📍नई दिल्ली | 23 Jun, 2026, 11:08 AM
IAF Rafale Bridge Support RFP: पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमानों को मार गिराने के दावे किए गए थे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, पाकिस्तानी टीवी चैनलों और कुछ विदेशी अखबारों ने अलग-अलग संख्या में राफेल विमानों के नुकसान का दावा किया। लेकिन एक बार फिर पाकिस्तान का झूठ बेनकाब हो गया है। अब भारतीय वायुसेना ने हाल में एक आरएफपी जारी की है जिसमें 36 राफेल विमानों के लिए ब्रिज सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट का प्रपोजल मांगा गया है।
एयर हेडक्वार्टर्स की डायरेक्टोरेट ऑफ इंजीनियरिंग ने फ्रांस की साफरान एयरक्राफ्ट इंजंस को राफेल के इंजनों को लेकर रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। डॉक्यूमेंट में भारतीय वायुसेना के 36 राफेल विमानों के ऑपरेशन के लिए पांच महीने का ब्रिज सपोर्ट मांगा है। आरएफपी में साफ लिखा गया है कि प्रपोजल 36 राफेल विमानों के लिए तैयार किया जाए।
डॉक्यूमेंट में राफेल फ्लीट की संख्या 36 दर्ज होना पाकिस्तान के उन दावों के बीच महत्वपूर्ण है, जिनमें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय राफेल विमानों के नुकसान की बातें कही गई थीं। इससे पहले 26 जनवरी को भी गणतंत्र दिवस परेड के एरियल फ्लाईपास्ट में भारतीय वायुसेना ने राफेल बीएस-022 को उड़ान भरते हुए दिखाया था, जिसे पाकिस्तान ने गिराने का दावा किया था।
IAF Rafale Bridge Support RFP: वायुसेना मुख्यालय से जारी हुआ आरएफपी
राफेल बेड़े के लिए यह आरएफपी एयर हेडक्वार्टर्स के डायरेक्टोरेट ऑफ इंजीनियरिंग राफेल की ओर से जारी किया गया है। आरएफपी फ्रांस की साफरान एयरक्राफ्ट इंजन्स को भेजा गया है। डॉक्यूमेंट लिखा गया है कि भारतीय वायुसेना 36 राफेल विमानों को ऑपरेट कर रही है। इन विमानों के लिए पहले से मौजूद सपोर्ट पैकेज 18 सितंबर 2026 तक लागू है। इसके बाद सपोर्ट में कोई अंतर न आए, इसके लिए वायुसेना ने पांच महीने की ब्रिज सपोर्ट व्यवस्था मांगी है।
डॉक्यूमेंट का शीर्षक है, “रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल फॉर ब्रिज सपोर्ट फॉर राफेल फ्लीट ऑफ इंडियन एयर फोर्स ऑन पीएसी बेसिस।” जिसमें पीएसी का मतलब प्रोप्राइटरी आर्टिकल सर्टिफिकेट होता है। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी इक्विपमेंट, स्पेयर या टेक्निकल सर्विस की मूल निर्माता केवल एक कंपनी हो। राफेल में लगे एम88 इंजन और उससे जुड़े महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरणों के लिए साफरान मूल निर्माता है। इसलिए वायुसेना ने उसी कंपनी से प्रपोजल मांगा है।
2016 के भारत-फ्रांस समझौते के तहत आए थे 36 राफेल
भारत 2016 के इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत फ्रांस की दसा एविएशन से खरीदे गए 36 राफेल विमानों को ऑपरेट कर रहा है। भारतीय वायुसेना में 36 राफेल विमान के दो स्क्वाड्रन हैं। इनमें नंबर 17 स्क्वाड्रन गोल्डन एरोज और नंबर 101 स्क्वाड्रन शामिल हैं।
राफेल का इस्तेमाल एयर डिफेंस, ग्राउंड अटैक, समुद्री मिशन, लंबी दूरी के स्ट्राइक मिशन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से जुड़े कार्यों में किया जा सकता है। राफेल में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, एयर-टू-एयर मिसाइल और एयर-टू-ग्राउंड हथियारों को ले जाने की क्षमता है। यह अलग-अलग मिशनों के लिए कॉन्फिगर किया जा सकता है।
डॉक्यूमेंट के अनुसार, प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट में 36 विमान, उनसे जुड़े उपकरण और पांच साल का सपोर्ट पैकेज शामिल था। इस सपोर्ट में मेंटेनेंस, रिपेयर और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, कंज्यूमेबल्स, स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट और ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट की जरूरतें शामिल थीं। (IAF Rafale Bridge Support RFP)
खत्म हुआ पांच साल का सपोर्ट
