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ऑस्ट्रेलिया में INS नीलगिरी का जलवा! काकाडू एक्सरसाइज में दिखी भारत की समुद्री ताकत

INS Nilgiri Kakadu 2026

INS Nilgiri Kakadu 2026: भारतीय नौसेना के आधुनिक फ्रिगेट आईएनएस नीलगिरी ने ऑस्ट्रेलिया में चल रहे एक्सरसाइज काकाडू 2026 के सी फेज यानी समुद्री चरण में हिस्सा लिया है। इसकी आधिकारिक पुष्टि भी भारतीय नौसेना ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर की। नेवी की इस भागीदारी को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की मजबूत होती रणनीतिक पकड़ और सहयोग की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

INS Nilgiri Kakadu 2026: क्या है एक्सरसाइज काकाडू 2026

एक्सरसाइज काकाडू ऑस्ट्रेलिया की रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी द्वारा आयोजित एक बड़ा बहुपक्षीय समुद्री अभ्यास है, जो हर दो साल में आयोजित किया जाता है। इस साल इसका 17वां संस्करण आयोजित हो रहा है, जो 2 मार्च से 31 मार्च तक चलेगा। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, एक साथ काम करने की क्षमता विकसित करना और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना है।

इस अभ्यास में सिर्फ युद्ध से जुड़े अभ्यास ही नहीं होते, बल्कि समुद्री सुरक्षा, निगरानी, आपदा राहत और अन्य ऑपरेशंस से जुड़े पहलुओं को भी शामिल किया जाता है। इस बार के अभ्यास में करीब 19 देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं, जिनमें 20 से ज्यादा युद्धपोत, एयरक्राफ्ट और 6000 से अधिक सैन्य कर्मी शामिल हैं।

यह अभ्यास ऑस्ट्रेलिया के डार्विन से लेकर कैर्न्स और जर्विस बे तक फैले समुद्री क्षेत्र में हो रहा है। खास बात यह भी है कि इस बार का आयोजन रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर हो रहा है। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

समुद्र में दिखा आईएनएस नीलगिरी का कौशल

आईएनएस नीलगिरी इस समय वेस्टर्न पैसिफिक क्षेत्र में ओवरसीज डिप्लॉयमेंट पर है और इसी दौरान उसने एक्सरसाइज काकाडू के सी फेज में भाग लिया। इस चरण में जहाजों के बीच तालमेल से नेविगेशन, जटिल समुद्री अभ्यास और विभिन्न युद्धक रणनीतियों का अभ्यास किया जाता है।

इस दौरान आईएनएस नीलगिरी ने कई देशों के युद्धपोतों के साथ मिलकर अभ्यास किया। इनमें ऑस्ट्रेलिया का एचएमएएस चूल्स, मलेशिया का केडी लेकिर, फिलीपींस का बीआरपी डिएगो सिलांग और थाईलैंड का एचटीएमएस नरेसुआन शामिल रहे। इन सभी के साथ मिलकर भारतीय नौसेना ने समुद्र में जॉइंट ऑपरेशन की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया।

21 मार्च को सिडनी हार्बर में आयोजित फ्लीट रिव्यू इस अभ्यास का एक अहम हिस्सा रहा, जिसमें 19 देशों के 31 युद्धपोत शामिल हुए। यह पिछले एक दशक में सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक जमावड़ा माना जा रहा है। आईएनएस नीलगिरी भी इस भव्य आयोजन का हिस्सा बनी, जिससे भारत की मौजूदगी को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिली। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

इंडो-पैसिफिक में बढ़ती भारत की भूमिका

आईएनएस नीलगिरी की यह भागीदारी सिर्फ एक अभ्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक सोच को भी दर्शाती है। आज के समय में यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है।

भारत लगातार इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है और विभिन्न देशों के साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। काकाडू जैसे अभ्यास भारत को अन्य देशों के साथ बेहतर तालमेल बनाने का मौका देते हैं। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

इस अभ्यास में वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे आसियान देशों की भागीदारी भी इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय सहयोग को कितना महत्व दिया जा रहा है। इसके अलावा क्वाड देशों के बीच भी इस तरह के अभ्यास रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करते हैं।

आईएनएस नीलगिरी की वेस्टर्न पैसिफिक में मौजूदगी यह भी दिखाती है कि भारतीय नौसेना अब लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम है। इसे ही ब्लू वॉटर नेवी कहा जाता है, जहां एक देश की नौसेना अपने समुद्री क्षेत्र से दूर जाकर भी प्रभावी ऑपरेशन कर सकती है। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

आईएनएस तारागिरी से और बढ़ेगी ताकत

जहां एक ओर आईएनएस नीलगिरी विदेश में भारत की ताकत दिखा रही है, वहीं नीलगिरी क्लास के चौथे फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को भारतीय नौसेना 4 अप्रैल को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है।

यह जहाज प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाया गया चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे मुंबई की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने तैयार किया है। करीब 6670 टन वजनी यह युद्धपोत आधुनिक तकनीक से लैस है और इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी उपकरण लगे हैं।

आईएनएस तारागिरी में सतह से सतह और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम और आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगे हैं। यह जहाज युद्ध के अलावा मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

2027 तक बदल जाएगा भारतीय सेना के युद्ध का तरीका, हर जवान बनेगा ‘ईगल इन द आर्म’

Indian Army Drone Warrior
Indian Army Drone Warrior

Indian Army Drone Warrior: पहले रूस-यूक्रेन युद्ध और अब इजरायल-ईरान संघर्ष हर जगह ड्रोन बेहद भूमिका निभा रहे हैं। यहां तक कि पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भी ड्रोन ने अहम भूमिका निभाई थी। जिसके बाद भारतीय सेना ने अपने स्ट्रक्चर में कई अहम बदलाव करते हुए एक बड़ा कदम उठाया। जिसके तहत आने वाले समय में हर इन्फैंट्री जवान को ड्रोन ऑपरेट करने का फैसला लिया गया। वहीं पिछले साल लिए गए इस फैसले के बाद इन्फैंट्री बटालियनों के हर जवान को बुनियादी ड्रोन ट्रेनिंग दी गई, जो अब पूरी हो चुकी है और उन्हें अब स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग दी जा रही है। जिसके तहत 2027 तक 100 प्रतिशत सैनिक ड्रोन ऑपरेशन में एक्सपर्ट हो जाएंगे।

Indian Army Drone Warrior: क्या है ‘ईगल इन द आर्म’?

सेना ने पिछले साल सितंबर में नई डॉक्ट्रिन “ईगल इन द आर्म” लॉन्च की थी। इसका मतलब यह है कि हर सैनिक सिर्फ ड्रोन चलाना ही नहीं सीखेगा, बल्कि ड्रोन उसके हथियार का हिस्सा बन जाएगा। जैसे वह अपनी राइफल साथ रखता है, वैसे ही ड्रोन भी साथ रहेगा। यह ड्रोन सैनिक की “तीसरी आंख” की तरह काम करेगा, जिससे वह दूर तक देख सकेगा और जरूरत पड़ने पर हमला भी कर सकेगा। यह सोच रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास संघर्ष और मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर जैसे अनुभवों से आई है, जहां ड्रोन ने बड़ी भूमिका निभाई।

यह योजना सितंबर 2025 में औपचारिक रूप से शुरू हुई थी। इससे पहले जुलाई में कारगिल विजय दिवस पर आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इसकी घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि हर इन्फैंट्री बटालियन में एक खास ड्रोन प्लाटून बनाया जाएगा। इसके अलावा तोपखाने में दुश्मन के ड्रोन को रोकने के लिए काउंटर-ड्रोन सिस्टम और लॉइटर म्यूनिशन भी शामिल किए जाएंगे। (Indian Army Drone Warrior)

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में सैनिक सिर्फ राइफल से नहीं, बल्कि हाथ में ड्रोन लेकर लड़ाई लड़ेगा, जिससे उसकी देखने की क्षमता, पहुंच और ताकत तीनों बढ़ जाएंगी।

ड्रोन की ट्रेनिंग पहले यूनिट स्तर पर शुरू की गई थी, लेकिन अब इसे और आगे बढ़ाया जा रहा है। अलग-अलग जगहों पर खास ट्रेनिंग सेंटर बनाए जा रहे हैं, जहां एडवांस कोर्स चल रहे हैं। इसके अलावा वर्चुअल रियलिटी यानी वीआर सिमुलेटर के जरिए भी सैनिकों को बिना किसी खतरे के ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके साथ ही 2026 तक देशभर में करीब 19 ड्रोन ट्रेनिंग हब तैयार किए जा रहे हैं, जहां बड़े पैमाने पर सैनिकों को प्रशिक्षित किया जाएगा।

देशभर में खास ट्रेनिंग सेंटर बनाए

इन ट्रेनिंग सेंटरों में देहरादून का भारतीय मिलिट्री अकादमी (आईएमए), महू का इन्फैंट्री स्कूल, चेन्नई और गया की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (ओटीए), देवलाली का आर्टिलरी स्कूल और अरुणाचल प्रदेश का लिकाबली ड्रोन लैब शामिल हैं। यहां सिर्फ जवान ही नहीं, बल्कि अधिकारी भी ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग ले रहे हैं।

ट्रेनिंग को अलग-अलग भूमिकाओं के हिसाब से तैयार किया गया है। जो सैनिक कॉम्बैट में होंगे, उन्हें एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन चलाना सिखाया जा रहा है। निगरानी के लिए सैनिकों को रियल टाइम आईएसआर ड्रोन की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख सकें।

इसके अलावा लॉजिस्टिक्स के लिए ड्रोन के जरिए सामान पहुंचाना और मेडिकल स्थिति में घायल सैनिकों को निकालना भी सिखाया जा रहा है। साथ ही एक जरूरी हिस्सा यह भी है कि सैनिक दुश्मन के ड्रोन को कैसे रोके या नष्ट करे। इसलिए काउंटर-ड्रोन ट्रेनिंग भी अनिवार्य बनाई गई है, ताकि हर जवान सिर्फ ड्रोन चलाना ही नहीं, बल्कि दुश्मन के ड्रोन से मुकाबला करना भी सीख सके। (Indian Army Drone Warrior)

‘अश्नि प्लाटून’ इस योजना का अहम हिस्सा

पिछले साल कारगिल विजय दिवस के मौके पर अहम रिस्ट्रक्चर प्लान में अश्नि प्लाटून बनाने का एलान किया गया था। अश्नी प्लाटून इस पूरी ड्रोन क्रांति का सबसे अहम हिस्सा बन गए हैं। ‘अश्नि’ का मतलब होता है ‘अग्नि’, यानी आग की ताकत। आसान शब्दों में समझें तो हर 380 इन्फैंट्री बटालियन में अब एक खास ड्रोन टीम बनाई गई है, जिसमें करीब 20 से 25 विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक होते हैं।

इस प्लाटून के पास कई तरह के ड्रोन होते हैं। इनमें कम से कम 4 सर्विलांस ड्रोन होते हैं, जो दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। इसके अलावा करीब 6 आर्म्ड या कामिकाजी ड्रोन भी होते हैं, जिन्हें सीधे दुश्मन पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जैसे नागास्त्र-1, वारमेट और अन्य ड्रोन। (Indian Army Drone Warrior)

