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पाकिस्तान में कैसे खत्म हुआ लोकतंत्र? सेना ने कैसे बढ़ाई अपनी ताकत, साइफर कांड से लेकर संविधान बदलने तक की पूरी कहानी

अप्रैल 2022 पाकिस्तान की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है। इसी समय इमरान खान को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया। आधिकारिक तौर पर इसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए संवैधानिक प्रक्रिया बताया गया, लेकिन पाकिस्तान के अंदर और बाहर इसे सत्ता संतुलन बदलने वाली घटना माना गया...

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📍इस्लामाबाद | 18 May, 2026, 3:55 PM

Pakistan Army Cipher controversy: पाकिस्तान की सेना ने पिछले चार सालों में सत्ता पर इस कदर पकड़ बना ली है कि अब वह देश की असली ताकत बन चुकी है। प्रधानमंत्री शहबाद शरीफ कहीं भी जाते हैं, तो साथ में कथित फील्ड मार्शल साथ जरूर आते हैं। वहीं, अब पाकिस्तानी सेना की सारी कारस्तानियां खुल कर सामने आ रही हैं। पहले जो बातें पर्दे के पीछे से होती थीं, अब वे खुले आम सबको पता रही हैं।

इमरान खान को प्रधानमंत्री के पद से हटाने से लेकर संविधान में 27वां संशोधन करने तक, सेना ने हर कदम सोच-समझकर उठाया। इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ रहा I-0678 साइफर नाम का एक डिप्लोमैटिक संदेश, जिसे पहले इमरान खान ने विदेशी साजिश बताया और बाद में सेना ने इसे उनके खिलाफ हथियार बना दिया।

ड्रॉप साइट की विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच पाकिस्तान में जो घटनाएं घटीं, उन्होंने देश के सिविल-मिलिट्री सिस्टम को पूरी तरह बदल दिया। सेना ने राजनीतिक गठजोड़, मीडिया नैरेटिव, अदालतों और संवैधानिक बदलावों के जरिए अपनी स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत कर ली है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब पाकिस्तान में सेना अब देश की असली सत्ता बन चुकी है।

Pakistan Army Cipher controversy: इमरान सरकार गिरने के बाद शुरू हुआ खेल 

अप्रैल 2022 पाकिस्तान की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है। इसी समय इमरान खान को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया। आधिकारिक तौर पर इसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए संवैधानिक प्रक्रिया बताया गया, लेकिन पाकिस्तान के अंदर और बाहर इसे सत्ता संतुलन बदलने वाली घटना माना गया।

रिपोर्ट के मुताबिक इमरान खान की विदेश नीति सेना और पश्चिमी देशों दोनों को असहज कर रही थी। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से ठीक पहले उनका मॉस्को दौरा काफी विवादित रहा। उन्होंने कई मौकों पर अमेरिकी नीतियों का खुलकर विरोध किया और पाकिस्तान की रणनीतिक स्वतंत्रता की बात की। इससे सेना और पश्चिमी देशों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं।

तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के दौर में संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और इमरान खान की सरकार गिर गई। इसके बाद शहबाज शरीफ के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार बनी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार बदलने के बाद पाकिस्तान की विदेश नीति में भी बदलाव आया। अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारे गए और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से आर्थिक मदद का रास्ता साफ हुआ। इसी दौरान यह भी आरोप लगे कि पाकिस्तान ने यूक्रेन को अप्रत्यक्ष रूप से हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने में मदद की।

चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की कोशिश

सरकार बदलने के बाद पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका दोनों के साथ रिश्तों को संतुलित रखने की कोशिश की। चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार तो बना रहा, लेकिन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपेक) प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसके पीछे सुरक्षा संबंधी समस्याएं, कर्ज और प्रशासनिक अड़चनें बड़ी वजह बताई गईं।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि सेना ने अमेरिका को यह संदेश देने की कोशिश की कि पाकिस्तान अब भी इस क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अहम देश है। दूसरी तरफ चीन को भरोसा दिलाया गया कि पाकिस्तान की नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।

क्या था आई-0678 साइफर?

