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IRGC की निगरानी में होर्मुज! अब बिना क्लियरेंस कोई जहाज नहीं गुजर सकता

Strait of Hormuz Crisis
Strait of Hormuz

Strait of Hormuz Crisis: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान द्वारा इस रास्ते पर सख्ती बढ़ाने के बाद जहाजों की आवाजाही आसान नहीं रह गई है। कई जहाज फंसे हुए हैं और वैश्विक तेल बाजार में हलचल देखी जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसी रास्ते से सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, इराक और ईरान जैसे देशों से तेल और गैस की सप्लाई होती है। दुनिया की कुल तेल और एलएनजी सप्लाई का करीब 20 से 25 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

हर दिन लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल तेल इस रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देश इसी रास्ते पर निर्भर हैं। भारत के लिए यह रास्ता और भी अहम है, क्योंकि देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से मंगाता है।

Strait of Hormuz Crisis: ईरान की सख्ती से बढ़ी दिक्कतें

हाल के दिनों में ईरान ने इस रास्ते पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। उसने साफ कर दिया है कि केवल वही जहाज इस रास्ते से गुजर सकते हैं, जिन्हें उसकी मंजूरी मिली हो। बताया जा रहा है कि ईरान उन देशों के जहाजों को प्राथमिकता दे रहा है, जिनसे उसके अच्छे संबंध हैं, और भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गुजरने की अनुमति दी गई है।

ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि बिना अनुमति के आने वाले जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। इसी वजह से अब कोई भी जहाज बिना अनुमति के इस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं कर रहा है।

संकरे रास्ते से बढ़ा जोखिम

होर्मुज जलडमरूमध्य बहुत संकरा है। इसके सबसे पतले हिस्से में जहाजों के आने-जाने के रास्ते की चौड़ाई तीन किलोमीटर से भी कम है। जहाजों के लिए अलग-अलग लेन बनाई गई हैं ताकि टक्कर न हो।

लेकिन इस संकरे रास्ते की वजह से हर जहाज को ईरान के तटीय क्षेत्र के बेहद करीब से गुजरना पड़ता है। इससे ईरान के लिए हर जहाज पर नजर रखना आसान हो जाता है। यही कारण है कि यहां से गुजरना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।

वहीं, तनाव बढ़ने के बाद इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी कमी आई है। पहले रोजाना लगभग 130 से 140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर 5 से 6 जहाज प्रतिदिन रह गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह करीब 95 प्रतिशत की गिरावट है, जो अभूतपूर्व मानी जा रही है। इसके चलते हजारों जहाज इस रास्ते के आसपास फंसे हुए हैं और सुरक्षित रास्ता मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

मंजूरी के बिना नहीं मिल रही एंट्री

अब इस रास्ते से गुजरने के लिए जहाजों को पहले से अनुमति लेनी पड़ रही है। इसके लिए शिपिंग कंपनियों को ईरान से जुड़े अधिकारियों को जहाज की पूरी जानकारी देनी होती है। इसमें जहाज की पहचान, मालिक, माल, गंतव्य और क्रू से जुड़ी जानकारी शामिल होती है।

इन सभी दस्तावेजों की गहराई से जांच की जाती है। इसके बाद ही तय होता है कि जहाज को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाएगी या नहीं। खास तौर पर तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों को प्राथमिकता दी जा रही है।

आईआरजीसी की निगरानी में पूरा सिस्टम

इस पूरे सिस्टम की निगरानी आईआरजीसी कर रहा है। यही संगठन तय करता है कि कौन सा जहाज इस रास्ते से गुजर सकता है। जब किसी जहाज को अनुमति मिल जाती है, तो उसे एक विशेष कोड दिया जाता है और आगे बढ़ने के निर्देश दिए जाते हैं। जैसे ही जहाज संकरे हिस्से के पास पहुंचता है, उससे रेडियो के जरिए संपर्क किया जाता है और उसकी पहचान की पुष्टि की जाती है। इसके बाद पेट्रोल बोट्स उस जहाज को एस्कॉर्ट करते हुए आगे ले जाती हैं, ताकि वह सुरक्षित तरीके से इस रास्ते को पार कर सके।

ट्रांजिट चार्ज को लेकर भी चर्चा

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस रास्ते से गुजरने के लिए भारी शुल्क लिया जा रहा है। विदेशी मीडिया में इसे “तेहरान टोल बूथ” तक कहा गया है। बताया गया है कि कुछ जहाजों से सुरक्षित रास्ता देने के बदले बड़ी रकम मांगी जा रही है। हालांकि ईरान ने इन दावों को खारिज कर दिया है। फिर भी यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि इस रास्ते से गुजरना अब महंगा और जटिल हो गया है।

भारत पर भी सीधा असर

भारत इस रास्ते पर काफी हद तक निर्भर है। देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से मंगाता है। इसके अलावा एलएनजी की सप्लाई भी इसी रास्ते से होती है।

हालांकि मौजूदा स्थिति में भारत के जहाजों को गुजरने की अनुमति मिली हुई है, लेकिन पूरे क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण चिंता बनी हुई है। शिपिंग कंपनियां भी सावधानी बरत रही हैं और कई जहाज सुरक्षित रास्ते का इंतजार कर रहे हैं।

लंबी कतार में खड़े जहाज

तनाव बढ़ने के बाद इस रास्ते के दोनों ओर जहाजों की लंबी कतार लग गई है। कई जहाज कई दिनों से इंतजार कर रहे हैं कि कब उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिलेगी।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के मुताबिक, हजारों जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। इससे यह साफ है कि स्थिति सामान्य नहीं है और आवाजाही पर बड़ा असर पड़ा है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में तेजी आई है और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। कई देशों में ऊर्जा संकट की स्थिति बनने लगी है। जहाजों की आवाजाही रुकने से न केवल तेल और गैस, बल्कि अन्य सामान की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ रहा है।

BDL ने बनाया आकाश मिसाइल का नया अवतार! एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम है डिलीवरी के लिए तैयार

Advanced Akash Weapon System

Advanced Akash Weapon System: भारत डायनैमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) ने एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम का पहला प्रोडक्शन मॉडल यानी एफओपीएम तैयार कर लिया है। यह वही सिस्टम है जिसे भारतीय सेनाओं के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है और इसमें कई नए और एडवांस सब-सिस्टम्स जोड़े गए हैं। वहीं उम्मीद जताई जा रही है जल्द ही इस सिस्टम की डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

