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Bharat Forge विशाखापट्टनम में बनाएगी भारत का पहला प्राइवेट मरीन गैस टरबाइन हब, देश में ही होगी वॉरशिप्स के इंजनों की मरम्मत

Bharat Forge Marine Gas Turbine

Bharat Forge Marine Gas Turbine: भारत फोर्ज लिमिटेड ने आंध्र प्रदेश सरकार के साथ एक अहम समझौता किया है, जिसके तहत विशाखापट्टनम में देश का पहला प्राइवेट सेक्टर मरीन गैस टरबाइन सुविधा केंद्र बनाया जाएगा। यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के युद्धपोतों में इस्तेमाल होने वाले गैस टरबाइन इंजनों की मरम्मत, ओवरहॉल और भविष्य में स्वदेशी विकास से जुड़ा होगा।

यह समझौता 15 मई को आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी में आयोजित एयरोस्पेस और डिफेंस इन्वेस्टमेंट कॉन्क्लेव के दौरान हुआ था। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू भी मौजूद थे। इसी कार्यक्रम में भारत के एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए स्टेल्थ फाइटर प्रोग्राम की आधारशिला भी रखी गई।

भारत फोर्ज की ओर से कंपनी के एयरोस्पेस डिवीजन के सीईओ गुरु बिस्वाल ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। कंपनी का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक को पूरा करेगा।

भारत फोर्ज के वाइस चेयरमैन और जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अमित कल्याणी ने कहा कि भारतीय युद्धपोत लंबे समय तक विदेशी इंजनों पर निर्भर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विशाखापट्टनम में बनने वाली यह सुविधा उस निर्भरता को कम करने की दिशा में बड़ा कदम है।

अमित कल्याणी के मुताबिक यह केवल एक निवेश नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना और देश के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता है।

Bharat Forge Marine Gas Turbine: क्या होता है मरीन गैस टरबाइन

मरीन गैस टरबाइन युद्धपोतों का बेहद अहम हिस्सा होता है। यह वही सिस्टम है जो बड़े नौसैनिक जहाजों को ताकत देता है और उन्हें तेज रफ्तार से समुद्र में चलाने में मदद करता है।

आधुनिक युद्धपोतों में हाई-स्पीड ऑपरेशन, लंबी दूरी की तैनाती और तेजी से प्रतिक्रिया के लिए गैस टरबाइन इंजन इस्तेमाल किए जाते हैं। इन्हें लगातार हाई टैंपरेचर और हेवी प्रेशर में काम करना पड़ता है। इसलिए इन इंजनों की समय-समय पर मरम्मत और ओवरहॉलिंग बेहद जरूरी होती है।

अब तक भारत इन तकनीकों के लिए काफी हद तक विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। खासतौर पर यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट जैसी कंपनियां भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण सप्लायर रही हैं। लेकिन वैश्विक तनाव और सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में घरेलू क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा था। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

विशाखापट्टनम में क्यों बन रहा है यह केंद्र

विशाखापट्टनम भारतीय नौसेना का एक बड़ा और रणनीतिक बेस है। यहां ईस्टर्न नेवल कमांड का मुख्यालय मौजूद है। इसके अलावा नेवल डॉकयार्ड और आईएनएस एक्सिला जैसी महत्वपूर्ण नौसैनिक सुविधाएं भी यहीं स्थित हैं।

भारत फोर्ज का यह नया केंद्र करीब 80 एकड़ जमीन पर आंध्र प्रदेश डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर के अंदर बनाया जाएगा। यह लोकेशन इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे नौसेना के जहाजों के इंजन की मरम्मत और रखरखाव का समय काफी कम हो जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पहले कई मामलों में विदेशी सहायता या बाहरी सपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते थे। अब यह काम भारत में ही तेजी से किया जा सकेगा। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

दो चरणों में पूरा होगा प्रोजेक्ट

भारत फोर्ज इस परियोजना को दो चरणों में विकसित करेगा। पहले चरण में मरीन गैस टरबाइन रिपेयर और ओवरहॉल कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा। इसमें टरबाइन ब्लेड्स, वेंस और कॉम्बशन लाइनर्स की मरम्मत की सुविधा होगी। साथ ही कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और एनडीई यानी नॉन-डिस्ट्रक्टिव एग्जामिनेशन लेबोरेटरी भी बनाई जाएगी।

कंपनी का दावा है कि इस सुविधा के जरिए नेवल डॉकयार्ड को 72 घंटे के अंदर तकनीकी सपोर्ट दिया जा सकेगा। यानी जहाजों के इंजन की जांच और जरूरी मरम्मत पहले की तुलना में काफी तेजी से होगी।

दूसरे चरण में भारत का पहला प्राइवेट सेक्टर मरीन गैस टरबाइन डेवलपमेंट और असेंबली हॉल बनाया जाएगा। यहां फुल-स्पेक्ट्रम हॉट टेस्ट सेल भी स्थापित किया जाएगा, जहां अलग-अलग क्षमता वाले इंजनों की टेस्टिंग हो सकेगी।

इसी चरण में पहली बार भारत में स्वदेशी मरीन गैस टरबाइन को डेवलप और क्वालिफाई करने का काम शुरू होगा।

नौसेना के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

भारतीय नौसेना लगातार अपने युद्धपोत बेड़े को आधुनिक बना रही है। नए विध्वंसक, फ्रिगेट और दूसरे बड़े जहाजों में एडवांस प्रोपल्शन सिस्टम की जरूरत होती है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के समय किसी भी देश के लिए अपने जहाजों की मरम्मत क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है। अगर इंजन या प्रोपल्शन सिस्टम के लिए विदेशी सपोर्ट पर निर्भरता ज्यादा हो तो ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं।

भारत फोर्ज का यह प्रोजेक्ट इसी कमी को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे नौसेना को घरेलू स्तर पर इंजन सपोर्ट मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

इस प्रोजेक्ट से करीब 750 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। इंजीनियरिंग, मशीनिंग, टेस्टिंग और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े स्थानीय युवाओं को भी इसमें अवसर मिल सकते हैं।

आंध्र प्रदेश सरकार लंबे समय से राज्य को एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रही है। यह प्रोजेक्ट उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की सुविधाओं से आसपास छोटी और मध्यम उद्योग इकाइयों को भी काम मिलेगा। इससे सप्लाई चेन और लोकल इंडस्ट्री दोनों मजबूत होंगे।

भारत फोर्ज कल्याणी ग्रुप की प्रमुख कंपनी है और ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में काम करती है।

पिछले कुछ वर्षों में कंपनी ने रक्षा क्षेत्र में तेजी से विस्तार किया है। कंपनी पहले ही आर्टिलरी सिस्टम, ड्रोन इंजन और एयरोस्पेस कंपोनेंट्स पर काम कर रही है।

कंपनी का एयरोस्पेस डिवीजन बेंगलुरु में गैस टरबाइन और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट सेंटर भी चला रहा है। यहां इंजन डिजाइन और विकास पर काम किया जा रहा है।

भारत फोर्ज ने हाल ही में जोर्या-माशप्रोएक्ट इंडिया में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी भी हासिल की है। इससे कंपनी की मरीन गैस टरबाइन क्षेत्र में मौजूदगी और मजबूत हुई है। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

आंध्र प्रदेश बन रहा डिफेंस हब

आंध्र प्रदेश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर को तेजी से विकसित किया जा रहा है। सरकार राज्य में एयरोस्पेस, नौसैनिक और रक्षा उद्योग से जुड़े बड़े निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रही है।

विशाखापट्टनम पहले से ही नौसैनिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। अब मरीन गैस टरबाइन जैसी हाई-टेक सुविधा आने से इसकी रणनीतिक और औद्योगिक अहमियत और बढ़ गई है। (Bharat Forge Marine Gas Turbine)

भारत-वियतनाम के बीच द्विपक्षीय बातचीत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी पर हुआ बड़ा समझौता

India-Vietnam Defence Ties

India-Vietnam Defence Ties: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इन दिनों चार दिन की वियतनाम और द. कोरिया यात्रा पर है। रक्षा मंत्री की वियतनाम यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कई अहम समझौतों और रणनीतिक योजनाओं पर सहमति बनाई। इस दौरे में सबसे अहम साझेदारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में रही। भारत ने वियतनाम में एआई लैब स्थापित करने की घोषणा भी की है।

राजनाथ सिंह ने हनोई में वियतनाम के उप प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग के साथ द्विपक्षीय बैठक की। इस दौरान दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, सैन्य प्रशिक्षण और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता को लेकर विस्तार से चर्चा की।

रक्षा मंत्री का यह दौरा भारत-वियतनाम रक्षा संबंधों को नई तकनीकी दिशा देने वाला माना जा रहा है। खासकर ऐसे समय में जब दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को लेकर कई देशों की चिंता बढ़ी हुई है।

India Vietnam Defence Ties: एआई और क्वांटम टेक्नोलॉजी पर बड़ा समझौता

इस दौरान एआई और क्वांटम टेक्नोलॉजी से जुड़े अहम समझौते पर दस्तखत किए गए। भारत के मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस इंजीनियरिंग और वियतनाम की टेली कम्युनिकेशंस यूनिवर्सिटी के बीच इस क्षेत्र में एक समझौता ज्ञापन यानी एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अब दोनों देश भविष्य की युद्ध तकनीकों पर मिलकर काम करेंगे।

एआई तकनीक आज के आधुनिक युद्ध में तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसका इस्तेमाल ड्रोन ऑपरेशन, निगरानी, साइबर सुरक्षा, डेटा विश्लेषण और युद्ध क्षेत्र में तेजी से फैसले लेने के लिए किया जाता है। वहीं क्वांटम टेक्नोलॉजी को सुरक्षित कम्युनिकेशन और हाई-लेवल डिफेंस नेटवर्क के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

न्हा ट्रांग में बनेगी एआई लैब

राजनाथ सिंह ने वियतनाम के न्हा ट्रांग शहर स्थित टेली कम्युनिकेशंस यूनिवर्सिटी में एआई लैब स्थापित करने की घोषणा भी की। भारतीय सहायता से बनने वाली यह लैब वियतनाम के सैन्य और तकनीकी प्रशिक्षण को मजबूत करने में मदद करेगी। रक्षा जानकारों के मुताबिक यह केवल एक लैब नहीं, बल्कि हाई-टेक डिफेंस सहयोग का नया प्लेटफॉर्म होगा।

इस लैब में एआई आधारित सिस्टम, डेटा प्रोसेसिंग, साइबर डिफेंस और एडवांस टेक्नोलॉजी पर रिसर्च की जा सकती है। इससे वियतनाम के सैन्य अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों को आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग मिलेगी।

