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भारत के NOTAM ट्रैप में फिर फंसा चीनी जासूसी जहाज, आया था मिसाइल डेटा लेने, लौटा खाली हाथ

NOTAM India Missile Test
Image Source: @notam_in, @detresfa/X

NOTAM India Missile Test: भारत ने एक बार फिर बंगाल की खाड़ी में चीन के साथ कैट एंड माउस गेम खेला है। जिसमें चीनी शिप की एख बार फिर फजीहत हुई है। भारत ने सात अप्रैल को NOTAM यानी “नोटिस टू एयरमेन” जारी किया था। इसी दौरान चीन का मिसाइल ट्रैकिंग शिप हिंद महासागर क्षेत्र में पहुंच गया। वहीं भारत ने चीन के खेल को समझते हुए नोटम कैंसिल कर दिया।

NOTAM India Missile Test: क्या होता है NOTAM और क्यों जारी किया जाता है

जब भी भारत कोई मिसाइल टेस्ट करने की तैयारी करता है, तो पहले से एक बड़ा इलाका खाली कराया जाता है। इसके लिए NOTAM जारी किया जाता है। इसका मतलब होता है कि उस क्षेत्र में कुछ समय के लिए हवाई और समुद्री गतिविधियां सीमित रहेंगी। आमतौर पर यह इलाका सैकड़ों से लेकर हजारों किलोमीटर तक फैला होता है।

इसका सीधा उद्देश्य सुरक्षा होता है, ताकि टेस्ट के दौरान कोई सिविल एयरक्राफ्ट या जहाज उस इलाके में न पहुंचे। लेकिन यही NOTAM अब एक तरह का संकेत भी बन गया है, जिसे दूसरे देश, खासकर चीन, बहुत ध्यान से देखता है।

कैसे काम करते हैं चीनी ट्रैकिंग शिप

चीन के पास “युआन वांग” सीरीज के खास जहाज हैं, जिन्हें मिसाइल और सैटेलाइट ट्रैक करने के लिए बनाया गया है। ये जहाज बेहद एडवांस रडार और एंटीना सिस्टम से लैस होते हैं। इनका काम किसी भी मिसाइल टेस्ट के दौरान उसकी स्पीड, रास्ता और बाकी तकनीकी जानकारी जुटाना होता है।

जैसे ही भारत NOTAM जारी करता है, ये जहाज उस इलाके के पास पहुंचने की कोशिश करते हैं। इसका मकसद टेस्ट के दौरान ज्यादा से ज्यादा डेटा इकट्ठा करना होता है।

सात अप्रैल को भी भारत ने 12 से 14 अप्रैल के लिए 1780 किमी की रेंज का NOTAM यानी “नोटिस टू एयरमेन” जारी किया था। मना जा रहा था कि यह कोई लंबी दूरी की मिसाइल का परीक्षण हो सकता है। इसी दौरान चीन का युआन वांग-07 जहाज सुंडा स्ट्रेट के रास्ते हिंद महासागर में दाखिल होने लगा।

लेकिन 13 अप्रैल को अचानक NOTAM कैंसल कर दिया गया। नतीजा यह रहा कि चीनी जहाज, जो खास तौर पर डेटा इकट्ठा करने आया था, उसे कुछ हासिल नहीं हुआ।

हालांकि भारत ने 14 अप्रैल को बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में फिर एक नया NOTAM यानी “नोटिस टू एयरमेन” जारी किया है। यह नोटिस 20 अप्रैल सुबह 10 बजे से 24 अप्रैल शाम 6:30 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस दौरान 170 किमी के इलाके में हवाई गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी।

पहले भी कई बार हो चुका है ऐसा

यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ हो। पिछले कुछ सालों में कई बार इसी तरह की स्थिति बनी है। कई बार NOTAM जारी हुआ और फिर अचानक रद्द कर दिया गया।

भारत ने पिछले साल दिसंबर के दौरान कई बार अलग-अलग तारीखों पर NOTAM जारी किए थे, जैसे 1 से 4 दिसंबर, 17 से 20 दिसंबर और 22 से 24 दिसंबर। इन NOTAM की रेंज 3500 किलोमीटर तक रखी गई थी। जैसे ही ये NOTAM जारी होते, चीन के 4 से 5 रिसर्च वैसल तुरंत उस इलाके के आसपास पहुंच जाते। इनमें शी यान-6, शेन हाय यी हाओ, लान हाई 101 और द यांग यी हाओ जैसे जहाज शामिल थे।

इसी दौरान चीन के कुछ युद्धपोत भी वहां मौजूद थे। ये सभी जहाज चीन के 48वें एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा थे, जो उस समय गल्फ ऑफ एडन के आसपास तैनात थे। ये जहाज मिसाइल की दिशा, उसकी गति, टेलीमेट्री डेटा, ध्वनि संकेत और गिरने वाले हिस्सों तक की जानकारी जुटाने में सक्षम होते हैं।

भारत ने भी इस पैटर्न को समझ लिया था। जैसे ही चीनी जहाज उस इलाके में पहुंचते, भारत NOTAM रद्द कर देता था। इससे चीन के जहाजों को कोई फायदा नहीं मिलता, उनका समय और ईंधन खर्च होता और उनकी लोकेशन भी सामने आ जाती। भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा था कि ऐसी स्थिति में टेस्ट को “रीकैलिब्रेट” करना अब एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।

क्या यह सिर्फ संयोग है या रणनीति

सोशल मीडिया पर इसे मजाक के तौर पर भी देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर रणनीति मानी जा रही है। क्योंकि NOTAM एक पब्लिक डॉक्यूमेंट होता है, जिसे कोई भी देख सकता है। चीन भी इसी जानकारी के आधार पर अपने जहाज भेजता है।

लेकिन भारत अब इस प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहा है। जब चीनी जहाज तय जगह पर पहुंच जाते हैं, तो टेस्ट को आगे खिसका दिया जाता है या उनका समय बदल दिया जाता है।

इस पूरे खेल में भारत को कई तरह के फायदे मिलते हैं। सबसे पहला फायदा यह है कि चीन को मिसाइल से जुड़ा कोई डेटा नहीं मिल पाता। दूसरा, चीन के जहाजों को बार-बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनका समय और संसाधन खर्च होता है।

तीसरा, भारत को यह समझने में मदद मिलती है कि चीन कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देता है और उसकी निगरानी क्षमता कैसी है। चौथा, भारतीय नौसेना को भी इन जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने का मौका मिलता है।

भारत की तैयारी भी है मजबूत

भारत के पास भी अब अपना मिसाइल ट्रैकिंग जहाज है, जिसे आईएनएस ध्रुव कहा जाता है। यह जहाज इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और मिसाइल ट्रैकिंग में सक्षम है। इसके जरिए भारत खुद भी समुद्र में होने वाली गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

इसके अलावा अंडमान-निकोबार और बंगाल की खाड़ी जैसे इलाके भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। यहां से गुजरने वाले समुद्री रास्तों पर नजर रखना जरूरी माना जाता है।

Operation Tiranga: इस नई सीक्रेट वॉर स्ट्रैटेजी ने रखी सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स की नींव, जानें क्या है यह ऐतिहासिक टेबल टॉप एक्सरसाइज

Operation Tiranga Explained: How India’s Theatre Command Plan Will Transform Armed Forces Structure

Operation Tiranga: अगले कुछ महीनों में भारतीय सेनाओं के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है जिसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा रक्षा सुधार माना जाएगा। इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स को सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन थिएटर कमांड्स को आकार देने में सबसे अहम भूमिका निभाई है ऑपरेशन तिरंगा ने।

नाम भले ही किसी सैन्य अभियान जैसा लगे, लेकिन यह असल में एक टेबल टॉप एक्सरसाइज (TTX) थी, जिसमें तीनों सेनाओं ने बैठकर भविष्य के युद्ध का पूरा खाका तैयार किया। इस पूरी प्रक्रिया में जनरल अनिल चौहान की अगुवाई में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने मिलकर थिएटर कमांड का फॉर्मेट तय किया।

यह एक्सरसाइज कई महीनों तक चली और अप्रैल 2026 में इसका मुख्य काम पूरा हो गया। इसमें सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि युद्ध के समय तीनों सेनाएं एक साथ कैसे काम करें और फैसले जल्दी कैसे लिए जाएं।

