Prahar LMG India: अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भारतीय सेना को लाइट मशीन गन ‘प्रहार’ की पहली खेप सौंप दी है। इस खेप में कुल 2,000 लाइट मशीन गन शामिल हैं, जिन्हें पूरी तरह भारत में तैयार किया गया है। यह पहली बार है जब किसी बड़े प्राइवेट सेक्टर की कंपनी ने देश में इस स्तर पर लाइट मशीन गन बनाकर सेना को डिलीवर की हैं।
Prahar LMG India: तय समय से पहले पूरी हुई डिलीवरी
इस प्रोजेक्ट की खास बात यह रही कि कंपनी ने तय समय से काफी पहले काम पूरा कर लिया। जहां इस डिलीवरी के लिए ज्यादा समय तय था, वहीं पहली खेप सिर्फ सात महीने में ही तैयार कर ली गई।
इसके अलावा प्रोडक्शन का पहला मॉडल भी तय समय से पहले तैयार हुआ, जिससे बड़े स्तर पर निर्माण शुरू करने में तेजी आई। इसके बाद जरूरी मंजूरी मिलने के साथ ही फुल स्केल मैन्युफैक्चरिंग शुरू कर दी गई। (Prahar LMG India)
ग्वालियर में बनाया आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग सेंटर
इन मशीन गनों का निर्माण मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित अदाणी डिफेंस की स्मॉल आर्म्स फैसिलिटी में किया गया है। यह भारत का पहला ऐसा प्राइवेट सेक्टर हब है, जहां छोटे हथियारों का पूरा निर्माण एक ही जगह पर किया जाता है।
करीब 100 एकड़ में फैली इस यूनिट में बैरल बनाने से लेकर मशीनिंग, रोबोटिक्स, मेटल ट्रीटमेंट और टेस्टिंग तक की सभी सुविधाएं मौजूद हैं। यहां 25 मीटर लंबी अंडरग्राउंड फायरिंग रेंज भी बनाई गई है, जहां हथियारों की जांच की जाती है। (Prahar LMG India)
‘प्रहार’ मशीन गन की खासियत
प्रहार लाइट मशीन गन 7.62 मिमी कैलिबर की है। यह गन सेमी-ऑटोमैटिक और ऑटोमैटिक दोनों मोड में फायर कर सकती है। इसमें 120 राउंड का ड्रम या बेल्ट के जरिए गोलियां भरी जा सकती हैं। इसके अलावा इसमें मजबूत बाइपॉड, एडजस्टेबल बट स्टॉक और अतिरिक्त सेफ्टी सिस्टम भी दिए गए हैं।
यह गन करीब 8 किलो वजन की है और इसकी प्रभावी रेंज लगभग 1,000 मीटर तक है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि जरूरत पड़ने पर इसे मैदान में आसानी से खोला और जोड़ा जा सके। (Prahar LMG India)
हर हथियार की कड़ी जांच
अदाणी डिफेंस के मुताबिक, सेना को देने से पहले हर मशीन गन को कई तरह के टेस्ट से गुजरना होता है। इसमें बैलिस्टिक टेस्ट, एनवायरनमेंट ट्रायल और लंबी अवधि तक चलने की जांच शामिल है। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद ही हथियार को ऑपरेशन के लिए तैयार माना जाता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि हथियार हर तरह की परिस्थितियों में सही तरीके से काम करे। (Prahar LMG India)
90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा देश में तैयार
इस प्रोजेक्ट की एक अहम बात यह है कि इसमें 90 फीसदी से ज्यादा हिस्से भारत में ही बनाए गए हैं। इसका मतलब है कि अब छोटे हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो रही है। इस फैसिलिटी में बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी है। यहां हर साल एक लाख तक हथियार बनाए जा सकते हैं। इससे स्थानीय इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिल रहा है और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
कानपुर से मिलेगा गोला-बारूद का सपोर्ट
अदाणी डिफेंस का एक और बड़ा सेंटर उत्तर प्रदेश के कानपुर में है, जहां गोला-बारूद तैयार किया जाता है। यह यूनिट सालाना करीब 30 करोड़ राउंड छोटे हथियारों के लिए बना सकती है। इस तरह हथियार और गोला-बारूद दोनों का निर्माण देश में ही हो रहा है, जिससे पूरी सप्लाई चेन मजबूत हो रही है। (Prahar LMG India)
T-90 Gunnery Simulator: भारतीय सेना अब टी-90 भीष्म टैंक क्रू को सिमुलेटर पर ट्रेनिंग देगी। रक्षा मंत्रालय ने करीब 50 बेसिक गनरी सिमुलेटर खरीदने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। इन सिमुलेटर के जरिए टैंक गनर्स को बिना असली फायरिंग रेंज पर ले जाए ट्रेनिंग दी जाएगी।
यह सिमुलेटर खास तौर पर टी-90 टैंक के गनर और कमांडर को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएंगे, ताकि वे असली युद्ध जैसे माहौल में बेहतर तरीके से अभ्यास कर सकें।
T-90 Gunnery Simulator: असली फायरिंग जैसा अनुभव मिलेगा
सेना ने साफ किया है कि यह सिमुलेटर सिर्फ स्क्रीन पर ट्रेनिंग देने वाला साधारण सिस्टम नहीं होगा, बल्कि इसमें वास्तविक फायरिंग जैसा पूरा अनुभव मिलेगा। टैंक के अंदर का माहौल बिल्कुल असली टी-90जैसा बनाया जाएगा, जिसमें गनर की सीट, कंट्रोल्स और डिस्प्ले सिस्टम भी उसी तरह काम करेंगे।
इसमें गनर को दुश्मन को पहचानने, उसे ट्रैक करने, दूरी नापने, निशाना साधने और फायर करने तक की पूरी प्रक्रिया सिखाई जाएगी। इसमें 125 मिमी की मुख्य तोप, 7.62 मिमी मशीन गन, इनवार मिसाइल और स्मोक ग्रेनेड लॉन्चर का इस्तेमाल भी सिखाया जाएगा। (T-90 Gunnery Simulator)
आवाज और झटके भी लगेंगे
इस सिमुलेटर की एक खास बात यह होगी कि इसमें सिर्फ विजुअल नहीं, बल्कि आवाज और झटकों का भी पूरा अनुभव दिया जाएगा। जब टैंक फायर करेगा तो झटका महसूस होगा और स्क्रीन पर फ्लैश भी दिखाई देगा।
इंजन की आवाज, ऑटो लोडर के चलने की आवाज, दुश्मन की फायरिंग और युद्ध में बम फटने की आवाजें भी सुनाई देंगी। इससे ट्रेनिंग लेने वाला सैनिक मानसिक रूप से उसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जैसा असली युद्ध के दौरान होता है। (T-90 Gunnery Simulator)
मशीन में होगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल
इस सिमुलेटर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का खास इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें दुश्मन के टारगेट एआई के जरिए तैयार किए जाएंगे, जो हर अभ्यास के साथ ज्यादा मुश्किल होते जाएंगे।
इंस्ट्रक्टर चाहे तो कठिनाई का स्तर खुद भी तय कर सकता है। इसके अलावा सिस्टम खुद ही यह देखेगा कि ट्रेनिंग लेने वाला सैनिक कहां गलती कर रहा है और उसे सुधारने के सुझाव भी देगा। (T-90 Gunnery Simulator)
अलग-अलग इलाकों में होगी ट्रेनिंग
इस सिस्टम में भारत के अलग-अलग सीमावर्ती इलाकों जैसा माहौल बनाया जाएगा। इसमें पश्चिमी सीमा, नियंत्रण रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा जैसे क्षेत्रों के हालात शामिल होंगे।
रेगिस्तान, मैदान, नदी के इलाके, ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र और शहरी इलाकों जैसे अलग-अलग टेरेन में ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे सैनिकों को हर तरह के ऑपरेशन के लिए तैयार किया जा सकेगा। (T-90 Gunnery Simulator)
ट्रेनिंग पर नजर रखेगा इंस्ट्रक्टर
इस सिस्टम में एक इंस्ट्रक्टर स्टेशन भी होगा, जहां से ट्रेनिंग पर नजर रखी जाएगी। इंस्ट्रक्टर यह देख सकेगा कि सैनिक कैसे प्रदर्शन कर रहे हैं, कहां गलती कर रहे हैं और उन्हें कैसे सुधारना है। साथ ही बाहर लगे डिस्प्ले पर दूसरे सैनिक भी ट्रेनिंग को देख सकेंगे।
जरूरत पड़ने पर सिस्टम में जानबूझकर खराबी भी डाली जा सकती है, ताकि सैनिकों को इमरजेंसी स्थिति से निपटना सिखाया जा सके।
साइज और मजबूती पर खास ध्यान
सेना ने सिमुलेटर के डिजाइन को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसे मिलिट्री ग्रेड मजबूती के साथ बनाया जाना होगा, ताकि यह अलग-अलग मौसम और कठिन परिस्थितियों में काम कर सके।
यह सिस्टम इतना कॉम्पैक्ट होगा कि इसे अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रक में रखा जा सके। इसका वजन और साइज भी तय सीमा के भीतर होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके।
यह सिमुलेटर -10 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक के तापमान में काम कर सकेगा और दिन में 12 से 16 घंटे तक लगातार चलने में सक्षम होगा। इसमें बैकअप पावर के लिए यूपीएस की सुविधा भी होगी। (T-90 Gunnery Simulator)
लंबी सर्विस लाइफ और मेंटेनेंस की व्यवस्था
सेना ने इस सिमुलेटर की सर्विस लाइफ करीब 15 साल तय की है। कंपनियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे लंबे समय तक इसके स्पेयर्स और मेंटेनेंस की सुविधा दे सकें।
साथ ही, अगर किसी कंपनी को प्रोडक्शन बंद करना हो, तो उसे पहले से सूचना देनी होगी, ताकि जरूरी पार्ट्स का स्टॉक तैयार किया जा सके। (T-90 Gunnery Simulator)
खरीद प्रक्रिया में स्वदेशी कंपनियों को प्राथमिकता
यह पूरी प्रक्रिया आत्मनिर्भर भारत के तहत की जा रही है। इसका मतलब है कि इसमें भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सेना कंपनियों से यह भी पूछ रही है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है। इसके आधार पर आगे चयन किया जाएगा। (T-90 Gunnery Simulator)
