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चीन की टेंशन बढ़ाएगा भारत का ‘ब्रह्मास्त्र’! वियतनाम बना ब्रह्मोस मिसाइल का खरीदार, अब इंडोनेशिया की बारी

Vietnam BrahMos Missile Deal
Brahmos WPN System passes through the Rajpath during the full dress rehearsal for the Republic Day Parade-2016, in New Delhi on January 23, 2016 (Photo- PIB)

Vietnam BrahMos Missile Deal: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब दुनिया के कई देशों की पसंद बनती जा रही है। फिलीपींस के बाद अब वियतनाम ने भी भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल खरीद समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। वहीं इंडोनेशिया के साथ भी डील अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस बात की पहली आधिकारिक पुष्टि सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने की।

रक्षा विशेषज्ञ इस डील को सिर्फ हथियार बिक्री नहीं बल्कि एशिया में बदलते सामरिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। खासकर दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच भारत की यह रक्षा साझेदारी बेहद अहम मानी जा रही है। भारत अब केवल दुनिया का बड़ा हथियार आयातक देश नहीं रहा, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक बेचने वाला उभरता रक्षा निर्यातक बन चुका है।

Vietnam BrahMos Missile Deal: शांगरी-ला डायलॉग में हुआ बड़ा खुलासा

सिंगापुर में आयोजित 23वें शांगरी-ला डायलॉग में एशिया, यूरोप और पश्चिमी देशों के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी और रणनीतिक विशेषज्ञ मौजूद थे। इसी मंच पर भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस डील साइन हो चुकी है, हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि वियतनाम और इंडोनेशिया दोनों के साथ बातचीत अंतिम चरण में थी और वियतनाम के मामले में समझौता पहले ही हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल उन्हीं मित्र देशों के साथ इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करता है, जिन पर भरोसा किया जा सके।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से बनी ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यही वजह है कि कई एशियाई देश अब इसे अपनी नौसैनिक सुरक्षा का अहम हिस्सा बनाना चाहते हैं।

कितनी बड़ी है वियतनाम डील

सूत्रों के मुताबिक वियतनाम के साथ हुई ब्रह्मोस डील की कीमत लगभग 5,800 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इस पैकेज में तटीय रक्षा के लिए मिसाइल बैटरियां, शुरुआती मिसाइल सप्लाई, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है।

बताया जा रहा है कि वियतनाम भविष्य में एयर लॉन्च वर्जन यानी लड़ाकू विमान से दागी जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइल में भी रूचि दिखाई है। इससे उसकी समुद्री मारक क्षमता में और इजाफा होगा।

भारत और वियतनाम के बीच पिछले कुछ महीनों में रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। मई 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम भारत आए थे। इसके कुछ ही दिनों बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हनोई का दौरा किया। इसी दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी पर विस्तार से चर्चा की थी।

मार्च में भारतीय डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स की एक टीम भी वियतनाम गई थी, जहां डिफेंस प्रोक्योरमेंट को लेकर बातचीत हुई थी।

इंडोनेशिया भी खरीदना चाहता है ब्रह्मोस

वियतनाम के बाद अब इंडोनेशिया को ब्रह्मोस का अगला बड़ा ग्राहक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। अनुमान है कि यह डील लगभग 450 मिलियन डॉलर की हो सकती है।

भारत और इंडोनेशिया ने इसके लिए जॉइंट डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन कमेटी भी बनाई है। इसके तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट रिसर्च, सप्लाई चेन और रक्षा उत्पादन सहयोग पर काम हो रहा है।

इंडोनेशिया लंबे समय से अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री इलाकों में चीन की गतिविधियों के कारण वह आधुनिक एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम चाहता है। ब्रह्मोस उसकी इसी जरूरत को पूरा कर सकती है।

फिलीपींस पहले ही इस्तेमाल कर रहा है ब्रह्मोस

फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना था। जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच करीब 375 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,770 करोड़ रुपये की डील हुई थी।

फिलीपींस ने 2024 से इन मिसाइलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। वहां इन मिसाइलों को तटीय रक्षा के लिए तैनात किया गया है। फिलीपींस और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है। ऐसे में ब्रह्मोस को वहां गेम चेंजर हथियार माना जा रहा है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

आखिर इतनी खास क्यों है ब्रह्मोस मिसाइल

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी को मिलाकर रखा गया है। यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है।

एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज करीब 290 किलोमीटर है। यह जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से दागी जा सकती है। इसकी गति आवाज की रफ्तार से लगभग तीन गुना ज्यादा है, जिससे दुश्मन के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।

ब्रह्मोस बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हुए दुश्मन के जहाज या सैन्य ठिकाने पर सटीक हमला कर सकती है। इसकी सटीकता और तेज गति ही इसे दूसरे मिसाइल सिस्टम से अलग बनाती है।

भारतीय सेना और नौसेना लंबे समय से इसका इस्तेमाल कर रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की मारक क्षमता चर्चा में रही थी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी मांग

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस को लेकर दुनिया का भरोसा और बढ़ा। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता ने कई देशों का ध्यान खींचा।

ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम ने बेहद सटीक तरीके से टारगेट्स को हिट किया और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव बनाया। इसके बाद कई देशों ने भारतीय रक्षा तकनीक में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

चीन की बढ़ती चिंता

दक्षिण चीन सागर में चीन लंबे समय से अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों का चीन के साथ समुद्री विवाद भी है। ऐसे में इन देशों के पास ब्रह्मोस जैसी तेज एंटी-शिप मिसाइलों का पहुंचना चीन के लिए रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक अगर दक्षिण चीन सागर के कई तटीय देशों के पास ब्रह्मोस तैनात हो जाती है तो चीन की समुद्री रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत भी इसे केवल रक्षा निर्यात नहीं बल्कि अपनी “एक्ट ईस्ट” नीति और क्षेत्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में देख रहा है।

इंर्पोटर से एक्सपोर्टर बना भारत

दशकों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश माना जाता था। लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और मिसाइल सिस्टम तक के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर था। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 2.76 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह पिछले साल की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार का लक्ष्य 2030 तक रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसी डील्स इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

केवल दोस्त देशों को मिलती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री को लेकर एक खास शर्त भी है। क्योंकि यह भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है, इसलिए इसे केवल उन्हीं देशों को बेचा जा सकता है जो दोनों देशों के “फ्रेंडली फॉरेन कंट्री” माने जाते हों।

इसी वजह से हर देश को यह मिसाइल नहीं दी जाती। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी साफ कहा कि वियतनाम उन मित्र देशों में शामिल है जिनके साथ भारत ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करने को तैयार है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

मलेशिया और थाईलैंड भी संपर्क में

सूत्रों के मुताबिक मलेशिया और थाईलैंड भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को लेकर भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अगर ये डील्स भी आगे बढ़ती हैं तो दक्षिण चीन सागर के आसपास कई देशों के पास भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम मौजूद होगा। इससे भारत की रक्षा कूटनीति और मजबूत होती दिखाई दे रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

भारत की डिफेंस डिप्लोमेसी को मिली नई पहचान

ब्रह्मोस डील्स को भारत की नई डिफेंस डिप्लोमेसी का हिस्सा माना जा रहा है। भारत अब केवल सैन्य अभ्यास या राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीक के जरिए भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।

वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग यह दिखाता है कि एशिया में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। ब्रह्मोस अब केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि भारत की सैन्य क्षमता, तकनीकी ताकत और रणनीतिक भरोसे का प्रतीक बनती जा रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

लखनऊ में हुआ नौसेना शौर्य वाटिका का उद्घाटन, INS गोमती के मिसाइल लॉन्चर, टॉरपीडो और TU-142M विमान होंगे आकर्षण

Nausena Shaurya Vatika

Nausena Shaurya Vatika: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भारतीय नौसेना की वीरता, समुद्री ताकत और सैनिकों के बलिदान को समर्पित नौसेना शौर्य वाटिका अब आम लोगों के लिए खोल दी गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश की मौजूदगी में 30 मई को इस ओपन एयर डिस्प्ले म्यूजियम का उद्घाटन हुआ। करीब 19 करोड़ रुपये की लागत से दो एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में तैयार की गई यह वाटिका भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता, तकनीक और शौर्य को करीब से दिखाती है।

इस शौर्य वाटिका में भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस गोमती से जुड़े हथियार, रडार, मिसाइल लॉन्चर, टॉरपीडो सिस्टम और कई असली सैन्य उपकरण लगाए गए हैं। इसके अलावा लंबे समय तक समुद्री निगरानी करने वाले टीयू-142एम एयरक्राफ्ट का वॉकथ्रू म्यूजियम भी बनाया गया है। उद्घाटन कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने कहा कि यह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश की सुरक्षा और सैनिकों के बलिदान का एहसास कराने वाला प्रेरणा केंद्र है।

Nausena Shaurya Vatika: नौसेना की ताकत को करीब से दिखाएगी शौर्य वाटिका

लखनऊ में बनाई गई नौसेना शौर्य वाटिका को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यहां आने वाले लोग भारतीय नौसेना की असली ताकत को समझ सकें। पार्क में आईएनएस गोमती पर इस्तेमाल होने वाले कई हथियार और सैन्य सिस्टम लगाए गए हैं। इनमें एके-726 नेवल गन, सरफेस टू एयर मिसाइल लॉन्चर, सरफेस टू सरफेस एंटी शिप मिसाइल सिस्टम, जहाज का रडार, टॉरपीडो लॉन्चर, एंकर और जहाज के मस्तूल शामिल हैं।

इन उपकरणों को इस तरह प्रदर्शित किया गया है ताकि आम लोग समझ सकें कि युद्धपोत समुद्र में किस तरह काम करते हैं और नौसेना समुद्री सीमाओं की रक्षा कैसे करती है। पार्क में आधुनिक लाइटिंग और साउंड सिस्टम भी लगाया गया है, जिससे रात में इसका दृश्य और आकर्षक दिखाई देता है। इसके साथ ही फूड कोर्ट और सोवेनियर शॉप जैसी सुविधाएं भी बनाई गई हैं।

Nausena Shaurya Vatika

रक्षा मंत्री बोले- आज समुद्री सुरक्षा सबसे बड़ी जरूरत

उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद जरूरी हो गई है। उन्होंने कहा कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से चलता है। ऐसे में समुद्री सुरक्षा केवल सैन्य जरूरत नहीं बल्कि वैश्विक शांति और समृद्धि का भी आधार है।

उन्होंने भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल तैयारी की तारीफ करते हुए कहा कि भारतीय नौसेना हर परिस्थिति में देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम है। राजनाथ सिंह ने कहा कि नौसेना शौर्य वाटिका युवाओं में राष्ट्र निर्माण और सेना के प्रति सम्मान की भावना पैदा करेगी।

उन्होंने कहा कि देश की आजादी और सुरक्षा की असली कीमत सैनिकों के त्याग और बलिदान से समझी जा सकती है। यह वाटिका उसी भावना को जीवित रखने का प्रयास है।

ऑपरेशन सिंदूर में नौसेना की भूमिका का जिक्र

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय नौसेना ने अरब सागर में जिस तरह अपनी मजबूत मौजूदगी दिखाई, उससे पाकिस्तान नौसेना दबाव में आ गई थी।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय नौसेना की आक्रामक और मजबूत तैनाती का असर यह हुआ कि पाकिस्तान नौसेना अपने बंदरगाहों तक सीमित रही। उन्होंने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना तीनों की संयुक्त भूमिका की सराहना की।

उन्होंने कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों की बढ़ती ताकत सरकार की रणनीतिक योजना और लगातार किए गए प्रयासों का परिणाम है।

आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन पर सरकार का जोर

रक्षा मंत्री ने कार्यक्रम में आत्मनिर्भर भारत अभियान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश को वास्तव में मजबूत तब माना जाएगा जब सेना को हथियारों और सैन्य उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि मेक इन इंडिया, डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, आईडैक्स और अदिति जैसी योजनाओं के जरिए भारत अब आधुनिक हथियार खुद बना रहा है। भारतीय रक्षा उद्योग अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है बल्कि कई मित्र देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात भी किया जा रहा है।

राजनाथ सिंह ने बताया कि 2014 में भारत का रक्षा उत्पादन लगभग 46 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। वहीं रक्षा निर्यात भी एक हजार करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहा है और राज्य में रक्षा उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है।