Operation Tiranga पर क्या कहा सीडीएस ने

अप्रैल 2026 में बेंगलुरु में हुए रण संवाद कार्यक्रम के दौरान सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने पहली बार खुलकर “ऑपरेशन तिरंगा” का नाम लिया। उन्होंने साफ शब्दों में बताया कि यह कोई युद्ध अभ्यास नहीं था, बल्कि तीनों सेनाओं के बीच थिएटर कमांड बनाने को लेकर गहन चर्चा और योजना बनाने की प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन तिरंगा” के तहत जो भी बातचीत और विचार-विमर्श चल रहा था, वह अब पूरा हो चुका है। यानी सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच जो बड़े मुद्दे थे, उन पर चर्चा खत्म हो गई है और एक तरह से सहमति बन चुकी है।

जनरल चौहान ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि थिएटर कमांड बनने के बाद सर्विस चीफ्स की कुछ शक्तियां कम हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद तीनों सेनाएं इस बदलाव के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। यानी तीनों सेनाएं अपनी-अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर देश के बड़े हित के लिए एक साथ काम करने को तैयार हैं।

जनरल चौहान ने सबसे अहम बात यह कही कि थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर तीनों सेनाओं के बीच कोई मतभेद नहीं है। उनके मुताबिक, सभी सर्विस चीफ इस बात से सहमत हैं कि भविष्य के युद्ध के लिए यह सिस्टम जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि कोई भी सेवा प्रमुख यह नहीं कह रहा कि थिएटर कमांड नहीं बनना चाहिए।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ मुद्दों पर अलग-अलग राय है, लेकिन ये मतभेद केवल इस बात को लेकर हैं कि इसे लागू कैसे किया जाए। इसे उन्होंने “मैनिफेस्टेशन” यानी कार्यान्वयन का हिस्सा बताया।

उनके अनुसार, मुख्य सवाल यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से हो, किस क्रम में हो और संसाधनों का बंटवारा कैसे किया जाए। खास तौर पर एयर एसेट्स यानी फाइटर जेट और दूसरे हवाई संसाधनों को लेकर चर्चा ज्यादा हुई है। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि ये सभी मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं।

सीडीएस ने यह भी बताया कि तीनों सेनाओं की तरफ से जो काम होना था, वह लगभग पूरा हो चुका है। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी पूरी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं और इसे जल्द ही रक्षा मंत्री को सौंप दिया जाएगा, जिसके बाद इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

क्या है Operation Tiranga

ऑपरेशन तिरंगा को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि यह कोई जमीनी ऑपरेशन नहीं था। यह ऑपरेशन एक “टेबल टॉप एक्सरसाइज” यानी टीटीएक्स के रूप में किया गया, जहां असली युद्ध नहीं लड़ा गया, बल्कि अलग-अलग संभावित परिस्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई। इसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों ने हिस्सा लिया और यह समझने की कोशिश की कि भविष्य में अगर एक साथ कई तरह के खतरे सामने आएं, तो उनसे कैसे निपटा जाए।

इस एक्सरसाइज में अलग-अलग हालात बनाए गए, जैसे अगर एक साथ दो सीमाओं पर तनाव बढ़ जाए या समुद्र में दुश्मन सक्रिय हो जाए, तो तीनों सेनाएं कैसे प्रतिक्रिया देंगी। इन सभी परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा हुई और हर स्थिति में फैसले लेने का तरीका तय किया गया।

कैसे हुई टेबल टॉप एक्सरसाइज

ऑपरेशन तिरंगा के दौरान कई तरह के काल्पनिक हालात तैयार किए गए। इनमें चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान के साथ युद्ध, समुद्री खतरे, साइबर हमले और स्पेस से जुड़े खतरे शामिल थे। इन सभी स्थितियों पर बैठकर चर्चा की गई कि अगर ऐसा होता है तो कौन क्या करेगा और कैसे करेगा।

इस प्रक्रिया में “रोल प्ले” भी किया गया। यानी कुछ अधिकारियों को थिएटर कमांडर की भूमिका दी गई, कुछ को डिप्टी कमांडर की और कुछ को सर्विस चीफ की भूमिका में रखा गया। इसके जरिए यह समझा गया कि आदेश कैसे दिए जाएंगे, किसके पास कितना अधिकार होगा और किस तरह से संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

मल्टी-डोमेन युद्ध पर फोकस

इस दौरान एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि केवल एक डोमेन यानी जमीन, हवा या समुद्र के आधार पर अब युद्ध नहीं जीता जा सकता। सभी डोमेन्स को एक साथ जोड़कर ही काम करना होगा। इसमें साइबर हमले, स्पेस टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जानकारी की लड़ाई भी शामिल होती है। यही वजह है कि इसे मल्टी-डोमेन अप्रोच कहा जाता है।

ऑपरेशन तिरंगा में इस बात पर खास ध्यान दिया गया कि कैसे एक कमांडर एक साथ सभी डोमेन्स को समझ सके और उनका इस्तेमाल कर सके। उदाहरण के तौर पर, अगर जमीन पर सेना आगे बढ़ रही है, तो उसी समय वायुसेना एयर सपोर्ट दे रही हो और नौसेना समुद्र में दुश्मन की सप्लाई रोक रही हो। (Operation Tiranga)

नए थिएटर कमांड्स की तैयारी

आज भारतीय सेनाएं अलग-अलग कमांड के तहत काम करती हैं। कुल मिलाकर करीब 17 कमांड हैं, जिनमें आर्मी, नेवी और वायुसेना की अपनी-अपनी व्यवस्था है। हर सर्विस का अपना अलग कमांड सिस्टम होता है। जैसे आर्मी का वेस्टर्न कमांड पाकिस्तान सीमा को देखता है, नॉर्दर्न कमांड चीन सीमा को संभालता है, जबकि वायुसेना का वेस्टर्न एयर कमांड जरूरत पड़ने पर एयर सपोर्ट देता है।

इस पूरे अभ्यास के बाद तीन बड़े थिएटर कमांड का प्रस्ताव तैयार किया गया। पहला वेस्टर्न थिएटर, जो पाकिस्तान पर फोकस करेगा। दूसरा नॉर्दर्न या ईस्टर्न थिएटर, जो चीन से जुड़े क्षेत्रों को संभालेगा। तीसरा मैरिटाइम थिएटर, जो समुद्री क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालेगा।

इन तीनों थिएटर में अलग-अलग सेवाओं के अधिकारी कमांडर बनेंगे, लेकिन उनके साथ दूसरी सेवाओं के अधिकारी भी डिप्टी के रूप में काम करेंगे। इससे तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बना रहेगा।

इसके अलावा एक और प्रस्ताव सामने आया, जिसमें वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नई पोस्ट बनाने की बात कही गई है, जो ऑपरेशन के स्तर पर कॉर्डिनेशन में मदद करेगा।

इसके अलावा यह भी तय हुआ कि कुछ खास संसाधन, जैसे एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट या बड़े सर्विलांस सिस्टम, सीधे वायुसेना के पास ही रहेंगे, ताकि जरूरत के हिसाब से उन्हें कहीं भी भेजा जा सके। (Operation Tiranga)

कौन लेगा ऑपरेशनल फैसले

इस नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव फैसले लेने के तरीके में आएगा। अभी किसी ऑपरेशन के लिए अलग-अलग स्तर पर अनुमति लेनी पड़ती है। थिएटर कमांड में यह प्रक्रिया छोटी हो जाएगी।

इससे समय की बचत होगी और किसी भी आपात स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। साथ ही, अलग-अलग संसाधनों का बेहतर उपयोग भी हो पाएगा, क्योंकि सब कुछ एक ही कमांड के तहत होगा।

क्योंकि तीनों सेनाएं अभी अपने-अपने संसाधनों का इस्तेमाल अलग-अलग करती हैं। इससे कई बार एक ही तरह के संसाधन अलग-अलग जगहों पर उपयोग होते हैं, जिससे खर्च भी बढ़ता है और प्रभाव भी कम होता है।

थिएटर कमांड के जरिए सभी संसाधनों को एक साथ लाकर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जाएगा। इससे लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम भी मजबूत होगा और ऑपरेशन में कोई रुकावट नहीं आएगी। (Operation Tiranga)

ट्रेनिंग और तैयारी में बदलाव

थिएटर कमांड लागू होने के बाद सैनिकों की ट्रेनिंग में भी बदलाव आएगा। अब उन्हें सिर्फ अपने डोमेन की नहीं, बल्कि दूसरे डोमेन्स की भी जानकारी दी जाएगी।

इससे सैनिक और अधिकारी बेहतर तरीके से समझ पाएंगे कि युद्ध के समय किस तरह अलग-अलग सिस्टम एक साथ काम करते हैं। इससे उनकी तैयारी भी मजबूत होगी और ऑपरेशन के दौरान गलतियों की संभावना कम होगी।

अंडमान-निकोबार कमांड से मिली सीख

भारत में पहले से एक जॉइंट कमांड मौजूद है, जिसे अंडमान-निकोबार कमांड कहा जाता है। इसे मॉडल के तौर पर देखा गया।

