📍नई दिल्ली | 23 May, 2026, 6:11 PM
Pakistan TPS-77 Radar: पाकिस्तान एयर फोर्स ने सरगोधा के पास स्थित किराना हिल्स के टॉप पर आधुनिक TPS-77 रडार तैनात किया है। हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में इस नए रडार सिस्टम की मौजूदगी दिखाई दी है। पाकिस्तान ने यह कदम सरगोधा एयरबेस की सुरक्षा मजबूत करने और कम ऊंचाई पर आने वाले खतरों का जल्दी पता लगाने के लिए उठाया है।
किराना हिल्स पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित एक पहाड़ी इलाका है, जो लंबे समय से सैन्य गतिविधियों और रडार स्टेशन के लिए जाना जाता रहा है। बताया जाता है कि यहां 1968 से अलग-अलग तरह के एयर डिफेंस रडार तैनात होते रहे हैं। पहले यहां प्लासी AR-1 और बाद में AN/TPS-43 जैसे रडार लगाए गए थे। इसके बाद चीनी YLC सीरीज के रडार भी यहां इस्तेमाल किए गए। अब पाकिस्तान ने यहां अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन का TPS-77 रडार लगाया है।
Pakistan TPS-77 Radar: सरगोधा एयरबेस के लिए अहम माना जा रहा रडार
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक किराना हिल्स की ऊंचाई लगभग 320 मीटर है, जो पाकिस्तान को रणनीतिक फायदा देती है। यह इलाका सरगोधा एयरबेस से करीब 18 से 20 किलोमीटर दूर है। ऊंचाई पर रडार लगाने से कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों, ड्रोन और दूसरे “टेरेन हगिंग” हथियारों को जल्दी ट्रैक करना आसान हो जाता है।
सरगोधा एयरबेस को पाकिस्तान एयर फोर्स बेस मुशाफ भी कहा जाता है, पाकिस्तान वायु सेना के सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों में गिना जाता है। सरगोधा एयरबेस को पाकिस्तान एयर फोर्स का “क्राउन ज्वेल” भी माना जाता है। यहां एफ-16 और जेएफ-17 जैसे लड़ाकू विमान तैनात रहते हैं। यह पाकिस्तान एयर फोर्स के सेंट्रल एयर कमांड का मुख्य केंद्र भी माना जाता है।
वहीं, TPS-77 रडार को किराना हिल्स पर तैनात करने का मुख्य मकसद इस एयरबेस को बेहतर “अर्ली वार्निंग” देना है, ताकि किसी भी हवाई खतरे का पहले से पता लगाया जा सके।
क्या है TPS-77 रडार की खासियत
TPS-77 एक आधुनिक 3D लॉन्ग रेंज एयर सर्विलांस रडार है, जिसे अमेरिकी रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने डेवलप किया है। यह रडार लंबी दूरी तक हवाई गतिविधियों को ट्रैक कर सकता है। इसकी रेंज लगभग 450 से 470 किलोमीटर तक है। वहीं इसकी कवरेज हाइट 30 किमी तक है।
यह रडार खास तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसमें ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमान शामिल हैं।
वहीं, यह रडार एक साथ हजार से ज्यादा एरियल टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसकी एक और बड़ी खासियत यह है कि इसे जल्दी एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। ट्रक, ट्रेन और सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान की मदद से इसे शिफ्ट किया जा सकता है।
TPS-77 कैसे करेगा काम
TPS-77 रडार नाटो कम्पैटेबल तकनीक मानी जाती है, यानी इसे दूसरे एयर डिफेंस और कमांड नेटवर्क के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है।
रडार से मिलने वाला पूरा डेटा सीधे पाकिस्तान एयर फोर्स के एयर डिफेंस कमांड एंड कंट्रोल (C2) सेंटर तक पहुंचता है। सरगोधा क्षेत्र में पाकिस्तान का एक प्रमुख C2 नेटवर्क मौजूद है, जहां अलग-अलग रडार और एयर डिफेंस सिस्टम से आने वाली जानकारी को एक साथ जोड़ा जाता है।
TPS-77 से मिला डेटा पाकिस्तान के अवॉक्स विमानों, जैसे साब एरीआई और केजे-500, दूसरे ग्राउंड रडार सिस्टम जैसे YLC सीरीज और TPS-43, साथ ही सरफेस टू एयर मिसाइल बैटरियों के साथ भी शेयर किया जाता है।