भारत पहले भी कई देशों के साथ रक्षा प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग करता रहा है, लेकिन एआई और क्वांटम जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी में सहयोग को काफी रणनीतिक माना जा रहा है।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर साझा संदेश

बैठक के दौरान दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और नेविगेशन की स्वतंत्रता बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।

दोनों देशों ने कहा कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन बेहद जरूरी है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों की पृष्ठभूमि में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत और वियतनाम दोनों ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था का समर्थन करते हैं। दोनों देश समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक सहयोग को लगातार बढ़ा रहे हैं।

India-Vietnam Defence Ties

रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत वियतनाम के साथ अपने “एनहैंस्ड कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने वियतनाम के रक्षा आधुनिकीकरण और क्षमता निर्माण में भारत के सहयोग को दोहराया। दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, संयुक्त अभ्यास, सैन्य प्रशिक्षण और हाई-लेवल एक्सचेंज को बढ़ाने पर भी सहमति बनी।

बैठक में साइबर सुरक्षा, संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन और क्षमता निर्माण जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। दोनों देशों ने नियमित सैन्य संवाद और एक्सचेंज प्रोग्राम जारी रखने पर सहमति जताई।

वियतनाम के रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग ने भारत के सहयोग की सराहना की और कहा कि दोनों देशों के बीच पुरानी दोस्ती लगातार मजबूत हो रही है। (India-Vietnam Defence Ties)

भाषा लैब का भी उद्घाटन

राजनाथ सिंह और वियतनाम के रक्षा मंत्री ने संयुक्त रूप से एक लैंग्वेज लैब का वर्चुअल उद्घाटन भी किया। यह लैब वियतनाम के एयर फोर्स ऑफिसर्स कॉलेज में भारतीय सहायता से बनाई गई है।

इस लैब का मकसद सैन्य अधिकारियों की भाषा क्षमता और अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण स्तर को बेहतर बनाना है। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक आधुनिक सैन्य सहयोग में भाषा और कम्युनिकेशन की भूमिका काफी अहम होती है।

राष्ट्रपति तो लाम से भी हुई मुलाकात

द्विपक्षीय बैठक के बाद राजनाथ सिंह ने वियतनाम के राष्ट्रपति और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव तो लाम से भी मुलाकात की।

उन्होंने भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की ओर से शुभकामनाएं दीं और दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, निवेश, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और समुद्री सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा की।

दोनों नेताओं ने कहा कि भारत और वियतनाम के बीच संबंध साझा विश्वास, ऐतिहासिक जुड़ाव और रणनीतिक हितों पर आधारित हैं।

वियतनाम के राष्ट्रपति ने भारत को अपने विकास और रणनीतिक प्राथमिकताओं का अहम साझेदार बताया। उन्होंने रक्षा सहयोग को दोनों देशों की साझेदारी का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया। (India-Vietnam Defence Ties)

हो ची मिन्ह को दी श्रद्धांजलि

राजनाथ सिंह ने अपनी यात्रा की शुरुआत वियतनाम के संस्थापक नेता हो ची मिन्ह को श्रद्धांजलि देकर की। उन्होंने हो ची मिन्ह समाधि स्थल पर जाकर सम्मान व्यक्त किया।

यह अवसर हो ची मिन्ह की 136वीं जयंती का भी था। राजनाथ सिंह ने कहा कि हो ची मिन्ह का नेतृत्व, स्वतंत्रता के प्रति समर्पण और वैश्विक एकजुटता का संदेश आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और वियतनाम की दोस्ती की मजबूत नींव रखने में हो ची मिन्ह की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

भारत-वियतनाम रक्षा संबंध क्यों हैं अहम

भारत और वियतनाम पिछले कई वर्षों से रक्षा और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में लगातार सहयोग बढ़ा रहे हैं।

भारत वियतनाम को रक्षा प्रशिक्षण, नौसैनिक सहयोग और तकनीकी सहायता प्रदान करता रहा है। दोनों देशों की नौसेनाएं कई बार संयुक्त गतिविधियों में हिस्सा ले चुकी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वियतनाम दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण देश है और भारत उसे इंडो-पैसिफिक रणनीति में अहम साझेदार मानता है।

भारत “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” के तहत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध मजबूत कर रहा है। वहीं वियतनाम भी भारत को एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में देखता है। (India-Vietnam Defence Ties)

70,000 करोड़ की मेगा डील! भारतीय नौसेना को मिलेंगी ऐसी पनडुब्बियां जो हफ्तों तक नहीं आएंगी सतह पर

India AIP Submarine Deal

India AIP Submarine Deal: भारतीय नौसेना अगले कुछ महीनों में अपनी सबसे बड़ी पनडुब्बी परियोजनाओं में से एक को अंतिम रूप देने जा रही है। करीब 70 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली प्रोजेक्ट-75 इंडिया यानी पी-75आई के तहत भारत छह नई एडवांस पनडुब्बियां खरीदेगा। इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी तकनीक होगी, जिससे ये लंबे समय तक समुद्र के अंदर बिना सतह पर आए रह सकेंगी।

यह सौदा ऐसे समय में किया जा रहा है जब पाकिस्तान तेजी से अपने अंडरवॉटर बेड़े को मजबूत कर रहा है। चीन की मदद से पाकिस्तान ने हाल ही में नई हंगोर क्लास एआईपी पनडुब्बियां शामिल कर रहा है, जबकि भारतीय नौसेना के पास अभी तक एक भी ऑपरेशनल एआईपी पनडुब्बी नहीं है। वहीं भारतीय नौसेना भी अपनी कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाने की तैयारी कर रही है, जो इस साल के आखिर तक पूरा हो जाएगा।

India AIP Submarine Deal: सितंबर तक लग सकती है सौदे पर अंतिम मुहर

रक्षा सूत्रों के मुताबिक इस परियोजना से जुड़ी प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इसी महीने इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप से मंजूरी मिलने की उम्मीद है। इसके बाद सितंबर तक कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत हो सकते हैं।

इस प्रोजेक्ट में मुंबई की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल भारतीय स्ट्रेटेजिक पार्टनर होगी। जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस इसके साथ मिलकर काम करेगी।

रक्षा मंत्रालय के स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के तहत विदेशी कंपनी भारत को पनडुब्बी डिजाइन और तकनीक ट्रांसफर करेगी। इसके बाद भारत में ही इन पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा।

क्या होती है एआईपी तकनीक

एआईपी तकनीक आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे अहम क्षमता मानी जाती है। सामान्य पनडुब्बियों को बैटरियां चार्ज करने के लिए कुछ समय बाद समुद्र की सतह के करीब आना पड़ता है या स्नॉर्कल इस्तेमाल करना पड़ता है। इस दौरान दुश्मन के रडार और सेंसर उन्हें पकड़ सकते हैं।

लेकिन एआईपी तकनीक वाली पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। इससे उनकी स्टेल्थ क्षमता काफी बढ़ जाती है और दुश्मन के लिए उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध में यह तकनीक बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे पनडुब्बी बिना दिखाई दिए लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। (India AIP Submarine Deal)

सात साल बाद मिलेगी पहली पनडुब्बी

योजना के मुताबिक समझौते पर हस्ताक्षर होने के करीब सात साल बाद पहली पनडुब्बी नौसेना को मिलेगी। इसके बाद हर साल एक नई पनडुब्बी की डिलीवरी की जाएगी।

सरकार ने इस परियोजना में स्वदेशीकरण पर भी बड़ा जोर दिया है। पहली पनडुब्बी में कम से कम 45 प्रतिशत भारतीय उपकरण और सिस्टम होंगे। छठी पनडुब्बी तक यह हिस्सा बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया जाएगा।

रक्षा मंत्रालय इसे “आत्मनिर्भर भारत” अभियान से जुड़ी बड़ी परियोजना मान रहा है। इसके जरिए भारत में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। (India AIP Submarine Deal)

भारत के सामने बड़ी चुनौती

भारतीय नौसेना के पास इस समय 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें से कई पनडुब्बियां काफी पुरानी हो चुकी हैं और धीरे-धीरे उनकी सर्विस लाइफ खत्म होने की तरफ बढ़ रही है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारतीय नौसेना के पास अभी तक एक भी एआईपी क्षमता वाली पनडुब्बी ऑपरेशनल नहीं है। यही वजह है कि पी-75आई परियोजना को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

रक्षा योजनाकारों का मानना है कि अगर नई पनडुब्बियां समय पर नहीं मिलीं तो भारत की अंडरवॉटर क्षमता पर असर पड़ सकता है। (India AIP Submarine Deal)

चीन की मदद से तेजी से आगे बढ़ रहा पाकिस्तान

दूसरी तरफ पाकिस्तान तेजी से अपनी अंडरवॉटर ताकत बढ़ा रहा है। 30 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान ने चीन में बनी अपनी चौथी एआईपी क्षमता वाली पनडुब्बी को शामिल किया था।

यह हंगोर क्लास पनडुब्बी कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान कुल आठ हंगोर क्लास पनडुब्बियां चीन की मदद से बना रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक अगले कुछ सालों में पाकिस्तान के पास 11 तक एआईपी पनडुब्बियां हो सकती हैं। इससे उसे लंबे समय तक समुद्र में छिपे रहने की क्षमता मिल जाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भारतीय नौसेना के लिए चिंता का विषय है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में अंडरवॉटर मुकाबला तेजी से बढ़ रहा है। (India AIP Submarine Deal)

डीआरडीओ भी बना रहा स्वदेशी एआईपी सिस्टम

भारत केवल विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ भी स्वदेशी एआईपी सिस्टम विकसित कर रहा है।

सूत्रों के मुताबिक यह सिस्टम अगले महीने जून तक तैयार हो सकता है। इसे भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में लगाया जाएगा।

आईएनएस खंडेरी, कलवरी क्लास की दूसरी पनडुब्बी है। इसे रखरखाव के दौरान एआईपी मॉड्यूल से लैस किया जाएगा।

हालांकि इस परियोजना में पहले भी देरी हो चुकी है। शुरुआत में योजना थी कि आईएनएस कलवरी में ही एआईपी लगाया जाएगा, लेकिन सिस्टम समय पर तैयार नहीं हो पाया। इसी वजह से कलवरी का रिफिट बिना एआईपी के पूरा किया गया।

कलवरी क्लास बनी नौसेना की रीढ़

भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बियां फिलहाल देश की सबसे अहम पारंपरिक अंडरवॉटर ताकत मानी जाती हैं। इन्हें फ्रांस की नेवल ग्रुप की तकनीकी मदद से मझगांव डॉक में बनाया गया है।

इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कॉर्पीन क्लास के नाम से भी जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यह परियोजना भारत की घरेलू पनडुब्बी निर्माण क्षमता बढ़ाने में अहम साबित हुई है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पी-75आई इसी अनुभव को आगे बढ़ाने वाली अगली बड़ी परियोजना है। (India AIP Submarine Deal)

हिंद महासागर में बढ़ रही चीन की मौजूदगी

भारत की चिंता केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी यानी पीएलए नेवी भी हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के पास इस समय करीब 355 युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। 2025 तक उसके पास 65 पनडुब्बियां होने का अनुमान है। 2035 तक यह संख्या 80 तक पहुंच सकती है।

चीन लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपने जहाज, सर्विलांस प्लेटफॉर्म और पनडुब्बियां भेज रहा है। भारत इसे अपनी रणनीतिक चुनौती के तौर पर देख रहा है।

इसी वजह से भारतीय नौसेना अपनी कुल ताकत बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। फिलहाल नौसेना के पास 130 से ज्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। लक्ष्य अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर 170 से 175 तक पहुंचाने का है।

दुनिया के कई देशों के पास है एआईपी तकनीक

आज दुनिया की ज्यादातर आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों में एआईपी तकनीक इस्तेमाल हो रही है। जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों के पास पहले से ऑपरेशनल एआईपी सिस्टम हैं।

भारत फिलहाल इस तकनीक में पीछे माना जाता है। यही वजह है कि शुरुआती चरण में उसे विदेशी साझेदार की जरूरत पड़ रही है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआईपी तकनीक केवल पनडुब्बी की क्षमता नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे नौसैनिक संतुलन को प्रभावित करती है। लंबे समय तक समुद्र के अंदर रहने वाली पनडुब्बियां दुश्मन के जहाजों, सप्लाई रूट्स और नौसैनिक गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकती हैं। (India AIP Submarine Deal)

पुंछ पहुंचे जयपुर के छात्र, लाइव ड्रोन डेमो और फॉरवर्ड पोस्ट्स का किया दौरा

Indian Army Students Tour

Indian Army Students Tour: राजस्थान के आर्मी पब्लिक स्कूल जयपुर के छात्रों ने जम्मू-कश्मीर के पुंछ-सौजियां इलाके का एक खास रिवर्स नेशनल इंटीग्रेशन टूर पूरा किया। यह दौरा 10 मई से 17 मई तक आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन सप्त शक्ति कमांड ने नॉर्दर्न कमांड की ऐस ऑफ स्पेड्स डिवीजन के साथ मिलकर किया था।

इस दौरान छात्रों को सीमावर्ती इलाकों के जमीनी हालात, सेना की तैनाती और जम्मू-कश्मीर की संस्कृति को करीब से देखने का मौका मिला। छात्रों ने अग्रिम चौकियों, सैन्य यूनिट्स, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों और पुंछ वॉर मेमोरियल का दौरा किया।

Indian Army Students Tour

Indian Army Students Tour: छात्रों ने करीब से देखी सेना की तैयारियां

दौरे के दौरान छात्रों को भारतीय सेना के आधुनिक ड्रोन और अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स यानी यूएवी सिस्टम्स भी दिखाए गए। सेना के अधिकारियों ने उन्हें बताया कि पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में इन तकनीकों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है।

छात्रों ने ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ के मौके पर सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से भी बातचीत की। इस दौरान अधिकारियों ने उन्हें सीमाओं पर तैनात जवानों के सामने आने वाली चुनौतियों और सेना की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी दी।

इस टूर का सबसे खास हिस्सा सौजियां इलाके का दौरा रहा। यहां छात्रों ने एक आर्टिलरी रेजिमेंट और एलीट राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन का दौरा किया।

सेना ने छात्रों के लिए लाइव ड्रोन डेमोंस्ट्रेशन भी आयोजित किया। इसमें दिखाया गया कि ड्रोन किस तरह निगरानी, सूचना जुटाने और ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल किए जाते हैं।

छात्रों को हाई एल्टीट्यूड यानी ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों की जिंदगी और कठिन परिस्थितियों के बारे में भी बताया गया।

संस्कृति और इतिहास से भी कराया परिचय

इस दौरे में केवल सैन्य गतिविधियां ही शामिल नहीं थीं। छात्रों को जम्मू-कश्मीर की स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और इतिहास से भी परिचित कराया गया।

उन्होंने स्थानीय लोगों से मुलाकात की और सीमावर्ती इलाकों की जीवनशैली को करीब से समझा। पुंछ वॉर मेमोरियल पर जाकर छात्रों ने युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि भी दी।

Indian Army Students Tour

सेना कमांडर से हुई मुलाकात

टूर के आखिरी दिन छात्रों की मुलाकात सप्त शक्ति कमांड के आर्मी कमांडर से हुई। इस दौरान एक विशेष इंटरैक्शन और सम्मान समारोह आयोजित किया गया।

छात्रों ने अपने अनुभव साझा किए और सेना की इस पहल के लिए धन्यवाद दिया। कई छात्रों ने कहा कि इस दौरे के बाद उन्हें भारतीय सेना के काम और सीमावर्ती इलाकों की परिस्थितियों को समझने का नया अनुभव मिला।

सेना अधिकारियों के मुताबिक इस तरह के नेशनल इंटीग्रेशन टूर का मकसद युवाओं को देश की सीमाओं, सैनिकों के जीवन और राष्ट्रीय एकता से जोड़ना है।

भारतीय वायुसेना की सबसे मुश्किल रेटिंग हासिल करने वाली पहली महिला पायलट बनीं स्क्वाड्रन लीडर सान्या

Sqn Ldr Saanya Cat-A QFI
Squadron Leader Saanya Becomes First Woman Officer To Achieve IAF’s Highest Cat-A QFI Rating

Sqn Ldr Saanya Cat-A QFI: भारतीय वायुसेना में स्क्वाड्रन लीडर सान्या पहली महिला अधिकारी बन गई हैं, जिन्हें कैटेगरी-ए क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर यानी कैट-ए क्यूएफआई रेटिंग मिली है। यह वायु सेना में फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स को दी जाने वाली सबसे ऊंची इंस्ट्रक्शनल क्वालिफिकेशन मानी जाती है।

भारतीय वायु सेना ने इस उपलब्धि की आधिकारिक जानकारी साझा करते हुए कहा कि स्क्वाड्रन लीडर सान्या ने अपने समर्पण, मेहनत और प्रोफेशनल स्किल्स के दम पर यह मुकाम हासिल किया है। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी उन्हें सम्मानित किया।

यह उपलब्धि इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि अब महिलाएं केवल फाइटर जेट उड़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के पायलटों को ट्रेन करने की भूमिका भी निभा रही हैं।

Sqn Ldr Saanya Cat-A QFI: 2015 में वायुसेना में हुई थीं शामिल

स्क्वाड्रन लीडर सान्या 20 जून 2015 को भारतीय वायु सेना में शामिल हुई थीं। उन्होंने 42 एसएससी (डब्ल्यू) फ्लाइंग पायलट कोर्स के जरिए कमीशन हासिल किया था।

वायुसेना में शामिल होने के बाद उन्होंने लगातार अलग-अलग चरणों की ट्रेनिंग और ऑपरेशनल जिम्मेदारियां निभाईं। जून 2017 में उन्हें फ्लाइट लेफ्टिनेंट बनाया गया और जून 2021 में वह स्क्वाड्रन लीडर बनीं।

वायुसेना की पॉलिसी के तहत सर्विंग अफसरों की निजी जानकारी सार्वजनिक तौर पर ज्यादा साझा नहीं की जाती है, लेकिन उनकी इस उपलब्धि ने उन्हें भारतीय वायु सेना की अग्रणी महिला अधिकारियों की सूची में शामिल कर दिया है।

क्या होता है कैट-ए क्यूएफआई

भारतीय वायुसेना में फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स के लिए अलग-अलग ग्रेडिंग सिस्टम होता है। इसे मुख्य रूप से कैट-सी, कैट-बी और कैट-ए में बांटा गया है।

कैट-सी शुरुआती स्तर की इंस्ट्रक्टर रेटिंग मानी जाती है। इसमें पायलट बेसिक इंस्ट्रक्शनल स्किल्स सीखते हैं।

इसके बाद कैट-बी रेटिंग आती है। इसमें इंस्ट्रक्टर ज्यादा अनुभवी माने जाते हैं और उन्हें बेहतर ट्रेनिंग क्षमता के आधार पर आंका जाता है।

सबसे ऊपर कैट-ए रेटिंग होती है। यह केवल उन्हीं पायलटों को दी जाती है, जो फ्लाइंग स्किल, ट्रेनिंग क्षमता, प्रोफेशनल नॉलेज और लीडरशिप में बेहद उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।

कैट-ए क्यूएफआई बनने वाले अधिकारी नए और अनुभवी दोनों तरह के पायलटों को ट्रेन करते हैं। उन्हें वायु सेना के सबसे कुशल इंस्ट्रक्टर्स में गिना जाता है।

सूत्रों के मुताबिक यह केवल एक बैज नहीं, बल्कि वायु सेना के अंदर सबसे ऊंची इंस्ट्रक्शनल पहचान मानी जाती है।

बेहद कठिन होती है ट्रेनिंग

कैट-ए रेटिंग हासिल करना आसान नहीं होता। इसके लिए फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल यानी एफआईएस में लंबी और कठिन ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है।

यह ट्रेनिंग करीब 22 हफ्तों तक चलती है। इसमें 10 अलग-अलग चरणों की फ्लाइंग ट्रेनिंग और 200 घंटे से ज्यादा ग्राउंड ट्रेनिंग शामिल होती है।

इस दौरान पायलटों को केवल विमान उड़ाना ही नहीं सिखाया जाता, बल्कि यह भी सिखाया जाता है कि वे दूसरे पायलटों को किस तरह ट्रेन करें।

ट्रेनिंग में इमरजेंसी हैंडलिंग, एविएशन सेफ्टी, एयर कॉम्बैट, इंस्ट्रक्शनल टेक्नीक और अलग-अलग तरह की उड़ान परिस्थितियों से निपटने का अभ्यास कराया जाता है।

उम्मीदवारों की लगातार जांच होती रहती है। केवल वही अधिकारी आगे बढ़ पाते हैं जो हर स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

चेन्नई के पास है फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल

भारतीय वायु सेना का फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल तमिलनाडु के तांबरम एयर फोर्स स्टेशन पर स्थित है। यह चेन्नई के पास है।

