Home Blog Page 8

वेस्ट एशिया तनाव पर रक्षा मंत्री लिया ने सेना की तैयारियों का जायजा, 10 साल का प्लान बनाने के निर्देश

Rajnath Singh defence review

Rajnath Singh defence review: वेस्ट एशिया के मौजूदा हालात और भारत की रक्षा तैयारियों को लेकर मंगलवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक विशेष बैठक में चर्चा की। इस बैठक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव, रक्षा उत्पादन सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

बैठक के दौरान रक्षा मंत्री को वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति की पूरी जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष और बढ़ते तनाव का असर केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दुनिया के कई देशों पर पड़ रहा है, जिसमें भारत भी शामिल है।

Rajnath Singh defence review: संघर्ष का असर भारत की सुरक्षा और सप्लाई चेन पर

बैठक में खास तौर पर इस बात पर ध्यान दिया गया कि अगर वेस्ट एशिया में स्थिति और बिगड़ती है तो उसका भारत पर क्या असर पड़ेगा। अधिकारियों ने बताया कि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से समुद्री रास्तों, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मार्गों पर दबाव बढ़ सकता है।

यह मार्ग दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का ट्रांसपोर्ट होता है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में किसी भी तरह की बाधा से देश की ऊर्जा सप्लाई और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

इसके अलावा बैठक में यह भी चर्चा हुई कि इस स्थिति का रक्षा उपकरणों की सप्लाई चेन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। कई जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और टेक्नोलॉजी अलग-अलग देशों से आती है। अगर सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो इससे मेंटेनेंस और सर्विसेबिलिटी पर असर पड़ सकता है। (Rajnath Singh defence review)

रक्षा मंत्री ने दिए अहम निर्देश

बैठक के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कहा कि वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष से मिलने वाले ऑपरेशनल और टेक्नोलॉजिकल अनुभवों का लगातार अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और भारत को समय के साथ अपनी तैयारियों को मजबूत करना होगा।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इन अनुभवों के आधार पर सेना की रणनीति और क्षमताओं को बेहतर बनाया जाए। इसके साथ ही उन्होंने अगले दस साल के लिए एक व्यापक और इंटीग्रेटेड रोडमैप तैयार करने की जरूरत पर भी बल दिया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि इस रोडमैप में भविष्य की चुनौतियों, नए अवसरों और तकनीकी बदलावों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया, ताकि भारत रक्षा क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा स्वदेशी सिस्टम और उपकरणों पर निर्भर हो सके। (Rajnath Singh defence review)

टेक्नोलॉजी और ऑपरेशन पर विशेष फोकस

बैठक में यह भी चर्चा हुई कि आधुनिक युद्ध में टेक्नोलॉजी की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, मिसाइल सिस्टम और नेटवर्क आधारित ऑपरेशन जैसे क्षेत्र अब युद्ध के अहम हिस्से बन चुके हैं।

अधिकारियों ने बताया कि इन नई तकनीकों को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी रक्षा रणनीति को लगातार अपडेट करना होगा। इसके लिए रिसर्च, डेवलपमेंट और इंडिजिनस प्रोडक्शन पर फोकस बढ़ाने की जरूरत है।

सभी मोर्चों पर तैयार रहने की बात

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारत को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। चाहे वह पारंपरिक युद्ध हो या नई तरह की चुनौतियां, सभी मोर्चों पर ऑपरेशनल रेडीनेस बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि सेना के पास जरूरी संसाधन, उपकरण और सपोर्ट सिस्टम हमेशा उपलब्ध रहें, ताकि किसी भी स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। (Rajnath Singh defence review)

बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा

इस बैठक में केवल सुरक्षा स्थिति ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े कई अन्य पहलुओं पर भी चर्चा हुई। इसमें रक्षा उत्पादन, उपकरणों की खरीद, उनकी देखभाल और सर्विसेबिलिटी जैसे मुद्दे शामिल रहे।

अधिकारियों ने बताया कि मौजूदा स्थिति में इन सभी पहलुओं पर नजर रखना जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की बाधा आने पर समय रहते समाधान किया जा सके।

बैठक के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत लगातार बदलते वैश्विक हालात पर नजर बनाए हुए है और जरूरत के अनुसार अपनी रणनीति में बदलाव करता रहेगा। (Rajnath Singh defence review)

लेह-मनाली हाईवे खोलने की तैयारी शुरू, BRO ने शुरू किया स्नो क्लियरेंस ऑपरेशन

Leh-Manali Snow Clearance

Leh-Manali Snow Clearance: लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से जोड़ने वाले अहम लेह-सर्चू-मनाली मार्ग को खोलने की शुरुआत शुरू हो गई है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ ने नेशनल हाईवे-03 पर स्नो क्लियरेंस ऑपरेशन शुरू कर दिया है। यह सड़क हर साल भारी बर्फबारी के कारण करीब चार से पांच महीने तक बंद रहती है, जिससे इलाके की कनेक्टिविटी पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।

Leh-Manali Snow Clearance: बीआरओ का प्रोजेक्ट हिमांक कर रहा ऑपरेशन

बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के तहत यह अभियान चलाया जा रहा है। यह प्रोजेक्ट लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले और कठिन इलाकों में सड़क निर्माण और रखरखाव का काम करता है। इस बार भी टीमों ने कठिन मौसम और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच बर्फ हटाने का काम शुरू किया है, ताकि सड़क को जल्द से जल्द खोला जा सके।

Leh-Manali Snow Clearance

यह 251.5 किलोमीटर लंबा रास्ता लेह से सरचू तक जाता है और इसमें तीन प्रमुख हाई एल्टीट्यूड पास शामिल हैं। इनमें तंगलंग ला, लाचुंग ला और नकी ला जैसे दर्रे आते हैं, जिनकी ऊंचाई 15 हजार फीट से ज्यादा है। इन इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फ जमा हो जाती है, जिससे सड़क पूरी तरह बंद हो जाती है।

यह सड़क कई दूर-दराज के गांव और बॉर्डर के पास स्थित कैंप के लिए लाइफ लाइन है। सर्चू समेत करीब 9 गांव इस मार्ग पर निर्भर हैं, जहां लगभग 5 से 6 हजार लोग रहते हैं। सड़क बंद होने से इन इलाकों में जरूरी सामान और सेवाओं की आपूर्ति प्रभावित होती है।

Leh-Manali Snow Clearance

सेना के लिए भी महत्वपूर्ण

यह सड़क भारतीय सेना के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। लद्दाख में तैनात सैनिकों तक रसद, उपकरण और जरूरी सामग्री पहुंचाने में यह मार्ग अहम भूमिका निभाता है। सड़क बंद होने पर सेना की सप्लाई लाइन प्रभावित होती है, इसलिए इसे समय पर खोलना जरूरी होता है।

इस ऑपरेशन को बीआरओ की 111 रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी, जो 753 बॉर्डर रोड्स टास्क फोर्स के तहत काम करती है, अंजाम दे रही है। टीमों के पास भारी स्नो कटिंग मशीनें और अनुभवी ऑपरेटर्स हैं। ये टीमें लगातार दिन-रात काम कर रही हैं ताकि रास्ते को जल्द से जल्द साफ किया जा सके।

Leh-Manali Snow Clearance

स्नो क्लियरेंस का काम आसान नहीं होता। ऊंचाई, ठंड और खराब मौसम के बीच काम करना चुनौतीपूर्ण होता है। इसके बावजूद बीआरओ की टीमें इस मिशन को पूरा करने में जुटी हुई हैं और रास्ते को फिर से चालू करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अफसरों को मिलेगा हक, परमानेंट कमीशन न देने को बताया गलत

IAF Supreme Court
Supreme Court Rules Against Denial of Permanent Commission to IAF SSC Officers, Grants Pension Benefits

IAF Supreme Court: भारतीय वायु सेना से जुड़े एक बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सेना में महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों को भी परमानेंट कमीशन (पीसी) पाने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने माना कि अब तक उन्हें पीसी न देना सही नहीं था और इसमें कई तरह की भेदभाव वाली खामियां थीं।

यह मामला उन महिला अधिकारियों से जुड़ा है जिन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत सेवा के बाद परमानेंट कमीशन (PC) नहीं दिया गया था। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के बाद प्रभावित अधिकारियों को पेंशन और अन्य सुविधाएं देने का आदेश दिया है।

इस फैसले का सबसे बड़ा असर महिला अधिकारियों पर पड़ा है। लंबे समय से महिलाएं सेना में समान अधिकारों की मांग कर रही थीं। (IAF Supreme Court)

IAF Supreme Court: क्या है पूरा मामला

भारतीय वायुसेना में दो तरह की सर्विस होती है। एक होती है शॉर्ट सर्विस कमीशन, जिसे एसएससी कहा जाता है। इसमें अधिकारी एक तय समय, आमतौर पर 10 से 14 साल तक सेवा करते हैं। इसके बाद या तो उन्हें परमानेंट कमीशन दिया जाता है या फिर सेवा से बाहर होना पड़ता है।

दूसरी तरफ परमानेंट कमीशन यानी पीसी होता है, जिसमें अधिकारी लंबी अवधि तक सेवा कर सकते हैं और उन्हें पेंशन, प्रमोशन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं।

समस्या तब शुरू हुई जब कई एसएससी अधिकारियों ने शिकायत की कि उन्हें परमानेंट कमीशन देने की प्रक्रिया में सही मौका नहीं दिया गया और उनके साथ न्याय नहीं हुआ। (IAF Supreme Court)

अधिकारियों की शिकायत क्या थी

कई अधिकारियों, खासकर महिला अधिकारियों ने कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं थी। उनका कहना था कि उन्हें खुद को साबित करने का सही मौका नहीं मिला।

कुछ मामलों में यह भी सामने आया कि अलग-अलग बैच के अधिकारियों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए गए। यानी एक बैच में ज्यादा अंक वालों का चयन हुआ, जबकि दूसरे बैच में कम अंक वालों को भी मौका मिल गया।

इसके अलावा कुछ महिला अधिकारियों ने यह भी कहा कि मैटरनिटी लीव के कारण उनकी एसीआर पर असर पड़ा, जिससे उनके चयन की संभावना कम हो गई। (IAF Supreme Court)

क्या कहा कोर्ट ने

कोर्ट ने अपने विशेष अधिकार, यानी आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला अधिकारियों के साथ सिस्टम के स्तर पर भेदभाव हुआ है। साथ ही यह भी कहा कि हर साल केवल 250 महिला अधिकारियों को ही पीसी देने की सीमा तय करना मनमाना फैसला था और इसे सही नहीं माना जा सकता।

