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दुनिया के सबसे बड़े स्पेशल ऑप्स इवेंट में भारतीय सेना का जलवा, पहली बार CAPEX में लिया हिस्सा

SOF Week 2026 USA
Lieutenant General Pushpendra Pal Singh, General Officer Commanding-in-Chief, Western Command

SOF Week 2026 USA: भारतीय सेना ने अमेरिका में आयोजित दुनिया के सबसे बड़े स्पेशल ऑपरेशंस इवेंट्स में से एक “एसओएफ वीक 2026” में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम 18 से 21 मई तक अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के टैम्पा शहर में आयोजित किया गया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वेस्टर्न कमांड के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह ने किया, जिन्हें भारतीय सशस्त्र बलों के सबसे वरिष्ठ कार्यरत स्पेशल फोर्सेस अधिकारियों में गिना जाता है। एसओएफ वीक में दुनिया भर के स्पेशल ऑपरेशंस फोर्सेज, रक्षा उद्योगों और सैन्य रणनीतिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

SOF Week 2026 USA: 70 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि पहुंचे

एसओएफ वीक 2026 का आयोजन यूनाइटेड स्टेट्स स्पेशल ऑपरेशंस कमांड (यूएसएसओकॉम) और ग्लोबल एसओएफ फाउंडेशन ने मिलकर किया। इस कार्यक्रम में 70 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। आयोजन में लगभग 28 हजार प्रतिभागियों और 850 से ज्यादा डिफेंस एग्जिबिटर्स ने हिस्सा लिया।

इस दौरान सैन्य रणनीति, स्पेशल ऑपरेशंस, आधुनिक युद्ध तकनीक, इंडस्ट्री सहयोग और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों पर कई चर्चाएं हुईं। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भी कई देशों के स्पेशल फोर्सेस कमांडरों के साथ बैठकें कीं और अलग-अलग सैन्य तकनीकों का अवलोकन किया।

भारतीय सेना ने पहली बार किया बड़ा प्रदर्शन

इस बार भारतीय सेना ने पहली बार “कैपेबिलिटी डेमोंस्ट्रेशन” यानी कैपेक्स में हिस्सा लिया। यह एसओएफ वीक का सबसे महत्वपूर्ण लाइव प्रदर्शन माना जाता है।

20 मई को टैम्पा वॉटरफ्रंट पर “बैटल इन द बे” नाम से लाइव ऑपरेशनल डेमो आयोजित किया गया। इसमें अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस के साथ 10 पार्टनर देशों की टुकड़ियां शामिल हुईं। भारतीय स्पेशल फोर्सेस ने भी इसमें अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया।

भारतीय टीम ने काउंटर टेररिज्म, जंगल युद्ध, हाई-ऑल्टीट्यूड कॉम्बैट और अनकन्वेंशनल वॉरफेयर से जुड़ी क्षमताएं दिखाई। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक यह भारतीय स्पेशल फोर्सेस के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट की 4 पैरा स्पेशल फोर्सेस यूनिट से जुड़े रहे हैं। उन्हें करीब चार दशक का सैन्य अनुभव है। उन्होंने सियाचिन, जम्मू-कश्मीर, एलओसी और उत्तर-पूर्व के कई ऑपरेशंस में हिस्सा लिया है।

उन्होंने ऑपरेशन पवन, ऑपरेशन मेघदूत और कई काउंटर इंसर्जेंसी मिशनों में भी काम किया है। अप्रैल 2026 में उन्होंने वेस्टर्न कमांड की कमान संभाली थी। सेना में उन्हें स्पेशल फोर्सेस ऑपरेशंस का विशेषज्ञ माना जाता है।

भारतीय पैरा एसएफ की खासियत क्या है

भारतीय पैरा स्पेशल फोर्सेस दुनिया की अनुभवी स्पेशल यूनिट्स में गिनी जाती हैं। इन्हें ऊंचाई वाले इलाकों, जंगलों और आतंकवाद विरोधी अभियानों में विशेषज्ञता हासिल है।

सियाचिन और लद्दाख जैसे इलाकों में हाई-ऑल्टीट्यूड ऑपरेशंस से लेकर जम्मू-कश्मीर में काउंटर टेररिज्म मिशनों तक इन यूनिट्स ने कई बार अपनी क्षमता साबित की है।

उत्तर-पूर्व के घने जंगलों में भी भारतीय स्पेशल फोर्सेस लंबे समय से ऑपरेशन करती रही हैं। अपने इसी अनुभव को एसओएफ वीक जैसे मंच पर सेना ने लाइव प्रदर्शन किया।

आधुनिक युद्ध तकनीकों पर चर्चा

एसओएफ वीक के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने एडवांस डिफेंस टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्री एग्जिबिशन का भी दौरा किया। यहां ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, नाइट विजन, एआई आधारित सिस्टम और आधुनिक कम्युनिकेशन तकनीकों का प्रदर्शन किया गया।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक ऐसे आयोजनों से अलग-अलग देशों की सेनाओं को नई तकनीकों और ऑपरेशनल अनुभवों को समझने का मौका मिलता है। भारतीय टीम ने भी कई देशों के साथ ऑपरेशनल अनुभव साझा किए।

भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता सहयोग

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। दोनों देशों के बीच कॉमकासा, लेमोआ और आईसीईटी जैसे कई महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं।

भारतीय और अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस पहले भी “वज्र प्रहार” और “तर्कश” जैसे संयुक्त अभ्यास कर चुकी हैं। एसओएफ वीक में भारत की भागीदारी को इसी बढ़ते सहयोग का हिस्सा माना जा रहा है।

भारतीय सेना के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मंचों से इंटरऑपरेबिलिटी यानी अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने में मदद मिलती है। संयुक्त ऑपरेशंस के दौरान यह क्षमता काफी अहम मानी जाती है।

हाई-ऑल्टीट्यूड और जंगल युद्ध पर खास फोकस

भारतीय स्पेशल फोर्सेस की सबसे बड़ी ताकत हाई-ऑल्टीट्यूड और जंगल वॉरफेयर मानी जाती है। दुनिया की बहुत कम सेनाओं के पास सियाचिन जैसे बर्फीले इलाके में लंबे समय तक ऑपरेशन चलाने का अनुभव है।

इसी तरह उत्तर-पूर्व के घने जंगलों में काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशंस का अनुभव भी भारतीय सेना को अलग पहचान देता है। एसओएफ वीक के दौरान भारतीय टीम ने इन्हीं क्षमताओं से जुड़े पहलुओं को प्रदर्शित किया।

डिफेंस इंडस्ट्री ने भी लिया हिस्सा

कार्यक्रम में कई बड़ी वैश्विक डिफेंस कंपनियों ने हिस्सा लिया। यहां आधुनिक हथियार, कम्युनिकेशन सिस्टम, स्पेशल ऑपरेशंस गियर और अनमैन्ड सिस्टम्स का प्रदर्शन किया गया।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने कई नई तकनीकों का अध्ययन किया। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य सिस्टम, छोटे ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और एडवांस नाइट ऑपरेशन उपकरण शामिल रहे।

अंधेरे में भी दुश्मन पर नजर रखेंगे सेना के नए नाइट विजन सिस्टम, BEL ने दिया जर्मेनियम लेंस के लिए 29.8 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर

BEL Germanium Lens Order
File Photo

BEL Germanium Lens Order: भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने गोवा की प्राइवेट डिफेंस कंपनी आरआरपी डिफेंस को करीब 29.8 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर हाई-प्रिसीजन जर्मेनियम लेंसेज की सप्लाई के लिए है, जिनका इस्तेमाल थर्मल इमेजिंग और इन्फ्रारेड डिफेंस सिस्टम्स में किया जाता है। ये लेंसेज नाइट विजन डिवाइसेज, थर्मल कैमरों, सर्विलांस सिस्टम्स और हथियारों की साइट्स का अहम हिस्सा होते हैं।

बीईएल देश की सबसे बड़ी डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों में शामिल है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए बनने वाले कई एडवांस सिस्टम्स में ऐसे इन्फ्रारेड ऑप्टिकल पार्ट्स की जरूरत पड़ती है।

BEL Germanium Lens Order: क्या होते हैं जर्मेनियम लेंसेज

जर्मेनियम लेंसेज सामान्य कैमरा लेंस की तरह नहीं होते। इनका इस्तेमाल खासतौर पर इन्फ्रारेड और थर्मल इमेजिंग सिस्टम्स में किया जाता है। सामान्य ऑप्टिकल ग्लास इन्फ्रारेड रेडिएशन को ठीक से पास नहीं होने देता, जबकि जर्मेनियम इन्फ्रारेड तरंगों को आसानी से ट्रांसमिट कर सकता है।

इसी वजह से सेना के थर्मल कैमरे, नाइट विजन डिवाइसेज और हथियारों की थर्मल साइट्स में जर्मेनियम का इस्तेमाल किया जाता है। रात में, धुंध में, धुएं में या कम दृश्यता वाले इलाकों में सैनिक इन्हीं सिस्टम्स की मदद से दुश्मन की गतिविधियों को देख पाते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में थर्मल इमेजिंग बेहद जरूरी हो चुकी है। सीमा पर निगरानी से लेकर ड्रोन, टैंक और हथियार सिस्टम्स तक में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।

बीईएल ने क्यों दिया यह ऑर्डर

बीईएल कई तरह के डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम बनाती है। कंपनी के प्रोडक्ट्स में रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, कम्युनिकेशन सिस्टम, मिसाइल इलेक्ट्रॉनिक्स और नाइट विजन डिवाइसेज शामिल हैं।

इनमें इस्तेमाल होने वाले थर्मल और इन्फ्रारेड सिस्टम्स के लिए हाई-क्वालिटी ऑप्टिकल लेंसेज की जरूरत होती है। आरआरपी डिफेंस अब बीईएल की तकनीकी जरूरतों के मुताबिक इन लेंसेज को डिजाइन, इंजीनियर और कस्टमाइज करेगी।

