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पहली बार प्राइवेट कंपनी ने किया पिनाका MBRL का सफल ट्रायल, पोखरण में 24 रॉकेट्स दाग कर दिखाई ताकत

Pinaka Rocket Trials

Pinaka Rocket Trials: नागपुर स्थित सोलर इंडस्ट्रीज ने राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में पिनाका एक्सटेंडेड रेंज रॉकेट्स का सफल परीक्षण किया है। यह पहली बार है जब किसी प्राइवेट कंपनी ने प्रोडक्शन लेवल पर पिनाका रॉकेट्स का प्रूफ ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया है।

कंपनी के मुताबिक, इस परीक्षण में कुल 24 एन्हांस्ड पिनाका रॉकेट्स को फायर किया गया। इन सभी रॉकेट्स ने अपने निर्धारित टारगेट को सटीकता के साथ भेदा। ट्रायल के दौरान रॉकेट्स की एक्यूरेसी, कंसिस्टेंसी और लेथैलिटी यानी घातक क्षमता का परीक्षण किया गया, जिसमें उन्होंने बेहतर प्रदर्शन दिखाया। (Pinaka Rocket Trials)

Pinaka Rocket Trials: फील्ड कंडीशंस में शानदार प्रदर्शन

यह परीक्षण पोखरण के कठिन फील्ड कंडीशंस में किया गया, जहां तेज गर्मी, धूल और हवा जैसी परिस्थितियां मौजूद रहती हैं। इन सभी चुनौतियों के बावजूद रॉकेट्स ने अपने टारगेट को सटीक तरीके से हिट किया। कंपनी ने बताया कि रॉकेट्स का प्रदर्शन “एक्सेप्शनली गुड” रहा।

इस ट्रायल को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह प्रोडक्शन लॉट्स का परीक्षण था, यानी बड़े पैमाने पर बनाए गए रॉकेट्स को फील्ड में परखा गया। (Pinaka Rocket Trials)

क्या है पिनाका रॉकेट सिस्टम

पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है, जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम एक साथ कई रॉकेट फायर करने की क्षमता रखता है, जिससे दुश्मन के बड़े इलाके को कम समय में निशाना बनाया जा सकता है।

पिनाका के शुरुआती वर्जन की रेंज करीब 40 किलोमीटर तक थी, लेकिन अब इसके एक्सटेंडेड रेंज और एन्हांस्ड वर्जन में यह दूरी बढ़कर लगभग 75 से 90 किलोमीटर तक पहुंच गई है। कुछ गाइडेड वर्जन में यह रेंज 120 किलोमीटर तक भी बताई जाती है।

एक पिनाका लॉन्चर बहुत कम समय में कई रॉकेट दाग सकता है, जिससे युद्ध के मैदान में तेजी से जवाबी कार्रवाई संभव होती है। इसकी सटीकता भी बेहतर मानी जाती है, जिससे लक्ष्य को सही तरीके से निशाना बनाया जा सकता है। (Pinaka Rocket Trials)

प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी

अब तक पिनाका रॉकेट्स का उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों द्वारा किया जाता था, लेकिन अब प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। सोलर इंडस्ट्रीज की सहायक कंपनी ने डीआरडीओ से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर लेकर इन रॉकेट्स का निर्माण किया है।

कंपनी पहले भी परीक्षण कर चुकी है, लेकिन यह पहली बार है जब प्रोडक्शन स्तर के रॉकेट्स का सफल परीक्षण किया गया है। इससे यह साफ हो गया है कि प्राइवेट कंपनियां भी रक्षा उत्पादन में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

सोलर इंडस्ट्रीज को रक्षा मंत्रालय से करीब 6,084 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। इस ऑर्डर के तहत कंपनी को पिनाका एन्हांस्ड रेंज रॉकेट्स और एरिया डिनायल म्युनिशन्स की सप्लाई करनी है।

एरिया डिनायल म्युनिशन्स ऐसे हथियार होते हैं, जिनका उपयोग बड़े इलाके में दुश्मन की गतिविधियों को रोकने के लिए किया जाता है। इस ट्रायल के सफल होने के बाद अब बड़े पैमाने पर रॉकेट्स की सप्लाई का रास्ता साफ हो गया है। (Pinaka Rocket Trials)

पिनाका रेजिमेंट्स की संख्या बढ़ा रही भारतीय सेना  

पिनाका सिस्टम भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। सेना लगातार अपनी पिनाका रेजिमेंट्स की संख्या बढ़ा रही है। इन रेजिमेंट्स को देश की सीमाओं, खासकर संवेदनशील इलाकों में तैनात किया जा रहा है।

पिनाका की मदद से सेना लंबी दूरी से दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकती है। इसमें दुश्मन की आर्टिलरी, कमांड सेंटर और सप्लाई लाइन जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शामिल होते हैं। (Pinaka Rocket Trials)

आत्मनिर्भर भारत को मिला बढ़ावा

इस परीक्षण को आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पहल के तहत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से देश की उत्पादन क्षमता मजबूत हो रही है।

सोलर इंडस्ट्रीज पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय है। कंपनी ने पिनाका रॉकेट्स का निर्यात भी शुरू कर दिया है, जिससे भारत के रक्षा निर्यात को बढ़ावा मिला है। (Pinaka Rocket Trials)

समझें क्या है म्यांमार ड्रोन केस? जिसमें शामिल हैं 6 यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक, आतंकी साजिश से जुड़े तार

Myanmar Drone Case- 6 Ukrainians and 1 US Citizen Booked Under UAPA in Major Terror Conspiracy Probe
NIA just caught US mercenary Matthew VanDyke

Myanmar Drone Case: भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा करते हुए छह यूक्रेनी नागरिकों और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया है। इस मामले को “म्यांमार ड्रोन केस” कहा जा रहा है, जिसमें ड्रोन टेक्नोलॉजी, हथियार ट्रेनिंग और सीमा पार गतिविधियों से जुड़ी गंभीर साजिश के आरोप सामने आए हैं। इस पूरे मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए कर रही है।

एनआईए के मुताबिक यह मामला भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा हुआ है। एजेंसी ने इन सातों विदेशी नागरिकों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत केस दर्ज किया है। इस कानून के तहत आतंक से जुड़ी साजिशों पर सख्त कार्रवाई की जाती है। (Myanmar Drone Case)

Myanmar Drone Case: कौन हैं आरोपी और कैसे हुई गिरफ्तारी

जांच एजेंसी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए लोगों में एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक और छह यूक्रेनी नागरिक शामिल हैं। जिनके नाम पेट्रो हुरबा, तारास स्लिवियाक, इवान सुकमानोव्स्की, मारियन स्टेफानकिव, मक्सिम होंचारुक और विक्टर कामिंस्की बताए गए हैं। इन सभी को 13 मार्च की रात को देश के अलग-अलग एयरपोर्ट्स से पकड़ा गया। ये एयरपोर्ट कोलकाता, दिल्ली और लखनऊ थे। अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक को पूर्व मर्सेनरी/प्राइवेट मिलिट्री कांट्रैक्टर के रूप में जाना जाता है।

एनआईए का कहना है कि ये सभी भारत में टूरिस्ट वीजा पर आए थे, लेकिन इनके असली मकसद कुछ और थे। जांच में सामने आया कि इन लोगों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए मिजोरम जैसे संवेदनशील इलाके में बिना परमिट प्रवेश किया। (Myanmar Drone Case)

