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भारतीय सेना खरीदेगी 450 नए कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV लॉन्चर, जानिए कितना घातक है यह एंटी-टैंक वेपन सिस्टम

Carl Gustaf M4 Rocket Launcher RFP
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

Carl Gustaf M4 Rocket Launcher: भारतीय सेना अपनी इन्फैंट्री युनिट्स की मारक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठा रही है। भारतीय सेना जल्द ही कार्ल गुस्ताफ मार्क-4 मल्टी-रोल शोल्डर-फायर्ड वेपन खरीदने की तैयारी कर रही है। सेना ने हल्के वजन वाले रॉकेट लॉन्चरों की 450 यूनिट खरीदने के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी की है। इस खरीद में केवल लॉन्चर ही नहीं, बल्कि इनके साथ जरूरी एक्सेसरीज, स्पेयर पार्ट्स, टेक्निकल डॉक्युमेंट्स और सपोर्ट सिस्टम भी शामिल होंगे।

धरअसल सेना को अलग-अलग तरह के युद्ध क्षेत्रों में तेजी से कार्रवाई करनी होती है। खासतौर पर पहाड़ी इलाकों, जंगलों, सीमावर्ती क्षेत्रों और शहरी युद्ध में हल्के लेकिन शक्तिशाली हथियारों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। कार्ल गुस्ताफ मार्क-4 सेना की इसी जरूरत को पूरा करेगी।

Carl Gustaf M4 Rocket Launcher: क्या है कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV?

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV दुनिया की सबसे आधुनिक 84 मिलीमीटर रिकॉयलेस राइफल सिस्टम में से एक है। इसे स्वीडन की रक्षा कंपनी साब ने डेवलप किया है। यह ऐसा हथियार है जिसे एक सैनिक आसानी से अपने कंधे पर लेकर युद्ध क्षेत्र में पहुंच सकता है और जरूरत पड़ने पर दुश्मन के बख्तरबंद वाहन, बंकर, इमारत, फायरिंग पोजीशन या अन्य सैन्य ठिकानों पर हमला कर सकता है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका हल्का वजन और मल्टीपर्पज इस्तेमाल है। एक ही लॉन्चर से अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद दागे जा सकते हैं। इसी के चलते इसे केवल एंटी-टैंक वेपन नहीं, बल्कि मल्टी-रोल वेपन सिस्टम भी माना जाता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

पहले से कहीं हल्का और आधुनिक

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV वर्जन पहले के मॉडल की तुलना में काफी हल्का बनाया गया है। इसका वजन साइटिंग सिस्टम और बाइपॉड को छोड़कर 6.6 से 7 किलोग्राम है, जबकि पुराने मॉडल इससे काफी भारी थे। वजन कम होने के कारण सैनिक इसे लंबे समय तक अपने साथ लेकर चल सकते हैं।

इसकी कुल लंबाई लगभग 95 सेंटीमीटर है। यानी यह एक मीटर से भी छोटा है। छोटे आकार के कारण इसे तंग गलियों, पहाड़ी रास्तों, घने जंगलों और इमारतों के भीतर भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

मार्क-IV को हल्का बनाने के लिए इसमें आधुनिक सामग्री का उपयोग किया गया है। इसके बाहरी हिस्से में कार्बन फाइबर और अंदर टाइटेनियम लाइनर लगाया गया है। इससे हथियार का वजन कम हुआ है, लेकिन मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ा।

इसके पीछे का वेंटुरी सेक्शन भी नए तरीके से डिजाइन किया गया है, जिससे इसकी लंबाई और वजन दोनों कम हुए हैं। यही कारण है कि यह मॉडल पहले की तुलना में ज्यादा संतुलित माना जाता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

बैरल लाइफ 15 साल

आरएफपी के मुताबिक, भारतीय सेना के लिए खरीदा जाने वाला कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV एक 84 मिलीमीटर कैलिबर का हल्के वजन वाला रिकॉयलेस रॉकेट लॉन्चर होगा। यह सिंगल-शॉट फायरिंग सिस्टम पर काम करेगा, यानी एक बार में एक ही रॉकेट दागा जाएगा और उसके बाद अगला राउंड लोड किया जाएगा।

आरएफपी में स्पष्ट किया गया है कि इस लॉन्चर की बैरल लाइफ कम से कम 1,500 राउंड या 15 साल होनी चाहिए। यानी निर्धारित रखरखाव के साथ इसे लंबे समय तक सेवा में इस्तेमाल किया जा सके।

एक ही लॉन्चर से कई तरह के टारगेट्स पर हमला

सेना ने यह भी शर्त रखी है कि नए लॉन्चर की सटीकता (एक्यूरेसी) मौजूदा 84 मिलीमीटर कार्ल गुस्ताफ मार्क-III के बराबर या उससे बेहतर होनी चाहिए, ताकि टारगेट पर पहले जैसी या उससे अधिक प्रभावी फायरिंग की जा सके।

लॉन्चर को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह भारतीय सेना के पास पहले से मौजूद 84 मिलीमीटर के सभी गोला-बारूद को दाग सके। इसके साथ ही भविष्य में डेवलप होने वाले नए गोला-बारूद के साथ भी यह पूरी तरह काम कर सके।

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक तरह का रॉकेट लॉन्चर नहीं है, बल्कि एक ऐसा हथियार है जो अलग-अलग मिशनों के लिए अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद का इस्तेमाल कर सकता है। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं इसे अपनी इन्फैंट्री यूनिट्स का महत्वपूर्ण हथियार मानती हैं।

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV के लिए 84 मिलीमीटर कैलिबर के कई प्रकार के गोले उपलब्ध हैं। मिशन के अनुसार सैनिक अलग-अलग राउंड का चयन कर सकते हैं।

यदि सामने दुश्मन का बख्तरबंद वाहन या टैंक हो, तो हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (हीट) राउंड का उपयोग किया जाता है। इसकी विशेष डिजाइन धातु की मोटी परत को भेदकर अंदर विस्फोट करती है।

अगर टारगेट किसी इमारत, बंकर या दीवार के पीछे छिपा हो, तो हाई एक्सप्लोसिव ड्यूल पर्पज (एचईडीपी) राउंड इस्तेमाल किया जाता है। यह पहली बाधा को तोड़ कर और फिर अंदर विस्फोट करता है।

इसी तरह सैनिकों के समूह के खिलाफ हाई एक्सप्लोसिव (एचई) राउंड का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा धुआं फैलाने वाले स्मोक राउंड और रात के समय रोशनी करने वाले इल्यूमिनेशन राउंड भी उपलब्ध हैं। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक करे काम

भारतीय सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह हथियार भारत के धूलभरे, गर्म और अधिक नमी वाले इलाकों में बिना किसी रुकावट के काम करने में सक्षम होना चाहिए। यानी रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों जैसी सभी परिस्थितियों में इसकी कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

विश्वसनीयता के मामले में भी नया लॉन्चर कार्ल गुस्ताफ मार्क-III के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन करने वाला होना चाहिए। साथ ही इसकी मेंटेनेंस आसान होनी चाहिए, ताकि सैनिक बिना किसी विशेष औजार के इसे खोलकर साफ कर सकें, नियमित जांच कर सकें और जरूरत पड़ने पर इसके पुर्जों को आसानी से बदल या मरम्मत कर सकें।

इसके अलावा सेना ने यह भी शर्त रखी है कि माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी लॉन्चर की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। यानी यह हथियार लद्दाख की कड़ाके की ठंड से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान जैसी भीषण गर्मी तक हर मौसम में समान रूप से प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम होना चाहिए। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

कैसे करता है काम?

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV एक सिंगल-शॉट ब्रीच-लोडिंग रिकॉयलेस सिस्टम है। हर बार फायरिंग के बाद पीछे से नया गोला-बारूद डाला जाता है और फिर अगला शॉट तैयार होता है।

सामान्य तौर पर इसे दो सैनिक चलाते हैं। एक सैनिक लॉन्चर संभालता है जबकि दूसरा गोला-बारूद लोड करता है। हालांकि जरूरत पड़ने पर एक सैनिक भी इसे अकेले चला सकता है, लेकिन उस हालात में फायरिंग की स्पीड कम हो जाती है। कार्ल गुस्ताफ लगभग एक मिनट में छह राउंड तक दाग सकता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

निशाना लगाने के लिए आधुनिक सिस्टम

मार्क-IV में अलग-अलग प्रकार की साइट लगाई जा सकती हैं। इसमें साधारण आयरन साइट, रेड डॉट साइट, टेलीस्कोपिक साइट और आधुनिक डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है।

आरएफपी के अनुसार लॉन्चर में एफसीडी-558 फायर कंट्रोल डिवाइस और रेड डॉट साइट लगाने की सुविधा होनी चाहिए। इससे गनर टारगेट पर तेजी और अधिक सटीकता के साथ निशाना लगा सकेगा।

इसके ऊपर पिकाटिनी रेल दी गई है, जिस पर जरूरत के अनुसार अतिरिक्त उपकरण लगाए जा सकते हैं। इससे अलग-अलग मिशनों के अनुसार हथियार को आसानी से तैयार किया जा सकता है। आधुनिक डिजिटल साइट लगाने पर टारगेट की दूरी, ऊंचाई और अन्य जरूरी जानकारी देखकर ज्यादा सटीक निशाना लगाया जा सकता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

सैनिकों की सुरक्षा का भी ध्यान

मार्क-IV में कई ऐसे फीचर जोड़े गए हैं, जो सैनिकों की सुरक्षा बढ़ाते हैं। इसमें ट्रैवल सेफ्टी कैच दिया गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर हथियार को लोडेड स्थिति में भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसके अलावा इसमें एडजस्ट होने वाला शोल्डर रेस्ट और आगे पकड़ने के लिए बेहतर ग्रिप दी गई है। इससे लंबे समय तक हथियार इस्तेमाल करने में भी सैनिक को कम थकान होती है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

बैरल की स्थिति खुद बताएगा सिस्टम

इस हथियार में डिजिटल शॉट काउंटर भी लगाया गया है। यह रिकॉर्ड रखता है कि लॉन्चर से अब तक कितने राउंड दागे जा चुके हैं। इससे तकनीकी टीम को यह पता चलता रहता है कि बैरल की कितनी लाइफ बची है और कब उसकी जांच या बदलाव की जरूरत पड़ेगी। कंपनी के अनुसार इसकी बैरल लाइफ एक हजार से अधिक फुल कैलिबर राउंड तक हो सकती है।

कितनी दूर तक कर सकता है हमला

मार्क-IV की मारक क्षमता इस्तेमाल किए जाने वाले गोले पर निर्भर करती है। आरएफपी के मुताबिक, इसकी मारक क्षमता की बात करें तो हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (HEAT) गोले के साथ इसकी प्रभावी रेंज कम से कम 350 मीटर होनी चाहिए। वहीं हाई एक्सप्लोसिव (HE) गोले के साथ यह कम से कम 800 मीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम होना चाहिए।

चलते हुए बख्तरबंद वाहन के खिलाफ इसकी प्रभावी दूरी लगभग 350 से 400 मीटर मानी जाती है। यदि टारगेट स्थिर हो, तो यह दूरी लगभग 500 मीटर तक हो सकती है।

हाई एक्सप्लोसिव और स्मोक राउंड के साथ यह लगभग एक किलोमीटर तक प्रभावी फायर कर सकता है। आधुनिक गाइडेड गोला-बारूद के साथ इसकी दूरी इससे भी अधिक हो सकती है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

भारत में ही बनेगा कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV

सूत्रों के मुताबिक, भारत में इस हथियार का निर्माण हरियाणा के झज्जर स्थित मेट सिटी में स्थापित साब की नई फैक्टरी में किया जाएगा। यह स्वीडन के बाहर कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV की पहली प्रोडक्शन युनिट है। इसे स्थापित करने की घोषणा वर्ष 2022 में की गई थी।

डिफेंस सेक्टर में पहला 100 प्रतिशत एफडीआई प्रोजेक्ट

साल 2023 में भारत सरकार ने साब को इस परियोजना के लिए 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की मंजूरी दी। इसके बाद कंपनी ने साब एफएफवीओ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के नाम से अपनी भारतीय युनिट बनाई, जो पूरी तरह साब के स्वामित्व वाली कंपनी है।

रक्षा क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना गया क्योंकि इससे आधुनिक रक्षा उपकरणों का उत्पादन भारत में शुरू होने का रास्ता खुला।

मार्च 2024 में झज्जर स्थित संयंत्र का निर्माण कार्य आधिकारिक रूप से शुरू हुआ। फैक्टरी में केवल लॉन्चर ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण पुर्जों का भी निर्माण किया जाएगा। इनमें कार्बन फाइबर ट्यूब, आधुनिक साइटिंग सिस्टम और अन्य अपग्रेडेड कंपोनेंट शामिल हैं।

सूत्रों का कहना है कि यहां बने कुछ कंपोनेंट दुनिया के दूसरे देशों में उपयोग होने वाले कार्ल गुस्ताफ सिस्टम के लिए भी भेजे जा सकते हैं।

वहीं, भारत में उत्पादन शुरू होने से सेना को हथियारों की आपूर्ति के लिए विदेश पर पहले जैसी निर्भरता नहीं रहेगी। स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और तकनीकी सहायता भी कम समय में उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे लॉजिस्टिक व्यवस्था बेहतर होगी और रखरखाव का समय कम लगेगा। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

Explained: दो ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां क्यों चाहता है इंडोनेशिया? क्यों है ये दुनिया का सबसे घातक कोस्टल डिफेंस सिस्टम

India-Indonesia BrahMos Missile Deal
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India-Indonesia BrahMos Missile Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा मिली है। दोनों देशों ने ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, समुद्री सुरक्षा, रक्षा तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और रक्षा उद्योग से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। सूत्रों के मुताबिक, इन्हीं समझौतों के तहत भारत इंडोनेशिया को करीब 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 1,900 करोड़ रुपये) मूल्य की दो ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां देगा। इस प्रस्ताव को भारत और इंडोनेशिया के बीच अब तक के सबसे बड़े रक्षा सहयोगों में से एक माना जा रहा है।

बता दें कि रक्षा समाचार ने दो दिन पहले ही बताया था कि “एक नहीं, अब अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां चाहता है जकार्ता।

India-Indonesia BrahMos Missile Deal: क्या होती है ब्रह्मोस बैटरी?

