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संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन पर पैसे का संकट, दुनिया में बढ़ रहे युद्ध लेकिन 25 साल में सबसे कम हुए शांति सैनिक

SIPRI UN Peacekeeping Crisis

SIPRI UN Peacekeeping Crisis: दुनिया भर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र और दूसरे बहुराष्ट्रीय शांति मिशन अब गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। सैनिकों की संख्या लगातार घट रही है, बड़े देश फंड देने में देरी कर रहे हैं और वैश्विक राजनीति के कारण कई मिशनों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों की भूमिका और कमजोर हो सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 के अंत तक दुनिया भर के शांति मिशनों में तैनात अंतरराष्ट्रीय सैनिकों और कर्मचारियों की संख्या घटकर 78,633 रह गई। यह पिछले 25 सालों में सबसे कम आंकड़ा माना जा रहा है। SIPRI ने बताया कि 2016 के मुकाबले यह संख्या लगभग 49 प्रतिशत कम हो चुकी है। केवल 2025 में ही इसमें 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

सिपरी के पीस ऑपरेशंस एंड कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट प्रोग्राम के निदेशक डॉ. जायर वान डर लाइन ने कहा कि अगर यही हाल रहा तो मल्टीलेटरल कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट मेकेनिज्म बहुत कमजोर हो सकती है। उनके मुताबिक फंडिंग संकट, राजनीतिक दबाव और भू-राजनीतिक टकराव मिलकर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को किनारे कर रहे हैं। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)

रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2025 में दुनिया के 34 देशों और क्षेत्रों में कुल 58 बहुपक्षीय शांति मिशन सक्रिय थे। यह संख्या 2024 के मुकाबले तीन कम रही। सबसे ज्यादा मिशन सब-सहारन अफ्रीका और यूरोप में रहे, जहां 18-18 मिशन ऑपरेट किए गए। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में 14, अमेरिका क्षेत्र में 5 और एशिया-ओशिनिया में 3 मिशन सक्रिय रहे।

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कुल शांति सैनिकों में से लगभग 70 फीसदी केवल सब-सहारन अफ्रीका में तैनात थे। हालांकि सबसे ज्यादा कटौती भी इसी क्षेत्र में हुई। अफ्रीका में तैनात सैनिकों की संख्या में 21 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

SIPRI UN Peacekeeping Crisis: संयुक्त राष्ट्र पर बढ़ा फंडिंग संकट

सिपरी रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता संयुक्त राष्ट्र के फंडिंग संकट को बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक कई बड़े देशों ने संयुक्त राष्ट्र को अपनी निर्धारित आर्थिक मदद समय पर नहीं दी। कुछ देशों ने पूरा पैसा भी जमा नहीं किया। इसी कारण जुलाई 2025 तक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों के सामने करीब 2 अरब डॉलर की कमी आ गई थी। यह रकम पूरे 5.6 अरब डॉलर के बजट का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा थी।

इस संकट के कारण संयुक्त राष्ट्र को अपने खर्चों में भारी कटौती करनी पड़ी। रिपोर्ट में कहा गया कि खर्च कम करने के लिए कई मिशनों में सैनिकों और कर्मचारियों की संख्या घटाई गई। कुछ मिशनों में यूनिफॉर्म पहनने वाले कर्मियों की संख्या में करीब 25 फीसदी तक कटौती हुई। साथ ही सिविलियन स्टाफ भी कम किया गया।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी 2026 की शुरुआत में चेतावनी दी थी कि अगर सदस्य देशों ने समय पर फंड नहीं दिया तो संगठन आर्थिक पतन की स्थिति में पहुंच सकता है।

लेबनान मिशन पर भी बढ़ा विवाद

रिपोर्ट में लेबनान में तैनात संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (UNIFIL) का भी जिक्र किया गया है। अमेरिका चाहता था कि इस मिशन को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई देशों ने इसका विरोध किया। आखिरकार समझौते के तहत मिशन को दिसंबर 2026 तक आखिरी बार बढ़ाया गया।

रिपोर्ट में कहा गया कि यह मामला दिखाता है कि अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सहमति बनाना कितना मुश्किल हो गया है। स्थायी सदस्य देशों के बीच टकराव और वीटो की राजनीति के कारण नए मिशन शुरू करना और पुराने मिशनों को जारी रखना कठिन हो रहा है। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)

अफ्रीका में लगातार घट रहे मिशन

सिपरी रिपोर्ट के मुताबिक अफ्रीकी क्षेत्रीय संगठनों को भी गंभीर आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अफ्रीकी यूनियन, इकॉनमिक कम्यूनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट्स (ECOWAS) और दूसरे संगठनों के कई मिशन या तो बंद हो गए या उनमें कटौती की गई।

रिपोर्ट में बताया गया कि सोमालिया में अफ्रीकन यूनियन ट्रांजिशन मिशन (ATMIS) को बंद करके उसकी जगह अफ्रीकन यूनियन सपोर्ट एंड स्टेबलाइजेशन मिशन इन सोमालिया (AUSSOM) मिशन शुरू किया गया। हालांकि नए मिशन का उद्देश्य लगभग वही रखा गया है। इसका मकसद सोमालिया सरकार को अल-शबाब जैसे आतंकी संगठनों से लड़ने में मदद करना है।

वहीं डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में साउथर्न अफ्रीकन डेवलपमेंट कम्यूनिटी मिशन इन द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो (SAMIDRC) को मार्च 2025 में बंद कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार वहां सुरक्षा हालात लगातार बिगड़ रहे थे और मिशन के जवान भी हमलों का शिकार हुए थे।

भारत समेत ग्लोबल साउथ देशों की बड़ी भूमिका

सिपरी रिपोर्ट में कहा गया कि शांति मिशनों में सबसे ज्यादा सैनिक देने वाले सभी शीर्ष 10 देश ग्लोबल साउथ से थे। युगांडा सबसे बड़ा सैन्य योगदानकर्ता देश बना। इसके बाद नेपाल, बांग्लादेश और भारत का नाम शामिल रहा।

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। भारतीय सैनिक अफ्रीका, मध्य पूर्व और दूसरे संवेदनशील इलाकों में कई दशकों से तैनात रहे हैं। रिपोर्ट में भारत को दुनिया के प्रमुख सैन्य योगदानकर्ताओं में शामिल किया गया है। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)

हैती और गाजा में नए प्रयोग

रिपोर्ट के अनुसार 2025 में दो नए मिशन शुरू किए गए। पहला सोमालिया में AUSSOM और दूसरा हैती में गैंग सप्रेशन फोर्स (GSF)।

हैती में पहले मौजूद मल्टीनेशनल सिक्योरिटी सपोर्ट मिशन को बंद कर दिया गया था। उसकी जगह नई GSF फोर्स बनाई गई। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक यह मिशन अभी भी अपनी पूरी ताकत तक नहीं पहुंच पाया है।

इसी तरह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गाजा में एक अंतरराष्ट्रीय स्टेबिलाइजेशन फोर्स को भी मंजूरी दी, लेकिन 2025 के अंत तक वहां कोई सैनिक तैनात नहीं किया गया था। मिशन केवल तैयारी के चरण में था। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)

यूक्रेन और सूडान जैसे संघर्षों में गतिरोध

रिपोर्ट में कहा गया कि यूक्रेन, सूडान, सीरिया और यमन जैसे संघर्षों में नए बहुपक्षीय मिशन शुरू नहीं हो पाए। इसका कारण राजनीतिक मतभेद और बड़े देशों के बीच टकराव बताया गया है।

सिपरी के शोधकर्ताओं ने कहा कि कई क्षेत्रीय संगठन भी अब संयुक्त राष्ट्र की तरह विभाजित हो चुके हैं। ऐसे में संघर्ष प्रबंधन की जिम्मेदारी धीरे-धीरे छोटे समूहों, द्विपक्षीय समझौतों और अस्थायी सैन्य गठबंधनों की तरफ जा रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि रवांडा, यूएई, तुर्किये, कतर और सऊदी अरब जैसे देश अब अलग-अलग क्षेत्रों में सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं। कई जगह ये देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर सैन्य या राजनीतिक भूमिका निभा रहे हैं।

सिपरी ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अगर बहुपक्षीय शांति मिशनों की संख्या और संसाधन इसी तरह घटते रहे, तो संघर्ष प्रबंधन और कठिन हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और हिंसा पहले से ही बढ़ रही है, जबकि शांति मिशनों की क्षमता लगातार कमजोर पड़ रही है। (SIPRI UN Peacekeeping Crisis)

भारतीय सेना की नई ‘कौटिल्य’ एप रखेगी हथियारों से राशन तक सब पर नजर, कमांडरों को मिलेगा रियल टाइम इंटेलिजेंस

Indian Army Kautilya App

Indian Army Kautilya App: भारतीय सेना ने डिजिटल वारफेयर और मॉडर्न मिलिट्री मैनेजमेंट की तरफ कदम बढ़ाते हुए हाल ही में नई एआई बेस्ड एप्लिकेशन “कौटिल्य” लॉन्च की है। यह एप भारतीय सेना के लिए एक एडवांस कमांड इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म की तरह काम करेगी। सेना का कहना है कि इसका मकसद डेटा को तेजी से जुटाना, उसका विश्लेषण करना और कमांडरों को तुरंत सही जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि फैसले जल्दी और बेहतर तरीके से लिए जा सकें।

भारतीय सेना की तरफ से एक्स पर दी जानकारी के मुताबिक, “भारतीय सेना ने ‘कौटिल्य’ नाम की नई एप्लिकेशन लॉन्च की है, जिसका उद्देश्य स्ट्रक्चर्ड डेटा जेनरेशन को मजबूत करना और एआई-रेडी डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करना है।

यह एप्लिकेशन सोर्स लेवल पर टैबलेट आधारित डेटा एंट्री को सपोर्ट करती है और भारतीय सेना के दूसरे डेटा प्लेटफॉर्म्स के साथ इंटीग्रेट होकर काम करती है।

एआई एनेबल्ड डैशबोर्ड्स और एनएलपी आधारित इंटरफेस से लैस ‘कौटिल्य’ भारतीय सेना में बेहतर एनालिटिक्स, रियल टाइम डिसीजन मेकिंग और एडमिनिस्ट्रेटिव एफिशिएंसी बढ़ाने में मदद करेगी।”

Indian Army Kautilya App: चाणक्य के नाम पर रखा गया ‘कौटिल्य’

इस एप का नाम प्राचीन भारतीय रणनीतिकार और अर्थशास्त्री चाणक्य यानी कौटिल्य के नाम पर रखा गया है। चाणक्य को रणनीति, प्रशासन और खुफिया व्यवस्था का बड़ा विशेषज्ञ माना जाता है। भारतीय सेना ने इस नाम के जरिए पारंपरिक रणनीतिक सोच और आधुनिक टेक्नोलॉजी को जोड़ने की कोशिश की है।

सेना के अधिकारियों के मुताबिक यह प्लेटफॉर्म “डेटा टू डिसीजन” यानी डेटा से तुरंत फैसले लेने की क्षमता बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसका इस्तेमाल ऑपरेशनल प्लानिंग से लेकर प्रशासनिक कामों तक किया जाएगा।

कैसे काम करेगी यह एप

“कौटिल्य” एप कई अलग-अलग स्रोतों से जानकारी इकट्ठा कर सकती है। इसमें टैबलेट इनपुट, फील्ड रिपोर्ट, स्कैन किए गए डॉक्यूमेंट, हैंडरिटन रिपोर्ट और डिजिटल फाइलें शामिल हैं।

मैदान में मौजूद जवान और अधिकारी सीधे टैबलेट के जरिए डेटा दर्ज कर सकेंगे। इससे कागजी काम कम होगा और जानकारी तुरंत सिस्टम तक पहुंच जाएगी। सेना का मानना है कि इससे रिपोर्टिंग में देरी कम होगी और यूनिट्स के बीच बेहतर कॉर्डिनेशन बनेगा।

