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एयरफोर्स चीफ बोले- ड्रोन अब सिर्फ ‘आंखें’ नहीं, बन चुके हैं आसमान के ‘पंजे’, C-UAS को बताया “बिल्ली और चूहे के खेल”

Air Chief AP Singh Drone Warfare
Air force Chief AP Singh

Air Chief AP Singh Drone Warfare: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह का कहना है कि अब युद्ध का तरीका तेजी से बदल चुका है और ड्रोन, यूएवी तथा अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स आधुनिक युद्ध का सबसे अहम हिस्सा बन गए हैं। उन्होंने साफ कहा कि यह भविष्य की तकनीक नहीं, बल्कि आज की वास्तविकता है। अब युद्ध केवल पारंपरिक लड़ाकू विमानों और बड़े एयर ऑपरेशन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे डिसेंट्रलाइज्ड और “ऑटोनॉमस” मॉडल की तरफ बढ़ रहा है।

दिल्ली के सुब्रतो पार्क स्थित एयर फोर्स ऑडिटोरियम में सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज और इंडियन मिलिट्री रिव्यू की तरफ से आयोजित सेमिनार में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने ड्रोन वॉरफेयर, काउंटर यूएएस सिस्टम और ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से बात की।

एयर चीफ ने कहा कि आज के समय में ड्रोन केवल “आंखें” नहीं रहे, बल्कि अब वे आसमान में “पंजे” बन चुके हैं। यानी अब इनका इस्तेमाल केवल निगरानी के लिए नहीं, बल्कि सीधे हमला करने, दुश्मन के एयर डिफेंस को निशाना बनाने और युद्ध के मैदान में सटीक कार्रवाई के लिए भी किया जा रहा है।

Air Chief AP Singh Drone Warfare: बदल चुका है युद्ध का मैदान

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि आधुनिक युद्ध का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। पहले युद्धों में बड़ी संख्या में लड़ाकू विमान और पारंपरिक एयर पावर का इस्तेमाल होता था। उन्होंने कहा, “यह मानने से इनकार नहीं किया जा सकता कि बैटलफील्ड बदल चुका है। हम अब कंसंट्रेटेड एयर पावर से हटकर डिसेंट्रलाइज्ड और ऑटोनॉमस सिस्टम की तरफ जा रहे हैं।” यानी अब छोटे-छोटे अनमैन्ड सिस्टम और ड्रोन भी युद्ध का रुख बदल सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ड्रोन इसलिए सफल हो रहे हैं क्योंकि उनमें एयर पावर की लगभग सभी क्षमताएं मौजूद हैं।

एयर चीफ ने कहा कि ड्रोन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ऑपरेशन के दौरान मानव जीवन का जोखिम कम हो जाता है। इसके अलावा इनकी लागत भी पारंपरिक फाइटर जेट या मिसाइल सिस्टम की तुलना में काफी कम होती है। यही वजह है कि दुनिया की लगभग हर सेना अब ड्रोन और काउंटर ड्रोन तकनीक पर तेजी से काम कर रही है।

भविष्य “मैन्ड और अनमैन्ड टीमिंग” का

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि भविष्य “मैन्ड और अनमैन्ड टीमिंग” का है। यानी इंसान और ड्रोन दोनों मिलकर युद्ध लड़ेंगे।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में इंसान को पूरी तरह सिस्टम से बाहर नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि इंसान सीधे नियंत्रण में न हो, लेकिन निगरानी और फैसले लेने की भूमिका में जरूर रहेगा।

उन्होंने कहा कि अगर पूरी दुनिया केवल अनमैन्ड सिस्टम की तरफ जा रही होती तो बड़े देश आज भी छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने में इतना पैसा और समय नहीं लगाते। उन्होंने कहा कि सभी नए फाइटर प्रोग्राम अभी भी “मैनड” यानी पायलट वाले हैं।

काउंटर ड्रोन सिस्टम पर भी जोर

उन्होंने कहा कि ड्रोन के खिलाफ तकनीक विकसित करना भी उतना ही जरूरी है। उनके मुताबिक यह “बिल्ली और चूहे के खेल” जैसा है। यानी अगर एक तरफ नई ड्रोन तकनीक विकसित होगी तो दूसरी तरफ उसे रोकने वाली तकनीक भी साथ-साथ विकसित करनी पड़ेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक पक्ष को पूरी बढ़त मिल जाएगी। तभी संतुलन बना रहता है।

इसी वजह से दुनिया भर में लेजर बेस्ड एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, रेडियो फ्रीक्वेंसी सिस्टम और एंटी ड्रोन हथियारों पर तेजी से काम हो रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि अब केवल “फोर्स बनाम फोर्स” यानी ताकत के मुकाबले ताकत का दौर नहीं है। अब “फोर्स बनाम डिफेंस” का दौर है, जहां दुश्मन के हथियारों को रोकना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस सैन्य अभियान के दौरान भारतीय सेनाओं ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया और इसकी सबसे बड़ी वजह थी बेहतर तालमेल।

उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने अच्छा काम किया और यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि सभी एजेंसियों के बीच कोऑर्डिनेशन था।”

उन्होंने बताया कि अगर उस समय कोई केंद्रीय एजेंसी पूरे ऑपरेशन को कॉर्डिनेट नहीं कर रही होती, तो इतनी बड़ी सफलता संभव नहीं होती।

एयर चीफ ने खास तौर पर इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम यानी आईएसीसीएस का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह सिस्टम पूरे ऑपरेशन का “नर्व सेंटर” बन गया था।

उनके मुताबिक चाहे काउंटर यूएएस ऑपरेशन हो, काउंटर वेपन सिस्टम हो या एयर डिफेंस ऑपरेशन, हर जगह आईएसीसीएस ने अलग-अलग मिलिट्री यूनिट्स के बीच तालमेल बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन के दौरान दुश्मन के कुछ हथियार अपने टारगेट तक पहुंच पाए, लेकिन उनके यूएएस सिस्टम टारगेट पर असर नहीं डाल सके। इसकी वजह भारतीय सेनाओं के बीच मजबूत समन्वय था।

तीनों सेनाओं के बीच तालमेल जरूरी

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि आने वाले समय में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को एक ही एयर स्पेस में काम करना होगा। ऐसे में “टोटल कोऑर्डिनेशन” बेहद जरूरी हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्धों में अलग-अलग सैन्य शाखाओं के लिए अलग-अलग तरीके से काम करना संभव नहीं होगा। सभी सेनाओं को नेटवर्क आधारित सिस्टम और साझा कमांड ढांचे के तहत काम करना पड़ेगा।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि भारतीय सेना अब जॉइंटनेस और मल्टी डोमेन ऑपरेशन मॉडल पर तेजी से काम कर रही है। इसके तहत जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई करने की क्षमता विकसित की जा रही है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यही मॉडल देखने को मिला था, जहां तीनों सेनाओं ने एक साथ मिलकर ऑपरेशन चलाया।

ड्रोन अब केवल निगरानी तक सीमित नहीं

एयर चीफ ने कहा कि पहले ड्रोन को केवल “आंखें” माना जाता था, यानी उनका मुख्य काम निगरानी और जानकारी जुटाना होता था। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।

उन्होंने कहा, “यूएएस अब केवल आंखें नहीं हैं, बल्कि आसमान के पंजे बन चुके हैं।”

उनके मुताबिक आधुनिक ड्रोन अब दुश्मन के इलाके में जाकर हमला कर सकते हैं, हथियार गिरा सकते हैं और एयर डिफेंस सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दुनिया को दिखा दिया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़े युद्धों का रुख बदल सकते हैं।

इसी वजह से भारत भी तेजी से स्वदेशी ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, स्वार्म ड्रोन और एआई आधारित युद्ध प्रणाली पर काम कर रहा है।

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि अब युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि नेटवर्क, डेटा, ऑटोमेशन और बेहतर कोऑर्डिनेशन से भी जीते जाएंगे।

CDS जनरल चौहान बोले- थिएटर कमांड अंत नहीं, बल्कि बड़े सैन्य सुधारों की शुरुआत, सेनाओं की सोच बदलने में लगा वक्त

CDS on Theatre Command
Anil Chauhan during an interactive session at the ‘Kalam and Kavach’ Defence Conclave held at the Manekshaw Centre.

CDS on Theatre Command: देश के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने साफ कहा है कि भविष्य के युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे। आने वाले समय में साइबर, स्पेस, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर भी उतने ही बड़े हथियार होंगे। उन्होंने कहा कि भारत अब तेजी से थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस और मल्टी डोमेन वॉरफेयर की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

नई दिल्ली में मानेकशॉ सेंटर में आयोजित सेंटर फॉर जॉइंट वारफेयर स्टडीज (CENJOWS) के कलम एंड कवच के तीसरे संस्करण में आयोजित फायरसाइड चैट में बोलते हुए सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता, मल्टी-डोमेन वॉरफेयर, इनोवेशन और भविष्य के युद्धों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम में बातचीत के दौरान जनरल अनिल चौहान ने कहा कि भारतीय सेनाओं में जो बड़े सैन्य सुधार चल रहे हैं, वे केवल स्ट्रक्चरल बदलाव नहीं हैं, बल्कि सोच बदलने की प्रक्रिया भी है। उन्होंने माना कि थिएटर कमांड बनाने से ज्यादा मुश्किल काम सेनाओं की मानसिकता बदलना था।

उन्होंने कहा कि भारत जिस थिएटराइजेशन और जॉइंटनेस सुधार की तरफ बढ़ रहा है, वह देश के सबसे बड़े सैन्य सुधारों में से एक है। उनके मुताबिक भविष्य का युद्ध जॉइंटनेस यानी तीनों सेनाओं के एक साथ काम करने पर आधारित होगा।

CDS on Theatre Command: “सहमति” के रास्ते से आगे बढ़ाने की कोशिश

जनरल चौहान ने कहा कि कई देशों ने पहले भी इस मॉडल को अपनाया है और हर जगह अलग-अलग सैन्य सेवाओं के बीच मतभेद और प्रतिस्पर्धा देखने को मिली थी। भारत में भी शुरुआत में कई तरह की चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने इस प्रक्रिया को “सहमति” के रास्ते से आगे बढ़ाने की कोशिश की।

उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने हजारों सैन्य अधिकारियों और संस्थानों के बीच जाकर थिएटर कमांड और जॉइंटनेस पर चर्चा की। उनका मकसद केवल नया ढांचा बनाना नहीं बल्कि यह समझाना था कि भविष्य के युद्धों में तीनों सेनाओं को एक साथ काम करना ही होगा।

सीडीएस ने कहा कि जैसे-जैसे अधिकारियों और जवानों को यह समझ आया कि मल्टी डोमेन वॉरफेयर में अकेली कोई भी सेना पूरी लड़ाई नहीं लड़ सकती, वैसे-वैसे थिएटराइजेशन को लेकर स्वीकार्यता भी बढ़ी।

उन्होंने कहा कि असली चुनौती संरचना बदलना नहीं बल्कि “माइंडसेट” बदलना था।

जनरल चौहान ने कहा कि अब इस प्रक्रिया को “गति और दिशा” दोनों मिल चुकी हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले सीडीएस के कार्यकाल में यह प्रक्रिया और तेजी से आगे बढ़ेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि सैन्य सुधार कभी खत्म नहीं होते, यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस सैन्य अभियान के दौरान भारत के पास दुश्मन की तुलना में बेहतर बैटलफील्ड ट्रांसपेरेंसी और सिचुएशनल अवेयरनेस थी। यानी भारतीय सेनाओं को यह साफ पता था कि सीमा के दोनों तरफ क्या हो रहा है।

उन्होंने कहा कि यही वजह थी कि भारत पूरे ऑपरेशन के दौरान “एस्केलेशन मैट्रिक्स” पर हावी रहा। उन्होंने बताया कि भारतीय सेनाओं के बीच बेहतर इंटीग्रेशन और नेटवर्क आधारित सिस्टम की वजह से तेजी से फैसले लेने और जवाब देने में मदद मिली। सीडीएस ने कहा कि आधुनिक युद्धों में केवल हथियार नहीं बल्कि सूचना, डेटा और नेटवर्क भी बड़ी ताकत बन चुके हैं। (CDS On Theatre Command)

मल्टी डोमेन वॉरफेयर पर जोर

जनरल चौहान ने कहा कि आज सेनाओं के बीच इंटीग्रेशन केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रह सकता। अब साइबर स्पेस, स्पेस डोमेन, कॉग्निटिव वॉरफेयर और इंफॉर्मेशन ऑपरेशन भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

उन्होंने बताया कि भविष्य के युद्धों में “कॉग्निटिव वॉरफेयर” यानी लोगों की सोच और भावनाओं को प्रभावित करना भी एक बड़ा हथियार होगा। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और फेक न्यूज अब युद्ध का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

सीडीएस ने अधिकारियों को सलाह दी कि वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखना सीखें, क्योंकि सोशल मीडिया पर छोटी-छोटी बातें भी विरोधी देशों द्वारा इस्तेमाल की जा सकती हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया अभी भी इस नए तरह के युद्ध को पूरी तरह समझने की कोशिश कर रही है और भारत भी लगातार इससे सीख रहा है। (CDS On Theatre Command)

ईरान युद्ध और ड्रोन खतरे का जिक्र

जनरल चौहान ने हाल के संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन वॉरफेयर देखने को मिला, लेकिन ईरान से जुड़े संघर्षों में एक नई चीज देखने को मिली, वह थी बड़े पैमाने पर मिसाइलों का इस्तेमाल।

उन्होंने कहा कि कई बैलिस्टिक मिसाइलें सैन्य और नागरिक दोनों तरह के ठिकानों तक पहुंचीं। कुछ मिसाइलों को रोका गया लेकिन कुछ अपने टारगेट तक भी पहुंचीं।

सीडीएस के मुताबिक भविष्य में दुनिया को ड्रोन और मिसाइलों के “सैचुरेशन अटैक” से बड़ी चुनौती मिल सकती है। यानी एक साथ इतनी बड़ी संख्या में हमले किए जाएं कि एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाए। उन्होंने कहा कि यह एक नया ट्रेंड है, जिसे पूरी दुनिया देख रही है। (CDS On Theatre Command)

डीएमए और आईडीएस की भूमिका समझाई

जनरल चौहान ने फायरसाइड चैट के दौरान डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी डीएमए और हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ यानी आईडीएस की भूमिका भी समझाई। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच अभी भी इन दोनों संस्थाओं को लेकर भ्रम है।

उन्होंने बताया कि आईडीएस का काम तीनों सेनाओं के बीच इंटीग्रेशन और नए डोमेन्स में क्षमता निर्माण करना है, जबकि डीएमए रक्षा मंत्रालय के भीतर सैन्य मामलों को संभालता है।

उन्होंने कहा कि डीएमए की स्थापना भारतीय सैन्य सुधारों में सबसे बड़ा बदलाव रही है क्योंकि अब सेना से जुड़े कई फैसले सीधे सैन्य नेतृत्व के जरिए लिए जा सकते हैं।

कारगिल रिव्यू कमेटी का भी जिक्र

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि थिएटराइजेशन का सुझाव सबसे पहले कारगिल रिव्यू कमेटी ने दिया था। उनके अनुसार डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी डीएमए का गठन इस दिशा में सबसे बड़ा बदलाव रहा है, क्योंकि अब सैन्य मामलों के लिए एक अलग और स्पष्ट व्यवस्था मौजूद है। हालांकि उन्होंने कहा कि इस सिस्टम को पूरी तरह से बनने के लिए अभी समय की जरूरत है। (CDS On Theatre Command)

भारत के पास विवादित सीमाएं

जनरल चौहान ने कहा कि भारत के पास विवादित सीमाएं हैं, इसलिए देश को हर समय तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा कि युद्ध छोटा होगा या लंबा, इस पर ध्यान देने की बजाय उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अगर किसी सैन्य कार्रवाई का लक्ष्य स्पष्ट हो तो मिशन पूरा होने के बाद जल्दी बाहर निकलने की रणनीति भी जरूरी होती है।

सीडीएस ने यह भी कहा कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, ऑटोनॉमस सिस्टम और नई पीढ़ी की तकनीकें युद्ध का रूप बदल देंगी। उन्होंने कहा कि थिएटर कमांड अंत नहीं, बल्कि आगे आने वाले बड़े सैन्य सुधारों की शुरुआत है। (CDS On Theatre Command)

नौसेना को मिलेगा अनमैन्ड माइन हंटर सिस्टम, L&T और फ्रांस की Exail मिलकर बनाएंगी ये खास वेसल्स

Indian Navy MCMV
L&T Partners France’s Exail To Build Advanced Unmanned Mine Counter Measure System For Indian Navy

Indian Navy MCMV: भारतीय नौसेना को जल्द ही समुद्र के भीतर छिपी बारूदी सुरंगों से निपटने के लिए नई पीढ़ी की अनमैन्ड टेक्नोलॉजी मिलने वाली है। भारत की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो यानी एलएंडटी ने फ्रांस की कंपनी एक्साइल के साथ एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी की है। इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए एडवांस अनमैन्ड माइन काउंटर मेजर सिस्टम तैयार किया जाएगा।

यह सिस्टम भारतीय नौसेना के आने वाले माइन काउंटर मेजर वेसल्स यानी एमसीएमवी प्रोग्राम का हिस्सा होगा। नौसेना इस प्रोजेक्ट के तहत 12 नए विशेष युद्धपोत शामिल करने की तैयारी कर रही है। इन जहाजों का काम समुद्र में बिछाई गई दुश्मन की माइन्स का पता लगाना और उन्हें सुरक्षित तरीके से नष्ट करना होगा।

समुद्री माइन्स सबसे सस्ती लेकिन सबसे खतरनाक हथियारों में मानी जाती हैं। इन्हें बंदरगाहों, समुद्री रास्तों या तटीय इलाकों में चुपचाप बिछाया जा सकता है। अगर समय रहते इन्हें खोजा न जाए तो युद्धपोतों, व्यापारिक जहाजों और सप्लाई रूट्स को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

Indian Navy MCMV: एलएंडटी होगा प्राइम कॉन्ट्रैक्टर

एलएंडटी इस पूरे प्रोजेक्ट में “प्राइम कॉन्ट्रैक्टर” की भूमिका निभाएगा। यानी भारतीय नौसेना के लिए बनने वाले इस अनमैन्ड सिस्टम की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एलएंडटी के पास होगी। वहीं फ्रांस की एक्साइल कंपनी टेक्नोलॉजी पार्टनर के रूप में काम करेगी।

दोनों कंपनियां मिलकर ऐसा सिस्टम तैयार करेंगी, जो बिना किसी इंसानी चालक के समुद्र में जाकर माइन्स का पता लगाएगा। इसके बाद वह माइन्स की पहचान करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट भी कर सकेगा।

एलएंडटी ने कहा है कि यह सिस्टम पूरी तरह “स्टैंड ऑफ मोड” में काम करेगा। यानी नौसैनिकों को सीधे खतरे वाले इलाके में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अनमैन्ड सिस्टम दूर से ही पूरा ऑपरेशन करेगा।

हालांकि, एलएंडटी पहले से युद्धपोत, सबमरीन सिस्टम्स, मिसाइल लॉन्चर और कई एडवांस रक्षा प्लेटफॉर्म्स पर काम कर चुकी है।

कंपनी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अरुण रामचंदानी ने कहा कि यह साझेदारी एलएंडटी की डिफेंस इंजीनियरिंग क्षमता और एक्साइल की एडवांस माइन वारफेयर टेक्नोलॉजी को एक साथ लाएगी।

वहीं एक्साइल के मैरीटाइम सिस्टम्स बिजनेस प्रमुख जेरोम बेंडेल ने कहा कि यह साझेदारी केवल एक प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि भारत में स्वदेशी अनमैन्ड समुद्री सिस्टम्स के विकास की दिशा में भी अहम कदम है।

क्यों जरूरी है यह सिस्टम

भारतीय नौसेना लंबे समय से नए माइन काउंटर मेजर जहाजों की जरूरत महसूस कर रही थी। वर्तमान में पुराने पोंडिचेरी-क्लास माइन्सवीपर्स 25-30 साल पुराने हो चुके हैं और जल्द ही डीकमीशन होने वाले हैं। इनकी जगह 12 माइन काउंटर मेजर वेसल्स (MCMVs) खरीदने की योजना है, हालांकि जरूरत 24 की है। इनमें प्रत्येक जहाज लगभग 1000 टन वजन का होगा, जिसमें नॉन-मैग्नेटिक हल, हाई-डेफिनिशन सोनार, हल-माउंटेड और टोड एरे सोनार शामिल होंगे। इनमें माइन काउंटरमेजर के साथ-साथ एंटी-सबमरीन वारफेयर (ASW) की भी क्षमता होगी।