MiG-29 ASRAAM missile upgrade: भारतीय वायुसेना अपने फेवरेट ‘बाज’ यानी मिग-29 फाइटर एयरक्राफ्ट (Fulcrum) को और ज्यादा घातक बनाने की तैयारी में है। वायुसेना मिग-29 में ASRAAM यानी एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल को लगाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने बकायदा इसके लिए प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। हाल ही में वायुसेना ने आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है, जिसमें इंडिजिनस कंपनियों से निविदा मांगी गई है।
इस अपग्रेड के तहत मिग-29 फ्लीट के 56 एयरक्राफ्ट, जिनमें 48 फाइटर और 8 ट्रेनर शामिल हैं, पर ASRAAM मिसाइल का इंटीग्रेशन और सर्टिफिकेशन किया जाएगा। इसके साथ ही नए लॉन्चर, टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और ट्रेनिंग भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे।
MiG-29 ASRAAM missile upgrade: क्यों जरूरी है यह अपग्रेड
मिग-29 भारतीय वायुसेनाका एक अहम फाइटर एयरक्राफ्ट है, जिसे मिग-29UPG वर्जन में अपग्रेड किया जा चुका है। इसके बावजूद इसमें इस्तेमाल हो रही कुछ मिसाइलें अब पुरानी हो चुकी हैं। खास तौर पर शॉर्ट रेंज फाइट यानी क्लोज कॉम्बैट में इस्तेमाल होने वाली आर-73 मिसाइल 1980 के दशक की टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है, जिसकी रेंज 10-15 किमीतक है। वहीं इसमें मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल भी इस्तेमाल होती है।
आज के समय में जब एयर कॉम्बैट तेजी से बदल रहा है, जहां बेहतर सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नई मिसाइल टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है। ऐसे में ASRAAM जैसी लेटेस्ट मिसाइल के इंटीग्रेट होने से मिग-29 की कॉम्बैट क्षमता बनी रहेगी, बल्कि मॉडर्न डॉगफाइट में भी इसकी सुपीरियरिटी बनी रहेगी। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
Photo Source: IAF
क्या है ASRAAM मिसाइल
ASRAAM एक शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (विद इन विजुअल रेंज- WVR) है, जिसे ब्रिटेन की कंपनी एमबीडीए ने डेवलप किया है। यह मिसाइल मैक-3 से ज्यादा की स्पीड से उड़ सकती है और इसकी रेंज लगभग 25 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है। ASRAAM को साल 1998 में रॉयल एयर फोर्स (RAF) में शामिल किया गया था।
इसमें एडवांस्ड इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर लगा होता है, जो दुश्मन के विमान को बेहतर तरीके से पहचान सकता है। यह मिसाइल फ्लेयर्स और जैमिंग जैसी तकनीकों से बचने में भी सक्षम है।
ASRAAM की एक खूबी यह भी है कि इसे लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च (LOBL) और लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च (LOAL) मोड में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च मोड में पायलट पहले दुश्मन के विमान को अपनी स्क्रीन या हेलमेट से देखता है और मिसाइल को उसी समय टारगेट पर लॉक कर देता है। जब लॉक हो जाता है, तब मिसाइल फायर की जाती है। इसका फायदा यह है कि मिसाइल पहले से टारगेट को पकड़ चुकी होती है, इसलिए हिट करने की संभावना ज्यादा रहती है।
वहीं, लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च ज्यादा एडवांस है। इस मोड में पायलट बिना पूरी तरह लॉक किए पहले मिसाइल दाग देता है। मिसाइल हवा में आगे बढ़ती है और उड़ते-उड़ते खुद ही टारगेट को ढूंढकर लॉक कर लेती है। इसमें पायलट सिर्फ दिशा बताता है कि दुश्मन किस तरफ है। बाकी काम मिसाइल खुद करती है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि पायलट को दुश्मन को सीधे सामने रखने की जरूरत नहीं होती। वह साइड में या दूर होते हुए भी हमला कर सकता है। कई बार दुश्मन को पता भी नहीं चलता कि मिसाइल उसकी तरफ आ रही है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
Air Chief Marshal AP Singh with MiG-29 UPG on March 12, 2026
चीन की PL-10 और पाकिस्तान की PL-10E से कैसे करेगी मुकाबला
भारत के मुकाबले चीन और पाकिस्तान भी अपने फाइटर जेट में आधुनिक शॉर्ट रेंज मिसाइलें इस्तेमाल कर रहे हैं। चीन की PL-10 और उसका एक्सपोर्ट वर्जन PL-10E ऐसी ही मिसाइलें हैं। चीन की PL-10 मिसाइल को साल 2015 में सेवा में शामिल किया गया था। इसका डेवलपमेंट 2004 में शुरू हुआ था और 2010 में इसका डिजाइन मंजूर हुआ। इसके बाद 2013 से इसका प्रोडक्शन शुरू हो गया।
यह मिसाइल खास तौर पर चीन के नए फाइटर जेट जैसे जे-10सी, जे-16 और जे-20 के लिए बनाई गई है। यह एक शॉर्ट रेंज इंफ्रारेड गाइडेड मिसाइल है, यानी यह दुश्मन के विमान की गर्मी को ट्रैक करके उसे निशाना बनाती है।
पीएल-10 की रेंज आम तौर पर करीब 20 किलोमीटर बताई जाती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह 30 किलोमीटर तक भी जा सकती है। इसकी स्पीड मैक-4 तक पहुंच सकती है, जो इसे काफी तेज बनाती है।
अगर ASRAAM से तुलना करें, तो पीएल-10 की टॉप स्पीड ज्यादा है। लेकिन ASRAAM में बड़ा रॉकेट मोटर लगा होता है, जिससे यह ज्यादा देर तक रफ्तार बनाए रख सकती है और लंबी दूरी तक असरदार बनी रहती है।
पाकिस्तान ने भी इस मिसाइल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। वह पीएल-10ई वर्जन को अपने जेएफ-17 ब्लॉक-3 फाइटर जेट में लगा रहा है। यह डील चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग का हिस्सा है।
मिग-29 में हुए क्या-क्या अपग्रेड
हाल ही में 12 मार्च को एयर फोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आदमपुर एयरबेस पर अपग्रेड हुए मिग-29 यूपीजी को उड़ाया था। भारतीय वायुसेना के मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट पहले से ही कई अपग्रेड से गुजर चुके हैं। शुरुआत में 6 मिग-29 विमानों का अपग्रेड रूस में किया गया था, जबकि बाकी विमानों को भारत में नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में अपग्रेड किया गया। वायुसेना के अधिकारियों के अनुसार, हर एक मिग-29 को अपग्रेड करने में करीब 15 मिलियन डॉलर खर्च आया है। अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी की क्षमता काफी हद तक एफ-16 ब्लॉक 70 जैसे आधुनिक फाइटर के बराबर मानी जा रही है।
इसमें नया झुक-एमई रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक कर सकता है। हवाई मोड में यह करीब 120 किलोमीटर दूर तक दुश्मन के विमान को पहचान सकता है। यह एक साथ 10 टारगेट को ट्रैक कर सकता है और उनमें से 4 पर एक साथ हमला किया जा सकता है। इसके अलावा इसमें एडवांस एवियोनिक्स, ग्लास कॉकपिट और इन-फ्लाइट रिफ्यूलिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं।
मिग-29यूपीजी में ईएलटी-568 जैमर भी लगाया गया है। यह सिस्टम दुश्मन के रडार और मिसाइलों को भ्रमित करने में मदद करता है। इससे विमान पर हमला करना मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा मिग-29 में डी-29 इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार को पहचान कर उसे जाम करने में मदद करता है। इसे भारत में ही डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट ने बनाया है और इसका निर्माण बीईएल ने किया है। इसके साथ ही इसमें आईआरएसटी यानी इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम भी है, जो बिना रडार ऑन किए दुश्मन के विमान को ट्रैक कर सकता है।
इसके अलावा इसमें सिक्योर डेटा लिंक भी लगाया गया है, जिससे यह अवाक्स और ग्राउंड रडार से जुड़कर जानकारी ले सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
मिग-29 का इंजन भी बदला
मिग-29 यूपीजी में नए सीरीज-3 आरडी-33 इंजन भी लगाया गया है। जहां चीन का जे-11 फाइटर जेट थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो के मामले में करीब 1 पर है, वहीं मिग-29 यूपीजी का यह अनुपात लगभग 1.11 तक पहुंच जाता है। जिससे मिग-29 ज्यादा वजन के साथ भी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
मिग-29 के आरडी-33 इंजन की खासियत यह है कि यह बहुत तेजी से पावर जनरेट करता है, जिससे पायलट को अचानक स्पीड और ऊंचाई बदलने में मदद मिलती है। यही वजह है कि हवाई लड़ाई के दौरान यह दुश्मन की मिसाइलों से बचने और जवाबी हमला करने में ज्यादा सक्षम माना जाता है। इन इंजनों का निर्माण भारत में ही एचएएल के कोरापुट डिवीजन में लाइसेंस के तहत किया जा रहा है। इस अपग्रेड के बाद मिग-29 अब सात हार्ड पॉइंट्स पर करीब 4,500 किलोग्राम तक हथियार ले जा सकता है, जिससे इसकी स्ट्राइक क्षमता बढ़ गई है।