इस संस्थान की स्थापना 1 अप्रैल 1948 को अंबाला में हुई थी। बाद में 1954 में इसे तांबरम शिफ्ट कर दिया गया। एफआईएस का मोटो है- “विद्या दानेन वर्धते”, यानी ज्ञान बांटने से बढ़ता है।

यह संस्थान पिछले 75 साल से ज्यादा समय से वायु सेना के पायलटों को इंस्ट्रक्टर के रूप में तैयार कर रहा है।
यहां केवल भारतीय वायु सेना के पायलट ही नहीं, बल्कि थल सेना, नौसेना, पैरामिलिट्री फोर्स और मित्र देशों के पायलट भी ट्रेनिंग लेते हैं।

एफआईएस से निकले इंस्ट्रक्टर्स आगे चलकर देश के नए एयर वॉरियर्स को तैयार करते हैं।

फाइटर स्ट्रीम में महिलाओं की एंट्री

भारतीय वायु सेना में पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ी है। फाइटर स्ट्रीम में महिलाओं की एंट्री के बाद कई महिला अधिकारी लगातार नए रिकॉर्ड बना रही हैं।

अक्टूबर 2025 में राफेल फाइटर पायलट स्क्वाड्रन लीडर शिवांगी सिंह पहली महिला फाइटर पायलट बनी थीं जिन्हें 159 बैच में क्यूएफआई बैज मिला था।

अब स्क्वाड्रन लीडर सान्या पहली महिला अधिकारी बन गई हैं, जिन्होंने कैट-ए लेवल हासिल किया है।

इससे पहले हरिता कौर देओल पहली महिला पायलट बनी थीं, जिन्होंने सोलो उड़ान भरी थी। इसके बाद अवनी चतुर्वेदी, भावना कांत और मोहना सिंह जैसी महिला अधिकारियों ने फाइटर पायलट बनकर इतिहास रचा।

कैसे तैयार किए जाते हैं नए पायलट

क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स की जिम्मेदारी बेहद अहम होती है। ये अधिकारी शुरुआती स्तर के पायलटों को बेसिक फ्लाइंग सिखाते हैं। इसके बाद एडवांस फ्लाइंग, एयर कॉम्बैट और ऑपरेशनल मिशन की ट्रेनिंग भी देते हैं।

पायलटों को उड़ान के दौरान छोटी-छोटी गलतियों से बचाने, इमरजेंसी स्थिति संभालने और एयरक्राफ्ट सिस्टम्स को समझाने में इंस्ट्रक्टर्स की बड़ी भूमिका होती है।

कैट-ए इंस्ट्रक्टर्स को अक्सर सबसे कठिन ट्रेनिंग जिम्मेदारियां दी जाती हैं। वे दूसरे इंस्ट्रक्टर्स का मूल्यांकन भी करते हैं।

ट्रेनिंग के दौरान होता है भारी दबाव

एफआईएस में ट्रेनिंग को भारतीय मिलिट्री एविएशन की सबसे कठिन ट्रेनिंग में गिना जाता है। पायलटों को लगातार फ्लाइंग टेस्ट, क्लासरूम सेशन और इंस्ट्रक्शनल असेसमेंट से गुजरना पड़ता है।

उन्हें यह साबित करना होता है कि वे केवल अच्छे पायलट ही नहीं, बल्कि अच्छे शिक्षक भी हैं। कई बार ट्रेनिंग के दौरान हाई-प्रेशर फ्लाइंग, सटीक एयरक्राफ्ट कंट्रोल और तेजी से फैसले लेने की क्षमता की जांच की जाती है। इसी वजह से हर कोर्स में शामिल होने वाले सभी अधिकारी कैट-ए स्तर तक नहीं पहुंच पाते।

GE Aerospace का बड़ा एलान, पुणे प्लांट में 100 करोड़ निवेश, अब यहीं बनेंगे विमानों के इंजन पार्ट्स

GE Aerospace Pune Investment

GE Aerospace Pune Investment: अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी जीई एयरोस्पेस ने पुणे स्थित अपनी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी में 100 करोड़ रुपये का नया निवेश करने का एलान किया है। इस निवेश के जरिए कंपनी भारत में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नई तकनीक जोड़ने और ग्लोबल सप्लाई चेन को मजबूत करने पर काम करेगी।

जीई एयरोस्पेस का कहना है कि यह निवेश केवल एक फैक्ट्री का विस्तार नहीं है, बल्कि भारत को ग्लोबल एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। पिछले तीन सालों में कंपनी पुणे फैसिलिटी में कुल 510 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश कर चुकी है। इससे पहले दो वर्षों में कंपनी 410 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा कर चुकी थी।

GE Aerospace Pune Investment: पुणे फैसिलिटी में लगेंगी नई तकनीकें

कंपनी के मुताबिक नए निवेश के तहत एडवांस वेल्डिंग टेक्नोलॉजी, हाई-प्रिसिजन इंस्पेक्शन इक्विपमेंट, नए टूल्स, गेज, फिक्स्चर और दूसरी आधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी। इसके साथ ही फैक्ट्री के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी अपग्रेड किया जाएगा ताकि उत्पादन क्षमता बढ़ सके और एयरक्राफ्ट इंजन के पार्ट्स ज्यादा सटीक तरीके से बनाए जा सकें।

जीई एयरोस्पेस ने बताया कि इन नई सुविधाओं का इस्तेमाल दुनिया भर के ग्राहकों के लिए हाई-क्वालिटी एयरोस्पेस कंपोनेंट्स तैयार करने में किया जाएगा। कंपनी का फोकस ऐसे सिस्टम्स पर है जो अगली पीढ़ी के विमान इंजनों के लिए जरूरी हैं।

किन इंजन प्रोग्राम्स के लिए बनेंगे पार्ट्स

पुणे प्लांट में बनने वाले पार्ट्स का इस्तेमाल जीई एयरोस्पेस के कई बड़े इंजन प्रोग्राम्स में किया जाएगा। इनमें जीई90, जीईएनएक्स, जीई9एक्स और सीएफएम इंटरनेशनल के लीप इंजन शामिल हैं।

जीई90 इंजन दुनिया के बड़े कमर्शियल विमानों में इस्तेमाल होता है। वहीं जीईएनएक्स इंजन बोइंग 787 ड्रीमलाइनर और बोइंग 747-8 जैसे विमानों में लगाया जाता है। जीई9एक्स को दुनिया के सबसे ताकतवर जेट इंजनों में गिना जाता है, जिसका इस्तेमाल बोइंग 777एक्स विमान में होना है।

लीप इंजन आज की नई पीढ़ी के सिंगल-आइल कमर्शियल विमानों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। एयरबस ए320 नियो और बोइंग 737 मैक्स जैसे विमानों में यह इंजन बड़ी संख्या में लगाए जा रहे हैं।

जीई एयरोस्पेस का कहना है कि भारत उसके लिए लंबे समय की रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है। कंपनी के पुणे प्लांट के मैनेजिंग डायरेक्टर विश्वजीत सिंह ने कहा कि यह निवेश भारत के प्रति कंपनी की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दिखाता है।

उन्होंने कहा कि पुणे फैसिलिटी अब जीई एयरोस्पेस के ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क का अहम हिस्सा बन चुकी है। पिछले दस वर्षों में यह प्लांट एक हाई-कैपेबिलिटी एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित हुआ है।

विश्वजीत सिंह के मुताबिक इस विस्तार से न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि अप्रेंटिसशिप और रोजगार के नए मौके भी पैदा होंगे। इसका फायदा कंपनी के सप्लायर नेटवर्क को भी मिलेगा।

300 से ज्यादा भारतीय सप्लायर्स जुड़े

पुणे स्थित यह प्लांट भारत के बड़े एयरोस्पेस सप्लाई नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। कंपनी ने बताया कि वह देशभर में 2200 से ज्यादा सप्लायर्स के साथ काम कर रही है। इनमें से 300 से ज्यादा सप्लायर्स सीधे पुणे फैसिलिटी से जुड़े हैं।

इन सप्लायर्स के जरिए भारत में प्रिसीजन इंजीनियरिंग, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग और एयरोस्पेस कंपोनेंट्स का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर के विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारतीय कंपनियों को ग्लोबल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स के हिसाब से काम करने का मौका मिल रहा है।

भारत बन रहा है एयरोस्पेस हब

पिछले कुछ सालों में भारत तेजी से एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। सरकार “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत विदेशी कंपनियों को भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

कम लागत, कुशल इंजीनियरिंग वर्कफोर्स और बढ़ते एविएशन मार्केट की वजह से कई ग्लोबल कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं। जीई एयरोस्पेस भी इसी रणनीति के तहत भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत कर रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एयरोस्पेस सेक्टर में किसी भी कंपोनेंट को तैयार करने के लिए बेहद सटीक इंजीनियरिंग और गुणवत्ता नियंत्रण की जरूरत होती है। ऐसे में पुणे जैसी फैसिलिटीज भारत की तकनीकी क्षमता को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रही हैं।

केवल मैन्युफैक्चरिंग नहीं, इंजीनियरिंग पर भी फोकस

जीई एयरोस्पेस केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। कंपनी भारत में इंजीनियरिंग, रिसर्च और सप्लाई चेन डेवलपमेंट पर भी लगातार निवेश कर रही है।

कंपनी का कहना है कि भारत अब केवल लो-कॉस्ट प्रोडक्शन सेंटर नहीं रहा, बल्कि एडवांस इंजीनियरिंग और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र बन रहा है।

रक्षा और एविएशन सेक्टर से जुड़े जानकारों के मुताबिक ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। खासतौर पर विमान इंजन और एयरोस्पेस कंपोनेंट्स जैसे हाई-टेक सेक्टर में भारतीय उद्योगों की भागीदारी पहले के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ी है।

पाकिस्तान में कैसे खत्म हुआ लोकतंत्र? सेना ने कैसे बढ़ाई अपनी ताकत, साइफर कांड से लेकर संविधान बदलने तक की पूरी कहानी

Pakistan Army Cipher controversy

Pakistan Army Cipher controversy: पाकिस्तान की सेना ने पिछले चार सालों में सत्ता पर इस कदर पकड़ बना ली है कि अब वह देश की असली ताकत बन चुकी है। प्रधानमंत्री शहबाद शरीफ कहीं भी जाते हैं, तो साथ में कथित फील्ड मार्शल साथ जरूर आते हैं। वहीं, अब पाकिस्तानी सेना की सारी कारस्तानियां खुल कर सामने आ रही हैं। पहले जो बातें पर्दे के पीछे से होती थीं, अब वे खुले आम सबको पता रही हैं।