मैथ्यू वैनडाइक की भूमिका सबसे अहम

जांच एजेंसी के अनुसार, इस पूरे ग्रुप में अलग-अलग भूमिकाएं तय थीं और सभी मिलकर एक संगठित नेटवर्क की तरह काम कर रहे थे। इस ग्रुप का सबसे प्रमुख नाम मैथ्यू एरॉन वैनडाइक है, जो एक अमेरिकी नागरिक है। उनकी उम्र करीब 40 साल बताई जाती है। वह पेशे से जर्नलिस्ट, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर और प्राइवेट मिलिट्री कांट्रैक्टर रह चुका है। उसने “Sons of Liberty International” नाम का एक संगठन भी बनाया है। साल 2011 में लीबिया के गृहयुद्ध के दौरान वह गद्दाफी के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुआ था, जहां उसे पकड़ लिया गया और त्रिपोली की अबू सलीम जेल में करीब छह महीने तक कैद रखा गया। बाद में वह वहां से भाग निकला। इसके अलावा वह सीरिया, इराक और यूक्रेन में सक्रिय रहा है। (Myanmar Drone Case)

एनआईए के अनुसार, इस पूरे केस में मैथ्यू वैनडाइक की भूमिका सबसे अहम बताई जा रही है। एजेंसी का दावा है कि वह इस ग्रुप का लीडर था और ड्रोन ट्रेनिंग तथा सप्लाई नेटवर्क को कॉर्डिनेट कर रहा था।

बाकी छह आरोपी यूक्रेन के नागरिक हैं। लेकिन जांच एजेंसी का मानना है कि ये सभी किसी न किसी रूप में मिलिट्री या ड्रोन टेक्नोलॉजी से जुड़े रहे हैं।

इनमें पहला नाम पेट्रो हुरबा का है। माना जा रहा है कि उसका मिलिट्री से जुड़ा बैकग्राउंड हो सकता है। उसे ड्रोन ऑपरेशन और ट्रेनिंग से संबंधित गतिविधियों में शामिल बताया गया है।

दूसरा नाम तारास स्लिवियाक का है। माना जा रहा है कि वह भी ड्रोन ट्रेनिंग और सैन्य गतिविधियों से जुड़ा रहा है। यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद कई यूक्रेनी नागरिक ड्रोन टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट बने हैं, और इसे भी उसी श्रेणी में देखा जा रहा है। (Myanmar Drone Case)

तीसरे आरोपी इवान सुकमानोव्स्की को भी ड्रोन से जुड़ी गतिविधियों और सप्लाई नेटवर्क का हिस्सा बताया गया है।

चौथा नाम मारियन स्टेफानकिव का है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इनके पास तकनीकी या मिलिट्री एक्सपर्टाइज हो सकती है और ये ट्रेनिंग से जुड़े काम में शामिल था।

पांचवं आरोपी मक्सिम होंचारुक हैं, यह ड्रोन असेंबली और ऑपरेशनल काम में शामिल था, यानी ड्रोन को तैयार करना और इस्तेमाल करना इसका काम था।

छठा यूक्रेनी नागरिक विक्टर कामिंस्की हैं, उसे इस पूरे नेटवर्क में ट्रेनिंग और सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ बताया गया है।

जांच एजेंसी के अनुसार, ये सभी आरोपी मिलकर एक संगठित तरीके से काम कर रहे थे, जिसमें ड्रोन ट्रेनिंग, तकनीकी सपोर्ट और उपकरणों की सप्लाई जैसी गतिविधियां शामिल थीं। (Myanmar Drone Case)

रिस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट का उल्लंघन

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ हिस्सों में विदेशी नागरिकों के लिए विशेष अनुमति यानी रिस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट लेना जरूरी होता है। यह नियम सुरक्षा कारणों से लागू किया गया है। लेकिन एनआईए के अनुसार इन आरोपियों ने यह परमिट नहीं लिया और सीधे इन क्षेत्रों में प्रवेश कर गए।

जांच में यह भी सामने आया कि भारत को इन लोगों ने केवल ट्रांजिट रूट की तरह इस्तेमाल किया। यानी इनका मुख्य उद्देश्य भारत में रहना नहीं था, बल्कि यहां से म्यांमार पहुंचना था। (Myanmar Drone Case)

म्यांमार में ड्रोन और हथियार ट्रेनिंग का आरोप

एफआईआर के मुताबिक, ये सभी आरोपी म्यांमार में सक्रिय एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ट्रेनिंग देने जा रहे थे। इन समूहों को ड्रोन ऑपरेशन, हथियार चलाने, हार्डवेयर असेंबली और सिग्नल जैमिंग जैसी तकनीकी ट्रेनिंग दी जा रही थी। इन्होंने यूरोप से बड़ी मात्रा में ड्रोन (और संबंधित उपकरण) आयात कर भारत के रास्ते म्यांमार पहुंचाए।

जांच एजेंसी का दावा है कि यह ट्रेनिंग काफी एडवांस लेवल की थी। इसमें ड्रोन के जरिए हमले करना, निगरानी करना और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बाधित करना शामिल था। (Myanmar Drone Case)

ड्रोन सप्लाई नेटवर्क का खुलासा

एनआईए की जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी यूरोप से आधुनिक ड्रोन भारत के रास्ते म्यांमार भेजने में भी शामिल थे। यह एक बड़ा नेटवर्क था, जिसमें हाई-टेक उपकरणों को अवैध तरीके से ट्रांसफर किया जा रहा था।

इन ड्रोन्स का इस्तेमाल म्यांमार के सशस्त्र समूहों द्वारा किया जाना था, जिससे उनकी सैन्य क्षमता बढ़ सके। जांच एजेंसी का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। (Myanmar Drone Case)

भारत की सुरक्षा को क्यों है खतरा

एनआईए के अनुसार, जिन एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ट्रेनिंग दी जा रही थी, उनके संबंध भारत के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों से हैं। ये संगठन पूर्वोत्तर भारत में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं।

जांच में यह आशंका जताई गई है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी और हथियारों की यह ट्रेनिंग भारत के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती थी। खासकर मणिपुर जैसे राज्यों में पहले से चल रहे तनाव को देखते हुए इसे गंभीर माना जा रहा है।

एफआईआर में साफ कहा गया है कि आरोपियों की गतिविधियों का सीधा असर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता था। (Myanmar Drone Case)

कोर्ट ने दी 11 दिन की कस्टडी  

गिरफ्तारी के बाद इन सभी आरोपियों को एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया गया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 11 दिन की कस्टडी मंजूर की है। यह रिमांड 27 मार्च तक चलेगा।

अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में कहा कि इस मामले की पूरी साजिश को समझने के लिए आरोपियों से पूछताछ जरूरी है। साथ ही उनके डिजिटल डिवाइस की जांच भी महत्वपूर्ण है। (Myanmar Drone Case)

डिजिटल फॉरेंसिक जांच जारी

एनआईए ने आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप को जब्त कर लिया है। इन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। इस जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इन लोगों के संपर्क किन-किन लोगों से थे।

एजेंसी का कहना है कि शुरुआती जांच में आरोपियों का संपर्क हथियारबंद लोगों से मिला है, जो एके-47 जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे। (Myanmar Drone Case)

गिरफ्तारी पर क्या बोले यूक्रेन और अमेरिका 

यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि उनके छह नागरिकों के खिलाफ भारत या म्यांमार में किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल होने के पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं। नई दिल्ली में यूक्रेन के राजदूत ओलेक्सांद्र पोलिशचुक ने भारत के विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सिबी जॉर्ज से मुलाकात कर विरोध दर्ज कराया और एक आधिकारिक नोट सौंपा।

यूक्रेन ने अपने नागरिकों की तुरंत रिहाई की मांग की है और उनके लिए कांसुलर एक्सेस यानी दूतावास से संपर्क की अनुमति देने की बात कही है। यूक्रेन का यह भी कहना है कि भारत के कुछ प्रतिबंधित इलाकों में जाने के लिए विशेष परमिट जरूरी होता है, लेकिन कई जगह जमीन पर इसकी स्पष्ट जानकारी या निशान नहीं होते। ऐसे में विदेशी पर्यटक अनजाने में नियमों का उल्लंघन कर सकते हैं। (Myanmar Drone Case)

वहीं अमेरिका की ओर से प्रतिक्रिया सीमित रही है। अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि उन्हें मैथ्यू वैनडाइक की गिरफ्तारी की जानकारी है, लेकिन उन्होंने निजी कारणों का हवाला देते हुए इस पर ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