नौसेना ने 2023 में इसके लिए आरएफआई जारी की थी। इसके बाद जुलाई 2025 में रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने इस योजना को मंजूरी दी। इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 44 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। नए माइन काउंटर मेजर जहाजों की डिलीवरी 2030 से 2037 के बीच शुरू होगी।

इन जहाजों का निर्माण गोवा शिपयार्ड लिमिटेड समेत भारतीय शिपयार्ड्स में किया जाएगा। ऑर्डर अलग-अलग शिपयार्ड्स के बीच बांटा जाएगा। इससे पहले 2011 और 2015 में भी इस तरह की कोशिश हुई थी, लेकिन विदेशी कंपनियों से तकनीक ट्रांसफर में दिक्कत आने की वजह से प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया। अब सरकार का पूरा जोर भारत में ही स्वदेशी तकनीक से निर्माण करने पर है।

समुद्र में माइन्स का खतरा आज भी बेहद गंभीर माना जाता है। किसी भी युद्ध के दौरान दुश्मन समुद्री रास्तों को ब्लॉक करने के लिए माइन्स का इस्तेमाल कर सकता है। इससे बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही रुक सकती है।

भारत के लिए यह खतरा इसलिए भी अहम है क्योंकि देश का बड़ा व्यापार समुद्री रास्तों से होता है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान की नौसैनिक गतिविधियों को देखते हुए भारत अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करने में जुटा हुआ है।

सूत्रों का कहना है कि पुराने समय में माइन्स हटाने के लिए जहाजों और जवानों को सीधे खतरे वाले इलाके में जाना पड़ता था। लेकिन अब अनमैन्ड सिस्टम्स इस जोखिम को काफी कम कर देंगे।

कैसे काम करेगा यह अनमैन्ड सिस्टम

एलएंडटी और एक्साइल जो सिस्टम भारतीय नौसेना को देने जा रहे हैं, उसमें कई तरह के एडवांस समुद्री ड्रोन और सेंसर शामिल होंगे। इनमें अनमैन्ड सरफेस व्हीकल यानी यूएसवी, अंडरवॉटर ड्रोन, रिमोट ऑपरेटेड सिस्टम और हाई टेक सोनार सिस्टम शामिल हैं।

ये सिस्टम समुद्र के अंदर जाकर पहले संदिग्ध माइन्स का पता लगाएंगे। फिर उनकी तस्वीर और डेटा कमांड सेंटर तक भेजेंगे। इसके बाद जरूरत पड़ने पर छोटे रोबोटिक सिस्टम माइन्स के पास जाकर उन्हें निष्क्रिय या नष्ट कर देंगे।

एक्साइल की तकनीक पहले से कई देशों की नौसेनाओं में इस्तेमाल हो रही है। कंपनी का दावा है कि उसके सिस्टम्स वास्तविक सैन्य ऑपरेशनों में टेस्ट किए जा चुके हैं।

फ्रांस की एक्साइल कंपनी का दावा है कि उसके अनमैन्ड माइन वारफेयर सिस्टम्स दुनिया के सबसे एडवांस प्लेटफॉर्म्स में गिने जाते हैं। यह तकनीक यूरोप और मिडिल ईस्ट की कई नौसेनाओं में इस्तेमाल हो रही है।

समुद्री ड्रोन और एआई पर बढ़ रहा जोर

आधुनिक नौसैनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है। अब केवल बड़े युद्धपोत ही सबसे बड़ी ताकत नहीं माने जाते। अनमैन्ड सिस्टम्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंडरवॉटर ड्रोन जैसी तकनीकें तेजी से अहम होती जा रही हैं।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य के समुद्री युद्धों में ऐसे ड्रोन सिस्टम्स की भूमिका और बढ़ेगी। ये सिस्टम दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी, माइन्स की खोज और खतरनाक इलाकों में ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

भारतीय नौसेना अब “मैनड और अनमैन्ड टीमिंग” मॉडल पर भी जोर दे रही है। यानी युद्धपोतों के साथ छोटे समुद्री ड्रोन मिलकर काम करेंगे।

ऑपरेशन सिंदूर पर बोले राजनाथ सिंह- “अगर कोई हमें उकसाएगा तो छोड़ेंगे नहीं”

Operation Sindoor Rajnath Singh

Operation Sindoor Rajnath Singh: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति पर चल रहा है। राजस्थान के नागौर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि भारत किसी को उकसाता नहीं है, लेकिन अगर कोई भारत को उकसाएगा तो उसे छोड़ा भी नहीं जाएगा।

राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने जिस तरह मिलकर कार्रवाई की, वह अभूतपूर्व थी। उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर फिर से आतंकवादी गतिविधियां जारी रहीं तो भारत और भी कड़ा जवाब देगा।

Operation Sindoor Rajnath Singh: नागौर में दिया बड़ा बयान

रक्षा मंत्री राजस्थान के नागौर जिले में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत और मेड़ता के संस्थापक राव दूदा मेड़तिया की प्रतिमा अनावरण समारोह में पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी मौजूद रहे।

अपने संबोधन के दौरान राजनाथ सिंह ने पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति अब पूरी तरह जीरो टॉलरेंस की होगी।

रक्षा मंत्री ने कहा, “2016 में हमने सर्जिकल स्ट्राइक की, 2019 में बालाकोट स्ट्राइक की और 2025 में ऑपरेशन सिंदूर हुआ। हमारी तीनों सेनाओं ने जिस तरह यह ऑपरेशन अंजाम दिया, उसकी कोई तुलना नहीं है।”

उन्होंने कहा कि भारत किसी देश को उकसाना नहीं चाहता, लेकिन अगर कोई भारत के खिलाफ कार्रवाई करेगा तो उसे जवाब जरूर मिलेगा।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में ऑपरेशन सिंदूर को भारत की बड़ी सैन्य कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले में निर्दोष लोगों की हत्या के बाद देश ने मजबूत जवाब दिया।

उन्होंने कहा कि आतंकियों ने लोगों को धर्म पूछकर निशाना बनाया था, लेकिन भारत ने उसके बाद जवाबी कार्रवाई करके यह दिखा दिया कि देश अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर कदम उठाने को तैयार है।

रक्षा मंत्री ने कहा, “अब ऐसी घटनाओं में कोई सीमा हमें रोक नहीं सकती।”

बता दें कि मई 2025 में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने एक साथ मिलकर कार्रवाई की थी।

तीनों सेनाओं के तालमेल की तारीफ

राजनाथ सिंह ने खास तौर पर भारतीय सेनाओं के बीच तालमेल की तारीफ की। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं ने जिस तरह एक साथ काम किया, उसने दुनिया को भारत की सैन्य क्षमता दिखाई।

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में भारतीय सेना “जॉइंटनेस” और “मल्टी डोमेन वॉरफेयर” मॉडल पर तेजी से काम कर रही है। इसका मकसद जमीन, हवा और समुद्र में एक साथ ऑपरेशन करने की क्षमता बढ़ाना है।

ऑपरेशन सिंदूर को इसी नई सैन्य रणनीति का बड़ा उदाहरण माना गया था। इस अभियान में लंबी दूरी की मिसाइलों, ड्रोन, प्रिसिजन हथियारों और एडवांस सर्विलांस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अब आतंकवाद को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान अब दोबारा भारत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करेगा।

सर्जिकल स्ट्राइक से ऑपरेशन सिंदूर तक

अपने भाषण में राजनाथ सिंह ने पिछले एक दशक में भारत की बड़ी सैन्य कार्रवाइयों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक और फिर ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया को भारत की नई नीति दिखाई है।

उन्होंने कहा कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रह गया है, बल्कि जरूरत पड़ने पर निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता रखता है।

भैरों सिंह शेखावत को किया याद

कार्यक्रम के दौरान राजनाथ सिंह ने पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत को भी याद किया। उन्होंने कहा कि भैरों सिंह शेखावत का राजनीतिक जीवन बेहद प्रेरणादायक रहा।

उन्होंने बताया कि शेखावत ने 1952 में राजस्थान विधानसभा सदस्य के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की थी और बाद में तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने देश के 11वें उपराष्ट्रपति के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली।

कार्यक्रम में राव दूदा मेड़तिया को भी श्रद्धांजलि दी गई। राव दूदा मेड़तिया राठौड़ राजपूत योद्धा और मेड़तिया वंश के संस्थापक माने जाते हैं।

राजनाथ सिंह ने घटाया अपना काफिला

इस बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने सरकारी काफिले का आकार भी कम करने का फैसला किया है। जानकारी के मुताबिक उन्होंने अपने काफिले को पहले की तुलना में आधे से भी कम करने का निर्णय लिया है।

यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील के बाद आया है, जिसमें उन्होंने देशवासियों से ईंधन बचाने और आयातित फ्यूल पर निर्भरता कम करने की बात कही थी।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से ऊर्जा बचाने और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने की अपील की थी। इसी के बाद रक्षा मंत्री ने भी अपने काफिले को छोटा करने का फैसला लिया।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह कदम ईंधन बचत और संसाधनों के बेहतर उपयोग के संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बड़ा फैसला, थिएटराइजेशन से पहले भारतीय सेना और नौसेना के बीच जॉइंटनेस बढ़ाने को लेकर हुआ बड़ा समझौता

Army-Navy MoA Agreement

Army-Navy MoA Agreement: भारतीय सेना और भारतीय नौसेना के बीच हाल ही में एक अहम समझौता हुआ है। नया “मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन ऑन अफिलिएशन” समझौता देश के मिलिट्री स्ट्रक्चर में बड़े बदलावों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इस समझौते के तहत सेना और नौसेना अब नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ ट्रेनिंग, एक्सचेंज प्रोग्राम, ऑपरेशनल जानकारी और जॉइंट गतिविधियों में शामिल होंगी, ताकि भविष्य के मल्टी-डोमेन युद्धों में तेजी से और एकजुट होकर कार्रवाई की जा सके।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत थिएटराइजेशन, जॉइंटनेस और इंटीग्रेटेड वॉरफेयर मॉडल की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पिछले कुछ सालों में चीन और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा खतरे, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियां और ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों ने यह दिखा दिया है कि भविष्य के युद्ध अब केवल जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे।