ये अश्नि प्लाटून अब पूरी तरह से ऑपरेशनल हो चुके हैं और सेना के बड़े अभ्यासों जैसे ‘राम प्रहार’ और ‘खड़गा शक्ति’ में अपनी क्षमता दिखा चुके हैं। ये प्लाटून युद्ध के मैदान में एक ‘अदृश्य तीसरी आंख’ की तरह काम करते हैं। ये रियल टाइम जानकारी देते हैं और जरूरत पड़ने पर सटीक हमला करके दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

अब इन प्लाटून का इस्तेमाल सिर्फ इन्फैंट्री तक सीमित नहीं है। स्पेशल फोर्सेस, भैरव लाइट कमांडो बटालियनों और आगे चलकर आर्मर्ड और आर्टिलरी यूनिट्स में भी इन्हें शामिल किया जा रहा है, ताकि पूरी सेना की ताकत और बढ़ाई जा सके। (Indian Army Drone Warrior)

ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि ड्रोन युद्ध में कितना अहम रोल निभा सकते हैं। इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान ने बड़ी संख्या में ड्रोन का इस्तेमाल किया, लेकिन भारत ने अपने मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम से उन्हें नाकाम कर दिया।

साथ ही भारतीय ड्रोन ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला किया। इससे यह साबित हो गया कि ड्रोन अब सिर्फ सहायक उपकरण नहीं, बल्कि मुख्य हथियार बन चुके हैं।

हर काम में होगा ड्रोन का इस्तेमाल

अब ड्रोन सिर्फ हमला करने के लिए ही नहीं, बल्कि कई और कामों में भी इस्तेमाल होंगे। जैसे दुश्मन की निगरानी करना, जरूरी सामान पहुंचाना, घायल सैनिकों को निकालना और रीयल टाइम जानकारी देना।

सेना अब हर सैनिक को उसकी भूमिका के हिसाब से ट्रेनिंग दे रही है। यानी कोई सैनिक कॉम्बैट में ड्रोन चलाएगा, तो कोई सर्विलांस या लॉजिस्टिक्स में इसका इस्तेमाल करेगा। (Indian Army Drone Warrior)

काउंटर-ड्रोन क्षमता भी बढ़ाई जा रही

जैसे-जैसे ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे ही दुश्मन के ड्रोन से बचाव भी जरूरी हो गया है। इसलिए सेना अपने जवानों को यह भी सिखा रही है कि दुश्मन के ड्रोन को कैसे रोका जाए या नष्ट किया जाए।

इसके लिए जैमर, लेजर सिस्टम और अन्य तकनीकों पर भी काम किया जा रहा है, ताकि एक मजबूत मल्टी-लेयर सिस्टम तैयार हो सके। (Indian Army Drone Warrior)

स्वदेशी तकनीक पर जोर

इस पूरे प्रोग्राम में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर खास ध्यान दिया जा रहा है। सेना ज्यादा से ज्यादा ड्रोन देश में ही बनवाना चाहती है, ताकि विदेशों पर निर्भरता कम हो।

इसी के तहत ‘ड्रोन शक्ति’ जैसी पहल शुरू की गई है, जिसमें भारतीय कंपनियां और डीआरडीओ मिलकर काम कर रहे हैं। ‘ड्रोन शक्ति’ को सेना का ईएमई कोर अगुवाई कर रही है। अब हर कोर में 1000 से ज्यादा छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन तैनात किए जा रहे हैं।

फिलहाल अलग-अलग तरह के करीब 9 ड्रोन की टेस्टिंग चल रही है। इनमें कुछ ड्रोन निगरानी (आईएसआर) के लिए हैं, कुछ सीधे हमला करने वाले यानी कामिकाजी ड्रोन हैं, और कुछ ऐसे हैं जो ऊपर से सटीक तरीके से हथियार गिरा सकते हैं। इसके साथ ही दुश्मन के ड्रोन को रोकने के लिए भी तैयारी की जा रही है। इसके लिए लेजर सिस्टम, जामर और गन सिस्टम इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यहां तक कि प्रशिक्षित बाज (ईगल), जिसे ‘अर्जुन’ कहा जाता है, का भी प्रयोग किया जा रहा है, जो दुश्मन के ड्रोन को पकड़ सकता है। 2026 के गणतंत्र दिवस पर ‘ड्रोन शक्ति-ईगल ऑन आर्म’ की झलक भी दिखाई गई थी। (Indian Army Drone Warrior)

2027 तक हर जवान बनेगा ड्रोन वॉरियर

सेना का लक्ष्य है कि साल 2027 तक हर इन्फैंट्री जवान ड्रोन ऑपरेशन में पूरी तरह दक्ष हो जाए। यानी भविष्य में हर सैनिक एक “ड्रोन वॉरियर” होगा, जो जमीन के साथ-साथ आसमान से भी युद्ध लड़ सकेगा।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, अब सैनिकों को उनकी भूमिका के हिसाब से ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। यानी जो सैनिक जिस काम में लगे हैं, उसी के अनुसार उन्हें ड्रोन इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है। (Indian Army Drone Warrior)

कुछ सैनिकों को लड़ाई (कॉम्बैट) के लिए ड्रोन चलाना सिखाया जा रहा है, कुछ को दुश्मन पर नजर रखने यानी सर्विलांस के लिए। वहीं कुछ को जरूरी सामान पहुंचाने यानी लॉजिस्टिक्स में ड्रोन का इस्तेमाल सिखाया जा रहा है। यहां तक कि घायल सैनिकों को निकालने (मेडिकल एवाक्यूएशन) में भी ड्रोन की ट्रेनिंग दी जा रही है।

इसके साथ-साथ सेना सिर्फ ड्रोन चलाना ही नहीं, बल्कि दुश्मन के ड्रोन को रोकना या खत्म करना भी सिखा रही है। यानी सैनिक अब ड्रोन से हमला भी कर सकेंगे और दुश्मन के ड्रोन से बचाव भी कर पाएंगे। (Indian Army Drone Warrior)

F-INSAS प्रोग्राम के तहत सेना खरीदेगी 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स, एक क्लिक में दुश्मन खत्म!

Holographic Reflex Sight India RFI

Holographic Reflex Sight India RFI: भारतीय सेना को आधुनिक बनाने के लिए फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (F-INSAS) के तहत रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। यह इक्विपमेंट जवानों की निशानेबाजी को पहले से कहीं ज्यादा तेज और सटीक बनाने में मदद करेगा। खास बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत की जा रही है, ताकि देश में ही इन इक्विपमेंट्स का निर्माण हो सके।

Holographic Reflex Sight India RFI: क्या है होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट और क्यों है जरूरी

सरल शब्दों में समझें तो होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट एक आधुनिक निशानेबाजी इक्विपमेंट है, जो राइफल पर लगाया जाता है। पहले जवान आयरन साइट्स यानी साधारण निशाने का इस्तेमाल करते थे, जिसमें टारगेट को फोकस करने में थोड़ा समय लगता था। लेकिन इस नई तकनीक में जवानों को एक होलोग्राफिक रेटिकल यानी चमकता हुआ निशान दिखाई देता है, जिससे वह बहुत तेजी से टारगेट पर निशाना लगा सकता है।

यह इक्विपमेंट मुख्य रूप से 7.62×51 मिमी असॉल्ट राइफल के साथ इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन इसे 7.62×39 मिमी राइफल पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जवान दोनों आंखें खुली रखकर भी फायरिंग कर सकता है। इससे आसपास के हालात पर नजर बनाए रखते हुए भी दुश्मन पर सटीक निशाना लगाया जा सकता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में जहां हर सेकंड की अहमियत होती है, वहां यह इक्विपमेंट काफी मददगार साबित होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

हर मौसम और हर इलाके में काम करेगा

आरएफआई में साफ कहा गया है कि ये साइट्स देश के अलग-अलग इलाकों में इस्तेमाल होंगी। इसमें पश्चिमी सीमा के रेगिस्तान से लेकर उत्तर-पूर्व के ऊंचे पहाड़ तक शामिल हैं। यानी यह इक्विपमेंट 18,000 फीट की ऊंचाई तक भी काम करेगा।

मौसम चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, जैसे तेज बारिश, धूल, बर्फ या तेज धूप, यह साइट लगातार काम करती रहेगी। तापमान माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तक होने पर भी इसकी परफॉर्मेंस पर असर नहीं पड़ेगा। और जेन-2 या जेन-3 इमेज इंटेंसिफायर के साथ आसानी से काम करेंगी। रात के समय भी इसे नाइट विजन डिवाइस के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे सैनिक अंधेरे में भी दुश्मन को आसानी से देख और निशाना लगा पाएंगे। इनका डिजाइन मॉड्यूलर होगा, यानी भविष्य में इन्हें बिना ज्यादा बदलाव किए आसानी से अपग्रेड किया जा सकेगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

सैनिकों की ताकत कई गुना बढ़ेगी

इस इक्विपमेंट से सैनिकों की फायरिंग स्पीड और सटीकता दोनों बढ़ेंगी। पहले जहां निशाना साधने में समय लगता था, अब दुश्मन को देखते ही तुरंत फायर किया जा सकेगा। इसमें पैरालैक्स एरर नहीं होता, यानी आंख की स्थिति बदलने पर भी निशाना नहीं बदलता।

सबसे खास बात यह है कि अगर इस साइट का सामने वाला ग्लास आंशिक रूप से टूट भी जाए, तब भी इसका रेटिकल काम करता रहता है। यही होलोग्राफिक साइट की सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। यानी युद्ध के दौरान नुकसान होने पर भी सैनिक अपनी फायरिंग जारी रख सकता है। यही वजह है कि इसे सैनिकों के लिए “तीसरी आंख” भी कहा जाता है।

इसके साथ ही इसमें लंबी बैटरी लाइफ होनी चाहिए, ताकि इसे बार-बार चार्ज या बदलने की जरूरत न पड़े। सैनिक अगर दस्ताने पहने हों तब भी इसके बटन आसानी से दबा सकें। इसे हेलमेट या गैस मास्क पहनकर भी आराम से इस्तेमाल किया जा सके और राइफल के रेल कवर या चार्जिंग हैंडल के साथ कोई दिक्कत न आए।

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई जारी करके कंपनियों से जानकारी मांगी है। इसका मकसद यह जानना है कि कौन-कौन सी भारतीय या विदेशी कंपनियां इस तरह के इक्विपमेंट बना सकती हैं। कंपनियों को 28 अप्रैल तक अपना जवाब देना होगा।

इसके बाद तकनीकी जांच होगी, फिर ट्रायल किए जाएंगे। ट्रायल में यह देखा जाएगा कि इक्विपमेंट असली परिस्थितियों में कितना अच्छा काम करता है। इसमें ऊंचे पहाड़, रेगिस्तान, बारिश और धूल जैसी परिस्थितियों में टेस्ट किया जाएगा। जो कंपनी इन सभी टेस्ट में सफल होगी, उसे आगे कॉन्ट्रैक्ट मिलने की संभावना होगी। (Holographic Reflex Sight India RFI)

‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगा बड़ा फायदा

इस पूरी खरीद प्रक्रिया का एक बड़ा उद्देश्य देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना भी है। सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक इक्विपमेंट भारत में ही बनें। इससे देश की कंपनियों को काम मिलेगा, रोजगार बढ़ेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

भारतीय कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि वे कितने प्रतिशत इक्विपमेंट देश में ही बना सकती हैं और क्या वे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन कर सकती हैं। अगर यह योजना सफल होती है, तो आने वाले समय में भारत खुद इस तकनीक में आत्मनिर्भर बन सकता है।