यह एप भारतीय सेना के पहले से मौजूद कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ भी जुड़ सकती है। इसमें सैनिकों की जानकारी, हथियारों का रिकॉर्ड, ट्रेनिंग स्टेटस, राशन सप्लाई, उपकरणों की स्थिति और ऑपरेशनल रेडिनेस से जुड़ा डेटा शामिल रहेगा। (Indian Army Kautilya App)

एआई डैशबोर्ड से मिलेगी रियल टाइम जानकारी

“कौटिल्य” की सबसे बड़ी खासियत इसका एआई एनेबल्ड डैशबोर्ड माना जा रहा है। इस डैशबोर्ड के जरिए कमांडर एक ही जगह पर कई तरह की जानकारी देख सकेंगे।

उदाहरण के तौर पर किसी यूनिट की ट्रेनिंग स्थिति, हथियारों की उपलब्धता, रसद व्यवस्था, गोला-बारूद की स्थिति और ऑपरेशनल तैयारी की जानकारी तुरंत मिल सकेगी।

सेना के मुताबिक इससे “सिचुएशनल अवेयरनेस” बेहतर होगी। यानी किसी इलाके या यूनिट की स्थिति को समझने में आसानी होगी और फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।

साधारण भाषा में सवाल पूछ सकेंगे अधिकारी

इस एप में नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग यानी एनएलपी तकनीक भी जोड़ी गई है। इसकी मदद से अधिकारी सामान्य भाषा में सवाल पूछ सकेंगे।

अगर कोई अधिकारी पूछता है कि “यूनिट एक्स की रेडिनेस रिपोर्ट दिखाओ” या “गोला-बारूद की स्थिति क्या है”, तो सिस्टम बड़े डेटा को तुरंत समझकर आसान तरीके से जवाब देगा।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक यह सुविधा मैनुअल डेटा सर्च का समय कम करेगी और कमांडरों को तेजी से जरूरी जानकारी उपलब्ध कराएगी। (Indian Army Kautilya App)

फील्ड एरिया में भी करेगा काम

भारतीय सेना ने इस एप को फील्ड ऑपरेशंस को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया है। सिस्टम में “आउटपोस्ट मोड” और “सिक्योर चैनल” जैसी सुविधाएं दी गई हैं।

यह एप सीमित इंटरनेट या कठिन इलाकों में भी काम कर सकती है। स्कैन डॉक्यूमेंट और ओसीआर तकनीक की मदद से कागजों को डिजिटल डेटा में बदला जा सकेगा।

सेना का कहना है कि इससे सीमा क्षेत्रों और ऑपरेशनल इलाकों में डेटा मैनेजमेंट आसान होगा।

सेना के डिजिटल बदलाव का हिस्सा

भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से डिजिटल मॉडर्नाइजेशन पर तेजी से काम कर रही है। “कौटिल्य” उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

सेना ने 2026 को “ईयर ऑफ नेटवर्किंग एंड डेटा सेंट्रिसिटी” घोषित किया है। इसका मकसद सेना को नेटवर्क आधारित और डेटा-सेंट्रिक फोर्स में बदलना है।

इससे पहले सेना “ईयर ऑफ टेक्नोलॉजी एब्जॉर्प्शन” जैसे अभियान भी चला चुकी है। अब फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, ऑटोमेशन और स्मार्ट मिलिट्री सिस्टम्स पर बढ़ रहा है। (Indian Army Kautilya App)

ऑपरेशन और प्रशासन दोनों में मदद

सेना सूत्रों के मुताबिक “कौटिल्य” केवल बैटल फील्ड के लिए नहीं है। इसका इस्तेमाल प्रशासनिक कामों में भी किया जाएगा।

इससे सैनिकों का रिकॉर्ड, ट्रांसफर, लॉजिस्टिक्स, राशन, उपकरणों की मरम्मत और ट्रेनिंग मैनेजमेंट जैसे काम आसान हो सकते हैं।

अगर किसी यूनिट में किसी उपकरण की कमी हो या मरम्मत की जरूरत हो, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट दे सकेगा। इससे समय पर कार्रवाई करना आसान होगा।

डेटा सिक्योरिटी पर भी फोकस

भारतीय सेना ने इस प्लेटफॉर्म में डेटा सिक्योरिटी पर भी खास ध्यान दिया है। सिस्टम सुरक्षित डिजिटल चैनल पर काम करेगा और संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग सुरक्षा स्तर बनाए गए हैं।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में डेटा और साइबर सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए सेना ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार कर रही है जो तेज भी हों और सुरक्षित भी। (Indian Army Kautilya App)

आधुनिक युद्ध में डेटा की बढ़ती भूमिका

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आज का युद्ध केवल हथियारों का नहीं, बल्कि डेटा और सूचना का भी है। जिस सेना के पास ज्यादा तेज और सही जानकारी होगी, वह फैसले भी तेजी से ले सकेगी।

इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं एआई, मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकों पर तेजी से काम कर रही हैं। भारतीय सेना भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

“कौटिल्य” को भारतीय सेना के लिए एक ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के तौर पर देखा जा रहा है, जो अलग-अलग सोर्सेज से जानकारी लेकर उसे तुरंत उपयोगी फैसलों में बदलने में मदद करेगा। (Indian Army Kautilya App)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान अलर्ट, सरगोधा एयरबेस की सुरक्षा के लिए किराना हिल्स पर लगाया हाईटेक अमेरिकी रडार

Pakistan TPS-77 Radar
Pic Source: @Mrcool63040811/X

Pakistan TPS-77 Radar: पाकिस्तान एयर फोर्स ने सरगोधा के पास स्थित किराना हिल्स के टॉप पर आधुनिक TPS-77 रडार तैनात किया है। हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में इस नए रडार सिस्टम की मौजूदगी दिखाई दी है। पाकिस्तान ने यह कदम सरगोधा एयरबेस की सुरक्षा मजबूत करने और कम ऊंचाई पर आने वाले खतरों का जल्दी पता लगाने के लिए उठाया है।

किराना हिल्स पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित एक पहाड़ी इलाका है, जो लंबे समय से सैन्य गतिविधियों और रडार स्टेशन के लिए जाना जाता रहा है। बताया जाता है कि यहां 1968 से अलग-अलग तरह के एयर डिफेंस रडार तैनात होते रहे हैं। पहले यहां प्लासी AR-1 और बाद में AN/TPS-43 जैसे रडार लगाए गए थे। इसके बाद चीनी YLC सीरीज के रडार भी यहां इस्तेमाल किए गए। अब पाकिस्तान ने यहां अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन का TPS-77 रडार लगाया है।

Pakistan TPS-77 Radar: सरगोधा एयरबेस के लिए अहम माना जा रहा रडार

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक किराना हिल्स की ऊंचाई लगभग 320 मीटर है, जो पाकिस्तान को रणनीतिक फायदा देती है। यह इलाका सरगोधा एयरबेस से करीब 18 से 20 किलोमीटर दूर है। ऊंचाई पर रडार लगाने से कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों, ड्रोन और दूसरे “टेरेन हगिंग” हथियारों को जल्दी ट्रैक करना आसान हो जाता है।

सरगोधा एयरबेस को पाकिस्तान एयर फोर्स बेस मुशाफ भी कहा जाता है, पाकिस्तान वायु सेना के सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों में गिना जाता है। सरगोधा एयरबेस को पाकिस्तान एयर फोर्स का “क्राउन ज्वेल” भी माना जाता है। यहां एफ-16 और जेएफ-17 जैसे लड़ाकू विमान तैनात रहते हैं। यह पाकिस्तान एयर फोर्स के सेंट्रल एयर कमांड का मुख्य केंद्र भी माना जाता है।

वहीं, TPS-77 रडार को किराना हिल्स पर तैनात करने का मुख्य मकसद इस एयरबेस को बेहतर “अर्ली वार्निंग” देना है, ताकि किसी भी हवाई खतरे का पहले से पता लगाया जा सके।

Pakistan TPS-77 Radar

क्या है TPS-77 रडार की खासियत

TPS-77 एक आधुनिक 3D लॉन्ग रेंज एयर सर्विलांस रडार है, जिसे अमेरिकी रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने डेवलप किया है। यह रडार लंबी दूरी तक हवाई गतिविधियों को ट्रैक कर सकता है। इसकी रेंज लगभग 450 से 470 किलोमीटर तक है। वहीं इसकी कवरेज हाइट 30 किमी तक है।

यह रडार खास तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसमें ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमान शामिल हैं।

वहीं, यह रडार एक साथ हजार से ज्यादा एरियल टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसकी एक और बड़ी खासियत यह है कि इसे जल्दी एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। ट्रक, ट्रेन और सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान की मदद से इसे शिफ्ट किया जा सकता है।

TPS-77 कैसे करेगा काम

TPS-77 रडार नाटो कम्पैटेबल तकनीक मानी जाती है, यानी इसे दूसरे एयर डिफेंस और कमांड नेटवर्क के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है।

रडार से मिलने वाला पूरा डेटा सीधे पाकिस्तान एयर फोर्स के एयर डिफेंस कमांड एंड कंट्रोल (C2) सेंटर तक पहुंचता है। सरगोधा क्षेत्र में पाकिस्तान का एक प्रमुख C2 नेटवर्क मौजूद है, जहां अलग-अलग रडार और एयर डिफेंस सिस्टम से आने वाली जानकारी को एक साथ जोड़ा जाता है।

TPS-77 से मिला डेटा पाकिस्तान के अवॉक्स विमानों, जैसे साब एरीआई और केजे-500, दूसरे ग्राउंड रडार सिस्टम जैसे YLC सीरीज और TPS-43, साथ ही सरफेस टू एयर मिसाइल बैटरियों के साथ भी शेयर किया जाता है।

इसके बाद C2 सेंटर पूरे एयरस्पेस की स्थिति का विश्लेषण करता है। वहां मौजूद ऑपरेटर्स और नेटवर्क सिस्टम यह तय करते हैं कि किस खतरे को कौन सा एयर डिफेंस सिस्टम इंटरसेप्ट करेगा।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई कम ऊंचाई पर उड़ती क्रूज मिसाइल या ड्रोन दिखाई देता है, तो C2 सेंटर उसके रास्ते, गति और ऊंचाई का विश्लेषण करके सबसे उपयुक्त मिसाइल सिस्टम या फाइटर एयरक्राफ्ट को निर्देश भेजता है। इसी प्रक्रिया को “एंगेजमेंट” कहा जाता है।

Pakistan TPS-77 Radar
Sargodha airbase Image by @detresfa_/X

2025 के बाद बढ़ी टेंशन

रक्षा सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान ने यह कदम 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया है। उस दौरान भारतीय हमलों में सरगोधा क्षेत्र के कुछ एयर डिफेंस सिस्टम और मिलिट्री स्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा था। भारत की तरफ से की गई प्रिसिजन स्ट्राइक में सरगोधा एय़रबेस के रनवे पर देखा गया। एयरबेस के मुख्य रनवे पर करीब 15 फीट रेडियस का बड़ा गड्ढा हुआ था, जबकि दूसरा गड्ढा रनवे इंटरसेक्शन के पास था। इन हमलों के बाद एयरबेस कुछ समय के लिए बेकार हो गया था।

इस हमले में कुछ ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट, ट्रांसपोर्ट वाहन और मिलिट्री स्ट्रक्चर को भी नुकसान पहुंचा था। पाकिस्तान ने सरगोधा में एक एयरमैन की मौत और कुछ जवानों के घायल होने की पुष्टि भी की थी। हमले के बाद पाकिस्तान ने तेजी से रनवे की मरम्मत शुरू कर दी थी। और 2026 तक भी कुछ हिस्सों में रिपेयर का काम जारी था।

इसके बाद पाकिस्तान ने अपने बचे हुए एयर डिफेंस संसाधनों को ज्यादा सुरक्षित और रणनीतिक स्थानों पर तैनात करना शुरू किया। माना जा रहा है कि TPS-77 रडार को भी इसी रणनीति के तहत सरगोधा एयरबेस से हटाकर किराना हिल्स के ऊंचे इलाके में लगाया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों और ड्रोन से निपटना आज किसी भी एयर फोर्स के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से पाकिस्तान अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

