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भारतीय सेना के पास क्यों हो अपनी ऑर्गेनिक एयर पावर? कारगिल और सियाचिन से मिले अनुभव हैं बड़ी वजह

Indian Army Organic Air Power
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Indian Army Organic Air Power: भारतीय सेना को अपने लिए अलग एयर पावर यानी हेलिकॉप्टर और अन्य हवाई संसाधन मिलने चाहिए या नहीं, इस मुद्दे पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में एक थिंक टैंक के विश्लेषण में कहा गया कि देश की तीनों सेनाओं के हवाई संसाधनों को एक जगह लाकर बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर कई सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सेना को अपनी जरूरतों के मुताबिक खुद के एयर एसेट्स रखना जरूरी है, क्योंकि जमीनी युद्ध के दौरान तत्काल हवाई मदद कई बार निर्णायक साबित होती है।

हालांकि मामला केवल संसाधनों के बंटवारे का नहीं है, बल्कि युद्ध के मैदान में सैनिकों तक समय पर मदद पहुंचाने और ऑपरेशन की सफलता से भी जुड़ा है। कारगिल युद्ध, सियाचिन और 1971 के युद्ध जैसे उदाहरणों को देखते हुए सेना के लिए ऑर्गेनिक एयर पावर की आवश्यकता पर फिर चर्चा हो रही है।

Indian Army Organic Air Power: आखिर क्या है ऑर्गेनिक एयर पावर?

ऑर्गेनिक एयर पावर का मतलब है कि किसी सेना के पास अपने नियंत्रण में ऐसे हवाई संसाधन हों जिन्हें वह सीधे अपने ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल कर सके। इसमें मुख्य रूप से हेलिकॉप्टर, टोही विमान और अन्य सपोर्ट प्लेटफॉर्म शामिल होते हैं।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि जमीनी लड़ाई के दौरान कई बार मिनटों में फैसला लेना पड़ता है। ऐसे समय में अगर हवाई सहायता के लिए किसी दूसरी सेवा पर निर्भर रहना पड़े तो प्रतिक्रिया में देरी हो सकती है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों की सेनाओं के पास अपनी अलग एविएशन यूनिट मौजूद हैं।

1971 के युद्ध से मिले सबक

भारतीय सैन्य इतिहास में 1971 का युद्ध एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस दौरान पूर्वी मोर्चे पर तेजी से बढ़ती सेना को रसद, सैनिकों की आवाजाही और अन्य मदद की जरूरत थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई इलाकों में सेना के एविएशन संसाधनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जमीनी कमांडरों को सीधे उपलब्ध हवाई सहायता ने ऑपरेशन को रफ्तार देने में मदद की। इसी अनुभव ने बाद के सालों में आर्मी एविएशन को और मजबूत करने की सोच को बढ़ावा दिया। (Indian Army Organic Air Power)

सियाचिन में हेलिकॉप्टर हैं लाइफलाइन 

1984 में सियाचिन में शुरू हुए ऑपरेशन मेघदूत ने दिखाया कि ऊंचे और कठिन इलाकों में हेलिकॉप्टर कितने जरूरी होते हैं।

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है। यहां सैनिकों तक राशन, हथियार, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने का सबसे बड़ा साधन हेलिकॉप्टर ही हैं।

ऐसे हालात में केवल उड़ान भरना ही चुनौती नहीं होता, बल्कि बेहद कम तापमान और ऑक्सीजन की कमी में सुरक्षित संचालन भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। सेना का तर्क है कि ऐसे मिशनों के लिए उन्हीं पायलटों की जरूरत होती है जो सेना की कार्यप्रणाली और जमीनी जरूरतों को अच्छी तरह समझते हों।

कारगिल युद्ध में दिखी सेना एविएशन की ताकत

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं आर्मी एविएशन कोर के चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों ने भी बेहद अहम जिम्मेदारी निभाई।

कारगिल की ऊंची चोटियों तक रसद पहुंचाने, घायल सैनिकों को निकालने और अग्रिम चौकियों तक सहायता पहुंचाने का काम इन हेलिकॉप्टरों ने किया।

रक्षा मामलों से जुड़ी पुस्तक द इंडियन डिफेंस बजट के अनुसार कारगिल अभियान के दौरान सेना एविएशन कोर ने लगभग 2,500 मिशन पूरे किए और 2,700 घंटे से अधिक उड़ान भरी। इस दौरान करीब 900 घायलों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।

यह सब इसलिए संभव हो सका क्योंकि हेलिकॉप्टर सीधे सेना कमांड के नियंत्रण में थे और जरूरत के अनुसार तुरंत तैनात किए जा सकते थे। (Indian Army Organic Air Power)

क्या कहता है दुनिया की बड़ी सेनाओं का मॉडल?

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सभी हवाई संसाधन एक ही एयर फोर्स के पास होने चाहिए। लेकिन कई देशों की व्यवस्था इससे अलग है।

अमेरिका की सेना के पास खुद का विशाल एविएशन बेड़ा है। अमेरिकी सेना एविएशन के पास हजारों रोटरी विंग एयरक्राफ्ट यानी हेलिकॉप्टर हैं। संख्या के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य हवाई क्षमताओं में से एक है।

ब्रिटेन की सेना के पास भी अपने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर हैं, जिन्हें आर्मी एविएशन कोर ऑपरेट करता है। इनका इस्तेमाल सीधे जमीनी अभियानों के सपोर्ट में किया जाता है।

इन उदाहरणों को देखते हुए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीनी युद्ध की जरूरतें अलग होती हैं और उनके लिए समर्पित हवाई संसाधन जरूरी हैं।

ब्रह्मोस मिसाइल का उदाहरण भी चर्चा में

विश्लेषण में एक और दिलचस्प मुद्दा उठाया गया है। भारतीय सेना ने 2007 में ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट को शामिल किया था। बाद में भारतीय वायुसेना ने भी ब्रह्मोस मिसाइल को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया।

कुछ विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि अगर अलग-अलग सेवाओं द्वारा समान क्षमता वाले सिस्टम अपनाने को संसाधनों की पुनरावृत्ति माना जाए, तो फिर यह तर्क केवल आर्मी एविएशन पर ही क्यों लागू किया जाए।

उनका कहना है कि कई बार अलग-अलग सर्विसेज की जरूरतें अलग होती हैं और उसी के आधार पर संसाधनों का चयन किया जाता है। (Indian Army Organic Air Power)

वायुसेना के सामने भी बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम

इस बहस के बीच भारतीय वायुसेना भी कई बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रमों पर काम कर रही है।

36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए लगभग 59 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बाद तेजस एमके-1ए के 83 विमानों का अनुबंध करीब 48 हजार करोड़ रुपये का रहा। फिर अतिरिक्त 97 तेजस एमके-1ए विमानों के लिए भी बड़ा समझौता किया गया।

इसके अलावा तेजस एमके-2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) जैसे कार्यक्रम भी चल रहे हैं। हाल ही में एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम के लिए आरएफपी जारी की गई है, और फुल-स्केल इंजीनियरिंग डेवलपमेंट (FSDE) कार्यक्रम के लिए 15,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।

इन सभी परियोजनाओं के लिए अलग प्रशिक्षण, रखरखाव और सपोर्ट सिस्टम की जरूरत होती है।

विश्लेषकों का कहना है कि संसाधनों के बेहतर उपयोग पर चर्चा करते समय सभी सेवाओं के कार्यक्रमों को समान नजरिए से देखना चाहिए। (Indian Army Organic Air Power)

सेना की जरूरत का सवाल

भारतीय सेना का कहना है कि उसकी मांग किसी संस्थागत प्रतिस्पर्धा या अधिकार क्षेत्र बढ़ाने से जुड़ी नहीं है। सेना का मुख्य तर्क यह है कि जमीनी अभियानों के दौरान उसे तत्काल और हवाई सहायता की जरूरत होती है।

पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों और आतंकवाद विरोधी अभियानों में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जहां मिनटों में लिए गए फैसले मिशन की सफलता तय करते हैं। ऐसे में सीधे सेना के नियंत्रण में मौजूद हेलिकॉप्टर और हवाई संसाधन अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। (Indian Army Organic Air Power)

The debate over organic air power for the Indian Army has gained renewed attention, driven by lessons from the Kargil War, Siachen operations, and modern battlefield requirements. Army Aviation helicopters played a critical role in casualty evacuation, logistics, and frontline support during Kargil, completing thousands of missions in extreme conditions. Military experts argue that dedicated air assets under Army control ensure faster response and better coordination during combat. As warfare evolves, the demand for organic air power is increasingly being viewed as an operational necessity rather than a duplication of resources.

कैलाश खेर का नया देशभक्ति गीत ‘भारतीय सेना’ वायरल, पहली बार सुनाई दी अमित शाह और राजनाथ सिंह की आवाज

Kailash Kher Bharatiya Sena Song

Kailash Kher Bharatiya Sena Song: मशहूर गायक और पद्मश्री सम्मानित कलाकार कैलाश खेर ने देश की रक्षा और सुरक्षा में जुटे सैनिकों को समर्पित एक विशेष गीत ‘भारतीय सेना’ जारी किया है। इस गाने को कैलाश खेर ने ही लिखा और संगीतबद्ध किया और अपनी आवाज दी है। खास बात यह है कि इस गीत में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह की आवाज भी सुनाई देती है। बताया जा रहा है कि पहली बार दोनों वरिष्ठ नेताओं ने किसी गाने के लिए वॉयसओवर दिया है।

यह गीत भारतीय एयरोस्पेस और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी सैमटेल एवियोनिक्स तथा कैलाशा एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से तैयार किया गया है। हाल ही में अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे करने वाली सैमटेल एवियोनिक्स ने इस परियोजना के जरिए देश के सैनिकों को सम्मान देने की कोशिश की है।

Kailash Kher Bharatiya Sena Song: सैनिकों के साहस को समर्पित है गीत

भारतीय सेना’ गीत में देश की थल सेना, वायु सेना और नौसेना के जवानों के साहस, समर्पण और देशभक्ति को दर्शाया गया है। गीत के बोल और संगीत इस तरह तैयार किए गए हैं कि वे सैनिकों के संघर्ष, त्याग और कर्तव्य भावना को सामने लाते हैं।

गीत में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक हर परिस्थिति में राष्ट्र की सुरक्षा के लिए तैयार रहते हैं। इसी भावना को संगीत और शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।

इस गीत की सबसे बड़ी खासियत रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह की भागीदारी है। दोनों नेताओं ने गीत में अपने संदेश और वॉयसओवर के जरिए सैनिकों के प्रति देश के सम्मान और आभार को व्यक्त किया है।

किसी संगीत रचना में दोनों शीर्ष नेताओं की एक साथ आवाज सुनाई देना एक अनोखी पहल है। इससे गीत का महत्व और भी बढ़ गया है।

सैमटेल एवियोनिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक पुनीत कौरा ने कहा कि कंपनी का उद्देश्य केवल तकनीक विकसित करना नहीं है, बल्कि उन वीर पुरुषों और महिलाओं का सम्मान करना भी है जो देश की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं।