कंपनियों से पूछा गया है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का क्या प्लान है और जरूरी पार्ट्स कहां से आएंगे।

ट्रायल्स के लिए “नो कॉस्ट नो कमिटमेंट” आधार रखा गया है, यानी कंपनियों को बिना किसी भुगतान के अपने प्रोडक्ट का टेस्ट देना होगा। यह टेस्ट ऊंचाई वाले इलाकों, रेगिस्तान, बारिश, धूल, रिकॉयल और गिरने जैसी स्थितियों में किया जाएगा। इसके लिए वेंडर को अपना प्रोटोटाइप देना होगा।

ट्रेनिंग के मामले में भी कंपनियों से पूछा गया है कि वे सैनिकों और तकनीकी स्टाफ को कैसे ट्रेनिंग देंगे, क्या कंप्यूटर बेस्ड ट्रेनिंग देंगे और ट्रेन-द-ट्रेनर सिस्टम होगा या नहीं।

वहीं वेंडर चुनने की प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को इसमें कुछ छूट भी दी गई है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

अभी क्या स्थिति है सेना में

फिलहाल भारतीय सेना में यह तकनीक सीमित संख्या में इस्तेमाल हो रही है। इन्हें अभी चुनिंदा यूनिट्स में ही इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे घातक प्लाटून, पैरा एसएफ और वे इन्फैंट्री यूनिट्स जो फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (एफ-इंसास) के तहत आधुनिक उपकरणों से लैस हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या अभी कुछ हजार के आसपास ही है। कुछ यूनिट्स, खासकर स्पेशल फोर्सेस और घातक प्लाटून में ऐसे इक्विपमेंट पहले से मौजूद हैं। लेकिन अब इन्हें बड़े स्तर पर लाने की तैयारी है।

सबसे पहले बात करें स्वदेशी विकल्प की, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल की होलोग्राफिक वेपन साइट सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आ रही है। इसे डीआरडीओ के सहयोग से बनाया गया है। यह साइट सिग-716आई बैटल राइफल, एके-203 असॉल्ट राइफल, इंसास और अन्य क्लोज क्वार्टर बैटल हथियारों पर लगाई जा रही है। यह एफ-इंसास प्रोग्राम का हिस्सा है और 2022 से धीरे-धीरे सेना में शामिल की जा रही है। इसकी खासियत यह है कि सैनिक दोनों आंखें खुली रखकर निशाना लगा सकता है, इसमें पैरालैक्स की समस्या नहीं होती, दिन और रात दोनों समय काम करती है और मजबूत होने के साथ-साथ अपेक्षाकृत सस्ती भी है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

इसके अलावा कुछ इम्पोर्टेड साइट्स भी इस्तेमाल हो रही हैं, जिनमें ईओटेक EXPS3 और 512 मॉडल शामिल हैं। ये मुख्य रूप से पैरा एसएफ, एनएसजी और अन्य स्पेशल फोर्सेस के पास हैं। इन्हें एम4ए1 कार्बाइन, एके-203 और सिग-716 जैसी राइफलों पर लगाया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये दुनिया की सबसे भरोसेमंद होलोग्राफिक साइट्स मानी जाती हैं। अगर इनका फ्रंट ग्लास टूट भी जाए, तब भी रेटिकल काम करता रहता है, जो युद्ध में बहुत अहम होता है।

इसके अलावा कुछ अन्य साइट्स भी सीमित संख्या में मौजूद हैं। डीआरडीओ की इंडिजिनस साइट, जिसे इगनेटा कहा जाता है, अभी डेवलपमेंट और ट्रायल के चरण में है और इसे सिग सॉयर, एके-47 और उग्रम जैसी राइफलों के लिए तैयार किया जा रहा है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

जानें फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम के बारे में

भारतीय सेना का फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम, जिसे एफ-इंसास (F-INSAS) कहा जाता है, एक ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट है जिसका मकसद सैनिकों को आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करना है। इस सिस्टम में हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, नाइट विजन, कम्युनिकेशन और डिजिटल नेटवर्क जैसी सभी चीजें शामिल होती हैं, ताकि वह ज्यादा सुरक्षित, तेज और घातक बन सके।

यह योजना करीब 2007-08 में शुरू हुई थी। उस समय लक्ष्य था कि 2020 तक सेना की सभी इन्फैंट्री बटालियनों को आधुनिक इक्विपमेंटों से लैस कर दिया जाए। 2015 में इसमें बड़ा बदलाव किया गया। पहले यह एक ही बड़ा प्रोग्राम था, लेकिन बाद में इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। पहला हिस्सा था सैनिकों के हथियार और व्यक्तिगत इक्विपमेंट, जैसे असॉल्ट राइफल, हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते और अन्य जरूरी चीजें। दूसरा हिस्सा था बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम, यानी ऐसा डिजिटल सिस्टम जिससे सैनिक को रीयल टाइम में जानकारी मिल सके कि दुश्मन कहां है, उसके साथी कहां हैं और किस दिशा से हमला हो सकता है।

इसके बाद 2022 में इस प्रोग्राम को नया रूप मिला। रक्षा मंत्री ने इसका एक अपडेटेड वर्जन सेना को सौंपा। इसमें कई नई चीजें शामिल थीं, जैसे नया कैमोफ्लाज यूनिफॉर्म, एडवांस्ड हेलमेट, मजबूत बॉडी आर्मर, नाइट विजन डिवाइस, थर्मल इमेजर और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम। इसके साथ ही नई एके-203 असॉल्ट राइफल भी दी गई, जो पुरानी इंसास राइफल की जगह ले रही है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

फिलहाल यह प्रोग्राम धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। कई यूनिट्स, खासकर जो सीमा पर तैनात हैं, उन्हें नए इक्विपमेंट मिल चुके हैं। सैनिकों को बेहतर राइफल, मजबूत सुरक्षा गियर और आधुनिक इक्विपमेंट दिए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ डीआरडीओ और निजी कंपनियां डिजिटल सिस्टम पर काम कर रही हैं, जिससे सैनिक को युद्ध के दौरान हर जानकारी तुरंत मिल सके।

आने वाले समय में इसमें और भी नई तकनीक जुड़ सकती है। जैसे सैनिक हेलमेट या चश्मे के जरिए ही दुश्मन की लोकेशन देख सके, ड्रोन से मिल रही जानकारी सीधे उसके सामने दिखाई दे, और वह तेजी से फैसले ले सके। इसे और बेहतर बनाने के लिए “स्मार्ट सोल्जर” जैसी पहल भी चल रही है।

इस प्रोग्राम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सैनिक की फायरपावर बढ़ेगी। नई राइफल से वह ज्यादा दूर और सटीक निशाना लगा सकेगा। साथ ही, बेहतर बॉडी आर्मर और हेलमेट उसे दुश्मन की गोली से बचाने में मदद करेंगे। हल्के और आरामदायक इक्विपमेंट होने से उसकी मूवमेंट भी बेहतर होगी। सबसे अहम बात यह है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए उसे हर समय पूरी स्थिति की जानकारी मिलती रहेगी, जिससे वह ज्यादा समझदारी से लड़ाई लड़ सकेगा।

कुल मिलाकर, एफ-इंसास अब सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं रहा, बल्कि भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की पूरी सोच बन चुका है। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारतीय सैनिक को तकनीक से लैस एक “स्मार्ट फाइटर” बना देगा, जो हर तरह की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

गलवान हीरो कर्नल जामवाल को बड़ा सम्मान! मिला ‘नेशनल एडवेंचर आइकन अवॉर्ड’

Colonel Ranveer Singh Jamwal Award

Colonel Ranveer Singh Jamwal Award: जम्मू निवासी और अरुणाचल प्रदेश में दिरांग स्थित राष्ट्रीय पर्वतारोहण एवं साहसिक खेल संस्थान (निमास) के डायरेक्टर कर्नल रणवीर सिंह जामवाल को हाल ही में ‘नेशनल एडवेंचर आइकन अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें उनके शानदार साहसिक कारनामों और देश के लिए किए गए योगदान के लिए दिया गया है। बता दें कि कर्नल जामवाल वही भारतीय सेना के बहादुर अधिकारी हैं, जिन्होंने 2020 में गलवान संघर्ष के बाद 29-30 अगस्त की रात को पैंगोंग झील के पास ब्लैक टॉप पर चीनी पीएलए की कब्जे की कोशिशों को नाकाम किया था।

कर्नल जामवाल पिछले करीब 20 साल से एडवेंचर की दुनिया में सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने कई ऐसे काम किए हैं, जो बहुत कम लोग कर पाते हैं। उन्होंने दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई की है। इसके साथ ही उन्होंने भारत के सभी 28 राज्यों की सबसे ऊंची चोटियों को भी फतह किया है। ऐसा करने वाले वह देश के इकलौते व्यक्ति हैं।

तीन बार एवरेस्ट फतह, 70 से ज्यादा मिशन पूरे

कर्नल जामवाल ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तीन बार सफल चढ़ाई की है। यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने अब तक 70 से ज्यादा एडवेंचर मिशन पूरे किए हैं।

उनकी उपलब्धियां सिर्फ पर्वतारोहण तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी पर 1040 किलोमीटर लंबी राफ्टिंग यात्रा का नेतृत्व भी किया है। इस यात्रा में भारत के अंदर नदी की पूरी लंबाई को पार किया गया, जो पहले कभी नहीं हुआ था। तेज धाराओं और मुश्किल हालात के बीच यह मिशन पूरा करना आसान नहीं था।

Colonel Ranveer Singh Jamwal Award

इसके अलावा उन्होंने साइकिलिंग में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के कठिन इलाकों में 1100 किलोमीटर की साइकिल यात्रा का नेतृत्व किया। वहीं ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के दौरान 5374 किलोमीटर लंबा इंटरनेशनल साइकिल अभियान भी पूरा किया, जिसमें उन्होंने छह देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

कई बड़े पुरस्कारों से हो चुके हैं सम्मानित

कर्नल जामवाल को देश के कई बड़े एडवेंचर अवॉर्ड भी मिल चुके हैं। इनमें तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड, आईएमएफ गोल्ड मेडल और मैकग्रेगर मेडल शामिल हैं। खास बात यह है कि वह इन तीनों बड़े पुरस्कारों को पाने वाले देश के एकमात्र व्यक्ति हैं।

सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स की तैयारी; सरकार ने संसदीय कमेटी में क्या कहा थिएटर कमांड्स पर, अगले 3 माह में कैसे बदलेगा पूरा मिलिट्री स्ट्रक्चर?

