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डिफेंस एक्सपोर्ट में बंपर उछाल! 38,000 करोड़ पार, सरकार ने खर्च किया पूरा बजट

India defence exports 2026

India defence exports 2026: वित्तीय वर्ष 2025-26 भारतीय डिफेंस सेक्टर के लिए शानदार साबित हुआ है। एक तरफ जहां देश का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, वहीं दूसरी तरफ रक्षा मंत्रालय ने अपने पूंजीगत बजट का लगभग पूरा इस्तेमाल भी कर लिया है।

India defence exports 2026: रक्षा निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड

वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। पिछले साल यह आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपये था। यानी एक ही साल में करीब 62.66 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रकम के हिसाब से देखें तो लगभग 14,800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निर्यात हुआ है।

इस बढ़ोतरी में सरकारी और निजी दोनों सेक्टर की अहम भूमिका रही है। रक्षा सार्वजनिक उपक्रम यानी डीपीएसयू ने कुल निर्यात में करीब 54.84 प्रतिशत योगदान दिया, जबकि निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 45.16 प्रतिशत रही।

सरकारी कंपनियों का निर्यात खास तौर पर तेजी से बढ़ा है। डीपीएसयू का निर्यात पिछले साल के मुकाबले 151 प्रतिशत बढ़ गया, जबकि निजी कंपनियों ने भी करीब 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की।

अगर रकम की बात करें तो निजी कंपनियों ने करीब 17,353 करोड़ रुपये का निर्यात किया, जबकि डीपीएसयू का योगदान 21,071 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल यह आंकड़ा काफी कम था, जिससे साफ है कि इस बार बड़ी छलांग लगी है। (India defence exports 2026)

80 से ज्यादा देशों को हुआ निर्यात

भारत अब सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए भी रक्षा उपकरण बना रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत अब 80 से ज्यादा देशों को रक्षा सामान निर्यात कर रहा है।

इनमें अलग-अलग तरह के सिस्टम, सब-सिस्टम, पार्ट्स और उपकरण शामिल हैं। सिर्फ निर्यात ही नहीं, बल्कि निर्यात करने वाली कंपनियों की संख्या भी बढ़ी है। पिछले साल जहां 128 एक्सपोर्टर थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 145 हो गई है। यानी करीब 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। (India defence exports 2026)

पांच साल में तीन गुना बढ़ा निर्यात

अगर पिछले पांच साल का आंकड़ा देखें तो भारत का रक्षा निर्यात करीब तीन गुना तक बढ़ चुका है। यह बढ़ोतरी अचानक नहीं हुई, बल्कि लगातार किए गए प्रयासों का नतीजा है। सरकार ने रक्षा निर्यात से जुड़े नियमों को आसान बनाया है, ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू की है और कंपनियों को ज्यादा मौके दिए हैं। इसके चलते अब भारतीय रक्षा उद्योग अब ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनता जा रहा है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि भारत अब धीरे-धीरे एक ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सफलता देश की नीतियों और उद्योगों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है। (India defence exports 2026)

रक्षा मंत्रालय ने पूरा किया पूंजीगत बजट

डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़ने के साथ रक्षा मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में अपने पूंजीगत बजट का पूरा इस्तेमाल कर लिया है। इस साल डिफेंस सर्विसेज के लिए करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत बजट रखा गया था, जिसे पूरी तरह खर्च कर दिया गया।

यह लगातार दूसरा साल है जब मंत्रालय ने पूरा बजट उपयोग किया है। कुल मिलाकर रक्षा मंत्रालय का कुल बजट उपयोग करीब 99.62 प्रतिशत रहा। (India defence exports 2026)

किन चीजों पर हुआ सबसे ज्यादा खर्च

इस बजट का बड़ा हिस्सा सेना के आधुनिकीकरण पर खर्च किया गया। इसमें खास तौर पर शामिल हैं: हवाई प्लेटफॉर्म जैसे एयरक्राफ्ट और एयरो इंजन पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ। इसके बाद जमीन से जुड़े सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरण, हथियार, जहाज निर्माण और एविएशन स्टोर्स पर भी बड़ा निवेश किया गया।

इन खर्चों का मकसद सेना की ऑपरेशनल क्षमता को बेहतर बनाना और आधुनिक तकनीक को शामिल करना रहा। (India defence exports 2026)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

बजट में बढ़ोतरी का एक कारण हाल के ऑपरेशन भी रहे हैं। खास तौर पर ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त फंड दिया गया। पहले पूंजीगत खर्च के लिए 1.80 लाख करोड़ रुपये तय किए गए थे, जिसे बाद में बढ़ाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये किया गया।

बड़े स्तर पर हुई रक्षा खरीद

इस साल रक्षा मंत्रालय ने बड़ी संख्या में नई परियोजनाओं को मंजूरी दी। कुल 109 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिनकी कुल कीमत करीब 6.81 लाख करोड़ रुपये है। इसके अलावा 503 डिफेंस प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट साइन किए गए, जिनकी कुल कीमत 2.28 लाख करोड़ रुपये रही। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है। (India defence exports 2026)

सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी असर

रक्षा बजट का असर सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं है। इसका एक हिस्सा सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार पर भी खर्च किया गया। इससे सड़कों, बेस और अन्य सुविधाओं का विकास हुआ, जिससे सेना की तैनाती और संचालन आसान हो सके।

वहीं, वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा मंत्रालय को पूंजीगत मद में करीब 2.19 लाख करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 22 प्रतिशत ज्यादा है। (India defence exports 2026)

Exclusive: ऑपरेशन सिंदूर से मिला बड़ा सबक! स्वार्म ड्रोन से निपटने के लिए सेना खरीदेगी नेक्स्ट जनरेशन एयर डिफेंस गन

ADG NG Air Defence Gun RFI

ADG NG Air Defence Gun RFI: ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेते हुए भारतीय सेना अब बड़ी तैयारी कर रही है। सेना की एयर डिफेंस क्षमता को और मजबूत करने के लिए सेना की एयर डिफेंस विंग ने नई पीढ़ी की एयर डिफेंस गन यानी एडीजी-एनजी की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब युद्ध के मैदान में ड्रोन, स्वार्म ड्रोन, क्रूज मिसाइल और प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन जैसे नए खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं।

सेना का मानना है कि पारंपरिक फाइटर जेट या हेलीकॉप्टर के मुकाबले दुश्मन अब बड़े प्लेटफॉर्म की बजाय छोटे और सस्ते हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। ड्रोन के जरिए निगरानी के साथ-साथ हमले भी किए जा रहे हैं। कई बार एक साथ कई ड्रोन यानी स्वार्म अटैक किए जाते हैं, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में एक ऐसी गन सिस्टम की जरूरत महसूस की गई है जो कम लागत में इन खतरों को तुरंत खत्म कर सके।

ADG NG Air Defence Gun RFI: ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

आरएफआई में ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि पश्चिमी मोर्चे पर दुश्मन ने ड्रोन और स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया था। इन हमलों में सिविल और डिफेंस ठिकानों को निशाना बनाया गया।

इन बदलते खतरों को देखते हुए अब एक नई पीढ़ी की गन सिस्टम की जरूरत महसूस की जा रही है। यह सिस्टम समय रहते टारगेट को पहचान सके, उसे ट्रैक कर सके और कम लागत में उसे खत्म कर सके, ताकि महत्वपूर्ण ठिकानों को किसी भी बड़े नुकसान से बचाया जा सके।

इसी वजह से सेना अब ऐसी गन सिस्टम चाहती है जो कम समय में ज्यादा टारगेट को ट्रैक और न्यूट्रलाइज कर सके। एडीजी-एनजी को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

कैसे काम करेगी यह गन

आर्मी एयर डिफेंस का काम होता है कि वह युद्ध क्षेत्र और पीछे के इलाकों में मौजूद महत्वपूर्ण ठिकानों की हर मौसम में सुरक्षा करे। इन ठिकानों को दुश्मन के हवाई हमलों से बचाना इसकी जिम्मेदारी होती है।

नई एयर डिफेंस गन को व्हीकल पर भी लगाया जा सकेगा या फिर इसे खींचकर भी ले जाया जा सकेगा। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे यह खुद ही टारगेट को पहचानकर उस पर हमला कर सकेगी।

यह सिस्टम अलग-अलग तरह के खतरों को निशाना बना सकेगा। इसमें फाइटर एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, रिमोट पायलटेड एयरक्राफ्ट, क्रूज मिसाइल और प्रिसीजन गाइडेड हथियार शामिल हैं।

नई एयर डिफेंस गन को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि यह कई तरह के हवाई खतरों को एक साथ संभाल सके। इसमें फिक्स्ड विंग एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और रॉकेट-आर्टिलरी-मोर्टार जैसे हथियार शामिल हैं।

इसका मुख्य काम होगा तेजी से टारगेट को पहचानना, उसे ट्रैक करना और सही समय पर सटीक फायर करके खत्म करना। खास बात यह है कि यह सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स के खिलाफ भी प्रभावी होगा, जो अक्सर रडार से बच निकलते हैं। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

