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रेड कॉरिडोर से विकास के गलियारे तक: कैसे खत्म हुआ 50 साल का नक्सल संकट

Naxalism End in India

Naxalism End in India: भारत सरकार ने औपचारिक तौर पर यह घोषणा कर दी है कि देश में नक्सल समस्या यानी लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म (एलडब्ल्यूई) अब खत्म हो चुकी है। यह वही समस्या थी जिसने करीब पांच दशक तक देश के आदिवासी इलाकों, खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को आतंक के साये में रखा था।

इस आंदोलन की शुरुआत साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी, जहां जमीन और अधिकारों को लेकर एक किसान विद्रोह हुआ था। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक बड़े सशस्त्र संघर्ष में बदल गया, जिसने देश के कई हिस्सों में हिंसा और अस्थिरता पैदा की।

लेकिन अब सरकार का कहना है कि यह समस्या केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नहीं, बल्कि विकास और जनकल्याण योजनाओं के जरिए धीरे-धीरे खत्म की गई है।

Naxalism End in India: सुरक्षा के साथ विकास पर भी बराबर ध्यान

सरकार ने 2014 के बाद अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। पहले नक्सल समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा माना जाता था, लेकिन बाद में इसे विकास की कमी से जुड़ी समस्या के रूप में भी देखा गया।

यही वजह रही कि सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और बैंकिंग सेवाओं को तेजी से बढ़ाया गया। जिन इलाकों में पहले सरकारी पहुंच बेहद कम थी, वहां धीरे-धीरे प्रशासन की मौजूदगी बढ़ाई गई।

जंगलों तक पहुंची स्वास्थ्य सुविधाएं

छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर जैसे इलाकों में लंबे समय तक स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं। लोगों को इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था या फिर पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना पड़ता था।

इस स्थिति को बदलने के लिए जगदलपुर में 240 बेड का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया गया। इसके अलावा बीजापुर और सुकमा में फील्ड हॉस्पिटल तैयार किए गए, जिससे संघर्ष वाले इलाकों में ही इलाज की सुविधा मिल सके।

इनके साथ ही छह और फील्ड हॉस्पिटल को अपग्रेड किया गया। इसका असर यह हुआ कि 2017 के बाद से करीब 67,500 मरीजों का इलाज इन सुविधाओं के जरिए किया गया।

ग्रामीण स्तर पर भी स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत की गई। मितानिन प्रोग्राम के तहत 70,000 से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स को तैयार किया गया, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और आदिवासी समुदाय से थीं।

शहरी क्षेत्रों में महिला आरोग्य समितियों ने भोजन, सफाई और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों पर काम किया। 12,927 हेल्थ कैंप लगाए गए, जिसका फायदा 7.66 लाख से ज्यादा लोगों को मिला।

गांव-गांव तक पहुंचीं बैंकिंग सेवाएं

नक्सल प्रभावित इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या थी। लोग कर्ज के लिए साहूकारों पर निर्भर रहते थे, जो उनका आर्थिक शोषण करते थे।

इस स्थिति को बदलने के लिए पोस्ट ऑफिस और बैंकिंग नेटवर्क का विस्तार किया गया। 6,025 नए पोस्ट ऑफिस खोले गए, जहां बैंकिंग सुविधाएं भी दी जाने लगीं।

इसके अलावा 1,804 बैंक ब्रांच और 1,321 एटीएम शुरू किए गए। सबसे अहम कदम था 75,000 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट्स की नियुक्ति, जो गांव-गांव जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देने लगे। इससे लोगों को बचत, बीमा और सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे मिलने लगा। (Naxalism End in India)

शिक्षा ने बदली तस्वीर

नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा की कमी लंबे समय तक एक बड़ी समस्या रही। कई गांवों में स्कूल ही नहीं थे या बच्चों को पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता था। 2014 के बाद इस दिशा में तेजी से काम किया गया। अब तक 9,303 नए स्कूल बनाए गए। आदिवासी बच्चों के लिए एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल शुरू किए गए, जिनमें से 179 स्कूल अब पूरी तरह से चालू हैं। यहां बच्चों को रहने और पढ़ने दोनों की सुविधा मिलती है।

इसके अलावा 11 केंद्रीय विद्यालय और 6 नवोदय विद्यालय भी शुरू किए गए, जिससे बेहतर शिक्षा की पहुंच बढ़ी।

अब जमीन पर दिखने लगीं सरकारी योजनाएं

पहले जिन इलाकों में सरकारी योजनाएं पहुंच ही नहीं पाती थीं, वहां अब तेजी से काम हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर पाने वाले लोगों की संख्या एक साल में काफी बढ़ी। 2024 में जहां 92,847 लोगों को घर मिले थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,54,045 हो गई।

मनरेगा में भी लोगों की भागीदारी बढ़ी। 2024 में 8.19 लाख लोग जुड़े थे, जो 2025 में बढ़कर 9.87 लाख हो गए। वहीं अब इन इलाकों में प्रशासन की सक्रिय भागीदारी भी बढ़ी है। (Naxalism End in India)

सड़क, मोबाइल और रेल से जुड़े इलाके

नक्सल प्रभावित इलाकों की सबसे बड़ी समस्या थी उनका अलग-थलग होना। इसे खत्म करने के लिए बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया गया। अब तक 17,500 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई गईं। मोबाइल कनेक्टिविटी भी बढ़ाई गई। करीब 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए, जिनमें से 2,343 को 4जी में अपग्रेड किया गया।

रेलवे कनेक्टिविटी भी धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है। दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर रेल लाइन तैयार हो चुकी है। रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर का काम पूरा किया गया है। इसके अलावा दंतेवाड़ा से तेलंगाना के मुनुगुरु तक नई रेल लाइन के लिए सर्वे किया जा रहा है। (Naxalism End in India)

लोकतंत्र में बढ़ी भागीदारी

नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले चुनावों का बहिष्कार आम बात थी। कई जगहों पर लोगों को वोट डालने से रोका जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। बस्तर में 2019 के मुकाबले 2024 में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। इसी तरह कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में भी मतदान में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

बाल विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी काम हुआ है। बालोद जिला पूरी तरह बाल विवाह मुक्त घोषित किया गया। वन अधिकार कानून के तहत आदिवासी परिवारों को जमीन के अधिकार दिए गए, जिससे उनकी भागीदारी और भरोसा बढ़ा। (Naxalism End in India)

दो मोर्चों पर साथ-साथ चला अभियान

इस पूरे बदलाव के पीछे एक बड़ी रणनीति रही, जिसमें सुरक्षा और विकास दोनों को साथ लेकर चला गया। एक तरफ सुरक्षा बलों ने जंगलों में ऑपरेशन चलाए, वहीं दूसरी तरफ गांवों में सड़क, स्कूल, अस्पताल और बैंकिंग जैसी सुविधाएं पहुंचाई गईं। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और सरकारी योजनाओं का असर जमीन पर दिखने लगा। देश के जिन इलाकों को कभी “रेड कॉरिडोर” कहा जाता था, वहां अब प्रशासन, विकास और लोकतंत्र की मौजूदगी साफ नजर आने लगी है। (Naxalism End in India)

स्टेल्थ फ्रिगेट से लेकर एंटी-सबमरीन शिप तक, भारतीय नौसेना को मिले ‘दुनागिरी’, ‘संशोधक’ और ‘अग्रय’

Indian Navy new ships- Delivery of Agray
Delivery of Agray

Indian Navy new ships: भारतीय नौसेना को एक साथ तीन नए स्वदेशी जहाज मिले हैं, जिससे समुद्री सुरक्षा और ऑपरेशनल क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ है। कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान स्टेल्थ फ्रिगेट ‘दुनागिरी’, सर्वे वेसल ‘संशोधक’ और एंटी-सबमरीन वारफेयर शिप ‘अग्रय’ को नौसेना को सौंपे गए।

Indian Navy new ships: स्टेल्थ फ्रिगेट ‘दुनागिरी’ की डिलीवरी

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण ‘दुनागिरी’ रहा, जो प्रोजेक्ट 17ए (Project 17A) के तहत बनने वाला एक एडवांस स्टेल्थ फ्रिगेट है। यह नीलगिरी क्लास का पांचवां जहाज है और इसी श्रेणी का दूसरा जहाज है जिसे जीआरएसई ने बनाया है।

