DRDO Preparing IRSA 2.0 and New SDR for IAF, Enabling Secure Tri-Service Military Communications. (AI Image)
IRSA 2.0: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) अब जल्द इंडियन रेडियो सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर (IRSA) 2.0 लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही साल 2026 के अंत तक भारतीय वायुसेना के लिए नया सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) भी डेवलप किया जा रहा है। जिससे सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच सिक्योर कम्युनिकेशन किया जा सकेगा।
IRSA 2.0: IRSA- भारत का पहला राष्ट्रीय मानक
इंडियन रेडियो सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर (IRSA) भारत का पहला राष्ट्रीय मानक है, जिसे सैन्य सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो के लिए तैयार किया गया है। इसका पहला संस्करण अक्टूबर 2025 में जारी किया गया था।
यह ऐसा साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो अलग-अलग कंपनियों और अलग-अलग सेनाओं के रेडियो को एक ही भाषा में बात करने की क्षमता देता है।
आज भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में कई तरह के रेडियो सिस्टम इस्तेमाल हो रहे हैं। इनमें से कई विदेशी कंपनियों के बनाए हुए हैं। इन रेडियो में इस्तेमाल होने वाले वेवफॉर्म यानी डेटा और आवाज भेजने के डिजिटल पैटर्न अलग-अलग होते हैं। इसी वजह से कई बार एक प्लेटफॉर्म का रेडियो दूसरे प्लेटफॉर्म से सीधे संपर्क नहीं कर पाता।
IRSA इसी समस्या का समाधान करने के लिए विकसित किया गया है।
IRSA 2.0 से क्या बदलेगा?
डीआरडीओकी डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स एप्लीकेशंस लेबोरेटरी (DEAL) ने तीनों सेनाओं के सहयोग से IRSA 2.0 तैयार किया है। नया संस्करण सशस्त्र बलों की नई जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है। इसमें नए वेवफॉर्म, बेहतर ऑपरेशनल फीचर्स और अधिक इंटरऑपरेबिलिटी शामिल होगी।
IRSA केवल सॉफ्टवेयर स्पेसिफिकेशन तय नहीं करता बल्कि यह एपीआई, इंटरफेस, एक्जीक्यूशन एनवायरनमेंट, वेवफॉर्म पोर्टेबिलिटी और सर्टिफिकेशन मानकों को भी निर्धारित करता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग निर्माताओं के रेडियो भी एक-दूसरे के साथ आसानी से काम कर सकें।
युद्ध में एसडीआर जरूरी
सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) आधुनिक सैन्य संचार प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुराने रेडियो हार्डवेयर आधारित होते थे। यदि किसी नई तकनीक या नए वेवफॉर्म की जरूरत होती थी तो पूरा सिस्टम बदलना पड़ता था।
लेकिन एसडीआर में अधिकतर काम सॉफ्टवेयर के जरिए होता है। इसका मतलब है कि जरूरत पड़ने पर रेडियो को नए मिशन, नए नेटवर्क या नए एन्क्रिप्शन के अनुसार अपडेट किया जा सकता है।
युद्ध के दौरान बदलती परिस्थितियों में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है। (IRSA 2.0)
भारतीय वायुसेना को मिलेगा नया एसडीआर
डीआरडीओ इस साल के अंत तक भारतीय वायुसेना के लिए नया एसडीआरऔर नया वेवफॉर्म विकसित करने पर काम कर रहा है।
वर्तमान में भारतीय वायुसेना के कई प्लेटफॉर्म, खासकर रूसी मूल के सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमानों में विदेशी एसडीआर लगे हुए हैं। वहीं, भविष्य में चाहे कोई भी रेडियो इस्तेमाल हो, उसे IRSA मानक के अनुरूप होना पड़ेगा।
इसका मतलब है कि आयातित रेडियो सिस्टम को भी भारतीय मानकों के अनुरूप इंटरऑपरेबल बनाया जाएगा।
तीनों सेनाओं में अलग-अलग एसडीआर
भारतीय नौसेना के पहले से ही डीआरडीओ और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा विकसित एसडीआर-Tac का उपयोग कर रही है। यह सिस्टम कई नौसैनिक प्लेटफॉर्म पर सक्रिय है।
थलसेना के लिए विकसित मैनपैक एसडीआर के फील्ड ट्रायल पूरे हो चुके हैं। बीईल द्वारा संचालित यह परियोजना अब इंडक्शन के अंतिम चरण में है।
वहीं भारतीय वायुसेना अभी भी कई विदेशी रेडियो सिस्टम पर निर्भर है। इसलिए नया आईएएफ एसडीआर कार्यक्रम विशेष महत्व रखता है। (IRSA 2.0)
विदेशी सिस्टम पर निर्भरता कम करने की कोशिश
भारत लंबे समय से कई आयातित रेडियो सिस्टम का इस्तेमाल करता रहा है। विदेशी सिस्टम के साथ सबसे बड़ी समस्या वेंडर लॉक-इन होती है। स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर अपडेट, तकनीकी सहायता और एन्क्रिप्शन पर नियंत्रण मूल निर्माता के पास रहता है।
IRSA के जरिए भारत अपना वेवफॉर्म, अपना एन्क्रिप्शन और अपना सर्टिफिकेशन विकसित कर रहा है। इससे संचार प्रणाली पर राष्ट्रीय नियंत्रण मजबूत होगा। (IRSA 2.0)
अभी भी बाकी हैं कई चुनौतियां
हालांकि IRSA 2.0 महत्वपूRर्ण कदम है, लेकिन इसके सामने कई तकनीकी चुनौतियां भी हैं।
देश में बीईएल, अल्फा डिजाइन, कोरएल और अन्य कंपनियां अलग-अलग रेडियो प्लेटफॉर्म विकसित कर रही हैं। सफलता तभी मानी जाएगी जब एक कंपनी का वेवफॉर्म दूसरी कंपनी के रेडियो पर बिना बड़े बदलाव के काम करे।
इसके अलावा मौजूदा रेडियो बेड़े को नए मानकों के अनुरूप अपग्रेड करना भी बड़ा काम होगा। इसके लिए सर्टिफिकेशन लैब, वेवफॉर्म लाइब्रेरी और टेस्टिंग फ्रेमवर्क की जरूरत पड़ेगी। (IRSA 2.0)
200 years of Gunners Day 2026: From Kargil to Operation Sindoor, How Indian Artillery Evolved Into a High-Tech Precision Strike Force. (AI Image)
Indian Artillery Gunners Day 2026: भारत की सैन्य ताकत की बात होती है तो अक्सर फाइटर जेट, टैंक और मिसाइलों का जिक्र होता है। लेकिन युद्ध के मैदान में एक ऐसी ताकत भी है जो दुश्मन को दिखाई दिए बिना उसके ठिकानों पर सटीक हमला करती है। यह ताकत है भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी, जिसे आम भाषा में तोपखाना कहा जाता है। आर्टिलरी को गॉड ऑफ वॉर” भी कहा जाता है। 28 सितंबर को भारतीय सेना का तोपखाना अपना 200वां गनर्स डे मना रहा है। यह सिर्फ एक सैन्य परंपरा का दिन नहीं, बल्कि दो सदियों की उस विरासत का प्रतीक है जिसने भारत के लगभग हर बड़े सैन्य अभियान में अहम भूमिका निभाई है।
हाल के सालों में कारगिल युद्ध और ऑपरेशन सिंदूर में आर्टिलरी ने एक बार फिर दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में आर्टिलरी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। आज आर्टिलरी सिर्फ भारी तोपों तक सीमित नहीं है। यह ड्रोन, रडार, सैटेलाइट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन गाइडेड गोला-बारूद से जुड़ा एक हाई-टेक नेटवर्क बन चुकी है।
Indian Artillery Gunners Day 2026: 28 सितंबर आर्टिलरी के लिए क्यों है खास?
भारतीय सेना में हर साल 28 सितंबर को गनर्स डे मनाया जाता है। इसी दिन साल 1827 में 5 (बॉम्बे) माउंटेन बैटरी का गठन किया गया था। इसे भारतीय आर्टिलरी की आधुनिक परंपरा की शुरुआत माना जाता है।
उस समय इस यूनिट के पास 2.5 इंच की माउंटेन गन थीं। पहाड़ी इलाकों में इन्हें जानवरों की मदद से ले जाया जाता था। यही यूनिट आगे चलकर भारतीय तोपखाने की ऐतिहासिक पहचान का आधार बनी। साल 2026 और भी विशेष है क्योंकि यह उस ऐतिहासिक स्थापना की 200वीं वर्षगांठ है।
भारत में तोपखाने का इतिहास 1827 से भी पुराना
हालांकि आधुनिक आर्टिलरी की परंपरा 1827 से जुड़ी है, लेकिन भारत में तोपों का इस्तेमाल इससे कई सदियों पहले शुरू हो चुका था।
दक्कन के बहमनी शासकों ने युद्ध में बारूद आधारित तोपों का इस्तेमाल किया था। इसके बाद मुगल साम्राज्य ने तोपखाने को अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। मराठा सेना, हैदर अली और टीपू सुल्तान की सेनाओं तथा महाराजा रणजीत सिंह की फौजों ने भी तोपखाने को मजबूत किया।
उस दौर की तोपें भारी होती थीं और उनकी मारक क्षमता सीमित थी। फिर भी उन्होंने युद्ध की रणनीति बदली क्योंकि पहली बार सैनिक दूर बैठकर दुश्मन पर हमला कर सकते थे। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
ब्रिटिश काल में बदला तोपखाने का स्वरूप
ब्रिटिश शासन के दौरान तोपखाने का संगठन और अधिक व्यवस्थित हुआ। अलग-अलग तरह की आर्टिलरी यूनिट बनाई गईं, जिनमें फील्ड आर्टिलरी और माउंटेन आर्टिलरी प्रमुख थीं।
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने भारतीय सैनिकों की आर्टिलरी यूनिट्स पर कई प्रतिबंध लगाए। इसके बावजूद पहाड़ी इलाकों में कुछ आर्टिलरी युनिट्स काम करती रहीं।
20वीं सदी में परिस्थितियां बदलीं और भारतीय सैनिकों की भागीदारी बढ़ी। नई ट्रेनिंग व्यवस्था विकसित हुई, आधुनिक हथियार आए और आर्टिलरी सेना की बड़ी फॉरमेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
💥 Raksha Samachar extends warm greetings on the 200th Gunners’ Day! 🇮🇳
Today, we salute the brave men and women of the Regiment of Artillery, whose precision, professionalism and firepower have been at the heart of countless battlefield successes.