उन्होंने कहा कि ‘भारतीय सेना’ गीत सैनिकों के साहस, बलिदान और अटूट समर्पण को समर्पित एक भावनात्मक श्रद्धांजलि है। उनके अनुसार यह पहल देश की सुरक्षा में योगदान देने वाले हर सैनिक के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम है।

कैलाश खेर ने बताया दिल से निकला गीत

गीत के बारे में बात करते हुए कैलाश खेर ने कहा कि ‘भारतीय सेना’ केवल एक गीत नहीं बल्कि उनके दिल से निकली भावनाओं का प्रकटीकरण है। उन्होंने बताया कि इस रचना को तैयार करते समय वे भारतीय सशस्त्र बलों के साहस, धैर्य और अदम्य जज्बे से गहराई से प्रभावित थे।

कैलाश खेर ने कहा कि यह गीत उन सभी सैनिकों को उनका विनम्र प्रणाम है जो देश की आजादी और सुरक्षा की रक्षा करते हैं। उन्होंने इसे हर भारतीय के लिए गर्व और सम्मान का प्रतीक बताया।

कैलाशा एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले तैयार किया गया यह गीत कई अनुभवी संगीतकारों और कलाकारों की टीम के सहयोग से बनाया गया है। ‘भारतीय सेना’ को प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जारी किया गया है। यह गीत कैलाश खेर के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर भी उपलब्ध है।

सैमटेल एवियोनिक्स का कहना है कि यह पहल कंपनी की उस सोच को दर्शाती है, जिसमें रक्षा तकनीक के साथ-साथ राष्ट्रीय सेवा की भावना को भी समान महत्व दिया जाता है। गीत के माध्यम से भारतीय सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

मिशन राफेल 2.0 शुरू! फ्रांस पहुंचे वायुसेना प्रमुख, 114 जेट्स के सौदे को मिलेगी रफ्तार

IAF Chief France Visit

IAF Chief France Visit: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह तीन दिन की फ्रांस यात्रा पर हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है। इस प्रस्तावित सौदे को भारतीय वायुसेना के इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाकू विमान खरीद योजनाओं में गिना जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत ने 114 राफेल विमानों की खरीद के लिए फ्रांस को आधिकारिक तौर पर लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (एलओआर) भेज दिया है। यह दस्तावेज पिछले सप्ताह रक्षा मंत्रालय के एक्विजिशन विंग द्वारा फ्रांसीसी सरकार को सौंपा गया। अब फ्रांस अगले दो से तीन महीनों में कीमत, उपलब्धता, उत्पादन व्यवस्था और लॉजिस्टिक सपोर्ट से जुड़ा अपना जवाब भेजेगा। इसके बाद दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू होगी। अधिकारियों का मानना है कि अगले एक वर्ष के भीतर इस सौदे को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

IAF Chief France Visit: फ्रांस यात्रा में क्या है खास

एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह की यात्रा केवल एक औपचारिक दौरा नहीं है। इस दौरान उनकी मुलाकात फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी दसॉ एविएशन और मिसाइल निर्माता कंपनी एमबीडीए के वरिष्ठ अधिकारियों से होने की संभावना है।

दसॉ एविएशन वही कंपनी है जो राफेल लड़ाकू विमान बनाती है। वहीं एमबीडीए मीटिओर और स्कैल्प जैसी एडवांस मिसाइलें बनाती है। माना जा रहा है कि बातचीत का फोकस राफेल सौदे के अलावा भारतीय हथियारों के इंटीग्रेशन, तकनीकी सहयोग और भारत में उत्पादन व्यवस्था पर भी रहेगा।

पीएम मोदी जा सकते हैं फ्रांस

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जून के मध्य में फ्रांस की यात्रा कर सकते हैं। इस दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति और शीर्ष नेतृत्व के साथ होने वाली बैठकों में राफेल सौदा भी प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकता है। चूंकि यह सौदा सरकार-से-सरकार (G2G) मॉडल के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है, इसलिए दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत क्यों खरीदना चाहता है 114 नए राफेल

भारतीय वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू स्क्वाड्रन की कमी का सामना कर रही है। वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है, लेकिन वर्तमान में यह संख्या 29 है। पुराने मिग-21 और अन्य विमानों की चरणबद्ध विदाई के बाद यह चुनौती और बढ़ गई है।

इसी कमी को दूर करने के लिए मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट कार्यक्रम के तहत 114 नए लड़ाकू विमानों की योजना तैयार की गई है। राफेल इस दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से ही 36 विमानों को ऑपरेट कर रही है।

राफेल के आने से वायुसेना को नए स्क्वाड्रन खड़े करने में मदद मिलेगी और कई मोर्चों पर उसकी ऑपरेशनल क्षमता मजबूत होगी।

पहले भी भारत खरीद चुका है राफेल

भारत और फ्रांस के बीच राफेल को लेकर रक्षा सहयोग नया नहीं है। वर्ष 2016 में दोनों देशों के बीच 36 राफेल विमानों की खरीद का समझौता हुआ था। इन विमानों की सप्लाई पूरी हो चुकी है और वे अंबाला तथा हाशिमारा एयरबेस पर तैनात हैं।

पिछले कुछ सालों में राफेल ने भारतीय वायुसेना की क्षमता में बड़ा योगदान दिया है। यही कारण है कि अब बड़ी संख्या में अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद पर विचार किया जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पहले से मौजूद बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित पायलटों और तकनीकी स्टाफ के कारण राफेल के नए बेड़े को शामिल करना अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

भारत में बनेंगे लगभग 90 विमान

इस प्रस्तावित सौदे की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार राफेल लड़ाकू विमान का उत्पादन फ्रांस के बाहर किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार 114 विमानों में से 94 राफेल भारत में बनाए जाएंगे। इसके लिए फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन किसी भारतीय साझेदार के साथ मिलकर उत्पादन लाइन स्थापित करेगी। शेष 20 विमान फ्रांस से सीधे भारतीय वायुसेना को मिलेंगे।

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार इस कार्यक्रम में लगभग 50 प्रतिशत स्थानीयकरण (लोकलाइजेशन) का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत भारतीय हथियारों, भारतीय डेटा लिंक और कई स्वदेशी प्रणालियों को भी विमान में एकीकृत करने की अनुमति होगी। यही वजह है कि इस परियोजना को “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के सबसे बड़े रक्षा कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है।

राफेल कार्यक्रम को मेक इन इंडिया अभियान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यदि बड़ी संख्या में विमान भारत में बनते हैं तो इससे रक्षा उत्पादन क्षेत्र को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा।

विमानों के निर्माण में शामिल होने वाली भारतीय कंपनियों को अत्याधुनिक तकनीक के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। इससे देश में रक्षा उत्पादन से जुड़ी सप्लाई चेन भी मजबूत होगी।

पहली बार फ्रांस के बाहर बनेगा राफेल

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि राफेल का निर्माण पहली बार फ्रांस के बाहर भारत में होगा। साथ ही भारतीय हथियारों और भारतीय प्रणालियों के एकीकरण पर भी भारत को पर्याप्त अधिकार मिलेंगे। भारतीय नौसेना के लिए राफेल-एम विमानों की डिलीवरी 2028 से शुरू होने की उम्मीद है, जबकि वायुसेना के लिए नए राफेल विमानों की आपूर्ति उसके बाद शुरू हो सकती है।

176 तक पहुंच जाएगी भारतीय राफेल बेड़े की संख्या

भारतीय वायुसेना पहले ही 36 राफेल लड़ाकू विमान शामिल कर चुकी है। इसके अलावा भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-एम विमानों का सौदा भी हो चुका है। इस तरह 62 राफेल विमानों का ऑर्डर पहले से दिया जा चुका है।

यदि 114 नए राफेल विमानों का यह सौदा पूरा होता है तो भारत के पास कुल राफेल विमानों की संख्या 176 हो जाएगी। नौसेना ने भविष्य में अतिरिक्त राफेल-एम विमानों की जरूरत भी जताई है, जिससे यह संख्या और बढ़ सकती है।

राफेल क्यों माना जाता है खास

राफेल को दुनिया के सबसे आधुनिक बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। यह एक ऐसा विमान है जो हवाई युद्ध, जमीनी हमले, समुद्री मिशन और लंबी दूरी की स्ट्राइक जैसे कई कार्य एक साथ कर सकता है।

इस विमान में आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और उन्नत सेंसर लगे होते हैं। इसके साथ मीटिओर, माइका और स्कैल्प जैसी आधुनिक मिसाइलों का उपयोग किया जा सकता है।

भारतीय वायुसेना के पास मौजूद राफेल विमानों में भारत की जरूरतों के अनुसार कई विशेष सुधार भी किए गए हैं।

एलओआर से लेकर अनुबंध तक क्या होगी प्रक्रिया

रक्षा खरीद प्रक्रिया में लेटर ऑफ रिक्वेस्ट एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इसके जरिए भारत आधिकारिक रूप से फ्रांस को अपनी आवश्यकता और शर्तों की जानकारी देगा।

फ्रांस की ओर से जवाब मिलने के बाद कीमत, उपलब्धता, उत्पादन व्यवस्था और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दों पर बातचीत शुरू होगी।

इसके बाद औपचारिक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। दोनों पक्षों के बीच कई दौर की वार्ता होगी। अंत में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की मंजूरी मिलने के बाद अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।

भारतीय सेना खरीदेगी पोर्टेबल काउंटर ड्रोन सिस्टम, 1.5 किमी दूर से GPS, Beidou और GLONASS सिग्नल करेगा जाम

Indian Army Counter UAS System
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Indian Army Counter UAS System: आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी युद्ध के मैदान में टैंक, तोप और लड़ाकू विमान सबसे बड़े हथियार माने जाते थे, लेकिन अब छोटे आकार के ड्रोन भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक, ड्रोन ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। भारत की सीमाओं पर भी ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। पाकिस्तान की ओर से हथियार और नशीले पदार्थ गिराने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कई बार सामने आ चुका है, जबकि उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन निगरानी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना ने एक नए काउंटर-यूएएस सिस्टम की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। सेना ऐसा पोर्टेबल सिस्टम चाहती है जो दुश्मन के ड्रोन को बिना गोली चलाए बेअसर कर सके। इसमें आधुनिक जेमिंग तकनीक वाले उपकरण की मांग की गई है।

Indian Army Counter UAS System: क्यों बढ़ी काउंटर ड्रोन सिस्टम की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पहले जहां ड्रोन केवल सेनाओं के पास होते थे, वहीं अब छोटे संगठन और आतंकवादी समूह भी उनका इस्तेमाल करने लगे हैं। कुछ किलो वजन वाले ड्रोन कैमरे के जरिए निगरानी कर सकते हैं, हथियार गिरा सकते हैं और यहां तक कि आत्मघाती हमलों के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार सीमा पार से आने वाले ड्रोन पकड़े हैं। कई मामलों में इन ड्रोन के जरिए हथियार, गोला-बारूद और नशीले पदार्थ भारतीय सीमा में गिराए गए। ऐसे में केवल ड्रोन खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें रोकने वाली तकनीक भी उतनी ही जरूरी हो गई है।

