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CAG on ECHS: कैशलेस का वादा, लेकिन भुगतान की मार; क्यों चरमरा रही है पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य योजना?

पूर्व नौसेना प्रमुख रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इलाज से जुड़े खर्च के लिए बजट की कमी की वजह से अस्पतालों को समय पर पैसा नहीं मिल पाता...

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📍नई दिल्ली | 23 Dec, 2025, 12:36 PM

CAG on ECHS: पूर्व सैनिकों के लिए बनाई गई एक्स-सर्विसमैन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ईसीएचएस) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 18 दिसंबर को संसद में पेश की गई सीएजी (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट ने ईसीएचएस की कमजोर कड़ियां उजागर कर दी हैं। रिपोर्ट में घोटाले या भ्रष्टाचार की बात इसमें नहीं है, लेकिन रिपोर्ट खुलकर कहती है कि लापरवाहियों और पैसों की तंगी ने ईसीएचएस को उसके असली मकसद से दूर कर दिया है।

ईसीएचएस की शुरुआत 2003 में इस सोच के साथ हुई थी कि देश की सेवा कर चुके सैनिकों और उनके परिवारों को रिटायरमेंट के बाद इलाज के लिए भटकना न पड़े। योजना का मकसद था कि कैशलेस, बिना लिमिट के इलाज, चाहे मरीज किसी भी राज्य में क्यों न हो। लेकिन सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि यह वादा कागजों में तो कायम है, जमीनी लेवल पर लगातार कमजोर पड़ रहा है। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: अस्पतालों को भुगतान में हो रही देरी

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक ईसीएचएस के तहत जुड़े अस्पतालों को भुगतान में लगातार देरी हो रही है। इलाज से जुड़ी रकम के लिए जो बजट तय होता है, वह अक्सर कम पड़ जाता है। नतीजा यह होता है कि कई प्राइवेट अस्पताल महीनों तक भुगतान का इंतजार करते हैं और अंत में योजना से बाहर निकल जाते हैं।

पूर्व नौसेना प्रमुख रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इलाज से जुड़े खर्च के लिए बजट की कमी की वजह से अस्पतालों को समय पर पैसा नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर यह होता है कि अस्पताल ईसीएचएस छोड़ देते हैं और रिटायर्ड सैनिकों को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती है। (CAG on ECHS)

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उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सीजीएचएस जैसी योजना केंद्र सरकार के कर्मचारियों, सांसदों, जजों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए ठीक से चलाई जा सकती है, तो पूर्व सैनिकों के इलाज के लिए पैसा जुटाना इतना मुश्किल क्यों है। उन्होंने कहा कि ईसीएचएस एक अजीब व्यवस्था बन गई है, जहां मेंबरशिप तो जरूरी है और पूर्व सैनिकों से 30,000 से लेकर 1,20,000 रुपये तक की रकम ली जाती है, लेकिन मंत्रालय की तरफ से इस योजना को सुचारू चलाने की जिम्मेदारी कहीं नहीं दिखती। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: कैशलेस योजना है तो लेकिन जेब से खर्च क्यों?

ईसीएचएस को कैशलेस कहा जाता है, लेकिन कई मामलों में पूर्व सैनिकों को इलाज के समय अपनी जेब से पैसे देने पड़ते हैं। कहीं अस्पताल योजना से बाहर हो चुका होता है, तो कहीं बिल का भुगतान अटका रहता है। ऐसे में मरीज या तो इलाज टालता है या मजबूरी में पैसा खर्च करता है। (CAG on ECHS)

रिटायर्ड कमांडर विक्रम डब्ल्यू. कारवे का कहना है कि अगर सरकार सच में पूर्व सैनिकों की परवाह करती है, तो ईसीएचएस की कार्यप्रणाली में तुरंत सुधार जरूरी है। अच्छे अस्पतालों को योजना से जोड़ना होगा और उनके बिल समय पर चुकाने होंगे, वरना भरोसा लगातार टूटता रहेगा। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: योजना पर बोझ बढ़ा, बजट जस का तस

वरिष्ठ नौसेना अधिकारी और रक्षा मामलों के जानकार महेंद्र नेगी ने कहा कि बीते कुछ सालों में ईसीएचएस के दायरे को बिना तैयारी के बढ़ा दिया गया। योजना का मूल मकसद पूर्व सैनिकों के लिए था, लेकिन अब इसमें तीनों सेनाओं के यूनिफॉर्मधारी पेंशनर्स और बड़ी संख्या में आश्रित भी जुड़ गए हैं। इसके मुकाबले बजट में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ। (CAG on ECHS)

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उनका कहना है कि अब जरूरत है कि ईसीएचएस की पूरी रिव्यू की जाए। बजट बढ़ाया जाए, लाभार्थियों की स्पष्ट कैटेगरी तय हो और जिन लोगों को सीजीएचएस में शामिल किया जा सकता है, उन्हें वहां शिफ्ट किया जाए। इससे ईसीएचएस पर दबाव कम होगा और योजना वाकई काम की बन पाएगी। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: राजनीति में पूर्व सैनिकों की प्राथमिकता कहां

पूर्व ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह और भी सीधा बोलते हैं। उनका कहना है कि सरकार की दिलचस्पी ईसीएचएस सुधारने में इसलिए कम है क्योंकि पूर्व सैनिक कोई ऑर्गनाइज्ड वोट बैंक नहीं हैं। न तो वे “लाड़ली बहनाएं” हैं और न ही एम्प्लॉयमेंट की मांग करने वाला बड़ा समूह। उन्होंने यह भी कहा कि सर्विस में मौजूद सीनियर अधिकारी भी अक्सर इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाते। (CAG on ECHS)

CAG on ECHS: तीन राज्यों में ही खर्च का बड़ा हिस्सा

सीएजी रिपोर्ट और पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, ईसीएचएस का 60 फीसदी खर्च सिर्फ दिल्ली, पंजाब, और हरियाणा में हो जाता है। जबकि, देशभर के करीब 18 लाख मुख्य लाभार्थियों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी 24-26 फीसदी ही है। फिर भी, जालंधर, दिल्ली-I और दिल्ली-II जैसे रीजनल सेंटर्स नेशनल खर्च का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं।

रिटायर्ड वाइस एडमिरल सुधीर पिल्लै बताते हैं, ये असंतुलन सिर्फ संख्या की वजह से नहीं है। इसमें बड़े प्राइवेट और सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल, महंगे इलाज, ज्यादा कैंसर और हार्ट की बीमारियां, और रिटायरमेंट के बाद इन इलाकों में बसने की प्रवृत्ति भी शामिल है। (CAG on ECHS)

यही कारण है कि कई पूर्व सैनिकों को ईसीएचएस के साथ-साथ अलग से ग्रुप इंश्योरेंस या प्राइवेट हेल्थ कवर लेना पड़ रहा है।

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सीएजी की चेतावनी साफ है

सीएजी की रिपोर्ट यह नहीं कहती कि ईसीएचएस पूरी तरह फेल हो चुकी है, लेकिन यह जरूर बताती है कि योजना थक चुकी है। बेनेफिशियरीज बढ़ते गए, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ, बजट और मॉनिटरिंग उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। अगर समय रहते ठोस सुधार नहीं किए गए, तो ईसीएचएस सिर्फ नाम की हेल्थ स्कीम बनकर रह जाएगी। (CAG on ECHS)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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