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स्वदेशी फाइटर जेट इंजन को लेकर बड़ी खबर! कावेरी की देरी से लिया सबक, अब देश में बनेगा जेट इंजन टेस्टिंग सेंटर

National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility
National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility

National Aero Engine Test Complex: भारत अब जेट इंजन की टेस्टिंग को लेकर बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। देश जल्द ही अपना पहला पूरी तरह इंटीग्रेटेड एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद यह है कि अब जेट इंजन की टेस्टिंग के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

डीआरडीओ ने इसके लिए “नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स” बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। (National Aero Engine Test Complex)

National Aero Engine Test Complex: कहां बनेगा यह हाई-टेक कॉम्प्लेक्स

सूत्रों के अनुसार, यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स कर्नाटक के चल्लाकेरे या फिर नागार्जुन सागर के आसपास बनाया जा सकता है। यह जगह इसलिए चुनी जा रही है क्योंकि यहां बड़े स्तर पर तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना आसान है।

अब तक भारत को अपने जेट इंजन की कई अहम टेस्टिंग के लिए रूस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की परफॉरमेंस जांचने के लिए भारत के पास खुद की सुविधा नहीं थी।

इस वजह से समय ज्यादा लगता था, खर्च बढ़ जाता था और कई बार प्रोजेक्ट में देरी भी हो जाती थी। कावेरी इंजन प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है, जिसमें टेस्टिंग के लिए विदेश जाना पड़ा और समयसीमा पर असर पड़ा। (National Aero Engine Test Complex)

कैसा होगा यह नया टेस्ट कॉम्प्लेक्स

यह कॉम्प्लेक्स पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस होगा। इसमें जेट इंजन के हर हिस्से की टेस्टिंग के लिए अलग-अलग सुविधाएं होंगी। इसमें हाई अल्टीट्यूड टेस्ट सिस्टम होगा, जहां 10 से 15 किलोमीटर ऊंचाई जैसी स्थिति बनाई जा सकेगी।

इसके अलावा इसमें फैन, कंप्रेसर, कंबस्चर, टरबाइन और आफ्टरबर्नर जैसे सभी अहम हिस्सों की जांच के लिए अलग टेस्ट सेटअप होंगे। इससे इंजन के छोटे-छोटे पार्ट्स से लेकर पूरे इंजन तक की जांच एक ही जगह पर हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

टर्नकी आधार पर बनेगा पूरा सिस्टम

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को टर्नकी आधार पर बनाने की योजना बनाई है। इसका मतलब है कि जो कंपनी इस प्रोजेक्ट को लेगी, वही डिजाइन से लेकर निर्माण और इंस्टॉलेशन तक की पूरी जिम्मेदारी निभाएगी। इसमें सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ एडवांस टेस्टिंग सिस्टम भी शामिल होंगे। देश और विदेश की कंपनियों को इसमें हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। (National Aero Engine Test Complex)

किन कंपनियों को मौका मिलेगा

इस प्रोजेक्ट में देशी और विदेशी कंपनियां दोनों हिस्सा ले सकती हैं। इसमें ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स, टेस्ट फैसिलिटी बनाने वाली कंपनियां, जॉइंट वेंचर और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल हो सकते हैं।

फ्रांस की कंपनी सफरान और रूस की कंपनियां इस सेक्टर में पहले से काम कर रही हैं, इसलिए उनके भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसमें जीटीआरई के साथ 110-120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन के लिए संभावित साझेदारी भी शामिल है। (National Aero Engine Test Complex)

कावेरी इंजन की कहानी – क्यों जरूरी है यह कॉम्प्लेक्स

कावेरी इंजन की शुरुआत साल 1989 में हुई थी, जब जीटीआरई ने इसे डेवलप करना शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत अपने एलसीए तेजस फाइटर जेट के लिए खुद का इंजन तैयार कर सके। लेकिन कई सालों की मेहनत के बावजूद यह इंजन तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। यह करीब 72 से 81 किलो न्यूटन थ्रस्ट ही दे सका, जबकि तेजस को 83 से 85 किलो न्यूटन की जरूरत थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रही हाई टेम्परेचर मटेरियल, जैसे सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर अलॉय की कमी, साथ ही पर्याप्त टेस्टिंग सुविधाओं का न होना था।

इसी वजह से 2008 में डीआरडीओ ने तेजस प्रोजेक्ट से कावेरी इंजन को अलग कर दिया। हालांकि इसके बाद भी इस पर काम बंद नहीं हुआ। धीरे-धीरे इसमें सुधार किया गया और अब इसका ड्राई वर्जन, यानी बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन, करीब 48 से 52 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने लगा है। इस वर्जन को अब डीआरडीओ के घातक यूसीएवी यानी स्टेल्थ ड्रोन में इस्तेमाल करने की योजना है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में जाकर कावेरी इंजन के आफ्टरबर्नर का ट्रायल भी देखा था। (National Aero Engine Test Complex)

इसके साथ ही अब भारत एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे एएचटीसीई कहा जाता है। इसका लक्ष्य 110 से 130 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाला ताकतवर इंजन बनाना है। यह इंजन भारत के भविष्य के स्टेल्थ फाइटर जेट एएमसीए के लिए होगा। एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे, जिनकी कुल ताकत करीब 240 किलो न्यूटन होगी। अगर यह इंजन भारत खुद नहीं बना पाया, तो उसे विदेशी इंजनों जैसे जीई एफ414 या सफरान पर निर्भर रहना पड़ेगा। (National Aero Engine Test Complex)

सबसे बड़ी समस्या अब तक टेस्टिंग की रही है। भारत में हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की जांच करने के लिए जरूरी टेस्ट बेड नहीं है। इसी वजह से कावेरी इंजन के कई टेस्ट रूस के रूस के ग्रोमोव इंस्टीट्यूट और सीआईएएम संस्थानों में करवाने पड़े। वहां टेस्टिंग के लिए 9 से 10 महीने तक लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा यह प्रक्रिया काफी महंगी भी थी और संवेदनशील तकनीक विदेश भेजने का जोखिम भी बना रहता था।

यही वजह है कि अब नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई है, ताकि भारत अपने इंजन की पूरी टेस्टिंग देश में ही कर सके और भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी और निर्भरता दोनों कम हो सकें। (National Aero Engine Test Complex)

कितनी मुश्किल है टेस्टिंग?

जेट इंजन बनाना बेहद मुश्किल काम होता है। एक इंजन में करीब 25,000 छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं और हर पार्ट का सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। इसके अंदर तापमान 1500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में इंजन को सही तरीके से चलाना और उसकी जांच करना आसान नहीं होता।

जब इंजन को ऊंचाई पर उड़ान के लिए टेस्ट किया जाता है, तो वहां हवा बहुत पतली होती है। इससे इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा आफ्टरबर्नर में अतिरिक्त ताकत पाने के लिए ईंधन जलाया जाता है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट मिलता है, लेकिन इस प्रक्रिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होता है। (National Aero Engine Test Complex)

दुनिया में ऐसे टेस्ट करने के लिए बहुत कम देशों के पास पूरी सुविधाएं हैं। अमेरिका में नासा और जीई के पास सबसे बड़े और आधुनिक टेस्ट कॉम्प्लेक्स हैं। रूस और फ्रांस के पास भी ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं।

जीटीआरई में फिलहाल 130 किलो न्यूटन क्षमता वाला ट्विन इंजन टेस्ट बेड बनाया जा रहा है, लेकिन वह सिर्फ जमीन पर होने वाले टेस्ट के लिए है। वहीं नया नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जहां हर तरह की टेस्टिंग एक ही जगह पर की जा सकेगी।

नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स के बाद अगला कदम फ्लाइंग टेस्ट बेड होगा। वहीं भारतीय वायुसेना के आईएल-76 ट्रांसपोर्ट प्लेन इसे बनाने के लिए चुना जा सकता है। इससे उड़ान की टेस्टिंग भी देश में हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए जरूरी कदम

यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए के लिए बेस तैयार करेगा। भारत एएमसीए जैसे एडवांस फाइटर जेट्स पर काम कर रहा है, जिसके लिए हाई पावर इंजन की जरूरत होगी।

अगर इंजन की टेस्टिंग देश में ही होगी, तो इन प्रोजेक्ट्स को रफ्तार मिलेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (National Aero Engine Test Complex)

डीआरडीओ की तरफ से जारी की गई आरएफआई इस पूरे प्रोजेक्ट का पहला चरण है। इसके जरिए कंपनियों की क्षमता और तकनीकी योग्यता का आकलन किया जाएगा।

इसके बाद इस प्रोजेक्ट को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहां से मंजूरी मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

