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Explainer: राफेल की नई ‘साइलेंट किलर’ मिसाइल MICA NG क्यों है खास? चीन के स्टेल्थ फाइटर J-20 और क्रूज मिसाइलों के लिए क्यों बनी बड़ा खतरा?

MICA NG Missile
Image Source: Mbda-systems

MICA NG Missile: फ्रांस ने राफेल लड़ाकू विमान से मीका एनजी (MICA-NG) एयर-टू-एयर मिसाइल का सफल सुपरसोनिक परीक्षण किया है। यह पहली बार था जब इस नई पीढ़ी की मिसाइल को सुपरसोनिक उड़ान के दौरान दागकर उसकी क्षमता परखी गई।

फ्रांसीसी मिसाइल निर्माता एमबीडीए और फ्रांसीसी रक्षा खरीद एजेंसी डीजीए ने इसे भविष्य के हवाई युद्ध की दिशा में बड़ा कदम बताया है। खास बात यह है कि यह मिसाइल केवल सामान्य लड़ाकू विमानों को ही नहीं बल्कि स्टेल्थ फाइटर जेट, ड्रोन और अत्यधिक तेज क्रूज मिसाइलों को भी निशाना बनाने के लिए तैयार की गई है।

भारत के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से राफेल लड़ाकू विमान ऑपरेशनल हैं और फ्रांस से बड़ी संख्या में अतिरिक्त 114 राफेल खरीदने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

क्या है MICA NG Missile?

मीका (MICA) का पूरा नाम “मिसाइल डी इंटरसेप्शन, डी कॉम्बैट एट डी ऑटोडिफेंस” है। यह फ्रांस की बनाई हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। इसका नया संस्करण एमआईसीए एनजी यानी न्यू जेनरेशन मिसाइल है। इसे मूल एमआईसीए मिसाइल की जगह लेने के लिए डेवलप किया गया है।

एमआईसीए फैमिली की मिसाइलें 1990 के दशक से फ्रांसीसी वायुसेना का हिस्सा रही हैं। इन्हें राफेल और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों पर लगाया जाता है।

नई एमआईसीए एनजी बाहर से देखने पर लगभग पुरानी मिसाइल जैसी लगती है, लेकिन इसके अंदर की तकनीक पूरी तरह बदल दी गई है। नई मिसाइल में ज्यादा ताकतवर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं। इसके सेंसर ज्यादा संवेदनशील हैं और इसकी रॉकेट मोटर भी पहले की तुलना में अधिक एडवांस है।

एमबीडीए के अनुसार नई मिसाइल पुरानी एमआईसीए की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक दूरी तक हमला करने में सक्षम है। जहां पुरानी एयर-लॉन्च्ड मीका मिसाइल की रेंज लगभग 60 से 80 किलोमीटर तक थी, वहीं नई पीढ़ी की मीका एनजी मिसाइल की रेंज करीब 84 से 112 किलोमीटर तक मानी जा रही है। यानी नई मिसाइल पुराने वर्जन की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक दूरी पर मौजूद लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। हालांकि कंपनी ने आधिकारिक रेंज नहीं बताई है।

एमबीडीए का कहना है कि यह मिसाइल भविष्य के उन खतरों को ध्यान में रखकर बनाई गई है जो मौजूदा मिसाइलों के लिए चुनौती बन सकते हैं।

सुपरसोनिक परीक्षण क्यों था इतना महत्वपूर्ण?

साधारण भाषा में समझें तो जब कोई लड़ाकू विमान ध्वनि की गति से तेज उड़ता है तो उसके आसपास का तापमान काफी बढ़ जाता है। हवा के घर्षण से मिसाइल और विमान दोनों के आसपास गर्मी पैदा होती है।

ऐसी स्थिति में किसी टारगेट को पहचानना और उसका पीछा करना काफी कठिन हो जाता है। विशेष रूप से तब जब सामने वाला टारगेट स्टेल्थ तकनीक से लैस हो और उसकी गर्मी भी बहुत कम हो।

इसी चुनौती को देखते हुए फ्रांस ने एमआईसीए एनजी का सुपरसोनिक परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान मिसाइल ने उच्च तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी टारगेट को सफलतापूर्वक ट्रैक किया। इससे साबित हुआ कि इसका नया इंफ्रारेड सीकर वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में भी प्रभावी रहेगा। (MICA NG Missile)

स्टेल्थ विमान क्यों होते हैं इतने खतरनाक

स्टेल्थ विमान ऐसे लड़ाकू जेट होते हैं जिन्हें रडार पर पकड़ना कठिन होता है। चीन का जे-20 और अमेरिका का एफ-35 ऐसे ही विमानों की श्रेणी में आते हैं।

इन विमानों का डिजाइन इस तरह बनाया जाता है कि वे दुश्मन के रडार पर कम दिखाई दें। साथ ही उनकी गर्मी और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर भी कम करने की कोशिश की जाती है।

यही कारण है कि स्टेल्थ विमान आधुनिक वायु युद्ध में सबसे खतरनाक हथियारों में गिने जाते हैं।

एमआईसीए एनजी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसे ऐसे ही कम सिग्नेचर वाले टारगेट्स को खोजने और मार गिराने के लिए विकसित किया गया है। (MICA NG Missile)

Rafale Source Code India

मिसाइल का नया इंफ्रारेड सीकर क्यों खास है?

एमआईसीए एनजी के इंफ्रारेड वर्जन में नया मैट्रिक्स सेंसर लगाया गया है। यह सेंसर टारगेट से निकलने वाली बेहद कम गर्मी को भी पहचान सकता है। पुरानी पीढ़ी की मिसाइलों के लिए कम थर्मल सिग्नेचर वाले टारगेट चुनौती होते थे, लेकिन नई मिसाइल को खासतौर पर इसी समस्या को हल करने के लिए बनाया गया है।

इसका इंफ्रारेड सीकर किसी प्रकार का रडार सिग्नल नहीं भेजता। इसका मतलब है कि दुश्मन को यह पता ही नहीं चलता कि मिसाइल उसे ट्रैक कर रही है। इसीलिए इसे “साइलेंट किलर” भी कहा जा रहा है।

मिसाइल की नई ताकत: डुअल पल्स मोटर

एमआईसीए एनजी में डुअल पल्स रॉकेट मोटर दी गई है। पुरानी मिसाइलों में मोटर एक बार पूरी ताकत के साथ जलती थी और फिर उसका ईंधन समाप्त हो जाता था। नई मिसाइल में दो चरणों वाली मोटर लगाई गई है।

पहला चरण मिसाइल को तेजी से टारगेट की ओर बढ़ाता है। दूसरा चरण जरूरत पड़ने पर सक्रिय होता है और अंतिम समय में अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है।

इसका फायदा यह है कि अंतिम क्षणों में भी मिसाइल तेजी से दिशा बदल सकती है और तेज उड़ते हुए विमान या टारगेट का पीछा कर सकती है।

एमबीडीए के अनुसार यह मिसाइल 50 जी तक का मोड़ लेने में सक्षम है, जिससे बच निकलना दुश्मन के लिए मुश्किल हो जाता है। (MICA NG Missile)

केवल लड़ाकू विमान ही नहीं, ड्रोन भी होंगे निशाने पर

यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखा दिया है कि ड्रोन अब युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। छोटे ड्रोन रडार पर कम दिखाई देते हैं और बड़ी संख्या में हमला कर सकते हैं। एमआईसीए एनजी को ऐसे ही खतरों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

कंपनी का कहना है कि मिसाइल बहुत कम इंफ्रारेड और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नेचर वाले टारगेटों को भी पहचान सकती है। इसका मतलब है कि भविष्य में ड्रोन स्वार्म जैसी चुनौतियों से निपटने में भी इसका उपयोग हो सकेगा।

फ्रांस का दावा है कि यह मिसाइल पारंपरिक लड़ाकू विमान के साथ-साथ ड्रोन और अत्यधिक फुर्तीली क्रूज मिसाइलों के खिलाफ भी प्रभावी रहेगी। (MICA NG Missile)

राफेल और एमआईसीए एनजी की जोड़ी क्यों है घातक

राफेल दुनिया के सबसे आधुनिक 4.5 जेनरेशन लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसमें आरबीई-2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और अत्याधुनिक सेंसर लगे हुए हैं। जब राफेल और एमआईसीए एनजी एक साथ काम करते हैं तो दोनों की क्षमता और बढ़ जाती है।

राफेल अपने सेंसरों से टारगेट की जानकारी मिसाइल को भेज सकता है। इसके बाद मिसाइल उड़ान के दौरान भी अपडेट लेती रहती है और रास्ता भी बदल सकती है। युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। (MICA NG Missile)

चीन के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

फ्रांस ने आधिकारिक रूप से किसी देश का नाम नहीं लिया है, लेकिन रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मीका-एनजी जैसी मिसाइलें चीन के जे-20 जैसे स्टेल्थ विमानों को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं। चीन के पास आज दुनिया का सबसे बड़ा स्टेल्थ लड़ाकू विमान बेड़ा माना जाता है।

जे-20 को चीन अपनी वायु शक्ति का सबसे अहम हथियार मानता है। लेकिन स्टेल्थ का मतलब पूरी तरह अदृश्य होना नहीं होता। हर विमान किसी न किसी रूप में गर्मी और इलेक्ट्रॉनिक संकेत छोड़ता है। एमआईसीए एनजी का नया इंफ्रारेड सीकर ऐसे ही संकेतों को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। (MICA NG Missile)

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परीक्षण?

भारतीय वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल लड़ाकू विमान हैं। ये विमान अंबाला और हाशिमारा एयरबेस पर तैनात हैं। लद्दाख से लेकर पूर्वी क्षेत्र तक कई संवेदनशील मोर्चों पर राफेल को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।

इसी बीच भारत ने फ्रांस को 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए अनुरोध पत्र भेजा है। इस प्रस्ताव के तहत बड़ी संख्या में विमान भारत में ही बनाए जाने की योजना है। यदि यह कार्यक्रम आगे बढ़ता है तो भारतीय वायुसेना के पास राफेल का बहुत बड़ा बेड़ा हो सकता है। यदि भविष्य में मीका-एनजी भारतीय राफेल बेड़े का हिस्सा बनती है तो वायुसेना को छोटी और मध्यम दूरी के हवाई मुकाबलों में एक नई क्षमता मिलेगी।

फ्रांस ने वर्ष 2018 में एमआईसीए एनजी कार्यक्रम की शुरुआत की थी। उस समय दुनिया भर में स्टेल्थ विमान, ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा था। फ्रांसीसी वायुसेना चाहती थी कि उसके पास ऐसी मिसाइल हो जो आने वाले कई दशकों तक सर्विस में बनी रहे।

फ्रांस पहले ही 500 से अधिक एमआईसीए एनजी मिसाइलों का ऑर्डर दे चुका है। इन मिसाइलों का उपयोग केवल वायुसेना तक सीमित नहीं रहेगा। इसका एक अलग वर्जन जहाजों और जमीन पर तैनात एयर डिफेंस सिस्टम्स के लिए भी तैयार किया जा रहा है। (MICA NG Missile)

RAW पर किताब लिखने वाले मेजर जनरल के केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का हवाला देकर नहीं रोक सकते दस्तावेज

Official Secrets Act- Major General Retd VK Singh
Major General (Retd) VK Singh

Official Secrets Act: राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में गोपनीय दस्तावेजों की भूमिका हमेशा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे मामलों में अक्सर सरकार और जांच एजेंसियां यह दलील देती हैं कि कुछ दस्तावेज इतने संवेदनशील होते हैं कि उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाया जा रहा है और चार्जशीट में शामिल दस्तावेज उसके खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे हैं, तो केवल ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (ओएसए) का हवाला देकर आरोपी को उन दस्तावेजों की प्रति देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

रिटायर्ड मेजर जनरल वी.के. सिंह से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई किसी भी आरोपी का बुनियादी अधिकार है। यदि उसे यह ही नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ कौन से दस्तावेज और सबूत इस्तेमाल किए जा रहे हैं, तो वह अपना बचाव कैसे करेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके नाम पर आरोपी के कानूनी अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते।

Official Secrets Act: क्या है पूरा मामला?