आमतौर पर लोग समझते हैं कि किसी देश को केवल मिसाइलें बेची जाती हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग होती है। किसी भी आधुनिक मिसाइल सिस्टम में केवल मिसाइल नहीं, बल्कि पूरा ऑपरेशनल नेटवर्क शामिल होता है। इसी नेटवर्क को मिसाइल बैटरी कहा जाता है।

एक ब्रह्मोस बैटरी में सामान्य तौर पर चार मोबाइल लॉन्चर शामिल होते हैं। प्रत्येक लॉन्चर पर कई मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं। इसके अलावा बैटरी में लगभग 12 तैयार मिसाइलें, कमांड पोस्ट, मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट्स, पावर सप्लाई व्हीकल्स, री-लोडिंग व्हीकल्स, टेक्निकल सपोर्ट व्हीकल, और मेंटेनेंस से जुड़े कई उपकरण शामिल होते हैं।

यानी किसी बैटरी को तैनात करने के बाद वह अपने स्तर पर टारगेट की पहचान करने, मिसाइल लॉन्च करने और ऑपरेशन संचालित करने में सक्षम होती है।

तटीय सुरक्षा के लिए कैसे काम करती है ब्रह्मोस बैटरी?

सूत्रों के मुताबिक, इंडोनेशिया को मिलने वाली ब्रह्मोस बैटरियां मुख्य रूप से कोस्टल डिफेंस यानी तटीय सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की जाएंगी।

यदि किसी दुश्मन का युद्धपोत, एंफीबियस हमला करने वाला जहाज या अन्य बड़ा समुद्री प्लेटफॉर्म इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र की ओर बढ़ता है, तो तटीय रडार और सर्विलांस सिस्टम पहले उसकी पहचान करेंगे। इसके बाद कमांड सेंटर टारगेट की दूरी, दिशा और गति का विश्लेषण करेगा।

जब टारगेट की पुष्टि हो जाती है, तब ब्रह्मोस मिसाइल मोबाइल लॉन्चर से दागी जाती है। मिसाइल लॉन्च होने के बाद बेहद तेज गति से समुद्र की सतह के करीब उड़ते हुए टारगेट की ओर बढ़ती है और निर्धारित बिंदु पर सटीक हमला करती है।

दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल

ब्रह्मोस को दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यह लगभग मैक 2.8 से 3 की गति से उड़ सकती है। इसका मतलब है कि इसकी रफ्तार लगभग 3,400 से 3,700 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। इतनी अधिक गति के कारण दुश्मन के जहाजों या एयर डिफेंस सिस्टम के पास प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय बचता है।

अधिकांश सबसोनिक क्रूज मिसाइलें ब्रह्मोस की तुलना में काफी धीमी होती हैं। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)

कितनी है ब्रह्मोस की रेंज?

वर्तमान में ब्रह्मोस के अलग-अलग वर्जन अलग-अलग दूरी तक हमला कर सकते हैं। जमीन से जमीन पर हमला करने वाले वर्जन की मारक क्षमता लगभग 500 किलोमीटर तक पहुंच चुकी है। वहीं जहाज से दागे जाने वाले वर्जन की प्रभावी रेंज लगभग 400 किलोमीटर तक है।

सूत्रों के अनुसार, ब्रह्मोस के पुराने संस्करण की रेंज लगभग 290 किलोमीटर थी। बाद में तकनीकी सुधारों के जरिए इसकी मारक क्षमता बढ़ाई गई।

ब्रह्मोस को इतनी सटीक मिसाइल क्यों माना जाता है?

ब्रह्मोस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रिसीजन स्ट्राइक क्षमता है। मिसाइल लॉन्च होने के बाद पहले चरण में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम की मदद से उड़ान भरती है। इसके बाद जीपीएस, ग्लोनास और अन्य नेविगेशन तकनीकों की सहायता से अपनी दिशा बनाए रखती है।

अंतिम चरण में इसका एक्टिव रडार सीकर अपने टारगेट की पहचान करता है और बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हुए सीधे टारगेट पर हमला करता है।

समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ने की इस तकनीक को सी-स्किमिंग प्रोफाइल कहा जाता है। इससे दुश्मन के रडार को मिसाइल का पता काफी देर से चलता है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)

मिसाइल को रोकना क्यों मुश्किल?

किसी भी मिसाइल को रोकने के लिए एयर डिफेंस सिस्टम के पास पर्याप्त समय होना चाहिए। ब्रह्मोस बहुत तेज रफ्तार से उड़ती है और आखिरी चरण में ऊंचाई कम कर लेती है। साथ ही यह उड़ान के दौरान दिशा भी बदल सकती है। इस कारण दुश्मन के डिफेंस सिस्टम के लिए इसकी सही दिशा का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।

इसी वजह से इसे आधुनिक नौसैनिक युद्ध में बेहद प्रभावी हथियार माना जाता है।

किन प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है ब्रह्मोस?

ब्रह्मोस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुउद्देश्यीय क्षमता है। इसे जमीन से मोबाइल लॉन्चर के जरिए दागा जा सकता है। भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत भी इससे लैस हैं। भारतीय वायुसेना के सु-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से भी इसका एयर-लॉन्च वर्जन का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसके अलावा पनडुब्बी से दागे जाने वाले संस्करण पर भी लंबे समय से काम किया जा रहा है। यही वजह है कि ब्रह्मोस को मल्टी-प्लेटफॉर्म सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल कहा जाता है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)

इंडोनेशिया को ब्रह्मोस की जरूरत क्यों पड़ रही है?

इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े द्वीपीय देशों में शामिल है। उसके पास करीब 17 हजार द्वीप हैं और उसकी समुद्री सीमा हजारों किलोमीटर तक फैली हुई है। ऐसे में इतनी बड़ी समुद्री सीमा की सुरक्षा करना किसी भी देश के लिए बड़ी चुनौती होती है।

इंडोनेशिया अपनी तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लंबे समय से आधुनिक मिसाइल सिस्टम की तलाश में था। खासकर दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए इंडोनेशिया ऐसी मिसाइल चाहता था, जो दुश्मन के युद्धपोतों को काफी दूरी से ही रोक सके। ब्रह्मोस उसकी इसी जरूरत को पूरा करता है। इसकी लंबी मारक क्षमता, तेज रफ्तार और सटीक निशाना इसे तटीय रक्षा के लिए उपयुक्त बनाते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर में किया साबित

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की क्षमता ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल का इस्तेमाल तय किए गए टारगेट्स पर सटीक हमला करने के लिए किया था।

सूत्रों के मुताबिक, इस ऑपरेशन के बाद कई देशों ने ब्रह्मोस की वास्तविक ऑपरेशनल क्षमता में रुचि दिखाई। किसी भी वेपन सिस्टम के लिए वास्तविक परिस्थितियों में प्रदर्शन सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसी कारण अब कई मित्र देशों ने भारत के साथ ब्रह्मोस खरीदने को लेकर बातचीत तेज कर दी है।

फिलीपींस के बाद इंडोनेशिया दूसरा बड़ा ग्राहक

भारत ने पहली बार वर्ष 2022 में फिलीपींस के साथ ब्रह्मोस निर्यात का बड़ा समझौता किया था। उस सौदे के तहत फिलीपींस ने अपनी तटीय सुरक्षा के लिए तीन ब्रह्मोस बैटरियां खरीदी थीं।

सूत्रों के अनुसार, वियतनाम के साथ भी मिसाइल निर्यात को लेकर समझौता हो चुका है। इसके अलावा इंडोनेशिया के साथ दो बैटरियों का प्रस्ताव अंतिम चरण में पहुंच गया है। इसके अलावा पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई अन्य देश भी इस मिसाइल में रुचि दिखा रहे हैं। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)

डीआरडीओ और ब्रह्मोस एयरोस्पेस की क्या है भूमिका?

ब्रह्मोस मिसाइल का विकास भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के संयुक्त सहयोग से किया गया है।

इसके प्रोडक्शन और डिस्ट्रिब्यूशन की जिम्मेदारी ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड के पास है।

भारत में मिसाइल के कई महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण अब स्वदेशी उद्योग कर रहा है। समय के साथ इसमें स्वदेशी तकनीक और भारतीय कंपोनेंट्स की हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई गई है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यही कारण है कि अब ब्रह्मोस भारत के रक्षा निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद बन चुका है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)

क्या है ब्रह्मोस-एनजी?

ब्रह्मोस के मौजूदा वर्जन के साथ-साथ भारत इसका नया ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) वर्जन भी विकसित कर रहा है। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि इसे ज्यादा प्रकार के लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों और पनडुब्बियों से आसानी से दागा जा सके। इसका आकार मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल से छोटा और वजन लगभग आधा होगा, जिससे इसे ले जाना और ऑपरेट करना आसान होगा।

ब्रह्मोस-एनजी का वजन करीब 1.5 टन होगा, जबकि मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल का वजन लगभग 3 टन है। इसकी लंबाई करीब 6 मीटर और व्यास लगभग 50 सेंटीमीटर होगा। यह लगभग मैक 3.5 यानी ध्वनि की गति से साढ़े तीन गुना अधिक रफ्तार से उड़ सकेगी। इसकी मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर होगी। साथ ही इसमें आधुनिक एईएसए आधारित सीकर और कम रडार क्रॉस सेक्शन (आरसीएस) जैसी तकनीकें होंगी, जिससे दुश्मन के रडार के लिए इसे पहचानना पहले की तुलना में अधिक कठिन होगा।

फिलहाल भारतीय वायुसेना का सु-30 लड़ाकू विमान भारी वजन के कारण एक समय में केवल एक ब्रह्मोस-ए मिसाइल लेकर उड़ सकता है। लेकिन ब्रह्मोस-एनजी के हल्का होने के कारण यही विमान एक साथ तीन ब्रह्मोस-एनजी मिसाइलें ले जा सकेगा। सूत्रों का कहना है कि भविष्य में इसमें पांच मिसाइलें ले जाने की क्षमता भी विकसित की जा सकती है।

एक साथ अधिक मिसाइलें ले जाने की क्षमता मिलने से सु-30 एक ही मिशन में कई अलग-अलग टारगेट्स पर हमला कर सकेगा। इसमें दुश्मन के युद्धपोत, एयरबेस, रडार स्टेशन, मिसाइल लॉन्च साइट और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने शामिल हो सकते हैं। ब्रह्मोस-एनजी को सु-30 के एलसीए तेजस, मिग-29के जैसे लड़ाकू विमानों के साथ भी जोड़ने की योजना है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)

Explained: मलक्का स्ट्रेट पर भारत को बड़ी कामयाबी! जानें कैसे चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का जवाब बनेगा सबांग पोर्ट?

India-Indonesia Sabang Port Project
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India-Indonesia Sabang Port Project: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, बंदरगाह विकास और कनेक्टिविटी से जुड़े कई अहम फैसलों पर सहमति जताई। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में से एक इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट के संयुक्त विकास का है। इस प्रोजेक्ट से भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और इंडो-पैसिफिक रणनीति को मजबूती मिलेगी।

सूत्रों के अनुसार, सबांग पोर्ट का विकास भारत और इंडोनेशिया के बीच कई सालों से चल रही समुद्री साझेदारी का हिस्सा है। यह प्रोजेक्ट ऐसे स्थान पर स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। यही वजह है कि इस प्रोजेक्ट को आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

India-Indonesia Sabang Port Project: आखिर कहां है सबांग पोर्ट?

सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के अचे प्रांत में स्थित वेह द्वीप पर बना हुआ है। यह द्वीप सुमात्रा के सबसे उत्तरी हिस्से में है। भौगोलिक दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के बिल्कुल पास स्थित है। यह स्ट्रेट मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच स्थित है। इसकी लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है। वहीं, कुछ जगहों पर चौड़ाई मात्र 2.8 किलोमीटर तक सिकुड़ जाती है।

मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर से जोड़ता है। दुनिया के अधिकांश मालवाहक जहाज, तेल टैंकर और कंटेनर शिप इसी समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए इस क्षेत्र को वैश्विक समुद्री व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन माना जाता है।

मलक्का जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

दुनिया के समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर साल हजारों जहाज इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं। मध्य-पूर्व से निकलने वाला कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एशियाई देशों के बीच होने वाला व्यापार इसी रास्ते से आगे बढ़ता है।

वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई अन्य एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति भी काफी हद तक इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर है।

यही कारण है कि मलक्का जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मैरिटाइम चोकपॉइंट्स में गिना जाता है। यदि किसी कारण से इस मार्ग पर यातायात प्रभावित होता है तो उसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए क्यों खास है सबांग?

सबांग पोर्ट की सबसे बड़ी रणनीतिक विशेषता इसकी भारत से निकटता है। यह बंदरगाह भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

भारत इस समय ग्रेट निकोबार में एक बड़े ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, बिजली प्रोजेक्ट और अन्य समुद्री बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास कर रहा है। ऐसे में सबांग और ग्रेट निकोबार एक-दूसरे के पूरक समुद्री केंद्र बन सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि दोनों स्थानों की भौगोलिक स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर बेहतर समुद्री पहुंच उपलब्ध करा सकती है। इससे समुद्री निगरानी, जहाजों की आवाजाही और लॉजिस्टिक सपोर्ट की क्षमता मजबूत हो सकती है।

केवल बंदरगाह नहीं, समुद्री नेटवर्क का हिस्सा

विशेषज्ञों के अनुसार, सबांग प्रोजेक्ट को केवल एक बंदरगाह के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य पूरे क्षेत्र में समुद्री कनेक्टिविटी को मजबूत करना है।

भारत और इंडोनेशिया पहले से अंडमान-निकोबार और अचे क्षेत्र के बीच व्यापार, पर्यटन और समुद्री संपर्क बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। इसी दिशा में सबांग पोर्ट को एक बड़े समुद्री नेटवर्क के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है।

इस नेटवर्क में कंटेनर परिवहन, जहाजों को ईंधन उपलब्ध कराना, मरम्मत सुविधाएं, समुद्री लॉजिस्टिक्स, मत्स्य क्षेत्र और पर्यटन जैसे कई क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। (India-Indonesia Sabang Port Project)

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से क्या होगा फायदा?

भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश की सबसे बड़ी समुद्री आधारभूत प्रोजेक्टओं में शामिल है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, ऊर्जा संयंत्र और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जा रही है।

अभी भारत के काफी कंटेनर कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिपमेंट किए जाते हैं। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का उद्देश्य इस निर्भरता को कम करना है।

यदि ग्रेट निकोबार और सबांग दोनों समुद्री केंद्र एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं, तो पूरे अंडमान सागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे व्यापारिक जहाजों को अतिरिक्त सेवाएं भी उपलब्ध हो सकेंगी।

चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मलक्का मार्ग?

चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्ते से पूरा करता है। चीन के आयातित कच्चे तेल का अधिकांश भाग मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

चीन के रणनीतिक विशेषज्ञ लंबे समय से इसे “मलक्का डिलेमा” कहते रहे हैं। इसका मतलब यह है कि यदि किसी संकट के समय इस समुद्री मार्ग पर बाधा आती है तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

इसी कारण चीन ने “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के तहत पिछले कई सालों में हिंद महासागर क्षेत्र में विभिन्न बंदरगाहों और समुद्री प्रोजेक्टओं में निवेश किया है। पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हम्बनटोटा और म्यांमार के क्योकफ्यू जैसे बंदरगाह इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि भारत और इंडोनेशिया का सबांग सहयोग किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है। हालांकि इसकी रणनीतिक स्थिति इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण बना देती है।

सबांग पोर्ट का संयुक्त विकास कैसे होगा?