इमरान खान को प्रधानमंत्री के पद से हटाने से लेकर संविधान में 27वां संशोधन करने तक, सेना ने हर कदम सोच-समझकर उठाया। इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ रहा I-0678 साइफर नाम का एक डिप्लोमैटिक संदेश, जिसे पहले इमरान खान ने विदेशी साजिश बताया और बाद में सेना ने इसे उनके खिलाफ हथियार बना दिया।

ड्रॉप साइट की विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच पाकिस्तान में जो घटनाएं घटीं, उन्होंने देश के सिविल-मिलिट्री सिस्टम को पूरी तरह बदल दिया। सेना ने राजनीतिक गठजोड़, मीडिया नैरेटिव, अदालतों और संवैधानिक बदलावों के जरिए अपनी स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत कर ली है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब पाकिस्तान में सेना अब देश की असली सत्ता बन चुकी है।

Pakistan Army Cipher controversy: इमरान सरकार गिरने के बाद शुरू हुआ खेल 

अप्रैल 2022 पाकिस्तान की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है। इसी समय इमरान खान को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया। आधिकारिक तौर पर इसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए संवैधानिक प्रक्रिया बताया गया, लेकिन पाकिस्तान के अंदर और बाहर इसे सत्ता संतुलन बदलने वाली घटना माना गया।

रिपोर्ट के मुताबिक इमरान खान की विदेश नीति सेना और पश्चिमी देशों दोनों को असहज कर रही थी। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से ठीक पहले उनका मॉस्को दौरा काफी विवादित रहा। उन्होंने कई मौकों पर अमेरिकी नीतियों का खुलकर विरोध किया और पाकिस्तान की रणनीतिक स्वतंत्रता की बात की। इससे सेना और पश्चिमी देशों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं।

तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के दौर में संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और इमरान खान की सरकार गिर गई। इसके बाद शहबाज शरीफ के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार बनी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार बदलने के बाद पाकिस्तान की विदेश नीति में भी बदलाव आया। अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारे गए और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से आर्थिक मदद का रास्ता साफ हुआ। इसी दौरान यह भी आरोप लगे कि पाकिस्तान ने यूक्रेन को अप्रत्यक्ष रूप से हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने में मदद की।

चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की कोशिश

सरकार बदलने के बाद पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका दोनों के साथ रिश्तों को संतुलित रखने की कोशिश की। चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार तो बना रहा, लेकिन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपेक) प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसके पीछे सुरक्षा संबंधी समस्याएं, कर्ज और प्रशासनिक अड़चनें बड़ी वजह बताई गईं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सेना ने अमेरिका को यह संदेश देने की कोशिश की कि पाकिस्तान अब भी इस क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अहम देश है। दूसरी तरफ चीन को भरोसा दिलाया गया कि पाकिस्तान की नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।

क्या था आई-0678 साइफर?

इमरान खान सरकार गिरने के बाद पाकिस्तान की राजनीति में “आई-0678 साइफर” सबसे बड़ा विवाद बन गया। यह एक राजनयिक संदेश था, जिसे वॉशिंगटन स्थित पाकिस्तान दूतावास से इस्लामाबाद भेजा गया था। इसमें अमेरिकी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत का जिक्र था।

इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई ने दावा किया कि यह दस्तावेज इस बात का सबूत है कि अमेरिका उनकी सरकार से नाराज था और सत्ता परिवर्तन में उसकी भूमिका हो सकती है। खान ने कई रैलियों में साइफर का जिक्र करते हुए इसे विदेशी साजिश बताया।

लेकिन बाद में यही साइफर उनके खिलाफ इस्तेमाल होने लगा। सेना समर्थित सिस्टम ने आरोप लगाया कि इमरान खान और पीटीआई नेताओं ने गोपनीय सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक किए और देश के गोपनीय राज लीक किए। इसके बाद साइफर केस पाकिस्तान की राजनीति का सबसे बड़ा आपराधिक मामला बन गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह केवल एक कानूनी मामला नहीं था, बल्कि सेना की नैरेटिव मैनेजमेंट रणनीति का हिस्सा था। जिस दस्तावेज से सरकार और सेना पर सवाल उठ सकते थे, उसी को विपक्ष को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया गया।

साइफर सार्वजनिक होने के बाद क्या बदला?

बाद में जब साइफर के कुछ हिस्से सार्वजनिक हुए तो पाकिस्तान में बहस और तेज हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक इससे यह साफ नहीं हुआ कि कोई सीधी विदेशी साजिश थी, बल्कि यह सवाल खड़ा हो गया कि सेना और सिक्युरिटी इंस्टीट्यूशंस ने इस दस्तावेज का इस्तेमाल घरेलू राजनीति को प्रभावित करने के लिए कैसे किया।

अब यह विवाद केवल अमेरिका या विदेशी दखल का नहीं रहा, बल्कि यह सेना की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल बन गया। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था ने कूटनीतिक घटनाओं को घरेलू राजनीतिक हथियार में बदल दिया।

पीटीआई पर सबसे बड़ी कार्रवाई

इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी पीटीआई इस दौरान पाकिस्तान में सबसे बड़ा जन आंदोलन बन चुकी थी। शहरी युवा, मध्यम वर्ग, विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी और पारंपरिक राजनीतिक दलों से नाराज लोग बड़ी संख्या में पीटीआई के साथ जुड़े।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पीटीआई सेना के पारंपरिक राजनीतिक रोल को चुनौती दे रही थी। पार्टी आर्थिक सुधार, जवाबदेही और स्वतंत्र विदेश नीति की बात कर रही थी। यही वजह थी कि इसे संस्थागत चुनौती माना गया।

मई 2023 में जब इमरान खान की गिरफ्तारी हुई तो पूरे पाकिस्तान में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। कई जगह सेना की इमारतों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इसके बाद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू हुई।

पीटीआई नेताओं को गिरफ्तार किया गया, कई नेताओं पर दबाव डालकर पार्टी छोड़वाई गई, चुनाव लड़ने से रोका गया और लंबी कानूनी कार्रवाई में फंसाया गया। मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी गई और सोशल मीडिया पर सेना विरोधी सामग्री को अपराध की तरह देखा जाने लगा।

रिपोर्ट के मुताबिक सेना का संदेश साफ था, कोई भी ऐसा नेता जो सेना से अलग अपनी राजनीतिक ताकत खड़ी करेगा, उसे कमजोर कर दिया जाएगा।

2024 चुनाव और “मैनेज्ड डेमोक्रेसी”

फरवरी 2024 के चुनाव से पहले पाकिस्तान की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी थी। पीटीआई से उसका चुनाव चिह्न छीन लिया गया और पार्टी उम्मीदवारों को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा। कई नेताओं पर कानूनी और प्रशासनिक प्रतिबंध लगाए गए।

चुनाव के बाद जो संसद बनी उसमें पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज और सेना समर्थित दलों की स्थिति मजबूत रही। विपक्ष और कई विश्लेषकों ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए, लेकिन सेना समर्थित व्यवस्था का उद्देश्य पूरा हो गया।

रिपोर्ट में इसे “मैनेज्ड डेमोक्रेसी” कहा गया है। यानी लोकतंत्र तो मौजूद है, लेकिन असली नियंत्रण सेना के हाथ में है। नागरिक सरकारें महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक समस्याओं का बोझ उठाती रहीं, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और बड़े फैसलों पर सेना का नियंत्रण बना रहा।

आसिम मुनीर के दौर में बढ़ी सैन्य ताकत

नवंबर 2022 में जनरल सैयद आसिम मुनीर पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने। रिपोर्ट के मुताबिक इमरान खान के साथ उनके संबंध पहले से तनावपूर्ण रहे थे। सेना प्रमुख बनने के बाद उन्होंने इंस्टीट्यूशनल कंट्रोल और मजबूत किया।

उनके कार्यकाल में पीटीआई के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई। सेना समर्थित मीडिया नैरेटिव में विरोध प्रदर्शनों को “राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा” बताया गया।

भारत के साथ तनाव ने बदली राजनीति

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव बढ़ गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि ड्रोन हमलों, गोलीबारी और सीमा पार जवाबी कार्रवाई ने पाकिस्तान में राष्ट्रवादी माहौल पैदा कर दिया।

सेना ने खुद को देश का सबसे बड़ा रक्षक बताया। इस दौरान आर्थिक समस्याएं और राजनीतिक विवाद पीछे चले गए। रिपोर्ट के मुताबिक इसी माहौल में जनरल आसिम मुनीर की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

बाद में उन्होंने खुद को स्वयंभू फील्ड मार्शल घोषित किया, जो पाकिस्तान के इतिहास में बेहद असाधरण पद माना जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाहरी खतरे ने सेना को अपनी ताकत को और ज्यादा मजबूत करने का मौका दिया।

27वां संविधान संशोधन क्यों अहम?

नवंबर 2025 में पाकिस्तान में 27वां संविधान संशोधन पारित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार यह बदलाव पाकिस्तान के सिविल-मिलिट्री संबंधों में सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

इस संशोधन के तहत “चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज” यानी सीडीएफ का नया पद बनाया गया। इससे सेना प्रमुख को तीनों सेनाओं पर व्यापक अधिकार मिल गए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव से सैन्य नेतृत्व का कार्यकाल बढ़ाया गया और रणनीतिक तथा परमाणु कमांड व्यवस्था को और केंद्रीकृत किया गया। पहले मौजूद संतुलन व्यवस्था कमजोर पड़ गई।

इसका असर सेना के अंदर भी दिखाई दिया। कई वरिष्ठ अधिकारियों को समय से पहले रिटायर होना पड़ा। वायु सेना और नौसेना के प्रशासनिक क्षेत्रों में भी थल सेना का प्रभाव बढ़ गया।

क्यों कमजोर हुई संसद की भूमिका?