मेजर जनरल वी.के. सिंह भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं। उन्होंने सेना में लंबी सेवा देने के अलावा नवंबर 2000 से जून 2004 तक कैबिनेट सचिवालय में संयुक्त सचिव के रूप में भी काम किया था। इस दौरान उनका संबंध भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) से जुड़े कार्यों से रहा।

रिटायर होने के बाद उन्होंने “इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस: सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग” नाम से एक किताब लिखी। जिसके बाद इसी किताब को लेकर विवाद शुरू हुआ।

जांच एजेंसियों का आरोप है कि किताब में कई ऐसी जानकारियां प्रकाशित की गईं जो गोपनीय श्रेणी में आती थीं। आरोप के अनुसार किताब में कुछ अधिकारियों के नाम, उनकी नियुक्तियां, स्टेशन कोड, तकनीकी परियोजनाओं की जानकारी, दूरसंचार इकाइयों के कामकाज और सिग्नल इंटेलिजेंस से जुड़ी जानकारियां शामिल थीं।

सरकार और जांच एजेंसियों का कहना था कि ऐसी सूचनाओं के सार्वजनिक होने से भारत की सुरक्षा और संप्रभुता को नुकसान पहुंच सकता है।

किन धाराओं में दर्ज हुआ मामला?

20 सितंबर 2007 को मेजर जनरल वी.के. सिंह के खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 की धारा 3 और 5 के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 409 और 120बी भी लगाई गई।

जांच के बाद सीबीआई ने वर्ष 2008 में अदालत में चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट के साथ कई ऐसे दस्तावेज भी जमा किए गए जिन्हें जांच एजेंसी ने अत्यंत गोपनीय बताया।

सीबीआई ने अदालत से अनुरोध किया कि इन दस्तावेजों को सीलबंद लिफाफे में रखा जाए ताकि संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो।

चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों पर विवाद

मुकदमे की सुनवाई शुरू होने के बाद मेजर जनरल वी.के. सिंह ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के तहत आवेदन दाखिल किया।

उन्होंने कहा कि जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया जा रहा है, उनकी प्रतियां उन्हें उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उनका तर्क था कि किसी भी आरोपी को अपना बचाव तैयार करने के लिए यह जानना जरूरी है कि उसके खिलाफ क्या सबूत पेश किए जा रहे हैं।

उन्होंने अदालत से उन दस्तावेजों की प्रतियां मांगीं जो चार्जशीट का हिस्सा थीं लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई थीं। (Official Secrets Act)

सीबीआई ने क्यों किया विरोध?

सीबीआई ने इस मांग का विरोध किया। एजेंसी का कहना था कि दस्तावेज राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं और उनकी प्रतियां आरोपी को देने से संवेदनशील जानकारी बाहर जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

सीबीआई ने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट की धारा 14 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे दस्तावेजों का वितरण देश की सुरक्षा के हितों के खिलाफ हो सकता है।

एजेंसी का तर्क था कि यदि इन दस्तावेजों की प्रतियां बाहर चली गईं तो उनका गलत इस्तेमाल हो सकता है और इससे राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में क्या हुआ?

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष कर रहा है, उनकी प्रतियां आरोपी को मिलनी चाहिए। लेकिन सीबीआई इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गई।

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि आरोपी को दस्तावेजों की प्रतियां नहीं दी जाएंगी। हालांकि अदालत ने यह अनुमति दी कि वह ट्रायल कोर्ट में जाकर दस्तावेजों का निरीक्षण कर सकता है।

हाईकोर्ट का मानना था कि इस व्यवस्था से आरोपी को मुकदमे की तैयारी का अवसर मिलेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा भी प्रभावित नहीं होगी।

मेजर जनरल वी.के. सिंह इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे। उनका कहना था कि केवल निरीक्षण की अनुमति पर्याप्त नहीं है। मुकदमे की प्रभावी तैयारी के लिए दस्तावेजों की प्रतियां होना जरूरी है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। (Official Secrets Act)

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि निष्पक्ष सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट ने ‘सुपरिटेंडेंट एंड रिमेंब्रेंसर ऑफ लीगल अफेयर्स, वेस्ट बंगाल बनाम सत्येन भौमिक और अन्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि सीबीआई की यह दलील केवल एक आशंका पर आधारित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी आशंका के आधार पर किसी आरोपी के उस कानूनी अधिकार को नहीं छीना जा सकता, जिसके तहत वह चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों की प्रतियां मांग सकता है।

अदालत ने कहा कि किसी भी आरोपी को चार्जशीट का हिस्सा बने दस्तावेजों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि यदि अभियोजन पक्ष किसी दस्तावेज का इस्तेमाल आरोपी के खिलाफ कर रहा है, तो आरोपी को उसकी प्रति मिलना उसका कानूनी अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों को छिपाने से आरोपी के बचाव के अधिकार को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि मामला ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत दर्ज है, दस्तावेज देने से इनकार नहीं किया जा सकता। (Official Secrets Act)

क्यों महत्वपूर्ण है धारा 207?

अदालत ने अपने फैसले में कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर (CrPC) की धारा 207 का विशेष उल्लेख किया। इसके तहत किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी को मुफ्त में उन दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराई जाती हैं जो चार्जशीट के साथ अदालत में जमा किए गए हों। (Official Secrets Act)

इनमें पुलिस रिपोर्ट, एफआईआर, गवाहों के बयान और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज शामिल होते हैं।

अदालत ने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य आरोपी को मुकदमे में समान अवसर उपलब्ध कराना है ताकि वह प्रभावी तरीके से अपना पक्ष रख सके।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और दस्तावेज संवेदनशील हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल आशंका के आधार पर किसी आरोपी को उसके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानून में पहले से ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जो गोपनीय दस्तावेजों के दुरुपयोग को रोकते हैं।

यदि कोई व्यक्ति ऐसे दस्तावेज सार्वजनिक करता है तो उसके खिलाफ अलग से कार्रवाई की जा सकती है। (Official Secrets Act)

अदालत ने लगाई ये शर्त?

अदालत ने केंद्र सरकार और सीबीआई को निर्देश दिया कि जिन दस्तावेजों की मांग आरोपी ने की है, उनकी टाइप की हुई प्रतियां दो महीने के भीतर उपलब्ध कराई जाएं।

साथ ही मेजर जनरल वी.के. सिंह को निर्देश दिया गया कि वे एक लिखित शपथपत्र देंगे कि इन दस्तावेजों को किसी भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम, प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया या अन्य किसी तरीके से सार्वजनिक नहीं करेंगे।

अदालत ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर ट्रायल कोर्ट की निगरानी में दस्तावेजों का निरीक्षण भी किया जा सकता है। (Official Secrets Act)

सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्यों है अहम?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल एक व्यक्ति के मामले तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा, खुफिया एजेंसियों और गोपनीय दस्तावेजों से जुड़े मामलों में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि आरोपी को कितनी जानकारी दी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई दस्तावेज चार्जशीट का हिस्सा है और अभियोजन पक्ष उसका इस्तेमाल कर रहा है, तो आरोपी को उससे वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी साफ किया कि निष्पक्ष सुनवाई केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकार है। इसलिए जांच एजेंसियों को राष्ट्रीय सुरक्षा और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।

फैसले में अदालत ने दोहराया कि न्याय तभी संभव है जब अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों को समान अवसर मिले। इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर आरोपी को दस्तावेजों की प्रतियां देने का निर्देश दिया। (Official Secrets Act)

Cause Title: V.K. Singh v. Central Bureau of Investigation and Anr. (Neutral Citation: 2026 INSC 614)

Factcheck: अग्निवीरों को 80% पक्की नौकरी और 25 लाख सेवा निधि? जानें वायरल नोटिफिकेशन की पूरी सच्चाई

Agniveer Viral Notification
Image Source: PIB

Agniveer Viral Notification: सोशल मीडिया पर इन दिनों अग्निवीर योजना को लेकर एक कथित नोटिफिकेशन तेजी से वायरल हो रहा है। व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक पोस्ट और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर किए जा रहे इस दस्तावेज में दावा किया जा रहा है कि सरकार ने अग्निवीर योजना में बड़ा बदलाव कर दिया है। दावा यह भी किया जा रहा है कि अब 75 से 80 प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी नौकरी मिलेगी और सेवा निधि की राशि बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी गई है।

इसी बीच भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का एक इंटरव्यू भी चर्चा में है। ऐसे में कई युवा और उनके परिवार यह जानना चाहते हैं कि क्या वास्तव में अग्निवीर योजना में कोई बड़ा बदलाव हो गया है या नहीं।

Agniveer Viral Notification: वायरल नोटिफिकेशन में क्या दावा किया जा रहा है?

सोशल मीडिया पर वायरल डॉक्यूमेंट में दावा किया गया है कि अग्निवीरों के लिए स्थायी भर्ती का प्रतिशत बढ़ा दिया गया है। इसमें कहा गया है कि चार साल की सेवा पूरी करने वाले 75 से 80 प्रतिशत अग्निवीरों को सेना में नियमित नौकरी दी जाएगी।

दूसरा दावा यह है कि जो अग्निवीर स्थायी सेवा के लिए चयनित नहीं होंगे, उन्हें सम्मानजनक तरीके से सेवा से मुक्त किया जाएगा।

तीसरा और सबसे चर्चित दावा सेवा निधि को लेकर है। दस्तावेज में कहा गया है कि सेवा निधि पैकेज को बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दिया गया है।

इन्हीं दावों के कारण यह नोटिफिकेशन तेजी से वायरल हुआ और लाखों युवाओं के बीच चर्चा का विषय बन गया।

आर्मी चीफ ने वास्तव में क्या कहा?

हाल ही में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में अग्निपथ योजना पर विस्तार से बात की।

उन्होंने अग्निपथ योजना को भारतीय सेना के लिए एक बड़ा मानव संसाधन सुधार बताया। उनके अनुसार इस योजना का उद्देश्य सेना को अधिक युवा, ऊर्जावान और आधुनिक युद्ध की चुनौतियों के लिए तैयार बनाना है।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि आज युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सर्विलांस टेक्नोलॉजी और मॉडर्न जैसी नई तकनीकें युद्ध का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में सेना को ऐसे जवानों की जरूरत है, जो नई तकनीक को जल्दी सीख सकें और बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकें। (Agniveer Viral Notification)

25 प्रतिशत रिटेंशन पर क्या बोले सेना प्रमुख?

अग्निपथ योजना के तहत वर्तमान व्यवस्था में चार साल की सेवा के बाद लगभग 25 फीसदी अग्निवीरों को नियमित कैडर में शामिल किया जाता है।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस व्यवस्था पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि 25 फीसदी रिटेंशन योजना का मौजूदा आधार है, लेकिन यह एक विकसित होती प्रक्रिया है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में ऑपरेशनल जरूरतें, प्रशिक्षण पर होने वाला निवेश और जमीनी अनुभव यह संकेत देते हैं कि अधिक अग्निवीरों को नियमित सेवा में रखना जरूरी है, तो इस विषय पर संस्थागत स्तर पर विचार किया जा सकता है।

पहले बैच इस साल होगा पूरा

सेना प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि अग्निपथ योजना की पहली बैच का पूरा चार साल का कार्यकाल अभी समाप्त नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि किसी भी योजना का सही मूल्यांकन तभी किया जा सकता है जब उसका पूरा चक्र पूरा हो जाए। पहले बैच के अनुभव, यूनिट कमांडरों की रिपोर्ट और सेना की जरूरतों का आकलन करने के बाद ही आगे कोई निर्णय लिया जा सकता है।

इसी कारण उन्होंने अभी किसी बड़े बदलाव पर अंतिम टिप्पणी करने से बचने की बात कही। (Agniveer Viral Notification)

अग्निपथ योजना क्या है?