यह जहाज भारतीय नौसेना के पुराने आईएनएस दुनागिरी का नया अवतार माना जा रहा है, जिसने 1977 से 2010 तक करीब 33 साल सेवा दी थी।

Indian Navy new ships- Delivery of Dunagiri
Delivery of Dunagiri

नए दुनागिरी में आधुनिक डिजाइन, कम रडार सिग्नेचर यानी स्टेल्थ क्षमता, बेहतर फायरपावर और ऑटोमेशन सिस्टम दिए गए हैं। इसे इस तरह तैयार किया गया है कि यह समुद्र में अलग-अलग तरह के मिशन आसानी से पूरा कर सके।

इस जहाज में ब्रह्मोस एंटी-शिप मिसाइल, एडवांस रडार सिस्टम और एंटी-सबमरीन हथियार लगाए गए हैं, जिससे यह सतह और पानी के नीचे दोनों तरह के खतरों से निपट सकता है।

दुनागिरी को भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है। इसमें इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे जहाज बनाने का समय कम हुआ है।

इस जहाज में डीजल इंजन और गैस टरबाइन का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल किया गया है, जिसे सीओडीओजी (कम्बाइंड डीजल या गैस) प्रोपल्शन कहा जाता है। इसके साथ ही इसमें इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है, जो जहाज के अलग-अलग सिस्टम को कंट्रोल करता है।

दुनागिरी में करीब 75 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा एमएसएमई कंपनियों ने हिस्सा लिया है। (Indian Navy new ships)

सर्वे वेसल ‘संशोधक’ भी शामिल

दूसरा महत्वपूर्ण जहाज ‘संशोधक’ है, जो एक बड़ा सर्वे वेसल है। यह चार जहाजों की उस सीरीज का आखिरी जहाज है, जिसका कॉन्ट्रैक्ट 2018 में साइन हुआ था। इससे पहले इसी श्रेणी के तीन जहाज नौसेना में शामिल हो चुके हैं।

संशोधक का काम समुद्र के अंदर और तटीय इलाकों का सर्वे करना है। यह जहाज समुद्र की गहराई, रास्तों और नेविगेशन चैनल्स की जानकारी जुटाता है, जिससे जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सके।

Indian Navy new ships- Delivery of Sanshodhak
Delivery of Sanshodhak

यह जहाज ओशनोग्राफिक और जियोफिजिकल डेटा भी जुटाता है, जिसका इस्तेमाल रक्षा और सिविल दोनों क्षेत्रों में होता है। इसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

संशोधक करीब 3400 टन वजनी और 110 मीटर लंबा जहाज है। इसमें आधुनिक हाइड्रोग्राफिक उपकरण लगाए गए हैं, जिसमें डेटा एक्विजिशन सिस्टम, ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल और डिजिटल सोनार सिस्टम शामिल हैं। यह जहाज 18 नॉट्स से ज्यादा की स्पीड से चल सकता है। (Indian Navy new ships)

एंटी-सबमरीन शिप ‘अग्रय’ भी सौंपा

तीसरा जहाज ‘अग्रय’ है, जो अर्नाला क्लास का एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है। यह इस श्रेणी का चौथा जहाज है। इस जहाज को खास तौर पर समुद्र के कम गहराई वाले इलाकों में पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह करीब 77 मीटर लंबा जहाज है और इसे वॉटरजेट प्रोपल्शन से चलाया जाता है।

Indian Navy new ships- Delivery of Agray
Delivery of Agray

अग्रय में लाइटवेट टॉरपीडो, रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सोनार सिस्टम लगाए गए हैं। ये सिस्टम समुद्र के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों को ढूंढने और उन पर हमला करने में मदद करते हैं। यह जहाज तटीय निगरानी और माइन वारफेयर में भी अहम भूमिका निभाता है।

अग्रय भी भारतीय नौसेना के पुराने जहाज का नया रूप है, जिससे परंपरा और तकनीक दोनों का मेल देखने को मिलता है। (Indian Navy new ships)

स्वदेशी निर्माण पर जोर

इन तीनों जहाजों में एक बात समान है कि इन्हें स्वदेश में ही बनाया गया है। दुनागिरी में करीब 75 प्रतिशत और संशोधक व अग्रय में 80 प्रतिशत से ज्यादा इंडिजिनस कंटेंट है। इन प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योगों ने हिस्सा लिया, जिससे देश के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिली।

इन जहाजों के निर्माण से हजारों लोगों को रोजगार मिला है। दुनागिरी प्रोजेक्ट में ही करीब 4000 लोगों को सीधे और 10,000 से ज्यादा लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिला। इसके अलावा शिपबिल्डिंग से जुड़े सप्लाई चेन नेटवर्क को भी मजबूती मिली है। (Indian Navy new ships)

Explainer: रूस-फ्रांस-अमेरिका और इजरायल से क्यों दूरी बना रहा भारत? क्या है देश का नया मिलिट्री डिप्लोमेसी प्लान?

India Defence Attache Reshuffle
File Photo: ADGPI

India Defence Attache Reshuffle: भारत ने अपनी मिलिट्री डिप्लोमेसी में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसका सीधा असर कई देशों में देखने को मिलेगा। संसदीय समिति को सरकार ने बताया कि भारत अब विदेश में तैनात अपने डिफेंस अटैची नेटवर्क में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है। अब भारत उन देशों में अपनी मौजूदगी कम कर रहा है, जहां से वह लंबे समय से हथियार खरीदता रहा है। वहीं, नई रणनीति के तहत उन देशों पर ध्यान बढ़ा रहा है जहां भारतीय हथियारों के खरीदार मौजूद हैं। यह बदलाव चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है और इसका मकसद रक्षा निर्यात को बढ़ाना है।

India Defence Attache Reshuffle: क्या होता है डिफेंस अटैची और क्या है इसकी भूमिका

डिफेंस अटैची किसी भी देश के दूतावास में तैनात एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होता है। उसका काम दो देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना, सैन्य सूचनाओं का आदान-प्रदान करना और रणनीतिक संवाद बनाए रखना होता है।

अब तक इन अधिकारियों की भूमिका मुख्य रूप से उन देशों में ज्यादा महत्वपूर्ण रही है, जहां से भारत हथियार और सैन्य तकनीक खरीदता था। लेकिन अब इस सिस्टम को बदला जा रहा है।

नई नीति के तहत डिफेंस अटैची सिर्फ सैन्य संपर्क अधिकारी नहीं रहेंगे, बल्कि वे भारत के रक्षा उद्योग का प्रतिनिधित्व भी करेंगे। (India Defence Attache Reshuffle)

सीडीएस ने क्यों लिया यह फैसला

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने डिफेंस अटैचियों में किए गए इस बदलाव पर संसदीय रक्षा स्थायी समिति के साथ बातचीत के दौरान चर्चा की। यह वही समिति है, जिसकी हालिया रिपोर्ट पिछले हफ्ते लोकसभा में पेश की गई थी।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने संसदीय रक्षा समिति को बताया कि भारत अब एक एक्सपोर्टर की भूमिका निभाना चाहता है। इसके लिए जरूरी है कि सैन्य कूटनीति का फोकस भी बदला जाए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन देशों से भारत हथियार आयात करता था, वहां बड़ी संख्या में अटैची तैनात थे। अब उन्हें वहां से हटाकर उन देशों में भेजा जा रहा है जहां भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग बनने की संभावना है।

किन देशों में घट रही है तैनाती

इस बदलाव के तहत भारत ने उन देशों में अपनी सैन्य कूटनीतिक मौजूदगी कम करनी शुरू कर दी है, जो लंबे समय से उसके प्रमुख सप्लायर रहे हैं। इनमें रूस, फ्रांस, अमेरिका और इजरायल जैसे देश शामिल हैं।

पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि 2021 से 2025 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से आया था। रूस अकेले करीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा सप्लायर रहा, जबकि फ्रांस और इजरायल का योगदान भी काफी बड़ा था।

अब इन देशों में अटैचियों की संख्या घटाई जा रही है, क्योंकि यहां भारत की भूमिका मुख्य रूप से खरीदार की रही है।

कहां बढ़ रही है भारत की मौजूदगी

दूसरी ओर, भारत अब उन क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है जहां रक्षा निर्यात की संभावनाएं ज्यादा हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में रक्षा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। इन देशों के पास सीमित बजट होता है, इसलिए वे ऐसे विकल्प तलाशते हैं जो सस्ते, भरोसेमंद और टिकाऊ हों।