योगी आदित्यनाथ ने सैनिकों को बताया देश की सुरक्षा की ढाल

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कार्यक्रम में भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि देश के जवान सीमाओं पर तैनात रहते हैं, तभी देश का हर नागरिक चैन की नींद सो पाता है।

उन्होंने कहा कि विकास योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं जब देश सुरक्षित हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकसित भारत विजन सैनिकों के सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश अब रक्षा उत्पादन का बड़ा केंद्र बन रहा है और राज्य में रक्षा उद्योग को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।

Nausena Shaurya Vatika

नौसेना का गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट था आईएनएस गोमती

नौसेना शौर्य वाटिका का सबसे बड़ा आकर्षण आईएनएस गोमती से जुड़े सैन्य उपकरण हैं। आईएनएस गोमती भारतीय नौसेना का गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट था। इसका नाम उत्तर प्रदेश की गोमती नदी पर रखा गया था।

इस युद्धपोत को 16 अप्रैल 1988 को मझगांव डॉक लिमिटेड में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह गोदावरी क्लास का तीसरा युद्धपोत था। 34 साल तक सेवा देने के बाद 29 मई 2022 को इसे डीकमीशन किया गया।

सेवा के दौरान आईएनएस गोमती ने कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में हिस्सा लिया। इनमें ऑपरेशन कैक्टस, ऑपरेशन पराक्रम और ऑपरेशन रेनबो शामिल रहे। इसके अलावा इस युद्धपोत ने कई द्विपक्षीय और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यासों में भी भाग लिया।

भारतीय समुद्री सुरक्षा में बेहतरीन योगदान के लिए आईएनएस गोमती को दो बार यूनिट साइटेशन अवॉर्ड भी दिया गया। पहली बार 2007-08 में और दूसरी बार 2019-20 में यह सम्मान मिला।

टीयू-142एम एयरक्राफ्ट भी आकर्षण का केंद्र

नौसेना शौर्य वाटिका में टीयू-142एम समुद्री निगरानी विमान का वॉकथ्रू म्यूजियम भी बनाया गया है। यह विमान लंबे समय तक समुद्र में निगरानी करने और दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

हालांकि अब यह विमान भारतीय नौसेना की सक्रिय सेवा में नहीं है, लेकिन इसे भारतीय समुद्री सुरक्षा इतिहास का अहम हिस्सा माना जाता है। वाटिका में लोग इसके अंदर जाकर देख सकेंगे कि यह विमान किस तरह काम करता था और समुद्री मिशनों को कैसे अंजाम देता था।

नौसेना शौर्य वाटिका को केवल सैन्य संग्रहालय के रूप में नहीं बल्कि युवाओं और छात्रों के लिए प्रेरणा स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यहां आने वाले लोग भारतीय नौसेना की कार्यप्रणाली, समुद्री युद्ध तकनीक और सैनिकों के जीवन को करीब से समझ सकेंगे।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस तरह के संग्रहालय युवाओं में देशभक्ति की भावना मजबूत करते हैं और उन्हें सशस्त्र बलों के बारे में जागरूक बनाते हैं।

भारत की पहली मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज ‘प्रगति’ में नहीं पहुंचा बांग्लादेश, सैन्य अभ्यास से दूरी बनाकर क्या दे रहा संदेश?

Exercise Pragati 2026 in Umroi, Meghalaya
Background Pic is from Exercise Pragati 2026 in Umroi, Meghalaya and Ambassador Yao Wen Calls on Bangladeshi Prime Minister Tarique Rahman

Exercise Pragati 2026: भारत की पहली मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज ‘प्रगति 2026’ इस समय मेघालय के उमरोई फील्ड ट्रेनिंग नोड में चल रही है। इस युद्धाभ्यास में एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों की सेनाएं हिस्सा ले रही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बांग्लादेश की गैरमौजूदगी को लेकर हो रही है। बांग्लादेश को भी इस अभ्यास का न्योता भेजा गया था, लेकिन उसने इसमें भाग नहीं लिया।

वहीं बांग्लादेश के इस युद्धाभ्यास में नहीं शामिल होने को भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में बढ़ती दूरी के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि यह एक्सरसाइज उसी मेघालय इलाके में हो रही है, जहां पहले भारत और बांग्लादेश की संयुक्त सैन्य एक्सरसाइज ‘सम्प्रिति’ आयोजित होती थी।

भारत समेत कुल 13 देशों के 400 से ज्यादा सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं। इनमें भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, फिलीपींस, सेशेल्स, श्रीलंका और वियतनाम शामिल हैं। यह अभ्यास 20 मई से शुरू हुआ और 31 मई तक चलेगा। विदेशी सैन्य दलों का आना 18 मई से ही शुरू हो गया था।

Exercise Pragati 2026: क्या है एक्सरसाइज प्रगति

प्रगति’ का पूरा नाम “पार्टनरशिप ऑफ रीजनल आर्मीज फॉर ग्रोथ एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन द इंडियन ओशन रीजन” है। यह भारत की पहली ऐसी मल्टीनेशनल सैन्य एक्सरसाइज है, जिसमें कई देशों की सेनाएं एक साथ ट्रेनिंग ले रही हैं।

इस अभ्यास का मुख्य फोकस काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन है। सैनिकों को पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में आतंकवाद विरोधी कार्रवाई की ट्रेनिंग दी जा रही है। पूर्वोत्तर भारत का इलाका इसी तरह के कठिन भूभाग के लिए जाना जाता है, इसलिए उमरोई को इसके लिए चुना गया।

भारतीय सेना के अधिकारियों के मुताबिक अभ्यास का मकसद अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, आधुनिक युद्ध तकनीकों को साझा करना और संयुक्त ऑपरेशन क्षमता मजबूत करना है। (Exercise Pragati 2026)

अलग-अलग देशों के सैनिक एक साथ कर रहे ट्रेनिंग

इस सैन्य अभ्यास की एक खास बात यह है कि इसमें केवल अलग-अलग देशों की यूनिट्स नहीं बल्कि “मिक्स्ड टीम्स” बनाई गई हैं। यानी विभिन्न देशों के सैनिकों को मिलाकर टीम तैयार की गई है ताकि वे एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को समझ सकें।

अब तक सैनिकों ने जंगल वारफेयर, रॉक क्राफ्ट, एंबुश और काउंटर एंबुश ड्रिल, स्लिथरिंग और बस इंटरवेंशन ऑपरेशन जैसी ट्रेनिंग की है। इसके अलावा स्नाइपर फायरिंग और एके-203 राइफल शूटिंग प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।

सैनिकों के बीच आपसी तालमेल बढ़ाने के लिए बास्केटबॉल और वॉलीबॉल जैसी स्पोर्ट्स एक्टिविटीज भी कराई गईं। उद्घाटन समारोह में सभी विदेशी दलों का पारंपरिक भारतीय तरीके से स्वागत किया गया।

भारतीय सेना के एडिशनल डायरेक्टर जनरल इन्फैंट्री मेजर जनरल सुनील श्योराण ने उद्घाटन कार्यक्रम में कहा कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सेनाओं के बीच “कोहेशन”, “इंटरऑपरेबिलिटी” और “कलेक्टिव एंगेजमेंट” बेहद जरूरी हैं।

आखिर क्यों नहीं आया बांग्लादेश

बांग्लादेश की गैरमौजूदगी ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है क्योंकि भारत और बांग्लादेश के सैन्य रिश्ते पहले काफी मजबूत माने जाते थे। दोनों देशों के बीच ‘सम्प्रिति’ नाम की संयुक्त सैन्य एक्सरसाइज कई बार हो चुकी है।

उमरोई ट्रेनिंग नोड का बांग्लादेश सीमा से काफी नजदीकी होना इस मुद्दे को और ज्यादा संवेदनशील बना देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ढाका का इस अभ्यास से दूर रहना केवल सैन्य फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव की शुरुआत अगस्त 2024 के बाद मानी जाती है। उसी दौरान बड़े जनआंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और वे भारत आ गईं। तब से दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी दिखाई नहीं दी। (Exercise Pragati 2026)

चीन दौरे में मोहम्मद यूनुस के बयान से बढ़ा विवाद

तनाव उस समय और बढ़ गया जब मार्च 2025 में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस चीन दौरे पर गए। बीजिंग में एक बिजनेस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को “लैंडलॉक्ड” बताया और कहा कि बांग्लादेश इस पूरे क्षेत्र के लिए समुद्र तक पहुंच का “गार्डियन” है।

उन्होंने चीन से कहा कि वह इस स्थिति को आर्थिक अवसर के रूप में देख सकता है। इस बयान को भारत में काफी गंभीरता से लिया गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जवाब देते हुए कहा था कि भारत अपने पड़ोसी देशों को जोड़ने वाला मुख्य केंद्र है और क्षेत्रीय सहयोग किसी एक देश की पसंद के आधार पर नहीं चल सकता।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस बयान को “आपत्तिजनक” बताया था। (Exercise Pragati 2026)

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान पहले चीन जाएंगे

वहीं, बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने सत्ता संभालने के बाद अपने पहले विदेशी दौरे के लिए चीन को चुना है। जून के आखिर में उनकी बीजिंग यात्रा होने वाली है। इस दौरान वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात करेंगे। बातचीत में इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार और तीस्ता नदी परियोजना जैसे मुद्दे शामिल रहेंगे। बताया जा रहा है कि इस परियोजना के लिए चीन की एक्जिम बैंक फंडिंग भी दे सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत ने भी तारिक रहमान को यात्रा का न्योता दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले बधाई दी थी। इसके बावजूद बांग्लादेश ने चीन को पहली प्राथमिकता दी।

आमतौर पर बांग्लादेश समेत भारत के पड़ोसी देशों के नेता नई सरकार बनने के बाद सबसे पहले भारत आते रहे हैं। इसे भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति का हिस्सा माना जाता है। लेकिन इस बार यह परंपरा टूटती दिखाई दे रही है।

ढाका का कहना है कि चीन उसका बड़ा विकास साझेदार है और यह दौरा संतुलित विदेश नीति का हिस्सा है। वहीं भारत में इसे चीन की तरफ बढ़ते झुकाव के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी और तीस्ता परियोजना में चीन की भूमिका को लेकर भी नई दिल्ली नजर बनाए हुए है।

भारत ने वापस ली ट्रांसशिपमेंट सुविधा

बांग्लादेश के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारत ने 2020 में दी गई ट्रांसशिपमेंट सुविधा भी वापस ले ली। इस सुविधा के तहत बांग्लादेश को भारतीय एयरपोर्ट और बंदरगाहों का इस्तेमाल तीसरे देशों में निर्यात के लिए करने की अनुमति मिली थी।

2022 में इस व्यवस्था को और बढ़ाया गया था, लेकिन विवाद के बाद नई दिल्ली ने इसे खत्म कर दिया। इसे भारत की तरफ से मजबूत कूटनीतिक प्रतिक्रिया माना गया। (Exercise Pragati 2026)

पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ती नजदीकी से चिंता

नई दिल्ली में चिंता का एक बड़ा कारण बांग्लादेश का चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ता संपर्क भी माना जा रहा है। हाल के महीनों में ढाका और इस्लामाबाद के बीच रिश्तों में गर्मजोशी दिखाई दी है।

इसके अलावा तीस्ता नदी परियोजना को लेकर चीन की भूमिका पर भी भारत की नजर है। इस परियोजना में चीनी कंपनियों और विशेषज्ञों की भागीदारी की चर्चा हुई थी। भारतीय रणनीतिक हलकों में आशंका जताई गई कि इससे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीनी मौजूदगी बढ़ सकती है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर को “चिकन नेक” भी कहा जाता है। यह बेहद संवेदनशील इलाका है जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है।

भारत ने पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी पर बढ़ाया फोकस

बांग्लादेश पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स की रफ्तार तेज कर दी है। सरकार ने करीब 22,864 करोड़ रुपये की लागत वाली शिलांग-सिलचर फोर लेन हाईवे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाया है।

यह हाईवे म्यांमार के जरिए बनने वाले कलादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट से जुड़ने वाला है। इसका मकसद पूर्वोत्तर राज्यों को ऐसा वैकल्पिक समुद्री और जमीनी रास्ता देना है, जिसमें बांग्लादेश पर निर्भरता कम हो। (Exercise Pragati 2026)

कूटनीतिक स्तर पर भी बदलाव

भारत ने अप्रैल 2026 में बांग्लादेश में नए हाई कमिश्नर की नियुक्ति भी की। इस बार करियर डिप्लोमैट की जगह वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को ढाका भेजने का फैसला किया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दोनों देशों के रिश्तों को राजनीतिक स्तर पर संभालने की कोशिश के तौर पर देखा गया।