अग्निपथ योजना वर्ष 2022 में शुरू की गई थी। इसके तहत युवा चार साल के लिए सेना, नौसेना और वायुसेना में भर्ती होते हैं।

चार साल की सेवा पूरी होने के बाद उनमें से चुनिंदा 25 प्रतिशत जवानों को नियमित सेवा में शामिल किया जाता है। बाकी अग्निवीरों को सेवा निधि पैकेज, प्रशिक्षण प्रमाणपत्र और विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य सेनाओं की औसत आयु कम करना और उन्हें अधिक युवा बनाना है।

अपने इंटरव्यू में जनरल द्विवेदी ने यह भी कहा कि कुछ विशेष क्षेत्रों में प्रशिक्षित कर्मियों का अनुभव बेहद महत्वपूर्ण होता है।

उन्होंने एयर डिफेंस, ड्रोन ऑपरेशन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, कम्युनिकेशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया।

इन क्षेत्रों में जवानों को प्रशिक्षित करने में समय और संसाधन दोनों लगते हैं। इसलिए सेना लगातार इस बात का अध्ययन कर रही है कि भविष्य में इन क्षेत्रों की जरूरतों को कैसे बेहतर तरीके से पूरा किया जाए। (Agniveer Viral Notification)

सेवा के बाद अग्निवीरों के अवसर

सेना प्रमुख ने उन अग्निवीरों का भी उल्लेख किया जो चार साल बाद नियमित सेवा में शामिल नहीं हो पाते।

उन्होंने कहा कि ऐसे युवाओं को सम्मानजनक अवसर मिलना चाहिए ताकि वे अपने अनुभव और प्रशिक्षण का लाभ देश के अन्य क्षेत्रों में भी दे सकें।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अग्निपथ योजना केवल सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई है, बल्कि युवाओं के भविष्य को भी ध्यान में रखा गया है। (Agniveer Viral Notification)

जानकारी की आधिकारिक स्रोतों से करें जांच

अग्निवीर भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे किसी भी जानकारी पर भरोसा करने से पहले आधिकारिक स्रोतों की जांच करें।

सेना से जुड़े किसी भी नियम, भर्ती प्रक्रिया या योजना में बदलाव की जानकारी आधिकारिक वेबसाइटों और अधिकृत सरकारी प्लेटफॉर्म पर जारी की जाती है। ऐसे में सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेशों और स्क्रीनशॉट्स को भरोसा करना कई बार भ्रम पैदा कर सकता है।

अग्निपथ योजना में फिलहाल 25 प्रतिशत अग्निवीरों को नियमित सेवा में रखने का प्रावधान लागू है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यह जरूर कहा है कि भविष्य में अनुभव और जरूरत के आधार पर इस प्रतिशत पर विचार किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने किसी नई संख्या की घोषणा नहीं की है। (Agniveer Viral Notification)

वायुसेना में बड़ा बदलाव: एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित होंगे नए वाइस चीफ, क्या बन सकते हैं अगले एयर चीफ?

Air Marshal Ashutosh Dixit next IAF Vice Chief
PIC Source: PIB/IAF

Air Marshal Ashutosh Dixit: भारतीय वायुसेना को 1 जुलाई से नया 51वां वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ मिलने जा रहा है। सरकार ने अनुभवी फाइटर पायलट और टेस्ट पायलट एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित को इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया है। वह मौजूदा वाइस चीफ एयर मार्शल नागेश कपूर की जगह लेंगे, जो 30 जून को रिटायर हो रहे हैं।

भारतीय वायुसेना में वाइस चीफ का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। एयर चीफ मार्शल के बाद यह दूसरा सबसे वरिष्ठ पद होता है। वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारियों, आधुनिकीकरण, भविष्य की योजनाओं और संसाधनों के प्रबंधन में वाइस चीफ की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित की नियुक्ति को वायुसेना के लिए एक अहम बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

Air Marshal Ashutosh Dixit: फाइटर पायलट से वायुसेना के शीर्ष नेतृत्व तक का सफर

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का सैन्य सफर लगभग चार दशक पुराना है। उन्हें 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन मिला था। वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला के पूर्व छात्र हैं। इसके अलावा उन्होंने बांग्लादेश स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और नई दिल्ली के नेशनल डिफेंस कॉलेज से भी उच्च सैन्य शिक्षा प्राप्त की।

अपने करियर के दौरान उन्होंने केवल लड़ाकू विमान उड़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशिक्षण, परीक्षण, योजना निर्माण और रणनीतिक नेतृत्व जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

3300 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव

एयर मार्शल दीक्षित भारतीय वायुसेना के उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फाइटर पायलट होने के साथ-साथ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट का भी दर्जा हासिल है।

उन्होंने 20 से अधिक प्रकार के विमानों पर 3300 घंटे से ज्यादा उड़ान भरी है। इनमें मिराज-2000, मिग-21, जगुआर और कई अन्य लड़ाकू तथा परीक्षण विमान शामिल हैं।

टेस्ट पायलट की जिम्मेदारी सामान्य फाइटर पायलट से कहीं अधिक मुश्किल होती है। ऐसे पायलट नए विमान, नए हथियार और नई तकनीकों का परीक्षण करते हैं। किसी भी विमान के अपग्रेड या नए सिस्टम को सर्विस में शामिल करने से पहले इन्हीं अधिकारियों की भूमिका सबसे अहम होती है। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

कारगिल युद्ध के दौर की पीढ़ी के अधिकारी

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित उस पीढ़ी के अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना के बड़े बदलावों को करीब से देखा और उनमें योगदान दिया।

कारगिल संघर्ष के बाद भारत ने अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए। आधुनिक लड़ाकू विमान, सटीक हथियार, बेहतर रडार और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता विकसित की गई। एयर मार्शल दीक्षित इस पूरे परिवर्तन का हिस्सा रहे।

इसी वजह से उन्हें ऑपरेशनल अनुभव के साथ-साथ तकनीकी और रणनीतिक समझ रखने वाले अधिकारियों में गिना जाता है।

स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास में बड़ी भूमिका

एयर मार्शल दीक्षित का नाम उन अधिकारियों में शामिल है, जिन्होंने भारतीय वायुसेना में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

वायुसेना मुख्यालय में विभिन्न जिम्मेदारियों के दौरान उन्होंने एलसीए मार्क-1ए, एलसीए मार्क-2 और एएमसीए जैसी परियोजनाओं को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एलसीए यानी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान है। वहीं एएमसीए भारत का प्रस्तावित पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान कार्यक्रम है।

सूत्रों का मानना है कि एयर मार्शल दीक्षित लगातार आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी सैन्य तकनीक के समर्थक रहे हैं। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण से जुड़ा हुआ माना जाता है।

जगुआर और मिग-27 अपग्रेड कार्यक्रम में योगदान

टेस्ट पायलट के रूप में एयर मार्शल दीक्षित ने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं में काम किया। बेंगलुरु स्थित एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट में उन्होंने फ्लाइट टेस्ट स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया। इस दौरान जगुआर और मिग-27 विमानों के एवियोनिक्स अपग्रेड कार्यक्रम में उनकी अहम भूमिका रही।

एवियोनिक्स किसी भी आधुनिक विमान का इलेक्ट्रॉनिक दिमाग माना जाता है। रडार, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और वेपन कंट्रोल जैसे सिस्टम्स इसी का हिस्सा होती हैं।

इन अपग्रेड्स ने भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों की क्षमता बढ़ाने में मदद की।

मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट ट्रायल्स से भी जुड़े

भारतीय वायुसेना के इतिहास में मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एमएमआरसीए कार्यक्रम सबसे चर्चित रक्षा खरीद परियोजनाओं में से एक रहा है।

जब एयर मार्शल दीक्षित एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट्स के निदेशक थे, तब उन्होंने इस परियोजना से जुड़े परीक्षणों और योजना निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही वह कार्यक्रम था जिसके बाद भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों को चुना था। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

सर्वश्रेष्ठ फाइटर ट्रेनिंग बेस का नेतृत्व

एयर मार्शल दीक्षित ने दक्षिण भारत में स्थित एक प्रमुख फाइटर ट्रेनिंग बेस की कमान भी संभाली।

उनके नेतृत्व के दौरान इस बेस को कमांड का बेस्ट ट्रेनिंग सेंटर घोषित किया गया। वायुसेना में प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भविष्य के फाइटर पायलट यहीं से तैयार होते हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार उनके नेतृत्व की खासियत केवल ऑपरेशनल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने प्रशिक्षण और मानव संसाधन विकास पर भी विशेष ध्यान दिया।

थिएटराइजेशन और जॉइंट मिलिटरी स्ट्रक्चर्स में भूमिका

वर्तमान में एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के पद पर कार्यरत हैं। यह पद तीनों सेनाओं के बीच बेहतर जॉइंटनेंस स्थापित करने के लिए बनाया गया है। भारत थिएटर कमांड मॉडल की दिशा में काम कर रहा है, जिसके तहत सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर संयुक्त अभियान चला सकें।

सूत्रों के अनुसार एयर मार्शल दीक्षित ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी भूमिका तीनों सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाने और संयुक्त सैन्य योजना को आगे बढ़ाने में रही है। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

एयर मार्शल नागेश कपूर होंगे रिटायर

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ऐसे समय वाइस चीफ का पद संभालेंगे जब एयर मार्शल नागेश कपूर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।

एयर मार्शल नागेश कपूर ने 1 जनवरी 2026 को वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का पद संभाला था। इससे पहले वे दक्षिण-पश्चिमी एयर कमांड और ट्रेनिंग कमांड जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं।

उन्होंने मिग-21 और मिग-29 के लगभग सभी वर्जन उड़ाए हैं और उनके पास 3400 घंटे से अधिक उड़ान अनुभव है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली थीं।

क्या भविष्य में बन सकते हैं एयर चीफ?

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित की नियुक्ति के बाद एक सवाल पर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या वे भविष्य में भारतीय वायुसेना के प्रमुख बन सकते हैं।

भारतीय सैन्य व्यवस्था में वाइस चीफ का पद अक्सर टॉप लीडरशिप की दौड़ में महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि एयर चीफ की नियुक्ति वरिष्ठता, सेवा अवधि, अनुभव और सरकार के निर्णय सहित कई कारकों पर निर्भर करती है। माना जा रहा है कि वे अगले चीफ ऑफ एयर स्टाफ की इस रेस में शामिल हैं।

फिलहाल एयर मार्शल दीक्षित की नई जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना के दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी के रूप में होगी। उनके सामने वायुसेना के आधुनिकीकरण, स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों, जॉइंट मिलिट्री स्ट्रक्चर और भविष्य की वायु युद्ध क्षमताओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषय होंगे। (Air Marshal Ashutosh Dixit IAF Vice Chief)

एयर मार्शल तेजिंदर सिंह बन सकते हैं अगले CISC

रक्षा सूत्रों के अनुसार, दक्षिण पश्चिमी एयर कमांड (SWAC) के प्रमुख एयर मार्शल तेजिंदर सिंह को हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) का अगला चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (CISC) नियुक्त किया जा सकता है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। एयर मार्शल तेजिंदर सिंह इससे पहले डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पद पर भी रह चुके हैं।

मौजूदा CISC एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित 1 जुलाई को भारतीय वायुसेना के वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का पद संभालेंगे। उनके नए पद पर जाने के बाद CISC का पद खाली होगा, जिसके लिए एयर मार्शल तेजिंदर सिंह का नाम सबसे आगे माना जा रहा है।

जून 1987 में वायुसेना में कमीशन प्राप्त एयर मार्शल तेजिंदर सिंह एक अनुभवी फाइटर पायलट हैं और उनके पास 4500 घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव है। अपने लंबे सैन्य करियर में उन्होंने फाइटर स्क्वाड्रन, रडार स्टेशन, बड़े एयरबेस और जम्मू-कश्मीर में महत्वपूर्ण कमांड जिम्मेदारियां संभाली हैं। उन्होंने वायुसेना मुख्यालय में भी कई अहम पदों पर काम किया है।

एयर मार्शल तेजिंदर सिंह पहले हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में भी जिम्मेदारी निभा चुके हैं, जिससे उन्हें तीनों सेनाओं के जॉइंट ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन का अच्छा अनुभव है। वर्तमान में वे पश्चिमी सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

CISC का पद सीडीएस के अधीन काम करता है और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल, थिएटराइजेशन और संयुक्त सैन्य क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। रक्षा सूत्रों का मानना है कि उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए वे इस पद के मजबूत दावेदार हैं। (Air Marshal Ashutosh Dixit)

सेना के कर्नल को महिला अफसरों को आपत्तिजनक मैसेज भेजना पड़ा भारी, नौकरी भी गई और मिली 3 साल की जेल

Army Colonel Sexual Harassment Case
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Army Colonel Sexual Harassment Case: भारतीय सेना ने महिला अधिकारियों के साथ कथित यौन उत्पीड़न और अभद्र व्यवहार के मामले में एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। जनरल कोर्ट मार्शल (जीसीएम) ने आर्मी मेडिकल कॉर्प्स (एएमसी) के एक कर्नल को सेवा से बर्खास्त करने और तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। मामला राजस्थान के नसीराबाद सैन्य अस्पताल में तैनाती के दौरान महिला अधिकारियों के साथ कथित अनुचित व्यवहार से जुड़ा है।

हालांकि यह फैसला अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है। सेना की प्रक्रिया के अनुसार इसे उच्च सैन्य अधिकारियों की अनुमति मिलने के बाद लागू किया जाएगा।

Army Colonel Sexual Harassment Case: क्या है पूरा मामला?