रिपोर्ट के मुताबिक संसद में मौजूद सेना समर्थित दलों ने इन बदलावों का ज्यादा विरोध नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि जो सैन्य प्रभाव पहले अनौपचारिक माना जाता था, वह अब संवैधानिक ढांचे का हिस्सा बन गया।

यानी पाकिस्तान में सेना की भूमिका अब केवल पर्दे के पीछे की शक्ति नहीं रही, बल्कि उसे कानूनी और संवैधानिक आधार भी मिल गया।

अमेरिका, चीन और ईरान के बीच संतुलन

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की सेना ने अमेरिका और चीन दोनों के साथ रिश्तों को अपने रणनीतिक हितों के हिसाब से इस्तेमाल किया।

घरेलू राजनीति में सेना ने खुद को विदेशी दखल के खिलाफ “रक्षक” बताया, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका के साथ सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग जारी रखा। चीन के साथ भी साझेदारी बनाए रखी गई।

ईरान के साथ रिश्तों को लेकर भी रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की नीति पूरी तरह रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से तय होती रही। अगर कोई रिश्ता अमेरिका, खाड़ी देशों या घरेलू सत्ता संतुलन को प्रभावित करता दिखा, तो उसे सीमित रखा गया।

संकटों के जरिए ताकत बढ़ाने का मॉडल

रिपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा वह है जिसमें पाकिस्तान की सेना की रणनीति को “कंट्रोल्ड इंस्टेबिलिटी” यानी नियंत्रित अस्थिरता बताया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार सेना ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी नेता इतना मजबूत न हो जाए कि वह सेना से स्वतंत्र होकर फैसले ले सके। घरेलू संकट, राजनीतिक अशांति, कूटनीतिक विवाद और सीमा तनाव जैसे हालातों का इस्तेमाल सेना ने अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए किया।

इसके साथ ही आईएमएफ वार्ता, विदेशी निवेश, सुरक्षा साझेदारी और सैन्य कारोबार से जुड़ी आर्थिक ताकत ने भी सेना की स्थिति मजबूत की। मीडिया कैंपेन, चुनिंदा लीक और अदालतों के जरिए नैरेटिव को नियंत्रित रखा गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में नागरिक नेताओं को तभी तक स्वीकार किया जाता है, जब तक वे सेना की तय सीमाओं के भीतर रहें। जो नेता अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करते हैं, उन्हें धीरे-धीरे अलग-थलग कर दिया जाता है।

2026 तक आते-आते पाकिस्तान की सेना ने अपनी ताकत को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और संस्थागत रूप दे दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक अब सैन्य प्रभाव केवल परंपरा या अनौपचारिक दबाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह सीधे राज्य व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।

तेजस मार्क-1ए को लेकर HAL ने कर ली IAF के साथ सेटिंग! जानें क्या है अब डिलीवरी की नई डेडलाइन?

Tejas Mk-1A Delivery Delay

Tejas Mk-1A Delivery Delay: भारतीय वायु सेना के सबसे अहम फाइटर जेट प्रोग्राम में शामिल तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और भारतीय वायु सेना के बीच होने वाली अहम रिव्यू बैठक टलने के पीछ अहम वजह सामने आई है। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक एचएएल के नए चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रवि कोटा ने हाल ही में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह से मुलाकात की थी और तेजस कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की थी।

सूत्रों का कहना है कि इस दौरान रवि कोटा ने वायु सेना प्रमुख से रिव्यू बैठक को कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध किया। उन्होंने करीब एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा है क्योंकि तेजस मार्क-1ए से जुड़े कई महत्वपूर्ण ट्रायल और टेक्निकल टेस्टिंग अभी भी जारी हैं। यह समीक्षा बैठक बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि इसी के बाद यह तय होना है कि विमान भारतीय वायु सेना की ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा कर रहा है या नहीं।

बता दें कि रवि कोटा लंबे समय से तेजस कार्यक्रम से जुड़े रहे हैं और डिफेंस सेक्टर में उन्हें अक्सर “एलसीए मैन” के नाम से भी जाना जाता है। अब एचएएल के शीर्ष पद की जिम्मेदारी संभालते ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती तेजस मार्क-1ए कार्यक्रम की विश्वसनीयता बनाए रखना और समय पर डिलीवरी करना है।

इस रिव्यू बैठक में वायु सेना की ओर से वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल नागेश कपूर, टेस्ट पायलट्स और कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल होने वाले हैं। बैठक में विमान की तकनीकी स्थिति, ट्रायल रिपोर्ट, वेपन सिस्टम और नई डिलीवरी टाइमलाइन पर चर्चा होनी है।

Tejas Mk-1A Delivery Delay: दो साल से ज्यादा पीछे चल रहा है प्रोजेक्ट

तेजस मार्क-1ए प्रोग्राम पहले से ही तय समयसीमा से काफी पीछे चल रहा है। भारतीय वायु सेना को पहले ही इस विमान की शुरुआती खेप मिल जानी चाहिए थी। सूत्रों के मुताबिक पहले तय योजना के अनुसार अब तक करीब 35 से 36 तेजस मार्क-1ए विमान वायु सेना को मिल जाने चाहिए थे।

लेकिन इंजन सप्लाई में देरी, रडार इंटीग्रेशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और वेपंस ट्रायल के चलते पूरा कार्यक्रम प्रभावित हुआ है। अब नई समीक्षा बैठक के बाद ही यह साफ होगा कि पहली डिलीवरी कब शुरू होगी।

एचएएल को मिला छठा एफ-404 इंजन

इसी बीच एचएएल को अमेरिका की जीई एयरोस्पेस से एफ-404 इंजन की छठी यूनिट भारत पहुंच चुकी है। यह इंजन तेजस मार्क-1ए का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है।

सूत्रों ने बताया कि एचएएल ने अब तक करीब 18 मार्क-1ए एयरफ्रेम तैयार कर लिए हैं, लेकिन इनमें से केवल कुछ विमानों को ही इंजन मिल पाए हैं।

कुछ इंजन अभी ट्रायल प्रोसेस में हैं जबकि कुछ को विमान में इंटीग्रेट किया जा रहा है। एचएएल का कहना है कि अगस्त या सितंबर 2026 तक इंजन सप्लाई पूरी तरह स्टेबल होने की उम्मीद है। इसके बाद प्रोडक्शन उत्पादन और डिलीवरी की रफ्तार बढ़ सकेगी।

सूत्रों ने बताया कि कहा कि इंजन सप्लाई स्टेबल होने के बाद भारतीय वायु सेना के साथ नई डिलीवरी टाइमलाइन को अंतिम रूप देने पर चर्चा शुरू होगी। उन्होंने भरोसा जताया कि अगस्त-सितंबर 2026 से तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी शुरू हो सकती है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

आखिर क्यों हो रही है देरी

रक्षा सूत्रों के मुताबिक देरी की सबसे बड़ी वजह केवल इंजन नहीं है। तेजस मार्क-1ए में कई एडवांस सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिनके इंटीग्रेशन और ट्रायल में वक्त लग रहा है।

वायु सेना ने कुछ मैंडेटरी ऑपरेशनल स्टैंडर्ड्स तय किए हैं। इनमें मिसाइल फायरिंग ट्रायल, एईएसए रडार का इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन और पूरे हथियार पैकेज की फुल टेस्टिंग शामिल है।

सूत्रों का कहना है कि जब तक इन सभी स्टैंडर्ड्स की सफल टेस्टिंग नहीं हो जाती, तब तक विमान को औपचारिक रूप से वायु सेना में शामिल नहीं किया जाएगा।

हालांकि वायु सेना ने एचएएल को कुछ अनुबंधीय शर्तों में राहत भी दी है, लेकिन अनिवार्य तकनीकी जरूरतों को पूरा करना अभी भी जरूरी है।

बता दें कि तेजस मार्क-1ए भारतीय वायु सेना के पुराने मिग-21 विमानों की जगह लेने के लिए डेवलप किया जा रहा है। यह मूल तेजस मार्क-1 का ज्यादा एडवांस और घातक वर्जन है।

इस विमान में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी एईएसए रडार लगाया जा रहा है। यह रडार एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है और लंबी दूरी पर दुश्मन के विमानों का पता लगाने में सक्षम है।

विमान में नया इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइलों से बचाव में मदद करेगा। इसके अलावा यह बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी बीवीआर मिसाइल से भी लैस है।

तेजस मार्क-1ए को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसकी मेंटेनेंस जरूरतें कम हों और ऑपरेशनल उपलब्धता ज्यादा रहे। यानी ज्यादा विमान कम समय में उड़ान भर सकेंगे। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

कब से लगेगा उत्तम रडार

फिलहाल 83 तेजस मार्क-1ए विमानों के मौजूदा ऑर्डर में शुरुआती विमानों में इजरायल का ईएलएम-2052 एईएसए रडार लगाया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक स्वदेशी “उत्तम” रडार अभी डीआरडीओ के कंट्रोल में है और एचएएल केवल प्रोडक्शन एजेंसी की भूमिका निभा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक 83 विमानों के ऑर्डर में 41वें विमान से उत्तम रडार को शामिल किया जाएगा। इसके बाद दूसरे बैच के 97 विमानों में 2027 से नया गैलियम नाइट्राइड आधारित एडवांस उत्तम रडार लगाया जाएगा।

सूत्रों ने बताया कि स्वदेशी उत्तम एईएसए रडार की पहली खेप में करीब 33 रडार भारतीय वायु सेना को 2026 से मिलना शुरू होंगे। इन रडारों को तेजस मार्क-1ए फाइटर जेट में लगाने की तैयारी की जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि इस रडार में 912 ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल होंगे और यह 150 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर फाइटर जेट को ट्रैक कर सकेगा। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

ट्रायल और सॉफ्टवेयर ट्यूनिंग जारी

एचएएल के मुताबिक विमान में केवल हार्डवेयर नहीं बल्कि कई सॉफ्टवेयर और मिशन सिस्टम सुधार भी किए जा रहे हैं। कंपनी फिलहाल फ्लाइट पैरामीटर वैलिडेशन, सिस्टम इंटीग्रेशन और मिशन सॉफ्टवेयर ट्यूनिंग पर काम कर रही है।

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जब विमान भारतीय वायु सेना में शामिल हो तो उसे तुरंत ऑपरेशनल रोल में इस्तेमाल किया जा सके।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि आधुनिक फाइटर जेट केवल एक विमान नहीं बल्कि उड़ता हुआ नेटवर्क सिस्टम होता है। इसलिए हर सेंसर, रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का एक साथ सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

पांच विमान तैयार लेकिन मंजूरी बाकी

फरवरी में एचएएल ने दावा किया था कि पांच तेजस मार्क-1ए विमान डिलीवरी के लिए तैयार हैं। कंपनी ने कहा था कि इन विमानों में अधिकांश जरूरी क्षमताएं शामिल कर दी गई हैं।

हालांकि रक्षा सूत्रों का कहना है कि अभी सभी जरूरी सर्टिफिकेशन पूरे नहीं हुए हैं। कुछ जरूरी क्लियरेंस और तकनीकी मंजूरियां अभी बाकी हैं।

यही वजह है कि वायु सेना अंतिम मंजूरी देने से पहले सभी ट्रायल्स और टेस्टिंग्स की समीक्षा करना चाहती है।

वायु सेना के लिए क्यों जरूरी है तेजस

भारतीय वायु सेना इस समय स्क्वाड्रन की कमी का सामना कर रही है। वायु सेना की स्वीकृत ताकत 42.5 फाइटर स्क्वाड्रन की है, लेकिन वर्तमान में उसके पास करीब 29 स्क्वाड्रन ही हैं।