क्रिकेट से लेकर सैन्य मंच तक दिख रही दूरी

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में दूरी केवल सैन्य मामलों तक सीमित नहीं रही। जनवरी 2026 में बांग्लादेश ने भारत में होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप मुकाबलों में खेलने से इनकार कर दिया था। उसने सुरक्षा और राजनीतिक तनाव का हवाला देते हुए मैच श्रीलंका में कराने की मांग की थी। हालांकि आईसीसी ने यह मांग स्वीकार नहीं की।

अब एक्सरसाइज प्रगति से दूरी को उसी बड़े पैटर्न का हिस्सा माना जा रहा है। (Exercise Pragati 2026)

सेना के साथ ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रदर्शन भी

प्रगति एक्सरसाइज के साथ-साथ एक बड़ा डिफेंस इंडस्ट्री एक्सपो भी आयोजित किया गया है। फिक्की ने ईस्टर्न कमांड और आर्मी डिजाइन ब्यूरो के साथ मिलकर 30 और 31 मई को यह कार्यक्रम आयोजित किया।

इस दौरान आत्मनिर्भर भारत के तहत विकसित भारतीय सैन्य उपकरण, ड्रोन, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य डिफेंस टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया गया।

भारतीय सेना के अधिकारी और विदेशी सैन्य प्रतिनिधि इन स्वदेशी प्रणालियों को करीब से देख रहे हैं। एक्सपो का मकसद केवल तकनीक दिखाना नहीं बल्कि रक्षा सहयोग और इंडस्ट्री नेटवर्किंग को मजबूत करना भी बताया गया। (Exercise Pragati 2026)

अभ्यास के अंतिम चरण में पहुंची एक्सरसाइज

सूत्रों के मुताबिक प्रगति एक्सरसाइज अब अपने इंटेंसिव ऑपरेशनल फेज में पहुंच चुकी है। अंतिम दिनों में हाई इंटेंसिटी वैलिडेशन मिशन कराया जाएगा, जिसमें अलग-अलग देशों की मिश्रित टीमें मिलकर ऑपरेशन करेंगी।

इस दौरान सैनिकों की संयुक्त रणनीति, कम्युनिकेशन, फायरिंग और रेस्क्यू क्षमताओं का परीक्षण होगा। भारतीय सेना का मानना है कि इस तरह के अभ्यास आधुनिक युद्ध की बदलती चुनौतियों से निपटने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। (Exercise Pragati 2026)

Bangladesh has skipped India’s first multinational military exercise, Exercise Pragati 2026, currently underway in Meghalaya’s Umroi Field Training Node. The counter-terrorism exercise includes over 400 troops from 13 countries across South Asia, Southeast Asia, and the Indian Ocean region. Dhaka’s absence has drawn attention amid growing strategic tensions between India and Bangladesh since 2024. The exercise focuses on jungle warfare, joint tactical drills, sniper firing, and coordinated operations in semi-mountainous terrain. Analysts view Bangladesh’s decision as a diplomatic signal, especially as Dhaka deepens ties with China and Pakistan while India strengthens regional military cooperation and Northeast connectivity projects.

खड़कवासला से निकले 353 नए ‘वॉरियर’, NDA के 150वें कोर्स में 21 देशों के विदेशी कैडेट भी शामिल, सेना प्रमुख बोले- बदल चुका है युद्ध का तरीका

NDA Passing Out Parade 2026

NDA Passing Out Parade 2026: पुणे के खड़कवासला स्थित नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में शनिवार को पासिंग आउट परेड का आयोजन हुआ। एनडीए के 150वें कोर्स के 353 कैडेट्स ने अपनी ट्रेनिंग पूरी कर पासिंग आउट की। इनमें भारत के अलावा 21 मित्र देशों के कैडेट भी शामिल रहे। इस बार 18 महिला कैडेट्स ने भी परेड और ट्रेनिंग पूरी कर नई पहचान बनाई।

इस खास मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पासिंग आउट परेड की समीक्षा की और कैडेट्स को संबोधित किया। खास बात यह थी कि करीब 42 साल पहले वह खुद इसी परेड ग्राउंड से कैडेट के तौर पर निकले थे। वहीं, अब वह भारतीय सेना के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर उसी अकादमी में मुख्य अतिथि बने।

NDA Passing Out Parade 2026: सेना प्रमुख ने साझा किया अपना अनुभव

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कैडेट्स को संबोधित करते हुए कहा कि 42 साल पहले वह भी इसी परेड ग्राउंड पर खड़े थे और तब उनके मन में भी भविष्य को लेकर उत्साह और सवाल थे। उन्होंने कहा कि एनडीए सिर्फ एक ट्रेनिंग संस्थान नहीं है, बल्कि यह जीवनभर के लिए सोच, अनुशासन और नेतृत्व की नींव तैयार करता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब खतरे हमेशा पारंपरिक युद्ध की तरह सामने नहीं आते। कई बार दुश्मन सीमा के पार नहीं बल्कि साइबर, ड्रोन, इंफॉर्मेशन और टेक्नोलॉजी के जरिए भी चुनौती देता है। ऐसे माहौल में सैनिकों को केवल हथियार चलाना ही नहीं बल्कि तेजी से सोचने और सही फैसला लेने की क्षमता भी होनी चाहिए।

जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि हालिया ऑपरेशंस ने दिखाया कि भारत किस तरह तेज, सटीक और निर्णायक प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि आज के युवा अधिकारियों को इसी तरह की जिम्मेदारी निभानी होगी।

“सीखना कभी बंद मत करना”

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में कैडेट्स को लगातार सीखते रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अपने 40 साल से ज्यादा लंबे सैन्य जीवन में उन्होंने देखा कि सबसे अच्छे अधिकारी वही बने जो जीवनभर विद्यार्थी बने रहे।

उन्होंने कहा कि हर नई पोस्टिंग, हर नई जिम्मेदारी और हर ऑपरेशन से कुछ नया सीखने की कोशिश करनी चाहिए। केवल रैंक या मेडल ही अच्छे अधिकारी की पहचान नहीं होते, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में शांत रहना और सही नेतृत्व देना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

उन्होंने तीन अहम गुणों पर जोर दिया – एटीट्यूड, एडैप्टेबिलिटी और एबिलिटी। उनके मुताबिक एटीट्यूड यानी सोच सबसे मजबूत आधार होता है। एडैप्टेबिलिटी यानी बदलती परिस्थितियों में खुद को ढालने की क्षमता और एबिलिटी यानी नेतृत्व व निर्णय लेने की ताकत। (NDA Passing Out Parade 2026)

महिला कैडेट्स को लेकर कही बड़ी बात

इस बार की पासिंग आउट परेड में 18 महिला कैडेट्स भी शामिल रहीं। सेना प्रमुख ने कहा कि महिला कैडेट्स ने हर ट्रेनिंग, हर ड्रिल और हर चुनौती में खुद को साबित किया। उन्होंने कहा कि परेड ग्राउंड पर उन्हें अलग पहचानना मुश्किल था क्योंकि उन्होंने सभी मानकों को बराबरी से पूरा किया।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि युद्धक्षेत्र में साहस, नेतृत्व और संकल्प का कोई जेंडर नहीं होता। सेना में जिम्मेदारी निभाने की क्षमता ही सबसे अहम होती है।

महिला कैडेट्स की मौजूदगी इस बार बेहद खास रही। क्योंकि एनडीए में महिलाओं की एंट्री के बाद यह तीसरा बैच है जिसने ट्रेनिंग पूरी की है। (NDA Passing Out Parade 2026)

21 देशों के विदेशी कैडेट भी हुए पास आउट

इस बार 21 मित्र देशों के कैडेट्स ने भी एनडीए से ट्रेनिंग पूरी की। इनमें 12 देशों के 24 फ्रेंडली फॉरेन कैडेट्स शामिल रहे। सेना प्रमुख ने अपने भाषण में इन विदेशी कैडेट्स का खास तौर पर स्वागत और सम्मान किया।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों से आए ये युवा अधिकारी अपने साथ दोस्ती, भरोसा और सैन्य सहयोग की भावना लेकर जाएंगे। भारत लंबे समय से कई मित्र देशों के सैन्य अधिकारियों को ट्रेनिंग देता रहा है और एनडीए इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (NDA Passing Out Parade 2026)

परिवारों का भी किया जिक्र

पासिंग आउट परेड के दौरान कैडेट्स के परिवार भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। कई माता-पिता अपने बच्चों को सैन्य वर्दी में देखकर भावुक नजर आए।

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में परिवारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कैडेट्स की सफलता के पीछे उनके परिवारों का त्याग और भरोसा भी शामिल है। कठिन ट्रेनिंग और लंबे समय तक परिवार से दूर रहने के दौरान परिवारों का समर्थन बेहद अहम होता है।

उन्होंने प्रशिक्षकों और स्टाफ की भी सराहना की जिन्होंने इन युवा कैडेट्स को सैन्य जीवन के लिए तैयार किया।

“सेवा परमो धर्म” का संदेश

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एनडीए के मूल मंत्र “सेवा परमो धर्म” का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सैन्य जीवन में कई बार आराम और कर्तव्य के बीच चुनाव करना पड़ता है, लेकिन एक सैनिक का सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र सेवा होता है।

उन्होंने कैडेट्स से कहा कि नेतृत्व कभी शब्दों से साबित नहीं होता, बल्कि सैनिकों का भरोसा ही किसी अधिकारी की असली पहचान बनता है। (NDA Passing Out Parade 2026)

किरण बेदी ने कैडेट्स को बताया “स्कॉलर वॉरियर”

इस समारोह में पूर्व आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी भी मौजूद रहीं। उन्होंने कैडेट्स को संबोधित करते हुए उन्हें “स्कॉलर वॉरियर” बनने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में केवल शारीरिक ताकत काफी नहीं है। आधुनिक सैन्य अधिकारी को टेक्नोलॉजी, रणनीति, साइबर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय मामलों और नेतृत्व की भी गहरी समझ होनी चाहिए।

किरण बेदी ने कहा कि अनुशासन, ज्ञान और ईमानदारी किसी भी सैन्य अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत होती है।

236 कैडेट्स को मिली डिग्री

समारोह के दौरान जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ने 236 कैडेट्स को बैचलर डिग्री भी प्रदान की। इनमें कंप्यूटर साइंस, साइंस और आर्ट्स स्ट्रीम के कैडेट्स शामिल रहे।

आंकड़ों के मुताबिक 112 कैडेट्स ने कंप्यूटर साइंस, 65 ने साइंस और 59 ने आर्ट्स स्ट्रीम में डिग्री हासिल की।

एनडीए में सैन्य ट्रेनिंग के साथ-साथ अकादमिक पढ़ाई पर भी बराबर जोर दिया जाता है। कैडेट्स तीन साल तक कठोर शारीरिक ट्रेनिंग के साथ नियमित शैक्षणिक पढ़ाई भी करते हैं। (NDA Passing Out Parade 2026)

इन कैडेट्स ने हासिल किए बड़े सम्मान

इस समारोह में कई कैडेट्स को उनकी शानदार अकादमिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित भी किया गया। ‘जे’ स्क्वाड्रन के कैडेट रणविजय त्यागी ने कंप्यूटर साइंस स्ट्रीम में सबसे ज्यादा ग्रेड हासिल किए। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और एडमिरल रोलिंग ट्रॉफी दी गई।

‘एम’ स्क्वाड्रन के कैडेट पीयूष रौतेला ने साइंस स्ट्रीम में टॉप किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीओएएस रोलिंग ट्रॉफी मिली।

‘पी’ स्क्वाड्रन के कैडेट सुशांत वर्मा ने सोशल साइंस स्ट्रीम में पहला स्थान हासिल किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीएएस ट्रॉफी प्रदान की गई।

वहीं बीटेक स्ट्रीम में ‘जी’ स्क्वाड्रन के कैडेट मन्नेला नितिन ने छह सेमेस्टर में सबसे ज्यादा सीजीपीए हासिल किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीआईएससी ट्रॉफी दी गई। (NDA Passing Out Parade 2026)

क्यों खास है एनडीए

1954 में स्थापित एनडीए एशिया की सबसे पुरानी ट्राई-सर्विस सैन्य अकादमियों में गिनी जाती है। यहां सेना, नौसेना और वायुसेना के कैडेट्स एक साथ ट्रेनिंग लेते हैं।

तीन साल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद कैडेट्स अलग-अलग सैन्य अकादमियों में आगे की ट्रेनिंग के लिए जाते हैं। सेना के कैडेट्स इंडियन मिलिट्री अकादमी, नौसेना के कैडेट्स नेवल अकादमी और वायुसेना के कैडेट्स एयर फोर्स अकादमी में आगे की ट्रेनिंग लेते हैं।

एनडीए का 150वां कोर्स इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह अकादमी के लंबे सैन्य इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां से निकले कई अधिकारी बाद में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख बने। (NDA Passing Out Parade 2026)

The National Defence Academy’s 150th course marked a major milestone as 353 cadets, including trainees from 21 friendly foreign nations, graduated from NDA Khadakwasla. The passing out ceremony also included 18 female cadets, reflecting the changing face of India’s armed forces. Chief of the Army Staff General Upendra Dwivedi reviewed the parade and delivered an emotional address, urging cadets to lead with courage, adaptability, and integrity. He highlighted the importance of jointness among the three services and referred to Operation Sindoor as an example of modern military preparedness. The ceremony was attended by senior military leaders and dignitaries.