यह मामला उस समय का है जब संबंधित कर्नल राजस्थान के नसीराबाद स्थित मिलिट्री हॉस्पिटल में डॉक्टर के रूप में तैनात थे। उसी अस्पताल में एक मेजर और एक कैप्टन रैंक की महिला अधिकारी भी कार्यरत थीं।

बाद में कर्नल को 97 आर्टिलरी ब्रिगेड मुख्यालय से अटैच किया गया, जहां उनके खिलाफ जनरल कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू हुई। अक्टूबर 2025 में उनके खिलाफ सेना अधिनियम के तहत छह अलग-अलग आरोप लगाए गए थे।

कोर्ट मार्शल की सुनवाई के बाद अधिकारी को पांच आरोपों में दोषी पाया गया, जबकि एक आरोप में उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया। (Army Colonel Sexual Harassment Case)

महिला मेजर से जुड़े आरोप

चार्जशीट के अनुसार पहला आरोप नवंबर 2022 का था। आरोप लगाया गया कि कर्नल ने एक महिला मेजर को उसकी इच्छा के विरुद्ध गले लगाया। शिकायत में कहा गया कि यह कृत्य महिला अधिकारी की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था।

दूसरा आरोप मार्च 2023 का है। इसमें कहा गया कि कर्नल ने उसी महिला अधिकारी के साथ अनुचित शारीरिक संपर्क किया और उसकी गर्दन तथा जांघ को छुआ। शिकायतकर्ता के मुताबिक यह व्यवहार प्रोफेशनल सीमाओं के खिलाफ था।

व्हाट्सएप संदेश भी बने जांच का हिस्सा

जांच के दौरान कुछ व्हाट्सएप संदेशों को भी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया गया। आरोप था कि मार्च और अप्रैल 2023 के बीच कर्नल ने महिला मेजर को कई ऐसे संदेश भेजे, जिनमें दोहरे अर्थ वाले और यौन संकेत वाले शब्दों का इस्तेमाल किया गया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार कुछ संदेशों में उन्होंने खुद को महिला अधिकारी का “करीबी दोस्त” बताया और निजी संबंध बनाने की कोशिश की। जांच में यह भी आरोप सामने आया कि उन्होंने महिला अधिकारी को कई बार पर्सनल और इमोशनल मैसेज भेजे। कोर्ट मार्शल के दौरान इन डिजिटल मैसेज को भी सबूत के तौर पर पेश किया गया।

अश्लील सामग्री भेजने का आरोप

मामले का एक अन्य गंभीर आरोप यह था कि मार्च 2023 में देर रात महिला मेजर को व्हाट्सएप के जरिए एक तस्वीर और वीडियो भेजा, जिसे सेना ने आपत्तिजनक सामग्री की श्रेणी में माना।

आरोप पत्र में कहा गया कि ऐसा व्यवहार एक सैन्य अधिकारी के पद, जिम्मेदारी और अपेक्षित आचरण के अनुरूप नहीं था।

सेना के नियमों के अनुसार अधिकारियों से उच्च स्तर के पेशेवर और नैतिक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। इसी आधार पर इस आरोप को भी सुनवाई में शामिल किया गया। (Army Colonel Sexual Harassment Case)

महिला कैप्टन की शिकायत भी शामिल

कोर्ट मार्शल में एक महिला कैप्टन की शिकायत को भी शामिल किया गया। आरोप था कि फरवरी और मार्च 2023 के दौरान कर्नल ने उनके प्रति भी अनुचित टिप्पणियां की थीं।

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कहा कि यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं था और अलग-अलग शिकायतों में समान प्रकार के व्यवहार का आरोप सामने आया।

हालांकि तीसरी महिला अधिकारी, जो मेजर रैंक की थीं, से जुड़े एक आरोप में कोर्ट मार्शल ने कर्नल को दोषी नहीं माना।

क्या होता है जनरल कोर्ट मार्शल?

भारतीय सेना में अनुशासन बनाए रखने के लिए कोर्ट मार्शल की व्यवस्था होती है। जनरल कोर्ट मार्शल सेना की सबसे गंभीर न्यायिक प्रक्रिया मानी जाती है।

जब किसी अधिकारी या सैनिक पर गंभीर आरोप लगते हैं, तब मामले की सुनवाई जनरल कोर्ट मार्शल के माध्यम से की जाती है। इसमें गवाहों के बयान, दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य सबूतों की जांच की जाती है।

यदि आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो सेवा से बर्खास्तगी, पदावनति, वेतन कटौती या जेल जैसी सजा दी जा सकती है।

सेना ने किन धाराओं के तहत की कार्रवाई?

आरोपों में सेना अधिनियम की विभिन्न धाराओं का इस्तेमाल किया गया। इनमें कुछ आरोप भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं से भी जुड़े थे जो महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने और यौन उत्पीड़न से संबंधित हैं।

सेना अधिनियम की धारा 69 के तहत ऐसे मामलों में नागरिक कानूनों के प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं। इसके अलावा अधिकारियों के आचरण से संबंधित नियमों का भी परीक्षण किया गया। (Army Colonel Sexual Harassment Case)

बचाव पक्ष ने क्या कहा?

कर्नल की ओर से पेश हुए वकील ने कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सुनवाई के दौरान कई प्रक्रियागत अनियमितताएं हुईं।

बचाव पक्ष का आरोप है कि अदालत में दर्ज किए गए बयानों और बाद में तैयार किए गए दस्तावेजों में अंतर पाया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ मूल रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं रखे गए और कुछ सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई।

वकील के अनुसार इस संबंध में सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) में भी याचिकाएं दायर की गई थीं। उनका कहना है कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मूल अधिकार है।

वहीं, इस फैसले के बाद सेना में महिला अधिकारियों की सुरक्षा और कार्यस्थल पर सम्मानजनक वातावरण को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। पिछले कुछ सालों में भारतीय सेनाओं में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ी है। आज महिलाएं चिकित्सा सेवाओं से लेकर स्थायी कमीशन और कई महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य कर रही हैं।

ऐसे में सेना के भीतर पेशेवर आचरण, अनुशासन और लैंगिक सम्मान से जुड़े नियमों को लेकर संवेदनशीलता और जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना जाता है। (Army Colonel Sexual Harassment Case)

अग्निवीरों के लिए बड़ी खबर! क्या 25% से ज्यादा जवानों को मिलेगी स्थायी नौकरी? आर्मी चीफ ने दिया बड़ा संकेत

Agniveer Permanent Job Policy
Image Source: PIB/Indian Army

Agniveer Retention Policy: अग्निपथ योजना को लेकर भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक अहम बयान दिया है। 30 जून को रिटायर हो रहे आर्मी चीफ ने कहा है कि अगर जरूरत महसूस हुई तो अग्निवीरों को स्थायी सेवा में रखने का मौजूदा 25 प्रतिशत कोटा बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है।

अपने एक हालिया इंटरव्यू में जनरल द्विवेदी ने अग्निपथ योजना को भारतीय सेना में हुए सबसे बड़े मानव संसाधन सुधारों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि इस योजना का मकसद सेना को अधिक युवा, तकनीक समझने वाली और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार बनाना है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी योजना का पहला पूरा चक्र समाप्त नहीं हुआ है, इसलिए किसी भी बदलाव पर अंतिम फैसला लेने का समय नहीं आया है।

Agniveer Permanent Job Policy: क्या है अग्निपथ योजना?

अग्निपथ योजना की शुरुआत साल 2022 में की गई थी। इसके तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है। भर्ती होने वाले जवानों को अग्निवीर कहा जाता है।

अभी तक की योजना के मुताबिक चार साल की सेवा पूरी होने के बाद इनमें से 25 प्रतिशत अग्निवीरों को नियमित कैडर में शामिल किया जाएगा, जबकि बाकी 75 प्रतिशत अग्निवीरों सेवा से बाहर हो जाएंगे। उन्हें सेवा निधि पैकेज, प्रशिक्षण और विभिन्न प्रमाण पत्र दिए जाते हैं ताकि वे आगे रोजगार या अन्य क्षेत्रों में अवसर प्राप्त कर सकें।

सरकार और सेना का मानना है कि इस मॉडल से सेना की औसत उम्र कम होगी और बल अधिक युवा और फुर्तीला बना रहेगा। (Agniveer Permanent Job Policy)

25 प्रतिशत कोटा बढ़ाने की चर्चा क्यों?

अग्निपथ योजना लागू होने के बाद से सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात को लेकर होती रही है कि केवल 25 प्रतिशत अग्निवीरों को ही स्थायी नौकरी क्यों मिलती है। अब पहली बार सेना प्रमुख ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया है कि यह संख्या भविष्य में बढ़ाई भी जा सकती है।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि फिलहाल 25 प्रतिशत का प्रावधान योजना का हिस्सा है, लेकिन किसी भी सैन्य व्यवस्था की तरह इसमें भी अनुभव के आधार पर बदलाव संभव हैं। उन्होंने कहा कि यदि जमीनी जरूरतें, प्रशिक्षण में होने वाला निवेश और यूनिट स्तर से मिलने वाला अनुभव यह बताता है कि ज्यादा अग्निवीरों को बनाए रखना सेना के हित में होगा, तो उस पर संस्थागत स्तर पर विचार किया जा सकता है। (Agniveer Permanent Job Policy)

किन आधार पर लिया जाएगा फैसला?

आर्मी चीफ के अनुसार किसी भी बदलाव का फैसला भावनाओं या दबाव के आधार पर नहीं होगा। इसके लिए कई पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा।

सबसे पहले देखा जाएगा कि सेना की ऑपरेशनल जरूरत क्या है। यानी भविष्य के युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों के लिए कितने प्रशिक्षित और अनुभवी सैनिकों की आवश्यकता है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ट्रेनिंग पर होने वाला खर्च है। किसी भी जवान को प्रशिक्षित करने में सेना समय, संसाधन और धन खर्च करती है। यदि कोई अग्निवीर चार साल में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है तो उसे बनाए रखना कई मामलों में लाभदायक हो सकता है।

तीसरा पहलू यूनिट और फॉर्मेशन स्तर से मिलने वाला फीडबैक है। सेना यह भी देखेगी कि अग्निवीरों का प्रदर्शन वास्तविक परिस्थितियों में कैसा रहा और उन्होंने यूनिट कल्चर को किस हद तक अपनाया।

आधुनिक युद्ध में बदल रही हैं जरूरतें

जनरल द्विवेदी ने कहा कि आज के युद्ध पहले जैसे नहीं रहे। अब लड़ाई केवल बंदूक और टैंक तक सीमित नहीं है। ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सर्विलांस सिस्टम, साइबर तकनीक और सुरक्षित कम्युनिकेशन आधुनिक युद्ध का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

ऐसे में सेना को ऐसे जवानों की जरूरत है जो नई तकनीक जल्दी सीख सकें और बदलते माहौल में खुद को ढाल सकें। उन्होंने कहा कि अग्निवीर इस दिशा में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और नई तकनीकों को समझने में रुचि दिखा रहे हैं।

किन क्षेत्रों में अनुभवी अग्निवीरों की जरूरत ज्यादा?