यह कमांड तीनों सेनाओं को एक साथ लेकर काम करता है और लंबे समय से सक्रिय है। ऑपरेशन तिरंगा में इसके अनुभव का इस्तेमाल किया गया, ताकि नई व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके। (Operation Tiranga)

कमांड और कंट्रोल सिस्टम में बदलाव

थिएटर कमांड के साथ कमांड और कंट्रोल सिस्टम भी बदलेगा। इसमें कम्युनिकेशन, डेटा और इंटेलिजेंस को एक साथ जोड़ा जाएगा।

इसका मतलब है कि जमीन पर मौजूद सैनिक से लेकर ऊपर बैठे कमांडर तक, सभी को एक ही समय में एक जैसी जानकारी मिलेगी। इससे फैसले लेने में आसानी होगी।

थिएटर कमांड लागू होने के बाद क्या करेंगे सर्विस चीफ

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने साफ बताया है कि थिएटर कमांड लागू होने के बाद आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ की भूमिका बदल जाएगी। पहले ये चीफ्स ऑपरेशन भी संभालते थे और अपनी-अपनी सेना की तैयारी भी करते थे, लेकिन अब ये दोनों काम अलग हो जाएंगे।

अब युद्ध लड़ने की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। यानी किसी इलाके में अगर ऑपरेशन होता है, तो वहां एक ही कमांडर तीनों सेनाओं को मिलाकर काम करेगा।

थिएटर कमांड बनने के बाद सेवा चीफ्स का मुख्य काम अपनी-अपनी सेना को तैयार रखना होगा। इसे आसान भाषा में “रेज, ट्रेन और सस्टेन” कहा जाता है। (Operation Tiranga)

रेज का मतलब है नई यूनिट बनाना, भर्ती करना और नए हथियार व उपकरण शामिल करना। ट्रेन का मतलब है सैनिकों और अधिकारियों को अच्छी ट्रेनिंग देना, ताकि वे हर स्थिति में तैयार रहें। सस्टेन का मतलब है सेना को हमेशा तैयार रखना, जिसमें हथियारों की मरम्मत, गोला-बारूद, ईंधन और दूसरी जरूरी चीजों की सप्लाई शामिल है।

इसके अलावा सेवा चीफ्स अपने-अपने फोर्स की परंपरा और सिस्टम को बनाए रखेंगे। वे जरूरत पड़ने पर थिएटर कमांडर को तैयार और ट्रेन की हुई फोर्स उपलब्ध कराएंगे। साथ ही, वे रणनीतिक स्तर पर सीडीएस की मदद भी करेंगे।

पहले सेवा चीफ्स ही ऑपरेशन भी चलाते थे और सेना भी तैयार करते थे, जिससे कई बार तालमेल की कमी और देरी होती थी। अब ऑपरेशन और तैयारी दोनों काम अलग हो जाएंगे, जिससे काम ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से हो सकेगा। (Operation Tiranga)

क्या होगा स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड (SFC) का?

थिएटर कमांड बनने की प्रक्रिया के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड यानी SFC का क्या होगा। इस बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है। लेकिन सूत्रों का कहना है, एसएफसी को अलग ही रखा जाएगा। इसे थिएटर कमांड में शामिल नहीं किया जाएगा। क्योंकि चीन और रूस में भी स्ट्रेटेजिक फोर्सेस अलग-अलग हैं।

स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड की स्थापना 2003 में की गई थी। इसका मुख्य काम भारत के परमाणु हथियारों से जुड़ी पूरी व्यवस्था को संभालना है। इसमें जमीन से छोड़ी जाने वाली मिसाइलें, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलें और हवाई माध्यम से इस्तेमाल होने वाले परमाणु हथियार शामिल होते हैं। इनमें अग्नि मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलें (SLBM), और एयर-ड्रॉप्ड न्यूक्लियर वेपंस शामिल हैं।

फिलहाल स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड के वर्तमान कमांडर-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल दिनेश सिंह राणा हैं, जो सीडीएस को रिपोर्ट करते हैं।

यह कमांड पहले से ही तीनों सेनाओं का संयुक्त सिस्टम है, यानी आर्मी, नेवी और वायुसेना, तीनों की न्यूक्लियर ताकत इसमें शामिल रहती है। इसका कंट्रोल बहुत ही उच्च स्तर पर होता है और यह सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व के दिशा-निर्देशों के तहत काम करता है।

सूत्रों ने बताया कि थिएटर कमांड का काम सामान्य युद्ध यानी जमीन, हवा और समुद्र में होने वाले ऑपरेशन को संभालना होगा। लेकिन स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड का काम इससे अलग और ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि यह परमाणु हथियारों से जुड़ा है। (Operation Tiranga)

इसी वजह से इसे किसी क्षेत्रीय थिएटर कमांडर के अधीन नहीं रखा जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो कमांड और कंट्रोल सिस्टम में जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड को अलग ही रखा जाएगा, ताकि इसका कंट्रोल सीधे राष्ट्रीय स्तर पर बना रहे।

स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड पहले की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाता रहेगा। यह परमाणु हथियारों की सुरक्षा, नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की तैयारी से जुड़ा रहेगा। थिएटर कमांडर्स को इसके संसाधनों पर सीधा कंट्रोल नहीं मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि अगर किसी स्थिति में कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ेगी, तो यह काम सीडीएस के जरिए किया जाएगा। यानी स्ट्रेटेजिक फोर्स कमांड और थिएटर कमांड्स के बीच तालमेल रहेगा, लेकिन कंट्रोल अलग-अलग रहेगा। (Operation Tiranga)

थिएटर कमांड बनने के बाद कितने 4-स्टार अफसर

थिएटर कमांड लागू होने के बाद भारतीय सेना में 4-स्टार अधिकारियों की संख्या बढ़ जाएगी। अभी स्थिति यह है कि सिर्फ चार ही 4-स्टार अधिकारी होते हैं, जिनमें एक सीडीएस, एक आर्मी चीफ, एक नेवी चीफ और एक एयर चीफ शामिल हैं।

लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद कुल 8 चार-स्टार अधिकारी होंगे। इनमें सबसे ऊपर सीडीएस होंगे। उनके अलावा एक नया पद बनेगा, जिसे वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (VCDS) कहा जाएगा। यह भी 4-स्टार रैंक का होगा।

इसके बाद तीनों सेनाओं के प्रमुख यानी आर्मी चीफ, नेवी चीफ और एयर चीफ पहले की तरह 4-स्टार रहेंगे। साथ ही तीन नए थिएटर कमांडर भी बनाए जाएंगे, जो अलग-अलग इलाकों की कमान संभालेंगे और ये भी 4-स्टार रैंक के होंगे। इस तरह कुल मिलाकर 8 बड़े अधिकारी होंगे। (Operation Tiranga)

कानपुर बनेगा एविएशन हब, जीई एयरोस्पेस से मिलेगा यूपी डिफेंस कॉरिडोर को ग्रोथ का “इंजन”!

GE Aerospace Tejas Engine Depot
GE Aerospace Tejas Engine Depot India: Kanpur Set to Become Aviation Hub Boosting UP Defence Corridor

GE Aerospace Tejas Engine Depot: उत्तर प्रदेश अब डिफेंस और एविएशन सेक्टर में भी ऊंची छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पोस और भारतीय वायुसेना के बीच तेजस के इंजन को लेकर हाल ही में अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत देश में ही एफ-404-आईएन20 इंजन के लिए एक इन-कंट्री डिपो फैसिलिटी बनाई जाएगी, जो तेजस एलसीए फाइटर जेट्स के इंजन की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम करेगी। सूत्रों का कहना है कि यह फैसिलिटी उत्तर प्रदेश में लगाई जा सकती है।

इस फैसिलिटी को भारतीय वायुसेना तैयार करेगी, जबकि जीई एयरोस्पेस तकनीकी सहयोग देगा। इस कदम को यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए एक बड़े बूस्ट के तौर पर देखा जा रहा है।

GE Aerospace Tejas Engine Depot: क्या है नया डिपो प्रोजेक्ट

इस समझौते का मुख्य उद्देश्य यह है कि भारत में ही तेजस एमके1/एमके1ए के इंजन रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा तैयार हो सके। अभी तक जब भी तेजस फाइटर जेट के इंजन में बड़ी खराबी आती थी, तो उसे विदेश भेजना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगता था और कई विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहते थे।