Army Navy MoA Agreement: नई दिल्ली में हुआ समझौता

नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय सेना की ओर से एडजुटेंट जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीपीएस कौशिक और भारतीय नौसेना की ओर से चीफ ऑफ पर्सनल वाइस एडमिरल गुरचरण सिंह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान सेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ और नौसेना के वाइस चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्स्यायन भी मौजूद रहे।

इस समझौते का मकसद दोनों सेनाओं के बीच इंटर-सर्विस कोऑपरेशन और जॉइंटनेस को और मजबूत करना है। इसके तहत सेना की रेजिमेंट्स, नौसेना के जहाजों, ट्रेनिंग संस्थानों और मिलिट्री इंस्टॉलेशंस के बीच इंटीग्रेशन बढ़ाया जाएगा।

आसान शब्दों में समझें तो अब सेना और नौसेना की अलग-अलग यूनिट्स नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ समय बिताएंगी, ट्रेनिंग करेंगी और ऑपरेशनल अनुभव साझा करेंगी। इससे दोनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक-दूसरे की कार्यप्रणाली और चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।

सैन्य भाषा में अफिलिएशन का मतलब दो अलग सैन्य यूनिट्स के बीच औपचारिक संबंध बनाना होता है। उदाहरण के तौर पर सेना की किसी रेजिमेंट को नौसेना के किसी युद्धपोत या ट्रेनिंग संस्थान से जोड़ा जा सकता है। इसके बाद दोनों यूनिट्स के बीच रेगुलर विजिट, संयुक्त कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, सेमिनार और ट्रेनिंग एक्सचेंज होते हैं। इसका मकसद ऑपरेशनल समझ और तालमेल को मजबूत करना होता है।

हालांकि पहले भी भारतीय सेना और नौसेना की कुछ यूनिट्स के बीच ऐसे संबंध रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस तेग को सिख लाइट इन्फैंट्री से और आईएनएस सह्याद्री को पूना हॉर्स रेजिमेंट से जोड़ा गया था। लेकिन अब पहली बार पूरे स्तर पर एक औपचारिक नीति बनाई गई है, जिसके तहत भविष्य में होने वाले सभी अफिलिएशन को एक समान स्ट्रक्चर में लाया जाएगा।

क्यों जरूरी हो गया यह बदलाव

भारत का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है। एक तरफ चीन सीमा पर दबाव बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ हिंद महासागर क्षेत्र में भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इसके अलावा साइबर वॉरफेयर, ड्रोन अटैक, स्पेस टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में केवल थलसेना या नौसेना अकेले काम नहीं कर सकतीं। अगर समुद्र में किसी सैन्य कार्रवाई की जरूरत पड़े तो नौसेना को सेना के साथ तालमेल बैठाना होगा। इसी तरह जमीन पर होने वाले बड़े ऑपरेशन में वायुसेना और नौसेना की भूमिका भी अहम होगी।

इसी वजह से भारत अब मल्टी-डोमेन ऑपरेशन मॉडल पर काम कर रहा है। इसमें जमीन, समुद्र, हवा, साइबर और स्पेस सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई की जाती है।

इसके तहत आने वाले समय के सैन्य अभियानों में तेजी से फैसले लेना, अलग-अलग डोमेन्स के बीच कॉर्डिनेशन और इंटरऑपरेबल क्षमता बेहद जरूरी होगी। यही वजह है कि सेवाओं के बीच सहज तालमेल को मजबूत किया जा रहा है।

Army-Navy MoA Agreement

ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

इस समझौते के पीछे ऑपरेशन सिंदूर का अनुभव भी बड़ा कारण माना जा रहा है। मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे।

करीब 88 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने एक साथ मिलकर कार्रवाई की थी। सेना ने जमीन से प्रिसिजन फायर किए, वायुसेना ने लंबी दूरी की मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से हमले किए, जबकि नौसेना ने अरब सागर में अपनी फॉरवर्ड तैनाती मजबूत की।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस ऑपरेशन ने यह साबित कर दिया कि जब तीनों सेनाएं एक साथ काम करती हैं तो ऑपरेशन की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

सेना की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं एक साथ मिल कर कार्रवाई की और सफलता मिली। इसी अनुभव के आधार पर अब इंटर-सर्विस सहयोग को और संस्थागत रूप दिया जा रहा है। (Army-Navy MoA Agreement)

क्या यह थिएटराइजेशन की शुरुआत है?

सूत्रों के मुताबिक यह समझौता थिएटराइजेशन की शुरुआत नहीं है, लेकिन उसकी दिशा में एक अहम कदम जरूर माना जा रहा है।

थिएटराइजेशन भारतीय सेनाओं का सबसे बड़ा सैन्य सुधार कार्यक्रम माना जा रहा है। इसके तहत तीनों सेनाओं को अलग-अलग कमांड की बजाय इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स के तहत लाया जाएगा।

उदाहरण के तौर पर चीन सीमा के लिए अलग थिएटर कमांड, पाकिस्तान सीमा के लिए अलग और समुद्री क्षेत्र के लिए अलग कमांड बनाई जा सकती है। इनमें एक ही कमांडर के अधीन थलसेना, वायुसेना और नौसेना काम करेंगी।

इसका उद्देश्य कमांड चेन को छोटा करना, संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और युद्ध के दौरान तेजी से फैसले लेना है।

सूत्रों के मुताबिक थिएटराइजेशन की योजना अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और इस पर पिछले दिनों जयपुर में हुई जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भी इस पर चर्चा हुई थी। (Army-Navy MoA Agreement)

जमीनी स्तर पर बढ़ेगा तालमेल

सेना और नौसेना के बीच हुए इस समझौते का सबसे बड़ा असर जमीनी स्तर पर दिखाई देगा। अब सेना और नौसेना की यूनिट्स के बीच नियमित संपर्क रहेगा। जवान और अधिकारी एक-दूसरे के बेस, जहाजों और ट्रेनिंग संस्थानों का दौरा करेंगे।

इससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन के दौरान गलतफहमी और समन्वय की समस्या कम होगी। सैन्य योजनाओं और ऑपरेशनल जरूरतों को समझना आसान होगा।

दुनिया के कई बड़े देश पहले से इसी मॉडल पर काम कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसी सेनाएं लंबे समय से जॉइंट कमांड और इंटर-सर्विस इंटीग्रेशन पर जोर देती रही हैं। (Army-Navy MoA Agreement)

भारत-ऑस्ट्रेलिया मीटिंग में दिखा ‘Ghost’, लॉयल विंगमैन ड्रोन टेक्नोलॉजी पर बढ़ रहा फोकस

MQ-28 Ghost Bat

MQ-28 Ghost Bat: भारत और ऑस्ट्रेलिया अब भविष्य के युद्धों में इस्तेमाल होने वाली एडवांस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी, ड्रोन सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित युद्ध क्षमता पर भी तेजी से साथ काम कर रहे हैं। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में हुई 12वीं एयर स्टाफ टॉक्स के दौरान मीटिंग की तस्वीरों में बोइंग का एडवांस अनक्रूड कॉम्बैट एयरक्राफ्ट “एमक्यू-28 घोस्ट बैट” बैकग्राउंड में दिखाई दिया।

भारतीय वायुसेना और रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के बीच 12वीं एयर स्टाफ टॉक्स हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में आयोजित हुई थी। बातचीत का मुख्य फोकस ऑपरेशनल कॉर्डिनेशन, इंटरऑपरेबिलिटी, ट्रेनिंग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और भविष्य के एयरोस्पेस सहयोग पर रहा।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक फोटो ऑप नहीं था, बल्कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी का संकेत था। खासकर ऐसे समय में जब भारत ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी वायु युद्ध रणनीति, ड्रोन क्षमता और जॉइंट वॉरफेयर मॉडल पर तेजी से काम कर रहा है।

MQ-28 Ghost Bat: कैनबरा में हुई अहम बैठक

भारतीय वायुसेना और रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के बीच 12वीं एयर स्टाफ टॉक्स मई 2026 में आयोजित की गई। इसमें भारतीय वायुसेना की ओर से एयर वाइस मार्शल संजीव तलियान शामिल हुए, जबकि ऑस्ट्रेलिया की ओर से डिप्टी चीफ ऑफ एयर फोर्स एयर वाइस मार्शल स्टीवन पेस्के ने बातचीत का नेतृत्व किया।

बैठक में ऑपरेशनल सिनर्जी, इंटरऑपरेबिलिटी, जॉइंट एक्सरसाइज, ट्रेनिंग, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग और भविष्य के एयरोस्पेस सहयोग जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

भारतीय वायुसेना ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि दोनों देशों की वायु सेनाएं इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता मजबूत करने और भविष्य के लिए तैयार रक्षा साझेदारी बनाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं।

वहीं, ऑस्ट्रेलियाई रक्षा मंत्रालय ने भी इस बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते एयर पावर सहयोग का अहम हिस्सा बताया।

एमक्यू-28 घोस्ट बैट ने खींचा ध्यान

इस बैठक के दौरान जारी तस्वीरों में बोइंग डिफेंस ऑस्ट्रेलिया का एमक्यू-28 घोस्ट बैट दिखाई दिया। यह एक एडवांस “कोलेबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट” है, जिसे बिना पायलट वाले कॉम्बैट प्लेटफॉर्म के तौर पर डेवलप किया गया है।

इसे ऐसे डिजाइन किया गया है कि यह फाइटर जेट्स और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम्स के साथ मिलकर काम कर सके। आसान शब्दों में कहें तो यह भविष्य का “लॉयल विंगमैन” सिस्टम माना जा रहा है।

यह ड्रोन केवल निगरानी नहीं करता, बल्कि दुश्मन की एयर डिफेंस पर हमला, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, डिकॉय मिशन और मिसाइल सपोर्ट जैसे काम भी कर सकता है।