यह फैसला आर्मी, नेवी और एयर फोर्स तीनों पर लागू होगा। कोर्ट ने साफ किया कि महिलाओं को मूल्यांकन, करियर के मौके और पेंशन जैसे मामलों में बराबरी मिलनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी समझाया कि एसएससी सिस्टम में अधिकारी 10 साल के लिए भर्ती होते हैं, जिसे बढ़ाकर 14 साल तक किया जा सकता है। इसके बाद अगर उन्हें परमानेंट कमीशन नहीं मिलता, तो उन्हें सेवा छोड़नी पड़ती है। ऐसे में उन्हें पेंशन और आगे बढ़ने के मौके भी सीमित मिलते हैं। वहीं, पीसी मिलने पर अधिकारी रिटायरमेंट तक सेवा कर सकते हैं, प्रमोशन पा सकते हैं और पेंशन के हकदार बनते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों के मूल्यांकन का तरीका ही गलत था। उनकी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (एसीआर) इस सोच के साथ लिखी जाती थी कि उन्हें पीसी नहीं मिलेगा। इससे उनकी मेरिट यानी योग्यता पर असर पड़ता था।

हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि 2019, 2020 और 2021 में जो चयन बोर्ड के जरिए पीसी दिया जा चुका है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के मानदंड को सही तरीके से और निष्पक्ष तरीके से लागू नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी माना कि अधिकारियों को खुद को साबित करने का पूरा मौका नहीं मिला, जो कि उनके अधिकारों के खिलाफ है। इसे संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन माना गया। (IAF Supreme Court)

क्या थी 2019 की पॉलिसी 

साल 2019 में वायु सेना ने एक नई ह्यूमन रिसोर्स पॉलिसी लागू की थी। इसके तहत एसएससी अधिकारियों को पीसी पाने के लिए तीन मौके दिए गए थे। यह मौके उनकी सेवा के 11वें, 12वें और 13वें साल में मिलते थे।

इस प्रक्रिया में अधिकारियों के प्रदर्शन को कई आधारों पर परखा जाता था। जैसे उनकी एसीआर यानी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट, सीजीपीए और एक न्यूनतम प्रदर्शन मानक, जिसे एमपीसी कहा जाता है।

सरकार का कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया मेरिट के आधार पर थी और इसमें कोई भेदभाव नहीं था। (IAF Supreme Court)

कोर्ट ने क्या राहत दी

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं को अक्सर ऐसे कोर्स और अहम पोस्टिंग नहीं दी जाती थी, जो उनके करियर को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं। बाद में जब पीसी के लिए उनका मूल्यांकन किया जाता था, तो उनके पास कम मौके होने की वजह से उन्हें कमजोर माना जाता था।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अब यह नहीं माना जा सकता कि परमानेंट कमीशन सिर्फ पुरुषों के लिए ही रहेगा। महिलाओं को इससे बाहर रखना साफ तौर पर भेदभाव है।

पुराने मामलों में न्याय देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया। जिन महिला अधिकारियों को पीसी मिलना चाहिए था, उन्हें ऐसा माना जाएगा जैसे उन्होंने 20 साल की सेवा पूरी कर ली हो। इसके आधार पर उन्हें पेंशन और बाकी सभी सुविधाएं दी जाएंगी। यह लाभ उन अधिकारियों को भी मिलेगा, जिन्हें पहले चयन प्रक्रिया में अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

इसमें पेंशन के साथ-साथ मेडिकल सुविधा, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ भी शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन अधिकारियों की सेवा को ऐसे माना जाए जैसे उन्होंने लंबी अवधि तक सेवा की हो।

हालांकि कोर्ट ने उन्हें दोबारा सेवा में लेने का आदेश नहीं दिया, लेकिन आर्थिक सुरक्षा देने पर जोर दिया।

नेवी-एयरफोर्स पर क्या कहा कोर्ट ने

नेवी के मामले में कोर्ट ने कहा कि वहां सीटों का सिस्टम ठीक है, लेकिन चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2009 के बाद शामिल हुई महिला अधिकारियों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर पीसी दिया जाए।

एयर फोर्स के मामले में कोर्ट ने कहा कि जिन अधिकारियों को करियर में आगे बढ़ने का सही मौका ही नहीं मिला, उनके खिलाफ यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने कम सेवा की है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें दोबारा सेवा में लेना सही नहीं होगा, लेकिन इससे उनकी पेंशन नहीं रोकी जा सकती।

अंत में कोर्ट ने तीनों सेनाओं को निर्देश दिया कि वे अपने मूल्यांकन सिस्टम की पूरी समीक्षा करें, ताकि भविष्य में किसी भी महिला अधिकारी के साथ भेदभाव न हो और सभी को निष्पक्ष मौका मिल सके। (IAF Supreme Court)

Explained: क्या होता है कर्नल ऑफ द रेजिमेंट? लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई को मिला भारतीय सेना का सबसे सम्मानित पद!

Colonel of the Regiment
Lieutenant General Rajiv Ghai, Deputy Chief of Army Staff (Strategy), Indian Army, has assumed the prestigious appointment of Colonel of the Kumaon Regiment, Kumaon Scouts and Naga Regiment, taking over from Lieutenant General Ram Chander Tiwari, the outgoing General Officer Commanding-in-Chief, Eastern Command.

Colonel of the Regiment: भारतीय सेना में कई ऐसे पद होते हैं जो सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परंपरा और सम्मान से भी जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक खास पद है “कर्नल ऑफ द रेजिमेंट” (Colonel of the Regiment)। हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कुमाऊं रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट और कुमाऊं स्काउट्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद संभाला है। नाम भले ही “कर्नल” हो, लेकिन यह कोई सामान्य रैंक या फील्ड कमांड नहीं है, बल्कि परंपरा, सम्मान और नेतृत्व से जुड़ा एक खास पद है। ऐसे में समझना जरूरी है कि कर्नल ऑफ द रेजिमेंट वास्तव में क्या होता है और सेना में इसकी क्या अहमियत है। (Colonel of the Regiment)

Colonel of the Regiment: क्या होता है कर्नल ऑफ द रेजिमेंट

सरल शब्दों में समझें तो कर्नल ऑफ द रेजिमेंट कोई सामान्य सैन्य रैंक नहीं है। यह एक ऑनरेरी यानी सम्मानित और पारंपरिक पद होता है। इसका काम युद्ध में कमांड देना नहीं, बल्कि पूरी रेजिमेंट को एक परिवार की तरह जोड़कर रखना होता है।

यह पद उस अधिकारी को दिया जाता है जिसका उस रेजिमेंट से गहरा रिश्ता रहा हो और जिसने अपने करियर में बेहतरीन सेवा दी हो। वह अधिकारी उस रेजिमेंट का सबसे वरिष्ठ और सम्मानित चेहरा बन जाता है। (Colonel of the Regiment)

कैसे हुई इस पद की शुरुआत 

यह परंपरा ब्रिटिश दौर की सेना से शुरू हुई थी। उस समय रेजिमेंट्स को एक तरह से “छोटी-छोटी निजी सेना” की तरह माना जाता था। तब कर्नल ऑफ द रेजिमेंट उस यूनिट का सबसे बड़ा संरक्षक होता था, जिसे जवान अपने परिवार के मुखिया या पिता जैसा मानते थे।

आजादी के बाद भारतीय सेना ने इस परंपरा को जारी रखा। आज भी हर बड़ी रेजिमेंट, जैसे कुमाऊं, गोरखा, सिख या राजपूताना राइफल्स, आर्टिलरी और आर्मर्ड कोर में यह पद होता है। आमतौर पर एक ही व्यक्ति पूरी रेजिमेंट की सभी बटालियनों के लिए कर्नल ऑफ द रेजिमेंट होता है। जैसे कुमाऊं रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट और कुमाऊं स्काउट्स के लिए एक ही अधिकारी इस जिम्मेदारी को संभाल सकता है। (Colonel of the Regiment)

कैसे होती है नियुक्ति?

कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद आमतौर पर चुनाव के जरिए तय होता है, लेकिन अंतिम फैसला सेना प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) की मंजूरी से होता है। इस प्रक्रिया में रेजिमेंट के वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा लेते हैं। कर्नल और उससे ऊपर के अधिकारी वोट देते हैं, जबकि बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर्स अपनी-अपनी यूनिट के जवानों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

आमतौर पर उसी अधिकारी को चुना जाता है जो सबसे वरिष्ठ हो और जिसका उस रेजिमेंट से गहरा जुड़ाव रहा हो। यह अधिकारी ब्रिगेडियर, मेजर जनरल या लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का होता है, और कभी-कभी जनरल भी हो सकता है।

एक बार नियुक्ति होने के बाद यह पद लंबे समय तक रहता है। अक्सर अधिकारी इसे जीवनभर निभाता है या तब तक जब तक वह खुद इसे छोड़ न दे।

हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने यह जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने यह पद ईस्टर्न कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राम चंदर तिवारी से लिया है, जो पहले इस रेजिमेंट के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट थे। (Colonel of the Regiment)

क्या करता है कर्नल ऑफ द रेजिमेंट

कर्नल ऑफ द रेजिमेंट (CoR) कोई लड़ाई लड़ने या यूनिट चलाने वाला पद नहीं होता। यानी वह रोजमर्रा की कमान नहीं संभालता। उसका काम एक मार्गदर्शक, संरक्षक और परिवार के मुखिया की तरह होता है।

सबसे पहले, वह रेजिमेंट की परंपरा और इतिहास को संभालकर रखता है। रेजिमेंट ने कौन-कौन सी लड़ाइयां लड़ीं, कौन से सम्मान जीते, उसका वॉर क्राई क्या है, यूनिफॉर्म और बैज कैसे हैं- इन सब चीजों को वह जीवित रखता है। साथ ही रेजिमेंटल सेंटर और म्यूजियम को भी आगे बढ़ाने में मदद करता है।

दूसरी बड़ी जिम्मेदारी होती है सैनिकों और उनके परिवारों का ख्याल रखना। इसमें सिर्फ ड्यूटी पर तैनात जवान ही नहीं, बल्कि रिटायर्ड सैनिक, शहीदों के परिवार और वेटरन्स भी शामिल होते हैं। उनकी पेंशन, इलाज, बच्चों की पढ़ाई या नौकरी जैसी जरूरतों को लेकर वह उच्च अधिकारियों से बात करता है और मदद की कोशिश करता है। (Colonel of the Regiment)

तीसरी भूमिका है मोराल यानी मनोबल और एकता बढ़ाना। वह पूरी रेजिमेंट को एक परिवार की तरह जोड़कर रखता है। अलग-अलग कार्यक्रमों जैसे रेजिमेंटल डे, रीयूनियन या परेड में शामिल होकर जवानों का हौसला बढ़ाता है और युवा अफसरों को दिशा देता है।

इसके अलावा, वह रेजिमेंट का प्रतिनिधित्व भी करता है। बड़े समारोहों में शामिल होता है, नए अफसरों की कमीशनिंग या प्रमोशन के समय मार्गदर्शन देता है और रेजिमेंट की तरफ से सेना मुख्यालय या रक्षा मंत्रालय में अपनी बात रखता है।