अब इस नई डिपो फैसिलिटी के बनने के बाद यह काम देश के अंदर ही हो सकेगा। इससे रिपेयर का समय कम होगा और विमान ज्यादा समय तक ऑपरेशनल रह पाएंगे। इस फैसिलिटी का पूरा ऑपरेशन भारतीय वायुसेना के हाथ में होगा। जबकि जीई एयरोस्पेस ट्रेनिंग, तकनीकी सपोर्ट, स्पेयर पार्ट्स और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराएगा।

समय पर मिलेंगे इंजन

जीई एरोस्पेस की डिफेंस और सिस्टम्स की सेल्स और बिजनेस डेवलपमेंट की वाइस प्रेसिडेंट रीटा फ्लैहर्टी ने कहा,भारतीय सशस्त्र बलों की मदद करना उनकी कंपनी की प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि इसी सोच के तहत यह साझेदारी आगे बढ़ाई जा रही है, ताकि तेजस विमान के इंजनों की देखभाल और सपोर्ट की क्षमता भारत में ही मजबूत हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि नई डिपो फैसिलिटी के जरिए भारतीय वायुसेना को एफ-404 आईएन20 इंजन समय पर उपलब्ध रहेंगे और उन्हें आधुनिक तकनीक का सीधा फायदा मिलेगा। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

तेजस फ्लीट को कैसे मिलेगा फायदा

एफ-404-आईएन20 वही इंजन है, जो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एलएएल) तेजस फाइटर जेट में लगाया जाता है। यह भारत का स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है। इंजन की समय पर मरम्मत और मेंटेनेंस न होने की वजह से कई बार विमान उड़ान के लिए तैयार नहीं हो पाते थे। अब डिपो फैसिलिटी के जरिए यह समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। इसका सीधा असर यह होगा कि वायुसेना के पास ज्यादा विमान एक साथ उपलब्ध रहेंगे और ऑपरेशनल क्षमता बेहतर बनी रहेगी। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

यूपी डिफेंस कॉरिडोर को मिलेगी मजबूती

उत्तर प्रदेश में बना डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर देश के बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक है। यह कॉरिडोर छह अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है, जिसमें अलीगढ़, आगरा, चित्रकूट, झांसी, लखनऊ और कानपुर शामिल हैं।

इन सभी में कानपुर को सबसे अहम नोड माना जा रहा है। यहां सबसे ज्यादा निवेश आया है और पहले से ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत बेस मौजूद है। सूत्रों का कहना है कि जीई एरोस्पेस अपनी नई फैसिलिटी के लिए कानपुर नोड को चुन सकता है।

इसकी वजह है कि कानपुर में पुराने समय से ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां काम कर रही हैं, जहां हथियार और सैन्य उपकरण बनाए जाते रहे हैं। यहां आयुध निर्माणी कानपुर, लघु शस्त्र निर्माणी, फील्ड गन निर्माणी जैसी कई ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां पहले से ही मौजूद हैं। इसके साथ ही यहां के लोगों को मेटल वर्क, लेदर और टेक्सटाइल का अच्छा अनुभव है, जिससे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए तैयार स्किल्ड वर्कफोर्स और इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलता है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

चकेरी में है बेस रिपेयर डिपो 

सूत्रों ने बताया कि कानपुर के चकेरी इलाके में भारतीय वायुसेना और एचएएल की बड़ी मरम्मत और मेंटेनेंस सुविधाएं भी हैं। चकेरी एयर फोर्स स्टेशन पर वायुसेना के दो बड़े वर्कशॉप हैं, जिन्हें बेस रिपेयर डिपो कहा जाता है। पहला है 1 बीआरडी, जहां मुख्य रूप से ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे एएन-32 की मरम्मत और ओवरहॉल किया जाता है। यहां विमान के इंजन, बॉडी और सिस्टम्स की पूरी जांच और सुधार किया जाता है, ताकि वह लंबे समय तक सुरक्षित उड़ान भर सके। दूसरा है 4 बीआरडी, जहां एयरक्राफ्ट के इंजन की मरम्मत होती है। यहां मिग और मिराज जैसे फाइटर जेट्स में इस्तेमाल होने वाले इंजनों की ओवरहॉलिंग की जाती रही है।

इसके अलावा चकेरी में ही एचएएल का ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट डिविजन भी है। यहां डॉर्नियर-228 जैसे विमानों का निर्माण भी होता है और उनकी रिपेयरिंग भी की जाती है। इसके अलावा एएन-32 और दूसरे ट्रांसपोर्ट विमानों की मेंटेनेंस का काम भी यहीं होता है।

चकेरी की खासियत यह है कि यहां पहले से ही स्किल्ड वर्कफोर्स और पुरानी डिफेंस फैक्ट्री का अनुभव मौजूद है। आजादी के बाद से यह जगह एयरक्राफ्ट रिपेयर का बड़ा केंद्र रही है।

तेजी से बढ़ रहा निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर

कानपुर यूपी डिफेंस कॉरिडोर का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है। यहां सबसे ज्यादा निवेश आया है और यही वजह है कि इसे इस कॉरिडोर का “इंजन” कहा जाता है। अब तक यहां करीब 12,683 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, जो बाकी सभी नोड्स से ज्यादा है।

यहां नए-नए डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो चुका है। नरवल इलाके में बड़े पैमाने पर जमीन डेवलप की गई है, जहां कंपनियों को प्लॉट दिए जा रहे हैं। इसके अलावा यहां सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े प्रोजेक्ट्स भी शुरू किए गए हैं। आईआईटी कानपुर जैसे संस्थान के जुड़ने से रिसर्च और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट को भी बढ़ावा मिल रहा है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

इसके अलावा कानपुर में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भी तेजी से निवेश किया है। यहां बड़े प्राइवेट प्रोजेक्ट्स भी तेजी से आ रहे हैं। अदाणी डिफेंस एंड एरोस्पेस का करीब 1,500 करोड़ रुपये का प्लांट कानपुर में शुरू हो चुका है, जहां मिसाइल और गोला-बारूद बनाए जा रहे हैं। इसे दक्षिण एशिया के बड़े डिफेंस प्लांट्स में गिना जाता है।

यह यूनिट सालाना करीब 30 करोड़ राउंड छोटे हथियारों के लिए बना सकती है। इस तरह हथियार और गोला-बारूद दोनों का निर्माण देश में ही हो रहा है, जिससे पूरी सप्लाई चेन मजबूत हो रही है। हाल ही में अदाणी डिफेंस की तरफ से सेना को डिलीवर की गईं प्रहार लाइट मशीन गन की गोलियां भी यहीं बनाई जा रही हैं।

कानपुर में टेक्नोलॉजी और रिसर्च पर भी काम हो रहा है। आईआईटी कानपुर के साथ मिलकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जा रहा है। शिवली इलाके में डिफेंस पार्क की योजना है, जहां बैलिस्टिक मैटेरियल और डिफेंस टेक्सटाइल से जुड़े प्रोजेक्ट्स लगाए जाएंगे।

इसमें बड़े डिफेंस प्लांट लगाए जा रहे हैं, जहां मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरण बनाए जा रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स की वजह से न सिर्फ उत्पादन बढ़ रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। सरकार की तरफ से भी इन कंपनियों को पॉलिसी सपोर्ट, टैक्स में छूट और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा दी जा रही है, जिससे निवेश को बढ़ावा मिल रहा है।

सीधे शब्दों में कहें तो पुरानी फैक्ट्रियों और नई प्राइवेट कंपनियों के निवेश की वजह से कानपुर सबसे तेजी से आगे बढ़ रहा है और पूरे डिफेंस कॉरिडोर को रफ्तार दे रहा है। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

सेना के कई प्लेटफॉर्म्स में जीई के इंजन

कंपनी भारत में एविएशन सेक्टर को मजबूत बनाने पर भी काम कर रही है। डिजाइन, डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में लगातार सहयोग किया जा रहा है। कंपनी ने भारत में कई ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाए हैं, जिनसे हजारों लोगों को तकनीकी कौशल सिखाया गया है।

तेजस के अलावा भी जीई एरोस्पेस के इंजन भारतीय नौसेना और वायुसेना के कई प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल हो रहे हैं। इनमें पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और एएच-64 अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। इसके अलावा एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और आईएनएस जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर में भी लगाए गए हैं।

इसके साथ ही, जीई और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ‘तेजस एमके2’ के लिए भारत में एफ414 इंजनों का संयुक्त उत्पादन भी करेंगे, जिसमें 80% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल होगा। (GE Aerospace Tejas Engine Depot)

मंगोलिया में भारतीय सेना के बॉक्सरों का जलवा! एशियन चैंपियनशिप में जीते 8 मेडल

Indian Army Boxers Asian Championship

Indian Army Boxers Asian Championship: भारतीय सेना के बॉक्सरों ने मंगोलिया में आयोजित एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल आठ मेडल अपने नाम किए हैं। इस टूर्नामेंट में सेना के खिलाड़ियों ने तीन गोल्ड, दो सिल्वर और तीन ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया।