आरएफआई के जवाब जून के मध्य तक मांगे गए हैं। इसके बाद इंडस्ट्री के साथ चर्चा की जाएगी और प्रोजेक्ट की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। (National Aero Engine Test Complex)

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

आज के समय में जेट इंजन टेक्नोलॉजी किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानी जाती है। अगर किसी देश के पास अपनी इंजन टेस्टिंग सुविधा नहीं है, तो उसे हर बार विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इस नए कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इससे समय, लागत और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान हो जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा। इससे देश की कंपनियों को नई तकनीक पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। (National Aero Engine Test Complex)

भारतीय वायुसेना कर रही मॉडर्न वॉरफेयर को लेकर बड़ी तैयारी, खरीदेगी AI-बेस्ड हाई-टेक वॉरगेमिंग सिमुलेटर

Computer Aided Wargaming Simulator

Computer Aided Wargaming Simulator: भारतीय वायुसेना अब मॉडर्न वॉरफेयर को लेकर बड़ी तैयारी कर रही है। वायुसेना आधुनिक युद्ध की तैयारियों के लिए एक नया हाई-टेक सिस्टम लाने जा रही है। इसके लिए कंप्यूटर एडेड वारगेमिंग सिमुलेटर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस सिस्टम के जरिए वायुसैनिक बिना किसी असली हथियार के इस्तेमाल के, वर्चुअल तरीके से युद्ध की पूरी तैयारी कर सकेंगे।

इस सिस्टम के लिए सिकंदराबाद स्थित कॉलेज ऑफ एयर वारफेयर ने टेंडर जारी किया है। इसके तहत एक यूनिट खरीदी जाएगी। (Computer Aided Wargaming Simulator)

Computer Aided Wargaming Simulator: क्या होता है वारगेमिंग सिमुलेटर

यह एक आधुनिक डिजिटल ट्रेनिंग सिस्टम है, या सीधे शब्दों में कहें तो यह एक वर्चुअल युद्ध का मैदान है, जहां भारतीय वायुसेना के अधिकारी बिना कोई जोखिम उठाए, असली युद्ध के लिए खुद को तैयार करते हैं। इसमें कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और थ्रीडी ग्राफिक्स की मदद से युद्ध जैसी पूरी स्थिति को वर्चुअल तरीके से तैयार किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह “वारगेमिंग” का कंप्यूटर वाला रूप है, जिसमें बिना असली हथियार इस्तेमाल किए और बिना किसी नुकसान के, सैन्य अधिकारियों को युद्ध की योजना बनाना, फैसले लेना और ऑपरेशन चलाने की प्रैक्टिस कराई जाती है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

अगर इसे और सरल तरीके से समझें, तो यह एक एडवांस वीडियो गेम जैसा होता है, लेकिन इसमें सब कुछ असली युद्ध जैसा होता है। इसमें अधिकारी हवाई जहाज, मिसाइल, रडार, दुश्मन की गतिविधियां, साइबर अटैक और यहां तक कि स्पेस सैटेलाइट तक को स्क्रीन पर देख और कंट्रोल कर सकते हैं। कई अधिकारी एक साथ इसमें हिस्सा लेते हैं, जहां कोई एयर ऑपरेशन संभालता है तो कोई ग्राउंड या दूसरी जिम्मेदारी निभाता है। इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दुश्मन की तरफ से फैसले लेता है और मौसम, जमीन की स्थिति और इंटेलिजेंस इनपुट भी रियल टाइम में बदलते रहते हैं।

जब यह पूरा अभ्यास खत्म होता है, तो उसका पूरा रिव्यू किया जाता है। इसमें बताया जाता है कि कहां गलती हुई और आगे कैसे बेहतर रणनीति अपनाई जा सकती है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

हमलों और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस का अभ्यास

भारतीय वायुसेना में इस सिस्टम का इस्तेमाल अधिकारियों की ट्रेनिंग के लिए किया जाएगा। इसे सिकंदराबाद स्थित कॉलेज ऑफ एयर वारफेयर में लगाया जा रहा है। इसके जरिए एयर वॉर, जॉइंट ऑपरेशन, साइबर और स्पेस से जुड़े हमलों और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस का अभ्यास कराया जाएगा। अधिकारी इसमें नई रणनीतियों और नए हथियारों को भी सुरक्षित तरीके से टेस्ट कर सकते हैं।

इस सिमुलेटर की मदद से वास्तविक युद्ध जैसी स्थितियों को बार-बार दोहराया जा सकता है, जैसे सीमा पर तनाव या किसी बड़े ऑपरेशन की तैयारी। इसमें 10 अधिकारियों के लिए करीब 28 दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम भी शामिल है।

इस तरह के सिमुलेटर में हाई क्वालिटी थ्रीडी मैप, रियल टाइम सिमुलेशन, एआई आधारित दुश्मन का व्यवहार, मल्टी-प्लेयर सिस्टम और डेटा एनालिसिस जैसी सुविधाएं होती हैं। इसके साथ ही यह सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित होता है और सेना की सुरक्षा नीतियों के अनुसार डिजाइन किया जाता है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

इस सिमुलेटर में कई अधिकारी एक साथ जुड़कर अलग-अलग जिम्मेदारी निभाते हैं। कोई एयर ऑपरेशन संभालता है, तो कोई ग्राउंड सपोर्ट या नेवल सपोर्ट देखता है। सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी होता है, जो दुश्मन की तरफ से फैसले लेता है।

जब पूरा सिमुलेशन खत्म होता है, तो उसका विश्लेषण किया जाता है। इसमें यह बताया जाता है कि कहां गलती हुई और कैसे बेहतर रणनीति अपनाई जा सकती थी। इसे आफ्टर एक्शन रिव्यू कहा जाता है।

इस टेंडर के लिए बोली जमा करने की अंतिम तारीख 27 मार्च रखी गई है। इससे पहले 23 मार्च को प्री-बिड मीटिंग भी आयोजित की जाएगी। बिड में शामिल होने के लिए कंपनियों को कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। जैसे पिछले तीन साल में कम से कम 20 करोड़ रुपये का औसत टर्नओवर होना जरूरी है। हालांकि एमएसएमई और स्टार्टअप के लिए इसमें कुछ छूट दी गई है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

यह टेंडर मेक इन इंडिया नीति के तहत जारी किया गया है। इसमें कम से कम 50 फीसदी लोकल कंटेंट अनिवार्य रखा गया है। यानी इस सिस्टम का बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा। इससे भारतीय कंपनियों को डिफेंस सेक्टर में काम करने का मौका मिलेगा और देश को तकनीक के मामले में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी।

इस सिस्टम के लिए सुरक्षा के कड़े नियम भी तय किए गए हैं। इसमें मैलिशियस कोड नहीं होना चाहिए और सभी डेटा पूरी तरह सुरक्षित होना चाहिए। सिस्टम को आईपीवी6 रेडी भी होना जरूरी है। इसके अलावा, अगर हार्ड डिस्क खराब होती है, तो उसे वापस नहीं लिया जाएगा, ताकि कोई संवेदनशील डेटा बाहर न जा सके।

इस सिमुलेटर के साथ दो साल की वारंटी दी जाएगी। इसके बाद तीन साल तक मेंटेनेंस का विकल्प भी रहेगा। इसमें सिस्टम की देखभाल और तकनीकी सहायता शामिल होगी। (Computer Aided Wargaming Simulator)

क्यों जरूरी है यह सिस्टम

आज के समय में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर और स्पेस जैसे क्षेत्रों तक फैल चुकी है। ऐसे में इस तरह के सिमुलेटर पर अभ्यास करने से अधिकारियों की फैसले लेने की क्षमता बेहतर होती है, गलतियां कम होती हैं और कम खर्च में ज्यादा ट्रेनिंग मिलती है। इस सिस्टम के जरिए वायुसेना के अधिकारी अलग-अलग युद्ध स्थितियों का बार-बार अभ्यास कर सकते हैं और अपनी रणनीति को मजबूत बना सकते हैं। (Computer Aided Wargaming Simulator)

US रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, भारत-पाक नहीं चाहते युद्ध, फिर भी खतरा बरकरार! आतंकियों को लेकर दी चेतावनी

India Pakistan Relations
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India Pakistan Relations: अमेरिका की एक ताजा खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत और पाकिस्तान दोनों ही अब युद्ध नहीं चाहते हैं, लेकिन आतंकवादी गतिविधियां ऐसी परिस्थितियां बना रही हैं, जिससे कभी भी तनाव बढ़ सकता है।

यह रिपोर्ट अमेरिका के डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (डीएनआई) की सालाना थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट है, जिसे हाल ही में जारी किया गया। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि दोनों देश फिलहाल टकराव से बचना चाहते हैं, लेकिन जमीनी हालात पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