क्या होंगी तकनीकी खूबियां

इस गन की मारक क्षमता कम से कम 4 किलोमीटर या उससे ज्यादा रखी गई है। यह 500 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से आने वाले टारगेट को भी निशाना बना सकेगी। फायरिंग स्पीड कम से कम 300 राउंड प्रति मिनट होगी, जिससे कम समय में ज्यादा फायर किया जा सकेगा। इसकी प्रभावी ऊंचाई 2500 मीटर या उससे ज्यादा होगी। इसमें छोटे टारगेट जैसे माइक्रो एयरक्राफ्ट, पैरा मोटर, पैराग्लाइडर और छोटे ड्रोन भी शामिल किए गए हैं।

इसमें इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी आधुनिक होगा। इसमें प्रोग्रामेबल और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज वाले राउंड होंगे, जो टारगेट के पास पहुंचकर खुद ही फट सकते हैं। इसके अलावा सामान्य हाई एक्सप्लोसिव राउंड और ट्रेनिंग अम्यूनिशन भी शामिल होंगे।

गन में ऑटोमैटिक लोडिंग सिस्टम होगा, जिससे फायरिंग के दौरान समय की बचत होगी। कम क्रू के साथ इसे ऑपरेट किया जा सकेगा और दो लोग भी इसे रीलोड कर पाएंगे।

पावर और सिस्टम इंटीग्रेशन

गन में अपना पावर सिस्टम होगा, जिसमें जनरेटर और बैटरी दोनों शामिल होंगे। बैटरी के जरिए साइलेंट ऑपरेशन भी किया जा सकेगा, जिससे दुश्मन को इसकी लोकेशन का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा।

यह सिस्टम मॉड्यूलर होगा, यानी जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव किया जा सकेगा। साथ ही इसे मौजूदा रडार और नेविगेशन सिस्टम के साथ भी जोड़ा जा सकेगा। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम

इस गन की सबसे बड़ी ताकत इसका इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम होगा। इसमें डे और नाइट दोनों में काम करने की क्षमता होगी। कैमरा, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर की मदद से यह दूर के टारगेट को भी पहचान सकेगा।

अगर किसी कारण से इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हो जाए, तब भी इसे मैनुअल ओपन साइट के जरिए चलाया जा सकेगा। इसका मतलब है कि खराब हालात में भी यह पूरी तरह बंद नहीं होगी। इस सिस्टम में रिकॉर्डिंग की सुविधा भी होगी, जिससे ऑपरेशन का डेटा बाद में देखा जा सकेगा। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

हर इलाके में काम करने की क्षमता

सेना चाहती है कि यह गन हर तरह के इलाके में काम कर सके। चाहे ऊंचे पहाड़ी इलाके हों, रेगिस्तान हो या सामान्य मैदान, यह हर जगह तैनात की जा सके। मैदानी इलाकों में इसकी मूवमेंट स्पीड करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है, जबकि पहाड़ों में 30 किलोमीटर प्रति घंटा और ऑफ रोड में 20 किलोमीटर प्रति घंटा की क्षमता होगी।

यह सिस्टम -30 डिग्री से लेकर +55 डिग्री तक के तापमान में काम करने के लिए तैयार किया जाएगा। साथ ही इसे समुद्र तल से 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से यह भी जानकारी मांगी है कि उनका सिस्टम अलग-अलग टारगेट को कितनी दूरी से पहचान सकता है। इसमें छोटे ड्रोन से लेकर हेलीकॉप्टर और फाइटर जेट तक शामिल हैं।

इसके लिए खास तौर पर DJI Mavic Pro 3 ड्रोन, चीता हेलीकॉप्टर और राफेल जैसे फाइटर जेट को उदाहरण के तौर पर लिया गया है। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

फील्ड ट्रायल भारत में ही

सेना इस सिस्टम को खरीदने के लिए टू-बिड सिस्टम अपनाएगी। पहले टेक्निकल मूल्यांकन होगा और उसके बाद कमर्शियल बिड खोली जाएगी। फील्ड ट्रायल भारत में ही किए जाएंगे, जहां अलग-अलग परिस्थितियों में इसकी क्षमता को परखा जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में स्वदेशी हिस्सेदारी पर खास जोर दिया गया है। कम से कम 50 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट जरूरी रखा गया है, यानी इसका बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में सरकारी और निजी दोनों सेक्टर की कंपनियों के लिए मौका खुला है। रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली कई कंपनियां इसमें हिस्सा ले सकती हैं। उन्हें अपनी तकनीकी क्षमता, उत्पादन क्षमता और सपोर्ट सिस्टम की जानकारी देनी होगी।

सेना ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि वे कितनी जल्दी उत्पादन कर सकती हैं और कितनी संख्या में गन सप्लाई कर सकती हैं।

प्री-सबमिशन मीटिंग अप्रैल के मध्य में रखी गई है, जहां कंपनियों को अपनी शंकाएं दूर करने का मौका मिलेगा। रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों को 11 जून तक अपना जवाब जमा करने के लिए कहा है। इसके बाद आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल की थीं ये एयर डिफेंस गन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने बड़े स्तर पर ड्रोन हमलों का सामना किया। पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान ने 600 से ज्यादा छोटे ड्रोन और स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल किया, जिनका मकसद निगरानी करना और सैन्य ठिकानों पर हमला करना था। इन खतरों से निपटने के लिए आर्मी एयर डिफेंस ने मल्टी-लेयर सिस्टम अपनाया, जिसमें गन और मिसाइल दोनों का इस्तेमाल हुआ।

इस ऑपरेशन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल बोफोर्स एल-70 40 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन का हुआ। यह गन अपग्रेडेड सिस्टम के साथ थी, जिसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज अम्यूनिशन शामिल था। इसकी फायरिंग स्पीड 300 राउंड प्रति मिनट से ज्यादा है और इसने कई ड्रोन मार गिराए।

इसके अलावा जेडयू-23-2 ट्विन बैरल गन का भी इस्तेमाल किया गया। यह हल्की और तेज फायरिंग वाली गन है, जो छोटे ड्रोन को गिराने में काफी कारगर साबित हुई। वहीं कुछ जगहों पर व्हीकल माउंटेड जेडयू-23-4 शिल्का गन सिस्टम भी तैनात किया गया था, जो तेजी से मूव कर सकता है।

इन गन्स के साथ मिसाइल सिस्टम जैसे पिचोरा और ओसा-का भी इस्तेमाल हुए, जबकि सभी सिस्टम को एक साथ जोड़ने के लिए आधुनिक कमांड और कंट्रोल नेटवर्क का सहारा लिया गया। ऑपरेशन के दौरान इन गन्स ने बड़ी संख्या में ड्रोन को गिराकर महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा की। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

तेजस एमके-1ए की डिलीवरी पर बड़ा फैसला जल्द, IAF और HAL की हाई-लेवल रिव्यू मीटिंग इसी महीने

Tejas Mk1A delivery delay

Tejas Mk1A delivery delay: स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए की डिलीवरी को लेकर इस महीने एक अहम मोड़ आने वाला है। भारतीय वायुसेना और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच जल्द ही एक बड़ी रिव्यू बैठक होने जा रही है। इस बैठक में यह तय किया जाएगा कि तेजस एमके-1ए आखिर कब तक वायुसेना को सौंपा जा सकेगा।

Tejas Mk1A delivery delay: देरी के बीच अहम समीक्षा बैठक

सूत्रों के मुताबिक, इस रिव्यू मीटिंग में दोनों पक्ष यह देखेंगे कि विमान के जरूरी ऑपरेशनल मानक कितने पूरे हुए हैं। ये वही मानक हैं जिन्हें बिना पूरा किए विमान को सेवा में शामिल नहीं किया जा सकता।

अगर इन जरूरी शर्तों को पूरा कर लिया जाता है, तो अगले दो से तीन महीनों में पहले तेजस एमके-1ए की डिलीवरी हो सकती है। लेकिन अगर इनमें कमी रह जाती है, तो देरी और बढ़ सकती है।

इसलिए यह बैठक सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूरे प्रोग्राम की दिशा तय करने वाली मानी जा रही है।

क्या हैं अनिवार्य ऑपरेशनल जरूरतें

तेजस एमके-1ए को वायुसेना में शामिल करने से पहले कुछ जरूरी तकनीकी और ऑपरेशनल शर्तों को पूरा करना होता है। इन्हें एयर स्टाफ क्वालिटी रिक्वायरमेंट कहा जाता है।

इनमें सबसे अहम मिसाइल फायरिंग ट्रायल का पूरा होना है। इसके अलावा रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का सही तरीके से इंटीग्रेशन भी जरूरी है। विमान में लगे सभी हथियारों के पैकेज का सफल परीक्षण और वैलिडेशन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

पांच तेजस एमके-1ए विमान डिलीवरी के लिए तैयार!