इन सभी बॉक्सरों ने सेना के आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग ली है, जो मिशन ओलंपिक्स प्रोग्राम के तहत काम करता है। इस प्रोग्राम का मकसद ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करना है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें।

पुरुष वर्ग में विश्वनाथ ने 50 किलो कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता। वहीं 60 किलो वर्ग में सचिन ने सिल्वर हासिल किया। आकाश ने 75 किलो में ब्रॉन्ज जीता, जबकि लोकेश ने 85 किलो और नरेंद्र ने 90 किलो से ऊपर की कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया।

महिला वर्ग में भी भारतीय सेना की बॉक्सरों ने शानदार प्रदर्शन किया। प्रीति ने 54 किलो कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता। अरुंधति ने 70 किलो वर्ग में गोल्ड हासिल किया, जबकि जैस्मिन ने 57 किलो कैटेगरी में सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

इन खिलाड़ियों की सफलता के पीछे आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट की कड़ी ट्रेनिंग और अनुशासन को अहम माना जा रहा है। यहां खिलाड़ियों को प्रोफेशनल माहौल में तैयार किया जाता है, ताकि वे बड़े मुकाबलों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

मिशन ओलंपिक्स के तहत सेना लगातार ऐसे खिलाड़ियों को आगे बढ़ा रही है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने की क्षमता रखते हैं।

अब NCC कैडेट्स बनेंगे ‘साइबर डिफेंडर’, इंटरनेट सेफ्टी पर फोकस, NIELIT के साथ किया करार

NCC Cyber Security Training Programme
DG NCC, Lt Gen Virendra Vats, YSM, SM, VSM and DG NIELIT, Dr Madan Mohan Tripathi

NCC Cyber Security Training Programme: एनसीसी ने देशभर के कैडेट्स को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में ट्रेनिंग करने के लिए एक नया कार्यक्रम शुरू किया है। इस पहल के तहत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर साइबर सिक्योरिटी कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम लॉन्च किया गया है। इसके लिए दोनों संस्थाओं के बीच एमओयू साइन किया गया।

इस प्रोग्राम का मकसद कैडेट्स को साइबर अवेयरनेस, डिजिटल हाइजीन और बेसिक साइबर डिफेंस स्किल्स सिखाना है। आज के समय में इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में ऑनलाइन सुरक्षा को समझना जरूरी हो गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए यह ट्रेनिंग शुरू की गई है।

एनसीसी के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल वीरेंद्र वत्स और एनआईईएलआईटी के महानिदेशक डॉ. मदन मोहन त्रिपाठी की उपस्थिति में एनसीसी और एनआईईएलआईटी के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

इस पूरे प्रोग्राम को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले चरण में साइबर सिक्योरिटी अवेयरनेस प्रोग्राम होगा, जो 15 घंटे का ऑनलाइन कोर्स है। इसमें कैडेट्स को डिजिटल लिटरेसी, सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल और साइबर खतरों के बारे में आसान जानकारी दी जाएगी। यह ट्रेनिंग सभी एनसीसी कैडेट्स के लिए खुली रहेगी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए कराई जाएगी।

दूसरे चरण में साइबर डिफेंडर प्रोग्राम होगा। यह 60 घंटे का ऑफलाइन ट्रेनिंग कोर्स है, जिसमें केवल चुने गए कैडेट्स को शामिल किया जाएगा। इसमें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, सिमुलेशन और अलग-अलग साइबर टूल्स का इस्तेमाल सिखाया जाएगा, ताकि कैडेट्स असली परिस्थितियों में भी साइबर खतरों को पहचान सकें।

इस पहल के जरिए ऐसे प्रशिक्षित कैडेट्स तैयार किए जाएंगे, जो अपने आसपास के लोगों को साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक कर सकें। साथ ही वे सुरक्षित डिजिटल आदतों को बढ़ावा देने में भी मदद करेंगे। यह प्रोग्राम देश में चल रहे डिजिटल इंडिया और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े प्रयासों के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि युवाओं को नई तकनीक के साथ सुरक्षित तरीके से जोड़ा जा सके।

अब भारत में ही होगा तेजस इंजन रिपेयर! F404 इंजन के लिए भारत में खास फैसिलिटी बनाएगा GE

GE-IAF F404 Engine Depot

GE-IAF F404 Engine Depot: अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पेस ने भारतीय वायुसेना के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत देश में ही एफ-404 इंजन के लिए डिपो फैसिलिटी स्थापित की जाएगी। यह वही इंजन है जो तेजस एलसीए फाइटर जेट में इस्तेमाल किया जाता है। इस फैसिलिटी के बनने के बाद भारत को इंजन की मरम्मत और ओवरहॉल के लिए विदेश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे समय और संसाधनों दोनों की बचत होगी।

GE-IAF F404 Engine Depot: क्या है नया समझौता

इस समझौते के तहत देश में एफ-404-आईएन20 इंजन के लिए एक इन-कंट्री डिपो तैयार किया जाएगा। इस डिपो को ऑपरेट और मेंटेन भारतीय वायुसेना करेगी। इसमें जीई एरोस्पेस तकनीकी सहयोग देगा, जिसमें ट्रेनिंग, सपोर्ट स्टाफ, जरूरी स्पेयर पार्ट्स और विशेष उपकरण शामिल होंगे।

इसका मकसद यह है कि तेजस फ्लीट के इंजनों को समय पर रिपेयर और मेंटेनेंस मिल सके और विमान ज्यादा समय तक ऑपरेशनल रहें।

एफ-404-आईएन20 इंजन भारतीय वायुसेना के लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस एमके1 और एमके1ए वेरिएंट में इस्तेमाल होता है। अभी तक जब भी इंजन में बड़ी मरम्मत की जरूरत होती थी, तो उसे विदेश भेजना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता था, जिससे कई बार विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहते थे। अब देश में ही डिपो बनने से यह प्रक्रिया तेज हो जाएगी और इंजनों की उपलब्धता बेहतर हो सकेगी। (GE-IAF F404 Engine Depot)

यह डिपो पूरी तरह भारत में बनाया जाएगा और इसका ऑपरेशन भारतीय वायुसेना करेगी। जीई एरोस्पेस इस फैसिलिटी को तकनीकी रूप से सपोर्ट करेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय इंजीनियरों और तकनीकी स्टाफ को विशेष ट्रेनिंग भी देगी, साथ ही जरूरी उपकरण उपलब्ध कराएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि सभी मरम्मत अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हो। इसके अलावा कंपनी स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई में भी मदद करेगी, ताकि रिपेयर का काम बिना रुकावट चलता रहे।

जीई एरोस्पेस ने भारत में पहले भी कई स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाए हैं, जिनमें हजारों लोगों को मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई है। इस नई फैसिलिटी के जरिए भी स्थानीय स्तर पर तकनीकी कौशल को बढ़ावा मिलेगा। (GE-IAF F404 Engine Depot)

इस फैसिलिटी का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इंजन रिपेयर में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा। पहले इंजन को विदेश भेजने, वहां जांच और मरम्मत कराने और फिर वापस लाने में लंबा समय लगता था। अब यह पूरा काम भारत में ही हो सकेगा, जिससे टर्नअराउंड टाइम कम होगा। इसका सीधा असर यह होगा कि ज्यादा से ज्यादा तेजस विमान ऑपरेशन के लिए उपलब्ध रहेंगे।

इस डिपो फैसिलिटी को देश में स्थापित करने का मकसद सिर्फ सुविधा बढ़ाना नहीं है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना भी है। जब इंजन की मरम्मत और मेंटेनेंस देश में ही होगी, तो विदेशी निर्भरता कम होगी और तकनीकी क्षमता भी बढ़ेगी। इससे देश के अंदर ही एक मजबूत एविएशन सपोर्ट सिस्टम तैयार होगा, जो भविष्य में अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए भी उपयोगी रहेगा। (GE-IAF F404 Engine Depot)

पी-8आई, एमएच-60आर और अपाचे में जीई के इंजन

जीई एरोस्पेस और भारत के बीच साझेदारी नई नहीं है। पिछले करीब 40 सालों से यह कंपनी भारत के एविएशन सेक्टर के साथ काम कर रही है। तेजस विमान के अलावा कंपनी के इंजन भारतीय नौसेना के पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर में भी इस्तेमाल हो रहे हैं।

इसके अलावा एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत में भी लगाए गए हैं।