India Pakistan Relations: आतंकी हमले बन सकते हैं बड़े संकट की वजह

रिपोर्ट में खास तौर पर पिछले साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके में हुए आतंकी हमले का जिक्र किया गया है। इस हमले ने यह दिखाया कि कैसे एक आतंकी घटना दोनों देशों के बीच बड़े टकराव की वजह बन सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे हमले माहौल को अचानक बिगाड़ सकते हैं और दोनों देशों को आमने-सामने ला सकते हैं। यानी भले ही सरकारें युद्ध नहीं चाहतीं, लेकिन आतंकवादी संगठन हालात को खराब कर सकते हैं। (India Pakistan Relations)

परमाणु टकराव का खतरा अभी भी मौजूद

अमेरिकी रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में अभी भी परमाणु टकराव का खतरा बना हुआ है। दोनों देश परमाणु हथियार रखते हैं और पहले भी कई बार आमने-सामने आ चुके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जब भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। ऐसे में परमाणु युद्ध का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। (India Pakistan Relations)

पिछले तनाव में अमेरिका की भूमिका का जिक्र

रिपोर्ट में पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तनाव का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल से हालात को शांत करने में मदद मिली थी। जिसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस क्षेत्र के हालात पर नजर रखी जाती है और जरूरत पड़ने पर दखल दिया जाता है।

रिपोर्ट में दोनों देशों की सैन्य क्षमताओं पर भी बात की गई है। इसमें कहा गया है कि भारत नई और लंबी दूरी तक मार करने वाले परमाणु डिलीवरी सिस्टम पर काम कर रहा है।

वहीं पाकिस्तान भी अपने मिसाइल सिस्टम को लगातार बेहतर बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ऐसी मिसाइल तकनीक विकसित कर रहा है, जिससे वह दक्षिण एशिया से बाहर तक निशाना साध सके। (India Pakistan Relations)

आईसीबीएम को लेकर चिंता

अमेरिकी रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई है कि पाकिस्तान इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी आईसीबीएम बनाने की दिशा में काम कर सकता है। यह ऐसी मिसाइल होती है जिसकी रेंज 5,500 किलोमीटर से ज्यादा होती है। अगर ऐसा होता है, तो यह क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से भी अहम मामला बन सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ भारत और पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि कई अन्य देश भी अपने हथियारों को आधुनिक बना रहे हैं। चीन, उत्तर कोरिया, रूस और पाकिस्तान जैसे देश नई तकनीक पर काम कर रहे हैं।

इन देशों में ऐसे सिस्टम डेवलप किए जा रहे हैं, जिनकी रेंज ज्यादा है और जिन्हें पकड़ना या रोकना पहले से ज्यादा मुश्किल हो सकता है। (India Pakistan Relations)

नई तकनीक से बढ़ी चुनौती

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आजकल ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित हो रही है, जिसे डुअल-यूज टेक्नोलॉजी कहा जाता है। इसका मतलब है कि इनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों कामों में हो सकता है।

ऐसी तकनीक के कारण यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन-सी चीज सैन्य इस्तेमाल के लिए बनाई जा रही है और कौन-सी सामान्य इस्तेमाल के लिए। (India Pakistan Relations)

ड्रग्स और केमिकल सप्लाई पर भी चिंता

इस रिपोर्ट में अवैध ड्रग्स के कारोबार का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि चीन और भारत फेंटेनाइल जैसे खतरनाक ड्रग्स के प्रीकर्सर केमिकल और मशीनों के प्रमुख सोर्स बने हुए हैं।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत ने इस दिशा में अपनी कार्रवाई तेज की है। भारत ने काउंटर-नार्कोटिक्स यानी नशे के खिलाफ अभियान को मजबूत किया है। (India Pakistan Relations)

भारत-अमेरिका सहयोग बढ़ाने के संकेत

जनवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य भारतीय अधिकारियों ने अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई थी। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देश इस समस्या को मिलकर हल करना चाहते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई के बावजूद ड्रग तस्कर नए तरीके अपनाकर कानून से बच निकल रहे हैं। खासकर मेक्सिको के तस्कर गलत लेबल लगाकर या बिना नियंत्रण वाले केमिकल खरीदकर सिस्टम को चकमा दे रहे हैं। (India Pakistan Relations)

इजरायल ने नहीं दिया Iron Dome, तो अब यूक्रेन खुद बना रहा घातक एयर डिफेंस सिस्टम

Ukraine Air Defence Shield
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Ukraine Air Defence Shield: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन अब अपनी सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठा रहा है। यूक्रेन एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहा है, जो इजरायल के आयरन डोम की तरह काम करेगा। इस सिस्टम का मुख्य उद्देश्य दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और बमों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट करना है।

यूक्रेन को यह सिस्टम खुद डिजाइन करना पड़ रहा है, क्योंकि इजरायल ने अपना आयरन डोम सिस्टम साझा नहीं किया था। ऐसे में यूक्रेन ने अपनी जरूरतों के अनुसार एक नया सिस्टम बनाने का काम शुरू किया है।

Ukraine Air Defence Shield: बड़ी चुनौती- यूक्रेन का विशाल क्षेत्र

यूक्रेन के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका बड़ा क्षेत्रफल है। यूक्रेन का क्षेत्रफल इजरायल से लगभग 30 गुना बड़ा है। ऐसे में पूरे देश को कवर करने के लिए एक बहुत बड़े और मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क की जरूरत है।

यूक्रेन का कुल क्षेत्रफल लगभग 2,33,000 स्क्वायर माइल है, जिसमें से करीब 20 फीसदी हिस्सा अभी भी रूस के कब्जे में है। इस बड़े इलाके की सुरक्षा करना किसी भी देश के लिए आसान नहीं है। (Ukraine Air Defence Shield)

रूस के लगातार हमलों ने बढ़ाई जरूरत

यूक्रेन पर लगातार ड्रोन, मिसाइल और बम हमले हो रहे हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के अनुसार, सिर्फ एक हफ्ते में रूस ने 1,770 सुसाइड ड्रोन, 1,530 हवाई बम और 86 मिसाइलें दागीं।

इन लगातार हमलों के कारण यूक्रेन को अपनी एयर डिफेंस क्षमता को तेजी से बढ़ाना पड़ रहा है। रूस की रणनीति यह है कि वह एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइलें भेजकर यूक्रेन के डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड कर दे। (Ukraine Air Defence Shield)

ड्रोन आने से पहले ही नष्ट करने की तैयारी

यूक्रेन का नया एयर डिफेंस सिस्टम इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह खतरे को आने से पहले ही खत्म कर दे। यूक्रेन के अधिकारियों के अनुसार, यह सिस्टम केवल प्रतिक्रिया नहीं करेगा, बल्कि पहले से ही खतरे को पहचानकर उसे रोक देगा।

इस साल जनवरी में यूक्रेन ने इस मिशन के लिए पाव्लो येलिजारोव को एयर फोर्स का डिप्टी कमांडर नियुक्त किया था। उन्हें इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी गई है।

येलिजारोव ने कहा कि उनका लक्ष्य “एंटी-ड्रोन डोम” बनाना है, जो दुश्मन के ड्रोन को उनके लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट कर दे। (Ukraine Air Defence Shield)

कैसे काम करेगा यह एयर डिफेंस सिस्टम

यूक्रेन के इस सिस्टम में कई तकनीकें शामिल होंगे। जैसे इसमें रडार, एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और इंटरसेप्टर ड्रोन शामिल होंगे।

रडार सिस्टम दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों का पता लगाएगा। इसके बाद मिसाइल या इंटरसेप्टर ड्रोन उन्हें हवा में ही नष्ट करने की कोशिश करेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम दुश्मन के ड्रोन के कम्युनिकेशन और नेविगेशन को बाधित करेगा। (Ukraine Air Defence Shield)

इंटरसेप्टर ड्रोन बने सबसे प्रभावी हथियार

यूक्रेन ने इंटरसेप्टर ड्रोन पर खास जोर दिया है। ये छोटे ड्रोन दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही टकराकर या हमला करके गिरा सकते हैं। यूक्रेन के अनुसार, इंटरसेप्टर ड्रोन का इस्तेमाल करने वाली मोबाइल एंटी-एयर यूनिट्स करीब 50 प्रतिशत तक दुश्मन के ड्रोन को मार गिराने में सफल हो रही हैं। यह सफलता जमीन पर लगे एंटी-एयर सिस्टम और हेलीकॉप्टर से भी ज्यादा मानी जा रही है।