Advanced Akash Weapon System: क्या है एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम

एडवांस्ड आकाश एक मध्यम दूरी का सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसे हवा से आने वाले खतरों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है, जबकि इसका प्रोडक्शन बीडीएल कर रही है। यह सिस्टम भारतीय सेना और वायुसेना दोनों के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि यह दुश्मन के एयरक्राफ्ट, ड्रोन और मिसाइल जैसे खतरों को हवा में ही नष्ट कर सकता है।

आकाश मिसाइल सिस्टम पहले से ही भारतीय सेना में तैनात है, लेकिन इस नए एडवांस्ड वर्जन में कई तकनीकी सुधार किए गए हैं, जिससे इसकी ताकत और सटीकता पहले से ज्यादा बढ़ गई है।

एफओपीएम पूरा होने का क्या है मतलब

एफओपीएम यानी फर्स्ट-ऑफ प्रोडक्शन मॉडल का मतलब है कि डिजाइन और टेस्टिंग के बाद अब यह सिस्टम उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है। बीडीएल द्वारा यह मॉडल तैयार कर लिया जाना इस बात का संकेत है कि अब इसे बड़े पैमाने पर बनाया जा सकता है और सेना को सौंपा जा सकता है। इस मॉडल में सभी जरूरी सिस्टम इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और क्वालिटी चेक पूरे कर लिए गए हैं। इसके बाद ही इसे एफओपीएम माना जाता है। अब अगला चरण डिलीवरी और तैनाती का होगा।

नई तकनीक से बढ़ी क्षमता

एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें अपग्रेडेड सब-सिस्टम्स लगाए गए हैं। इस सिस्टम में बेहतर रडार, आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स जैसी क्षमताएं जोड़ी गई हैं।

इसमें इस्तेमाल किया गया आरएफ सीकर टारगेट को अधिक सटीकता से पहचानने में मदद करता है। साथ ही यह सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक जामिंग में भी काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि दुश्मन अगर सिग्नल को बाधित करने की कोशिश करे, तब भी यह सिस्टम अपना काम जारी रख सकता है।

अलग-अलग हवाई खतरों पर भी असरदार

इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कई तरह के हवाई खतरों को एक साथ संभाल सकता है। इसमें हाई स्पीड एयरक्राफ्ट, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य एरियल टारगेट शामिल हैं। हाल में टेस्टिंग के दौरान इस सिस्टम ने अलग-अलग परिस्थितियों में सटीक निशाना लगाकर अपनी क्षमता साबित की है। इसमें मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट क्षमता है यानी यह एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन पर कार्रवाई कर सकता है।

एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम की डिलीवरी शुरू होने के बाद इसे सीमावर्ती इलाकों और संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किया जाएगा, जहां हवाई खतरों का जोखिम ज्यादा रहता है। इस सिस्टम की खास बात यह है कि यह मोबाइल है। यानी इसे एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाया जा सकता है। इससे जरूरत के हिसाब से इसकी तैनाती की जा सकती है।

ईरानी दूतावास क्यों डिलीट कर रहा कश्मीर को ‘थैक्स’ वाले कई ट्वीट, क्या पाकिस्तान के दबाव में है ईरान?

Iran Embassy Tweet Controversy
Iran Embassy Tweet Controversy: Why Iran Deleted Kashmir-Related Posts Amid Pakistan Backlash

Iran Embassy Tweet Controversy: नई दिल्ली में ईरानी दूतावास के एक के बाद एक ट्वीट डिलीट करने पर सवाल खड़े होने लगे हैं। खास बात यह है कि ये ट्वीट भारत और कश्मीर से जुड़े थे और इनमें मानवीय मदद के लिए धन्यवाद दिया गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद इन पोस्ट को बिना किसी वजह बताए हटा दिया गया। यह सिलसिला एक बार नहीं, बल्कि लगातार दो-तीन बार हुआ, जिससे पूरे मामले पर सवाल उठने लगे हैं।

ताजा मामला ईरान की एरोस्पेस फोर्स की तरफ से किए गए एक ट्वीट को लेकर है। जिसमें इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की एरोस्पेस फोर्स ने कश्मीर के लोगों का धन्यवाद दिया था। हालांकि ईरान ऐसा पहली बार नहीं कर रहा है। हाल ही में वह जब भी कोई मिसाइल छोड़ता है फ्लिस्तीन में मारे गए लोगों के नाम लिखता है।

Iran Embassy Tweet Controversy: एक के बाद एक कई ट्वीट डिलीट

इस पूरे मामले में सबसे पहले ईरान के दूतावास ने ईद के मौके पर एक पोस्ट किया था, जिसमें भारत और “कश्मीर के लोगों” को धन्यवाद दिया गया था। इसमें लिखा गया था कि कश्मीर के लोगों ने मुश्किल समय में ईरान का साथ दिया और उनकी मदद को कभी नहीं भुलाया जाएगा। इस पोस्ट में साफ तौर पर “थैंक यू इंडिया” भी लिखा गया था।

इसके कुछ समय बाद यह ट्वीट हटा दिया गया। इसके बाद दूसरा पोस्ट सामने आया, जिसमें कश्मीर की एक महिला द्वारा सोना दान करने की कहानी साझा की गई थी। इस पोस्ट के अंत में भी “थैंक यू कश्मीर” और “थैंक यू इंडिया” लिखा गया था। लेकिन यह पोस्ट भी कुछ समय बाद हटा दिया गया। (Iran Embassy Tweet Controversy)

तीसरा ट्वीट भी किया डिलीट

इसके बाद जो तीसरा ट्वीट सामने आया, वही सबसे ज्यादा विवादित माना जा रहा है। इस पोस्ट में इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी के एयरोस्पेस फोर्स का जिक्र था। साथ ही एक तस्वीर भी साझा की गई थी।

इस तस्वीर में एक मिसाइल या ड्रोन सिस्टम के पास एक बैनर लगा हुआ था, जिसमें उर्दू या फारसी भाषा में लिखा गया था, “हम दिल की गहराइयों से आप कश्मीरी लोगों की सहायता के शुक्रगुजार हैं, और आपके नाम पर अपने लीडर के कातिलों से बदला लेंगे।”

यह पोस्ट सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से प्रतिक्रिया शुरू हो गई। लोगों ने इसे गंभीर और संवेदनशील मामला बताया। इसके कुछ समय बाद यह ट्वीट भी बिना किसी स्पष्टीकरण के हटा दिया गया। (Iran Embassy Tweet Controversy)