भारत और इंडोनेशिया के बीच जिस सबांग पोर्ट परियोजना पर सहमति बनी है, उसका उद्देश्य केवल बंदरगाह का विस्तार करना नहीं है। रक्षा और समुद्री मामलों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसे एक ऐसे आधुनिक समुद्री केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां व्यापारिक जहाजों के साथ-साथ समुद्री लॉजिस्टिक्स, ईंधन आपूर्ति, जहाजों की मरम्मत और अन्य आवश्यक सेवाएं भी उपलब्ध हों।

इसके तहत बंदरगाह के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाएगा। बड़े जहाजों के लिए बर्थिंग सुविधा बेहतर बनाई जाएगी, कंटेनर हैंडलिंग क्षमता बढ़ाई जाएगी और आधुनिक समुद्री उपकरण लगाए जाएंगे। इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा से जुड़ी सुविधाओं का भी विस्तार किया जाएगा। (India-Indonesia Sabang Port Project)

क्या होता है ड्यूल-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर?

समुद्री विशेषज्ञ अक्सर इस तरह की परियोजनाओं के लिए ड्यूल-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर शब्द का इस्तेमाल करते हैं। इसका मतलब ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर से होता है जिसका उपयोग सामान्य व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सरकारी या सुरक्षा एजेंसियां भी कर सकें।

उदाहरण के तौर पर किसी बंदरगाह पर बनाए गए बड़े जेटी, ईंधन भंडारण केंद्र, गोदाम, संचार प्रणाली और मरम्मत सुविधाओं का उपयोग सामान्य कार्गो जहाज भी कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर नौसेना या तटरक्षक बल के जहाज भी।

भारतीय नौसेना को कैसे मिलेगा फायदा?

सूत्रों के अनुसार, यदि सबांग पोर्ट पूरी तरह विकसित हो जाता है तो भारतीय नौसेना को हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में बेहतर लॉजिस्टिक सहायता मिल सकती है।

जब कोई युद्धपोत लंबी दूरी के मिशन पर जाता है, तो उसे समय-समय पर ईंधन, भोजन, पानी, तकनीकी जांच और अन्य आवश्यक सामग्री की जरूरत पड़ती है। यदि आसपास ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हों तो जहाजों को अपने मूल बेस पर लौटने की आवश्यकता कम पड़ती है।

इसी तरह समुद्री निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत और संयुक्त अभ्यास जैसे अभियानों के दौरान भी बेहतर सहयोग संभव हो सकता है। (India-Indonesia Sabang Port Project)

समुद्री निगरानी कैसे होगी मजबूत?

सबांग पोर्ट की सबसे बड़ी खूबी उसकी लोकेशन है। यहां से मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश क्षेत्र की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

आज समुद्री निगरानी केवल जहाजों से नहीं होती। इसके लिए तटीय रडार, सैटेलाइट, ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस), समुद्री संचार नेटवर्क और विभिन्न देशों के बीच साझा की जाने वाली सूचनाओं का भी उपयोग किया जाता है।

यदि किसी जहाज की गतिविधि सामान्य पैटर्न से अलग दिखाई देती है तो उसकी जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाई जा सकती है।

इसी प्रकार समुद्री डकैती, हथियारों की तस्करी, मानव तस्करी, अवैध मछली पकड़ने और संदिग्ध जहाजों की पहचान करने में भी ऐसे नेटवर्क मदद करते हैं। (India-Indonesia Sabang Port Project)

एक-दूसरे के पूरक कैसे बन सकते हैं ग्रेट निकोबार और सबांग?

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रेट निकोबार और सबांग की भूमिका अलग-अलग हो सकती है।

ग्रेट निकोबार को बड़े अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में डेवलप किया जा रहा है, जहां बड़े कंटेनर जहाज अपना माल दूसरे जहाजों में स्थानांतरित कर सकेंगे।

दूसरी ओर, सबांग पोर्ट समुद्री सेवाओं का केंद्र बन सकता है। यहां जहाजों को ईंधन, तकनीकी सहायता, मरम्मत, समुद्री लॉजिस्टिक्स और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। (India-Indonesia Sabang Port Project)

इंडोनेशिया खरीदेगा भारत की Astra Mk-1 मिसाइल! Su-30 फाइटर जेट पर होगी तैनाती, जानिए पूरी डील

Astra Missile Indonesia Deal
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Astra Missile Indonesia Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती मिली है। यात्रा के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग, एयर-टू-एयर मिसाइल सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा और रक्षा तकनीक से जुड़े कई अहम समझौतों और पहलों पर सहमति बनी। खास बात यह है कि इंडोनेशिया भारत में बनी अस्त्र (Astra) एयर-टू-एयर मिसाइल को अपने सु-27 और सु-30 लड़ाकू विमानों के लिए खरीदना चाहता है। इंडोनेशिया 150 से अधिक अस्त्र एमके-1 मिसाइलें खरीदने पर विचार कर रहा है। साथ ही भविष्य में लंबी दूरी वाली अस्त्र एमके-2 मिसाइल को भी शामिल करने की संभावना पर चर्चा चल रही है।

भारत और इंडोनेशिया के बीच एयर-टू-एयर मिसाइल सहयोग से न केवल दोनों देशों के रक्षा संबंध और मजबूत होंगे। वहीं इंडोनेशिया के भारतीय अस्त्र मिसाइल के खरीदने से भारत के रक्षा निर्यात को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को वैश्विक पहचान मिलेगी।

इसके साथ ही दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग भी बढ़ेगा। यह सहयोग भारत के स्वदेशी मिसाइल विकास कार्यक्रम और रक्षा अनुसंधान को भी मजबूती देगा।

Astra Missile Indonesia Deal: क्यों बढ़ी अस्त्र मिसाइल की मांग

इंडोनेशियाई वायुसेना में कई देशों के लड़ाकू विमान शामिल हैं। इसमें 33 अमेरिकी एफ-16, 5 रूसी सु-27 और 11 सु-30, और 6 फ्रांस के राफेल विमान शामिल हैं। इंडोनेशिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती रूसी मूल के हथियारों और मिसाइलों की समय पर सप्लाई की है। पिछले कुछ सालों में वैश्विक हालात बदलने के बाद रूस से स्पेयर पार्ट्स और मिसाइलों की सप्लाई प्रभावित हुई है। ऐसे में इंडोनेशिया ऐसे विकल्प तलाश रहा है जो तकनीकी रूप से आधुनिक होने के साथ भरोसेमंद सप्लाई चेन भी उपलब्ध कराएं।

सूत्रों का कहना है कि इस खरीद में मिसाइल को इंडोनेशिया के फाइटर जेट्स के साथ जोड़ने, पायलटों और तकनीकी स्टाफ की ट्रेनिंग तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल हैं।

अस्त्र एमके-1 मिसाइल की क्या है रेंज

अस्त्र एमके-1 भारत की पहली स्वदेशी बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। यह दुश्मन के लड़ाकू विमान को काफी दूर से निशाना बनाने के लिए विकसित की गई है।

अगर मिसाइल सामने से आ रहे टारगेट (हेड-ऑन) पर दागी जाए, तो इसकी मारक क्षमता लगभग 110 किलोमीटर तक होती है। वहीं, अगर टारगेट मिसाइल से दूर जा रहा हो (टेल-चेज), तो इसकी प्रभावी रेंज करीब 20 से 40 किलोमीटर रहती है।

सूत्रों का कहना है कि हाल के सालों में मिसाइल की परफॉरमेंस में कई सुधार किए गए हैं। ऑपरेशनल अनुभवों और परीक्षणों के आधार पर इसकी प्रभावी रेंज को बढ़ाकर लगभग 160 किलोमीटर तक पहुंचाने की दिशा में काम किया गया है, जिससे यह पहले की तुलना में अधिक दूरी से टारगेट को निशाना बनाने में सक्षम हो गई है।

तकनीकी रूप से यह मिसाइल मैक 4.5 से अधिक यानी लगभग 5,500 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से उड़ सकती है। इसकी लंबाई लगभग 3.6 से 3.84 मीटर, वजन करीब 154 किलोग्राम और व्यास 178 मिलीमीटर है। इसमें लगभग 15 किलोग्राम का प्री-फ्रैगमेंटेड हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया गया है, जो टारगेट के पास पहुंचकर अधिकतम नुकसान पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है।

मिसाइल में सिंगल-पल्स स्मोकलेस सॉलिड रॉकेट मोटर लगी है, जिससे उड़ान के दौरान धुएं का निशान बहुत कम बनता है, जिससे कम आरसीएस बनता है और दुश्मन के लिए इसे पहचानना कठिन हो जाता है। (Astra Missile Indonesia Deal)

सु-30 पर इंटीग्रेशन क्यों आसान माना जा रहा है

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इंडोनेशिया के सु-27 और सु-30 लड़ाकू विमान उसी फ्लैंकर परिवार के हैं, जिस पर भारतीय वायुसेना का सु-30एमकेआई बना है।

भारतीय वायुसेना कई सालों से सु-30 पर अस्त्र मिसाइल को ऑपरेट कर रही है। इसलिए इंडोनेशिया के विमान पर इस मिसाइल को जोड़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान मानी जा रही है।

हालांकि दोनों विमानों में कुछ इलेक्ट्रॉनिक और एवियोनिक्स का अंतर हैं, लेकिन बेसिक प्लेटफॉर्म एक जैसा होने के कारण बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की जरूरत पड़ने की संभावना बेहद कम है।

कैसे होती है किसी मिसाइल की इंटीग्रेशन

किसी भी नई मिसाइल को सीधे विमान के नीचे लगाकर उड़ाया नहीं जा सकता। इसके लिए लंबी तकनीकी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।

सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि मिसाइल विमान के हार्डपॉइंट्स यानी उन स्थानों पर सुरक्षित तरीके से लग सके, जहां हथियार लगाए जाते हैं। इसके लिए विशेष लॉन्च रेल और एडॉप्टर लगाए जाते हैं।

इसके बाद विमान के वेपन मैनेजमेंट सिस्टम में बदलाव किए जाते हैं ताकि कॉकपिट से मिसाइल को कंट्रोल किया जा सके।

इसके बाद फायर कंट्रोल सिस्टम और विमान के रडार को मिसाइल के साथ जोड़ा जाता है ताकि टारगेट की जानकारी लगातार मिसाइल तक पहुंचती रहे।

जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तब ग्राउंड टेस्ट, कैरी टेस्ट, सेपरेशन टेस्ट और आखिर में एक्चुअल फायरिंग ट्रायल्स किए जाते हैं। (Astra Missile Indonesia Deal)

अस्त्र मिसाइल को कैसे मिलता है टारगेट

अस्त्र भारत की पहली स्वदेशी लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल है, जिसे डीआरडीओ ने विकसित किया है और इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) कर रही है।

अस्त्र एक बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। इसका मतलब है कि यह ऐसे टारगेट पर भी हमला कर सकती है जिसे पायलट अपनी आंखों से नहीं देख सकता।

जब विमान का रडार किसी दुश्मन विमान को खोज लेता है तो उसकी स्थिति, गति और दिशा की जानकारी मिसाइल के कंप्यूटर में भेजी जाती है।

मिसाइल लॉन्च होने के बाद शुरुआती चरण में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के आधार पर आगे बढ़ती है। उड़ान के दौरान विमान से डेटालिंक के जरिए टारगेट की नई जानकारी लगातार भेजी जाती रहती है।

जब मिसाइल टारगेट के काफी करीब पहुंच जाती है, तब उसका एक्टिव रडार सीकर अपने आप चालू हो जाता है। इसके बाद मिसाइल स्वयं टारगेट को खोजकर उसका पीछा करती है और उस पर हमला करती है।

इसी कारण इसे फायर एंड फॉरगेट कैटेगरी की मिसाइल माना जाता है।

रडार और सीकर कैसे करते हैं काम

अस्त्र एमके-1 में टारगेट तक पहुंचने के लिए कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। उड़ान की शुरुआत में यह इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम की मदद से आगे बढ़ती है। बीच की उड़ान में लड़ाकू विमान से डेटालिंक के जरिए टारगेट की नई जानकारी मिलती रहती है। अंतिम चरण में इसका स्वदेशी एक्टिव रडार सीकर अपने आप टारगेट को खोजकर उसका पीछा करता है और सटीक हमला करता है।

अस्त्र मिसाइल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका एक्टिव रडार सीकर है। शुरुआती उड़ान के दौरान मिसाइल पूरी तरह विमान पर निर्भर रहती है।

यदि टारगेट दिशा बदलता है तो सीकर लगातार उसका पीछा करता रहता है। मिसाइल में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचने के लिए ईसीसीएम (इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स) क्षमता भी दी गई है, जिससे दुश्मन द्वारा रडार को भ्रमित करने की कोशिश का असर कम हो जाता है। (Astra Missile Indonesia Deal)

अस्त्र मिसाइल की कितनी है कीमत?

सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अस्त्र एमके-1 मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 7 से 8 करोड़ रुपये है। यही कीमत इसे दुनिया की आधुनिक बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर (BVRAAM) मिसाइलों में सबसे किफायती विकल्पों में शामिल करती है।

अस्त्र एमके-2 की आधिकारिक कीमत अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, इसमें अधिक लंबी मारक क्षमता और ड्यूल-पल्स रॉकेट मोटर जैसी नई तकनीक जोड़ी जा रही है। ऐसे में इसकी कीमत करीब 9 से 10 करोड़ रुपये प्रति मिसाइल हो सकती है।

यदि कीमत की तुलना की जाए, तो भारत की अस्त्र एमके-1 सबसे सस्ती है। रूस की आर-77 मिसाइल की कीमत पहले कम थी, लेकिन हाल के सालों में सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण इसकी कीमत बढ़ गई है और अब इसकी एक मिसाइल की लागत लगभग 8.5 से 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक मानी जाती है।

चीन की पीएल-15 मिसाइल की अनुमानित कीमत लगभग 8.5 से 10.5 करोड़ रुपये प्रति यूनिट है।

अमेरिका की एआईएम-120 (AMRAAM) मिसाइल के आधुनिक संस्करण की कीमत करीब 9.5 करोड़ से 15 करोड़ रुपये प्रति मिसाइल तक है।

वहीं यूरोप की मीटिओर (Meteor) मिसाइल सबसे महंगी है। इसकी एक मिसाइल की कीमत लगभग 18 से 20 करोड़ रुपये तक है।

अस्त्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी कम कीमत और स्वदेशी निर्माण है। विदेशी मिसाइलों की तुलना में इसे खरीदने में कम खर्च आता है और इसके रखरखाव पर भी कम लागत आती है।

चूंकि यह पूरी तरह भारतीय तकनीक पर आधारित है, इसलिए इसके लिए किसी तीसरे देश की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं पड़ती। स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और सॉफ्टवेयर अपग्रेड भी देश के भीतर ही किए जा सकते हैं।

रूस की आर-77 मिसाइल लंबे समय से कई देशों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है, लेकिन हाल के वर्षों में सप्लाई और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता प्रभावित हुई है।

यूरोप की मीटिओर मिसाइल तकनीकी रूप से बेहद आधुनिक मानी जाती है, लेकिन इसकी ऊंची कीमत के कारण केवल कुछ ही देश इसे खरीद पाते हैं।

अमेरिका की एम्राम मिसाइल दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एयर-टू-एयर मिसाइलों में शामिल है, लेकिन इसके निर्यात पर अमेरिकी नियम लागू होते हैं और खरीद प्रक्रिया भी काफी जटिल होती है।

चीन की पीएल-15 लंबी दूरी की मिसाइल है, लेकिन इसकी उपलब्धता सीमित है और इसका निर्यात भी चुनिंदा देशों तक ही रहता है। (Astra Missile Indonesia Deal)

केवल मिसाइल नहीं, पूरा वेपन पैकेज मिलेगा

किसी भी देश को केवल मिसाइलें नहीं बेची जातीं। इसके साथ एक पूरा ऑपरेशनल पैकेज दिया जाता है।

इस पैकेज में मिसाइलों के अलावा लॉन्चर इंटरफेस, टेस्ट इक्विपमेंट, स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड सपोर्ट सिस्टम, तकनीकी दस्तावेज, सॉफ्टवेयर अपडेट और रखरखाव से जुड़ी सुविधाएं भी शामिल होती हैं।

इसके अलावा मिसाइलों की नियमित जांच, स्टोरेज, परिवहन और समय-समय पर उनकी सर्विसिंग की व्यवस्था भी बनाई जाती है।

बीडीएल करेगी मिसाइलों का उत्पादन

अस्त्र मिसाइल का डिजाइन डीआरडीओ ने विकसित किया है, जबकि इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) करती है।

बीडीएल मिसाइल के सभी प्रमुख हिस्सों को जोड़ने, अंतिम परीक्षण करने और गुणवत्ता जांच के बाद उसे भारतीय वायुसेना या निर्यात के लिए तैयार करती है।

यदि इंडोनेशिया का ऑर्डर अंतिम रूप लेता है, तो मिसाइलों का उत्पादन चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि सप्लाई समय पर पूरी हो सके। (Astra Missile Indonesia Deal)

ऑपरेशनल ट्रेनिंग भी होगी महत्वपूर्ण

सूत्रों के अनुसार नई मिसाइल मिलने के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम पायलटों की ट्रेनिंग होती है। पायलटों को यह सिखाया जाता है कि किस दूरी पर मिसाइल दागना सबसे प्रभावी रहेगा, किस प्रकार के टारगेट पर कौन-सा मोड इस्तेमाल करना है और किस परिस्थिति में फायरिंग नहीं करनी चाहिए।

इसके साथ ही ग्राउंड क्रू को मिसाइल को सुरक्षित तरीके से विमान पर लगाने, उसकी जांच करने, सॉफ्टवेयर अपडेट करने और तकनीकी निरीक्षण की ट्रेनिंग भी दी जाती है। (Astra Missile Indonesia Deal)

समंदर में अब चलते जहाज से नहीं चूकेगा निशाना! भारतीय नौसेना इग्ला-वर्बा मिसाइलों से दुश्मन के ड्रोन-हेलीकॉप्टर करेगी ढेर

Indian Navy Stabilized Launcher
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Indian Navy Stabilized Launcher: भारतीय नौसेना अपने वॉरशिप्स की नजदीकी हवाई सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। रक्षा मंत्रालय ने मेक-2 मॉडल के तहत मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (मैनपैड्स) के लिए स्वदेशी स्टेबलाइज्ड लॉन्चर सिस्टम डेवलप करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसा लॉन्चर तैयार किया जाएगा, जिसे नौसेना के वॉरशिप्स पर लगाया जा सके और उससे रूसी मूल की इग्ला-एस और वर्बा मिसाइलों को रिमोट तरीके से दागा जा सके।

यह सिस्टम भारतीय नौसेना की नई क्षमता के रूप में शामिल होगा। इसका उद्देश्य वॉरशिप्स को कम ऊंचाई पर आने वाले हेलीकॉप्टर, ड्रोन, फाइटर एयरक्राफ्ट और एंटी-शिप मिसाइल जैसे हवाई खतरों से बेहतर सुरक्षा देना है। नेवी को शुरुआत में कम से कम 40 लॉन्चर सिस्टम चाहिए। लेकिन इससे पहले इंडस्ट्री पाटर्नर को एक प्रोटोटाइप बनाकर उसकी क्षमता दिखानी होगी। उसके सफल ट्रायल के बाद ही बड़े पैमाने पर खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

Indian Navy Stabilized Launcher: समुद्र में कंधे से मिसाइल दागना क्यों होता है मुश्किल

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास इग्ला कैटेगरी की मिसाइलें मौजूद हैं। इन्हें सामान्य रूप से सैनिक अपने कंधे पर रखकर दागते हैं। जमीन पर तो आसानी से मिसाइल दागी जा सकती है, लेकिन जब बात समंदर की आती है तो हालात बिल्कुल अलग होते हैं।

समुद्र में जहाज लगातार लहरों की वजह से ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं हिलते रहते हैं। इसे नौसैनिक भाषा में रोल, पिच और यॉ कहा जाता है। ऐसी स्थिति में ऑपरेटर के लिए मिसाइल को टारगेट पर निशान लगाना आसान नहीं होता। यदि टारगेट तेज रफ्तार से उड़ रहा हो तो निशाना चूकने की संभावना और बढ़ जाती है।

सूत्रों का कहना है कि इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय नौसेना को ऐसे लॉन्चर की जरूरत महसूस हुई, जो जहाज के हिलने का असर खुद संभाल सके और मिसाइल को सही दिशा में लॉन्च करने में मदद करे।

क्या होगा स्टेबलाइज्ड लॉन्चर सिस्टम

नौसेना को जो लॉन्चर चाहिए, वह पूरी तरह से जाइरो-स्टेबलाइज्ड होगा। लॉन्चर के अंदर ऐसे सेंसर और मोटर लगे होंगे, जो जहाज के हर झटके और हर मूवमेंट को तुरंत पहचान लेंगे।

अगर जहाज किसी लहर की वजह से दाईं तरफ झुकता है तो लॉन्चर उसी समय अपने आप विपरीत दिशा में संतुलन बना लेगा। इसी तरह जहाज ऊपर-नीचे या आगे-पीछे हिलेगा तो लॉन्चर भी लगातार अपनी स्थिति को ठीक करता रहेगा। इसका फायदा यह होगा कि मिसाइल का सीकर टारगेट पर लगातार लॉक बनाए रख सकेगा।

यह सिस्टम पूरी तरह रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट होगा। ऑपरेटर को मिसाइल कंधे पर रखने की जरूरत नहीं होगी। वह सुरक्षित जगह पर बैठकर लॉन्चर को कंट्रोल करेगा और जरूरत पड़ने पर एक मिसाइल या एक साथ कई मिसाइलें दाग सकेगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

Indian Navy Stabilized Launcher
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इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम होगा सबसे अहम हिस्सा

लॉन्चर में इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम (ईओएफसीएस) लगाया जाएगा। यही पूरे सिस्टम का “दिमाग” होगा।

इसका काम केवल टारगेट दिखाना नहीं होगा, बल्कि टारगेट को ढूंढना, उसकी पहचान करना, लगातार ट्रैक करना और मिसाइल दागने के लिए सही फायर कंट्रोल सॉल्यूशन तैयार करना भी होगा।

जब कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइल जहाज की ओर बढ़ेगी, तो सबसे पहले यही सिस्टम उसे खोजेगा। इसके बाद उसकी दिशा, गति और दूरी का लगातार आकलन करेगा। जब सिस्टम को लगेगा कि मिसाइल दागने का सही समय है, तब ऑपरेटर को फायरिंग की अनुमति देगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

इग्ला और वर्बा दोनों मिसाइलों से होगा ऑपरेशन

रक्षा मंत्रालय ने तकनीकी जरूरतों में स्पष्ट किया है कि लॉन्चर को इस तरह से बनाया जाए कि वह इग्ला-एस और वर्बा जैसी बहुत कम दूरी की एरियल डिफेंस मिसाइलों के साथ काम कर सके।

इन मिसाइलों का इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इनमें हेलीकॉप्टर, ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान और एंटी-शिप मिसाइल जैसे खतरे शामिल हैं।

वहीं, लॉन्चर को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वह दो या चार मिसाइलों के कॉन्फिगरेशन में उपलब्ध हो सके। यानी लॉन्चर को दो अलग-अलग कॉन्फिगरेशन में डेवलप किया जाएगा। इसमें एक साथ दो या चार इग्ला मिसाइलें लगाई जा सकेंगी। इसका मतलब यह है कि ऑपरेशन की जरूरत के अनुसार युद्धपोत पर अलग-अलग क्षमता वाले लॉन्चर लगाए जा सकेंगे।

इस सिस्टम में दो तरह की फायरिंग क्षमता होगी। पहली सिंगल लॉन्च होगी, जिसमें केवल एक मिसाइल दागी जाएगी।

दूसरी साल्वो लॉन्च होगी। इसमें ऑपरेटर बहुत कम समय के अंतराल में एक के बाद एक कई मिसाइलें दाग सकेगा। यदि सामने एक से ज्यादा हवाई खतरे हों या किसी तेजी से बढ़ते टारगेट को रोकने के लिए दो मिसाइलें एक साथ दागनी हों, तो साल्वो मोड इस्तेमाल किया जा सकेगा।

डे और नाइट दोनों समय करेगा काम

नया लॉन्चर केवल दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी समान क्षमता से काम करेगा। इसके लिए इसमें डे-नाइट इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा।

इस सिस्टम में आधुनिक कैमरे, थर्मल इमेजिंग और टारगेट पर नजर रखने वाली तकनीक शामिल होगी। इससे ऑपरेटर अंधेरे, धुंध या खराब मौसम में भी टारगेट की पहचान कर सकेगा।

सूत्रों के अनुसार यही सिस्टम टारगेट को खोजेगा, उसकी लगातार ट्रैकिंग करेगा और मिसाइल दागने के लिए जरूरी फायर कंट्रोल सॉल्यूशन भी तैयार करेगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

छोटा साइज, ताकि हर तरह के वॉरशिप पर लगाया जा सके

मंत्रालय चाहता है कि लॉन्चर का साइज ज्यादा बड़ा न हो। इसलिए इसकी डिजाइन कॉम्पैक्ट रखी जाएगी। सूत्रों के मुताबिक लॉन्चर का कुल वजन लगभग 800 किलोग्राम से कम रखा जाएगा। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम भी शामिल होगा।

छोटा साइज होने का फायदा यह होगा कि इसे बड़े डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट के अलावा छोटे कॉर्वेट और दूसरे नौसैनिक प्लेटफॉर्म पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि लॉन्चर में इतनी स्टैबिलिटी होनी चाहिए कि इग्ला, वर्बा और भविष्य के VSHORDS जैसी मिसाइलों का सीकर आसानी से टारगेट पर लॉक कर सके।

मिसाइल का सीकर टारगेट की गर्मी या इंफ्रारेड सिग्नेचर को पहचानता है। यदि लॉन्चर लगातार हिलता रहे तो सीकर टारगेट खो सकता है। स्टेबलाइजेशन सिस्टम इसी समस्या को कम करेगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

जहाज के हिसाब से बदले जा सकेंगे फायरिंग एंगल

हर युद्धपोत की बनावट अलग होती है। इसलिए रक्षा मंत्रालय ने यह भी शर्त रखी है कि लॉन्चर के फायरिंग एंगल को जहाज के डिजाइन के अनुसार बदला जा सके।

इसके लिए लॉन्चर में मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल स्टॉपर्स लगाए जाएंगे। इनकी मदद से फायरिंग का क्षेत्र सीमित किया जा सकेगा, ताकि मिसाइल गलती से जहाज के किसी हिस्से की ओर न जाए।

साथ ही एक अलग रिमोट सेफ्टी स्विच भी होगा। जरूरत पड़ने पर इससे लॉन्चर को तुरंत सक्रिय या निष्क्रिय किया जा सकेगा।

रिमोट कंट्रोल से होगा पूरा ऑपरेशन

इस सिस्टम के साथ एक मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले यूनिट भी दी जाएगी। इसमें एलईडी स्क्रीन और सॉफ्ट-टच या पुश बटन होंगे। इसी कंट्रोल यूनिट से ऑपरेटर लॉन्चर को चालू करेगा, सिस्टम की जांच करेगा, कैलिब्रेशन करेगा, टारगेट चुनेगा और मिसाइल दागेगा।

इस सिस्टम में एक इंटरनल रिकॉर्डिंग यूनिट भी होगी, जो हर ऑपरेशन का पूरा रिकॉर्ड अपने आप सुरक्षित रखेगी। इसमें टारगेट की जानकारी, फायरिंग कमांड, सिस्टम की स्थिति और अन्य तकनीकी डेटा दर्ज होगा। इससे बाद में ऑपरेशन का विश्लेषण और तकनीकी जांच करना आसान होगा।

भारत में ही डिजाइन और विकास पर रहेगा पूरा जोर

इस प्रोजेक्ट के तहत देश के भीतर ही उसकी पूरी तकनीक डेवलप की जाएगी। इसलिए कंपनियों से पूछा गया है कि सिस्टम का डिजाइन और डेवलपमेंट भारत में ही किया जाएगा या नहीं।

यदि किसी विदेशी कंपनी के साथ तकनीकी साझेदारी, जॉइंट वेंचर या समझौता है, तो उसकी पूरी जानकारी देनी होगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि कौन-कौन सी तकनीक विदेश से आएगी और भविष्य में उसे पूरी तरह स्वदेशी बनाने की क्या योजना होगी।

रक्षा मंत्रालय यह भी जानना चाहता है कि प्रोटोटाइप तैयार होने के बाद उसकी डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स किसके पास रहेंगे और जरूरत पड़ने पर किसी सरकारी रक्षा कंपनी को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया जा सकेगा या नहीं।

बता दें कि यह प्रोजेक्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर-2020 की मेक-2 कैटेगरी के तहत लाया गया है। इस मॉडल में उद्योग अपनी तकनीक के आधार पर प्रोटोटाइप विकसित करता है। सफल परीक्षण के बाद ही रक्षा मंत्रालय बड़े स्तर पर खरीद का निर्णय लेता है। (Indian Navy Stabilized Launcher)