भारत खुद को इसी रूप में पेश कर रहा है और डिफेंस अटैची नेटवर्क के जरिए इन देशों तक अपनी पहुंच मजबूत कर रहा है। (India Defence Attache Reshuffle)

तेजी से बढ़ता भारतीय रक्षा निर्यात

भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 23,682 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में करीब 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2029-30 तक इसे बढ़ाकर 50,000 करोड़ रुपये किया जाए।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निर्यात को बढ़ावा देना जरूरी है, और इसी दिशा में डिफेंस अटैची नेटवर्क को फिर से व्यवस्थित किया जा रहा है।

हाल ही में जारी सिपरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016-20 से 2021-25 के बीच भारत के हथियार आयात में करीब 4 फीसदी की कमी आई है। इसके बावजूद भारत अब भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य उपकरण आयातक बना हुआ है और वैश्विक हथियार आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 8.2 फीसदी है।

क्या-क्या बेच रहा है भारत

भारत अब दुनिया के करीब 100 देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। इनमें मिसाइल, आर्टिलरी गन, रॉकेट, आर्मर्ड व्हीकल, ऑफशोर पेट्रोल वेसल, रडार, सर्विलांस सिस्टम और गोला-बारूद जैसे कई उत्पाद शामिल हैं।

इसमें निजी कंपनियों और सरकारी रक्षा उपक्रमों दोनों का योगदान है। निजी सेक्टर ने इस क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बनाई है। (India Defence Attache Reshuffle)

ब्रह्मोस की बढ़ रही मांग

भारत अब छोटे उपकरणों के साथ-साथ बड़े और एडवांस हथियार सिस्टम भी निर्यात करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल इसका प्रमुख उदाहरण है। फिलीपींस को इस मिसाइल सिस्टम की आपूर्ति पहले ही की जा चुकी है। इसके अलावा इंडोनेशिया के साथ भी इस मिसाइल को लेकर बातचीत चल रही है।

इसके साथ ही हल्के लड़ाकू विमान, एडवांस हेलीकॉप्टर और अन्य प्लेटफॉर्म भी निर्यात के लिए तैयार किए जा रहे हैं। (India Defence Attache Reshuffle)

क्या होगी डिफेंस अटैची की नई भूमिका

अब डिफेंस अटैची की जिम्मेदारी सिर्फ सैन्य संपर्क तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें यह निर्देश दिए गए हैं कि वे भारत के पूरे रक्षा उद्योग का प्रतिनिधित्व करें। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ-साथ निजी कंपनियां भी शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि अब अटैची विदेशी देशों में जाकर भारतीय रक्षा उत्पादों को बढ़ावा देने और नए बाजार तलाशने का काम करेंगे।

नीति सुधारों का असर

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कई अहम सुधार किए हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, कई कंपोनेंट्स को लाइसेंस की जरूरत से बाहर किया गया है और निर्यात अनुमति प्रक्रिया को सरल किया गया है। इन सुधारों के कारण रक्षा क्षेत्र में कंपनियों की संख्या बढ़ी है और निर्यात में तेजी आई है। (India Defence Attache Reshuffle)

शिपबिल्डिंग सेक्टर पर जोर

भारत अब खुद को वैश्विक शिपबिल्डिंग हब के रूप में भी स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में निवेश और तकनीकी सहयोग के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य समुद्री क्षमता को मजबूत करना और नए रोजगार के अवसर पैदा करना है।

हालांकि भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है, लेकिन इसमें धीरे-धीरे कमी आ रही है। इससे साफ है कि भारत अब आयात पर निर्भरता कम करने और निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

चरणबद्ध तरीके से हो रहा बदलाव

डिफेंस अटैची नेटवर्क में यह बदलाव एक साथ नहीं किया गया है, बल्कि इसे चरणों में लागू किया गया है। पहले चरण में उन देशों से अटैचियों को हटाया गया जहां से आयात होता था, जबकि दूसरे चरण में नए बाजार वाले देशों में उनकी तैनाती बढ़ाई गई। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद यह है कि भारत की सैन्य कूटनीति सीधे उसके आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों को मजबूत करे। (India Defence Attache Reshuffle)

मलक्का के पास भारत की बड़ी तैयारी! तट और द्वीपों की सुरक्षा को लेकर तीनों सेनाओं ने की ऑपरेशनल एक्सरसाइज

Exercise Dweep Shakti 2026

Exercise Dweep Shakti 2026: पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान-अमेरिका युद्ध में जिस तरह से अमेरिका मरीन कमांडोज के जरिए ईरान के खार्ग द्वीप पर कब्जे की रणनीति बना रहा है, उस पर पूरी दुनिया की नजरें हैं। यह द्वीप ईरान की आर्थिक जीवनरेखा है, जहां से देश के लगभग 90% क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट होता है।

वहीं, भारतीय सेनाओं ने हाल ही में भारत की तटीय और द्वपीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़ा संयुक्त अभ्यास किया। 24 से 28 मार्च तक चली एक्सरसाइज “द्वीप शक्ति” (DWEEP SHAKTI) में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर कई ऑपरेशंस को अंजाम दिया। इस अभ्यास का मकसद था कि समुद्र और द्वीपों से जुड़े किसी भी खतरे की स्थिति में तीनों सेनाएं कितनी तेजी और तालमेल के साथ कार्रवाई कर सकती हैं।

Exercise Dweep Shakti 2026

इस एक्सरसाइज में आधुनिक उपकरणों, ड्रोन और नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। पांच दिनों तक चले इस अभियान में अलग-अलग परिस्थितियों में ऑपरेशन करके यह देखा गया कि सेना की तैयारी कितनी मजबूत है।

Exercise Dweep Shakti 2026: तटीय और द्वीपीय सुरक्षा पर फोकस

भारत के पास 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा और 1,300 से ज्यादा द्वीप समूहों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। खासकर अंडमान और निकोबार जैसे द्वीप सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसी वजह से इस अभ्यास में तटीय इलाकों और द्वीपों पर फोकस रखा गया।

अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) के नेतृत्व में चले इस अभ्यास के दौरान ऐसी परिस्थितियां तैयार की गईं, जिनमें दुश्मन समुद्र के रास्ते हमला करने की कोशिश करता है या किसी द्वीप पर कब्जा करने की कोशिश करता है। इन परिस्थितियों में सेना को तेजी से प्रतिक्रिया देनी होती है। इसी तरह की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सैनिकों ने अभ्यास किया।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित हैं, जो वैश्विक समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण चोक पॉइंट है। चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियां और क्षेत्रीय तनावों को देखते हुए ऐसी संयुक्त तैयारियां अत्यंत आवश्यक हैं।

तीनों सेनाओं का देखने को मिला तालमेल

इस अभ्यास की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें तीनों सेनाओं ने एक साथ मिलकर काम किया। थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर समन्वय बनाने पर जोर दिया गया।

नौसेना ने समुद्र में ऑपरेशन संभाला, थलसेना के जवानों ने जमीन पर कार्रवाई की और वायुसेना ने हवाई सपोर्ट दिया। तीनों सेनाओं के बीच रियल टाइम में जानकारी साझा की गई, जिससे ऑपरेशन और ज्यादा प्रभावी बन सके।

इस तरह का तालमेल किसी भी आधुनिक युद्ध में बेहद जरूरी होता है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई करनी होती है। (Exercise Dweep Shakti 2026)

Exercise Dweep Shakti 2026

स्पेशल फोर्सेस भी हुईं शामिल

अभ्यास में स्पेशल फोर्सेस ने भी हिस्सा लिया। इन यूनिट्स ने तेज और सटीक ऑपरेशन का प्रदर्शन किया। कठिन परिस्थितियों में काम करने की उनकी क्षमता को परखा गया। इन सैनिकों ने सर्च ऑपरेशन और हाई रिस्क मिशन जैसे कार्यों का अभ्यास किया। (Exercise Dweep Shakti 2026)

समुद्र से हमला और बीच लैंडिंग का अभ्यास

अभ्यास के दौरान एंफीबियस ऑपरेशन यानी समुद्र से जमीन पर हमला करने की ड्रिल की गई। इसमें सैनिकों को जहाजों और लैंडिंग क्राफ्ट की मदद से समुद्र से तट पर उतारा गया।