इस पूरे मामले पर भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, जबकि एनआईए की जांच लगातार जारी है।

भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि एनआईए की जांच लगातार जारी है और एजेंसी इस मामले के हर पहलू की जांच कर रही है। (Myanmar Drone Case)

भारतीय नौसेना ने शुरू की IOS SAGAR 2026 पहल, 16 देशों के साथ शुरू हुआ समुद्री सहयोग कार्यक्रम

IOS SAGAR 2026

IOS SAGAR 2026: भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और सहयोग को मजबूत करने के लिए आईओएस सागर पहल का दूसरा संस्करण शुरू कर दिया है। 16 मार्च से शुरू हुए इस कार्यक्रम में हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों की भागीदारी शामिल है।

यह पहल भारत की उस नीति के तहत की गई है जिसमें क्षेत्र के सभी देशों के साथ मिलकर सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसे सागर यानी “Security and Growth for All in the Region” और महासागर विजन का हिस्सा माना जा रहा है।

IOS SAGAR 2026: 16 देशों के नौसैनिक ले रहे हैं हिस्सा

इस बार के आईओएस सागर कार्यक्रम में इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (IONS) से जुड़े 16 देशों के नौसैनिक शामिल हो रहे हैं। जो पहले संस्करण की तुलना में ज्यादा है। भारतीय नौसेना ने फरवरी 2026 में IONS की चेयरमैनशिप संभाली है। इसके बाद यह पहला बड़ा कार्यक्रम है, जिसमें इतने देशों के सैनिक एक साथ हिस्सा ले रहे हैं। इस पहल के तहत अलग-अलग देशों के नौसैनिक एक ही जहाज पर साथ काम करेंगे और एक-दूसरे के अनुभव से सीखेंगे। (IOS SAGAR 2026)

कोच्चि में शुरू हुआ ट्रेनिंग फेज

इस कार्यक्रम की शुरुआत केरल के कोच्चि स्थित भारतीय नौसेना के ट्रेनिंग संस्थानों में हुई है। यहां पर विदेशी नौसैनिकों को समुद्री संचालन, जहाज चलाने की तकनीक और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं की ट्रेनिंग दी जा रही है।

इस दौरान उन्हें सीमैनशिप यानी समुद्री कौशल, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और समुद्री सुरक्षा से जुड़े विषयों की जानकारी दी जा रही है।

ट्रेनिंग का उद्देश्य यह है कि अलग-अलग देशों के सैनिक एक-दूसरे की कार्यशैली को समझ सकें और साथ मिलकर काम करने की क्षमता विकसित कर सकें। (IOS SAGAR 2026)

समुद्र में संयुक्त ऑपरेशन की तैयारी

ट्रेनिंग के बाद सभी प्रतिभागी एक भारतीय नौसैनिक जहाज पर सवार होकर समुद्र में संयुक्त गतिविधियों में हिस्सा लेंगे। इस दौरान वे वास्तविक परिस्थितियों में ऑपरेशन से जुड़ी गतिविधियों को समझेंगे।

समुद्र में रहने के दौरान यह दल कई तरह के अभ्यास करेगा, जिससे उनकी आपसी समझ और तालमेल मजबूत होगा।

इस चरण में जहाज अलग-अलग देशों के बंदरगाहों पर भी जाएगा, जहां स्थानीय नौसेना और एजेंसियों के साथ बातचीत और सहयोग किया जाएगा। (IOS SAGAR 2026)

पोर्ट विजिट और समुद्री सहयोग

कार्यक्रम के दौरान जहाज विभिन्न देशों के बंदरगाहों का दौरा करेगा। इन विजिट्स के जरिए अलग-अलग देशों के बीच संबंध मजबूत होंगे और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।

इन गतिविधियों के जरिए देशों के बीच जानकारी साझा करने, अनुभवों के आदान-प्रदान और बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

यह पहल खास तौर पर समुद्री चुनौतियों जैसे पायरेसी यानी समुद्री डकैती, तस्करी और अन्य खतरों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है। (IOS SAGAR 2026)

पहले संस्करण की तुलना में बड़ा कार्यक्रम

आईओएस सागर का पहला संस्करण 2025 में आयोजित किया गया था, जिसमें कम देशों ने हिस्सा लिया था। उस समय यह कार्यक्रम एक महीने तक चला था और इसमें कई देशों के बंदरगाहों का दौरा किया गया था। इस बार का संस्करण अधिक बड़ा और विस्तारित है। इसमें ज्यादा देशों की भागीदारी है और गतिविधियों का दायरा भी बढ़ाया गया है। (IOS SAGAR 2026)

SAGAR और MAHASAGAR विजन पर फोकस

आईओएस सागर पहल भारत के सागर विजन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह पीएम मोदी के महासागर विजन को भी आगे बढ़ाता है, जिसमें भारत समुद्री सहयोग को और व्यापक स्तर पर बढ़ाना चाहता है। इस पहल के जरिए भारत खुद को एक भरोसेमंद समुद्री साझेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की पहल

भारतीय नौसेना के अनुसार यह कार्यक्रम सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य देशों के बीच वास्तविक सहयोग को बढ़ाना है। इस पहल से विभिन्न देशों के नौसैनिक एक-दूसरे के साथ काम करने का अनुभव हासिल करेंगे, जिससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन करना आसान होगा। कार्यक्रम के दौरान समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और अन्य साझा चुनौतियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। (IOS SAGAR 2026)

होर्मुज से ओमान की खाड़ी तक बढ़ा खतरा, IFC-IOR की रिपोर्ट के बाद भारतीय नौसेना अलर्ट पर

Hormuz Threat Expansion

Hormuz Threat Expansion: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच गुरुग्राम स्थित इंडियन नेवी के इन्फॉरमेशन सेंटर ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास का खतरा अब पूर्व की ओर बढ़ता हुआ ओमान की खाड़ी तक पहुंच रहा है। इस चेतावनी को क्षेत्रीय सुरक्षा को देखते के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह आकलन इंडियन नेवी के सहयोग से काम करने वाले इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) ने किया है, जो कई देशों के साथ मिलकर समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है। (Hormuz Threat Expansion)

Hormuz Threat Expansion: कई देशों के साथ मिलकर हो रही निगरानी

यह केंद्र एक मल्टी-नेशनल प्लेटफॉर्म है, जिसमें 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हैं। ये सभी देश मिलकर कमर्शियल शिपिंग से जुड़ी जानकारी साझा करते हैं, जिससे समुद्र में चल रही गतिविधियों की एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है।

इस केंद्र ने हाल ही में अपने अपडेट में बताया कि होर्मुज के आसपास की स्थिति लगातार बदल रही है और खतरा अब धीरे-धीरे ओमान की खाड़ी की तरफ बढ़ रहा है। (Hormuz Threat Expansion)

छह अलग-अलग शिपिंग घटनाएं दर्ज

रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के पूर्वी हिस्से में छह अलग-अलग शिपिंग घटनाएं दर्ज की गई हैं। ये घटनाएं खास तौर पर ओमान की खाड़ी के आसपास हुई हैं।

इन घटनाओं के आधार पर यह माना जा रहा है कि खतरा केवल होर्मुज तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसका असर आसपास के समुद्री क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। इसका असर ऊर्जा और अन्य जरूरी सामान की सप्लाई पर भी पड़ सकता है। (Hormuz Threat Expansion)

एनर्जी सप्लाई पर बढ़ सकता है दबाव

इस स्थिति का असर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में बढ़ते जोखिम के कारण वॉर रिस्क इंश्योरेंस की लागत भी बढ़ी हुई बनी हुई है।

इसका मतलब यह है कि जहाजों को इस क्षेत्र से गुजरने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है, जिससे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। (Hormuz Threat Expansion)