इसी वजह से सेना अब ऐसे सिस्टम पर जोर दे रही है, जो दुश्मन के ड्रोन को उसके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही बेकार कर दे। (Indian Army Counter UAS System)

क्या होता है काउंटर-यूएएस सिस्टम

काउंटर-यूएएस का मतलब है काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम। यह एंटी ड्रोन सिस्टम है। इसका काम दुश्मन के ड्रोन को पहचानना, उसके कंट्रोल को जाम करना और उसे मिशन पूरा करने से रोकना होता है।

भारतीय सेना जिस सिस्टम की खरीद कर रही है, वह मुख्य रूप से जेमिंग तकनीक पर आधारित है। यह ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच मौजूद कम्यूनिकेशन को जाम कर देता है। इसके अलावा यह उन सैटेलाइट सिग्नलों को भी रोकता करता है जिनकी मदद से ड्रोन को डायरेक्शन मिलता है।

जब ड्रोन को सही सिग्नल नहीं मिलते तो वह या तो अपनी जगह पर रुक जाता है, वापस लौटने की कोशिश करता है या फिर टारगेट से भटक जाता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आधुनिक युद्ध में बेहद प्रभावी माने जाते हैं। (Indian Army Counter UAS System)

एक साथ कई सैटेलाइट सिस्टम को करेगा जाम

सेना ऐसा सिस्टम चाहती है, जो एक साथ कई ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को जाम कर सके। इसमें जीपीएस, गैलीलियो, ग्लोनास और बीडू जैसे प्रमुख सैटेलाइट नेटवर्क शामिल हैं।

आज अधिकांश ड्रोन इन्हीं नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि ये सिग्नल जाम हो जाएं तो ड्रोन की दिशा और कंट्रोल प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि जेमिंग तकनीक को एंटी-ड्रोन डिफेंस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

360 डिग्री सुरक्षा देगा सिस्टम

सेना की मांग के अनुसार यह सिस्टम ओम्नी-डायरेक्शनल होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह केवल एक दिशा में नहीं बल्कि चारों डायरेक्शन में काम करेगा।

तकनीकी शर्तों के अनुसार सिस्टम को 360 डिग्री तक जेमिंग कवरेज देना होगा। यानी सैनिक को यह अनुमान लगाने की जरूरत नहीं होगी कि ड्रोन किस दिशा से आ रहा है। यदि कोई ड्रोन उसके आसपास के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो सिस्टम उसे प्रभावित कर सकेगा।

युद्ध क्षेत्र में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि ड्रोन किसी भी दिशा से अचानक दिखाई दे सकते हैं।

डेढ़ किलोमीटर तक असरदार

सेना ने इस सिस्टम के लिए न्यूनतम 1.5 किलोमीटर की जेमिंग रेंज तय की है। इसका मतलब है कि सैनिक अपने स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर तक उड़ रहे ड्रोन को भी प्रभावित कर सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम चौकियों, संवेदनशील ठिकानों और अस्थायी सैन्य शिविरों की सुरक्षा के लिए यह दूरी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे सैनिकों को ड्रोन खतरे का पहले से जवाब देने का अवसर मिलेगा।

वजन तीन किलो से कम

किसी भी सैन्य उपकरण के लिए उसका वजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषकर पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिक अतिरिक्त भार नहीं उठा सकते।

इसी को ध्यान में रखते हुए सेना ने शर्त रखी है कि पूरा सिस्टम तीन किलो से कम वजन का होना चाहिए। इसका मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ आसानी से लेकर चल सकेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल कर सकेगा।

हल्का होने के बावजूद सिस्टम को मजबूत और भरोसेमंद भी होना होगा ताकि मुश्किल हालात में भी उसका परफॉरमेंस प्रभावित न हो। (Indian Army Counter UAS System)

हर मौसम में काम करने की क्षमता

भारतीय सेना रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और बर्फीले इलाकों सहित विभिन्न परिस्थितियों में तैनात रहती है। इसलिए किसी भी उपकरण को हर तरह के मौसम में काम करने योग्य होना जरूरी है।

दस्तावेज के अनुसार यह सिस्टम माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह हिमालयी क्षेत्रों की ठंड और पश्चिमी भारत की गर्मी दोनों में उपयोग किया जा सकेगा।

इसके अलावा इसे आईपी-67 सुरक्षा मानक के अनुरूप भी होना होगा। ताकि यह धूल और पानी से भी सुरक्षित रहे।

आठ घंटे लगातार ऑपरेशनल

सैन्य अभियानों में लगातार ऑपरेशन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए सेना ने मांग की है कि यह सिस्टम बैटरी के सहारे कम से कम आठ घंटे तक लगातार काम कर सके।

इससे सैनिकों को बार-बार बैटरी बदलने या चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। लंबी गश्त, सीमा सुरक्षा और महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियों के दौरान यह विशेष रूप से उपयोगी होगा।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सिस्टम के सभी मोड चौबीसों घंटे संचालन के लिए सक्षम होने चाहिए।

वहीं, सेना केवल काउंटर ड्रोन सिस्टम ही नहीं खरीद रही, बल्कि ड्रोन प्रशिक्षण से जुड़ी सुविधाओं पर भी ध्यान दे रही है।

तकनीकी दस्तावेज में ड्रोन सॉकर एरीना, डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर और अवरोधक प्रशिक्षण क्षेत्र जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है। सेना ड्रोन ऑपरेशन और एंटी ड्रोन दोनों क्षमताओं को साथ-साथ विकसित करना चाहती है।

ड्रोन सॉकर एरीना में सैनिक सुरक्षित वातावरण में ड्रोन ऑपरेशन का अभ्यास कर सकेंगे। वहीं सिमुलेटर के जरिए वास्तविक परिस्थितियों जैसी ट्रेनिंग दी जा सकेगी। (Indian Army Counter UAS System)

एफपीवी ड्रोन भी होंगे ट्रेनिंग का हिस्सा

दस्तावेज में आठ इंच और दस इंच कैटेगरी के एफपीवी ड्रोन का भी उल्लेख किया गया है। एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन, जिन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए वास्तविक समय में कंट्रोल करता है।

इन ड्रोन की उड़ान अवधि, गति और पेलोड क्षमता को देखते हुए स्पष्ट है कि सेना ड्रोन ऑपरेशन की नई तकनीकों पर भी काम कर रही है। कुछ ड्रोन 180 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार हासिल कर सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के पेलोड ले जाने में सक्षम होते हैं।

मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावा

इस प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर विशेष जोर दिया गया है। केवल क्लास-1 और क्लास-2 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को भाग लेने की अनुमति दी गई है।

डिलीवरी की समयसीमा 20 दिन तय की गई है। साथ ही चयनित विक्रेता को प्रशिक्षण और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी। सेना ने अनुभव, प्रदर्शन और तकनीकी क्षमता से जुड़े कई मानदंड भी निर्धारित किए हैं ताकि केवल सक्षम कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकें। (Indian Army Counter UAS System)

The Indian Army has initiated the procurement of a portable Counter-Unmanned Aerial System (Counter-UAS) to strengthen its ability to detect and neutralize hostile drones. Designed for modern battlefield requirements, the system will be capable of disrupting enemy drone operations at ranges of up to 1.5 kilometers through advanced signal jamming technology. The lightweight and portable solution will help troops counter surveillance, reconnaissance, and weaponized drones in sensitive border areas and operational zones. This move reflects the Army’s growing focus on anti-drone warfare capabilities as unmanned aerial threats continue to evolve, posing significant security challenges across multiple theatres.

SSB भर्ती घोटाले में रिटायरमेंट के आखिरी दिन सेना के मेजर जनरल पर बड़ा एक्शन, 20 से ज्यादा अफसरों का होगा कोर्ट मार्शल

SSB Recruitment Scam
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SSB Recruitment Scam: भारतीय सेना में अधिकारी भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक पुराने और चर्चित भ्रष्टाचार मामले में बड़ा कदम उठाया गया है। सेना ने सर्विस सेलेक्शन सेंटर (एसएसबी) कपूरथला भर्ती घोटाले में एक मेजर जनरल समेत कई अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू कर दी है। यह मामला वर्ष 2021 में सामने आया था, जब आरोप लगे थे कि कुछ उम्मीदवारों को पैसे लेकर अधिकारी चयन प्रक्रिया में पास कराया गया।

इस पूरे मामले की जांच पहले सैन्य खुफिया एजेंसियों ने की थी। बाद में मामला सीबीआई तक पहुंचा। करीब पांच साल तक चली जांच और विभागीय कार्रवाई के बाद अब सेना ने आरोपित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का फैसला किया है।

SSB Recruitment Scam: रिटायरमेंट के आखिरी दिन लागू की विशेष कानूनी धारा

सूत्रों के अनुसार जिस मेजर जनरल के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है, वह उस समय सर्विस सेलेक्शन सेंटर, कपूरथला के प्रमुख थे। सेना ने उनके रिटायर होने के अंतिम दिन आर्मी एक्ट की धारा 123 लागू की। यह धारा सेना को यह अधिकार देती है कि यदि किसी अधिकारी पर सेवा अवधि के दौरान अपराध करने का आरोप हो तो रिटायरमेंट के बाद भी उसे जांच और कोर्ट मार्शल के लिए वापस बुलाया जा सकता है।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल तभी किया जाता है जब मामला गंभीर प्रकृति का हो और आरोपों की जांच में पर्याप्त आधार सामने आए हों। (SSB Recruitment Scam)

मई 2026 में कई अधिकारियों को किया अटैच

जानकारी के मुताबिक मई 2026 में मेजर जनरल को दिल्ली एरिया मुख्यालय से अटैच किया गया। इसके अलावा करीब 20 अन्य अधिकारियों को भी अलग-अलग सैन्य प्रतिष्ठानों से जोड़कर जांच प्रक्रिया के लिए रखा गया है। इनमें कुछ ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं जो अब रिटायर हो चुके हैं। वहीं, अधिकारियों के अलावा कुछ जूनियर रैंक के सैन्यकर्मी भी जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। (SSB Recruitment Scam)

आखिर क्या था भर्ती घोटाला?