इस बीच एचएएल और जीई एरोस्पेस के बीच एफ-414 इंजन को लेकर तकनीकी समझौते पर भी बातचीत हुई है।
यह इंजन तेजस एमके2 के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, जो मौजूदा एफ-404 इंजन से ज्यादा ताकतवर है। एचएएल और जीई अब इस प्रोजेक्ट की अगली स्टेज में पहुंच गए हैं, जहां कमर्शियल बातचीत आगे बढ़ेगी।

इससे पहले पिछले हफ्ते बुधवार को बेंगलुरु में एचएएल के साथ जीई के अधिकारियों की अहम बैठक हुई थी। इस बैठक में जीई एरोस्पेस के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने एचएएल के अधिकारियों से मुलाकात की। इस अहम बैठक का फोकस तेजस के इंजन की डिलीवरी में देरी और आगे की योजना को लेकर था। बैठक में जीई एरोस्पेस की टीम का नेतृत्व कंपनी की वाइस प्रेसिडेंट रीटा फ्लेहर्टी कर रही थीं। जबकि एचएएल की तरफ से चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डीके सुनील और डायरेक्टर (ऑपरेशंस) रवि के. शामिल हुए थे। (GE-IAF F404 Engine Depot)

भारतीय नौसेना की बढ़ेगी ताकत! NGMV जहाजों के लिए वॉटरजेट डील, 65 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ेंगे नए वॉरशिप

Indian Navy NGMV Waterjet Deal

Indian Navy NGMV Waterjet Deal: भारतीय नौसेना के नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल वेसल यानी एनजीएमवी प्रोग्राम के लिए नॉर्वे की कंपनी कॉन्ग्सबर्ग मैरीटाइम ने वॉटरजेट प्रोपल्शन सिस्टम सप्लाई करने का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। इस डील के तहत कुल 18 बड़े ‘कामेवा वॉटरजेट’ दिए जाएंगे, जो इन जहाजों की स्पीड और मूवमेंट को काफी बेहतर बनाएंगे।

भारतीय नौसेना के एनजीएमवी प्रोग्राम के तहत हर जहाज में तीन वॉटरजेट लगाए जाएंगे, जिससे ये जहाज तेज गति से चल सकेंगे और तेजी से दिशा बदल पाएंगे। ये सभी जहाज कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में बनाए जा रहे हैं। यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। (Indian Navy NGMV Waterjet Deal)

Indian Navy NGMV Waterjet Deal: क्या होता है वॉटरजेट सिस्टम

वॉटरजेट एक तरह का प्रोपल्शन सिस्टम होता है, जो पारंपरिक प्रोपेलर से अलग काम करता है। इसमें पानी को तेज दबाव से पीछे की ओर फेंका जाता है, जिससे जहाज आगे बढ़ता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जहाज ज्यादा तेज चलता है और उसे मोड़ना आसान होता है। हाई-स्पीड ऑपरेशन और तटीय इलाकों में काम करने के लिए यह सिस्टम काफी उपयोगी माना जाता है। साथ ही ये नॉइज और वाइब्रेशन भी कम करते हैं, इसलिए स्टेल्थ ऑपरेशन के लिए बेहतर हैं।

कंपनी के मुताबिक यह अब तक का उनका सबसे बड़ा वॉटरजेट ऑर्डर है। पिछले कुछ सालों में इस तरह के बड़े ऑर्डर कम मिले थे, लेकिन इस डील के साथ कंपनी ने फिर से बड़े स्तर पर वॉटरजेट मैन्युफैक्चरिंग में वापसी की है। कंपनी के अधिकारियों ने कहा कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए एक माइलस्टोन है और इस बात का प्रतीक है कि उनकी तकनीक पर भरोसा किया जा रहा है। (Indian Navy NGMV Waterjet Deal)

क्या है एनजीएमवी प्रोग्राम

एनजीएमवी यानी नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल वेसल भारतीय नौसेना का एक बड़ा प्रोजेक्ट है। इसके तहत छह नए मिसाइल वेसल बनाए जा रहे हैं। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड इस पूरे प्रोजेक्ट को तैयार कर रहा है। मार्च 2023 में करीब 9804 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट का कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ था। पहले जहाज की डिलीवरी मार्च 2027 तक होने की योजना है। इसके लिए स्टील कटिंग का काम दिसंबर 2024 में शुरू किया जा चुका है।

ये आधुनिक मिसाइल कॉर्वेट्स हैं, जिन्हें खास तौर पर समुद्र में दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने, समुद्री इलाकों में नियंत्रण बनाए रखने और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए डिजाइन किया गया है। इसके अलावा ये जहाज ऑफशोर इलाकों जैसे तेल और गैस प्लेटफॉर्म की सुरक्षा में भी काम आएंगे।

इन जहाजों की एक बड़ी खासियत इनकी स्टेल्थ क्षमता है। यानी इन्हें इस तरह बनाया जा रहा है कि दुश्मन के रडार, इंफ्रारेड सेंसर, साउंड डिटेक्शन और मैग्नेटिक सिस्टम इन्हें आसानी से पकड़ न सकें। इसका मतलब यह हुआ कि ये जहाज दुश्मन के करीब जाकर भी काफी हद तक छिपे रह सकते हैं और अचानक हमला करने में सक्षम होंगे।

इन मिसाइल वेसल को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि ये तेजी से ऑपरेशन कर सकें और जरूरत पड़ने पर जल्दी से अपनी दिशा बदल सकें। इनमें सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें लगाई जाएंगी, जिनमें ब्रह्मोस जैसी मिसाइल शामिल होने की संभावना है। इसके अलावा इनमें शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम भी लगाया जाएगा।
इन जहाजों में 76 मिमी की नेवल गन, एयर सर्विलांस और फायर कंट्रोल रडार जैसे सिस्टम भी होंगे।

इस प्रोजेक्ट में सिर्फ वॉटरजेट ही नहीं, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण सिस्टम भी लगाए जा रहे हैं। इसके तहत भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को एक्स-बैंड मल्टी फंक्शन रडार देने का ऑर्डर मिला है। यह रडार डीआरडीओ द्वारा विकसित किया गया है और इसे इन जहाजों पर लगाया जाएगा। इसके अलावा इन जहाजों में वीएलएसआरएसएएम यानी वर्टिकल लॉन्च शॉर्ट रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम लगाने की भी योजना है। (Indian Navy NGMV Waterjet Deal)

स्पीड होगी 65 किलोमीटर प्रति घंटा

स्पीड की बात करें तो ये जहाज करीब 33 से 35 नॉट्स यानी लगभग 61 से 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकेंगे, जो समुद्री ऑपरेशन के लिहाज से काफी तेज मानी जाती है। इसी वजह से इन्हें “ब्रह्मोस स्ट्राइक फ्लीट” का हिस्सा भी माना जा रहा है, क्योंकि ये तेज गति के साथ लंबी दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम होंगे।

इन जहाजों का वजन करीब 1500 टन के आसपास हो सकता है और लंबाई लगभग 90 मीटर रहने का अनुमान है। एक जहाज में करीब 80 क्रू मेंबर्स तैनात रहेंगे। इसके अलावा ये जहाज एक बार में करीब 2800 नॉटिकल माइल तक की दूरी तय कर सकते हैं, जिससे ये लंबे समय तक समुद्र में ऑपरेशन कर सकते हैं। (Indian Navy NGMV Waterjet Deal)

GE एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन

इन जहाजों के लिए एलएम2500 गैस टरबाइन इंजन चुना गया है, जिसे जीई एयरोस्पेस बना रही है। इन इंजनों को भारत में एचएएल के जरिए असेंबल किया जाएगा। इस तरह इस प्रोजेक्ट में विदेशी और भारतीय दोनों तरह की कंपनियां शामिल हैं, जो अलग-अलग सिस्टम सप्लाई कर रही हैं।

एनजीएमवी जहाजों का इस्तेमाल पुराने और छोटे मिसाइल क्राफ्ट की जगह किया जाएगा। इसके अलावा कुछ कॉर्वेट्स को भी धीरे-धीरे रिप्लेस किया जाएगा। ये नए जहाज ज्यादा आधुनिक सिस्टम से लैस होंगे और समुद्र में तेज और सटीक ऑपरेशन के लिए तैयार किए जा रहे हैं।

कॉन्ग्सबर्ग मैरीटाइम ने कहा है कि वॉटरजेट सिस्टम की डिलीवरी उसी समय के अनुसार होगी, जिस समय जहाजों का निर्माण आगे बढ़ेगा। यानि जैसे-जैसे जहाज तैयार होते जाएंगे, वैसे-वैसे इन सिस्टम्स को इंस्टॉल किया जाएगा। (Indian Navy NGMV Waterjet Deal)