किराना हिल्स पहले भी रहा है संवेदनशील इलाका

किराना हिल्स का नाम पहले भी कई बार चर्चा में आ चुका है। यह इलाका पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा माना जाता रहा है। इसे संभावित न्यूक्लियर वॉरहेड स्टोरेज और सब-क्रिटिकल टेस्टिंग साइट बताया गया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने किराना हिल्स के फुट एंट्रेंस एरिया को ब्रह्मोस मिसाइलों ने हिट किया था। जिसके बाद पाकिस्तान ने इसे न्यूक्लियर साइट पर अटैक बता कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने की कोशिश की थी, लेकिन भारत ने इस हमले से इनकार किया था।

इसी वजह से यह इलाका लंबे समय से पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। अब यहां आधुनिक TPS-77 रडार लगाए जाने से इसकी सैन्य अहमियत और बढ़ गई है।

पाकिस्तान का एयर डिफेंस नेटवर्क

सरगोधा एयरबेस की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान कई स्तरों वाला एयर डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल करता है। इसमें लंबी दूरी से लेकर छोटी दूरी तक मार करने वाले मिसाइल सिस्टम शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान के पास चीनी एचक्यू-9 और एचक्यू-16 जैसे सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं। इसके अलावा इटली का SPADA-2000 और फ्रांस का क्रोटाल सिस्टम भी उसकी एयर डिफेंस व्यवस्था का हिस्सा हैं। कम दूरी की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान मैनपैड्स और एंटी एयरक्राफ्ट गन भी इस्तेमाल करता है।

स्कूल ऑफ आर्टिलरी में आर्मेनिया के अधिकारी, क्या Pinaka MBRL के लोकल प्रोडक्शन को लेकर चल रही बातचीत?

India-Armenia Pinaka Deal
A three member Armenian military delegation led by Col Aram Khachatryan, Combat Cross First Class, Deputy Chief of Artillery Department, visited School of Artillery on 21-22 May 2026.

India-Armenia Pinaka Deal: भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा सहयोग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। हाल ही में आर्मेनिया की सेना का एक तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल महाराष्ट्र के देवलाली स्थित भारतीय सेना के प्रतिष्ठित स्कूल ऑफ आर्टिलरी पहुंचा। इस टीम का नेतृत्व आर्मेनिया के डिप्टी चीफ ऑफ आर्टिलरी डिपार्टमेंट कर्नल अराम खाचातुरियन कर रहे थे।

भारतीय सेना ने आर्मेनिया के अधिकारियों को आधुनिक आर्टिलरी ट्रेनिंग सिस्टम, लाइव फायरिंग एक्सरसाइज और हथियारों के रखरखाव से जुड़ी प्रक्रियाओं की जानकारी दी। इस दौरान दोनों देशों के बीच आर्टिलरी क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।

भारतीय सेना के अधिकारियों के मुताबिक विदेशी प्रतिनिधिमंडल को उन सभी प्रक्रियाओं के बारे में बताया गया, जिनकी मदद से भारतीय सेना अपने हथियारों और आर्टिलरी सिस्टम को लंबे समय तक ऑपरेशनल स्थिति में बनाए रखती है।

India-Armenia Pinaka Deal: स्कूल ऑफ आर्टिलरी में लाइव फायरिंग एक्सरसाइज

देवलाली स्थित स्कूल ऑफ आर्टिलरी भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण ट्रेनिंग संस्थाओं में गिना जाता है। यहां तोपखाना अधिकारियों और जवानों को आधुनिक आर्टिलरी सिस्टम चलाने, फायर कंट्रोल, सर्विलांस और बैटलफील्ड कोऑर्डिनेशन की ट्रेनिंग दी जाती है।

आर्मेनिया के अधिकारियों को यहां अत्याधुनिक ट्रेनिंग सुविधाएं दिखाई गईं। उन्हें लाइव फायरिंग एक्सरसाइज भी दिखाई गई, जिसमें भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता का प्रदर्शन किया गया।

प्रतिनिधिमंडल को यह भी बताया गया कि भारतीय सेना किस तरह अलग-अलग स्तर पर हथियारों की मरम्मत, ओवरहॉल और तकनीकी जांच करती है ताकि युद्ध जैसी स्थिति में भी सिस्टम लगातार काम करते रहें।

स्कूल ऑफ आर्टिलरी के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल एनएस सरना ने भी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। इस दौरान भारत और आर्मेनिया के बीच आर्टिलरी सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा हुई।

India-Armenia Pinaka Deal
A three member Armenian military delegation led by Col Aram Khachatryan, Combat Cross First Class, Deputy Chief of Artillery Department, visited School of Artillery on 21-22 May 2026.

पिनाका सिस्टम पर रहा खास फोकस

इस दौरे के दौरान आर्मेनिया के अधिकारियों को भारतीय पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम भी दिखाया गया। विदेशी अधिकारियों ने पिनाका लॉन्चर और आर्टिलरी के फायर कंट्रोल/सर्विलांस इक्विपमेंट (रडार/थर्मल सिस्टम) का डेमो भी देखा।

सूत्रों के मुताबिक यह दौरा केवल औपचारिक था, बल्कि भारत द्वारा आर्मेनिया को दिए गए पिनाका सिस्टम से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

दरअसल, आर्मेनिया भारत का पहला विदेशी ग्राहक है जिसने पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम खरीदा है। वर्ष 2022 में दोनों देशों के बीच करीब 2,000 करोड़ रुपये का रक्षा समझौता हुआ था। इस डील में चार पिनाका बैटरियां, रॉकेट, गाइडेड रॉकेट और अन्य सैन्य उपकरण शामिल थे।

क्यों खास है पिनाका रॉकेट सिस्टम

पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है। इसे डीआरडीओ और भारतीय रक्षा उद्योग ने मिलकर विकसित किया है। यह सिस्टम कम समय में बड़ी मात्रा में रॉकेट दागने की क्षमता रखता है।

इसे “इंडियन हिमार्स” भी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत “शूट एंड स्कूट” क्षमता मानी जाती है। यानी रॉकेट फायर करने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल सकता है, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचना आसान हो जाता है।

आर्मेनिया को पिनाका के अलग-अलग वेरिएंट दिए गए हैं, जिनमें स्टैंडर्ड, एक्सटेंडेड रेंज और गाइडेड वर्जन शामिल हैं। गाइडेड पिनाका रॉकेट लगभग 75 किलोमीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम माना जाता है।

भारतीय रक्षा सूत्रों के मुताबिक इस साल जनवरी में भारत ने गाइडेड पिनाका रॉकेट्स का पहला बैच आर्मेनिया भेजा था। जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फ्लैगऑफ किया था। खास बात यह है कि गाइडेड पिनाका पाने वाला पहला विदेशी देश आर्मेनिया बना।

आर्मेनिया क्यों बढ़ा रहा भारत से रक्षा सहयोग

पिछले कुछ वर्षों में आर्मेनिया ने भारत के साथ रक्षा संबंध तेजी से मजबूत किए हैं। नागोर्नो-काराबाख संघर्ष के बाद आर्मेनिया अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना चाहता है और रूस पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।

इसी वजह से उसने भारत से पिनाका, आर्टिलरी सिस्टम और दूसरे सैन्य उपकरण खरीदने शुरू किए।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि आर्मेनिया भारतीय हथियारों को भरोसेमंद और लागत के हिसाब से प्रभावी मान रहा है। भारतीय सिस्टम की खासियत यह भी है कि उन्हें कठिन इलाकों और युद्ध जैसी परिस्थितियों में इस्तेमाल के हिसाब से डिजाइन किया गया है।

लोकल प्रोडक्शन पर भी चर्चा

वहीं, आर्मेनिया भारत के साथ मिलकर कुछ सैन्य उपकरणों का स्थानीय उत्पादन शुरू करना चाहता है।

सूत्रों के मुताबिक आर्मेनिया भारत के साथ मिलकर 155 एमएम आर्टिलरी गोले और पिनाका रॉकेट सिस्टम से जुड़े हथियारों का लोकल प्रोडक्शन शुरू करना चाहता है। इसके लिए दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि यह चर्चा कितनी आगे बढ़ चुकी है और संभावित डील की लागत कितनी हो सकती है।

दरअसल आर्मेनिया भविष्य में किसी संघर्ष की स्थिति में सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करना चाहता है। अगर युद्ध के दौरान दूसरे देशों से हथियारों की सप्लाई रुक जाए, तो स्थानीय स्तर पर उत्पादन उसके लिए मददगार साबित हो सकता है। इसी वजह से वह भारत के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और लाइसेंस प्रोडक्शन जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है।

हालांकि अभी यह प्रक्रिया शुरुआती बातचीत के स्तर पर है। दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग जैसे मुद्दों पर चर्चा चल रही है।

रिटायर्ड कर्नल की पेंशन में 50 फीसदी की कटौती, पत्नी के निलंबन पर उठाए थे सवाल, बोले- सिस्टम में सच बोलने वालों को मिल रही सजा

Colonel Pension Cut
Pic Source: @ColAmitkumar/X

Colonel Pension Cut: भारतीय सेना ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए रिटायर्ड कर्नल अमित कुमार की पेंशन आधी कर दी है। सेना ने उन पर गंभीर कदाचार यानी “ग्रेव मिसकंडक्ट” के आरोप लगाए हैं। यह कार्रवाई अप्रैल 2026 से लागू की गई है। इससे पहले अगस्त 2025 में उन्हें शो कॉज नोटिस जारी किया गया था।

कर्नल अमित कुमार पहले सेना की जज एडवोकेट जनरल (जैग) ब्रांच में अधिकारी रह चुके हैं। समय से पहले रिटायरमेंट लेने के बाद वह वकालत कर रहे हैं। मामला उस समय चर्चा में आया जब उन्होंने अपनी पत्नी के साथ कथित अन्याय का मुद्दा लगातार उठाया। उनकी पत्नी भी सेना की जैग ब्रांच में कर्नल रैंक की अधिकारी हैं और वे भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना कर रही हैं।

Colonel Pension Cut: सेना ने किन आरोपों का किया जिक्र

सेना की ओर से जारी नोटिस में कहा गया कि कर्नल अमित कुमार पर कई बार अनुचित व्यवहार करने, जांच प्रक्रिया में दखल देने और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी करने के आरोप हैं।

नोटिस के अनुसार उन पर कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की कार्यवाही में बिना अनुमति घुसने, सैन्य अधिकारियों को धमकाने और सेना की सुरक्षा प्रक्रियाओं के खिलाफ बयान देने जैसे आरोप लगाए गए। सेना ने यह कार्रवाई आर्मी पेंशन रेगुलेशंस 2008 के तहत की है। इन नियमों में भविष्य के अच्छे आचरण को पेंशन जारी रहने की शर्त माना गया है।

दो एफआईआर का भी किया जिक्र

सेना के नोटिस में दो अलग-अलग एफआईआर का उल्लेख किया गया है। पहली एफआईआर सितंबर 2024 में अंबाला कैंट पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी। इसमें सरकारी कर्मचारी को चोट पहुंचाने, सरकारी काम में बाधा डालने और महिला की गरिमा से जुड़े आरोप शामिल किए गए।

दूसरी एफआईआर जुलाई 2024 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी। इसमें कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के दौरान सैन्य अधिकारियों को कथित रूप से डराने, बाधा पहुंचाने और मानहानि करने के आरोप लगाए गए।

सेना का कहना है कि इन मामलों से जुड़े रिकॉर्ड और चल रही जांच के आधार पर कार्रवाई की गई है।

कर्नल अमित कुमार ने क्या कहा

कर्नल अमित कुमार ने सेना की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि नोटिस में लगाए गए आरोप अभी अदालत में लंबित मामलों पर आधारित हैं और बिना पूरी प्रक्रिया पूरी किए कार्रवाई की गई है।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें पहले से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और अंबाला की अदालत में लंबित हैं, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई की बजाय शिकायत उठाने वालों को निशाना बनाया जा रहा है।