भारतीय नौसेना ने बढ़ाई तैनाती

इसी बीच भारतीय नौसेना ने भी अपनी तैनाती बढ़ा दी है। फिलहाल इस क्षेत्र में यूएवी और सर्विलांस एयरक्राफ्ट्स के साथ 6 से 8 युद्धपोत भी तैनात किए गए हैं, जो भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकालने में मदद कर रहे हैं।

इन युद्धपोतों का मुख्य काम एलपीजी और क्रूड ऑयल लेकर आने वाले जहाजों को सुरक्षित एस्कॉर्ट करना है। इसके अलावा निगरानी के लिए सर्विलांस एयरक्राफ्ट और यूएवी यानी ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। (Hormuz Threat Expansion)

दो टास्क फोर्स बनाकर किया गया ऑपरेशन

सूत्रों के अनुसार, भारतीय नौसेना ने इस मिशन के लिए दो अलग-अलग टास्क फोर्स तैयार किए हैं। पहले जहां केवल तीन युद्धपोत तैनात थे, वहीं अब उनकी संख्या बढ़ाकर 6 से 8 कर दी गई है। यह पूरा ऑपरेशन भारत अपने स्तर पर चला रहा है और किसी बहुराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। (Hormuz Threat Expansion)

ओमान की खाड़ी में पहले से मौजूद हैं युद्धपोत

भारतीय नौसेना पहले से ही सऊदी अरब के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र में अपने युद्धपोत तैनात रखती है। इनमें से एक युद्धपोत साल 2008 से अदन की खाड़ी में तैनात है, जहां उसका मुख्य काम समुद्री डकैती यानी एंटी-पायरेसी ऑपरेशन को रोकना है। इसके अलावा एक दूसरा युद्धपोत साल 2019 से ओमान की खाड़ी में तैनात है, जो इस क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा का काम करता है।

हाल ही में होर्मुज क्षेत्र में बढ़े तनाव के बाद नौसेना ने एक और अतिरिक्त युद्धपोत इस इलाके में तैनात कर दिया है, ताकि सुरक्षा को और मजबूत किया जा सके। इन युद्धपोतों को अपने रडार, सैटेलाइट और अन्य निगरानी सिस्टम से लगातार जानकारी मिलती रहती है। इसके जरिए वे जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। (Hormuz Threat Expansion)

समुद्र में ही किया जा सकता है ईंधन और सप्लाई ट्रांसफर

भारतीय नौसेना के पास अपने जहाजों को सपोर्ट देने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर ये जहाज ओमान के डुक्म और सलालाह जैसे बंदरगाहों पर जाकर ईंधन भर सकते हैं और जरूरी सामान ले सकते हैं। इसके अलावा नौसेना के पास फ्लीट टैंकर भी होते हैं, जो समुद्र में ही जहाजों तक ईंधन और राशन पहुंचा सकते हैं, जिससे उन्हें बीच रास्ते में कहीं रुकने की जरूरत नहीं पड़ती। (Hormuz Threat Expansion)

जेलेंस्की का बड़ा खुलासा! सस्ते ड्रोन के आगे बेबस हैं महंगे एयर डिफेंस सिस्टम, अब फाइटर जेट्स भी सुरक्षित नहीं!

Ukraine drone warfare: President Zelenskyy speech at UK Parliament
Ukraine drone warfare: President Zelenskyy speech at UK Parliament

Ukraine Drone Warfare: पश्चिम एशिया में यूएस-ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन से शाहेद ड्रोन का मुकाबला करने के लिए इंटरसेप्टर ड्रोन मांगे। जिसके बाद यूक्रेन ने इंटरसेप्टर ड्रोन के साथ 200 यूक्रेनी एयर डिफेंस एक्सपर्ट पश्चिम एशिया में तैनात कर दिए। यह खुलासा खुद यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने ब्रिटेन की संसद में किया। संसद को संबोधित करते हुए जेलेंस्की ने आधुनिक युद्ध में तेजी से बदलती तकनीकों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ड्रोन तकनीक ने युद्ध के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है और अब सस्ते हथियार भी महंगे सैन्य सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं।

उन्होंने अपने संबोधन में यह भी बताया कि रूस और ईरान के बीच रक्षा सहयोग के चलते युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है। उनके अनुसार, यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर देखा जा सकता है। (Ukraine Drone Warfare)

Ukraine Drone Warfare: शाहेद ड्रोन से शुरू हुई नई रणनीति

जेलेंस्की ने कहा कि करीब तीन साल पहले रूस को ईरान से “शाहेद” ड्रोन मिले थे। ये ऐसे ड्रोन हैं, जिन्हें कम लागत में तैयार किया जाता है, लेकिन इनका इस्तेमाल महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि ईरान ने रूस को इन ड्रोन को इस्तेमाल करने और बनाने की तकनीक दी। बाद में रूस ने इसमें बदलाव किए और अब इन ड्रोन में रूसी तकनीक के भी हिस्से शामिल हो चुके हैं। (Ukraine Drone Warfare)

कम लागत वाले हथियार बन रहे बड़ी ताकत

जेलेंस्की ने कहा कि आधुनिक युद्ध में अब एक नई तरह की प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। एक तरफ महंगे एयर डिफेंस सिस्टम और हथियार हैं, वहीं दूसरी तरफ कम लागत वाले ड्रोन हैं। उन्होंने बताया कि एक छोटा ड्रोन कुछ सौ डॉलर में तैयार हो सकता है, जबकि उसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिस्टम की लागत हजारों या लाखों डॉलर तक होती है। इस वजह से युद्ध का संतुलन बदल रहा है। (Ukraine Drone Warfare)

समुद्र से जमीन तक हमला करने में सक्षम 

यूक्रेन ने ऐसे बोट्स भी विकसित किए हैं, जो अन्य ड्रोन को ले जा सकते हैं और उन्हें लॉन्च कर सकते हैं। इसके अलावा ऐसे सिस्टम भी तैयार किए गए हैं, जो समुद्र से जमीन पर हमला कर सकते हैं। जेलेंस्की ने बताया कि इन ड्रोन को और ज्यादा स्थिर और लंबी दूरी तक काम करने लायक बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसे सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं, जो समुद्र के कठिन हालात में भी काम कर सकेंगे।

जेलेंस्की के मुताबिक यूक्रेन ने भी इस बदलते युद्ध के तरीके को समझते हुए अपनी रणनीति में बदलाव किया है। जेलेंस्की ने बताया कि शुरुआत में यूक्रेन ने साधारण कामिकाजी समुद्री ड्रोन बनाए, जिनका इस्तेमाल दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने के लिए किया गया। इसके बाद यूक्रेन ने ऐसे ड्रोन विकसित किए, जिनमें टर्रेट यानी गन सिस्टम लगाया गया। ये ड्रोन हवा में मौजूद हेलीकॉप्टर को भी निशाना बना सकते हैं।

उन्होंने बताया कि अब यूक्रेन ऐसे ड्रोन भी विकसित कर चुका है, जो समुद्र से उड़ान भरकर दुश्मन के लड़ाकू विमानों को भी निशाना बना सकते हैं। यह तकनीक आधुनिक युद्ध में एक बड़ा बदलाव मानी जा रही है। (Ukraine Drone Warfare)

अंडरवाटर सिस्टम पर भी चल रहा काम

उन्होंने यह भी बताया कि यूक्रेन अब अंडरवाटर सिस्टम यानी पानी के नीचे काम करने वाले ड्रोन पर भी काम कर रहा है। ब्लैक सी में बढ़ते खतरों को देखते हुए यह तकनीक विकसित की जा रही है। उनके अनुसार, इन तकनीकों की मदद से यूक्रेन ने अपनी सुरक्षा के लिए नए समाधान तैयार किए हैं।