जवानों को ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही भारतीय सेना, पहाड़ों पर 30 किलो वजन के साथ भी नहीं थकेंगे सैनिक

Indian Army Exoskeleton System
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Indian Army Exoskeleton System: भारतीय सेना अब अपने जवानों को अब ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही है। सेना ऐसी तकनीक इस्तेमाल करने जा रही है, जो लंबे समय तक भारी वजन उठाकर चलने के दौरान उनकी थकान कम करेगी। रक्षा मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और भारतीय सेना ने 520 पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह सिस्टम सैनिकों को पहाड़ी इलाकों, बर्फीले मोर्चों और कठिन युद्ध क्षेत्रों में भारी सामान उठाने में मदद करेगा।

सेना को जरूरतों को पूरा करने वाले एक्सोस्केलेटन सिस्टम की खरीद का सबसे अहम हिस्सा यह है कि यह तकनीक बिना बैटरी और बिना बिजली के काम करेगी। यानी सैनिकों को किसी चार्जिंग सिस्टम या अतिरिक्त पावर सोर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

सेना को 90 दिनों के अंदर इसकी डिलीवरी पूरी करनी होगी। इन सिस्टम्स का इस्तेमाल उच्च हिमालयी इलाकों में किया जाएगा, जहां जवानों को रोजाना कई किलो वजन उठाकर ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं।

Indian Army Exoskeleton System: आखिर क्या होता है एक्सोस्केलेटन?

एक्सोस्केलेटन को आसान भाषा में समझें तो यह एक पहनने वाला मैकेनिकल सपोर्ट सिस्टम है। यह किसी रोबोटिक सूट जैसा दिखता है, लेकिन इसमें मोटर या बैटरी नहीं होती। सैनिक इसे शरीर पर पहनते हैं और यह उनकी कमर, पीठ, कंधों, हाथों और घुटनों को अतिरिक्त ताकत देता है।

सेना के टेक्निकल स्पेसिफिकेशन डॉक्यूमेंट में इसे ऐसे सिस्टम के रूप में बताया गया है जो सैनिकों की स्ट्रेंथ, एंड्योरेंस और मोबिलिटी बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसमें कहा गया है कि यह कार्बन फाइबर जैसे हल्के लेकिन मजबूत मटेरियल से तैयार किया जाता है और कठिन इलाकों में तेजी से मूवमेंट में मदद करता है।

भारतीय सेना के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि सियाचिन, लद्दाख और ऊंचाई वाले इलाकों में जवानों को कई किलो राशन, हथियार और गोला-बारूद लेकर घंटों चलना पड़ता है। लंबे समय तक वजन उठाने से रीढ़, घुटनों और कंधों पर दबाव बढ़ता है। एक्सोस्केलेटन इस दबाव को कम करेगा। (Indian Army Exoskeleton System)

बिना बिजली के काम करेगा पूरा सिस्टम

इस खरीद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सेना ने पूरी तरह पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम मांगा है। टेक्निकल स्पेसिफिकेशन में साफ लिखा गया है कि सिस्टम “विदाउट एनी एक्सटर्नल पावर” होना चाहिए। यानी यह बैटरी या इलेक्ट्रिक मोटर के बिना काम करेगा।

इसका फायदा यह होगा कि जवानों को ऑपरेशन के दौरान चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। ऊंचाई वाले इलाकों में अत्यधिक ठंड के कारण बैटरियां जल्दी खत्म हो जाती हैं, लेकिन यह सिस्टम मैकेनिकल सपोर्ट पर आधारित होगा।

सैनिक जरूरत पड़ने पर इसे तुरंत ऑन या ऑफ भी कर सकेंगे। इसके लिए मैनुअल कंट्रोल स्विच दिया जाएगा। जवान बिना सूट उतारे इसे बंद या चालू कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

सैनिकों को कितना सपोर्ट मिलेगा?

सेना ने इस सिस्टम के लिए काफी सख्त तकनीकी मानक तय किए हैं। दस्तावेज के मुताबिक एक्सोस्केलेटन सैनिक को कम से कम 30 किलो वजन उठाने और ले जाने में मदद करेगा।

कमर और रीढ़ वाले हिस्से में सिस्टम को ऐसा बनाया जाएगा कि जवान जब जमीन से वजन उठाए तो उसे कम से कम 20 किलो का अतिरिक्त सपोर्ट मिले। वहीं दोनों हाथों को मिलाकर 15 किलो तक अतिरिक्त सपोर्ट देने की शर्त रखी गई है।

इसका मतलब यह हुआ कि जवान का शरीर पूरा बोझ अकेले नहीं उठाएगा। सूट वजन का हिस्सा अपने ऊपर ले लेगा। इससे सैनिक की ऊर्जा कम खर्च होगी और थकान धीरे आएगी।

पहाड़ों और बर्फीले इलाकों के लिए खास डिजाइन

भारतीय सेना ने जो तापमान सीमा तय की है, उससे साफ है कि यह सिस्टम बेहद कठिन मौसम के लिए खरीदा जा रहा है। ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री से प्लस 50 डिग्री तक रखा गया है। वहीं स्टोरेज टेम्परेचर माइनस 40 डिग्री तक होना चाहिए। यानी यह सिस्टम सियाचिन जैसे ग्लेशियर क्षेत्र से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इसके अलावा पूरा सिस्टम वाटरप्रूफ कैरिंग केस में आएगा, ताकि बारिश, बर्फ या कीचड़ वाले इलाकों में भी इसे सुरक्षित रखा जा सके। (Indian Army Exoskeleton System)

केवल 5.5 किलो होगा वजन

दिलचस्प बात यह है कि सैनिकों को अतिरिक्त ताकत देने वाला यह पूरा सिस्टम खुद बहुत हल्का होगा। सेना ने इसकी अधिकतम वजन सीमा 5.5 किलो तय की है।

इसके लिए कार्बन फाइबर, हाई स्ट्रेंथ एल्यूमिनियम अलॉय, टफ नायलॉन और कुशन मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा। ये सभी मटेरियल हल्के होने के साथ मजबूत भी होते हैं।

सेना ने यह भी कहा है कि सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिसे जवान आसानी से पहन और उतार सकें। किसी मुश्किल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। (Indian Army Exoskeleton System)

तीन हिस्सों में बंटा होगा एक्सोस्केलेटन

सेना ने 3-इन-1 मॉड्यूलर डिजाइन मांगा है। इसमें बैक मॉड्यूल, आर्म मॉड्यूल और नी मॉड्यूल शामिल होंगे। बैक मॉड्यूल सैनिक की कमर और रीढ़ को सपोर्ट देगा। आर्म मॉड्यूल हथियार या भारी उपकरण उठाने के दौरान हाथों पर दबाव कम करेगा। वहीं नी मॉड्यूल घुटनों को सहारा देगा ताकि ऊंचाई वाले इलाकों में चढ़ाई करते समय शरीर पर कम असर पड़े।

टेक्निकल डॉक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त मॉड्यूल जोड़े जा सकेंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

सेना को क्यों चााहिए यह सूट

भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से हाई अल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों की फिजिकल स्ट्रेस कम करने वाली तकनीकों पर ध्यान दे रही है। पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सीमाओं पर लंबे समय तक तैनाती के दौरान जवानों को भारी उपकरण लेकर गश्त करनी पड़ती है।

एक सामान्य सैनिक कई बार 25 से 35 किलो तक वजन लेकर चलता है। इसमें हथियार, गोला-बारूद, राशन, रेडियो सेट और सर्वाइवल उपकरण शामिल होते हैं। ऐसे में कमर और घुटनों की चोटें बढ़ जाती हैं।

सेना का मानना है कि एक्सोस्केलेटन से जवान ज्यादा समय तक एक्टिव रह सकेंगे और तेजी से मूवमेंट कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

मेक इन इंडिया को प्रथमिकता

इस पूरी खरीद प्रक्रिया में “मेक इन इंडिया” को प्राथमिकता दी गई है। इसमें केवल क्लास-1 और क्लास-2 लोकल सप्लायर्स ही इसमें भाग ले सकेंगे। क्लास-1 सप्लायर के लिए कम से कम 50 प्रतिशत लोकल कंटेंट जरूरी है, जबकि क्लास-2 के लिए 20 प्रतिशत।

सरकार ने माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज को भी विशेष छूट दी है। एमएसई कंपनियों को प्राइस प्रेफरेंस और क्वांटिटी प्रेफरेंस दोनों मिलेंगे। इससे भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स और घरेलू कंपनियों को बड़ा मौका मिलेगा।

सेना ने सिस्टम खरीद के साथ ट्रेनिंग की शर्त भी जोड़ी है। सप्लायर के दो व्यक्तियों को एक सप्ताह की ट्रेनिंग देनी होगी। यह ट्रेनिंग यूजर लोकेशन पर होगी, ताकि जवान वास्तविक परिस्थितियों में सिस्टम इस्तेमाल करना सीख सकें।

सिस्टम की वारंटी तीन साल तय की गई है। इसके अलावा छह साल की शेल्फ लाइफ मांगी गई है। (Indian Army Exoskeleton System)

दुनियाभर की सेनाओं में तेजी से बढ़ रहा इस्तेमाल

अमेरिका, चीन और रूस जैसी बड़ी सेनाएं पिछले कई वर्षों से एक्सोस्केलेटन तकनीक पर काम कर रही हैं। अमेरिकी सेना ने लॉजिस्टिक्स और लोड कैरिंग के लिए कई प्रोटोटाइप तैयार किए हैं। चीन ने हाई अल्टीट्यूड सैनिकों के लिए हल्के एक्सोस्केलेटन का परीक्षण किया है।

वहीं अब भारतीय सेना भी सैनिकों की फिजिकल परफॉर्मेंस बढ़ाने के लिए नई तकनीक को तेजी से अपनाना चाहती है। खास बात यह है कि भारतीय सेना ने शुरुआत में पॉसिव सिस्टम चुना है क्योंकि यह कम मुश्लकिल, कम खर्चीला और फील्ड में ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। (Indian Army Exoskeleton System)

The Indian Army is set to procure 520 passive exoskeleton systems to enhance the physical endurance and operational efficiency of soldiers deployed in high-altitude and extreme terrain areas such as Ladakh and Siachen. These wearable assistive devices will help troops carry heavy loads of up to 30 kilograms with reduced fatigue and lower stress on the spine, knees, shoulders, and arms. Unlike powered robotic suits, the passive exoskeleton works without batteries or external power sources, making it ideal for harsh environments. The move is part of the Army’s modernisation drive and supports the government’s “Make in India” initiative in the defence sector.