यह मामला सेना में अधिकारी चयन के लिए होने वाली एसएसबी प्रक्रिया से जुड़ा है। एसएसबी वह संस्था है जो राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा, तकनीकी प्रवेश और अन्य अधिकारी स्तर की भर्तियों के लिए उम्मीदवारों का मूल्यांकन करती है।

आरोप था कि कुछ अधिकारियों और बिचौलियों ने मिलकर उम्मीदवारों से पैसे लेकर उन्हें चयन प्रक्रिया में फायदा पहुंचाया। जांच में सामने आया कि कुछ उम्मीदवारों से 50 हजार रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक की रकम ली गई थी।

जांच एजेंसियों के अनुसार रिश्वत की रकम नकद, बैंक ट्रांसफर, यूपीआई और अन्य डिजिटल माध्यमों से ली गई। कई मामलों में अधिकारियों के परिजनों के खातों में भी रकम भेजी गई थी। (SSB Recruitment Scam)

सीबीआई की एफआईआर में 23 लोग नामजद

मार्च 2021 में सीबीआई ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। जांच एजेंसी ने कुल 23 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें 17 सैन्य अधिकारी और कर्मचारी तथा छह नागरिक शामिल थे।

जांच में कुछ अधिकारियों पर उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया में मदद करने, चिकित्सा जांच को प्रभावित करने और बिचौलियों के माध्यम से पैसों का लेन-देन कराने के आरोप लगे।

सीबीआई ने अपनी जांच में कई बैंक खातों की पड़ताल की और डिजिटल लेन-देन का रिकॉर्ड जुटाया। एजेंसी का दावा था कि कुछ मामलों में रिश्वत के पैसे सीधे परिवार के सदस्यों के खातों तक पहुंचे थे।

मेडिकल रिजेक्शन को पास कराने का आरोप

जांच के दौरान पता चला कि कुछ उम्मीदवारों को पहले मेडिकल आधार पर अस्थायी रूप से अयोग्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में समीक्षा मेडिकल बोर्ड के दौरान उन्हें पास करा दिया गया।

सीबीआई के दस्तावेजों के अनुसार एक सैन्यकर्मी कथित रूप से ऐसे उम्मीदवारों की सूची तैयार करता था जिन्हें मेडिकल आधार पर रोका गया था। बाद में इन उम्मीदवारों या उनके परिवारों से संपर्क किया जाता था और कथित तौर पर पैसे लेकर उन्हें राहत दिलाने की कोशिश की जाती थी।

यही हिस्सा जांच एजेंसियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि इसमें चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए।

एनडीए और ओटीए तक पहुंची जांच

जांच के दौरान कुछ ऐसे मामलों की भी पहचान हुई, जिनका संबंध राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से था।

सीबीआई की जांच में ऐसे उम्मीदवारों की जानकारी भी दी गई जिन्हें कथित तौर पर पैसे लेकर अधिकारी प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश दिलाने की कोशिश की गई थी।

मामले की जांच के दौरान सीबीआई ने देश के कई हिस्सों में एक साथ छापेमारी की थी। कपूरथला, बठिंडा, दिल्ली, कैथल, पलवल, लखनऊ, बरेली, गोरखपुर, जयपुर, विशाखापट्टनम, गुवाहाटी और जोरहाट समेत 13 शहरों में लगभग 30 स्थानों पर तलाशी ली गई थी।

कुछ सैन्य प्रतिष्ठान और अस्पताल भी जांच के दायरे में आए। एजेंसी ने बड़ी मात्रा में दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल डाटा और अन्य सामग्री जब्त की थी।

जांच अधिकारियों का कहना था कि इन दस्तावेजों ने पैसों के लेन-देन और उम्मीदवारों से जुड़े संपर्कों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। (SSB Recruitment Scam)

मिलिटरी इंटेलिजेंस इनवेस्टिगेशन से खुला था मामला

इस घोटाले का खुलासा सबसे पहले मिलिटरी इंटेलिजेंस की जांच में हुआ था। कुछ अधिकारियों पर अवैध आर्थिक लाभ लेने के आरोप सामने आने के बाद मामला सेना मुख्यालय पहुंचा।

इसके बाद अतिरिक्त महानिदेशालय अनुशासन एवं सतर्कता ने विस्तृत जांच कराई और फिर मामला सीबीआई को सौंप दिया गया।

सेना ने शुरू से ही यह रुख रखा कि अधिकारी चयन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अदालतों तक भी पहुंचा था मामला

जांच के दौरान कुछ आरोपित अधिकारियों ने अपने खिलाफ की गई कार्रवाई को विभिन्न कानूनी मंचों पर चुनौती दी थी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में याचिकाएं दायर की गईं।

हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन याचिकाओं को राहत नहीं मिली और जांच प्रक्रिया जारी रही। इसके बाद विभागीय कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया। (SSB Recruitment Scam)

एसएसबी चयन प्रक्रिया क्यों है अहम?

भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी बनने के लिए एसएसबी प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक मानी जाती है। यहां उम्मीदवारों के नेतृत्व, निर्णय क्षमता, मानसिक मजबूती, व्यक्तित्व और समूह में काम करने की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।

इसी वजह से चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को बेहद गंभीरता से लिया जाता है। यदि किसी भी स्तर पर हस्तक्षेप या भ्रष्टाचार की आशंका पैदा होती है तो उसका असर पूरी भर्ती व्यवस्था की साख पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि सेना ने मामले की जांच पूरी होने के बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की है। (SSB Recruitment Scam)

सेना ने प्रक्रिया में बढ़ाई निगरानी

मामला सामने आने के बाद भर्ती प्रक्रिया की निगरानी और इवैल्यूशन सिस्टम को और सख्त बनाया गया। विभिन्न चरणों में अतिरिक्त जांच और रिकॉर्ड सत्यापन की व्यवस्था लागू की गई।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि अधिकारी चयन प्रणाली की निष्पक्षता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसी उद्देश्य से समय-समय पर प्रक्रियाओं की समीक्षा की जाती है। (SSB Recruitment Scam)

The Indian Army has initiated court martial proceedings against a Major General and several other officers in connection with the 2021 SSB recruitment bribery scam. The case revolves around allegations that candidates were selected for officer training after illegal payments ranging from Rs 50,000 to Rs 10 lakh. Following an extensive investigation by Military Intelligence and the Central Bureau of Investigation (CBI), multiple officers were found linked to irregularities in the Service Selection Board (SSB) selection process at Kapurthala. The Army invoked Section 123 of the Army Act to proceed against retired personnel, highlighting its commitment to transparency, accountability, and integrity in military recruitment.

चीन की टेंशन बढ़ाएगा भारत का ‘ब्रह्मास्त्र’! वियतनाम बना ब्रह्मोस मिसाइल का खरीदार, अब इंडोनेशिया की बारी

Vietnam BrahMos Missile Deal
Brahmos WPN System passes through the Rajpath during the full dress rehearsal for the Republic Day Parade-2016, in New Delhi on January 23, 2016 (Photo- PIB)

Vietnam BrahMos Missile Deal: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब दुनिया के कई देशों की पसंद बनती जा रही है। फिलीपींस के बाद अब वियतनाम ने भी भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल खरीद समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। वहीं इंडोनेशिया के साथ भी डील अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस बात की पहली आधिकारिक पुष्टि सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने की।

रक्षा विशेषज्ञ इस डील को सिर्फ हथियार बिक्री नहीं बल्कि एशिया में बदलते सामरिक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। खासकर दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच भारत की यह रक्षा साझेदारी बेहद अहम मानी जा रही है। भारत अब केवल दुनिया का बड़ा हथियार आयातक देश नहीं रहा, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक बेचने वाला उभरता रक्षा निर्यातक बन चुका है।

Vietnam BrahMos Missile Deal: शांगरी-ला डायलॉग में हुआ बड़ा खुलासा

सिंगापुर में आयोजित 23वें शांगरी-ला डायलॉग में एशिया, यूरोप और पश्चिमी देशों के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी और रणनीतिक विशेषज्ञ मौजूद थे। इसी मंच पर भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस डील साइन हो चुकी है, हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि वियतनाम और इंडोनेशिया दोनों के साथ बातचीत अंतिम चरण में थी और वियतनाम के मामले में समझौता पहले ही हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल उन्हीं मित्र देशों के साथ इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करता है, जिन पर भरोसा किया जा सके।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से बनी ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यही वजह है कि कई एशियाई देश अब इसे अपनी नौसैनिक सुरक्षा का अहम हिस्सा बनाना चाहते हैं।

कितनी बड़ी है वियतनाम डील

सूत्रों के मुताबिक वियतनाम के साथ हुई ब्रह्मोस डील की कीमत लगभग 5,800 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इस पैकेज में तटीय रक्षा के लिए मिसाइल बैटरियां, शुरुआती मिसाइल सप्लाई, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल है।

बताया जा रहा है कि वियतनाम भविष्य में एयर लॉन्च वर्जन यानी लड़ाकू विमान से दागी जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइल में भी रूचि दिखाई है। इससे उसकी समुद्री मारक क्षमता में और इजाफा होगा।

भारत और वियतनाम के बीच पिछले कुछ महीनों में रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। मई 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम भारत आए थे। इसके कुछ ही दिनों बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हनोई का दौरा किया। इसी दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी पर विस्तार से चर्चा की थी।

मार्च में भारतीय डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स की एक टीम भी वियतनाम गई थी, जहां डिफेंस प्रोक्योरमेंट को लेकर बातचीत हुई थी।

इंडोनेशिया भी खरीदना चाहता है ब्रह्मोस

वियतनाम के बाद अब इंडोनेशिया को ब्रह्मोस का अगला बड़ा ग्राहक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। अनुमान है कि यह डील लगभग 450 मिलियन डॉलर की हो सकती है।

भारत और इंडोनेशिया ने इसके लिए जॉइंट डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन कमेटी भी बनाई है। इसके तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट रिसर्च, सप्लाई चेन और रक्षा उत्पादन सहयोग पर काम हो रहा है।

इंडोनेशिया लंबे समय से अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री इलाकों में चीन की गतिविधियों के कारण वह आधुनिक एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम चाहता है। ब्रह्मोस उसकी इसी जरूरत को पूरा कर सकती है।

फिलीपींस पहले ही इस्तेमाल कर रहा है ब्रह्मोस

फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना था। जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच करीब 375 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,770 करोड़ रुपये की डील हुई थी।

फिलीपींस ने 2024 से इन मिसाइलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। वहां इन मिसाइलों को तटीय रक्षा के लिए तैनात किया गया है। फिलीपींस और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है। ऐसे में ब्रह्मोस को वहां गेम चेंजर हथियार माना जा रहा है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

आखिर इतनी खास क्यों है ब्रह्मोस मिसाइल

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी को मिलाकर रखा गया है। यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है।

एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज करीब 290 किलोमीटर है। यह जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से दागी जा सकती है। इसकी गति आवाज की रफ्तार से लगभग तीन गुना ज्यादा है, जिससे दुश्मन के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।

ब्रह्मोस बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हुए दुश्मन के जहाज या सैन्य ठिकाने पर सटीक हमला कर सकती है। इसकी सटीकता और तेज गति ही इसे दूसरे मिसाइल सिस्टम से अलग बनाती है।

भारतीय सेना और नौसेना लंबे समय से इसका इस्तेमाल कर रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ब्रह्मोस की मारक क्षमता चर्चा में रही थी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी मांग

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस को लेकर दुनिया का भरोसा और बढ़ा। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता ने कई देशों का ध्यान खींचा।

ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम ने बेहद सटीक तरीके से टारगेट्स को हिट किया और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव बनाया। इसके बाद कई देशों ने भारतीय रक्षा तकनीक में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