From traditional artillery guns… pic.twitter.com/YO2KUiVoef
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 28, 2026
भारतीय सेना में रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी
इन्फैंट्री की तरह इसमें पंजाब रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट या गोरखा रेजिमेंट जैसी अलग-अलग रेजिमेंटल पहचान नहीं होती। पूरी शाखा को सामूहिक रूप से रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी कहा जाता है। इसकी कॉम्बैट युनिट्स को भी “रेजिमेंट” कहा जाता है, जो साइज में लगभग एक बटालियन के बराबर होती हैं और आमतौर पर 18 तोपों या लॉन्चरों से लैस रहती हैं।
वर्तमान समय में भारतीय सेना के पास करीब 220 से 230 आर्टिलरी रेजिमेंट हैं। इनमें फील्ड रेजिमेंट, मीडियम रेजिमेंट, सेल्फ-प्रोपेल्ड रेजिमेंट, लाइट रेजिमेंट, रॉकेट रेजिमेंट, मिसाइल रेजिमेंट, सर्विलांस एंड टारगेट एक्विजिशन (SATA) रेजिमेंट और पैराशूट फील्ड रेजिमेंट शामिल हैं।
फील्ड और मीडियम रेजिमेंट पारंपरिक तोपखाने की रीढ़ मानी जाती हैं। इनमें 105 मिमी और 155 मिमी कैलिबर की तोपें शामिल हैं। इनमें मीडियम रेजिमेंट्स में तैनात एम777 अल्ट्रा लाइट हॉवित्जर भी शामिल हैं, जो विशेष रूप से पर्वतीय इलाकों के लिए हैं। इसका वजन कम होने के कारण इसे हेलीकॉप्टर से भी ले जाया जा सकता है। वहीं, फील्ड रेजिमेंट्स में सारंग और धनुष तोपें तैनात हैं।
धनुष तोप बोफोर्स तकनीक पर आधारित स्वदेशी सिस्टम है। इसकी मारक क्षमता पुरानी तोपों की तुलना में अधिक है।
वहीं, सारंग आर्टिलरी सिस्टम पुराने प्लेटफॉर्म का आधुनिक संस्करण है, जिसे अपग्रेड कर लंबी दूरी तक फायरिंग के लिए तैयार किया गया है।
जबकि सेल्फ-प्रोपेल्ड रेजिमेंट में 155 मिमी होवित्जर के-9 वज्रजैसी आधुनिक ट्रैक्ड गन सिस्टम तैनात हैं। रॉकेट रेजिमेंट लंबी दूरी तक भारी फायरपावर देने के लिए बनाई गई हैं, जबकि मिसाइल रेजिमेंट ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों को ऑपरेट करती हैं।
रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में सबसे पुरानी 5 (बॉम्बे) माउंटेन बैटरी है, इसके अलावा 2 (देराजत) माउंटेन बैटरी और 4 (हजारा) माउंटेन बैटरी भी भारतीय तोपखाने की सबसे पुरानी युनिट्स में शामिल हैं।
आधुनिक भारतीय आर्टिलरी ने 1965, 1971, में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 40 फील्ड रेजिमेंट को 1965 के असल उत्तर युद्ध के लिए जाना जाता है, जबकि 108 फील्ड रेजिमेंट ने कारगिल संघर्ष में अहम योगदान दिया था।
इसी रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है पिनाकामल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम। पिनाका को डीआरडीओ ने बनाया है और यह भारतीय सेना की रॉकेट आर्टिलरी क्षमता का प्रमुख आधार बन चुका है। यह पारंपरिक तोपों से अलग एक रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम है, जिसे विशेष रूप से रॉकेट रेजिमेंट्स में तैनात किया जाता है।
पिनाका का मुख्य उद्देश्य दुश्मन के बड़े इलाके में एक साथ भारी फायरपावर पहुंचाना है। इसे सैन्य भाषा में एरिया सैचुरेशन कहा जाता है। यह कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागकर दुश्मन के ठिकानों, कमांड पोस्ट, सैन्य जमावड़ों और लॉजिस्टिक केंद्रों को निशाना बना सकता है।
पिनाका के कई संस्करण सेवा में हैं। इनमें पिनाका एमके-1 और गाइडेड पिनाका प्रमुख हैं। गाइडेड पिनाका में बेहतर नेविगेशन और लक्ष्य भेदन क्षमता दी गई है, जिससे इसकी सटीकता और मारक दूरी दोनों बढ़ी हैं। यह सिस्टम भारतीय सेना को लंबी दूरी से तेज और प्रभावी फायर सपोर्ट उपलब्ध कराता है।
कारगिल युद्ध में दिखी आर्टिलरी की ताकत
भारतीय आर्टिलरी का मूल मंत्र है “सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल”। इसका अर्थ है “हर जगह सम्मान और गौरव”।
1999 का कारगिल युद्ध भारतीय आर्टिलरी के इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय माना जाता है।
पाकिस्तानी घुसपैठियों और सैनिकों ने ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में भारतीय सेना के लिए सीधी लड़ाई बेहद कठिन थी। इस दौरान बोफोर्स एफएच-77बी 155 मिमी होवित्जर ने निर्णायक भूमिका निभाई।
भारतीय तोपों ने दुश्मन की चौकियों, बंकरों और सप्लाई रूट्स को लगातार निशाना बनाया। कठिन पहाड़ी इलाकों में की गई इस फायरिंग ने जमीनी सैनिकों के लिए रास्ता तैयार किया।
उस दौरान आर्टिलरी का खौफ इतना जबरदस्त था कि पहाड़ों पर पाकिस्तानी चिल्लाते थे– हमें बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है। वो इतने डरे हुए थे कि अपनी पोजिशन छोड़ना ही बेहतर समझते थे।
खुद प्रसिद्ध पाकिस्तानी पत्रकार और लेखिका नसीम जेहरा ने अपनी पुस्तक फ्रॉम कारगिल टू द कूप में लिखा है कि भारतीय बोफोर्स तोपों ने युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनके अनुसार, भारतीय आर्टिलरी की लगातार गोलाबारी के चलते पाकिस्तानी ठिकानों पर भारी दबाव बना। ऊंचाई पर स्थित पोस्ट लगातार निशाने पर रहीं, सप्लाई लाइनें प्रभावित हुईं और सैनिकों का मनोबल भी कमजोर पड़ा। उन्होंने माना कि भारतीय तोपखाने ने युद्ध का रुख बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
(Indian Artillery Gunners Day 2026)
विदेशों में भी हुई स्टडी
कारगिल युद्ध में भारतीय आर्टिलरी (तोपखाना) की भूमिका का अध्ययन विदेशों में भी किया गया। कई विदेशी सैन्य विशेषज्ञों, शोध संस्थानों और विश्लेषकों ने भी इसे पहाड़ी युद्ध (माउंटेन वॉरफेयर) का महत्वपूर्ण उदाहरण माना है। अमेरिकी सेना और डिफेंस टेक्निकल इन्फॉर्मेशन सेंटर (DTIC) से जुड़े कुछ रिसर्च पेपर्स में कारगिल युद्ध का जिक्र किया गया है। इन रिपोर्टों का निष्कर्ष था कि ऊंचे और कठिन इलाकों में दुश्मन के मजबूत ठिकानों को नष्ट करने के लिए फील्ड आर्टिलरी बेहद महत्वपूर्ण होती है। शोधकर्ताओं ने कारगिल युद्ध की तुलना सोवियत संघ के अफगानिस्तान अभियान और बाद में अमेरिका के अफगानिस्तान अभियानों से भी की।
कारगिल युद्ध के अनुभवों के आधार पर भारत ने फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान (FARP) शुरू किया। इसके तहत 155 मिमी कैलिबर को भारतीय सेना की स्टैंडर्ड आर्टिलरी सिस्टम बनाने का फैसला लिया गया।
ऑपरेशन सिंदूर में भी महत्वपूर्ण रही भूमिका
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की आर्टिलरी ने ऐसी भूमिका निभाई, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई, लेकिन अभियान की सफलता में उसका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में मौजूद आतंकी ढांचों को निशाना बनाया।
इस संयुक्त अभियान में कुल 9 आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की गई। इनमें से दो बड़े और अंदर स्थित ठिकाने, मुरिदके में लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय और बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय, भारतीय वायुसेना ने निशाना बनाए। बाकी सात ठिकानों को भारतीय सेना के जिम्मे सौंपा गया, जहां आर्टिलरी ने सटीक प्रिसिजन स्ट्राइक कर उन्हें तबाह किया। ये लक्ष्य मुख्य रूप से नियंत्रण रेखा (एलओसी) से 6 से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे।
अभियान के दौरान सेना की एयर डिफेंस युनिट्स ने पूरे ऑपरेशन को सुरक्षा कवच प्रदान किया, जबकि आर्टिलरी ने मुख्य फायरपावर की जिम्मेदारी संभाली। इस मिशन में आधुनिक एम-777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपों का इस्तेमाल किया गया, जिनसे एम-982 एक्सकैलिबरप्रिसिजन-गाइडेड गोले दागे गए। इन गोलों की मारक क्षमता लगभग 40 किलोमीटर है और ये टारगेट को लगभग 2 मीटर की सटीकता से भेद सकते हैं। इसके अलावा बोफोर्स एफएच-77 और सोल्तम तोपों का भी इस्तेमाल किया गया।
ऑपरेशन में ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, टागरेट की पहचान और फायर डायरेक्शन के लिए भी किया गया। इससे गन पोजिशन ऑफिसर्स को वास्तविक समय में जानकारी मिलती रही और टारगेट पर सटीक फायर संभव हो सका।
ऑपरेशन सिंदूर में 302 मीडियम रेजिमेंट ने भी इतिहास रचा। पहली बार इस रेजिमेंट की एम-777 तोपों को हेलीकॉप्टरों के जरिए एयर मोबिलाइज किया गया। चिनूक और एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की मदद से इन तोपों को तेजी से नॉर्दर्न कमांड के ऑपरेशनल क्षेत्र में पहुंचाया गया। इस तैनाती और नेतृत्व के लिए रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल कोशांक लांबा को वीर चक्र से भी सम्मानित किया गया।
कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की ओर से हुई गोलाबारी का जवाब भी भारतीय आर्टिलरी ने प्रभावी तरीके से दिया। एलओसी के पार स्थित कई बंकरों और फायरिंग पोजिशनों को गोलाबारी से नष्ट किया गया। उस समय के डायरेक्टर जनरल आर्टिलरी लेफ्टिनेंट जनरल आदोष कुमार ने कहा था कि भारतीय सेना के स्वदेशी और आधुनिक हथियारों ने दुश्मन के आयातित हथियारों को प्रभावी रूप से निष्क्रिय कर दिया।
ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि भारतीय आर्टिलरी अब केवल पारंपरिक “सपोर्ट आर्म” नहीं रह गई है। आधुनिक प्रिसिजन गोला-बारूद, एम-777 हॉवित्जर, ड्रोन इंटीग्रेशन और तेज एयर मोबिलिटी जैसी क्षमताओं के कारण आर्टिलरी ने सीधे लक्ष्य भेदने वाली “प्रिसिजन स्ट्राइक आर्म” की भूमिका निभाई। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
नेटवर्क सेंट्रिक सिस्टम का हिस्सा
आर्टिलरी का नाम सुनते ही अक्सर बड़ी-बड़ी तोपों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन आधुनिक युद्ध में आर्टिलरी केवल गन सिस्टम नहीं रह गई है।