इसके अलावा इस अपग्रेड से मिग-29 की रेंज में भी करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। अब यह विमान सिर्फ अपने इंटरनल फ्यूल के सहारे करीब 2,100 किलोमीटर तक मिशन पूरा कर सकता है। साथ ही इसमें एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के लिए रिट्रैक्टेबल प्रोब भी जोड़ा गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर उड़ान के दौरान ही ईंधन भरा जा सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
बढ़ जाएगी मिग-29 की लाइफ
मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट को अभी कई साल तक सेवा में रखा जाना है। भारतीय वायुसेना का प्लान इसे 2033–37 तक रिटायर करने का है। इस वजह से इसमें लगातार नए अपग्रेड किए जा रहे हैं, ताकि यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक काम करता रहे। ASRAAM का इंटीग्रेशन इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल मिग-29 की तीन स्क्वाड्रन हैं, जो अलग-अलग इलाकों में तैनात हैं। इन एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन मिशन में किया जाता है। इन बदलावों के चलते इस विमान की उम्र करीब 10 साल तक बढ़ गई है। इसके रखरखाव की लागत भी कम हुई है और इसकी ऑपरेशनल रेंज भी पहले से ज्यादा हो गई है।
इन सभी अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी अब एक आधुनिक 4 जेनरेशन फाइटर के बराबर माना जाता है। इसकी लड़ाकू क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ताकत दोनों में बड़ा सुधार हुआ है। अब यह विमान पहले की तुलना में ज्यादा समय तक उड़ान भर सकता है और ज्यादा प्रभावी तरीके से मिशन पूरा कर सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
किन मिसाइलों की जगह लेगी ASRAAM
मिग-29 में अभी दो तरह की एयर-टू-एयर मिसाइलें इस्तेमाल होती हैं। मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल और शॉर्ट रेंज मिसाइल के लिए आर-73 मिसाइल लगी है।
अब वायुसेना आर-77 की जगह स्वदेशी अस्त्र मार्क-1 और आने वाले समय में अस्त्र मार्क-2 को शामिल करने की योजना बना रही है। वहीं आर-73 की जगह ASRAAM को लाया जा रहा है।
इस बदलाव के बाद मिग-29 पूरी तरह आधुनिक मिसाइल सिस्टम से लैस हो जाएगा, जिसमें लंबी दूरी के लिए अस्त्र और नजदीकी लड़ाई के लिए ASRAAM का कॉम्बिनेशन होगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
दो कंपनियां बनाती हैं ASRAAM
ASRAAM मिसाइल को मुख्य रूप से दो कंपनियां बनाती हैं। पहली कंपनी है ब्रिटेन की एमबीडीएहै, जो इस मिसाइल की असली और मुख्य निर्माता यानी ओईएम है। दुनिया भर में जो ASRAAM मिसाइल इस्तेमाल होती है, उसकी सप्लाई भी यही कंपनी करती है। यूके, ऑस्ट्रेलिया और कई फाइटर जेट जैसे टाइफून और एफ-35 में यही मिसाइल लगाई जाती है।
वहीं, दूसरी कंपनी है भारत डायनैमिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल, जो भारत की सरकारी रक्षा कंपनी है। साल 2021 में दोनों कंपनियों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत में ही ASRAAM मिसाइल को जोड़ने और तैयार करने का काम शुरू हुआ। अब हैदराबाद में बीडीएल इस मिसाइल की असेंबली, टेस्टिंग और इंटीग्रेशन करती है।
एक जैसी मिसाइलों से मिलेगा फायदा
वायुसेना अब अपने अलग-अलग फाइटर एयरक्राफ्ट में एक जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है। ASRAAM को पहले ही तेजस मार्क-1ए और जगुआर जैसे एयरक्राफ्ट में शामिल किया जा चुका है। भारतीय वायुसेना की योजना है कि धीरे-धीरे इस मिसाइल को सभी फाइटर जेट में लगाया जाए।
अगर मिग-29 में भी यही मिसाइल लगती है, तो ट्रेनिंग और मेंटेनेंस आसान हो जाएगा। पायलट एक ही तरह की मिसाइल पर ट्रेनिंग ले सकेंगे और लॉजिस्टिक्स भी सरल हो जाएगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
कैसे होगा इंटीग्रेशन
आरएफपी के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट में मिसाइल को एयरक्राफ्ट के साथ पूरी तरह जोड़ना और उसकी टेस्टिंग शामिल होगी। इसके अलावा 98 नए लॉन्चर दिए जाएंगे, जिनमें प्रोटोटाइप और प्रोडक्शन दोनों शामिल हैं।
इसके साथ ही टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और मेंटेनेंस टूल्स भी दिए जाएंगे। वायुसेना के 30 कर्मियों को इस सिस्टम के लिए खास ट्रेनिंग भी दी जाएगी, जो नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में होगी।
इस प्रक्रिया में एयरक्राफ्ट के सॉफ्टवेयर, फायर कंट्रोल सिस्टम और अन्य सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि मिसाइल पूरी तरह से काम कर सके। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
हाई एल्टीट्यूड में शानदार परफॉरमेंस
2020 में लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए गतिरोध के दौरान हल्के वजन के चलते मिग-29 यूपीजी ने शानदार प्रदर्शन किया था। ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में इसकी क्षमता को देखते हुए इसे “ड्रैगन स्लेयर” का नाम भी दिया गया। 2020 में पूरी लद्दाख में स्टैंडऑफ के दौरान मिडियम-वेट फाइटर जैसे मिग-29 यूपीजी और राफेल ने उच्च हिमालयी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि भारी फाइटर जेट जैसे सुखोई-30 एमकेआई को पतली हवा के चलते कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
लद्दाख में तैनाती के दौरान मिग-29 यूपीजी को लेह और थोइस एयरबेस पर ऑपरेट किया गया। लेह करीब 10,600 फीट और थोइस लगभग 9,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। इन एयरबेस से मिग-29 ने नियमित सॉर्टीज उड़ाईं और हिमालयी इलाकों में पेट्रोलिंग की। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
मिग-29 यूपीजी की ताकत का सबसे बड़ा कारण उसका हल्का वजन है। इसका मैक्स टेकऑफ वेट करीब 27 टन है, जबकि सुखोई-30 एमकेआई लगभग 38 टन का होता है। ऊंचाई वाले इलाकों में जहां हवा पतली होती है, वहां हल्का विमान ज्यादा आसानी से लिफ्ट और थ्रस्ट हासिल कर पाता है। यही वजह है कि मिग-29 ऐसे इलाकों में ज्यादा सहज तरीके से ऑपरेट करता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
Indian Army Dhanush Howitzer Photo By Raksha Samachar
Dhanush Artillery Gun India: भारतीय सेना की आर्टिलरी पावर को नया बूस्ट मिलने वाला है। शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में सेना के लिए 300 स्वदेशी धनुष आर्टिलरी गन सिस्टम खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है।
इस फैसले के बाद सेना के तोपखाने की ताकत में बड़ा इजाफा होने वाला है।
Dhanush Artillery Gun India: 300 नई तोपों से बढ़ेंगी रेजिमेंट
धनुष तोपों की यह बड़ी संख्या सेना में नई आर्टिलरी रेजिमेंट तैयार करने में मदद करेगी। सूत्रों के मुताबिक, इन 300 तोपों के शामिल होने के बाद सेना के पास 15 से ज्यादा नई रेजिमेंट तैयार हो सकेंगी।
अभी तक धनुष तोप की करीब 3 रेजिमेंट सेना में शामिल हो चुकी हैं और 3 और रेजिमेंट शामिल होने की प्रक्रिया में हैं। जैसे-जैसे नई तोपें मिलती जाएंगी, आर्टिलरी यूनिट्स की संख्या और बढ़ती जाएगी।
पहले चरण में साल 2019 में बुल्क प्रोडक्शन क्लियरेंस मिलने के बाद 114 धनुष तोपों का ऑर्डर दिया गया था। उम्मीद जताई जा रही है कि 114 तोपों की पूरी डिलीवरी इसी साल तक पूरी हो जाएगी। वहीं अब कुल मिलाकर धनुष की संख्या 400 से ज्यादा हो जाएगी। (Dhanush Artillery Gun India)
क्यों कहा जाता है ‘देसी बोफोर्स’
धनुष तोप को अक्सर ‘देसी बोफोर्स’ कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि इसका डिजाइन पुराने बोफोर्स गन FH-77B सिस्टम पर आधारित है, लेकिन इसमें कई नए बदलाव और सुधार किए गए हैं।
यह 155 मिमी और 45 कैलिबर की तोप है, जो करीब 38 से 40 किलोमीटर तक मार कर सकती है। पुराने बोफोर्स सिस्टम की रेंज करीब 27 किलोमीटर थी। यानी धनुष उससे काफी ज्यादा दूरी तक निशाना साध सकती है।
इसकी बैरल लंबाई बढ़ाई गई है, जिससे इसकी रेंज और सटीकता दोनों बेहतर हुई हैं। इसके साथ ही इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी जोड़े गए हैं। सस्टेन मोड में धनुष प्रति घंटा 60 राउंड तक फायर कर सकती है। (Dhanush Artillery Gun India)
स्वदेशी तकनीक से तैयार
धनुष तोप का निर्माण भारत में ही किया जा रहा है। इसे जबलपुर स्थित गन कैरिज फैक्ट्री में तैयार किया जाता है, जो अब एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड का हिस्सा है।