सबसे खास बात यह है कि कर्नल ऑफ द रेजिमेंट होने के कारण वह ऊपर के स्तर पर रेजिमेंट के हितों की आवाज उठाने में सक्षम होता है। जैसे बेहतर ट्रेनिंग, नए हथियार या अच्छी पोस्टिंग से जुड़े मुद्दों पर वह अपने विचार रख सकता है। (Colonel of the Regiment)

इतना खास क्यों है यह पद

कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद इसलिए खास है क्योंकि यह रैंक से भी ऊपर का सम्मान होता है। एक अधिकारी चाहे कितना भी बड़ा पद संभाल रहा हो, लेकिन अगर वह अपनी रेजिमेंट का कर्नल ऑफ द रेजिमेंट बनता है, तो यह उसके करियर का सबसे गौरवपूर्ण क्षण माना जाता है।

यह पद उस अधिकारी के अनुभव, नेतृत्व और रेजिमेंट के साथ उसके जुड़ाव का प्रतीक होता है। (Colonel of the Regiment)

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई की नई जिम्मेदारी

हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने इस पद को संभाला है। उन्होंने कुमाऊं रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट और कुमाऊं स्काउट्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट के रूप में जिम्मेदारी ली है।

उन्होंने इस मौके पर कहा कि उन्हें इन वीर और गौरवशाली रेजिमेंट्स का नेतृत्व करने पर गर्व है। उन्होंने अपने पूर्व अधिकारी के योगदान की भी सराहना की और कहा कि वह इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। (Colonel of the Regiment)

Special Report: भारतीय सेना की आर्मर्ड कोर में बड़ा बदलाव! अब हर टैंक यूनिट के साथ होगी ड्रोन से लैस ये खास “स्क्वाड्रन”

Shaurya Squadron Indian Army
Shaurya Squadron Indian Army

Shaurya Squadron Indian Army: भारतीय सेना अब तेजी से अपने युद्ध लड़ने के तरीके को बदल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका-ईरान जैसे हालिया संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ टैंक, तोप और सैनिकों से नहीं जीते जाते, बल्कि टेक्नोलॉजी, खासकर ड्रोन की बड़ी भूमिका होती है। यही वजह है कि भारतीय सेना अब अपनी इन्फैंट्री के बाद आर्मर्ड कोर यानी टैंक यूनिट्स में भी बड़ा बदलाव करने जा रही है।

सेना अब हर आर्मर्ड रेजिमेंट में “शौर्य स्क्वाड्रन” नाम से एक नई यूनिट जोड़ने की तैयारी कर रही है। यह कोई सामान्य यूनिट नहीं होगी, बल्कि इन्फैंट्री की अश्नि प्लाटून की तरह ड्रोन और एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस एक आधुनिक टैक्टिकल फोर्स होगी, जो टैंकों की ताकत को कई गुना बढ़ा देगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

Shaurya Squadron Indian Army: क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव

पिछले कुछ सालों में हुए युद्धों ने दुनिया को दिखाया है कि ड्रोन अब गेम चेंजर बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में कई बार ऐसा देखा गया कि छोटे-छोटे ड्रोन ने महंगे टैंकों को भी नष्ट कर दिया। वहीं, मिडिल ईस्ट में भी ड्रोन अटैक और सर्विलांस ने युद्ध की दिशा बदल दी।

भारतीय सेना ने इन अनुभवों से सीख लेते हुए यह फैसला किया है कि अब सिर्फ टैंक या आर्मर्ड व्हीकल्स पर निर्भर रहना काफी नहीं है। उन्हें ड्रोन-एनेबल्ड बनाना जरूरी है। यानी अब टैंक जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान से मिलने वाली जानकारी और हमले की क्षमता के साथ काम करेंगे। (Shaurya Squadron Indian Army)

क्या है नई शौर्य स्क्वाड्रन

शौर्य स्क्वाड्रन भारतीय सेना की एक नई और आधुनिक टैक्टिकल यूनिट है, जिसे खास तौर पर मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस के लिए तैयार किया जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी यूनिट है जो एक साथ कई काम कर सकती है। इन प्रस्तावित स्क्वाड्रनों को आर्मर्ड रेजिमेंट के अंदर कंपनी स्तर पर बनाया जाएगा। इसका मतलब यह है कि ड्रोन यूनिट्स को सीधे फ्रंटलाइन लड़ाकू यूनिट्स के साथ जोड़ा जाएगा, न कि उन्हें ऊपर के स्तर पर अलग रखा जाएगा।

आम तौर पर एक आर्मर्ड रेजिमेंट की कंपनी में करीब एक दर्जन टैंक और सौ से ज्यादा जवान होते हैं। ऐसे में इसी स्तर पर ड्रोन तैनात करने का मकसद है कि निगरानी, टारगेट पहचान और हमला करने की प्रक्रिया को तेज और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।

यह यूनिट दुश्मन की निगरानी करेगी, टारगेट ढूंढेगी, जरूरत पड़ने पर तुरंत हमला भी करेगी और लगातार मैदान में सक्रिय भी रहेगी। इसका मकसद है दूर तक देखना, गहराई में वार करना और लंबे समय तक ऑपरेशन जारी रखना।

यह यूनिट सबसे पहले सदर्न कमांड के तहत सुदर्शन चक्र कोर की व्हाइट टाइगर डिवीजन में रेज की गई है। हाल ही में इसे बाबीना फायरिंग रेंज में “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज” के दौरान टेस्ट भी किया गया, जहां इसने अपनी क्षमताओं का सफल प्रदर्शन किया। (Shaurya Squadron Indian Army)

ड्रोन के साथ टैंक की नई जोड़ी

अब भारतीय सेना का फोकस यह है कि टैंक और ड्रोन एक साथ मिलकर काम करें। पहले टैंक आगे बढ़ते थे और उन्हें दुश्मन की जानकारी सीमित मिलती थी। लेकिन अब ड्रोन पहले ही आसमान से दुश्मन की पोजीशन, मूवमेंट और हथियारों की जानकारी दे देंगे।

इससे टैंक यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी हो जाएंगी। अगर दुश्मन कहीं छिपा हुआ है, तो ड्रोन पहले ही उसे पहचान लेगा। इसके बाद टैंक या ड्रोन खुद उस पर सटीक हमला कर सकते हैं।

यही नहीं, अब टैंक कॉलम के आगे ड्रोन “स्काउट” की तरह काम करेंगे। यानी वे रास्ता साफ करेंगे, खतरे की जानकारी देंगे और जरूरत पड़ने पर खुद हमला भी कर सकते हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

हर आर्मर्ड रेजिमेंट में होगी ड्रोन यूनिट

सूत्रों के मुताबिक, इन स्क्वाड्रनों का फोकस निगरानी के साथ-साथ हमले पर भी रहेगा। इसमें फर्स्ट पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन के जरिए दुश्मन के टैंक और लॉजिस्टिक ठिकानों पर हमला करने की क्षमता शामिल होगी।

हालांकि, सूत्रों ने यह भी साफ किया है कि “शौर्य स्क्वाड्रन” का यह कॉन्सेप्ट अभी शुरुआती चरण में है और इसे धीरे-धीरे डेवलप किया जा रहा है।

सेना की योजना है कि आने वाले समय में हर आर्मर्ड रेजिमेंट में एक डेडिकेटेड ड्रोन प्लाटून या शौर्य स्क्वाड्रन तैनात किया जाए। इसमें करीब 20 से 25 प्रशिक्षित सैनिक होंगे, जो खास तौर पर ड्रोन ऑपरेशन में एक्सपर्ट होंगे। बता दें कि प्रेसिडेंट गार्ड को शामिल करके सेना में लगभग 60 से 67 आर्मर्ड रेजिमेंट्स हैं। जिनमें से हर एक में लगभग 45-50 टैंक हैं और इन्हें कई स्क्वाड्रनों में बांटा गया है। (Shaurya Squadron Indian Army)

भारतीय सेना के पास करीब 4000-4200 तक मुख्य युद्धक टैंक हैं। इनमें टी-90 भीष्मा, टी-72 अजेय और अर्जुन एमके1ए जैसे टैंक शामिल हैं। सेना की आर्मर्ड रेजिमेंट्स इन्हीं टैंकों को चलाती और इस्तेमाल करती हैं।

इन यूनिट्स के पास अलग-अलग तरह के ड्रोन होंगे। कुछ ड्रोन सिर्फ निगरानी के लिए होंगे, कुछ दुश्मन पर हमला करने के लिए और कुछ ऐसे होंगे जो टारगेट पर मंडराते रहेंगे और सही समय पर खुद को विस्फोट कर देंगे।

इस तरह यह यूनिट टैंक यूनिट्स के लिए “आंख और हथियार” दोनों का काम करेगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज में दिखी ताकत

हाल ही में बाबीना फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज” में शौर्य स्क्वाड्रन का प्रदर्शन देखा गया। जहां सदर्न कमांड के जजनरल ऑफिसर कमांडर इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ भी इस एक्सरसाइज को देखने पहुंचे। इस एक्सरसाइज में टैंक, अटैक हेलीकॉप्टर, फाइटर जेट, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम एक साथ काम करते नजर आए।

यह पहली बार था जब इतने बड़े स्तर पर मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का प्रदर्शन किया गया। इसमें ड्रोन ने रियल-टाइम सर्विलांस दिया, टारगेट की पहचान की और फिर सटीक हमले में मदद की।

बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ जल्द ही दिल्ली में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की जिम्मेदारी संभालेंगे।

सदर्न कमांड की तरफ से जारी ट्विट में लिखा गया, “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज के दौरान भारतीय सेना ने शौर्य स्क्वाड्रन का प्रदर्शन किया। यह एक नई और आधुनिक टैक्टिकल यूनिट है, जिसे व्हाइट टाइगर डिवीजन ने सुदर्शन चक्र कोर के तहत तैयार किया है। (Shaurya Squadron Indian Army)

इस एक्सरसाइज में शौर्य स्क्वाड्रन को बिल्कुल असली युद्ध जैसे माहौल में टेस्ट किया गया। इसमें इस यूनिट ने दिखाया कि कैसे यह एक साथ दुश्मन पर नजर रख सकती है, उसकी गतिविधियों को समझ सकती है और फिर सही समय पर सटीक हमला भी कर सकती है।

शौर्य स्क्वाड्रन की खास बात यह है कि यह दूर तक निगरानी करने, दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर हमला करने और लंबे समय तक ऑपरेशन जारी रखने के लिए बनाई गई है। यह रियल टाइम जानकारी जुटाकर तुरंत और सटीक प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

इस एक्सरसाइज से यह साफ हो गया कि आने वाले समय में यह यूनिट युद्ध के मैदान में बहुत अहम भूमिका निभा सकती है और सेना की ताकत को काफी बढ़ा सकती है।” (Shaurya Squadron Indian Army)