इसे बनाने वाली कंपनी बोइंग के मुताबिक यह प्लेटफॉर्म एडवांस एयर पावर सिस्टम्स के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करता है। इसका डिजाइन पूरी तरह मॉड्यूलर है। मिशन के हिसाब से इसके पेलोड और सिस्टम को तेजी से बदला जा सकता है। इसकी रेंज 2000 नॉटिकल मील से ज्यादा है और यह करीब मैक 0.9 की स्पीड से उड़ान भर सकता है।

पिछले आठ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में विकसित किए गए इस सिस्टम को बोइंग दुनिया का सबसे परिपक्व कोलेबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट बता रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक युद्धों में ऐसे सिस्टम बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि ये पायलट की जान को जोखिम में डाले बिना खतरनाक मिशन पूरे कर सकते हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है यह तकनीक

भारत भी इस समय अपने यू-सीएवी कैट्स वॉरियर प्रोग्राम पर काम कर रहा है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इसे बना रहा है और यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के लिए स्वदेशी लॉयल विंगमैन प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

पूर्व एचएएल प्रमुख डीके सुनील पहले ही बता चुके हैं कि कैट्स वॉरियर को 2027 तक उड़ान के लिए तैयार करने की योजना है।

यह प्लेटफॉर्म भी फाइटर जेट्स के साथ मिलकर काम करेगा और स्ट्राइक मिशन, सर्विलांस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और स्वार्म अटैक जैसी भूमिकाएं निभाएगा।

ऐसे में एमक्यू-28 का भारत-ऑस्ट्रेलिया एयर स्टाफ टॉक्स के दौरान सामने आना कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि दोनों देशों के बीच भविष्य में टेक्नोलॉजी सहयोग और इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली सोच

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने भारत ने अपनी डिफेंस स्ट्रेटेजी में बड़ा बदलाव किया। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे।

करीब 88 घंटे तक चले इस सैन्य अभियान में पहली बार बड़े स्तर पर ड्रोन, लॉन्ग रेंज मिसाइल, प्रिसिजन स्ट्राइक और मल्टी डोमेन ऑपरेशन देखने को मिले।

भारतीय वायुसेना ने राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों से स्कैल्प, ब्रह्मोस, रैम्पेज और दूसरी एडवांस मिसाइलों का इस्तेमाल किया।

वहीं भारतीय सेना ने एम777 हॉवित्जर और एक्सकैलिबर प्रिसिजन शेल्स का इस्तेमाल किया। नौसेना ने आईएनएस विक्रांत समेत कई युद्धपोतों को फॉरवर्ड पोजिशन में तैनात किया।

इस ऑपरेशन में ड्रोन वॉरफेयर की भूमिका बेहद अहम रही। भारत ने हार्पी, हारोप और एआई आधारित ड्रोन सिस्टम्स का इस्तेमाल किया।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने साफ कर दिया कि भविष्य के युद्ध केवल फाइटर जेट और टैंक से नहीं जीते जाएंगे। अब डेटा, एआई, ड्रोन और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

तीनों सेनाओं के तालमेल पर बढ़ा जोर

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान थलसेना, वायुसेना और नौसेना ने एक साथ मिलकर काम किया। इसे भारतीय सैन्य ढांचे में “जॉइंटनेस” का बड़ा उदाहरण माना गया।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने बाद में कहा था कि शुरुआती चुनौतियों के बाद भारतीय बलों ने दुश्मन की एयर डिफेंस को भेदते हुए सटीक हमले किए।

इसी अनुभव के बाद भारत अब थिएटराइजेशन और मल्टी डोमेन ऑपरेशन पर तेजी से काम कर रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक एमक्यू-28 जैसे सिस्टम और भारत का कैट्स वॉरियर प्रोग्राम इसी नई रणनीति का हिस्सा हैं, जहां मानव और मशीन एक साथ मिलकर युद्ध लड़ेंगे।

इंडो-पैसिफिक में बढ़ रहा सहयोग

भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों क्वाड समूह का हिस्सा हैं। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते सुरक्षा माहौल के बीच दोनों देशों के रक्षा संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं।

हाल के वर्षों में दोनों देशों ने जॉइंट एक्सरसाइज की संख्या और बढ़ाई हैं। भारत ने टैलिस्मन सेबर और पुक पुक जैसे सैन्य अभ्यासों में भी भाग लिया।

नवंबर 2024 में दोनों देशों के बीच एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग एग्रीमेंट भी हुआ था। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया के केसी-30ए मल्टी रोल टैंकर ट्रांसपोर्ट विमान भारतीय सैन्य विमानों को हवा में ईंधन दे सकते हैं।

ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने कहा था कि इससे दोनों देशों की इंटरऑपरेबिलिटी और ऑपरेशनल क्षमता मजबूत होगी। साथ ही, भारतीय नौसेना के पी-8आई समुद्री निगरानी विमानों की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में ऑपरेटिंग क्षमता भी बढ़ेगी।

ड्रोन और एआई आधारित युद्ध की तरफ बढ़ रहा भारत

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने रक्षा खरीद और सैन्य आधुनिकीकरण की रफ्तार तेज कर दी है। ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, एआई आधारित सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता पर खास जोर दिया जा रहा है।

भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब ऐसे सिस्टम चाहते हैं जो कम लागत में ज्यादा प्रभावी हों और पायलटों को कम जोखिम में डालें।

यही वजह है कि लॉयल विंगमैन और कोलेबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट जैसे सिस्टम तेजी से चर्चा में हैं।

सूत्रों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में एक फाइटर जेट के साथ कई अनक्रूड ड्रोन उड़ते दिखाई दे सकते हैं, जो अलग-अलग मिशन संभालेंगे। इससे दुश्मन की एयर डिफेंस पर दबाव बढ़ेगा और ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित बनेंगे।

AMCA के बाद अब बैलिस्टिक मिसाइल भी बनाएगा प्राइवेट सेक्टर, खत्म होगा सरकारी कंपनियों का एकाधिकार

India Ballistic Missile Production

India Ballistic Missile Production: भारत का रक्षा क्षेत्र अब तेजी से बदल रहा है। लंबे समय तक जिन डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर केवल सरकारी कंपनियों का नियंत्रण रहा, अब उनमें निजी कंपनियों की एंट्री की तैयारी शुरू हो गई है। रक्षा मंत्रालय अब एडवांस फाइटर जेट एएमसीए और एम्यूनिशन सेक्टर के बाद बैलिस्टिक मिसाइल भी निजी कंपनियां बनाएंगी।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने मंगलवार को बड़ा बयान देते हुए कहा कि सरकार अब बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण में भी निजी क्षेत्र को शामिल करने पर गंभीरता से काम कर रही है। उन्होंने साफ कहा कि आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए अब समय आ गया है कि निजी कंपनियों को इस क्षेत्र में पर्याप्त भागीदारी दी जाए।

यह बयान इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि अब तक बैलिस्टिक मिसाइल जैसे प्रोजेक्ट्स केवल डीआरडीओ, बीडीएल, एचएएल और दूसरी सरकारी रक्षा कंपनियों तक सीमित थे। लेकिन अब सरकार रक्षा उत्पादन का दायरा बढ़ाकर निजी कंपनियों को भी सीधे रणनीतिक हथियार निर्माण में शामिल करना चाहती है।

सीआईआई एनुअल बिजनेस समिट 2026 में उद्योग जगत और सैन्य अधिकारियों को संबोधित करते हुए रक्षा सचिव ने कहा कि सरकार अलग-अलग तरह की बैलिस्टिक मिसाइल टेक्नोलॉजी प्राइवेट सेक्टर को ट्रांसफर करने को तैयार है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाती दिखाई देगी।

India Ballistic Missile Production: बैलिस्टिक मिसाइल क्षेत्र में बड़ा बदलाव

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जिनके पास अपना स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम है। अग्नि सीरीज, पृथ्वी, प्रहार और शौर्य जैसी मिसाइलें भारत की डिफेंस पावर का अहम हिस्सा हैं। इन मिसाइलों का इस्तेमाल लंबी दूरी तक दुश्मन के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

अब तक इनका विकास और उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों के हाथ में था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह महसूस किया गया कि तेजी से बदलते युद्ध और बढ़ती सैन्य जरूरतों के कारण उत्पादन क्षमता बढ़ाना जरूरी हो गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर निजी कंपनियों को भी इस क्षेत्र में शामिल किया जाता है, तो उत्पादन की रफ्तार बढ़ेगी और नई तकनीक का इस्तेमाल तेजी से हो सकेगा। इससे सप्लाई चेन भी मजबूत होगी।

रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी ड्राफ्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 में निजी कंपनियों को “लेवल प्लेइंग फील्ड” देने की बात कही गई है। यानी सरकारी और निजी कंपनियों को बराबरी का मौका देने की कोशिश की जा रही है।

एएमसीए प्रोजेक्ट में पहली बार बड़ी निजी भागीदारी

सरकार पहले ही एएमसीए यानी एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम में निजी कंपनियों की एंट्री को मंजूरी दे चुकी है। यह भारत का पहला स्वदेशी फिफ्थ जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है।

एएमसीए को भारतीय वायुसेना के भविष्य का सबसे अहम लड़ाकू विमान माना जा रहा है। इसमें स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, एडवांस सेंसर, आधुनिक एवियोनिक्स और लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता होगी।

रक्षा सचिव ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए तीन कंसोर्टियम चुने गए हैं। इनमें दो पब्लिक-प्राइवेट मॉडल पर आधारित हैं जबकि एक पूरी तरह निजी कंपनियों का समूह है।

सूत्रों के मुताबिक आने वाले कुछ हफ्तों में इन कंपनियों को आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किए जा सकते हैं। इससे एचएएल के अलावा एक अतिरिक्त प्रोडक्शन लाइन तैयार होगी, जिससे भारत का एयरोस्पेस सेक्टर और मजबूत होगा।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि केवल सरकारी कंपनियों के भरोसे बड़े स्तर का उत्पादन करना अब मुश्किल हो रहा है। इसलिए निजी कंपनियों को शामिल करना जरूरी माना जा रहा है।

एम्यूनिशन सेक्टर में भी बढ़ रही निजी कंपनियों की भूमिका

सरकार केवल मिसाइल और फाइटर जेट तक सीमित नहीं रहना चाहती। गोला-बारूद और स्मार्ट एम्यूनिशन के क्षेत्र में भी निजी कंपनियों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।