India Theatre Commands
3 Service Chiefs and CDS (File Photo)

India Theatre Commands: अगले कुछ महीने भारतीय सेनाओं के लिए बेहद अहम होने वाले हैं। एक तरफ जहां, सीडीएस, नेवी चीफ मई के आखिर तक रिटायर हो जाएंगे तो मौजूदा आर्मी चीफ जून के आखिर तक रिटायर होंगे। वहीं दूसरी तरफ सरकार तीन इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स बनाने की तैयारी में है, जिससे सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर काम करेंगी। इस पर संसदीय कमेटी की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दिशा में काफी प्रगति हो चुकी है और लगभग सभी पक्षों में सहमति बन गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, अब कुछ अंतिम मुद्दों पर चर्चा चल रही है और प्रशासनिक काम भी साथ-साथ आगे बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि मई तक इस पर बड़ा फैसला हो सकता है। कोशिश यह है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान के मई में रिटायर होने से पहले इस योजना को मंजूरी मिल जाए। इसके लिए जल्द ही कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी से अप्रूवल लिया जा सकता है। यह बदलाव आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए बहुत अहम माना जा रहा है। (India Theatre Commands)

India Theatre Commands: क्या होते हैं थिएटर कमांड्स

थिएटर कमांड्स का मतलब है कि किसी खास इलाके या दुश्मन के हिसाब से सेना की तीनों शाखाओं को एक कमांड के तहत लाया जाए। अभी भारत में आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के अलग-अलग कमांड हैं, जो अपने-अपने तरीके से काम करते हैं।

नए सिस्टम में एक ही कमांडर के तहत तीनों सेनाएं मिलकर ऑपरेशन चलाएंगी। इससे फैसले जल्दी होंगे और युद्ध के समय तालमेल बेहतर रहेगा। (India Theatre Commands)

रक्षा मंत्रालय ने क्या कहा संसदीय कमेटी को

संसदीय कमेटी को रक्षा मंत्रालय ने बताया कि थिएटर कमांड्स बनाने की दिशा में अच्छा काम हुआ है और ज्यादातर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। अब कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा चल रही है, जिन्हें चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी यानी सीओएससी अंतिम रूप दे रही है। साथ ही, प्रशासनिक स्तर पर भी तैयारियां लगातार जारी हैं, ताकि जब फैसला हो, तो उसे तुरंत लागू किया जा सके।

सरकार का मानना है कि आज का युद्ध पहले जैसा नहीं रहा। अब लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर, स्पेस और मल्टी-डोमेन में भी होती है। ऐसे में सेना के ढांचे में बदलाव करना जरूरी हो गया है, ताकि आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से तेजी और बेहतर तरीके से काम किया जा सके।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी कहा है कि थिएटर कमांड्स का एक बड़ा फायदा यह होगा कि तीनों सेनाओं के बीच “जॉइंटनेस” यानी मिलकर काम करने की संस्कृति मजबूत होगी। अभी अलग-अलग सिस्टम होने की वजह से कई बार तालमेल की कमी दिखती है, लेकिन नए ढांचे में यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। (India Theatre Commands)

तीन बड़े थिएटर कमांड्स की योजना

अभी भारत में करीब 17 अलग-अलग सिंगल सर्विस कमांड्स हैं। जैसे आर्मी के अलग कमांड, एयर फोर्स के अलग और नेवी के अलग कमांड्स हैं। थिएटर कमांड्स बनने के बाद इन सभी को मिलाकर तीन बड़े कमांड बनाए जाएंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने कमांड पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, बल्कि उनका रोल बदल जाएगा।

दुश्मन के हिसाब से बनेगा नया स्ट्रक्चर

सूत्रों के मुताबिक भारत जिस नए थिएटर कमांड सिस्टम की तैयारी कर रहा है, उसकी सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ नक्शे के हिसाब से नहीं, बल्कि दुश्मन के हिसाब से बनाया जा रहा है। यानी पहले की तरह सिर्फ इलाके के आधार पर कमांड नहीं होगी, बल्कि जहां से खतरा है, उसी हिसाब से पूरी सैन्य ताकत को एक जगह लाकर रखा जाएगा।

इस नए मॉडल में तीन बड़े थिएटर कमांड नॉर्दर्न, वेस्टर्न और मैरिटाइम बनाए जाने की योजना है। हर कमांड का अपना अलग रोल होगा और उसमें तीनों सेनाओं के संसाधन एक साथ काम करेंगे। (India Theatre Commands)

नॉर्दर्न थिएटर कमांड: चीन के खिलाफ सबसे बड़ा फ्रंट

नॉर्दर्न थिएटर कमांड का सबसे बड़ा फोकस चीन के साथ लगने वाली सीमा यानी एलएसी पर होगा। इसमें लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक का पूरा इलाका शामिल होगा। इसके साथ ही पूर्वी सेक्टर में बांग्लादेश और म्यांमार से जुड़े इलाकों पर भी नजर रखी जाएगी, ताकि पूरे पूर्वी मोर्चे को एक साथ कंट्रोल किया जा सके।

इस कमांड का हेडक्वार्टर लखनऊ में बनाया जा सकता है। इसके पीछे वजह यह है कि लखनऊ भौगोलिक रूप से इस पूरे क्षेत्र के बीच में पड़ता है और यहां से कमांड और कंट्रोल करना आसान होगा।

इस थिएटर कमांड में आर्मी की नॉर्दर्न, सेंट्रल और ईस्टर्न कमांड्स के कुछ हिस्सों को शामिल किया जाएगा। साथ ही एयर फोर्स की वेस्टर्न, सेंट्रल और ईस्टर्न कमांड्स के एयर एसेट्स भी इसमें शामिल होंगे। यानी लड़ाई की स्थिति में जमीन और हवा दोनों से एक साथ कार्रवाई हो सकेगी। (India Theatre Commands)

इसका कमांडर तीन-स्टार रैंक का अधिकारी होगा, जो आर्मी या एयर फोर्स दोनों में से किसी से भी हो सकता है। माना जा रहा है कि इसमें रोटेशन सिस्टम भी हो सकता है, ताकि दोनों सेनाओं को बराबर मौका मिले।

इस कमांड का मुख्य उद्देश्य चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के खिलाफ मजबूत डिफेंस तैयार करना और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई यानी काउंटर-ऑफेंसिव करना होगा। पिछले कुछ सालों में एलएसी पर जो तनाव देखने को मिला है, उसके बाद इस कमांड की अहमियत और बढ़ जाती है। (India Theatre Commands)

वेस्टर्न थिएटर कमांड: पाकिस्तान फ्रंट पर तेजी से जवाब

वेस्टर्न थिएटर कमांड पूरी तरह पाकिस्तान को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इसका इलाका सियाचिन में साल्टोरो रिज से लेकर रण ऑफ कच्छ तक फैला होगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में चल रहे काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस भी इसी कमांड के तहत आएंगे।

इसका हेडक्वार्टर जयपुर में बनाया जा सकता है। जयपुर की लोकेशन पश्चिमी मोर्चे के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि यहां से पूरे बॉर्डर पर नजर रखना आसान होता है। (India Theatre Commands)

इस थिएटर में आर्मी की वेस्टर्न और साउथ-वेस्टर्न कमांड्स के हिस्से शामिल होंगे। इसके अलावा एयर फोर्स के जरूरी स्क्वाड्रन्स भी इसमें जोड़े जाएंगे। यानी अगर किसी भी तरह के तनाव की स्थिति बनती है, तो आर्मी और एयर फोर्स मिलकर तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे।

इस कमांड का नेतृत्व भी तीन-स्टार जनरल करेगा, लेकिन यहां आर्मी अफसर को कमांड सौंपी जाा सकती है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ जमीन पर टकराव की संभावना ज्यादा रहती है।

इस थिएटर का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह की पारंपरिक लड़ाई या “कोल्ड स्टार्ट” जैसे ऑपरेशन में तेजी से और प्रभावी कार्रवाई की जा सके। अभी तक अलग-अलग कमांड्स के चलते फैसलों में देरी हो सकती थी, लेकिन अब एक ही कमांडर के पास पूरा कंट्रोल होगा, जिससे प्रतिक्रिया का समय कम हो जाएगा। (India Theatre Commands)

मैरिटाइम थिएटर कमांड: नेवी की समुद्र में बढ़ेगी ताकत

तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण थिएटर कमांड होगा मैरिटाइम थिएटर कमांड, जो पूरी तरह समुद्री क्षेत्र पर फोकस करेगा। इसमें हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी जैसे इलाके शामिल होंगे। इसके साथ ही इंडियन ओशन रीजन में चीन की बढ़ती मौजूदगी पर भी नजर रखी जाएगी।

इसके हेडक्वार्टर के लिए तिरुवनंतपुरम, कारवार या कोयंबटूर में से किसी एक जगह को चुना जा सकता है। हालांकि तिरुवनंतपुरम की लोकेशन समुद्री ऑपरेशंस के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है।

इस थिएटर में नेवी की ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड्स के सभी एसेट्स शामिल होंगे। इसके अलावा एयर फोर्स के कुछ समुद्री ऑपरेशन से जुड़े स्क्वाड्रन्स और आर्मी की कोस्टल यूनिट्स भी इसमें शामिल होंगी। यानी समुद्र से जुड़े हर ऑपरेशन को एक ही कमांड के तहत लाया जाएगा।

इस कमांड का नेतृत्व नेवी के फ्लैग ऑफिसर यानी एडमिरल रैंक के अधिकारी के पास होगा। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि समुद्री ऑपरेशंस में नेवी की भूमिका सबसे ज्यादा होती है।

इस थिएटर का मुख्य उद्देश्य समुद्री रास्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से लेकर मलक्का स्ट्रेट तक, जहां से दुनिया का बड़ा व्यापार गुजरता है। इसके अलावा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत को संतुलित करना भी इसका अहम लक्ष्य होगा। (India Theatre Commands)

कुल 197 जॉइंटनेस इनिशिएटिव्स तय

आज के समय में सेना की ताकत सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि तीनों सेनाएं – आर्मी, नेवी और एयर फोर्स – मिलकर कितनी अच्छी तरह काम करती हैं। इसी को “जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन” कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है तीनों सेनाओं का एक टीम की तरह काम करना, ताकि युद्ध के समय पूरी ताकत एक साथ इस्तेमाल हो सके।

सरकार और रक्षा मंत्रालय का मानना है कि यही जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन भविष्य के युद्धों में जीत की सबसे बड़ी कुंजी है। इसी सोच के तहत कुल 197 अलग-अलग पहलें यानी इनिशिएटिव्स तय किए गए हैं। ये पहलें कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फैली हुई हैं, जैसे ऑपरेशन और इंटेलिजेंस, नई सैन्य क्षमता का विकास, कम्युनिकेशन और आईटी सिस्टम, लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस, मानव संसाधन, प्रशासन और कानूनी व्यवस्था।

इन सभी क्षेत्रों में सुधार करके यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि तीनों सेनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर काम करें।

इन 197 पहलों को अलग-अलग चरणों में लागू किया जा रहा है। पहले चरण में वे काम शामिल थे, जो थिएटर कमांड्स की घोषणा से पहले पूरे किए जाने थे। इस चरण में कुल 50 काम तय किए गए थे, जिनमें से 29 पूरे हो चुके हैं।

दूसरे चरण में थिएटर कमांड्स की घोषणा के बाद से लेकर उनके पूरी तरह काम शुरू करने तक पूरे किए जाएंगे। इस चरण में 62 काम तय किए गए हैं, जिनमें से 12 पर काम पूरा हो चुका है और बाकी पर तेजी से काम चल रहा है।

तीसरा चरण वह है, जो थिएटर कमांड्स के पूरी तरह ऑपरेशनल होने के बाद भी जारी रहेगा। इसमें 51 काम शामिल हैं, जिनमें से 7 पूरे किए जा चुके हैं। यानी यह प्रक्रिया सिर्फ एक बार की नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाला सुधार है।

अगर इन तीनों चरणों को मिलाकर देखें, तो कुल 163 काम इस मुख्य सेट में आते हैं, जिनमें से अब तक 48 पूरे हो चुके हैं। इसके अलावा 34 ऐसे काम भी हैं, जो थिएटर कमांड्स बनने से सीधे जुड़े नहीं हैं, लेकिन सेना की जॉइंटनेस बढ़ाने के लिए जरूरी हैं। इनमें से 10 काम पूरे हो चुके हैं। (India Theatre Commands)