इन्फैंट्री में अश्नि, शक्तिबाण और दिव्यास्त्र

पिछले साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, भैरव बटालियन और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई UAV/ड्रोन-केंद्रित स्ट्रक्चर बनाने का ऐलान किया था। ये सभी यूनिट्स मुख्य रूप से इन्फैंट्री और आर्टिलरी के लिए डिजाइन की गई हैं, ताकि पारंपरिक बलों को आधुनिक ड्रोन युद्ध क्षमता से लैस किया जा सके।

अश्नि प्लाटून (Ashni Platoons) इन्फैंट्री बटालियनों के अंदर रेज की गई हैं। प्रत्येक बटालियन में 20-25 विशेष प्रशिक्षित सैनिकों वाली यह प्लाटून सर्विलांस, रिकॉन्सेंस, FPV स्ट्राइक और लॉइटरिंग मुनिशन (कामिकाजे ड्रोन) से लैस है। इसका उद्देश्य हर इन्फैंट्री यूनिट को ऑर्गेनिक ड्रोन क्षमता देना है, जिससे ग्राउंड फोर्सेस रीयल-टाइम इंटेलिजेंस और प्रिसिजन स्ट्राइक कर सकें। सेना की योजना है कि हर इन्फैंट्री यूनिट में अश्नि प्लाटून तैयार की जाए।

शक्तिबाण रेजिमेंट भी आर्टिलरी के अंतर्गत तैयार की गई हैं। ये यूएवी/सी-यूएवी आधारित स्पेशल आर्टिलरी रेजिमेंट्स हैं, जो लंबी दूरी के ड्रोन स्वार्म, लॉइटरिंग मुनिशन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम से लैस हैं। ये बैटलफील्ड पर डीप स्ट्राइक और एंटी-ड्रोन रक्षा प्रदान करती हैं।

भैरव बटालियन स्पेशल फोर्सेस/लाइट कमांडो यूनिट्स हैं, जो घातक और स्पेशल फोर्सेस के बीच की कड़ी है। ये ड्रोन-इंटीग्रेटेड कमांडो ऑपरेशंस के लिए हैं, जहां स्वार्म ड्रोन, ओवरवॉच और शॉक एक्शन पर फोकस है। 25-30 ऐसी बटालियन रेज की जा रही हैं।

वहीं, दिव्यास्त्र बैटरी आर्टिलरी में लॉइटरिंग मुनिशन और सर्विलांस एसेट्स का कॉम्बिनेशन हैं। ये मूविंग टारगेट्स को ट्रैक करके रीयल-टाइम में सटीक हमला करती हैं, जिससे आर्टिलरी की मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

ये स्ट्रक्चर ‘डेकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ (2023-2032) का हिस्सा हैं, जो रुद्र ब्रिगेड्स के साथ मिलकर सेना को अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए तैयार कर रही हैं। ड्रोन को सबसे निचले स्तर तक इंटीग्रेट करके भारतीय सेना फ्यूचर-रेडी बन रही है, जहां हर सैनिक ईगल इन द आर्म की तरह ड्रोन से लैस होगा। यह परिवर्तन सीमा पर चीन-पाकिस्तान थ्रेट्स के जवाब में महत्वपूर्ण है। (Shaurya Squadron Indian Army)

सेना की “ड्रोन-फर्स्ट” अप्रोच

भारतीय सेना अब धीरे-धीरे “ड्रोन-फर्स्ट” रणनीति की ओर बढ़ रही है। इसका मतलब है कि अब युद्ध में सबसे पहले ड्रोन का इस्तेमाल होगा, उसके बाद बाकी हथियारों का।

भारतीय सेना की इन्फैंट्री में पहले ही अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण और दिव्यास्त्र जैसे ड्रोन यूनिट्स तैनात की जा चुकी हैं। अब उसी मॉडल को आर्मर्ड में भी लागू किया जा रहा है।

सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक हर सैनिक को बेसिक ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग मिल जाए। इसके लिए देशभर के कई मिलिट्री संस्थानों में ट्रेनिंग सेंटर भी बनाए गए हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

रुद्र ब्रिगेड और मल्टी-डोमेन वॉर

सेना अब सिर्फ यूनिट लेवल पर ही नहीं, बल्कि ब्रिगेड लेवल पर भी बदलाव कर रही है। “रुद्र ब्रिगेड” जैसे नए स्ट्रक्चर बनाए जा रहे हैं, जिनमें टैंक, इन्फैंट्री, आर्टिलरी और ड्रोन सभी को एक साथ जोड़ा जा रहा है।

इससे सेना की मारक क्षमता और प्रतिक्रिया समय दोनों बेहतर होंगे। दुश्मन पर तेजी से और सटीक हमला करना आसान हो जाएगा। (Shaurya Squadron Indian Army)

Petrodollar vs Petroyuan: होर्मुज में ईरान के इस दांव से घबराया अमेरिका, क्या खत्म होगा डॉलर का राज?

Petrodollar vs Petroyuan
AI-Generated Image

Petrodollar vs Petroyuan: पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान-अमेरिका टकराव के बीच एक ऐसा खेल चल रहा है जो केवल मिसाइल और ड्रोन तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई असल में पैसों की है, करेंसी की है और दुनिया की आर्थिक ताकत के संतुलन की है। यह लड़ाई पेट्रो डॉलर वर्सेस पेट्रो युआन की है। अगर इसे आसान भाषा में समझें तो यह पूरी कहानी तेल और पैसे के रिश्तों की है।

इस समय जो कुछ भी होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हो रहा है, वह सिर्फ एक युद्ध नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक दांव भी है। जहां ईरान इस पूरे खेल में सिर्फ अपने दुश्मनों से नहीं लड़ रहा, बल्कि वह अमेरिका के सबसे बड़े आर्थिक हथियार को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। (Petrodollar vs Petroyuan)

Petrodollar vs Petroyuan: पेट्रो डॉलर क्या है और कैसे बना अमेरिका की ताकत

दुनिया में आज जो अमेरिकी डॉलर इतना मजबूत है, उसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह तेल है। 1970 के दशक में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत तय हुआ कि दुनिया में ज्यादातर तेल का व्यापार सिर्फ अमेरिकी डॉलर में होगा। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी देश को तेल खरीदना है, तो उसे पहले डॉलर हासिल करना पड़ेगा।

यहीं से पेट्रो डॉलर सिस्टम की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे यह पूरी दुनिया में फैल गया और आज भी ज्यादातर देशों के बीच तेल का व्यापार डॉलर में ही होता है। इससे अमेरिका को बहुत बड़ा फायदा मिला। हर देश को डॉलर की जरूरत होने लगी, जिससे डॉलर की मांग हमेशा बनी रहती है।

इसका एक और फायदा अमेरिका को यह मिला कि वह अपने आर्थिक घाटे को भी आसानी से संभाल सकता है, क्योंकि दुनिया के देश डॉलर को सुरक्षित मानकर अपने पास रखते हैं। इसके अलावा अमेरिका के पास यह ताकत भी आ गई कि वह किसी भी देश को डॉलर सिस्टम से बाहर करके उस पर आर्थिक दबाव बना सकता है। ईरान, रूस और वेनेजुएला जैसे देश इसका उदाहरण हैं। (Petrodollar vs Petroyuan)

क्या है पेट्रो युआन और चीन क्यों बढ़ा रहा है आगे

अब बात करते हैं पेट्रो युआन की। चीन ने कुछ साल पहले यह समझ लिया था कि अगर दुनिया सिर्फ डॉलर पर निर्भर रहेगी, तो अमेरिका हमेशा आर्थिक रूप से मजबूत रहेगा। इसलिए चीन ने अपनी करेंसी युआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने की कोशिश शुरू की।

इसके तहत चीन ने शंघाई इंटरनेशनल एनर्जी एक्सचेंज पर युआन में तेल का व्यापार शुरू किया। इसका मतलब यह हुआ कि अब कुछ देश डॉलर की बजाय युआन में भी तेल खरीद और बेच सकते हैं।

ईरान जैसे देशों के लिए यह बहुत बड़ा मौका बन गया, क्योंकि वे पहले से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। अगर वे डॉलर में व्यापार नहीं कर सकते, तो युआन उनके लिए एक विकल्प बन जाता है। यही वजह है कि चीन और ईरान के बीच तेल का व्यापार तेजी से बढ़ा है और उसमें युआन का इस्तेमाल भी हो रहा है। (Petrodollar vs Petroyuan)

ईरान वॉर में होर्मुज बना आर्थिक हथियार

अब समझिए कि इस युद्ध में होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों इतना महत्वपूर्ण है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से लगभग 20 फीसदी वैश्विक तेल गुजरता है। यानी अगर यहां कोई रुकावट आती है, तो पूरी दुनिया पर असर पड़ता है।

ईरान ने इस जगह को एक तरह से अपने आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। उसने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया, बल्कि नियंत्रित तरीके से जहाजों को गुजरने दिया जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक नई शर्त सामने आई है कि तेल का व्यापार डॉलर में नहीं, बल्कि युआन में किया जाए।

यह कदम सीधा-सीधा पेट्रो डॉलर सिस्टम को चुनौती देने जैसा है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि अगर दुनिया को तेल चाहिए, तो उसे अमेरिका के बजाय दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना होगा। (Petrodollar vs Petroyuan)

8 देशों से बात कर रहा है ईरान

निजी कंपनियां अब ईरान की सेना से जुड़े संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को पैसे देकर अपने तेल के जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिला रही हैं। यानी जहाजों को गुजरने के लिए एक तरह से “प्रोटेक्शन फीस” देनी पड़ रही है। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

लेकिन मामला यहीं तक सीमित नहीं है। ईरान अब इससे भी आगे बढ़ गया है। खबरों के मुताबिक, तेहरान कम से कम 8 देशों जैसे चीन, भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और इराक से बातचीत कर रहा है। इस बातचीत का मकसद एक ऐसा सिस्टम बनाना है जिसमें जो देश चीन की करेंसी युआन में तेल खरीदेगा, उसे होर्मुज से गुजरने में प्राथमिकता दी जाएगी।

यानी साफ शब्दों में कहें तो अगर तेल का सौदा डॉलर में नहीं, बल्कि युआन में होगा, तभी जहाजों को आसानी से रास्ता मिलेगा। एक ईरानी अधिकारी ने तो यहां तक कहा है कि होर्मुज से सीमित संख्या में ही टैंकर गुजरने दिए जाएंगे और उनमें भी वही जहाज प्राथमिकता पाएंगे जिनका तेल व्यापार युआन में होगा।

इसका मतलब बहुत बड़ा है। दुनिया का सबसे अहम तेल रास्ता अब धीरे-धीरे डॉलर से हटकर युआन की तरफ धकेला जा रहा है।