कर्नल अमित कुमार ने कहा कि उनकी पत्नी के साथ कथित हिरासत में प्रताड़ना की शिकायतों पर कोई जांच नहीं हुई। उनका आरोप है कि कुछ अधिकारी शिकायतों को दबाने और शिकायत करने वालों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

पत्नी के निलंबन को लेकर लगातार उठा रहे थे आवाज

कर्नल अमित कुमार का कहना है कि वह अपनी पत्नी के साथ हुए कथित अन्याय के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे थे। उनकी पत्नी इस समय निलंबित हैं और चंडीगढ़ पीजीआई में इलाज करा रही हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी पत्नी भारी मानसिक तनाव से गुजर रही हैं।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी कमान मुख्यालय की ओर से उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए शुरू की गई क्योंकि वह लगातार न्याय की मांग कर रहे थे।

सच बोलने वालों को सजा

कर्नल अमित कुमार ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह कार्रवाई दिखाती है कि सिस्टम में “अंधी वफादारी” को ईनाम दिया जा रहा है, जबकि सच बोलने वालों को सजा मिल रही है।

उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता और कमांडिंग ऑफिसर ने उन्हें महिलाओं का सम्मान करना और सिद्धांतों के साथ खड़े रहना सिखाया था। इसी वजह से उन्होंने शुरुआत से ही शिकायतों और वीडियो को आगे बढ़ाया।

उन्होंने अपने संदेश में यह भी लिखा कि यदि उनकी पूरी पेंशन भी रोक दी जाए तो भी वह शायद कानूनी चुनौती न दें, लेकिन ईमानदार सैनिकों और अधिकारियों को बचाना जरूरी है।

कर्नल अमित कुमार ने कहा कि उन्हें कभी वरिष्ठ नेतृत्व पर बहुत सम्मान था, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि उनके खिलाफ फैसले बिना उन्हें सुनवाई का मौका दिए लिए गए।

पेंशन कटौती बहुत कम मामलों में

सेना में किसी रिटायर्ड अधिकारी की पेंशन में कटौती बहुत कम मामलों में होती है। आमतौर पर यह कदम तभी उठाया जाता है जब गंभीर अनुशासनहीनता या सेवा नियमों के उल्लंघन के आरोप हों।

रक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक पेंशन को “भविष्य के अच्छे आचरण” से जोड़ा गया है। इसी आधार पर सेना को कुछ विशेष परिस्थितियों में पेंशन रोकने, घटाने या बंद करने का अधिकार मिलता है।

सूर्यकिरण टीम के 30 साल में 800 एयर शो…दुनिया की सबसे खतरनाक एरोबेटिक टीमों में क्यों गिनी जाती है लाल-सफेद रंग के जेट वाली टीम

Suryakiran Aerobatic Team 30 Years

Suryakiran Aerobatic Team 30 Years: भारतीय वायु सेना की मशहूर सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम 26 मई को अपने 30 साल पूरे करने जा रही है। तीन दशक पहले शुरू हुई यह टीम आज दुनिया की प्रमुख एरोबेटिक टीमों में गिनी जाती है। लाल और सफेद रंग के लड़ाकू जेट जब एक साथ बेहद करीब उड़ते हुए आसमान में करतब दिखाते हैं, तो हजारों लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं।

भारतीय वायु सेना सूर्यकिरण टीम को एंबेसडर ऑफ द इंडियन एयर फोर्स भी कहती है। यह टीम केवल एयर शो नहीं करती, बल्कि दुनिया के सामने भारतीय वायु सेना की प्रोफेशनल क्षमता, अनुशासन और सटीकता भी दिखाती है।

Suryakiran Aerobatic Team 30 Years: 1996 में हुई थी शुरुआत

सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम की स्थापना 27 मई 1996 को कर्नाटक के बीदर एयर फोर्स स्टेशन में हुई थी। शुरुआत में टीम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल द्वारा बनाए गए किरण एमके-2 जेट ट्रेनर विमान उड़ाती थी। इसके पहले विंग कमांडर कुलदीप मलिक थे, जो पहले थंडरबोल्ट्स टीम का सदस्य रह चुके थे।

टीम ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 15 सितंबर 1996 में कोयंबटूर में किया था। उस एयर शो के बाद सूर्यकिरण टीम तेजी से लोकप्रिय हो गई। लोगों ने पहली बार इतने करीब उड़ते विमानों को एक साथ करतब करते देखा था। 1998 में विंग कमांडर ए.के. मुरगई के नेतृत्व में टीम 9 विमानों की फॉर्मेशन में परिवर्तित हुई। वहीं, 15 अगस्त 1998 को लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस पर 9 विमानों का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ।

8 अक्टूबर 2004 को सूर्यकिरण टीम को चीफ ऑफ द एयर स्टाफ यूनिट साइटेशन से सम्मानित किया गया। यह भारतीय वायु सेना में पहली बार किसी यूनिट को दिया गया यह सम्मान था। 1 मई 2006 से सूर्यकिरण टीम को नंबर 52 के तौर पर अलग स्क्वाड्रन का दर्जा दिया। पहले यह नंबर 52 स्क्वॉड्रन (शार्क्स) के तहत काम कर रही थी, लेकिन अब पूरी टीम को स्वतंत्र स्क्वाड्रन का दर्जा मिल गया।

पिछले 30 वर्षों में सूर्यकिरण टीम ने 800 से ज्यादा एयर डिस्प्ले किए हैं। भारत के लगभग हर बड़े शहर में यह टीम प्रदर्शन कर चुकी है। इसके अलावा चीन, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भी टीम ने भारतीय वायु सेना का प्रतिनिधित्व किया।

2011 से 2015 तक निलंबित रही थी टीम

साल 2011 में सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम को बड़ा झटका लगा था। फरवरी 2011 में एयरो इंडिया शो के बाद टीम को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया गया। इसकी सबसे बड़ी वजह एचएएल किरण मेक-II ट्रेनर विमानों की कमी थी। उस समय भारतीय वायु सेना में नए पायलटों की ट्रेनिंग की जरूरत तेजी से बढ़ रही थी, इसलिए उपलब्ध किरण विमानों को ट्रेनिंग यूनिट्स में भेज दिया गया।

स्थिति ऐसी हो गई कि सूर्यकिरण टीम के पास 9 विमानों की फॉर्मेशन बनाए रखने के लिए पर्याप्त एयरक्राफ्ट नहीं बचे। इसके बाद टीम के कई पायलटों को दूसरी स्क्वाड्रनों में ट्रांसफर कर दिया गया। करीब चार साल तक यानी 2011 से 2015 के बीच सूर्यकिरण का कोई बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं हुआ।

इसके बाद फरवरी 2015 में भारतीय वायु सेना ने सूर्यकिरण टीम को फिर से शुरू किया। इस बार टीम को आधुनिक हॉक एमके-132 विमान दिए गए। उस समय विंग कमांडर अजित कुलकर्णी टीम के कमांडिंग ऑफिसर थे।

नई शुरुआत के बाद अक्टूबर 2015 में हिंडन एयरबेस पर एयर फोर्स डे समारोह में हॉक विमानों के साथ टीम ने पहला प्रदर्शन किया। शुरुआत में केवल चार विमान शामिल थे, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ाकर फिर से नौ विमानों की फॉर्मेशन तक पहुंचाई गई।

किरण विमान से हॉक जेट तक का सफर

साल 2015 में सूर्यकिरण टीम ने एक बड़ा बदलाव किया। पुराने किरण एमके-2 विमानों की जगह टीम ने हॉक एमके-132 एडवांस जेट ट्रेनर विमान शामिल किए।

यह विमान ज्यादा ताकतवर इंजन, आधुनिक एवियोनिक्स और बेहतर नियंत्रण क्षमता के साथ आते हैं। लाल और सफेद रंग वाले यही हॉक विमान अब सूर्यकिरण टीम की नई पहचान बन चुके हैं।

भारतीय वायु सेना के अधिकारियों के मुताबिक हॉक विमान जटिल एरोबेटिक मैन्यूवर्स के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते हैं। इससे टीम के प्रदर्शन में और सुधार आया।

भारतीय वायु सेना में इस्तेमाल होने वाला बीएई सिस्टम्स हॉक एमके-132 एक एडवांस जेट ट्रेनर विमान है। इसे ब्रिटेन की कंपनी बीएई सिस्टम्स ने बनाया है, जबकि भारत में इसका निर्माण एचएएल करती है। यह विमान मुख्य रूप से नए फाइटर पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वे आगे चलकर सुखोई-30 एमकेआई, राफेल और तेजस जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों को आसानी से उड़ा सकें।

इस विमान में दो सीटें होती हैं। आगे की सीट पर ट्रेनिंग लेने वाला पायलट बैठता है और पीछे ट्रेनर बैठता है। हॉक एमके-132 पहली बार 2008 में भारतीय वायु सेना में शामिल हुआ था।

यह विमान लगभग 12.4 मीटर लंबा है और इसकी अधिकतम गति करीब 1,000 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। जरूरत पड़ने पर यह डाइव के दौरान ध्वनि की गति के करीब भी उड़ सकता है। इसकी उड़ान क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है और यह करीब 44 हजार फीट की ऊंचाई तक जा सकता है।

हॉक एमके-132 में रोल्स-रॉयस और टर्बोमेका का एडौर इंजन लगा है। यह इंजन विमान को तेज रफ्तार और बेहतर कंट्रोल देता है। इसमें आधुनिक डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम भी है, जिससे इंजन की परफॉर्मेंस बेहतर रहती है।

यह विमान सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। इसमें हल्के हथियार भी लगाए जा सकते हैं। इसके नीचे मिसाइल, रॉकेट और बम लगाने की क्षमता होती है। हालांकि सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम में इस्तेमाल होने वाले हॉक विमानों में हथियार नहीं लगाए जाते। वहां इन विमानों का इस्तेमाल केवल एयर शो और एरोबेटिक प्रदर्शन के लिए होता है।

हॉक एमके-132 की सबसे बड़ी खासियत इसकी आधुनिक एवियोनिक्स प्रणाली है। इसमें ग्लास कॉकपिट, हेड-अप डिस्प्ले (HUD), मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगे हैं। पायलट बिना नीचे देखे एचयूडी पर जरूरी जानकारी देख सकता है। इससे फॉर्मेशन फ्लाइट और एयर कॉम्बैट ट्रेनिंग आसान हो जाती है।

इस विमान में HOTAS सिस्टम भी दिया गया है। इसका मतलब है कि पायलट थ्रॉटल और कंट्रोल स्टिक से हाथ हटाए बिना कई जरूरी सिस्टम चला सकता है। इससे तेज प्रतिक्रिया और बेहतर कंट्रोल मिलता है।

नौ विमानों की फॉर्मेशन बनाती है खास

सूर्यकिरण टीम की सबसे बड़ी पहचान इसकी नौ विमानों वाली फॉर्मेशन है। दुनिया में बहुत कम एरोबेटिक टीमें इतनी बड़ी फॉर्मेशन में प्रदर्शन करती हैं।

टीम के विमान कुछ मीटर की दूरी पर उड़ते हैं। इतनी कम दूरी पर तेज गति से उड़ान भरना बेहद कठिन माना जाता है। पायलटों को एक-दूसरे की गति, दिशा और ऊंचाई का बिल्कुल सटीक अंदाजा रखना पड़ता है।

एयर शो के दौरान टीम डायमंड फॉर्मेशन, एरो फॉर्मेशन, लूप, रोल, स्प्लिट और क्रॉसओवर जैसे जटिल करतब दिखाती है। कई बार विमान 600 से 800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हैं। कई बार उनके बीच की दूरी सिर्फ 5 से 10 मीटर होती है। इतनी नजदीकी में उड़ान भरना बेहद मुश्किल माना जाता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इतने करीब उड़ान के दौरान एक छोटी गलती भी बड़ा हादसा बन सकती है। इसी वजह से सूर्यकिरण टीम (SKAT) को दुनिया की सबसे अनुशासित एरोबेटिक टीमों में गिना जाता है।