इमरान खान सरकार गिरने के बाद पाकिस्तान की राजनीति में “आई-0678 साइफर” सबसे बड़ा विवाद बन गया। यह एक राजनयिक संदेश था, जिसे वॉशिंगटन स्थित पाकिस्तान दूतावास से इस्लामाबाद भेजा गया था। इसमें अमेरिकी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत का जिक्र था।

इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई ने दावा किया कि यह दस्तावेज इस बात का सबूत है कि अमेरिका उनकी सरकार से नाराज था और सत्ता परिवर्तन में उसकी भूमिका हो सकती है। खान ने कई रैलियों में साइफर का जिक्र करते हुए इसे विदेशी साजिश बताया।

लेकिन बाद में यही साइफर उनके खिलाफ इस्तेमाल होने लगा। सेना समर्थित सिस्टम ने आरोप लगाया कि इमरान खान और पीटीआई नेताओं ने गोपनीय सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक किए और देश के गोपनीय राज लीक किए। इसके बाद साइफर केस पाकिस्तान की राजनीति का सबसे बड़ा आपराधिक मामला बन गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह केवल एक कानूनी मामला नहीं था, बल्कि सेना की नैरेटिव मैनेजमेंट रणनीति का हिस्सा था। जिस दस्तावेज से सरकार और सेना पर सवाल उठ सकते थे, उसी को विपक्ष को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया गया।

साइफर सार्वजनिक होने के बाद क्या बदला?

बाद में जब साइफर के कुछ हिस्से सार्वजनिक हुए तो पाकिस्तान में बहस और तेज हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक इससे यह साफ नहीं हुआ कि कोई सीधी विदेशी साजिश थी, बल्कि यह सवाल खड़ा हो गया कि सेना और सिक्युरिटी इंस्टीट्यूशंस ने इस दस्तावेज का इस्तेमाल घरेलू राजनीति को प्रभावित करने के लिए कैसे किया।

अब यह विवाद केवल अमेरिका या विदेशी दखल का नहीं रहा, बल्कि यह सेना की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल बन गया। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था ने कूटनीतिक घटनाओं को घरेलू राजनीतिक हथियार में बदल दिया।

पीटीआई पर सबसे बड़ी कार्रवाई

इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी पीटीआई इस दौरान पाकिस्तान में सबसे बड़ा जन आंदोलन बन चुकी थी। शहरी युवा, मध्यम वर्ग, विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी और पारंपरिक राजनीतिक दलों से नाराज लोग बड़ी संख्या में पीटीआई के साथ जुड़े।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पीटीआई सेना के पारंपरिक राजनीतिक रोल को चुनौती दे रही थी। पार्टी आर्थिक सुधार, जवाबदेही और स्वतंत्र विदेश नीति की बात कर रही थी। यही वजह थी कि इसे संस्थागत चुनौती माना गया।

मई 2023 में जब इमरान खान की गिरफ्तारी हुई तो पूरे पाकिस्तान में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। कई जगह सेना की इमारतों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इसके बाद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू हुई।

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पीटीआई नेताओं को गिरफ्तार किया गया, कई नेताओं पर दबाव डालकर पार्टी छोड़वाई गई, चुनाव लड़ने से रोका गया और लंबी कानूनी कार्रवाई में फंसाया गया। मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी गई और सोशल मीडिया पर सेना विरोधी सामग्री को अपराध की तरह देखा जाने लगा।

रिपोर्ट के मुताबिक सेना का संदेश साफ था, कोई भी ऐसा नेता जो सेना से अलग अपनी राजनीतिक ताकत खड़ी करेगा, उसे कमजोर कर दिया जाएगा।

2024 चुनाव और “मैनेज्ड डेमोक्रेसी”

फरवरी 2024 के चुनाव से पहले पाकिस्तान की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी थी। पीटीआई से उसका चुनाव चिह्न छीन लिया गया और पार्टी उम्मीदवारों को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा। कई नेताओं पर कानूनी और प्रशासनिक प्रतिबंध लगाए गए।

चुनाव के बाद जो संसद बनी उसमें पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज और सेना समर्थित दलों की स्थिति मजबूत रही। विपक्ष और कई विश्लेषकों ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए, लेकिन सेना समर्थित व्यवस्था का उद्देश्य पूरा हो गया।

रिपोर्ट में इसे “मैनेज्ड डेमोक्रेसी” कहा गया है। यानी लोकतंत्र तो मौजूद है, लेकिन असली नियंत्रण सेना के हाथ में है। नागरिक सरकारें महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक समस्याओं का बोझ उठाती रहीं, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और बड़े फैसलों पर सेना का नियंत्रण बना रहा।

आसिम मुनीर के दौर में बढ़ी सैन्य ताकत

नवंबर 2022 में जनरल सैयद आसिम मुनीर पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने। रिपोर्ट के मुताबिक इमरान खान के साथ उनके संबंध पहले से तनावपूर्ण रहे थे। सेना प्रमुख बनने के बाद उन्होंने इंस्टीट्यूशनल कंट्रोल और मजबूत किया।

उनके कार्यकाल में पीटीआई के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई। सेना समर्थित मीडिया नैरेटिव में विरोध प्रदर्शनों को “राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा” बताया गया।