पुराने समय में फायरिंग के लिए गणनाएं हाथ से की जाती थीं। टारगेट देखने के लिए सैनिकों को ऊंची जगहों पर तैनात किया जाता था। कम्युनिकेशन के लिए आधुनिक रेडियो या सैटेलाइट जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं।
आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारतीय सेना के पास 155 मिमी श्रेणी की आधुनिक तोपें हैं जो कई दर्जन किलोमीटर दूर तक सटीक हमला कर सकती हैं।
आज एक फायर मिशन को सफल बनाने के लिए ऑब्जर्वेशन पोस्ट, सर्विलांस सिस्टम, रडार, कम्युनिकेशन नेटवर्क, मौसम संबंधी डेटा, ड्रोन और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम की जरूरत होती है।
दुश्मन का लक्ष्य पहले ड्रोन या सेंसर की मदद से खोजा जाता है। उसके बाद डिजिटल सिस्टम दूरी, दिशा, हवा की गति और अन्य आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं। फिर गन क्रू को फायरिंग डेटा भेजा जाता है।
इसके बाद कमांड सेंटर से फायरिंग का आदेश जारी होता है।
आधुनिक आर्टिलरी में गन क्रू, ऑब्जर्वर, ड्रोन ऑपरेटर, रडार एक्सपर्ट, कम्युनिकेशन टीम और लॉजिस्टिक स्टाफ सभी मिलकर काम करते हैं। यानी अब आर्टिलरी एक नेटवर्क सेंट्रिक सिस्टम बन चुकी है, जहां कई तकनीकें एक साथ काम करती हैं। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
लोइटिंग म्यूनिशन बन रहे हैं आर्टिलरी का हिस्सा
पहले आर्टिलरी के पास मुख्य रूप से दो बड़े हथियार थे, तोप और रॉकेट। अब इनके साथ लोइटिंग म्यूनिशन को तीसरे हथियार के रूप में शामिल किया जा रहा है। इसी सोच के तहत भारतीय सेना ने शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई यूनिटें बनाई हैं।
जहां तोपें 40 से 50 किलोमीटर तक बड़े पैमाने पर और अपेक्षाकृत कम लागत में फायर सपोर्ट देती हैं। वहीं पिनाका जैसे मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम इससे कहीं अधिक दूरी तक हमला कर सकते हैं। लेकिन बैटल फील्ड में कई ऐसे टारगेट होते हैं, जो लगातार अपनी जगह बदलते रहते हैं, जैसे एयर डिफेंस सिस्टम, मिलिट्री व्हीकल, कमांड पोस्ट या एम्युनिशन। ऐसे टारगेट्स पर तुरंत और सटीक हमला करने के लिए एक नए विकल्प की जरूरत महसूस की जा रही थी।
लोइटिंग म्यूनिशन यह जरूरतें पूरी करते हैं। यह एक ऐसा ड्रोन है जो टारगेट एरिया के ऊपर लंबे समय तक उड़ सकता है, निगरानी कर सकता है और टारगेट की पुष्टि होने के बाद सीधे उस पर हमला कर सकता है। इसमें सेंसर और हथियार दोनों एक ही प्लेटफॉर्म में मौजूद होते हैं। इसी वजह से सेना ने इसे सीधे आर्टिलरी कमांडरों के कंट्रोल में रखा है, ताकि उन्हें इन्फैंट्री या वायुसेना के संसाधनों का इंतजार न करना पड़े।
शक्तिबाण रेजिमेंट को इसीलिए तैयार किया गया है। शक्तिबाण का अर्थ है “शक्ति का बाण”। यह रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के भीतर बनाई गई नई ड्रोन-फोकस्ड यूनिट है। इसका एलान जुलाई 2025 में कारगिल विजय दिवस के अवसर पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया था।
शक्तिबाण रेजिमेंट पारंपरिक आर्टिलरी रेजिमेंट से अलग है। सामान्य तौर पर एक आर्टिलरी रेजिमेंट में तोपें मुख्य हथियार होती हैं, लेकिन शक्तिबाण में मुख्य भूमिका ड्रोन और लोइटिंग म्यूनिशन निभाते हैं।
प्रत्येक शक्तिबाण रेजिमेंट में तीन बैटरियां हैं, इनमें से दो बैटरियां मध्यम और लंबी दूरी के लोइटिंग म्यूनिशन ऑपरेट करेंगी, जबकि तीसरी बैटरी स्वार्म ड्रोन और आरपीएएस यानी रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम से लैस होगी। कुछ फॉरमेशंस में काउंटर-ड्रोन क्षमताओं को भी शामिल किया जा रहा है।
सेना की योजना 15 से 20 शक्तिबाण रेजिमेंट खड़ी करने की है। इन्हें विशेष रूप से स्ट्राइक फॉर्मेशन और माउंटेन स्ट्राइक कोर के साथ तैनात किया जाएगा।
शक्तिबाण रेजिमेंट का मुख्य उद्देश्य 50 किलोमीटर से 500 किलोमीटर के बीच की दूरी वाले टारगेटों पर सटीक हमला करना है। यह वह क्षेत्र है जहां पारंपरिक तोपों की पहुंच सीमित हो जाती है, जबकि ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल महंगा पड़ता है। ऐसे में लोइटिंग म्यूनिशन एक प्रभावी और किफायती विकल्प हैं।
वहीं, दिव्यास्त्र बैटरी को शक्तिबाण रेजिमेंट से अलग है। जहां शक्तिबाण पूरी तरह ड्रोन और लोइटिंग म्यूनिशन आधारित नई रेजिमेंट है, वहीं दिव्यास्त्र बैटरी मौजूदा आर्टिलरी रेजिमेंटों के भीतर बनाई जा रही एक विशेष हाइब्रिड यूनिट है।
इसमें पारंपरिक तोपों के साथ ड्रोन और लोइटिंग म्यूनिशन भी शामिल रहते हैं। यानी एक ही बैटरी निगरानी, टारगेट पहचान, फायर करेक्शन और सटीक हमले जैसे कई काम कर सकती है।
पहले चरण में कम से कम पांच आर्टिलरी रेजिमेंट्स में एक-एक दिव्यास्त्र बैटरी बनाई जा रही है। भविष्य में इनकी संख्या और बढ़ाई जा सकती है। इनका प्रमुख कार्य बैटलफील्ड की निगरानी करना, टारगेट्स को ट्रैक करना, तोपखाने की गोलाबारी को अधिक सटीक बनाना और हमले के बाद नुकसान का आकलन करना है।
दरअसल सेना लोइटिंग म्यूनिशन को आर्टिलरी की “आंख और चाकू” के रूप में देख रही है। ड्रोन टारगेट खोजेंगे, लोइटिंग म्यूनिशन सटीक हमला करेगा और जरूरत पड़ने पर पारंपरिक तोपें बड़े पैमाने पर फायर सपोर्ट देंगी। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
रडार और सेंसर बने नई ताकत
आधुनिक आर्टिलरी में वेपन लोकेटिंग रडार का विशेष महत्व है। ये रडार दुश्मन की तोप से निकले गोले की दिशा देखकर उसकी लोकेशन का पता लगा सकते हैं।
इससे भारतीय सेना तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकती है। इसके अलावा ग्राउंड सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम और सैटेलाइट डेटा भी आर्टिलरी नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड सिस्टम टारगेट सिलेक्शन, डेटा एनालिसिस और फायरिंग सॉल्युशन तैयार करने में मदद कर रहे हैं। (Indian Artillery Gunners Day 2026)
Indian Army To Install Anti-Drone Screen Over Military Buildings In Jaisalmer After Operation Sindoor. (AI Image)
Indian Army Anti-Drone Shield: सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना अब अपने महत्वपूर्ण सैन्य भवनों को ड्रोन खतरों से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा कवच लगाने जा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी सीमा पर बड़ी संख्या में ड्रोन गतिविधियां सामने आने के बाद सेना ने महत्वपूर्ण इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने का फैसला किया है। जिसके तहत मौजूदा इमारतों के ऊपर एंटी-ड्रोन स्क्रीन लगाई जाएगी। जिसकी शुरुआत जैसलमेर मिलिट्री स्टेशन से की जा रही है।
सदर्न कमांड के तहत भारतीय सेना की 53 इंजीनियर रेजिमेंट इस प्रोजेक्ट को संभालेगी। करीब 6.34 करोड़ रुपये की इस प्रोजेक्ट के तहत सैन्य परिसरों की छतों को ऐसे मजबूत सुरक्षा ढांचे से कवर किया जाएगा, जो किसी भी संदिग्ध ड्रोन को भवन तक पहुंचने से पहले रोक सके।
Indian Army Anti-Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदला सुरक्षा का नजरिया
7 मई 2025 को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस अभियान के दौरान भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और अन्य हवाई माध्यमों का उपयोग करने की कोशिशें सामने आईं।
राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और श्रीगंगानगर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में कई संदिग्ध ड्रोन गतिविधियों की रिपोर्ट मिली थी। बीएसएफ राजस्थान फ्रंटियर के सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राजस्थान के चार जिलों में कुल 413 ड्रोन हमलों या घुसपैठ की कोशिशों को भारतीय सुरक्षा बलों ने विफल किया था।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि खतरा केवल सीमा चौकियों या सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। अब ड्रोन सीधे भवनों, कमांड सेंटरों, स्टोरेज क्षेत्रों और प्रशासनिक परिसरों तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
तीन लेयर की एंटी-ड्रोन स्क्रीन?
सेना जिस सिक्योरिटी सिस्टम को बनाने जा रही है, वह कोई रडार या इलेक्ट्रॉनिक जैमर नहीं है। यह एक मजबूत फिजिकल सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसे इमारतों के ऊपर बनाया जाएगा।
इस स्ट्रक्चर में स्टील के खंभे, बीम और मजबूत फ्रेम लगाए जाएंगे। इनके ऊपर तीन अलग-अलग परतों वाली स्टील जाली बिछाई जाएगी। पहली लेयर इंटरवोवन स्टील मेश होगी, जबकि दूसरी और तीसरी परत कॉर्कस्क्रू स्टील नेट की होगी।
इन तीनों परतों के बीच उचित दूरी रखी जाएगी ताकि यदि कोई ड्रोन पहली जाली से टकराकर आगे बढ़ने की कोशिश करे तो दूसरी और तीसरी लेयर उसे रोक सकें। सैन्य भाषा में इसे “स्टेज्ड इंटरसेप्शन” कहा जाता है।
इसका उद्देश्य ड्रोन को भवन की छत तक पहुंचने से पहले ही निष्क्रिय करना है। (Indian Army Anti-Drone Shield)
रेगिस्तानी इलाके को ध्यान में रखकर तैयार होगा डिजाइन
जैसलमेर का इलाका अत्यधिक गर्मी, तेज हवाओं और धूल भरी आंधियों के लिए जाना जाता है। इसी वजह से एंटी-ड्रोन स्क्रीन का डिजाइन सामान्य स्ट्रक्चर्स से अलग होगा। पूरे स्ट्रक्चर को उच्च तापमान, तेज हवा और रेत के दबाव को सहने लायक बनाया जाएगा। स्टील पर विशेष एंटी-कोरोजन कोटिंग की जाएगी ताकि जंग न लगे।
इसके अलावा बाहरी हिस्से को ऐसे रंग और फिनिश दी जाएगी, जिससे यह आसपास के रेगिस्तानी वातावरण में आसानी से घुल-मिल जाए। इससे स्ट्रक्चर दूर से कम दिखाई देगी और सैन्य परिसरों की पहचान सीमित रहेगी। (Indian Army Anti-Drone Shield)
ड्रोन क्यों बन गए हैं बड़ी चुनौती?