क्या हैं फोर्स एप्लीकेशन और फोर्स जनरेशन

थिएटर कमांड बनने के बाद अब सर्विस चीफ यानी आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के प्रमुख “फोर्स जनरेशन” पर ध्यान देंगे। यानी भर्ती, ट्रेनिंग, उपकरण और तैयारी उनकी जिम्मेदारी होगी। फोर्स जनरेशन यानी सेना को तैयार करना – भर्ती, ट्रेनिंग, हथियार आदि – यह काम सर्विस चीफ्स करेंगे।

जबकि फोर्स एप्लीकेशन यानी असली ऑपरेशन की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। इससे कमांडर पूरी तरह युद्ध और ऑपरेशन पर ध्यान दे पाएगा।

सथ ही, रणनीतिक और ऑपरेशनल प्लानिंग को नए तरीके से व्यवस्थित किया जाएगा। अब पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी एक ही कमांडर के पास होगी। इससे “यूनिटी ऑफ कमांड” बनेगी। पहले अलग-अलग कमांड होने की वजह से कई बार तालमेल की समस्या आती थी, लेकिन अब यह समस्या कम हो जाएगी। एक ही कमांडर पूरे ऑपरेशन को प्लान करेगा और तीनों सेनाएं मिलकर काम करेंगी। (India Theatre Commands)

अगले तीन महीनों में कई बड़े बदलाव

अगले तीन महीनों में भारतीय सेना के शीर्ष स्तर पर कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इसकी शुरुआत नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस की नियुक्ति से होगी। मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान को पिछले साल सितंबर में एक्सटेंशन दिया गया था, जो 30 मई तक है। यानी मई के अंत तक नए सीडीएस की नियुक्ति तय मानी जा रही है।

सरकार अप्रैल के अंत तक इस पर फैसला ले सकती है। रक्षा मंत्रालय के 2022 के नियमों के मुताबिक, सीडीएस पद के लिए वही अधिकारी चुने जा सकते हैं जो तीन-स्टार रैंक के हों, यानी लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल। ये अधिकारी या तो सेवा में हों या रिटायर हो चुके हों, लेकिन उनकी उम्र नियुक्ति के समय 62 साल से कम होनी चाहिए। (India Theatre Commands)

इस नियम में 2019 के पुराने नियम में बदलाव करके यह दायरा बढ़ाया गया था, जिसके बाद जनरल अनिल चौहान को भी 2022 में सीडीएस बनाया गया था। इसका मतलब यह है कि सरकार के पास काफी बड़ा विकल्प है और 150 से ज्यादा तीन-स्टार अधिकारी इस पद के लिए संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं।

हालांकि अगर सरकार चाहे, तो वह इस नियम से आगे जाकर मौजूदा सेना प्रमुखों में से भी किसी को सीडीएस बना सकती है। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि अगला सीडीएस कौन होगा।

सीडीएस के अलावा आर्मी और नेवी में भी बड़े बदलाव होने वाले हैं। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी 31 मई को रिटायर हो रहे हैं, जबकि थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 30 जून को रिटायर होंगे। ऐसे में इन दोनों पदों पर भी नए चेहरों की नियुक्ति होगी।

अप्रैल की शुरुआत में ही आर्मी के शीर्ष अधिकारियों में फेरबदल की योजना बनाई जा चुकी है। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ दिल्ली में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनके स्थान पर लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को साउदर्न आर्मी कमांड का नया कमांडर बनाया जाएगा।

वहीं, मौजूदा वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल पीपी सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कटियार की जगह वेस्टर्न कमांड की कमान संभालेंगे, जो 31 मार्च को रिटायर हो रहे हैं। इसी दिन ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी भी रिटायर होंगे और उनकी जगह लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन को जिम्मेदारी दी जाएगी, जो अभी क्वार्टर मास्टर जनरल के पद पर हैं।

यह सारे बदलाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि मौजूदा कमांड सिस्टम जारी रहता है या नहीं। अगर जल्द ही इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स लागू हो जाते हैं, तो सेना के पूरे ढांचे में बड़े स्तर पर बदलाव, प्रमोशन और नई नियुक्तियां देखने को मिल सकती हैं। (India Theatre Commands)

रक्षा मंत्री बोले- जल्द खुलेंगे 100 नए सैनिक स्कूल, युवाओं को समझाया VUCA का नया मतलब

Raksha Mantri Rajnath Singh on Sainik Schools

Sainik Schools: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि आज के समय में युद्ध सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा हो चुका है। अब किसी देश की सुरक्षा सिर्फ सेना पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इकोनॉमिक, डिजिटल, एनर्जी और फूड सिक्योरिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने यह बात उत्तराखंड के सैनिक स्कूल घोराखाल के 60वें स्थापना दिवस (डायमंड जुबली) कार्यक्रम को वर्चुअल तरीके से संबोधित करते हुए कही। इस दौरान उन्होंने कहा कि देश को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ एक मजबूत सेना ही नहीं, बल्कि जागरूक और तैयार नागरिक भी जरूरी हैं।

Sainik Schools: बदल चुका है युद्ध का तरीका

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के समय में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। पहले युद्ध जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित होते थे, लेकिन अब साइबर, स्पेस और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर भी इसका हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने बताया कि अब दुश्मन किसी देश को सीधे हमला किए बिना भी कमजोर कर सकता है। जैसे साइबर अटैक के जरिए सिस्टम ठप करना, इकोनॉमिक दबाव बनाना या गलत जानकारी फैलाकर देश को अस्थिर करना। इसी वजह से उन्होंने हर नागरिक को सतर्क और तैयार रहने की जरूरत पर जोर दिया।

देश के नागरिकों की भूमिका बेहद अहम

राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार लगातार सेना को आधुनिक हथियार और नई टेक्नोलॉजी से लैस कर रही है। लेकिन इसके साथ-साथ देश के नागरिकों की भूमिका भी बहुत अहम है।

उन्होंने कहा कि अगर देश के लोग मानसिक रूप से मजबूत और अनुशासित होंगे, तभी वे मुश्किल समय में देश के साथ खड़े हो पाएंगे। खासकर युवाओं को इस दिशा में तैयार होने की जरूरत है।

युवाओं के लिए VUCA का नया मतलब

रक्षा मंत्री ने युवाओं को एक खास संदेश भी दिया। उन्होंने VUCA शब्द का जिक्र किया, जिसका मतलब होता है – वोलाटाइल, अनसर्टेन, कॉम्प्लेक्स और एम्बिग्युअस।

लेकिन उन्होंने युवाओं से कहा कि वे इसका नया मतलब अपनाएं – विजन, अंडरस्टैंडिंग, करेज और अडैप्टेबिलिटी।

उन्होंने समझाया कि आज के समय में युवाओं को साफ सोच, सही समझ, हिम्मत और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। इससे वे किसी भी चुनौती का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

देशभर में बढ़ रहे सैनिक स्कूल

राजनाथ सिंह ने बताया कि सरकार देश में युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए तैयार करने के लिए कई कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत 100 नए सैनिक स्कूल खोलने का फैसला किया है। इससे ज्यादा से ज्यादा युवाओं को अनुशासन और देश सेवा की भावना सिखाई जा सकेगी।

इसके अलावा एनसीसी यानी नेशनल कैडेट कॉर्प्स में भी सीटों की संख्या बढ़ाई गई है। पहले जहां 17 लाख कैडेट्स की क्षमता थी, अब इसे बढ़ाकर 20 लाख कर दिया गया है।

लड़कियों के लिए नया मौका

रक्षा मंत्री ने सैनिक स्कूलों में लड़कियों के एडमिशन को एक ऐतिहासिक फैसला बताया। उन्होंने कहा कि इससे देश की ‘नारी शक्ति’ और मजबूत होगी। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में यही लड़कियां देश के अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ी भूमिका निभाएंगी और दूसरों के लिए प्रेरणा बनेंगी।

अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने सैनिक स्कूल घोराखाल की उपलब्धियों की भी सराहना की। उन्होंने बताया कि इस स्कूल ने पिछले कई दशकों में देश को बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारी दिए हैं। अब तक यहां से 800 से ज्यादा छात्र नेशनल डिफेंस एकेडमी में पहुंचे हैं, जबकि 2000 से ज्यादा छात्र अलग-अलग परीक्षाओं के जरिए सशस्त्र बलों में शामिल हुए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह संस्थान आगे भी देश के लिए बेहतर और जिम्मेदार नेता तैयार करता रहेगा।

INS Taragiri: ब्रह्मोस मिसाइल से लैस नया वॉरशिप भारतीय नौसेना में जल्द होगा कमीशन, प्रोजेक्ट 17A का है चौथा फ्रिगेट

INS Taragiri Commissioning

INS Taragiri: भारतीय नौसेना को जल्द ही नया वारशिप मिलने वाला है। देश में बना आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी (F41) जल्द ही नौसेना के बेड़े में शामिल होने वाला है। इस युद्धपोत का कमीशनिंग समारोह 3 अप्रैल को आयोजित किया जाएगा, जिसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहेंगे।

आईएनएस तारागिरी प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाए जा रहे आधुनिक फ्रिगेट्स की सीरीज का हिस्सा है। यह इस प्रोजेक्ट का चौथा युद्धपोत है, जिसे विशेष रूप से आधुनिक समुद्री युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। हालांकि रक्षा समाचार ने 14 मार्च को ही इस बारे में पहले ही बता दिया था…”INS Taragiri: भारत का नया स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट अप्रैल में होगा नौसेना में शामिल, ब्रह्मोस-बराक से है लैस

INS Taragiri: क्या है प्रोजेक्ट 17ए और क्यों है अहम

प्रोजेक्ट 17ए भारतीय नौसेना का एक बड़ा और महत्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसके तहत नीलगिरी क्लास के स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इन युद्धपोतों को नई तकनीक, बेहतर डिजाइन और आधुनिक हथियारों से लैस किया गया है।

इस सीरीज का पहला जहाज आईएनएस नीलगिरी पहले ही नौसेना में शामिल हो चुका है। इसके बाद आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस हिमगिरि भी सेवा में आ चुके हैं। अब आईएनएस तारागिरी इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए नौसेना की ताकत में नया इजाफा करेगा।

यह प्रोजेक्ट इसलिए भी खास है क्योंकि इसका उद्देश्य भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है और आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करना है। (INS Taragiri)

स्वदेशी तकनीक से बना है INS Taragiri

आईएनएस तारागिरी को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) में तैयार किया गया है। यह जहाज करीब 6,670 टन वजनी है और इसमें 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी यानी भारत में बनी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

इस युद्धपोत के निर्माण में देश की अपनी तकनीक और उद्योगों की बड़ी भूमिका रही है। इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा एमएसएमई यानी छोटे और मध्यम उद्योगों ने भी योगदान दिया है, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला है।

यह जहाज ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का एक मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। (INS Taragiri)

स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए मुश्किल

आईएनएस तारागिरी की सबसे बड़ी खासियत इसका स्टेल्थ डिजाइन है। स्टेल्थ का मतलब होता है ऐसा डिजाइन, जिससे दुश्मन के रडार और सेंसर इसे आसानी से पकड़ न सकें।