जेलेंस्की ने बताया कि यूक्रेन अब ऐसे ड्रोन विकसित कर रहा है, जो लंबे समय तक समुद्र में काम कर सकें। जेलेंस्की ने कहा कि इन ड्रोन को और ज्यादा स्थिर और प्रभावी बनाया जा रहा है, ताकि वे कठिन मौसम और समुद्री परिस्थितियों में भी ऑपरेशन कर सकें। उन्होंने कहा कि जल्द ही ऐसे सिस्टम तैयार होंगे, जो महासागर जैसी परिस्थितियों में भी काम कर सकेंगे। (Ukraine Drone Warfare)

दूसरे देशों को भी दे रहा है तकनीकी सहयोग

जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन अपनी इस तकनीक को अन्य देशों के साथ साझा करने के लिए भी तैयार है। उन्होंने बताया कि यूक्रेन के सैन्य विशेषज्ञ कई देशों में काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यूक्रेन के करीब 200 से ज्यादा विशेषज्ञ मध्य पूर्व और खाड़ी देशों में मौजूद हैं। और 34 अन्य लोग तैनाती के लिए तैयार हैं।  ये सभी सैन्य विशेषज्ञ हैं, जिन्हें “शाहेद” जैसे ड्रोन से बचाव और मुकाबला करने का अनुभव है। हमारी टीमें पहले से ही यूएई, कतर और सऊदी अरब में काम कर रही हैं, जबकि कुछ टीमें कुवैत के रास्ते में हैं। इसके अलावा हम कई अन्य देशों के साथ भी सहयोग कर रहे हैं और इसको लेकर समझौते पहले ही हो चुके हैं।

ये विशेषज्ञ ड्रोन से सुरक्षा और रक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं। इन विशेषज्ञों का काम वहां ड्रोन से सुरक्षा के उपाय तैयार करना और डिफेंस सिस्टम को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि इन सैन्य विशेषज्ञों को मैंने हमारे सहयोगी देशों के अनुरोध पर भेजा है, जिसमें अमेरिका भी शामिल है। दरअसल, यह उसी “ड्रोन डील” का हिस्सा है, जिसे हमने अमेरिका के साथ मिलकर प्रस्तावित किया था और जिस पर अभी भी बातचीत जारी है। (Ukraine Drone Warfare)

रियल टाइम कंट्रोल सिस्टम से बढ़ी क्षमता

यूक्रेन ने एक ऐसा डिजिटल सिस्टम भी तैयार किया है, जिसके जरिए पूरे युद्ध क्षेत्र की स्थिति को रियल टाइम में देखा जा सकता है। जेलेंस्की ने बताया कि इस सिस्टम के जरिए फ्रंटलाइन की स्थिति, हमलों की जानकारी और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

जेलेंस्की ने कहा कि मेरे पास इस बात के सबूत हैं कि सुरक्षा व्यवस्था को बहुत तेजी से बदला जा सकता है, और यह पुराने रक्षा सिस्टम के मुकाबले सस्ती भी हो सकती है। उन्होंने कहा, यह एक आईपैड है, जिसमें ऐसा सॉफ्टवेयर है जो हमें रियल टाइम में अपनी सुरक्षा पर नजर रखने और उसे कंट्रोल करने की सुविधा देता है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है। मेरे पास यह आईपैड है, हमारे प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और शीर्ष सैन्य कमांडरों के पास भी यही सिस्टम है। इसके जरिए हम यूक्रेन के फ्रंटलाइन की स्थिति देख सकते हैं, यहां तक कि दुश्मन के नुकसान को भी वीडियो सबूत के साथ ट्रैक कर सकते हैं।

इस समय फ्रंटलाइन पर रूस के लगभग 90% नुकसान हमारे ड्रोन के कारण हो रहे हैं। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी हो गया है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी में किसके पास बढ़त है और उनसे बचाव में कौन ज्यादा मजबूत और तेज है।

यह आईपैड हमें आसमान में होने वाले हर हमले, समुद्री क्षेत्र की गतिविधियों और रूस के खिलाफ हमारी लंबी दूरी की स्ट्राइक की जानकारी भी देता है। इसके जरिए लोगों की सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा क्षेत्र पर भी रियल टाइम नजर रखी जाती है।

मेरा मानना है कि भविष्य में सुरक्षा का यह सिस्टम इतना विकसित हो जाएगा कि हर देश के नेता, रक्षा मंत्री ही नहीं, बल्कि आम लोगों के पास भी ऐसे टूल्स होंगे, जिनसे वे अपनी सुरक्षा को बेहतर तरीके से समझ और देख सकेंगे।

उन्होंने कहा कि इस तरह के सिस्टम से कमांड और कंट्रोल में सुधार होता है और तेजी से फैसले लिए जा सकते हैं। (Ukraine Drone Warfare)

ड्रोन से होने वाले हमलों को रोकने की तैयारी

जेलेंस्की ने यह भी बताया कि यूक्रेन ने ड्रोन से होने वाले हमलों को रोकने के लिए इंटरसेप्टर सिस्टम भी विकसित किए हैं। उन्होंने कहा कि यूक्रेन हर दिन बड़ी संख्या में ऐसे इंटरसेप्टर तैयार कर सकता है।

जेलेंस्की ने बताया कि हम हर दिन कम से कम 2,000 प्रभावी और युद्ध में साबित इंटरसेप्टर बनाने में सक्षम हैं। हम इससे ज्यादा भी बना सकते हैं, यह निवेश पर निर्भर करता है। हमें रोज लगभग 1,000 इंटरसेप्टर की जरूरत होती है, और हम अपने सहयोगी देशों को भी कम से कम 1,000 इंटरसेप्टर रोज उपलब्ध करा सकते हैं।

उन्होंने कहा, हमें यह अच्छी तरह पता है कि “शाहेद” जैसे ड्रोन और अन्य ड्रोन किस तरह आते हैं, और उन्हें रोकने के लिए हम रडार और ध्वनि (एकॉस्टिक) निगरानी सिस्टम तैयार कर सकते हैं।

इसके अलावा रडार और सॉफ्टवेयर सिस्टम भी बनाए गए हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बावजूद काम करते रहते हैं। इससे ड्रोन की पहचान और उन्हें रोकना आसान होता है। (Ukraine Drone Warfare)

ड्रोन से बदल रहा वैश्विक सुरक्षा ढांचा

जेलेंस्की ने अपने संबोधन में कहा कि अब ड्रोन केवल जमीन से ही नहीं, बल्कि समुद्र से भी लॉन्च किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि लंबी दूरी तक हमले करना अब सामान्य होता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि समुद्र में मौजूद जहाजों से भी ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं, जिससे सुरक्षा चुनौतियां और बढ़ जाती हैं।

जेलेंस्की ने कहा कि आधुनिक हथियार अब हजारों किलोमीटर दूर तक हमला करने में सक्षम हैं। बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन दोनों ही लंबी दूरी तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दुनिया के किसी भी हिस्से में हो रहा संघर्ष अब दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकता है। (Ukraine Drone Warfare)

रूस-ईरान के सहयोग पर उठाए सवाल

जेलेंस्की ने अपने संबोधन में रूस और ईरान के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच हथियारों और तकनीक का आदान-प्रदान हो रहा है। उनके अनुसार, यह सहयोग वैश्विक सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के सहयोग से युद्ध का स्वरूप और जटिल हो रहा है। (Ukraine Drone Warfare)

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने लगाई लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के रिटायरमेंट पर रोक, केस से प्रमोशन पर पड़ा असर

Lt Col Purohit AFT Case
Lt Col Purohit (File Photo)

Lt Col Purohit AFT Case: नई दिल्ली में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक अहम फैसले में लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित की रिटायरमेंट पर अस्थायी रोक लगा दी है। उनका रिटायरमेंट 31 मार्च को होना था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस प्रक्रिया को फिलहाल रोकते हुए रक्षा मंत्रालय से जवाब मांगा है। यह मामला मालेगांव ब्लास्ट केस और उससे जुड़े लंबे ट्रायल के कारण उनके करियर पर पड़े असर से जुड़ा है।