क्या पाकिस्तान जता रहा है आपत्ति

बताया जा रहा है कि इन ट्वीट्स को लेकर पाकिस्तान से जुड़े कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि कश्मीर को भारत का हिस्सा बताना सही नहीं है। इसी वजह से ईरान दूतावास के पोस्ट पर बड़ी संख्या में टिप्पणियां आने लगीं।

इन प्रतिक्रियाओं के बाद दूतावास ने अपने पोस्ट एक-एक करके हटाने शुरू कर दिए। हालांकि इस पर दूतावास की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया। (Iran Embassy Tweet Controversy)

भारत में लोगों ने जताई नाराजगी

इस पूरे घटनाक्रम के बाद भारत में भी लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने पूछा कि अगर पहले भारत और कश्मीर का जिक्र किया गया था, तो बाद में उसे क्यों हटाया गया।

कुछ लोगों ने इसे भारत की संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया। उनका कहना था कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और इस तरह के बदलाव से गलत संदेश जा सकता है। कुछ यूजर्स ने विदेश मंत्रालय से इस मामले पर दखल देने की मांग भी की।

यह पूरा मामला उस समय सामने आया जब कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों से ईरान के लिए मदद भेजी जा रही थी। लोगों ने नकद पैसे, सोना, चांदी और घरेलू सामान तक दान किया।

कई जगहों पर लोगों ने खुद आगे आकर राहत सामग्री इकट्ठा की। कुछ महिलाओं ने अपने निजी गहने तक दान कर दिए। इसी मदद को लेकर ईरान दूतावास ने शुरुआत में आभार जताया था। (Iran Embassy Tweet Controversy)

कश्मीर का जिक्र क्यों बना मुद्दा

कश्मीर का मुद्दा भारत के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। भारत हमेशा यह कहता है कि पूरा जम्मू-कश्मीर उसका हिस्सा है। वहीं पाकिस्तान इस पर अलग रुख रखता है। ऐसे में जब किसी विदेशी दूतावास की तरफ से कश्मीर का जिक्र किया जाता है, तो उसे बहुत ध्यान से देखा जाता है। यही वजह है कि ईरान दूतावास के ट्वीट चर्चा में आ गए।

सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई। कुछ लोगों ने इसे कूटनीतिक दबाव का असर बताया, तो कुछ ने इसे गलत संदेश देने वाला कदम कहा। कई यूजर्स ने यह भी कहा कि बार-बार ट्वीट डिलीट करना खुद में एक बड़ा सवाल है। वहीं कुछ लोगों ने यह मुद्दा उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया के दबाव का असर कूटनीतिक फैसलों पर पड़ रहा है। हालांकि ईरान दूतावास की तरफ से अब तक इन ट्वीट्स को हटाने को लेकर कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है। (Iran Embassy Tweet Controversy)

भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग में बड़ा कदम, हथियार खरीद से आगे बढ़कर अब को-प्रोडक्शन पर फोकस!

DPG Meeting 2026
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh and US Under Secretary of War for Policy Elbridge Colby co-chaired the talks.

DPG Meeting 2026: ईरान में चल रही भीषण जंग के बीच भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए नई दिल्ली में 18वें डिफेंस पॉलिसी ग्रुप (डीपीजी) बैठक आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी फॉर पॉलिसी एल्ब्रिज कोल्बी ने संयुक्त रूप से की। बैठक में दोनों देशों ने मौजूदा रक्षा सहयोग की समीक्षा की और आगे के सहयोग के लिए अहम क्षेत्रों पर सहमति जताई।

डिफेंस पॉलिसी ग्रुप भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सबसे अहम संवाद मंच माना जाता है। इसके जरिए दोनों देश रक्षा, सुरक्षा, सैन्य सहयोग और रणनीतिक मामलों पर नियमित बातचीत करते हैं। इस बैठक में भी दोनों पक्षों ने उन पहलुओं पर ध्यान दिया जो दोनों देशों की सुरक्षा और सैन्य तैयारियों से सीधे जुड़े हैं।

बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच पहले से चल रही रक्षा योजनाओं की विस्तार से समीक्षा की गई। इसमें रक्षा उपकरणों की खरीद, तकनीकी सहयोग और सैन्य साझेदारी से जुड़े मुद्दे शामिल रहे। दोनों पक्षों ने माना कि इन योजनाओं को और बेहतर तरीके से लागू करने की जरूरत है, ताकि इसका फायदा जमीन पर भी दिखाई दे।

DPG Meeting 2026: को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन पर जोर

इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रक्षा उपकरणों के को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन को लेकर चर्चा रहा। दोनों देशों ने ऐसे क्षेत्रों की पहचान की, जहां मिलकर आधुनिक हथियार और तकनीक विकसित की जा सकती है।

इसका उद्देश्य यह है कि भारत और अमेरिका केवल खरीदार और विक्रेता के रूप में नहीं, बल्कि साझेदार के रूप में काम करें। इससे भारत को नई तकनीक तक पहुंच मिलेगी और देश के अंदर रक्षा उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा।

बता दें कि जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल और स्ट्राइकर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स के को-प्रोडक्शन की योजनाएं पहले से ही आगे बढ़ रही हैं। इसके साथ ही ऑटोनॉमस सिस्टम्स इंडस्ट्री अलायंस (एशिया) जैसी नई पहल पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत एंडुरिल-महिंद्रा और एल3 हैरिस-भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे पाटर्नरशिप मॉडल उभरकर सामने आ रहे हैं।

सैन्य सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति

बैठक में दोनों देशों ने अपनी सेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। इसके तहत संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अधिकारियों के बीच रणनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। इस तरह के सहयोग से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बेहतर होता है और किसी भी स्थिति में साथ मिलकर काम करने की क्षमता बढ़ती है।

बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर भी चर्चा हुई। यह क्षेत्र दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सहयोग जारी रखना जरूरी है।

बैठक में आधुनिक सैन्य तकनीकों पर भी विशेष जोर दिया गया। इसमें एडवांस सिस्टम, निगरानी क्षमता और नई पीढ़ी के हथियारों के विकास जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तकनीकी सहयोग को और बढ़ाया जाएगा।

वहीं, बैठक में दोनों देशों के बीच चल रही योजनाओं और समझौतों की समीक्षा की गई। इसमें लेमोआ (2016), कॉमकासा (2018), बीईसीए (2020) और इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एग्रीमेंट जैसे समझौते शामिल रहे।