इससे पहले तेजस मार्क-1 के 30 से ज्यादा विमान भारतीय वायु सेना में शामिल हो चुके हैं। ये विमान फिलहाल दो स्क्वाड्रनों नंबर 45 फ्लाइंग डैगर्स और नंबर 18 फ्लाइंग बुलेट्स में ऑपरेशनल भूमिका में हैं।

ऐसे में तेजस मार्क-1ए को भविष्य की लड़ाकू क्षमता का अहम हिस्सा माना जा रहा है। वायु सेना ने कुल 180 तेजस मार्क-1ए विमानों का ऑर्डर दिया है।

अगर एचएएल की मौजूदा उत्पादन क्षमता को देखा जाए तो कंपनी सालाना लगभग 24 फाइटर जेट बना सकती है। ऐसे में पूरी डिलीवरी प्रक्रिया को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

नासिक लाइन से भी बढ़ेगा उत्पादन

एचएएल ने तेजस प्रोडक्शन के लिए बेंगलुरु के अलावा नासिक में भी नई असेंबली लाइन शुरू की है। पिछले साल अक्टूबर में नासिक में बने पहले तेजस मार्क-1ए विमान ने उड़ान भरी थी।

कंपनी का लक्ष्य उत्पादन क्षमता बढ़ाकर समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना है। इसके लिए सप्लाई चेन, सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन और परीक्षण प्रक्रिया पर भी तेजी से काम किया जा रहा है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

भारतीय वायु सेना ला रही है खास ‘अग्नि’ सिमुलेटर सिस्टम, पायलट करेंगे दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और एयर अटैक की लाइव प्रैक्टिस

IAF AGNI Simulator System RFP
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IAF AGNI Simulator System: भारतीय वायु सेना अपने पायलटों को हाईटेक ट्रेनिंग देने के लिए नए एडवांस सिमुलेटर सिस्टम खरीदने जा रही है। इसके लिए वायु सेना ने “एयर कॉम्बैट, ग्राउंड प्लानिंग एंड नेटवर्क इंटीग्रेटेड (AGNI) सिमुलेटर सिस्टम” की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी की है। यह सिस्टम लखनऊ में मेमौरा एयर फोर्स स्टेशन स्थित एयर डिफेंस कॉलेज में लगाया जाएगा। खास बात यह है कि यह केवल आम फ्लाइट सिमुलेटर नहीं है, बल्कि यह पूरा नेटवर्क आधारित इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जिसमें पायलट, एयर डिफेंस कंट्रोलर और ग्राउंड कमांडर एक साथ ट्रेनिंग ले सकेंगे।

IAF AGNI Simulator System: क्या है ‘अग्नि’ सिमुलेटर सिस्टम?

आज के समय में हवाई युद्ध केवल फाइटर जेट उड़ाने तक सीमित नहीं रह गया है। अब रडार, नेटवर्क लिंक, सैटेलाइट डेटा, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और साइबर सिस्टम्स भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में पुराने तरीके की ट्रेनिंग पर्याप्त नहीं मानी जा रही थी। इसी जरूरत को देखते हुए ”अग्नि” प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया गया।

‘अग्नि’ सिमुलेटर सिस्टम ऐसा डिजिटल युद्ध सिस्टम होगा, जिसमें बिना असली लड़ाकू विमान उड़ाए, बिना गोला-बारूद खर्च किए और बिना किसी जोखिम के वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों का अभ्यास किया जा सकेगा। इसमें दुश्मन के फाइटर जेट, ड्रोन, मिसाइल हमले, रडार ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नेटवर्क कमांड जैसे पूरे युद्ध माहौल को लाइव सिमुलेट किया जाएगा।

आखिर ‘अग्नि’ सिस्टम करेगा क्या?

‘अग्नि’ सिस्टम का मुख्य काम युद्ध जैसे हालात बनाकर अधिकारियों को ट्रेनिंग देना है। इसमें फाइटर पायलट, एयर डिफेंस कंट्रोलर और ग्राउंड वॉर प्लानर एक साथ अभ्यास करेंगे।

मान लीजिए दुश्मन का लड़ाकू विमान भारतीय सीमा की तरफ बढ़ रहा है। सिस्टम में रडार उसे पकड़ लेगा। कंट्रोलर स्क्रीन पर उसकी लोकेशन देखेगा। फिर वह फाइटर जेट को आदेश देगा। पायलट अपने कॉकपिट में बैठकर दुश्मन की तरफ जाएगा। मिसाइल लॉक होगी, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग शुरू होगी और नीचे बैठी ग्राउंड टीम पूरे ऑपरेशन को कंट्रोल करेगी। यह सब कुछ एक साथ नेटवर्क पर चलेगा।

चार हिस्सों में बंटा होगा पूरा सिस्टम

इस पूरे सिस्टम को चार बड़े सेक्शन में बांटा गया है। पहला हिस्सा फाइटर कंट्रोलर सेक्शन होगा। यही वह जगह होगी जहां एयर डिफेंस कंट्रोलर बैठकर दुश्मन के विमानों और मिसाइलों की निगरानी करेंगे। यहां बड़े पैनोरमिक डिस्प्ले लगाए जाएंगे जिन पर एक साथ हजार से ज्यादा ट्रैक्स दिखाई दे सकेंगे। इनमें फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और मिसाइल शामिल होंगी।

अधिकारियों को यह भी ट्रेनिंग दी जाएगी कि किस स्थिति में कौन सा हथियार इस्तेमाल करना है और किस विमान को इंटरसेप्ट करना है। इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के हालात भी बनाए जाएंगे ताकि जामिंग और फेक सिग्नल जैसी स्थितियों से निपटने का अभ्यास हो सके। (IAF AGNI Simulator System)

असली लड़ाकू विमान जैसा कॉकपिट

अग्नि सिस्टम का दूसरा सबसे अहम हिस्सा एयरक्राफ्ट कॉकपिट सेक्शन होगा। यहां चार हाई-फिडेलिटी कॉकपिट बनाए जाएंगे। इनमें भारतीय वायु सेना के सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000 या राफेल जैसे विमान का अनुभव मिलेगा। साथ ही विदेशी विमानों जैसे एफ-16, एफ-22 या चीन के जे-10 और जे-11 जैसे प्लेटफॉर्म भी सिमुलेट किए जाएंगे।

इन कॉकपिट में बैठने वाले पायलट को ऐसा महसूस होगा जैसे वह असली विमान उड़ा रहा हो। कंट्रोल स्टिक, थ्रॉटल, रडार, मिसाइल चेतावनी सिस्टम और हथियार नियंत्रण – सब कुछ वास्तविक विमान जैसा होगा। सीट हल्के झटकों और मूवमेंट के साथ काम करेगी ताकि टेकऑफ, मोड़ और मिसाइल लॉन्च जैसी स्थितियां असली लगें।

सबसे खास बात यह है कि इसमें वीआर और मिक्स्ड रियलिटी तकनीक भी इस्तेमाल होगी। पायलट हाई-रेजोल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी के जरिए युद्ध क्षेत्र को देख सकेंगे। उन्हें बादल, बारिश, कोहरा और रात जैसी परिस्थितियों में भी उड़ान का अभ्यास कराया जाएगा। (IAF AGNI Simulator System)

डॉगफाइट से लंबी दूरी की ट्रेनिंग

इस सिस्टम में “टू वर्सेस टू” एयर कॉम्बैट ट्रेनिंग भी होगी। मतलब दो विमान मिलकर दुश्मन के दो विमानों के खिलाफ लड़ाई का अभ्यास कर सकेंगे। इसके अलावा बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी बीवीआर और विजुअल रेंज डॉगफाइट दोनों तरह के युद्ध अभ्यास होंगे।

पायलटों का सीधा संपर्क फाइटर कंट्रोलर से रहेगा। कंट्रोलर उन्हें रडार पर दिख रहे दुश्मन की जानकारी देंगे और पायलट उसी आधार पर कार्रवाई करेंगे। इससे टीमवर्क और रियल टाइम कोऑर्डिनेशन बेहतर होगा। (IAF AGNI Simulator System)

जमीन से लेकर समुद्र तक पूरा बैटलफील्ड होगा सिमुलेट

एजीएनआई सिस्टम का सबसे जटिल हिस्सा ग्राउंड एनवायरनमेंट सेक्शन माना जा रहा है। यहां थल सेना, नौसेना और वायु सेना तीनों से जुड़े प्लेटफॉर्म्स को एक साथ जोड़ा जाएगा।

आरएफपी डॉक्यूमेंट के मुताबिक इसमें टैंक, मिसाइल सिस्टम, रडार, ड्रोन, युद्धपोत, एयरक्राफ्ट कैरियर, सबमरीन और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम तक को सिमुलेट किया जाएगा। 3डी इंटरैक्टिव स्क्रीन पर पूरा युद्धक्षेत्र दिखाई देगा। कौन सा रडार कितना क्षेत्र कवर कर रहा है, किस मिसाइल की रेंज कितनी है और कहां से हमला हो सकता है – सब कुछ लाइव दिखेगा।

यही नहीं, सिस्टम में धुआं, विस्फोट, मिसाइल ट्रेल और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसे स्पेशल इफेक्ट्स भी होंगे ताकि अभ्यास बिल्कुल वास्तविक लगे। साथ ही, खराब मौसम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर भी सिमुलेट किया जाएगा।

यानी बारिश, तूफान, धुंध, रडार जैमिंग, फर्जी सिग्नल और इलेक्ट्रॉनिक हमले जैसी स्थितियां भी बनाई जाएंगी। इससे अधिकारियों को वास्तविक युद्ध की कठिन परिस्थितियों की ट्रेनिंग मिलेगी। (IAF AGNI Simulator System)

इंस्ट्रक्टर पूरे युद्ध को करेंगे कंट्रोल

सिस्टम में अलग से सुपरवाइजर सेक्शन भी होगा। यहां बैठे इंस्ट्रक्टर किसी भी समय युद्ध की स्थिति बदल सकेंगे। वे अचानक दुश्मन के नए विमान जोड़ सकते हैं, नेटवर्क जामिंग कर सकते हैं या मौसम खराब कर सकते हैं।

पूरे अभ्यास की रिकॉर्डिंग भी होगी। बाद में वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग देखकर पायलटों और कंट्रोलरों की गलतियों का विश्लेषण किया जाएगा। (IAF AGNI Simulator System)

तीनों सेनाओं की संयुक्त ट्रेनिंग

इस सिस्टम की एक बड़ी खासियत यह भी होगी कि इसमें केवल वायु सेना ही नहीं, बल्कि थल सेना और नौसेना के अधिकारी भी ट्रेनिंग ले सकेंगे।