आरआरपी ग्रुप ऑफ कंपनीज के फाउंडर और चेयरमैन राजेंद्र चोडणकर ने कहा कि बीईएल से मिला यह ऑर्डर आरआरपी डिफेंस की एडवांस इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और हाई-प्रिसीजन ऑप्टिकल इंजीनियरिंग क्षमताओं पर बड़ा भरोसा दिखाता है। उन्होंने कहा कि जर्मेनियम लेंसेज़ किसी भी थर्मल इमेजिंग सिस्टम का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और यही किसी सिस्टम की परफॉर्मेंस और विश्वसनीयता तय करते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत तेजी से स्वदेशी रक्षा तकनीकों पर फोकस बढ़ा रहा है और आरआरपी डिफेंस का लक्ष्य भारत में डिजाइन और भारत में निर्माण वाले विश्वस्तरीय इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम विकसित करना है। राजेंद्र चोडणकर के मुताबिक कंपनी ऐसे सिस्टम तैयार कर रही है जिनका इस्तेमाल केवल भारतीय सुरक्षा जरूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी किया जा सके।

राजेंद्र चोडणकर के मुताबिक बीईएल के साथ लगातार बढ़ता सहयोग इस बात का संकेत है कि दोनों कंपनियां इनोवेशन, सटीक तकनीक और टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता के जरिए भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने की साझा सोच के साथ काम कर रही हैं।

आरआरपी डिफेंस गोवा बेस्ड निजी रक्षा कंपनी है, जो इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और थर्मल इमेजिंग सिस्टम्स पर काम करती है। कंपनी आरआरपी ग्रुप का हिस्सा है।

आरआरपी ग्रुप पिछले कुछ समय से डिफेंस और सेमीकंडक्टर सेक्टर में तेजी से निवेश कर रहा है। समूह की प्रमुख कंपनी आरआरपी इलेक्ट्रॉनिक्स महाराष्ट्र की पहली ओसैट यानी “आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट” सुविधा चला रही है।

नवी मुंबई के महापे इलाके में स्थित यह सुविधा ऑटोमोटिव, टेलीकॉम, इंडस्ट्रियल और डिफेंस सेक्टर के लिए सेमीकंडक्टर पैकेजिंग और टेस्टिंग सेवाएं देती है।

ग्रुप ने महाराष्ट्र के खालापुर इलाके में बड़ा सेमीकंडक्टर कैंपस बनाने की भी योजना बनाई है। इसके लिए 100 एकड़ से ज्यादा जमीन ली गई है।

थर्मल इमेजिंग सिस्टम्स में क्यों जरूरी हैं ये लेंसेज

थर्मल इमेजिंग सिस्टम्स शरीर, वाहन या किसी वस्तु से निकलने वाली गर्मी को पहचानते हैं। इसके जरिए सैनिक अंधेरे में भी दुश्मन को देख सकते हैं।

जर्मेनियम लेंसेज इस सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं, क्योंकि वे इन्फ्रारेड सिग्नल्स को सेंसर तक पहुंचाते हैं।

इनका इस्तेमाल कई सैन्य उपकरणों में जैसे नाइट विजन साइट्स, थर्मल वेपन साइट्स, बॉर्डर सर्विलांस कैमरे, ड्रोन पेलोड्स, टारगेट ट्रैकिंग सिस्टम्स और व्हीकल बेस्ड सर्विलांस सिस्टम्स में होता है। वहीं आधुनिक सीमा सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियानों में ऐसे सिस्टम्स की मांग तेजी से बढ़ी है।

चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश

जर्मेनियम का वैश्विक उत्पादन सीमित देशों में होता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन इस क्षेत्र में बड़ी हिस्सेदारी रखता है। इसी वजह से कई देश अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत भी लंबे समय से ऐसे संवेदनशील डिफेंस कंपोनेंट्स के लिए आयात पर निर्भर रहा है। अब सरकार और निजी कंपनियां मिलकर लोकल सप्लाई चेन विकसित करने पर काम कर रही हैं।

यह ऑर्डर बीईएल और आरआरपी ग्रुप के बीच हुए एक बड़े समझौते के बाद आया है। दोनों कंपनियों ने डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स, ड्रोन और एडवांस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए एमओयू साइन किया था।

हालांकि उस समझौते की पूरी वित्तीय जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी, लेकिन अब यह ऑर्डर उस साझेदारी का पहला बड़ा परिणाम माना जा रहा है।

हालांकि आरआरपी डिफेंस केवल ऑप्टिकल लेंसेज तक सीमित नहीं है। कंपनी थर्मल साइट्स, थर्मल कैमरों और सर्विलांस सिस्टम्स पर भी काम कर रही है। कंपनी ने पहले रक्षा मंत्रालय से डिजिटल स्पॉटर स्कोप्स का ऑर्डर भी हासिल किया था। इसके अलावा लॉन्ग-रेंज थर्मल इमेजिंग कैमरे और स्मार्ट थर्मल साइट्स के क्षेत्र में भी काम चल रहा है।

ग्रुप ड्रोन टेक्नोलॉजी में भी निवेश कर रहा है। “ड्रोन-इन-अ-बॉक्स” जैसे ऑटोनॉमस सिस्टम्स पर काम किया जा रहा है, जिन्हें कठिन परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

विदेशी कंपनियों के साथ तकनीकी साझेदारी

आरआरपी ग्रुप ने कई विदेशी कंपनियों के साथ भी तकनीकी सहयोग समझौते किए हैं। इसमें इजरायल की मेप्रोलाइट और बुल्गारिया की ऑप्टिक्स जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इन साझेदारियों के जरिए कंपनी एडवांस इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और थर्मल टेक्नोलॉजी भारत में विकसित करने की कोशिश कर रही है। वहीं, कंपनी का फोकस केवल भारतीय सेना ही नहीं, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार के लिए भी सिस्टम तैयार करने पर है।

भारत-दक्षिण कोरिया के बीच साइबर सिक्योरिटी और मिलिट्री ट्रेनिंग पर बड़े समझौते, K-9 वज्र के बाद नई टेक्नोलॉजी पर फोकस

India-South Korea Defence Cooperation

India-South Korea Defence Cooperation: भारत और दक्षिण कोरिया ने रक्षा साइबर सुरक्षा, सैन्य प्रशिक्षण और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में सहयोग बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। सियोल में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आह्न ग्यू-बैक के बीच हुई बैठक में रक्षा उत्पादन, नई तकनीक और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

भारत और दक्षिण कोरिया के बीच यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। दोनों देशों ने साफ कहा कि वे “फ्री, ओपन और रूल-बेस्ड इंडो-पैसिफिक” के समर्थन में साथ काम करेंगे। रणनीतिक मामलों के जानकार इसे चीन की बढ़ती आक्रामक गतिविधियों के बीच महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं।

India-South Korea Defence Cooperation: डिफेंस साइबर और मिलिट्री ट्रेनिंग पर समझौते

बैठक के दौरान भारत और दक्षिण कोरिया के बीच तीन बड़े रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। पहला समझौता डिफेंस साइबर ​​कोऑपरेशन से जुड़ा है। इसके तहत दोनों देश साइबर सुरक्षा, सैन्य नेटवर्क की सुरक्षा और डिजिटल खतरों से निपटने में सहयोग करेंगे।

दूसरा समझौता भारत के नेशनल डिफेंस कॉलेज और कोरिया नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के बीच सैन्य प्रशिक्षण और अकादमिक आदान-प्रदान को लेकर हुआ। इसके जरिए दोनों देशों के सैन्य अधिकारी एक-दूसरे के संस्थानों में प्रशिक्षण ले सकेंगे।

तीसरा समझौता संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में सहयोग बढ़ाने को लेकर हुआ। भारत लंबे समय से यूएन पीसकीपिंग मिशनों में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया भी अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा है।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ये समझौते दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक और रक्षा संबंधों को दिखाते हैं।

India-South Korea Defence Cooperation

एलएंडटी और हनव्हा के बीच भी हुए समझौते

भारत की एलएंडटी और दक्षिण कोरिया की हनव्हा कंपनी लिमिटेड के बीच भी दो अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। सूत्रों के मुताबिक ये समझौते नई रक्षा तकनीकों से जुड़े हैं।

दोनों कंपनियां पहले से भारत में के-9 वज्र ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी गन का संयुक्त उत्पादन कर रही हैं। के-9 वज्र भारतीय सेना की सबसे आधुनिक आर्टिलरी गनों में गिनी जाती है।

सूत्रों का कहना है कि नए समझौते एडवांस डिफेंस टेक्नोलॉजी, सिस्टम इंटीग्रेशन और उत्पादन सहयोग को आगे बढ़ाने पर केंद्रित हैं।

इंडो-पैसिफिक पर साझा रणनीतिक सोच

बैठक में दोनों देशों ने “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और दक्षिण कोरिया की क्षेत्रीय रणनीति के बीच बढ़ती समानता पर जोर दिया। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक दोनों देशों ने कहा कि वे एक स्वतंत्र, खुला और नियम आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र बनाए रखने के लिए मिलकर काम करेंगे।

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि “रूल-बेस्ड इंडो-पैसिफिक” शब्द का इस्तेमाल अक्सर दक्षिण चीन सागर और समुद्री मार्गों पर चीन की बढ़ती दावेदारी के संदर्भ में किया जाता है।

चीन पहले भी दक्षिण चीन सागर में विदेशी युद्धपोतों की मौजूदगी पर आपत्ति जताता रहा है। ऐसे में भारत और दक्षिण कोरिया का यह साझा बयान क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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रक्षा उत्पादन और नई तकनीक पर फोकस

राजनाथ सिंह ने सियोल में भारत-दक्षिण कोरिया डिफेंस इंडस्ट्री बिजनेस राउंडटेबल की भी अध्यक्षता की। इसमें दोनों देशों के सरकारी अधिकारी और रक्षा उद्योग से जुड़े बड़े प्रतिनिधि शामिल हुए।

बैठक में संयुक्त विकास, संयुक्त उत्पादन और संयुक्त निर्यात के नए अवसरों पर चर्चा हुई। दोनों देशों ने भारत-कोरिया डिफेंस इनोवेशन एक्सेलेरेटर इकोसिस्टम (KIND-X) को आगे बढ़ाने पर भी सहमति जताई।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आधुनिक रक्षा उत्पादन अब केवल टैंक, तोप और पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है।