इन समझौतों की वजह से अमेरिका के कई रक्षा उपकरण जैसे सी-17, सी-130जे, पी-8आई, अपाचे, चिनूक हेलीकॉप्टर और एमक्यू-9बी ड्रोन भारतीय सेना में शामिल किए जा चुके हैं।

इस समय भारत अमेरिका से 20 अरब डॉलर से ज्यादा के रक्षा उपकरण ले चुका है। बैठक में इन उपकरणों की देखभाल, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और भारत में ही उनकी मरम्मत की व्यवस्था को बेहतर बनाने पर खास ध्यान दिया गया।

रक्षा मंत्री ने की बीआरओ के कामकाज की समीक्षा, बॉर्डर इलाकों में तेजी से बढ़ रहा है इंफ्रास्ट्रक्चर

BRO Projects
Pic: PIB

BRO Projects: सीमा क्षेत्रों में सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में एक अहम बैठक हुई, जिसमें बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ के कामकाज और योजनाओं की समीक्षा की गई। इस बैठक में रक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।

BRO Projects: संसद की कमेटी के साथ हुई चर्चा

यह बैठक रक्षा मंत्रालय की पार्लियामेंट्री कंसल्टेटिव कमेटी के साथ नई दिल्ली में आयोजित की गई। इसमें सरकार और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। बैठक के दौरान बीआरओ द्वारा किए जा रहे काम, नई परियोजनाओं और सीमा क्षेत्रों में विकास की स्थिति पर विस्तार से जानकारी दी गई।

रक्षा मंत्री ने इस दौरान कहा कि बीआरओ सिर्फ सड़कें ही नहीं बना रहा, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में एक ऐसा सिस्टम तैयार कर रहा है जिसमें सुरक्षा, विकास और कनेक्टिविटी तीनों को साथ लेकर काम किया जा रहा है।

सीमावर्ती इलाकों में बदल रही तस्वीर

रक्षा मंत्री ने बताया कि बीआरओ ने खासतौर पर नॉर्थ-ईस्ट और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों में कनेक्टिविटी बेहतर करने का काम किया है। इससे न सिर्फ सेना की आवाजाही आसान हुई है, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के जीवन में भी बदलाव आया है।

उन्होंने कहा कि अब सेना की मूवमेंट पहले से ज्यादा तेज और आसान हो गई है, जिससे ऑपरेशनल तैयारी मजबूत हुई है। साथ ही दूर-दराज के गांव भी अब बेहतर तरीके से जुड़ रहे हैं।

बीआरओ भारत के अलावा दूसरे देशों में भी काम कर रहा है। अफगानिस्तान, भूटान, म्यांमार और ताजिकिस्तान जैसे देशों में भी इस संगठन ने सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट पूरे किए हैं। बैठक में यह भी बताया गया कि बीआरओ को भारत-म्यांमार सीमा पर करीब 1600 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है।

बॉर्डर रोड्स डेवलपमेंट प्रोग्राम 2023-28 पर चर्चा

बैठक के दौरान बॉर्डर रोड्स डेवलपमेंट प्रोग्राम 2023-28 की प्रगति पर भी चर्चा हुई। इस प्रोग्राम के तहत देशभर में 1000 से ज्यादा सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

इनमें नई सड़कें बनाना, पुरानी सड़कों को अपग्रेड करना और उनकी मेंटेनेंस शामिल है। सरकार का लक्ष्य है कि दूर-दराज और ऊंचाई वाले इलाकों में भी हर मौसम में कनेक्टिविटी बनी रहे।

रक्षा मंत्री ने कहा कि इस नेटवर्क के जरिए अब ऐसे इलाकों में भी ऑल वेदर कनेक्टिविटी दी जा रही है, जहां पहले पहुंचना बहुत मुश्किल था। इससे सेना की तैयारी और मजबूत हुई है।

आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा

बैठक में तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया। रक्षा मंत्री ने कहा कि बीआरओ अब हाई एल्टीट्यूड इक्विपमेंट, मॉड्यूलर ब्रिज और प्रीकास्ट टेक्नोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकों का तेजी से इस्तेमाल कर रहा है।

इससे काम की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है और प्रोजेक्ट जल्दी पूरे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीक से भविष्य के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।

बैठक में डायरेक्टर जनरल बॉर्डर रोड्स लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने बीआरओ के काम की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बीआरओ की स्थापना 1960 में हुई थी और तब से अब तक इस संगठन ने 64,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई हैं। इसके अलावा 1179 पुल, 22 एयरफील्ड और 7 सुरंगों का निर्माण भी किया गया है। इन परियोजनाओं ने सीमा क्षेत्रों में सेना की तैयारी को मजबूत करने के साथ-साथ वहां के लोगों के विकास में भी मदद की है। इन परियोजनाओं से सीमा क्षेत्रों में सेना की ऑपरेशनल तैयारी मजबूत हुई है और वहां के लोगों के जीवन में भी सुधार आया है।

कमेटी को यह भी बताया गया कि सीमा क्षेत्रों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बनने से सेना की तैयारी मजबूत हुई है और इन इलाकों में सामाजिक और आर्थिक विकास को भी रफ्तार मिली है, जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से जुड़ा हुआ है।

कठिन हालात में काम करने की चुनौती

बीआरओ को काम करते समय कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसमें ऊंचे पहाड़ी इलाके, बेहद ठंडा मौसम और सीमित समय में काम पूरा करना शामिल है।

इसके अलावा जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी भी कई बार काम को प्रभावित करती हैं। इसके बावजूद बीआरओ लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है और नई तकनीक अपनाकर तेजी से काम कर रहा है।

इसके अलावा बीआरओ सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि आपदा के समय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बर्फबारी, भूस्खलन या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बीआरओ की टीमें तुरंत राहत और रास्ता खोलने का काम करती हैं।

भारतीय सेना के ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’ में जुटेंगे सेना-स्टार्टअप और इंडस्ट्री, ड्रोन, AI और नई टेक्नोलॉजी पर फोकस

North Tech Symposium 2026
North Tech Symposium 2026 is being organised jointly by Northern and Central Commands of the Indian Army