फरवरी 2026 में एचएएल ने बताया था कि पांच तेजस एमके-1ए विमान डिलीवरी के लिए तैयार हैं। इनमें कई जरूरी क्षमताएं शामिल की जा चुकी हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि अभी भी कुछ महत्वपूर्ण क्लीयरेंस बाकी हैं।
इसी वजह से वायुसेना अभी इंतजार की स्थिति में है और अंतिम फैसला इस रिव्यू के बाद ही लिया जाएगा।

इंजन और सिस्टम इंटीग्रेशन की चुनौती

तेजस एमके-1ए की देरी के पीछे कई वजहें रही हैं। सबसे बड़ी समस्या इंजन की सप्लाई में आई देरी रही है। इसके लिए अमेरिकी कंपनी से एफ-404 इंजन आने थे, जो समय पर नहीं मिल सके। इसके अलावा विमान में लगे एडवांस रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के इंटीग्रेशन में भी समय लगा। खासकर एईएसए रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को एक साथ जोड़ना भी मुश्किल प्रक्रिया है। इन सभी तकनीकी चुनौतियों के चलते पूरा प्रोग्राम तय समय से पीछे खिसकता गया।

तेजस एमके-1ए की तकनीकी खूबियां

तेजस एमके-1ए, तेजस के पुराने वर्जन से काफी ज्यादा एडवांस माना जाता है। इसमें कई नए सिस्टम और क्षमताएं जोड़ी गई हैं। इसमें एईएसए रडार लगाया गया है, जो दूर तक टारगेट को ट्रैक कर सकता है। इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट इसे दुश्मन के रडार और मिसाइल से बचाने में मदद करता है।

विमान में आधुनिक हथियार ले जाने की क्षमता है, जिसमें बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल भी शामिल हैं। इसके अलावा इसमें एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड दोनों तरह के मिशन करने की क्षमता है।

इसकी अधिकतम गति करीब मैक 1.6 तक है और यह करीब 50,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। इसमें डिजिटल फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम दिया गया है, जिससे नियंत्रण और स्थिरता बेहतर होती है।

भारतीय वायुसेना इस समय फाइटर स्क्वॉड्रन की कमी से जूझ रही है। जरूरत के मुकाबले उसके पास काफी कम स्क्वॉड्रन हैं, जिससे ऑपरेशनल दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में तेजस एमके-1ए को जल्दी शामिल करना जरूरी माना जा रहा है। यह विमान पुराने हो चुके फाइटर जेट की जगह लेने में अहम भूमिका निभाने वाला है।

हालांकि वायुसेना पहले ही तेजस के शुरुआती वर्जन एमके-1 को शामिल कर चुकी है, लेकिन नए और ज्यादा सक्षम एमके-1ए वर्जन का इंतजार काफी समय से किया जा रहा है।

जब भी कोई नया विमान तैयार होता है, तो उसे सीधे सेवा में शामिल नहीं किया जाता। पहले उसकी कई स्तर पर जांच होती है।

फैक्ट्री से निकलने के बाद वायुसेना की तकनीकी टीम उसका निरीक्षण करती है। इसके बाद टेस्ट पायलट उसकी उड़ान भरते हैं और अलग-अलग परिस्थितियों में उसकी क्षमता को परखते हैं।

हर टेस्ट के बाद रिपोर्ट तैयार की जाती है। अगर कोई कमी सामने आती है, तो उसे ठीक करने के लिए वापस निर्माता को भेजा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया समय लेने वाली होती है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित होता है कि विमान पूरी तरह भरोसेमंद हो।

भारतीय सेना में बड़ा फेरबदल, धीरज सेठ बने उप-सेना प्रमुख, सदर्न, ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड को मिले नए चीफ

Indian Army reshuffle 2026
From Left to Right: LT GEN DHIRAJ SETH, LT GEN SANDEEP JAIN, LT GEN VMB KRISHNAN and LT GEN PUSHPENDRA PAL SINGH

Indian Army reshuffle 2026: भारतीय सेना में एक अप्रैल को कई बड़े फेरबदल हुए हैं। इन बदलावों के तहत सेना के कई महत्वपूर्ण पदों पर नए अधिकारियों की नियुक्ति हुई है। इस फेरबदल में सबसे अहम बदलाव यह रहा कि लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ नए वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ बन गए हैं। इसके साथ ही सदर्न, ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड में भी नए कमांडर तैनात किए गए हैं। यह बदलाव सेना की ऑपरेशनल तैयारी और लीडरशिप सिस्टम के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।

Indian Army reshuffle 2026: वाइस चीफ बने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ

सेना में इस समय वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने एक अप्रैल को वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ यानी वीसीओएएस का पद संभाला है। वे इससे पहले सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग थे। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ नेशनल डिफेंस एकेडमी, खड़कवासला के पूर्व छात्र रहे हैं और दिसंबर 1986 में आर्मर्ड कोर में कमीशन हुए थे। करीब चार दशक के लंबे करियर में उन्होंने अलग-अलग तरह के ऑपरेशनल क्षेत्रों में काम किया है।

उन्होंने रेगिस्तान इलाके में आर्मर्ड रेजिमेंट की कमान संभाली, इसके बाद एक आर्मर्ड ब्रिगेड का नेतृत्व किया और जम्मू-कश्मीर में काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स की कमान भी संभाली। बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र कोर की कमान संभाली और दिल्ली एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में भी काम किया।

Indian Army reshuffle 2026
LT GEN DHIRAJ SETH

उन्हें दो बड़ी ऑपरेशनल कमांड संभालने का भी अनुभव है। वे साउथ वेस्टर्न कमांड और सदर्न कमांड दोनों के कमांडर रह चुके हैं। वे उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्हें दो अलग-अलग कमांड संभालने का मौका मिला। माना जा रहा है कि मौजूदा आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी के 30 जून को रिटायर होने के बाद वे अगले आर्मी चीफ का पदभार संभालेंगे। वहीं उनकी जगह पर ईस्टर्न कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहित मल्होत्रा नए वीसीओएस बनेंगे। (Indian Army reshuffle 2026)

लेफ्टिनेंट जनरल सेठ के पास लंबा रणनीतिक और प्रशासनिक अनुभव

लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने सिर्फ फील्ड कमांड ही नहीं संभाली, बल्कि कई अहम स्टाफ और रणनीतिक पदों पर भी काम किया है। वे आर्मी हेडक्वार्टर में असिस्टेंट मिलिट्री सेक्रेटरी रहे और साउथ वेस्टर्न कमांड में ऑपरेशंस से जुड़े पदों पर भी रहे।

इसके अलावा उन्होंने यूनाइटेड नेशंस मिशन इन अंगोला में ऑपरेशंस ऑफिसर के तौर पर भी काम किया। आर्मी में कैपेबिलिटी डेवलपमेंट और लॉन्ग टर्म प्लानिंग से जुड़े कई पदों पर रहकर उन्होंने आधुनिकीकरण योजनाओं में योगदान दिया।

ट्रेनिंग के दौरान भी उनका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। उन्होंने जूनियर कमांड कोर्स में टॉप किया और डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में बेस्ट ऑल राउंड स्टूडेंट ऑफिसर का मेडल हासिल किया।

उनके कार्यकाल के दौरान सेना ने कई बड़े और अहम सैन्य अभ्यास किए, जिनका मकसद भविष्य के युद्ध के लिए तैयारी को मजबूत करना था।

इनमें सबसे प्रमुख था एक्सरसाइज अमोघ ज्वाला, जो हाल ही में झांसी के बबीना फायरिंग रेंज में हुई थी। इसमें सेना ने ड्रोन, अटैक हेलीकॉप्टर, फाइटर एयरक्राफ्ट और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके युद्ध की नई रणनीतियों का अभ्यास किया। माना जा रहा है कि आर्मर्ड कोर में डेडिकेटेड ड्रोन प्लाटून शौर्य स्क्वाड्रन बनाने के पीछे उनकी ही अहम रणनीति है।

वहीं राजस्थान के रेगिस्तान में एक्सरसाइज मरु ज्वाला और अखंड प्रहार का आयोजन उनके ही कार्यकाल में हुआ, जहां सैनिकों ने कठिन हालात में ऑपरेशन करने की क्षमता को परखा। पोखरण में एक्सरसाइज रुद्र शक्ति के दौरान लाइव फायरिंग के साथ मैकेनाइज्ड फोर्स, आर्टिलरी और आर्मी एविएशन की जॉइंट एक्सरसाइज हुई।

इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबसे बड़ी ट्राई सर्विसेस एक्सरसाइज त्रिशूल का आयोजन भी उनके नेतृत्व में सदर्न कमांड ने किया था, जिसमें थल, जल और वायु सेना ने मिलकर काम किया। इन सभी अभ्यासों में लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने खुद समीक्षा की और सैनिकों की तैयारियों को परखा। (Indian Army reshuffle 2026)

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने संभाली सदर्न कमांड की कमान

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने पुणे स्थित सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाल लिया है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ की जगह यह जिम्मेदारी ली है। वे इससे पहले सदर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर तैनात थे। लेफ्टिनेंट जनरल जैन इससे पहले अंबाला स्थित सेकंड कोर, जिसे खड़गा कोर भी कहा जाता है, की कमान संभाल चुके हैं। यह सेना की पश्चिमी मोर्चे पर तैनात सबसे अहम स्ट्राइक फॉर्मेशन में से एक मानी जाती है।