पश्चिमी हथियारों पर पूरी निर्भरता नहीं

यूक्रेन इस सिस्टम को पूरी तरह पश्चिमी देशों के महंगे हथियारों पर आधारित नहीं रखना चाहता। यूक्रेन के पास पैट्रियट और आईरिस-टी जैसे सिस्टम हैं, लेकिन ये महंगे हैं और पूरे देश को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए यूक्रेन अपने घरेलू संसाधनों और तकनीक के आधार पर यह सिस्टम बना रहा है, ताकि इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके। (Ukraine Air Defence Shield)

इजरायल से प्रेरणा, लेकिन सहयोग नहीं

यूक्रेन ने इस सिस्टम के लिए इजरायल के आयरन डोम से प्रेरणा ली है। लेकिन इजरायल ने 2022 में यूक्रेन को यह सिस्टम देने से इनकार कर दिया था। इजरायल का कहना था कि अगर यह तकनीक गलत हाथों में चली गई, तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। इजराइल ने यूक्रेन को आयरन डोम इसलिए नहीं दिया था, क्योंकि उसे डर था कि यह तकनीक ईरान के हाथ लग सकती है। हालांकि इजरायल ने यूक्रेन को एक अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूर दिया, जिससे हमलों की पहले जानकारी मिल सके।

इसके अलावा इजरायल रूस के साथ अपने संबंधों को भी ध्यान में रखकर फैसले लेता है। इजराइल में बड़ी संख्या में रूसी मूल के लोग रहते हैं, इसलिए वह रूस के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता।

लेकिन अब हालात यह हैं कि इजरायल खुद यूक्रेन की ड्रोन इंटरसेप्टर तकनीक में रुचि दिखा रहा है। (Ukraine Air Defence Shield)

यूक्रेन की तकनीक में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी

यूक्रेन द्वारा बनाए गए इंटरसेप्टर ड्रोन और अन्य तकनीकों में अब कई देश दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के देश इस तकनीक को ध्यान से देख रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब की कंपनी सऊदी अरामको भी इन ड्रोन को खरीदने पर विचार कर रही है। हालांकि यूक्रेन की कंपनी वाइल्ड हॉर्नेट्स, जो “स्टिंग” इंटरसेप्टर ड्रोन बनाती है, ने इन खबरों से इनकार किया है। कंपनी का कहना है कि वह अभी अपने देश की सेना की जरूरत भी पूरी नहीं कर पा रही है। (Ukraine Air Defence Shield)

युद्ध के बीच डेवलप हो रहा सिस्टम

यूक्रेन का यह एयर डिफेंस सिस्टम ऐसे समय में तैयार किया जा रहा है, जब देश लगातार युद्ध का सामना कर रहा है। यूक्रेन के पास न तो इजरायल जैसा तैयार सिस्टम है और न ही उसके पास कोई ब्लूप्रिंट है। इसके अलावा उसकी फ्रंटलाइन करीब 1,000 किलोमीटर लंबी है। इसके बावजूद यूक्रेन अपने अनुभव और युद्ध में सीखी गई तकनीकों के आधार पर यह सिस्टम बना रहा है। (Ukraine Air Defence Shield)

ड्रोन ने बदला युद्ध का स्वरूप

इस युद्ध ने यह भी दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो गई है। ड्रोन का इस्तेमाल न केवल हमले के लिए बल्कि निगरानी और इंटरसेप्शन के लिए भी किया जा रहा है। यूक्रेन अब ड्रोन को केवल हमला करने का हथियार नहीं, बल्कि रक्षा प्रणाली का हिस्सा बना रहा है। (Ukraine Air Defence Shield)

क्या इजरायल-ईरान जंग में कूदेगा पाकिस्तान? तेहरान को सऊदी की कड़ी चेतावनी के बाद क्यों छूटे शहबाज शरीफ के पसीने?

Saudi Arabia Iran Conflict
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Saudi Arabia Iran Conflict: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने इजरायल के साथ अपने उस पड़ोसियों पर भी जमकर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए, जिनकी सीमा ईरान से लगती थी। लेकिन इनमें से केवल पाकिस्तान ही अकेला एक ऐसा देश था, जिसकी सीमा ईरान से लगने के बावजूद ईरान ने उस पर कोई हमला नहीं किया। लेकिन अब पाकिस्तान का रोल नजर आने लगा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव जिस तरह से अब और गंभीर होता नजर आ रहा है। और सऊदी अरब ने साफ तौर पर कहा है कि अगर ईरान की ओर से हमले नहीं रुके, तो वह सैन्य जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इस बयान के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है और खासकर पाकिस्तान को लेकर कई देशों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

Saudi Arabia Iran Conflict: रियाद में हुई अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक

हाल ही में रियाद में ईरानी हमलों को लेकर अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में कतर, अजरबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्किये और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। मंत्रियों ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से ईरान के जानबूझकर किए गए हमलों की निंदा की, जिनमें रिहायशी इलाकों, सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें तेल की फैसिलिटी, डीसेलिनेशन प्लांट, एयरपोर्ट, रिहायशी इमारतें और डिप्लोमैटिक जगहों को निशाना बनाया गया। (Saudi Arabia Iran Conflict)

बैठक में मंत्रियों ने यूनाइटेड नेशंस चार्टर के आर्टिकल (51) के अनुसार देशों के खुद का बचाव करने के अधिकार पर भी जोर दिया। साथ ही मंत्रियों ने ईरान से तुरंत अपने हमले रोकने और तनाव को खत्म करने, इलाके में सुरक्षा और स्थिरता पाने और संकट को हल करने के तरीके के तौर पर डिप्लोमेसी को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले इंटरनेशनल कानून, इंटरनेशनल मानवीय कानून और अच्छे पड़ोसी के सिद्धांतों का सम्मान करने की जरूरत पर जोर दिया। (Saudi Arabia Iran Conflict)

रियाद बैठक के बाद सऊदी अरब का सख्त संदेश

इस बैठक के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने कहा कि वह इस तरह के हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करेगा। सऊदी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि ईरान अपने पड़ोसियों पर दबाव बनाने के लिए हमले कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब अब झुकने वाला नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो सैन्य कदम उठाए जा सकते हैं।

इसके अलावा, बैठक में यह भी कहा गया कि ईरान को अपने सहयोगी मिलिशिया ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करना चाहिए। आरोप लगाया गया कि ईरान इन ग्रुप्स को फंडिंग, हथियार और ट्रेनिंग देकर क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

समुद्री सुरक्षा पर भी जताई चिंता

बैठक में समुद्री सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदब जैसे अहम समुद्री रास्तों को लेकर कहा गया कि इन्हें बंद करने या बाधित करने की कोई भी कोशिश वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

पाकिस्तान की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान की भूमिका को लेकर हो रही है। दरअसल, पिछले साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इस नाटो स्टाइल समझौते में दोनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। इस डिफेंस पैक्ट के बाद पाकिस्तान को मध्य पूर्व में एक तरह से “सिक्योरिटी गारंटर” यानी सुरक्षा देने वाला देश माना जाने लगा है और इससे अरब-इस्लामिक देशों के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

लेकिन अब हालात बदल गए हैं। जब ईरान ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए, तो इस समझौते की वजह से पाकिस्तान के सामने बड़ी कूटनीतिक मुश्किल खड़ी हो गई है।

इसका कारण यह है कि समझौते के मुताबिक अगर सऊदी अरब पर बड़ा हमला होता है, तो पाकिस्तान को उसका साथ देना पड़ सकता है, जबकि पाकिस्तान के ईरान के साथ भी संबंध हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

रियाद बैठक में पाकिस्तान की मौजूदगी

रियाद में हुई बैठक में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है कि पाकिस्तान इस मामले में क्या रुख अपनाएगा।

हाल के दिनों में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच संपर्क भी बढ़ा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने भी रियाद का दौरा किया था।

इन मुलाकातों को इस पूरे संकट से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस मामले में कोई स्पष्ट सैन्य रुख नहीं अपनाया है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

म्यूचुअल डिफेंस समझौते का असर

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए यह स्थिति काफी जटिल है। एक तरफ उसका सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है, तो दूसरी तरफ उसके ईरान के साथ भी अच्छे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय की बड़ी आबादी भी रहती है, ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इस बीच कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अगर सऊदी अरब इस युद्ध में पूरी तरह शामिल होता है, तो वह अपने रक्षा समझौते को सक्रिय कर सकता है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब को सुरक्षा सहयोग दे सकता है। हालांकि इस तरह के दावों पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

हालांकि सऊदी अरब अब तक ईरान के साथ बातचीत करने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करता रहा है। इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया था कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बातचीत के दौरान सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते का मुद्दा उठाया था।