इस जहाज का बाहरी ढांचा बहुत स्मूद और स्लीक बनाया गया है। इसके अलावा इसमें रडार क्रॉस सेक्शन कम करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इससे यह जहाज दुश्मन की नजर से काफी हद तक छिपा रह सकता है।

इसके साथ ही इसमें कम इंफ्रारेड सिग्नेचर यानी कम गर्मी छोड़ने वाली तकनीक भी दी गई है, जिससे इसे ट्रैक करना और भी मुश्किल हो जाता है। युद्ध के समय यह क्षमता बेहद अहम होती है। (INS Taragiri)

आधुनिक हथियारों से लैस

आईएनएस तारागिरी को आधुनिक और शक्तिशाली हथियारों से लैस किया गया है। इसमें सुपरसोनिक सर्फेस-टू-सर्फेस मिसाइल यानी ब्रह्मोस सिस्टम लगाया गया है, जो दुश्मन के जहाजों और जमीन पर मौजूद ठिकानों को तेजी से निशाना बना सकता है।

इसके अलावा इसमें मीडियम रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम भी है, जो हवाई खतरों जैसे फाइटर जेट या मिसाइल से जहाज की रक्षा करता है। जहाज में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम भी लगाया गया है, जिससे यह समुद्र के अंदर छिपी पनडुब्बियों को खोजकर उन पर हमला कर सकता है।

इसके साथ ही इसमें आधुनिक रडार, सेंसर और कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है। यह सिस्टम सभी हथियारों और सेंसर को एक साथ जोड़ता है, जिससे जहाज का क्रू तेजी से फैसले ले सकता है और तुरंत कार्रवाई कर सकता है। (INS Taragiri)

तेज रफ्तार और लंबी दूरी की क्षमता

आईएनएस तारागिरी में सीओडीओजी (कंबाइंड डीजल ऑर गैस) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इसका मतलब यह है कि जहाज जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टरबाइन दोनों का इस्तेमाल कर सकता है।

इससे जहाज को हाई स्पीड और लंबी दूरी तक चलने की क्षमता मिलती है। यानी यह युद्धपोत तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है।

निर्माण में इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक

इस युद्धपोत के निर्माण में इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें जहाज के अलग-अलग हिस्सों को पहले अलग से तैयार किया जाता है और बाद में उन्हें जोड़कर पूरा जहाज बनाया जाता है।

इस तकनीक से निर्माण में कम समय लगता है और गुणवत्ता भी बेहतर रहती है। आईएनएस तारागिरी को बनाने में पहले के मुकाबले कम समय लगा, जो भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दिखाता है।

कई तरह के मिशन के लिए तैयार

आईएनएस तारागिरी सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं बना है, बल्कि यह कई तरह के मिशन को पूरा करने में सक्षम है। यह जहाज हाई इंटेंसिटी कॉम्बैट यानी बड़े युद्ध के अलावा ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ (एचएडीआर) जैसे कामों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

मतलब, यह जहाज जरूरत पड़ने पर आपदा के समय लोगों की मदद करने, राहत सामग्री पहुंचाने और बचाव कार्यों में भी उपयोगी साबित होगा।

पूर्वी नौसेना कमान में होगी तैनाती

आईएनएस तारागिरी को भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान में तैनात किया जाएगा, जिसका मुख्यालय विशाखापत्तनम में है। यह कमान हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। इस युद्धपोत के शामिल होने से पूर्वी फ्लीट की ताकत और बढ़ेगी और समुद्री क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा बेहतर होगी।

आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होने से भारत की समुद्री ताकत को तेजी से मजबूती मिलेगी। यह जहाज न सिर्फ तकनीकी रूप से आधुनिक है, बल्कि यह देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को भी दिखाता है।

भारत अब ऐसे युद्धपोत बना रहा है, जो पूरी तरह देश में डिजाइन किए गए हैं, देश में बनाए गए हैं और देश के ही सैनिकों द्वारा संचालित किए जाएंगे। यह भारतीय नौसेना को और ज्यादा मजबूत, तैयार और आत्मनिर्भर बनाता है। (INS Taragiri)

4000 किमी दूर डिएगो गार्सिया पर ईरानी मिसाइल अटैक से चौंकी दुनिया, क्या इसमें है चीन का हाथ?

Iran Missile Range Diego Garcia

Iran Missile Range Diego Garcia: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच हिंद महासागर के बीच स्थित एक छोटे से द्वीप पर ईरान ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी दुनिया के रक्षा समीकरण बदल दिए। ब्रिटेन द्वारा अमेरिका को डिएगो गार्सिया बेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने इस सैन्य ठिकाने को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल दाग दीं।

हालांकि यह हमला भले ही सफल नहीं रहा, लेकिन इससे एक बड़ा संदेश दुनिया को मिल गया कि अब ईरान की मिसाइल क्षमता पहले से कहीं ज्यादा दूर तक पहुंच चुकी है।

Iran Missile Range Diego Garcia: क्या हुआ डिएगो गार्सिया में

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने दो बैलिस्टिक मिसाइलें डिएगो गार्सिया की ओर दागीं। यह बेस ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर हिंद महासागर में चागोस द्वीपसमूह में स्थित है।

हालांकि एक मिसाइल बीच रास्ते में ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत ने रोकने की कोशिश की। यह साफ नहीं हो पाया कि इंटरसेप्शन सफल रहा या नहीं, लेकिन इतना जरूर तय है कि ईरान ने इतनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता दिखा दी। यह घटना इसलिए भी अहम है क्योंकि ईरान पहले दावा करता रहा है कि उसकी मिसाइलों की अधिकतम रेंज करीब 2000 किलोमीटर है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ईरान ने असली ताकत छिपाई थी?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कुछ दिन पहले कहा था कि देश ने जानबूझकर अपनी मिसाइल रेंज को सीमित रखा है। लेकिन इस हमले ने उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह साफ हो गया है कि ईरान की मिसाइलें 4000 किलोमीटर तक पहुंच सकती हैं। इसका मतलब है कि सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई हिस्से भी इस रेंज में आ जाते हैं। इससे दुनिया भर के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संस्थानों के लिए खतरा बढ़ गया है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ब्रिटेन के फैसले से बढ़ा तनाव

यह पूरा मामला फरवरी महीने से शुरू हुआ। उस समय ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने दो अहम सैन्य ठिकानों, आरएएफ फेयरफोर्ड और डियागो गार्सिया, का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय कानून बताई गई। सरकार के कानूनी सलाहकारों ने कहा था कि अगर बिना मजबूत कानूनी आधार के किसी हमले में शामिल हुआ जाता है, तो यह नियमों के खिलाफ हो सकता है। इसी वजह से प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने खुद इस अनुरोध को ठुकरा दिया। (Iran Missile Range Diego Garcia)

इस फैसले के तुरंत बाद अमेरिका की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ब्रिटेन को डियागो गार्सिया जैसे महत्वपूर्ण बेस पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहिए। उन्होंने यह भी इशारा किया कि चागोस द्वीपों को मॉरिशस को सौंपने का जो समझौता चल रहा था, वह भी इस फैसले से प्रभावित हो सकता है। ट्रंप ने इसे कमजोरी के रूप में पेश किया और कहा कि ऐसे समय में, खासकर चीन जैसे देश के सामने, यह सही संकेत नहीं है।

जिसके बाद हालात तेजी से बदले। करीब दस दिन बाद, यानी मार्च की शुरुआत में, ब्रिटेन ने अपना रुख बदलते हुए प्रधानमंत्री स्टार्मर ने एक आधिकारिक बयान जारी कर अमेरिका को इन बेस के इस्तेमाल की अनुमति दे दी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह अनुमति सिर्फ सीमित और रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए खासकर ईरान के मिसाइल लॉन्च साइट और उनके स्टोरेज ठिकानों को निशाना बनाने के लिए है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

इसी दौरान हालात और ज्यादा गंभीर हो गए। उसी दिन ईरान ने बहरीन में मौजूद एक ब्रिटिश सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया। इस हमले में ब्रिटिश सैनिक बाल-बाल बच गए, लेकिन खतरा साफ दिखने लगा था। इसके अलावा कतर के ऊपर एक ईरानी ड्रोन को ब्रिटेन के आरएएफ टाइफून लड़ाकू विमान ने मार गिराया।

इन सब घटनाओं के बीच एक और बड़ा दबाव था, जो चागोस द्वीपों से जुड़ा था। यह सौदा करीब 35 अरब पाउंड का था और इस पर अमेरिका का भी असर था। ऐसे में ब्रिटेन के सामने सुरक्षा, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का दबाव एक साथ आ गया। (Iran Missile Range Diego Garcia)

अमेरिकी ऑपरेशन पर पड़ा था असर 

ब्रिटेन की अनुमति न मिलने की वजह से अमेरिका को पहले लंबी दूरी से ऑपरेशन करना पड़ा था। अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स को अमेरिका से उड़ान भरकर 36 घंटे का मिशन करना पड़ा था। अब जब ब्रिटेन ने अपने बेस खोल दिए हैं, तो ऑपरेशन आसान हो गया है। अब बी-52 और बी-1 जैसे बॉम्बर्स कम समय में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं और बार-बार ऑपरेशन कर सकते हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ईरान ने दी कड़ी प्रतिक्रिया

ईरान ने इस फैसले के तुरंत बाद कड़ी प्रतिक्रिया दी। ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिटेन इस कदम से अपने नागरिकों को खतरे में डाल रहा है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि ईरान आत्मरक्षा का अधिकार इस्तेमाल करेगा। कुछ ही घंटों बाद मिसाइलें दाग दी गईं। यानी चेतावनी और हमला लगभग एक ही समय में हुआ।

हालांकि इस घटनाक्रम ने अमेरिका और ब्रिटेन के बीच मतभेद भी उजागर कर दिए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि ब्रिटेन ने बहुत देर से अनुमति दी, जिससे ऑपरेशन में देरी हुई। उन्होंने यह भी कहा कि सहयोगी देशों को ऐसे मामलों में तुरंत फैसले लेने चाहिए।

दरअसल अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी देश तुरंत सैन्य समर्थन दें, जबकि ब्रिटेन अपने कानूनी और राजनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखता है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

Iran Missile Range Diego Garcia

क्यों इतन अहम है डिएगो गार्सिया बेस

डियागो गार्सिया सिर्फ एक छोटा सा द्वीप नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर में स्थित एक बेहद अहम और रणनीतिक सैन्य ठिकाना है। यह चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा हिस्सा है, जहां अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य बेस मौजूद है।

इस बेस की खासियत यह है कि यहां दुनिया के सबसे आधुनिक सैन्य संसाधन तैनात हैं। बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर जैसे अत्याधुनिक विमान, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां, गाइडेड मिसाइल से लैस युद्धपोत और खुफिया जानकारी जुटाने वाले इंटेलिजेंस सेंटर सभी एक ही जगह पर मौजूद हैं।

भौगोलिक रूप से भी यह जगह बेहद महत्वपूर्ण है। यह मालदीव से करीब 1600 किलोमीटर, श्रीलंका से लगभग 1900 किलोमीटर और भारत से करीब 1800 से 2000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसे में अगर कोई देश इस बेस तक पहुंचने की क्षमता दिखा देता है, तो इसका मतलब है कि पूरे क्षेत्र के कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकाने खतरे में आ सकते हैं।