यानी भविष्य में तीनों सेनाएं एक साथ मल्टी डोमेन वॉरफेयर का अभ्यास कर सकेंगी। यह थिएटराइजेशन और जॉइंटनेस मॉडल के लिए भी अहम माना जा रहा है। (IAF AGNI Simulator System)

देना होगा मैलिशियस कोड न होने का प्रूफ

अग्नि के वेंडर को यह साबित करना होगा कि सिस्टम में कोई मैलिशियस कोड या साइबर खतरा नहीं है। सभी सॉफ्टवेयर और नेटवर्क पूरी तरह सुरक्षित होने चाहिए। कंपनियों को ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर यानी ओईएम सपोर्ट सर्टिफिकेट भी देना होगा। इसके लिए विशेष सुरक्षा जांच और सर्टिफिकेट जरूरी होंगे।

वायु सेना ने पूरे प्रोजेक्ट के लिए 365 दिन की समय सीमा तय की है। पहले चरण में फाइटर कंट्रोलर सेक्शन तैयार होगा। उसके बाद कॉकपिट सेक्शन लगाया जाएगा। सबसे आखिर में ग्राउंड एनवायरनमेंट सेक्शन को ऑपरेशनल किया जाएगा क्योंकि यह सबसे जटिल हिस्सा है।

अगर कोई कंपनी तय समय पर सिस्टम तैयार नहीं कर पाती तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है। कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का अधिकार भी वायु सेना के पास रहेगा।

इसमें भविष्य में नए कॉकपिट, अतिरिक्त कंसोल और नए युद्ध परिदृश्य जोड़ने की सुविधा रखी गई है। सिस्टम को 20 साल तक अपग्रेड करने लायक बनाया जाएगा।

साथ ही ऑपरेटर और मेंटेनेंस ट्रेनिंग भी दी जाएगी ताकि लंबे समय तक इसका ऑपरेशन भारत में ही किया जा सके। यही वजह है कि इसे आत्मनिर्भर भारत अभियान से जोड़कर भी देखा जा रहा है। (IAF AGNI Simulator System)

भारत-यूएई मिलकर बनाएंगे ड्रोन, मिसाइल और AI वेपंस! हैदराबाद में बनेंगी विदेशी स्नाइपर राइफल

India-UAE Defence Partnership

India-UAE Defence Partnership: भारत और यूएई अब मिलकर ड्रोन, मिसाइल, गोला-बारूद, नौसैनिक प्लेटफॉर्म, साइबर डिफेंस और एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी डेवलप करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। शुक्रवार को अबू धाबी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात के दौरान “फ्रेमवर्क फॉर स्ट्रैटेजिक डिफेंस पार्टनरशिप” को आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दिया गया।

यह समझौता भारत और यूएई के रक्षा संबंधों में अब तक का सबसे बड़ा और सबसे व्यापक कदम माना जा रहा है। इस नई साझेदारी के तहत दोनों देश रक्षा उपकरणों का संयुक्त उत्पादन के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस हथियार, ड्रोन टेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, स्पेशल ऑपरेशन, ट्रेनिंग और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम्स पर भी साथ काम करेंगे।

प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इस फ्रेमवर्क में डिफेंस इंडस्ट्रियल कोलैबोरेशन, इनोवेशन, एडवांस टेक्नोलॉजी, संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग, एजुकेशन, स्पेशल ऑपरेशन, इंटरऑपरेबिलिटी, मैरीटाइम सिक्योरिटी, साइबर डिफेंस और इंफॉर्मेशन एक्सचेंज जैसे कई अहम क्षेत्र शामिल हैं।

India-UAE Defence Partnership: जनवरी में शुरू हुई थी प्रक्रिया

दरअसल इस समझौते की नींव जनवरी 2026 में पड़ गई थी, जब यूएई के राष्ट्रपति भारत दौरे पर आए थे। उसी दौरान दोनों देशों ने स्ट्रैटेजिक डिफेंस पार्टनरशिप को लेकर एक लेटर ऑफ इंटेंट यानी एलओआई साइन किया था। शुक्रवार को अबू धाबी में उसी प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक पिछले दो सालों में भारत और यूएई के बीच रक्षा उद्योग सहयोग को लेकर लगातार बातचीत चल रही थी। भारत-यूएई डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन फोरम की पहली बैठक सितंबर 2024 में भारत में हुई थी। इसके बाद दूसरी बैठक 2025 में नई दिल्ली में आयोजित की गई थी।

इन बैठकों में यूएई की बड़ी डिफेंस कंपनी एज ग्रुप और भारत की सरकारी और निजी रक्षा कंपनियों ने हिस्सा लिया था। इसी दौरान संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और एडवांस सैन्य सिस्टम्स पर साझेदारी को लेकर चर्चा तेज हुई।

ड्रोन, मिसाइल और एआई पर रहेगा बड़ा फोकस

सूत्रों का कहना है कि भारत और यूएई अब संयुक्त रूप से हाई-टेक डिफेंस प्लेटफॉर्म्स बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। इनमें अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी यूएवी, एडवांस मिसाइल सिस्टम्स, प्रिसिजन म्यूनिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य तकनीक और नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं।

भारत का तेजी से बढ़ता रक्षा उत्पादन और यूएई की वित्तीय तथा तकनीकी क्षमता इस साझेदारी को खास बना रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात करीब 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जबकि कुल रक्षा उत्पादन लगभग 1.54 लाख करोड़ रुपये रहा।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि यूएई भारत के लिए केवल एक साझेदार देश नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के रक्षा बाजार तक पहुंच का बड़ा रास्ता बन सकता है।

हैदराबाद में खुल चुका है जॉइंट आर्म्स कॉम्प्लेक्स

भारत और यूएई के बीच रक्षा उत्पादन सहयोग की शुरुआत पहले ही हो चुकी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैदराबाद में बना आईकॉम-काराकल स्मॉल आर्म्स कॉम्प्लेक्स है।

यूएई की काराकल कंपनी और भारत की आईकॉम टेली लिमिटेड के बीच यह पहला बड़ा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रोजेक्ट माना जा रहा है। इस फैसिलिटी का उद्घाटन पिछले साल 21 अप्रैल को किया गया था।

इस प्रोजेक्ट के तहत यूएई की काराकल कंपनी की पूरी हथियार रेंज अब भारत में बनाई जा रही है। इसमें पिस्टल, स्नाइपर राइफल और दूसरे छोटे हथियार शामिल हैं।

हाल ही में सीएसआर-338 स्नाइपर राइफल का कॉन्ट्रैक्ट सीआरपीएफ को मिला है और इन राइफलों का निर्माण भी हैदराबाद की इसी यूनिट में होगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत मॉडल का बड़ा उदाहरण बन चुका है, जहां विदेशी तकनीक को भारत में लाकर स्थानीय उत्पादन किया जा रहा है।

India-UAE Defence Partnership

अदाणी और एज ग्रुप के बीच भी बड़ा समझौता

भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग केवल छोटे हथियारों तक सीमित नहीं है। जून 2024 में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और यूएई के एज ग्रुप के बीच भी बड़ा समझौता हुआ था।

इस साझेदारी में मिसाइल सिस्टम्स, ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, काउंटर ड्रोन टेक्नोलॉजी, अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और साइबर सिस्टम्स पर संयुक्त काम करने का फैसला लिया गया था।

सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों में रिसर्च एंड डेवलपमेंट फैसिलिटी तैयार करने पर भी काम चल रहा है।

इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल और एज ग्रुप के बीच भी एयरोस्पेस सेक्टर में सहयोग बढ़ रहा है। दोनों कंपनियां तेजस लड़ाकू विमान में यूएई के एयरबोर्न सिस्टम्स के इंटीग्रेशन पर चर्चा कर रही हैं।

शिप रिपेयर और नेवल सेक्टर में भी बड़ी साझेदारी

प्रधानमंत्री मोदी के यूएई दौरे के दौरान रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक और अहम समझौता हुआ। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और यूएई की ड्राईडॉक्स वर्ल्ड कंपनी के बीच गुजरात के वाडिनार में शिप रिपेयर क्लस्टर डेवलप करने के लिए एमओयू साइन किया गया।

इस प्रोजेक्ट में ऑफशोर फैब्रिकेशन और समुद्री प्लेटफॉर्म्स की मरम्मत जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।

इसके साथ ही मैरीटाइम और शिपबिल्डिंग सेक्टर में स्किल डेवलपमेंट के लिए भी अलग समझौता हुआ है। इसके तहत भारतीय वर्कफोर्स को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि भारत को ग्लोबल शिप रिपेयर हब के रूप में विकसित किया जा सके।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इसका सीधा संबंध भविष्य में नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स के जॉइंट प्रोडक्शन और मेंटेनेंस से भी जुड़ा हुआ है।

तीनों सेनाओं के बीच बढ़े सैन्य अभ्यास

पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के सैन्य संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। दोनों देशों की सेनाओं के बीच लगातार संयुक्त अभ्यास हो रहे हैं।

भारतीय सेना और यूएई सेना के बीच “डेजर्ट साइक्लोन” सैन्य अभ्यास आयोजित किया गया। 2024 में इसका आयोजन भारत में हुआ था, जबकि 2025 में इसका आयोजन यूएई में किया गया।

भारतीय नौसेना और यूएई नौसेना के बीच “एक्स गल्फ वेव्स” अभ्यास भी हुआ। इसके अलावा दोनों देशों के युद्धपोतों के बीच नियमित पोर्ट कॉल्स जारी हैं।

भारतीय वायुसेना ने यूएई में आयोजित “डेजर्ट फ्लैग” एयर एक्सरसाइज में अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी की थी। वहीं यूएई ने भारत के “तरंग शक्ति” अभ्यास में हिस्सा लिया था।

इसके अलावा दोनों देशों के बीच एयर चीफ, नेवी चीफ और आर्मी अधिकारियों के कई हाई लेवल दौरे भी हुए हैं।

साइबर और सुरक्षित कम्युनिकेशन पर भी जोर

नई रक्षा साझेदारी में साइबर डिफेंस और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम्स को भी खास जगह दी गई है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्धों में साइबर हमले और डेटा सुरक्षा सबसे बड़े मुद्दों में शामिल हो चुके हैं।

इसी वजह से भारत और यूएई अब सुरक्षित इंफॉर्मेशन शेयरिंग और डिफेंस नेटवर्क्स पर भी साथ काम करेंगे।

सूत्रों का कहना है कि यह साझेदारी किसी तीसरे देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि इसका मकसद दोनों देशों की तकनीकी और सैन्य क्षमता को मजबूत करना है।