सिग्नेचर डिस्प्ले है DNA मैन्यूवर

सूर्यकिरण टीम का सबसे मशहूर करतब DNA मैन्यूवर माना जाता है। इसे टीम का सिग्नेचर डिस्प्ले भी कहा जाता है। इस करतब में कुछ विमान सीधे उड़ते रहते हैं, जबकि बाकी विमान उनके चारों ओर स्पाइरल यानी कुंडली जैसी उड़ान भरते हैं। इससे आसमान में DNA की डबल हेलिक्स जैसी आकृति बनती है। जब विमान तिरंगे रंगों का धुआं छोड़ते हैं, तो यह दृश्य और भी शानदार दिखाई देता है।

इस मैन्यूवर में नंबर 1, 2 और 3 विमान सीधी लाइन में उड़ते हैं और केंद्रीय धुरी का काम करते हैं। वहीं नंबर 4 और 7 विमान उनके चारों ओर गोल-गोल घूमते हैं। दोनों पायलटों को बिल्कुल एक जैसी गति, दूरी और टाइमिंग बनाए रखनी पड़ती है। छोटी सी गलती भी पूरे फॉर्मेशन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि इस करतब के लिए महीनों तक अभ्यास किया जाता है।

सूर्यकिरण टीम का एक और बेहद लोकप्रिय करतब “बॉम्ब बर्स्ट” है। इसमें सभी विमान पहले एक साथ ऊपर की ओर उड़ते हैं और फिर अचानक अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है जैसे आसमान में कोई विस्फोट हुआ हो। एयर शो देखने वाले लोग इस करतब पर सबसे ज्यादा तालियां बजाते हैं।

टीम “हार्ट इन द स्काई” यानी दिल की आकृति भी बनाती है। इसमें विमान आसमान में विशाल हार्ट शेप तैयार करते हैं। कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों और खास मौकों पर यह प्रदर्शन किया जाता है। तिरंगे धुएं के साथ बना यह दिल दर्शकों को काफी आकर्षित करता है।

“डायमंड फॉर्मेशन” भी सूर्यकिरण की पहचान मानी जाती है। इसमें नौ विमान हीरे जैसी आकृति में उड़ते हैं। यह फॉर्मेशन टीम की सटीकता और अनुशासन दिखाती है। कई बार इसी फॉर्मेशन में लूप और रोल जैसे कठिन करतब भी किए जाते हैं।

“एरोहेड फॉर्मेशन” में विमान तीर की नोक जैसा आकार बनाते हैं। यह तेज गति और दिशा परिवर्तन का प्रदर्शन माना जाता है। वहीं “विक” या “एरो फॉर्मेशन” क्लासिक लड़ाकू विमान फॉर्मेशन जैसा दिखाई देता है।

सूर्यकिरण टीम “लूप” मैन्यूवर भी करती है। इसमें विमान पूरा 360 डिग्री का चक्कर लगाते हुए ऊपर की ओर घूमते हैं। कई बार पूरा फॉर्मेशन एक साथ लूप बनाता है, जो बेहद कठिन माना जाता है।

“बैरल रोल” में विमान अपनी लंबाई वाली धुरी पर घूमते हुए आगे बढ़ते हैं। जब कई विमान एक साथ यह करतब करते हैं, तो पूरा दृश्य बेहद रोमांचक दिखाई देता है।

टीम “इनवर्टेड फ्लाइंग” यानी उल्टी उड़ान भी दिखाती है। इसमें कुछ विमान उल्टे होकर उड़ते हैं। यह करतब पायलट की क्षमता और विमान के नियंत्रण को दर्शाता है।

पुराने किरण एमके-II विमानों के दौर में “टैंगो रोल” और “गोबलेट रोल” जैसे करतब भी काफी मशहूर थे। टैंगो रोल को भारतीय वायु सेना के सबसे कठिन एरोबेटिक करतबों में गिना जाता था।

इसके अलावा टीम “क्रॉसओवर”, “ट्रिपल मिरर”, “बॉक्स फॉर्मेशन”, “वाई फॉर्मेशन” और “हिडन स्प्लिट” जैसे कई जटिल मैन्यूवर्स भी दिखाती है। “हिडन स्प्लिट” में विमान अचानक अलग-अलग दिशाओं में बंट जाते हैं और फिर दोबारा एक साथ जुड़ जाते हैं।

विशेष G-सूट पहनते हैं पायलट

सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम के पायलट जब आसमान में डीएनए, बॉम्ब बर्स्ट, हार्ट शेप, लूप या बैरल रोल जैसे कठिन करतब दिखाते हैं, तब उनके शरीर पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है। तेज गति और अचानक मोड़ लेने की वजह से पायलटों को +6जी तक का फोर्स झेलना पड़ता है। कई बार नेगेटिव -1.5जी फोर्स भी लगता है, जिससे शरीर और दिमाग पर असर पड़ सकता है।

जी-फोर्स का मतलब होता है गुरुत्वाकर्षण से कई गुना ज्यादा दबाव। जब विमान बहुत तेज मोड़ लेता है या तेजी से ऊपर उठता है, तो शरीर का खून नीचे की तरफ खिंचने लगता है। इससे दिमाग तक खून कम पहुंचता है। ऐसी स्थिति में पायलट की आंखों के सामने धुंधलापन आ सकता है, जिसे “ग्रे-आउट” कहा जाता है। अगर दबाव और बढ़ जाए तो कुछ समय के लिए दिखाई देना बंद हो सकता है, जिसे “ब्लैक-आउट” कहते हैं। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब पायलट बेहोश हो जाए। इसे जी-लॉक यानी “G-Induced Loss of Consciousness” कहा जाता है।

सूर्यकिरण जैसी टीम में यह खतरा और ज्यादा गंभीर होता है, क्योंकि विमान एक-दूसरे से सिर्फ कुछ मीटर की दूरी पर उड़ते हैं। ऐसे में अगर एक पायलट भी नियंत्रण खो दे, तो पूरा फॉर्मेशन खतरे में पड़ सकता है।

इसी वजह से सूर्यकिरण टीम के पायलट विशेष “एंटी-G सूट” पहनते हैं। इसे आम भाषा में G-सूट कहा जाता है। यह सूट पायलट के शरीर को सुरक्षित रखने में मदद करता है।

G-सूट एक खास तरह का टाइट फ्लाइट सूट होता है। इसमें पेट, जांघों और पैरों के आसपास हवा भरने वाले हिस्से लगे होते हैं। जब विमान पर G-फोर्स बढ़ता है, तो विमान का सिस्टम अपने आप सूट में हवा भर देता है। इससे सूट शरीर को कसकर पकड़ता है और खून को नीचे जाने से रोकने में मदद करता है। इससे दिमाग तक खून की सप्लाई बनी रहती है और पायलट लंबे समय तक होश में रह सकता है।

हॉक एमके-132 विमान में यह सिस्टम विमान के एवियोनिक्स और सेंसर से जुड़ा होता है। जैसे ही विमान पर ज्यादा G-फोर्स आता है, सूट तुरंत प्रतिक्रिया देता है।

सिर्फ G-सूट ही नहीं, पायलट एक खास सांस लेने की तकनीक भी इस्तेमाल करते हैं। इसे “एंटी-G स्ट्रेनिंग मैन्यूवर” (AGSM) कहा जाता है। इसमें पायलट खास तरीके से सांस रोकते हैं और पेट व पैरों की मांसपेशियों को कसते हैं। इससे शरीर का ब्लड प्रेशर बना रहता है और दिमाग तक खून पहुंचता रहता है।

हर एयर शो से पहले लंबी ब्रीफिंग और प्रैक्टिस की जाती है। उड़ान के बाद वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर हर छोटी गलती का विश्लेषण किया जाता है।

सूर्यकिरण टीम के विमानों में स्मोक सिस्टम लगाया गया है, जिससे वे केसरिया, सफेद और हरे रंग का धुआं छोड़ते हैं। यही तिरंगा धुआं एयर शो को और आकर्षक बनाता है।

कैसे चुने जाते हैं सूर्यकिरण के पायलट

सूर्यकिरण टीम में शामिल होना किसी भी फाइटर पायलट के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है। भारतीय वायु सेना केवल चुनिंदा और अनुभवी पायलटों को ही इस टीम के लिए चुनती है।

चयन के बाद पायलटों को कई महीनों तक कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। इसमें फॉर्मेशन फ्लाइंग, सिमुलेटर ट्रेनिंग, इमरजेंसी हैंडलिंग और मानसिक मजबूती पर खास ध्यान दिया जाता है। इसके लिए सेंट्रीफ्यूज मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक बड़ी घूमने वाली मशीन होती है, जिसमें पायलटों को 7 से 9G तक का दबाव झेलने का अभ्यास कराया जाता है।

पायलटों की फिटनेस पर भी खास ध्यान दिया जाता है। गर्दन की ताकत बढ़ाने वाली एक्सरसाइज, कार्डियो ट्रेनिंग और कोर स्ट्रेंथ वर्कआउट रोजाना का हिस्सा होते हैं। तेज मोड़ों के दौरान गर्दन और शरीर पर काफी दबाव पड़ता है, इसलिए शारीरिक फिटनेस बहुत जरूरी मानी जाती है।

सूर्यकिरण टीम की ट्रेनिंग कई चरणों में होती है। पहले ग्राउंड क्लास और सिमुलेटर ट्रेनिंग कराई जाती है। इसके बाद पायलट ढीली फॉर्मेशन में उड़ान भरते हैं और धीरे-धीरे बेहद करीबी फॉर्मेशन तक पहुंचते हैं। हर उड़ान के बाद पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग देखी जाती है और छोटी से छोटी गलती पर चर्चा होती है।

टीम में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। हर पायलट को अपने साथी की क्षमता पर पूरा विश्वास रखना पड़ता है। उड़ान के दौरान लगातार रेडियो कम्युनिकेशन चलता रहता है। “स्मोक ऑन”, “इन पोजीशन” और “क्लियर” जैसे कॉल लगातार दिए जाते हैं।

पूरे प्रदर्शन का नियंत्रण नंबर-1 पायलट यानी टीम लीडर के हाथ में होता है। बाकी सभी विमान उसी के निर्देशों के अनुसार उड़ते हैं।

हर एयर शो से पहले टीम घंटों तक ब्रीफिंग करती है। पायलट हर मैन्यूवर का अभ्यास करते हैं। प्रदर्शन के बाद वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर गलतियों और सुधार पर चर्चा की जाती है।

टीम के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक सूर्यकिरण में केवल अच्छा पायलट होना काफी नहीं है। यहां टीमवर्क और एक-दूसरे पर भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है।

बीदर एयरबेस पर होगा बड़ा समारोह

30वीं वर्षगांठ के मौके पर बीदर एयर फोर्स स्टेशन में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस दौरान सूर्यकिरण टीम विशेष एयर डिस्प्ले करेगी।

समारोह में वर्तमान और पूर्व पायलटों के साथ टेक्नीशियन, इंजीनियर और सपोर्ट स्टाफ भी शामिल होंगे। वायु सेना के अधिकारियों के मुताबिक यह कार्यक्रम उन सभी लोगों को सम्मान देने का अवसर होगा, जिन्होंने तीन दशकों में इस टीम को दुनिया की प्रमुख एरोबेटिक टीमों में शामिल करने में योगदान दिया।

दुनिया की बड़ी टीमों में गिनी जाती है सूर्यकिरण

सूर्यकिरण टीम की तुलना दुनिया की कई प्रसिद्ध एरोबेटिक टीमों से की जाती है। ब्रिटेन की रेड एरोज, अमेरिका की थंडरबर्ड्स और इटली की फ्रेचे ट्रिकोलोरी जैसी टीमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी प्रसिद्ध हैं।

भारतीय वायु सेना के अधिकारी मानते हैं कि सूर्यकिरण टीम ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई है। टीम के विमानों का मेंटेनेंस और सपोर्ट भी भारत में ही किया जाता है।