इस बेस का इतिहास भी काफी पुराना और विवादों से जुड़ा रहा है। 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इस सैन्य ठिकाने को विकसित किया था। उस समय चागोस द्वीपसमूह के मूल निवासियों को यहां से हटाया गया था, ताकि इस जगह को पूरी तरह सैन्य उपयोग के लिए तैयार किया जा सके। तब से लेकर आज तक यह बेस अमेरिका के लिए हिंद महासागर में सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल हब बना हुआ है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

गल्फ वॉर से लेकर इराक युद्ध तक, कई बड़े सैन्य अभियानों में इसी बेस से बॉम्बर विमान उड़ान भरते रहे हैं। यह जगह अमेरिका के लिए एक लॉन्च पैड की तरह काम करती है, जहां से वह एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका तक अपनी सैन्य पहुंच बनाए रखता है।

हाल के घटनाक्रम के बाद इस बेस की अहमियत और बढ़ गई है। पहले अमेरिका को अपने बॉम्बर विमान मिसौरी से उड़ाकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, जिसमें करीब 36 घंटे का समय लगता था। लेकिन अब जब ब्रिटेन ने फेयरफोर्ड और डियागो गार्सिया जैसे बेस खोल दिए हैं, तो ऑपरेशन कहीं ज्यादा आसान हो गया है।

अब बमवर्षक विमान कम समय में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, मिशन पूरा कर सकते हैं और दोबारा हथियार भरकर फिर से उड़ान भर सकते हैं। इससे सैन्य कार्रवाई की गति और प्रभाव दोनों बढ़ जाते हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

मिसाइल की रेंज ने बदला पूरा समीकरण

ईरान लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसकी मिसाइलों की अधिकतम रेंज करीब 2000 किलोमीटर तक ही सीमित है। लेकिन हालिया हमले ने इस दावे को पूरी तरह बदल दिया है। अब जिस तरह से अटैक हुआ है, उससे साफ है कि ईरान की असली क्षमता इससे कहीं ज्यादा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले में इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था। इससे पहले ईरान के पास ज्यादातर शॉर्ट और मीडियम रेंज मिसाइलें थीं, जिनमें शाहब-3, एमाद और खोर्रमशहर शामिल हैं। इनकी रेंज लगभग 1300 से 3000 किलोमीटर के बीच मानी जाती है।

लेकिन पिछले कुछ सालों में ईरान ने स्पेस लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी पर भी काम किया है। इसी तकनीक की मदद से वह धीरे-धीरे लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

हाल ही में अमेरिका और इजरायल ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के तहत ईरान के कई मिसाइल ठिकानों, फैक्ट्रियों और स्टोरेज साइट्स पर बड़े हमले किए थे। इसके बावजूद ईरान इस तरह का लंबी दूरी का हमला करने में सफल रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि उसकी मिसाइल उत्पादन क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और वह अभी भी सक्रिय है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

हालांकि इस हमले में तकनीकी कमियां भी सामने आईं। एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को रोक दिया गया। इससे यह पता चलता है कि ईरान की मिसाइलों की सटीकता और भरोसेमंद प्रदर्शन अभी पूरी तरह मजबूत नहीं है।

इसका सीधा असर यह है कि अब खतरे का दायरा काफी बढ़ गया है। पहले जहां 2000 किलोमीटर तक का क्षेत्र ही खतरे में माना जाता था, अब यह सीमा करीब 4000 किलोमीटर तक पहुंच गई है।

इस नए दायरे में अब सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई हिस्से भी शामिल हो गए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरण पर बड़ा असर पड़ सकता है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

क्या चीन का है कोई रोल

इस पूरे मामले को लेकर कई लोग इसे सिर्फ ईरान का “मैसेज” बता रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ ईरान की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसके पीछे चीन की भूमिका भी हो सकती है। उनका मानना है कि यह कदम अमेरिका की सैन्य क्षमता और उसके मिसाइल डिफेंस सिस्टम को परखने के लिए उठाया गया।

20 मार्च को ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डियागो गार्सिया बेस की ओर दो मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल दागीं। इनमें से एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही खराब हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत ने एसएम-3 इंटरसेप्टर से रोकने की कोशिश की। हालांकि यह साफ नहीं हो पाया कि वह मिसाइल पूरी तरह नष्ट हुई या नहीं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले में खोर्रमशहर-4 मिसाइल का इस्तेमाल किया गया हो सकता है, जिसे खैबर के नाम से भी जाना जाता है। यह ईरान की एक एडवांस लिक्विड फ्यूल वाली मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी रेंज 4000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है और यह करीब 1500 किलोग्राम तक का वॉरहेड ले जा सकती है।

इस मिसाइल की खास बात यह है कि यह बहुत तेज गति से उड़ती है, जिसे हाइपरसोनिक रेंज कहा जाता है। इसकी गति मैक 8 से लेकर मैक 16 तक हो सकती है। इसमें एक खास तरह का सिस्टम होता है, जिसे मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल कहा जाता है। इसके जरिए मिसाइल अपने रास्ते में बदलाव कर सकती है, जिससे इसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है।

बताया जाता है कि यह मिसाइल कम समय में तैयारी के साथ मोबाइल लॉन्चर से करीब 15 मिनट के अंदर दागी जा सकती है। इसकी सटीकता भी काफी बेहतर मानी जाती है, जो करीब 30 से 100 मीटर तक की गलती के दायरे में रहती है।

माना जाता है कि यह मिसाइल उत्तर कोरिया की ह्वासोंग-10 तकनीक पर आधारित है, जो खुद सोवियत संघ की पुरानी आर-27 मिसाइल से प्रेरित थी। ईरान ने 2005 के आसपास इस तकनीक को हासिल किया और फिर इसमें अपने स्तर पर सुधार करते हुए खोर्रमशहर सीरीज तैयार की।

कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस मिसाइल के नए वर्जन खासकर डिजाइन और गाइडेंस सिस्टम में में चीन की तकनीकी मदद भी शामिल हो सकती है।

खास बात यह रही कि अमेरिका इस मिसाइल को पूरी तरह रोक नहीं पाया। इसे एक चिंता की बात माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम में कुछ कमियां हो सकती हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

एयरक्राफ्ट कैरियर के डेक पर पड़ा बोल्ट भी बन सकता है बड़ा खतरा! नहीं होगी FOD वॉक की जरूरत! AI करेगा मदद

AI FOD Detection System
AI FOD Detection System

AI FOD Detection System: कई बार एयरक्राफ्ट कैरियर के फ्लाइट डेक पर छोटी-छोटी चीजें जैसे स्क्रू, बोल्ट, धातु के टुकड़े या रबर के हिस्से पड़े रह जाते हैं। देखने में ये बेहद मामूली लगते हैं, लेकिन यही चीजें किसी बड़े हादसे की वजह बन सकती हैं। ऐसे ही खतरों से निपटने के लिए अब भारतीय नौसेना ने एक नई हाई-टेक तकनीक की ओर कदम बढ़ाया है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इन खतरनाक चीजों को तुरंत पहचान लिया जाएगा।

भारत की डिफेंस टेक कंपनी स्काईलार्क लैब्स ने हाल ही में भारतीय नौसेना की एयर ऑपरेशन क्षमता को और मजबूत बनाने के लिए नौसेना के एक एयरक्राफ्ट कैरियर पर फिक्स्ड फॉरेन ऑब्जेक्ट डेब्रिस यानी एफओडी डिटेक्शन सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया।

इस सिस्टम की खास बात यह है कि अब जहाज के फ्लाइट डेक पर छोटी-छोटी खतरनाक चीजों को पहचानने के लिए इंसानों को बार-बार चेक नहीं करना पड़ेगा। यह काम अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई खुद करेगा और वह भी लगातार, बिना रुके। (AI FOD Detection System)

AI FOD Detection System: क्या होता है एफओडी और क्यों है यह इतना खतरनाक

एफओडी का मतलब होता है फॉरेन ऑब्जेक्ट डेब्रिस। यानी ऐसी छोटी चीजें जो फ्लाइट डेक या रनवे पर पड़ी रह जाती हैं। इनमें स्क्रू, बोल्ट, धातु के टुकड़े, रबर के हिस्से या छोटे टूल्स शामिल हो सकते हैं।

ये चीजें देखने में छोटी लगती हैं, लेकिन इनसे बड़ा नुकसान हो सकता है। अगर ये जेट इंजन के अंदर चली जाएं तो इंजन खराब हो सकता है। इससे विमान को नुकसान पहुंच सकता है और लाखों-करोड़ों का नुकसान हो सकता है और उड़ान भी रद्द करनी पड़ सकती है। यहां तक कि पायलट की जान भी खतरे में पड़ सकती है। (AI FOD Detection System)

इसके अलावा इससे टायर फट सकते हैं या डेक पर काम कर रहे लोगों को चोट लग सकती है। एयरक्राफ्ट कैरियर पर यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि वहां समुद्र का नमक, तेज हवा, जहाज की हलचल और लगातार उड़ानें होती रहती हैं। (AI FOD Detection System)

पहले कैसे होता था चेकिंग का काम

अब तक इन खतरों से बचने के लिए सेलर्स को फ्लाइट ऑपरेशन से पहले डेक पर पैदल चलकर जांच करनी पड़ती थी। इसे फॉरेन ऑब्जेक्ट डेब्रिस वॉक कहा जाता है।

यह प्रक्रिया समय लेने वाली होती थी और इसमें जोखिम भी रहता था। अगर किसी छोटी चीज को नजरअंदाज कर दिया गया, तो बड़ा हादसा हो सकता था। (AI FOD Detection System)

अब AI करेगा पूरा काम

स्काईलार्क लैब्स के इस नये सिस्टम ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। इसमें डेक पर खास जगहों पर कैमरे लगाए जाते हैं, जो लगातार निगरानी करते रहते हैं।

जैसे ही कोई संदिग्ध चीज दिखाई देती है, सिस्टम तुरंत उसे पहचान लेता है और उसकी सटीक लोकेशन डेक पर काम कर रहे स्टाफ को भेज देता है। इससे तुरंत कार्रवाई की जा सकती है।

यह सिस्टम सिर्फ चीजों को पहचानता ही नहीं, बल्कि उन्हें अलग-अलग कैटेगरी में भी बांटता है, जैसे मेटल, रबर या अन्य सामग्री। इससे बाद में जांच और मेंटेनेंस प्लान बनाने में भी मदद मिलती है। (AI FOD Detection System)

कठिन परिस्थितियों में भी काम करने की क्षमता

एयरक्राफ्ट कैरियर का माहौल बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। यहां नमक का असर, तेज धूप, परछाइयां, जहाज की वाइब्रेशन और लगातार मूवमेंट रहता है। इस सिस्टम को खास तौर पर इन सभी परिस्थितियों में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह एआई सिस्टम धीरे-धीरे सीखता भी रहता है और अलग-अलग परिस्थितियों में खुद को बेहतर बनाता है। (AI FOD Detection System)

रियल टाइम में काम, बिना ऑपरेशन रोके

इस डेमोंस्ट्रेशन के दौरान सिस्टम ने रियल टाइम में डेक की निगरानी की और बिना किसी रुकावट के उड़ान संचालन चलता रहा। जैसे ही कोई डेब्रिस मिला, सिस्टम ने तुरंत उसकी जानकारी दी और टीम ने तुरंत उसे हटा दिया। इसके अलावा, इस सिस्टम की एक और खास बात यह है कि यह समय के साथ और ज्यादा स्मार्ट होता जाता है।