इस सिस्टम में 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से स्वदेशी हैं। इसका मतलब है कि इसमें ज्यादातर पार्ट्स भारत में ही बनाए जाते हैं। इससे उत्पादन पर देश का नियंत्रण बना रहता है और बाहर पर निर्भरता कम होती है।
इस प्रोजेक्ट पर काम 2011 के आसपास शुरू हुआ था और कुछ वर्षों में इसका प्रोटोटाइप तैयार किया गया। इसके बाद टेस्टिंग और सुधार के बाद इसे सेना में शामिल किया गया। (Dhanush Artillery Gun India)
कैसे काम करती है धनुष तोप
धनुष एक टोड आर्टिलरीगन है, यानी इसे किसी वाहन के जरिए खींचकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है। इसे ऑपरेट करने के लिए आमतौर पर 6 से 8 जवानों की टीम की जरूरत होती है।
इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और ऑटो लेइंग जैसी सुविधाएं दी गई हैं। इसका मतलब यह है कि यह अपने आप लक्ष्य की दिशा तय करने में मदद करती है और फायरिंग को ज्यादा सटीक बनाती है।
इसमें ऑनबोर्ड बैलिस्टिक कंप्यूटेशन सिस्टम भी है, जो हवा, दूरी और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फायरिंग की कैलकुलेशन करता है। इससे निशाना ज्यादा सटीक लगता है। (Dhanush Artillery Gun India)
ऑपरेशन सिंदूर में भी हुआ था इस्तेमाल
धनुष तोप का इस्तेमाल हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी किया गया था। इसे सीमावर्ती इलाकों में तैनात किया गया और इसका उपयोग किया गया। इस दौरान यह देखा गया कि यह तोप पहाड़ी और कठिन इलाकों में भी प्रभावी तरीके से काम कर सकती है।
सेना के आधुनिकीकरण का हिस्सा
भारतीय सेना 1999 से अपने आर्टिलरी सिस्टम को आधुनिक बनाने की योजना पर काम कर रही है। जिसे फील्ड आर्टिलरी रैशनलाइजेशन प्लान कहा जाता है। इस योजना के तहत 2027 तक करीब 2800 नई 55 मिमी तोपों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें अलग-अलग तरह की तोपें शामिल हैं। कुछ तोपें ऐसी हैं जिन्हें गाड़ियों से खींचा जाता है, कुछ ट्रक पर लगी होती हैं और कुछ खुद चलने वाली यानी सेल्फ प्रोपेल्ड होती हैं।
इसके अलावा अल्ट्रा लाइट होवित्जर तोपें भी शामिल हैं, जिन्हें हेलीकॉप्टर के जरिए पहाड़ी इलाकों तक पहुंचाया जा सकता है, जहां सड़क से पहुंचना मुश्किल होता है। (Dhanush Artillery Gun India)
पहले से मौजूद सिस्टम
सेना के पास पहले से ही कई आधुनिक तोप सिस्टम मौजूद हैं। इनमें एम-777अल्ट्रा लाइट होवित्जर शामिल हैं, जिनकी संख्या 145 के करीब है। ये हल्की तोपें हैं और इन्हें हवाई रास्ते से ले जाया जा सकता है।
इसके अलावा के-9 वज्र नाम की ट्रैक्ड सेल्फ प्रोपेल्ड गन भी सेना में शामिल है। इसकी संख्या करीब 100 है। यह सिस्टम खास तौर पर तेजी से मूव करने और फायर करने के लिए जाना जाता है।
इन सभी सिस्टम के बीच धनुष एक मजबूत टोड आर्टिलरी विकल्प के रूप में सामने आया है, जो लंबी दूरी तक सटीक हमला कर सकता है। (Dhanush Artillery Gun India)
डीएसी में सेना को और क्या मिला
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में 55 प्रस्तावों को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी यानी एओएन के तहत मंजूरी दी गई। जो किसी एक वित्तीय वर्ष में अब तक की सबसे बड़ी मंजूरी मानी जा रही है।
सेना के हिस्से में पांच अहम सिस्टम शामिल किए गए हैं। इनमें एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम प्रमुख है, जो रियल टाइम में हवाई खतरों की पहचान और रिपोर्टिंग करने में मदद करेगा। मौजूदा समय में क्रूज मिसाइल और लोइटरिंग म्यूनिशन जैसे खतरों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यह सिस्टम सेना के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।
साथ ही, टैंक यूनिट्स को मजबूत करने के लिए आर्मर्ड पियर्सिंग टैंक अम्यूनिशन को भी मंजूरी दी गई है। इससे दुश्मन के भारी बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ सेना की क्षमता और प्रभावी होगी।
कम्युनिकेशन सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए हाई कैपेसिटी रेडियो रिले सिस्टम को शामिल किया गया है। यह सिस्टम युद्ध के दौरान संचार को सुरक्षित रखने और जैमिंग या इंटरसेप्शन से बचाने में मदद करेगा।
इसके साथ ही रनवे इंडिपेंडेंट एरियल सर्विलांस सिस्टम को भी मंजूरी मिली है। यह सिस्टम बिना किसी एयरबेस पर निर्भर हुए जमीन से ही निगरानी करने की सुविधा देता है। खास तौर पर लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे इलाकों में, जहां एयरफील्ड की कमी होती है, वहां यह सिस्टम काफी उपयोगी माना जा रहा है। (Dhanush Artillery Gun India)
IAF S-400 Sudarshan Revealed: First Official Image Marks New Era in India’s Air Defence
DAC S-400 India Approval: सरकार ने भारतीय वायुसेना के लिए अतिरिक्त एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह फैसला शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में लिया गया।
इस मंजूरी के बाद अब एस-400 सिस्टम की खरीद की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर शुरू हो जाएगी। इससे पहले डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने भी पांच अतिरिक्त यूनिट खरीदने की सिफारिश की थी। अब अंतिम मंजूरी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की बैठक में दी जाएगी।
DAC S-400 India Approval: ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार हुआ इस्तेमाल
एस-400 सिस्टम का इस्तेमाल हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था। यह पहली बार था जब इस सिस्टम का कॉम्बैट डेब्यू हुआ। इस ऑपरेशन में एस-400 ने पाकिस्तान के एक एयरक्राफ्ट को करीब 300 किलोमीटर की दूरी से निशाना बनाया।
यह अब तक का सबसे लंबी दूरी का इंटरसेप्शन माना जा रहा है। इस घटना के बाद इस सिस्टम की क्षमता को लेकर वायुसेना के अंदर भरोसा और मजबूत हुआ।
अभी कितनी यूनिट हैं और क्या है स्थिति
भारत ने साल 2018 में रूस के साथ एस-400 सिस्टम खरीदने का बड़ा समझौता किया था। इस डील के तहत कुल पांच स्क्वाड्रन मिलने थे। इनमें से अब तक तीन स्क्वाड्रन भारत को मिल चुके हैं।
पहली यूनिट दिसंबर 2021 में मिली थी, दूसरी अप्रैल 2022 में और तीसरी फरवरी 2023 में डिलीवर हुई। बाकी दो यूनिट 2024 तक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से डिलीवरी में देरी हो गई।
अब रक्षा अधिकारियों के अनुसार, चौथी यूनिट अगले कुछ महीनों में मिल सकती है, जबकि पांचवीं यूनिट साल के आखिर तक मिलने की संभावना है।
मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट को भी मिली थी मंजूरी
ऑपरेशन सिंदूर के बाद डीएसी ने एस-400 सिस्टम के लिए एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट को भी मंजूरी दी थी। किसी भी बड़े सैन्य सिस्टम के लिए मेंटेनेंस बेहद जरूरी होता है, ताकि वह लंबे समय तक सही तरीके से काम करता रहे।
इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत सिस्टम की सर्विसिंग, मरम्मत और जरूरी अपडेट किए जाते हैं। समय-समय पर इसे रिन्यू भी किया जाता है, जिससे सिस्टम की कार्यक्षमता बनी रहती है।
एस-400 सिस्टम की खूबियां
एस-400 एक लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जो दुश्मन के हवाई खतरों को दूर से ही पहचान कर उन्हें नष्ट कर सकता है। इसका रडार करीब 600 किलोमीटर दूर तक आने वाले टारगेट को डिटेक्ट कर सकता है।
यह सिस्टम एक साथ 100 से ज्यादा टारगेट को ट्रैक कर सकता है और उनमें से कई को एक साथ निशाना बना सकता है। इसकी खासियत यह है कि यह अलग-अलग तरह के खतरों को पहचान सकता है।
इसमें फाइटर जेट, स्ट्रैटेजिक बॉम्बर, अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे टारगेट शामिल हैं। यह सिस्टम इन सभी को 400 किलोमीटर तक की दूरी से इंटरसेप्ट करने की क्षमता रखता है।
चार तरह की मिसाइलों से लैस
एस-400 सिस्टम में चार अलग-अलग रेंज की मिसाइलें इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें 400 किलोमीटर, 250 किलोमीटर, 120 किलोमीटर और 40 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलें शामिल हैं।
इसका मतलब यह है कि यह सिस्टम अलग-अलग दूरी पर आने वाले टारगेट को उनकी स्थिति के हिसाब से निशाना बना सकता है। यही वजह है कि इसे मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा माना जाता है।
बड़े स्तर पर डिफेंस खरीद को मंजूरी
इसी बैठक में सिर्फ एस-400 ही नहीं, बल्कि कई अन्य रक्षा खरीद प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई है। कुल मिलाकर करीब 2.38 लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी गई है।