North Tech Symposium 2026: भारतीय सेना अब भविष्य की युद्ध तैयारी को ध्यान में रखते हुए नई टेक्नोलॉजी की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रही है। भारतीय सेना ने नॉर्थ टेक सिम्पोजियम की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य सेना, इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी सेक्टर को एक साथ लाकर आधुनिक जरूरतों के अनुसार समाधान तैयार करना है। नई दिल्ली में आयोजित कर्टेन रेजर कार्यक्रम के जरिए इस बड़े आयोजन की घोषणा की गई, जो इस साल मई में प्रयागराज में होगा।

इस कार्यक्रम में भारतीय सेना, इंडस्ट्री, स्टार्टअप्स, एकेडेमिया, डीपीएसयू, पैरामिलिट्री फोर्स और रक्षा मंत्रालय से जुड़े कई बड़े अधिकारी शामिल हुए। इसका मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस सिम्पोजियम में हिस्सा लें और रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक पर मिलकर काम करें।

North Tech Symposium 2026: सेना और इंडस्ट्री को जोड़ने की कोशिश

यह सिम्पोजियम भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड मिलकर आयोजित कर रही हैं। इसमें सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) भी सहयोग कर रही है। कार्यक्रम में सेंट्रल कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता और नॉर्दन कमांड जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा जैसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। इनके अलावा इंडस्ट्री और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञ भी शामिल हुए।

इस सिम्पोजियम का मुख्य उद्देश्य सेना की जरूरतों और देश में बन रही तकनीक के बीच तालमेल बैठाना है, ताकि जो टेक्नोलॉजी बनाई जा रही है, वह सीधे मैदान में काम आ सके।

क्या है ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’ थीम

इस बार सिम्पोजियम की थीम रखी गई है “रक्षा त्रिवेणी संगम – जहां टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्री और सैनिक एक साथ आते हैं।” इसका मतलब है कि सेना, प्राइवेट कंपनियां, स्टार्टअप्स और पढ़ाई-लिखाई से जुड़े संस्थान एक प्लेटफॉर्म पर आएं और मिलकर नई रक्षा तकनीक विकसित करें।

प्रयागराज में यह आयोजन इसलिए रखा गया है क्योंकि यह गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम का प्रतीक है। उसी तरह यह सिम्पोजियम भी तीन क्षेत्रों को जोड़ने की कोशिश है।

सिम्पोजियम में क्या होगा खास

इस सिम्पोजियम में देश की कई कंपनियां और स्टार्टअप्स अपनी नई टेक्नोलॉजी दिखाएंगे। ये तकनीक सेना की जरूरतों के आधार पर तैयार की गई हैं। कर्टेन रेजर के दौरान जो “प्रॉब्लम डिफिनिशन स्टेटमेंट” जारी किए गए हैं, उन्हीं के आधार पर इंडस्ट्री अपनी तकनीक लेकर आएगी। इसके अलावा अलग-अलग सेमिनार भी आयोजित किए जाएंगे, जिनमें सेना, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के विशेषज्ञ मिलकर चर्चा करेंगे।

दो बड़े सेमिनार होंगे आयोजित

इस कार्यक्रम में दो खास सेमिनार रखे गए हैं। पहला सेमिनार “संगम” नाम से होगा, जिसमें नई पीढ़ी की तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग पर बात होगी। दूसरा सेमिनार “ध्रुवा” नाम से होगा, जिसमें रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने और सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की जाएगी। इन सेमिनारों में नई टेक्नोलॉजी, रिसर्च और भविष्य की जरूरतों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

किन-किन तकनीकों पर रहेगा फोकस

सिम्पोजियम में कई अहम क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा। इसमें ड्रोन सिस्टम, रोबोटिक्स, कम्युनिकेशन सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और सर्विलांस जैसे विषय शामिल हैं। इसके साथ ही हाई एल्टीट्यूड एरिया में काम आने वाली तकनीक, सैनिकों की सुरक्षा से जुड़ी डिवाइस और विशेष ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरण भी दिखाए जाएंगे।

नॉर्थ टेक सिम्पोजियम से पहले भी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। 2023 में इसका पहला आयोजन आईआईटी जम्मू में हुआ था, जहां इंडस्ट्री और एकेडेमिया ने मिलकर सेना की जरूरतों के समाधान खोजे थे। इसके बाद 2024 में लेह में “हिम टेक” कार्यक्रम हुआ था, जिसमें हाई एल्टीट्यूड एरिया में काम आने वाली तकनीकों पर फोकस किया गया था।

अब 2026 का यह सिम्पोजियम इन दोनों अनुभवों को आगे बढ़ाने का प्रयास है। इस सिम्पोजियम का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि सेना को जो भी तकनीक चाहिए, वह देश में ही विकसित की जाए।

इसके लिए इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स को सीधे सेना की जरूरतों के बारे में बताया जाएगा, ताकि वे उसी के अनुसार समाधान तैयार कर सकें। इससे न सिर्फ सेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि देश में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। सेना चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस क्षेत्र में जुड़ें और मिलकर ऐसे समाधान तैयार करें जो भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकें।

सैनिक स्कूलों को लेकर संसदीय समिति ने कही ये बड़ी बात, बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर जताई नाराजगी!

Sainik Schools India
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Sainik Schools: देश के सैनिक स्कूलों को लेकर संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने बड़ी सिफारिश की है। हाल ही में जारी संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक अब इन स्कूलों का फोकस केवल आर्म्ड फोर्सेज में भर्ती तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समिति का कहना है कि छात्रों को रक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों जैसे डिफेंस रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइन और मेडिसिन में भी करियर बनाने के लिए तैयार किया जाए।

यह सिफारिश समिति की हालिया रिपोर्ट में दी गई है, जिसमें कहा गया है कि समय के साथ युद्ध और सुरक्षा का स्वरूप बदल गया है। ऐसे में छात्रों को भी नई तकनीक और आधुनिक क्षेत्रों के लिए तैयार करना जरूरी है। (Sainik Schools)

Sainik Schools: अब केवल सेना तक सीमित नहीं रहेगा करियर

अभी तक सैनिक स्कूलों का मुख्य उद्देश्य छात्रों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और नौसेना अकादमी के लिए तैयार करना रहा है। यहां पढ़ने वाले अधिकतर छात्र सेना, नौसेना या वायुसेना में जाने का सपना देखते हैं।

लेकिन समिति ने कहा है कि अब छात्रों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार अन्य विकल्प भी दिए जाने चाहिए। इसमें डिफेंस टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, रिसर्च, मेडिकल और डिजाइन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इससे छात्रों के सामने करियर के ज्यादा रास्ते खुलेंगे। (Sainik Schools)