उन्होंने कहा कि आज का डिफेंस इकोसिस्टम एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोनॉमस सिस्टम्स, साइबर टेक्नोलॉजी, सेंसर, सेमीकंडक्टर्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, एडवांस मैटेरियल्स और स्पेस-बेस्ड सिस्टम्स पर आधारित होता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत और दक्षिण कोरिया मिलकर भविष्य की रक्षा तकनीकों पर काम कर सकते हैं।

भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि दक्षिण कोरिया की तकनीकी क्षमता और भारत के बड़े मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम का संयोजन मजबूत साझेदारी बना सकता है। उन्होंने कहा कि भारत के पास तेजी से बढ़ता स्टार्टअप नेटवर्क, एमएसएमई, रिसर्च संस्थान और निजी रक्षा कंपनियों का मजबूत आधार मौजूद है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय युवा उद्यमी अब अनमैन्ड सिस्टम्स, एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स, साइबर सिक्योरिटी, एडवांस कम्युनिकेशन और डिफेंस सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में तेजी से काम कर रहे हैं।

उन्होंने कोरियाई कंपनियों से भारतीय उद्योग के साथ लंबे समय की साझेदारी बढ़ाने की अपील की।

‘आत्मनिर्भर भारत’ पर भी चर्चा

बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने भारत के बढ़ते रक्षा उत्पादन और निर्यात के आंकड़ों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन करीब 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। वहीं रक्षा निर्यात लगभग 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

उन्होंने कहा कि सरकार स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने पर लगातार काम कर रही है और निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।

ऑपरेशन सिंदूर का भी किया जिक्र

दक्षिण कोरिया में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन भारत के मजबूत और निर्णायक रुख का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि भारत आतंकवाद को किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं करेगा।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत “नो फर्स्ट यूज” नीति का पालन करता है, लेकिन इसका मतलब कमजोरी नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत किसी भी तरह की परमाणु ब्लैकमेलिंग को स्वीकार नहीं करेगा।

India-South Korea Defence Cooperation

कोरियन वॉर मेमोरियल पर श्रद्धांजलि

दक्षिण कोरिया दौरे की शुरुआत में राजनाथ सिंह ने सियोल स्थित कोरियन वॉर सेमेट्री पहुंचकर युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया के लोगों का साहस, देशभक्ति और समर्पण प्रेरणादायक है। भारत ने इस मौके पर दक्षिण कोरिया के साथ अपनी एकजुटता भी जताई।

भारत में पहली बार ‘प्रगति 2026’, मेघालय के उमरोई में दिखेगा 12 देशों की सेनाओं का दम

PRAGATI 2026 Exercise

PRAGATI 2026 Exercise: भारत की मेजबानी में पहली बार आयोजित हो रहा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास “प्रगति 2026” मेघालय के उमरोई मिलिट्री स्टेशन में शुरू हो गया है। इस बड़े सैन्य अभ्यास में हिंद महासागर क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया के 12 मित्र देशों की सेनाएं हिस्सा ले रही हैं।

इस अभ्यास में भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, फिलीपींस, सेशेल्स, श्रीलंका और वियतनाम की सेनाएं शामिल हो रही हैं। भारतीय सेना का कहना है कि यह अभ्यास क्षेत्रीय सहयोग, साझा सुरक्षा और आतंकवाद से मुकाबले के लिए संयुक्त तैयारी को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है।

PRAGATI 2026 Exercise: क्या है प्रगति का मतलब

प्रगति नाम का मतलब है “पार्टनरशिप ऑफ रीजनल आर्मीज फॉर ग्रोथ एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन द इंडियन ओशन रीजन।” इसके तहत हिंद महासागर क्षेत्र की सेनाओं के बीच साझेदारी, विकास और बदलाव को बढ़ावा दिया जा रहा है।

उमरोई मिलिट्री स्टेशन में आयोजित उद्घाटन समारोह में भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी और सभी भाग लेने वाले देशों के सैन्य प्रतिनिधि मौजूद रहे। इन्फैंट्री के अतिरिक्त महानिदेशक मेजर जनरल सुनील श्योरान ने सभी विदेशी दलों का स्वागत करते हुए कहा कि आज की दुनिया में सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं और उनका सामना अकेले नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि आतंकवाद, सीमा पार हिंसा, समुद्री सुरक्षा, साइबर खतरे और प्राकृतिक आपदाएं ऐसे मुद्दे हैं जिनसे निपटने के लिए देशों के बीच तालमेल जरूरी है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों से एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और खुलकर विचार साझा करने की अपील की।

उमरोई को इस अभ्यास के लिए चुनने के पीछे भी रणनीतिक वजह मानी जा रही है। मेघालय और पूरा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र भारत के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उमरोई मिलिट्री स्टेशन बांग्लादेश की सीमा से लगभग 50-70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहीं, एलएसी से उमरोई की दूरी तकरीबन 600 किमी है।

दो सप्ताह तक चलेगी एक्सरसाइज

यह अभ्यास करीब दो सप्ताह तक चलेगा। इसमें मुख्य रूप से अर्ध-पहाड़ी और घने जंगल वाले इलाकों में काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशन पर फोकस किया जाएगा। मेघालय का इलाका ऐसे अभ्यासों के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है क्योंकि यहां का भूगोल वास्तविक ऑपरेशनल परिस्थितियों जैसा माहौल देता है।

अभ्यास के दौरान सैनिकों को जंगल युद्ध, सर्च ऑपरेशन, हॉस्टेज रेस्क्यू, रात के मिशन, कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन और संयुक्त टैक्टिकल मूवमेंट जैसी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके अलावा अलग-अलग देशों की सेनाएं अपनी विशेषज्ञता और अनुभव भी साझा करेंगी।

भारतीय सेना के अधिकारियों के मुताबिक इस अभ्यास का सबसे अहम हिस्सा “इंटरऑपरेबिलिटी” यानी अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाना है। आधुनिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में कई बार अलग-अलग देशों को साथ मिलकर काम करना पड़ता है। ऐसे में कम्युनिकेशन, प्लानिंग और ऑपरेशन के दौरान समन्वय बहुत जरूरी होता है।

एक साथ बैठकर बनाएंगे ऑपरेशन की योजना

अभ्यास में जॉइंट प्लानिंग एक्सरसाइज भी शामिल की गई हैं। इसमें अलग-अलग देशों के अधिकारी एक साथ बैठकर ऑपरेशन की योजना बनाएंगे। सैनिकों को यह भी सिखाया जाएगा कि मल्टीनेशनल फोर्स के तौर पर काम करते समय इंटेलिजेंस शेयरिंग और ऑपरेशनल फैसले कैसे लिए जाते हैं।

भारतीय सेना ने इस अभ्यास में फिजिकल फिटनेस और अनुशासन पर भी खास जोर दिया है। कठिन परिस्थितियों में लंबी दूरी की मूवमेंट, जंगलों में ऑपरेशन और सीमित संसाधनों में मिशन पूरा करने जैसी ट्रेनिंग सैनिकों को दी जाएगी।

इस अभ्यास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी रहेगा। अलग-अलग देशों के सैनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक खेलों और फूड फेस्टिवल में हिस्सा लेंगे। भारतीय सेना का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम सैनिकों के बीच व्यक्तिगत संबंध मजबूत करते हैं और आपसी भरोसा बढ़ाते हैं।

अपने हथियारों को शोकेस करेंगी निजी डिफेंस कंपनियां

भारतीय सेना ने इस मौके पर “आत्मनिर्भर भारत” पहल के तहत विकसित स्वदेशी रक्षा उपकरणों और तकनीकों को भी शोकेस किया जाएगा। अभ्यास के दौरान फिक्की की अगुवाई में भारतीय डिफेंस कंपनियां अपने हथियार, कम्युनिकेशन सिस्टम, ड्रोन, नाइट विजन डिवाइस और दूसरे आधुनिक उपकरणों को प्रदर्शित करेंगी।

सूत्रों के मुताबिक विदेशी सैन्य दलों को भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती क्षमताओं से भी परिचित कराया जाएगा। इसमें सरकारी और निजी दोनों रक्षा कंपनियां हिस्सा ले रही हैं। कई देशों ने भारतीय तकनीक और रक्षा उपकरणों में रुचि दिखाई है।

सूत्रों का कहना है कि “प्रगति 2026” ऐसे समय में आयोजित हो रही है जब हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आतंकवाद, अवैध तस्करी, समुद्री डकैती और क्षेत्रीय तनाव कई देशों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।

भारत पिछले कुछ सालों से “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और “नेबरहुड फर्स्ट” नीति के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। इसी रणनीति के तहत भारत कई द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सैन्य अभ्यास आयोजित कर रहा है।

वहीं “प्रगति” अभ्यास भारत की रक्षा कूटनीति का हिस्सा है। इससे भारत और क्षेत्रीय देशों के बीच सैन्य संबंध मजबूत होंगे और साझा सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सहयोग बढ़ेगा।

अभ्यास के अंतिम चरण में संयुक्त फील्ड ट्रेनिंग एक्सरसाइज होगी, जिसमें सभी देशों की सेनाएं मिलकर एक सिमुलेटेड मिशन पूरा करेंगी। इसमें ऑपरेशन प्लानिंग, टारगेट पहचान, इंटेलिजेंस शेयरिंग और संयुक्त कार्रवाई जैसी प्रक्रियाओं को परखा जाएगा।

300 किमी तक हमला करने वाले सूर्यास्त्र का सफल ट्रायल, सेना को मिलेगी लंबी दूरी की स्ट्राइक पावर

Suryastra Rocket System
Indian Army Receives Long-Range ‘Suryastra’ Rocket Launchers

Suryastra Rocket System: भारत की निजी डिफेंस कंपनी नाइब लिमिटेड ने लंबी दूरी तक मार करने वाले अपने सूर्यास्त्र रॉकेट सिस्टम का सफल फायरिंग डेमो पूरा कर लिया है। ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) में 18 और 19 मई को नाइब ने इन परीक्षणों को पूरा किया। इस दौरान 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट दागे गए।

कंपनी के मुताबिक दोनों रॉकेट्स ने बेहद सटीकता के साथ टारगेट को हिट किया। 150 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट का सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबल 1.5 मीटर रहा, जबकि 300 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट का सीईपी 2 मीटर दर्ज किया गया। इतनी लंबी दूरी पर इतने कम सीईपी को किसी भी रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