Indian Army reshuffle 2026
LT GEN SANDEEP JAIN

वे भी नेशनल डिफेंस एकेडमी से प्रशिक्षित हैं और जून 1988 में महार रेजिमेंट में कमीशन हुए थे। अपने करियर में उन्होंने अलग-अलग ऑपरेशनल क्षेत्रों में काम किया है। वे देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए) के 52वें कमांडेंट के पद पर भी रह चुके हैं। लेफ्टिनेंट जनरल जैन दिसंबर 2022 से दिसंबर 2023 तक जम्मू के नागरोटा में तैनात व्हाइट नाइट कॉर्प्स के जनरल ऑफिसर कमांडिंग भी रह चुके हैं।

उन्होंने एक इन्फैंट्री बटालियन महार रेजिमेंट की कमान संभाली और संयुक्त राष्ट्र मिशन साउथ सूडान में भी सेवा दी। इसके अलावा उन्होंने स्ट्राइक कोर में इन्फैंट्री ब्रिगेड और नॉर्दर्न कमांड में पिवट कोर का नेतृत्व किया।

वे ऑपरेशन पवन का भी हिस्सा रहे हैं और लाइन ऑफ कंट्रोल तथा नॉर्थ ईस्ट में कई बार काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में तैनात रहे हैं।

सदर्न कमांड का कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने वार मेमोरियल पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि कमांड अपने सभी क्षेत्रों में ऑपरेशनल तैयारी पर ध्यान बनाए रखेगी। (Indian Army reshuffle 2026)

ईस्टर्न कमांड की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन को

लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने ईस्टर्न कमांड के नए कमांडर के तौर पर जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी की जगह ली है, जो 31 मार्च को रिटायर हुए। लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन
डोगरा रेजिमेंट से हैं। वे इससे पहले सेना में क्वार्टरमास्टर जनरल (QMG) के पद पर तैनात थे।

Indian Army reshuffle 2026
LIEUTENANT GENERAL VMB KRISHNAN

वे जून 1988 में सेना में शामिल हुए थे और उनके पास करीब चार दशक का अनुभव है। उन्होंने सियाचिन जैसे कठिन हाई-एल्टीट्यूड इलाके में इन्फैंट्री बटालियन और ब्रिगेड की कमान संभाली है।

इसके अलावा वे 28 इन्फैंट्री डिवीजन (वज्र डिवीजन), जम्मू-कश्मीर और ब्रह्मास्त्र कोर (माउंटेन स्ट्राइक कोर) के कमांडर भी रह चुके हैं। आर्मी हेडक्वार्टर में उन्होंने डायरेक्टर जनरल इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के रूप में काम किया और लंदन में डिफेंस अटैची के पद पर भी रह चुके हैं। (Indian Army reshuffle 2026)

वेस्टर्न कमांड की कमान लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह को

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह ने वेस्टर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाल लिया है। इससे पहले वे वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ के पद पर थे। वे पैराशूट रेजिमेंट स्पेशल फोर्सेज के अधिकारी रहे हैं और दिसंबर 1987 में सेना में कमीशन हुए थे। उन्होंने अपने करियर में नॉर्दर्न और वेस्टर्न सीमाओं पर कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं।

Indian Army reshuffle 2026
LT GEN PUSHPENDRA PAL SINGH

उन्होंने ऑपरेशन पवन में हिस्सा लिया और लाइन ऑफ कंट्रोल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी कई बार तैनात रहे हैं। इससे पहले वे डायरेक्टर जनरल ऑपरेशनल लॉजिस्टिक्स के पद पर भी रह चुके हैं, जहां उन्होंने सेना की लॉजिस्टिक क्षमता को मजबूत करने का काम किया।

कमांड संभालने के बाद उन्होंने ऑपरेशनल तैयारी बनाए रखने, नई तकनीक अपनाने और सैनिकों के मनोबल पर ध्यान देने की बात कही। (Indian Army reshuffle 2026)

राफेल का सोर्स कोड देने से फ्रांस ने किया फिर इनकार, तकनीक को बताया बेहद संवेदनशील

Rafale Source Code India

Rafale Source Code India: भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जा रहे राफेल लड़ाकू विमानों को लेकर फ्रांस ने साफ कर दिया है कि वह भारत को राफेल फाइटर जेट के अहम सोर्स कोड तक पहुंच नहीं देगा। यह जानकारी फ्रांस के बिजनेस आउटलेट L’Essentiel de l’Éco ने अपनी एक रिपोर्ट में दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस ने खास तौर पर तीन अहम सिस्टम्स के सोर्स कोड देने से इनकार किया है। इनमें राफेल का एडवांस एईएसए रडार, मिशन कंप्यूटर सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट शामिल हैं।

इन सिस्टम्स को किसी भी फाइटर जेट का “दिमाग” माना जाता है। यही सिस्टम तय करते हैं कि विमान कैसे दुश्मन को पहचानता है, कैसे प्रतिक्रिया देता है और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में खुद को कैसे सुरक्षित रखता है।

फ्रांस का कहना है कि ये तकनीक बेहद संवेदनशील है और इसे कई सालों की मेहनत से तैयार किया गया है, इसलिए इसे साझा नहीं किया जा सकता।

Rafale Source Code India: क्या होता है सोर्स कोड और क्यों है जरूरी

सोर्स कोड किसी भी सिस्टम का वह मूल सॉफ्टवेयर होता है, जिसके जरिए वह पूरे जहाज को कंट्रोल करता है। अगर किसी देश के पास इसका एक्सेस होता है, तो वह सिस्टम में अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव कर सकता है।

लेकिन अगर सोर्स कोड नहीं मिलता, तो हर बदलाव के लिए मूल निर्माता कंपनी या देश पर निर्भर रहना पड़ता है। राफेल के मामले में इसका मतलब यह होगा कि भारत को हर बड़े बदलाव के लिए फ्रांस की मंजूरी लेनी होगी।

स्वदेशी हथियार जोड़ने में आ सकती है दिक्कत

इस फैसले का असर भारत के अपने हथियार सिस्टम पर भी पड़ सकता है। भारत लंबे समय से अपने स्वदेशी हथियार जैसे अस्त्र मिसाइल या ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की कोशिश कर रहा है।

लेकिन अगर राफेल के सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल नहीं होगा, तो ऐसे हथियारों को सीधे जोड़ना आसान नहीं होगा। इसके लिए बार-बार फ्रांसीसी कंपनियों से अनुमति और तकनीकी सहयोग लेना पड़ेगा। (Rafale Source Code India)

बड़े राफेल सौदे पर भी असर

यह मुद्दा उस समय सामने आया है जब भारत 114 नए रफाल फाइटर जेट खरीदने की योजना पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट को मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम कहा जाता है।

इस संभावित डील की कीमत काफी बड़ी बताई जा रही है और इसमें राफेल भी एक प्रमुख विकल्प माना जा रहा है। लेकिन सोर्स कोड न मिलने की स्थिति में भारत के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है।

2016 में भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल विमान का सौदा हुआ था। यह सौदा तत्काल जरूरतों को देखते हुए किया गया था। लेकिन इसमें भी सोर्स कोड एक्सेस का विकल्प शामिल नहीं था। यानी भारत को विमान तो मिले, लेकिन उसके सभी सिस्टम पर पूरा नियंत्रण नहीं मिला। (Rafale Source Code India)

ऑपरेशन के दौरान क्या असर पड़ सकता है

अगर किसी विमान के सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल नहीं होता है, तो युद्ध के समय तेजी से बदलाव करना मुश्किल हो सकता है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे मामलों में, जहां हर सेकंड की अहमियत होती है।

रडार की सेटिंग बदलना, जामिंग सिस्टम को अपडेट करना या नए खतरे के हिसाब से प्रतिक्रिया देना, ये सभी काम सॉफ्टवेयर पर निर्भर होते हैं। ऐसे में बार-बार फ्रांस की मंजूरी लेने से समय लग सकता है।

हालांकि फ्रांस का यह रुख पूरी तरह अलग नहीं है। दुनिया के कई देश अपनी संवेदनशील तकनीक और सॉफ्टवेयर को साझा करने से बचते हैं। इसका मकसद अपनी तकनीकी बढ़त बनाए रखना और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करना होता है।

पूरा सोर्स कोड नहीं, API मॉडल की पेशकश

इससे पहले खबरें आई थीं कि फ्रांस की तरफ से एक बीच का रास्ता भी सामने आया है, जिसे एपीआई यानी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस कहा जाता है। इस मॉडल में भारत को पूरा सोर्स कोड नहीं मिलेगा, लेकिन इतना एक्सेस दिया जाएगा कि वह अपने सिस्टम और हथियार जोड़ सके। इसे आसान भाषा में “प्लग एंड प्ले” तरीका कहा जा सकता है। इसमें जेट के असली सॉफ्टवेयर को छुए बिना नए हथियार या सिस्टम जोड़े जाते हैं। यानी भारत सीधे सॉफ्टवेयर में बदलाव नहीं करेगा, बल्कि एक इंटरफेस के जरिए काम करेगा। (Rafale Source Code India)