IDS चीफ एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित बोले- हथियार बनाना काफी नहीं, सिस्टम पर होना चाहिए पूरा कंट्रोल

Atmanirbharta in Defence Technology

Atmanirbharta in Defence Technology: भारतीय सेना और डिफेंस सिस्टम में अक्सर हथियार को लेकर आत्मनिर्भरता की बात की जाती है, लेकिन अब इस सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। ‘रण संवाद 2026’ कार्यक्रम में चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने साफ कहा कि आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ देश में हथियार बनाना नहीं है, बल्कि असली जरूरत तकनीक पर पूरा नियंत्रण हासिल करना है।

Atmanirbharta in Defence Technology: सिर्फ हथियार बनाना ही आत्मनिर्भरता नहीं

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि अगर कोई देश सिर्फ हथियार बना लेता है, लेकिन उसके सॉफ्टवेयर, डेटा और सिस्टम पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं है, तो वह पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं माना जा सकता।

उन्होंने समझाया कि आज के आधुनिक हथियार सिर्फ मशीन नहीं होते, बल्कि उनमें सॉफ्टवेयर, एन्क्रिप्शन और डेटा सिस्टम बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। अगर इन पर नियंत्रण नहीं होगा, तो किसी भी संकट के समय दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

टेक्नोलॉजी पर कंट्रोल क्यों जरूरी

उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र में “आर्किटेक्चर” यानी सिस्टम का पूरा स्ट्रक्चर, सॉफ्टवेयर, डेटा स्टैंडर्ड और अपग्रेड साइकिल बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

अगर इन चीजों का कंट्रोल अपने पास नहीं होगा, तो जरूरत पड़ने पर सिस्टम को बदलना या अपडेट करना भी मुश्किल हो सकता है। इसका सीधा असर ऑपरेशन पर पड़ता है।

थिएटराइजेशन पर भी सहमति

एयर मार्शल दीक्षित ने यह भी बताया कि भारतीय सेनाओं के “थिएटराइजेशन” यानी तीनों सेनाओं को एक साथ जोड़कर काम करने की योजना पर 90 प्रतिशत से ज्यादा सहमति बन चुकी है।

इसका मतलब है कि सेना, वायुसेना और नौसेना अलग-अलग काम करने के बजाय एक साझा सिस्टम के तहत ऑपरेशन करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

सिर्फ हथियारों की संख्या से नहीं मापी जाती ताकत

उन्होंने कहा कि किसी देश की सैन्य ताकत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसके पास कितने हथियार या प्लेटफॉर्म हैं। असल ताकत इस बात से तय होती है कि वह कितनी तेजी से अलग-अलग सोर्सेज से मिली जानकारी को जोड़कर एक साफ तस्वीर बना सकता है और उस आधार पर कितनी जल्दी फैसले ले सकता है।

एयर मार्शल दीक्षित ने बताया कि आज के युद्ध में डेटा और नेटवर्क सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। अगर सिस्टम साइबर अटैक या इलेक्ट्रॉनिक हमले के दौरान भी काम करता रहे, तो वही असली मजबूती मानी जाती है। साथ ही, अगर कोई सिस्टम खराब हो जाए, तो उसे कितनी जल्दी फिर से चालू किया जा सकता है, यह भी उतना ही जरूरी है।

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की असली समझ

उन्होंने कहा कि मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि तीनों सेनाएं एक साथ बैठकर चर्चा करें।
असल मायने में इसका मतलब है कि सभी सेनाएं मिलकर रियल टाइम में ऑपरेशन करें और एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाकर काम करें।

ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख

एयर मार्शल दीक्षित ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि इस ऑपरेशन ने साफ दिखा दिया कि अब युद्ध एक ही क्षेत्र से नहीं जीता जा सकता। जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और अन्य सभी क्षेत्रों में एक साथ काम करना जरूरी हो गया है। हर डोमेन एक-दूसरे को सपोर्ट करता है और तभी सही नतीजे मिलते हैं।

उन्होंने कहा कि युद्ध की मूल प्रकृति भले ही वही हो, लेकिन उसका तरीका बहुत तेजी से बदल रहा है। अब युद्ध चरणों में नहीं चलता, बल्कि एक साथ कई स्तरों पर होता है। एक छोटा सा कदम भी कुछ ही मिनटों में बड़े रणनीतिक असर डाल सकता है।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि इन सभी बदलावों को देखते हुए सेना को अपने प्रशिक्षण, उपकरण और ऑपरेशन के तरीके में बदलाव करना जरूरी है। अब लक्ष्य यह है कि सभी सिस्टम एक साथ मिलकर काम करें और किसी भी स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें।

ऑपरेशन सिंदूर ने बदली सेना की रणनीति, बनाई नई ‘साइकॉलॉजिकल डिफेंस यूनिट’

Psychological Defence Unit Indian Army
Chief of the Army Staff General Upendra Dwivedi speaks in Bengaluru as part of the Ran Samvad tri-services forum on multi-domain Operation

Psychological Defence Unit Indian Army: बेंगलुरु में आयोजित ‘रण संवाद 2026’ कार्यक्रम में आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि अब सेना भविष्य के युद्ध के लिए मल्टी-डोमेन ऑपरेशन यानी एमडीओ की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख अब भारतीय सेना की भविष्य की तैयारियों को बदल रही हैं। उन्होंने खास तौर पर इनफॉरमेशन वॉरफेयर का जिक्र करते हुए कहा कि आज का युद्ध सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि जानकारी और सोच के स्तर पर भी लड़ा जाता है।

Psychological Defence Unit Indian Army: ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख

आर्मी चीफ ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सिर्फ जमीन पर लड़ाई ही नहीं हुई, बल्कि जानकारी और अफवाहों से निपटना भी बड़ी चुनौती रही। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन में करीब 15 प्रतिशत प्रयास केवल इंफॉर्मेशन वॉरफेयर को संभालने में लगे। यानी यह समझना जरूरी हो गया है कि कौन-सी जानकारी सही है और कौन-सी गलत।

उन्होंने यह भी कहा कि आज सेना सिर्फ 12 लाख जवानों तक सीमित नहीं है, बल्कि अगर पूर्व सैनिक और उनके परिवारों को जोड़ लिया जाए, तो यह संख्या करीब 1.3 करोड़ तक पहुंचती है। उन्होंने बताया उनके परिवार भी इस सूचना के दायरे का हिस्सा बन जाते हैं। यानी युद्ध अब सिर्फ बॉर्डर पर नहीं, बल्कि जानकारी के स्तर पर भी लड़ा जा रहा है। (Psychological Defence Unit Indian Army)

बनाई नई साइकॉलॉजिकल डिफेंस डिवीजन

सेना प्रमुख ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर से एक बड़ी बात यह सामने आई कि कोई एक क्षेत्र यानी डोमेन युद्ध का फैसला नहीं करता। जमीन से मिली जानकारी, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक इनपुट, एयरफोर्स की सटीक कार्रवाई और नेवी की रणनीतिक तैनाती, इन सबने मिलकर काम किया। हर हिस्से ने दूसरे को सपोर्ट किया और इसी तालमेल से सही नतीजे मिले।

उन्होंने बताया कि इसी अनुभव के आधार पर सेना ने एक नई यूनिट बनाई है, जिसे साइकॉलॉजिकल डिफेंस डिवीजन कहा जाता है। इसका काम गलत जानकारी का मुकाबला करना और सही जानकारी को समय पर लोगों तक पहुंचाना है।

आर्मी चीफ ने बताया कि आज के समय में जानकारी का असर सीधे युद्ध के नतीजों पर पड़ता है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। (Psychological Defence Unit Indian Army)

कई परतों में लड़े जा रहे हैं युद्ध

सेना प्रमुख का कहना है कि आज की दुनिया एक तरह से लगातार संघर्ष की स्थिति में है। यह कोई एक घोषित युद्ध नहीं है, बल्कि अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीकों से टकराव चल रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि अलग-अलग डोमेन आपस में जुड़े हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें सही तरीके से मिलाकर कैसे इस्तेमाल किया जाए।

आर्मी चीफ ने समझाया कि अब युद्ध को सिर्फ नक्शे पर एक लाइन की तरह नहीं देखा जा सकता। आज का युद्ध कई लेयर्स में चलता है। जमीन पर सैनिक लड़ रहे होते हैं, उसी समय साइबर अटैक चल रहे होते हैं, स्पेस से जानकारी मिल रही होती है और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम दुश्मन के कम्युनिकेशन को प्रभावित कर रहे होते हैं। ऐसे में अगर कोई कमांडर सिर्फ अपने इलाके को देखेगा, तो वह पूरी लड़ाई नहीं समझ पाएगा। अब जरूरी है कि वह हर डोमेन को एक साथ समझे।