इन परीक्षणों को भारतीय सेना के इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट ऑर्डर का हिस्सा बताया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि यह भारत के निजी रक्षा उद्योग के लिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पहली बार किसी प्राइवेट कंपनी ने इतनी लंबी दूरी के प्रिसीजन रॉकेट सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया है।

क्या है Suryastra Rocket System

सूर्यास्त्र भारत का स्वदेशी यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है। इसे नाइब लिमिटेड ने बनाया है। यह सिस्टम अलग-अलग तरह के रॉकेट दाग सकता है, और इसकी रेंज 30 किलोमीटर से लेकर 300 किलोमीटर तक बताई जा रही है।

सूर्यास्त्र को इजरायल के प्रसिद्ध पीयूएलएस यानी प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम तकनीक के आधार पर भारतीय जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। हालांकि कंपनी ने इसमें काफी हद तक भारतीय तकनीक और लोकल मैन्युफैक्चरिंग को शामिल किया है।

इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसका मॉड्यूलर डिजाइन है। यानी एक ही लॉन्चर से अलग-अलग तरह के रॉकेट फायर किए जा सकते हैं।

‘शूट एंड स्कूट’ क्षमता

सूर्यास्त्र को आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यह एक हाई मोबिलिटी “शूट एंड स्कूट” सिस्टम है।

रॉकेट दागने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल सकता है। इससे दुश्मन के काउंटर अटैक से बचना आसान हो जाता है। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता बेहद अहम मानी जाती है क्योंकि दुश्मन अक्सर रॉकेट लॉन्च होने के बाद उसकी लोकेशन ट्रैक करने की कोशिश करता है।

चांदीपुर में क्यों हुए ट्रायल

इन परीक्षणों के लिए ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज को चुना गया। यह डीआरडीओ का प्रमुख मिसाइल और रॉकेट परीक्षण केंद्र है।

यहीं पर अग्नि, ब्रह्मोस और पिनाका जैसे कई बड़े हथियार सिस्टम्स के परीक्षण किए जाते रहे हैं। समुद्र के किनारे होने की वजह से यहां लंबी दूरी के हथियारों का सुरक्षित परीक्षण संभव होता है।

सूत्रों के मुताबिक परीक्षण के दौरान रॉकेट्स ने तय टारगेट को बेहद कम त्रुटि के साथ हिट किया। यही वजह है कि इन ट्रायल्स को भारतीय प्रिसीजन स्ट्राइक क्षमता के लिए अहम माना जा रहा है।

कितना सटीक है सूर्यास्त्र

सूर्यास्त्र रॉकेट्स में जीपीएस और आईएनएस आधारित गाइडेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। इसकी मदद से रॉकेट टारगेट तक पहुंचने के दौरान अपनी दिशा को लगातार सुधार सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक 300 किलोमीटर दूरी पर सिर्फ 2 मीटर का सीईपी हासिल करना बड़ी उपलब्धि माना जाता है। इसका मतलब है कि रॉकेट लगभग “पिन-पॉइंट एक्यूरेसी” के साथ टारगेट पर हमला कर सकता है।

यह क्षमता खासतौर पर दुश्मन के कमांड सेंटर, एयर डिफेंस सिस्टम, गोला-बारूद डिपो और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने में उपयोगी मानी जाती है।

भारतीय सेना ने क्यों दिखाई दिलचस्पी

भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से लंबी दूरी की प्रिसीजन स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। चीन और पाकिस्तान दोनों के पास लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं। ऐसे में भारतीय सेना भी ऐसे हथियार चाहती है जो दुश्मन के इलाके में अंदर तक हमला कर सकें।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने आकलन किया था कि पिनाका और गाइडेड पिनाका की रेंज 90 किमी तक है, इसके बाद एक गैप बन जाता है। वहीं लंबी रेंज के पिनाका आने में अभी लंबा वक्त है, जिसके बाद इस गैप को तुरंत भरने के लिए यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की जरूरत महसूस की गई।

सूत्रों के मुताबिक इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए जनवरी 2026 में सेना ने करीब 292.69 करोड़ रुपये का इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट दिया था। उसी ऑर्डर के तहत यह फायरिंग डेमोंस्ट्रेशन किया गया।

कैसे होते हैं इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट में ट्रायल

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट (ईपी) का इस्तेमाल तब किया जाता है जब सेना को किसी नई क्षमता की तुरंत जरूरत होती है। सामान्य रक्षा खरीद प्रक्रिया में ट्रायल्स कई महीनों या कई बार सालों तक चलते हैं, लेकिन ईपी में इन्हें सीमित समय में पूरा किया जाता है ताकि हथियार जल्दी सेना तक पहुंच सके।

सूत्रों के मुताबिक सूर्यास्त्र परियोजना भी इसी फास्ट ट्रैक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाई गई। जनवरी 2026 में भारतीय सेना ने करीब 293 करोड़ रुपये का इमरजेंसी ऑर्डर जारी किया था। इसके बाद मई 2026 में सिर्फ दो दिनों के भीतर ओडिशा के आईटीआर चांदीपुर में 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर रेंज वाले रॉकेट्स के लाइव फायरिंग ट्रायल्स किए गए।

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट में सबसे ज्यादा फोकस हथियार की जरूरी क्षमताओं को जल्दी परखने पर होता है। सूर्यास्त्र के मामले में भी सेना ने खास तौर पर सीईपी यानी निशाने की सटीकता, लॉन्च सिस्टम की परफॉर्मेंस और ऑपरेशनल क्षमता को परखा।

सूत्रों के मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में किसी नए रॉकेट सिस्टम के ट्रायल्स रेगिस्तान, ऊंचाई वाले इलाके, अलग-अलग मौसम और कई चरणों में किए जाते हैं। लेकिन इमरजेंसी प्रक्रिया में “रिप्रेजेंटेटिव कंडीशंस” में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण परीक्षण किए जाते हैं। यही वजह रही कि सूर्यास्त्र के ट्रायल्स चांदीपुर जैसी प्रमुख टेस्ट रेंज में कम समय में पूरे किए गए।

दाग सकता है अलग-अलग तरह के हथियार

सूर्यास्त्र केवल साधारण रॉकेट सिस्टम नहीं है। इसमें अलग-अलग प्रकार के हथियार इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

यह गाइडेड रॉकेट्स के अलावा लॉइटरिंग म्यूनिशन भी लॉन्च कर सकता है। लॉइटरिंग म्यूनिशन ऐसे ड्रोन जैसे हथियार होते हैं जो टारगेट के ऊपर कुछ समय तक मंडराने के बाद हमला करते हैं।

हालांकि भारत पहले से पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम इस्तेमाल कर रहा है। पिनाका की अलग-अलग वैरिएंट्स की रेंज 40 किलोमीटर से लेकर 90 किलोमीटर तक है।

हालांकि डीआरडीओ पिनाका के लंबी दूरी वाले वर्जन पर भी काम कर रहा है, लेकिन सूर्यास्त्र फिलहाल 300 किलोमीटर तक की क्षमता के साथ सामने आया है।

सूत्रों का कहना है कि सूर्यास्त्र और पिनाका दोनों सिस्टम भारतीय सेना की अलग-अलग जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।

इजरायल से लिया तकनीकी सहयोग

नाइब लिमिटेड ने 2025 में इजरायल की एल्बिट सिस्टम्स के साथ टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन एग्रीमेंट किया था।
इसी समझौते के तहत कंपनी को पीयूएलएस तकनीक तक पहुंच मिली। इसके बाद भारतीय जरूरतों के हिसाब से सूर्यास्त्र सिस्टम को डेवलप किया गया।

हालांकि कंपनी का कहना है कि उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारत में किया जा रहा है और इसमें स्थानीय उद्योगों की भी भागीदारी है।

आधुनिक युद्ध में क्यों अहम हैं ऐसे सिस्टम

रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया है कि लंबी दूरी के रॉकेट सिस्टम आधुनिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ऐसे हथियार दुश्मन की सप्लाई लाइन, कमांड पोस्ट और एयर डिफेंस सिस्टम को दूर से निशाना बना सकते हैं।

सूर्यास्त्र जैसे सिस्टम भारतीय सेना को “डीप स्ट्राइक” क्षमता देते हैं। यानी सीमा पार काफी अंदर तक मौजूद सैन्य ठिकानों को टारगेट किया जा सकता है।

नेटवर्क आधारित युद्ध के लिए तैयार

सूर्यास्त्र में एडवांस फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया गया है। यह नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए तैयार किया गया है।

यह सिस्टम दूसरे मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स और कमांड नेटवर्क के साथ जुड़कर काम कर सकता है। इससे टारगेट की जानकारी तेजी से साझा की जा सकती है और हमला ज्यादा सटीक बनाया जा सकता है।

गणतंत्र दिवस पर भी दिखा था सूर्यास्त्र

सूर्यास्त्र सिस्टम को इस साल जयपुर में हुई सेना परेड और गणतंत्र दिवस परेड में भी प्रदर्शित किया गया था। उस दौरान इसे ब्रह्मोस जैसे बड़े हथियार सिस्टम्स के साथ दिखाया गया था।

इसके बाद से रक्षा क्षेत्र में इस सिस्टम को लेकर काफी चर्चा थी। अब सफल फायरिंग परीक्षण के बाद इसकी क्षमताओं को लेकर और ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।

अब जमीन में छिपे प्लास्टिक IED की तुरंत होगी पहचान, सेना खरीदेगी ये खास माइन डिटेक्टर

Indian Army Dual Technology Mine Detector
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Dual Technology Mine Detector: भारतीय सेना अब ऐसी नई तकनीक वाले माइन डिटेक्टर्स खरीदने की तैयारी कर रही है, जो जमीन में दबे मेटल और नॉन-मेटल वाले दोनों तरह के माइंस और आईईडी का पता लगा सकेंगे। रक्षा मंत्रालय के अधीन डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (डीएमए) ने करीब 290.11 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया है। यह खरीद “डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर” के लिए की जा रही है, जिसे मॉडर्न बैटलफील्ड की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

यह परियोजना इसलिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आज आतंकवादी संगठन और दुश्मन सेनाएं ऐसे माइंस और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (आईईडी) का इस्तेमाल कर रही हैं, जिनमें मेटल बहुत कम होती है या बिल्कुल नहीं होती। ऐसे हालात में पुराने मेटल डिटेक्टर्स कई बार बेअसर साबित होते हैं।

