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रिटायर्ड मेजर की पेंशन में देरी पर सेना प्रमुख और रक्षा सचिव पर 2 लाख रुपये का जुर्माना, सैलरी काटने का आदेश

साल 2017 में ड्यूटी के दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई। उन्हें दिल्ली कैंट के बेस अस्पताल में मेडिकल जांच के लिए लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनकी बीमारी की पहचान ‘सिस्टाइटिस सिस्टिका ग्लैंडुलरिस’ के रूप में की...

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📍नई दिल्ली/चंडीगढ़ | 3 May, 2026, 5:52 PM

Army pension delay case: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक रिटायर्ड आर्मी मेजर की दिव्यांग पेंशन में देरी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए रक्षा सचिव और सेना प्रमुख पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदलत ने कहा है कि यह रकम उनकी सैलरी से काटकर याचिकाकर्ता को दी जाए। यह मामला एक ऐसे पूर्व अधिकारी से जुड़ा है, जिसने सेवा के दौरान गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं झेली और कई बार सर्जरी करवाई, लेकिन उन्हें समय पर पेंशन नहीं मिल पाई।

Army pension delay case: सेवा के दौरान बिगड़ी तबीयत

महाराष्ट्र के पुणे निवासी मेजर राजदीप दिनकर पांडेर साल 2012 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे। शुरुआत में वह पूरी तरह फिट थे और उन्हें लद्दाख स्काउट्स यूनिट के साथ ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात किया गया। उन्होंने फील्ड एरिया, पीस स्टेशन और हाई-ऑल्टीट्यूड पोस्टिंग जैसे कठिन इलाकों में ड्यूटी की।

साल 2017 में ड्यूटी के दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई। उन्हें दिल्ली कैंट के बेस अस्पताल में मेडिकल जांच के लिए लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनकी बीमारी की पहचान ‘सिस्टाइटिस सिस्टिका ग्लैंडुलरिस’ के रूप में की। यह बीमारी मूत्राशय से जुड़ी होती है और लगातार इलाज की जरूरत होती है। इसके बाद उनकी सर्जरी हुई और उन्हें लो मेडिकल कैटेगरी में डाल दिया गया।

कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेशी

बीमारी के बाद मेजर पांडेर को कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया। अलग-अलग मेडिकल बोर्ड ने उनकी स्थिति का आकलन किया और उन्हें लगातार इलाज की जरूरत बताई गई। इस दौरान उनकी कई सर्जरी भी हुईं। बाद में 2022 में उन्हें चंडीमंदिर स्थित वेस्टर्न कमांड अस्पताल में रिलीज मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया।

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यहां मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता 15 फीसदी तय की, लेकिन यह भी कहा कि यह बीमारी सैन्य सेवा से जुड़ी नहीं है और न ही सेवा के कारण बढ़ी है। इसके आधार पर उन्हें सितंबर 2022 में सेना से रिटायर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने दिव्यांग पेंशन के लिए आवेदन किया, जिसे नवंबर 2022 में खारिज कर दिया गया।

ट्रिब्यूनल ने उठाए सवाल

इस फैसले के खिलाफ मेजर पांडेर ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि मेजर पांडेर की कई बार सर्जरी हुई और उनकी बीमारी सेवा के दौरान ही विकसित हुई थी। ऐसे में यह समझ से परे है कि अंतिम मेडिकल बोर्ड ने इसे सेवा से जुड़ा क्यों नहीं माना।

ट्रिब्यूनल ने 2008 के गाइडलाइन के आधार पर उनकी दिव्यांगता 40 प्रतिशत मानी और सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया। इसके साथ ही उन्हें जुलाई 2022 से दिव्यांग पेंशन देने का आदेश दिया गया।

हाई कोर्ट ने भी दी राहत

केंद्र सरकार ने ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन जुलाई 2025 में हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि मेजर पांडेर को पेंशन मिलने का अधिकार है और इसमें कोई संदेह नहीं है।

इसके बाद भी जब पेंशन जारी नहीं की गई, तो मेजर पांडेर ने हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने आदेश को लागू कराने की मांग की। अक्टूबर 2025 में अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया और पेंशन देने का निर्देश दिया।

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आदेश के बावजूद नहीं मिला भुगतान

अदालत के आदेश के बावजूद भी संबंधित अधिकारियों ने पेंशन जारी नहीं की। इस पर मेजर पांडेर ने कंटेम्प्ट पिटीशन दाखिल की। उनके वकील ने अदालत में कहा कि आदेश के बाद काफी समय बीत चुका है, लेकिन न तो कोई भुगतान हुआ है और न ही पेंशन से जुड़ा कोई आधिकारिक पत्र जारी किया गया है।

30 अप्रैल को सुनवाई के दौरान जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा कि पिछली सुनवाई में भी अधिकारियों को जवाब देने का आखिरी मौका दिया गया था, लेकिन उन्होंने कोई जवाब दाखिल नहीं किया। अदालत ने कहा कि अब एक और मौका दिया जा रहा है, लेकिन इसके साथ दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “अगर निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है, तो लागत लगाई जाएगी।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह रकम रक्षा सचिव और सेना प्रमुख की सैलरी से बराबर हिस्से में काटी जाएगी और डिमांड ड्राफ्ट के जरिए याचिकाकर्ता को दी जाएगी।

इस पूरे मामले में अदालत ने यह भी साफ किया कि मेडिकल बोर्ड के अलग-अलग आकलन में अंतर क्यों आया, यह स्पष्ट नहीं है। ट्रिब्यूनल ने भी इसी पर सवाल उठाए थे कि जब पहले कई बार बीमारी को सेवा से जुड़ा माना गया, तो आखिरी समय में इसे अलग क्यों बताया गया।

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