नेटवर्क वॉरफेयर है समय की जरूरत

राफेल जैसे आधुनिक विमान नेटवर्क आधारित युद्ध का हिस्सा होते हैं। इसमें अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर काम करते हैं और रियल टाइम में जानकारी साझा करते हैं। इसे नेट-सेंट्रिक वारफेयर कहा जाता है। इसमें सॉफ्टवेयर और डेटा लिंक की भूमिका बहुत अहम होती है। भारत चाहता है कि उसके विमान भारतीय और विदेशी दोनों तरह के सिस्टम के साथ आसानी से काम कर सकें।

बता दें कि भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट की नई डील को लेकर चर्चा चल रही है। 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी – एओएन दी जा चुकी है। यह डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। इसके साथ ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन भी पहले ही तय किए जा चुके हैं। 114 राफेल में से 18 राफेल सीधे फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में 2030 तक आएंगे, जबकि बाकी बचे 90-96 राफेल मेक इन इंडिया के तहत भारत में असेंबल या निर्मित होंगे। भारत में बने राफेल की डिलीवरी 2031-2032 से शुरू हो सकती है। (Rafale Source Code India)

तेजस एमके-1ए और ट्रेनर जेट एचटीटी-40 की डिलीवरी क्यों अटकी? HAL ने बताई वजह

Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay

Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay: स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए और बेसिक ट्रेनर जेट एचटीटी-40 की डिलीवरी को लेकर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने कहा कि इन दोनों प्रोजेक्ट्स में देरी की बड़ी वजह सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याएं हैं। एचएएल के अनुसार, ज्यो-पॉलिटिक्स दिक्कतों और तकनीकी चुनौतियों के चलते ये दिक्कतें हुईं, जिससे जरूरी उपकरण और इंजन समय पर नहीं मिल सके।

Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay: तेजस एमके-1ए: बार-बार बदला डिलीवरी शेड्यूल

तेजस एमके-1ए भारतीय वायुसेना के लिए तैयार किया जा रहा आधुनिक हल्का लड़ाकू विमान है। पहले इसकी डिलीवरी मार्च 2024 तक करने का लक्ष्य रखा गया था। उस समय योजना यह थी कि इसके बाद लगातार विमान वायुसेना को मिलते रहेंगे।

लेकिन ऐसा नहीं हो सका। समय के साथ इसका शेड्यूल बदलता गया। पहले इसे 2024 के आखिर तक खिसकाया गया, फिर 2025 के आखिर तक कुछ विमानों की डिलीवरी देने का नया लक्ष्य रखा गया। बाद में एचएएल ने कहा कि मार्च 2026 तक पांच विमानों की डिलीवरी कर देगी।

इस देरी की सबसे बड़ी वजह जीई एयरोस्पेस से एफ-404 इंजन की सप्लाई में रुकावट रही। विमान के लिए जरूरी इंजन समय पर नहीं पहुंच पाए, जिससे तैयार एयरफ्रेम भी आगे नहीं बढ़ सके। इसके अलावा विमान के सिस्टम को पूरी तरह जोड़ने और टेस्ट करने में भी समय लगा। वायुसेना इन विमानों को पूरी तरह तैयार स्थिति में ही लेना चाहती है, इसलिए अधूरी तैयारी के साथ डिलीवरी नहीं हो पाई।

एचएएल के पास तेजस मार्क-1ए के कुल 180 विमानों के ऑर्डर हैं। ये ऑर्डर दो बड़े चरणों में दिए गए हैं। इसमें 83 विमान पहले चरण के हैं और 97 विमान दूसरे चरण के। इनमें सिंगल सीटर फाइटर और ट्विन सीटर ट्रेनर दोनों शामिल हैं।

पहला ऑर्डर फरवरी 2021 में रक्षा मंत्रालय ने एचएएल के साथ लगभग 48,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट दिया था। इस डील में 83 तेजस एमके-वन-ए विमान शामिल थे, जिनमें 73 सिंगल सीटर फाइटर और 10 ट्विन सीटर ट्रेनर विमान थे।

वहीं, दूसरा 62,370 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर 25 सितंबर 2025 को साइन हुआ। इसमें 97 तेजस एमके-वन-1ए विमान शामिल हैं, जिनमें 68 सिंगल सीटर फाइटर और 29 ट्विन सीटर ट्रेनर हैं।

एचएएल ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए बेंगलुरु और नासिक में असेंबली लाइनें तैयार की हैं। कंपनी का लक्ष्य सालाना 16 से 24 विमान बनाने का है। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

एचटीटी-40: ट्रेनर विमान डिलीवरी में हुई देरी

एचटीटी-40 एक बेसिक ट्रेनर विमान है, जिसका इस्तेमाल नए पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए शुरुआत में 2025 सितंबर तक ज्यादा संख्या में विमान देने का लक्ष्य तय किया गया था।

लेकिन इसकी डिलीवरी भी समय से पीछे चली गई। हनीवेल कंपनी से इंजन मिलने में समस्या आई। दिसंबर 2025 में लक्ष्य घटाकर सिर्फ तीन विमान कर दिया गया। इंजन की पहली खेप सितंबर 2025 में आने वाली थी, जो जनवरी 2026 तक टल गई। कंपनी ने उत्पादन लाइन तेज करने की कोशिश की, लेकिन उत्पादन की तैयारी होने के बावजूद जरूरी पार्ट्स की कमी ने काम की रफ्तार को धीमा कर दिया।

एचएएल के पास एचटीटी-40 के कुल 70 विमानों का फर्म ऑर्डर है। इसके अलावा 38 और विमानों का विकल्प भी रखा गया है। रक्षा मंत्रालय ने मार्च 2023 में एचएएल के साथ यह कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। अनुबंध की कुल कीमत लगभग 6,828 करोड़ रुपये है। इसमें विमान के साथ जरूरी उपकरण, सिमुलेटर और प्रशिक्षण सामग्री भी शामिल है। डिलीवरी छह साल के अंदर पूरी करने की योजना थी।

वायुसेना को बेसिक ट्रेनर विमानों की जरूरत है। पुराने एचपीटी-32 दीपक ट्रेनर 2014 में सर्विस से बाहर हो गए थे। उसके बाद 75 पिलाटस पीसी-7 एमके-टू ट्रेनर आयात किए गए। लेकिन स्वदेशी विकल्प की जरूरत महसूस होने पर एचटीटी-40 प्रोजेक्ट को बढ़ावा दिया गया। एचएएल ने 2016 में इसका पहला प्रोटोटाइप उड़ाया। उसके बाद अक्टूबर 2022 और मार्च 2023 में अंतिम अनुबंध तय हुआ। इस विमान में हनीवेल का टीपीई331-12बी टर्बोप्रॉप इंजन लगा है।

क्या है सप्लाई चेन की समस्या

एयरोस्पेस सेक्टर में किसी भी विमान को बनाने के लिए कई तरह के पार्ट्स और सिस्टम अलग-अलग जगहों से मंगाए जाते हैं। इनमें इंजन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और कई अहम कंपोनेंट शामिल होते हैं।

अगर इनमें से कोई एक भी हिस्सा समय पर नहीं मिलता, तो पूरा उत्पादन रुक जाता है। एचएएल ने बताया कि तेजस और एचटीटी-40 के साथ भी यही हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और तकनीकी दिक्कतों के कारण सप्लाई में रुकावट आई, जिसका सीधा असर डिलीवरी पर पड़ा। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

दूसरे प्रोडक्ट्स ने संभाली स्थिति

इन दोनों प्रोजेक्ट्स में देरी के बावजूद एचएएल ने अपने दूसरे प्रोडक्ट्स की डिलीवरी तेज कर दी। कंपनी ने एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, एएल-31 एफपी इंजन, आरडी-33 इंजन और अन्य सेवाओं की सप्लाई बढ़ाई।

इन प्रोडक्ट्स की वजह से कंपनी की कुल आय पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। यानी जहां एक तरफ तेजस और एचटीटी-40 की डिलीवरी धीमी रही, वहीं बाकी काम तेजी से चलता रहा, जिससे कंपनी का प्रदर्शन संतुलित बना रहा।

एचएएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डीके सुनील ने कहा कि कंपनी ने मुश्किल हालात में भी अपना काम जारी रखा। उनके मुताबिक, वैश्विक तनाव, संघर्ष और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद कंपनी ने स्थिर ग्रोथ बनाए रखी।

उन्होंने यह भी बताया कि पिछले एक साल में कंपनी ने अपने ऑर्डर बढ़ाए और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत किया।

इन चुनौतियों के बावजूद एचएएल का वित्तीय प्रदर्शन मजबूत रहा। वित्तीय वर्ष 2025-26 में कंपनी का कुल रेवेन्यू बढ़कर 32,250 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल यह 30,981 करोड़ रुपये था।