भारतीय सेना ऐसे डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर की 386 यूनिट्स खरीदने की योजना बना रही है। डॉक्यूमेंट में साफ कहा गया है कि चुनी गई कंपनी को सप्लाई ऑर्डर मिलने के बाद 540 दिनों यानी करीब 18 महीनों के भीतर सभी उपकरणों की डिलीवरी पूरी करनी होगी। इसकी अंतिम तारीख 5 जून रखी गई है।

Dual Technology Mine Detector: क्यों जरूरी हैं नए माइन डिटेक्टर

भारतीय सेना के पास अभी मुख्य रूप से शिबेल और मेटेक्स जैसे माइन डिटेक्टर्स मौजूद हैं। ये पारंपरिक मेटल डिटेक्टर हैं, जो जमीन के नीचे दबे मेटल के हिस्सों को खोजते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में युद्ध और आतंकवाद का तरीका तेजी से बदला है।

अब प्लास्टिक, लकड़ी, सिरेमिक और दूसरी नॉन-मेटलिक सामग्री से बने माइंस और आईईडी का इस्तेमाल बढ़ा है। इनमें मेटल की मात्रा बेहद कम होती है। कई बार एक ग्राम से भी कम मेटल इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे माइंस को सामान्य डिटेक्टर पकड़ नहीं पाते।

इसी वजह से सेना अब डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर पर फोकस कर रही है। यह सिस्टम केवल मेटल नहीं खोजेगा, बल्कि जमीन के अंदर छिपी वस्तु की बनावट, डेंसिटी और अन्य सिग्नल्स के आधार पर भी उसकी पहचान कर सकेगा।

कैसे काम करेगा डुअल टेक्नोलॉजी सिस्टम

यह नया सिस्टम दो तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करेगा। पहला पारंपरिक मेटल डिटेक्शन सिस्टम होगा और दूसरा ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार यानी जीपीआर या आईआर तकनीक होगी।

जीपीआर तकनीक जमीन के नीचे मौजूद वस्तु की पहचान उसके डाइइलेक्ट्रिक गुणों और डेंसिटी में बदलाव के आधार पर करती है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि मिट्टी के नीचे कोई संदिग्ध वस्तु दबाई गई है या नहीं।

यह तकनीक खासतौर पर उन इलाकों में उपयोगी होती है जहां दुश्मन कम मेटल वाले माइंस का इस्तेमाल करता है।

डीएमए की तरफ से जारी डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि दोनों सब-सिस्टम स्वतंत्र रूप से भी काम कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर एक साथ भी इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इससे ऑपरेटर अलग-अलग परिस्थितियों में यूज कर सकेगा।

एक ग्राम मेटल तक पहचानने की क्षमता

जीएसक्यूआर के मुताबिक यह सिस्टम जमीन में दबे ऐसे माइंस और आईईडी को पहचान सकेगा, जिनमें कम से कम एक ग्राम मेटल मौजूद हो।

डिवाइस को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह रियल टाइम में खतरे की पहचान कर सके। दस्तावेज में छह सेंटीमीटर व्यास और चार सेंटीमीटर ऊंचाई वाले ऑब्जेक्ट को रेफरेंस के रूप में लिया गया है।

सूखे इलाके जैसे लेटराइट, मिट्टी और रेतीली जमीन में यह सिस्टम 12 सेंटीमीटर तक गहराई में दबे माइंस का पता लगा सकेगा। वहीं बर्फ, पानी या नमक वाली मिट्टी में भी इसकी क्षमता करीब 10 सेंटीमीटर तक रखी गई है।

सियाचिन से रेगिस्तान तक इस्तेमाल

भारतीय सेना को अलग-अलग मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में ऑपरेशन करने पड़ते हैं। इसी वजह से नए सिस्टम को बेहद कठिन वातावरण के लिए डिजाइन किया गया है।

डॉक्यूमेंट के मुताबिक यह इक्विपमेंट माइनस 10 डिग्री सेल्सियस से लेकर 42 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा। यानी इसे बर्फीले इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

सिस्टम को इस तरह तैयार करने की शर्त रखी गई है कि सैनिक एनबीसी सूट या भारी सर्दियों के कपड़ों में भी इसे आसानी से चला सकें। इसे दोनों हाथों से इस्तेमाल करने की सुविधा भी होगी।

लंबे समय तक ऑपरेशन के दौरान सैनिकों को कम थकान हो, इसके लिए इसमें सपोर्ट हार्नेस और स्लिंग सिस्टम भी दिया जाएगा।

ऑडियो और विजुअल अलार्म की सुविधा

नए डिटेक्टर में दो तरह के अलार्म सिस्टम होंगे। पहला ऑडियो अलार्म और दूसरा विजुअल अलार्म।

अगर जमीन के नीचे कोई संदिग्ध वस्तु मिलती है तो सिस्टम आवाज और स्क्रीन दोनों के जरिए संकेत देगा। दोनों तकनीकों के लिए अलग-अलग तरह की ध्वनि रखी जाएगी ताकि ऑपरेटर आसानी से समझ सके कि किस सिस्टम ने खतरा पकड़ा है।

इसमें हेडफोन के साथ इनबिल्ट स्पीकर का विकल्प भी होगा। विजुअल डिस्प्ले को दिन और रात दोनों समय साफ दिखाई देने लायक बनाया जाएगा। (Dual Technology Mine Detector)

वजन कम रखने पर जोर

भारतीय सेना ने इस सिस्टम के वजन को लेकर भी साफ मानक तय किए हैं। ऑपरेशनल मोड में बैटरी सहित इसका वजन आठ किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। रक्सैक सहित मैन पोर्टेबिलिटी मोड में वजन 12 किलो से कम रखना होगा। ट्रांसपोर्टेशन मोड में पूरा सिस्टम 20 किलो से अधिक नहीं होना चाहिए।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सैनिक पहले से ही हथियार, गोला-बारूद और दूसरे उपकरण लेकर चलते हैं। ऐसे में हल्का सिस्टम उनकी मोबिलिटी बढ़ाने में मदद करेगा।

कई पोजिशन में इस्तेमाल करने की सुविधा

जीएसक्यूआर में यह भी कहा गया है कि सैनिक इस उपकरण को खड़े होकर, घुटनों के बल या लेटकर भी आसानी से इस्तेमाल कर सकें।

इसके अलावा इसमें “सेलेक्टिव म्यूटिंग” की सुविधा भी होगी। यानी ऑपरेटर जरूरत पड़ने पर अनचाहे सिग्नल्स को बंद कर सकेगा।

ट्रेनिंग के लिए एक्सटर्नल स्पीकर जोड़ने का विकल्प भी दिया जाएगा ताकि जवानों को अभ्यास के दौरान अलार्म स्पष्ट सुनाई दे सके। (Dual Technology Mine Detector)

बैटरी और फील्ड सपोर्ट पर फोकस

सिस्टम में कमर्शियली उपलब्ध रिचार्जेबल बैटरियों का इस्तेमाल किया जाएगा। सेना ने बैटरी बैकअप के लिए भी मानक तय किए हैं।

माइनस 10 डिग्री से लेकर 50 डिग्री तापमान तक यह कम से कम चार घंटे लगातार काम कर सके। वहीं सामान्य तापमान में आठ घंटे तक ऑपरेशन की क्षमता होनी चाहिए।

फील्ड में रखरखाव आसान बनाने के लिए इसमें बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट यानी बीआईटीई सिस्टम भी होगा। इससे सैनिक मौके पर ही खराबी की पहचान कर सकेंगे। (Dual Technology Mine Detector)

बारिश और खराब मौसम में भी काम करेगा

भारतीय सेना चाहती है कि यह सिस्टम बारिश और खराब मौसम में भी प्रभावी तरीके से काम करे।

इसी वजह से इसे ऑल-वेदर ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। हर यूनिट के साथ कैरींग केस और रक्सैक भी उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि उपकरण को सुरक्षित तरीके से ले जाया जा सके।

बैटलफील्ड में इंजीनियरिंग यूनिट्स का सबसे महत्वपूर्ण काम सैनिकों और वाहनों के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करना होता है।

माइंस और आईईडी इस काम में सबसे बड़ा खतरा बनते हैं। कई बार सड़क, पुल या सीमावर्ती इलाकों में छिपाए गए विस्फोटक जवानों के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

नया डुअल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर ऐसी परिस्थितियों में सैनिकों को तेजी से खतरे की पहचान करने में मदद करेगा। (Dual Technology Mine Detector)

दुश्मन के टैंक से लेकर हेलीकॉप्टर तक सब होंगे निशाने पर, DRDO की नई स्मार्ट मिसाइल ULPGM-V3 का ड्रोन से सफल परीक्षण

DRDO ULPGM-V3 Missile
DRDO ULPGM-V3 Missile

DRDO ULPGM-V3 Missile: भारत ने ड्रोन से लॉन्च होने वाली अपनी नई स्वदेशी मिसाइल ULPGM-V3 का सफल परीक्षण पूरा कर लिया है। डीआरडीओ ने इस मिसाइल के फाइनल डेवलपमेंट ट्रायल्स आंध्र प्रदेश के कुर्नूल स्थित टेस्ट रेंज में किए। खास बात यह रही कि इस मिसाइल का परीक्षण केवल जमीन पर मौजूद टारगेट्स पर ही नहीं, बल्कि हवा में उड़ने वाले ड्रोन और हेलीकॉप्टर जैसे टारगेट्स पर भी किया गया।

डीआरडीओ के मुताबिक ULPGM-V3 अब एयर-टू-ग्राउंड और एयर-टू-एयर दोनों मोड में काम कर सकती है। यह मिसाइल टैंक, बंकर और दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने के साथ-साथ हवा में मौजूद दुश्मन ड्रोन और हेलीकॉप्टरों को भी मार सकती है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा रणनीतिक कदम बताया है। उन्होंने डीआरडीओ, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, निजी कंपनियों और इंडस्ट्री से जुड़े सभी भागीदारों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। वहीं, डीआरडीओ चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने इस उपलब्धि पर सभी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और इंडस्ट्री पार्टनर्स को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह भारतीय रक्षा तकनीक की बड़ी उपलब्धि है।