दूसरी तरफ, ईरान ने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया है। वह लगातार चीन को तेल भेज रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से करीब 1.1 से 1.2 करोड़ बैरल तेल होर्मुज के रास्ते चीन पहुंच चुका है। यह ज्यादातर “डार्क फ्लीट” यानी ऐसे जहाजों के जरिए हो रहा है जो ट्रैकिंग से बचकर चलते हैं या ईरान के झंडे वाले टैंकर होते हैं।

इससे साफ है कि ईरान बिना सोचे-समझे रास्ता बंद नहीं कर रहा, बल्कि बहुत सोच-समझकर चाल चल रहा है। वह इस रास्ते को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है जहां जरूरत हो वहां दबाव बना रहा है, और जहां फायदा हो वहां रास्ता दे रहा है।

यानी यह कोई सीधा-सादा कदम नहीं है, बल्कि बहुत ही रणनीतिक और सटीक तरीके से खेला जा रहा दांव है, जो अमेरिका की रणनीति से बिल्कुल अलग नजर आता है। (Petrodollar vs Petroyuan)

यह असिमेट्रिक इकोनॉमिक वॉर है

ईरान का यह कदम एक तरह का असिमेट्रिक इकोनॉमिक वॉर है। यानी वह सीधे सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि आर्थिक तरीके से जवाब दे रहा है। अगर ज्यादा देश युआन में तेल खरीदना शुरू कर देते हैं, तो धीरे-धीरे डॉलर की मांग कम हो सकती है।

इसका असर अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। डॉलर कमजोर हो सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और अमेरिका की वैश्विक पकड़ भी कम हो सकती है। हालांकि यह बदलाव तुरंत नहीं होगा, लेकिन इसकी शुरुआत हो चुकी है।

चीन को इस स्थिति से फायदा मिल सकता है। वह पहले से दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और अगर तेल का व्यापार युआन में होता है, तो उसकी करेंसी मजबूत होगी। इसके अलावा उसे सस्ता तेल भी मिल सकता है, क्योंकि ईरान जैसे देश प्रतिबंधों से बचने के लिए कम कीमत पर तेल बेचते हैं। (Petrodollar vs Petroyuan)

दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ अमेरिका या चीन तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। सबसे पहला असर तेल की कीमतों पर दिखाई देता है। युद्ध और तनाव की वजह से तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।

जब तेल महंगा होता है, तो हर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। भारत जैसे देशों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है। आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ता है।

इसके अलावा निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर जाने लगते हैं, जैसे सोना और चांदी। वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ जाती है। कंपनियों की लागत बढ़ती है और विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है। (Petrodollar vs Petroyuan)

पेट्रो डॉलर का धीरे-धीरे कमजोर होना

एक बात है जो नई दिल्ली, वॉशिंगटन और रियाद के वित्त मंत्रालयों को चिंतित कर सकती है। पिछले करीब 50 साल से दुनिया में तेल का ज्यादातर व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता रहा है। इसी सिस्टम को पेट्रो डॉलर कहा जाता है। इसमें खाड़ी देशों की कमाई का बड़ा हिस्सा फिर अमेरिका की फाइनेंशियल सिस्टम में वापस चला जाता है। लेकिन अब इस व्यवस्था में दरारें दिखने लगी हैं, जिन्हें सिर्फ थोड़े समय के बदलाव से छिपाया नहीं जा सकता।

यह सही है कि युद्ध शुरू होने के बाद कुछ समय के लिए डॉलर मजबूत हुआ है। मार्च में हमलों के बाद डॉलर इंडेक्स में करीब 2 फीसदी से ज्यादा बढ़त देखी गई। आमतौर पर जब दुनिया में तनाव बढ़ता है तो निवेशक सुरक्षित विकल्प की तरफ जाते हैं और डॉलर को अभी भी सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर की स्थिति लंबे समय तक मजबूत ही रहेगी। ऊपर से सब ठीक दिख सकता है, लेकिन अंदर ही अंदर बड़ा बदलाव चल रहा है।

चीन ने पहले अपने ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में किया करता था, लेकिन अब उसने इसका बड़ा हिस्सा अपनी करेंसी रेनमिन्बी यानी युआन में करना शुरू कर दिया है। एक दशक पहले जहां 80 प्रतिशत से ज्यादा व्यापार डॉलर में होता था, अब यह घटकर करीब आधा रह गया है। (Petrodollar vs Petroyuan)

रूस भी अपने ब्रिक्स देशों के साथ लगभग 90 प्रतिशत व्यापार अपनी-अपनी करेंसी में कर रहा है। सऊदी अरब ने भी खुले तौर पर युआन में तेल बेचने की संभावना पर चर्चा की है। अर्जेंटीना और पाकिस्तान जैसे देश चीन से होने वाले कई बड़े आयात युआन में ही निपटा रहे हैं।

भारत का उदाहरण भी दिलचस्प है। कुछ साल पहले तक भारत ईरान से तेल खरीदते समय रुपये में भुगतान करता था। यह पैसा भारतीय बैंकों में ही रखा जाता था और ईरान उसी पैसे से भारत से सामान खरीद लेता था। यह एक संतुलित व्यवस्था थी, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम होती थी और भारतीय मुद्रा भी मजबूत रहती थी।

कुल मिलाकर, तस्वीर यह दिखा रही है कि पेट्रो डॉलर सिस्टम अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी पकड़ कमजोर पड़ रही है और दुनिया अब दूसरे विकल्पों की तरफ बढ़ रही है। (Petrodollar vs Petroyuan)

क्या डॉलर का अंत हो जाएगा

यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है कि क्या अब डॉलर खत्म हो जाएगा। इसका जवाब है – नहीं, कम से कम अभी नहीं। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे मजबूत और भरोसेमंद करेंसी है। ज्यादातर देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का बड़ा हिस्सा होता है।

लेकिन यह जरूर है कि डॉलर की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। इसे एक लंबी प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए। जैसे समुद्र किनारे की मिट्टी धीरे-धीरे कटती है, वैसे ही डॉलर की ताकत भी समय के साथ कम हो सकती है।

पेट्रो युआन अभी शुरुआती दौर में है। इसमें कई सीमाएं भी हैं, जैसे चीन की कड़ी नियंत्रण वाली वित्तीय व्यवस्था और सीमित अंतरराष्ट्रीय भरोसा। लेकिन फिर भी यह एक विकल्प के रूप में उभर रहा है। (Petrodollar vs Petroyuan)

भारत के लिए क्या हैं मायने

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की स्थिति भी दिलचस्प है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और उसकी ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में होर्मुज में कोई भी रुकावट सीधे भारत को प्रभावित करती है।

पहले भारत ईरान से तेल खरीदता था और कुछ हद तक रुपये में भुगतान भी करता था। इससे उसे डॉलर पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में यह व्यवस्था लगभग खत्म हो गई है।

अब अगर पेट्रो युआन का दायरा बढ़ता है, तो भारत को भी अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। उसे अपने ऊर्जा स्रोतों और भुगतान के तरीकों में विविधता लानी होगी, ताकि किसी एक सिस्टम पर ज्यादा निर्भरता न रहे। (Petrodollar vs Petroyuan)

ट्रंप से दोस्ती कर भारत को क्या मिला

अगर सीधे और साफ शब्दों में समझें, तो अमेरिका के साथ रिश्तों से भारत को क्या मिला, इस पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका ने भारत के सामान पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया था। पहले 25 प्रतिशत “रिसिप्रोकल” के नाम पर लगाया गया और फिर 25 प्रतिशत और बढ़ाया गया, क्योंकि भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा था।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन भी रूस से भारत से ज्यादा तेल खरीद रहा था, लेकिन उस पर ऐसा कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया गया। यानी अमेरिका ने चीन से टकराने के बजाय भारत पर दबाव बनाना ज्यादा आसान समझा, जबकि भारत खुद को उसका रणनीतिक साझेदार कहता है।

बाद में जो टैरिफ समझौता हुआ, उसे आधिकारिक तौर पर बड़ी सफलता बताया गया। लेकिन हकीकत यह है कि टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया, जबकि पहले यह सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत के बीच था। यानी अब भी भारत ज्यादा टैरिफ दे रहा है। इसके साथ ही भारत ने अगले पांच साल में 500 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने का वादा भी किया।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि अगर यह टैरिफ पूरी तरह लागू रहता, तो भारत की जीडीपी पर करीब 0.8 प्रतिशत तक असर पड़ सकता था और अमेरिका को होने वाला निर्यात हर साल लगभग 35 बिलियन डॉलर तक घट सकता था। इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा, खासकर टेक्सटाइल, जेम्स और लेदर से जुड़े कामगारों पर, जो इस पूरे भू-राजनीतिक खेल में फंस गए।

इसी बीच ऑपरेशन सिंदूर भी हुआ, जो पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई थी। यह ऐसे समय पर हुआ जब भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संतुलन बनाकर चलने की जरूरत थी। ऑपरेशन के अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन इसके समय और दुनिया के सामने पेश किए जाने के तरीके ने यह दिखाया कि सरकार ने वैश्विक हालात का सही अंदाजा नहीं लगाया।

डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई सार्वजनिक टिप्पणियां भी इस रिश्ते की असली तस्वीर दिखाती हैं। कभी वह सलाह देने वाले अंदाज में नजर आए, तो कभी आलोचनात्मक। इससे यह साफ होता है कि यह रिश्ता जितना दिखाया जाता है, उतना मजबूत जमीनी स्तर पर नहीं है।

दूसरी तरफ ईरान है, जिससे भारत ने पिछले कुछ सालों में दूरी बना ली। लेकिन ईरान की भौगोलिक स्थिति बहुत अहम है। वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर बैठा है, जो दुनिया के तेल का सबसे बड़ा रास्ता है। साथ ही, चाबहार पोर्ट भी उसी के पास है, जो भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का एकमात्र रास्ता है।

आज ईरान ब्रिक्स का हिस्सा भी बन चुका है और रूस व चीन के साथ उसके संबंध मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में यह साफ है कि न तो अमेरिका और न ही इजरायल, ईरान की जगह ले सकते हैं। उसकी भौगोलिक और रणनीतिक अहमियत को किसी भी तरह से बदला नहीं जा सकता। (Petrodollar vs Petroyuan)

मल्टी-पोलर वर्ल्ड की तरफ बढ़ती दुनिया

आज की दुनिया धीरे-धीरे एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां सिर्फ एक देश या एक करेंसी का दबदबा नहीं रहेगा। इसे मल्टी-पोलर वर्ल्ड कहा जाता है। इसमें कई देश और कई करेंसी मिलकर वैश्विक व्यवस्था को तय करेंगे।

पेट्रो डॉलर से पेट्रो युआन की ओर बढ़ता यह बदलाव उसी दिशा का संकेत है। यह अचानक नहीं होगा, बल्कि धीरे-धीरे कई सालों में होगा। लेकिन जो घटनाएं आज हो रही हैं, वे इस बदलाव की नींव रख रही हैं। (Petrodollar vs Petroyuan)

भारतीय सेना में बड़ा बदलाव, अब ग्रेजुएट जवान चार नहीं सिर्फ डेढ़ साल में बनेंगे आर्मी ऑफिसर!