सेना प्रमुख ने संकेत दिया कि कुछ तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षित जवानों को लंबे समय तक बनाए रखना अधिक उपयोगी हो सकता है। इनमें एयर डिफेंस, ड्रोन ऑपरेशन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, कम्युनिकेशन नेटवर्क और सर्विलांस से जुड़े क्षेत्र शामिल हैं।

इन क्षेत्रों में किसी जवान को पूरी तरह एक्सपर्ट बनाने में समय लगता है। ऐसे में यदि प्रशिक्षित कर्मी सेवा छोड़ देते हैं तो सेना को नए लोगों को फिर से तैयार करना पड़ता है। यही वजह है कि भविष्य में इन क्षेत्रों के अनुभव को भी ध्यान में रखा जा सकता है। (Agniveer Permanent Job Policy)

अग्निवीरों के प्रदर्शन पर क्या बोले आर्मी चीफ?

जनरल द्विवेदी ने अग्निवीरों के प्रदर्शन को सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि अब तक का अनुभव उत्साहजनक रहा है। उनके अनुसार युवा सैनिकों में सीखने की इच्छा ज्यादा है। वे नई तकनीक को तेजी से अपनाते हैं और अपने दायित्वों को समझने की कोशिश करते हैं। सेना प्रमुख ने कहा कि अग्निपथ योजना का उद्देश्य केवल संख्या कम या ज्यादा करना नहीं है, बल्कि सेना को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है।

सेवा के बाद क्या होगा?

अग्निपथ योजना को लेकर एक बड़ा सवाल हमेशा यह रहा है कि सेवा पूरी करने के बाद बाहर जाने वाले 75 प्रतिशत अग्निवीरों का क्या होगा। इस पर भी आर्मी चीफ ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि जो अग्निवीर चार साल बाद सेना से बाहर जाएंगे, उनके लिए सम्मानजनक अवसर उपलब्ध होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि ऐसे युवाओं के पास अनुशासन, प्रशिक्षण और अनुभव होगा, जिसका उपयोग राष्ट्र निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि जरूरत हुई तो पुनर्वास और रोजगार से जुड़ी व्यवस्थाओं में भी सुधार किया जा सकता है। (Agniveer Permanent Job Policy)

पहला बैच इस साल के आखिर तक

आर्मी चीफ ने जोर देकर कहा कि अग्निपथ योजना अभी अपने शुरुआती चरण में है। पहले बैच के अग्निवीरों की चार साल की सेवा अवधि अभी पूरी नहीं हुई है। इसलिए अभी किसी भी बड़े निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

उन्होंने कहा कि जब पहले बैच का पूरा अनुभव सामने आएगा, तब योजना के विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा। उसी आधार पर आगे की दिशा तय होगी।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहली बार सेना की टॉप लीडरशिप से यह संकेत मिला है कि अग्निवीरों के लिए तय 25 प्रतिशत परमानेंट करने नियम पूरी तरह स्थायी नहीं है और जरूरत पड़ने पर इसकी समीक्षा की जा सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल अग्निपथ योजना को सफल माना जा रहा है और सेना इसके परिणामों का विस्तृत अध्ययन कर रही है। (Agniveer Permanent Job Policy)

आर्मी वेटरंस के हक में हाईकोर्ट का फैसला; मेडिकल बोर्ड की एक लाइन से नहीं रोकी जा सकती पूर्व सैनिक की विकलांगता पेंशन

Army Disability Pension
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Army Disability Pension: देश की सुरक्षा में वर्षों तक सेवा देने वाले सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली विकलांगता पेंशन को लेकर केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर किसी पूर्व सैनिक की विकलांगता पेंशन को रोकना है, तो मेडिकल बोर्ड को इसके पीछे ठोस और विस्तृत कारण बताने होंगे। केवल कुछ शब्द लिखकर या सामान्य टिप्पणी देकर पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक पूर्व सैनिक के मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसका असर उन हजारों पूर्व सैनिकों पर पड़ सकता है, जिनके विकलांगता पेंशन के दावे मेडिकल बोर्ड की संक्षिप्त टिप्पणियों के आधार पर खारिज कर दिए गए थे।

केरल हाईकोर्ट की जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन वाली डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी मेडिकल बोर्ड की राय तभी स्वीकार की जा सकती है जब उसके पीछे पर्याप्त चिकित्सकीय और तथ्यात्मक आधार मौजूद हो। अगर कारण स्पष्ट नहीं हैं, तो ऐसी राय के आधार पर पेंशन रोकना उचित नहीं माना जा सकता। (Army Disability Pension)

Army Disability Pension: क्या था पूरा मामला?

यह मामला पूर्व सैनिक बालामुरली कृष्णा एम से जुड़ा है। उन्होंने नवंबर 2004 में भारतीय सेना जॉइन की थी। लगभग 17 वर्षों तक सेवा देने के बाद नवंबर 2021 में उन्हें सेवा से मुक्त किया गया।

सेना से बाहर आने से पहले उनके स्वास्थ्य की जांच रिलीज मेडिकल बोर्ड ने की। जांच में दो स्वास्थ्य समस्याएं सामने आईं। पहली प्राइमरी हाइपरटेंशन यानी उच्च रक्तचाप और दूसरी मोटापा।

मेडिकल बोर्ड ने हाई ब्लड प्रेशर के लिए 30 प्रतिशत और मोटापे के लिए 5 प्रतिशत विकलांगता मानी। दोनों को मिलाकर कुल विकलांगता 33.5 प्रतिशत आंकी गई।

सामान्य तौर पर इतनी विकलांगता होने पर पूर्व सैनिक विकलांगता पेंशन का दावा कर सकता है। लेकिन यहां विवाद इस बात पर हुआ कि मेडिकल बोर्ड ने इन बीमारियों को सैन्य सेवा से जुड़ा हुआ नहीं माना।

क्या कहा था मेडिकल बोर्ड ने?

मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि हाई ब्लड प्रेशर पीस एरिया में सेवा के दौरान शुरू हुआ था और इसका सेना की ड्यूटी, तनाव या ऊंचाई वाले इलाकों में तैनाती से कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया।

मोटापे को लेकर बोर्ड ने टिप्पणी की कि यह लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्या है। इसलिए दोनों बीमारियों को “न तो सेवा के कारण हुआ और न ही सेवा के कारण बढ़ा” माना गया।

इसी आधार पर पेंशन अधिकारियों ने विकलांगता पेंशन देने से इनकार कर दिया।

ट्रिब्यूनल से भी नहीं मिली राहत

पेंशन नहीं मिलने के बाद बालामुरली कृष्णा ने आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोच्चि स्थित बेंच में याचिका दाखिल की।

हालांकि मार्च 2024 में ट्रिब्यूनल ने उनकी याचिका खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल ने मेडिकल बोर्ड की राय को सही माना और कहा कि सेवा और बीमारी के बीच संबंध साबित नहीं हुआ है।

इसके बाद बालामुरली कृष्णा ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर की। (Army Disability Pension)

हाईकोर्ट ने किन बातों पर जताई आपत्ति?

हाईकोर्ट ने सबसे पहले मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को ध्यान से देखा। अदालत ने पाया कि रिपोर्ट में केवल कुछ सामान्य टिप्पणियां लिखी गई थीं, लेकिन यह नहीं बताया गया था कि आखिर किस आधार पर बीमारी को सेवा से असंबंधित माना गया।

कोर्ट ने कहा कि केवल “पीस एरिया में बीमारी शुरू हुई” लिख देना पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने टिप्पणी की कि सेना की नौकरी सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं होती। पीस एरिया में तैनात सैनिक भी लगातार अनुशासन, जिम्मेदारियों, लंबे कार्य घंटों, परिवार से दूरी और ऑपरेशनल तैयारी जैसी परिस्थितियों से गुजरते हैं। इनका स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है।

इसलिए मेडिकल बोर्ड को यह विस्तार से बताना चाहिए था कि उसने बीमारी और सैन्य सेवा के बीच संबंध क्यों नहीं माना।

“लाइफस्टाइल डिसऑर्डर” लिख देना काफी नहीं

कोर्ट ने मोटापे को लेकर मेडिकल बोर्ड की टिप्पणी पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि किसी बीमारी को केवल “लाइफस्टाइल डिसऑर्डर” बता देना पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। मेडिकल बोर्ड को यह भी बताना चाहिए कि वह इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा।

हाईकोर्ट के अनुसार किसी भी सरकारी अथॉरिटी का फैसला कारणों पर आधारित होना चाहिए। खासकर तब जब उस फैसले का असर किसी व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक अधिकारों पर पड़ रहा हो।

15 साल वाले नियम को भी समझाया

फैसले में अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु भी स्पष्ट किया। सरकार की ओर से कहा गया था कि 2008 के नियमों के अनुसार कुछ मामलों में दावा करने वाले व्यक्ति को खुद यह साबित करना पड़ता है कि बीमारी सेवा से जुड़ी है।

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि यह नियम हर मामले में लागू नहीं होता। अगर कोई पूर्व सैनिक सेवा समाप्त होने के तुरंत बाद या निर्धारित समय सीमा के भीतर दावा करता है, तो प्राथमिक जिम्मेदारी विभाग की होती है कि वह साबित करे कि बीमारी का सेना की सेवा से कोई संबंध नहीं है।

बालामुरली कृष्णा ने समय पर दावा किया था। इसलिए अदालत ने माना कि इस मामले में पूरा बोझ उन पर नहीं डाला जा सकता था। (Army Disability Pension)

सुप्रीम कोर्ट और दूसरे हाईकोर्ट के फैसलों का भी जिक्र

केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के कई पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि पहले भी न्यायालय यह स्पष्ट कर चुके हैं कि मेडिकल बोर्ड की राय अंतिम नहीं मानी जा सकती। यदि उसके पीछे पर्याप्त वजह नहीं हैं तो अदालत उसकी जांच कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विकलांगता पेंशन एक कल्याणकारी योजना है। ऐसे मामलों में नियमों की व्याख्या उदार तरीके से की जानी चाहिए ताकि पूर्व सैनिकों को न्याय मिल सके।

अदालत ने क्या आदेश दिया?

हाईकोर्ट ने आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि बालामुरली कृष्णा विकलांगता पेंशन पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित पेंशन अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर पेंशन से जुड़े दस्तावेजों में आवश्यक संशोधन करें और पेंशन का लाभ प्रदान करें।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि निर्धारित समय में आदेश का पालन नहीं किया गया तो बकाया राशि पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। (Army Disability Pension)

पूर्व सैनिकों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे पूर्व सैनिक हैं, जिनकी विकलांगता पेंशन के दावे यह कहकर खारिज कर दिए जाते हैं कि बीमारी सेवा से संबंधित नहीं है। कई मामलों में मेडिकल बोर्ड केवल कुछ पंक्तियों की टिप्पणी देकर मामला खत्म कर देता है।

केरल हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ संदेश दिया है कि अब केवल औपचारिक टिप्पणी काफी नहीं होगी। मेडिकल बोर्ड को अपने निष्कर्ष के पीछे पूरा चिकित्सकीय और तथ्यात्मक आधार बताना होगा।

इस फैसले से उन पूर्व सैनिकों को भी राहत मिल सकती है जो लंबे समय से अपने पेंशन मामलों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। (Army Disability Pension)

विकलांगता पेंशन क्यों महत्वपूर्ण है?

सेना में सेवा के दौरान जवानों और अधिकारियों को कई तरह की शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

कई बार बीमारी या स्वास्थ्य समस्या सीधे युद्ध क्षेत्र से नहीं बल्कि लगातार तनाव, कठिन जीवनशैली, जिम्मेदारियों और कार्य परिस्थितियों के कारण भी पैदा होती है।

विकलांगता पेंशन ऐसी ही परिस्थितियों में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाई गई व्यवस्था है।

इसी कारण अदालतों ने समय-समय पर कहा है कि इस तरह के मामलों को केवल तकनीकी नजरिए से नहीं बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।

केरल हाईकोर्ट के ताजा फैसले में भी यही कहा गया है कि किसी पूर्व सैनिक के अधिकारों को केवल एक सामान्य मेडिकल टिप्पणी के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। (Army Disability Pension)

Case No: W.P.(C) No.2893/2026

Case Title: Balamurali Krishna M. v. Union of India and Ors.