चीन की बढ़ती चिंता

दक्षिण चीन सागर में चीन लंबे समय से अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों का चीन के साथ समुद्री विवाद भी है। ऐसे में इन देशों के पास ब्रह्मोस जैसी तेज एंटी-शिप मिसाइलों का पहुंचना चीन के लिए रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक अगर दक्षिण चीन सागर के कई तटीय देशों के पास ब्रह्मोस तैनात हो जाती है तो चीन की समुद्री रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत भी इसे केवल रक्षा निर्यात नहीं बल्कि अपनी “एक्ट ईस्ट” नीति और क्षेत्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में देख रहा है।

इंर्पोटर से एक्सपोर्टर बना भारत

दशकों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश माना जाता था। लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और मिसाइल सिस्टम तक के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर था। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 2.76 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह पिछले साल की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार का लक्ष्य 2030 तक रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसी डील्स इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

केवल दोस्त देशों को मिलती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री को लेकर एक खास शर्त भी है। क्योंकि यह भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है, इसलिए इसे केवल उन्हीं देशों को बेचा जा सकता है जो दोनों देशों के “फ्रेंडली फॉरेन कंट्री” माने जाते हों।

इसी वजह से हर देश को यह मिसाइल नहीं दी जाती। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी साफ कहा कि वियतनाम उन मित्र देशों में शामिल है जिनके साथ भारत ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा करने को तैयार है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

मलेशिया और थाईलैंड भी संपर्क में

सूत्रों के मुताबिक मलेशिया और थाईलैंड भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को लेकर भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अगर ये डील्स भी आगे बढ़ती हैं तो दक्षिण चीन सागर के आसपास कई देशों के पास भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम मौजूद होगा। इससे भारत की रक्षा कूटनीति और मजबूत होती दिखाई दे रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

भारत की डिफेंस डिप्लोमेसी को मिली नई पहचान

ब्रह्मोस डील्स को भारत की नई डिफेंस डिप्लोमेसी का हिस्सा माना जा रहा है। भारत अब केवल सैन्य अभ्यास या राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीक के जरिए भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।

वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग यह दिखाता है कि एशिया में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। ब्रह्मोस अब केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि भारत की सैन्य क्षमता, तकनीकी ताकत और रणनीतिक भरोसे का प्रतीक बनती जा रही है। (Vietnam BrahMos Missile Deal)

लखनऊ में हुआ नौसेना शौर्य वाटिका का उद्घाटन, INS गोमती के मिसाइल लॉन्चर, टॉरपीडो और TU-142M विमान होंगे आकर्षण

Nausena Shaurya Vatika

Nausena Shaurya Vatika: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भारतीय नौसेना की वीरता, समुद्री ताकत और सैनिकों के बलिदान को समर्पित नौसेना शौर्य वाटिका अब आम लोगों के लिए खोल दी गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश की मौजूदगी में 30 मई को इस ओपन एयर डिस्प्ले म्यूजियम का उद्घाटन हुआ। करीब 19 करोड़ रुपये की लागत से दो एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में तैयार की गई यह वाटिका भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता, तकनीक और शौर्य को करीब से दिखाती है।

इस शौर्य वाटिका में भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस गोमती से जुड़े हथियार, रडार, मिसाइल लॉन्चर, टॉरपीडो सिस्टम और कई असली सैन्य उपकरण लगाए गए हैं। इसके अलावा लंबे समय तक समुद्री निगरानी करने वाले टीयू-142एम एयरक्राफ्ट का वॉकथ्रू म्यूजियम भी बनाया गया है। उद्घाटन कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने कहा कि यह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश की सुरक्षा और सैनिकों के बलिदान का एहसास कराने वाला प्रेरणा केंद्र है।

Nausena Shaurya Vatika: नौसेना की ताकत को करीब से दिखाएगी शौर्य वाटिका

लखनऊ में बनाई गई नौसेना शौर्य वाटिका को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यहां आने वाले लोग भारतीय नौसेना की असली ताकत को समझ सकें। पार्क में आईएनएस गोमती पर इस्तेमाल होने वाले कई हथियार और सैन्य सिस्टम लगाए गए हैं। इनमें एके-726 नेवल गन, सरफेस टू एयर मिसाइल लॉन्चर, सरफेस टू सरफेस एंटी शिप मिसाइल सिस्टम, जहाज का रडार, टॉरपीडो लॉन्चर, एंकर और जहाज के मस्तूल शामिल हैं।

इन उपकरणों को इस तरह प्रदर्शित किया गया है ताकि आम लोग समझ सकें कि युद्धपोत समुद्र में किस तरह काम करते हैं और नौसेना समुद्री सीमाओं की रक्षा कैसे करती है। पार्क में आधुनिक लाइटिंग और साउंड सिस्टम भी लगाया गया है, जिससे रात में इसका दृश्य और आकर्षक दिखाई देता है। इसके साथ ही फूड कोर्ट और सोवेनियर शॉप जैसी सुविधाएं भी बनाई गई हैं।

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रक्षा मंत्री बोले- आज समुद्री सुरक्षा सबसे बड़ी जरूरत

उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद जरूरी हो गई है। उन्होंने कहा कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से चलता है। ऐसे में समुद्री सुरक्षा केवल सैन्य जरूरत नहीं बल्कि वैश्विक शांति और समृद्धि का भी आधार है।

उन्होंने भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल तैयारी की तारीफ करते हुए कहा कि भारतीय नौसेना हर परिस्थिति में देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम है। राजनाथ सिंह ने कहा कि नौसेना शौर्य वाटिका युवाओं में राष्ट्र निर्माण और सेना के प्रति सम्मान की भावना पैदा करेगी।

उन्होंने कहा कि देश की आजादी और सुरक्षा की असली कीमत सैनिकों के त्याग और बलिदान से समझी जा सकती है। यह वाटिका उसी भावना को जीवित रखने का प्रयास है।

ऑपरेशन सिंदूर में नौसेना की भूमिका का जिक्र

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय नौसेना ने अरब सागर में जिस तरह अपनी मजबूत मौजूदगी दिखाई, उससे पाकिस्तान नौसेना दबाव में आ गई थी।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय नौसेना की आक्रामक और मजबूत तैनाती का असर यह हुआ कि पाकिस्तान नौसेना अपने बंदरगाहों तक सीमित रही। उन्होंने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना तीनों की संयुक्त भूमिका की सराहना की।

उन्होंने कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों की बढ़ती ताकत सरकार की रणनीतिक योजना और लगातार किए गए प्रयासों का परिणाम है।

आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन पर सरकार का जोर

रक्षा मंत्री ने कार्यक्रम में आत्मनिर्भर भारत अभियान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश को वास्तव में मजबूत तब माना जाएगा जब सेना को हथियारों और सैन्य उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि मेक इन इंडिया, डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, आईडैक्स और अदिति जैसी योजनाओं के जरिए भारत अब आधुनिक हथियार खुद बना रहा है। भारतीय रक्षा उद्योग अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है बल्कि कई मित्र देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात भी किया जा रहा है।

राजनाथ सिंह ने बताया कि 2014 में भारत का रक्षा उत्पादन लगभग 46 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। वहीं रक्षा निर्यात भी एक हजार करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहा है और राज्य में रक्षा उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है।

योगी आदित्यनाथ ने सैनिकों को बताया देश की सुरक्षा की ढाल

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कार्यक्रम में भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि देश के जवान सीमाओं पर तैनात रहते हैं, तभी देश का हर नागरिक चैन की नींद सो पाता है।

उन्होंने कहा कि विकास योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं जब देश सुरक्षित हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकसित भारत विजन सैनिकों के सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश अब रक्षा उत्पादन का बड़ा केंद्र बन रहा है और राज्य में रक्षा उद्योग को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।

Nausena Shaurya Vatika

नौसेना का गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट था आईएनएस गोमती

नौसेना शौर्य वाटिका का सबसे बड़ा आकर्षण आईएनएस गोमती से जुड़े सैन्य उपकरण हैं। आईएनएस गोमती भारतीय नौसेना का गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट था। इसका नाम उत्तर प्रदेश की गोमती नदी पर रखा गया था।

इस युद्धपोत को 16 अप्रैल 1988 को मझगांव डॉक लिमिटेड में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह गोदावरी क्लास का तीसरा युद्धपोत था। 34 साल तक सेवा देने के बाद 29 मई 2022 को इसे डीकमीशन किया गया।

सेवा के दौरान आईएनएस गोमती ने कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में हिस्सा लिया। इनमें ऑपरेशन कैक्टस, ऑपरेशन पराक्रम और ऑपरेशन रेनबो शामिल रहे। इसके अलावा इस युद्धपोत ने कई द्विपक्षीय और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यासों में भी भाग लिया।

भारतीय समुद्री सुरक्षा में बेहतरीन योगदान के लिए आईएनएस गोमती को दो बार यूनिट साइटेशन अवॉर्ड भी दिया गया। पहली बार 2007-08 में और दूसरी बार 2019-20 में यह सम्मान मिला।

टीयू-142एम एयरक्राफ्ट भी आकर्षण का केंद्र

नौसेना शौर्य वाटिका में टीयू-142एम समुद्री निगरानी विमान का वॉकथ्रू म्यूजियम भी बनाया गया है। यह विमान लंबे समय तक समुद्र में निगरानी करने और दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

हालांकि अब यह विमान भारतीय नौसेना की सक्रिय सेवा में नहीं है, लेकिन इसे भारतीय समुद्री सुरक्षा इतिहास का अहम हिस्सा माना जाता है। वाटिका में लोग इसके अंदर जाकर देख सकेंगे कि यह विमान किस तरह काम करता था और समुद्री मिशनों को कैसे अंजाम देता था।

नौसेना शौर्य वाटिका को केवल सैन्य संग्रहालय के रूप में नहीं बल्कि युवाओं और छात्रों के लिए प्रेरणा स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यहां आने वाले लोग भारतीय नौसेना की कार्यप्रणाली, समुद्री युद्ध तकनीक और सैनिकों के जीवन को करीब से समझ सकेंगे।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस तरह के संग्रहालय युवाओं में देशभक्ति की भावना मजबूत करते हैं और उन्हें सशस्त्र बलों के बारे में जागरूक बनाते हैं।

भारत की पहली मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज ‘प्रगति’ में नहीं पहुंचा बांग्लादेश, सैन्य अभ्यास से दूरी बनाकर क्या दे रहा संदेश?