क्या है DRDO ULPGM-V3 Missile

ULPGM का पूरा नाम अनमैन्ड एरियल व्हीकल लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल है। यह एक हल्की लेकिन बेहद सटीक मिसाइल है, जिसे ड्रोन यानी यूएवी से लॉन्च किया जाता है।

यह “फायर एंड फॉरगेट” तकनीक पर आधारित है। इसका मतलब है कि मिसाइल को लॉन्च करने के बाद ऑपरेटर को लगातार उसे कंट्रोल करने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल खुद अपने टारगेट को ट्रैक करती है और हमला करती है।

डीआरडीओ ने ULPGM के पिछले वर्जन के मुकाबले V3 में कई बड़े बदलाव किए हैं। इसमें नई गाइडेंस तकनीक, ज्यादा रेंज, बेहतर सीकर और मल्टी-रोल क्षमता जोड़ी गई है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

पहली बार मिली एयर-टू-एयर क्षमता

ULPGM-V3 की सबसे बड़ी खासियत इसकी नई एयर-टू-एयर क्षमता मानी जा रही है। अब तक इस तरह की हल्की मिसाइलें मुख्य रूप से जमीन पर मौजूद टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल होती थीं, लेकिन अब यह हवा में मौजूद ड्रोन, हेलीकॉप्टर और दूसरे लो-स्पीड हवाई लक्ष्यों को भी निशाना बना सकती है।

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे और सस्ते ड्रोन अब निगरानी, हमला और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में ड्रोन से लॉन्च होने वाली यह मिसाइल भारतीय सेना को नई क्षमता दे सकती है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

कितनी ताकतवर है मिसाइल

ULPGM-V3 का वजन करीब 12.5 किलोग्राम बताया जा रहा है। इसकी लंबाई लगभग 680 से 890 मिलीमीटर के बीच है, जबकि व्यास 100 मिलीमीटर है। हल्का डिजाइन होने की वजह से इसे छोटे क्वाडकॉप्टर ड्रोन से लेकर बड़े यूएवी और अटैक हेलीकॉप्टरों तक पर लगाया जा सकता है।

मिसाइल की रेंज को भी पहले से बढ़ाया गया है। दिन के समय यह करीब 4 से 10 किलोमीटर तक के टारगेट को निशाना बना सकती है। रात में भी इसकी मारक क्षमता 2.5 किलोमीटर से ज्यादा बताई जा रही है।

डीआरडीओ ने इसमें हाई-डेफिनिशन डुअल चैनल सीकर लगाया है। इसमें आईआईआर यानी इमेजिंग इंफ्रारेड और एस-बैंड आरएफ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसकी मदद से मिसाइल दिन और रात दोनों समय टारगेट को पहचान सकती है।

ट्रायल्स के दौरान एक इंटीग्रेटेड ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। यह सिस्टम मिसाइल और ड्रोन दोनों को कंट्रोल करता है।

इसमें ऑटोमेटेड रेडीनेस और लॉन्च ऑपरेशन जैसी आधुनिक तकनीकें जोड़ी गई हैं। इससे ऑपरेटर को तेजी से टारगेट लॉक करने और लॉन्च करने में मदद मिलती है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

टारगेट बदलने की भी क्षमता

ULPGM-V3 में टू-वे डेटा लिंक तकनीक भी दी गई है। इसका मतलब है कि लॉन्च के बाद भी ऑपरेटर मिसाइल को नई जानकारी भेज सकता है।

अगर युद्ध के दौरान टारगेट बदल जाए या नया खतरा सामने आ जाए तो मिसाइल को री-टारगेट भी किया जा सकता है। इसे आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए बेहद अहम क्षमता माना जा रहा है। यह फीचर खासतौर पर तेजी से बदलते बैटलफील्ड माहौल में उपयोगी होता है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

जामिंग में भी कर सकती है हमला

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग बड़ी चुनौती बन चुकी है। दुश्मन अक्सर जीपीएस और कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम करने की कोशिश करता है।

डीआरडीओ के मुताबिक ULPGM-V3 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह जामिंग की स्थिति में भी काम कर सके। जरूरत पड़ने पर यह ऑटोनॉमस मोड में जाकर खुद टारगेट तक पहुंच सकती है।

इस क्षमता की वजह से इसे इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर वातावरण में भी प्रभावी माना जा रहा है।

लगा सकते हैं अलग-अलग तरह के वारहेड

ULPGM-V3 को मॉड्यूलर डिजाइन के साथ तैयार किया गया है। यानी जरूरत के हिसाब से इसमें अलग-अलग तरह के वारहेड लगाए जा सकते हैं।

इसका एंटी-आर्मर वारहेड आधुनिक टैंकों और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर यानी ईआरए वाले बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह टॉप-अटैक मोड में हमला कर सकता है, जिसमें मिसाइल टैंक के ऊपर वाले कमजोर हिस्से पर वार करती है।

इसके अलावा इसमें पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट वारहेड भी लगाया जा सकता है, जो बंकर और कंक्रीट स्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के लिए बनाया गया है।

तीसरा विकल्प प्री-फ्रैगमेंटेड वारहेड का है, जिसका इस्तेमाल सैनिकों और दूसरे सॉफ्ट टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकता है।

लगाई है डुअल-थ्रस्ट रॉकेट मोटर

मिसाइल में डुअल-थ्रस्ट सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है। इसका फायदा यह होता है कि मिसाइल लॉन्च के बाद पहले तेजी से गति पकड़ती है और बाद में लंबे समय तक एक रफ्तार पर उड़ती रहती है। इससे मिसाइल की रेंज और सटीकता दोनों बेहतर होती हैं।

सूत्रों के मुताबिक ULPGM-V3 की सटीकता यानी सीईपी करीब 10 सेंटीमीटर तक बताई जा रही है। यानी यह बेहद छोटे क्षेत्र में सटीक वार कर सकती है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

क्यों महत्वपूर्ण है ULPGM-V3

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक युद्ध तेजी से ड्रोन आधारित होता जा रहा है। छोटे ड्रोन अब केवल निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हथियार लेकर हमले भी कर रहे हैं।

ऐसे माहौल में हल्की, सस्ती और सटीक मिसाइलों की जरूरत बढ़ रही है। ULPGM-V3 को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

यह मिसाइल महंगी एंटी-टैंक या एयर डिफेंस मिसाइलों का कम लागत वाला विकल्प भी मानी जा रही है। इसकी मदद से छोटे ड्रोन भी बड़े सैन्य टारगेट्स पर सटीक हमला कर सकते हैं।

पूरी तरह स्वदेशी परियोजना

डीआरडीओ ने इस मिसाइल को पूरी तरह भारतीय डिफेंस इकोसिस्टम के साथ मिलकर डेवलप किया है। इसका नेतृत्व हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत यानी आरसीआई ने किया।

इसके अलावा डीआरडीओ की कई अन्य लैब्स भी इस परियोजना में शामिल रहीं। इनमें डीआरडीएल हैदराबाद, टीबीआरएल चंडीगढ़ और एचईएमआरएल पुणे शामिल हैं।

मिसाइल के विकास और उत्पादन में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल और अदाणी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज लिमिटेड भी शामिल हैं।

इस परियोजना में बेंगलुरु की भारतीय स्टार्टअप कंपनी न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज का भी बड़ा योगदान रहा। कंपनी के यूएवी प्लेटफॉर्म्स पर इस मिसाइल का परीक्षण किया गया।

यह पहली बार है जब डीआरडीओ, सरकारी कंपनियां, निजी रक्षा कंपनियां, स्टार्टअप्स और एमएसएमई इतने बड़े स्तर पर एक साथ काम करते दिखाई दिए हैं।

डीआरडीओ के मुताबिक इस परियोजना में 30 से ज्यादा एमएसएमई और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल रहे।

सीरियल प्रोडक्शन के लिए तैयार

डीआरडीओ ने कहा है कि ट्रायल्स के दौरान यह साबित हो गया कि मिसाइल की घरेलू सप्लाई चेन पूरी तरह तैयार है। अब इस मिसाइल का बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया जा सकता है। इसे भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। (DRDO ULPGM-V3 Missile)

सेना प्रमुख बोले- ऑपरेशन सिंदूर में 22 मिनट में तोड़ी दुश्मन की रणनीति, दिखाई ‘स्मार्ट पावर’ की ताकत

Operation Sindoor Smart Power
Army Chief General Upendra Dwivedi

Operation Sindoor Smart Power: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की “स्मार्ट पावर” का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है। उन्होंने कहा कि यह केवल सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसमें सैन्य ताकत, कूटनीतिक संदेश, सूचना नियंत्रण और आर्थिक संकल्प सभी का एक साथ इस्तेमाल किया गया।

दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित “सिक्योरिटी टू प्रॉस्पेरिटी” राष्ट्रीय सेमिनार में बोलते हुए सेना प्रमुख ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने दिखा दिया कि आधुनिक दौर में सिर्फ हथियारों की ताकत ही काफी नहीं होती, बल्कि टेक्नोलॉजी, रणनीति और तेज फैसले भी उतने ही जरूरी हैं।

उन्होंने बताया कि यह अभियान केवल 22 मिनट तक चला, लेकिन इस दौरान भारतीय सेनाओं ने आतंकी ढांचे को गहरा नुकसान पहुंचाया। सेना प्रमुख के मुताबिक कार्रवाई पूरी तरह सटीक और योजनाबद्ध थी।

Operation Sindoor Smart Power: 22 मिनट की कार्रवाई, 88 घंटे बाद जानबूझकर रोका गया ऑपरेशन

जनरल द्विवेदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय बलों ने दुश्मन के आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने लंबे समय से बनी एक रणनीतिक सोच को भी तोड़ दिया।

सेना प्रमुख ने बताया कि कार्रवाई के बाद भारत ने 88 घंटे के भीतर ऑपरेशन को जानबूझकर और सोच-समझकर रोका। उनके मुताबिक यह फैसला किसी दबाव में नहीं बल्कि रणनीतिक संतुलन को ध्यान में रखकर लिया गया था।

उन्होंने कहा कि आधुनिक संघर्षों में केवल हमला करना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि यह तय करना भी जरूरी होता है कि कब रुकना है और कितना संदेश देना है।