पिछले दो वर्षों में सरकार ने कई निजी कंपनियों को 155 एमएम आर्टिलरी शेल, स्मार्ट मुनिशन, एंटी ड्रोन सिस्टम और दूसरे महत्वपूर्ण हथियारों के ऑर्डर दिए हैं।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो, भारत फोर्ज, अदानी डिफेंस और दूसरी कंपनियां पहले से रक्षा उत्पादन में सक्रिय हैं। अब सरकार रणनीतिक हथियारों की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करके इन्हें और बड़ी भूमिका देना चाहती है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आधुनिक युद्धों में लगातार भारी मात्रा में एम्यूनिशन की जरूरत पड़ती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान दुनिया ने देखा कि गोला-बारूद का उत्पादन कितनी बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी वजह से भारत भी अब अपनी उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाना चाहता है।

रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

रक्षा सचिव ने बताया कि भारत का रक्षा निर्यात अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल की तुलना में 62 फीसदी से ज्यादा वृद्धि है।

उन्होंने कहा कि यह भारत के रक्षा क्षेत्र में हो रहे बदलाव का बड़ा संकेत है। खास बात यह रही कि इस निर्यात में निजी क्षेत्र का योगदान लगभग 45 प्रतिशत रहा जबकि सरकारी रक्षा कंपनियों का हिस्सा करीब 55 प्रतिशत था।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि अगर निजी कंपनियों को और ज्यादा अवसर दिए जाएं तो भारत वैश्विक रक्षा बाजार में तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है।

सरकार अब अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में भारतीय हथियारों और रक्षा उपकरणों की पहुंच बढ़ाना चाहती है।

नई लाइन ऑफ क्रेडिट योजना की तैयारी

रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि सरकार नई लाइन ऑफ क्रेडिट योजना पर काम कर रही है। इसका मकसद कम विकसित देशों को भारतीय रक्षा उपकरण खरीदने में वित्तीय सहायता देना है।

इस योजना के जरिए भारत दूसरे देशों को आसान शर्तों पर कर्ज उपलब्ध कराएगा ताकि वे भारतीय हथियार और रक्षा सिस्टम खरीद सकें।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक चीन लंबे समय से इसी तरह की रणनीति अपनाकर एशिया और अफ्रीका के कई देशों में अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। अब भारत भी अपने रक्षा निर्यात को बढ़ाने के लिए इसी तरह के मॉडल पर काम कर रहा है।

डिफेंस विजन 2047 में बड़े लक्ष्य

रक्षा मंत्रालय ने “डिफेंस फोर्सेज विजन 2047” के तहत रक्षा उत्पादन और निर्यात के लिए बड़े लक्ष्य तय किए हैं। सरकार का लक्ष्य 2047 तक भारत को दुनिया के टॉप-3 रक्षा निर्यातकों में शामिल करना है। इसके लिए रक्षा उत्पादन को 8.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इसके अलावा रक्षा निर्यात को 2.8 लाख करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।

रक्षा सचिव ने बताया कि पिछले डेढ़ साल में लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स उद्योग को दिए गए। इनमें से 70 प्रतिशत मूल्य और लगभग 90 प्रतिशत अनुबंध स्वदेशी उद्योग को मिले हैं।

उन्होंने उद्योग जगत से यह भी कहा कि कंपनियां आपसी शिकायतों और कानूनी विवादों से बचें क्योंकि इससे खरीद प्रक्रिया में देरी होती है। उन्होंने समय पर डिलीवरी देने पर भी जोर दिया।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बने रहने की बजाय खुद एक बड़ा रक्षा निर्माण केंद्र बनना चाहता है। इसी वजह से सरकार निजी कंपनियों को मिसाइल, फाइटर जेट, एम्यूनिशन, ड्रोन और दूसरी एडवांस सैन्य तकनीकों में तेजी से शामिल कर रही है।

India May Open Ballistic Missile Production To Private Sector After AMCA Push, Defence Secretary Signals Major Reform.

भारत को मिला ‘सुरेशास्त्र’! IAF के बेड़े में शामिल हुआ 150 किमी तक हमला करने वाला जेट कामिकाजे ड्रोन

Sureshastra Mk1 Drone
Sureshastra Mk1 Drone

Sureshastra Mk1 Drone: नोएडा के स्टार्टअप वेदा एयरोनॉटिक्स ने भारतीय वायुसेना को एस-यूएमएस सुरेशास्त्र एमके1 की पहली यूनिट्स सौंप दी हैं। यह एक जेट-पावर्ड कामिकाजे ड्रोन है, जो 150 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक उड़ान भर सकता है और दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों को सटीक तरीके से तबाह कर सकता है।

यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर बना है। खास बात यह है कि यह केवल एक ड्रोन नहीं बल्कि “स्वार्म ड्रोन सिस्टम” का हिस्सा है। यानी कई ड्रोन एक साथ मिलकर हमला कर सकते हैं और दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं।

भारतीय वायुसेना ने इस सिस्टम को ऐसे समय शामिल किया है जब दुनिया के कई युद्धों में ड्रोन गेम चेंजर बन रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया तक, छोटे और सस्ते ड्रोन बड़े सैन्य सिस्टम को चुनौती देते दिखाई दिए हैं।

Sureshastra Mk1 Drone: मेहर बाबा प्रतियोगिता से शुरू हुआ सफर

सुरेशास्त्र एमके1 का डेवलपमेंट भारतीय वायुसेना की मेहर बाबा स्वार्म ड्रोन प्रतियोगिता के तहत हुआ था। इस प्रतियोगिता का मकसद भारतीय कंपनियों और स्टार्टअप्स को नई पीढ़ी के ड्रोन सिस्टम विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना था।

वेदा एयरोनॉटिक्स ने इसी कार्यक्रम के तहत अपना डिजाइन पेश किया था। कंपनी की तकनीक और प्रदर्शन से प्रभावित होकर अगस्त 2023 में भारतीय वायुसेना ने लगभग 300 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट दिया था। इसके तहत 200 यूनिट्स तैयार की जानी थीं।

यह किसी भारतीय स्टार्टअप को अनमैन्ड सिस्टम्स के लिए दिया गया सबसे बड़ा शुरुआती ऑर्डर था। कंपनी ने तय समय से पहले इस साल अप्रैल में पहली यूनिट्स की डिलीवरी शुरू कर दी है।

कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर दिपेश गुप्ता के मुताबिक इस प्लेटफॉर्म को भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

क्या है सुरेशास्त्र एमके1

सुरेशास्त्र एमके1 एक फिक्स्ड-विंग जेट ड्रोन है। इसका डिजाइन वी-टेल कॉन्फिगरेशन पर आधारित है। इसकी लंबाई करीब 3.5 मीटर और विंगस्पैन लगभग 3 मीटर है। ड्रोन का वजन करीब 90 किलोग्राम है।

इसे कैटापल्ट लॉन्च सिस्टम से उड़ाया जाता है। इसका मतलब है कि इसे किसी बड़े एयरबेस की जरूरत नहीं होती। छोटे प्लेटफॉर्म या खुले इलाके से भी लॉन्च किया जा सकता है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका जेट इंजन है। आम तौर पर कई कामिकाजे ड्रोन प्रोपेलर सिस्टम पर चलते हैं, लेकिन सुरेशास्त्र एमके1 के जेट पावर से लैस होने से यह काफी तेजी से उड़ता है और दुश्मन के रडार को प्रतिक्रिया देने का समय बहुत कम मिलता है। इसकी रेंज 150 किलोमीटर से ज्यादा है।

दुश्मन के एयरबेस और रडार होंगे निशाने पर

इस ड्रोन को खास तौर पर हाई वैल्यू टारगेट्स पर हमला करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें दुश्मन के एयरफील्ड, पार्क किए गए लड़ाकू विमान, रडार सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और मिलिट्री कम्युनिकेशन नेटवर्क शामिल हैं।

अगर किसी दुश्मन एयरबेस पर एक साथ कई सुरेशास्त्र ड्रोन हमला करें, तो वहां खड़े विमानों और रडार सिस्टम को भारी नुकसान पहुंच सकता है।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस तरह के कामिकाजे ड्रोन पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में कम लागत वाले होते हैं, लेकिन कई परिस्थितियों में उतने ही प्रभावी साबित हो सकते हैं।

स्वार्म टेक्नोलॉजी से बदल रहा युद्ध

सुरेशास्त्र एमके1 की सबसे बड़ी खासियत इसका एआई बेस्ड स्वार्म सिस्टम माना जा रहा है। इसमें कई ड्रोन एक-दूसरे से लगातार संपर्क में रहते हैं और मिलकर मिशन पूरा करते हैं।

अगर किसी मिशन में 10 या 20 ड्रोन भेजे जाएं, तो वे अलग-अलग दिशाओं से हमला कर सकते हैं। इससे दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है।

बता दें कि आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम एक समय में सीमित संख्या में टारगेट को इंटरसेप्ट कर पाते हैं। लेकिन जब बड़ी संख्या में ड्रोन एक साथ हमला करते हैं तो डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है।

ड्रोन में ऑनबोर्ड इंटेलिजेंस भी दी गई है। यानी यह केवल उड़ान ही नहीं भरता, बल्कि लक्ष्य की पहचान और ट्रैकिंग भी कर सकता है।

जीपीएस जाम होने पर भी कर सकेगा हमला

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तेजी से अहम होता जा रहा है। कई बार दुश्मन जीपीएस सिग्नल जाम करने की कोशिश करता है ताकि ड्रोन और मिसाइल रास्ता भटक जाएं।

लेकिन सुरेशास्त्र एमके1 को ऐसे माहौल में भी काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें ऑनबोर्ड नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह जीपीएस डिनाइड एनवायरनमेंट में भी मिशन जारी रख सकता है।

यह क्षमता चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के खिलाफ बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि भविष्य के युद्धों में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का इस्तेमाल बढ़ सकता है।

भारतीय वायुसेना लंबे समय से ऐसे सिस्टम चाहती थी जो कम लागत में दुश्मन के अहम ठिकानों को निशाना बना सकें। पारंपरिक फाइटर जेट मिशन महंगे होते हैं और उनमें पायलट की जान का जोखिम भी रहता है।

कामिकाजे ड्रोन इस समस्या का समाधान माने जा रहे हैं। इन्हें बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर दुश्मन के अंदर तक भेजा जा सकता है।