Exercise Pragati 2026 in Umroi, Meghalaya
Background Pic is from Exercise Pragati 2026 in Umroi, Meghalaya and Ambassador Yao Wen Calls on Bangladeshi Prime Minister Tarique Rahman

Exercise Pragati 2026: भारत की पहली मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज ‘प्रगति 2026’ इस समय मेघालय के उमरोई फील्ड ट्रेनिंग नोड में चल रही है। इस युद्धाभ्यास में एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों की सेनाएं हिस्सा ले रही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बांग्लादेश की गैरमौजूदगी को लेकर हो रही है। बांग्लादेश को भी इस अभ्यास का न्योता भेजा गया था, लेकिन उसने इसमें भाग नहीं लिया।

वहीं बांग्लादेश के इस युद्धाभ्यास में नहीं शामिल होने को भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में बढ़ती दूरी के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि यह एक्सरसाइज उसी मेघालय इलाके में हो रही है, जहां पहले भारत और बांग्लादेश की संयुक्त सैन्य एक्सरसाइज ‘सम्प्रिति’ आयोजित होती थी।

भारत समेत कुल 13 देशों के 400 से ज्यादा सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं। इनमें भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, फिलीपींस, सेशेल्स, श्रीलंका और वियतनाम शामिल हैं। यह अभ्यास 20 मई से शुरू हुआ और 31 मई तक चलेगा। विदेशी सैन्य दलों का आना 18 मई से ही शुरू हो गया था।

Exercise Pragati 2026: क्या है एक्सरसाइज प्रगति

प्रगति’ का पूरा नाम “पार्टनरशिप ऑफ रीजनल आर्मीज फॉर ग्रोथ एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन द इंडियन ओशन रीजन” है। यह भारत की पहली ऐसी मल्टीनेशनल सैन्य एक्सरसाइज है, जिसमें कई देशों की सेनाएं एक साथ ट्रेनिंग ले रही हैं।

इस अभ्यास का मुख्य फोकस काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन है। सैनिकों को पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में आतंकवाद विरोधी कार्रवाई की ट्रेनिंग दी जा रही है। पूर्वोत्तर भारत का इलाका इसी तरह के कठिन भूभाग के लिए जाना जाता है, इसलिए उमरोई को इसके लिए चुना गया।

भारतीय सेना के अधिकारियों के मुताबिक अभ्यास का मकसद अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, आधुनिक युद्ध तकनीकों को साझा करना और संयुक्त ऑपरेशन क्षमता मजबूत करना है। (Exercise Pragati 2026)

अलग-अलग देशों के सैनिक एक साथ कर रहे ट्रेनिंग

इस सैन्य अभ्यास की एक खास बात यह है कि इसमें केवल अलग-अलग देशों की यूनिट्स नहीं बल्कि “मिक्स्ड टीम्स” बनाई गई हैं। यानी विभिन्न देशों के सैनिकों को मिलाकर टीम तैयार की गई है ताकि वे एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को समझ सकें।

अब तक सैनिकों ने जंगल वारफेयर, रॉक क्राफ्ट, एंबुश और काउंटर एंबुश ड्रिल, स्लिथरिंग और बस इंटरवेंशन ऑपरेशन जैसी ट्रेनिंग की है। इसके अलावा स्नाइपर फायरिंग और एके-203 राइफल शूटिंग प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।

सैनिकों के बीच आपसी तालमेल बढ़ाने के लिए बास्केटबॉल और वॉलीबॉल जैसी स्पोर्ट्स एक्टिविटीज भी कराई गईं। उद्घाटन समारोह में सभी विदेशी दलों का पारंपरिक भारतीय तरीके से स्वागत किया गया।

भारतीय सेना के एडिशनल डायरेक्टर जनरल इन्फैंट्री मेजर जनरल सुनील श्योराण ने उद्घाटन कार्यक्रम में कहा कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सेनाओं के बीच “कोहेशन”, “इंटरऑपरेबिलिटी” और “कलेक्टिव एंगेजमेंट” बेहद जरूरी हैं।

आखिर क्यों नहीं आया बांग्लादेश

बांग्लादेश की गैरमौजूदगी ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है क्योंकि भारत और बांग्लादेश के सैन्य रिश्ते पहले काफी मजबूत माने जाते थे। दोनों देशों के बीच ‘सम्प्रिति’ नाम की संयुक्त सैन्य एक्सरसाइज कई बार हो चुकी है।

उमरोई ट्रेनिंग नोड का बांग्लादेश सीमा से काफी नजदीकी होना इस मुद्दे को और ज्यादा संवेदनशील बना देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ढाका का इस अभ्यास से दूर रहना केवल सैन्य फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव की शुरुआत अगस्त 2024 के बाद मानी जाती है। उसी दौरान बड़े जनआंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और वे भारत आ गईं। तब से दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी दिखाई नहीं दी। (Exercise Pragati 2026)

चीन दौरे में मोहम्मद यूनुस के बयान से बढ़ा विवाद

तनाव उस समय और बढ़ गया जब मार्च 2025 में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस चीन दौरे पर गए। बीजिंग में एक बिजनेस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को “लैंडलॉक्ड” बताया और कहा कि बांग्लादेश इस पूरे क्षेत्र के लिए समुद्र तक पहुंच का “गार्डियन” है।

उन्होंने चीन से कहा कि वह इस स्थिति को आर्थिक अवसर के रूप में देख सकता है। इस बयान को भारत में काफी गंभीरता से लिया गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जवाब देते हुए कहा था कि भारत अपने पड़ोसी देशों को जोड़ने वाला मुख्य केंद्र है और क्षेत्रीय सहयोग किसी एक देश की पसंद के आधार पर नहीं चल सकता।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस बयान को “आपत्तिजनक” बताया था। (Exercise Pragati 2026)

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान पहले चीन जाएंगे

वहीं, बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने सत्ता संभालने के बाद अपने पहले विदेशी दौरे के लिए चीन को चुना है। जून के आखिर में उनकी बीजिंग यात्रा होने वाली है। इस दौरान वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात करेंगे। बातचीत में इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार और तीस्ता नदी परियोजना जैसे मुद्दे शामिल रहेंगे। बताया जा रहा है कि इस परियोजना के लिए चीन की एक्जिम बैंक फंडिंग भी दे सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत ने भी तारिक रहमान को यात्रा का न्योता दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले बधाई दी थी। इसके बावजूद बांग्लादेश ने चीन को पहली प्राथमिकता दी।

आमतौर पर बांग्लादेश समेत भारत के पड़ोसी देशों के नेता नई सरकार बनने के बाद सबसे पहले भारत आते रहे हैं। इसे भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति का हिस्सा माना जाता है। लेकिन इस बार यह परंपरा टूटती दिखाई दे रही है।

ढाका का कहना है कि चीन उसका बड़ा विकास साझेदार है और यह दौरा संतुलित विदेश नीति का हिस्सा है। वहीं भारत में इसे चीन की तरफ बढ़ते झुकाव के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी और तीस्ता परियोजना में चीन की भूमिका को लेकर भी नई दिल्ली नजर बनाए हुए है।

भारत ने वापस ली ट्रांसशिपमेंट सुविधा

बांग्लादेश के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारत ने 2020 में दी गई ट्रांसशिपमेंट सुविधा भी वापस ले ली। इस सुविधा के तहत बांग्लादेश को भारतीय एयरपोर्ट और बंदरगाहों का इस्तेमाल तीसरे देशों में निर्यात के लिए करने की अनुमति मिली थी।

2022 में इस व्यवस्था को और बढ़ाया गया था, लेकिन विवाद के बाद नई दिल्ली ने इसे खत्म कर दिया। इसे भारत की तरफ से मजबूत कूटनीतिक प्रतिक्रिया माना गया। (Exercise Pragati 2026)

पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ती नजदीकी से चिंता

नई दिल्ली में चिंता का एक बड़ा कारण बांग्लादेश का चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ता संपर्क भी माना जा रहा है। हाल के महीनों में ढाका और इस्लामाबाद के बीच रिश्तों में गर्मजोशी दिखाई दी है।

इसके अलावा तीस्ता नदी परियोजना को लेकर चीन की भूमिका पर भी भारत की नजर है। इस परियोजना में चीनी कंपनियों और विशेषज्ञों की भागीदारी की चर्चा हुई थी। भारतीय रणनीतिक हलकों में आशंका जताई गई कि इससे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीनी मौजूदगी बढ़ सकती है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर को “चिकन नेक” भी कहा जाता है। यह बेहद संवेदनशील इलाका है जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है।

भारत ने पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी पर बढ़ाया फोकस

बांग्लादेश पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स की रफ्तार तेज कर दी है। सरकार ने करीब 22,864 करोड़ रुपये की लागत वाली शिलांग-सिलचर फोर लेन हाईवे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाया है।

यह हाईवे म्यांमार के जरिए बनने वाले कलादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट से जुड़ने वाला है। इसका मकसद पूर्वोत्तर राज्यों को ऐसा वैकल्पिक समुद्री और जमीनी रास्ता देना है, जिसमें बांग्लादेश पर निर्भरता कम हो। (Exercise Pragati 2026)

कूटनीतिक स्तर पर भी बदलाव

भारत ने अप्रैल 2026 में बांग्लादेश में नए हाई कमिश्नर की नियुक्ति भी की। इस बार करियर डिप्लोमैट की जगह वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को ढाका भेजने का फैसला किया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दोनों देशों के रिश्तों को राजनीतिक स्तर पर संभालने की कोशिश के तौर पर देखा गया।

क्रिकेट से लेकर सैन्य मंच तक दिख रही दूरी

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में दूरी केवल सैन्य मामलों तक सीमित नहीं रही। जनवरी 2026 में बांग्लादेश ने भारत में होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप मुकाबलों में खेलने से इनकार कर दिया था। उसने सुरक्षा और राजनीतिक तनाव का हवाला देते हुए मैच श्रीलंका में कराने की मांग की थी। हालांकि आईसीसी ने यह मांग स्वीकार नहीं की।

अब एक्सरसाइज प्रगति से दूरी को उसी बड़े पैटर्न का हिस्सा माना जा रहा है। (Exercise Pragati 2026)

सेना के साथ ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रदर्शन भी

प्रगति एक्सरसाइज के साथ-साथ एक बड़ा डिफेंस इंडस्ट्री एक्सपो भी आयोजित किया गया है। फिक्की ने ईस्टर्न कमांड और आर्मी डिजाइन ब्यूरो के साथ मिलकर 30 और 31 मई को यह कार्यक्रम आयोजित किया।

इस दौरान आत्मनिर्भर भारत के तहत विकसित भारतीय सैन्य उपकरण, ड्रोन, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य डिफेंस टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया गया।

भारतीय सेना के अधिकारी और विदेशी सैन्य प्रतिनिधि इन स्वदेशी प्रणालियों को करीब से देख रहे हैं। एक्सपो का मकसद केवल तकनीक दिखाना नहीं बल्कि रक्षा सहयोग और इंडस्ट्री नेटवर्किंग को मजबूत करना भी बताया गया। (Exercise Pragati 2026)

अभ्यास के अंतिम चरण में पहुंची एक्सरसाइज

सूत्रों के मुताबिक प्रगति एक्सरसाइज अब अपने इंटेंसिव ऑपरेशनल फेज में पहुंच चुकी है। अंतिम दिनों में हाई इंटेंसिटी वैलिडेशन मिशन कराया जाएगा, जिसमें अलग-अलग देशों की मिश्रित टीमें मिलकर ऑपरेशन करेंगी।

इस दौरान सैनिकों की संयुक्त रणनीति, कम्युनिकेशन, फायरिंग और रेस्क्यू क्षमताओं का परीक्षण होगा। भारतीय सेना का मानना है कि इस तरह के अभ्यास आधुनिक युद्ध की बदलती चुनौतियों से निपटने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। (Exercise Pragati 2026)

Bangladesh has skipped India’s first multinational military exercise, Exercise Pragati 2026, currently underway in Meghalaya’s Umroi Field Training Node. The counter-terrorism exercise includes over 400 troops from 13 countries across South Asia, Southeast Asia, and the Indian Ocean region. Dhaka’s absence has drawn attention amid growing strategic tensions between India and Bangladesh since 2024. The exercise focuses on jungle warfare, joint tactical drills, sniper firing, and coordinated operations in semi-mountainous terrain. Analysts view Bangladesh’s decision as a diplomatic signal, especially as Dhaka deepens ties with China and Pakistan while India strengthens regional military cooperation and Northeast connectivity projects.