“दुनिया अब पावर पॉलिटिक्स से चल रही है”

अपने संबोधन में सेना प्रमुख ने कहा कि आज दुनिया अव्यवस्था, अविश्वास और बदलते गठबंधनों के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में अब “पावर पॉलिटिक्स” समृद्धि को प्रभावित कर रही है।

उन्होंने कहा कि पहले यह माना जाता था कि वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास युद्ध और संघर्ष को पीछे छोड़ देंगे, लेकिन मौजूदा हालात अलग तस्वीर दिखा रहे हैं।

जनरल द्विवेदी ने अपनी बात के दौरान “द एंड ऑफ हिस्ट्री एंड द लास्ट मैन” किताब का भी जिक्र किया और कहा कि दुनिया अब फिर से शक्ति संतुलन की राजनीति की तरफ बढ़ रही है।

लैब से बैटलफील्ड तक तेजी से पहुंच रही तकनीक

सेना प्रमुख ने आधुनिक युद्ध में तकनीक की भूमिका पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि पहले किसी नई सैन्य तकनीक को लैब से युद्धक्षेत्र तक पहुंचने में कई दशक लग जाते थे, लेकिन अब यह समय घटकर कुछ महीनों तक रह गया है।

उन्होंने कहा कि अगर कोई तकनीक बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं हो पाती तो उसका महत्व कम हो जाता है।

जनरल द्विवेदी के मुताबिक भारत के पास नए आइडिया और प्रोटोटाइप तैयार करने की क्षमता मौजूद है, लेकिन अब जरूरत उन्हें बड़े स्तर पर लागू करने की है।

उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वॉरफेयर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, ऑटोनॉमस सिस्टम्स, स्पेस और एडवांस मैटेरियल्स आधुनिक युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

निजी कंपनियों और रिसर्च संस्थानों की भूमिका अहम

सेना प्रमुख ने कहा कि भारत को रक्षा तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने के लिए सरकार, निजी कंपनियों, रिसर्च संस्थानों और अकादमिक क्षेत्र के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि ड्यूल-यूज रिसर्च एंड डेवलपमेंट इकोसिस्टम को मजबूत करना होगा। इसका मतलब ऐसी तकनीकों से है जिनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य – दोनों क्षेत्रों में किया जा सके।

उन्होंने साफ कहा कि सरकार को निजी क्षेत्र को स्पष्ट समर्थन देना चाहिए ताकि रक्षा क्षेत्र में नई तकनीकों का तेजी से विकास हो सके।

विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता को बताया बड़ा खतरा

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि आज सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा केवल सैन्य कमजोरी नहीं है, बल्कि विदेशी सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भरता भी है।

उन्होंने कहा कि अगर कोई देश जरूरी तकनीक, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर या महत्वपूर्ण खनिजों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है, तो यह उसकी सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।

उन्होंने कहा कि मजबूती का मतलब केवल हथियार खरीदना नहीं है, बल्कि जरूरी संसाधनों और तकनीकों में आत्मनिर्भर बनना भी है।

सेना प्रमुख ने कहा कि भारत को समान सोच वाले देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ानी चाहिए, लेकिन साथ ही अपनी घरेलू क्षमता भी मजबूत करनी होगी।

“जो टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण करेगा, वही युद्ध के नतीजे तय करेगा”

सेना प्रमुख ने कहा कि आने वाले दशक में वही देश युद्ध के नतीजों को प्रभावित करेगा जिसके पास आधुनिक टेक्नोलॉजी पर पकड़ होगी।

उन्होंने कहा कि भारत को केवल विदेशी तकनीक अपनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे स्वदेशी तकनीकों को विकसित करना, उन्हें सैन्य इस्तेमाल के लिए तैयार करना और उनमें नेतृत्व करना होगा।

उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में डेटा, नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और एआई आधारित फैसले बहुत अहम हो चुके हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी का भी किया जिक्र

अपने भाषण के दौरान जनरल द्विवेदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बयान का भी जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि “शांति का मतलब ताकत की कमी नहीं होता, बल्कि क्षमता, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की मौजूदगी होता है।”

सेना प्रमुख ने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और रक्षा क्षेत्र में कई बड़े बदलाव हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब जरूरी है कि देश नई चुनौतियों के मुताबिक अपनी तैयारी को लगातार मजबूत करता रहे।

अब मिसाइल नहीं, माइक्रोवेव से ढेर होंगे दुश्मन के ड्रोन, भारतीय नौसेना ने दिया हाईटेक सीक्रेट वेपन का कॉन्ट्रैक्ट

Indian Navy Microwave Weapon Tonbo Imaging

Indian Navy Microwave Weapon: भारतीय नौसेना डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी टोनबो इमेजिंग को हाई पावर माइक्रोवेव यानी एचपीएम सिस्टम को विकसित और नेवल प्लेटफॉर्म्स पर इंटीग्रेट करने का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। यह प्रोजेक्ट अदिति 3.0 (ADITI) इनोवेशन फ्रेमवर्क के तहत दिया गया है।

यह सिस्टम ड्रोन खतरों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की चुनौतियों से निपटने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। दुनिया के बहुत कम देशों के पास ऐसी हाई पावर माइक्रोवेव क्षमता मौजूद है।

Indian Navy Microwave Weapon: क्या होता है हाई पावर माइक्रोवेव सिस्टम

हाई पावर माइक्रोवेव सिस्टम एक तरह का नॉन-किनेटिक डायरेक्टेड एनर्जी वेपन होता है। इसका मतलब यह है कि यह पारंपरिक मिसाइल या गोली की तरह विस्फोट करके हमला नहीं करता, बल्कि बेहद ताकतवर माइक्रोवेव पल्स के जरिए दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बेकार कर देता है।

जब यह सिस्टम किसी ड्रोन, सेंसर, कम्युनिकेशन नेटवर्क या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पर माइक्रोवेव एनर्जी छोड़ता है तो उसके सर्किट प्रभावित हो जाते हैं। इससे दुश्मन के ड्रोन, रडार, नेविगेशन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण काम करना बंद कर सकते हैं।

रक्षा जानकारों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में यह तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आज ज्यादातर सैन्य प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर निर्भर हैं।

स्वार्म ड्रोन के खिलाफ बेहद कारगर

हाल के सालों में स्वार्म ड्रोन यानी एक साथ बड़ी संख्या में छोटे ड्रोन से हमला करने की रणनीति अपनाई जाती है। ऐसे ड्रोन सस्ते होते हैं लेकिन एक साथ हमला करके बड़े मिलिट्री सिस्टम को चुनौती दे सकते हैं।

पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम या मिसाइलों से हर छोटे ड्रोन पर अटैक करना महंगा और मुश्किल होता है। वहीं हाई पावर माइक्रोवेव सिस्टम एक साथ कई ड्रोन को टारगेट किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री युद्ध में यह तकनीक और ज्यादा उपयोगी हो सकती है क्योंकि युद्धपोतों को कई दिशाओं से आने वाले ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक खतरों का सामना करना पड़ सकता है। (Indian Navy Microwave Weapon Tonbo Imaging)

टोनबो इमेजिंग को मिला प्रोजेक्ट

भारतीय नौसेना ने यह प्रोजेक्ट टोनबो इमेजिंग को दिया है। यह कंपनी पहले इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स, थर्मल इमेजिंग और नाइट विजन सिस्टम्स के लिए जानी जाती थी। अब कंपनी एडवांस डिफेंस टेक्नोलॉजी, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस के सेक्टर में भी तेजी से काम कर रही है।

कंपनी का कहना है कि इस प्रोग्राम के तहत वह नेवल प्लेटफॉर्म्स के लिए सिस्टम इंटीग्रेशन और कमीशनिंग का काम करेगी। इसके बाद सफल परीक्षण और मंजूरी मिलने पर कई प्रोडक्शन यूनिट्स भी सप्लाई की जाएंगी।

टोनबो इमेजिंग के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ अरविंद लक्ष्मीकुमार ने कहा कि यह कार्यक्रम कंपनी के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से कंपनी हाई पावर माइक्रोवेव तकनीक के जरूरी सब-सिस्टम्स और वैक्यूम ट्यूब आधारित सोर्सेज पर काम कर रही है।

क्यों खास है वैक्यूम ट्यूब तकनीक

कंपनी के मुताबिक एचपीएम सिस्टम के लिए बेहद हाई पावर ऊर्जा की जरूरत होती है। इसके लिए वैक्यूम ट्यूब आधारित माइक्रोवेव सोर्स अभी सबसे प्रभावी माने जाते हैं।

अरविंद लक्ष्मीकुमार ने बताया कि सॉलिड-स्टेट आरएफ सिस्टम कई क्षेत्रों में अच्छे हैं, लेकिन हाई पावर माइक्रोवेव सिस्टम के लिए जरूरी एनर्जी लेवल हासिल करना अभी उनके लिए संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि टोनबो उन चुनिंदा निजी कंपनियों में शामिल है जिनके पास वैक्यूम ट्यूब टेक्नोलॉजी से जुड़ी खुद की इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी मौजूद है।

वेवस्ट्राइक सिस्टम पर काम

रक्षा सूत्रों के मुताबिक यह कॉन्ट्रैक्ट टोनबो के वेवस्ट्राइक हाई पावर माइक्रोवेव सिस्टम से जुड़ा माना जा रहा है। कंपनी ने इसे एरो इंडिया 2025 में पेश किया था।

यह सिस्टम मल्टी-बीम क्लाइस्ट्रॉन तकनीक पर आधारित है। इसकी मदद से कम पावर में ज्यादा माइक्रोवेव एनर्जी पैदा की जा सकती है।

सिस्टम में एईएसए रडार और ईओ/आईआर कैमरे भी लगाए गए हैं। ये टारगेट की पहचान और ट्रैकिंग में मदद करते हैं। इसके जरिए ऑटोमैटिक टारगेटिंग भी संभव होती है।

मौजूदा सिस्टम की रेंज करीब तीन किलोमीटर बताई जा रही है। वहीं पांच किलोमीटर रेंज वाला एडवांस वर्जन भी डेवलप किया जा रहा है। (Indian Navy Microwave Weapon Tonbo Imaging)