पिछले कुछ सालों में दुनिया भर के युद्धों ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं। कम कीमत वाले क्वाडकॉप्टर ड्रोन अब हाई-रिजोल्यूशन कैमरों, जीपीएस सिस्टम और विस्फोटक ले जाने की क्षमता के साथ उपलब्ध हैं। इनका उपयोग निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, हथियार पहुंचाने और हमले करने तक में किया जा रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और दक्षिण एशिया की सुरक्षा चुनौतियों ने यह साबित किया है कि छोटे ड्रोन अब आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां भी पिछले कुछ सालों में सीमा पार से आने वाले ड्रोन, हथियारों की तस्करी और निगरानी गतिविधियों के कई मामलों का सामना कर चुकी हैं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
पश्चिमी सीमा पर लगातार मिल रहे ड्रोन
रक्षा मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों के सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार 2025 के दौरान पश्चिमी सीमा पर 863 ड्रोन घुसपैठ की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से ज्यादातर पंजाब-राजस्थान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर थीं।
इनमें से 237 ड्रोन को बरामद या निष्क्रिय किया गया। कई मामलों में ड्रोन का उपयोग नशीले पदार्थ, हथियार और अन्य सामग्री पहुंचाने के लिए किया गया था।
राजस्थान सीमा क्षेत्र में भी कई संदिग्ध ड्रोन बरामद हुए। अगस्त 2025 में जैसलमेर के पास एक चीनी निर्मित ड्रोन मिलने की खबरें सामने आई थीं। (Indian Army Anti-Drone Shield)
निर्माण से पहले होगी तकनीकी जांच
प्रोजेक्ट के तहत केवल जाली लगाना ही नहीं बल्कि पूरा इंजीनियरिंग डिजाइन तैयार करना भी कॉन्ट्रैक्टर की जिम्मेदारी होगी। मिट्टी की जांच, स्ट्रक्चरल डिजाइन, मैटेरियल की सप्लाई, फ्रेम निर्माण, जाल स्थापना और अंतिम परीक्षण का काम एक ही एजेंसी करेगी।
सेना ने यह भी तय किया है कि डिजाइन को किसी आईआईटी या एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान से सत्यापित कराया जाएगा ताकि स्ट्रक्चर की मजबूती सुनिश्चित की जा सके। (Indian Army Anti-Drone Shield)
How Military Medicine Shaped an Army Doctor’s Life, Leadership and Service. (AI Image)
When I entered the world of medicine, I imagined that my professional life would be defined by patients, hospital wards, clinical decisions and perhaps, with time, a postgraduate qualification. I never thought that medicine would one day take me into operational areas, teach me lessons in leadership, place me alongside soldiers in difficult circumstances, and eventually make me responsible not merely for individual patients but also for aspects of a healthcare system.
Looking back after more than two decades in uniform, I sometimes wonder whether I chose this journey or whether, in some quiet way, it had begun choosing me much earlier. As a seven-year-old boy, my role model was not a film star or a fictional superhero. It was my maternal uncle, a soldier of 5 Rajput Regiment and a veteran of Operation Pawan. I listened with fascination to his stories of military service, particularly his experiences after the mandatory commando training at Belagavi. To a young boy, these were stories of courage and adventure. Only much later did I understand the deeper qualities behind them—discipline, endurance and a sense of purpose.
From Medical College to the Armed Forces Medical Services
Life, however, first took me towards medicine. Like thousands of young doctors, I spent years studying, working in hospitals and thinking about the conventional milestones of a medical career. I believed my future would unfold within hospital corridors.
The final push towards the Armed Forces came from my father. Perhaps he recognised something in me that I had not fully recognised myself. He encouraged me to explore the Armed Forces Medical Services and helped me initiate my application for a Short Service Commission.
The Day the Olive-Green Uniform Changed Everything
When the call eventually came, another journey began. I still remember the significance of wearing the olive-green uniform for the first time. The stethoscope around my neck had not changed, but somehow its meaning had. I was still a doctor, but medicine now carried an additional responsibility—to care for those who had accepted the responsibility of defending the nation.
Initially, I thought of myself simply as a doctor in uniform. It took the Army to teach me the difference between a doctor in uniform and a doctor-officer.
Lessons Beyond Medical Textbooks
Medical college had taught me anatomy, physiology, pathology and finally clinical medicine as well as surgery. Military life began teaching me things that were more difficult to find in textbooks: accountability, teamwork, adaptability, composure and leadership.
Learning Leadership in Jammu and Kashmir
The real classroom, however, came during my first posting, with a Rashtriya Rifles unit in Jammu and Kashmir. Within the first few months, a soldier was brought to our medical facility late at night with a gunshot injury involving his index finger. The situation required immediate assessment and intervention. My earlier exposure to surgery and orthopedics helped me stabilise him before evacuation to a higher medical centre.
A few weeks later, another soldier arrived with a bullet injury to his thigh. Again, resources were limited and decisions had to be made quickly. Those incidents taught me something that has stayed with me ever since: confidence during an emergency is rarely created in the moment of crisis. It is built quietly through preparation long before the crisis arrives.
A Wrong Turn That Became a Lifelong Lesson
Yet one of my most valuable lessons from that tenure came not from something I did correctly, but from a mistake. We once received information about two suspected poisoning cases at a company location several kilometres away. An ambulance was prepared and we moved immediately.
Somewhere along the route, uncertainty about the direction resulted in a wrong turn. By the time we could have reached the location, the casualties had already been evacuated by helicopter.
I returned expecting criticism. My Commanding Officer did something far more useful. He explained that in an operational environment, knowing medicine was not enough. I also needed to know the terrain. I was subsequently made to physically familiarise myself with company locations and routes.
What initially felt like corrective action became an enduring lesson in leadership. A good leader does not merely identify a mistake; he converts it into learning.
Leadership Lessons From Soldiers and Commanders
The Army also gave me teachers who never entered a medical college. One of them was an infantry officer and company commander in the Rashtriya Rifles Battalion with which I served.
He was physically fit, disciplined and professionally demanding, but what impressed me equally was his intellectual curiosity and composure. During one operational movement, our team had to cross a fast-flowing mountain stream. We negotiated it methodically, each person supporting the one ahead.
On another occasion, I watched his calm handling of a dangerous situation involving the evacuation of a civilian doctor.
Such experiences gradually changed my understanding of leadership. Authority may come with rank and appointment. Leadership does not. Leadership has to be earned through competence, conduct and the confidence one creates in others.
What Soldiers Taught Me About Courage and Trust
Soldiers themselves became some of my greatest teachers. Medical textbooks teach disease. Hospitals teach treatment. Soldiers often teach character.
I saw men continue their duties despite difficult terrain, extreme weather, prolonged separation from their families and operational uncertainty. Their resilience was humbling.
It also made me understand that courage is not always dramatic. Sometimes courage is simply continuing to do one’s duty when circumstances are difficult and nobody is watching.
Above all, soldiers taught me the meaning of trust. A soldier who approaches his medical officer when ill or injured brings more than a clinical problem. He brings the expectation that someone will know what to do.
From Operational Medicine to Healthcare Administration
Over the years, my postings changed. Operational medicine gave way at different times to military hospitals, administrative responsibilities and eventually veteran healthcare.
In the Ex-Servicemen Contributory Health Scheme (ECHS), I began looking at healthcare from an entirely different perspective. Instead of examining only an individual patient, I sometimes found myself examining patterns in healthcare data—unusual expenditure, admission patterns or other variations that might require closer scrutiny.
For a doctor trained in diagnosis, the similarity was striking. A symptom does not prove a disease; it tells us where to look more carefully.
Protecting the Integrity of Military Healthcare
In the same way, an unusual data pattern does not establish wrongdoing. It raises a question.
I learnt to apply a familiar medical principle to administration: observe carefully, analyse objectively and never confuse suspicion with proof.
The uniform had first taught me to care for individual patients. Years later, it was teaching me that professional responsibility could also mean protecting the integrity of a healthcare system.
Serving Veterans With Dignity and Respect
Working with veterans added another dimension. A veteran may have removed his uniform years ago, but his relationship with the institution does not disappear with retirement.
Behind every beneficiary is a history of service, separation, hardship and sacrifice. For many veterans, military healthcare represents a continuation of the trust they once placed in the organisation while serving.
That deserves to be treated with dignity.
Why Military Medicine Is Different
These experiences have also made me think about young doctors deciding what to do with their lives.
Military medicine should never be romanticized. Uniformed service involves difficult postings, separation, mobility, uncertainty and occasions when personal convenience must give way to organisational requirements.
But neither should it be seen merely as another employment option for a medical graduate.
Few medical careers allow a doctor to move so naturally between clinical medicine, operational environments, leadership, administration, preventive healthcare and the care of veterans.
The Journey From Doctor to Doctor-Officer
A young doctor entering the Armed Forces may believe that medicine will define his identity. Slowly, almost without noticing it, the uniform adds other dimensions—responsibility, resilience, accountability and a larger sense of service.
That is what happened to me.
I entered the Armed Forces as a doctor who happened to wear a uniform. Somewhere along the journey, I became a doctor-officer.
The distinction may appear small. To me, it represents more than two decades of learning.
Why I Remain Purely in Love With My Uniform
Today, when I look at the olive-green uniform, I no longer see merely the uniform I was once excited to wear.
I see the seven-year-old boy listening to his uncle’s stories.
I see the young doctor beginning an uncertain military career.
I see soldiers brought into a medical room in the middle of the night.
I see a wrong road in Kashmir that eventually taught me the right lesson.
I see commanders who demonstrated that leadership is not about how loudly one gives orders, but how much confidence one’s presence creates.
I see military families, hospitals and veterans who reminded me that healthcare is ultimately built on trust.
And I see a profession that gradually became something larger than the career I had originally imagined.
Medicine gave me the ability to heal. The Army taught me responsibility. Soldiers taught me resilience. Leadership taught me accountability. And the uniform brought all of them together into a sense of purpose.
Perhaps that is why, after more than two decades, I remain “purely in love with my uniform”.
Not because the journey has always been easy, but because of what the journey has made of me.