राजनाथ सिंह ने जारी की ऑपरेशन सिंदूर पर खास किताब, मिसाइल क्रू से फाइटर पायलट तक सबने साझा किए अपने अनुभव

Operation Sindoor Book
Raksha Mantri releases commemorative book on Op Sindoor, chronicling soldiers’ personal testimonies (Pic: Defence Ministry)

Operation Sindoor Book: ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अब एक खास स्मारक पुस्तक जारी की गई है, जिसमें उन सैनिकों के अनुभव दर्ज किए गए हैं जिन्होंने इस सैन्य अभियान में सीधे हिस्सा लिया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवाार को इस विशेष पुस्तक का विमोचन किया। इस किताब में सेना, नौसेना और वायुसेना के 100 अधिकारियों, जवानों, एयरमैन और नाविकों की कहानियां शामिल की गई हैं।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस किताब का उद्देश्य युद्ध की वास्तविक परिस्थितियों को समझाना है। इसमें केवल सैन्य उपलब्धियों की बात नहीं बल्कि उन भावनात्मक और मानसिक परिस्थितियों को भी दिखाया गया है जिनसे सैनिक गुजरते हैं।

Operation Sindoor Book: राजनाथ सिंह ने क्या कहा

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पुस्तक को ऑपरेशन सिंदूर में शामिल सैनिकों को समर्पित श्रद्धांजलि बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि यह पुस्तक देश के नागरिकों को सैनिकों के समर्पण और साहस से जोड़ती है।

उन्होंने कहा कि देश के लोगों को इस किताब से प्रेरणा लेनी चाहिए और ऐसे नागरिक बनना चाहिए जो राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए सैनिकों द्वारा चुकाई गई भारी कीमत को समझ सकें।

राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की बड़ी सैन्य सफलता बताया। उन्होंने कहा कि इस अभियान में भारत ने पाकिस्तान को केवल चार दिनों के भीतर युद्धविराम की मांग करने के लिए मजबूर कर दिया था। रक्षा मंत्री के मुताबिक यह संघर्ष भारत द्वारा लड़े गए पिछले युद्धों से अलग था।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल घटनाओं का इतिहास नहीं बताती, बल्कि आधुनिक युद्ध के उस मानवीय पक्ष को सामने लाती है जहां नेतृत्व, साहस, दबाव में फैसले लेने की क्षमता और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता मिलकर रणनीति को सफलता में बदलते हैं। (Operation Sindoor Book)

सैनिकों की नजर से दिखाया गया युद्ध

इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें युद्ध को केवल बड़े सैन्य मुख्यालय या कमांडरों के नजरिए से नहीं दिखाया गया। आमतौर पर युद्ध से जुड़ी आधिकारिक किताबों में रणनीति, फैसले और ऑपरेशन रूम की गतिविधियों पर ज्यादा फोकस किया जाता है।

लेकिन इस पुस्तक में उन सैनिकों के अनुभव शामिल किए गए हैं जो सीधे मोर्चे पर मौजूद थे। इसमें लाइन ऑफ कंट्रोल पर दुश्मन के बंकरों को निशाना बनाने वाले जवानों से लेकर दुश्मन के ड्रोन को ट्रैक और नष्ट करने वाले एयर डिफेंस ऑपरेटरों तक की बातें दर्ज की गई हैं।

किताब में उन लड़ाकू पायलटों के अनुभव भी शामिल हैं जो हथियार छोड़ने के समय कॉकपिट में मौजूद थे। इसके अलावा समुद्र में ऑपरेशन के दौरान अलर्ट मोड पर काम कर रहे नौसेना के जवानों के अनुभव भी इस पुस्तक का हिस्सा बनाए गए हैं। (Operation Sindoor Book)

तीनों सेनाओं के जवानों की कहानियां

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह पुस्तक तीनों सेनाओं के साझा अनुभवों पर आधारित है। इसमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना के अलावा इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ और संयुक्त सैन्य संगठनों के अधिकारियों और जवानों की बातें भी शामिल हैं।

किताब में कॉम्बैट एविएटर्स, सरफेस-टू-एयर मिसाइल यूनिट्स, स्पेशल फोर्स ऑपरेटर्स, सिग्नलर्स, लॉजिस्टिक स्टाफ और मेडिकल अधिकारियों के अनुभव दर्ज किए गए हैं।

युद्ध के दौरान मेडिकल टीमों ने किस तरह दबाव में काम किया, सप्लाई नेटवर्क कैसे चलाया गया और अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल कैसे बना रहा, इन सभी पहलुओं को भी विस्तार से शामिल किया गया है। (Operation Sindoor Book)

आधुनिक युद्ध का अलग चेहरा

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक युद्ध अब केवल टैंक और बंदूकों तक सीमित नहीं रह गया है। ऑपरेशन सिंदूर में ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और जॉइंट मिलिटरी कोआर्डिनेशन की बड़ी भूमिका रही।

इसी वजह से पुस्तक में उन तकनीकी और मानवीय चुनौतियों का भी जिक्र किया गया है जिनका सामना सैनिकों ने युद्ध के दौरान किया।

यह स्मारक पुस्तक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान के मार्गदर्शन में तैयार की गई है। सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े व्यक्तिगत अनुभवों को अलग-अलग सैन्य मीडिया और स्ट्रैटेजिक कम्यूनिकेशन यूनिट्स ने संकलित किया।

इसके प्रकाशन में यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया ने भी सहयोग दिया है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार इस पुस्तक को तैयार करने में कई महीनों का समय लगा और अलग-अलग यूनिट्स से अनुभव जुटाए गए।

इस पुस्तक का विमोचन नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष समारोह में किया गया। कार्यक्रम में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी, सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं के तालमेल और संयुक्त कार्रवाई की चर्चा की। अधिकारियों ने कहा कि यह अभियान आधुनिक सैन्य समन्वय का बड़ा उदाहरण था।
आम लोगों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पुस्तक

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि आम नागरिक अक्सर युद्ध को केवल खबरों और आधिकारिक बयानों के जरिए देखते हैं। लेकिन इस पुस्तक के जरिए लोगों को यह समझने का मौका मिलेगा कि मोर्चे पर मौजूद सैनिक किन हालात में काम करते हैं।

इसमें युद्ध के दौरान के वास्तविक अनुभवों को सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया है ताकि आम लोग भी सैनिकों की भूमिका और उनकी चुनौतियों को समझ सकें।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की किताबें आने वाली पीढ़ियों को देश की सुरक्षा में लगे जवानों के योगदान के बारे में जागरूक करती हैं। (Operation Sindoor Book)

‘FRCV प्रोग्राम’ में नए मेन बैटल टैंकों के साथ उड़ेंगे सर्विलांस और कामिकाजे ड्रोन, तैयार होंगे 590 हाईटेक कॉम्बैट सिस्टम

Indian Tank Drone System FRCV
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Indian Tank Drone System: भारतीय सेना अब फ्यूचर टैंकों को हमला और निगरानी करने वाले हाईटेक कॉम्बैट ड्रोन प्लेटफॉर्म से भी लैस करने की तैयारी कर रही है। आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) ने एक ऐसा प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिससे भारतीय टैंक दुश्मन पर कई किलोमीटर दूर से ड्रोन हमला कर सकेंगे। इसके साथ ही टैंक के अंदर बैठे जवान रियल टाइम वीडियो फीड देखकर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख पाएंगे।

एवीएनएल और हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री अवाडी ने भारतीय सेना के फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) प्रोग्राम के लिए एडवांस्ड ड्रोन सिस्टम डेवलप करने का एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। यह सिस्टम एवीएनएल के नए 55 टन वाले मेन बैटल टैंक (एमबीटी) के लिए बनाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत तीन अलग-अलग तरह के ड्रोन तैयार किए जाएंगे, जिनमें लॉइटरिंग मुनिशन, अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन और टेदर्ड ड्रोन शामिल हैं।

यह पूरा प्रोजेक्ट रक्षा मंत्रालय की “बाय इंडियन-आईडीडीएम” कैटेगरी के तहत होगा, जिसमें बड़े स्तर पर स्वदेशी तकनीक और भारतीय कंपनियों की भागीदारी होगी। शुरुआती प्रोटोटाइप चरण में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट जरूरी रखा गया है, जबकि सीरीज प्रोडक्शन के अंतिम चरण में इसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।

Indian Tank Drone System: क्या है AVNL का नया ड्रोन सिस्टम

एवीएनएल द्वारा तैयार किया जा रहा यह ड्रोन सिस्टम केवल एक ड्रोन नहीं बल्कि पूरा कॉम्बैट नेटवर्क होगा। इसमें तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्म एक साथ काम करेंगे। इनका उद्देश्य टैंक को दूर से हमला करने, आसमान से निगरानी करने और युद्ध के दौरान लगातार कम्युनिकेशन बनाए रखने की क्षमता देना है।

इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि टैंक क्रू को दुश्मन के इलाके में बिना आगे बढ़े हमला करने की क्षमता मिलेगी। मौजूदा टैंक आमतौर पर अपनी गन की रेंज तक ही प्रभावी होते हैं, लेकिन नए ड्रोन सिस्टम के जरिए टैंक 15 से 20 किलोमीटर दूर तक दुश्मन को ट्रैक और निशाना बना सकेगा।

सूत्रों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह दिखा दिया है कि भविष्य की लड़ाई में ड्रोन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं अब ड्रोन-इंटीग्रेटेड टैंक और आर्मर्ड सिस्टम डेवलप कर रही हैं।

लॉइटरिंग मुनिशन से सटीक हमला

इस पूरे सिस्टम का सबसे घातक हिस्सा लॉइटरिंग मुनिशन (एलएम) होगा। इसे आम भाषा में “कामीकाजे ड्रोन” भी कहा जाता है। यह ड्रोन टैंक से लॉन्च होगा और दुश्मन के इलाके के ऊपर काफी देर तक उड़ान भरते हुए टारगेट को खोज कर हमल करेगा।

एवीएनएल की तरफ से जारी तकनीकी जानकारी के अनुसार इस ड्रोन की न्यूनतम रेंज 15 किलोमीटर होगी। यह कम से कम 45 मिनट तक हवा में रह सकेगा और 30 मिनट तक टारगेट एरिया के ऊपर लॉइटर कर सकेगा। साथ ही, इसका वारहेड कम से कम 500 मिमी और बेहतर स्थिति में 600 मिमी तक आर्मर भेदने में सक्षम होना चाहिए।

यह ड्रोन एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर (ERA) को भी भेद सकेगा। आधुनिक युद्ध में कई देशों के टैंक ईआरए सिक्योरिटी से लैस होते हैं, जिन्हें नष्ट करना आसान नहीं होता। एवीएनएल चाहता है कि उसका ड्रोन ऊपर से हमला कर दुश्मन के सबसे कमजोर हिस्से को निशाना बनाए। इसे “टॉप अटैक” मोड कहा जाता है। आधुनिक टैंकों की छत बाकी हिस्सों की तुलना में कमजोर होती है, इसलिए ऊपर से हमला बेहद प्रभावी माना जाता है।

इस लॉइटरिंग म्यूनिशन को टैंक से कैनिस्टर या ट्यूब के जरिए लॉन्च किया जाएगा। लॉन्च के बाद यह 5 सेकंड के भीतर सक्रिय होकर उड़ान भर सकेगा। ड्रोन का कैनिस्टर पूरी तरह वाटरप्रूफ होगा और 5 मीटर गहरे पानी में भी सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा यह टैंक की तेज रफ्तार, झटकों और मुख्य तोप की फायरिंग के दौरान भी सुरक्षित रहना चाहिए। यह सिस्टम सिर्फ मैदानी इलाकों के लिए नहीं बल्कि रेगिस्तान, जंगल, शहरी इलाकों और पहाड़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

एलएम ड्रोन में एंटी-जैमिंग सिस्टम, फ्रीक्वेंसी हॉपिंग और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन जैसी तकनीकें भी होंगी। ताकि ताकि दुश्मन रेडियो सिग्नल जाम करके इसे गिरा न सके। ड्रोन को GNSS डिनाइड वातावरण में भी काम करना होगा। यानी यदि दुश्मन जीपीएस सिग्नल जाम कर दे तब भी यह अपना मिशन पूरा कर सके।

इसमें ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे चलते हुए टैंक या तेज रफ्तार से वाले टारगेट को भी ट्रैक किया जा सकेगा। जानकारी के अनुसार यह 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहे टारगेट पर भी हमला कर सकता है। ड्रोन की सटीकता इतनी ज्यादा रखी गई है कि इसका सर्कुलर एरर प्रॉबेबिलिटी (CEP) सिर्फ 1 मीटर से कम होना चाहिए।

इसमें EO/IR गिम्बल भी लगाया जाएगा। यानी दिन और रात दोनों समय दुश्मन को पहचानने वाले कैमरे। इसमें ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग की क्षमता भी होगी। एवीएनएल ने साफ कहा है कि यह ड्रोन केवल टैंक के आदेश पर ही अंतिम हमला करेगा। यानी इंसानी नियंत्रण हमेशा रहेगा।

अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन करेगा निगरानी

दूसरा सिस्टम अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन (यूएसडी) होगा। इसका मुख्य काम दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना और टैंक क्रू को लाइव वीडियो फीड देना होगा। यह ड्रोन टैंक को “बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट” क्षमता देगा। यानी टैंक चालक दल उन लक्ष्यों को भी देख सकेगा जो सीधे दिखाई नहीं देते। यह ड्रोन लगभग 20 किलोमीटर तक की दूरी से हाई क्वालिटी वीडियो भेज सकेगा। इसमें डे और नाइट ऑपरेशन क्षमता होगी, यानी दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकेगी।

यूएसडी में ईओ और आईआर सेंसर लगाए जाएंगे। ईओ यानी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर सामान्य विजुअल निगरानी करेंगे जबकि आईआर यानी इन्फ्रारेड सिस्टम अंधेरे में भी दुश्मन की गतिविधियां पकड़ सकेगा।

इस ड्रोन को मैनुअल और सेमी-ऑटोमैटिक दोनों मोड में उड़ाया जा सकेगा। अगर जीपीएस सिग्नल जाम हो जाएं तब भी यह विजन-बेस्ड नेविगेशन और आईएनएस सिस्टम के जरिए काम करता रहेगा। इस ड्रोन में AES-256 एन्क्रिप्शन या उससे बेहतर सुरक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि दुश्मन इसके डेटा को इंटरसेप्ट न कर सके।

इस सिस्टम की एक और खासियत यह है कि यह लॉइटरिंग मुनिशन के साथ मिलकर काम करेगा। यानी यूएसडी पहले टारगेट की पहचान करेगा और उसके बाद एलएम ड्रोन को टारगेट की लोकेशन भेजी जाएगी। एवीएनएल चाहता है कि सर्विलांस ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और टैंक एक ही C4ISR नेटवर्क में काम करें। (Indian Tank Drone System)

टेदर्ड ड्रोन करेगा लगातार हवाई निगरानी

तीसरा सिस्टम टेदर्ड ड्रोन (टीडी) होगा। यह सामान्य ड्रोन से काफी अलग होगा। इसे टैंक से केबल के जरिए जोड़ा जाएगा और उसी से पावर सप्लाई मिलेगी।

आमतौर पर ड्रोन की सबसे बड़ी समस्या बैटरी लाइफ होती है, लेकिन टेदर्ड ड्रोन घंटों तक लगातार उड़ान भर सकता है क्योंकि उसे बिजली सीधे टैंक से मिलती रहेगी। एवीएनएल ने कहा है कि टेदर्ड ड्रोन सिस्टम में ऑटोमैटिक विंच सिस्टम, पावर मॉड्यूल और हाई बैंडविड्थ डेटा ट्रांसमिशन होना चाहिए।

इसका इस्तेमाल लगातार हवाई निगरानी और कम्युनिकेशन रिले के लिए किया जाएगा। युद्ध के दौरान यह ड्रोन ऊंचाई पर रहकर आसपास के इलाके की निगरानी करेगा और टैंक यूनिट्स के बीच कम्युनिकेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा।

इसमें हाई-बैंडविड्थ डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम होगा जिससे रियल टाइम वीडियो फीड तुरंत टैंक तक पहुंचेगी।

पूरे सिस्टम को -20 डिग्री से +45 डिग्री तापमान में काम करने योग्य बनाया जाएगा। ड्रोन सिस्टम को टैंक के साथ इस तरह इंटीग्रेट किया जाएगा कि वाहन की मोबिलिटी प्रभावित न हो।

एवीएनएल ने यह भी कहा है कि सभी ड्रोन सिस्टम MIL-STD-461E और MIL-STD-464C जैसे मिलिटरी स्टैंडर्ट्स पर आधारित होंगे।

एक ही कंट्रोल सिस्टम से चलेंगे तीनों ड्रोन

एवीएनएल की ईओआई में साफ कहा गया है कि तीनों ड्रोन सिस्टम के लिए एक ही इंटीग्रेटेड डिस्प्ले यूनिट बनाई जाएगी। यानी टैंक के अंदर बैठा क्रू एक ही कंट्रोल पैनल से एलएम, यूएसडी और टीडी तीनों को ऑपरेट कर सकेगा।

इस यूनिट में जॉयस्टिक, टच कंट्रोल और डिजिटल इंटरफेस दिए जाएंगे। रियल टाइम टेलीमेट्री, वीडियो फीड और टारगेट डेटा इसी सिस्टम पर दिखाई देगा। (Indian Tank Drone System)

3 प्रोटोटाइप और 590 यूनिट्स की योजना

एवीएनएल ने इस प्रोजेक्ट को दो फेज में बांटा है। पहले फेज में तीन प्रोटोटाइप सिस्टम विकसित किए जाएंगे। इनमें तीनों ड्रोन प्लेटफॉर्म शामिल होंगे। दूसरे चरण में कुल 590 सीरीज प्रोडक्शन यूनिट्स का टारगेट रखा गया है। हालांकि यह उत्पादन रक्षा मंत्रालय द्वारा एफआरसीवी प्रोग्राम में एवीएनएल के चयन पर निर्भर करेगा। अगर सेना एवीएनएल के टैंक को चुनती है, तभी बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन होगा।

शुरुआत में तीन टैंकों पर यह तकनीक लगाकर उसका परीक्षण होगा। यदि सेना और रक्षा मंत्रालय परीक्षण में संतुष्ट रहते हैं तो बाद में 590 टैंक ड्रोन सिस्टम से लैस किए जाएंगे। हालांकि दस्तावेज में साफ कहा गया है कि यह संख्या भविष्य में सेना की जरूरत के हिसाब से बदल भी सकती है।

एवीएनएल ने साफ किया है कि सिस्टम को कई स्तर के ट्रायल से गुजरना होगा। पहले बेंच टेस्टिंग होगी, फिर डायनामिक स्टैंड टेस्ट और उसके बाद टैंक पर इंटीग्रेशन किया जाएगा। इसके अलावा ईएमआई-ईएमसी टेस्ट, पर्यावरणीय परीक्षण और लाइव फायरिंग ट्रायल भी होंगे। ड्रोन सिस्टम को स्थिर और गतिशील दोनों तरह के टारगेट के खिलाफ जांचा जाएगा।

इन परीक्षणों के बाद ही सिस्टम को बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए मंजूरी मिलेगी।

इस परियोजना के तहत पहला प्रोटोटाइप सप्लाई ऑर्डर मिलने के 12 महीने के भीतर तैयार करना होगा। इसके बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होगा। दस्तावेज के अनुसार सीरीज प्रोडक्शन चरण में 30 सिस्टम से शुरुआत होगी। इसके बाद अगले चरण में 45 सिस्टम तैयार किए जाएंगे। तीसरे चरण में 85 सिस्टम का उत्पादन होगा।

इसके बाद चौथे और पांचवें चरण में 100-100 सिस्टम बनाए जाएंगे। उसके बाद छठे चरण में 110 और सातवें चरण में 120 सिस्टम तैयार किए जाएंगे। इस तरह कुल संख्या 590 तक पहुंचेगी। (Indian Tank Drone System)

क्या है एफआरसीवी प्रोग्राम

एफआरसीवी यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल भारतीय सेना का अगली पीढ़ी का टैंक प्रोग्राम है। इसे “प्रोजेक्ट रंजीत” नाम से भी जाना जाता है।

इसका उद्देश्य पुराने टी-72 अजेय टैंकों को बदलना है। भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टी-72 टैंक मौजूद हैं, जिनमें से कई अब पुराने हो चुके हैं।

एफआरसीवी को लगभग 55 टन क्लास का मीडियम वेट टैंक बनाया जा रहा है। इसमें आधुनिक फायरपावर, एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम, एआई आधारित टारगेट ट्रैकिंग और ड्रोन इंटीग्रेशन जैसी क्षमताएं होंगी। (Indian Tank Drone System)

एफआरसीवी टैंक की खासियतें

एफआरसीवी में 120 एमएम स्मूथबोर गन लगाए जाने की योजना है। यह टैंक एपीएफएसडीएस, हीट और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसे आधुनिक गोला-बारूद इस्तेमाल कर सकेगा।

टैंक में ऑटोलोडर सिस्टम होगा जिससे फायरिंग की गति बढ़ेगी। इसकी अधिकतम स्पीड करीब 70 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है।

टैंक में एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम भी होगा जो आने वाली मिसाइलों और ड्रोन हमलों को रोक सकेगा। इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर आर्मर, सीबीआरएन प्रोटेक्शन और थर्मल सिग्नेचर मैनेजमेंट जैसी तकनीकें भी शामिल होंगी। (Indian Tank Drone System)

70,000 करोड़ की लागत वाले पी-75आई को मिले पंख, 6 AIP सबमरीन डील के लिए सीसीएस की मंजूरी का इंतजार

Project-75I Submarine Deal
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Project-75I Submarine Deal: वित्त मंत्रालय ने भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर ताकत बढ़ाने के लिए करीब 70 हजार करोड़ रुपये की उस बड़ी डील को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत भारत में छह नई पीढ़ी की एडवांस कन्वेंशनल पनडुब्बियां बनाई जाएंगी। यह पूरा प्रोजेक्ट “प्रोजेक्ट-75आई” यानी पी-75आई के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।

इन पनडुब्बियों का निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल और जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस मिलकर करेंगे। यह डील भारतीय नौसेना की पानी के नीचे लड़ने की क्षमता को काफी मजबूत मानी जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद अब इस प्रस्ताव को जल्द कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) के सामने रखा जाएगा। अंतिम मंजूरी के बाद कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर होंगे।

Project-75I Submarine Deal: सात साल बाद मिलेगी पहली पनडुब्बी

जानकारी के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के करीब सात साल बाद पहली पनडुब्बी भारतीय नौसेना को सौंपी जाएगी। इसके बाद हर साल एक-एक पनडुब्बी की डिलीवरी की जाएगी।

यह प्रोजेक्ट भारत के सबसे बड़े नेवल निर्माण कार्यक्रमों में शामिल माना जा रहा है। खास बात यह है कि इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

क्यों जरूरी हैं नई पनडुब्बियां

भारतीय नौसेना लंबे समय से अपनी पुरानी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बदलने की योजना पर काम कर रही थी। प्रोजेक्ट-75आई की कल्पना 1990 के दशक के अंत में की गई थी। इसका उद्देश्य नौसेना के पुरानी हो चुकी सिंधुघोष क्लास (किलो क्लास) और शिशुमार क्लास (टाइप 209) पनडुब्बियों को आधुनिक विकल्प देना था। 2005 में प्रोजेक्ट-75 के तहत फ्रांस से स्कॉर्पीन क्लास (कलवरी क्लास) की 6 पनडुब्बियां बनाई गईं, जिसकी आखिरी पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर जनवरी 2025 में कमीशन हुई। लेकिन पी-75आई को वित्तीय कारणों से टाल दिया गया। लेकिन अब 2026 में इस डील मंजूरी मिल गई है।

नौसेना के पास वर्तमान में 7-18 डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं– इनमें 6 कलवरी क्लास, और बाकी 7-9 सिंधुघोष क्लास की हैं। जबकि चार 4 शिशुमार क्लास की है, जिन्हें 1980 के दशक में शामिल किया गया था। वहीं इनमें से कोई भी एआईपी टेक्नोलॉजी से लैस नहीं है। जबकि डीआरडीओ का स्वदेशी एआईपी सिस्टम कलवरी क्लास में रेट्रोफिट के लिए देरी का शिकार है।

दूसरी तरफ चीन तेजी से अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहा है। चीन के पास लगभग 50 आधुनिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें कई एआईपी तकनीक से लैस हैं। पाकिस्तान भी चीन से नई 8 युआन क्लास पनडुब्बियां हासिल कर रहा है।

ऐसे में भारतीय नौसेना को ऐसी नई पनडुब्बियों की जरूरत महसूस हो रही थी जो लंबे समय तक समुद्र के भीतर रह सकें और दुश्मन को बिना पता चले ऑपरेशन कर सकें। (Project-75I Submarine Deal)

कैसी होंगी नई पनडुब्बियां

ये पनडुब्बियां जर्मन एचडीडब्ल्यू टाइप-214 डिजाइन पर आधारित होंगी। हालांकि भारतीय जरूरतों के हिसाब से इनमें कई बदलाव किए जाएंगे।

इनका वजन लगभग 3500 टन तक हो सकता है। यह भारतीय नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी कन्वेंशनल पनडुब्बियों में शामिल होंगी।