लेह में बड़ा हादसा टला, सेना का चीता हेलीकॉप्टर क्रैश होने के बाद भी बची तीन अधिकारियों की जान

Indian Army Cheetah Crash Leh

Indian Army Cheetah Crash Leh: लद्दाख के बेहद दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाके तंगत्से में भारतीय सेना का चीता हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हेलीकॉप्टर में सेना के तीन वरिष्ठ अधिकारी सवार थे। हादसे में तीनों अधिकारियों की जान बच गई और उन्हें मामूली चोटें आईं हैं। सेना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक यह हादसा किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है, क्योंकि हेलीकॉप्टर जिस जगह गिरा वहां से सैकड़ों फीट नीचे गहरी ढलान थी।

सेना के सूत्रों के मुताबिक हेलीकॉप्टर में 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल सचिन मेहता, एक लेफ्टिनेंट कर्नल और एक मेजर सवार थे। तीनों अधिकारियों को मामूली चोटें आईं और वे सुरक्षित बाहर निकल आए।

Indian Army Cheetah Crash Leh: दो चट्टानों के बीच टकराया हेलीकॉप्टर

यह घटना 20 मई को हुई थी, लेकिन इसकी जानकारी बाद में सामने आई। हादसे के बाद सेना ने जांच शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि हेलीकॉप्टर नियमित ऑपरेशन पर था और कम ऊंचाई पर उड़ान भर रहा था। इसी दौरान श्योक नदी के पास तंगत्से इलाके की पहाड़ियों के बीच हेलीकॉप्टर का संतुलन बिगड़ गया और वह क्रैश लैंडिंग की स्थिति में आ गया। हादसे के बाद हेलीकॉप्टर दो चट्टानों के बीच टकराया और ढलान पर लगभग 20 से 30 फीट तक फिसलता चला गया। आखिर में वह एक बड़े पत्थर पर अटक गया। अगर वह पत्थर वहां नहीं होता तो हेलीकॉप्टर सैकड़ों फीट नीचे खाई में गिर सकता था। इलाके की ढलान करीब 60 से 70 डिग्री तक बताई जा रही है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)

Indian Army Cheetah Crash Leh

हादसे के बाद नहीं लगी आग

सेना के अधिकारियों का कहना है कि सबसे राहत वाली बात यह रही कि हादसे के बाद हेलीकॉप्टर में आग नहीं लगी। आमतौर पर ऐसे हादसों में फ्यूल लीक होने के बाद आग लगने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। लेकिन इस दुर्घटना में ऐसा नहीं हुआ। तीनों अधिकारी खुद हेलीकॉप्टर से बाहर निकल आए। उन्हें मामूली चोटें आईं और बाद में मेडिकल जांच कराई गई।

सेना के सूत्रों के मुताबिक हादसे के बाद तीनों अधिकारी खुद हेलीकॉप्टर से बाहर निकले। मौके पर मौजूद जवानों ने तुरंत राहत और बचाव अभियान शुरू किया। कठिन पहाड़ी इलाके के बावजूद 20 मिनट के भीतर ही रेस्क्यू टीम तेजी से मौके तक पहुंच गई। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर भी चर्चा में रही है, जिसमें मेजर जनरल सचिन मेहता और बाकी अधिकारी दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के पास खड़े दिखाई दिए। सेना के कई पूर्व अधिकारियों ने इसे सैन्य प्रशिक्षण और मजबूत मानसिकता का उदाहरण बताया।

Indian Army Cheetah Crash Leh

बेहद कठिन इलाके में हुआ हादसा

यह हादसा जिस इलाके में हुआ वह बेहद कठिन माना जाता है। तंगत्से लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आता है, जहां मौसम तेजी से बदलता है और पहाड़ी ढलान काफी खतरनाक होती है। ऐसे इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाना आसान नहीं माना जाता। यहां हवा पतली होती है, जिससे हेलीकॉप्टर के इंजन और रोटर की क्षमता पर असर पड़ता है।

भारतीय सेना ने हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी है। कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि दुर्घटना तकनीकी खराबी, मौसम, ऊंचाई या किसी अन्य वजह से हुई। फिलहाल सेना ने आधिकारिक तौर पर कारणों की पुष्टि नहीं की है। हालांकि हादसे के वक्त मौसम साफ था। इसलिए क्रैश की वजह को लेकर अटकलें ही लगाई जा रही हैं।

मेजर जनरल सचिन मेहता भारतीय सेना की 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जीओसी हैं। यह डिवीजन पूर्वी लद्दाख और एलएसी के पास महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालती है। ऐसे में उनका इस तरह के ऑपरेशनल इलाके में दौरा करना नियमित सैन्य गतिविधि का हिस्सा माना जा रहा है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)

क्यों खास माना जाता है चीता हेलीकॉप्टर

चीता हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायुसेना के सबसे पुराने लाइट हेलीकॉप्टरों में गिने जाते हैं। इनका इस्तेमाल खास तौर पर सियाचिन, लद्दाख और उत्तर-पूर्व जैसे कठिन इलाकों में किया जाता है। चीता हेलीकॉप्टर मूल रूप से फ्रांस की एयरोस्पेशियल कंपनी की तकनीक पर आधारित है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल ने 1970 के दशक में इसे भारत में बनाना शुरू किया था। सेना में यह हेलीकॉप्टर दशकों से इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि अब इसकी उम्र काफी ज्यादा हो चुकी है।

सेना के मुताबिक चीता हेलीकॉप्टर दशकों से ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों के लिए लाइफलाइन की तरह काम कर रहे हैं। जहां बड़े हेलीकॉप्टर नहीं उतर सकते, वहां चीता आसानी से पहुंच जाता है। यही वजह है कि सियाचिन ग्लेशियर, एलएसी और कई अग्रिम चौकियों तक राशन, दवाइयां और जवानों को पहुंचाने में इन हेलीकॉप्टरों की बड़ी भूमिका रही है।

यह हेलीकॉप्टर भारतीय सेना का चीता मॉडल था, जिसे लंबे समय से हाई ऑल्टीट्यूड वाले इलाकों में इस्तेमाल किया जाता रहा है। चीता हेलीकॉप्टर को भारतीय सेना और वायुसेना के लिए बेहद अहम माना जाता है, खासकर सियाचिन, लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे दुर्गम इलाकों में। यह हल्का हेलीकॉप्टर संकरी पहाड़ी जगहों पर उतर सकता है और जवानों तक जरूरी सामान पहुंचाने में मदद करता है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)

पुराने हेलीकॉप्टरों पर बढ़ी चिंता

हालांकि इन हेलीकॉप्टरों की उम्र अब काफी ज्यादा हो चुकी है। कई चीता और चेतक हेलीकॉप्टर 30 से 50 साल पुराने बताए जाते हैं।

भारतीय सेना के पास इस समय करीब 190 चीता, चेतक और चीटल हेलीकॉप्टर सेवा में हैं। शुरुआत में सेना के पास इन हेलीकॉप्टर्स की कुल संख्या 246 थी। इनमें से लगभग 25 हेलीकॉप्टर किसी भी समय मरम्मत और मेंटेनेंस में रहते हैं।

इन हेलीकॉप्टर्स के बेड़े का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा 30 साल से भी पुराना हो चुका है। सेना, नौसेना और वायु सेना तीनों को मिलाकर देखा जाए तो चेतक और चीता हेलीकॉप्टर्स की कुल संख्या करीब 400 के आसपास है।

पिछले कुछ वर्षों में इनसे जुड़े कई हादसे सामने आए हैं। रक्षा सूत्रों के मुताबिक पिछले 10 से 12 सालों में 15 से ज्यादा चीता और चेतक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इनमें कई पायलटों और सैन्यकर्मियों की जान भी गई।

चीता हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी खासियत इसकी हाई-ऑल्टीट्यूड क्षमता मानी जाती है। यह करीब 19 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर भी ऑपरेशन कर सकता है। इसकी अधिकतम गति लगभग 190 से 220 किलोमीटर प्रति घंटा है। यह छोटे आकार का हेलीकॉप्टर है और संकरी पहाड़ी जगहों पर भी उतर सकता है।

लेकिन इसके साथ कुछ सीमाएं भी जुड़ी हैं। यह सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर है। यानी इंजन फेल होने की स्थिति में बैकअप नहीं होता। ऊंचाई वाले इलाकों में पतली हवा की वजह से इंजन पर ज्यादा दबाव पड़ता है। मौसम और कठिन भूभाग भी जोखिम बढ़ाते हैं।

सेना के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 से 12 सालों में चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों के कई हादसे हो चुके हैं। इनमें कई पायलटों और सैन्यकर्मियों की जान भी गई। इसी वजह से पुराने हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। (Indian Army Cheetah Crash Leh)

नए हेलीकॉप्टर शामिल करने की तैयारी

इसी वजह से भारतीय सेना अब धीरे-धीरे पुराने चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों को हटाने की योजना पर काम कर रही है। सेना की एविएशन कोर नई पीढ़ी के लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर शामिल कर रही है। एचएएल का स्वदेशी लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर यानी एलयूएच इसी योजना का हिस्सा है।

सेना पहले ही एलयूएच के सीमित सीरीज प्रोडक्शन वाले छह हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दे चुकी है। इन हेलीकॉप्टरों की अधिकतम गति करीब 220 किलोमीटर प्रति घंटा है और इनकी ऑपरेशनल रेंज लगभग 350 किलोमीटर बताई जाती है। सेना और वायुसेना को आने वाले वर्षों में करीब 250 नए हेलीकॉप्टरों की जरूरत बताई जा रही है।

सेना पहले ही एलयूएच के कुछ लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दे चुकी है। नए हेलीकॉप्टरों में बेहतर इंजन, ज्यादा सुरक्षा और हाई-ऑल्टीट्यूड क्षमता दी जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक पुराने हेलीकॉप्टर अभी भी एयरवर्दी हैं और उनकी तकनीकी उम्र बाकी है, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें बदला जाएगा।

चीता हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल केवल जवानों की आवाजाही तक सीमित नहीं है। इनका उपयोग मेडिकल इवैक्यूएशन, टोही मिशन, सप्लाई ड्रॉप और फॉरवर्ड पोस्ट तक जरूरी सामान पहुंचाने में भी किया जाता है। सियाचिन जैसे इलाकों में इन्हें जवानों की “लाइफलाइन” कहा जाता है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)

बाल-बाल बचे थे जनरल बिपिन रावत

भारतीय सेना के इतिहास में पहले भी ऐसे कई हादसे सामने आ चुके हैं, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी बाल-बाल बचे। इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत भी नागालैंड के दीमापुर में चीता हेलीकॉप्टर दुर्घटना में बच गए थे। उस समय हेलीकॉप्टर उड़ान भरने के कुछ सेकंड बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। शुरुआती जांच में इंजन फेल होने की आशंका जताई गई थी।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाना दुनिया के सबसे कठिन सैन्य अभियानों में गिना जाता है। इसके बावजूद भारतीय सेना के एविएशन पायलट लगातार बेहद कठिन परिस्थितियों में मिशन पूरा करते हैं। (Indian Army Cheetah Crash Leh)

भारत के इस ड्रोन को मिला DGCA सर्टिफिकेट, अब करेगा मैपिंग से लेकर निगरानी तक बड़े मिशन

ideaForge Q6 V2 GEO Drone
ideaForge Q6 V2 GEO Drone

ideaForge Q6 V2 GEO Drone: भारत की प्रमुख ड्रोन कंपनी आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी लिमिटेड के मल्टी-पर्पज ड्रोन “क्यू6 वी2 जियो” को डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) से टाइप सर्टिफिकेशन मिल गया है। यह सर्टिफिकेशन ड्रोन रूल्स 2021 के तहत स्मॉल कैटेगरी में दिया गया है। इस कैटेगरी में 2 किलो से 25 किलो तक के ड्रोन शामिल होते हैं।

ideaForge Q6 V2 GEO Drone: कई तरह के मिशन में इस्तेमाल

कंपनी का कहना है कि यह ड्रोन खास तौर पर एडवांस सर्विलांस, मैपिंग, इंस्पेक्शन और जियोस्पेशियल डेटा जुटाने के लिए तैयार किया गया है। इसे सरकारी एजेंसियों, सुरक्षा बलों और एंटरप्राइज सेक्टर की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