खड़कवासला से निकले 353 नए ‘वॉरियर’, NDA के 150वें कोर्स में 21 देशों के विदेशी कैडेट भी शामिल, सेना प्रमुख बोले- बदल चुका है युद्ध का तरीका

NDA Passing Out Parade 2026

NDA Passing Out Parade 2026: पुणे के खड़कवासला स्थित नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में शनिवार को पासिंग आउट परेड का आयोजन हुआ। एनडीए के 150वें कोर्स के 353 कैडेट्स ने अपनी ट्रेनिंग पूरी कर पासिंग आउट की। इनमें भारत के अलावा 21 मित्र देशों के कैडेट भी शामिल रहे। इस बार 18 महिला कैडेट्स ने भी परेड और ट्रेनिंग पूरी कर नई पहचान बनाई।

इस खास मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पासिंग आउट परेड की समीक्षा की और कैडेट्स को संबोधित किया। खास बात यह थी कि करीब 42 साल पहले वह खुद इसी परेड ग्राउंड से कैडेट के तौर पर निकले थे। वहीं, अब वह भारतीय सेना के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर उसी अकादमी में मुख्य अतिथि बने।

NDA Passing Out Parade 2026: सेना प्रमुख ने साझा किया अपना अनुभव

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कैडेट्स को संबोधित करते हुए कहा कि 42 साल पहले वह भी इसी परेड ग्राउंड पर खड़े थे और तब उनके मन में भी भविष्य को लेकर उत्साह और सवाल थे। उन्होंने कहा कि एनडीए सिर्फ एक ट्रेनिंग संस्थान नहीं है, बल्कि यह जीवनभर के लिए सोच, अनुशासन और नेतृत्व की नींव तैयार करता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब खतरे हमेशा पारंपरिक युद्ध की तरह सामने नहीं आते। कई बार दुश्मन सीमा के पार नहीं बल्कि साइबर, ड्रोन, इंफॉर्मेशन और टेक्नोलॉजी के जरिए भी चुनौती देता है। ऐसे माहौल में सैनिकों को केवल हथियार चलाना ही नहीं बल्कि तेजी से सोचने और सही फैसला लेने की क्षमता भी होनी चाहिए।

जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि हालिया ऑपरेशंस ने दिखाया कि भारत किस तरह तेज, सटीक और निर्णायक प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि आज के युवा अधिकारियों को इसी तरह की जिम्मेदारी निभानी होगी।

“सीखना कभी बंद मत करना”

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में कैडेट्स को लगातार सीखते रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अपने 40 साल से ज्यादा लंबे सैन्य जीवन में उन्होंने देखा कि सबसे अच्छे अधिकारी वही बने जो जीवनभर विद्यार्थी बने रहे।

उन्होंने कहा कि हर नई पोस्टिंग, हर नई जिम्मेदारी और हर ऑपरेशन से कुछ नया सीखने की कोशिश करनी चाहिए। केवल रैंक या मेडल ही अच्छे अधिकारी की पहचान नहीं होते, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में शांत रहना और सही नेतृत्व देना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

उन्होंने तीन अहम गुणों पर जोर दिया – एटीट्यूड, एडैप्टेबिलिटी और एबिलिटी। उनके मुताबिक एटीट्यूड यानी सोच सबसे मजबूत आधार होता है। एडैप्टेबिलिटी यानी बदलती परिस्थितियों में खुद को ढालने की क्षमता और एबिलिटी यानी नेतृत्व व निर्णय लेने की ताकत। (NDA Passing Out Parade 2026)

महिला कैडेट्स को लेकर कही बड़ी बात

इस बार की पासिंग आउट परेड में 18 महिला कैडेट्स भी शामिल रहीं। सेना प्रमुख ने कहा कि महिला कैडेट्स ने हर ट्रेनिंग, हर ड्रिल और हर चुनौती में खुद को साबित किया। उन्होंने कहा कि परेड ग्राउंड पर उन्हें अलग पहचानना मुश्किल था क्योंकि उन्होंने सभी मानकों को बराबरी से पूरा किया।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि युद्धक्षेत्र में साहस, नेतृत्व और संकल्प का कोई जेंडर नहीं होता। सेना में जिम्मेदारी निभाने की क्षमता ही सबसे अहम होती है।

महिला कैडेट्स की मौजूदगी इस बार बेहद खास रही। क्योंकि एनडीए में महिलाओं की एंट्री के बाद यह तीसरा बैच है जिसने ट्रेनिंग पूरी की है। (NDA Passing Out Parade 2026)

21 देशों के विदेशी कैडेट भी हुए पास आउट

इस बार 21 मित्र देशों के कैडेट्स ने भी एनडीए से ट्रेनिंग पूरी की। इनमें 12 देशों के 24 फ्रेंडली फॉरेन कैडेट्स शामिल रहे। सेना प्रमुख ने अपने भाषण में इन विदेशी कैडेट्स का खास तौर पर स्वागत और सम्मान किया।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों से आए ये युवा अधिकारी अपने साथ दोस्ती, भरोसा और सैन्य सहयोग की भावना लेकर जाएंगे। भारत लंबे समय से कई मित्र देशों के सैन्य अधिकारियों को ट्रेनिंग देता रहा है और एनडीए इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (NDA Passing Out Parade 2026)

परिवारों का भी किया जिक्र

पासिंग आउट परेड के दौरान कैडेट्स के परिवार भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। कई माता-पिता अपने बच्चों को सैन्य वर्दी में देखकर भावुक नजर आए।

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में परिवारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कैडेट्स की सफलता के पीछे उनके परिवारों का त्याग और भरोसा भी शामिल है। कठिन ट्रेनिंग और लंबे समय तक परिवार से दूर रहने के दौरान परिवारों का समर्थन बेहद अहम होता है।

उन्होंने प्रशिक्षकों और स्टाफ की भी सराहना की जिन्होंने इन युवा कैडेट्स को सैन्य जीवन के लिए तैयार किया।

“सेवा परमो धर्म” का संदेश

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एनडीए के मूल मंत्र “सेवा परमो धर्म” का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सैन्य जीवन में कई बार आराम और कर्तव्य के बीच चुनाव करना पड़ता है, लेकिन एक सैनिक का सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र सेवा होता है।

उन्होंने कैडेट्स से कहा कि नेतृत्व कभी शब्दों से साबित नहीं होता, बल्कि सैनिकों का भरोसा ही किसी अधिकारी की असली पहचान बनता है। (NDA Passing Out Parade 2026)

किरण बेदी ने कैडेट्स को बताया “स्कॉलर वॉरियर”

इस समारोह में पूर्व आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी भी मौजूद रहीं। उन्होंने कैडेट्स को संबोधित करते हुए उन्हें “स्कॉलर वॉरियर” बनने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में केवल शारीरिक ताकत काफी नहीं है। आधुनिक सैन्य अधिकारी को टेक्नोलॉजी, रणनीति, साइबर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय मामलों और नेतृत्व की भी गहरी समझ होनी चाहिए।

किरण बेदी ने कहा कि अनुशासन, ज्ञान और ईमानदारी किसी भी सैन्य अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत होती है।

236 कैडेट्स को मिली डिग्री

समारोह के दौरान जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ने 236 कैडेट्स को बैचलर डिग्री भी प्रदान की। इनमें कंप्यूटर साइंस, साइंस और आर्ट्स स्ट्रीम के कैडेट्स शामिल रहे।

आंकड़ों के मुताबिक 112 कैडेट्स ने कंप्यूटर साइंस, 65 ने साइंस और 59 ने आर्ट्स स्ट्रीम में डिग्री हासिल की।

एनडीए में सैन्य ट्रेनिंग के साथ-साथ अकादमिक पढ़ाई पर भी बराबर जोर दिया जाता है। कैडेट्स तीन साल तक कठोर शारीरिक ट्रेनिंग के साथ नियमित शैक्षणिक पढ़ाई भी करते हैं। (NDA Passing Out Parade 2026)

इन कैडेट्स ने हासिल किए बड़े सम्मान

इस समारोह में कई कैडेट्स को उनकी शानदार अकादमिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित भी किया गया। ‘जे’ स्क्वाड्रन के कैडेट रणविजय त्यागी ने कंप्यूटर साइंस स्ट्रीम में सबसे ज्यादा ग्रेड हासिल किए। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और एडमिरल रोलिंग ट्रॉफी दी गई।

‘एम’ स्क्वाड्रन के कैडेट पीयूष रौतेला ने साइंस स्ट्रीम में टॉप किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीओएएस रोलिंग ट्रॉफी मिली।

‘पी’ स्क्वाड्रन के कैडेट सुशांत वर्मा ने सोशल साइंस स्ट्रीम में पहला स्थान हासिल किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीएएस ट्रॉफी प्रदान की गई।

वहीं बीटेक स्ट्रीम में ‘जी’ स्क्वाड्रन के कैडेट मन्नेला नितिन ने छह सेमेस्टर में सबसे ज्यादा सीजीपीए हासिल किया। उन्हें कमांडेंट सिल्वर मेडल और सीआईएससी ट्रॉफी दी गई। (NDA Passing Out Parade 2026)

क्यों खास है एनडीए

1954 में स्थापित एनडीए एशिया की सबसे पुरानी ट्राई-सर्विस सैन्य अकादमियों में गिनी जाती है। यहां सेना, नौसेना और वायुसेना के कैडेट्स एक साथ ट्रेनिंग लेते हैं।

तीन साल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद कैडेट्स अलग-अलग सैन्य अकादमियों में आगे की ट्रेनिंग के लिए जाते हैं। सेना के कैडेट्स इंडियन मिलिट्री अकादमी, नौसेना के कैडेट्स नेवल अकादमी और वायुसेना के कैडेट्स एयर फोर्स अकादमी में आगे की ट्रेनिंग लेते हैं।

एनडीए का 150वां कोर्स इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह अकादमी के लंबे सैन्य इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां से निकले कई अधिकारी बाद में सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख बने। (NDA Passing Out Parade 2026)

The National Defence Academy’s 150th course marked a major milestone as 353 cadets, including trainees from 21 friendly foreign nations, graduated from NDA Khadakwasla. The passing out ceremony also included 18 female cadets, reflecting the changing face of India’s armed forces. Chief of the Army Staff General Upendra Dwivedi reviewed the parade and delivered an emotional address, urging cadets to lead with courage, adaptability, and integrity. He highlighted the importance of jointness among the three services and referred to Operation Sindoor as an example of modern military preparedness. The ceremony was attended by senior military leaders and dignitaries.