भारतीय नौसेना के MiG-29K को मिलेगी स्वदेशी ताकत, घातक विदेशी 80mm एयरो रॉकेट को देश में बनाने की तैयारी

Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Image Source: PIB/Indian Navy

Indian Navy 80mm Aero Rocket: भारतीय सेनाएं लगातार डिफेंस सेक्टर में विदेश से आने वाले हथियारों पर से अपनी निर्भरता कम करने पर फोकस कर रही हैं। भारतीय नौसेना ने 80 एमएम एयरो रॉकेट के स्वदेशी डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य इस रॉकेट को पूरी तरह देश में डेवलप करना और निर्मित करना है ताकि भविष्य में इसके लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर नहीं रहना पड़े।

यह रॉकेट भारतीय नौसेना के मिग-29के और मिग-29केयूबी लड़ाकू विमानों से दागा जाता है। अब तक इसकी आपूर्ति विदेशी कंपनियों से होती रही है, लेकिन नौसेना चाहती है कि इसका पूरा उत्पादन भारत में ही हो। इससे न केवल सैन्य जरूरतें समय पर पूरी होंगी बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

Indian Navy 80mm Aero Rocket: क्या है 80 एमएम एयरो रॉकेट?

80 एमएम एयरो रॉकेट एक बिना गाइडेंस वाला एयर-टू-ग्राउंड रॉकेट है। इसका मतलब है कि इसे लक्ष्य की दिशा में दागा जाता है और यह अपने रफ्तार और बैलिस्टिक रूट के आधार पर टारगेट तक पहुंचता है। यह कोई गाइडेड मिसाइल नहीं है, लेकिन युद्ध के मैदान में इसकी उपयोगिता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

भारतीय नौसेना इस रॉकेट का इस्तेमाल जमीन पर मौजूद दुश्मन के ठिकानों, सैन्य वाहनों, रडार स्टेशनों, वेपंस सिस्टम्स और सैनिकों के खिलाफ करती है। इसकी खासियत यह है कि यह आर्मर्ड और सामान्य दोनों तरह के टारगेट्स को नुकसान पहुंचाने में सक्षम है।

दुश्मन के टैंक और रडार पर कर सकता है हमला

इस रॉकेट में होलो-चार्ज फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड लगा होता है। सरल शब्दों में कहें तो यह दो तरह से हमला करता है। पहला, यह टैंक या आर्मर्ड व्हीकल के कवच को भेद सकता है। दूसरा, विस्फोट के बाद इसकी धातु के टुकड़े बड़े इलाके में फैलकर आसपास के टारगेट्स को नुकसान पहुंचाते हैं।

गोवा स्थित नौसेना के नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टरेट की तरफ से जारी ईओआई डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह रॉकेट टैंक, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, रडार इंस्टॉलेशन, लॉन्चर, पार्क किए गए विमान और दुश्मन के सैनिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि इसे नौसेना के लड़ाकू विमानों के लिए एक मल्टीपर्पज हथियार माना जाता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

Indian Navy 80mm Aero Rocket
PM Modi at INS Vikrant Deck. Image Source: PIB/Indian Navy

मिग-29के की स्ट्राइक क्षमता का अहम हिस्सा

भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर तैनात मिग-29के लड़ाकू विमान समुद्र और तटीय इलाकों में हमले की क्षमता रखते हैं। 80 एमएम एयरो रॉकेट इन्हीं विमानों से बी8एम-1 लॉन्चर के जरिए दागा जाता है।

किसी भी युद्ध की स्थिति में लड़ाकू विमान को कम समय में अधिक संख्या में टारगेट नष्ट करने होते हैं। ऐसे में इस तरह के रॉकेट सटीक और कम लागत वाले हथियार का बेहतरीन विकल्प हैं।

आकार छोटा लेकिन मारक क्षमता बड़ी

इस रॉकेट का कैलिबर 80 एमएम है और इसकी लंबाई करीब डेढ़ मीटर से अधिक है। इसका कुल वजन लगभग 11.3 किलोग्राम है, जबकि वॉरहेड का वजन 3.6 किलोग्राम है।

रॉकेट की अधिकतम रफ्तार लगभग 600 मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है। इसकी प्रभावी मारक दूरी 1300 मीटर से लेकर 4000 मीटर तक है। यानी लड़ाकू विमान सुरक्षित दूरी से दुश्मन के टारगेट को हिट कर सकता है।

400 मिमी तक कवच भेदने की क्षमता

इस रॉकेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी होलो-चार्ज तकनीक है। डॉक्यूमेंट के अनुसार यह आदर्श स्थिति में 400 मिमी तक के कवच को भेद सकता है।

युद्ध के दौरान यह क्षमता महत्वपूर्ण होती है क्योंकि दुश्मन के आर्मर्ड व्हीकल और मिलिट्री प्लेटफॉर्म मजबूत सुरक्षा कवच से लैस होते हैं। ऐसे टारगेट्स को नष्ट करने के लिए विशेष प्रकार के हथियारों की आवश्यकता होती है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

विस्फोट के बाद बनते हैं सैकड़ों घातक टुकड़े

रॉकेट के फ्रैगमेंटेशन जैकेट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि विस्फोट के समय यह सैकड़ों धातु के टुकड़ों में टूट जाए। तकनीकी डॉक्यूमेंट के अनुसार इसमें कम से कम 400 फ्रैगमेंट बनते हैं, जिनमें प्रत्येक का वजन लगभग 3 ग्राम होता है।

ये टुकड़े तेजी से से चारों ओर फैलते हैं और बड़े इलाके में नुकसान पहुंचाते हैं। इसी वजह से यह रॉकेट सैनिकों के समूह, हल्के सैन्य ठिकानों और खुले में मौजूद टारगेट्स के खिलाफ भी प्रभावी माना जाता है।

कैसे काम करता है यह रॉकेट?

जब पायलट रॉकेट दागने का आदेश देता है तो विमान से एक इलेक्ट्रिकल सिग्नल रॉकेट तक पहुंचता है। इससे रॉकेट मोटर एक्टिव हो जाती है और सॉलिड फ्यूल जलने लगता है। इसके बाद रॉकेट लॉन्चर से बाहर निकलता है और उसके पीछे लगे फिन खुल जाते हैं, जो उड़ान को स्टेबल बनाए रखते हैं।

उड़ान के लगभग एक से डेढ़ सेकंड बाद इसका फ्यूज एक्टिव हो जाता है। टारगेट से टकराने पर विस्फोट होता है और होलो-चार्ज तथा फ्रैगमेंटेशन प्रभाव पैदा होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

कठिन मौसम में भी कर सकता है काम

नौसेना के लिए विकसित इस रॉकेट को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए बनाया गया है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे माइनस 60 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसके अलावा यह उच्च आर्द्रता और समुद्री वातावरण को भी झेल सकता है। नौसेना के लिए यह जरूरी है क्योंकि समुद्र में तैनाती के दौरान हथियारों को नमक और नमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

15 साल तक सुरक्षित रह सकता है स्टॉक

रॉकेट की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लंबी शेल्फ लाइफ है। डॉक्यूमेंट के अनुसार इसे 15 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इसकी उम्र बढ़ाने की व्यवस्था भी मौजूद है।

यह किसी भी सैन्य बल के लिए अहम है क्योंकि हथियारों का बड़ा भंडार लंबे समय तक स्टोर करके रखना पड़ता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

नौसेना को कितने रॉकेट चाहिए?

ईओआई डॉक्यूमेंट में बताया गया है कि सफल प्रोटोटाइप विकास के बाद नौसेना शुरुआती चरण में 273 हाई एक्सप्लोसिव रॉकेट और 2400 प्रैक्टिस या इनर्ट रॉकेट खरीद सकती है।

प्रैक्टिस रॉकेट ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जबकि हाई एक्सप्लोसिव संस्करण एक्चुअल ऑपरेशन में इस्तेमाल होता है। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

स्वदेशीकरण पर है फोकस

नौसेना ने साफ कहा है कि वर्तमान में 80 एमएम एयरो रॉकेट के लिए कोई स्वदेशी सोर्स उपलब्ध नहीं है और मौजूदा स्टॉक विदेशी ओरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) से खरीदा गया था।

यही वजह है कि अब इस पूरे सिस्टम को देश में डेवलप करने की योजना बनाई गई है। डॉक्यूमेंट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी सब-असेंबली स्वदेशी रूप से डेवलप की जानी चाहिए और किसी विदेशी कंपनी पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए।

नौसेना ने केवल उन्हीं भारतीय कंपनियों को आवेदन करने के लिए कहा है जिनके पास सैन्य स्तर के रॉकेट बनाने का अनुभव हो। चयनित कंपनियों को डिजाइन, अनुसंधान, परीक्षण, प्रमाणन और उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इसके लिए एयरवर्थीनेस सर्टिफिकेशन, गुणवत्ता परीक्षण और कई तकनीकी मानकों को पूरा करना होगा। सफल विकास के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन का रास्ता खुलेगा। (Indian Navy 80mm Aero Rocket)

DFPDS 2026 Explained: आखिर फील्ड कमांडर्स को क्यों मिले दोगुने वित्तीय अधिकार? जानें इससे भारतीय सेना को क्या होगा फायदा?

DFPDS 2026 Explained
Photo Source: Ministry of Defence

DFPDS 2026 Explained: युद्ध केवल टैंकों, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से नहीं जीते जाते। किसी भी सेना की असली ताकत इस बात में होती है कि जरूरत पड़ने पर उसे जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, हथियार, ईंधन और तकनीकी संसाधन कितनी तेजी से मिल पाते हैं। अगर सीमा पर तैनात किसी कमांडर को जरूरी सामान खरीदने के लिए महीनों तक फाइलें दिल्ली भेजनी पड़ें, तो इससे ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित हो सकती है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 4 जून को डिफेंस सर्विसेज के लिए वित्तीय शक्तियों के नए नियम जारी किए हैं। इसे डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स फॉर डिफेंस सर्विसेज (DFPDS-2026) कहा जाता है। नए नियमों के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के फील्ड कमांडरों को पहले के मुकाबले कहीं अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कई मामलों में वित्तीय अधिकारों को 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है, जबकि कुछ श्रेणियों में यह बढ़ोतरी दोगुने से भी अधिक है। सरकार का मानना है कि इससे खरीद प्रक्रिया तेज होगी, निर्णय लेने में समय कम लगेगा और सेनाओं को जरूरत के मुताबिक संसाधन समय पर मिल सकेंगे।

DFPDS 2026 Explained: क्या होते हैं वित्तीय अधिकार?

इसे बहुत आसान भाषा में समझा जाए तो वित्तीय अधिकार का मतलब है कि कोई अधिकारी कितनी राशि तक का खर्च या खरीदारी अपने स्तर पर मंजूर कर सकता है।

मान लीजिए किसी मिलिट्री यूनिट को अचानक स्पेयर पार्ट्स, विशेष उपकरण, संचार प्रणाली या अन्य जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ जाती है। अगर कमांडर के पास पर्याप्त वित्तीय अधिकार हैं, तो वह सीधे खरीद की मंजूरी दे सकता है। लेकिन अगर अधिकार सीमित हैं तो फाइल को कई स्तरों से गुजरना पड़ता है।

यही कारण है कि युद्ध या तनावपूर्ण परिस्थितियों में अधिक वित्तीय अधिकार तेजी से फैसले लेने में मदद करते हैं।

सरकार ने क्यों किया यह बदलाव?