इस वित्तीय वर्ष में अब तक कुल 6.73 लाख करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी मिल चुकी है। यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।
इन प्रस्तावों में सेना, वायुसेना और कोस्ट गार्ड के लिए अलग-अलग तरह के सिस्टम शामिल हैं। इसमें एयर डिफेंस, आर्टिलरी, कम्युनिकेशन सिस्टम, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और ड्रोन जैसे उपकरण शामिल हैं।
सेना और वायुसेना के लिए अलग-अलग योजनाएं
सेना के लिए एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम, धनुष गन सिस्टम और टैंक के लिए खास गोला-बारूद जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। इसके अलावा कम्युनिकेशन सिस्टम को मजबूत करने के लिए हाई कैपेसिटी रेडियो रिले और निगरानी के लिए नए सिस्टम पर भी काम किया जाएगा।
वायुसेना के लिए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम को मंजूरी दी गई है, जिससे पुराने विमानों की जगह नए विमान लिए जाएंगे। इसके अलावा स्ट्राइक ड्रोन और फाइटर एयरक्राफ्ट के इंजन अपग्रेड जैसे प्रोजेक्ट भी शामिल हैं।
कोस्ट गार्ड के लिए भी नए एयर कुशन व्हीकल्स खरीदने की योजना को मंजूरी दी गई है, जिनका इस्तेमाल समुद्री गश्त और रेस्क्यू ऑपरेशन में किया जाएगा।
Tunguska-P8i contracts: भारत सरकार ने डिफेंस सेक्टर को मजबूती देने के लिए शुक्रवार को दो बड़े समझौते किए हैं। कुल 858 करोड़ रुपये के इन सौदों में एक तरफ भारतीय सेना के लिए तुंगुश्का एयर डिफेंस मिसाइल गन सिस्टम के लिए मिसाइलें/स्पेयर्स खरीदे जाएंगे, वहीं दूसरी तरफ नौसेना के खास पी-8आई विमान की देखरेख और मेंटेनेंस की व्यवस्था की जाएगी।
Tunguska-P8i contracts: सेना के लिए तुंगुश्का एयर डिफेंस सिस्टम का अपग्रेड
पहला कॉन्ट्रैक्ट 445 करोड़ रुपये का है, जिसके तहत भारतीय सेना के तुंगुश्का एयर डिफेंस मिसाइल गन सिस्टम के लिए मिसाइलें/स्पेयर्स खरीदे जाएंगे। यह समझौता रूस की कंपनी जेएससी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ किया गया है।
तुंगुश्का एक ऐसा एयर डिफेंससिस्टम है, जो आसमान से आने वाले खतरों को रोकने के लिए इस्तेमाल होता है। इसमें मिसाइल और गन दोनों का कॉम्बिनेशन होता है, जिससे यह कम दूरी पर तेजी से हमला करने वाले टारगेट को भी निशाना बना सकता है। इस सिस्टम की खास बात यह है कि यह सिस्टम ड्रोन और मिसाइलों को निशाना बना सकता है।
India boosts its air defence shield! 🇮🇳🛡️
A key contract has been signed for the procurement of Tunguska Air Defence Missile System, valued at ₹445 crore, for the Indian Army.
The agreement was signed with JSC Rosoboronexport in the presence of Defence Secretary Rajesh Kumar…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) March 27, 2026
आज के समय में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लो फ्लाइंग एयरक्राफ्ट जैसे खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में तुंगुश्का जैसे सिस्टम सेना की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। यह सिस्टम बहुत कम समय में रेस्पॉन्स देता है और चलते-फिरते भी इस्तेमाल किया जा सकता है। भारतीय सेना में यह सिस्टम 1990 में शामिल किया गया था। इसकी मिसाइलों की रेंज 8-10 किमी तक है, जबकि यह पांच किमी दूर से ही गोलियों के जरिए किसी ड्रोन को निशाना बना सकता है। लेकिन समय के साथ यह सिस्टम पुराना हो गया है और इसे अपग्रेड की जरूरत है। इस सौदे के जरिए भारतीय सेना की मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम और मजबूत होगी। (Tunguska-P8i contracts)
नौसेना के पी8आई विमानों की होगी देश में ही देखरेख
दूसरा कॉन्ट्रैक्ट 413 करोड़ रुपये का है, जो भारतीय नौसेना के पी8आई लॉन्ग रेंज मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट की मेंटेनेंस के लिए किया गया है। यह समझौता बोइंग इंडिया डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ हुआ है।
पी8आई विमान भारतीय नौसेना के सबसे अहम विमानों में से एक है। इसका इस्तेमाल समुद्र में निगरानी, दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और लंबी दूरी तक गश्त करने के लिए किया जाता है।
India strengthens self-reliance in naval aviation! 🇮🇳✈️
A major contract has been signed for the Depot Level Inspection of Boeing P-8I Poseidon aircraft of the Indian Navy under the Buy Indian category with 100% indigenous content, valued at ₹413 crore.
The agreement has been… pic.twitter.com/GGwjcanYlH
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) March 27, 2026
अब तक इन विमानों की बड़ी मरम्मत और जांच के लिए कई बार विदेश पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन इस नए कॉन्ट्रैक्ट के बाद इनकी डिपो लेवल मेंटेनेंस भारत में ही की जाएगी। (Tunguska-P8i contracts)
देश में बनेगा मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर
इस समझौते के तहत भारत में ही एमआरओ यानी मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा विकसित की जाएगी। जिसके तहत विमान की गहरी जांच, मरम्मत और जरूरी बदलाव देश के अंदर ही किए जाएंगे।
इससे समय की बचत होगी और ऑपरेशनल उपलब्धता भी बढ़ेगी। यानी विमान ज्यादा समय तक मिशन के लिए तैयार रहेंगे।
यह कदम सरकार की आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया नीति के तहत उठाया गया है। इसमें खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में 100 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट यानी स्वदेशी भागीदारी रखी गई है। (Tunguska-P8i contracts)
पी8आई विमान क्यों है अहम
पी8आई विमान लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है और समुद्र के बड़े इलाके पर नजर रख सकता है। इसमें एडवांस सेंसर और रडार लगे होते हैं, जो पानी के नीचे छिपी पनडुब्बियों का भी पता लगा सकते हैं। यह विमान भारतीय महासागर क्षेत्र में निगरानी के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसके जरिए नौसेना दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखती है और समय रहते कार्रवाई कर सकती है। (Tunguska-P8i contracts)
US mines Iran missile bases: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने उसके एक इलाके में फाइटर जेट के जरिए ऐसे विस्फोटक पैकेट गिराए हैं, जो दिखने में खाने के डिब्बों जैसे हैं, लेकिन खोलते ही फट जाते हैं। यह दावा खास तौर पर शिराज शहर के आसपास के इलाकों को लेकर किया गया है, जहां ईरान के अहम मिसाइल ठिकाने मौजूद बताए जाते हैं।
ईरान की सरकारी एजेंसी तसनीम न्यूज ने सोशल मीडिया पर इस बारे में जानकारी दी और कुछ तस्वीरें भी शेयर कीं। इन तस्वीरों में छोटे-छोटे डिब्बे जैसे ऑब्जेक्ट दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें विस्फोटक बताया जा रहा है।
US mines Iran missile bases: ‘कैन फूड’ जैसे दिखने वाले विस्फोटक
तसनीम की रिपोर्ट के मुताबिक, ये विस्फोटक पैकेट देखने में बिल्कुल रेडीमेड कैन फूड जैसे लगते हैं। इनका आकार टूना फिश के डिब्बों से थोड़ा बड़ा बताया गया है। दावा किया गया कि जब लोग इन्हें खोलने की कोशिश करते हैं, तो ये तुरंत फट जाते हैं और गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि शिराज के दक्षिणी हिस्से और खासकर कफारी नाम के गांव में ऐसे पैकेट आसमान से गिराए गए। कुछ लोगों की मौत होने का भी दावा किया गया है, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।
جنایت جدید آمریکایی ـ صهیونی در برخی مناطق کشور
رهاسازی بستههای انفجاری با جنگنده
این بستههای انفجاری شبیه کنسرو آماده بوده و حاوی مواد منفجرهای است که بعد از بازگشایی منفجر شده و باعث تلفات جانی میگردد #انتقام_سختpic.twitter.com/0mChpxVhLP
तस्वीरों और वीडियो के आधार पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये सामान्य बम नहीं, बल्कि एंटी-टैंक लैंडमाइन हो सकते हैं। खास तौर पर इन्हें बीएलयू-91/बी नाम के एयर-ड्रॉप्ड माइंस जैसा बताया जा रहा है।
ये माइंस जमीन पर गिरने के बाद वहीं रह जाते हैं और जब कोई भारी वाहन या व्यक्ति इनके संपर्क में आता है, तो विस्फोट हो सकता है। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि दुश्मन के टैंक, ट्रक या भारी उपकरणों को रोका जा सके।
इन माइंस को हवा से गिराने के लिए खास तरह के डिस्पेंसर इस्तेमाल किए जाते हैं, जो एक ही बार में कई माइंस को बड़े इलाके में फैला देते हैं। (US mines Iran missile bases)
मिसाइल ठिकानों के पास क्यों गिराए जा रहे हैं?
