📍नई दिल्ली | 1 Jun, 2026, 12:25 PM
Indian Army Counter UAS System: आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी युद्ध के मैदान में टैंक, तोप और लड़ाकू विमान सबसे बड़े हथियार माने जाते थे, लेकिन अब छोटे आकार के ड्रोन भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक, ड्रोन ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। भारत की सीमाओं पर भी ड्रोन गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। पाकिस्तान की ओर से हथियार और नशीले पदार्थ गिराने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कई बार सामने आ चुका है, जबकि उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन निगरानी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना ने एक नए काउंटर-यूएएस सिस्टम की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। सेना ऐसा पोर्टेबल सिस्टम चाहती है जो दुश्मन के ड्रोन को बिना गोली चलाए बेअसर कर सके। इसमें आधुनिक जेमिंग तकनीक वाले उपकरण की मांग की गई है।
Indian Army Counter UAS System: क्यों बढ़ी काउंटर ड्रोन सिस्टम की जरूरत
पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पहले जहां ड्रोन केवल सेनाओं के पास होते थे, वहीं अब छोटे संगठन और आतंकवादी समूह भी उनका इस्तेमाल करने लगे हैं। कुछ किलो वजन वाले ड्रोन कैमरे के जरिए निगरानी कर सकते हैं, हथियार गिरा सकते हैं और यहां तक कि आत्मघाती हमलों के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार सीमा पार से आने वाले ड्रोन पकड़े हैं। कई मामलों में इन ड्रोन के जरिए हथियार, गोला-बारूद और नशीले पदार्थ भारतीय सीमा में गिराए गए। ऐसे में केवल ड्रोन खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें रोकने वाली तकनीक भी उतनी ही जरूरी हो गई है।
इसी वजह से सेना अब ऐसे सिस्टम पर जोर दे रही है, जो दुश्मन के ड्रोन को उसके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही बेकार कर दे। (Indian Army Counter UAS System)
क्या होता है काउंटर-यूएएस सिस्टम
काउंटर-यूएएस का मतलब है काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम। यह एंटी ड्रोन सिस्टम है। इसका काम दुश्मन के ड्रोन को पहचानना, उसके कंट्रोल को जाम करना और उसे मिशन पूरा करने से रोकना होता है।
भारतीय सेना जिस सिस्टम की खरीद कर रही है, वह मुख्य रूप से जेमिंग तकनीक पर आधारित है। यह ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच मौजूद कम्यूनिकेशन को जाम कर देता है। इसके अलावा यह उन सैटेलाइट सिग्नलों को भी रोकता करता है जिनकी मदद से ड्रोन को डायरेक्शन मिलता है।
जब ड्रोन को सही सिग्नल नहीं मिलते तो वह या तो अपनी जगह पर रुक जाता है, वापस लौटने की कोशिश करता है या फिर टारगेट से भटक जाता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आधुनिक युद्ध में बेहद प्रभावी माने जाते हैं। (Indian Army Counter UAS System)
एक साथ कई सैटेलाइट सिस्टम को करेगा जाम
सेना ऐसा सिस्टम चाहती है, जो एक साथ कई ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को जाम कर सके। इसमें जीपीएस, गैलीलियो, ग्लोनास और बीडू जैसे प्रमुख सैटेलाइट नेटवर्क शामिल हैं।
आज अधिकांश ड्रोन इन्हीं नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यदि ये सिग्नल जाम हो जाएं तो ड्रोन की दिशा और कंट्रोल प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि जेमिंग तकनीक को एंटी-ड्रोन डिफेंस का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
360 डिग्री सुरक्षा देगा सिस्टम
सेना की मांग के अनुसार यह सिस्टम ओम्नी-डायरेक्शनल होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह केवल एक दिशा में नहीं बल्कि चारों डायरेक्शन में काम करेगा।
तकनीकी शर्तों के अनुसार सिस्टम को 360 डिग्री तक जेमिंग कवरेज देना होगा। यानी सैनिक को यह अनुमान लगाने की जरूरत नहीं होगी कि ड्रोन किस दिशा से आ रहा है। यदि कोई ड्रोन उसके आसपास के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो सिस्टम उसे प्रभावित कर सकेगा।
युद्ध क्षेत्र में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि ड्रोन किसी भी दिशा से अचानक दिखाई दे सकते हैं।
डेढ़ किलोमीटर तक असरदार
सेना ने इस सिस्टम के लिए न्यूनतम 1.5 किलोमीटर की जेमिंग रेंज तय की है। इसका मतलब है कि सैनिक अपने स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर तक उड़ रहे ड्रोन को भी प्रभावित कर सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम चौकियों, संवेदनशील ठिकानों और अस्थायी सैन्य शिविरों की सुरक्षा के लिए यह दूरी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे सैनिकों को ड्रोन खतरे का पहले से जवाब देने का अवसर मिलेगा।