कितने प्रतिशत होगा स्वदेशी कंटेंट

इस परियोजना में आत्मनिर्भरता सबसे अहम शर्तों में शामिल है। इसलिए कंपनियों को यह भी बताना होगा कि प्रोटोटाइप तैयार करते समय और बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू होने के बाद सिस्टम में स्वदेशी हिस्सेदारी कितनी होगी।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक हर प्रमुख कंपोनेंट की सूची भी देनी होगी। कौन-सा हिस्सा कंपनी खुद बनाएगी, कौन-सा भारत की दूसरी कंपनी से लिया जाएगा और कौन-सा विदेश से आएगा, इसकी पूरी जानकारी देनी होगी।

यदि कोई महत्वपूर्ण पार्ट आयातित है, तो उसके लिए लंबी अवधि की सप्लाई और भविष्य में स्वदेशी उत्पादन की योजना भी बतानी होगी।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से प्रोटोटाइप तैयार करने की समयसीमा भी मांगी है। इसमें डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, इंटीग्रेशन, क्वॉलिटी टेस्टिंग और टेक्निकल इवैल्युशन का पूरा कार्यक्रम शामिल होगा।

इसके बाद यदि सिस्टम सफल रहता है, तो बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू करने में कितना समय लगेगा, इसकी भी जानकारी देनी होगी। कंपनियों को यह भी बताना होगा कि वे हर महीने या हर साल कितने लॉन्चर तैयार कर सकती हैं और जरूरत बढ़ने पर उत्पादन क्षमता कैसे बढ़ाएंगी। (Indian Navy Stabilized Launcher)

कई चरणों में होगी टेस्टिंग

सूत्रों का कहना है कि सबसे पहले इसके शोर ट्रायल किए जाएंगे। इनमें जमीन पर सिस्टम के सभी मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक और फायर कंट्रोल सिस्टम की जांच की जाएगी। इसके बाद लॉन्चर को जहाज पर लगाकर शिपबोर्न ट्रायल किए जाएंगे। इन परीक्षणों में एक्चुअल मिसाइल फायरिंग भी शामिल होगी।

इसके अलावा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कंपैटिबिलिटी, लेजर रेंज फाइंडर, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम, शॉक और वाइब्रेशन जैसे कई परीक्षण भी होंगे। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समुद्र में भी सिस्टम बिना किसी रुकावट के काम करे।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि क्या वे भारतीय नौसेना की सुविधाओं या भारतीय समुद्री क्षेत्र में नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट आधार पर फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल करने के लिए तैयार हैं। (Indian Navy Stabilized Launcher)

लॉन्चर खुद करेगा अपनी तकनीकी जांच

इस सिस्टम में बिल्ट-इन टेस्ट सुविधा भी होगी। यानी लॉन्चर समय-समय पर अपनी तकनीकी स्थिति की खुद जांच करेगा।

यदि किसी सेंसर, मोटर, कंट्रोल यूनिट या दूसरे हिस्से में कोई खराबी आती है, तो सिस्टम ऑपरेटर को तुरंत जानकारी देगा। इससे तकनीकी समस्या का पता लगाने में कम समय लगेगा और मरम्मत भी जल्दी हो सकेगी।

साथ ही लॉन्चर में लगी इंटरनल रिकॉर्डिंग यूनिट हर गतिविधि का पूरा रिकॉर्ड रखेगी। टारगेट की पहचान, ट्रैकिंग, फायरिंग कमांड और सिस्टम की स्थिति से जुड़ा डेटा सुरक्षित रहेगा, जिससे बाद में उसका विश्लेषण किया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उचित रखरखाव के साथ इस सिस्टम की सर्विस लाइफ 10 साल से अधिक होनी चाहिए।

कंपनियों को बताना होगा कि मरम्मत की प्रक्रिया कैसी होगी, कितने विशेष उपकरणों की जरूरत पड़ेगी और क्या भारतीय नौसेना को मौके पर ही तकनीकी सहायता दी जाएगी।

इसके अलावा स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, ऑन-साइट वारंटी, लाइफ-साइकिल सपोर्ट और पूरे सिस्टम के रखरखाव का विस्तृत प्रस्ताव भी देना होगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

PM मोदी की जकार्ता यात्रा से पहले भारतीय नौसेना के IFC-IOR में पहुंचा पहला इंडोनेशियाई अधिकारी

IFC-IOR Indonesia Liaison Officer
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IFC-IOR Indonesia Liaison Officer: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा से ठीक पहले भारत और इंडोनेशिया के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। सूत्रों के मुताबिक इंडोनेशिया ने पहली बार अपना एक लाइजन ऑफिसर भारतीय नौसेना के इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) में तैनात किया है। यह सेंटर हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित है और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारतीय नौसेना का प्रमुख मल्टीनेशनल सेंटर माना जाता है।

सूत्रों के मुताबिक इंडोनेशियाई अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर फेलिक्स डिमास सतीरावन ने एक जुलाई से यहां अपनी जिम्मेदारी संभाल ली है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब दोनों देशों के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा और सैन्य प्रशिक्षण को लेकर सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

IFC-IOR Indonesia Liaison Officer: क्या है आईएफसी-आईओआर और क्यों है इतना महत्वपूर्ण

आईएफसी-आईओआर की स्थापना भारतीय नौसेना ने 22 दिसंबर 2018 को की थी। यह भारत के सागर (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) और महासागर विजन का अहम हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में चलने वाले व्यापारिक जहाजों की निगरानी करना और समुद्र से जुड़े संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना है।

यह सेंटर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक पर नजर रखता है। यहां विभिन्न देशों के समुद्री सुरक्षा संगठनों, तटीय रडार नेटवर्क, सैटेलाइट, ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस) और अन्य साझेदार एजेंसियों से मिलने वाले डेटा को एक जगह जोड़कर उसका विश्लेषण किया जाता है। इसके आधार पर समुद्र में चल रहे जहाजों की एक साझा तस्वीर तैयार की जाती है।

समुद्री सुरक्षा से जुड़े खतरों पर रखी जाती है नजर

आईएफसी-आईओआर केवल जहाजों की लोकेशन देखने तक सीमित नहीं है। यहां लगातार यह भी देखा जाता है कि कहीं कोई जहाज असामान्य गतिविधि तो नहीं कर रहा। यदि किसी जहाज की गति, मार्ग या व्यवहार सामान्य से अलग दिखाई देता है तो उस पर विशेष निगरानी रखी जाती है।

सूत्रों के मुताबिक इस सेंटर के जरिए समुद्री डकैती, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, अवैध मछली पकड़ने, प्रतिबंधित सामान की आवाजाही और समुद्री आतंकवाद जैसी गतिविधियों पर भी नजर रखी जाती है। इससे साझेदार देशों को समय रहते अलर्ट भेजा जा सकता है।

लाइजन ऑफिसर की तैनाती क्यों है अहम

सूत्रों के मुताबिक किसी देश का केवल डेटा साझा करना और किसी अधिकारी को सीधे सेंटर में तैनात करना, दोनों अलग-अलग स्तर का सहयोग है।

लाइजन ऑफिसर भारतीय नौसेना के अधिकारियों के साथ एक ही ऑपरेशन रूम में काम करता है। वह अपने देश से मिलने वाली सूचनाओं को तुरंत साझा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों से मिली जानकारी भी अपने देश तक पहुंचा सकता है। इससे किसी घटना पर प्रतिक्रिया देने में समय कम लगता है और कॉर्डिनेशन बेहतर होता है।

सूत्रों का कहना है कि इंडोनेशिया के अधिकारी की तैनाती से भारत और इंडोनेशिया के बीच मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस यानी समुद्री क्षेत्र की साझा निगरानी को नई मजबूती मिलेगी।

अब 17 देशों के अधिकारी हैं इस सेंटर का हिस्सा

आईएफसी-आईओआर का नेटवर्क 28 देशों से जुड़ा हुआ है, लेकिन सभी देशों के अधिकारी यहां मौजूद नहीं हैं।

इंडोनेशिया के अधिकारी के आने के बाद अब इस सेंटर में 17 देशों के लाइजन ऑफिसर तैनात हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, केन्या, मालदीव, मॉरीशस, सिंगापुर, श्रीलंका, थाईलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य साझेदार देश शामिल हैं।

सूत्रों के मुताबिक किसी देश का यहां अधिकारी भेजना इस बात का संकेत माना जाता है कि दोनों देशों के बीच केवल सूचना साझा करने से आगे बढ़कर वास्तविक ऑपरेशनल सहयोग भी विकसित हो रहा है।

मलक्का जलडमरूमध्य के चलते बढ़ जाता है इंडोनेशिया का महत्व

इंडोनेशिया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में से एक में स्थित है। उसके पास मलक्का जलडमरूमध्य के आसपास का बड़ा समुद्री इलाका है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच बड़ी मात्रा में व्यापारिक जहाज गुजरते हैं।

भारत के लिए भी यह समुद्री मार्ग रणनीतिक रूप से बेहद अहम है क्योंकि देश के ऊर्जा आयात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि भारत और इंडोनेशिया समुद्री जानकारी को तेजी से साझा करते हैं तो पूरे हिंद महासागर और मलक्का क्षेत्र में जहाजों की निगरानी और बेहतर हो सकती है।

पीएम मोदी की यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग पर रहेगा जोर

सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान समुद्री सुरक्षा, मिलिट्री ट्रेनिंग और रक्षा सहयोग प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकते हैं।

बताया जा रहा है कि भारत इंडोनेशिया के सैन्य कैडेट्स के लिए पुणे स्थित नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में ट्रेनिंग सीटें उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रख सकता है। इसके अलावा तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में मिड-कैरियर कोर्स के अवसर बढ़ाने पर भी चर्चा हो सकती है।

इस तरह दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच प्रोफेशनल ट्रेनिंग और अनुभव साझा करने का दायरा बढ़ेगा।

रियल टाइम डेटा से तैयार होती है साझा समुद्री तस्वीर

आईएफसी-आईओआर की सबसे बड़ी ताकत इसका डेटा फ्यूजन मॉडल है। सेंटर में अलग-अलग स्रोतों से आने वाली सूचनाओं को एक साथ जोड़कर विश्लेषण किया जाता है।

इसमें तटीय रडार नेटवर्क, सैटेलाइट फीड, एआईएस डेटा, शिपिंग डेटाबेस और साझेदार देशों की एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी शामिल होती है। इसके बाद पूरे हिंद महासागर क्षेत्र का एक रियल टाइम समुद्री नक्शा तैयार किया जाता है।

यदि किसी जहाज का रास्ता अचानक बदलता है, वह अपने पहचान संकेत बंद कर देता है या किसी संवेदनशील क्षेत्र में असामान्य गतिविधि करता है तो सिस्टम तुरंत उसकी पहचान कर सकता है।

पिछले कुछ सालों में भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी को काफी मजबूत किया है। इसके लिए केवल नौसैनिक जहाजों पर निर्भर रहने के बजाय डेटा नेटवर्क, सैटेलाइट, तटीय रडार और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को भी बराबर महत्व दिया गया है। (IFC-IOR Indonesia Liaison Officer)

Explainer: क्या है भारतीय सेना का नया ड्रोन कमांड स्ट्रक्चर? अश्नि प्लाटून से बाज बटालियन तक ऐसे बदलेगी युद्ध की तस्वीर

Indian Army Drone Command Structure
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Indian Army Drone Command Structure: ड्रोन अब मॉडर्न वॉरफेयर का हिस्सा बन चुके हैं। अब केवल टैंक, तोप और लड़ाकू विमान ही किसी सेना की ताकत तय नहीं करते, बल्कि ड्रोन भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और हाल के कई सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक उड़ने वाले सर्विलांस ड्रोन तक, हर श्रेणी के मानव रहित सिस्टम अब युद्ध का तरीका बदल रहे हैं।

वहीं, भारतीय सेना भी इसी बदलाव के अनुरूप अपने ड्रोन नेटवर्क को नए सिरे से व्यवस्थित कर रही है। इनमें अश्नि प्लाटून, शौर्य स्क्वाड्रन, शक्तिमान रेजिमेंट और बाज बटालियन जैसे बैटल ऑफ ऑर्डर शामिल हैं।

Indian Army Drone Command Structure: भारतीय सेना ने को क्यों पड़ी जरूरत

पहले ड्रोन का इस्तेमाल केवल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित था, लेकिन अब यही ड्रोन सीधे हमला करने, आर्टिलरी की फायरिंग को गाइड करने, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस जुटाने और दुश्मन की सप्लाई लाइन पर हमला करने में यूज हो रहे हैं।

यूक्रेन युद्ध में छोटे एफपीवी ड्रोन ने महंगे टैंक, आर्मर्ड व्हीकल्स और कमांड पोस्ट तक को निशाना बनाया। इसी युद्ध ने दुनिया की सेनाओं को यह समझाया कि ड्रोन को अलग हथियार नहीं बल्कि पूरी मिलिट्री स्ट्रक्चर का हिस्सा बनाना होगा।

सूत्रों का कहना है कि पहले अधिकांश ड्रोन हेडक्वॉर्टर या स्पेशल सर्विलांस यूनिट्स के पास रहते थे। किसी बटालियन को ड्रोन की जरूरत पड़ती थी तो उसे दूसरे स्तर से सहायता लेनी पड़ती थी। लेकिन नए मॉडल में यह व्यवस्था बदल गई है। अब हर स्तर के कमांडर के पास उसी के मिशन के अनुरूप ड्रोन उपलब्ध रहेंगे। इससे सूचना मिलने और कार्रवाई शुरू होने के बीच का समय काफी कम हो जाएगा।

चार स्तर पर तैयार किया गया नया ड्रोन स्ट्रक्चर

भारतीय सेना ने भी इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए ड्रोन को केवल कुछ विशेष यूनिट्स तक सीमित रखने के बजाय इन्फेंट्री, आर्मर्ड, आर्टिलरी और आर्मी एविएशन कॉर्प्स तक पहुंचाने की योजना बनाई।

यह पूरा स्ट्रक्चर चार अलग-अलग स्तरों पर काम करता है। पहला स्तर इन्फेंट्री यानी पैदल सेना के लिए है। दूसरा आर्मर्ड फॉर्मेशन यानी टैंक रेजिमेंट्स के लिए, तीसरा आर्टिलरी के लिए और चौथा आर्मी एविएशन कॉर्प्स के तहत पूरे थिएटर स्तर पर काम करने वाली केंद्रीय ड्रोन यूनिट्स के लिए तैयार किया गया है।

इस सिस्टम का मकसद यह है कि हर स्तर पर मौजूद कमांडर को उसकी जरूरत के अनुसार ड्रोन उपलब्ध रहें और किसी भी मिशन के लिए अलग से संसाधन मांगने की जरूरत न पड़े। (Indian Army Drone Command Structure)

अश्नि प्लाटून बनी इन्फेंट्री की नई आंख

सूत्रों के मुताबिक इन्फेंट्री बटालियनों में अश्नि प्लाटून नाम की विशेष ड्रोन टीम बनाई गई है। इन प्लाटून का काम सबसे आगे तैनात सैनिकों को रियल टाइम जानकारी देना और जरूरत पड़ने पर तुरंत सटीक हमला करना है।