आइडियाफोर्ज ने बताया कि क्यू6 वी2 जियो को चुनौतीपूर्ण इलाकों में भी लगातार काम करने के लिए तैयार किया गया है। इसमें अलग-अलग तरह के सेंसर और पेलोड लगाए जा सकते हैं, जिससे यह एक साथ कई तरह के मिशन पूरा कर सकता है।

आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी लिमिटेड के को-फाउंडर और सीईओ अंकित मेहता ने पुष्टि की कि क्यू6 वी2 जियो को डीजीसीए टाइप सर्टिफिकेशन मिल गया है। उन्होंने कहा कि यह प्लेटफॉर्म एंटरप्राइज और सरकारी क्षेत्रों में बढ़ती एरियल इंटेलिजेंस, सर्विलांस, मैपिंग और जियोस्पेशियल डेटा की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

अंकित मेहता के मुताबिक लाइडार जैसे एडवांस पेलोड्स की मदद से यह ड्रोन कठिन परिस्थितियों में भी हाई-क्वालिटी डेटा कैप्चर करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि कंपनी का फोकस ऐसे स्वदेशी ड्रोन प्लेटफॉर्म विकसित करने पर है, जो सुरक्षा, सर्वे और प्रशासनिक जरूरतों को पूरा कर सकें।

डीजीसीए सर्टिफिकेशन क्यों माना जाता है अहम

भारत में किसी भी ड्रोन को बड़े स्तर पर सरकारी या कमर्शियल इस्तेमाल के लिए डीजीसीए टाइप सर्टिफिकेशन जरूरी माना जाता है। इसका मतलब यह होता है कि ड्रोन सुरक्षा, तकनीकी मानकों और ऑपरेशनल नियमों को पूरा करता है।

डिफेंस और सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि टाइप सर्टिफिकेशन मिलने के बाद किसी ड्रोन का इस्तेमाल सरकारी परियोजनाओं, सर्वे मिशनों और कई संवेदनशील ऑपरेशंस में आसानी से किया जा सकता है।

आइडियाफोर्ज का यह ड्रोन पहले “प्रज्ञा 2025” कार्यक्रम में पेश किया गया था। उसी दौरान कंपनी ने इसे अपनी जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी पहल का हिस्सा बताया था।

ideaForge Q6 V2 GEO Drone
ideaForge Q6 V2 GEO Drone

कई तरह के मिशन कर सकता है ड्रोन

क्यू6 वी2 जियो को मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म के तौर पर विकसित किया गया है। इसमें पांच तरह के अलग-अलग पेलोड कॉन्फिगरेशन लगाए जा सकते हैं।

इसमें लाइडार सिस्टम, लाइडार के साथ आरजीबी इमेजिंग, हाई-रिजॉल्यूशन फोटोग्रामेट्री, 3डी ऑब्लिक इमेजिंग और ड्यूल डे-नाइट पेलोड ऑपरेशन जैसी क्षमताएं शामिल हैं।

ड्रोन का इस्तेमाल सीमा निगरानी, औद्योगिक निरीक्षण, सर्वे, मैपिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर मॉनिटरिंग जैसे कामों में किया जा सकता है।

कंपनी के मुताबिक यह ड्रोन कठिन इलाकों में भी हाई-क्वालिटी एरियल डेटा जुटाने में सक्षम है।

45 मिनट से ज्यादा उड़ान भर सकता है

आइडियाफोर्ज के अनुसार क्यू6 वी2 जियो एक बार उड़ान भरने के बाद 45 मिनट से ज्यादा समय तक ऑपरेशन कर सकता है। लंबी उड़ान क्षमता की वजह से इसे बड़े सर्वे मिशनों और लंबी दूरी की मैपिंग के लिए उपयोगी माना जा रहा है। ड्रोन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह पहाड़ी इलाकों, जंगलों, नदी क्षेत्रों और मुश्किल भूभाग में भी स्थिर तरीके से काम कर सके।

किन क्षेत्रों में होगा इस्तेमाल

इस ड्रोन का इस्तेमाल कई सरकारी और औद्योगिक क्षेत्रों में किया जा सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में इसका उपयोग सड़कों, पुलों, बिजली लाइनों और पाइपलाइनों के निरीक्षण के लिए किया जाएगा।

माइनिंग सेक्टर में यह वॉल्यूमेट्रिक एनालिसिस और खनन क्षेत्रों की निगरानी में मदद करेगा। अर्बन प्लानिंग में इसका इस्तेमाल 3डी मैपिंग और शहरों की डिजिटल प्लानिंग के लिए किया जा सकता है।

पर्यावरण से जुड़े कामों में यह ड्रोन ग्लेशियर मैपिंग, नदी बेसिन संरक्षण, जंगलों की निगरानी और एवलांच जोन के अध्ययन में उपयोगी माना जा रहा है।

कृषि क्षेत्र में यह फसलों की स्थिति और एनडीवीआई एनालिसिस जैसे काम कर सकता है।

इसके अलावा डिजास्टर रिस्पॉन्स ऑपरेशंस में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां किसी आपदा प्रभावित इलाके का तेजी से एरियल सर्वे करना जरूरी होता है।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी उपयोगी

ड्रोन में लगे सेंसर और कैमरे इसे सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। इसका इस्तेमाल पेरिमीटर सर्विलांस, पेट्रोलिंग और संवेदनशील इलाकों की निगरानी में किया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक सुरक्षा ऑपरेशंस में ऐसे ड्रोन की मांग तेजी से बढ़ रही है, जो दिन और रात दोनों समय काम कर सकें और हाई-रिजॉल्यूशन डेटा उपलब्ध करा सकें।

पूरा जियोस्पेशियल सिस्टम तैयार किया

कंपनी का कहना है कि क्यू6 वी2 जियो केवल एक ड्रोन प्लेटफॉर्म नहीं है, बल्कि यह पूरे जियोस्पेशियल सिस्टम का हिस्सा है। इसके साथ “ब्लूफायर टच” ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम दिया गया है, जो मिशन प्लानिंग और मल्टी-यूएवी कोऑर्डिनेशन में मदद करता है।

इसके अलावा “फ्लाइट क्लाउड” प्लेटफॉर्म के जरिए वीडियो डेटा एनालिसिस, मिशन डेटा मैनेजमेंट और 3डी टेरेन मॉडल तैयार किए जा सकते हैं। कंपनी के मुताबिक यह सिस्टम फ्लाइट से लेकर डेटा प्रोसेसिंग तक पूरा एंड-टू-एंड वर्कफ्लो उपलब्ध कराता है।

जब CDS ‘कर्नल’ बनकर पहुंचे अपनी यूनिट, गोरखा जवानों के साथ निभाई ये खास परंपरा

CDS Anil Chauhan Gorkha Rifles
CDS General Anil Chauhan

CDS Anil Chauhan Gorkha Rifles: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस जनरल अनिल चौहान हाल ही में लखनऊ स्थित 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर पहुंचे। देश के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होने के बावजूद जनरल अनिल चौहान ने अपनी यूनिट के बीच कर्नल की रैंक इंसिग्निया पहनी हुई थी। कई लोगों को यह बात हैरान करने वाली लगी, लेकिन भारतीय सेना की रेजिमेंटल परंपरा में इसका खास महत्व है।

जनरल अनिल चौहान अपनी पैरेंट यूनिट 6/11 गोरखा राइफल्स और रेजिमेंटल सेंटर के दौरे पर पहुंचे थे। सैनिकों और पूर्व सैनिकों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। सेना के अधिकारियों के मुताबिक यह सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि अपने ही रेजिमेंटल परिवार में लौटने जैसा पल था।

CDS Anil Chauhan Gorkha Rifles: क्यों पहनी कर्नल की रैंक

जनरल अनिल चौहान भारतीय सेना में चार-स्टार रैंक वाले अधिकारी हैं और सीडीएस के पद पर तैनात हैं। इसके बावजूद उन्होंने कर्नल की रैंक इसलिए पहनी, क्योंकि उन्हें 11 गोरखा राइफल्स और सिक्किम स्काउट्स का ऑनरेरी कर्नल ऑफ द रेजिमेंट नियुक्त किया गया है।

भारतीय सेना में कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद बेहद सम्मानित माना जाता है। यह अधिकारी रेजिमेंट की परंपराओं, इतिहास, सैनिकों की भावना और पूर्व सैनिकों की भलाई का संरक्षक माना जाता है। जब ऐसा अधिकारी अपनी रेजिमेंट के कार्यक्रमों या यूनिट विजिट में शामिल होता है, तो वह उसी रेजिमेंटल पद की रैंक पहनता है।

सेना के सूत्रों का कहना है कि यह परंपरा ब्रिटिश इंडियन आर्मी के समय से चली आ रही है। इसका मकसद वरिष्ठ अधिकारी और सैनिकों के बीच दूरी कम करना होता है। सैनिकों को यह एहसास होता है कि उनके सबसे बड़े अधिकारी भी उसी रेजिमेंटल परिवार का हिस्सा हैं।

सैनिकों के लिए खास था यह पल

11 गोरखा राइफल्स के जवानों के लिए यह दौरा बेहद भावनात्मक रहा। एक पूर्व सैनिक ने कहा कि उनके लिए जनरल चौहान केवल देश के सीडीएस नहीं हैं, बल्कि अपनी यूनिट के पुराने साथी हैं।

सेना के अधिकारियों के मुताबिक जब कोई वरिष्ठ अधिकारी रेजिमेंटल परंपरा निभाते हुए कर्नल की रैंक पहनकर यूनिट में आता है, तो जवान उससे ज्यादा सहज महसूस करते हैं। वे खुलकर बातचीत कर पाते हैं और अपने अनुभव साझा कर सकते हैं।

इसी वजह से भारतीय सेना में रेजिमेंटल सिस्टम को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सेना में अलग-अलग रेजिमेंट्स की अपनी पहचान, इतिहास और परंपराएं होती हैं। सैनिक खुद को सिर्फ सेना का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी रेजिमेंटल फैमिली का सदस्य मानते हैं।

11 गोरखा राइफल्स से पुराना रिश्ता

जनरल अनिल चौहान का पूरा सैन्य करियर 11 गोरखा राइफल्स से जुड़ा रहा है। उनका जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने 1981 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून से पास आउट होकर 6/11 गोरखा राइफल्स में कमीशन लिया था।

इसके बाद उन्होंने सेना में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर, एलओसी, सियाचिन और उत्तर-पूर्व में कई ऑपरेशंस में हिस्सा लिया। काउंटर इंसर्जेंसी और हाई-ऑल्टीट्यूड ऑपरेशंस में उन्हें लंबा अनुभव हासिल है।

जनरल चौहान ने ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन रक्षक समेत कई सैन्य अभियानों में काम किया। अप्रैल 2026 में उन्होंने वेस्टर्न कमांड की कमान संभाली थी। बाद में उन्हें देश का चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त किया गया।

11 गोरखा राइफल्स की बहादुरी का इतिहास

11 गोरखा राइफल्स भारतीय सेना की सबसे सम्मानित इन्फैंट्री रेजिमेंट्स में गिनी जाती है। इसकी स्थापना 1 जनवरी 1948 को हुई थी। यह स्वतंत्र भारत में बनी पहली गोरखा रेजिमेंट मानी जाती है।

इस रेजिमेंट के सैनिक मुख्य रूप से नेपाल और भारतीय हिमालयी क्षेत्रों की गोरखा समुदायों से आते हैं। गोरखा सैनिकों की बहादुरी दुनिया भर में प्रसिद्ध मानी जाती है।

11 गोरखा राइफल्स ने 1948 के जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन, 1965 और 1971 के युद्ध, कारगिल संघर्ष और कई काउंटर इंसर्जेंसी अभियानों में हिस्सा लिया है।