यह डेक पर बार-बार गिरने वाली चीजों के पैटर्न को पहचान सकता है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किस जगह पर ज्यादा खतरा है और किस वजह से डेब्रिस बन रहा है। इससे भविष्य में हादसों को रोकने के लिए पहले से तैयारी की जा सकती है। (AI FOD Detection System)

ऑटोमैटिक रिपोर्ट और आसान मैनेजमेंट

पहले जहां हर चीज की मैन्युअल रिपोर्ट बनानी पड़ती थी, अब यह सिस्टम खुद ही रिपोर्ट तैयार कर सकता है। इससे समय बचता है और ऑपरेशन टीम को सीधे काम की जानकारी मिलती है।

स्काईलार्क लैब्स के सीईओ अमरजीत सिंह ने कहा कि एयरक्राफ्ट कैरियर सबसे कठिन ऑपरेशन वाले वातावरण में से एक है। इस डेमोंस्ट्रेशन ने साबित किया है कि उनका सिस्टम ऐसे माहौल में भी लगातार निगरानी कर सकता है और सही समय पर सटीक जानकारी दे सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह सिस्टम सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं है। यह एयरफील्ड, एयरपोर्ट और अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। (AI FOD Detection System)

वहीं, इस तकनीक के आने से भारतीय नौसेना की सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। अब मैन्युअल जांच पर निर्भरता कम होगी और गलतियों की संभावना भी घटेगी। इसके साथ ही उड़ानों की गति भी बढ़ सकती है, क्योंकि हर बार लंबी जांच की जरूरत नहीं होगी।

पहले 2023-24 में इस तकनीक का मोबाइल वर्जन आईएनएस विक्रमादित्य पर टेस्ट किया जा चुका है और iDEX प्रोजेक्ट के तहत कंपनी ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर काम भी किया था। अब इसका फिक्स्ड वर्जन भी सफलतापूर्वक साबित हो गया है, जो जमीन पर बने एयरपोर्ट के साथ-साथ एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे समुद्री प्लेटफॉर्म पर भी आसानी से काम कर सकता है। यही वजह है कि अब इस तकनीक के सामने वैश्विक स्तर पर भी बड़े मौके खुल गए हैं और आने वाले समय में इसे अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों की नौसेनाओं के एयरक्राफ्ट कैरियर पर भी इस्तेमाल के लिए निर्यात किया जा सकता है। (AI FOD Detection System)

स्वदेशी फाइटर जेट इंजन को लेकर बड़ी खबर! कावेरी की देरी से लिया सबक, अब देश में बनेगा जेट इंजन टेस्टिंग सेंटर

National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility
National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility

National Aero Engine Test Complex: भारत अब जेट इंजन की टेस्टिंग को लेकर बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। देश जल्द ही अपना पहला पूरी तरह इंटीग्रेटेड एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद यह है कि अब जेट इंजन की टेस्टिंग के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

डीआरडीओ ने इसके लिए “नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स” बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। (National Aero Engine Test Complex)

National Aero Engine Test Complex: कहां बनेगा यह हाई-टेक कॉम्प्लेक्स

सूत्रों के अनुसार, यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स कर्नाटक के चल्लाकेरे या फिर नागार्जुन सागर के आसपास बनाया जा सकता है। यह जगह इसलिए चुनी जा रही है क्योंकि यहां बड़े स्तर पर तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना आसान है।

अब तक भारत को अपने जेट इंजन की कई अहम टेस्टिंग के लिए रूस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की परफॉरमेंस जांचने के लिए भारत के पास खुद की सुविधा नहीं थी।

इस वजह से समय ज्यादा लगता था, खर्च बढ़ जाता था और कई बार प्रोजेक्ट में देरी भी हो जाती थी। कावेरी इंजन प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है, जिसमें टेस्टिंग के लिए विदेश जाना पड़ा और समयसीमा पर असर पड़ा। (National Aero Engine Test Complex)

कैसा होगा यह नया टेस्ट कॉम्प्लेक्स

यह कॉम्प्लेक्स पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस होगा। इसमें जेट इंजन के हर हिस्से की टेस्टिंग के लिए अलग-अलग सुविधाएं होंगी। इसमें हाई अल्टीट्यूड टेस्ट सिस्टम होगा, जहां 10 से 15 किलोमीटर ऊंचाई जैसी स्थिति बनाई जा सकेगी।

इसके अलावा इसमें फैन, कंप्रेसर, कंबस्चर, टरबाइन और आफ्टरबर्नर जैसे सभी अहम हिस्सों की जांच के लिए अलग टेस्ट सेटअप होंगे। इससे इंजन के छोटे-छोटे पार्ट्स से लेकर पूरे इंजन तक की जांच एक ही जगह पर हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

टर्नकी आधार पर बनेगा पूरा सिस्टम

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को टर्नकी आधार पर बनाने की योजना बनाई है। इसका मतलब है कि जो कंपनी इस प्रोजेक्ट को लेगी, वही डिजाइन से लेकर निर्माण और इंस्टॉलेशन तक की पूरी जिम्मेदारी निभाएगी। इसमें सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ एडवांस टेस्टिंग सिस्टम भी शामिल होंगे। देश और विदेश की कंपनियों को इसमें हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। (National Aero Engine Test Complex)

किन कंपनियों को मौका मिलेगा

इस प्रोजेक्ट में देशी और विदेशी कंपनियां दोनों हिस्सा ले सकती हैं। इसमें ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स, टेस्ट फैसिलिटी बनाने वाली कंपनियां, जॉइंट वेंचर और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल हो सकते हैं।

फ्रांस की कंपनी सफरान और रूस की कंपनियां इस सेक्टर में पहले से काम कर रही हैं, इसलिए उनके भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसमें जीटीआरई के साथ 110-120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन के लिए संभावित साझेदारी भी शामिल है। (National Aero Engine Test Complex)

कावेरी इंजन की कहानी – क्यों जरूरी है यह कॉम्प्लेक्स

कावेरी इंजन की शुरुआत साल 1989 में हुई थी, जब जीटीआरई ने इसे डेवलप करना शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत अपने एलसीए तेजस फाइटर जेट के लिए खुद का इंजन तैयार कर सके। लेकिन कई सालों की मेहनत के बावजूद यह इंजन तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। यह करीब 72 से 81 किलो न्यूटन थ्रस्ट ही दे सका, जबकि तेजस को 83 से 85 किलो न्यूटन की जरूरत थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रही हाई टेम्परेचर मटेरियल, जैसे सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर अलॉय की कमी, साथ ही पर्याप्त टेस्टिंग सुविधाओं का न होना था।

इसी वजह से 2008 में डीआरडीओ ने तेजस प्रोजेक्ट से कावेरी इंजन को अलग कर दिया। हालांकि इसके बाद भी इस पर काम बंद नहीं हुआ। धीरे-धीरे इसमें सुधार किया गया और अब इसका ड्राई वर्जन, यानी बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन, करीब 48 से 52 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने लगा है। इस वर्जन को अब डीआरडीओ के घातक यूसीएवी यानी स्टेल्थ ड्रोन में इस्तेमाल करने की योजना है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में जाकर कावेरी इंजन के आफ्टरबर्नर का ट्रायल भी देखा था। (National Aero Engine Test Complex)

इसके साथ ही अब भारत एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे एएचटीसीई कहा जाता है। इसका लक्ष्य 110 से 130 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाला ताकतवर इंजन बनाना है। यह इंजन भारत के भविष्य के स्टेल्थ फाइटर जेट एएमसीए के लिए होगा। एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे, जिनकी कुल ताकत करीब 240 किलो न्यूटन होगी। अगर यह इंजन भारत खुद नहीं बना पाया, तो उसे विदेशी इंजनों जैसे जीई एफ414 या सफरान पर निर्भर रहना पड़ेगा। (National Aero Engine Test Complex)

सबसे बड़ी समस्या अब तक टेस्टिंग की रही है। भारत में हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की जांच करने के लिए जरूरी टेस्ट बेड नहीं है। इसी वजह से कावेरी इंजन के कई टेस्ट रूस के रूस के ग्रोमोव इंस्टीट्यूट और सीआईएएम संस्थानों में करवाने पड़े। वहां टेस्टिंग के लिए 9 से 10 महीने तक लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा यह प्रक्रिया काफी महंगी भी थी और संवेदनशील तकनीक विदेश भेजने का जोखिम भी बना रहता था।

यही वजह है कि अब नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई है, ताकि भारत अपने इंजन की पूरी टेस्टिंग देश में ही कर सके और भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी और निर्भरता दोनों कम हो सकें। (National Aero Engine Test Complex)

कितनी मुश्किल है टेस्टिंग?

जेट इंजन बनाना बेहद मुश्किल काम होता है। एक इंजन में करीब 25,000 छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं और हर पार्ट का सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। इसके अंदर तापमान 1500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में इंजन को सही तरीके से चलाना और उसकी जांच करना आसान नहीं होता।

जब इंजन को ऊंचाई पर उड़ान के लिए टेस्ट किया जाता है, तो वहां हवा बहुत पतली होती है। इससे इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा आफ्टरबर्नर में अतिरिक्त ताकत पाने के लिए ईंधन जलाया जाता है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट मिलता है, लेकिन इस प्रक्रिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होता है। (National Aero Engine Test Complex)

दुनिया में ऐसे टेस्ट करने के लिए बहुत कम देशों के पास पूरी सुविधाएं हैं। अमेरिका में नासा और जीई के पास सबसे बड़े और आधुनिक टेस्ट कॉम्प्लेक्स हैं। रूस और फ्रांस के पास भी ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं।

जीटीआरई में फिलहाल 130 किलो न्यूटन क्षमता वाला ट्विन इंजन टेस्ट बेड बनाया जा रहा है, लेकिन वह सिर्फ जमीन पर होने वाले टेस्ट के लिए है। वहीं नया नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जहां हर तरह की टेस्टिंग एक ही जगह पर की जा सकेगी।

नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स के बाद अगला कदम फ्लाइंग टेस्ट बेड होगा। वहीं भारतीय वायुसेना के आईएल-76 ट्रांसपोर्ट प्लेन इसे बनाने के लिए चुना जा सकता है। इससे उड़ान की टेस्टिंग भी देश में हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए जरूरी कदम

यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए के लिए बेस तैयार करेगा। भारत एएमसीए जैसे एडवांस फाइटर जेट्स पर काम कर रहा है, जिसके लिए हाई पावर इंजन की जरूरत होगी।

अगर इंजन की टेस्टिंग देश में ही होगी, तो इन प्रोजेक्ट्स को रफ्तार मिलेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (National Aero Engine Test Complex)

डीआरडीओ की तरफ से जारी की गई आरएफआई इस पूरे प्रोजेक्ट का पहला चरण है। इसके जरिए कंपनियों की क्षमता और तकनीकी योग्यता का आकलन किया जाएगा।

इसके बाद इस प्रोजेक्ट को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहां से मंजूरी मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

आरएफआई के जवाब जून के मध्य तक मांगे गए हैं। इसके बाद इंडस्ट्री के साथ चर्चा की जाएगी और प्रोजेक्ट की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। (National Aero Engine Test Complex)

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

आज के समय में जेट इंजन टेक्नोलॉजी किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानी जाती है। अगर किसी देश के पास अपनी इंजन टेस्टिंग सुविधा नहीं है, तो उसे हर बार विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इस नए कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इससे समय, लागत और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान हो जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा। इससे देश की कंपनियों को नई तकनीक पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। (National Aero Engine Test Complex)