यह सिस्टम काउंटर एयर ऑपरेशन, एयरफील्ड डिनायल और डीप स्ट्राइक मिशन में उपयोगी हो सकता है।

एलएसी और पश्चिमी सीमा पर भी इसकी उपयोगिता मानी जा रही है। इस तरह के ड्रोन सीमापार मौजूद आतंकी ठिकानों या सैन्य पोस्ट्स को निशाना बनाने में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

एयर लॉन्च्ड वर्जन पर भी काम

वेदा एयरोनॉटिक्स अब इस सिस्टम के नए वर्जन पर भी काम कर रही है। कंपनी ने एयर ड्रॉप्ड कैनिस्टराइज्ड स्वार्म यानी एडीसी-एस प्रोग्राम के तहत एयर लॉन्च्ड मॉडल का प्रस्ताव दिया है।

इस योजना में सी-130जे, सी-17 और सी-295 जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स से हवा में बड़ी संख्या में ड्रोन छोड़े जा सकेंगे।

इन ड्रोन को हाई एल्टीट्यूड से रिलीज किया जाएगा और फिर वे अलग-अलग दिशाओं में जाकर टारगेट पर हमला करेंगे। इससे ड्रोन की रेंज और ऑपरेशन एरिया दोनों बढ़ जाएंगे।

भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक को मजबूती

सुरेशास्त्र एमके1 को “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत तैयार किया गया है। भारत पहले इस तरह के कई सिस्टम्स के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर था। लेकिन अब घरेलू कंपनियां खुद एडवांस ड्रोन सिस्टम तैयार कर रही हैं।

रक्षा मंत्रालय पिछले कुछ सालों से स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों को ज्यादा मौके दे रहा है। इसी वजह से ड्रोन, एआई, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्वार्म टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में तेजी से काम हो रहा है।

अरुणाचल में LAC के पास क्यों पहुंची GSI की टीम, क्या चीन सीमा पर बड़ी तैयारी में जुटा है भारत?

Arunachal LAC GSI Survey
Pics: Indian Army/ Gajraj Corps

Arunachal LAC GSI Survey: अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में हाल ही में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) की एक टीम ने दौरा किया था। ईस्टर्न कमांड के तहत आने वाली भारतीय सेना की गजराज कोर के साथ जीएसआई टीम ने फॉरवर्ड इलाकों का दौरा किया। यह पूरा मिशन भारत-चीन सीमा यानी एलएसी से जुड़े संवेदनशील इलाकों में हुआ, जहां पिछले कुछ वर्षों में तेजी से सड़कें, पुल, सुरंगें और सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जा रहे हैं।

गजराज कोर की तरफ से जारी जानकारी के मुताबिक जीएसआई की इस टीम का नेतृत्व डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ. पंकज जायसवाल और डायरेक्टर डी.पी. डंगवाल ने किया। टीम ने फॉरवर्ड एरिया में जाकर जमीन की स्थिरता, लैंडस्लाइड रिस्क और हार्ड रॉक मैपिंग का अध्ययन किया। इसके बाद टीम ने गजराज कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल नीरज शुक्ला से मुलाकात भी की।

इस दौरान सीमावर्ती इलाकों में सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर और लैंड मैनेजमेंट को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। सेना और जीएसआई की यह जॉइंट एक्टिविटी ऐसे समय हुई है, जब भारत पूर्वोत्तर में बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को पहले से कहीं ज्यादा तेजी से मजबूत कर रहा है।

Arunachal LAC GSI Survey: क्या कर रही थी जीएसआई की टीम

जीएसआई की टीम का मुख्य काम पहाड़ी इलाकों की जियोलॉजिकल स्ट्रक्चर को समझना था। इसमें यह देखा जाता है कि कौन सा इलाका भूस्खलन के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील है, कहां जमीन कमजोर है और किन क्षेत्रों में सड़क या मिलिट्री स्ट्रक्चर बनाना सुरक्षित रहेगा।

टीम ने जिन इलाकों का दौरा किया, वे ज्यादातर हाई एल्टीट्यूड और फॉरवर्ड एरिया माने जाते हैं। वहां सैनिकों ने टीम को ऊंचाई वाले कठिन इलाकों तक पहुंचाया। गजराज कोर ने बर्फ से ढके पहाड़, चट्टानी क्षेत्र और हाई एल्टीट्यूड झीलों के फोटो भी जारी किए हैं।

जीएसआई की तरफ से “हार्ड रॉक मैपिंग” भी की गई। जिसमें पहाड़ों की चट्टानों की गुणवत्ता और मजबूती का अध्ययन किया जाता है। इसमें यह देखा जाता है कि कौन सी चट्टानें सड़क, बंकर या पुल निर्माण के लिए उपयुक्त हैं और कौन सी जगहें भूस्खलन का खतरा पैदा कर सकती हैं।

सेना को क्यों पड़ी इसकी जरूरत 

अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के कई इलाके बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। यहां भारी बारिश, बादल फटना, भूकंप और लैंडस्लाइड आम बात है। मानसून के दौरान कई बार सड़कें टूट जाती हैं और सेना की सप्लाई लाइन प्रभावित हो जाती है।

भारत-चीन सीमा के पास इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ाने के लिए ऑल वेदर रोड, सुरंग और नए सैन्य ढांचे बनाए जा रहे हैं। लेकिन पहाड़ी इलाकों में निर्माण करना आसान नहीं होता। अगर पहाड़ की भू-संरचना को समझे बिना निर्माण किया जाए तो कुछ समय बाद सड़क धंस सकती है या लैंडस्लाइड से टूट सकती है।

इसी वजह से सेना अब वैज्ञानिक तरीके से बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रही है। जीएसआई की टीम उसी प्रक्रिया का हिस्सा मानी जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि केवल सड़क बनाना काफी नहीं है, उसे हर मौसम में चालू रखना ज्यादा बड़ी चुनौती है। खासकर उन इलाकों में जहां सैनिकों और सैन्य वाहनों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।

गलवान के बाद तेजी से बदली रणनीति

पूर्वी लद्दाख में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की रफ्तार काफी बढ़ा दी थी। लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक कई नए प्रोजेक्ट शुरू किए गए।

सड़क, पुल, एडवांस लैंडिंग ग्राउंड, टनल और बॉर्डर गांवों के विकास पर विशेष फोकस किया गया। केंद्र सरकार ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम और बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए।

अब रणनीति केवल तेजी से निर्माण करने की नहीं बल्कि “रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर” बनाने की है। यानी ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर जो भारी बारिश, बर्फबारी, भूकंप और लैंडस्लाइड जैसी परिस्थितियों में भी लंबे समय तक टिक सके।

जीएसआई और सेना की यह साझेदारी उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

गजराज कोर क्यों है अहम

गजराज कोर भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण कोर में गिनी जाती है। इसका मुख्यालय तेजपुर में है और यह अरुणाचल प्रदेश तथा असम के सीमावर्ती क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालती है।

तवांग समेत कई रणनीतिक इलाके इसी कोर के दायरे में आते हैं। चीन के साथ तनाव बढ़ने के बाद इस पूरे सेक्टर में सैन्य गतिविधियां काफी बढ़ी हैं।

नई सड़कें, सुरंगें और सप्लाई नेटवर्क तैयार किए जा रहे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर सेना तेजी से सैनिक और हथियार सीमा तक पहुंचा सके।

लेकिन पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर का सबसे बड़ा दुश्मन मौसम और लैंडस्लाइड हैं। ऐसे में जीएसआई की भूमिका और बढ़ जाती है।

क्यों किया गया झीलों का सर्वे

जीएसआई टीम ने हाई एल्टीट्यूड झीलों का भी सर्वे किया। हिमालयी इलाकों में कई झीलें ग्लेशियर पिघलने से बनती हैं। इनमें से कुछ झीलें अचानक टूटने पर भारी तबाही ला सकती हैं।

इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहा जाता है। इससे सड़कें, पुल और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर अचानक नष्ट हो सकते हैं। इसी वजह से हाई एल्टीट्यूड झीलों की निगरानी अब सीमा क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सेना और वैज्ञानिक एजेंसियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि कौन सी झीलें खतरा पैदा कर सकती हैं और किन इलाकों में पहले से तैयारी जरूरी है।

मिशन मौसम और वेदर रडार की बड़ी तैयारी

सूत्रों ने बताया कि जीएसआई टीम का यह दौरान इन इलाकों में वेदर रडार लगाने का है। ताकि इस इलाके में मौसम निगरानी नेटवर्क भी तेजी से मजबूत किया जा सके।

भारत सरकार “मिशन मौसम” के तहत पूरे देश में 53 नए डॉप्लर वेदर रडार लगाने की योजना पर काम कर रही है। इसके तहत पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में 10 एक्स-बैंड डॉप्लर रडार लगाए जा रहे हैं।

इन रडारों का काम रियल टाइम बारिश, बादल, तूफान और मौसम की गतिविधियों की निगरानी करना है। तेजपुर, सेंट्रल अरुणाचल, जोरहाट, नामसाई और दूसरे इलाकों में नए रडार नेटवर्क तैयार किए जा रहे हैं।

ये रडार सीमा से जुड़े ऊंचाई वाले इलाकों में लगाए जा रहे हैं ताकि भारी बारिश, तूफान और बर्फबारी पर तुरंत नजर रखी जा सके। इससे भूस्खलन का खतरा पहले ही पता चल सकेगा, क्योंकि ज्यादातर लैंडस्लाइड तेज बारिश की वजह से होते हैं। इसके अलावा सेना की सड़कें, पुल और दूसरे बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बनाने में भी मदद मिलेगी।

रक्षा और मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम की सही जानकारी पहले मिल जाए तो लैंडस्लाइड और बाढ़ से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जीएसआई की जियोलॉजिकल मैपिंग और मौसम विभाग के रडार सिस्टम को मिलाकर सीमा क्षेत्रों में एक बड़ा डिजास्टर मैनेजमेंट नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। (Arunachal LAC GSI Survey)

पूर्व एडमिरल बोले- “डेटा नहीं तो नई ISR-ISTAR डॉक्ट्रिन सिर्फ किताब”, कमजोर NavIC से GPS पर निर्भर होना खतरनाक!