यह बढ़ोतरी इसलिए संभव हो सकी क्योंकि कंपनी ने दूसरे प्रोडक्ट्स और सेवाओं की डिलीवरी तेज कर दी थी। इससे कुल आय और मुनाफा संतुलित बना रहा। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

ऑर्डर बुक करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये

31 मार्च तक एचएएल की ऑर्डर बुक करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इससे पहले यह 1.89 लाख करोड़ रुपये थी। इस बढ़ोतरी में रक्षा मंत्रालय के साथ हुए बड़े समझौते शामिल हैं। इनमें तेजस एमके-वन-ए विमान के लिए बड़ा ऑर्डर भी शामिल है। इसके अलावा हेलीकॉप्टर और अन्य एयरक्राफ्ट के ऑर्डर भी कंपनी को मिले हैं। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

अब पहाड़ों में नहीं बनेंगे रडार शैडो जोन! भारतीय वायुसेना हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में तैनात करेगी स्वदेशी माउंटेन रडार

IAF Mountain Radar India

IAF Mountain Radar India: भारतीय वायुसेना की निगरानी क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ करीब 1,950 करोड़ रुपये का समझौता किया है, जिसके तहत दो नए माउंटेन रडार खरीदे जाएंगे। इन रडार का मकसद उन इलाकों में निगरानी बढ़ाना है जहां अब तक नजर रखना मुश्किल रहा है।

यह डील पूरी तरह स्वदेशी श्रेणी के तहत की गई है, यानी इन रडार को भारत में ही डिजाइन, डेवलप और मैन्युफैक्चर किया जाएगा। इनका डिजाइन डीआरडीओ के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट ने तैयार किया है, जबकि निर्माण का जिम्मा बीईएल को दिया गया है।

IAF Mountain Radar India: कहां लगाए जाएंगे नए रडार

इन दोनों रडार को देश के दो बेहद संवेदनशील इलाकों में तैनात करने की योजना है। पहला जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग क्षेत्र में लगाया जाएगा, जबकि दूसरा नागालैंड के फुत्सेरो इलाके में तैनात किया जाएगा। ये दोनों स्थान ऐसे हैं जहां पहाड़ी इलाके और गहरी घाटियां मौजूद हैं, जिससे निगरानी करना काफी मुश्किल होता है।

इन क्षेत्रों में लंबे समय से यह समस्या रही है कि आम रडार हर दिशा में सही तरीके से काम नहीं कर पाते। पहाड़ों की ऊंची-नीची बनावट के चलते कई जगहों पर “रडार शैडो जोन” बन जाते हैं, यानी ऐसे हिस्से जहां रडार की नजर नहीं पहुंच पाती।

क्या होती है रडार शैडो की समस्या

पहाड़ी इलाकों में निगरानी करना मैदानों की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। जब रडार किसी ऊंचे पहाड़ के पीछे के हिस्से को नहीं देख पाता, तो वहां एक तरह का ब्लाइंड स्पॉट बन जाता है। इसी को रडार शैडो कहा जाता है।

इसका फायदा दुश्मन उठा सकता है। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले फाइटर जेट, ड्रोन या क्रूज मिसाइल ऐसे इलाकों का इस्तेमाल करके बिना पकड़े आगे बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि इन इलाकों में अतिरिक्त और खास तरह के रडार की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

नए रडार कैसे करेंगे मदद

ये नए माउंटेन रडार खास तौर पर पहाड़ी इलाकों के लिए बनाए गए हैं। इन्हें ऐसे स्थानों पर लगाया जाएगा जहां से वे घाटियों और पहाड़ों के बीच छिपे हिस्सों को भी कवर कर सकें। इनकी खासियत यह है कि ये छोटे आकार वाले टारगेट्स जैसे छोटे ड्रोन या कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को भी ट्रैक कर सकते हैं।

इन रडार को आगे की पोजिशन पर तैनात किया जाएगा, ताकि दुश्मन की गतिविधियों का पहले ही पता लगाया जा सके। साथ ही ये लगातार निगरानी बनाए रखने में सक्षम होंगे, जिससे किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।

एयर डिफेंस सिस्टम का होंगे हिस्सा

भारतीय वायुसेना पहले से ही एक मजबूत सर्विलांस नेटवर्क का इस्तेमाल करती है। इसमें अलग-अलग तरह के रडार, हवाई चेतावनी सिस्टम, एयरोस्टैट और स्पेस बेस्ड इनपुट शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर एक पूरा एयर पिक्चर तैयार करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि आसमान में क्या गतिविधि चल रही है।

नए माउंटेन रडार भी इसी नेटवर्क का हिस्सा होंगे। इन्हें इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा जाएगा। इस सिस्टम के जरिए अलग-अलग जगहों से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर रीयल टाइम में स्थिति का आकलन किया जाता है। (IAF Mountain Radar India)

मौजूदा रडार सिस्टम के साथ तालमेल

भारतीय वायुसेना के पास पहले से कई तरह के रडार सिस्टम मौजूद हैं। इनमें रोहिणी मीडियम रेंज रडार शामिल है, जो मध्यम दूरी तक निगरानी कर सकता है। इसके अलावा अरुद्र रडार है, जिसकी रेंज काफी ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक नजर रख सकता है।

अश्विनी लो लेवल रडार भी इस्तेमाल किया जाता है, जो कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को पकड़ने में सक्षम है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में इन रडार की क्षमता सीमित हो जाती है। ऐसे में नए माउंटेन रडार इन सिस्टम्स के बीच की कमी को पूरा करेंगे और एक बेहतर कवरेज देंगे। (IAF Mountain Radar India)

ड्रोन और मिसाइल से बढ़ी चुनौती

हाल के युद्धों में यह साफ देखा गया है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और प्रिसीजन गाइडेड हथियार एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ये छोटे आकार के होते हैं और कई बार पारंपरिक रडार से बच निकलते हैं।

पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन युद्ध में इस तरह के हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। इससे यह समझ आया है कि केवल लंबी दूरी के रडार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि हर स्तर पर निगरानी जरूरी है।

इस पूरे प्रोजेक्ट की एक खास बात यह भी है कि यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। रडार का डिजाइन देश में तैयार किया गया है और इसका निर्माण भी भारतीय कंपनी द्वारा ही किया जाएगा।

इन रडार के साथ जरूरी उपकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जाएगा, ताकि इन्हें सीमावर्ती इलाकों में आसानी से ऑपरेट किया जा सके। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां काफी कठिन होती हैं, इसलिए इन सिस्टम को उसी हिसाब से डिजाइन किया गया है।

रडार के इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग के बाद यह लगातार काम करते हुए सीमाओं पर नजर रखेंगे। इनके जरिए वायुसेना को समय पर जानकारी मिलेगी, जिससे जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। (IAF Mountain Radar India)

भारतीय नौसेना को डिलीवर हुआ माहे क्लास का दूसरा जहाज INS Malwan, उथले समुद्र में दुश्मन पनडुब्बियों का करेगा शिकार

INS Malwan
INS Malwan

INS Malwan: भारतीय नौसेना को एक और स्वदेशी युद्धपोत मिला है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में तैयार किया गया माहे क्लास कैटेगरी का एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस मालवान नौसेना को सौंपा गया। इस कैटेगरी के आठ जहाज बनाए जाने हैं, जिनमें यह दूसरा जहाज है, जिसे खास तौर पर समुद्र के उथले इलाकों में पनडुब्बियों से निपटने के लिए तैयार किया गया है।

यह जहाज पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है और इसे नौसेना की जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया है।

INS Malwan: ‘मालवान’ नाम के पीछे की कहानी

इस जहाज का नाम महाराष्ट्र के एतिहासिक तटीय शहर मालवान के नाम पर रखा गया है। यह इलाका छत्रपति शिवाजी महाराज की समुद्री ताकत और रणनीति से जुड़ा रहा है। समुद्र में उनकी मजबूत पकड़ और किलों के नेटवर्क के कारण मालवान का खास महत्व रहा है।

इसके साथ ही यह नाम भारतीय नौसेना के पुराने जहाज आईएनएस मालवान की परंपरा को भी आगे बढ़ाता है, जो पहले माइंसवीपर के रूप में सर्विस में था और 2003 तक नौसेना का हिस्सा रहा। इस तरह पुराने गौरवशाली नामों को नए जहाजों में जीवित रखने की परंपरा जारी रखी गई है। (INS Malwan)

किस तरह का जहाज है ‘मालवान’

‘मालवान’ को एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट कहा जाता है। इसका मतलब है कि यह जहाज खास तौर पर समुद्र के कम गहराई वाले हिस्सों में काम करने के लिए बनाया गया है, जहां पनडुब्बियों का पता लगाना मुश्किल होता है।

इसकी लंबाई करीब 78 मीटर के आसपास है, जबकि चौड़ाई लगभग 11.3 से 11.36 मीटर तक है। जहाज का ड्रॉट यानी पानी में डूबने की गहराई अधिकतम 2.7 मीटर है, जिससे यह उथले पानी में भी आसानी से ऑपरेशन कर सकता है। इसका कुल वजन करीब 900 से 1100 टन के बीच है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह तेजी से मूव कर सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सके।