Indian Army Launches Modernisation of 12 Regional Ordnance Depots to Upgrade Logistics and Supply Chain Network. (AI Image)
Indian Army Ordnance Depots Modernisation: भारतीय सेना ने देशभर में मौजूद अपने 12 रीजनल ऑर्डनेंस डिपो (आरओडी) के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सेना मुख्यालय के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ऑर्डनेंस सर्विसेज की तरफ से एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी कर इंडस्ट्री पार्टनर्स और कंसल्टेंट्स से प्रस्ताव मांगे हैं। इन डिपो को आधुनिक वेयरहाउसिंग, ऑटोमेशन, सिक्योरिटी और डिजिटल लॉजिस्टिक्स सिस्टम से लैस किया जाएगा।
सेना के अनुसार ये डिपो लगभग 60 साल पुराने हैं और बदलती जरूरतों के अनुसार अब इन्हें नई तकनीकों से अपग्रेड करना जरूरी हो गया है। यह कदम भारतीय सेना की सप्लाई चेन को अधिक तेज, सुरक्षित और कुशल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Indian Army Ordnance Depots Modernisation: सेना की लॉजिस्टिक्स चेन की अहम कड़ी हैं ऑर्डनेंस डिपो
रीजनल ऑर्डनेंस डिपो भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन डिपो का काम विभिन्न मिलिट्री स्टोर्स, उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और अन्य सामग्री को प्राप्त करना, सुरक्षित रखना, उनका रिकॉर्ड बनाए रखना और जरूरत के अनुसार फील्ड फॉर्मेशनों तक पहुंचाना होता है।
ये डिपो सेना की रणनीतिक और सामरिक जरूरतों के अनुसार सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। हालांकि ऑर्डनेंस डिपो और एम्युनिशन डिपो अलग-अलग होते हैं। ऑर्डनेंस डिपो में गोलियां, बम, रॉकेट, मिसाइल या विस्फोटक सामग्री नहीं रखी जाती। ऐसे हथियार और गोला-बारूद अलग सप्लाई चेन के जरिए ऑपरेट किए जाते हैं।
60 साल पुराने स्ट्रक्चर होंगे अपग्रेड
ईओआई डॉक्युमेंट में सेना ने कहा है कि मौजूदा समय में आधुनिक वेयरहाउसिंग तकनीक, सुरक्षा उपकरण और ऑटोमेटेड लॉजिस्टिक्स सिस्टम उपलब्ध हैं। ऐसे में पुराने ऑर्डनेंस इशेलॉन्स को आधुनिक बनाना जरूरी हो गया है।
दस्तावेज में कहा गया है, “बदलते समय और आधुनिक वेयरहाउसिंग तकनीकों की उपलब्धता को देखते हुए वेयरहाउसिंग, सुरक्षा, फायर प्रिवेंशन, टेलीकम्युनिकेशन, स्टोर हैंडलिंग और अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना आवश्यक है।”
सेना चाहती है कि इन डिपो में आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जाए ताकि बड़े पैमाने पर सामग्री का प्रबंधन तेज और सुरक्षित तरीके से हो सके। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
आधुनिक वेयरहाउसिंग पर रहेगा विशेष फोकस
आधुनिकीकरण योजना के तहत पुराने भवनों को फिर से डिजाइन किया जाएगा। नए कॉम्पैक्ट लेआउट के साथ स्पेस मैनेजमेंट को बेहतर बनाया जाएगा ताकि सीमित क्षेत्र में अधिक सामग्री सुरक्षित रूप से रखी जा सके।
वेयरहाउसिंग सुविधाओं को आधुनिक बनाया जाएगा और बल्क स्टोरेज तथा रिटेल स्टोरेज क्षेत्रों को अलग-अलग व्यवस्थित किया जाएगा। इससे रोजमर्रा के ऑपरेशन, सामग्री की पहचान, ट्रैकिंग तथा वितरण में आसानी होगी।
सेना का उद्देश्य ऐसा सिस्टम विकसित करना है जहां स्टोरेज और रिट्रीवल प्रक्रिया तेजी से पूरी हो सके और मानव श्रम पर निर्भरता कम हो।
ऑटोमेशन और स्मार्ट लॉजिस्टिक्स सिस्टम होंगे शामिल
नई योजना में ऑटोमेशन को विशेष महत्व दिया गया है। भारी पैलेट्स और बड़े आकार के सैन्य उपकरणों को स्थानांतरित करने के लिए आधुनिक मैटेरियल हैंडलिंग इक्विपमेंट लगाए जाएंगे।
इसके अलावा अलग-अलग लॉजिस्टिक्स मॉड्यूल्स को एकीकृत डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इससे स्टॉक मैनेजमेंट, इन्वेंट्री ट्रैकिंग और सप्लाई चेन मॉनिटरिंग रियल टाइम में संभव हो सकेगी।
सेना एक ऐसा इंटीग्रेटेड सिस्टम विकसित करना चाहती है जिसमें किसी भी सामग्री की उपलब्धता और उसकी स्थिति का पता तुरंत लगाया जा सके। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
सुरक्षा और निगरानी सिस्टम भी होगा अपग्रेड
आधुनिकीकरण के इस प्रोजेक्ट में सिक्योरिटी फ्रेमवर्क को भी पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा। इसके तहत अत्याधुनिक सर्विलांस सिस्टम, इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम और एक्सेस कंट्रोल तकनीक लगाई जाएगी।
सभी डिपो को एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से जोड़ा जाएगा। इससे किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत नजर रखी जा सकेगी और सुरक्षा प्रतिक्रिया समय कम होगा।
बढ़ती साइबर और फिजिकल सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फायर फाइटिंग सिस्टम भी होगा हाई-टेक
सेना ने आधुनिक फायर प्रिवेंशन और फायर फाइटिंग सिस्टम लगाने की भी योजना बनाई है। इसमें फायर मॉनिटरिंग, डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम शामिल होंगे।
वेयरहाउस में बड़ी मात्रा में सैन्य सामग्री और उपकरण रखे जाते हैं। ऐसे में आग लगने की किसी भी घटना को रोकने और तत्काल नियंत्रित करने के लिए एडवांस सिक्योरिटी सिस्टम डेवलप किया जाएगा।
इसके अलावा इलेक्ट्रिकल नेटवर्क, टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम, सिविल वर्क्स और क्षेत्रीय विकास कार्य भी परियोजना का हिस्सा होंगे। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
हर डिपो की जरूरत होगी अलग
सेना ने स्पष्ट किया है कि सभी 12 डिपो के लिए एक जैसी योजना लागू नहीं होगी। प्रत्येक डिपो की भूमिका, वहां रखी जाने वाली सामग्री, भौगोलिक स्थिति और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकताएं अलग होंगी।
इसी वजह से कंसल्टेंट्स को हर डिपो का विस्तृत अध्ययन करना होगा और उसके अनुरूप आधुनिकीकरण की योजना तैयार करनी होगी। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
360 दिनों में तैयार होगी विस्तृत रिपोर्ट
सेना ने विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने के लिए 360 दिनों का वक्त दिय है। इस दौरान विशेषज्ञ टीम प्रत्येक डिपो की प्रक्रियाओं, संचालन प्रणाली और मौजूदा बुनियादी ढांचे का अध्ययन करेगी।
डीपीआर में वर्तमान और भविष्य की स्टोरेज जरूरतों का मूल्यांकन किया जाएगा। साथ ही यह तय किया जाएगा कि अधिकृत इन्वेंट्री और भविष्य में आने वाली सामग्री के लिए कौन सा स्टोरेज और रिट्रीवल सिस्टम सबसे उपयुक्त रहेगा।
इसके अलावा बजट अनुमान, लागत प्रभाव और पूरे प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन की योजना भी इसी रिपोर्ट में शामिल की जाएगी। (Indian Army Ordnance Depots Modernisation)
DRDO Invites Industry Proposals For Electromagnetic Launcher Components, Boosting India's Indigenous Hypersonic Weapon Program (AI Image)
India Electromagnetic Railgun Program: भविष्य के बैटलफील्ड में गेम-चेंजर मानी जाने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन टेक्नोलॉजी पर भारत ने एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) लैब ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्सों बैरल प्लेटफॉर्म और ड्राइव्स के डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। रक्षा क्षेत्र में यह तकनीक भविष्य के हाइपरसोनिक हथियारों, लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता और आधुनिक नौसैनिक प्रणालियों के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
India Electromagnetic Railgun Program: क्या है इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर?
पारंपरिक तोपों में गोले को आगे बढ़ाने के लिए बारूद या कैमिकल प्रोपेलेंट का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्चर पूरी तरह अलग सिद्धांत पर काम करता है।
इस तकनीक में अत्यधिक इलेक्ट्रिक करेंट और शक्तिशाली चुंबकीय बल का इस्तेमाल किया जाता है। दो समानांतर रेलों के बीच लाखों एम्पीयर करंट प्रवाहित किया जाता है, जिससे लोरेंज फोर्स पैदा होती है। यही फोर्स प्रोजेक्टाइल को बेहद तेज रफ्तार से आगे धकेलता है।
इस प्रक्रिया में किसी विस्फोटक प्रोपेलेंट की जरूरत नहीं होती। एनर्जी सीधे पावर सिस्टम से आती है, जिससे प्रोजेक्टाइल बहुत अधिक रफ्तार प्राप्त कर सकता है। यही वजह है कि रेलगन को भविष्य की हाइपरसोनिक हथियार तकनीक के रूप में देखा जाता है।
डीआरडीओ ने पहले भी हासिल की है बड़ी सफलता
एआरडीई पिछले कई सालों से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन तकनीक पर काम कर रहा है। संगठन ने 10 मेगाजूल क्षमता वाला रेलगन सिस्टम डेवलप किया है।
इस सिस्टम की क्षमता लगभग एक किलोग्राम वजन वाले प्रोजेक्टाइल को 2000 मीटर प्रति सेकंड से अधिक रफ्तार देने की है। यह रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से कई गुना अधिक है।
अब डीआरडीओ का लक्ष्य शक्तिशाली 100 मेगाजूल क्षमता वाले सिस्टम का डेवलपमेंट करना है। इस स्तर का सिस्टम लगभग 50 किलोग्राम वजन के प्रोजेक्टाइल को करीब 200 किलोमीटर दूरी तक हाइपरसोनिक रफ्तार से लॉन्च कर सकता है।
यही कारण है कि बैरल प्लेटफॉर्म और ड्राइव्स जैसे महत्वपूर्ण सब-सिस्टम्स के डेवलपमेंट को कार्यक्रम का अगला बड़ा चरण माना जा रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
बैरल प्लेटफॉर्म क्यों है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा?