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पिछली बार वित्तीय शक्तियों में बड़ा संशोधन 2021 में किया गया था। उसके बाद सेनाओं का आकार बढ़ा है, ऑपरेशनल जिम्मेदारियां बढ़ी हैं और रक्षा बजट में भी बढ़ोतरी हुई है।

सीमा पर लगातार बदलते सुरक्षा माहौल, आधुनिक वेपन सिस्टम्स के रखरखाव और नई तकनीकों के इस्तेमाल के कारण खर्च भी बढ़ा है। ऐसे में 2021 के नियम कई जगहों पर पर्याप्त नहीं रह गए थे।

इसी वजह से नए सिरे से समीक्षा कर वित्तीय अधिकारों को बढ़ाने का फैसला लिया गया। (DFPDS 2026 Explained)

फील्ड कमांडरों को क्या फायदा मिलेगा?

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ उन अधिकारियों को मिलेगा जो सीधे ऑपरेशनल क्षेत्रों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
पहले कई मामलों में छोटी-छोटी खरीद के लिए भी हेड क्वॉर्टर की मंजूरी लेनी पड़ती थी। अब फील्ड कमांडर अपने स्तर पर अधिक राशि तक खरीदारी कर सकेंगे।

इसका मतलब यह है कि सीमा पर तैनात सैनिकों को जरूरी उपकरण, वाहन स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सामग्री या अन्य संसाधन जल्दी मिल सकेंगे।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में समय सबसे महत्वपूर्ण संसाधन होता है। अगर फैसले लेने में देरी होती है तो उसका असर ऑपरेशनल क्षमता पर पड़ता है।

1.25 लाख करोड़ रुपये की खरीद का क्या मतलब है?

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि नए वित्तीय अधिकारों के जरिए चालू वित्तीय वर्ष के बजट के अनुसार 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

यह राशि रेवेन्यू रूट के तहत खर्च की जाएगी। रेवेन्यू रूट का मतलब उन खर्चों से है जो रोजमर्रा की सैन्य जरूरतों, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत, गोला-बारूद और अन्य संचालन संबंधी जरूरतों पर किए जाते हैं।

इस फैसले से बड़ी संख्या में खरीद प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी मिल सकेगी। (DFPDS 2026 Explained)

आत्मनिर्भर भारत को कैसे मिलेगा फायदा?

नए नियमों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वदेशीकरण और अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तीय शक्तियों को दोगुना कर दिया गया है। इसका सीधा संबंध आत्मनिर्भर भारत अभियान से है।

पिछले कुछ सालों से सरकार लगातार यह कोशिश कर रही है कि भारतीय सेनाएं विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करें और अधिक से अधिक उपकरण देश में ही विकसित और निर्मित किए जाएं।

अब मिलिट्री यूनिट्स और कमांडरों के पास स्वदेशी उत्पादों और तकनीकों की खरीद के लिए अधिक अधिकार होंगे।

इससे रक्षा क्षेत्र में काम कर रहे स्टार्टअप, एमएसएमई, निजी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों को भी फायदा मिल सकता है।

विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश

कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों के लिए भारत अभी भी विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं पर निर्भर है। जब कोई उपकरण विदेश से आता है तो उसके स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव और तकनीकी सहायता के लिए भी उसी देश या कंपनी पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार चाहती है कि ऐसी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो।

नए वित्तीय अधिकार इसी दिशा में एक कदम माने जा रहे हैं क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर विकसित तकनीकों और उत्पादों की खरीद आसान होगी। (DFPDS 2026 Explained)

जॉइंट प्रोक्योरमेंट सिस्टम को बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय ने इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त खरीद को बढ़ावा देने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को कुछ समान प्रकार के उपकरणों की जरूरत होती है। पहले कई बार अलग-अलग खरीद प्रक्रिया चलती थी।

अब जिस सेवा को लीड सर्विस बनाया जाएगा, उसे ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे ताकि वह सभी के लिए संयुक्त खरीद कर सके। इससे समय की बचत होगी और लागत भी कम हो सकती है। (DFPDS 2026 Explained)

2021 में क्या हुए थे बदलाव?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इससे पहले सितंबर 2021 में रक्षा सेवाओं के वित्तीय अधिकारों में बड़ा बदलाव किया था। उस समय भी सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को पहले के मुकाबले ज्यादा वित्तीय शक्तियां दी गई थीं।

2021 में ज्यादातर कंपीटेंट फाइनेंशियल अथॉरिटीज (सीएफए) के अधिकार दोगुने कर दिए गए थे। यानी जो अधिकारी पहले एक निश्चित सीमा तक खरीदारी या खर्च की मंजूरी दे सकते थे, उन्हें उससे दोगुनी राशि तक फैसला लेने का अधिकार मिल गया था।

इसके अलावा, कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के फील्ड कमांडरों को कुछ मामलों में पांच से दस गुना तक अधिक वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, ताकि ऑपरेशनल जरूरतों को तेजी से पूरा किया जा सके।

उसी दौरान स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय अधिकारों को तीन गुना तक बढ़ाया गया था। इसका उद्देश्य विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करना और देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना था।

वहीं, वाइस चीफ स्तर के अधिकारियों की वित्तीय सीमा भी बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। (DFPDS 2026 Explained)

2021 और 2026 के नियमों में क्या अंतर है?

2021 में ज्यादातर अधिकारियों के वित्तीय अधिकार दोगुने किए गए थे। अब 2026 में इन्हें फिर से 100 फीसदी तक बढ़ाया गया है। कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी दो गुने से भी ज्यादा है। इससे अधिकारी पहले की तुलना में अधिक राशि की खरीद और मंजूरी खुद दे सकेंगे।

2021 में कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर के कमांडरों को ऑपरेशनल जरूरतों के लिए 5 से 10 गुना तक अधिक वित्तीय अधिकार दिए गए थे।

अब 2026 में इन शक्तियों को और बढ़ा दिया गया है। सीमा पर तैनात कमांडर आपात जरूरतों के लिए पहले से ज्यादा तेजी से खरीदारी कर सकेंगे।

वहीं, 2021 में स्वदेशी रक्षा उपकरणों और अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) परियोजनाओं के लिए वित्तीय सीमा तीन गुना तक बढ़ाई गई थी।

2026 में इन अधिकारों को फिर से दोगुना कर दिया गया है। इसका मतलब है कि 2016 की तुलना में अब स्वदेशीकरण और रक्षा अनुसंधान के लिए उपलब्ध वित्तीय शक्तियां कई गुना बढ़ चुकी हैं। इससे भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स और रक्षा उद्योग को फायदा मिलेगा।

2021 में सेना, नौसेना और वायुसेना के वाइस चीफ की वित्तीय सीमा बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई थी। 2026 के दस्तावेज में अलग से नई सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन कुल वित्तीय अधिकारों में हुई बढ़ोतरी का लाभ इस स्तर के अधिकारियों को भी मिलेगा।

2021 में नौसेना और वायुसेना को भी वे विशेष वित्तीय शक्तियां दी गई थीं, जो पहले मुख्य रूप से सेना के पास थीं। 2026 में तीनों सेनाओं के कमांडरों के लिए इन विशेष अधिकारों को और बढ़ा दिया गया है। आपातकालीन और ऑपरेशनल जरूरतों के लिए उपलब्ध कुल वित्तीय सीमा भी दोगुनी कर दी गई है।

2021 में संयुक्त खरीद की व्यवस्था सीमित स्तर पर मौजूद थी। वहीं, अब 2026 में नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके तहत यदि किसी उपकरण की खरीद तीनों सेनाओं के लिए एक साथ करनी हो तो जिस सेवा को लीड एजेंसी बनाया जाएगा, उसे सामान्य से अधिक वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे। इससे संयुक्त खरीद प्रक्रिया तेज होगी और समय की बचत होगी।

2021 में कुछ नए अधिकारियों को वित्तीय अधिकार दिए गए थे। 2026 में और अधिक अधिकारियों को सक्षम वित्तीय प्राधिकरण (सीएफए) बनाया गया है। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया ज्यादा विकेंद्रीकृत होगी और छोटे-छोटे मामलों के लिए फाइलें ऊपर नहीं भेजनी पड़ेंगी।

2021 में फील्ड कमांडरों को सीमित स्तर पर तुरंत खरीद की सुविधा मिली थी। 2026 में सरकार का अनुमान है कि 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद प्रक्रिया को फील्ड स्तर पर ही गति मिल सकेगी। इससे सेनाओं को जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और सेवाएं समय पर मिल पाएंगी। (DFPDS 2026 Explained)

क्या इससे युद्धकालीन तैयारी बेहतर होगी?

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी सैन्य बल की तैयारी केवल हथियारों की संख्या से तय नहीं होती। महत्वपूर्ण यह भी होता है कि जरूरत पड़ने पर मरम्मत, रखरखाव और पुनः आपूर्ति कितनी तेजी से हो सकती है।

यदि फील्ड कमांडरों को पर्याप्त अधिकार हों तो वे तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक सेनाएं निर्णय प्रक्रिया को अधिक डिसेंट्रलाइजेशन बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। (DFPDS 2026 Explained)

डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 से क्या है संबंध?

रक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर 2025 में संशोधित डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल जारी किया था। उसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना था। अब वित्तीय अधिकारों में यह नया संशोधन उसी प्रक्रिया को और मजबूत बनाता है।

एक तरफ खरीद के नियमों को आसान बनाया गया है और दूसरी तरफ खरीद को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की शक्तियां बढ़ाई गई हैं। दोनों कदम मिलकर रक्षा खरीद प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम करेंगे। (DFPDS 2026 Explained)

कौन है दुनिया के सबसे खतरनाक एयर डिफेंस सिस्टम S-400 का बॉडीगार्ड? जानें भारत को क्यों है जरूरत

S-400 Bodyguard Pantsir System
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S-400 Bodyguard Pantsir System: भारत को अपना चौथा एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 मिल गया है। भारत और रूस के बीच साल 2018 में पांच एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद का समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत को कुल पांच स्क्वाड्रन मिलने हैं। भारतीय वायुसेना ने रूस निर्मित एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम को “सुदर्शन चक्र” नाम दिया है। यह दुनिया के सबसे आधुनिक और लंबी दूरी तक मार करने वाले एयर डिफेंस सिस्टमों में गिना जाता है। इसकी क्षमता इतनी ज्यादा है कि यह सैकड़ों किलोमीटर दूर उड़ रहे लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल और निगरानी विमानों को निशाना बना सकता है।

लेकिन चाहे कोई भी हथियार कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसकी सुरक्षा के लिए भी एक सुरक्षा कवच की जरूरत होती है। यही वजह है कि रूस अपनी एस-400 बैटरियों को अकेले तैनात नहीं करता। इनके साथ हमेशा एक विशेष शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम लगाया जाता है, जिसका नाम है पेंटसिर-एस1 या पेंटसिर-एस1एम।

इसी वजह से दुनिया भर के सैन्य विश्लेषक पेंटसिर को एस-400 का “बॉडीगार्ड” कहते हैं।

S-400 Bodyguard Pantsir System: आखिर एस-400 को क्यों पड़ती है बॉडीगार्ड की जरूरत?

पहली नजर में यह सवाल अजीब लग सकता है कि जब एस-400 खुद 400 किलोमीटर दूर तक टारगेट को मार सकता है, तो उसे सुरक्षा की क्या जरूरत है।

दरअसल आधुनिक युद्ध में खतरे केवल लड़ाकू विमानों या बड़ी मिसाइलों से नहीं आते। पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्ष और हाल के सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलें भी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बन सकते हैं।

ऐसे हथियार बहुत कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और कई बार रडार की पकड़ से बचने की कोशिश करते हैं। यदि इनमें से कोई हथियार एस-400 की बैटरी, उसके रडार या कमांड सेंटर तक पहुंच जाए तो पूरे एयर डिफेंस नेटवर्क को नुकसान हो सकता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

क्या है पेंटसिर सिस्टम?