यह फैसला 17 मार्च को आया, जब ट्रिब्यूनल की बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक पुरोहित की स्टैट्यूटरी शिकायत पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उन्हें सेवा से रिटायर नहीं किया जाएगा। (Lt Col Purohit AFT Case)

Lt Col Purohit AFT Case: मालेगांव केस के बाद उठाया प्रमोशन का मुद्दा

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जुलाई 2025 में मालेगांव ब्लास्ट केस में अदालत से बरी कर दिया गया था। यह मामला साल 2008 का था और इसमें करीब 17 साल तक जांच और ट्रायल चला। पुरोहित का कहना है कि इस लंबे कानूनी संघर्ष के कारण उनके प्रमोशन और करियर प्रोग्रेशन पर असर पड़ा।

उन्होंने ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल कर कहा कि उन्हें उनके बैचमेट्स के बराबर प्रमोशन का अवसर नहीं मिला। उनके अनुसार, यदि यह मामला नहीं होता, तो वे सामान्य प्रक्रिया के तहत उच्च पद तक पहुंच सकते थे। (Lt Col Purohit AFT Case)

डीवी बैन और सीलबंद प्रक्रिया पर उठाए सवाल

पुरोहित ने अपने मामले में आर्मी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ डिसिप्लिन एंड विजिलेंस यानी डीवी बैन लागू था, जिसके चलते उनके प्रमोशन पर फैसला रोक दिया गया।

फरवरी 2021 में उन्हें कर्नल पद के लिए विचार किया गया था, लेकिन उनका रिजल्ट सीलबंद रखा गया। बाद में उन्हें बताया गया कि वे प्रमोशन के लिए फिट नहीं पाए गए। उनका कहना है कि यदि वे प्रमोशन के लिए योग्य नहीं थे, तो यह जानकारी तुरंत दी जानी चाहिए थी। सीलबंद प्रक्रिया अपनाकर उन्हें आगे के प्रमोशन के अवसरों से भी वंचित किया गया और उन्हें कानूनी चुनौती देने का मौका भी नहीं मिला। (Lt Col Purohit AFT Case)

ट्रिब्यूनल ने मांगा रक्षा मंत्रालय से जवाब

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल की जस्टिस राजेंद्र मेनन की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले में रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि पहली नजर में यह मामला बनता है कि पुरोहित को उनके जूनियर्स के बराबर प्रमोशन और अन्य लाभों पर विचार किया जाना चाहिए।

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि आपराधिक अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद यह देखा जाना जरूरी है कि कहीं उन्हें गलत तरीके से उनके अधिकारों से वंचित तो नहीं किया गया। इस मामले की अगली सुनवाई 22 मई को होगी। (Lt Col Purohit AFT Case)

पुरोहित ने करियर प्रभावित होने का किया दावा

पुरोहित ने अपनी याचिका में कहा है कि सामान्य परिस्थितियों में वे अब तक ब्रिगेडियर पद तक पहुंच सकते थे। उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ लगे आरोप और उसके बाद की प्रक्रिया ने उनके करियर ग्रोथ को प्रभावित किया।

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने प्रमोशन से जुड़े फैसले के खिलाफ अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला। इस कारण उन्हें समय रहते न्याय पाने का मौका नहीं मिल सका। (Lt Col Purohit AFT Case)

सेवा में वापसी के बाद भी जारी रहा असर

पुरोहित को 2017 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्होंने दोबारा सेना में जॉइन किया था। हालांकि, वे 2020 तक सस्पेंशन में रहे। सस्पेंशन हटने के बाद भी उनके ऊपर डीवी बैन जारी रहा। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सेवा जारी रखी और 2018 से 2025 के बीच कई एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट्स हासिल कीं। इन रिपोर्ट्स में उनके काम और प्रोफेशनल क्षमता को सकारात्मक बताया गया। (Lt Col Purohit AFT Case)

इंटेलिजेंस भूमिका का भी दिया हवाला

अपनी याचिका में पुरोहित ने यह भी कहा है कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस में कार्यरत थे और उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के अनुसार ही काम किया। उन्होंने कुछ आधिकारिक पत्रों का हवाला देते हुए कहा कि उनकी गतिविधियां ड्यूटी के दायरे में थीं। इन दस्तावेजों में यह उल्लेख किया गया कि वे एक सोर्स नेटवर्क के जरिए जानकारी जुटा रहे थे और यह काम उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा था। (Lt Col Purohit AFT Case)

अक्टूबर 2008 में हुई थी गिरफ्तारी

पुरोहित की गिरफ्तारी अक्टूबर 2008 में हुई थी, जब वे एक ट्रेनिंग कोर्स कर रहे थे। इसके बाद उन्हें एंटी टेररिज्म स्क्वाड को सौंपा गया। इस मामले में उन्होंने कई साल जेल में बिताए। जेल में रहने के दौरान वे अपनी दो महत्वपूर्ण कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट्स हासिल नहीं कर सके, जिसका असर उनके करियर पर पड़ा। (Lt Col Purohit AFT Case)

स्टैट्यूटरी शिकायत पर फैसला बाकी

पुरोहित ने अक्टूबर 2025 में आर्मी चीफ को पत्र लिखकर अपनी बात रखने का अनुरोध किया था। इसके बाद फरवरी 2026 में उन्होंने स्टैट्यूटरी शिकायत भी दर्ज कराई। उनका कहना है कि उन्हें उनके बैचमेट्स के बराबर अवसर दिए जाएं। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि जब तक इस शिकायत पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उनकी रिटायरमेंट पर रोक जारी रहेगी। (Lt Col Purohit AFT Case)

कानूनी अधिकारों के उल्लंघन का आरोप

पुरोहित ने अपनी याचिका में कहा है कि उनके साथ हुए व्यवहार से उनके मौलिक और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने कहा कि उन्हें समानता और सम्मान के साथ सेवा करने का अधिकार मिलना चाहिए था।
उनका यह भी कहना है कि लंबी कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों के कारण उन्हें समय से पहले सेवा से बाहर होना पड़ सकता था। (Lt Col Purohit AFT Case)

गेमचेंजर है जापान का नया एयरक्राफ्ट EC-2, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में दुश्मन के रडार को कर देगा ब्लाइंड

EC-2 Electronic Warfare Aircraft
EC-2 Electronic Warfare Aircraft

EC-2 Electronic Warfare Aircraft: जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स ने हाल ही में अपने नए इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एयरक्राफ्ट EC-2 की पहली आधिकारिक तस्वीरें जारी की हैं। यह एयरक्राफ्ट खास तौर पर दुश्मन के रडार और कम्यूनिकेशन सिस्टम को जाम करने के लिए तैयार किया गया है। यह एयरक्राफ्ट ऐसे मिशनों के लिए बनाया गया है, जिसमें यह दुश्मन की पहुंच से दूर रहकर उसके सिस्टम को प्रभावित कर सके।

जापान के एयर डेवलपमेंट एंड टेस्ट कमांड ने इस विमान की तस्वीरें हाल ही में सार्वजनिक की हैं। यह विमान पुराने EC-1 इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर विमान की जगह लेगा, जो 1986 से सेवा में था। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

EC-2 Electronic Warfare Aircraft: स्टैंड-ऑफ जैमिंग क्षमता से लैस है यह विमान

EC-2 विमान की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्टैंड-ऑफ जैमिंग क्षमता है। इसका मतलब है कि यह विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की सीमा से बाहर रहकर ही उसके रडार और कम्युनिकेशन नेटवर्क को जाम कर सकता है। इससे विमान को खतरा कम होता है और मिशन अधिक सुरक्षित तरीके से पूरा किया जा सकता है।

यह विमान दुश्मन के रडार सिस्टम, डेटा लिंक, कम्यूनिकेशन नेटवर्क और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सेंसर को प्रभावित करने में सक्षम है। इसके जरिए दुश्मन की निगरानी क्षमता को कमजोर किया जा सकता है, जिससे फाइटर जेट्स और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन कर सकते हैं। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