इसके बाद C2 सेंटर पूरे एयरस्पेस की स्थिति का विश्लेषण करता है। वहां मौजूद ऑपरेटर्स और नेटवर्क सिस्टम यह तय करते हैं कि किस खतरे को कौन सा एयर डिफेंस सिस्टम इंटरसेप्ट करेगा।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई कम ऊंचाई पर उड़ती क्रूज मिसाइल या ड्रोन दिखाई देता है, तो C2 सेंटर उसके रास्ते, गति और ऊंचाई का विश्लेषण करके सबसे उपयुक्त मिसाइल सिस्टम या फाइटर एयरक्राफ्ट को निर्देश भेजता है। इसी प्रक्रिया को “एंगेजमेंट” कहा जाता है।

2025 के बाद बढ़ी टेंशन
रक्षा सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान ने यह कदम 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया है। उस दौरान भारतीय हमलों में सरगोधा क्षेत्र के कुछ एयर डिफेंस सिस्टम और मिलिट्री स्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा था। भारत की तरफ से की गई प्रिसिजन स्ट्राइक में सरगोधा एय़रबेस के रनवे पर देखा गया। एयरबेस के मुख्य रनवे पर करीब 15 फीट रेडियस का बड़ा गड्ढा हुआ था, जबकि दूसरा गड्ढा रनवे इंटरसेक्शन के पास था। इन हमलों के बाद एयरबेस कुछ समय के लिए बेकार हो गया था।
इस हमले में कुछ ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट, ट्रांसपोर्ट वाहन और मिलिट्री स्ट्रक्चर को भी नुकसान पहुंचा था। पाकिस्तान ने सरगोधा में एक एयरमैन की मौत और कुछ जवानों के घायल होने की पुष्टि भी की थी। हमले के बाद पाकिस्तान ने तेजी से रनवे की मरम्मत शुरू कर दी थी। और 2026 तक भी कुछ हिस्सों में रिपेयर का काम जारी था।
इसके बाद पाकिस्तान ने अपने बचे हुए एयर डिफेंस संसाधनों को ज्यादा सुरक्षित और रणनीतिक स्थानों पर तैनात करना शुरू किया। माना जा रहा है कि TPS-77 रडार को भी इसी रणनीति के तहत सरगोधा एयरबेस से हटाकर किराना हिल्स के ऊंचे इलाके में लगाया गया है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों और ड्रोन से निपटना आज किसी भी एयर फोर्स के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से पाकिस्तान अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
किराना हिल्स पहले भी रहा है संवेदनशील इलाका
किराना हिल्स का नाम पहले भी कई बार चर्चा में आ चुका है। यह इलाका पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा माना जाता रहा है। इसे संभावित न्यूक्लियर वॉरहेड स्टोरेज और सब-क्रिटिकल टेस्टिंग साइट बताया गया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने किराना हिल्स के फुट एंट्रेंस एरिया को ब्रह्मोस मिसाइलों ने हिट किया था। जिसके बाद पाकिस्तान ने इसे न्यूक्लियर साइट पर अटैक बता कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने की कोशिश की थी, लेकिन भारत ने इस हमले से इनकार किया था।
इसी वजह से यह इलाका लंबे समय से पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। अब यहां आधुनिक TPS-77 रडार लगाए जाने से इसकी सैन्य अहमियत और बढ़ गई है।
पाकिस्तान का एयर डिफेंस नेटवर्क
सरगोधा एयरबेस की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान कई स्तरों वाला एयर डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल करता है। इसमें लंबी दूरी से लेकर छोटी दूरी तक मार करने वाले मिसाइल सिस्टम शामिल हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान के पास चीनी एचक्यू-9 और एचक्यू-16 जैसे सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं। इसके अलावा इटली का SPADA-2000 और फ्रांस का क्रोटाल सिस्टम भी उसकी एयर डिफेंस व्यवस्था का हिस्सा हैं। कम दूरी की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान मैनपैड्स और एंटी एयरक्राफ्ट गन भी इस्तेमाल करता है।