इशाक डार ने कहा कि “हमारा सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता है, और हमने यह बात ईरान को भी साफ तौर पर बता दी है।” इस पर ईरान की ओर से यह कहा गया कि सऊदी की जमीन का इस्तेमाल उनके खिलाफ हमले करने के लिए नहीं होना चाहिए, इस बारे में भरोसा दिया जाए। (Saudi Arabia Iran Conflict)

होर्मुज से आया पाकिस्तान का पहला जहाज

सऊदी अरब के साथ कूटनीतिक और रक्षा संबंधों के अलावा पाकिस्तान खाड़ी देशों पर तेल और गैस के लिए भी काफी हद तक निर्भर है।

इसी हफ्ते पाकिस्तान के झंडे वाला जहाज “कराची” (जिसे लोरेक्स भी कहा जाता है) होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला पहला ऐसा जहाज बना, जो गैर-ईरानी कच्चा तेल लेकर जा रहा था। इस जहाज का ट्रैकिंग सिस्टम यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम चालू था।

यह जहाज पाकिस्तान की सरकारी कंपनी नेशनल शिपिंग कॉरपोरेशन का है और इसमें जो तेल था, वह संयुक्त अरब अमीरात से आया था।

जानकारों का मानना है कि इस जहाज के सुरक्षित गुजरने के लिए पाकिस्तान ने संभवतः ईरान सरकार के साथ पहले से बातचीत की थी। (Saudi Arabia Iran Conflict)

तेल सप्लाई और वैश्विक असर

ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव का असर तेल सप्लाई पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है और यहां तनाव बढ़ने से बाजार पर असर दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण का असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर भी पड़ा है।

हालांकि, सऊदी अरब ने खाड़ी क्षेत्र से अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का इस्तेमाल करके इस समस्या से बचने की कोशिश की है। इस पाइपलाइन के जरिए वह होर्मुज को बायपास करके रोज करीब 40 लाख बैरल (4 मिलियन बैरल प्रति दिन) कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच पा रहा है। जबकि युद्ध शुरू होने से पहले सऊदी अरब लगभग 70 लाख बैरल प्रति दिन (7 मिलियन bpd) तेल निर्यात करता था, जिसमें से बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जाता था। (Saudi Arabia Iran Conflict)

अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति पर जोर

बैठक में शामिल देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय कानून के पालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए और किसी भी तरह की दखलअंदाजी से बचना चाहिए।

साथ ही यह भी कहा गया कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं और सभी देश इस दिशा में सहयोग जारी रखेंगे। (Saudi Arabia Iran Conflict)

ऑपरेशन सिंदूर का असर! संसदीय समिति ने की डिफेंस रिसर्च बजट बढ़ाने की सिफारिश

Defence Reserch Budget India

Defence Reserch Budget India: देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनाने के लिए संसदीय समिति ने एक अहम सिफारिश की है। समिति ने कहा है कि आने वाले पांच सालों में रक्षा अनुसंधान और विकास यानी डिफेंस आर एंड डी बजट को धीरे-धीरे बढ़ाया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि आधुनिक और एडवांस तकनीकों में निवेश बढ़ाने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अगर भारत को आत्मनिर्भर बनना है और दुनिया के बड़े देशों के साथ तकनीकी स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है, तो डिफेंस आर एंड डी पर खर्च बढ़ाना होगा। (Defence Reserch Budget India)

Defence Reserch Budget India: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बजट में बढ़ोतरी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मौजूदा वर्ष में डिफेंस कैपिटल बजट में विशेष बढ़ोतरी की गई है। यह बढ़ोतरी ऑपरेशन सिंदूर के बाद की गई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए की गई है। समिति का कहना है कि केवल एक साल की बढ़ोतरी काफी नहीं है, बल्कि लगातार कई सालों तक निवेश बढ़ाने की जरूरत है। (Defence Reserch Budget India)

नई और एडवांस तकनीकों पर जोर

समिति ने कहा कि बढ़ा हुआ बजट खास तौर पर एडवांस और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में निवेश के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसमें नए तरह के हथियार, बेहतर डिजाइन और अधिक प्रभावी डिफेंस सिस्टम डेपलप करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

रिपोर्ट के अनुसार, पर्याप्त और स्थिर फंडिंग से देश में स्वदेशी तकनीकों का विकास तेज होगा और विदेशी आयात पर निर्भरता कम की जा सकेगी। (Defence Reserch Budget India)

डीआरडीओ का बढ़ाएं बजट

डीआरडीओ ने भी समिति को बताया कि पिछले कुछ वर्षों में आर एंड डी बजट में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसे और बढ़ाने की जरूरत है। खासकर कुल रक्षा बजट के प्रतिशत के रूप में इसे बढ़ाना जरूरी बताया गया है।

डीआरडीओ के प्रतिनिधियों ने कहा कि कई बड़े प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिनमें सेना का बजट भी शामिल होता है। उदाहरण के तौर पर एईडब्ल्यू एंड सी मार्क-2 प्रोजेक्ट, जिसकी लागत करीब 19,000 करोड़ रुपये है, उसमें से बड़ा हिस्सा वायुसेना के बजट से आता है।

समिति के अनुसार, डीआरडीओ अब भविष्य की एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है, जिसमें हाइपरसोनिक मिसाइल और नई पीढ़ी के फाइटर विमान शामिल हैं। अभी भारत पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) पर काम कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट के लिए भी तकनीक विकसित करने की योजना बनाई जा रही है। ये नए फाइटर जेट नेटवर्क आधारित होंगे और दूसरे सिस्टम व ग्राउंड प्लेटफॉर्म के साथ जुड़े रहेंगे। (Defence Reserch Budget India)

समिति का कहना है कि इस तरह की पहल जरूरी है ताकि भारत दुनिया में तेजी से बदल रही रक्षा तकनीकों के साथ कदम मिलाकर चल सके। इसके लिए समिति ने सुझाव दिया है कि नई और महत्वपूर्ण तकनीकों के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए अलग से बजट तय किया जाए, ताकि इन प्रोजेक्ट्स को समय पर और बेहतर तरीके से पूरा किया जा सके और पैसों की कमी बीच में रुकावट न बने।

समिति ने यह भी कहा कि सुपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल जैसी तकनीकों पर खास ध्यान देना चाहिए। यह मिसाइल बहुत तेज गति से चलती है और लॉन्च होने के बाद हवा में दिशा बदल सकती है, जिससे इसे पकड़ना और रोकना दुश्मन के लिए मुश्किल हो जाता है। यह भविष्य की लड़ाई में भारत की ताकत को बढ़ाने में मदद कर सकती है। (Defence Reserch Budget India)

समिति का मानना है कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और अब नेटवर्क आधारित और क्लाउड सिस्टम पर आधारित ऑपरेशन बढ़ रहे हैं। ऐसे में ग्लाइड मिसाइल जैसी स्वदेशी तकनीक विकसित करना जरूरी है, ताकि भारत की सैन्य तैयारी मजबूत हो।

इसके लिए समिति ने कहा है कि पर्याप्त फंडिंग, तय समयसीमा और बेहतर टेस्टिंग सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि इन प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। साथ ही, यह तकनीक भविष्य के फाइटर जेट और ड्रोन जैसे सिस्टम के साथ मिलकर काम करेगी और देश को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगी। (Defence Reserch Budget India)

अगले पांच साल में बड़ा लक्ष्य

समिति को यह भी जानकारी दी गई कि आने वाले वर्षों में रक्षा अनुसंधान बजट को कुल रक्षा बजट का लगभग 10 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जा सकता है। इसके लिए चरणबद्ध तरीके से निवेश बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है।

समिति ने यह भी सुझाव दिया कि आर एंड डी प्रोजेक्ट्स की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि संसाधनों का सही उपयोग हो सके और परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकें। (Defence Reserch Budget India)

रक्षा बजट 2026-27

रिपोर्ट में रक्षा बजट 2026-27 के आंकड़े भी सामने आए हैं। इस वर्ष रक्षा मंत्रालय को कुल लगभग 7.84 लाख करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। यह देश के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस बजट में रक्षा सेवाओं के लिए सबसे बड़ा हिस्सा रखा गया है। इसके अलावा पेंशन, पूंजीगत खर्च और अन्य प्रशासनिक खर्चों के लिए भी अलग-अलग राशि निर्धारित की गई है। (Defence Reserch Budget India)

कैपिटल और रेवेन्यू खर्च में बढ़ोतरी

रक्षा सेवाओं के लिए पूंजीगत खर्च यानी कैपिटल आउटले में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। यह पिछले साल की तुलना में करीब 25 फीसदी से अधिक है। इस खर्च का उपयोग नए हथियार, उपकरण और सैन्य प्लेटफॉर्म खरीदने के लिए किया जाता है।