जवानों को ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही भारतीय सेना, पहाड़ों पर 30 किलो वजन के साथ भी नहीं थकेंगे सैनिक

Indian Army Exoskeleton System
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Indian Army Exoskeleton System: भारतीय सेना अब अपने जवानों को अब ‘रोबोट’ बनाने की तैयारी कर रही है। सेना ऐसी तकनीक इस्तेमाल करने जा रही है, जो लंबे समय तक भारी वजन उठाकर चलने के दौरान उनकी थकान कम करेगी। रक्षा मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और भारतीय सेना ने 520 पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह सिस्टम सैनिकों को पहाड़ी इलाकों, बर्फीले मोर्चों और कठिन युद्ध क्षेत्रों में भारी सामान उठाने में मदद करेगा।

सेना को जरूरतों को पूरा करने वाले एक्सोस्केलेटन सिस्टम की खरीद का सबसे अहम हिस्सा यह है कि यह तकनीक बिना बैटरी और बिना बिजली के काम करेगी। यानी सैनिकों को किसी चार्जिंग सिस्टम या अतिरिक्त पावर सोर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

सेना को 90 दिनों के अंदर इसकी डिलीवरी पूरी करनी होगी। इन सिस्टम्स का इस्तेमाल उच्च हिमालयी इलाकों में किया जाएगा, जहां जवानों को रोजाना कई किलो वजन उठाकर ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं।

Indian Army Exoskeleton System: आखिर क्या होता है एक्सोस्केलेटन?

एक्सोस्केलेटन को आसान भाषा में समझें तो यह एक पहनने वाला मैकेनिकल सपोर्ट सिस्टम है। यह किसी रोबोटिक सूट जैसा दिखता है, लेकिन इसमें मोटर या बैटरी नहीं होती। सैनिक इसे शरीर पर पहनते हैं और यह उनकी कमर, पीठ, कंधों, हाथों और घुटनों को अतिरिक्त ताकत देता है।

सेना के टेक्निकल स्पेसिफिकेशन डॉक्यूमेंट में इसे ऐसे सिस्टम के रूप में बताया गया है जो सैनिकों की स्ट्रेंथ, एंड्योरेंस और मोबिलिटी बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसमें कहा गया है कि यह कार्बन फाइबर जैसे हल्के लेकिन मजबूत मटेरियल से तैयार किया जाता है और कठिन इलाकों में तेजी से मूवमेंट में मदद करता है।

भारतीय सेना के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि सियाचिन, लद्दाख और ऊंचाई वाले इलाकों में जवानों को कई किलो राशन, हथियार और गोला-बारूद लेकर घंटों चलना पड़ता है। लंबे समय तक वजन उठाने से रीढ़, घुटनों और कंधों पर दबाव बढ़ता है। एक्सोस्केलेटन इस दबाव को कम करेगा। (Indian Army Exoskeleton System)

बिना बिजली के काम करेगा पूरा सिस्टम

इस खरीद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सेना ने पूरी तरह पैसिव एक्सोस्केलेटन सिस्टम मांगा है। टेक्निकल स्पेसिफिकेशन में साफ लिखा गया है कि सिस्टम “विदाउट एनी एक्सटर्नल पावर” होना चाहिए। यानी यह बैटरी या इलेक्ट्रिक मोटर के बिना काम करेगा।

इसका फायदा यह होगा कि जवानों को ऑपरेशन के दौरान चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। ऊंचाई वाले इलाकों में अत्यधिक ठंड के कारण बैटरियां जल्दी खत्म हो जाती हैं, लेकिन यह सिस्टम मैकेनिकल सपोर्ट पर आधारित होगा।

सैनिक जरूरत पड़ने पर इसे तुरंत ऑन या ऑफ भी कर सकेंगे। इसके लिए मैनुअल कंट्रोल स्विच दिया जाएगा। जवान बिना सूट उतारे इसे बंद या चालू कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

सैनिकों को कितना सपोर्ट मिलेगा?

सेना ने इस सिस्टम के लिए काफी सख्त तकनीकी मानक तय किए हैं। दस्तावेज के मुताबिक एक्सोस्केलेटन सैनिक को कम से कम 30 किलो वजन उठाने और ले जाने में मदद करेगा।

कमर और रीढ़ वाले हिस्से में सिस्टम को ऐसा बनाया जाएगा कि जवान जब जमीन से वजन उठाए तो उसे कम से कम 20 किलो का अतिरिक्त सपोर्ट मिले। वहीं दोनों हाथों को मिलाकर 15 किलो तक अतिरिक्त सपोर्ट देने की शर्त रखी गई है।

इसका मतलब यह हुआ कि जवान का शरीर पूरा बोझ अकेले नहीं उठाएगा। सूट वजन का हिस्सा अपने ऊपर ले लेगा। इससे सैनिक की ऊर्जा कम खर्च होगी और थकान धीरे आएगी।

पहाड़ों और बर्फीले इलाकों के लिए खास डिजाइन

भारतीय सेना ने जो तापमान सीमा तय की है, उससे साफ है कि यह सिस्टम बेहद कठिन मौसम के लिए खरीदा जा रहा है। ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री से प्लस 50 डिग्री तक रखा गया है। वहीं स्टोरेज टेम्परेचर माइनस 40 डिग्री तक होना चाहिए। यानी यह सिस्टम सियाचिन जैसे ग्लेशियर क्षेत्र से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इसके अलावा पूरा सिस्टम वाटरप्रूफ कैरिंग केस में आएगा, ताकि बारिश, बर्फ या कीचड़ वाले इलाकों में भी इसे सुरक्षित रखा जा सके। (Indian Army Exoskeleton System)

केवल 5.5 किलो होगा वजन

दिलचस्प बात यह है कि सैनिकों को अतिरिक्त ताकत देने वाला यह पूरा सिस्टम खुद बहुत हल्का होगा। सेना ने इसकी अधिकतम वजन सीमा 5.5 किलो तय की है।

इसके लिए कार्बन फाइबर, हाई स्ट्रेंथ एल्यूमिनियम अलॉय, टफ नायलॉन और कुशन मटेरियल का इस्तेमाल किया जाएगा। ये सभी मटेरियल हल्के होने के साथ मजबूत भी होते हैं।

सेना ने यह भी कहा है कि सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिसे जवान आसानी से पहन और उतार सकें। किसी मुश्किल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। (Indian Army Exoskeleton System)

तीन हिस्सों में बंटा होगा एक्सोस्केलेटन

सेना ने 3-इन-1 मॉड्यूलर डिजाइन मांगा है। इसमें बैक मॉड्यूल, आर्म मॉड्यूल और नी मॉड्यूल शामिल होंगे। बैक मॉड्यूल सैनिक की कमर और रीढ़ को सपोर्ट देगा। आर्म मॉड्यूल हथियार या भारी उपकरण उठाने के दौरान हाथों पर दबाव कम करेगा। वहीं नी मॉड्यूल घुटनों को सहारा देगा ताकि ऊंचाई वाले इलाकों में चढ़ाई करते समय शरीर पर कम असर पड़े।

टेक्निकल डॉक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त मॉड्यूल जोड़े जा सकेंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

सेना को क्यों चााहिए यह सूट

भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से हाई अल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों की फिजिकल स्ट्रेस कम करने वाली तकनीकों पर ध्यान दे रही है। पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सीमाओं पर लंबे समय तक तैनाती के दौरान जवानों को भारी उपकरण लेकर गश्त करनी पड़ती है।

एक सामान्य सैनिक कई बार 25 से 35 किलो तक वजन लेकर चलता है। इसमें हथियार, गोला-बारूद, राशन, रेडियो सेट और सर्वाइवल उपकरण शामिल होते हैं। ऐसे में कमर और घुटनों की चोटें बढ़ जाती हैं।

सेना का मानना है कि एक्सोस्केलेटन से जवान ज्यादा समय तक एक्टिव रह सकेंगे और तेजी से मूवमेंट कर पाएंगे। (Indian Army Exoskeleton System)

मेक इन इंडिया को प्रथमिकता

इस पूरी खरीद प्रक्रिया में “मेक इन इंडिया” को प्राथमिकता दी गई है। इसमें केवल क्लास-1 और क्लास-2 लोकल सप्लायर्स ही इसमें भाग ले सकेंगे। क्लास-1 सप्लायर के लिए कम से कम 50 प्रतिशत लोकल कंटेंट जरूरी है, जबकि क्लास-2 के लिए 20 प्रतिशत।

सरकार ने माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज को भी विशेष छूट दी है। एमएसई कंपनियों को प्राइस प्रेफरेंस और क्वांटिटी प्रेफरेंस दोनों मिलेंगे। इससे भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स और घरेलू कंपनियों को बड़ा मौका मिलेगा।

सेना ने सिस्टम खरीद के साथ ट्रेनिंग की शर्त भी जोड़ी है। सप्लायर के दो व्यक्तियों को एक सप्ताह की ट्रेनिंग देनी होगी। यह ट्रेनिंग यूजर लोकेशन पर होगी, ताकि जवान वास्तविक परिस्थितियों में सिस्टम इस्तेमाल करना सीख सकें।

सिस्टम की वारंटी तीन साल तय की गई है। इसके अलावा छह साल की शेल्फ लाइफ मांगी गई है। (Indian Army Exoskeleton System)

दुनियाभर की सेनाओं में तेजी से बढ़ रहा इस्तेमाल

अमेरिका, चीन और रूस जैसी बड़ी सेनाएं पिछले कई वर्षों से एक्सोस्केलेटन तकनीक पर काम कर रही हैं। अमेरिकी सेना ने लॉजिस्टिक्स और लोड कैरिंग के लिए कई प्रोटोटाइप तैयार किए हैं। चीन ने हाई अल्टीट्यूड सैनिकों के लिए हल्के एक्सोस्केलेटन का परीक्षण किया है।

वहीं अब भारतीय सेना भी सैनिकों की फिजिकल परफॉर्मेंस बढ़ाने के लिए नई तकनीक को तेजी से अपनाना चाहती है। खास बात यह है कि भारतीय सेना ने शुरुआत में पॉसिव सिस्टम चुना है क्योंकि यह कम मुश्लकिल, कम खर्चीला और फील्ड में ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। (Indian Army Exoskeleton System)

The Indian Army is set to procure 520 passive exoskeleton systems to enhance the physical endurance and operational efficiency of soldiers deployed in high-altitude and extreme terrain areas such as Ladakh and Siachen. These wearable assistive devices will help troops carry heavy loads of up to 30 kilograms with reduced fatigue and lower stress on the spine, knees, shoulders, and arms. Unlike powered robotic suits, the passive exoskeleton works without batteries or external power sources, making it ideal for harsh environments. The move is part of the Army’s modernisation drive and supports the government’s “Make in India” initiative in the defence sector.