जिस इलाके में ये माइंस मिलने की बात कही जा रही है, वह शिराज के पास एक अंडरग्राउंड मिसाइल फैसिलिटी के करीब बताया गया है। इन्हें अक्सर “मिसाइल सिटी” कहा जाता है, जहां ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों को जमीन के नीचे सुरक्षित रखता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन माइंस को ऐसे इलाकों में गिराने का मकसद इन ठिकानों तक पहुंचने वाले रास्तों को बंद करना हो सकता है। अगर रास्तों पर माइंस बिछा दिए जाएं, तो भारी गाड़ियां और लॉन्चर वहां तक नहीं पहुंच पाएंगे।
इससे मिसाइल लॉन्च करने में दिक्कत हो सकती है, क्योंकि मोबाइल लॉन्चर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना मुश्किल हो जाएगा। (US mines Iran missile bases)
Following failure in direct military strikes, the #US–#Zionist adversary has reportedly dropped explosive devices over parts of Shiraz via fighter jets.
— Consulate General of the I.R. Iran in Mumbai (@IRANinMumbai) March 26, 2026
लगातार हमलों के बावजूद एक्टिव हैं लॉन्चर
अमेरिका और उसके सहयोगी देश पिछले कुछ समय से ईरान के मिसाइल ठिकानों पर लगातार एयर स्ट्राइक कर रहे हैं। इन हमलों का मकसद मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च साइट्स को नष्ट करना है।
इसके बावजूद ईरान अब भी अलग-अलग जगहों से मिसाइल दागने में सफल हो रहा है। बताया जाता है कि वह अपने लॉन्चर को अंडरग्राउंड टनल में छिपाकर रखता है और जरूरत पड़ने पर बाहर लाकर लॉन्च करता है।
यही वजह है कि सिर्फ बमबारी से इन सिस्टम्स को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में माइंस जैसी रणनीति अपनाने की बात सामने आ रही है। (US mines Iran missile bases)
मोबाइल लॉन्चर बन रहे चुनौती
ईरान की मिसाइल रणनीति का एक अहम हिस्सा मोबाइल लॉन्चर हैं। ये ऐसे वाहन होते हैं, जिन पर मिसाइलें लगाई जाती हैं और उन्हें अलग-अलग जगहों से लॉन्च किया जा सकता है।
इन लॉन्चर को लगातार एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। अगर इनके रास्तों में माइंस बिछा दिए जाएं, तो इनकी मूवमेंट सीमित हो सकती है।
यह रणनीति सीधे हमले से अलग है, क्योंकि इसमें दुश्मन के मूवमेंट को रोकने की कोशिश की जाती है। (US mines Iran missile bases)
क्या है ‘गेटर’ माइंस सिस्टम
जिस तरह की माइंस की बात हो रही है, उन्हें गेटर सिस्टम का हिस्सा माना जाता है। इसमें दो तरह की माइंस होती हैं – एंटी-टैंक और एंटी-पर्सनल। हालांकि सामने आई तस्वीरों में सिर्फ एंटी-टैंक माइंस जैसे ऑब्जेक्ट दिखाई दे रहे हैं। ये माइंस जमीन पर गिरने के बाद एक्टिव हो जाते हैं और किसी भारी दबाव या संपर्क पर विस्फोट करते हैं। इनमें एक खास फीचर यह भी होता है कि इन्हें पहले से तय समय के बाद खुद ही नष्ट होने के लिए सेट किया जा सकता है। यह समय कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक हो सकता है। (US mines Iran missile bases)
नागरिकों के लिए खतरा
ऐसे माइंस का सबसे बड़ा खतरा आम लोगों के लिए होता है। अगर ये रिहायशी इलाके में गिरते हैं, तो लोग अनजाने में इन्हें छू सकते हैं या उठा सकते हैं, जिससे हादसा हो सकता है। ईरान ने जो दावा किया है, उसमें भी यही कहा गया है कि लोग इन्हें सामान्य चीज समझकर खोल रहे थे और तभी विस्फोट हो रहा था।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर ऐसे मिसाइल ठिकाने शहरों से दूर होते हैं और वहां आम लोगों की पहुंच सीमित रहती है। फिर भी अगर माइंस गांव या रिहायशी इलाके के पास गिरते हैं, तो खतरा बढ़ जाता है।
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, वे सोशल मीडिया और ईरानी मीडिया के जरिए आए हैं।
कुछ ओपन सोर्स जांच करने वाले समूहों ने इन लोकेशंस की पहचान करने की कोशिश की है और कुछ वीडियो को शिराज के पास के इलाकों से जोड़ा है। लेकिन यह साफ नहीं है कि ये माइंस किसने गिराए और कब गिराए गए।
अमेरिका की तरफ से भी इस बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इस मुद्दे पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है। (US mines Iran missile bases)
BrahMos Missile 800 km: भारतीय सेना अब अपनी स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत करने के लिए 800 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी कर रही है। अभी तक सेना के पास जो ब्रह्मोस मिसाइलें हैं, उनकी रेंज करीब 450 किलोमीटर तक है, लेकिन अब उसे और लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की जरूरत महसूस हो रही है।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर जल्द ही एक उच्चस्तरीय बैठक में फैसला लिया जा सकता है। यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों में जमकर लंबी दूरी की मिसाइलें इस्तेमाल की जा रहीं हैं।
BrahMos Missile 800 km: ब्रह्मोस मिसाइल क्यों खास है
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, यानी यह आवाज की गति से कई गुना ज्यादा रफ्तार से उड़ती है। इसकी स्पीड इतनी ज्यादा होती है कि दुश्मन के पास इसे रोकने के लिए बहुत कम समय बचता है। यह मिसाइल जमीन से जमीन, जहाज से जहाज और हवा से जमीन तक अलग-अलग तरह के टारगेट पर हमला कर सकती है।
इस मिसाइल को भारत और रूस ने मिलकर डेवलप किया है। समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए हैं और अब इसके ज्यादातर हिस्से भारत में ही बनाए जा रहे हैं। यह मिसाइल बेहद सटीक मानी जाती है और अपने टारगेट को बहुत कम गलती के साथ भेद सकती है। (BrahMos Missile 800 km)
अब क्यों बढ़ाई जा रही है रेंज
सेना के पास पहले से मौजूद 450 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलें अपने काम में प्रभावी रही हैं, लेकिन अब बदलते युद्ध के तरीके को देखते हुए लंबी दूरी से हमला करने की जरूरत बढ़ गई है। 800 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाली मिसाइल का मतलब है कि सेना दुश्मन के अंदरूनी इलाकों तक बिना आगे बढ़े ही हमला कर सकती है।
इससे सैनिकों को सीमा के पास जाने की जरूरत कम होगी और दूर से ही अहम ठिकानों को निशाना बनाया जा सकेगा। लंबी दूरी की मिसाइलें खास तौर पर एयर बेस, कमांड सेंटर और लॉजिस्टिक हब जैसे टारगेट को नष्ट करने में इस्तेमाल होती हैं। (BrahMos Missile 800 km)
ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ताकत
पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइलों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना और वायुसेना ने मिलकर पाकिस्तान के कई एयर बेस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। मिसाइलें बहुत कम समय में अपने टारगेट तक पहुंचीं और बड़े नुकसान का कारण बनीं। इस अनुभव के बाद सेना के अंदर यह भरोसा और मजबूत हुआ कि ब्रह्मोस जैसे हथियार भविष्य के युद्ध में बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं।
नई पीढ़ी के युद्ध की तैयारी
भारतीय सेना अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। बदलते समय के साथ सेना अपनी रणनीति में बड़े बदलाव कर रही है। अब फोकस ऐसे हथियारों पर है जो तेजी से, सटीक और दूर से हमला कर सकें।
इसी के तहत ड्रोन और मिसाइलों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। सेना अपने अलग-अलग रेजिमेंट में खास ड्रोन यूनिट तैयार कर रही है। ये ड्रोन निगरानी के साथ-साथ हमले में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इसके साथ ही एक अलग मिसाइल फोर्स तैयार करने की भी योजना पर काम चल रहा है। इसका मकसद यह है कि जरूरत पड़ने पर बड़ी संख्या में मिसाइलों का इस्तेमाल किया जा सके। (BrahMos Missile 800 km)
सेना खुद भी बना रही है ड्रोन
सेना ने अपने वर्कशॉप में ड्रोन बनाना भी शुरू कर दिया है। इनका उत्पादन बड़े स्तर पर किया जा रहा है, ताकि बाहर पर निर्भरता कम की जा सके। छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन अब सेना की रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा बन चुके हैं।
इन ड्रोन का इस्तेमाल सीमा पर निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरी जानकारी जुटाने के लिए किया जाता है। कई मामलों में इन्हें हमले के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। (BrahMos Missile 800 km)
तीनों सेनाओं के पास है ब्रह्मोस
ब्रह्मोस मिसाइल सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि नौसेना और वायुसेना के पास भी मौजूद है। नौसेना इसे जहाजों से दागती है, जबकि वायुसेना इसे फाइटर विमान से लॉन्च करती है। सेना के पास इसका जमीन से दागने वाला वर्जन है। इस मिसाइल की खासियत यह है कि इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि यह तीनों सेनाओं के लिए एक अहम हथियार बन चुका है। (BrahMos Missile 800 km)
ब्रह्मोस का अगला वर्जन भी तैयार