Indian Army ACC Entry

Indian Army ACC Entry: भारतीय सेना में जवान से ऑफिसर बनने का सपना अब पहले से ज्यादा आसान और तेज हो गया है। हाल ही में सेना ने इस प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है, खासकर उन जवानों के लिए जो पहले से ग्रेजुएट हैं। अब ऐसे जवानों को ऑफिसर बनने के लिए लंबी 4 साल की ट्रेनिंग नहीं करनी होगी, बल्कि वे सिर्फ डेढ़ साल में ही कमीशन हासिल कर सकेंगे। यह बदलाव सेना की बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद ऑफिसर्स की कमी को पूरा करना और अनुभवी सैनिकों को नेतृत्व की भूमिका में लाना गै।

Indian Army ACC Entry: क्या है पूरा मामला और क्यों हुआ बदलाव

भारतीय सेना में लंबे समय से ऑफिसर्स की कमी एक गंभीर मुद्दा रही है। लगभग साढ़े बारह लाख की क्षमता वाली भारतीय सेना में तकरीबन 8000 अफसरों के पद खाली हैं, जिससे यूनिट्स में लीडरशिप पर असर पड़ता है। ऐसे में सेना ने यह समझा कि जो जवान पहले से सेवा में हैं और ग्रेजुएट भी हैं, उन्हें जल्दी ऑफिसर बनाया जा सकता है।

पहले इन जवानों को भी वही लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, जो 12वीं पास जवानों के लिए होती है। लेकिन अब यह बदल गया है। सेना ने फैसला लिया है कि ग्रेजुएट जवानों को अनावश्यक एकेडमिक ट्रेनिंग से बचाकर सीधे मिलिट्री और लीडरशिप ट्रेनिंग दी जाए। (Indian Army ACC Entry)

ACC एंट्री क्या होती है

आर्मी कैडेट कॉलेज यानी एसीसी, देहरादून में स्थित एक खास ट्रेनिंग विंग है। यहां सिर्फ वही जवान आते हैं जो पहले से सेना में सेवा दे रहे होते हैं और ऑफिसर बनना चाहते हैं। यह एक तरह से सेना के अंदर ही प्रमोशन का सबसे बड़ा रास्ता है, जहां सिपाही, नायक या हवलदार जैसे रैंक वाले सैनिक पढ़ाई और ट्रेनिंग के जरिए लेफ्टिनेंट बन सकते हैं। इस एंट्री के लिए जवानों को पहले लिखित परीक्षा पास करनी होती है, फिर एसएसबी इंटरव्यू और मेडिकल टेस्ट होता है। इसके बाद ही उनका चयन होता है। (Indian Army ACC Entry)

पहले कैसी होती थी पूरी प्रक्रिया

पहले अगर कोई जवान एसीसी के जरिए ऑफिसर बनना चाहता था, तो उसे लंबी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता था। सबसे पहले उसे देहरादून के एसीसी विंग में 3 साल की पढ़ाई करनी होती थी। यहां उसे ग्रेजुएशन लेवल की पढ़ाई कराई जाती थी, साथ ही बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग भी दी जाती थी। इसके बाद उसे इंडियन मिलिट्री एकेडमी यानी आईएमए में 1 साल की प्री-कमीशनिंग ट्रेनिंग करनी होती थी।

इस तरह कुल मिलाकर 4 साल लगते थे। खास बात यह थी कि ग्रेजुएट जवानों को भी वही 3 साल की पढ़ाई करनी पड़ती थी, जो पहले से पढ़े-लिखे होने के बावजूद उनके लिए जरूरी नहीं थी। (Indian Army ACC Entry)

अब क्या बदल गया है

अब सबसे बड़ा बदलाव यही है कि ग्रेजुएट जवानों के लिए यह 4 साल की ट्रेनिंग घटाकर सिर्फ 1.5 साल यानी डेढ़ साल कर दी गई है। अब उन्हें एसीसी में 3 साल की पढ़ाई नहीं करनी होगी। उनकी ट्रेनिंग सीधे मिलिट्री स्किल्स, लीडरशिप और ऑफिसर बनने की तैयारी पर फोकस करेगी। इसका मतलब यह हुआ कि जो जवान पहले से ग्रेजुएशन कर चुके हैं, उन्हें दोबारा वही पढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी। उनकी ट्रेनिंग ज्यादा प्रैक्टिकल और फोकस्ड होगी।

हालांकि, 12वीं पास जवानों के लिए अभी भी पुरानी 4 साल वाली प्रक्रिया जारी रहेगी। (Indian Army ACC Entry)

इससे जवानों को क्या फायदा होगा

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा जवानों को मिलेगा। पहले जहां उन्हें ऑफिसर बनने में 4 साल लगते थे, अब वे सिर्फ डेढ़ साल में यह मुकाम हासिल कर सकते हैं। इससे उनका करियर तेजी से आगे बढ़ेगा। जो सैनिक पहले से मैदान में अनुभव ले चुके हैं, वे जल्दी नेतृत्व की भूमिका में आ जाएंगे। इसके अलावा, यह उन जवानों के लिए एक बड़ा मोटिवेशन भी है जो सेना में रहते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। (Indian Army ACC Entry)

सेना को क्या फायदा होगा

यह बदलाव सिर्फ जवानों के लिए ही नहीं, बल्कि सेना के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि ऑफिसर्स की कमी तेजी से पूरी होगी। जब ज्यादा जवान जल्दी ऑफिसर बनेंगे, तो यूनिट्स में लीडरशिप मजबूत होगी। इसके अलावा, जो जवान पहले से ग्राउंड पर काम कर चुके हैं, उन्हें जब ऑफिसर बनाया जाएगा, तो वे ज्यादा व्यावहारिक और अनुभवी लीडर साबित होंगे। इससे ऑपरेशनल एफिशिएंसी भी बढ़ेगी। (Indian Army ACC Entry)

अन्य स्कीम्स में भी किए गए बदलाव

सेना सिर्फ एसीसी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसने कई अन्य रास्तों को भी आसान बनाया है। परमानेंट कमीशन स्पेशल लिस्ट यानी पीसी एसएल के तहत अब जवानों के लिए एसएसबी की प्रक्रिया आसान कर दी गई है। पहले जहां दो स्टेज होते थे, अब स्टेज-1 हटा दिया गया है और सीधे स्टेज-2 में एंट्री मिलती है।

पीसी एसएल के तहत वे सैनिक आवेदन कर सकते हैं जिनकी सेवा 10 साल से ज्यादा हो चुकी है और जिनकी उम्र 42 साल तक है। इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले सैनिकों के लिए यह सीमा 45 साल तक है। चयन के बाद उन्हें 12 हफ्ते की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें पहले 8 हफ्ते कम्युनिकेशन स्किल्स पर फोकस होता है और फिर 4 हफ्ते की मिलिट्री ओरिएंटेशन ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद उन्हें परमानेंट कमीशन मिल जाता है। (Indian Army ACC Entry)

इसी तरह स्पेशल कमीशन्ड ऑफिसर यानी एससीओ स्कीम में भी ज्यादा उम्र के सैनिकों को ऑफिसर बनने का मौका दिया जा रहा है और उनके लिए भी एसएसबी प्रक्रिया को आसान बनाया गया है।

टेक्निकल एंट्री में भी बदलाव किए गए हैं। टेक्निकल एंट्री स्कीम यानी टीईएस, जो 12वीं पास छात्रों के लिए होती है, उसमें पहले कुल 5 साल की ट्रेनिंग होती थी। अब इसे घटाकर 4 साल कर दिया गया है। इसमें 3 साल की इंजीनियरिंग पढ़ाई और 1 साल की मिलिट्री ट्रेनिंग शामिल है। इस बदलाव से कैडेट्स जल्दी ऑफिसर बन पाएंगे और सेना को भी जल्दी नए ऑफिसर मिलेंगे।

शॉर्ट सर्विस कमीशन टेक्निकल यानी एसएससी टेक में भी प्रक्रिया को तेज किया गया है। इसमें इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स को करीब 49 हफ्ते यानी लगभग 1 साल की ट्रेनिंग दी जाती है। हालांकि इसमें ट्रेनिंग अवधि में ज्यादा कटौती नहीं की गई है, लेकिन पूरी चयन और ट्रेनिंग प्रक्रिया को पहले से ज्यादा तेज और प्रभावी बनाया गया है। ताकि ज्यादा युवा इसमें शामिल हों। (Indian Army ACC Entry)

ट्रेनिंग का नया तरीका कैसा होगा

नई ट्रेनिंग में फोकस पूरी तरह से प्रैक्टिकल स्किल्स पर रहेगा। जवानों को लीडरशिप, टैक्टिक्स, ऑपरेशन प्लानिंग और फील्ड कमांड जैसी चीजें सिखाई जाएंगी। इसके अलावा उन्हें फिजिकल और मेंटल रूप से भी तैयार किया जाएगा। इस ट्रेनिंग का मकसद सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक सक्षम ऑफिसर तैयार करना है, जो मैदान में तुरंत जिम्मेदारी संभाल सके। (Indian Army ACC Entry)

क्या यह बदलाव लंबे समय तक डालेगा असर

इस बदलाव का असर आने वाले सालों में साफ दिखाई देगा। जैसे-जैसे ज्यादा जवान ऑफिसर बनेंगे, सेना का लीडरशिप स्ट्रक्चर मजबूत होगा। इससे यूनिट्स में बेहतर समन्वय और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। इसके अलावा, यह बदलाव सेना को एक मॉडर्न और फ्लेक्सिबल फोर्स बनाने में मदद करेगा, जो तेजी से बदलते युद्ध के माहौल में खुद को ढाल सके।

जवानों के लिए सुनहरा मौका

अगर कोई जवान पहले से ग्रेजुएट है और ऑफिसर बनने का सपना देखता है, तो यह उसके लिए एक बड़ा मौका है। अब उसे लंबी ट्रेनिंग से नहीं गुजरना पड़ेगा। सही तैयारी, लिखित परीक्षा और एसएसबी इंटरव्यू पास करके वह कम समय में ऑफिसर बन सकता है। यह न सिर्फ उसके करियर को आगे बढ़ाएगा, बल्कि उसे सेना में एक नई पहचान भी देगा। (Indian Army ACC Entry)

1600 किमी मार करने वाली मिसाइलों से लैस है HMS Anson, पढ़ें ब्रिटेन की सबसे एडवांस्ड न्यूक्लियर अटैक सबमरीन की पूरी डिटेल