देश में कितने हैं सैनिक स्कूल

देश में इस समय कुल 33 सैनिक स्कूल हैं, जो 1961 से केंद्र और राज्य सरकारों के मिल कर चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और देहरादून स्थित राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज भी रक्षा मंत्रालय के तहत काम करते हैं।

आरआईएमसी की स्थापना 1922 में हुई थी और राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल 1925 से शुरू हुए। ये दोनों पूरी तरह केंद्र सरकार के अधीन हैं। वहीं सैनिक स्कूल केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से चलते हैं।

इन संस्थानों का उद्देश्य शुरू से ही सेना के लिए अधिकारियों को तैयार करना और देश के अलग-अलग हिस्सों से युवाओं को समान अवसर देना रहा है। (Sainik Schools)

नए विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश

रिपोर्ट में कहा गया है कि सैनिक स्कूल, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज के छात्रों को रक्षा से जुड़े दूसरे क्षेत्रों जैसे रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइन और मेडिकल फील्ड में भी जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे छात्रों को ज्यादा अवसर मिलेंगे और वे अलग-अलग क्षेत्रों में देश की सेवा कर सकेंगे।

समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि सैनिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में आधुनिक तकनीक से जुड़े विषय शामिल किए जाएं। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वारफेयर, स्पेस वारफेयर, ड्रोन टेक्नोलॉजी, क्वांटम टेक्नोलॉजी और डायरेक्टेड एनर्जी जैसे विषय शामिल हैं।

इन विषयों के जरिए छात्रों को नई तरह के युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों के बारे में जानकारी मिलेगी। साथ ही वे आधुनिक तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे। (Sainik Schools)

मल्टी-डायरेक्शनल शिक्षा पर जोर

रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय को इन स्कूलों के जरिए छात्रों में शुरुआती स्तर से ही जागरूकता बढ़ानी चाहिए। इसके लिए एक मल्टी-प्रॉन्ग्ड अप्रोच अपनाने की बात कही गई है, जिसमें छात्रों को अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में जानकारी दी जाए और उनकी पसंद के मुताबिक मार्गदर्शन किया जाए।

इसका उद्देश्य छात्रों का समग्र विकास करना है, ताकि वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें और देश के भविष्य में योगदान दे सकें। (Sainik Schools)

नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना

सरकार पहले ही देश में 100 नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना शुरू कर चुकी है। ये स्कूल एनजीओ, प्राइवेट संस्थानों और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में खोले जा रहे हैं। अब तक 86 नए स्कूलों को मंजूरी मिल चुकी है।

इन नए स्कूलों के जरिए ज्यादा से ज्यादा छात्रों को सैनिक शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। (Sainik Schools)

फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या

समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि कई सैनिक स्कूलों को बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। खासकर राज्य सरकारों से मिलने वाली आर्थिक मदद काफी नहीं है।

इस वजह से स्कूलों के रखरखाव, स्टाफ सुविधाओं और अन्य जरूरी कामों में दिक्कत आती है। समिति ने सुझाव दिया है कि इन स्कूलों को पर्याप्त फंड दिया जाए ताकि उनकी जरूरतें पूरी हो सकें। (Sainik Schools)

सरकार को दिए निर्देश

समिति ने रक्षा मंत्रालय से कहा है कि वह वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर सैनिक स्कूलों के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित करे। इसके साथ ही पुराने 33 सैनिक स्कूलों के आधुनिकीकरण पर भी ध्यान देने को कहा गया है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नए स्कूलों को फीस सपोर्ट, ट्रेनिंग ग्रांट और अन्य सुविधाएं समय पर दी जानी चाहिए, ताकि उनकी गुणवत्ता बनी रहे। (Sainik Schools)

Vayu Baan: अब हेलीकॉप्टर से छोड़े जाएंगे ड्रोन, IAF का नया प्रोजेक्ट दुश्मन पर करेगा दूर से वार

IAF Vayu Baan
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IAF Vayu Baan: भारतीय वायुसेना ने आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसका नाम “वायु बाण” रखा गया है। यह देश का पहला ऐसा प्रोग्राम है जिसमें हेलीकॉप्टर से ड्रोन को गिराकर ऑपरेशन किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत वायुसेना अब ऐसे छोटे ड्रोन डेवलप करना चाहती है जो हेलीकॉप्टर से लॉन्च होकर अपने आप दुश्मन के इलाके तक पहुंच सकें।

वायुसेना के डायरेक्टोरेट ऑफ एयरोस्पेस डिजाइन ने हाल ही में एक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया है। इसके जरिए भारतीय कंपनियों को इस सिस्टम के डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए आमंत्रित किया गया है। यह पूरा प्रोजेक्ट स्वदेशी है और इसमें केवल घरेलू कंपनियों को ही भाग लेने की अनुमति दी गई है। (IAF Vayu Baan)

IAF Vayu Baan: आधुनिक युद्ध में ड्रोन की बढ़ती भूमिका

हाल के सालों में युद्ध का तरीका तेजी से बदला है। अब लड़ाई केवल सामने से नहीं होती, बल्कि दूर से ही टारगेट को निशाना बनाया जाता है। इसे बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी बीवीआर कहा जाता है। ऐसे माहौल में ड्रोन सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं।

हेलीकॉप्टर को जब दुश्मन के इलाके के पास जाना पड़ता है तो उस पर हमला होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में “वायु बाण” प्रोजेक्ट का उद्देश्य यही है कि हेलीकॉप्टर को सुरक्षित दूरी पर रखते हुए ड्रोन के जरिए हमला किया जा सके। इससे एयरक्रू की सुरक्षा भी बढ़ेगी और मिशन ज्यादा प्रभावी होगा। (IAF Vayu Baan)

कैसे काम करेगा वायु बाण ड्रोन

इस प्रोजेक्ट के तहत जो ड्रोन तैयार किया जाएगा, उसे हेलीकॉप्टर से नीचे गिराया जाएगा। इसके बाद यह ड्रोन खुद ही उड़ान भरकर अपने टारगेट की ओर बढ़ेगा। यह पूरी तरह ऑटोमेटिक तरीके से काम करेगा और ऑपरेटर को रियल टाइम जानकारी भेजेगा।

यह ड्रोन केवल निगरानी ही नहीं करेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर सटीक हमला भी कर सकेगा। इसमें छोटा वॉरहेड लगाया जा सकता है, जिससे यह दुश्मन के टारगेट को निशाना बना सके। (IAF Vayu Baan)