वायुसेना ने नए ब्रिज सपोर्ट प्रपोजल में भी 36 राफेल विमानों के ऑपरेशन की बात कही है। प्रपोजल के मुताबिक, यह सपोर्ट 18 सितंबर 2026 के बाद पांच महीने के लिए होगा।
इस अवधि में सभी 36 राफेल विमानों को प्रति विमान औसतन 150 फ्लाइंग आवर्स प्रति वर्ष की दर से ऑपरेट करने का प्रावधान रखा गया है। पांच महीने के लिए कुल 2250 फ्लाइंग आवर्स का अनुमान लगाया गया है।
यह कैलकुलेशन 36 विमान, प्रति विमान प्रति माह 12.5 फ्लाइंग आवर्स और पांच महीने की अवधि के आधार पर की गई है।
राफेल के लिए मेंटेनेंस और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट क्यों जरूरी
राफेल एक ट्विन-इंजन, मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है। इसमें दो Snecma M88-2 आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन लगे हैं। हर इंजन का थ्रस्ट ड्राई (बिना आफ्टरबर्नर) लगभग 50 केएन और आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 75 केएन है। इस तरह राफेल का कुल थ्रस्ट 150 केएन है।
टर्बोफैन इंजन में हवा को अंदर लेकर उसे दबाया जाता है। इसके बाद उसमें ईंधन मिलाकर कंबस्शन किया जाता है। गर्म गैसें पीछे की तरफ निकलती हैं और विमान को आगे बढ़ाने के लिए थ्रस्ट पैदा करती हैं।
इंजन की सर्विसिंग में कई तरह के काम होते हैं। इसमें फिल्टर, पाइप, सेंसर, फ्यूल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट और इंजन के अंदर के हिस्सों की जांच शामिल हो सकती है। इंजन से जुड़ी तकनीकी जांच और ओवरहॉल के लिए विशेष उपकरण तथा प्रशिक्षित इंजीनियरों की जरूरत होती है।
राफेल में एवियोनिक्स सिस्टम भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। एवियोनिक्स का मतलब विमान के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से है। इसमें रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम, नेविगेशन सिस्टम, कंप्यूटर, सेंसर और मिशन सिस्टम शामिल होते हैं। इनकी मेंटेनेंस के लिए विशेष टेस्ट उपकरण और सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)
क्या होते हैं एमआरएलएस, जीएसई और जीएचई
डॉक्यूमेंट में एमआरएलएस का का जिक्र किया गया है। इसका पूरा नाम मेंटेनेंस, रिपेयर एंड लॉजिस्टिक्स सपोर्ट है। यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें विमान को उड़ान योग्य बनाए रखने के लिए स्पेयर, मरम्मत सहायता, तकनीकी जानकारी और लॉजिस्टिक्स उपलब्ध कराए जाते हैं।
इसमें कंज्यूमेबल्स भी शामिल होते हैं। कंज्यूमेबल्स वे सामग्री होती हैं जिनका इस्तेमाल मेंटेनेंस के दौरान होता है और जिन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर फिल्टर, सील, लुब्रिकेंट, कुछ इलेक्ट्रिकल पार्ट्स और अन्य छोटे उपकरण शामिल हो सकते हैं।
जीएसई का अर्थ ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट है। यह वह उपकरण होता है जिसका उपयोग विमान को जमीन पर जांचने, सर्विस करने और उड़ान के लिए तैयार करने में किया जाता है। इसमें पावर सप्लाई यूनिट, टेस्टिंग उपकरण, टोइंग वाहन और हाइड्रोलिक जांच उपकरण शामिल हो सकते हैं।
जीएचई का अर्थ ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट है। इसका इस्तेमाल विमान को पार्किंग एरिया में खींचने, सही स्थान पर लगाने, लोडिंग और अन्य ग्राउंड गतिविधियों के लिए किया जाता है।
डॉक्यूमेंट में ओ-लेवल मेंटेनेंस का भी जिक्र है। ओ-लेवल का मतलब ऑपरेशनल लेवल मेंटेनेंस है। यह वह शुरुआती स्तर का रखरखाव है जो स्क्वाड्रन या एयरबेस स्तर पर किया जाता है। इसमें रोजाना जांच, छोटे पुर्जों की बदलने की प्रक्रिया, सामान्य तकनीकी सुधार और विमान को अगली उड़ान के लिए तैयार करना शामिल होता है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)
मॉड्यूलर डिजाइन वाला है राफेल
राफेल एक आधुनिक लड़ाकू विमान है। इसे इस तरह बनाया गया है कि उड़ान के बाद इसकी जांच और मरम्मत में बहुत अधिक समय न लगे। किसी भी लड़ाकू विमान को उड़ाने के बाद ग्राउंड क्रू उसकी जांच करता है। राफेल में यह काम काफी हद तक आसान बनाया गया है।