कारगिल युद्ध के दौरान 1/11 गोरखा राइफल्स को “ब्रेवेस्ट ऑफ द ब्रेव” का सम्मान मिला था। इसी रेजिमेंट के कैप्टन मनोज कुमार पांडे को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

रेजिमेंट को कई अशोक चक्र, महावीर चक्र और अन्य वीरता पुरस्कार भी मिल चुके हैं। आज इसका रेजिमेंटल सेंटर लखनऊ में स्थित है, जहां जवानों की भर्ती और ट्रेनिंग होती है।

रेजिमेंटल परंपरा क्यों मानी जाती है अहम

भारतीय सेना में रेजिमेंटल सिस्टम केवल परंपरा नहीं, बल्कि सैनिकों की मनोवैज्ञानिक ताकत का हिस्सा माना जाता है। सेना के इतिहासकारों के मुताबिक युद्ध के दौरान सैनिक सबसे ज्यादा अपनी यूनिट और साथियों के लिए लड़ता है।

इसी वजह से सेना में रेजिमेंटल गौरव यानी रेजिमेंटल प्राइड को बहुत महत्व दिया जाता है। वरिष्ठ अधिकारी जब अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं तो जवानों का मनोबल भी मजबूत होता है।

सूत्रों का कहना है कि आज भारतीय सेना तेजी से आधुनिक तकनीकों और जॉइंट कमांड सिस्टम की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद रेजिमेंटल परंपराएं आज भी उतनी ही मजबूत हैं।

8वीं गोरखा राइफल्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नाम भारतीय सेना के सबसे महान सैन्य अधिकारियों में लिया जाता है। हालांकि उन्हें लोग सबसे ज्यादा 8वीं गोरखा राइफल्स से जोड़कर जानते हैं, लेकिन शुरुआत में उन्हें 1934 में 12h फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन में कमीशन मिला था। इसी यूनिट में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बहादुरी दिखाई थी और उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था।

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनकी मूल रेजिमेंट पाकिस्तान चली गई। इसके बाद सैम मानेकशॉ को भारतीय सेना की 8वीं गोरखा राइफल्स में ट्रांसफर कर दिया गया। यहीं से उनका गोरखा सैनिकों के साथ गहरा रिश्ता बना।

उन्होंने लंबे समय तक 8वीं गोरखा राइफल्स के साथ सेवा की और बाद में उन्हें इस रेजिमेंट का “कर्नल ऑफ द रेजिमेंट” भी बनाया गया। गोरखा सैनिक उन्हें बेहद सम्मान देते थे और प्यार से “सैम बहादुर” कहकर बुलाते थे।

सैम मानेकशॉ का गोरखा सैनिकों के बारे में कहा गया एक बयान आज भी बहुत मशहूर है। उन्होंने कहा था:

“If a man says he is not afraid of dying, he is either lying or is a Gorkha.”

यानी अगर कोई कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।

आज भी 8वीं गोरखा राइफल्स, जिसे “शाइनी एट” भी कहा जाता है, सैम मानेकशॉ को अपनी सबसे बड़ी पहचान मानती है। भारतीय सेना में उनका नाम गोरखा परंपरा, बहादुरी और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है।

गोरखा सैनिकों की अलग पहचान

गोरखा सैनिकों की पहचान उनकी बहादुरी, अनुशासन और युद्ध कौशल से जुड़ी रही है। “जय महाकाली, आयो गोरखाली” का युद्धघोष पूरी दुनिया में जाना जाता है।

सियाचिन जैसे बर्फीले इलाकों से लेकर घने जंगलों तक गोरखा यूनिट्स ने कई बार अपनी क्षमता साबित की है। भारतीय सेना में गोरखा रेजिमेंट्स को सबसे भरोसेमंद और लड़ाकू यूनिट्स में गिना जाता है।

जनरल अनिल चौहान का अपनी यूनिट में कर्नल की रैंक पहनकर पहुंचना इसी गहरी रेजिमेंटल संस्कृति का हिस्सा है। सैनिकों के बीच यह संदेश गया कि चाहे कोई अधिकारी कितना भी बड़ा पद हासिल कर ले, उसकी पहचान अपनी यूनिट और अपने सैनिकों से जुड़ी रहती है।

DRDO को चाहिए घातक टर्बोजेट इंजन, वजन हो 25 किग्रा से कम, देता हो 180 किलोग्राम-फोर्स तक का थ्रस्ट

DRDO Compact Turbojet Engine EoI
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DRDO Compact Turbojet Engine EoI: डीआरडीओ ने भारत के रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के लिए एक बेहद अहम एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने 130 से 180 किलोग्राम-फोर्स थ्रस्ट वाले कॉम्पैक्ट टर्बोजेट इंजन सिस्टम के लिए ईओआई जारी की है। खास बात यह है कि डीआरडीओ केवल उन्हीं इंजनों में दिलचस्पी दिखा रहा है जो पहले से फ्लाइट-प्रूवन हों, यानी किसी उड़ने वाले प्लेटफॉर्म पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किए जा चुके हों।

यह ईओआई भारत के मिसाइल, टारगेट ड्रोन और लॉयटरिंग म्यूनिशन प्रोग्राम्स के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। छोटे आकार के लेकिन ज्यादा ताकतवर टर्बोजेट इंजन मॉडर्न वेपन सिस्टम्स का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे इंजन लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले ड्रोन, टारगेट एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइलों में इस्तेमाल होते हैं।

DRDO Compact Turbojet Engine EoI: क्या चाहता है डीआरडीओ

आरसीआई ने साफ कहा है कि उसे ऐसा टर्बोजेट इंजन चाहिए जो पहले से किसी एयर या ग्राउंड लॉन्च सिस्टम में उड़ान भर चुका हो। नई तकनीक या केवल डेवलपमेंट स्टेज वाले प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाएंगे। कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनका इंजन पहले किसी सिस्टम पर इस्तेमाल हो चुका है और उसे संबंधित एजेंसी से फ्लाइट क्लियरेंस भी मिला हुआ है।

डीआरडीओ ने अपने डॉक्यूमेंट में कहा है कि इंजन के साथ उससे जुड़ी सभी जरूरी एक्सेसरीज भी कंपनियों को देनी होंगी। इसमें फ्यूल पंप, फ्यूल लाइन, इंजन कंट्रोल यूनिट, वाल्व, ग्राउंड टेस्ट सिस्टम और दूसरी तकनीकी चीजें शामिल हैं। फ्यूल टैंक डीआरडीओ खुद विकसित करेगा, लेकिन बाकी पूरा सिस्टम कंपनी को उपलब्ध कराना होगा। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

180 किलोग्राम-फोर्स तक थ्रस्ट

डीआरडीओ ने इस इंजन के लिए बेहद खास तकनीकी जरूरतें तय की हैं। इंजन का व्यास 275 मिलीमीटर और लंबाई 540 मिलीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद इसे 130 से 180 किलोग्राम-फोर्स तक थ्रस्ट पैदा करना होगा।

इसके अलावा इंजन का कुल वजन 25 किलोग्राम से कम होना चाहिए। हालांकि इतने हल्के वजन में इतना ज्यादा थ्रस्ट हासिल करना आसान नहीं होता। यही वजह है कि दुनिया में बहुत कम कंपनियां इस कैटेगरी के कॉम्पैक्ट टर्बोजेट इंजन बनाती हैं।

डीआरडीओ चाहता है कि यह इंजन 9.5 किलोमीटर से ज्यादा ऊंचाई पर भी काम कर सके और 0.9 मैक तक की स्पीड पर भी काम करे। साथ ही इसे बेहद ठंडे और गर्म मौसम में भी स्टार्ट होना चाहिए। ईओआई के मुताबिक इंजन माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी काम करना चाहिए।

किन वेपन सिस्टम में हो सकता है इस्तेमाल

हालांकि डीआरडीओ ने आधिकारिक तौर पर किसी विशेष प्रोजेक्ट का नाम नहीं लिया है, लेकिन जानकार मानते हैं कि इस तरह के इंजन कई तरह की सिस्टम्स में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

इसमें हाई-स्पीड टारगेट ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, छोटे क्रूज मिसाइल सिस्टम और एयर-लॉन्च प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं। भारत पहले से “अभ्यास” जैसे हाई-स्पीड एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट डेवलप कर चुका है। ऐसे सिस्टम्स में छोटे लेकिन ज्यादा पावर वाले इंजन की जरूरत होती है।

आधुनिक युद्ध में ड्रोन और लॉयटरिंग म्यूनिशन की भूमिका तेजी से बढ़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में छोटे जेट इंजन वाले ड्रोन और क्रूज हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल देखा गया है। ऐसे में भारत भी अपनी स्वदेशी क्षमता मजबूत करने पर जोर दे रहा है। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

ग्राउंड टेस्टिंग की भी शर्त

डीआरडीओ ने इंजन सप्लाई के साथ कंपनियों से पूरी टेस्टिंग क्षमता भी मांगी है। डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि कंपनियों के पास अलग-अलग आरपीएम और ऊंचाई की परिस्थितियों में इंजन की ग्राउंड टेस्टिंग करने की क्षमता होनी चाहिए।

इसके अलावा कंपनियों को इंजन का “कैरेक्टरिस्टिक मॉडल” भी देना होगा। जिसमें इंजन अलग-अलग स्पीड, ऊंचाई और मैक नंबर पर कितना थ्रस्ट देगा, उसका पूरा डेटा उपलब्ध कराना होगा। यह डेटा मिसाइल और ड्रोन डिजाइन के दौरान बेहद अहम होता है क्योंकि उसी के आधार पर उड़ान का व्यवहार तय किया जाता है। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

कौन कंपनियां ले सकेंगी हिस्सा

डीआरडीओ ने ईओआई में कंपनियों के लिए कई सख्त शर्तें रखी हैं। केवल वही कंपनियां भाग ले सकेंगी जो कंपनी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हों और जिनके पास एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ा वैध एएस9100 या समकक्ष सर्टिफिकेशन हो।

इसके अलावा इंजन को किसी मान्यता प्राप्त एजेंसी से फ्लाइट क्लियरेंस मिला होना जरूरी है। कंपनियों को यह भी साबित करना होगा कि उनका इंजन पहले से किसी एयर या ग्राउंड लॉन्च प्लेटफॉर्म पर उड़ान भर चुका है।

डीआरडीओ ने कंपनियों से उनके पुराने ऑर्डर, रक्षा क्षेत्र में अनुभव और अन्य देशों या भारतीय संस्थानों के साथ किए गए काम का रिकॉर्ड भी मांगा है। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

भारत अभी भी आयात पर निर्भर

भारत ने मिसाइल और ड्रोन तकनीक में काफी प्रगति की है, लेकिन छोटे जेट इंजनों के मामले में अब भी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है। दुनिया में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और कुछ यूरोपीय कंपनियां इस तकनीक में आगे मानी जाती हैं।

रक्षा क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक टर्बोजेट इंजन बनाना बेहद जटिल काम है। इसमें हाई-टेम्परेचर मेटल, सटीक एयरफ्लो डिजाइन, माइक्रो-टर्बाइन और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स का इस्तेमाल होता है।

यही वजह है कि डीआरडीओ इस बार किसी नई तकनीक पर रिस्क लेने के बजाय फ्लाइट-प्रूवन सिस्टम चाहता है, ताकि विकास प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सके।

डीआरडीओ ने 29 मई को आरसीआई हैदराबाद में टेक्निकल इंटरैक्शन मीटिंग रखी है। इसमें इच्छुक कंपनियां हिस्सा लेकर तकनीकी जरूरतों पर चर्चा कर सकेंगी। ईओआई जमा करने की अंतिम तारीख 11 जून है, जबकि प्रपोजल्स को 12 जून को खोला जाएगा।

डीआरडीओ ने साफ किया है कि केवल उन्हीं कंपनियों को आगे की आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा जो प्री-क्वालिफिकेशन शर्तें पूरी करेंगी। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)