यह जहाज अधिकतम 25 नॉट्स की रफ्तार से चल सकता है, जो समुद्र में तेज गति मानी जाती है। अगर इसे सामान्य गति यानी 14 नॉट्स पर चलाया जाए, तो यह करीब 1800 नॉटिकल मील तक बिना रुके सफर कर सकता है। इसमें कुल 57 लोग तैनात रहते हैं, जिनमें 7 अधिकारी और 50 नाविक शामिल होते हैं।

इस जहाज में तीन डीजल इंजन लगे हैं, जो वॉटरजेट प्रोपल्शन सिस्टम के जरिए इसे आगे बढ़ाते हैं। इसका मतलब यह है कि जहाज पानी को पीछे की ओर तेजी से फेंककर आगे बढ़ता है, जिससे इसकी दिशा बदलने की क्षमता बेहतर होती है और यह कम आवाज के साथ चलता है। यही वजह है कि दुश्मन पनडुब्बियों के लिए इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा इसमें स्टीथ और सिग्नेचर रिडक्शन तकनीक भी दी गई है, जिससे यह रडार और सोनार पर आसानी से नजर नहीं आता। (INS Malwan)

पनडुब्बियों से मुकाबले की खास तैयारी

इस जहाज की सबसे बड़ी खासियत इसकी पनडुब्बी रोधी क्षमता है। इसमें ऐसे आधुनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो पानी के नीचे छिपे दुश्मन का पता लगाने में मदद करते हैं।

इसमें अभय हल-माउंटेड सोनार लगाया गया है, जो पानी के अंदर छिपे टारगेट्स का पता लगाने में मदद करता है। इसके साथ ही लो फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार भी है, जिसे पानी में नीचे उतारकर गहराई में मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाया जा सकता है।

जहाज के हथियारों की बात करें तो ‘मालवान’ को खास तौर पर पनडुब्बियों से लड़ने के लिए तैयार किया गया है। इसमें आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर लगाया गया है, जो दुश्मन पनडुब्बियों पर रॉकेट से हमला करता है। इसके अलावा इसमें दो ट्रिपल लाइटवेट टॉरपीडो लॉन्चर हैं, जिनसे कुल छह टॉरपीडो दागे जा सकते हैं। ये टॉरपीडो खास तौर पर उथले पानी में पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं।

इसके अलावा सतह पर मौजूद खतरों से निपटने के लिए इसमें 30 मिलीमीटर की नेवल सरफेस गन लगाई गई है, जो नजदीकी लक्ष्य पर हमला करने के काम आती है। इसके अलावा दो 12.7 मिलीमीटर की रिमोट कंट्रोल गन भी हैं, जिन्हें दूर से ऑपरेट किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तेज फायरिंग की जा सकती है। (INS Malwan)

कई तरह के ऑपरेशन में काम आने वाला जहाज

‘मालवान’ सिर्फ पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए ही नहीं, बल्कि कई अन्य ऑपरेशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह जहाज पानी के नीचे निगरानी करने के अलावा लो इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशंस में भी काम आता है।

जहाज में माइन बिछाने की भी क्षमता है, जिससे समुद्र में दुश्मन के रास्ते को रोका जा सकता है। जरूरत पड़ने पर माइन वॉरफेयर यानी समुद्र में बिछे खतरों से निपटने का काम भी किया जा सकता है। साथ ही टॉरपीडो डिकॉय लॉन्चर भी लगाए गए हैं, जो दुश्मन के टॉरपीडो को भ्रमित कर जहाज को सुरक्षित रखते हैं। इसके जरिए समुद्र में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

तटीय सुरक्षा और गश्त के दौरान यह जहाज लगातार निगरानी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे किसी भी खतरे का समय रहते पता लगाया जा सके। (INS Malwan)

आधुनिक तकनीक से लैस

मालवान में आधुनिक रडार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं, जो समुद्र में दूर तक निगरानी कर सकते हैं। इनकी मदद से जहाज आसपास की गतिविधियों पर नजर रख सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई कर सकता है।

ऑपरेशन को आसान और प्रभावी बनाए रखने के लिए जहाज के अंदर कई ऑटोमेटेड सिस्टम भी लगाए गए हैं, जिससे जहाज पर काम करने वाले क्रू को भी बेहतर सहायता मिलती है।

‘मालवान’ की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। जहाज पर लगे कई उपकरण और सिस्टम भारत में ही विकसित किए गए हैं। (INS Malwan)

क्या है माहे क्लास

यह जहाज माहे क्लास का हिस्सा है। इस क्लास के तहत कुल आठ जहाज बनाए जा रहे हैं, जिन्हें कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड, कोच्चि में तैयार किया जा रहा है। ‘मालवान’ इस पूरी सीरीज का दूसरा जहाज है। ‘माहे’ इस सीरीज का पहला यानी लीड शिप माना जाता है। इसे अक्टूबर 2025 में नौसेना को सौंपा गया था और बाद में नवंबर 2025 में इसे औपचारिक तौर पर नौसेना में शामिल किया गया। (INS Malwan)

इस पूरे प्रोजेक्ट के तहत कुल 16 ऐसे जहाज बनाए जा रहे हैं। इनमें से आठ कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड बना रहा है, जिन्हें माहे क्लास कहा जाता है, जबकि बाकी आठ जहाज कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स बना रही है, जिन्हें अर्णाला क्लास के नाम से जाना जाता है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत अप्रैल 2019 में हुई थी, जब रक्षा मंत्रालय ने इन जहाजों के निर्माण का अनुबंध किया था। इसके बाद अलग-अलग चरणों में इन जहाजों का निर्माण और लॉन्चिंग शुरू हुई।

इस कैटेगरी के जहाजों का मुख्य काम तटीय इलाकों में निगरानी रखना, पानी के नीचे होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर पनडुब्बियों को निशाना बनाना होता है। इसके अलावा ये जहाज लो इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशन, सर्च एंड रेस्क्यू और माइन वॉरफेयर जैसे कामों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। (INS Malwan)

दुश्मनों पर नजर रखने आया ‘शाची’, भारतीय नौसेना को मिला नया दमदार नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल

Shachi Offshore Patrol Vessel NGOPV
Shachi Offshore Patrol Vessel NGOPV

Shachi Offshore Patrol Vessel: गोवा शिपयार्ड लिमिटेड ने पहले नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल ‘शाची’ को आज नौसेना को डिलीवर किया। इस जहाज को यार्ड 1280 के नाम से तैयार किया गया है और यह कुल 11 ऐसे जहाजों की सीरीज का पहला प्लेटफॉर्म है। लॉन्चिंग के दौरान पारंपरिक तरीके से जहाज को पानी में उतारा गया, जिसे नौसेना में एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।

इस मौके पर डिप्टी चीफ ऑफ नेवल स्टाफ वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने इसे एक ऐतिहासिक क्षण बताया और कहा कि यह नए क्लास के युद्धपोत की शुरुआत है, जो भारत की समुद्री क्षमता को नए स्तर पर ले जाएगा।

उन्होंने कहा कि यह जहाज कई सालों की योजना, डिजाइन और मेहनत का परिणाम है और इससे भारतीय नौसेना की भूमिका हिंद महासागर क्षेत्र और उससे आगे भी और मजबूत होगी।

Shachi Offshore Patrol Vessel: ‘शाची’ नाम का क्या है मतलब

इस जहाज का नाम ‘शाची’ रखा गया है, जो भारतीय पौराणिक परंपरा से लिया गया है। इस नाम का अर्थ होता है सहायता देने वाली। नौसेना के अनुसार, यह नाम जहाज की भूमिका के मुताबिक है, क्योंकि ऐसे जहाज कई तरह के मिशन में मददगार होते हैं।

जहाज के प्रतीक चिन्ह में उर्सा मेजर नक्षत्र और लाल-सफेद लाइटहाउस दिखाया गया है। यह समुद्र में मार्गदर्शन और सुरक्षा का संकेत देता है।

दो शिपयार्ड में बन रहे हैं जहाज

नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (NGOPV) प्रोजेक्ट के तहत कुल 11 जहाज बनाए जा रहे हैं। इनका निर्माण गोवा और कोलकाता, दोनों जगहों पर एक साथ किया जा रहा है। गोवा शिपयार्ड लिमिटेड और कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स मिलकर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहे हैं। दो शिपयार्डों में बनाने का मकसद यह है कि इससे जहाजों की डिलीवरी समय पर हो सके और नौसेना को जल्दी नई क्षमता मिल सके। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

क्या काम करेंगे यह जहाज

ये नए ऑफशोर पेट्रोल वेसल कई तरह के काम के लिए तैयार किए गए हैं। इनका इस्तेमाल समुद्र में निगरानी करने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के लिए किया जाएगा।

इसके अलावा ये जहाज सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में भी काम आएंगे, जहां समुद्र में फंसे लोगों को बचाने की जरूरत होती है। समुद्री इलाकों में मौजूद ऑयल रिग्स और अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों की सुरक्षा में भी इनकी भूमिका होगी।