बीच लैंडिंग ड्रिल के दौरान सैनिकों ने तेजी से किनारे पर उतरकर आगे बढ़ने का अभ्यास किया। इस दौरान यह भी देखा गया कि अगर सामने दुश्मन की मौजूदगी हो, तो सैनिक किस तरह से सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ते हैं।

इस तरह के ऑपरेशन काफी जटिल होते हैं, क्योंकि इसमें समुद्र, जमीन और हवा तीनों का कॉर्डिनेशन जरूरी होता है।

समुद्र पर नियंत्रण बनाए रखने की तैयारी

नौसेना ने इस अभ्यास में समुद्री क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के तरीके पर काम किया। इसमें समुद्र में निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और समुद्री मार्गों की सुरक्षा शामिल रही।

जहाजों और अन्य समुद्री प्लेटफॉर्म्स के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि किसी भी दुश्मन गतिविधि को समय रहते रोका जा सके। समुद्र पर कंट्रोल बनाए रखना किसी भी देश की सुरक्षा के लिए जरूरी होता है, खासकर जब बात व्यापारिक मार्गों की हो। (Exercise Dweep Shakti 2026)

Exercise Dweep Shakti 2026

वायुसेना ने दिया हवाई सपोर्ट

अभ्यास के दौरान वायुसेना ने अहम भूमिका निभाई। फाइटर जेट्स, हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया। इनकी मदद से सैनिकों को सपोर्ट दिया गया और जरूरत पड़ने पर तेजी से मूवमेंट भी किया गया।

हवाई निगरानी के जरिए जमीन और समुद्र दोनों जगह की गतिविधियों पर नजर रखी गई। इससे ऑपरेशन को बेहतर तरीके से प्लान करने में मदद मिली। (Exercise Dweep Shakti 2026)

ड्रोन और नई तकनीक का इस्तेमाल

इस अभ्यास में ड्रोन और नेक्स्ट जनरेशन उपकरणों का खास इस्तेमाल देखने को मिला। सर्विलांस ड्रोन के जरिए रियल टाइम जानकारी जुटाई गई। इससे यह पता चलता रहा कि टारगेट कहां है और वहां की स्थिति क्या है।

ड्रोन की मदद से ऑपरेशन ज्यादा सटीक और तेज हो गया। इसके अलावा नेटवर्क आधारित सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया, जिससे अलग-अलग यूनिट्स के बीच तुरंत जानकारी साझा हो सके।

अभ्यास के दौरान अलग-अलग तरह के हालात तैयार किए गए, ताकि सैनिक हर स्थिति के लिए तैयार रह सकें। कभी दुश्मन की घुसपैठ की स्थिति बनाई गई, तो कभी अचानक हमला होने का सीन तैयार किया गया।

इन हालात में सैनिकों ने तेजी से निर्णय लेने और तुरंत कार्रवाई करने का अभ्यास किया। इससे उनकी प्रतिक्रिया क्षमता को परखा गया। (Exercise Dweep Shakti 2026)

टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसीजर

इस अभ्यास का एक बड़ा उद्देश्य यह भी था कि ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल होने वाली रणनीतियों और प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाया जाए। इसे टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसीजर यानी टीटीपी कहा जाता है।

अभ्यास के दौरान यह देखा गया कि किस तरह से ऑपरेशन को और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है। अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल को भी मजबूत किया गया।

वहीं इस एक्सरसाइज में सिर्फ लड़ाकू क्षमता ही नहीं, बल्कि सपोर्ट सिस्टम का भी अभ्यास किया गया। इसमें यह देखा गया कि सैनिकों तक जरूरी सामान, ईंधन और उपकरण कितनी तेजी से पहुंचाए जा सकते हैं।

दूरदराज के इलाकों में ऑपरेशन चलाने के लिए मजबूत लॉजिस्टिक्स बहुत जरूरी होते हैं। इस अभ्यास में इसी पहलू पर भी ध्यान दिया गया। (Exercise Dweep Shakti 2026)

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की तैयारी

यह अभ्यास सिर्फ जमीन, समुद्र या हवा तक सीमित नहीं था। इसमें मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की तैयारी भी दिखाई दी। यानी एक साथ कई क्षेत्रों में कार्रवाई करने की क्षमता पर काम किया गया।

इसमें सूचना, निगरानी और तकनीक का इस्तेमाल अहम रहा। आधुनिक युद्ध में यह जरूरी हो गया है कि सभी क्षेत्रों में एक साथ काम किया जाए। (Exercise Dweep Shakti 2026)

ईरान-इजरायल संघर्ष से सीख: ड्रोनों के झुंड से कैसे निपटेगा भारत? सेना बदलेगी एयर डिफेंस स्ट्रेटेजी

Iran-Israel War Lessons: Indian Army Transformation
Indian Army Transformation: How Operation Sindoor Transformed Indian Army War-Fighting Architecture with Drone Units and Bhairav Battalions

Iran-Israel War Lessons: पश्चिम एशिया में चल रहे इजरायल-ईरान-अमेरिका युद्ध से भारतीय सेनाओं ने कई जरूरी सबक लेने शुरू कर दिए हैं। इस युद्ध में जिस तरह छोटे और सस्ते ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ, उसने पूरी दुनिया की सेनाओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अब भारतीय सेनाओं में इस बात पर गंभीर चर्चा चल रही है कि देश की सुरक्षा के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम को तेजी से खरीदा जाए और उन्हें पुराने एयर डिफेंस सिस्टम के साथ जोड़ा जाए।

Iran-Israel War Lessons: छोटे ड्रोन बने बड़ी चुनौती

हाल के युद्धों में यह साफ दिखा है कि छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे बन सकते हैं। इनकी कीमत बहुत कम होती है, लेकिन अगर इन्हें झुंड यानी स्वॉर्म के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यह बड़े और महंगे हथियारों को भी चुनौती दे सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, एक छोटे ड्रोन को गिराने के लिए महंगे मिसाइल का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से सही नहीं माना जाता। ऐसे में सस्ते और प्रभावी विकल्प तैयार करना जरूरी हो गया है।

पुराने हथियारों को नए सिस्टम से जोड़ने की तैयारी

भारतीय सेना अब अपने पुराने यानी लेगेसी एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने पर ध्यान दे रही है। जैसे एल-70 गन जैसे सिस्टम का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन गिराने में किया जा चुका है।

अब योजना यह है कि इन पुराने हथियारों को नए एंटी-ड्रोन सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किया जाए, ताकि कम लागत में एक मजबूत एयर डिफेंस छतरी तैयार हो सके। (Iran-Israel War Lessons)

स्वॉर्म ड्रोन का बढ़ता खतरा

वेस्ट एशिया के संघर्ष में यह देखा गया कि ईरान ने स्वॉर्म ड्रोन का इस्तेमाल किया, यानी एक साथ कई ड्रोन भेजे गए। इस तरह के हमले से एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है।

अगर एक साथ बहुत सारे ड्रोनहैं आते , तो उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि भारत अब अपनी एंटी-ड्रोन क्षमता को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। (Iran-Israel War Lessons)

रोबोटिक तकनीक पर भी ध्यान

सेना अब सिर्फ ड्रोन ही नहीं, बल्कि रोबोटिक सिस्टम पर भी फोकस बढ़ा रही है। ऐसे उपकरण जो माइन डिटेक्शन, सामान ढोने और अन्य कामों में मदद कर सकें, उन्हें शामिल करने की योजना है।

इससे सैनिकों पर निर्भरता कम होगी और जोखिम भी घटेगा। रोबोटिक सिस्टम कई खतरनाक काम बिना मानव नुकसान के कर सकते हैं।

किन स्ट्रक्चर को बनाए निशाना

वेस्ट एशिया संघर्ष में यह भी देखा गया कि देशों ने एक-दूसरे के एनर्जी रिसोर्सेस और प्रशासनिक ढांचे को निशाना बनाया। इससे उनके सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स पर बड़ा दबाव पड़ा।

भारतीय सेना इस पहलू पर भी विचार कर रही है कि भविष्य के युद्धों में किन लक्ष्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। (Iran-Israel War Lessons)

पैसिव उपायों की जरूरत

अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ हथियारों से ही सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि कुछ पैसिव उपाय भी जरूरी होते हैं। इसमें फोर्स को अलग-अलग जगहों पर फैलाना, छिपाना, कैमोफ्लेज करना और अंडरग्राउंड स्ट्रक्चर तैयार करना शामिल है।