कावासाकी C-2 प्लेटफॉर्म पर आधारित है EC-2

EC-2 विमान जापान के कावासाकी C-2 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट पर आधारित है। यह एक आधुनिक सैन्य परिवहन विमान है, जिसे खास तौर पर भारी उपकरण और सैनिकों को ले जाने के लिए विकसित किया गया था। इसी प्लेटफॉर्म को संशोधित करके EC-2 तैयार किया गया है।

इस विमान की लंबाई करीब 43.9 मीटर है और इसका विंगस्पैन 44.4 मीटर है। इसमें दो टर्बोफैन इंजन लगे हैं, जो इसे तेज गति और लंबी दूरी तक उड़ान भरने की क्षमता देते हैं। यह विमान लगभग 7,600 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है और भारी वजन उठाने में सक्षम है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

EC-2 Electronic Warfare Aircraft
EC-2 Electronic Warfare Aircraft

डिजाइन में दिखते हैं बड़े बदलाव

EC-2 का डिजाइन सामान्य C-2 विमान से काफी अलग दिखाई देता है। इसके आगे के हिस्से में एक बड़ा गोलाकार रेडोम लगाया गया है, जो इसकी सबसे प्रमुख पहचान है। इसके अलावा विमान के ऊपर और साइड में भी कई उभार दिखाई देते हैं।

ये उभार दरअसल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम के हिस्से हैं। इनमें एंटीना और सेंसर लगे होते हैं, जो रेडियो सिग्नल, रडार वेव्स और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों को पहचानते हैं और उन पर जैमिंग सिग्नल भेजते हैं।

इस तरह का डिजाइन यह दिखाता है कि यह विमान पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक अटैक और सिग्नल इंटेलिजेंस मिशन के लिए तैयार किया गया है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

चार विमानों की फ्लीट तैयार करने की योजना

जापान इस प्रोग्राम के तहत कुल चार EC-2 विमान तैयार करने की योजना बना रहा है। यह पुराने EC-1 की तुलना में बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है, क्योंकि पहले केवल एक ही विमान सेवा में था।

यह प्रोग्राम 2020 में शुरू किया गया था और इसे दो चरणों में डेवलप किया जा रहा है। पहले चरण में बेसिक जैमिंग क्षमता डेवलप की जा रही है, जबकि दूसरे चरण में इसे पूरी तरह ऑपरेशनल बनाया जाएगा।

EC-2 विमान पुराने EC-1 की जगह लेगा, जिसे 1980 के दशक में डेवलप किया गया था। EC-1 में भी रडार जेमिंग और कम्युनिकेशन डिसरप्शन की क्षमता थी, लेकिन तकनीक के मामले में वह अब पुराना हो चुका है।

EC-1 को कावासाकी C-1 विमान से विकसित किया गया था और इसमें कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए थे। लेकिन अब नई तकनीक के साथ EC-2 को ज्यादा आधुनिक और सक्षम बनाया गया है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में बढ़ेगी जापान की ताकत

EC-2 विमान जापान की इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमता को मजबूत करेगा। यह विमान इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में कंट्रोल स्थापित करने में मदद करेगा, जो आधुनिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसकी मदद से दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर किया जा सकता है और अपने फाइटर जेट्स को सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन करने का मौका मिल सकता है। यह विमान काउंटर-एयर ऑपरेशन और अन्य सामरिक मिशनों में भी उपयोगी होगा। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

RC-2 और अन्य वेरिएंट भी तैयार

कावासाकी C-2 प्लेटफॉर्म को केवल ट्रांसपोर्ट के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य सैन्य भूमिकाओं के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी प्लेटफॉर्म पर RC-2 नाम का एक इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस विमान भी विकसित किया गया है, जो रेडियो सिग्नल को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

लंबी दूरी तक ऑपरेशन की क्षमता

EC-2 विमान को लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी रेंज और पेलोड क्षमता इसे दूर से मिशन पूरा करने की सुविधा देती है। यह विमान दुश्मन के इलाके के करीब गए बिना ही अपने इलेक्ट्रॉनिक अटैक मिशन को अंजाम दे सकता है।

इसका फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और ग्लास कॉकपिट इसे आधुनिक और प्रभावी बनाते हैं। इसके जरिए पायलट का काम आसान होता है और ऑपरेशन अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

स्वदेशी तकनीक का किया इस्तेमाल

इस विमान के विकास में जापान ने अपनी घरेलू तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसका उद्देश्य संवेदनशील तकनीक को सुरक्षित रखना और बाहरी निर्भरता को कम करना है। इसमें पहले से मौजूद जापानी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जैसे J/ALQ-5 का भी इस्तेमाल किया गया है, जिसे समय के साथ अपग्रेड किया गया है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच विकास

जापान ने जहाज ऐसे समय में बनाया है, जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं। समुद्री और हवाई क्षेत्रों में बढ़ते खतरे के बीच इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। इस तरह के विमान आधुनिक युद्ध में अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि यह सीधे लड़ाई में शामिल हुए बिना ही दुश्मन की क्षमताओं को कमजोर कर सकते हैं। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

Blue Water Diplomacy: विशाखापत्तनम पहुंचे रूस के दो आधुनिक वॉरशिप, गुआम में US के साथ नेवी कर रही अभ्यास

Indian Navy Blue Water Diplomacy
Russia’n Navy comprising the Sovershenny and Rezky corvettes arrived on an unofficial visit at the India’n Navy’s Eastern Naval Command base in Visakhapatnam.

Indian Navy Blue Water Diplomacy: एक तरफ भारतीय नौसेना जहां गुआम में अमेरिका के साथ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के लिए सी ड्रैगन एक्सरसाइज में हिस्सा ले रही है, तो वहीं दूसरी तरफ रूस के दो युद्धपोत भारत के विशाखापत्तनम बंदरगाह पर पहुंचे हुए हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव के बीच भारतीय नौसेना की ब्लूवॉटर डिप्लोमेसी ही है, जो एक साथ अलग-अलग देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ा रही है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

Indian Navy Blue Water Diplomacy: गुआम में शुरू हुई सी ड्रैगन एक्सरसाइज

अमेरिका के गुआम स्थित एंडरसन एयर फोर्स बेस पर ‘सी ड्रैगन 2026’ अभ्यास 9 मार्च से शुरू हो चुका है। यह एक बहुराष्ट्रीय एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभ्यास है, जिसमें कई देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं।

इस अभ्यास में क्वॉड देशों भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के अलावा न्यूजीलैंड भी शामिल है। यह अभ्यास लगभग तीन सप्ताह यानी 21 मार्च तक चलेगा। इसमें सभी देश अपने-अपने लॉन्ग रेंज मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट यानी समुद्री निगरानी विमानों को तैनात कर रहे हैं।

भारतीय नौसेना ने इसमें अपने अत्याधुनिक पी-8आई एंटी-सबमरीन एयरक्राफ्ट को भेजा है। यह विमान समुद्र के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में सक्षम है। इसके अलावा यह विमान समुद्र की निगरानी और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने में भी उपयोगी है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

200 घंटे से ज्यादा का उड़ान प्रशिक्षण

इस अभ्यास के दौरान पायलट और एयरक्रू को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शुरुआत में सिमुलेशन के जरिए अभ्यास होता है, जिसमें नकली टारगेट्स को ट्रैक किया जाता है। इसके बाद वास्तविक परिस्थितियों में पनडुब्बियों को खोजने और उनका पीछा करने का अभ्यास कराया जाता है।

इस पूरे अभ्यास में 200 घंटे से अधिक का उड़ान प्रशिक्षण शामिल है। इसके साथ ही क्लासरूम सेशन भी आयोजित किए जा रहे हैं, जहां अलग-अलग देशों के अधिकारी मिलकर रणनीति और तालमेल पर चर्चा करते हैं।