रेलगन का बैरल सामान्य तोप के बैरल जैसा नहीं होता। यह पूरे सिस्टम का सबसे संवेदनशील और तकनीकी रूप से जटिल हिस्सा होता है।
हर फायरिंग के दौरान रेलों के बीच अत्यधिक करंट प्रवाहित होता है। इससे बहुत अधिक गर्मी पैदा होती है और धातु पर भारी मेकेनिकल प्रेशर पड़ता है। लगातार इस्तेमाल के दौरान रेलों का घिसाव भी एक बड़ी समस्या बन जाता है।
इसी वजह से बैरल प्लेटफॉर्म को ऐसे डिजाइन और सामग्री से बनाना पड़ता है जो उच्च तापमान, अत्यधिक विद्युत प्रवाह और लगातार फायरिंग के दबाव को सह सके।
साथ ही प्रभावी थर्मल मैनेजमेंट भी जरूरी होता है ताकि सिस्टम का तापमान नियंत्रित रखा जा सके और उसकी कार्यक्षमता प्रभावित न हो। (India Electromagnetic Railgun Program)
ड्राइव्स की भूमिका भी बेहद अहम
ईओआई में जिन ड्राइव्स का उल्लेख किया गया है, वे लॉन्च सिस्टम की सटीकता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इनका काम प्रोजेक्टाइल की रफ्तार को कंट्रोल करना, लॉन्च प्रक्रिया को स्थिर बनाना और पूरे सिस्टम को निर्धारित दिशा में संचालित रखना होता है। हाइपरसोनिक रफ्तार पर मामूली गलती भी टारगेट पर बड़े अंतर का कारण बन सकती है। इसलिए ड्राइव सिस्टम का डिजाइन अत्यधिक सटीक होना जरूरी है।
मई 2025 में डीआरडीओ ने पुणे में सेंटर फॉर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी (सीईएमएएलटी) की स्थापना की थी। यह केंद्र विशेष रूप से रेलगन और अन्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम्स के रिसर्च एवं डेवलपमेंट के लिए बनाया गया है।
यहां पल्स पावर सप्लाई, आर्मेचर डिजाइन, बैरल इंजीनियरिंग, थर्मल मैनेजमेंट और एडवांस मैटेरियल साइंस जैसे क्षेत्रों में काम चल रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
भारत दो अलग-अलग तकनीकी रास्तों पर कर रहा काम
भारत में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी केवल रेलगन तक सीमित नहीं है। जहां एआरडीई रेलगन का डेवलपमेंट कर रहा है, वहीं गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (आईपीआर) भी इस क्षेत्र में काम कर रहा है।
मई 2026 में आईपीआर ने 8 किलोन्यूटन क्षमता वाले लीनियर इंडक्शन मोटर बेस्ड लॉन्चर का सफल प्रदर्शन किया था। यह सिस्टम लगभग 170 किलोग्राम वजन को 18 से 20 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार दे सकता है।
यह तकनीक भविष्य में नौसेना के विमानवाहक पोतों और औद्योगिक प्रणालियों में इस्तेमाली हो सकती है। (India Electromagnetic Railgun Program)
भारतीय नौसेना की भी है बड़ी रुचि
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी में भारतीय नौसेना की विशेष दिलचस्पी है। दुनिया के सबसे आधुनिक विमानवाहक पोतों में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (ईएमएएलएस) का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अमेरिका के फोर्ड क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर पर यह सिस्टम पहले से तैनात है। चीन ने भी अपने फुजियान विमानवाहक पोत में इसी तरह की तकनीक को शामिल किया है।
भारत भविष्य के इंडिजिनस एयरक्राफ्ट कैरियर-3 के लिए स्वदेशी ईएमएएलएस डेवलप करने की दिशा में काम कर रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
आसान नहीं हैं तकनीकी चुनौतियां
रेलगन तकनीक दुनिया की सबसे जटिल डिफेंस टेक्नोलॉजीज में गिनी जाती है। सबसे बड़ी चुनौती रेलों का तेजी से घिसना है। इसके अलावा विशाल पल्स पावर सिस्टम को कॉम्पैक्ट बनाना, एनर्जी स्टोरेज, कूलिंग सिस्टम और लगातार फायरिंग की क्षमता डेवलपमेंट करना भी मुश्किल काम है।
डीआरडीओ के मौजूदा 10 मेगाजूल सिस्टम में 25 मॉड्यूलर कैपेसिटर बैंक लगाए गए हैं। प्रत्येक बैंक की क्षमता लगभग 400 किलोजूल है। इन्हें लिथियम बैटरी बैंक और 15 किलोवाट डीजल जनरेटर की मदद से चार्ज किया जाता है। (India Electromagnetic Railgun Program)
उद्योग को सीधे जोड़ा जा रहा है
आमतौर पर डीआरडीओ किसी तकनीक का प्रोटोटाइप डेवलपमेंट करने के बाद उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों या निजी उद्योग को ट्रांसफर करता है। लेकिन इस बार बैरल प्लेटफॉर्म जैसे कॉम्प्लैक्स कंपोनेंट्स के लिए शुरुआती चरण में ही उद्योग से साझेदारी मांगी गई है।
चयनित कंपनियां डिजाइन, प्रोटोटाइप निर्माण, परीक्षण और अंतिम सप्लाई प्रक्रिया में भाग लेंगी। इससे देश में उच्च स्तरीय रक्षा विनिर्माण क्षमता डेवलपमेंट करने में मदद मिलेगी।
चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल होने की कोशिश
दुनिया में अमेरिका, चीन और कुछ यूरोपीय देश ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च टेक्नोलॉजी पर गंभीरता से काम कर रहे हैं। अमेरिका ने कुछ समय के लिए अपने रेलगन कार्यक्रम की रफ्तार धीमी की थी, लेकिन काउंटर-ड्रोन सिस्टम और स्पेस लॉन्च जैसे सेक्टर्स में इसके इस्तेमाल पर फिर से काम हो रहा है। चीन भी इस तकनीक में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। (India Electromagnetic Railgun Program)
Pakistan Tightens Security Ahead of PTI Protest, Islamabad Under Lockdown-Like Measures (AI Image)
PTI Protest Islamabad: इस्लामाबाद में 27 सितंबर होने वाले पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के प्रदर्शन से पहले ही पाकिस्तान की राजधानी को किले में तब्दील कर दिया गया है। राजधानी की ओर जाने वाले कई प्रमुख मार्ग बंद कर दिए गए हैं, अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है और प्रशासन ने अस्पतालों को भी अलर्ट मोड पर रखा है। इसी बीच सोशल मीडिया पर पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल नोमान जकरिया और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बीच अनबन की भी खबरें हैं, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
PTI Protest Islamabad: इस्लामाबाद की ओर जाने वाले प्रमुख मार्ग बंद
24 सितंबर से पहले पाकिस्तानने राजधानी की सुरक्षा को लेकर कई बड़े कदम उठाए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार पेशावर-इस्लामाबाद एम-1 मोटरवे को दोनों दिशाओं में यातायात के लिए बंद कर दिया गया है। यह बंदी इस्लामाबाद टोल प्लाजा से लेकर चच इंटरचेंज तक लागू की गई है।
इसके अलावा फतेह जंग, तरनोल, संगजानी, ब्रह्मा बहतर, बुरहान, हजारा मोटरवे, गाजी और चच इंटरचेंज जैसे प्रवेश और बाहर निकलने वाले रस्तों को भी बंद रखा गया है। एम-14 मोटरवे पर हकला से कुंदल तक यातायात रोक दिया गया है, ताकि विभिन्न शहरों से राजधानी की ओर लोगों की आवाजाही सीमित की जा सके।
स्थानीय प्रशासन का कहना है कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से उठाए गए हैं।
पुलिस और रेंजर्स की अतिरिक्त तैनाती
इस्लामाबाद कैपिटल टेरिटरी में पुलिसकर्मियों की सभी छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं। इसके साथ ही अतिरिक्त फेडरल कॉन्स्टेबुलरी और पाकिस्तान रेंजर्स को भी तैनात किया गया है। पंजाब गृह विभाग ने संघीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर रावलपिंडी, अटक, झेलम और मियांवाली जिलों में रेंजर्स की तैनाती का अनुरोध किया था। जारी अधिसूचना के अनुसार रेंजर्स 5 अक्टूबर 2026 तक इन क्षेत्रों में तैनात रहेंगे।
सुरक्षा एजेंसियां किसी भी बड़े जमावड़े या हिंसक स्थिति से निपटने की तैयारी में जुटी हुई हैं।
अस्पतालों को अलर्ट पर रखा गया
राजधानी में चिकित्सा तैयारियां भी बढ़ाई गई हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार इस्लामाबाद प्रशासन, कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी (सीडीए) और गृह मंत्रालय ने विभिन्न अस्पतालों को अतिरिक्त आपातकालीन बेड तैयार रखने के निर्देश दिए हैं।
कॉम्बाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल (सीएमएच), पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (पीआईएमएस) और शिफा इंटरनेशनल अस्पताल सहित कई प्रमुख चिकित्सा संस्थानों को इमरजेंसी मोड में रहने के लिए कहा गया है।
हालांकि अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से किसी विशेष खतरे की पुष्टि नहीं की है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की तैयारियों से स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
पीटीआई नेताओं पर कार्रवाई तेज
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने आरोप लगाया है कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गई है।
पार्टी के अनुसार खैबर पख्तूनख्वा के प्रांतीय मंत्रियों सैयद फखर जहां और रियाज खान के घरों पर पुलिस ने छापेमारी की। वहीं नेशनल असेंबली सदस्य मोहम्मद जुबैर खान वजीर को भी हिरासत में लिया गया।
पीटीआई का दावा है कि कई नेताओं को पहले से ही गिरफ्तार किया जा चुका है या पूछताछ के लिए हिरासत में रखा गया है। पार्टी ने इन कार्रवाइयों को राजनीतिक दबाव की रणनीति बताया है।
जुनैद अकबर के खिलाफ एफआईआर दर्ज
पीटीआई खैबर पख्तूनख्वा के अध्यक्ष जुनैद अकबर के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है। नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनसीसीआईए) ने उन पर इलेक्ट्रॉनिक क्राइम प्रिवेंशन एक्ट (पीईसीए) के तहत केस दर्ज किया है।
एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टिकटॉक और यूट्यूब पर ऐसे बयान साझा किए जो राज्य विरोधी माने गए। जांच एजेंसियां इस मामले की जांच कर रही हैं। (PTI Protest Islamabad)
Pakistan Tightens Security Ahead of PTI Protest, Islamabad Under Lockdown-Like Measures.
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जताई चिंता
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी पाकिस्तान में हालिया गिरफ्तारियों पर चिंता व्यक्त की है।
संगठन ने इमरान खान की बहनों अलीमा खान, उज़मा खान और नोरीन नियाजी सहित कई पीटीआई नेताओं और कार्यकर्ताओं की हिरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान सरकार से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन करने की अपील की है।
मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध!
पंजाब गृह विभाग ने कुछ क्षेत्रों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं को सीमित करने का प्रस्ताव भी भेजा है।
प्रस्ताव के अनुसार रावलपिंडी के कुछ हिस्सों, टैक्सिला और एम-1 मोटरवे के आसपास मोबाइल सिग्नल जैमिंग की जा सकती है। अटक जिले में इंटरनेट सेवाओं की गति कम करने पर भी विचार किया गया है।
पाकिस्तान में बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान संचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने की घटनाएं पहले भी देखी जा चुकी हैं। (PTI Protest Islamabad)
लेफ्टिनेंट जनरल नोमान जकारिया को लेकर वायरल दावे
सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल नोमान जकारिया और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बीच मतभेद हो गए हैं और जनरल जकारिया लंदन चले गए हैं।
हालांकि इस दावे की किसी आधिकारिक स्रोत, इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) या पाकिस्तानी मीडिया ने पुष्टि नहीं की है।
लेफ्टिनेंट जनरल नोमान जकारिया वर्तमान में पाकिस्तान सेना की 1 कॉर्प्स (मंगला) के कमांडर हैं। इससे पहले वे डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस और चीफ ऑफ लॉजिस्टिक्स स्टाफ जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुके हैं। (PTI Protest Islamabad)
पीटीआई और सेना के बीच जारी है टकराव
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान 2023 से जेल में हैं और उनकी पार्टी लगातार उनकी रिहाई की मांग कर रही है। 9 मई 2023 की घटनाओं के बाद सेना और पीटीआई के संबंधों में भारी तनाव आया था।
सितंबर 2026 में प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर पीटीआई और सरकार दोनों अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और विभिन्न सरकारी एजेंसियां हालात पर नजर बनाए हुए हैं। (PTI Protest Islamabad)
DRDO’s SAT-SAAW Will Give Indian Air Force Long-Range Precision Strike Capability Against Enemy Airbases. (Photo: PIB)
SAT-SAAW glide bomb: रक्षा मंत्रालय ने भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) के साथ 810.79 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत भारतीय वायुसेना के लिए 160 सैटेलाइट स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन (SAT-SAAW) खरीदे जाएंगे। डीआरडीओ का बनाया यह स्वदेशी प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम दुश्मन के एयरबेस, रनवे, बंकर और मिलिट्री स्ट्रक्चर को सुरक्षित दूरी से निशाना बनाने में सक्षम है। नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुए इस समझौते को भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
यह सौदा “बाय इंडियन – इंडिजेनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड” कैटेगरी के तहत किया गया है, जिसका मतलब है कि हथियार का डिजाइन, विकास और निर्माण भारत में ही होगा।
क्या है SAT-SAAW glide bomb?