अगर एक ही जगह पर ज्यादा रिसोर्सेस रखे जाएं, तो वे आसानी से निशाना बन सकते हैं। इसलिए इन्हें सुरक्षित तरीके से दूसरी जगहों पर भी रखना जरूरी माना जा रहा है। (Iran-Israel War Lessons)

एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव

हाल के युद्धोंमें यह भी देखा गया कि अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी दबाव में आ सकते हैं। जब एक साथ कई मिसाइल या ड्रोन हमला करते हैं, तो सबसे मजबूत सिस्टम भी चुनौती का सामना करता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए भारत अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को और मजबूत बनाने पर विचार कर रहा है।

डिसेंट्रलाइज्ड युद्ध की ओर बढ़ता फोकस

अब युद्ध का तरीका भी बदल रहा है। पहले जहां बड़े स्तर पर सेंट्रलाइज्ड ऑपरेशन होते थे, अब छोटे-छोटे यूनिट्स के जरिए डिसेंट्रलाइज्ड तरीके से लड़ाई लड़ी जा रही है।

इससे दुश्मन के लिए पूरे सिस्टम को निशाना बनाना मुश्किल हो जाता है। भारत में भी जॉइंट मिलिट्री कमांड बनाने पर चर्चा चल रही है, जिससे बेहतर तालमेल हो सके। (Iran-Israel War Lessons)

लंबी लड़ाई की तैयारी पर जोर

अधिकारियों का मानना है कि अब सिर्फ तेज और छोटे युद्ध ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की तैयारी भी जरूरी है। इसके लिए संसाधनों का सही इस्तेमाल और लगातार सप्लाई बनाए रखना जरूरी होता है।

साथ ही यह भी जरूरी है कि युद्ध शुरू होने के साथ ही उसके उद्देश्य स्पष्ट हों और हर चरण में उसे खत्म करने की रणनीति तैयार रहे। (Iran-Israel War Lessons)

Drone warfare में नया इनोवेशन! वीडियो में देखें कैसे बिना विस्फोट के रूसी FPV ने मेटल रॉड से उड़ा दिए यूक्रेनी ड्रोन के परखच्चे

Drone Warfare

Drone warfare: चाहे अमेरिका-ईरान युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, हालिया जंगों में ड्रोन वॉरफेयर का अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। यूक्रेन ने रूस के शाहेद के ड्रोन का मुकाबला करने के लिए सस्ता इंटरसेप्टर ड्रोन बनाया तो, रूस ने यूक्रेनी ड्रोन को गिराने के लिए रियूजेबल तरीका अपनाया। हाल ही में एक वीडियो रूस की तरफ से जारी किया गया, जिसमें एक रूसी एफपीवी (फर्स्ट पर्सन व्यू) इंटरसेप्टर ड्रोन ने यूक्रेनी ड्रोन को बिना किसी विस्फोटक के सिर्फ मेटल रॉड्स की टक्कर मारकर गिरा दिया।

हालांकि यह तरीका देखने में बेहद साधारण लगता है, लेकिन इसका असर काफी बड़ा है। खास बात यह रही कि हमला करने वाला ड्रोन खुद सुरक्षित दिखाई दिया और उसे दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। (Drone warfare)

Drone warfare: कैसे हुआ ये हमला

वीडियो में साफ दिखता है कि रूसी ड्रोन के आगे दो लंबी मेटल रॉड्स लगी हुई थीं। यह ड्रोन तेजी से उड़ते हुए एक सफेद रंग के यूक्रेनी फिक्स्ड-विंग ड्रोन की तरफ बढ़ता है।

कुछ ही सेकंड में वह सीधे टारगेट से टकराता है और दोनों रॉड्स दुश्मन ड्रोन की बॉडी और विंग्स में घुस जाती हैं। टक्कर के साथ ही स्पार्क्स निकलते हैं और यूक्रेनी ड्रोन में आग लग जाती है। थोड़ी ही देर में वह हवा में टूटकर नीचे गिर जाता है।

इस पूरे ऑपरेशन में कोई विस्फोट नहीं हुआ। सिर्फ टक्कर से ही टारगेट को नष्ट कर दिया गया। (Drone warfare)

क्या है ‘काइनेटिक इंटरसेप्शन’

इस तरीके को ‘काइनेटिक इंटरसेप्शन’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि बिना बम या मिसाइल के, सिर्फ फिजिकल अटैक से ही दुश्मन को नष्ट किया जाता है।

आम तौर पर एफपीवी ड्रोन में विस्फोटक वॉरहेड लगाया जाता है। टारगेट से टकराते ही दोनों ड्रोन खत्म हो जाते हैं। लेकिन इस नए तरीके में सिर्फ मेटल रॉड्स का इस्तेमाल किया गया, जिससे हमला करने वाला ड्रोन बच गया।

यही इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत मानी जा रही है। (Drone warfare)

लागत में है बड़ा फर्क

ड्रोन युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती लागत की होती है। एक साधारण एफपीवी ड्रोन की कीमत लगभग 500 से 1000 डॉलर के बीच होती है। अगर इसमें विस्फोटक जोड़ा जाए तो खर्च और बढ़ जाता है।

लेकिन इस नए तरीके में कोई वॉरहेड नहीं लगाया गया। सिर्फ साधारण मेटल रॉड्स से काम हो गया। इससे हर इंटरसेप्शन की लागत काफी कम हो जाती है।

युद्ध में जहां रोज हजारों ड्रोन इस्तेमाल हो रहे हैं, वहां यह तरीका बड़ी बचत की वजह बन सकता है। (Drone warfare)

दोबारा इस्तेमाल की सुविधा

इस तकनीक का एक और अहम पहलू यह है कि ड्रोन को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। पारंपरिक हमलों में ड्रोन खुद भी नष्ट हो जाता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।

वीडियो में दिखता है कि टक्कर के बाद रूसी ड्रोन उड़ता रहता है। वीडियो में यह भी देखा गया कि उसने कुछ समय तक दुश्मन ड्रोन को साथ लेकर उड़ान जारी रखी और रूसी ड्रोन सुरक्षित रहा। यह सिस्टम सिर्फ सस्ता ही नहीं, बल्कि टिकाऊ भी है। (Drone warfare)

किन ड्रोन पर इस्तेमाल हो रही तकनीक

इस तरह की तकनीक कुछ खास इंटरसेप्टर ड्रोन मॉडल्स में इस्तेमाल हो रही है। इनका मकसद यूक्रेन के सस्ते स्ट्राइक ड्रोन को रोकना है।

यूक्रेन की तरफ से भी इसी तरह के कम लागत वाले प्रयोग देखने को मिले हैं। कुछ मामलों में ड्रोन पर फिशिंग रॉड या जाल लगाकर दुश्मन ड्रोन को गिराने की कोशिश की गई है।

दोनों पक्ष अब महंगे हथियारों की जगह सस्ती और सरल तकनीकों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। (Drone warfare)

ड्रोन बनाम ड्रोन की नई लड़ाई

2022 में शुरू हुए इस युद्ध में शुरुआत में ड्रोन का इस्तेमाल जमीन पर हमला करने के लिए किया जा रहा था। लेकिन अब स्थिति बदल गई है।

अब ड्रोन ही ड्रोन को मार रहे हैं। यानी आसमान में ही एक अलग तरह की लड़ाई चल रही है। इसे ड्रोन-वर्सेस-ड्रोन कॉम्बैट कहा जा रहा है।

इसमें छोटे, तेज और सस्ते ड्रोन ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं। (Drone warfare)

इलेक्ट्रॉनिक और अन्य तरीके भी इस्तेमाल

रूस सिर्फ टक्कर वाले ड्रोन ही नहीं, बल्कि अन्य तरीकों का भी इस्तेमाल कर रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी ईडब्ल्यू सिस्टम शामिल हैं, जो दुश्मन ड्रोन के सिग्नल को जाम कर देते हैं।

कुछ मामलों में जाल फेंककर ड्रोन को फंसाने की तकनीक भी अपनाई जा रही है। इसके अलावा डिकॉय ड्रोन यानी नकली ड्रोन भेजकर दुश्मन को भ्रमित किया जाता है।

लो-एल्टीट्यूड फ्लाइट और फाइबर-ऑप्टिक कंट्रोल जैसे तरीके भी इस्तेमाल में आ रहे हैं, जिससे जामिंग का असर कम हो जाता है।