वजन तीन किलो से कम
किसी भी सैन्य उपकरण के लिए उसका वजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषकर पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिक अतिरिक्त भार नहीं उठा सकते।
इसी को ध्यान में रखते हुए सेना ने शर्त रखी है कि पूरा सिस्टम तीन किलो से कम वजन का होना चाहिए। इसका मतलब है कि सैनिक इसे अपने साथ आसानी से लेकर चल सकेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल कर सकेगा।
हल्का होने के बावजूद सिस्टम को मजबूत और भरोसेमंद भी होना होगा ताकि मुश्किल हालात में भी उसका परफॉरमेंस प्रभावित न हो। (Indian Army Counter UAS System)
हर मौसम में काम करने की क्षमता
भारतीय सेना रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और बर्फीले इलाकों सहित विभिन्न परिस्थितियों में तैनात रहती है। इसलिए किसी भी उपकरण को हर तरह के मौसम में काम करने योग्य होना जरूरी है।
दस्तावेज के अनुसार यह सिस्टम माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यह हिमालयी क्षेत्रों की ठंड और पश्चिमी भारत की गर्मी दोनों में उपयोग किया जा सकेगा।
इसके अलावा इसे आईपी-67 सुरक्षा मानक के अनुरूप भी होना होगा। ताकि यह धूल और पानी से भी सुरक्षित रहे।
आठ घंटे लगातार ऑपरेशनल
सैन्य अभियानों में लगातार ऑपरेशन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए सेना ने मांग की है कि यह सिस्टम बैटरी के सहारे कम से कम आठ घंटे तक लगातार काम कर सके।
इससे सैनिकों को बार-बार बैटरी बदलने या चार्जिंग की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। लंबी गश्त, सीमा सुरक्षा और महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियों के दौरान यह विशेष रूप से उपयोगी होगा।
दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि सिस्टम के सभी मोड चौबीसों घंटे संचालन के लिए सक्षम होने चाहिए।
वहीं, सेना केवल काउंटर ड्रोन सिस्टम ही नहीं खरीद रही, बल्कि ड्रोन प्रशिक्षण से जुड़ी सुविधाओं पर भी ध्यान दे रही है।
तकनीकी दस्तावेज में ड्रोन सॉकर एरीना, डिफेंस ट्रेनिंग सिमुलेटर और अवरोधक प्रशिक्षण क्षेत्र जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है। सेना ड्रोन ऑपरेशन और एंटी ड्रोन दोनों क्षमताओं को साथ-साथ विकसित करना चाहती है।
ड्रोन सॉकर एरीना में सैनिक सुरक्षित वातावरण में ड्रोन ऑपरेशन का अभ्यास कर सकेंगे। वहीं सिमुलेटर के जरिए वास्तविक परिस्थितियों जैसी ट्रेनिंग दी जा सकेगी। (Indian Army Counter UAS System)
एफपीवी ड्रोन भी होंगे ट्रेनिंग का हिस्सा
दस्तावेज में आठ इंच और दस इंच कैटेगरी के एफपीवी ड्रोन का भी उल्लेख किया गया है। एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन, जिन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए वास्तविक समय में कंट्रोल करता है।
इन ड्रोन की उड़ान अवधि, गति और पेलोड क्षमता को देखते हुए स्पष्ट है कि सेना ड्रोन ऑपरेशन की नई तकनीकों पर भी काम कर रही है। कुछ ड्रोन 180 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार हासिल कर सकते हैं और विशेष परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के पेलोड ले जाने में सक्षम होते हैं।
मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावा
इस प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर विशेष जोर दिया गया है। केवल क्लास-1 और क्लास-2 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को भाग लेने की अनुमति दी गई है।
डिलीवरी की समयसीमा 20 दिन तय की गई है। साथ ही चयनित विक्रेता को प्रशिक्षण और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी। सेना ने अनुभव, प्रदर्शन और तकनीकी क्षमता से जुड़े कई मानदंड भी निर्धारित किए हैं ताकि केवल सक्षम कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकें। (Indian Army Counter UAS System)
The Indian Army has initiated the procurement of a portable Counter-Unmanned Aerial System (Counter-UAS) to strengthen its ability to detect and neutralize hostile drones. Designed for modern battlefield requirements, the system will be capable of disrupting enemy drone operations at ranges of up to 1.5 kilometers through advanced signal jamming technology. The lightweight and portable solution will help troops counter surveillance, reconnaissance, and weaponized drones in sensitive border areas and operational zones. This move reflects the Army’s growing focus on anti-drone warfare capabilities as unmanned aerial threats continue to evolve, posing significant security challenges across multiple theatres.