SAT-SAAW यानी सैटेलाइट स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन एक प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम है। यह हवा से जमीन पर मार करने वाला ऐसा हथियार है, जिसे लड़ाकू विमान से छोड़ने के बाद यह बिना इंजन के अपने पंखों की मदद से टारगेट की ओर बढ़ता है।
इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के एयरबेस, रनवे, टैक्सी ट्रैक, एयरक्राफ्ट शेल्टर, कमांड सेंटर, बंकर और अन्य महत्वपूर्ण मिलिट्री स्ट्रक्चर्स को नष्ट करना है। यह हथियार लंबी दूरी से छोड़ा जा सकता है, जिससे हमला करने वाले विमान को दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज में जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
यही वजह है कि इसे स्टैंड-ऑफ वेपनकी श्रेणी में रखा जाता है। स्टैंड-ऑफ वेपन ऐसे हथियार होते हैं जिन्हें सुरक्षित दूरी से दागकर टारगेट को निशाना बनाया जाता है। (SAT-SAAW glide bomb)
कैसे काम करता है यह स्मार्ट हथियार?
SAT-SAAW को लड़ाकू विमान से रिलीज करने के बाद इसके फोल्डिंग विंग्स खुल जाते हैं। इसके बाद यह हवा में ग्लाइड करते हुए टारगेट की ओर बढ़ता है।
इस हथियार में सैटेलाइट नेविगेशन और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम लगातार इसकी स्थिति, दिशा और रफ्तार को मापता रहता है, जबकि सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सिस्टम इसे टारगेट तक पहुंचने में मदद करता है।
हथियार के अंदर मौजूद मिशन कंप्यूटर लगातार फ्लाइट पाथ की गणना करता है और जरूरी सुधार करता रहता है। इसके कारण यह टारगेट पर अत्यधिक सटीकता के साथ हमला कर सकता है। (SAT-SAAW glide bomb)
किन विमानों से किया जा सकता है लॉन्च?
भारतीय वायुसेना के कई प्लेटफॉर्म इस हथियार को इस्तेमाल कर सकते हैं। SAT-SAAW को जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे विमानों से लॉन्च किया जा सकता है। सुखोई-30 एमकेआई जैसे भारी लड़ाकू विमान एक मिशन में कई SAT-SAAW लेकर उड़ान भर सकते हैं।
इससे एक ही सॉर्टी के दौरान कई अलग-अलग टारगेट्स पर हमला कर सकते हैं। वायुसेना के मौजूदा बेड़े के साथ इसका इंटीग्रेशन एक बड़ी बात मानी जा रही है। (SAT-SAAW glide bomb)
🇮🇳🎯 Breaking: Major Firepower Boost for IAF: MoD Signs ₹811 Crore SAT-SAAW Contract with BDL…
Ministry of Defence has signed an Rs 810.79 crore contract with Bharat Dynamics Limited (BDL) for the procurement of 160 Satellite Smart Anti-Airfield Weapons (SAT-SAAW) for the… pic.twitter.com/LeHeRQZmio
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 23, 2026
एयरफील्ड पर हमला क्यों होता है महत्वपूर्ण?
किसी भी आधुनिक युद्ध में एयरबेस सबसे महत्वपूर्ण मिलिट्री एसेट्स में गिने जाते हैं। लड़ाकू विमान, फ्यूल स्टोरेज, हथियार डिपो, रडार नेटवर्क और कमांड सेंटर आमतौर पर एयरबेस से जुड़े होते हैं।
यदि किसी एयरफील्ड का रनवे क्षतिग्रस्त हो जाए तो वहां से विमान उड़ान नहीं भर सकते। इससे दुश्मन की एयर पावर पर सीधा असर पड़ता है।
SAT-SAAW को इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसकी मदद से रनवे पर गहरे गड्ढे बनाए जा सकते हैं या एयरबेस के महत्वपूर्ण बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता के कारण यह हथियार दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम से सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए ऑपरेशन को अंजाम देने में मदद करता है। (SAT-SAAW glide bomb)
ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के कई एयरबेस को बनाया था टारगेट
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई अहम एयरबेस को निशाना बनाया था। इनमें सरगोधा स्थित मुशफ एयरबेस भी शामिल था। इस हमले में भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का इस्तेमाल किया था। हमले के बाद सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में रनवे पर बड़े गड्ढे साफ दिखाई दिए थे। रनवे पर दो जगह बेहद सटीक हमला किया गया था। यह हमला इतना जबदस्त था कि सिंदूर के 16 महीने बाद इस साल सितंबर तक पाकिस्तान रनवे की पूरी तरह मरम्मत नहीं कर पाया था। पहले किए गए रिपेयर पैच भी हटाने पड़े और कई हिस्सों में दोबारा खुदाई करनी पड़ी।
ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस को सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से लॉन्च किया गया था।
अब भारतीय वायुसेना ने SAT-SAAW को शामिल किया है। हालांकि ब्रह्मोस और SAT-SAAW में मुख्य अंतर यह है कि ब्रह्मोस एक भारी, महंगी और लंबी दूरी की मिसाइल है, जबकि SAT-SAAW एक अपेक्षाकृत हल्का और कम लागत वाला ग्लाइड बम है। इसकी मारक क्षमता लगभग 100 किलोमीटर तक है और एक विमान इसे अधिक संख्या में लेकर जा सकता है। (SAT-SAAW glide bomb)
डीआरडीओ ने बनाया
इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डीआरडीओ ने इस हथियार को पूरी तरह भारतीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डेवलप किया है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार SAT-SAAW में लगभग 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ कई महत्वपूर्ण सब-सिस्टम का भी स्वदेशीकरण किया जा रहा है।
इनमें इनिशियल मेजरमेंट यूनिट, लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज और ट्विन स्टोर कैरियर जैसे प्रमुख उपकरण शामिल हैं।
इनिशियल मेजरमेंट यूनिट हथियार की स्थिति और दिशा का सटीक आकलन करती है। लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज टारगेट पर प्रभाव के बाद विस्फोट का समय कंट्रोल करता है। वहीं ट्विन स्टोर कैरियर की मदद से विमान एक साथ दो हथियार लेकर उड़ान भर सकता है।
वहीं, भारत डायनामिक्स लिमिटेड पहले से कई मिसाइल और हथियार प्रणालियों का उत्पादन कर रही है। अब SAT-SAAW का उत्पादन भी बीडीएल के जिम्मे होगा। (SAT-SAAW glide bomb)
कब तक मिलेगी वायुसेना को डिलीवरी?
रक्षा मंत्रालय के अनुसार इसकी डिलीवरी दो चरणों में होगी। पहला चरण वित्तीय वर्ष 2027-28 के दौरान पूरा किया जाएगा, जबकि शेष हथियारों की सप्लाई 2028-29 में की जाएगी।
160 हथियारों की यह खेप भारतीय वायुसेना को विभिन्न ऑपरेशनल जरूरतों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। इससे वायुसेना के पास पर्याप्त संख्या में प्रिसिजन गाइडेड एयर-टू-ग्राउंड हथियार मौजूद होंगे। (SAT-SAAW glide bomb)
Delhi High Court Seeks Centre’s Response Over Single Vacancy for Women in Territorial Army Officer Recruitment. (AI Image)
Territorial Army Women Recruitment: टेरिटोरियल आर्मी में अधिकारी भर्ती के दौरान पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग और असमान रिक्तियां तय किए जाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत में दायर एक जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि भर्ती प्रक्रिया में पुरुष उम्मीदवारों के लिए कहीं अधिक पद रखे जाते हैं, जबकि महिलाओं के लिए केवल एक पद निर्धारित किया जाता है। याचिका में इसे संविधान के समानता संबंधी प्रावधानों के खिलाफ बताया गया है।
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।
Territorial Army Women Recruitment: कुश कालरा ने दायर की जनहित याचिका
याचिकाकर्ता कुश कालरा ने अपनी याचिका में कहा है कि टेरिटोरियल आर्मी अधिकारी भर्ती में महिलाओं के लिए बहुत कम पद निर्धारित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 19(1)(जी) का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2018 में महिलाओं को टेरिटोरियल आर्मी में शामिल होने की अनुमति दिए जाने के बावजूद भर्ती प्रक्रिया में बराबरी नहीं दी जा रही है।
2018 के फैसले का दिया हवाला
याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के 5 जनवरी 2018 के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया गया है। उस मामले में अदालत ने टेरिटोरियल आर्मी से महिलाओं को बाहर रखने की व्यवस्था को असंवैधानिक करार दिया था।
अदालत ने उस समय कहा था कि टेरिटोरियल आर्मी एक्ट, 1948 की धारा 6 में इस्तेमाल किया गया शब्द “एनी पर्सन” पुरुष और महिला दोनों पर लागू होता है। इसके बाद महिलाओं के लिए टेरिटोरियल आर्मी के दरवाजे खुल गए थे। (Territorial Army Women Recruitment)
भर्ती विज्ञापनों में दिखा भेदभाव
याचिका में दावा किया गया है कि अदालत के 2018 के फैसले के बाद भी भर्ती प्रक्रिया में बड़ा अंतर बना हुआ है।
रिकॉर्ड के मुताबिक साल 2022 की भर्ती अधिसूचना में पुरुष उम्मीदवारों के लिए 12 पद और महिलाओं के लिए केवल 1 पद रखा गया था। वर्ष 2023 में पुरुषों के लिए 18 और महिलाओं के लिए 1 पद निर्धारित किया गया।
याचिका के मुताबिक 2025 में भी यही स्थिति रही। उस वर्ष पुरुष उम्मीदवारों के लिए 18 पद और महिला उम्मीदवारों के लिए सिर्फ 1 पद तय किया गया। इसके साथ ही पुरुष और महिला उम्मीदवारों की अलग-अलग मेरिट सूची तैयार की गई।
साल 2026 की भर्ती अधिसूचना में भी पुरुषों के लिए 11 पद और महिलाओं के लिए केवल 1 पद निर्धारित किया गया है। यहां भी अलग-अलग मेरिट ऑर्डर रखा गया है। (Territorial Army Women Recruitment)
समान अवसर देने की मांग
याचिकाकर्ता का कहना है कि महिलाओं को केवल एक पद तक सीमित करना वास्तविक अवसर देने के बजाय केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। याचिका में इसे “टोकनिज्म” बताया गया है।
याचिका के अनुसार इस तरह की व्यवस्था उस भेदभाव को जारी रखती है, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। अलग-अलग और अत्यधिक असमान रिक्तियों की व्यवस्था महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार को प्रभावित करती है। (Territorial Army Women Recruitment)
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के अर्शनूर कौर मामले का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में सैन्य भर्ती में लैंगिक समानता के सिद्धांत को दोहराया था।
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब महिलाओं को सशस्त्र बलों की किसी शाखा में प्रवेश की अनुमति दी जा चुकी हो, तो केवल नीतिगत या संगठनात्मक कारणों का हवाला देकर उनके लिए संख्या आधारित प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते।
साथ ही भर्ती प्रक्रिया को वास्तविक रूप से जेंडर-न्यूट्रल और मेरिट आधारित बनाने की बात कही गई थी, जिसमें उम्मीदवारों का चयन समान मेरिट सूची के आधार पर हो। (Territorial Army Women Recruitment)
एक साझा मेरिट सूची की मांग
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि टेरिटोरियल आर्मी अधिकारी भर्ती पूरी तरह समान अवसर और मेरिट के आधार पर कराई जाए।
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग रिक्तियों और अलग मेरिट सूची की व्यवस्था समाप्त की जाए। इसके बजाय एक साझा मेरिट सूची बनाई जाए, जिसमें चयन केवल प्रदर्शन और योग्यता के आधार पर हो।
अब इस मामले में केंद्र सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना होगा। अदालत की अगली सुनवाई में सरकार की प्रतिक्रिया और भर्ती नीति से जुड़े तर्कों पर चर्चा होने की संभावना है। (Territorial Army Women Recruitment)
Why Retired Major Generals Are Challenging India's Military Pension Anomaly in Court. (AI Image)
Major General Pension Dispute: भारतीय सेना के कई रिटायर्ड मेजर जनरल और लेफ्टिनेंट जनरल एक ऐसे पेंशन विवाद को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं, जिसने डिफेंस कॉरिडोर में हलचल मचा दी है। मामला किसी प्रमोशन, पोस्टिंग या सर्विस रिकॉर्ड का नहीं है, बल्कि मामला पेंशन से जुड़ा है, जिसमें एक मेजर जनरल की पेंशन और सैलरी जूनियर ब्रिगेडियर के बराबर या उससे कम हो जाती है।
इस विवाद की वजह है सातवें वेतन आयोग के बाद बना सैलरी स्ट्रक्चर और मिलिट्री सर्विस पे यानी एमएसपी। इस मामले से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सरकार ने इस विसंगति को कुछ अधिकारियों के लिए तो दूर कर दिया, लेकिन समान स्थिति वाले बाकी अधिकारियों को इसका फायदा नहीं दिया गया।
Major General Pension Dispute: क्या है पूरा विवाद?