ड्रोन तकनीक में हो रहे ये बदलाव दिखाते हैं कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब महंगे मिसाइल सिस्टम के साथ-साथ सस्ते और स्मार्ट सॉल्यूशंस भी अहम हो गए हैं। (Drone warfare)

कोच्चि में जुटीं 12 देशों की नौसेनाएं, समुद्री सुरक्षा अभ्यास IONS IMEX 2026 में लिया हिस्सा

IONS IMEX 2026

IONS IMEX 2026: भारतीय नौसेना ने हाल ही में कोच्चि स्थित सदर्न नेवल कमांड के मैरीटाइम वॉरफेयर सेंटर में एक अहम अंतरराष्ट्रीय अभ्यास का आयोजन किया। इस अभ्यास का नाम आईओएनएस मैरीटाइम एक्सरसाइज (IMEX) टेबल-टॉप एक्सरसाइज (TTX) 2026 रखा गया था। इसमें हिंद महासागर क्षेत्र से जुड़े कई देशों की नौसेनाओं के अधिकारी शामिल हुए।

इस आयोजन में इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम यानी आईओएनएस के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ आईओएस सागर के अंतरराष्ट्रीय अधिकारी और भारतीय नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। सभी ने मिलकर समुद्री सुरक्षा से जुड़े नए और बदलते खतरों पर चर्चा की।

IONS IMEX 2026: कई देशों ने मिलकर किया अभ्यास

इस एक्सरसाइज में बांग्लादेश, फ्रांस, इंडोनेशिया, केन्या, मालदीव, मॉरीशस, म्यांमार, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया और तिमोर-लेस्ते जैसे देशों ने हिस्सा लिया। अलग-अलग देशों की भागीदारी से यह साफ दिखा कि समुद्री सुरक्षा को लेकर सभी देश एक साथ काम करना चाहते हैं।

यह अभ्यास ऐसे समय पर हुआ जब भारत 2026 से 2028 तक आईओएनएस की चेयरमैनशिप संभालने जा रहा है। करीब 16 साल बाद भारत को यह जिम्मेदारी मिली है, इसलिए यह एक्सरसाइज काफी अहम मानी जा रही है।

बिना असली तैनाती के किया गया अभ्यास

यह एक टेबल-टॉप एक्सरसाइज थी, यानी इसमें असली जहाज या हथियारों की तैनाती नहीं की गई। इसकी जगह एक सिमुलेटेड एनवायरनमेंट में अलग-अलग हालात बनाए गए, जिन पर अधिकारियों ने मिलकर काम किया।

इस तरीके से कई तरह के संभावित समुद्री खतरों को समझने और उनसे निपटने की रणनीति तैयार करने का मौका मिला। इसमें सूचना साझा करना, फैसले लेना और अलग-अलग देशों के बीच तालमेल कैसे बेहतर किया जाए, इन सभी बातों पर ध्यान दिया गया।

समुद्री सुरक्षा के नए खतरों पर चर्चा

इस अभ्यास में पारंपरिक युद्ध के अलावा उन खतरों पर ज्यादा फोकस रहा, जो आज के समय में तेजी से बढ़ रहे हैं। जिनमें समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मछली पकड़ना, आपदा की स्थिति और समुद्री रास्तों की सुरक्षा शामिल है।

हिंद महासागर क्षेत्र दुनिया के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति होती है। ऐसे में इस क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत बनाना सभी देशों के लिए जरूरी है।

यह एक्सरसाइज आईओएस सागर पहल से भी जुड़ी हुई थी, जिसमें कई देशों के नौसैनिक अधिकारी पहले से ही कोच्चि में ट्रेनिंग ले रहे थे। इन अधिकारियों ने भी इस टेबल-टॉप एक्सरसाइज में हिस्सा लिया, जिससे उन्हें वास्तविक परिस्थितियों के करीब अनुभव मिला।

इससे सिर्फ वरिष्ठ स्तर पर ही नहीं, बल्कि ऑपरेशनल स्तर पर भी सहयोग और समझ को मजबूत करने का मौका मिला।

इस अभ्यास के दौरान कई तरह के सीनारियो बनाए गए, जिनमें अलग-अलग तरह की परिस्थितियों को शामिल किया गया। इन पर चर्चा करके यह समझने की कोशिश की गई कि किसी संकट के समय किस तरह जल्दी और सही फैसला लिया जाए।

इस प्रक्रिया में सभी देशों के अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए और एक-दूसरे के काम करने के तरीके को समझा।

सहयोग और तालमेल पर रहा जोर

इस पूरे आयोजन का मुख्य उद्देश्य यही था कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें। इसके लिए जानकारी साझा करने, एक जैसी प्रक्रिया अपनाने और आपसी भरोसा बढ़ाने पर खास ध्यान दिया गया।

नेशनल आर्चरी चैंपियनशिप में आर्मी स्कूल की बेटियों ने रचा इतिहास, 13 साल की जीविशा ने जीता गोल्ड

Indian Army archery championship

Archery championship: भारतीय सेना से जुड़े एक प्रशिक्षण संस्थान के दो युवा तीरंदाजों ने राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया है। आंध्र प्रदेश के गुंटूर में आयोजित एनटीपीसी ओपन नेशनल आर्चरी चैंपियनशिप में इन खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का दम दिखाया और सेना के साथ-साथ महाराष्ट्र का नाम भी रोशन किया।

यह प्रतियोगिता देशभर के उभरते तीरंदाजों के लिए एक बड़ा मंच मानी जाती है, जहां कड़ी चुनौती के बीच खिलाड़ियों को अपनी क्षमता साबित करनी होती है।

Indian Army archery championship

Archery championship: जीविशा अग्रवाल ने जीता गोल्ड

इस प्रतियोगिता में जीविशा अग्रवाल ने शानदार प्रदर्शन किया। अहिल्यानगर के मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल से जुड़ी जीविशा ने अंडर-13 गर्ल्स कैटेगरी के इंडियन राउंड एलिमिनेशन इवेंट में शानदार खेल दिखाते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

पूरे मुकाबले के दौरान उन्होंने काफी संयम और आत्मविश्वास के साथ तीर चलाए। हर राउंड में उनका प्रदर्शन स्थिर रहा, जिसकी वजह से वह फाइनल तक पहुंचीं और जीत हासिल की।

इंडिविजुअल रैंकिंग प्रतियोगिता में भी जीविशा ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन वह सिर्फ एक अंक से पोडियम में जगह बनाने से चूक गईं। इसके बावजूद उनका प्रदर्शन लगातार शानदार बना रहा।

निधि महतो को राष्ट्रीय रैंकिंग में नौवां स्थान

जीविशा के साथ ही निधि महतो ने भी इस प्रतियोगिता में बेहतरीन खेल दिखाया। उन्होंने राष्ट्रीय रैंकिंग में नौवां स्थान हासिल किया।

कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच टॉप-10 में जगह बनाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। दोनों खिलाड़ियों ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान मेहनत और धैर्य के साथ मुकाबला किया और अपनी पहचान बनाई।

राज्य स्तर से नेशनल तक का सफर

इन दोनों युवा तीरंदाजों के इस शानदार सफर के पीछे लगातार मेहनत और कई प्रतियोगिताओं का अनुभव रहा है। महाराष्ट्र के सोलापुर में आयोजित मिनी सब-जूनियर स्टेट लेवल आर्चरी प्रतियोगिता में इनके प्रदर्शन के आधार पर ही इनका चयन नेशनल चैंपियनशिप के लिए हुआ था।

उस प्रतियोगिता में जीविशा ने इंडिविजुअल कैटेगरी में दूसरा स्थान हासिल किया था। वहीं टीम इवेंट में अहिल्यानगर की टीम ने गोल्ड मेडल जीता था, जिसमें जीविशा और निधि दोनों शामिल थीं।

सेना के ट्रेनिंग सिस्टम की अहम भूमिका

इन खिलाड़ियों की सफलता के पीछे सेना के प्रशिक्षण सिस्टम की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। अहिल्यानगर स्थित मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल में बच्चों की प्रतिभा को शुरुआती स्तर पर ही पहचाना जाता है और उन्हें सही दिशा में ट्रेनिंग दी जाती है।

यहां खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास, अनुशासन और सही मार्गदर्शन मिलता है, जिससे वे बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार हो पाते हैं।