एमडीओ की तरफ बढ़ रही सेना

आर्मी चीफ ने कहा कि सेना धीरे-धीरे मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके लिए एक तय प्रक्रिया के तहत बदलाव किए जा रहे हैं। तीनों सेनाओं के लिए एक साझा सिद्धांत बनाया गया है, ताकि सब एक ही तरीके से काम कर सकें। 2024 से लगातार ऐसे अभ्यास भी किए जा रहे हैं, जिनमें अलग-अलग मंत्रालय और एजेंसियां भी शामिल हो रही हैं।

उन्होंने कहा कि सेना के स्ट्रक्चर में भी बदलाव किया गया है। इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप बनाए गए हैं, नई ब्रिगेड और बटालियन जोड़ी गई हैं, ड्रोन यूनिट्स तैयार की गई हैं और साइबर व इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की क्षमताएं बढ़ाई गई हैं। इसके साथ ही इनफॉरमेशन वॉरफेयर के लिए नई आर्गनाइजेशन बनाई गई हैं।

उन्होंने कहा कि अब सेना काफी हद तक मल्टी-डोमेन के लिए तैयार हो चुकी है। इसी दिशा में 2024 और 2025 को टेक्नोलॉजी अपनाने का साल रखा गया था, जबकि 2026 और 2027 को नेटवर्किंग और डेटा पर फोकस करने के लिए तय किया गया है। (Psychological Defence Unit Indian Army)

टेक्नोलॉजी की भूमिका पर जोर

आर्मी चीफ ने खास तौर पर टेक्नोलॉजी की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अब डेटा, नेटवर्क और जानकारी को जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि सही समय पर सही फैसला लिया जा सके। लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि टेक्नोलॉजी सिर्फ एक साधन है, अंतिम निर्णय इंसान ही लेगा।

उन्होंने कहा कि अब कमांडरों की भूमिका भी बदल रही है। उन्हें सिर्फ युद्ध लड़ना ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी को समझकर उसका सही इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। इसी सोच के तहत सेना ने पिछले सालों को टेक्नोलॉजी अपनाने के लिए और आने वाले सालों को नेटवर्क और डेटा पर फोकस करने के लिए तय किया है। (Psychological Defence Unit Indian Army)

रक्षा मंत्री की IGoM बैठक में बड़ा एलान: 5 किलो वाले LPG सिलेंडर की सप्लाई दोगुनी, मजदूरों को राहत

5kg LPG Cylinder Supply
The Informal Group of Ministers (IGoM), headed by Raksha Mantri Rajnath Singh

5kg LPG Cylinder Supply: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने देश की तैयारियों का जायजा लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई इंटरनल ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (IGoM) की अहम बैठक में देश की एनर्जी, खाद्य और जरूरी सामानों की सप्लाई को लेकर विस्तृत समीक्षा की गई।

बैठक में रक्षा मंत्री ने सभी विभागों को साफ निर्देश दिया कि किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तैयारी रखी जाए और आपसी समन्वय मजबूत बनाया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार का फोकस तैयारी, कोऑर्डिनेशन और रेजिलिएंस यानी मजबूती पर है, ताकि किसी भी तरह की चुनौती का असर देश पर कम से कम पड़े।

उन्होंने यह भी बताया कि देश में एलपीजी, पेट्रोल, डीजल और खाद जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई लगातार बनी हुई है। आम लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए सप्लाई चेन पर लगातार नजर रखी जा रही है।

5kg LPG Cylinder Supply: एनर्जी सप्लाई पर खास नजर

बैठक में एनर्जी सेक्टर को लेकर आईजीओएम को बताया गया कि पिछले 40 दिनों में भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से सबसे ज्यादा जहाजों को सुरक्षित निकालने में सफलता हासिल की है। इस दौरान 8 एलपीजी जहाज, जिनमें करीब 340 हजार मीट्रिक टन गैस थी, सुरक्षित रूप से भारत पहुंचे। यह मात्रा देश की लगभग 11 दिनों की जरूरत के बराबर मानी जा रही है।

यह भी बताया कि देश में कहीं भी एलपीजी की कमी की खबर नहीं है और घरेलू गैस सिलेंडर की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है। इसके साथ ही कमजोर वर्गों और मजदूरों के लिए 5 किलो वाले फ्री ट्रेड एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई बढ़ा दी गई है, ताकि उन्हें राहत मिल सके।

इंडस्ट्री के लिए ईंधन की व्यवस्था

सरकार ने इंडस्ट्री को ध्यान में रखते हुए भी एक अहम फैसला लिया है। अब नॉन-डोमेस्टिक यानी औद्योगिक उपयोग के लिए एलपीजी की सप्लाई बढ़ाई गई है। करीब 70 प्रतिशत ईंधन की मांग इंडस्ट्री को देने का फैसला लिया गया है, ताकि फार्मा, फूड, स्टील, कृषि और पैकेजिंग जैसे जरूरी सेक्टर प्रभावित न हों।

इस कदम का मकसद यह है कि जरूरी सामानों की सप्लाई चेन में कोई रुकावट न आए और उत्पादन लगातार चलता रहे।

पीएनजी को बढ़ावा

बैठक में पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी के इस्तेमाल को भी बढ़ावा देने की बात सामने आई। सरकार के अभियान के तहत करीब 3.16 लाख नए पीएनजी कनेक्शन जोड़े गए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले तीन गुना ज्यादा हैं। इसके साथ ही 16 हजार से ज्यादा लोगों ने एलपीजी कनेक्शन सरेंडर किया है।

खाद्य सुरक्षा पर पूरी तैयारी

खाद्य सुरक्षा को लेकर भी सरकार ने भरोसा जताया है। बैठक में बताया गया कि देश में चावल और गेहूं का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जिससे पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के तहत जरूरतमंद लोगों को अनाज मिलता रहेगा।

सरकार जरूरत पड़ने पर ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत बाजार में अतिरिक्त अनाज भी जारी कर सकती है, ताकि कीमतें नियंत्रित रहें और महंगाई न बढ़े। इसके लिए एफसीआई के पास पर्याप्त भंडार उपलब्ध है।

रबी सीजन और खरीद व्यवस्था

रबी मार्केटिंग सीजन 2026-27 के तहत गेहूं की खरीद प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। राज्य सरकारों के साथ मिलकर इसकी तैयारी की जा रही है। पैकेजिंग सामग्री की उपलब्धता पर भी ध्यान दिया जा रहा है, ताकि खरीद और भंडारण में कोई दिक्कत न आए।

खाने के तेल और चीनी का पर्याप्त स्टॉक

बैठक में खाने के तेल की सप्लाई को लेकर भी जानकारी दी गई। बताया गया कि इंडोनेशिया, मलेशिया, अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे देशों से आयात सामान्य रूप से जारी है। इसके अलावा सरसों के उत्पादन में बढ़ोतरी से घरेलू सप्लाई भी मजबूत हुई है।

चीनी के मामले में भी देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। साल 2025-26 में उत्पादन पर्याप्त रहने की उम्मीद है। अब तक 15.80 लाख मीट्रिक टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई है, जिसमें से करीब 3.73 लाख मीट्रिक टन निर्यात हो चुका है।

कीमतों पर नजर

सरकार रोजाना 40 जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतों पर नजर रख रही है। देशभर के 578 केंद्रों से डेटा लिया जा रहा है, ताकि किसी भी तरह की असामान्य बढ़ोतरी को तुरंत पकड़ा जा सके।

अब तक ज्यादातर चीजों की कीमतें स्थिर बताई गई हैं, हालांकि खाने के तेल में थोड़ी बढ़ोतरी जरूर देखी गई है। प्याज की कीमत को नियंत्रित रखने के लिए जल्द ही बफर स्टॉक के लिए खरीद शुरू की जाएगी।

सप्लाई चेन बनाए रखने की कोशिश

सरकार का पूरा फोकस इस बात पर रहा कि जरूरी चीजों की सप्लाई बिना रुकावट जारी रहे। इसके लिए अलग-अलग मंत्रालय मिलकर काम कर रहे हैं। एनर्जी, खाद्य, कृषि और उद्योग से जुड़े फैसले इसी दिशा में लिए गए हैं, ताकि देश के अंदर किसी भी तरह की कमी या असंतुलन की स्थिति न बने।

इस बैठक में कई वरिष्ठ मंत्री शामिल हुए और हर सेक्टर की स्थिति की समीक्षा की गई। इसमें वित्त, विदेश, कृषि, पेट्रोलियम, खाद्य और अन्य मंत्रालयों के प्रतिनिधि मौजूद रहे, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र की जानकारी साझा की।