India ISR-ISTAR Doctrine
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India ISR-ISTAR Doctrine: भारतीय सेना आने वाले समय के युद्धों के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। सेना अब ऐसी जॉइंट डॉक्ट्रिन तैयार कर रही है, जिसमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर दुश्मन पर तेजी से कार्रवाई कर सकें। इस नई रणनीति का सबसे अहम हिस्सा होगा- आईएसआर और टारगेटिंग सिस्टम। यानी दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना, सही समय पर जानकारी जुटाना और तुरंत हमला करना।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ यानी आईडीएस मुख्यालय ने दो नई जॉइंट डॉक्ट्रिन तैयार की हैं। इनमें पहली आईएसआर यानी इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस से जुड़ी है, जबकि दूसरी टारगेटिंग से संबंधित है। माना जा रहा है कि अगले दो महीनों के भीतर इन्हें आधिकारिक रूप से जारी किया जा सकता है।

बता दें कि रक्षा समाचार ने सबसे पहले भारत की नई जॉइंट आईएसआर और टारगेटिंग डॉक्ट्रिन से जुड़ी यह एक्सक्लूसिव खबर प्रकाशित की थी। RakshaSamachar Exclusive Report 

यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब भारतीय सेना थिएटराइजेशन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसका मकसद तीनों सेनाओं की ताकत को एक साथ जोड़कर युद्ध के दौरान तेजी से फैसला लेना और दुश्मन को ज्यादा नुकसान पहुंचाना है।

India ISR-ISTAR Doctrine: क्या है आईएसआर और यह इतना अहम क्यों

आईएसआर का मतलब है इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस। आसान शब्दों में समझें तो युद्ध के दौरान दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना, उसकी लोकेशन, हथियार, सैनिक मूवमेंट और संचार नेटवर्क की जानकारी जुटाना ही आईएसआर कहलाता है।

आज का युद्ध केवल बंदूक और टैंक का नहीं रह गया है। अब युद्ध में सैटेलाइट, ड्रोन, रडार, साइबर सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी भूमिका है। अगर किसी देश के पास दुश्मन की सही और रियल टाइम जानकारी नहीं होगी, तो उसके लिए सटीक हमला करना मुश्किल हो जाएगा।

नई डॉक्ट्रिन में सेना इन सभी सिस्टम्स को एक नेटवर्क में जोड़ना चाहती है। यानी जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष और साइबर डोमेन से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर कमांडरों तक पहुंचाया जाएगा ताकि वे तुरंत फैसला ले सकें।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि मॉडर्न वॉरफेयर में डेटा सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। जिसके पास बेहतर डेटा होगा, वही तेजी से हमला कर सकेगा।

लेकिन इसी बीच कई पूर्व सैन्य अधिकारियों ने केवल डॉक्ट्रिन बनाने से ज्यादा सिस्टम की वास्तविक कमियों पर सवाल उठाए हैं।

पूर्व रियर एडमिरल एमडी सुरेश ने उठाए गंभीर सवाल

भारतीय नौसेना के पूर्व रियर एडमिरल एमडी सुरेश ने आईएसआर सिस्टम की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि केवल नई डॉक्ट्रिन बना देने से समस्या हल नहीं होगी, जब तक सेना को समय पर आधुनिक आईएसआर प्लेटफॉर्म नहीं मिलते।

उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर समस्या डॉक्ट्रिन की कमी है या फिर आईएसआर सिस्टम्स की खरीद और उपलब्धता में लगातार हो रही देरी।

रियर एडमिरल सुरेश ने कहा कि भारत में कई महत्वपूर्ण सैन्य प्रोजेक्ट शुरुआत से ही बेहद लंबी समयसीमा के साथ चलते हैं। फिर बाद में उनमें लगातार देरी होती रहती है। उन्होंने कहा कि सिस्टम केवल लागत को लेकर चिंतित रहता है, लेकिन समय की कीमत को गंभीरता से नहीं लिया जाता।

उनके मुताबिक कई बार फाइनेंशियल एडवाइजर और अकाउंटिंग सिस्टम प्रक्रिया पूरी होने से संतुष्ट रहते हैं, लेकिन देरी की वजह से होने वाले रणनीतिक नुकसान पर कोई ध्यान नहीं देता।

उन्होंने साफ कहा कि अगर डेटा ही उपलब्ध नहीं होगा, तो डॉक्ट्रिन केवल किताबों तक सीमित रह जाएगी। युद्ध में असली ताकत रियल टाइम जानकारी से आती है।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अगर सरकारी सिस्टम में देरी हो रही है तो प्राइवेट सेक्टर से आईएसआर सिस्टम खरीदने में भी संकोच नहीं होना चाहिए।

पूर्व नौसेना प्रमुख बोले- आईएसटीएआर की जरूरत

भारत के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने भी इस मुद्दे पर कहा कि अब केवल आईएसआर पर नहीं, बल्कि आईएसटीएआर पर ध्यान देने की जरूरत है।

आईएसटीएआर का मतलब है इंटेलिजेंस, सर्विलांस, टारगेट एक्विजिशन एंड रिकॉनिसेंस। यानी केवल जानकारी जुटाना ही नहीं, बल्कि सही लक्ष्य की पहचान करके तुरंत हमला करने की क्षमता भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि अगर हथियारों की सटीकता कमजोर होगी, तो आधुनिक युद्ध में बढ़त हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।

एडमिरल अरुण प्रकाश ने खास तौर पर भारत के नेविगेशन सिस्टम “नाविक” को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि अगर नाविक सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन पूरी तरह काम नहीं कर रहा है और सेना को जीपीएस या ग्लोनास जैसे विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे हथियारों की सटीकता पर असर पड़ सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आधुनिक मिसाइल और प्रिसिजन गाइडेड हथियारों में सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबलिटी बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसका मतलब है कि मिसाइल टारगेट के कितने करीब जाकर गिरती है। अगर नेविगेशन सिस्टम कमजोर होगा तो हथियार टारगेट से भटक सकते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जॉइंटनेस की जरूरत

भारतीय सेना में जॉइंटनेस यानी तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर लंबे समय से काम चल रहा है। हाल के वर्षों में सेना ने कई जॉइंट डॉक्ट्रिन जारी की हैं। इनमें स्पेशल फोर्स ऑपरेशन, एयरबोर्न ऑपरेशन, हेलिबोर्न ऑपरेशन, मल्टी डोमेन ऑपरेशन और इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर शामिल हैं।

सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के साथ हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तीनों सेनाओं ने एक साथ काम किया था। उसी अनुभव के बाद आईएसआर और टारगेटिंग सिस्टम को और मजबूत करने पर जोर बढ़ा।

सेना का मानना है कि भविष्य के युद्ध में अलग-अलग सेनाओं का अकेले काम करना पर्याप्त नहीं होगा। अगर किसी लक्ष्य पर हमला करना है, तो यह तय होना चाहिए कि कौन सी सेना सबसे तेजी और सटीक तरीके से कार्रवाई कर सकती है।

नई टारगेटिंग डॉक्ट्रिन में टारगेट की पहचान होने के बाद थलसेना, वायुसेना या नौसेना में से जो सबसे बेहतर स्थिति में होगी, वही हमला करेगी। कई मामलों में दो सेनाएं मिलकर भी कार्रवाई कर सकेंगी।

नई सीडीएस टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती

नई जॉइंट डॉक्ट्रिन ऐसे समय लाई जा रही है, जब लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद संभालने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि थिएटर कमांड्स को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका होगी।

थिएटर कमांड का मतलब है कि किसी खास क्षेत्र में तीनों सेनाओं की ताकत एक कमांडर के अधीन काम करेगी। उदाहरण के तौर पर चीन सीमा के लिए अलग थिएटर कमांड, पाकिस्तान सीमा के लिए अलग और समुद्री क्षेत्र के लिए अलग कमांड बनाई जा सकती है।

सूत्रों के मुताबिक मौजूदा योजना के तहत लखनऊ में चीन केंद्रित नॉर्दर्न थिएटर कमांड, जयपुर में पाकिस्तान केंद्रित वेस्टर्न थिएटर कमांड और तिरुवनंतपुरम में मैरीटाइम थिएटर कमांड बनाने पर काम चल रहा है।

ड्रोन, सैटेलाइट और एआई होंगे युद्ध के नए हथियार

नई जॉइंट डॉक्ट्रिन में ड्रोन, सैटेलाइट, साइबर वॉरफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी भूमिका तय की जा रही है। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक भविष्य के युद्धों में केवल पारंपरिक हथियार पर्याप्त नहीं होंगे। युद्ध अब मल्टी डोमेन में लड़ा जाएगा। यानी जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र एक साथ सक्रिय रहेंगे।

नई आईएसआर डॉक्ट्रिन में सेंसर फ्यूजन पर विशेष जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म से मिलने वाले डेटा को जोड़कर एक साझा तस्वीर तैयार की जाएगी।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी दुश्मन की गतिविधि को ड्रोन देखता है, रडार उसे ट्रैक करता है और सैटेलाइट उसकी लोकेशन कन्फर्म करता है, तो यह पूरी जानकारी तुरंत कमांड सेंटर तक पहुंचेगी।

इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम खतरे का विश्लेषण करेगा और कमांडर को संभावित कार्रवाई के विकल्प बताएगा। सेना का मानना है कि इससे फैसले लेने में लगने वाला समय काफी कम होगा।

भारतीय सेना लंबे समय से थिएटर कमांड मॉडल पर काम कर रही है। अमेरिका और चीन जैसे कई बड़े देशों में यह सिस्टम पहले से लागू है। अभी भारत में थलसेना, नौसेना और वायुसेना अलग-अलग कमांड स्ट्रक्चर में काम करती हैं। कई बार ऑपरेशन के दौरान तालमेल में समय लगता है।

थिएटर कमांड मॉडल में एक क्षेत्र के सभी सैन्य संसाधन एक ही कमांडर के अधीन होंगे। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा और दोहराव कम होगा। सरकार ने भी 2025 के लिए थिएटराइजेशन को प्रमुख रक्षा सुधारों में शामिल किया है। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इससे ऑपरेशनल एफिशिएंसी और कमांड एफेक्टिवनेस बढ़ेगी। वहीं, नई जॉइंट डॉक्ट्रिन इसी बड़े सैन्य बदलाव का हिस्सा मानी जा रही है। (India IISR-ISTAR Doctrine)