भारतीय सेना की लगभग 380 से 385 इन्फेंट्री बटालियनों में ऐसी प्लाटून बनाई जा चुकी हैं। हर प्लाटून में लगभग 20 से 25 विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक शामिल होते हैं।

इन सैनिकों को केवल ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती, बल्कि ड्रोन की मरम्मत, बैटरी प्रबंधन, मिशन प्लानिंग और फील्ड में तकनीकी सहायता की भी जिम्मेदारी दी जाती है।

सूत्रों के अनुसार अश्नि प्लाटून किसी अलग ब्रिगेड या डिवीजन का हिस्सा नहीं होती, बल्कि सीधे इन्फेंट्री बटालियन कमांडर के नियंत्रण में रहती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ड्रोन से मिलने वाली जानकारी तुरंत कमांडर तक पहुंच जाती है।

Indian Army Drone Command Structure
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एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक अश्नि प्लाटून के पास कई प्रकार के ड्रोन उपलब्ध रहते हैं। इनमें सर्विलांस ड्रोन, एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन शामिल हैं।

एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन ऑपरेटर को ड्रोन के कैमरे से लाइव विजुअल दिखाते हैं। इससे सैनिक दुश्मन की स्थिति को बेहद करीब से देख सकते हैं। अगर टारगेट की पुष्टि हो जाए तो यही ड्रोन सटीक हमला भी कर सकते हैं। लॉइटरिंग म्यूनिशन अलग तरीके से काम करते हैं। ये पहले तय क्षेत्र में कुछ समय तक उड़ते रहते हैं और टारगेट मिलने पर उसी पर हमला करते हैं। इससे तेजी से बदलती युद्ध स्थिति में भी सटीक कार्रवाई संभव होती है।

सूत्रों के अनुसार प्रत्येक अश्नि प्लाटून के पास सर्विलांस और अटैक कैटेगरी के कई ड्रोन उपलब्ध रहते हैं, जिससे बटालियन स्तर पर ही निगरानी और प्रिसीजन स्ट्राइक की क्षमता डेवलप हो जाती है।

‘ईगल ऑन द आर्म’ कॉन्सैप्ट पर आधारित है मॉडल

अश्नि प्लाटून का मूल विचार “ईगल ऑन द आर्म” कॉन्सैप्ट पर आधारित है। इसका अर्थ यह है कि इन्फेंट्री कमांडर के पास स्वयं ड्रोन की क्षमता मौजूद हो और उसे अलग से किसी अन्य यूनिट पर निर्भर न रहना पड़े। इससे किसी भी ऑपरेशन में जानकारी जुटाने और कार्रवाई करने के बीच लगने वाला समय काफी कम हो जाता है।

यदि किसी पहाड़ी क्षेत्र, जंगल, शहरी इलाके या सीमा पर दुश्मन की हलचल दिखाई देती है तो बटालियन स्तर पर ही तुरंत फैसला लिया जा सकता है। इस प्रक्रिया में अलग-अलग मुख्यालय से अनुमति लेने में समय नहीं लगता। (Indian Army Drone Command Structure)

शौर्य स्क्वाड्रन से टैंकों को मिल रही नई ताकत

आर्मर्ड फॉर्मेशन के लिए शौर्य स्क्वाड्रन बनाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इन स्क्वाड्रन को टी-90 भीष्म, टी-72 अजेय और अर्जुन एमके-1ए जैसे मुख्य युद्धक टैंकों के साथ जोड़ा जा रहा है।

इनका उद्देश्य टैंक कमांडर को बैटल फील्ड में फॉरवर्ड एरिया की जानकारी देना है। इस नए मॉडल में टैंक केवल अपनी तोप और सेंसर पर निर्भर नहीं रहेंगे। टैंक के आगे बढ़ने से पहले ड्रोन लगातार आगे उड़कर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखेंगे। युद्ध में सबसे बड़ा खतरा टैंक के सामने मौजूद दुश्मन नहीं बल्कि छिपे हुए एंटी-टैंक हथियार होते हैं। एफपीवी ड्रोन, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और टॉप-अटैक हथियार टैंकों को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर अटैक ड्रोन या लॉइटरिंग म्यूनिशन से टारगेट पर कार्रवाई भी की जा सकती है।

सूत्रों के मुताबिक प्रत्येक शौर्य स्क्वाड्रन में भी लगभग 20 से 25 प्रशिक्षित सैनिक शामिल है, जो सर्विलांस, एफपीवी, अटैक और स्वार्म ड्रोन को ऑपरेट करते हैं।

ड्रोन से मिली तस्वीरें सीधे टैंक कमांडर तक पहुंचेंगी। इससे टारगेट की पहचान कर फायरिंग का फैसला अधिक सटीक तरीके से लिया जा सकता है। वहीं, इन यूनिट्स की ट्रेनिंग बाबिना फील्ड फायरिंग रेंज सहित कई सैन्य क्षेत्रों में की जा चुकी है।

शक्तिमान रेजिमेंट से बदलेगी आर्टिलरी की भूमिका

आर्टिलरी के लिए शक्तिमान रेजिमेंट तैयार की जा रही हैं। इनका मुख्य काम लंबी दूरी तक सटीक हमला करना है।
ये रेजिमेंट केवल तोपों की फायरिंग तक सीमित नहीं रहेंगी। इनके पास लॉन्ग रेंज लॉइटरिंग म्यूनिशन, अटैक ड्रोन और अन्य आधुनिक मानव रहित सिस्टम होंगे। ड्रोन पहले लक्ष्य की पहचान करेंगे। उसके बाद जरूरत के अनुसार या तो खुद हमला करेंगे या आर्टिलरी यूनिट को सटीक निर्देश देंगे।

पारंपरिक आर्टिलरी में पहले टारगेट की जानकारी अलग स्रोतों से आती थी। अब ड्रोन सीधे लक्ष्य की लाइव तस्वीर भेज सकते हैं। यदि पहला गोला टारगेट से थोड़ा दूर गिरता है तो ड्रोन तुरंत नई जानकारी भेज सकता है। इसके बाद अगली फायरिंग पहले से अधिक सटीक हो सकती है।

इसी प्रक्रिया को आधुनिक सैन्य भाषा में सेंसर-टू-शूटर लूप कहा जाता है। इससे प्रतिक्रिया का समय काफी कम हो जाता है।

ड्रोन और आर्टिलरी मिलकर बना सकते हैं ‘किल वेब’

भविष्य का युद्ध केवल ‘किल चेन’ तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि अब सेनाएं ‘किल वेब’ के कॉन्सैप्ट पर काम कर रही हैं। इसमें ड्रोन, आर्टिलरी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, सैटेलाइट और कमांड सेंटर एक साथ जुड़े रहते हैं। शक्तिमान रेजिमेंट केवल ड्रोन नहीं उड़ाएंगी बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और काउंटर ड्रोन सिस्टम के साथ भी कॉर्डिनेशन करेंगी।

यदि दुश्मन इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग या अन्य इलेक्ट्रॉनिक तरीका अपनाता है तो उसी के मुताबिक ऑपरेशन की योजना तैयार की जा सकेगी। (Indian Army Drone Command Structure)

बाज बटालियन करेंगी पूरे थिएटर की निगरानी

ड्रोन कमांड स्ट्रक्चर का सबसे ऊपरी स्तर बाज बटालियन हैं। जिन्हें हाल ही में तैयार किया गया है। ये यूनिट्स आर्मी एविएशन कॉर्प्स के तहत काम करेंगी और पूरे थिएटर स्तर पर लंबी दूरी के ड्रोन ऑपरेशन संभालेंगी।

इनके पास मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस, हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस और अन्य बड़े मानव रहित प्लेटफॉर्म संचालित करने की क्षमता होगी। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी की निगरानी, इंटेलिजेंस जुटाने, गहरे इलाकों की निगरानी और स्पेशल मिशनों में किया जा सकता है। यह पूरे भारतीय सेना के लिए ड्रोन कमांड सेंटर की तरह काम कर सकती हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बाज बटालियन केवल ड्रोन उड़ाने तक सीमित नहीं रहेंगी। यहीं पर बड़े ड्रोन की तकनीकी देखभाल, सॉफ्टवेयर अपडेट, मिशन प्लानिंग, पायलट ट्रेनिंग, डेटा एनालिसिस और नई रणनीतियों पर भी काम किया जाएगा। यानी यह पूरी सेना के लिए सेंट्रलाइज्ड ड्रोन हब की तरह काम करेंगी।

कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम भी बदलेगा

सूत्रों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में ड्रोन तभी असरदार होंगे जब उनका कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम मजबूत हो। इसके लिए सुरक्षित डेटा लिंक, एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा प्रोसेसिंग और रियल टाइम वीडियो शेयरिंग की जरूरत होगी। ड्रोन से मिलने वाली जानकारी कुछ ही सेकंड में बटालियन, ब्रिगेड, डिवीजन और थिएटर कमांड तक पहुंच सकेगी। यही नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर की सबसे बड़ी खूबी है। (Indian Army Drone Command Structure)

समंदर में नहीं छिप पाएंगी चीन-पाकिस्तान की पनडुब्बियां, भारतीय नौसेना दुश्मन की सबमरींस को दूर से ही करेगी ट्रैक

Indian Navy Sonar System
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Indian Navy Sonar System: भारतीय नौसेना समुद्र के नीचे दुश्मन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने की तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने कंटेनराइज्ड थिएटर लेवल सोनार (सीटीएलएस) के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है। इस सिस्टम का मकसद पानी के नीचे लगातार निगरानी बनाए रखना, पनडुब्बियों का लंबी दूरी से पता लगाना और थिएटर स्तर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करना है। डॉक्यूमेंट के अनुसार यह सिस्टम भारतीय नौसेना के उपयुक्त जहाजों पर कंटेनर के तौर पर लगाया जाएगा, जिससे जरूरत के अनुसार इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर तेजी से तैनात किया जा सके।

Indian Navy Sonar System: क्या है कंटेनराइज्ड थिएटर लेवल सोनार

सीटीएलएस एक ऐसा आधुनिक सोनार सिस्टम है, जिसे एक स्टैंडर्ड कंटेनर के भीतर तैयार किया जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी जहाज पर बड़ा बदलाव किए बिना भी इसे लगाया या हटाया जा सकेगा। इससे नौसेना एक ही सिस्टम को अलग-अलग जहाजों पर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकेगी।

आरएफआई के अनुसार इस सिस्टम में कम फ्रीक्वेंसी वाला एक्टिव ट्रांसमीटर, पैसिव रिसीवर एरे, ऑपरेटर कंसोल, विंच और हैंडलिंग सिस्टम शामिल होंगे। पूरा सिस्टम कंटेनर के भीतर इंटीग्रेट रहेगा और जहाज पर केवल सीमित बदलाव करने होंगे। (Indian Navy Sonar System)

पानी के नीचे लंबी दूरी तक रखेगा नजर

रक्षा मंत्रालय चाहता है कि नया सिस्टम गहरे समुद्र, उथले पानी और जटिल तटीय इलाकों में भी प्रभावी ढंग से काम करे। इसका मुख्य काम पानी के भीतर मौजूद पनडुब्बियों और अन्य टारगेट्स का पता लगाना, उनकी पहचान करना और लगातार ट्रैक करना होगा।

सिस्टम को इस तरह डेवलप किया जाएगा ताकि वह एक साथ कई टारगेट्स पर नजर रख सके और लंबे समय तक लगातार निगरानी करने में सक्षम हो। इसके जरिए भारतीय नौसेना को समुद्र के नीचे बनने वाली स्ट्रैटेजिक इमेज को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। (Indian Navy Sonar System)

एक्टिव और पैसिव दोनों मोड में करेगा काम

आरएफआई के अनुसार सीटीएलएस केवल एक तरह के सोनार पर निर्भर नहीं रहेगा। इसमें एक्टिव और पैसिव दोनों तरह की क्षमता होगी।

एक्टिव मोड में सिस्टम ध्वनि तरंग भेजकर सामने मौजूद टारगेट की पहचान करेगा। वहीं पैसिव मोड में यह केवल पानी के भीतर मौजूद जहाजों और पनडुब्बियों से निकलने वाली आवाजों को सुनकर उनकी पहचान करेगा।

दोनों मोड को एक साथ भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे मोनो-स्टैटिक, बाई-स्टैटिक और मल्टी-स्टैटिक ऑपरेशन संभव होंगे, जो आधुनिक एंटी-सबमरीन ऑपरेशन में काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

Indian Navy Sonar System
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कम फ्रीक्वेंसी वाला एक्टिव सोनार होगा सबसे बड़ी ताकत

डॉक्यूमेंट के अनुसार सिस्टम का एक्टिव हिस्सा एक किलोहर्ट्ज से कम फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। कम फ्रीक्वेंसी की ध्वनि तरंगें समुद्र में ज्यादा दूरी तक जाती हैं, इसलिए लंबी दूरी पर पनडुब्बियों का पता लगाने में यह अधिक प्रभावी मानी जाती हैं।

सिस्टम में वेरिएबल डेप्थ सोनार लगाया जाएगा, जिसे लगभग 200 मीटर तक पानी के भीतर नीचे उतारा जा सकेगा। इससे समुद्र की अलग-अलग परतों में मौजूद ध्वनि की स्थिति के अनुसार बेहतर डिटेक्शन संभव होगा। साथ ही सिस्टम अपने डेप्थ कंट्रोल को समुद्री परिस्थितियों के अनुसार अपने आप एडजस्ट कर सकेगा।

पैसिव रिसीवर एरे लगातार सुनेंगे समुद्र की आवाज

सीटीएलएस का पैसिव हिस्सा ट्विन थिन लाइन रिसीवर एरे पर बेस्ड होगा। प्रत्येक एरे में कम से कम 180 एकॉस्टिक एलिमेंट होंगे, जो समुद्र में मौजूद बेहद हल्की आवाजों को भी रिकॉर्ड कर सकेंगे।

यह सिस्टम 10 हर्ट्ज से 2 किलोहर्ट्ज तक की फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। इससे पनडुब्बियों की मशीनरी, प्रोपेलर और पानी में बनने वाले हाइड्रोडायनामिक शोर की पहचान की जा सकेगी। सिस्टम में बीम फॉर्मिंग, एडैप्टिव नॉइज सप्रेशन और टारगेट मोशन एनालिसिस जैसी आधुनिक तकनीक भी शामिल होगी।

शोर के बीच भी टारगेट की करेगा पहचान

समुद्र के भीतर हमेशा शांत वातावरण नहीं होता। लहरें, जहाज, समुद्री जीव और मौसम लगातार शोर पैदा करते रहते हैं। ऐसे माहौल में टारगेट की पहचान करना चुनौतीपूर्ण होता है।

