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मिलिट्री ड्रोन बनाने के लिए कड़े होंगे नियम, चीनी पार्ट्स पर लगेगा पूरा ब्रेक, नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

ड्रोन के ऑटोपायलट मॉड्यूल, सिम्युलेटर, फील्ड प्रोग्रामर, पावर इंटरफेस और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन की भी गहनता से जांच होगी...

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📍नई दिल्ली | 19 Jan, 2026, 11:50 AM

Chinese Parts in Military Drones: सेना के लिए बनाए जाने वाले मिलिट्री ड्रोनों में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल को लेकर गंभीर रक्षा मंत्रालय के स्तर पर ऐसा सिक्योर्ड मिलिट्री ड्रोन फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जिसका मकसद भारतीय ड्रोन सिस्टम्स में किसी भी तरह के चीनी मूल के अवैध या अनकंट्रोल्ड कंपोनेंट्स के इस्तेमाल को पूरी तरह रोकना है। यह फ्रेमवर्क अब अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया में है और जल्द ही ड्रोन इंडस्ट्री के लिए एक बाइंडिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर लागू किया जा सकता है।

यह फ्रेमवर्क भारतीय सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो (एडीबी) ने तैयार किया है। इसकी जरूरत तब महसूस हुई, जब पिछले कुछ सालों में सामने आया कि कई घरेलू कंपनियां अपने ड्रोन को “मेक इन इंडिया” बताकर बेच रही थीं, लेकिन उनके अंदर इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर, कोड और हार्डवेयर चीनी मूल के थे। यह मामला सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, क्योंकि ऐसे कंपोनेंट्स में बैकडोर या रिमोट एक्सेस का खतरा रहता है। (Chinese Parts in Military Drones)

Chinese Parts in Military Drones: किस स्टेज पर है मंजूरी प्रक्रिया

सूत्रों के मुताबिक, इस फ्रेमवर्क को डायरेक्टर जनरल (एक्विजिशन) की मंजूरी मिल चुकी है। अब फाइल डिफेंस सेक्रेटरी आरके सिंह के पास है। डिफेंस सेक्रेटरी को इस मुद्दे पर पहले भी प्रेजेंटेशन दिया जा चुका है। उनकी मंजूरी के बाद यह फाइल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास जाएगी, जहां से अंतिम हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

एक बार रक्षा मंत्री की मंजूरी मिलते ही यह फ्रेमवर्क पब्लिक कर दिया जाएगा और सभी ड्रोन मैन्युफैक्चरर्स को इसका पालन करना होगा। यानी जो कंपनी भारतीय सेना, नौसेना या वायु सेना को ड्रोन सप्लाई करना चाहती है, उसे इस नए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के सभी नियम पूरे करने होंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

क्यों जरूरी हो गया नया ड्रोन फ्रेमवर्क

पिछले कुछ सालों में ड्रोन युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज ड्रोन सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सर्विलांस, टारगेटिंग, लॉइटरिंग म्यूनिशन, अटैक और लॉजिस्टिक्स जैसे अहम रोल निभा रहे हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम अनसेफ हुआ, तो वह दुश्मन के लिए हथियार बन सकता है।

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2020 में गलवान झड़प के दौरान यह सामने आया था कि कई भारतीय ड्रोन हैक हो गए थे और उनकी फीड दुश्मन तक पहुंचने का खतरा बना था। इसके बाद पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर भी ड्रोन हैकिंग की घटनाओं की रिपोर्ट आईं। यही वजह है कि ड्रोन आर्किटेक्चर को मजबूत करने की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात साफ हो गई कि ड्रोन सिक्योरिटी सिर्फ टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ऑपरेशनल सर्वाइवल से जुड़ा विषय है। (Chinese Parts in Military Drones)

क्या है इस नए फ्रेमवर्क में

यह नया फ्रेमवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य ओडब्ल्यूएएसपी 4.0 (ओपन वेब एप्लिकेशन सिक्योरिटी प्रोजेक्ट) स्टैंडर्ड पर आधारित है, लेकिन इसे भारतीय जरूरतों के हिसाब से और ज्यादा सख्त बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि अब ड्रोन सिर्फ उड़ने और काम करने भर से पास नहीं होगा, बल्कि उसकी साइबर और हार्डवेयर सिक्योरिटी की भी गहराई से जांच होगी।

फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन सिस्टम को 30 से ज्यादा अलग-अलग टेस्ट्स से गुजरना होगा। ये टेस्ट्स सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त लैब्स जैसे एसटीक्यूसी आईटी सर्विसेज, ईटीडीसी बेंगलुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं में किए जाएंगे। (Chinese Parts in Military Drones)

किन चीजों की होगी जांच

नए फ्रेमवर्क के तहत ड्रोन के हर महत्वपूर्ण हिस्से की जांच की जाएगी। इसमें सबसे पहले सॉफ्टवेयर और कोड लेवल पर टेस्ट होंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ड्रोन किसी अनधिकृत सर्वर या इकाई को डेटा न भेज रहा हो।