यह मामला भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के उन वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़ा है जो मेजर जनरल, रियर एडमिरल, एयर वाइस मार्शल और उससे ऊपर के रैंक तक पहुंचे।
सेना में ब्रिगेडियररैंक तक अधिकारियों को बेसिक पे के अलावा मिलिट्री सर्विस पे मिलता है। एमएसपी को सैन्य सेवा की विशेष परिस्थितियों, कठिन तैनाती और सेवा प्रतिबंधों को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया था।
लेकिन जैसे ही कोई अधिकारी मेजर जनरल बनता है, उसे एमएसपी मिलना बंद हो जाता है। यहीं से समस्या शुरू होती है।
सातवें वेतन आयोग के तहत एक ब्रिगेडियर का कुल वेतन एमएसपी जोड़ने के बाद लगभग 2,33,100 रुपये तक पहुंच जाता है। वहीं, दूसरी तरफ मेजर जनरल के लिए निर्धारित अधिकतम वेतन 2,18,200 रुपये था, जिसमें अलग से एमएसपी शामिल नहीं था। जिसके चलते कई मामलों में प्रमोशन पाने वाला अधिकारी अपने जूनियर ब्रिगेडियर से कम वेतन और कम पेंशन की स्थिति में पहुंच जाता है।
प्रमोशन के बाद आर्थिक नुकसान का सवाल
रिटायर्ड अधिकारियों का कहना है कि किसी भी सरकारी या सैन्य व्यवस्था में प्रमोशन का मतलब अधिक जिम्मेदारी और बेहतर आर्थिक लाभ होता है। लेकिन इस मामले में स्थिति उलट दिखाई दी है।
एक मेजर जनरल को डिवीजन कमांड, कोर मुख्यालय में चीफ ऑफ स्टाफ और सेना मुख्यालय में महत्वपूर्ण नियुक्तियां संभालनी पड़ती हैं। इसके बावजूद उसकी पेंशन उस ब्रिगेडियर के बराबर या कम हो सकती है जो उससे जूनियर रहा हो।
रिटायर्ड मेजर जनरल रंजन चंद ने कहा कि रक्षा मंत्रालय ने विसंगति को स्वीकार करते हुए राहत तो दी, लेकिन केवल उन्हीं अधिकारियों को जिन्होंने अदालत में याचिका दायर की थी।
उन्होंने कहा, “रक्षा मंत्रालय द्वारा विसंगति दूर करने का फैसला केवल उन अधिकारियों तक सीमित रखा गया जिन्होंने मुकदमा लड़ा। समान स्थिति वाले बाकी अधिकारियों को इसका फायदा नहीं दिया गया।” (Major General Pension Dispute)
एएफटी ने सुनाया था फैसला
14 मार्च 2023 को आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल यानी एएफटीकी प्रिंसिपल बेंच ने मेजर जनरल और समकक्ष रैंक के अधिकारियों की याचिकाओं पर फैसला सुनाया था।
ट्रिब्यूनल ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं के वेतन और पेंशन को उनके तत्काल जूनियर ब्रिगेडियर के स्तर तक बढ़ाया जाए। साथ ही एरियर और अन्य वित्तीय लाभ भी दिए जाएं।
यह फैसला सेना के अलावा नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों पर भी लागू था।
इस आदेश ने पहली बार आधिकारिक रूप से यह माना कि वेतन और पेंशन स्ट्रक्चर में एक विसंगति मौजूद है। (Major General Pension Dispute)
दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
सरकार ने एयर वाइस मार्शल लक्ष्मी नारायण शर्मा से जुड़े एक मामले में एएफटी के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हालांकि हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली, लेकिन एएफटी के आदेश पर रोक नहीं लगाई।
इसके बाद ट्रिब्यूनल ने शर्तों के साथ आदेश लागू करने की अनुमति दी। याचिकाकर्ताओं से कहा गया कि यदि भविष्य में अदालत का अंतिम फैसला सरकार के पक्ष में जाता है तो अतिरिक्त राशि वापस करनी होगी।
इसके बावजूद लंबे समय तक आदेश लागू नहीं हुआ। इससे नाराज होकर लगभग 82 अधिकारियों ने अवमानना याचिकाएं दाखिल कीं। (Major General Pension Dispute)
अगस्त 2026 में मिला 82 अधिकारियों को फायदा
अवमानना नोटिस जारी होने के बाद अगस्त 2026 में रक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत 82 अधिकारियों के वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई। अतिरिक्त राशि को पर्सनल पे माना गया, लेकिन उसे वेतन और पेंशन का हिस्सा भी स्वीकार किया गया।
इन अधिकारियों को एरियर और अन्य वित्तीय लाभ भी दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। नौसेना और वायुसेना के कुछ समान मामलों में भी ऐसे आदेश जारी होने की जानकारी सामने आई। (Major General Pension Dispute)
अब 200 से ज्यादा अधिकारी कोर्ट जाने की तैयारी में
लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। कई अधिकारियों की ओर से कानूनी लड़ाई लड़ रहे रिटायर्ड कर्नल इंद्रसेन सिंह का कहना है कि 200 से अधिक मेजर जनरल और लेफ्टिनेंट जनरल अब नई याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब सरकार ने विसंगति स्वीकार कर ली और कुछ अधिकारियों को लाभ भी दे दिया, तो वही लाभ सभी समान परिस्थितियों वाले अधिकारियों को स्वतः मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा, “अगर सभी अधिकारियों का डेटा सरकार के पास उपलब्ध है तो हर व्यक्ति को अलग-अलग अदालत जाने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है।” (Major General Pension Dispute)
ओआरओपी की नई समीक्षा में भी विवाद
इस बीच वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी की नई समीक्षा में ब्रिगेडियर से लेकर वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ तक यूनिफॉर्म पेंशन स्ट्रक्चर लागू किया गया।
अगस्त 2026 के आदेश में भी इसी सिद्धांत के आधार पर राहत दी गई। लेकिन कई अधिकारियों का कहना है कि केवल बराबरी काफी नहीं है। उनका तर्क है कि ऊंची रैंक पर प्रमोशन पाने वाले अधिकारी को आर्थिक रूप से अपने जूनियर के बराबर नहीं रखा जा सकता।
रिटायर्ड ब्रिगेडियर अनिल श्रीवास्तव ने कहा, “100 ब्रिगेडियर में से केवल 7 से 10 फीसदी अफसर ही जनरल रैंक तक पहुंचते हैं। ऐसे में उन्हें केवल ब्रिगेडियर के बराबर कर देना प्रमोशन की वास्तविक वित्तीय पहचान को समाप्त कर देता है।” (Major General Pension Dispute)
सातवें वेतन आयोग से पहले क्या थी स्थिति?
पूर्व सैन्य अधिकारियों के अनुसार छठे वेतन आयोग तक जनरल रैंक अधिकारियों के लिए एक प्रकार का नोटेशनल एमएसपी मौजूद था। इससे ब्रिगेडियर और मेजर जनरल के बीच वेतन और पेंशन का अंतर बना रहता था।
लेकिन सातवें वेतन आयोग में यह व्यवस्था समाप्त हो गई। इसके बाद वित्तीय अंतर खत्म होने लगा और कई मामलों में उलटा असर दिखाई देने लगा।
यही वजह है कि वरिष्ठ अधिकारी इसे केवल पेंशन का मामला नहीं बल्कि पूरे सैलरी स्ट्रक्चर की समस्या बता रहे हैं। (Major General Pension Dispute)
सेना के पूर्व अधिकारियों में नाराजगी
रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश की सेवा में पूरा जीवन बिताने वाले अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद अदालतों के चक्कर नहीं लगाने चाहिए।
उन्होंने कहा, “सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारी अब वही लाभ पाने के लिए कोर्ट जाने की योजना बना रहे हैं जो पहले ही समान स्थिति वाले अधिकारियों को मिल चुका है।”
रिटायर्ड ब्रिगेडियर एस.के. चटर्जी ने भी कहा कि केवल 82 अधिकारियों को लाभ देना और बाकी को अलग मुकदमा दायर करने के लिए छोड़ देने का कोई लॉजिक नहीं है। (Major General Pension Dispute)
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