इनकी लंबाई करीब 71 मीटर होगी और ये लगभग 400 मीटर गहराई तक समुद्र में ऑपरेट कर सकेंगी।

इन पनडुब्बियों में एडवांस सोनार सिस्टम, कम शोर करने वाला प्रोपेलर और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम लगाए जाएंगे। इसी वजह से इन्हें बेहद खतरनाक “स्टेल्थ हंटर” माना जा रहा है।

क्या होता है एआईपी सिस्टम

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर कुछ दिनों में बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर आना पड़ता है। इससे दुश्मन को उनके बारे में पता चलने का खतरा रहता है।

लेकिन एआईपी सिस्टम वाली पनडुब्बियां कई दिनों तक बिना सतह पर आए समुद्र के अंदर रह सकती हैं। इससे उनकी पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

जर्मन कंपनी का पीईएम फ्यूल सेल आधारित एआईपी सिस्टम दुनिया की सबसे शांत तकनीकों में गिना जाता है। इसी वजह से यह पनडुब्बियां दुश्मन के रडार और सोनार से बचने में ज्यादा सक्षम होंगी। (Project-75I Submarine Deal)

किन हथियारों से लैस होंगी

नई पनडुब्बियों में 533 एमएम के टॉरपीडो ट्यूब लगाए जाएंगे। इनके जरिए भारी टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल दागी जा सकेंगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार इनमें भारतीय वरुणास्त्र टॉरपीडो और लंबी दूरी की मिसाइलों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा ये पनडुब्बियां दुश्मन के जहाजों, पनडुब्बियों और तटीय ठिकानों पर हमला करने में सक्षम होंगी।

इनमें स्पेशल फोर्स ऑपरेशन की क्षमता भी होगी। यानी समुद्र के रास्ते कमांडो ऑपरेशन भी किए जा सकेंगे।

हिंद महासागर में बढ़ेगी भारत की ताकत

भारतीय नौसेना के लिए हिंद महासागर क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। चीन लगातार इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। चीन की नौसेना हिंद महासागर में लंबे समय तक तैनाती कर रही है और कई देशों में पोर्ट सुविधाएं विकसित कर रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नई पनडुब्बियां भारत को समुद्र में रणनीतिक बढ़त देने में मदद करेंगी। ये पनडुब्बियां समुद्री रास्तों की निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर और अंडरवॉटर डिटरेंस बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी।

इस प्रोजेक्ट को “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान का बड़ा हिस्सा माना जा रहा है। इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में होगा और धीरे-धीरे इनमें स्वदेशी सामग्री का प्रतिशत बढ़ाया जाएगा।

जानकारी के मुताबिक पहली पनडुब्बी में लगभग 45 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होगी। वहीं छठी पनडुब्बी तक यह बढ़कर करीब 60 प्रतिशत हो जाएगी।

जर्मन कंपनी टीकेएमएस भारत को डिजाइन और तकनीक भी ट्रांसफर करेगी। इससे भारतीय शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री को नई तकनीक सीखने का मौका मिलेगा।

एमडीएल पहले भी बना चुका है आधुनिक पनडुब्बियां

मुंबई स्थित मझगांव डॉक पहले भी फ्रांस की मदद से स्कॉर्पीन यानी कलवरी क्लास पनडुब्बियां बना चुका है। प्रोजेक्ट-75 के तहत छह कलवरी क्लास पनडुब्बियों का निर्माण किया गया था।

जनवरी 2025 में आखिरी पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर नौसेना में शामिल हुई थी। इस प्रोजेक्ट से एमडीएल को आधुनिक पनडुब्बी निर्माण का बड़ा अनुभव मिला।

अब उसी अनुभव का इस्तेमाल पी-75आई प्रोजेक्ट में किया जाएगा। (Project-75I Submarine Deal)

जर्मनी के साथ मजबूत हो रहे रक्षा संबंध

भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग लगातार बढ़ रहा है। अप्रैल 2026 में दोनों देशों ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप पर हस्ताक्षर किए थे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जर्मनी में टीकेएमएस की फैसिलिटी का दौरा भी किया था। दोनों देशों के बीच हथियार निर्माण, तकनीक साझेदारी और रक्षा उद्योग सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

भारत पहले भी जर्मनी से टाइप-209 पनडुब्बियां हासिल कर चुका है। अब नई पीढ़ी की टाइप-214 आधारित पनडुब्बियां दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूत करेंगी।

एलएंडटी-नवान्टिया को पीछे छोड़कर जीती बोली

इस प्रोजेक्ट के लिए एक और बड़ी प्रतिस्पर्धा एलएंडटी और स्पेन की नवान्टिया कंपनी की तरफ से थी। लेकिन आखिर में एमडीएल और टीकेएमएस की बोली को चुना गया।

सूत्रों का कहना है कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, निर्माण क्षमता और कीमत जैसे कई पहलुओं पर विचार करने के बाद यह फैसला लिया गया। (Project-75I Submarine Deal)

नौसेना के आधुनिकीकरण पर फोकस

भारतीय नौसेना इस समय बड़े स्तर पर आधुनिकीकरण अभियान चला रही है। देशभर के शिपयार्ड में लगभग 60 युद्धपोत और पनडुब्बियां निर्माणाधीन हैं।

नए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन के कार्यभार संभालने के बाद नौसेना के आधुनिकीकरण पर और ज्यादा जोर दिए जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

नौसेना का लक्ष्य 2047 तक पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने का है। इसी रणनीति के तहत स्वदेशी युद्धपोत, पनडुब्बियां और नेवल सिस्टम तेजी से विकसित किए जा रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि 2030-40 तक नौसेना के पास 24 से ज्यादा आधुनिक कन्वेंशनल और न्यूक्लियर पनडुब्बियां हो सकती हैं। (Project-75I Submarine Deal)

भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता भी बढ़ रही

इसी बीच भारत अपनी परमाणु पनडुब्बी ताकत भी लगातार मजबूत कर रहा है। हाल ही में भारत ने अपनी तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को नौसेना में शामिल किया है।

भारत के पास पहले से आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जैसी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बियां मौजूद हैं। ये देश की न्यूक्लियर ट्रायड क्षमता का हिस्सा हैं।

अब पी-75आई जैसी एडवांस कन्वेंशनल पनडुब्बियों के शामिल होने से भारतीय नौसेना की कुल अंडरवॉटर क्षमता और मजबूत मानी जा रही है।

वहीं, इस प्रोजेक्ट से देश में बड़े स्तर पर रोजगार पैदा होने की भी उम्मीद है। पनडुब्बी निर्माण में स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनिंग, सेंसर और इंजीनियरिंग सेक्टर की कई भारतीय कंपनियां जुड़ेंगी। इस प्रोजेक्ट से एमएसएमई सेक्टर को भी इससे बड़ा फायदा मिलेग, जिससे देश के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी। (Project-75I Submarine Deal)

भारत-चीन सीमा पर फिर हुई बड़ी बातचीत, बीजिंग में WMCC बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा

India-China WMCC Meeting
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India-China WMCC Meeting: भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े मुद्दों को लेकर एक बार फिर अहम बातचीत हुई है। दोनों देशों के अधिकारियों ने बीजिंग में आयोजित वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स (WMCC) की 35वीं बैठक में हिस्सा लिया। इस दौरान सीमा प्रबंधन, वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर स्थिति, सीमा निर्धारण और दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

यह बैठक ऐसे समय हुई है जब भारत और चीन 2020 के गलवान संघर्ष के बाद खराब हुए रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों देशों ने बातचीत को “रचनात्मक” और “भविष्य की दिशा में आगे बढ़ाने वाली” बताया।

India-China WMCC Meeting: बीजिंग में हुई अहम बैठक

27 मई को चीन की राजधानी बीजिंग में हुई इस बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी (ईस्ट एशिया) सुजीत घोष ने किया। वहीं चीनी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई चीन के विदेश मंत्रालय के बाउंड्री एंड ओशेनिक अफेयर्स विभाग की डायरेक्टर जनरल हौ यानची ने की।

विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की और सीमा पर शांति बनाए रखने में हुई प्रगति पर संतोष जताया। भारत और चीन का कहना है कि सीमा क्षेत्रों में स्थिरता आने से दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने में मदद मिल रही है।

क्या होता है WMCC

डब्ल्यूएमसीसी एक स्पेशल मैकेनिज्म है, जिसे भारत और चीन ने 2012 में बनाया था। इसका मकसद सीमा पर पैदा होने वाले तनाव को बातचीत के जरिए संभालना और सैन्य तथा कूटनीतिक स्तर पर समन्वय बनाए रखना है।

यह कोई सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत नहीं होती, बल्कि दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और संबंधित विभागों के अधिकारी इसमें शामिल होते हैं। यहां सीमा से जुड़े तकनीकी, प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की जाती है।

इस तंत्र का सबसे बड़ा उद्देश्य एलएसी पर शांति बनाए रखना और दोनों देशों के बीच किसी भी गलतफहमी को कम करना माना जाता है। (India-China WMCC Meeting)

सीमा प्रबंधन और सीमांकन पर चर्चा

बैठक के दौरान दोनों देशों ने सीमा सीमांकन यानी “डिलिमिटेशन” पर भी चर्चा की। इसका मतलब है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाओं को कम करने की कोशिश की जा रही है।

भारत और चीन के बीच करीब 3488 किलोमीटर लंबी सीमा है, लेकिन कई जगहों पर एलएसी को लेकर दोनों देशों की समझ अलग-अलग है। इसी वजह से कई बार दोनों देशों के सैनिक के बीच गतिरोध हो जाता है।

बैठक में सीमा प्रबंधन यानी बॉर्डर मैनेजमेंट पर भी चर्चा हुई। इसमें गश्त, सैनिक गतिविधियां, संचार व्यवस्था और तनाव कम करने के उपाय शामिल थे।

दोनों देशों ने मौजूदा सैन्य और कूटनीतिक तंत्रों के जरिए संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई।

ट्रांस-बॉर्डर नदियों का मुद्दा भी उठा

भारत ने इस बैठक में सीमा पार बहने वाली नदियों का मुद्दा भी उठाया। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारतीय पक्ष ने “एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म ऑन ट्रांस-बॉर्डर रिवर्स” की अगली बैठक जल्द बुलाने पर जोर दिया।

यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि ब्रह्मपुत्र जैसी कई बड़ी नदियां चीन से निकलकर भारत में आती हैं। भारत लंबे समय से चाहता रहा है कि चीन समय पर जल संबंधी डेटा साझा करे, ताकि बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में मदद मिल सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रांस-बॉर्डर नदियों का मुद्दा भारत-चीन संबंधों में काफी संवेदनशील माना जाता है। (India-China WMCC Meeting)

2020 के बाद बदले हालात

भारत और चीन के बीच 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई थी। इस घटना में दोनों देशों के सैनिकों की जान गई थी और उसके बाद सीमा पर तनाव काफी बढ़ गया था।

पूर्वी लद्दाख के कई इलाकों में दोनों देशों की सेनाएं लंबे समय तक आमने-सामने रहीं। कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत के बाद धीरे-धीरे कुछ क्षेत्रों में डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया पूरी हुई।

अब दोनों देश लगातार बातचीत के जरिए रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल के महीनों में दोनों पक्षों के बीच कई स्तरों पर बातचीत हुई है। (India-China WMCC Meeting)

स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता की तैयारी

डब्ल्यूएमसीसी बैठक में दोनों देशों ने अगली “स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव” यानी एसआर बैठक की तैयारी पर भी चर्चा की। यह बैठक चीन में आयोजित की जानी है।

एसआर वार्ता भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए सबसे ऊंचे स्तर की राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत मानी जाती है। भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीन की ओर से वरिष्ठ नेता इसमें शामिल होते हैं।

दोनों देशों ने कहा कि वे अगली एसआर बैठक की ठोस तैयारी के लिए साथ काम करेंगे।

बीजिंग दौरे के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख सुजीत घोष ने चीन के विदेश मंत्रालय के एशियन अफेयर्स विभाग के डायरेक्टर जनरल लियू जिनसॉन्ग से भी मुलाकात की।

इसके अलावा उन्होंने चीन के असिस्टेंट फॉरेन मिनिस्टर हांग लेई से शिष्टाचार मुलाकात भी की। इन बैठकों को दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। (India-China WMCC Meeting)

चीन ने क्या कहा

चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस बैठक को सकारात्मक बताया। चीनी बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच “व्यावहारिक और मित्रवत माहौल” में बातचीत हुई।

चीन ने कहा कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनी हुई है और दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन, सीमांकन और आपसी सहयोग पर बातचीत की।

चीनी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष सैन्य और कूटनीतिक चैनलों के जरिए संपर्क बनाए रखेंगे।

क्यों अहम मानी जा रही है यह बैठक

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कई दशकों पुराना है। 1962 के युद्ध के बाद से यह मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों का सबसे संवेदनशील हिस्सा बना हुआ है।

हाल के वर्षों में लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और अन्य क्षेत्रों को लेकर तनाव बढ़ा था। ऐसे में बीजिंग में हुई यह बैठक दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहने का संकेत मानी जा रही है।

रक्षा और विदेश नीति से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि एलएसी पर शांति बनाए रखना दोनों देशों के लिए जरूरी है क्योंकि सीमा तनाव का असर व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ता है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि WMCC जैसे मैकेनिज्म छोटे स्तर के तनाव को बड़ा संकट बनने से रोकने में मदद करते हैं। (India-China WMCC Meeting)

धीरे-धीरे सामान्य हो रहे रिश्ते

पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के बीच संपर्क बढ़ा है। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत हो रही है। कुछ क्षेत्रों में सैन्य तनाव कम होने के बाद अब रिश्तों को सामान्य करने पर जोर दिया जा रहा है।

हालांकि सीमा विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन दोनों देश फिलहाल बातचीत के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश कर रहे हैं।

विदेश मंत्रालय के बयान में भी कहा गया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता से द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में प्रगति हो रही है। (India-China WMCC Meeting)

Exclusive: अमेरिका के सुपर कैरियर को टक्कर देगा चीन का 960 फीट लंबा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर, Type-004 की पहली साफ तस्वीर आई सामने!