HMS Anson submarine
HMS Anson submarine

HMS Anson submarine: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन की न्यूक्लियर पावर्ड सबमरीन एचएमएस एंसन अब अरब सागर में पहुंच चुकी है और माना जा रहा है कि यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास रणनीतिक पोजीशन ले चुकी है। खास बात यह है कि यह सबमरीन टॉमहॉक ब्लॉक 4 लैंड अटैक मिसाइल्स से लैस है। यह तैनाती ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है और इस इलाके में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। इससे पूरे इलाके की स्थिति और संवेदनशील हो गई है।

HMS Anson submarine: ऑस्ट्रेलिया से अरब सागर तक का सफर

रिपोर्ट के मुताबिक यह सबमरीन 6 मार्च को ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर से रवाना हुई थी। करीब दो हफ्ते में 5,500 मील (लगभग 8,850 किमी) की यात्रा तय करने के बाद यह उत्तरी अरब सागर में पहुंची है। जहां यह डीप वॉटर्स में पोजिशन पर है। यह इलाका होर्मुज जलडमरूमध्य के बेहद करीब है, जो दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक माना जाता है। इसी रास्ते से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल की सप्लाई गुजरती है। (HMS Anson submarine)

क्या है एचएमएस एंसन और क्यों है खास

एचएमएस एंसन ब्रिटेन की रॉयल नेवी की पांचवी एस्ट्यूट क्लास न्यूक्लियर अटैक सबमरीन है। एचएमएस एंसन का नाम 18वीं सदी के एडमिरल जॉर्ज एन्सन के नाम पर पड़ा है। यह रॉयल नेवी का आठवां जहाज है जो इस नाम से है। पहले के एचएमएस एंसन वर्ल्ड वॉर के बैटलशिप थे।

इसे अगस्त 2022 में आधिकारिक तौर पर सेवा में शामिल किया गया था। यह कोई सामान्य पनडुब्बी नहीं है, बल्कि ब्रिटेन की सबसे एडवांस और आधुनिक सबमरीन में से एक मानी जाती है। इसका मुख्य काम दुश्मन के जहाजों और सबमरीन पर नजर रखना, जरूरत पड़ने पर हमला करना और गुप्त मिशन को अंजाम देना है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती है और दुश्मन को बिना पता चले उसके करीब पहुंच सकती है।

यह सबमरीन हर 24 घंटे में थोड़ा ऊपर उठकर लंदन स्थित परमानेंट जॉइंट हेडक्वार्टर्स (पीजीएचक्यू) से कम्यूनिकेट करती है। (HMS Anson submarine)

न्यूक्लियर रिएक्टर है असली ताकत

इस सबमरीन की सबसे बड़ी ताकत इसका न्यूक्लियर रिएक्टर है। इसमें रॉल्स-रॉयस पीडब्ल्यूआर-2 रिएक्टर लगा है, जो करीब 25 साल तक बिना ईंधन बदले काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि एचएमएस एंसन को बार-बार सतह पर आने या ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती। यह महीनों तक समुद्र के अंदर रहकर ऑपरेशन कर सकती है।

यह खुद ऑक्सीजन और पीने का पानी भी तैयार कर सकती है, जिससे यह पूरी तरह आत्मनिर्भर बन जाती है। इसकी स्पीड करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है, जो पानी के अंदर काफी तेज मानी जाती है। (HMS Anson submarine)

चुपके से हमला करने की क्षमता

एचएमएस एंसन 97 मीटर लंबी (318 फीट), 11.3 मीटर चौड़ी और 10 मीटर ड्रॉट वाली है। इसका डिस्प्लेसमेंट सरफेस पर 7,000-7,400 टन और सबमर्ज्ड स्टेट में 7,400-7,800 टन है। यह ब्रिटेन की सबसे बड़ी और सबसे एडवांस्ड अटैक सबमरीन है।

एचएमएस एंसन का डिजाइन इस तरह से बनाया गया है कि यह बेहद कम आवाज करती है। इसमें पंप-जेट प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह दुश्मन के सोनार में आसानी से पकड़ में नहीं आती। इसमें पारंपरिक पेरिस्कोप की जगह हाई-स्पेसिफिकेशन वीडियो कैमरा और फाइबर-ऑप्टिक केबल्स सिस्टम लगा है, जो फाइबर ऑप्टिक के जरिए कंट्रोल रूम तक लाइव तस्वीरें भेजता है। यानी सबमरीन को सतह के करीब आए बिना ही ऊपर की पूरी जानकारी मिल जाती है। इसके क्रू में 110 लोग हैं। (HMS Anson submarine)

38 तरह के हथियारों से जमीन और समुद्र दोनों पर हमला

इसमें 6 टॉरपीडो ट्यूब लगे होते हैं, जिनका साइज 533 मिलीमीटर होता है। इन ट्यूब्स के जरिए यह एक साथ कई तरह के हथियार इस्तेमाल कर सकती है और कुल मिलाकर करीब 38 हथियार अपने अंदर स्टोर कर सकती है।

इसमें टॉमहॉक ब्लॉक-4 क्रूज मिसाइलें लगी होती हैं, जो करीब 1600 किलोमीटर दूर तक जमीन पर सटीक निशाना लगा सकती हैं। इन मिसाइलों से दुश्मन के एयरबेस, कमांड सेंटर या मिसाइल साइट्स को निशाना बनाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर यह सबमरीन समुद्र की सतह के थोड़ा करीब आकर एक साथ चार मिसाइलें दाग सकती है, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं मिलता। (HMS Anson submarine)

इसके अलावा इसमें स्पीयरफिश हैवीवेट टॉरपीडो भी होते हैं। ये खास तौर पर दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं। ये टॉरपीडो बहुत स्मार्ट होते हैं, जो या तो वायर के जरिए कंट्रोल किए जाते हैं या फिर अपने आप सोनार की मदद से लक्ष्य को ढूंढकर हमला करते हैं।

यह सबमरीन जरूरत पड़ने पर समुद्र में माइन्स भी बिछा सकती है, जिससे दुश्मन के जहाजों के रास्ते को रोका जा सके। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सबमरीन एक साथ कई तरह के मिशन कर सकती है। यह जमीन पर हमला करने के साथ-साथ दुश्मन की पनडुब्बियों को भी ट्रैक कर सकती है, खुफिया जानकारी जुटा सकती है और स्पेशल फोर्सेस यानी रॉयल मरीन्स को गुप्त तरीके से दुश्मन इलाके में पहुंचाने या निकालने का काम भी कर सकती है। यही वजह है कि इसे एक मल्टी-रोल और बेहद खतरनाक प्लेटफॉर्म माना जाता है। (HMS Anson submarine)

अमेरिका-ईरान तनाव का असर

इस पूरी घटना की जड़ में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है। हाल के दिनों में होर्मुज के आसपास जहाजों पर हमले की घटनाएं सामने आई हैं, जिनका आरोप ईरान से जुड़े आतंकी गुटों पर लगाया जा रहा है। इसके जवाब में अमेरिका ने अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं और अब उसके सहयोगी देश भी इस क्षेत्र में सक्रिय हो रहे हैं।
ब्रिटेन की इस सबमरीन का तैनात होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

वहीं इस पूरे घटनाक्रम को ब्रिटेन की रणनीति में बड़े बदलाव की तरह देखा जा रहा है। पहले ब्रिटेन अमेरिका को अपना डिएगो गार्सिया सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की अनुमति सीमित तौर पर देता था। लेकिन अब उसने दायरा बढ़ा दिया है। अब अमेरिका इन बेस का इस्तेमाल ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाने के लिए कर सकता है, खासकर उन ठिकानों को जो होर्मुज में जहाजों पर हमलों से जुड़े हैं। हालांकि ब्रिटेन ने साफ किया है कि यह कार्रवाई “डिफेंसिव” यानी रक्षात्मक उद्देश्य के तहत होगी और वह सीधे बड़े युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता। (HMS Anson submarine)

वहीं, ब्रिटेन के इस फैसले पर वहां की राजनीति में भी बहस छिड़ गई है। विपक्ष की नेता केमी बैडेनोक ने सरकार की इस नीति को बड़ा यू-टर्न बताया है। उनका कहना है कि पहले सरकार अमेरिका के साथ पूरी तरह खड़ी नहीं थी, लेकिन अब उसने अचानक अपना रुख बदल लिया है।

इस बीच सैयद अब्बास अराघची ने ब्रिटेन को चेतावनी दी है कि अगर उसने अमेरिका को अपने बेस इस्तेमाल करने दिए, तो इसे आक्रामक कार्रवाई में शामिल होने के तौर पर देखा जाएगा। ईरान का कहना है कि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और क्षेत्र में बड़ा संघर्ष शुरू हो सकता है। यह बयान इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में तनाव और बढ़ सकता है। (HMS Anson submarine)

पाकिस्तान बना दुनिया का नंबर-1 आतंक प्रभावित देश, भारत में 43 फीसदी घटे हमले

Global Terrorism Index 2026
File Photo

Global Terrorism Index 2026: दुनिया भर में आतंकवाद की स्थिति को लेकर जारी हुई ग्लोबल ग्लोबल टेरेरिज्म इंडेक्स 2026 में पाकिस्तान अब दुनिया का सबसे ज्यादा आतंक प्रभावित देश बन गया है, जबकि भारत में आतंकवादी घटनाओं में साफ तौर पर कमी आई है। यह रिपोर्ट इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस ने जारी की है, जिसमें साल 2025 के आंकड़ों के आधार पर दुनिया के 160 से ज्यादा देशों का विश्लेषण किया गया है।

Global Terrorism Index 2026: पाकिस्तान में लगातार बिगड़ते हालात

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में साल 2025 के दौरान आतंकवाद से जुड़े हमलों और मौतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले साल वहां 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत आतंकवादी घटनाओं में हुई, जबकि 1,000 से ज्यादा हमले हुए। यानी हालात धीरे-धीरे खराब हो रहे हैं और अब पाकिस्तान इस सूची में पहले स्थान पर पहुंच गया है।

पहले यह स्थान अफ्रीकी देश बुर्किना फासो के पास था, लेकिन इस बार पाकिस्तान ने उसे पीछे पछाड़ दिया है। यह दिखाता है कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद का खतरा अभी भी बहुत गंभीर है। (Global Terrorism Index 2026)

टीटीपी बना सबसे बड़ा खतरा

पाकिस्तान में आतंकवाद बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी का फिर से मजबूत होना है। यह संगठन पिछले कुछ सालों में काफी सक्रिय हुआ है और उसने अपने हमलों की संख्या और क्षमता दोनों बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे खतरनाक चार आतंकी संगठनों में टीटीपी भी शामिल है, और खास बात यह है कि इन चारों में सिर्फ टीटीपी ही ऐसा संगठन है, जिसकी हिंसक गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है।