इन जहाजों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ यानी एचएडीआर ऑपरेशन में भी इस्तेमाल हो सकें। प्राकृतिक आपदा के समय राहत सामग्री पहुंचाने और बचाव कार्य करने में ये काफी मददगार होते हैं। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

शाची में क्या हैं खूबियां

‘शाची’ जैसे जहाज पुराने ऑफशोर पेट्रोल वेसल की तुलना में ज्यादा आधुनिक हैं। इसमें नए तरह के सिस्टम लगाए गए हैं, जिससे इसकी ऑपरेशन क्षमता बेहतर हुई है। इसमें एडवांस रडार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं, जिससे समुद्र में दूर तक निगरानी की जा सकती है।

जहाज में हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के लिए डेक और हैंगर की सुविधा दी गई है। इससे जरूरत पड़ने पर हवाई मदद भी ली जा सकती है। यह जहाज लंबे समय तक समुद्र में रहकर काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इन्हें इस तरह बनाया गया है कि ये तटीय इलाकों से लेकर गहरे समुद्र तक आसानी से ऑपरेशन कर सकें।

इस जहाज का डिजाइन और निर्माण भारत में ही किया गया है। इसमें बड़ी मात्रा में स्वदेशी तकनीक और सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

नौसेना के लिए क्यों है अहम

भारतीय नौसेना पहले से ही ऑफशोर पेट्रोल वेसल का इस्तेमाल करती रही है, लेकिन अब नए जहाजों के आने से उसकी क्षमता और बढ़ेगी। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए ऐसे जहाजों की जरूरत महसूस की जा रही थी।

इस मौके पर भारतीय नौसेना के वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने कहा कि नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल जैसे प्लेटफॉर्म को नौसेना में शामिल करना जरूरी कदम है, जिससे वर्तमान और उभरती चुनौतियों के लिए तैयार रहा जा सके। यह पहल आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान की सोच को मजबूत करती है और यह भी दिखाती है कि भारत अब जटिल नौसैनिक प्लेटफॉर्म को खुद डिजाइन और तैयार करने की क्षमता हासिल कर चुका है।

उन्होंने आगे कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र और उससे आगे के भू-राजनीतिक माहौल को आकार देने में भारतीय नौसेना की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हाल के वैश्विक घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि एक मजबूत नौसेना कितनी जरूरी है। बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और संघर्षों के बीच भारतीय नौसेना देश की समुद्री शक्ति का प्रमुख प्रतीक बनी हुई है और कूटनीति व क्षेत्रीय स्थिरता में भी अहम भूमिका निभा रही है। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की क्षमता

इन जहाजों को मल्टी-डोमेन ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। ये एक साथ कई तरह के मिशन को अंजाम दे सकता हैं। इस तरह के प्लेटफॉर्म आधुनिक जरूरतों के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं, ताकि अलग-अलग परिस्थितियों में उनका उपयोग किया जा सके। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में न्याय की धीमी रफ्तार, 11 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग

Armed Forces Tribunal pending cases

Armed Forces Tribunal pending cases: देश की अदालतों की तरह सैनिकों और पूर्व सैनिकों को न्याय देने के लिए बनाया गया आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) भी केसों के बोझ तले दबा है। यहां पेंडिंग मामलों की संख्या हजारों में पहुंच गई है और कई जगहों पर जरूरी पद खाली होने के चलते मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है।

रक्षा मंत्रालय ने 30 मार्च को राज्यसभा में जानकारी दी कि पिछले पांच साल में एएफटी के सामने कुल 44,622 मामले आए। इनमें से 33,525 मामलों का निपटारा हो चुका है, लेकिन अभी भी 11,097 मामले लंबित हैं। यह कुल मामलों का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।

Armed Forces Tribunal pending cases: क्या है आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल

आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल की स्थापना साल 2007 में एक विशेष कानून के तहत की गई थी। इसका मकसद था कि सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े मामलों का जल्दी और विशेषज्ञ तरीके से निपटारा हो सके।

यह ट्रिब्यूनल उन मामलों को सुनता है जो सैनिकों की भर्ती, नियुक्ति, प्रमोशन, पेंशन, सेवा शर्तों और अनुशासन से जुड़े होते हैं। इसके अलावा कोर्ट मार्शल के फैसलों के खिलाफ अपील भी यहीं की जाती है।

पहले ऐसे मामलों के लिए सैनिकों को हाई कोर्ट या अन्य सिविल अदालतों का सहारा लेना पड़ता था, जहां मामलों में काफी समय लग जाता था। इसी वजह से एएफटी को बनाया गया था ताकि न्याय जल्दी मिल सके।

पांच साल में बढ़े मामलों के आंकड़े

रक्षा मंत्रालय के अनुसार 2021 से लेकर जनवरी 2026 तक लगातार मामले दर्ज होते रहे। इस दौरान कुल 44,622 केस दाखिल हुए। इनमें से 33,525 मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन 11,097 मामले अभी भी बाकी हैं। इसका मतलब यह है कि हर चार में से एक मामला अभी भी पेंडिंग है।

साल के हिसाब से देखें तो पेंडिंग केसों की संख्या में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। 2021 में 3,431 मामले लंबित थे। इसके बाद 2023 में यह संख्या घटकर 534 रह गई थी।

लेकिन इसके बाद फिर बढ़ोतरी हुई और 2025 में लंबित मामलों की संख्या 2,795 तक पहुंच गई। 2026 के शुरुआती महीनों में 406 मामले पेंडिंग बताए गए हैं, हालांकि यह शुरुआत के महीनों का ही आंकड़ा है।

अलग-अलग बेंच में खाली पद बड़ी वजह

एएफटी की सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग बेंच में खाली पदों की है। कई रीजनल बेंच पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं क्योंकि वहां जरूरी सदस्य मौजूद नहीं हैं। श्रीनगर, जबलपुर और गुवाहाटी बेंच में दो-दो पद खाली हैं। इसके अलावा चंडीगढ़, लखनऊ, कोच्चि, चेन्नई और कोलकाता जैसी बेंचों में भी स्टाफ की कमी है।

इसके उलट नई दिल्ली की प्रिंसिपल बेंच पूरी तरह से भरी हुई है, जहां चेयरपर्सन सहित सभी पद मौजूद हैं। एएफटी में दो तरह के सदस्य होते हैं, न्यायिक सदस्य और प्रशासनिक सदस्य। न्यायिक सदस्य आमतौर पर हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं, जबकि प्रशासनिक सदस्य सेना के वरिष्ठ अधिकारी होते हैं। जब इन पदों में कमी होती है तो मामलों की सुनवाई धीमी पड़ जाती है।

सुनवाई में देरी का असर 

केस की सुनवाई समय पर न होने से इसका सीधा असर सैनिकों और उनके परिवारों पर पड़ता है। अधिकतर मामले पेंशन, प्रमोशन, मेडिकल बोर्ड, सेवा शर्तों और कोर्ट मार्शल से जुड़े होते हैं। कई बार सैनिक या उनके परिवार सालों तक फैसले का इंतजार करते रहते हैं। कई मामलों खासकर पेंशन से जुड़े केसों में यह देरी आर्थिक परेशानी भी पैदा करती है। पूर्व सैनिकों के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि रिटायरमेंट के बाद उनकी आय का मुख्य स्रोत पेंशन ही होता है।

देशभर में फैली हैं एएफटी की बेंच

एएफटी की बेंच देश के अलग-अलग हिस्सों में बनाई गई हैं, ताकि सैनिकों को अपने इलाके में ही न्याय मिल सके।
उत्तर भारत में चंडीगढ़ और लखनऊ, पूर्वोत्तर में गुवाहाटी, दक्षिण में चेन्नई और कोच्चि, मध्य भारत में जबलपुर और जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर जैसी जगहों पर बेंच काम करती हैं। इन बेंचों का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि सैनिक देश के अलग-अलग और दूरदराज इलाकों में तैनात रहते हैं। अगर इन बेंचों में स्टाफ की कमी रहती है, तो वहां के सैनिकों को ज्यादा परेशानी होती है।

सरकार ने मानी कमी, लेकिन समयसीमा नहीं बताई

रक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा में यह स्वीकार किया कि कई बेंच में स्टाफ की कमी है और इससे काम प्रभावित हो रहा है। हालांकि, मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि इन खाली पदों को कब तक भरा जाएगा। यही वजह है कि यह मुद्दा अब चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

लगातार बढ़ रहा काम का दबाव

एएफटी पर काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है। हर साल नए मामले दर्ज हो रहे हैं और पुराने मामलों का निपटारा भी करना होता है। हालांकि ट्रिब्यूनल ने बड़ी संख्या में मामलों को निपटाया है, लेकिन फिर भी पेंडिंग मामलों की संख्या काफी ज्यादा बनी हुई है। इससे साफ है कि मौजूदा संसाधनों के साथ सभी मामलों को समय पर निपटाना आसान नहीं है।