वहीं राजस्व खर्च यानी रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में भी बड़ी राशि निर्धारित की गई है, जिससे सेना के रोजमर्रा के संचालन और रखरखाव की जरूरतें पूरी की जाती हैं। (Defence Reserch Budget India)

एमएसएमई और आत्मनिर्भरता पर असर

समिति ने कहा कि बढ़ा हुआ आर एंड डी बजट देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देगा। इससे एमएसएमई और स्टार्ट-अप को भी नई तकनीकों पर काम करने का मौका मिलेगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सरकार की नीति आत्मनिर्भर भारत को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है, जिससे देश में ही रक्षा उपकरणों का निर्माण बढ़े।

समिति ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य के युद्धों में तकनीक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान देना जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर समय पर निवेश किया गया और नई तकनीकों को अपनाया गया, तो देश की रक्षा क्षमता को और मजबूत किया जा सकता है। (Defence Reserch Budget India)

रक्षा मंत्री बोले- रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल युद्ध से लें सीख, भारत में बनें ड्रोन के सभी पार्ट्स

Drone Manufacturing India

Drone Manufacturing India: बदलते वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि भविष्य की लड़ाइयों में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम होने वाली है। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव से यह साफ हो गया है कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है और अब ड्रोन टेक्नोलॉजी एक प्रमुख हथियार बनती जा रही है।

रक्षा मंत्री नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित राष्ट्रीय रक्षा उद्योग सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में एमएसएमई, स्टार्ट-अप, रक्षा कंपनियां, वैज्ञानिक, नीति निर्माता और सेना से जुड़े अधिकारी शामिल हुए। (Drone Manufacturing India)

Drone Manufacturing India: ड्रोन निर्माण में आत्मनिर्भरता पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत को केवल ड्रोन बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके हर हिस्से में आत्मनिर्भर बनना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ड्रोन के मोल्ड, सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरी तक सब कुछ भारत में ही बनना चाहिए।

उन्होंने बताया कि दुनिया के कई देशों में ड्रोन बनाए जाते हैं, लेकिन उनके कई जरूरी पुर्जे अब भी चीन से आयात किए जाते हैं। ऐसे में भारत को इस निर्भरता से बाहर निकलना होगा और अपने स्तर पर पूरी सप्लाई चेन तैयार करनी होगी। (Drone Manufacturing India)

ग्लोबल ड्रोन हब बनने का लक्ष्य

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत को मिशन मोड में काम करते हुए आने वाले कुछ सालों में ड्रोन निर्माण का वैश्विक केंद्र बनना चाहिए। इसके लिए एक मजबूत ड्रोन प्रोडक्शन इकोसिस्टम तैयार करना जरूरी है, जिससे देश की सुरक्षा मजबूत होगी और रणनीतिक स्वतंत्रता भी बढ़ेगी।

उन्होंने निजी क्षेत्र, स्टार्ट-अप और एमएसएमई को इस दिशा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया और सरकार की ओर से हर संभव सहयोग का भरोसा दिया। (Drone Manufacturing India)

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iDEX और ADITI जैसे प्रोग्राम लॉन्च

कार्यक्रम के दौरान रक्षा मंत्री ने डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज (DISC-14) और ADITI चैलेंज के नए संस्करण लॉन्च किए। इसके तहत कुल 107 प्रोब्लेम डिस्क्रिप्शन जारी किए गए, जिनमें रक्षा बलों, कोस्ट गार्ड और डिफेंस स्पेस एजेंसी की जरूरतों को शामिल किया गया है।

इसके अलावा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की ओर से 101 नए इनोवेशन चैलेंज भी शुरू किए गए हैं, ताकि स्टार्ट-अप और एमएसएमई नई तकनीकों पर काम कर सकें। इन प्रोजेक्ट्स में कंपनियों को मेंटरशिप, टेस्टिंग सुविधाएं और सप्लाई चेन में शामिल होने के अवसर दिए जाएंगे। (Drone Manufacturing India)

डिफेंस इनोवेशन में तेजी

रक्षा मंत्री ने बताया कि आईडेक्स प्रोग्राम के जरिए अब तक सैकड़ों स्टार्ट-अप और इनोवेटर्स डिफेंस सेक्टर से जुड़े हैं। फरवरी 2026 तक करीब 676 स्टार्ट-अप और एमएसएमई इस इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं। 548 कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए हैं और 566 चैलेंज लॉन्च किए गए हैं।

इनमें से कई प्रोटोटाइप को सेना के लिए खरीद की मंजूरी भी मिल चुकी है और हजारों करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट साइन किए जा चुके हैं। इससे यह साफ होता है कि इनोवेशन अब धीरे-धीरे वास्तविक उत्पाद और तकनीक में बदल रहा है।

नई तकनीकों को अपनाने पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसी तकनीकें तेजी से विकसित हो रही हैं। ऐसे में एमएसएमई और स्टार्ट-अप को इन तकनीकों को अपनाना होगा।

उन्होंने ‘डिजिटल ट्विन’ जैसी तकनीक का भी जिक्र किया, जिसमें किसी असली सिस्टम का वर्चुअल मॉडल तैयार किया जाता है। इससे जटिल सिस्टम को समझने और बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है। (Drone Manufacturing India)

इंटीग्रेशन से बनेगा मजबूत इकोसिस्टम

रक्षा मंत्री ने कहा कि एमएसएमई को आगे बढ़ाने के लिए इंटीग्रेशन बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि यह दो तरह से हो सकता है, हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल इंटीग्रेशन। हॉरिजॉन्टल इंटीग्रेशन में अलग-अलग क्षेत्रों की कंपनियां एक-दूसरे के साथ जुड़कर काम करती हैं, जबकि वर्टिकल इंटीग्रेशन में छोटी कंपनियां बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर काम करती हैं और नई तकनीकों में विशेषज्ञता हासिल करती हैं। (Drone Manufacturing India)

सरकार की ओर से पूरा सहयोग

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार एमएसएमई को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठा रही है। इस साल के बजट में तीन स्तरों- इक्विटी, लिक्विडिटी और प्रोफेशनल सपोर्ट- पर काम किया जा रहा है, ताकि छोटे उद्योग तेजी से आगे बढ़ सकें।

उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से सरकार ने इस सेक्टर को लगातार प्राथमिकता दी है। उद्यम पोर्टल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए छोटे उद्योगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। (Drone Manufacturing India)

एमएसएमई सेक्टर में तेजी से बढ़ोतरी

रक्षा मंत्री ने बताया कि देश में एमएसएमई की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2012-13 में जहां इनकी संख्या करीब 4.67 करोड़ थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 8 करोड़ हो गई है। उन्होंने कहा कि स्टार्ट-अप नए विचारों के साथ समाज में बदलाव ला रहे हैं और कई कंपनियां कम समय में यूनिकॉर्न बन रही हैं। (Drone Manufacturing India)

डिफेंस इंडस्ट्री में सुधार के प्रयास

कार्यक्रम में रक्षा उत्पादन विभाग के सचिव संजीव कुमार ने बताया कि डिफेंस सेक्टर में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इसमें प्रक्रियाओं को आसान बनाना, गुणवत्ता सुधारना और टेस्टिंग सुविधाओं को मजबूत करना शामिल है। इसके साथ ही ‘सृजन दीप’ नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है, जिसमें 40 हजार से ज्यादा कंपनियों को जोड़ा गया है, ताकि रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा मिल सके। (Drone Manufacturing India)

यूक्रेन ने बनाया बिना GPS के टारगेट को हिट करने वाला स्मार्ट ड्रोन मुनिशन, AI की मदद से बिना सिग्नल करेगा हमला

AI Guided Drone Munitions
AI Guided Drone Munitions

AI Guided Drone Munitions: रूस-यूक्रेन वॉर में कई तरह के इनोवेशन देखे को मिल रहे हैं। इंटरसेप्टर ड्रोन के बाद यूक्रेन की डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी डेफ्टाक ने एक नई तरह की ड्रोन मुनिशन टेक्नोलॉजी पेश की है। खास बात यह है कि यह बिना जीपीएस के भी अपने टारगेट को सटीक तरीके से निशाना बना सकती है। इस नई तकनीक को “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गाइडेड ड्रोन मुनिशन्स” कहा जा रहा है। हाल ही में इसे बार “आर्सेनल ऑफ टैलेंट्स” डिफेंस एग्जिबिशन में शोकेस किया गया।

इसे बनाने वाली कंपनी डेफ्टाक के मुताबिक यह सिस्टम मौजूदा ड्रोन हथियारों से अलग है, क्योंकि इसमें ऐसा गाइडेंस सिस्टम लगाया गया है जो उड़ान के दौरान अपने रास्ते को खुद बदल सकता है और टारगेट को सटीक निशाना बना सकता है। (AI Guided Drone Munitions)