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier

China Type-004 Aircraft Carrier: चीन एक बार फिर अपनी नौसैनिक ताकत को तेजी से बढ़ाने में जुटा हुआ है। हाल ही में रक्षा समाचार ने जब जांच-पड़ताल की तो नई सैटेलाइट तस्वीरों में चौंकाने वाला खुलासा देखने को मिला। इन तस्वीरों में चीन का नया और बेहद विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर दिखाई दिया है, जिसे फिलहाल “टाइप-004” के नाम से जाना जा रहा है। सूत्रों का मानना है कि यह चीन का पहला न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर हो सकता है।

रक्षा समाचार की खोजबीन में पता चला कि यह एयरक्राफ्ट कैरियर चीन के डालियान शिपयार्ड में बनाया जा रहा है। नई तस्वीरों से साफ संकेत मिले हैं कि इसका निर्माण तेजी से चल रहा है। यह जहाज आकार और क्षमता के मामले में अमेरिका के सुपरकैरीयर्स को चुनौती दे सकता है।

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier

China Type-004 Aircraft Carrier: सैटेलाइट तस्वीरों में क्या दिखा

मई 2026 की गूगल अर्थ की सैटेलाइट तस्वीरों में चीन के डालियान शिपयार्ड में एक विशाल युद्धपोत का स्ट्रक्चर साफ दिखाई दिया। यह 960 फीट से ज्यादा लंबा और 155 फीट चौड़ा है। इसका साइज चीन के मौजूदा “फुजियान” एयरक्राफ्ट कैरियर से भी बड़ा माना जा रहा है।

तस्वीरों में जहाज का फ्लैट फ्लाइट डेक, आइलैंड सुपर स्ट्रक्चर, विशाल हुल सेक्शन और भारी क्रेन्स दिखाई दे रहे हैं। तस्वीरें देख कर लगा रहा है निर्माण की गति काफी तेज है। शुरुआती हुल सेक्शन 2025 की शुरुआत में दिखाई दिए थे और कुछ ही महीनों में पूरा स्ट्रक्चर स्पष्ट रूप से नजर आने लगा।

यह एयरक्राफ्ट कैरियर लियाओनिंग प्रांत के डालियान शिपयार्ड में तैयार किया जा रहा है। यही वह जगह है जहां चीन के पहले दो एयरक्राफ्ट कैरियर “लियाओनिंग” और “शानदोंग” भी बनाए गए थे। (China Type-004 Aircraft Carrier)

क्या होगा न्यूक्लियर पावर वाला कैरियर

सीएसआईएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि टाइप-004 के ऊपर दो बड़े पीले रंग हिस्से ऐसे दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें न्यूक्लियर रिएक्टर के लिए बनाया गया माना जा रहा है। इसी वजह से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चीन पहली बार परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर बना रहा है।

अगर यह दावा सही साबित होता है तो चीन दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर हैं।

न्यूक्लियर पावर वाले कैरियर की सबसे बड़ी ताकत उसकी लंबी दूरी तक बिना ईंधन भरे ऑपरेशन करने की क्षमता होती है। ऐसे जहाज महीनों तक समुद्र में रह सकते हैं और उन्हें बार-बार रुककर फ्यूल भरने की जरूरत नहीं पड़ती।

अमेरिका की नेवी लंबे समय से इसी तरह के न्यूक्लियर सुपरकैरीयर्स का इस्तेमाल करती आ रही है। अब चीन भी उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट से लैस होगा जहाज

टाइप-004 में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम लगाया जा सकता है। यह वही तकनीक है जिसका इस्तेमाल अमेरिका के आधुनिक “जेराल्ड आर. फोर्ड क्लास” एयरक्राफ्ट कैरियर में किया जाता है।

इस तकनीक की मदद से लड़ाकू विमानों को ज्यादा तेजी और कम समय में लॉन्च किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इस कैरियर में चार कैटापल्ट सिस्टम हो सकते हैं, जबकि चीन के मौजूदा फुजियान कैरियर में तीन कैटापल्ट हैं।

अगर चार कैटापल्ट लगाए जाते हैं तो चीन एक साथ ज्यादा लड़ाकू विमान लॉन्च कर सकेगा। इससे लंबी दूरी के एयर मिशन और बड़े हवाई ऑपरेशन करना आसान होगा। (China Type-004 Aircraft Carrier)

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier

कैसे बढ़ी चीन की एयरक्राफ्ट कैरियर ताकत

चीन ने पिछले कुछ सालों में अपनी नौसैनिक ताकत तेजी से बढ़ाई है। शुरुआत में उसने सोवियत संघ के पुराने युद्धपोत “वारयाग” को खरीदकर उसे “लियाओनिंग” एयरक्राफ्ट कैरियर में बदला।

इसके बाद चीन ने “शानदोंग” नाम का अपना दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर बनाया। यह स्की-जंप डिजाइन वाला जहाज था।

फिर चीन ने कुछ साल पहले “फुजियान” एयरक्राफ्ट कैरियर लॉन्च किया, जो पूरी तरह चीन में डिजाइन और विकसित किया गया पहला आधुनिक कैरियर माना जाता है।

अब टाइप-004 को चीन की अगली पीढ़ी का सबसे ताकतवर एयरक्राफ्ट कैरियर माना जा रहा है।

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
Image Credit: Raksha Samachar/Google Earth

अमेरिका जैसी ब्लू-वॉटर नेवी बनाना चाहता है चीन

चीन अब केवल अपने तटीय इलाकों तक सीमित नौसेना नहीं रखना चाहता। वह ऐसी “ब्लू-वॉटर नेवी” बनाना चाहता है, जो दुनिया के किसी भी हिस्से में जाकर मिलिटरी पावर दिखा सके।

ब्लू-वॉटर नेवी का मतलब ऐसी नौसेना से है जो हजारों किलोमीटर दूर समुद्री इलाकों में लंबे समय तक ऑपरेशन चला सके।

चीन के बढ़ते एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका मकसद प्रशांत महासागर और हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी बढ़ाना बताया जा रहा है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

टाइप-004 के साथ चलेंगे बड़े वॉरशिप

चीन केवल एयरक्राफ्ट कैरियर ही नहीं बना रहा, बल्कि उसके साथ चलने वाले पूरे “कैरियर स्ट्राइक ग्रुप” को भी मजबूत कर रहा है।

इन स्ट्राइक ग्रुप्स में बड़े डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, पनडुब्बियां और सप्लाई जहाज शामिल होंगे।

विशेषज्ञ डेनियल राइस की रिपोर्ट के अनुसार चीन अपने कैरियर ग्रुप्स के लिए तीन स्तर की सुरक्षा प्रणाली तैयार कर रहा है।

बाहरी सुरक्षा घेरे में जे-15 लड़ाकू विमान और पनडुब्बियां तैनात होंगी। मध्य सुरक्षा घेरे में टाइप-052डी डेस्ट्रॉयर और टाइप-054ए फ्रिगेट जैसे युद्धपोत रहेंगे। सबसे अंदरूनी सुरक्षा घेरे में छोटे रेंज वाले हथियार और डिफेंस सिस्टम लगाए जाएंगे। (China Type-004 Aircraft Carrier)

China Type-004 Nuclear Aircraft Carrier
Image Credit: Raksha Samachar/Google Earth

“कैरियर किलर” मिसाइलों पर भी जोर

चीन केवल एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं बना रहा, बल्कि उन्हें सुरक्षा देने के लिए लंबी दूरी की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें भी डेवलप कर चुका है।

डीएफ-21डी और डीएफ-26बी मिसाइलों को अक्सर “कैरियर किलर” कहा जाता है। इन मिसाइलों का मकसद दुश्मन के एयरक्राफ्ट कैरियर को लंबी दूरी से निशाना बनाना है।

रिपोर्ट के अनुसार डीएफ-21डी करीब 900 मील दूर तक हमला कर सकती है, जबकि डीएफ-26बी की रेंज लगभग 2485 मील बताई जाती है।

इन मिसाइलों के जरिए चीन अमेरिकी नौसेना की गतिविधियों को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर पर नजर

चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत का सीधा असर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर की मदद से चीन लंबे समय तक समुद्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रख सकेगा।

इसी वजह से अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर लगातार नजर रख रहे हैं।

भारत के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी पिछले कुछ वर्षों से चिंता का विषय बनी हुई है। (China Type-004 Aircraft Carrier)

चीन बना रहा है विशाल सप्लाई वॉरशिप

इसके अलावा चीन एक बहुत बड़ा नेवल सप्लाई जहाज भी तैयार कर रहा है। यह जहाज एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप्स को समुद्र में ईंधन, हथियार और भोजन उपलब्ध कराएगा। यह जहाज करीब 889 फीट लंबा और 121 फीट चौड़ा हो सकता है।

अगर ऐसा होता है तो चीन अपने कैरियर ग्रुप्स को चीन से हजारों किलोमीटर दूर भी लंबे समय तक ऑपरेट करा सकेगा।

हालांकि भौगोलिक स्थिति भी चीन के लिए चुनौती मानी जाती है। खुले प्रशांत महासागर तक पहुंचने के लिए चीनी जहाजों को मियाको स्ट्रेट और बाशी चैनल जैसे संवेदनशील समुद्री रास्तों से गुजरना पड़ता है, जिन पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की कड़ी नजर रहती है।

दुनिया की नजरें डालियान शिपयार्ड पर

चीन के डालियान शिपयार्ड पर सबकी नजरें हैं। दुनियाभर में यह जानने की कोशिश हो रही है कि टाइप-004 में कौन-कौन सी नई तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं।

सीएसआईएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह जहाज चीन की सैन्य आधुनिकीकरण योजना का बड़ा हिस्सा है। अमेरिकी रक्षा विभाग की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक चीन 2035 तक कुल नौ एयरक्राफ्ट कैरियर रखने का लक्ष्य बना सकता है।

अगर ऐसा होता है तो चीन दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक ताकतों में शामिल हो जाएगा। (China Type-004 Aircraft Carrier)

2030 तक लॉन्च होने की संभावना

मिलिटरी एक्सपर्ट एरिक वर्टहाइम ने मार्च 2026 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि चीन के फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर को निर्माण शुरू होने से लॉन्च होने तक करीब छह साल लगे थे।

अगर टाइप-004 का निर्माण भी उसी रफ्तार से चलता है तो यह 2027-28 तक लॉन्च किया जा सकता है। वहीं इसकी कमीशनिंग 2029-30 के आसपास तक की जा सकती है।

हालांकि इसके बाद भी जहाज को पूरी तरह ऑपरेशनल बनने में कई साल लग सकते हैं क्योंकि समुद्री परीक्षण, हथियार इंटीग्रेशन और फाइनल फिटिंग जैसी प्रक्रियाएं लंबी होती हैं। (China Type-004 Aircraft Carrier)