कोच की अहम भूमिका

इस सफलता में कोच हवलदार राकेश निनामा का भी अहम योगदान रहा। उन्होंने दोनों खिलाड़ियों को लगातार ट्रेनिंग दी और उनके खेल को बेहतर बनाने पर काम किया।

उनकी देखरेख में खिलाड़ियों ने न केवल तकनीक सीखी, बल्कि दबाव में खेलने का तरीका भी समझा। यही वजह रही कि राष्ट्रीय स्तर पर भी दोनों ने आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन किया।

पहले भी दिखा चुकी हैं दम

यह पहली बार नहीं है जब इन खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया हो। इससे पहले भी 2025 में आयोजित सीबीएसई आर्चरी नेशनल प्रतियोगिता में अहिल्यानगर की टीम ने हिस्सा लिया था। उस समय भी टीम ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था और व्यक्तिगत स्तर पर भी खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया था।

गुंटूर में आयोजित इस प्रतियोगिता में देश के अलग-अलग राज्यों से आए खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। हर कैटेगरी में मुकाबला काफी कड़ा रहा, खासकर अंडर-13 वर्ग में जहां कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी मैदान में थे।

अग्निवीर इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव, एक्सीडेंट या आतंकी हमले में मौत होने पर मिलेगा पहले से ज्यादा मुआवजा!

Agniveer insurance cover

Agniveer insurance cover: भारतीय सेना के अग्निवीरों के लिए एक अहम बदलाव किया गया है। अब डिफेंस सैलरी पैकेज (डीएसपी- अग्निवीर) के तहत उन्हें पहले से ज्यादा इंश्योरेंस कवर मिलेगा। यह बदलाव भारतीय सेना और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के बीच हुए समझौते को रिन्यू करने के बाद लागू हुआ है, जिसे मार्च 2029 तक बढ़ा दिया गया है।

इस नए सिस्टम के तहत अग्निवीरों को अब पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस और एयर एक्सीडेंट इंश्योरेंस दोनों में बड़ा फायदा मिलेगा। इससे ड्यूटी के दौरान या किसी दुर्घटना की स्थिति में उनके परिवार को आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

Agniveer insurance cover: कितना मिलेगा इंश्योरेंस कवर

अब अग्निवीरों को पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस यानी पीएआई के तहत 1 करोड़ रुपये का कवर दिया जा रहा है। वहीं एयर एक्सीडेंट इंश्योरेंस यानी एएआई के तहत 1.5 करोड़ रुपये तक की सुरक्षा मिलेगी।

इसके अलावा अगर किसी अग्निवीर को स्थायी रूप से पूरी या आंशिक विकलांगता हो जाती है, तो उस स्थिति में भी उसे 1 करोड़ रुपये तक का कवर दिया जाएगा।

इस पैकेज में एक खास प्रावधान यह भी है कि अगर किसी अग्निवीर की मौत आतंकवाद, नक्सल हमले या दुश्मन के साथ मुठभेड़ जैसी स्थिति में होती है, तो अतिरिक्त 10 लाख रुपये का कवर भी दिया जाएगा। (Agniveer insurance cover)

पहले क्या था और अब क्या बदला

जब अग्निपथ योजना की शुरुआत हुई थी, उस समय मिलने वाला इंश्योरेंस कवर इससे काफी कम था। शुरुआत में पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस 50 लाख रुपये और एयर एक्सीडेंट कवर 1 करोड़ रुपये तक सीमित था।

बाद में नवंबर 2025 में इसमें बदलाव किया गया और कवर बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये और 1.5 करोड़ रुपये कर दिया गया। अब इस व्यवस्था को आगे भी जारी रखने के लिए समझौते को बढ़ा दिया गया है। यानी अब जो बढ़ा हुआ कवर है, वही आगे भी लागू रहेगा और अग्निवीरों को लगातार मिलता रहेगा। (Agniveer insurance cover)

कैसे काम करता है एयर एक्सीडेंट कवर

एयर एक्सीडेंट इंश्योरेंस के तहत कवर तभी लागू होता है, जब टिकट डीएसपी अकाउंट से खरीदा गया हो या फिर अग्निवीर आधिकारिक ड्यूटी पर डिफेंस एयरक्राफ्ट में यात्रा कर रहा हो। इसका मतलब यह है कि ड्यूटी से जुड़ी यात्रा के दौरान भी यह कवर पूरी तरह लागू रहेगा।

एक्स्ट्रा बेनिफिट्स भी शामिल

इस पैकेज में कुछ अतिरिक्त फायदे भी जोड़े गए हैं, जो जरूरत के समय काम आते हैं। अगर किसी हादसे में जलने की घटना होती है, तो प्लास्टिक सर्जरी के लिए 10 लाख रुपये तक का खर्च कवर किया जाएगा।

अगर इलाज के लिए बाहर से दवा मंगानी पड़े, तो उसके ट्रांसपोर्ट का पांच लाख रुपये तक का खर्च भी दिया जाएगा। एयर एंबुलेंस की जरूरत होने पर 10 लाख रुपये तक की मदद मिल सकती है। अगर कोई व्यक्ति हादसे के बाद 48 घंटे से ज्यादा समय तक कोमा में रहने के बाद मौत का शिकार हो जाता है, तो उस स्थिति में 5 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है।

परिवार से जुड़े प्रावधान भी इसमें शामिल हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिए 18 से 25 साल की उम्र के बीच उच्च शिक्षा के लिए पीएआई कवर का 25 प्रतिशत तक, यानी 8 लाख रुपये तक (लड़की के लिए 10 लाख रुपये तक) मदद मिलती है। बेटियों की शादी के लिए भी अलग से कवर दिया जाता है, जिसमें दो बेटियों के लिए कुल 10 लाख रुपये तक या एक बेटी के लिए 5 लाख रुपये तक की सहायता शामिल है।

इसके अलावा, हादसे के समय परिवार के दो सदस्यों के यात्रा खर्च के लिए 50,000 रुपये तक की राशि दी जाती है। पार्थिव शरीर को घर तक लाने के लिए 50,000 रुपये और एंबुलेंस खर्च के लिए भी 50,000 रुपये तक का कवर भी इस पैकेज में शामिल किया गया है। (Agniveer insurance cover)

आंशिक या पूर्ण विकलांग होने पर 1 करोड़ रुपये तक

अगर कोई अग्निवीर आतंकवाद, नक्सल हमले या दुश्मन के साथ मुठभेड़ में शहीद होता है, तो एसबीआई के एक्सप्रेस क्रेडिट लोन अकाउंट पर 10 लाख रुपये तक का इंश्योरेंस कवर मिलता है। इसके साथ ही ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त 10 लाख रुपये का पीएआई कवर भी दिया जाता है।

इसके अलावा, अगर किसी अग्निवीर को स्थायी रूप से पूरी तरह या आंशिक विकलांगता हो जाती है, तो उसे 1 करोड़ रुपये तक का कवर दिया जाता है।

अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों को 48 लाख रुपये का नॉन-कॉन्ट्रिब्यूटरी लाइफ इंश्योरेंस मिलता है। इसका पूरा प्रीमियम सरकार खुद वहन करती है, यानी अग्निवीर को इसके लिए अपनी जेब से एक भी रुपया नहीं देना पड़ता।

अग्निपथ योजना में क्या देती है सरकार

अग्निपथ योजना के तहत अगर किसी अग्निवीर की सेवा के दौरान मौत होती है, तो उसके परिवार को पेंशन नहीं मिलती, लेकिन एकमुश्त मुआवजे और इंश्योरेंस के रूप में एक तय पैकेज दिया जाता है। रक्षा मंत्रालय ने ऐसी स्थितियों को तीन कैटेगरी में बांटा है, जिनके आधार पर अलग-अलग लाभ मिलते हैं।

सबसे पहले कैटेगरी X आती है, जिसमें मौत सेवा से जुड़ी नहीं होती, जैसे बीमारी या प्राकृतिक कारण। इस स्थिति में परिवार को 48 लाख रुपये का नॉन-कॉन्ट्रिब्यूटरी लाइफ इंश्योरेंस मिलता है, जिसका पूरा प्रीमियम सरकार देती है। इसके साथ अग्निवीर का सेवा निधि फंड भी मिलता है, जिसमें उसका योगदान, सरकार का हिस्सा और ब्याज शामिल होता है। इस कैटेगरी में कोई एक्स-ग्रेशिया नहीं दिया जाता। (Agniveer insurance cover)