ड्रोन की खासियतें

वायु बाण प्रोजेक्ट के तहत तैयार होने वाले ड्रोन की रेंज 80 किलोमीटर से ज्यादा रखी जा रही है। इसका मतलब है कि हेलीकॉप्टर को दुश्मन के इलाके में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह ड्रोन करीब 30 मिनट तक हवा में रह सकता है, जिससे इसे टारगेट खोजने और हमला करने का पर्याप्त समय मिलता है ।

इसमें इलेक्ट्रो ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर लगाए जाएंगे, जिससे यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकेगा। इसके अलावा यह ड्रोन ऐसे सिस्टम से लैस होगा जो जीपीएस जैमिंग के बावजूद भी काम कर सके। यानी अगर दुश्मन जीपीएस सिग्नल को बंद कर दे, तब भी यह ड्रोन अपने मिशन को पूरा करेगा।

ड्रोन से मिलने वाला वीडियो सीधे ऑपरेटर तक पहुंचेगा, जिससे तुरंत निर्णय लिया जा सकेगा। इसे जमीन से भी कंट्रोल किया जा सकता है और हवा में मौजूद प्लेटफॉर्म से भी, जिससे ऑपरेशन में लचीलापन बढ़ेगा।

वायुसेना इस प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है। इसके तहत डिजाइन, डेवलपमेंट, टेस्टिंग और शुरुआती डिलीवरी को एक साल के अंदर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए हेलीकॉप्टर से ड्रॉप टेस्ट, पेलोड इंटीग्रेशन और हाई एल्टीट्यूड टेस्टिंग जैसे कई चरण पूरे किए जाएंगे।

जब यह सभी परीक्षण पूरे हो जाएंगे, तब इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी जाएगी। (IAF Vayu Baan)

स्वदेशी तकनीक पर जोर

यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा है। वायुसेना चाहती है कि इस तरह के आधुनिक सिस्टम देश में ही डेवलप हों, ताकि विदेशी निर्भरता कम हो सके। इस प्रोजेक्ट में स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों को भी भाग लेने का मौका दिया गया है।

डायरेक्टोरेट ऑफ एयरोस्पेस डिजाइन इस पूरे प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहा है, जिसे हाल ही में स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य भारतीय रक्षा क्षेत्र में डिजाइन और इनोवेशन को बढ़ावा देना है।

वायु बाण प्रोजेक्ट के साथ भारत उन देशों की सूची में शामिल हो रहा है जो एयर लॉन्च्ड ड्रोन सिस्टम पर काम कर रहे हैं। चीन ने अपने बॉम्बर विमान से ड्रोन स्वार्म दिखाए हैं, लेकिन उनका पूरी तरह इस्तेमाल अभी शुरू नहीं हुआ है।

अमेरिका भी इस दिशा में काम कर रहा है। वहां ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से ड्रोन लॉन्च करने और हवा में वापस लेने की तकनीक पर काम चल रहा है। वहीं अमेरिकी सेना हेलीकॉप्टर से ड्रोन ऑपरेशन को डेवलप कर रही है।

भारत का यह प्रोजेक्ट खास इसलिए है क्योंकि यह सीधे हेलीकॉप्टर से ड्रोन लॉन्च करने पर केंद्रित है और इसे तेजी से तैयार किया जा रहा है। (IAF Vayu Baan)

मल्टी डोमेन ऑपरेशन की दिशा में कदम

वायु बाण प्रोजेक्ट के जरिए वायुसेना अपनी ऑपरेशनल क्षमता को और मजबूत करना चाहती है। यह सिस्टम ऐसे इलाकों में काम आएगा जहां खतरा ज्यादा हो और सीधे प्रवेश करना मुश्किल हो। ड्रोन पहले जाकर जानकारी जुटाएगा, टारगेट की पहचान करेगा और जरूरत पड़ने पर हमला करेगा। इससे मिशन की सफलता की संभावना बढ़ेगी और जोखिम कम होगा। यह प्रोजेक्ट आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है, जहां टेक्नोलॉजी और ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। (IAF Vayu Baan)

सिडनी पहुंचा भारतीय नौसेना का स्टेल्थ फ्रिगेट INS नीलगिरी, ऑस्ट्रेलिया इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में लेगा हिस्सा

INS Nilgiri Sydney IFR 2026
INS NILGIRI IN SYDNEY, AUSTRALIA FOR RAN INTERNATIONAL FLEET REVIEW 2026

INS Nilgiri Sydney IFR 2026: भारतीय नौसेना का स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस नीलगिरी 21 मार्च को ऑस्ट्रेलिया के सिडनी पहुंच गया है। यह युद्धपोत रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में हिस्सा लेने के लिए वहां पहुंचा है। यह आयोजन ऑस्ट्रेलियन नौसेना की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर किया जा रहा है।

आईएनएस नीलगिरी ने सिडनी पहुंचने से पहले एक्सरसाइज काकाडू के पहले चरण को पूरा किया। यह एक बहुराष्ट्रीय समुद्री अभ्यास है, जिसमें कई देशों की नौसेनाएं शामिल होती हैं।

INS Nilgiri Sydney IFR 2026: भारत का प्रतिनिधित्व करेगा नीलगिरी

इस इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में आईएनएस नीलगिरी भारतीय नौसेना का प्रतिनिधित्व करेगा। यह जहाज प्रोजेक्ट पी-17ए के तहत बना भारत का आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है।

इस तैनाती को भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, क्योंकि यह जहाज विदेश में अपनी ऑपरेशनल मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

सिडनी हार्बर में 19 देशों के 31 युद्धपोतों के साथ यह फ्लीट रिव्यू आयोजित हो रहा है, जो पिछले 10 साल का सबसे बड़ा समुद्री कार्यक्रम है।

आईएनएस नीलगिरी की खूबियां

प्रोजेक्ट 17ए के तहत निर्मित आईएनएस नीलगिरी भारतीय नौसेना का पहला स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड द्वारा निर्मित यह जहाज 2025 में कमीशन हुआ। इसका पूर्ण विस्थापन 6,670 टन, लंबाई 149 मीटर, चौड़ाई 17.8 मीटर और ड्राफ्ट 5.22 मीटर है। यह कॉम्बाइंड डीजल एंड गैस प्रोपल्शन सिस्टम से लैस है, जिसमें दो एचएएल-जीई एलएम2500 गैस टरबाइन (प्रत्येक 30,200 किलोवॉट) और दो मैन डीजल इंजन शामिल हैं। इसकी अधिकतम गति 32 नॉट्स (59 किमी/घंटा) है और 28 नॉट्स पर 5,500 नॉटिकल मील की रेंज तय कर सकता है।