AI Guided Drone Munitions: कैसे काम करता है यह नया सिस्टम

इस नई मुनिशन में एक कैमरा, ऑनबोर्ड इलेक्ट्रॉनिक्स और एक वॉरहेड यानी विस्फोटक हिस्सा शामिल है। इसके साथ ही इसमें कंप्यूटर विजन आधारित सॉफ्टवेयर लगाया गया है। यह तकनीक ड्रोन को उड़ान के दौरान लक्ष्य की पहचान करने और उसी के अनुसार अपनी दिशा बदलने की क्षमता देती है।

सामान्य तौर पर पारंपरिक बम या प्रोजेक्टाइल एक तय रास्ते पर चलते हैं और लॉन्च होने के बाद उनका रास्ता बदला नहीं जा सकता। लेकिन डेफ्टाक का यह सिस्टम उड़ान के दौरान अपने ट्रैजेक्टरी यानी रास्ते को एडजस्ट कर सकता है, जिससे टारगेट पर सटीकता बढ़ जाती है। (AI Guided Drone Munitions)

बिना जीपीएस के भी काम करने की क्षमता

इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि यह जीपीएस के बिना भी काम कर सकती है। मौजूदा समय में युद्ध के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के जरिए जीपीएस सिग्नल को जाम किया जाता है, जिससे कई ड्रोन और मिसाइल सिस्टम प्रभावित हो जाते हैं।

ऐसे माहौल में डेफ्टाक की यह टेक्नोलॉजी कंप्यूटर विजन के जरिए टारगेट को पहचानती है और उसी के आधार पर हमला करती है। इससे यह सिस्टम जीपीएस जामिंग के बावजूद भी काम करता रहता है। (AI Guided Drone Munitions)

कई तरह के ड्रोन पर इस्तेमाल की तैयारी

कंपनी ने बताया कि शुरुआत में इस मुनिशन को मल्टीरोटर ड्रोन यानी क्वाडकॉप्टर पर इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह रिकॉन्सेप्ट क्वाडकॉप्टर्स को प्रिसिजन किलिंग मशीन्स में बदल देता है, इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी काम करता है अब इसे फिक्स्ड-विंग यूएवी यानी लंबे समय तक उड़ने वाले ड्रोन प्लेटफॉर्म पर भी लगाने की तैयारी की जा रही है।

इसके अलावा कंपनी एक लेजर-गाइडेड वर्जन पर भी काम कर रही है, जिसमें टारगेट पर लेजर से निशान लगाकर उसे और ज्यादा सटीक तरीके से हिट किया जा सकेगा। (AI Guided Drone Munitions)

रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम की कॉम्बैट टेस्टिंग पहले ही की जा चुकी है। अब कंपनी यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के साथ औपचारिक कॉन्ट्रैक्ट और कोडिफिकेशन प्रक्रिया की तैयारी कर रही है। कोडिफिकेशन एक प्रक्रिया होती है, जिसमें किसी नए हथियार या सिस्टम को आधिकारिक रूप से मिलिट्री इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी जाती है। (AI Guided Drone Munitions)

कम लागत में ज्यादा असर

डेफ्टाक को 2025 में यूरोप के डिफेंस फंड डार्कस्टार से करीब 6.5 लाख डॉलर का निवेश मिला था। निवेशकों के अनुसार, यह सिस्टम पारंपरिक गाइडेड मुनिशन्स की तुलना में काफी सस्ता है।

बताया गया है कि इसकी लागत पारंपरिक सिस्टम की तुलना में लगभग 10 गुना तक कम हो सकती है, जबकि इसकी सटीकता काफी उच्च स्तर की बनी रहती है। (AI Guided Drone Munitions)

डिफेंस टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव

यूक्रेन में चल रहे युद्ध के बीच डिफेंस टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। खास तौर पर ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम्स का उपयोग बढ़ रहा है। इसी दिशा में कई कंपनियां नए प्रयोग कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ ड्रोन को अब काउंटर-यूएवी यानी दुश्मन के ड्रोन को रोकने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे FP-1 ड्रोन, जिसे पहले लंबी दूरी के हमलों के लिए बनाया गया था, अब उसे इस तरह बदला जा रहा है कि वह एंटी-एयरक्राफ्ट हथियार ले जा सके और साथ ही इंटरसेप्टर FPV ड्रोन लॉन्च कर सके, ताकि दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोका जा सके।

“आर्सेनल ऑफ टैलेंट्स” नाम के डिफेंस इवेंट में इस सिस्टम को पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाया गया। इस कार्यक्रम में कई नई डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अपने उत्पाद पेश किए। डेफ्टाक के इस सिस्टम को खास तौर पर इसलिए ध्यान मिला क्योंकि यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार विकसित किया गया है, जहां जीपीएस जामिंग और इलेक्ट्रॉनिक हमले आम हो गए हैं। (AI Guided Drone Munitions)

रूस की खुफिया जानकारी से खुले थे ‘म्यामांर ड्रोन केस’ के राज, जिसके बाद हत्थे चढ़े एक अमेरिकी और 6 यूक्रेनी

Myanmar Drone Case- 6 Ukrainians and 1 US Citizen Booked Under UAPA in Major Terror Conspiracy Probe
NIA just caught US mercenary Matthew VanDyke

Myanmar Drone Case: हाल ही में म्यामांर ड्रोन केस में बड़ा खुलासा हुआ है। पकड़े गए एक अमेरिकी और 6 यूक्रेनी नागरिकों की खुफिया जानकारी रूस की तरफ से मिली थी। इस जानकारी के आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने 6 यूक्रेनी नागरिकों और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया। इन सभी पर आरोप है कि वे म्यांमार में सक्रिय एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ड्रोन से जुड़ी ट्रेनिंग दे रहे थे और इस गतिविधि का असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता था।

मामले से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, रूस की एजेंसियों ने भारतीय एजेंसियों को इन लोगों की गतिविधियों के बारे में इनपुट साझा किया था। हालांकि इस खुफिया जानकारी का पूरी डिटेल सामने नहीं आई है। (Myanmar Drone Case)

Myanmar Drone Case: म्यांमार से जुड़ी गतिविधियों पर नजर

रिपोर्ट के अनुसार, इन सातों विदेशी नागरिकों की गतिविधियां साल 2024 से ही निगरानी में थीं। बताया गया है कि यह ग्रुप कई बार म्यांमार गया और वहां के एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ड्रोन वारफेयर, ड्रोन असेंबली और सिग्नल जैमिंग जैसी तकनीकों की ट्रेनिंग देता था।

इसके साथ ही यह भी सामने आया कि यूरोप से बड़ी मात्रा में ड्रोन और संबंधित उपकरण भारत के रास्ते म्यांमार पहुंचाए गए। यह मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जिन ग्रुप्स को ट्रेनिंग दी जा रही थी, उनके भारत के उत्तर-पूर्व में सक्रिय उग्रवादी संगठनों से संपर्क होने की आशंका जताई गई है। (Myanmar Drone Case)

तीन महीने से चल रही थी ट्रैकिंग

सूत्रों के अनुसार, एनआईए और अन्य सुरक्षा एजेंसियां पिछले लगभग तीन महीने से इस पूरे नेटवर्क पर नजर रख रही थीं। खास तौर पर मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे सीमावर्ती इलाकों में गतिविधियों को ट्रैक किया जा रहा था।

रूस से मिली जानकारी ने इस जांच को निर्णायक मोड़ मिला। इसके बाद 13 मार्च को एक कॉर्डिनेटेड ऑपरेशन चलाया गया, जिसमें दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता एयरपोर्ट पर एक साथ कार्रवाई करते हुए सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। (Myanmar Drone Case)

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान

गिरफ्तार किए गए लोगों में अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन वैन डाइक और छह यूक्रेनी नागरिक शामिल हैं। इन सभी ने भारत में वैध टूरिस्ट वीजा पर प्रवेश किया था, लेकिन बाद में आवश्यक परमिट के बिना मिजोरम जैसे प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहुंच गए।

जांच एजेंसियों का कहना है कि यह समूह भारत को एक ट्रांजिट रूट की तरह इस्तेमाल कर म्यांमार में प्रवेश करता था, जहां पहले से तय ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। (Myanmar Drone Case)

ड्रोन ट्रेनिंग और सप्लाई के आरोप

एनआईए के अनुसार, यह समूह केवल ट्रेनिंग ही नहीं दे रहा था, बल्कि ड्रोन और उससे जुड़े उपकरणों की सप्लाई में भी शामिल था। आरोप है कि ये लोग ड्रोन ऑपरेशन, असेंबली और सिग्नल जैमिंग जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी की जानकारी दे रहे थे।