इसी कारण आरएफआई में एडवांस्ड डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग की मांग की गई है। सिस्टम हाई नॉइज और रिवरबरेशन की स्थिति में भी टारगेट को खोजने, उसकी स्थिति निर्धारित करने और उसकी पहचान करने में सक्षम होना चाहिए। इसमें ऑटोमैटिक ट्रैकिंग के साथ ऑपरेटर असिस्टेड ट्रैकिंग की सुविधा भी होगी।

कंटेनर डिजाइन से तेजी से होगी तैनाती

सीटीएलएस को 20 या 40 फुट के आईएसओ मानक कंटेनर में तैयार किया जाएगा। इससे इसे अलग-अलग जहाजों पर तेजी से लगाया और हटाया जा सकेगा।

सिस्टम को मॉड्यूलर बनाया जाएगा, ताकि एक्टिव मॉड्यूल, पैसिव मॉड्यूल, प्रोसेसिंग यूनिट और ऑपरेटर कंसोल को जरूरत पड़ने पर अलग-अलग बदला या अपग्रेड किया जा सके। नौसेना ने कम से कम 15 साल की सर्विस लाइफ की भी मांग की है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी होगा हिस्सा

आरएफआई में आधुनिक ऑपरेटर कंसोल की मांग की गई है। इन कंसोल पर हाई रेजोल्यूशन डिस्प्ले होंगे, जिनमें वॉटरफॉल डिस्प्ले, ट्रैक टेबल, टैक्टिकल डिस्प्ले और डेमॉन एनालिसिस जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अलर्ट, डिसीजन सपोर्ट टूल और मल्टीमॉडल डेटा फ्यूजन जैसी तकनीक भी शामिल होगी। इससे ऑपरेटर कम समय में ज्यादा सटीक निर्णय ले सकेंगे। (Indian Navy Sonar System)

मिशन शुरू होने से पहले बताएगा सफलता की संभावना

सीटीएलएस में एक विशेष मॉडलिंग और प्रेडिक्शन सॉफ्टवेयर भी होगा। यह समुद्र की गहराई, तापमान, साउंड वेलोसिटी प्रोफाइल, समुद्री तल की बनावट और आसपास के शोर जैसी जानकारियों का विश्लेषण करेगा।

इसके आधार पर सिस्टम पहले ही बता सकेगा कि किसी क्षेत्र में पनडुब्बी का पता चलने की संभावना कितनी है, किस दिशा में सेंसर लगाने से बेहतर परिणाम मिलेंगे और मिशन के दौरान किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। (Indian Navy Sonar System)

भारतीय नौसेना के मौजूदा सिस्टम से भी जुड़ेगा

रक्षा मंत्रालय चाहता है कि नया सोनार भारतीय नौसेना के मौजूदा कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम के साथ आसानी से जुड़ सके। इसके अलावा यह नेविगेशन सेंसर, पर्यावरण सेंसर और अन्य ऑनबोर्ड सिस्टम से भी डेटा साझा करेगा।

मिशन के दौरान रिकॉर्ड किया गया डेटा सुरक्षित रूप से स्टोर होगा और बाद में ट्रेनिंग तथा विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अपग्रेड भी जोड़े जा सकेंगे। (Indian Navy Sonar System)

वेंडर्स के लिए तय किए सख्त मानक

आरएफआई में कंपनियों के लिए कई शर्तें भी रखी गई हैं। आवेदन करने वाली कंपनी को मैन्युफैक्चरर या सिस्टम इंटीग्रेटर होना होगा। रक्षा क्षेत्र में अनुभव, पर्याप्त वित्तीय क्षमता, मेंटेनेंस और रिपेयर की सुविधा तथा जरूरी लाइसेंस भी अनिवार्य होंगे।

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पहले टेक्निकल मूल्यांकन होगा। इसके बाद चयनित कंपनियों के सिस्टम का भारत में बिना किसी वित्तीय प्रतिबद्धता के ट्रायल कराया जाएगा। सफल मूल्यांकन के बाद आगे की खरीद प्रक्रिया शुरू होगी। (Indian Navy Sonar System)

अग्निपथ योजना में होगा बड़ा बदलाव? क्या 75 फीसदी अग्निवीर होंगे परमानेंट, जानिए सेना, नौसेना और वायुसेना में क्यों बढ़ी रिटेंशन की मांग

Agniveer Permanent Recruitment
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Agniveer Permanent Recruitment: अग्निपथ योजना के तहत भर्ती किए गए पहले बैच के अग्निवीर इस साल अपना चार साल का कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब 25 प्रतिशत से ज्यादा अग्निवीरों को नियमित सैनिक के रूप में रखा जाएगा? रक्षा सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तीनों सेनाएं प्रशिक्षित और अनुभवी अग्निवीरों की संख्या बढ़ाने के विकल्प पर विचार कर रही हैं। हालांकि अभी सरकार की ओर से मौजूदा नीति में किसी बदलाव की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

सूत्रों के अनुसार भारतीय नौसेना अपने यहां लगभग 75 प्रतिशत अग्निवीरों को रखने का प्रस्ताव रख सकती है, जबकि भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना करीब 50 प्रतिशत तक रिटेंशन बढ़ाने के पक्ष में हैं। इस विषय पर अंतिम फैसला रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (डीएमए) के साथ चर्चा के बाद ही होगा।

Agniveer Permanent Recruitment: क्या है अग्निपथ योजना और कैसे होती है भर्ती

अग्निपथ योजना के तहत युवाओं की भर्ती चार साल के लिए की जाती है। भर्ती के बाद उन्हें सैनिक, नाविक और एयरमैन के रूप में पूरी सैन्य ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद वे अपनी-अपनी यूनिट में तैनात होकर ऑपरेशनल और तकनीकी जिम्मेदारियां निभाते हैं।

मौजूदा व्यवस्था के अनुसार चार साल पूरे होने पर सभी अग्निवीर पहले सेवा से मुक्त किए जाते हैं। इसके बाद स्वेच्छा से आवेदन करने वाले अग्निवीरों में से अधिकतम 25 प्रतिशत का चयन मेरिट, मेडिकल फिटनेस, प्रदर्शन और संगठन की जरूरत के आधार पर नियमित सेवा के लिए किया जाएगा। बाकी अग्निवीर सेवा निधि पैकेज और अन्य सुविधाओं के साथ सेना से बाहर आते हैं। (Agniveer Permanent Recruitment)

अब रिटेंशन बढ़ाने की चर्चा क्यों हो रही है

सूत्रों के मुताबिक पिछले चार वर्षों में अग्निवीरों ने केवल ट्रेनिंग ही नहीं ली, बल्कि कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनल गतिविधियों, सीमावर्ती तैनाती, बड़े सैन्य अभ्यास और आधुनिक हथियारों को चलाने की भी ट्रेनिंग ली है।

सेना का मानना है कि किसी सैनिक को पूरी तरह दक्ष बनने में केवल शुरुआती ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि फील्ड एक्सपीरियंस भी अहम भूमिका निभाता है। चार सालों में तैयार हुए प्रशिक्षित जवानों को पूरी तरह सेवा से अलग करने के बजाय बड़ी संख्या में बनाए रखने से अनुभवी स्किल्ड अग्निवीर सेना को मिलेंगे। इसी के चलते तीनों सेनाओं ने रिटेंशन प्रतिशत बढ़ाने के विकल्प पर आंतरिक स्तर पर विचार शुरू किया है। (Agniveer Permanent Recruitment)

नौसेना क्यों चाहती है सबसे ज्यादा रिटेंशन

सूत्रों के अनुसार भारतीय नौसेना में कई ऐसे प्लेटफॉर्म हैं, जिनके संचालन के लिए लंबी तकनीकी ट्रेनिंग की जरूरत होती है।

युद्धपोतों पर लगे आधुनिक रडार, मिसाइल सिस्टम, सोनार, कम्युनिकेशन नेटवर्क, गैस टर्बाइन इंजन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और नेटवर्क बेस्ड वेपन सिस्टम को चलाने में काफी समय लगता है। ऐसे में यदि प्रशिक्षित नौसैनिक चार साल बाद बड़ी संख्या में सेवा छोड़ देंगे तो नए कर्मियों को फिर से उसी स्तर तक ट्रेनिंग देने में अतिरिक्त समय और संसाधन लगेंगे।

इसी वजह से नौसेना लगभग 75 प्रतिशत तक प्रशिक्षित अग्निवीरों को बनाए रखने का प्रस्ताव रख सकती है।

सेना और वायुसेना भी क्यों चाहती हैं ज्यादा रिटेंशन

भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना भी लगभग 50 प्रतिशत तक रिटेंशन बढ़ाने के पक्ष में बताई जा रही हैं।

सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में सेना और वायुसेना में बड़ी संख्या में आधुनिक हथियार और नई तकनीक वाले प्लेटफॉर्म शामिल हुए हैं। इन पर काम करने वाले सैनिकों को विशेष तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद नई तकनीकों, आधुनिक हथियारों और डिजिटल युद्ध क्षमता पर ज्यादा जोर दिया गया है। ऐसे में प्रशिक्षित सैनिकों को लंबे समय तक सेवा में बनाए रखना अधिक उपयोगी माना जा रहा है। (Agniveer Permanent Recruitment)

Agniveer Permanent Recruitment
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आधुनिक हथियारों के लिए लंबी ट्रेनिंग जरूरी

आज का सैनिक केवल राइफल चलाने तक सीमित नहीं है। उसे नेटवर्क बेस्ड कम्युनिकेशन, ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, आधुनिक मिसाइलें, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरण, निगरानी प्रणाली और डिजिटल कमांड नेटवर्क जैसे कई तकनीकी सिस्टम पर काम करना पड़ता है।

इन सभी सिस्टम पर दक्षता हासिल करने में समय लगता है। सूत्रों का कहना है कि यदि प्रशिक्षित सैनिक अधिक समय तक सेवा में रहते हैं तो सेना को बार-बार नए लोगों को उसी स्तर की ट्रेनिंग देने की आवश्यकता कम होगी।

युद्ध का अनुभव भी बना बड़ा कारण

सूत्रों के अनुसार चार सालों के दौरान कई अग्निवीरों ने वास्तविक ऑपरेशनल परिस्थितियों में काम किया है। सीमावर्ती इलाकों में तैनाती, कठिन मौसम, लंबी फील्ड पोस्टिंग और बड़े सैन्य अभ्यासों का अनुभव किसी भी सैनिक की कार्यक्षमता बढ़ाता है।

ऐसे सैनिक किसी आपात स्थिति में तेजी से निर्णय लेने और बेहतर तालमेल के साथ काम करने में सक्षम होते हैं। यही अनुभव अब रिटेंशन बढ़ाने की चर्चा का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। (Agniveer Permanent Recruitment)

केवल तकनीक ही नहीं, टीमवर्क भी अहम

सूत्रों का मानना है कि किसी यूनिट की सबसे बड़ी ताकत केवल उसके हथियार नहीं होते, बल्कि उसके सैनिकों के बीच बना भरोसा और तालमेल भी होता है।

जब सैनिक लंबे समय तक एक साथ काम करते हैं, कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं और लगातार अभ्यास करते हैं, तब उनकी टीमवर्क क्षमता मजबूत होती है। ऐसे प्रशिक्षित सैनिक किसी भी ऑपरेशन में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

अगर नीति नहीं बदली तो क्या होगा

सूत्रों के अनुसार यदि कुल रिटेंशन प्रतिशत में बदलाव नहीं होता, तब भी कुछ विशेष यूनिटों में अधिक अनुभवी अग्निवीरों को रखा जा सकता है।

इस मॉडल में पूरी सेना का औसत रिटेंशन 25 प्रतिशत ही रहेगा, लेकिन अत्यधिक तकनीकी या विशेष जिम्मेदारी वाली यूनिटों में नियमित किए गए अग्निवीरों की संख्या अधिक हो सकती है।

वहीं सामान्य यूनिटों में चार वर्ष की सेवा पूरी कर रहे अग्निवीरों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रह सकती है।

भैरव बटालियन का भी दिया जा रहा उदाहरण

सूत्रों के मुताबिक सेना की नई भैरव बटालियन जैसी विशेष यूनिटों में अधिक अनुभवी सैनिकों की जरूरत हो सकती है।

ऐसी स्थिति में नियमित किए गए अग्निवीरों का अनुपात इन यूनिटों में सामान्य इन्फैंट्री बटालियन की तुलना में अधिक रखा जा सकता है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक नीति जारी नहीं की गई है।

पहले भी भेजा गया था प्रस्ताव

सूत्रों के अनुसार रिटेंशन बढ़ाने का प्रस्ताव पहले भी डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स को भेजा गया था।

बताया जाता है कि उस समय इस प्रस्ताव को दोबारा समीक्षा के लिए वापस भेज दिया गया था ताकि सभी पहलुओं का विस्तार से अध्ययन किया जा सके।

अब पहले बैच का चार साल का कार्यकाल पूरा होने के साथ इस विषय पर फिर चर्चा तेज हो गई है। (Agniveer Permanent Recruitment)

सेना में तेजी से चल रही है अग्निवीरों की ट्रेनिंग

सूत्रों के मुताबिक पिछले प्रशिक्षण चक्र में केवल भारतीय सेना के विभिन्न रेजिमेंटल सेंटरों में लगभग 70 हजार अग्निवीर ट्रेनिंग ले रहे थे।

अगले ट्रेनिंग साइकिल में सेना लगभग 90 हजार नई रिक्तियां जारी करने की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य सैनिकों की संख्या में आई कमी को धीरे-धीरे पूरा करना भी है।

सूत्रों के अनुसार सेना आने वाले वर्षों में चरणबद्ध तरीके से भर्ती बढ़ाकर मानव संसाधन की आवश्यकता पूरी करने पर काम कर रही है।

आधुनिक सेना के लिए युवा और अनुभवी सैनिकों का संतुलन

सूत्रों का कहना है कि अग्निपथ योजना का मूल उद्देश्य सेना की औसत आयु कम रखना है ताकि जवान अधिक युवा और ऊर्जावान रहें।

दूसरी ओर, आधुनिक युद्ध में अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। इसी वजह से अब युवा प्रोफाइल बनाए रखते हुए पर्याप्त संख्या में अनुभवी सैनिकों को भी सेवा में रखने पर विचार किया जा रहा है।

यही संतुलन रिटेंशन बढ़ाने की चर्चा का मुख्य आधार माना जा रहा है। (Agniveer Permanent Recruitment)

अग्निवीरों को मिल रही हैं नियमित सैनिकों जैसी कई सुविधाएं

चार वर्षों के दौरान अग्निवीरों को प्रशिक्षण, वेतन, भत्ते और छुट्टियों जैसी कई सुविधाएं नियमित सैनिकों के समान मिलती हैं।

रक्षा मंत्रालय ने विभिन्न बैंकों के साथ समझौते भी किए हैं ताकि अग्निवीरों को वित्तीय योजनाओं का लाभ मिल सके। सेवा समाप्त होने पर उन्हें सेवा निधि पैकेज भी दिया जाता है।

कौन करेगा अंतिम फैसला

सूत्रों के अनुसार रिटेंशन प्रतिशत में किसी भी बदलाव का अंतिम निर्णय रक्षा मंत्रालय और डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स के स्तर पर ही लिया जाएगा।

तीनों सेनाएं अपनी परिचालन जरूरत, तकनीकी आवश्यकताओं, मानव संसाधन और प्रशिक्षण से जुड़े अनुभव साझा कर रही हैं। इन्हीं आधारों पर आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। फिलहाल आधिकारिक नीति के अनुसार चार साल की सेवा पूरी करने के बाद अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को ही मेरिट और सेवा की आवश्यकता के आधार पर नियमित सैनिक के रूप में शामिल करने का प्रावधान लागू है। (Agniveer Permanent Recruitment)

क्या डीआरडीओ का APS बनेगा भारतीय टैंकों का नया सीक्रेट कवच? दुश्मन के ड्रोन, ATGM और टॉप-अटैक मिसाइलें होंगी बेअसर!