जहाज की स्टेल्थ डिजाइन रडार-अब्जॉर्बिंग कोटिंग और कंपोजिट मटेरियल से बनी है, जो इसे दुश्मन के रडार से लगभग अदृश्य बनाती है। हथियार प्रणाली में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (8 लॉन्चर), बाराक-8 सर्फेस-टू-एयर मिसाइल (32 वर्टिकल लॉन्च सेल्स), 127 मिमी मुख्य तोप, दो 30 मिमी एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम, टॉरपीडो ट्यूब और आरबीयू-12000 रॉकेट लॉन्चर शामिल हैं। एक केए-28 या एमएच-60R हेलीकॉप्टर के लिए हैंगर और लैंडिंग डेक है। कुल 226 नाविकों की क्षमता के साथ यह बहु-उद्देशीय युद्धपोत एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन युद्ध में माहिर है।

भारत-ऑस्ट्रेलिया नौसेना सहयोग पर जोर

इस यात्रा को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते समुद्री सहयोग के रूप में देखा जा रहा है। दोनों देशों की नौसेनाएं इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मिलकर काम कर रही हैं और इस तरह के आयोजन आपसी समझ और तालमेल को मजबूत करते हैं।

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम के विजाग में हुए फ्लीट रिव्यू में ऑस्ट्रेलिया की नौसेना ने भी हिस्सा लिया था। उस समय एचएमएएस वारामुंगा नाम का युद्धपोत भारत आया था। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद

इस कार्यक्रम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाइस एडमिरल संजय भल्ला कर रहे हैं, जो पूर्वी नौसेना कमान के प्रमुख हैं। वहीं रियर एडमिरल आलोक आनंद फ्लीट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भारतीय नौसेना का प्रतिनिधित्व करेंगे।

यह सम्मेलन नौसेना प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बातचीत का एक अहम मंच होता है, जहां विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की जाती है। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

पोर्ट कॉल के दौरान कई गतिविधियां

आईएनएस नीलगिरी के सिडनी पहुंचने के बाद कई तरह की गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। इसमें प्रोफेशनल डिस्कशन, एक्सरसाइज प्लानिंग, विशेषज्ञों के बीच बातचीत और खेल से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं।

इन गतिविधियों का उद्देश्य अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और समझ विकसित करना है। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

इंडो-पैसिफिक में बढ़ती भूमिका

आईएनएस नीलगिरी की तैनाती दक्षिणी गोलार्ध और वेस्टर्न पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती मौजूदगी को दिखाती है। इस दौरान यह जहाज कई विदेशी नौसेनाओं के साथ काम कर रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भारत क्षेत्र में सुरक्षित और सहयोगात्मक समुद्री व्यवस्था बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

Inspirational: कॉर्पोरेट जॉब छोड़ सेना में आए मेजर अब पूरे भारत में लगा रहे दौड़, 32 राज्यों में पूरी की 46 हाफ मैराथन

Major A Sharad Naidu Half Marathon Mission
Major A Sharad Naidu

Half Marathon Mission: भारतीय सेना के अधिकारी मेजर ए शरद नायडू इन दिनों अपने अनोखे मिशन को लेकर चर्चा में हैं। गोरखा राइफल्स से जुड़े मेजर नायडू ने 39 साल की उम्र में सेना जॉइन की थी। इससे पहले वह एक सफल कॉर्पोरेट करियर में थे और उनके पास 12 साल से ज्यादा का प्रोफेशनल अनुभव था।

मेकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मार्केटिंग और ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट में एमबीए भी किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी स्थिर नौकरी छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुना।

Half Marathon Mission: 2022 में शुरू हुआ खास मिशन

107 इन्फैंट्री बटालियन, टेरिटोरियल आर्मी, 11 गोरखा राइफल्स से जुड़े मेजर नायडू ने साल 2022 में एक अनोखा लक्ष्य तय किया। उन्होंने फैसला किया कि वह 50 साल की उम्र से पहले भारत के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में एक-एक हाफ मैराथन पूरा करेंगे।

इस मिशन की शुरुआत मिजोरम के वैरेंगटे से हुई। उस समय वह एक आर्मी कोर्स के दौरान व्यक्तिगत चुनौती का सामना कर रहे थे। उसी दिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद ही एक सोलो मैराथन पूरी की। यही पल उनके लिए एक बड़े मिशन की शुरुआत बन गया।

देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दौड़ पूरी

मेजर नायडू अब तक 46 हाफ मैराथन पूरी कर चुके हैं। उन्होंने देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह दौड़ पूरी की है। पिछले एक साल में ही उन्होंने उत्तर, पूर्वोत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत में 14 हाफ मैराथन पूरी की हैं।

वहीं, उनका यह मिशन केवल दौड़ पूरी करने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि वह हर राज्य में जाकर वहां के लोगों, संस्कृति और जीवन को करीब से समझने की कोशिश करते हैं।

मेडल नहीं, देश को समझना है मकसद

मेजर नायडू के मुताबिक यह मिशन किसी रिकॉर्ड या मेडल के लिए नहीं है। उनका उद्देश्य भारत की विविधता को अनुभव करना और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को जीना है।

हर दौड़ उनके लिए एक नया अनुभव होती है, जहां वह अलग-अलग इलाकों की परिस्थितियों, मौसम और लोगों के बीच दौड़ते हैं।

अब मिशन के अंतिम चरण में पहुंचे

मेजर नायडू अब अपने मिशन के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। उन्होंने कुल 36 में से 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर कर लिया है। अभी हिमाचल प्रदेश, केरल, लक्षद्वीप और लद्दाख में दौड़ पूरी करना बाकी है।

उनकी यह यात्रा लगातार जारी है और वह अपने तय लक्ष्य के अनुसार देश के हर हिस्से तक पहुंच रहे हैं।

मेजर नायडू अपनी सैन्य जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत मिशन को भी जारी रखते हैं। ऑपरेशनल ड्यूटी और ट्रेनिंग के बीच समय निकालकर वह अलग-अलग राज्यों में जाकर हाफ मैराथन पूरी करते हैं। (Half Marathon Mission)