राफेल में कई सिस्टम ऐसे हैं जो विमान की तकनीकी स्थिति की जानकारी खुद देते हैं। इसे बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट कहा जाता है। यदि इंजन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर या किसी दूसरे हिस्से में कोई गड़बड़ी हो, तो तकनीकी टीम को संकेत मिल जाता है। इससे हर हिस्से को बार-बार खोलकर जांचने की जरूरत कम होती है।
उड़ान के बाद टेकनीशियन विमान के टायर, फ्यूल, हाइड्रोलिक ऑयल, बाहरी ढांचे, हथियार स्टेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच करते हैं। सामान्य उड़ान के बाद यह शुरुआती जांच लगभग 30 मिनट से एक घंटे में पूरी हो सकती है। अगर कोई खराबी नहीं मिलती, तो विमान को अगली उड़ान के लिए तैयार किया जाता है। इसे टर्नअराउंड कहा जाता है।
लंबी दूरी या युद्धक मिशन के बाद यह जांच ज्यादा लंबी होती है। ऐसे समय हथियारों की स्थिति, इंजन, रडार, सेंसर और विमान के दूसरे सिस्टम की गहराई से जांच की जाती है। इसमें दो से चार घंटे तक लग सकते हैं।
राफेल में एम88 इंजन लगा है। इसका डिजाइन कई अलग-अलग हिस्सों या मॉड्यूल में किया गया है। यदि इंजन के किसी एक हिस्से में समस्या आती है, तो हर बार पूरा इंजन बदलना जरूरी नहीं होता। तकनीकी टीम जरूरत के अनुसार खराब हिस्से को बदल सकती है। इससे समय और मेंटेनेंस का काम कम हो सकता है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)
एक दिन में कितनी सॉर्टी कर सकता है राफेल
लड़ाकू विमान की एक बार की मिशन उड़ान को सॉर्टी कहा जाता है। जब राफेल एयरबेस से उड़ान भरता है, तय मिशन पूरा करता है और वापस बेस पर उतरता है, तो उसे एक सॉर्टी माना जाता है।
राफेल को तेज सॉर्टी जनरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। इसका मतलब है कि एक उड़ान के बाद तकनीकी जांच, ईंधन भरने और जरूरत पड़ने पर हथियार लगाने के बाद इसे कम समय में अगली उड़ान के लिए तैयार किया जा सकता है।
सामान्य प्रशिक्षण या शांति के समय एक राफेल विमान एक दिन में आमतौर पर दो से चार सॉर्टी कर सकता है। वहीं, बड़े सैन्य अभ्यास वाले समय में एक राफेल चार से पांच सॉर्टी तक कर सकता है। इसके लिए ग्राउंड क्रू, ईंधन, हथियार, स्पेयर पार्ट्स और रनवे की पूरी व्यवस्था जरूरी होती है। एक ही विमान को बार-बार उड़ाने के बजाय वायुसेना आमतौर पर पूरे बेड़े के अलग-अलग विमानों का उपयोग करती है।
युद्ध या सर्ज ऑपरेशन की स्थिति में राफेल की सॉर्टी संख्या कुछ समय के लिए और बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में मिशन छोटे रखे जा सकते हैं और अलग-अलग पायलट एक ही विमान को उड़ा सकते हैं। फिर भी हर उड़ान के बाद फ्यूल, इंजन, टायर, हाइड्रोलिक सिस्टम, रडार, हथियार स्टेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की जांच जरूरी होती है।
राफेल की तेज सॉर्टी क्षमता का एक कारण इसका डिजिटल डायग्नोस्टिक सिस्टम है। विमान अपने कई सिस्टम की स्थिति रिकॉर्ड करता है। ग्राउंड क्रू को पहले से पता चल सकता है कि किस हिस्से की जांच करनी है। इससे विमान को लंबे समय तक जमीन पर रखने की जरूरत कम होती है। (IAF Rafale Bridge Support RFP)
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने किए थे कई दावे
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की तरफ से भारतीय वायुसेना को नुकसान पहुंचाने के दावे किए गए थे। इनमें राफेल लड़ाकू विमान को लेकर भी कई दावे सामने आए। अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट्स पर विमान के मलबे, कथित सीरियल नंबर और पायलटों से जुड़ी अपुष्ट बातें प्रसारित की गईं।
भारत की ओर से पाकिस्तान के इन दावों पर कोई विस्तृत आधिकारिक विमान-वार जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी। ऐसे मामलों में मिलिट्री ऑपरेशंस से जुड़ी जानकारी अक्सर ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण सीमित रखी जाती है।
(IAF Rafale Bridge Support RFP)