दूसरी कैटेगरी Y होती है, जिसमें मौत ड्यूटी या ट्रेनिंग के दौरान किसी हादसे की वजह से होती है। इस स्थिति में परिवार को 48 लाख रुपये का इंश्योरेंस मिलता है, साथ ही सरकार की तरफ से 44 लाख रुपये का वन-टाइम एक्स-ग्रेशिया दिया जाता है। इसके अलावा, अग्निवीर की बची हुई सेवा अवधि का पूरा वेतन भी परिवार को दिया जाता है, जो आमतौर पर करीब 13 लाख रुपये के आसपास होता है। सेवा निधि की पूरी राशि भी मिलती है, जो लगभग 2.3 लाख रुपये तक होती है। इसके साथ ही आर्म्ड फोर्सेस बैटल कैजुअल्टी फंड से 8 लाख रुपये की अतिरिक्त मदद दी जाती है।

तीसरी कैटेगरी Z होती है, जिसमें अग्निवीर आतंकवादी हमले, दुश्मन की कार्रवाई या युद्ध जैसी स्थिति में शहीद होता है। इस कैटेगरी में Y कैटेगरी के सभी लाभ मिलते हैं। यानी 48 लाख रुपये का इंश्योरेंस, 44 लाख रुपये का एक्स-ग्रेशिया, करीब 13 लाख रुपये का बाकी वेतन, लगभग 2.3 लाख रुपये की सेवा निधि और 8 लाख रुपये का बैटल फंड मिलता है।

अगर कुल रकम को जोड़ा जाए, तो Y या Z कैटेगरी में परिवार को लगभग 1.15 करोड़ रुपये से 1.20 करोड़ रुपये तक का सरकारी मुआवजा देने का प्रावधान है। (Agniveer insurance cover)

डीएसपी अकाउंट में सिर्फ इंश्योरेंस ही नहीं, बैंकिंग सुविधाएं भी

डिफेंस सैलरी पैकेज के तहत अग्निवीरों को सिर्फ इंश्योरेंस ही नहीं, बल्कि कई बैंकिंग सुविधाएं भी दी जाती हैं। इस अकाउंट में मिनिमम बैलेंस रखने की जरूरत नहीं होती। इसके साथ इंटरनेशनल गोल्ड डेबिट कार्ड मुफ्त दिया जाता है और इस पर कोई सालाना चार्ज नहीं लिया जाता। एसबीआई के एटीएम पर अनलिमिटेड फ्री ट्रांजेक्शन की सुविधा भी मिलती है।

चेक बुक की सुविधा भी फ्री है, जिसमें हर महीने 25 चेक लीव्स बिना किसी शुल्क के मिलती हैं। इसके अलावा आरटीजीएस और एनईएफटी जैसी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन भी बिना चार्ज के की जा सकती हैं।

अग्निवीर योजना 2022 में शुरू की गई थी, जिसके तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना, नौसेना और वायुसेना में सेवा का मौका दिया जाता है। इस दौरान उन्हें ट्रेनिंग, सैलरी और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं।

इसी योजना के तहत अग्निवीरों के लिए यह डिफेंस सैलरी पैकेज तैयार किया गया, ताकि उन्हें बैंकिंग और इंश्योरेंस दोनों का लाभ एक साथ मिल सके। (Agniveer insurance cover)

पुणे से जैसलमेर तक सेना ने चलाया मिलिट्री-सिविल फ्यूजन अभियान, कई एजेंसियों को जोड़ा एक मंच पर

Military-Civil Fusion Campaign

Military-Civil Fusion Campaign: देश की सुरक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए भारतीय सेना की सदर्न कमांड ने एक खास पहल शुरू की है, जिसे मिलिट्री सिविल फ्यूजन अभियान नाम दिया गया है। इस अभियान के तहत सेना ने अलग-अलग सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर कई जगहों पर संयुक्त गतिविधियां कीं। इसका मकसद था कि किसी भी आपात स्थिति में सभी एजेंसियां एक साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें।

यह अभियान महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में चलाया गया। इसमें सेना के साथ सिविल एडमिनिस्ट्रेशन, पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां, शिक्षण संस्थान और इंडस्ट्री के लोग भी शामिल हुए।

Military-Civil Fusion Campaign: अलग-अलग एजेंसियों को एक मंच पर लाने की कोशिश

इस अभियान की खास बात यह रही कि इसमें कई तरह की एजेंसियों को एक साथ जोड़ा गया। इसमें सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स, स्टेट पुलिस, डिजास्टर मैनेजमेंट एजेंसियां, एयरपोर्ट और सिविल एविएशन से जुड़ी संस्थाएं, फॉरेस्ट और माइनिंग विभाग, एनसीसी और कई शैक्षणिक संस्थान शामिल रहे।

इन सभी ने मिलकर सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर काम किया। जैसे इंटरनल सिक्योरिटी, एयरस्पेस की निगरानी, डिजास्टर रिस्पॉन्स और महत्वपूर्ण इलाकों की सुरक्षा। इस दौरान अलग-अलग एजेंसियों ने एक-दूसरे के काम करने के तरीके को समझा और एक जैसी प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया। (Military-Civil Fusion Campaign)

Military-Civil Fusion Campaign

पुणे में हुई बड़ी टेबल टॉप एक्सरसाइज

अभियान के तहत पुणे स्थित सदर्न कमांड मुख्यालय में एक बड़ी टेबल टॉप एक्सरसाइज भी की गई, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई कि देश के अंदर अलग-अलग तरह के खतरों से कैसे निपटा जाए।

इस अभ्यास की अगुवाई लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने की। इसमें महाराष्ट्र सरकार के अधिकारी, रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी और कई सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सभी ने मिलकर संभावित खतरों पर चर्चा की और उनसे निपटने की रणनीति पर काम किया।

कई शहरों में हुए अलग-अलग अभ्यास

इस अभियान के तहत देश के अलग-अलग शहरों में विशेष गतिविधियां आयोजित की गईं। पुणे के औंध मिलिट्री स्टेशन में एक मल्टी एजेंसी एक्सरसाइज हुई, जिसमें सेना, पुलिस, सिविल एडमिनिस्ट्रेशन और एनसीसी ने मिलकर काम किया। इसका मकसद था कि किसी संकट के समय सभी एजेंसियां एक साथ कैसे प्रतिक्रिया दें।

भोपाल में काउंटर यूएएस यानी ड्रोन से जुड़े खतरों पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। इसमें मिलिट्री विशेषज्ञों के साथ सिविल एविएशन और एयरपोर्ट अथॉरिटी के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। यहां ड्रोन से बढ़ते खतरों पर चर्चा की गई।

बबीना में सेना, पुलिस और अन्य विभागों ने मिलकर जमीन स्तर पर गतिविधियां कीं। इसमें निगरानी, संयुक्त पेट्रोलिंग और आसपास के गांवों में संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दिया गया। (Military-Civil Fusion Campaign)

Military-Civil Fusion Campaign

चेन्नई और अन्य शहरों में भी हुई चर्चा

चेन्नई में विक्ट्री वॉर मेमोरियल पर एक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इसमें सेना, सिविल एडमिनिस्ट्रेशन और राज्य एजेंसियों के अधिकारी शामिल हुए। यहां इंटरनल सिक्योरिटी और संकट के समय प्रतिक्रिया पर चर्चा हुई।

बेलगावी और हैदराबाद में भी ट्रेनिंग और कोऑर्डिनेशन से जुड़ी गतिविधियां हुईं। वहीं जोधपुर और जैसलमेर जैसे रणनीतिक इलाकों में सिविल और मिलिट्री के बीच बेहतर तालमेल पर काम किया गया।

साथ काम करने से बढ़ा भरोसा

इस पूरे अभियान में सबसे अहम बात यह रही कि अलग-अलग एजेंसियां एक साथ आईं और उन्होंने मिलकर काम किया। सेना और सिविल एजेंसियों ने एक-दूसरे के अनुभव से सीखा और अपने काम करने के तरीके को बेहतर बनाया। इससे जानकारी का आदान-प्रदान तेज हुआ, फैसले जल्दी लिए गए और किसी भी स्थिति में मिलकर काम करने की क्षमता मजबूत हुई। (Military-Civil Fusion Campaign)