जांच के दौरान यह भी बताया गया कि इन गतिविधियों का सीधा असर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है, क्योंकि इससे देश के भीतर सक्रिय प्रतिबंधित संगठनों को तकनीकी सहायता मिल सकती थी। (Myanmar Drone Case)

गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों को विशेष एनआईए कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उन्हें 11 दिनों की एनआईए कस्टडी में भेज दिया है, जहां उनसे आगे पूछताछ की जा रही है। एनआईए ने कोर्ट को बताया कि आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है, ताकि उनके नेटवर्क और संपर्कों के बारे में और जानकारी जुटाई जा सके।

अधिकारियों का कहना है कि रूस ने केवल इन लोगों की गतिविधियों से जुड़ी सामान्य जानकारी साझा की थी, जिससे जांच एजेंसियों को दिशा मिली। सूत्रों का कहना है कि रूस म्यांमार की मिलिट्री जुंटा का समर्थक है, इसलिए वह उन एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स पर नजर रखता है जो जुंटा के खिलाफ लड़ रहे हैं। ये ग्रुप्स खासकर यूक्रेन युद्ध से जुड़े वेटरन्स की ट्रेनिंग पर रूस लगाताार नजर रख रहा था। इसके अलावा, गिरफ्तार अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैन डाइक के सोशल मीडिया पोस्ट्स में “Russia, we are coming for you” जैसी बातें भी सामने आई थीं, जिसके बाद से वह पहले से ही रूस की नजर में था। (Myanmar Drone Case)

अन्य संदिग्धों की तलाश जारी

जांच एजेंसियों को यह भी जानकारी मिली है कि यह समूह 14 लोगों के एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। फिलहाल बाकी लोगों के बारे में पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वे अभी म्यांमार में हैं या कहीं और चले गए हैं।

इसके अलावा भारतीय एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि इन विदेशी नागरिकों को भारत के भीतर किसने मदद की और किस तरह से उन्होंने सीमावर्ती इलाकों में प्रवेश किया। (Myanmar Drone Case)

इस मामले के सामने आने के बाद यूक्रेन ने अपने नागरिकों की गिरफ्तारी पर औपचारिक आपत्ति जताई है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं अमेरिका ने भी मामले की जानकारी होने की बात कही है, लेकिन ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार किया है।

भारत की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, क्योंकि जांच जारी है। (Myanmar Drone Case)

संसदीय समिति का बड़ा सुझाव, चीन से मुकाबले के लिए भारत को चाहिए छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट

Sixth Generation Fighter India
Sixth Generation Fighter India: Parliamentary Panel Calls for Roadmap to Boost Air Power (Photo: IAF)

Sixth Generation Fighter India: देश की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए संसद की स्थायी समिति ने बड़ा सुझाव दिया है। रक्षा मामलों से जुड़ी इस समिति ने कहा है कि भारत को अब छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट यानी सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट के डेवलपमेंट के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार करना चाहिए।

लोकसभा में पेश की गई और राज्यसभा में भी रखी गई इस रिपोर्ट में समिति ने कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और इसमें एयर पावर की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में भारत को केवल पुराने सिस्टम को अपग्रेड करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भविष्य की तकनीक पर काम शुरू करना चाहिए। (Sixth Generation Fighter India)

Sixth Generation Fighter India: नई पीढ़ी के युद्ध की जरूरतों पर जोर

31 सदस्यों वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब आज के समय में युद्ध केवल जमीन या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक मल्टी-डोमेन यानी कई क्षेत्रों में एक साथ लड़ा जा रहा है। इसमें हवा, अंतरिक्ष और साइबर जैसे क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं।

इसलिए भविष्य के फाइटर एयरक्राफ्ट ऐसे होने चाहिए, जो इन सभी क्षेत्रों में काम कर सकें। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिक्स्थ जेनरेशन एयरक्राफ्ट में एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और मैनड-अनमैनड टीमिंग जैसी क्षमताएं शामिल होंगी। (Sixth Generation Fighter India)

कई देश बनाने में जुटे

दुनिया के कई बड़े देश पहले से ही छठी पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने पर काम कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स का मकसद भविष्य के युद्ध को ध्यान में रखते हुए नई तकनीक विकसित करना है।

समिति ने कहा कि भारत को भी इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए ताकि वह वैश्विक स्तर पर पीछे न रह जाए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत इस समय यूरोप के कुछ देशों के साथ इस विषय पर बातचीत कर रहा है। (Sixth Generation Fighter India)

यूरोपीय कंसोर्टियम से जुड़ने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, भारत दो बड़े यूरोपीय समूहों में से किसी एक के साथ जुड़ने पर विचार कर रहा है। एक समूह में ब्रिटेन, इटली और जापान शामिल हैं, जबकि दूसरे में फ्रांस और जर्मनी शामिल हैं।

इन दोनों समूहों द्वारा सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट डेवलप किए जा रहे हैं। भारत इन प्रोजेक्ट्स में भागीदारी के जरिए तकनीक हासिल करने और उत्पादन में हिस्सेदारी चाहता है।

सूत्रों के अनुसार, भारत ने फ्रांस के साथ फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम में संभावित भागीदारी को लेकर शुरुआती स्तर पर बातचीत शुरू की है। यह एक अगली पीढ़ी का एयर कॉम्बैट प्रोग्राम है, जिसे फ्रांस जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर डेवलप कर रहा है। भारत इस सहयोग में खास तौर पर को-डेवलपमेंट यानी संयुक्त विकास और को-प्रोडक्शन यानी संयुक्त उत्पादन पर जोर दे रहा है।

यह कार्यक्रम दसॉ एविएशन, एयरबस और स्पेन की डिफेंस कंपनी इंद्रा के कंसोर्टियम पर आधारित है। हालांकि इस प्रोजेक्ट में फ्रांस और जर्मनी के बीच काम के बंटवारे और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर कुछ मतभेद भी सामने आए हैं। (Sixth Generation Fighter India)

स्वदेशी फाइटर प्रोग्राम पर भी काम जारी

इसी बीच भारत अपने स्वदेशी फाइटर जेट प्रोग्राम पर भी काम कर रहा है। एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए प्रोजेक्ट भारत का पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारत एक स्वदेशी इंजन डेवलप करने की दिशा में भी काम कर रहा है। फ्रांस की कंपनी के साथ मिलकर 110 से 120 किलो न्यूटन क्षमता का इंजन डेवलप करने को लेकर बातचीत चल रही है। जिसका इस्तेमाल इन स्वदेशी फाइटर जेट्स में किया जाएगा। (Sixth Generation Fighter India)

यह इंजन एएमसीए के भविष्य के वर्जन में इस्तेमाल किया जाएगा। इस सहयोग में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर यानी तकनीक का पूरा हस्तांतरण भी शामिल हो सकता है, जिससे भारत की विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी।

भारतीय वायुसेना की योजना है कि वह इन पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के कुल छह स्क्वाड्रन शामिल करेगी और उन्हें साल 2035 से तैनात किया जाएगा। (Sixth Generation Fighter India)

भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी पहले से बढ़ी

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी अब पहले से ज्यादा बढ़ गई है। अब वायुसेना को केवल पारंपरिक हमलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि उसे अंतरिक्ष और अन्य नए क्षेत्रों में भी काम करना होगा।

रिपोर्ट में कहा गया कि वायुसेना को “नियर स्पेस” यानी पृथ्वी के ऊपर के उस हिस्से में भी क्षमता डेवलप करनी चाहिए, जहां से निगरानी और सुरक्षा कार्य किए जा सकते हैं।

इसके लिए समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि वायुसेना को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वह आधुनिक तकनीक से लैस हो सके। (Sixth Generation Fighter India)

जॉइंट मिलिट्री स्ट्रक्चर पर भी जोर

समिति ने यह भी कहा कि भविष्य के युद्ध में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा। इसलिए संयुक्त सैन्य ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है।

रिपोर्ट में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ को और मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त फंड देने की सिफारिश की गई है, ताकि तीनों सेनाएं मिलकर बेहतर योजना और संचालन कर सकें। (Sixth Generation Fighter India)

चीन बना चुका है पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि अन्य देश तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहे हैं। चीन भी अपने सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर जेट पर काम कर रहा है और उसने इसके कुछ विजुअल्स भी जारी किए हैं।

इसके अलावा चीन के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट पहले से ही तैयार हैं और उन्हें अन्य देशों के साथ साझा करने की चर्चा भी चल रही है।

ऐसे माहौल में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी एयर पावर को मजबूत बनाए और नई तकनीकों को अपनाए। (Sixth Generation Fighter India)