ब्रह्मोस का एक नया और हल्का वर्जन भी तैयार किया जा रहा है, जिसे ब्रह्मोस नेक्स्ट जेनरेशन कहा जाता है। यह मौजूदा मिसाइल से छोटा और हल्का होगा, जिससे इसे ज्यादा तरह के फाइटर विमान में लगाया जा सकेगा। खासतौर पर स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान में इसे लगाने की योजना है। इससे वायुसेना की मारक क्षमता और बढ़ जाएगी और कम दूरी में ज्यादा मिसाइलें ले जाई जा सकेंगी।
ब्रह्मोस मिसाइल के उत्पादन में अब भारत की भूमिका पहले से ज्यादा बढ़ गई है। इसके कई हिस्से अब देश में ही बनाए जा रहे हैं। इससे उत्पादन तेज हुआ है और लागत भी कम हुई है। लखनऊ समेत कई जगहों पर इसके निर्माण और परीक्षण के लिए सुविधाएं तैयार की गई हैं। इससे सेना को समय पर मिसाइलें मिल पा रही हैं और जरूरत के हिसाब से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। (BrahMos Missile 800 km)
Military Drone Security Framework: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। अब कोई भी ड्रोन सीधे सेना में शामिल नहीं होगा। अब भारतीय सेनाओं के लिए खरीदे जाने वाले हर ड्रोन को 20 पॉइंट सिक्योरिटी टेस्ट पास करना जरूरी होगा। यह कदम खास तौर पर उस खतरे को देखते हुए उठाया गया है, जिसमें “मेड इन इंडिया” के नाम पर इस्तेमाल हो रहे ड्रोन के अंदर चीनी हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर पाए गए हैं।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सेना के भीतर यह चिंता बढ़ रही थी कि कुछ ड्रोन दिखने में भारतीय हैं, लेकिन उनके अंदर लगे अहम कंपोनेंट्स विदेशी हो सकते हैं, जो सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।
Military Drone Security Framework: नया ड्रोन सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार
रक्षा मंत्रालय ने एक नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसके तहत हर ड्रोन को खरीद से पहले सख्त जांच से गुजरना होगा। यह फ्रेमवर्क सेना, नौसेना और वायुसेना के साथ मिलकर तैयार किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी ड्रोन सिस्टम बिना पूरी जांच के सेना में शामिल न हो।
इस नई व्यवस्था में ड्रोन को सिर्फ उड़ान क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी साइबर सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और कंट्रोल सिस्टम की मजबूती के आधार पर भी जांचा जाएगा। (Military Drone Security Framework)
चीन से जुड़ा है खतरा
भारतीय एजेंसियों को यह इनपुट मिल रहे थे कि कई ड्रोन में ऐसे पार्ट्स लगे हैं जो चीन में बने हैं। यह हार्डवेयर या फर्मवेयर के जरिए ड्रोन की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं या उसे कंट्रोल भी कर सकते हैं।
इसका खतरा सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं है। अगर किसी ड्रोन का कंट्रोल बाहर से लिया जा सके, तो वह मिशन के दौरान गलत दिशा में जा सकता है या संवेदनशील जानकारी बाहर भेज सकता है। इसी वजह से अब हर ड्रोन को पूरी तरह जांचने का फैसला लिया गया है। (Military Drone Security Framework)
सीमा पर हुई घटना ने बढ़ाई चिंता
पिछले साल एक घटना ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया। पूर्वी सेक्टर में चीन सीमा के पास उड़ रहा एक भारतीय ड्रोन अचानक अपनी दिशा से भटक गया और चीन के नियंत्रण वाले इलाके में पहुंच गया। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने उस ड्रोनका कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। कुछ समय तक उसे ऑपरेट करने के बाद उन्होंने उसे वापस लौटा दिया। यह ड्रोन इजरायली तकनीक पर बेस्ड था और इसमें एन्क्रिप्टेड डेटा लिंक भी था, इसके बावजूद उसका कंट्रोल छिन जाना सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील था।
सात बड़े खतरों की हुई पहचान
नए फ्रेमवर्क में ड्रोन से जुड़े सात प्रमुख खतरों की पहचान की गई है। इसमें ड्रोन और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के बीच कम्युनिकेशन लिंक को इंटरसेप्ट करना, जीपीएस जैमिंग या स्पूफिंग, फर्मवेयर के जरिए कंट्रोल हासिल करना, डेटा चोरी, इंटरनेट के जरिए डेटा बाहर भेजना, बाहर से भेजे गए मैलिशियस अपडेट और नेटवर्क से जुड़े डिवाइसेस के जरिए अतिरिक्त डेटा कलेक्शन शामिल हैं। इन सभी खतरों को ध्यान में रखते हुए टेस्टिंग सिस्टम तैयार किया गया है, ताकि ड्रोन के हर हिस्से को अलग-अलग स्तर पर जांचा जा सके। (Military Drone Security Framework)
कैसे काम करेगा 20 पॉइंट टेस्ट सिस्टम
रक्षा मंत्रालय ने जो नया सिस्टम बनाया है, उसमें कुल 20 टेस्ट होंगे। इनमें 10 हार्डवेयर से जुड़े होंगे और 10 सॉफ्टवेयर से। हार्डवेयर टेस्ट में ड्रोन के अंदर लगे इंटीग्रेटेड सर्किट की जांच की जाएगी। यह देखा जाएगा कि कहीं उनमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई है। इसके अलावा सिक्योर बूट सिस्टम, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड की परतों की जांच और अलग-अलग हिस्सों के बीच होने वाले कम्युनिकेशन की सिक्योरिटी भी चेक की जाएगी।
वहीं सॉफ्टवेयर टेस्ट में यह देखा जाएगा कि ड्रोन में इस्तेमाल हो रहे क्रिप्टोग्राफिक-की कितनी सुरक्षित हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम की मेमोरी प्रोटेक्शन, डेटा ट्रांसफर के दौरान सिक्योरिटी और फर्मवेयर को बिना अनुमति बदले जाने से रोकने की क्षमता की भी जांच होगी। साथ ही यह देखा जाएगा कि ड्रोन का ऑपरेटिंग सिस्टम, डेटा ट्रांसफर और कंट्रोल सिस्टम सुरक्षित है या नहीं। इसमें यह भी जांचा जाएगा कि कहीं ड्रोन को दूर से हैक करके कंट्रोल तो नहीं किया जा सकता।
आठ अहम हिस्सों पर खास नजर
ड्रोन के आठ हिस्सों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, उसका फर्मवेयर, ट्रांसमिशन यूनिट, आईएनएस और जीपीएस मॉड्यूल, सेंसर, ग्राउंड डेटा टर्मिनल और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन का सॉफ्टवेयर शामिल हैं। इन हिस्सों में अगर कोई भी कमजोरी होती है, तो पूरा सिस्टम खतरे में आ सकता है। इसलिए इन पर सबसे ज्यादा सख्ती रखी गई है। (Military Drone Security Framework)
किन ड्रोन पर लागू होंगे नियम
अभी यह नियम छोटे और हल्के ड्रोन पर लागू किया गया है, जिन्हें लो, स्लो और स्मॉल कैटेगरी में रखा जाता है। इसमें नैनो, माइक्रो और छोटे क्वाडकॉप्टर और हेक्साकॉप्टर जैसे ड्रोन शामिल हैं। ये वही ड्रोन हैं, जो सेना में निगरानी, टोही और सीमित ऑपरेशन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। इन्हीं में सबसे ज्यादा सुरक्षा खतरे भी सामने आए हैं।
टेस्टिंग कहां और कैसे होगी
ड्रोनकी जांच भारत में ही होगी। इसके लिए सिर्फ उन्हीं लैब को अनुमति दी जाएगी, जो एनएबीएल से मान्यता प्राप्त हों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल कर चुकी हों। फिलहाल क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ही एक ऐसी संस्था है, जो पूरी टेस्टिंग प्रक्रिया को संभाल सकती है। इसके अलावा डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस सिकंदराबाद में एक नई टेस्टिंग सुविधा तैयार कर रहा है। (Military Drone Security Framework)
गलत जानकारी देने पर सख्त कार्रवाई
अगर कोई कंपनी अपने ड्रोन के पार्ट्स या सॉफ्टवेयर के बारे में गलत जानकारी देती है, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होगी। ऐसे विक्रेताओं को सीधे सस्पेंड किया जा सकता है या भविष्य के कॉन्ट्रैक्ट से बाहर किया जा सकता है और ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।
रक्षा उत्पादन विभाग एक सेंट्रल डेटाबेस भी बनाएगा, जिसमें उन कंपनियों और ड्रोन मॉडल्स की जानकारी होगी जो सभी टेस्ट पास कर चुके हैं। एक बार मंजूरी मिलने के बाद उसी मॉडल को दोबारा टेस्ट की जरूरत नहीं होगी, जब तक उसमें कोई बदलाव न किया जाए।
इसके अलावा ड्रोन को सेना में शामिल करने के बाद भी उसकी निगरानी जारी रहेगी। समय-समय पर उसके सॉफ्टवेयर अपडेट और सुरक्षा जांच की जाएगी। अगर किसी ड्रोन में बाद में कोई कमजोरी पाई जाती है, तो उसे तुरंत ठीक किया जाएगा या सिस्टम से हटाया जा सकता है। (Military Drone Security Framework)
बनी हुई है सप्लाई चेन की चुनौती
हालांकि यह नया फ्रेमवर्क काफी सख्त है, लेकिन एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है। भारत में चिप स्तर पर पूरी तरह स्वदेशी निर्माण अभी शुरुआती चरण में है। पहले एक सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए हार्डवेयर के सोर्स को ट्रैक किया जाता था, लेकिन नवंबर 2024 में उसे बंद कर दिया गया। इसके बाद सप्लाई चेन की पूरी ट्रेसबिलिटी अभी भी एक अधूरी कड़ी बनी हुई है। इस वजह से यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि हर पार्ट पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। इसलिए फिलहाल टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। (Military Drone Security Framework)
Lt Gen RC Tiwari, #ArmyCdrEC awarded the GOC-in-C, #EasternCommand Commendation Card to Col Prasad Bansod.