इसके अलावा ड्रोन के ऑटोपायलट मॉड्यूल, चिप, सिम्युलेटर, फील्ड प्रोग्रामर, पावर इंटरफेस और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन की भी गहनता से जांच होगी। खास बात यह है कि ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले विंडोज वर्कस्टेशन और स्मार्टफोन तक को टेस्टिंग के दायरे में लाया गया है।

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ड्रोन में इस्तेमाल होने वाला अपडेट सिस्टम भी जांच के दायरे में होगा। यानी अब यह देखा जाएगा कि ड्रोन में सॉफ्टवेयर अपडेट कैसे होता है, क्या अपडेट सुरक्षित है और कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी डाउनग्रेड अटैक के जरिए सिस्टम को कमजोर किया जा सके। (Chinese Parts in Military Drones)

हार्डवेयर पर भी सख्त नजर

अब तक ड्रोन सुरक्षा चर्चा ज्यादातर सॉफ्टवेयर तक सीमित रहती थी, लेकिन नया फ्रेमवर्क हार्डवेयर को भी उतनी ही अहमियत देता है। हर ड्रोन के बिल ऑफ मटीरियल की जांच होगी। इसका मतलब यह कि कौन-सा पार्ट कहां से आया है, किस देश में बना है और उसकी सप्लाई चेन क्या है, यह सब साफ-साफ बताना होगा।

सूत्रों ने बताया कि कई मामले ऐसे भी सामने आए थे, जिनमें देखा गया था ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स चीन से खरीदे गए, लेकिन कई रूट्स और कई देशों से होकर इन कंपनियों के पास पहुंचे। अब इसकी भी गहनता से जांच होगी और पार्ट्स पर लगी बारीक से बारीक मार्किंग को भी ध्यान से जांचा जाएगा।

सरकार का साफ संदेश है कि इनिमिकल देशों, खासकर चीन से जुड़े कंपोनेंट्स के लिए जीरो टॉलरेंस नीति होगी। अगर किसी ड्रोन में ऐसे कंपोनेंट्स पाए गए, तो उसे सेना में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलेगी। (Chinese Parts in Military Drones)

खरीद प्रक्रिया के हर स्टेज में लागू होगा नियम

इस फ्रेमवर्क की सबसे अहम बात यह है कि यह सिर्फ फाइनल डिलीवरी तक सीमित नहीं रहेगा। यह आरएफआई (रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन) से लेकर आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) और फिर कॉन्ट्रैक्ट के बाद की पूरी प्रक्रिया पर लागू होगा।

यानी ड्रोन कंपनी को शुरुआत से ही यह साबित करना होगा कि उसका सिस्टम सुरक्षित है। बाद में अगर किसी स्टेज पर गड़बड़ी पाई जाती है, तो कॉन्ट्रैक्ट पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि इस फ्रेमवर्क से ड्रोन इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में थोड़ी परेशानी जरूर हो सकती है, क्योंकि अब कंपनियों को ज्यादा टेस्टिंग और डॉक्यूमेंटेशन करना होगा। लेकिन लंबे समय में इसका फायदा उन्हीं कंपनियों को मिलेगा, जो असल में स्वदेशी और सुरक्षित टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं।

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इससे फर्जी “मेक इन इंडिया” के दावे अपने आप बाहर हो जाएंगे और भारतीय ड्रोन इंडस्ट्री की साख मजबूत होगी। साथ ही यह भारत को भविष्य में ड्रोन एक्सपोर्ट के लिए भी ज्यादा भरोसेमंद बनाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह कदम

आज की जंग सिर्फ बॉर्डर पर नहीं लड़ी जाती। साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन वारफेयर अब उतने ही अहम हो चुके हैं। ऐसे में अगर ड्रोन सिस्टम सुरक्षित नहीं होगा, तो वह दुश्मन के लिए भारत की कमजोरी बन सकता है।

यह नया फ्रेमवर्क इस खतरे को काफी हद तक कम कर देगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भारतीय सैनिक जिस ड्रोन पर भरोसा कर रहे हैं, वह सिर्फ उड़ने में नहीं, बल्कि डेटा और कंट्रोल के मामले में भी पूरी तरह सुरक्षित है।

वहीं, डिफेंस सेक्रेटरी और रक्षा मंत्री की मंजूरी के बाद यह फ्रेमवर्क आधिकारिक रूप से लागू हो जाएगा। इसके बाद ड्रोन इंडस्ट्री को नए नियमों के मुताबिक खुद को ढालना होगा। कुल मिलाकर, यह फ्रेमवर्क भारत की ड्रोन स्ट्रैटेजी में एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। यह कदम भारत को सिर्फ ड्रोन यूजर नहीं, बल्कि सिक्योर और भरोसेमंद ड्रोन पावर बनाने की दिशा में आगे ले जाएगा। (Chinese Parts in Military Drones)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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