DRDO Active Protection System
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DRDO Active Protection System: रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने भारतीय सेना के टैंकों के लिए एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) देने के बाद इस तकनीक पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि सरकार की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में यह साफ नहीं है कि सेना के लिए स्वदेशी एपीएस चुना जाएगा या किसी विदेशी सिस्टम को अपनाया जाएगा। लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह एओएन डीआरडीओ के बनाए एपीएस को मिला है। वहीं, विदेशी सिस्टम्स की बात करें, तो इजरायल का ट्रॉफी सिस्टम, रूस के एरिना-एम और अफगानिट जैसे सिस्टम भी विकल्पों में गिने जा रहे हैं। लेकिन सरकार की प्राथमिकता स्वदेशी होगी।

यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया भर की सेनाओं ने टैंकों की सुरक्षा को नए नजरिए से देखना शुरू किया है। आधुनिक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, टॉप-अटैक हथियार, ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन ने पारंपरिक टैंक सुरक्षा की सीमाओं को सामने ला दिया है। इसी वजह से अब एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम को आधुनिक टैंक का जरूरी हिस्सा माना जा रहा है।

DRDO Active Protection System: क्या होता है एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम?

एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम यानी एपीएस ऐसा स्मार्ट सुरक्षा सिस्टम है, जो टैंक पर हमला करने वाली मिसाइल, रॉकेट या ड्रोन को टैंक तक पहुंचने से पहले ही पहचान लेता है और उसे रास्ते में ही निष्क्रिय या नष्ट करने की कोशिश करता है।

अब तक टैंक मुख्य रूप से मोटे स्टील, कंपोजिट आर्मर और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर पर निर्भर रहते थे। ये सुरक्षा परतें हमला झेलने के लिए बनाई जाती हैं। इसके उलट एपीएस हमला होने का इंतजार नहीं करता, बल्कि खतरे को पहले ही रोकने की कोशिश करता है। आधुनिक युद्ध में यही सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

कैसे करता है काम एपीएस

एपीएस कई आधुनिक सेंसर, रडार और कंप्यूटर बेस्ड फायर कंट्रोल सिस्टम के साथ काम करता है। सबसे पहले एक्स-बैंड रडार या अन्य सेंसर आसपास के क्षेत्र पर लगातार नजर रखते हैं। जैसे ही कोई एंटी-टैंक मिसाइल, आरपीजी, ड्रोन या अन्य हथियार टैंक की ओर बढ़ता है, सिस्टम उसकी दिशा, रफ्तार और टकराने के संभावित स्थान की गणना करता है।

इसके बाद कुछ सेकंड से भी कम समय में कंप्यूटर फैसला करता है कि किस प्रकार का जवाब देना है। अगर खतरा गंभीर हो तो लॉन्चर से काउंटर म्यूनिशन दागा जाता है, जो हवा में ही उस मिसाइल या ड्रोन को नष्ट कर देता है।

पूरी प्रक्रिया इतनी तेजी से होती है कि कई बार टैंक के चालक दल को खतरे का एहसास होने से पहले ही सिस्टम कार्रवाई कर चुका होता है।

दो तरह के होते हैं एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम

एपीएस की मुख्य रूप से दो कैटेगरी हैं। पहला है सॉफ्ट-किल सिस्टम। इसमें आने वाली मिसाइल को नष्ट नहीं किया जाता, बल्कि उसके गाइडेंस सिस्टम को कन्फ्यूज किया जाता है। इसके लिए लेजर वार्निंग रिसीवर, इंफ्रारेड जैमर, स्मोक ग्रेनेड और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य मिसाइल को टारगेट से भटका देना होता है।

दूसरा है हार्ड-किल सिस्टम। यह ज्यादा आधुनिक और असरदर माना जाता है। इसमें रडार खतरे को पहचानने के बाद छोटे इंटरसेप्टर या स्पेशल काउंटर म्यूनिशन दागता है, जो मिसाइल या रॉकेट को टैंक से कुछ मीटर पहले ही नष्ट कर देते हैं। वहीं, अब मॉडर्न सेनाएं अब दोनों तकनीकों का इस्तेमाल करने लगी हैं ताकि सुरक्षा कई स्तरों पर सुनिश्चित की जा सके। (DRDO Active Protection System)

DRDO Active Protection System
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डीआरडीओ बना रहा बेहद खास एपीएस

सूत्रों के मुताबिक डीआरडीओ भारतीय सेना के टी-90 भीष्म और अर्जुन जैसे आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स के लिए स्वदेशी एपीएस डेवलप कर रहा है। इसे डीआरडीओ की चेन्नई स्थित अवाडी कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (सीवीआरडीई) बना रही है।

सूत्रों के मुताबिक इस एपीएस को टैंक के चारों ओर 360 डिग्री सुरक्षा देने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इसमें चार एक्स-बैंड एईएसए रडार और रडार, लेजर तथा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर का संयुक्त इस्तेमाल होगा। इसके साथ दो घूमने वाले लॉन्चर लगाए जाएंगे और हर लॉन्चर में दो-दो काउंटर म्यूनिशन होंगे।

यह सिस्टम लगभग 1,000 मीटर की दूरी से आने वाले खतरे का पता लगाने में सक्षम होगा। दावा किया जा रहा है कि यह 1,500 मीटर प्रति सेकंड से अधिक रफ्तार से आने वाली मिसाइलों या अन्य हथियारों को भी इंटरसेप्ट कर सकेगा।

इस सिस्टम में हार्ड-किल और सॉफ्ट-किल दोनों तकनीकों को एक साथ शामिल किया जा रहा है। सिस्टम का उद्देश्य एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, आरपीजी, ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और टॉप-अटैक हथियारों से टैंक की सुरक्षा करना है।

सूत्रों ने बताया कि इस सिस्टम में ब्लास्ट-फ्रेगमेंटेशन वॉरहेड या काइनेटिक इंटरसेप्टर बेस्ड हार्ड-किल काउंटरमेजर लगाए जाएंगे। इसका रिस्पॉन्स टाइम बेहद कम होगा और यह टॉप-अटैक मिसाइल, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम), आरपीजी, ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन जैसे खतरों से टैंक की सुरक्षा करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड थ्रेट प्रायोरिटाइजेशन फीचर भी डेवलप किया जा रहा है, ताकि एक साथ कई खतरों की स्थिति में सिस्टम पहले सबसे बड़े खतरे पर कार्रवाई कर सके।

अर्जुन एमके-1ए टैंक के लिए तैयार

सूत्रों के अनुसार इसका प्रोटोटाइप तैयार हो चुका है। कमांड प्रोसेसर, फायर कंट्रोल यूनिट, रीलोड मैकेनिज्म और सेंसर फ्यूजन मॉड्यूल जैसे प्रमुख हिस्से सफलतापूर्वक काम कर जा रहे हैं। वहीं लॉन्च ट्यूब, सॉलिड प्रोपेलेंट और ब्लास्ट वॉरहेड जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स को डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं में डेवलप किया गया है।

इस प्रोजेक्ट में सीवीआरडीई के अलावा एलआरडीई रडार और इलेक्ट्रॉनिक्स, टीबीआरएल टर्मिनल बैलिस्टिक्स तथा एचईएमआरएल ब्लास्ट काउंटरमेजर से जुड़े कार्यों में सहयोग कर रही हैं।

इस एपीएस को सबसे पहले अर्जुन एमके-1ए टैंक के लिए तैयार किया जा रहा है, लेकिन इसे टी-90 भीष्म टैंकों पर भी लगाया जा सके, इसके लिए इसे मॉड्यूलर डिजाइन दिया गया है। इसका उद्देश्य पुराने टैंकों पर भी आसानी से इसे फिट करना है। (DRDO Active Protection System)

पोखरण में किये जा चुके हैं ट्रायल

सूत्रों ने बताया कि डीआरडीओ के स्वदेशी एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) के शुरुआती परीक्षण राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में किए जा चुके हैं। इन परीक्षणों में सिस्टम की क्षमता को अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया। इसके लिए आरपीजी-7 सिमुलेंट और लेजर-गाइडेड एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) जैसे खतरों के खिलाफ परीक्षण किए गए। इन ट्रायल्स का उद्देश्य यह देखना था कि सिस्टम आने वाले खतरे को कितनी जल्दी पहचान सकता है और उसे समय रहते रोक सकता है।

सूत्रों के मुताबिक अब इस परियोजना के अगले चरण में व्हीकल बेस्ड ट्रायल किए जाएंगे। इसके तहत इसी साल अर्जुन एमके-1ए टैंक पर सिस्टम को लगाकर ट्रायल किए जाने की योजना है। ये ट्रायल डीआरडीओ की कॉम्बैट अवडी, सीवीआरडीई में किए जाएंगे। इसके बाद भारतीय सेना के साथ यूजर ट्रायल भी किए जाएंगे।

सूत्रों के अनुसार शुरुआती ट्रायल्स में सिस्टम ने 90 प्रतिशत से अधिक सफलता दर हासिल की है। रेगिस्तानी माहौल, धूल और तेज हवा जैसी परिस्थितियों में भी सिस्टम ने शानदार प्रदर्शन किया। ट्रायल्स के दौरान यह आरपीजी और लेजर-गाइडेड मिसाइल जैसे खतरों को सफलतापूर्वक पहचानने और रोकने में सक्षम रहा। रडार, सेंसर फ्यूजन और फायर कंट्रोल सिस्टम का प्रदर्शन भी शानदार रहा है। साथ ही, खतरे की पहचान से लेकर रिस्पॉन्स टाइम भी बेहद कम रहा।

सूत्रों ने बताया कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए डीआरडीओ निजी डिफेंस कंपनियों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मॉडल पर काम कर सकता है। अभी किसी कंपनी का अंतिम चयन नहीं हुआ है, लेकिन लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, भारत फोर्ज और कुछ अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों को संभावित भागीदारों के रूप में देखा जा रहा है। (DRDO Active Protection System)

टॉप-अटैक हथियारों से भी सुरक्षा देने की तैयारी

आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ा खतरा केवल सामने से आने वाली मिसाइलें नहीं हैं। अब कई एंटी-टैंक मिसाइलें ऊपर से हमला करती हैं। टैंक का ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत कमजोर माना जाता है। इसी वजह से डीआरडीओ के सिस्टम में टॉप-अटैक खतरों से सुरक्षा देने की क्षमता भी विकसित की जा रही है।

डीएसी से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार नए एपीएस को 360 डिग्री सुरक्षा देने के साथ ऑडियो-वीजुअल वार्निंग, सॉफ्ट-किल और हार्ड-किल दोनों उपायों से लैस होना होगा। (DRDO Active Protection System)

भारतीय सेना को इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई

यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की लगभग सभी सेनाओं को यह दिखाया कि केवल मोटा आर्मर काफी नहीं है। ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलों ने बड़ी संख्या में टैंकों को नुकसान पहुंचाया। कई मामलों में ऊपर से हमला करने वाली मिसाइलों ने भारी सुरक्षा वाले टैंकों को भी निष्क्रिय कर दिया।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि इसी अनुभव के बाद भारत भी अपने टैंक बेड़े की सुरक्षा को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहा है।

भारतीय सेना के पास कितने टी-90 टैंक हैं

भारतीय सेना के पास 1,200 से अधिक टी-90 भीष्म टैंक सेवा में हैं। इसके अलावा अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक भी सेना का हिस्सा हैं।

वर्तमान में इन टैंकों पर कोई स्वदेशी हार्ड-किल एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम तैनात नहीं है। इन्हें मुख्य रूप से कंपोजिट आर्मर और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर के सहारे सुरक्षित रखा जाता है। वहीं, एपीएस मिलने के बाद इन टैंकों के सर्वाइवल रेट में बड़ा सुधार हो सकता है। (DRDO Active Protection System)

विदेशी सिस्टम भी हैं विकल्प

इजरायल का ट्रॉफी एपीएस दुनिया का सबसे ज्यादा युद्ध में इस्तेमाल किया गया हार्ड-किल सिस्टम माना जाता है। यह असली युद्ध में भी कई बार सफलतापूर्वक इंटरसेप्शन कर चुका है।

रूस के एरिना-एम और अफगानिट सिस्टम भी हार्ड-किल श्रेणी में आते हैं। हाल के महीनों में रूस के टी-90एम टैंक पर एरिना-एम के नए वर्जन की तस्वीरें भी सामने आई हैं। इस सिस्टम को आधुनिक ड्रोन और टॉप-अटैक खतरों से निपटने के लिए अपग्रेड बनाया जा रहा है।

ब्रिटेन और जर्मनी की कंपनियां भी अपने-अपने एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम पर काम कर रही हैं, जबकि साब का समाधान मुख्य रूप से सॉफ्ट-किल तकनीक पर आधारित माना जाता है।

लार्सन एंड टुब्रो और इजरायल की राफेल कंपनी के बीच भारत में ट्रॉफी एपीएस के निर्माण और इंटीग्रेशन को लेकर सहयोग की घोषणा पहले ही हो चुकी है। (DRDO Active Protection System)

स्वदेशी सिस्टम कितना सस्ता?

सूत्रों के अनुसार डीआरडीओ का स्वदेशी एपीएस प्रति टैंक लगभग 12 से 15 करोड़ रुपये की लागत का हो सकता है।

इसके मुकाबले रूस के अफगानिट जैसे विदेशी सिस्टम की अनुमानित लागत 18 से 22 करोड़ रुपये प्रति टैंक बताई जाती है।

यदि स्वदेशी सिस्टम सफल रहता है तो बड़े टैंक बेड़े पर इसे लगाने में लागत कम रहने के साथ स्पेयर पार्ट्स और सप्लाई चेन पर भी भारत की निर्भरता घट सकती है। (DRDO Active Protection System)