हर मौसम में कर सकता है काम

एचपीएम सिस्टम की खास बात यह भी है कि यह अलग-अलग मौसम में काम कर सकता है। बारिश, धुंध और कम दृश्यता जैसे हालात में भी यह बखूबी काम कर सकता है।

इसे लैंड बेस्ड व्हीकल्स, युद्धपोतों और दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर लगाया जा सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के सिस्टम भविष्य के नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर में अहम भूमिका निभाएंगे। (Indian Navy Microwave Weapon Tonbo Imaging)

क्या है ADITI 3.0 

एडीआईटीआई का पूरा नाम “एसिंग डेवलपमेंट ऑफ इनोवेटिव टेक्नोलॉजीज विद आईडेक्स” है। यह भारत सरकार की पहल है जिसका मकसद नई रक्षा तकनीकों को विकसित करना और उन्हें सैन्य इस्तेमाल के लिए तैयार करना है।

इस कार्यक्रम के तहत हाई पावर माइक्रोवेव वेपन सिस्टम जैसे डीप-टेक समाधान विकसित किए जा रहे हैं। भारतीय नौसेना ने एडीआईटीआई 3.0 के तहत स्वायत्त ड्रोन झुंड को निष्क्रिय करने वाले सिस्टम की जरूरत रखी थी।

रक्षा मंत्रालय का फोकस ऐसे स्वदेशी सिस्टम विकसित करना है जो भविष्य के युद्ध में उपयोगी हों और विदेशी निर्भरता कम करें। (Indian Navy Microwave Weapon Tonbo Imaging)

नौसेना के लिए क्यों अहम है यह सिस्टम

भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रही है। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और नेटवर्क आधारित हमले अब समुद्री सुरक्षा के बड़े खतरे बनते जा रहे हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में केवल मिसाइल और तोपें ही पर्याप्त नहीं होंगी। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर कंट्रोल भी उतना ही जरूरी होगा।

इसी वजह से नौसेना अब ऐसी तकनीकों पर निवेश बढ़ा रही है जो दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बिना बड़े भौतिक नुकसान के निष्क्रिय कर सकें।

टोनबो इमेजिंग पहले से भारतीय सेना और कई अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को थर्मल इमेजिंग और ऑप्ट्रॉनिक सिस्टम सप्लाई कर चुकी है। कंपनी का फोकस अब इंटीग्रेटेड डिफेंस सिस्टम्स पर बढ़ रहा है।

कंपनी लॉइटरिंग म्यूनिशन, काउंटर-यूएएस सिस्टम, एम्बेडेड सॉफ्टवेयर और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स पर भी काम कर रही है। (Indian Navy Microwave Weapon Tonbo Imaging)

Bharat Forge विशाखापट्टनम में बनाएगी भारत का पहला प्राइवेट मरीन गैस टरबाइन हब, देश में ही होगी वॉरशिप्स के इंजनों की मरम्मत

Bharat Forge Marine Gas Turbine

Bharat Forge Marine Gas Turbine: भारत फोर्ज लिमिटेड ने आंध्र प्रदेश सरकार के साथ एक अहम समझौता किया है, जिसके तहत विशाखापट्टनम में देश का पहला प्राइवेट सेक्टर मरीन गैस टरबाइन सुविधा केंद्र बनाया जाएगा। यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के युद्धपोतों में इस्तेमाल होने वाले गैस टरबाइन इंजनों की मरम्मत, ओवरहॉल और भविष्य में स्वदेशी विकास से जुड़ा होगा।

यह समझौता 15 मई को आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी में आयोजित एयरोस्पेस और डिफेंस इन्वेस्टमेंट कॉन्क्लेव के दौरान हुआ था। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू भी मौजूद थे। इसी कार्यक्रम में भारत के एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए स्टेल्थ फाइटर प्रोग्राम की आधारशिला भी रखी गई।

भारत फोर्ज की ओर से कंपनी के एयरोस्पेस डिवीजन के सीईओ गुरु बिस्वाल ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। कंपनी का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक को पूरा करेगा।

भारत फोर्ज के वाइस चेयरमैन और जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अमित कल्याणी ने कहा कि भारतीय युद्धपोत लंबे समय तक विदेशी इंजनों पर निर्भर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विशाखापट्टनम में बनने वाली यह सुविधा उस निर्भरता को कम करने की दिशा में बड़ा कदम है।

अमित कल्याणी के मुताबिक यह केवल एक निवेश नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना और देश के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता है।

Bharat Forge Marine Gas Turbine: क्या होता है मरीन गैस टरबाइन

मरीन गैस टरबाइन युद्धपोतों का बेहद अहम हिस्सा होता है। यह वही सिस्टम है जो बड़े नौसैनिक जहाजों को ताकत देता है और उन्हें तेज रफ्तार से समुद्र में चलाने में मदद करता है।

आधुनिक युद्धपोतों में हाई-स्पीड ऑपरेशन, लंबी दूरी की तैनाती और तेजी से प्रतिक्रिया के लिए गैस टरबाइन इंजन इस्तेमाल किए जाते हैं। इन्हें लगातार हाई टैंपरेचर और हेवी प्रेशर में काम करना पड़ता है। इसलिए इन इंजनों की समय-समय पर मरम्मत और ओवरहॉलिंग बेहद जरूरी होती है।

अब तक भारत इन तकनीकों के लिए काफी हद तक विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। खासतौर पर यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट जैसी कंपनियां भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण सप्लायर रही हैं। लेकिन वैश्विक तनाव और सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में घरेलू क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा था। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

विशाखापट्टनम में क्यों बन रहा है यह केंद्र

विशाखापट्टनम भारतीय नौसेना का एक बड़ा और रणनीतिक बेस है। यहां ईस्टर्न नेवल कमांड का मुख्यालय मौजूद है। इसके अलावा नेवल डॉकयार्ड और आईएनएस एक्सिला जैसी महत्वपूर्ण नौसैनिक सुविधाएं भी यहीं स्थित हैं।

भारत फोर्ज का यह नया केंद्र करीब 80 एकड़ जमीन पर आंध्र प्रदेश डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर के अंदर बनाया जाएगा। यह लोकेशन इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे नौसेना के जहाजों के इंजन की मरम्मत और रखरखाव का समय काफी कम हो जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पहले कई मामलों में विदेशी सहायता या बाहरी सपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते थे। अब यह काम भारत में ही तेजी से किया जा सकेगा। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

दो चरणों में पूरा होगा प्रोजेक्ट

भारत फोर्ज इस परियोजना को दो चरणों में विकसित करेगा। पहले चरण में मरीन गैस टरबाइन रिपेयर और ओवरहॉल कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा। इसमें टरबाइन ब्लेड्स, वेंस और कॉम्बशन लाइनर्स की मरम्मत की सुविधा होगी। साथ ही कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और एनडीई यानी नॉन-डिस्ट्रक्टिव एग्जामिनेशन लेबोरेटरी भी बनाई जाएगी।

कंपनी का दावा है कि इस सुविधा के जरिए नेवल डॉकयार्ड को 72 घंटे के अंदर तकनीकी सपोर्ट दिया जा सकेगा। यानी जहाजों के इंजन की जांच और जरूरी मरम्मत पहले की तुलना में काफी तेजी से होगी।

दूसरे चरण में भारत का पहला प्राइवेट सेक्टर मरीन गैस टरबाइन डेवलपमेंट और असेंबली हॉल बनाया जाएगा। यहां फुल-स्पेक्ट्रम हॉट टेस्ट सेल भी स्थापित किया जाएगा, जहां अलग-अलग क्षमता वाले इंजनों की टेस्टिंग हो सकेगी।

इसी चरण में पहली बार भारत में स्वदेशी मरीन गैस टरबाइन को डेवलप और क्वालिफाई करने का काम शुरू होगा।

नौसेना के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

भारतीय नौसेना लगातार अपने युद्धपोत बेड़े को आधुनिक बना रही है। नए विध्वंसक, फ्रिगेट और दूसरे बड़े जहाजों में एडवांस प्रोपल्शन सिस्टम की जरूरत होती है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के समय किसी भी देश के लिए अपने जहाजों की मरम्मत क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है। अगर इंजन या प्रोपल्शन सिस्टम के लिए विदेशी सपोर्ट पर निर्भरता ज्यादा हो तो ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं।

भारत फोर्ज का यह प्रोजेक्ट इसी कमी को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे नौसेना को घरेलू स्तर पर इंजन सपोर्ट मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

इस प्रोजेक्ट से करीब 750 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। इंजीनियरिंग, मशीनिंग, टेस्टिंग और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े स्थानीय युवाओं को भी इसमें अवसर मिल सकते हैं।

आंध्र प्रदेश सरकार लंबे समय से राज्य को एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रही है। यह प्रोजेक्ट उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की सुविधाओं से आसपास छोटी और मध्यम उद्योग इकाइयों को भी काम मिलेगा। इससे सप्लाई चेन और लोकल इंडस्ट्री दोनों मजबूत होंगे।

भारत फोर्ज कल्याणी ग्रुप की प्रमुख कंपनी है और ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में काम करती है।

पिछले कुछ वर्षों में कंपनी ने रक्षा क्षेत्र में तेजी से विस्तार किया है। कंपनी पहले ही आर्टिलरी सिस्टम, ड्रोन इंजन और एयरोस्पेस कंपोनेंट्स पर काम कर रही है।

कंपनी का एयरोस्पेस डिवीजन बेंगलुरु में गैस टरबाइन और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट सेंटर भी चला रहा है। यहां इंजन डिजाइन और विकास पर काम किया जा रहा है।

भारत फोर्ज ने हाल ही में जोर्या-माशप्रोएक्ट इंडिया में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी भी हासिल की है। इससे कंपनी की मरीन गैस टरबाइन क्षेत्र में मौजूदगी और मजबूत हुई है। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

आंध्र प्रदेश बन रहा डिफेंस हब

आंध्र प्रदेश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर को तेजी से विकसित किया जा रहा है। सरकार राज्य में एयरोस्पेस, नौसैनिक और रक्षा उद्योग से जुड़े बड़े निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रही है।

विशाखापट्टनम पहले से ही नौसैनिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। अब मरीन गैस टरबाइन जैसी हाई-टेक सुविधा आने से इसकी रणनीतिक और औद्योगिक अहमियत और बढ़ गई है। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)