भारत के साथ तनाव ने बदली राजनीति

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव बढ़ गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि ड्रोन हमलों, गोलीबारी और सीमा पार जवाबी कार्रवाई ने पाकिस्तान में राष्ट्रवादी माहौल पैदा कर दिया।

सेना ने खुद को देश का सबसे बड़ा रक्षक बताया। इस दौरान आर्थिक समस्याएं और राजनीतिक विवाद पीछे चले गए। रिपोर्ट के मुताबिक इसी माहौल में जनरल आसिम मुनीर की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

बाद में उन्होंने खुद को स्वयंभू फील्ड मार्शल घोषित किया, जो पाकिस्तान के इतिहास में बेहद असाधरण पद माना जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाहरी खतरे ने सेना को अपनी ताकत को और ज्यादा मजबूत करने का मौका दिया।

27वां संविधान संशोधन क्यों अहम?

नवंबर 2025 में पाकिस्तान में 27वां संविधान संशोधन पारित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार यह बदलाव पाकिस्तान के सिविल-मिलिट्री संबंधों में सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

इस संशोधन के तहत “चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज” यानी सीडीएफ का नया पद बनाया गया। इससे सेना प्रमुख को तीनों सेनाओं पर व्यापक अधिकार मिल गए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव से सैन्य नेतृत्व का कार्यकाल बढ़ाया गया और रणनीतिक तथा परमाणु कमांड व्यवस्था को और केंद्रीकृत किया गया। पहले मौजूद संतुलन व्यवस्था कमजोर पड़ गई।

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इसका असर सेना के अंदर भी दिखाई दिया। कई वरिष्ठ अधिकारियों को समय से पहले रिटायर होना पड़ा। वायु सेना और नौसेना के प्रशासनिक क्षेत्रों में भी थल सेना का प्रभाव बढ़ गया।

क्यों कमजोर हुई संसद की भूमिका?

रिपोर्ट के मुताबिक संसद में मौजूद सेना समर्थित दलों ने इन बदलावों का ज्यादा विरोध नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि जो सैन्य प्रभाव पहले अनौपचारिक माना जाता था, वह अब संवैधानिक ढांचे का हिस्सा बन गया।

यानी पाकिस्तान में सेना की भूमिका अब केवल पर्दे के पीछे की शक्ति नहीं रही, बल्कि उसे कानूनी और संवैधानिक आधार भी मिल गया।

अमेरिका, चीन और ईरान के बीच संतुलन

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की सेना ने अमेरिका और चीन दोनों के साथ रिश्तों को अपने रणनीतिक हितों के हिसाब से इस्तेमाल किया।

घरेलू राजनीति में सेना ने खुद को विदेशी दखल के खिलाफ “रक्षक” बताया, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका के साथ सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग जारी रखा। चीन के साथ भी साझेदारी बनाए रखी गई।

ईरान के साथ रिश्तों को लेकर भी रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की नीति पूरी तरह रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से तय होती रही। अगर कोई रिश्ता अमेरिका, खाड़ी देशों या घरेलू सत्ता संतुलन को प्रभावित करता दिखा, तो उसे सीमित रखा गया।

संकटों के जरिए ताकत बढ़ाने का मॉडल

रिपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा वह है जिसमें पाकिस्तान की सेना की रणनीति को “कंट्रोल्ड इंस्टेबिलिटी” यानी नियंत्रित अस्थिरता बताया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार सेना ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी नेता इतना मजबूत न हो जाए कि वह सेना से स्वतंत्र होकर फैसले ले सके। घरेलू संकट, राजनीतिक अशांति, कूटनीतिक विवाद और सीमा तनाव जैसे हालातों का इस्तेमाल सेना ने अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए किया।

इसके साथ ही आईएमएफ वार्ता, विदेशी निवेश, सुरक्षा साझेदारी और सैन्य कारोबार से जुड़ी आर्थिक ताकत ने भी सेना की स्थिति मजबूत की। मीडिया कैंपेन, चुनिंदा लीक और अदालतों के जरिए नैरेटिव को नियंत्रित रखा गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में नागरिक नेताओं को तभी तक स्वीकार किया जाता है, जब तक वे सेना की तय सीमाओं के भीतर रहें। जो नेता अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करते हैं, उन्हें धीरे-धीरे अलग-थलग कर दिया जाता है।

2026 तक आते-आते पाकिस्तान की सेना ने अपनी ताकत को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और संस्थागत रूप दे दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक अब सैन्य प्रभाव केवल परंपरा या अनौपचारिक दबाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह सीधे राज्य व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।

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