Asmi Machine Pistol: भारतीय सेना में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे अधिकारी कर्नल प्रसाद बंसोड़ को सम्मानित कियाा गया है। ईस्टर्न कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने कर्नल प्रसाद बंसोड़ को प्रशंसा पत्र से सम्मानित किया है। यह सम्मान उन्हें ‘अस्मी’ सब-मशीन गन (एसएमजी) के डेवलपमेंट में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है।
Asmi Machine Pistol: ‘अस्मी’ मशीन पिस्टल के पीछे है कर्नल बंसोड़
‘अस्मी’ नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका मतलब होता है आत्मसम्मान और गर्व। कर्नल प्रसाद बंसोड़ ने भारतीय सेना की स्वदेशी मशीन पिस्टल ‘अस्मी’ के डिजाइन में अहम भूमिका निभाई है। यह एक 9 एमएम मशीन पिस्टल है, जिसे खास तौर पर क्लोज क्वार्टर बैटल यानी नजदीकी लड़ाई के लिए तैयार किया गया है। इस हथियार का डिजाइन पूरी तरह भारत में तैयार किया गया है और इसमें सेना की जरूरतों को ध्यान में रखा गया है।
‘अस्मी’ पूरी तरह स्वदेशी हथियार है और इसका उत्पादन भारत में ही किया जा रहा है। इसे हैदराबाद की कंपनी लोकेश मशीन्स लिमिटेड बना ररहाा है। यह पहली बार है जब किसी निजी कंपनी ने भारतीय सेना को इस तरह की स्वदेशी सबमशीन गन सप्लाई की है।
हल्की, कॉम्पैक्ट और इस्तेमाल में आसान
‘अस्मी’ का डिजाइन और विकास साल 2020 में शुरू हुआ था। तब लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद बंसोड़ ने बहुत कम समय में तैयार किया। उन्होंने इसे करीब चार महीनों में पूरा कर लिया इस प्रोजेक्ट में उन्होंने डीआरडीओ की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट, पुणे के साथ मिलकर काम किया।
कर्नल बंसोड़ के पास पहले से हथियार डिजाइन का अनुभव था। उन्होंने इंसासराइफल को समझकर उसे नए तरीके से बदलकर बुलपप कार्बाइन बनाने का काम भी किया था। इसी अनुभव का इस्तेमाल उन्होंने ‘अस्मी’ को तैयार करने में किया। उन्होंने इस हथियार को बनाते समय सैनिकों से मिले फीडबैक को ध्यान में रखा। खास तौर पर इसे हल्का, बिना जाम हुए काम करने वाला और आसानी से मेंटेन किया जा सकने वाला वेपन तैयार किया।
Lt Gen RC Tiwari, #ArmyCdrEC awarded the GOC-in-C, #EasternCommand Commendation Card to Col Prasad Bansod for his outstanding contribution towards indigenous defence innovation. He played a key role in designing the indigenously developed ‘Asmi’ Machine Pistol, showcasing… pic.twitter.com/CoZb6vfKFi
इस हथियार के विकास में 3डी प्रिंटिंग तकनीक का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इससे इसका प्रोटोटाइप यानी शुरुआती मॉडल जल्दी तैयार किया जा सका और उसमें जरूरी बदलाव भी आसानी से किए गए।
‘अस्मी’ को पहली बार साल 2021 में सार्वजनिक रूप से दिखाया गया था। इसके बाद 2022 में इसे इंटरनेशनल पुलिस एक्सपो और डेफएक्सपो जैसे बड़े कार्यक्रमों में भी प्रदर्शित किया गया। यह पूरी तरह स्वदेशी हथियार है, जो ‘मेक इन इंडिया’ पहल का एक मजबूत उदाहरण माना जाता है। इसके निर्माण में ऊपर का हिस्सा एयरक्राफ्ट ग्रेड एल्युमिनियम से बनाया गया है, जबकि हल्का और मजबूत रखने रखने के लिए नीचे का हिस्सा कार्बन फाइबर से तैयार किया गया है। (Asmi Machine Pistol)
अस्मी की खूबियां
‘अस्मी’ मशीन पिस्टल का वजन 2 किलोग्राम के बीच है। इस वजह से यह अपने अंतरराष्ट्रीय समकक्ष हथियारों की तुलना में करीब 10 से 15 प्रतिशत तक हल्की मानी जाती है। इसमें स्टैंडर्ड 9×19 मिमी पैराबेलम कारतूस का इस्तेमाल होता है, जो पहले से ही भारतीय सेनाओं में इस्तेमाल हो रहा है। ‘अस्मी’ की फायरिंग रेट लगभग 600 राउंड प्रति मिनट है और यह करीब 100 मीटर तक प्रभावी तरीके से लक्ष्य को भेद सकती है। इसकी मैगजीन क्षमता 33 राउंड की है और यह ग्लॉक मैगजीन के साथ भी इस्तेमाल की जा सकती है।
हथियार की बैरल लंबाई मूल संस्करण में करीब 8 इंच यानी लगभग 203 मिमी है, जबकि नए वेरिएंट में इसे बढ़ाकर 9 इंच तक किया गया है। ‘अस्मी’ अपनी जामिंग-फ्री क्षमता के लिए जानी जाती है। परीक्षणों के दौरान इसने लगातार 3000 राउंड फायर करने की क्षमता दिखाई है। (Asmi Machine Pistol)
भारतीय सेनाओं को हो रही सप्लाई
साल 2024 में हैदराबाद की कंपनी लोकेश मशीन्स लिमिटेड ने ‘अस्मी’ मशीन पिस्टल की सप्लाई के लिए भारतीय सेना का कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया। जिसके बाद उसे 550 यूनिट्स बनाने और देने का ऑर्डर मिला। यह ऑर्डर करीब 4.26 करोड़ रुपये का था। इसके बाद कंपनी ने तय समय के अंदर काम पूरा करते हुए अक्टूबर 2024 तक सभी 550 ‘अस्मी’ मशीन पिस्टल्स भारतीय सेना को सौंप दीं।
इन हथियारों को मुख्य रूप से नॉर्दर्न कमांड में शामिल किया गया, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील इलाकों की जिम्मेदारी संभालती है। यहां क्लोज क्वार्टर कॉम्बैट यानी नजदीकी लड़ाई की जरूरत ज्यादा होती है, इसलिए ‘अस्मी’ जैसे हल्के और कॉम्पैक्ट हथियार काफी उपयोगी माने जाते हैं। (Asmi Machine Pistol)
डिलीवरी के बाद इन हथियारों को पैरा स्पेशल फोर्सेज जैसी यूनिट्स को भी दिया गया, जहां तेज और सटीक कार्रवाई की जरूरत होती है। फरवरी 2026 में असम राइफल्स ने भी 1,013 ‘अस्मी’ कार्बाइन का ऑर्डर लोकेश मशीन्स लिमिटेड को दिया। इनकी डिलीवरी 90 दिनों के अंदर पूरी करनी है। असम राइफल्स पूर्वोत्तर राज्यों में तैनात रहती है, जहां इस हथियार का इस्तेमाल पुरानी कार्बाइनों की जगह किया जाएगा।
इसके अलावा मार्च 2026 में सशस्त्र सीमा बल यानी एसएसबी ने भी करीब 9.5 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है, जिसमें ‘अस्मी’ सबमशीन गन्स की सप्लाई शामिल है। इसके अलावा राज्य पुलिस बल, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स जैसी एजेंसियां भी इसमें रुचि दिखा रही हैं। (Asmi Machine Pistol)
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