अफगानिस्तान से है कनेक्शन

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद क्षेत्रीय समीकरण बदल गए। अफगानिस्तान में नई सरकार बनने के बाद टीटीपी को सीमा पार सुरक्षित ठिकाने और समर्थन मिलने लगा। इससे उसकी ताकत और बढ़ गई। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा लंबे समय से अस्थिर रही है, लेकिन अब यह और ज्यादा संवेदनशील हो गई है। कई बार दोनों देशों के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि पाकिस्तान को अफगानिस्तान के अंदर एयरस्ट्राइक तक करनी पड़ी। (Global Terrorism Index 2026)

खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान बने हिंसा के केंद्र

अगर पाकिस्तान के अंदर की स्थिति को देखें, तो ज्यादातर आतंकवादी घटनाएं खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में हो रही हैं। इन दोनों इलाकों में न सिर्फ हमलों की संख्या ज्यादा है, बल्कि मौतों का आंकड़ा भी यहीं सबसे अधिक है।

बलूचिस्तान में हाल ही में एक बड़ी घटना हुई थी, जिसमें एक ट्रेन को हाईजैक कर लिया गया और सैकड़ों लोगों को बंधक बना लिया गया। इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि वहां आतंकवादी संगठन कितनी ताकत हासिल कर चुके हैं।

वैश्विक स्तर पर कुछ सुधार, लेकिन खतरा बरकरार

अगर पूरी दुनिया की बात करें, तो रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। दुनिया भर में आतंकवाद से होने वाली मौतों में करीब 28 फीसदी की कमी आई है। हमलों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है और कई देशों में स्थिति बेहतर हुई है। करीब 80 से ज्यादा देशों में हालात सुधरे हैं, जबकि बहुत कम देशों में स्थिति खराब हुई है।

लेकिन इसके बावजूद रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि दुनिया में बढ़ते नए संघर्ष, जैसे मध्य पूर्व की स्थिति, भविष्य में आतंकवाद को फिर से बढ़ा सकते हैं। (Global Terrorism Index 2026)

भारत के लिए राहत भरी खबर

इस रिपोर्ट में भारत के लिए भी अच्छी खबर है। भारत इस सूची में 13वें स्थान पर है, जो पिछले साल से थोड़ा नीचे जरूर है, लेकिन इसके बावजूद देश में आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है। सबसे अहम बात यह है कि भारत में आतंकवादी हमलों की संख्या में 43 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही आतंकवाद से होने वाली मौतों में भी कमी आई है, जो देश में सुरक्षा व्यवस्था पहले से ज्यादा मजबूत होने का बड़ा संकेत है। (Global Terrorism Index 2026)

भारत में सुधार के पीछे क्या वजह

भारत में आतंकवाद में कमी के पीछे कई अहम कारण हैं। सबसे पहला कारण है सीमा पर सख्त निगरानी और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था है। इसके अलावा खुफिया एजेंसियों का बेहतर तालमेल और समय पर कार्रवाई भी इसमें अहम भूमिका निभा रही है। सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति में भी बदलाव किया है और अब तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। इन सभी प्रयासों का असर यह हुआ है कि पिछले कुछ सालों में आतंकवाद की घटनाओं में लगातार कमी आई है।

रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद वैश्विक आतंकवादी मौतों में इसका हिस्सा बहुत कम है। दुनिया की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा भारत में रहता है, लेकिन आतंकवाद से होने वाली मौतों में इसका हिस्सा सिर्फ करीब 2 फीसदी है। यह इस बात का संकेत है कि इतने बड़े देश में भी आतंकवाद को काफी हद तक नियंत्रित किया गया है।

हालांकि रिपोर्ट में सुधार के संकेत हैं, लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सीमा विवाद बढ़ रहे हैं। ये सभी कारक आतंकवाद को बढ़ावा दे सकते हैं। खासतौर पर दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और अफगानिस्तान की स्थिति भारत के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है। अगर क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ सकता है। (Global Terrorism Index 2026)

EXPLAINER: क्या टेलीमेडिसिन से जवानों की बचेगी जान? ISRO की मदद से कैसे फ्रंटलाइन पर बैठे सैनिकों तक पहुंचेगा डॉक्टर!

Army ISRO Telemedicine MoU
AI Generate Image

ISRO Army Telemedicine MoU: देश की सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए भारतीय सेनाओं और इसरो के बीच एक अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत अब दूर-दराज और कठिन इलाकों में तैनात सैनिकों को बेहतर मेडिकल सुविधा मिल सकेगी। इस समझौते का मकसद सैटेलाइट के जरिए टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार करना है, ताकि जहां अस्पताल पहुंचना मुश्किल है, वहां डॉक्टर खुद सैनिक तक पहुंच सके।

ISRO Army Telemedicine MoU: 53 नए टेलीमेडिसिन नोड्स

हाल ही में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर इसरो के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू साइन किया है। इस समझौते के तहत पहले से मौजूद टेलीमेडिसिन सिस्टम को मजबूत किया जाएगा और नए सेंटर भी जोड़े जाएंगे।

पहले चरण में इसरो 53 नए टेलीमेडिसिन नोड्स स्थापित करेगा। ये नोड्स पहले से मौजूद 20 नोड्स के साथ मिलकर काम करेंगे। यानी आने वाले समय में सेना के पास कुल 70 से ज्यादा ऐसे मेडिकल कनेक्शन पॉइंट होंगे, जहां से सैनिक सीधे बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों से जुड़ सकेंगे। (ISRO Army Telemedicine MoU)

क्यों जरूरी है यह सुविधा

भारत के कई ऐसे बेहद दुर्गम इलाके ऐसे हैं, जहां हालात बेहद कठिन होते हैं। जिनमें सियाचिन ग्लेशियर, लद्दाख की ऊंची पहाड़ियां या पूर्वोत्तर के दूर-दराज इलाके शामिल हैं। इन जगहों पर जवानों की तैनाती की जाती है। यहां तापमान कई बार माइनस 40-50 डिग्री तक चला जाता है और बर्फबारी के कारण कई महीनों तक सड़क और हेलीकॉप्टर दोनों का संपर्क टूट जाता है।

ऐसे हालात में अगर कोई जवान बीमार पड़ जाए या घायल हो जाए, तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है। पहले छोटी बीमारी भी गंभीर बन जाती थी, क्योंकि स्पेशलिस्ट डॉक्टर तक पहुंचने में काफी समय लग जाता था।

अब टेलीमेडिसिन के जरिए यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। जवान वहीं बैठे-बैठे बड़े अस्पताल के डॉक्टर से बात कर सकेगा और तुरंत इलाज शुरू किया जा सकेगा। (ISRO Army Telemedicine MoU)

कैसे काम करेगा टेलीमेडिसिन सिस्टम

यह पूरा सिस्टम सैटेलाइट पर आधारित है। इसमें वीसेट यानी वेरी स्मॉल एपर्चर टर्मिनल तकनीक का इस्तेमाल होता है। आसान भाषा में समझें तो यह एक छोटा डिश एंटेना होता है, जो इसरो के सैटेलाइट से जुड़कर इंटरनेट और वीडियो कनेक्शन उपलब्ध कराता है।

हर टेलीमेडिसिन नोड पर एक मेडिकल सेटअप होता है, जिसमें ईसीजी मशीन, डिजिटल एक्स-रे, ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन मापने वाले उपकरण और अन्य जरूरी मेडिकल डिवाइस होते हैं। यहां तैनात मेडिकल ऑफिसर मरीज का पूरा डेटा तैयार करता है।

इसके बाद यह डेटा और लाइव वीडियो कनेक्शन के जरिए कमांड हॉस्पिटल या बड़े स्पेशलिटी अस्पताल में बैठे डॉक्टरों तक पहुंचाया जाता है। वहां से डॉक्टर तुरंत सलाह देते हैं कि मरीज का इलाज कैसे करना है या उसे तुरंत निकालने की जरूरत है या नहीं। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं, जो पहले कई घंटों या दिनों में संभव हो पाता था। (ISRO Army Telemedicine MoU)

सियाचिन जैसे इलाकों में बड़ा फायदा

इस सिस्टम का सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में होगा, जहां हालात बेहद कठिन हैं। सियाचिन ग्लेशियर को दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है। यहां ऑक्सीजन कम होती है और ठंड बेहद ज्यादा होती है।

ऐसे इलाकों में हाई अल्टीट्यूड बीमारी, फ्रॉस्टबाइट, हार्ट से जुड़ी दिक्कतें और चोट लगने के मामले आम हैं। अब टेलीमेडिसिन के जरिए इन सभी समस्याओं का तुरंत इलाज संभव हो पाएगा।

यहां तक कि कुछ खास टेलीमेडिसिन नोड्स को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे बेहद ठंड में भी काम कर सकें। इन्हें गर्म कमरों में रखा जाता है ताकि मशीनें सही तरीके से चलती रहें। (ISRO Army Telemedicine MoU)

साल 2001 में की थी शुरुआत

भारत में टेलीमेडिसिन की शुरुआत इसरो ने साल 2001 में की थी। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ग्रामीण और दूर-दराज इलाकों के लोगों के इलाज के लिए किया गया था। बाद में इसे सेना के लिए भी अपनाया गया।

पिछले कुछ सालों में सेना के कई इलाकों में टेलीमेडिसिन नोड्स लगाए गए, लेकिन अब तकनीक को और बेहतर बनाने और कवरेज बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई। इसी को ध्यान में रखते हुए यह नया समझौता किया गया है।

इस समझौते के तहत सिर्फ नए नोड्स ही नहीं लगाए जाएंगे, बल्कि पुराने सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि बेहतर क्वालिटी का वीडियो और डेटा ट्रांसमिशन हो सके। (ISRO Army Telemedicine MoU)

सैनिकों की जान बचाने में मददगार

इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे सैनिकों की जान बचाई जा सकेगी। कई बार मौसम खराब होने के कारण हेलीकॉप्टर भी नहीं उड़ पाते और मरीज को निकालना संभव नहीं होता।

ऐसे में टेलीमेडिसिन ही एकमात्र सहारा बन जाता है। डॉक्टर तुरंत सलाह देकर इलाज शुरू करवा सकते हैं, जिससे हालत बिगड़ने से पहले ही मरीज को संभाला जा सके।

इसके अलावा इससे हेलीकॉप्टर के जरिए मरीजों को निकालने की जरूरत भी कम होगी, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत होगी। (ISRO Army Telemedicine MoU)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का होगा इस्तेमाल

साथ ही, आने वाले समय में टेलीमेडिसिन सिस्टम को और स्मार्ट बनाया जाएगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे बीमारी की पहचान और जल्दी हो सके। इसके अलावा बेहतर वीडियो क्वालिटी, पोर्टेबल डिवाइस और डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम को भी जोड़ा जाएगा। इससे सैनिकों का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड एक जगह उपलब्ध रहेगा और जरूरत पड़ने पर कहीं से भी देखा जा सकेगा। (ISRO Army Telemedicine MoU)