पेंटसिर रूस का ही बनाया हुआ एक शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे केबीपी इंस्ट्रूमेंट डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मिसाइल और गन दोनों लगे होते हैं। यानी यह दो तरह से हमला कर सकता है।

वहींस, पेंटसिर कोई एस-400 की तरह बड़ा एयर डिफेंस सिस्टम नहीं है। यह एक छोटा लेकिन बेहद तेज शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे आमतौर पर एक कॉम्बैट व्हीकल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यानी पूरा सिस्टम एक ट्रक पर लगा होता है और जरूरत पड़ते ही कुछ मिनटों में कार्रवाई शुरू कर सकता है।

एक पेंटसिर यूनिट में 12 मिसाइलें लगी होती हैं, जो लॉन्च के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। ये मिसाइलें हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लॉयटरिंग म्यूनिशन जैसे लक्ष्यों को मार सकती हैं। इसकी मारक क्षमता लगभग 20 किलोमीटर तक होती है।

मिसाइलों के अलावा पेंटसिर में दो शक्तिशाली 30 मिमी ऑटोमैटिक गन भी लगी होती हैं। ये गन प्रति मिनट लगभग 5,000 राउंड फायर कर सकती हैं और करीब 4 किलोमीटर तक के टारगेट्स को हिट कर सकती हैं। किसी ड्रोन या मिसाइल के बहुत करीब आने पर ये गन तुरंत एक्टिव हो जाती हैं।

पेंटसिर की एक और खासियत यह है कि यह एक समय में कई हवाई खतरों पर नजर रख सकता है और लगभग 4 टारगेट्स को एक साथ निशाना बना सकता है। पूरे सिस्टम को चलाने के लिए आमतौर पर तीन लोगों की जरूरत होती है, जिनमें एक ड्राइवर और दो ऑपरेटर शामिल होते हैं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 में जहां “स्क्वाड्रन” शब्द इस्तेमाल होता है, वहीं पेंटसिर के लिए आमतौर पर “बैटरी” शब्द इस्तेमाल किया जाता है। एक बैटरी में आमतौर पर 4 से 6 पेंटसिर व्हीकल्स होते हैं। इनके साथ एक कमांड वाहन, मिसाइल री-लोडिंग वाहन और अन्य सहायक उपकरण भी तैनात किए जाते हैं।

अगर किसी बैटरी में 6 पेंटसिर वाहन हों, तो उसके पास कुल 72 मिसाइलें और 12 ऑटोमैटिक गन उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि यह छोटी दूरी की हवाई सुरक्षा के लिए बेहद प्रभावी माना जाता है।

भारत में पेंटसिर सिस्टम को एस-400 की सुरक्षा के लिए देखा जा रहा है। इसका मुख्य काम एस-400 के रडार, कमांड पोस्ट और लॉन्चरों को ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों और अन्य नजदीकी हवाई खतरों से बचाना होगा। इसी कारण इसे अक्सर एस-400 का “बॉडीगार्ड” कहा जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो एस-400 दूर बैठे दुश्मन को मारता है, जबकि पेंटसिर उन खतरों को खत्म करता है जो एस-400 के बहुत करीब पहुंच जाते हैं। दोनों मिलकर एक मजबूत और बहुस्तरीय हवाई सुरक्षा कवच तैयार करते हैं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

DAC S-400 India Approval
Pic Source- IAF Disha

ड्रोन वॉरफेयर में बढ़ी जरूरत

कुछ साल पहले तक एयर डिफेंस सिस्टम मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों और बड़ी मिसाइलों के खिलाफ बनाए जाते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज हजारों डॉलर की कीमत वाला एक छोटा ड्रोन करोड़ों रुपये के मिलिट्री सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध में कई बार ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें सस्ते एफपीवी ड्रोन ने टैंक, रडार और सैन्य वाहनों को निशाना बनाया। यही कारण है कि बड़े एयर डिफेंस सिस्टमों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सुरक्षा परत की जरूरत महसूस की जाने लगी। वहीं, पेंटसिर इसी जरूरत को पूरा करता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 और पेंटसिर मिलकर कैसे बनाते हैं सुरक्षा कवच?

सैन्य भाषा में इसे “लेयर्ड एयर डिफेंस” कहा जाता है। इसका मतलब है कि दुश्मन के हमले को रोकने के लिए सुरक्षा की कई परतें बनाई जाएं। सबसे बाहरी परत एस-400 की होती है।

यह 40 किलोमीटर से लेकर 400 किलोमीटर तक की दूरी पर दुश्मन के बड़े टारगेटों को निशाना बनाता है।

इसके बाद मध्यम दूरी वाले सिस्टम काम करते हैं। सबसे अंदर की सुरक्षा परत पेंटसिर संभालता है। यदि कोई ड्रोन, क्रूज मिसाइल या अन्य हथियार सभी परतों को पार करके अंदर तक पहुंच जाए तो पेंटसिर उसे लास्ट फेज में नष्ट करने का प्रयास करता है। इसलिए इसे एस-400 का निजी सुरक्षा गार्ड भी कहा जाता है।

रूस कैसे करता है अपनी एस-400 साइटों की सुरक्षा?

रूस लंबे समय से इस रणनीति का उपयोग कर रहा है। सीरिया में रूसी एयरबेसों की सुरक्षा के दौरान एस-400 और पेंटसिर को एक साथ तैनात किया गया था। यूक्रेन युद्ध के दौरान भी कई एस-400 बैटरियों के आसपास पेंटसिर सिस्टम देखे गए।

इनका मुख्य काम एस-400 के रडार, कमांड पोस्ट और लॉन्चर वाहनों को छोटे लेकिन खतरनाक हवाई खतरों से बचाना था। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

S-400 Bodyguard Pantsir System
Pantsir S1M Air Defence System

भारत ने पेंटसिर खरीदने में दिखाई रुचि

भारत ने 2018 में रूस के साथ एस-400 की खरीद का समझौता किया था। इसके तहत पांच स्क्वाड्रन भारत को मिलने थे। इनमें से तीन स्क्वाड्रन पहले ही भारतीय वायुसेना को मिल चुके हैं। वहीं, चौथा स्क्वाड्रन हाल ही में भारत पहुंचा है। इसके पांच और अतिरिक्त स्क्वाड्रन भारत ने ऑर्डर किए हैं, जिन्हें रक्षा मंत्रालय से भी मंजूरी मिल चुकी है।

वहीं, हाल के सालों में ड्रोन खतरों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पश्चिमी सीमा और उत्तरी सीमा दोनों क्षेत्रों में ड्रोन, स्वार्म अटैक और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हथियारों का खतरा बढ़ा है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इसी वजह से भारतीय वायुसेना ने एस-400 बैटरियों की नजदीकी सुरक्षा के लिए पेंटसिर जैसे सिस्टम में रुचि दिखाई है। भारत ने अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए रूस से 13 पेंटसिर-एस1 एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद का प्रस्ताव रखा है। इनमें से 10 सिस्टम भारतीय वायुसेना को दिए जाने की योजना है, जिनका मुख्य काम एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की सुरक्षा करना होगा। वहीं 3 सिस्टम भारतीय थलसेना को मिल सकते हैं, जिन्हें सीमा क्षेत्रों में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों से निपटने के लिए तैनात किया जाएगा।

इस प्रस्ताव को मार्च 2026 में रक्षा खरीद बोर्ड (डीपीबी) ने मंजूरी दी थी। इसके बाद रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने भी इसके लिए “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी आवश्यकता की औपचारिक स्वीकृति दे दी। इसी दौरान एस-400 के लिए अतिरिक्त 288 मिसाइलों की खरीद के प्रस्ताव के साथ पेंटसिर सिस्टम को भी शामिल किया गया। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

इस परियोजना पर काम पहले से चल रहा था। साल 2024 में भारत की भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और रूस की रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तखत किए थे।

खरीद प्रक्रिया को तेज करने के लिए फास्ट-ट्रैक रूट अपनाया गया है, ताकि सिस्टम जल्द से जल्द भारतीय सेनाओं को मिल सकें। योजना के अनुसार शुरुआती कुछ पेंटसिर सिस्टम सीधे रूस से आयात किए जाएंगे। इसके बाद आने वाले सिस्टम भारत में ही “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम के तहत बीडीएल और अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों की भागीदारी से बनाए जा सकते हैं।

फिलहाल अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर और सिस्टम की डिलीवरी का इंतजार किया जा रहा है। पेंटसिर सिस्टम को एस-400 की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा परत माना जा रहा है, क्योंकि यह ड्रोन, कामिकाजे ड्रोन, क्रूज मिसाइल और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अन्य हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन और कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों ने एयर डिफेंस की नई चुनौतियों को सामने रखा। लंबी दूरी वाले सिस्टम अपने काम में सफल रहे, लेकिन छोटे और तेजी से बदलते टारगेटों के खिलाफ एक अतिरिक्त सिक्योरिटी लेयर की जरूरत महसूस की गई।

इसी के चलते पेंटसिर की खरीद को लेकर चर्चा शुरू हुई। हालांकि भारत पहले से ही मल्टीलेवल एयर डिफेंस नेटवर्क डेवलप कर रहा है। इसमें एस-400, आकाश, एमआरएसएएम, क्यूआरएसएएम और दूसरे सिस्टम्स भी शामिल हैं।

वहीं, पेंटसिर को इस नेटवर्क की सबसे अंदरूनी सुरक्षा परत के रूप में देखा जा रहा है। यह उन टारगेटों को रोकने का काम करेगा जो अन्य परतों को पार करके बेहद करीब पहुंच जाएं। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

एस-400 के एक स्क्वाड्रन में कितने लॉन्चर

भारतीय वायुसेना के एस-400 सिस्टम की एक स्क्वाड्रन में कुल 12 लॉन्चर होते हैं। यह स्क्वाड्रन दो बैटरियों में बंटी होती है और हर बैटरी में 6-6 लॉन्चर लगाए जाते हैं। इस तरह एक स्क्वाड्रन में कुल 12 लॉन्चर तैनात रहते हैं।

हर लॉन्चर में एक समय पर 4 मिसाइलें तैयार रखी जा सकती हैं। यानी 12 लॉन्चरों में कुल 48 मिसाइलें तुरंत दागने के लिए तैयार रहती हैं।

एक एस-400 स्क्वाड्रन के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें होती हैं। इसमें करीब 256 मिसाइलों का स्टॉक रखा जाता है। इनमें अलग-अलग दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें शामिल होती हैं। 40N6E मिसाइल लगभग 400 किलोमीटर दूर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है, 48N6E3 की मारक क्षमता करीब 240 किलोमीटर है, जबकि 9M96E2 मिसाइल करीब 120 किलोमीटर तक के हवाई खतरों को नष्ट कर सकती है। जरूरत के अनुसार अलग-अलग मिसाइलों का इस्तेमाल किया जाता है। (S-400 Bodyguard Pantsir System)

रडार नेटवर्क है एस-400 की ताकत

एस-400 की ताकत सिर्फ उसकी मिसाइलें नहीं हैं, बल्कि उसका रडार नेटवर्क भी है। इसका 92N6E “ग्रेव स्टोन” रडार लगभग 600 किलोमीटर दूर तक हवाई गतिविधियों पर नजर रख सकता है। इसके अलावा 30K6E कमांड पोस्ट पूरे सिस्टम का दिमाग होता है, जो रडार से मिली जानकारी का विश्लेषण करके लॉन्चरों को निर्देश देता है। इसके साथ सर्च रडार, एंगेजमेंट रडार और कई सपोर्ट वाहन भी तैनात रहते हैं।

एक पूरे एस-400 स्क्वाड्रन में लॉन्चर, रडार, कमांड वाहन और रीलोडिंग ट्रकों सहित लगभग 16 प्रमुख वाहन होते हैं। यह पूरी यूनिट बहुत तेजी से काम शुरू कर सकती है और आमतौर पर 5 से 10 मिनट के भीतर ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक एस-400 स्क्वाड्रन एक साथ 36 अलग-अलग एरियल टारगेट्स पर नजर रखकर उन्हें निशाना बना सकती है। यही वजह है कि इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली एयर डिफेंस सिस्टमों में गिना जाता है।

भारत ने रूस से कुल 5 एस-400 स्क्वाड्रन खरीदी हैं। इसका मतलब है कि पूरी डील के तहत भारतीय वायुसेना को कुल 60 लॉन्चर मिलने हैं। ताकि इन्हें जरूरत के अनुसार पाकिस्तान या चीन सीमा के अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से तैनात किया जा सके। (S-400 Bodyguard Pantsir System)