इस अभ्यास का आयोजन साल 2019 से हर साल किया जा रहा है और इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों के बीच बेहतर समन्वय और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

अमेरिका की नौसेना ने इसमें अपने दो पी-8ए पोसाइडन विमान भेजे हैं, जो अलग-अलग स्क्वाड्रन से आते हैं और पहले जापान के कडेना एयर बेस के जरिए तैनात किए गए हैं। भारतीय नौसेना की ओर से एक पी-8आई विमान शामिल किया गया है, जो इसी प्लेटफॉर्म का भारतीय संस्करण है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पनडुब्बियों का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस अभ्यास में जापान ने अपने कावासाकी पी-1 समुद्री निगरानी विमान को इस अभ्यास में भेजा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया की वायु सेना ने दो पी-8ए विमान और करीब 50 प्रशिक्षित कर्मियों को इसमें शामिल किया है। न्यूजीलैंड की ओर से भी एक पी-8ए विमान इस अभ्यास में हिस्सा ले रहा है। इस अभ्यास में शामिल अधिकांश विमान बोइंग पी-8 प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं। इन विमानों के मिशन सिस्टम, सेंसर और डेटा लिंक काफी हद तक एक जैसे हैं। इससे अलग-अलग देशों के बीच जानकारी साझा करना आसान हो जाता है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

विशाखापत्तनम पहुंचे रूसी युद्धपोत

दूसरी ओर, रूस के दो युद्धपोत ‘सोवर्शेन्नी’ (hull 333) और ‘रेजकी’ (hull 343) 14 मार्च को विशाखापत्तनम पहुंचे। ये दोनों जहाज रूस के प्रशांत बेड़े का हिस्सा हैं और आधुनिक मल्टी-रोल कॉर्वेट श्रेणी में आते हैं। ये व्लादिवोस्तोक से 12 फरवरी को लंबी दूरी की तैनाती पर निकले थे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई समुद्री इलाकों त्सुशिमा जलडमरूमध्य, पूर्वी चीन सागर और फिलीपीन सागर (जापान द्वारा अपने ईईजेड के पास निगरानी) जैसे इलाकों से होते हुए भारत पहुंचे हैं। इन जहाजों की यात्रा के दौरान जापान के समुद्री क्षेत्र के पास भी इनकी निगरानी की गई थी।

विशाखापत्तनम पहुंचने के बाद इन जहाजों का स्वागत भारतीय नौसेना और रूस के दूतावास के प्रतिनिधियों द्वारा किया गया। इस दौरान बंदरगाह पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इन जहाजों की यह यात्रा एक आधिकारिक “बिजनेस कॉल” के रूप में है, जिसका मतलब है कि यह कोई सैन्य अभ्यास नहीं बल्कि नियमित दौरा है। इस दौरान जहाजों के चालक दल को आराम दिया जाएगा, आवश्यक सामान की आपूर्ति की जाएगी और भारतीय नौसेना के साथ सांस्कृतिक और खेल गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब हाल ही में विशाखापत्तनम में इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और मिलन जैसे बड़े नौसैनिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, जिनमें कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। रूस के इन जहाजों का आना भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा संबंधों को भी दर्शाता है। दोनों देश अब रक्षा क्षेत्र में संयुक्त विकास और उत्पादन पर भी काम कर रहे हैं।

इसी बीच भारत ने हाल ही में एक ईरानी युद्धपोत को कोच्चि बंदरगाह पर शरण दी थी, जहां उसके चालक दल को भी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। यह कदम मानवीय आधार पर उठाया गया था। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

अमेरिका और रूस दोनों के साथ संबंध

भारत लंबे समय से अमेरिका और रूस दोनों के साथ अपने सैन्य संबंध बनाए हुए है। हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच संयुक्त अभ्यास और सहयोग बढ़ा है। वहीं दूसरी ओर रूस के साथ भारत के रक्षा संबंध कई दशकों पुराने हैं। दोनों देश अब रक्षा क्षेत्र में सह-विकास और सह-उत्पादन पर भी काम कर रहे हैं। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

शाहेद 136 के बाद एफपीवी ड्रोन कैसे बदल रहे युद्ध की रणनीति, असिमेट्रिक वारफेयर से कैसे फूलने लगीं अमेरिकी डिफेंस सिस्टम की सांसें

Asymmetric Warfare US-Iran War
Asymmetric Warfare US-Iran War

Asymmetric Warfare US-Iran War: पश्चिम एशिया में चल रहा अमेरिका-ईरान युद्ध अब असिमेट्रिक वारफेयर यानी असमान युद्ध की रणनीति की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। हाल ही में ईरान समर्थित एक मिलिशिया ने अमेरिकी दूतावास के ऊपर एक छोटा फर्स्ट-पर्सन-व्यू यानी एफपीवी ड्रोन उड़ाया और करीब दो मिनट तक पूरे इलाके की निगरानी की। यह ड्रोन बेहद कम ऊंचाई पर उड़ रहा था और इसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सका। रूस-यूक्रेन वॉर के बाद यह असिमेट्रिक वारफेयर का सबसे ताजा उदाहरण है।

यह घटना इराक की राजधानी बगदाद के ग्रीन जोन इलाके की है, जहां अमेरिकी दूतावास स्थित है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सुरक्षित इलाकों में माना जाता है। इसके बावजूद ड्रोन ने दूतावास के अंदर की इमारतों, गाड़ियों और अमेरिकी झंडे तक की तस्वीरें रिकॉर्ड कर लीं। बाद में इस वीडियो को सार्वजनिक रूप से जारी किया गया। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

Asymmetric Warfare US-Iran War: पहले हमले में नष्ट हुआ था रडार सिस्टम

इस घटना से कुछ दिन पहले दूतावास पर एक और हमला हुआ था। इस हमले में एक आत्मघाती ड्रोन ने दूतावास की छत पर लगे एक महत्वपूर्ण रडार सिस्टम को निशाना बनाया था। यह रडार सिस्टम Saab Giraffe-1X था, जो दूतावास की सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जाता है।

यह रडार सिस्टम C-RAM डिफेंस सिस्टम को जानकारी देता था। C-RAM एक ऐसा सिस्टम है, जो रॉकेट, आर्टिलरी और मोर्टार जैसे खतरों को हवा में ही नष्ट कर देता है। लेकिन रडार के नष्ट होने के बाद यह सिस्टम प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाया।

यह घटना इसी रणनीति का एक उदाहरण मानी जा रही है। इसमें ईरान समर्थित मिलिशिया ने पहले दूतावास के रडार सिस्टम को एक सस्ते आत्मघाती ड्रोन से नष्ट किया और फिर कुछ ही समय बाद एक छोटे एफपीवी ड्रोन के जरिए पूरे इलाके की निगरानी की। यह ड्रोन करीब दो मिनट तक बिना किसी रोक-टोक के उड़ता रहा। इस घटना ने दिखाया कि कैसे सस्ती तकनीक से महंगी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

सस्ते ड्रोन से महंगे सिस्टम्स को चैलेंज

इस घटना ने एक बड़ी बात सामने रखी है कि आधुनिक युद्ध में अब केवल ताकत ही नहीं, बल्कि रणनीति भी अहम हो गई है। जिस ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, उसकी लागत बहुत कम बताई जा रही है। यह ड्रोन सामान्य बाजार में मिलने वाले उपकरणों से तैयार किया गया था।

इसके विपरीत, अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा में लगे सिस्टम बहुत महंगे हैं। C-RAM सिस्टम एक मिनट में हजारों गोलियां दाग सकता है, जिसकी लागत बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में सस्ते ड्रोन से महंगे सिस्टम को चुनौती दी जा रही है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन की नई तकनीक

इस ड्रोन की एक खास बात यह भी थी कि इसमें फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस का इस्तेमाल किया गया था। इसका मतलब यह है कि यह ड्रोन रेडियो सिग्नल के बजाय तार के जरिए कंट्रोल किया जाता है।

इस तकनीक की वजह से इसे जाम करना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर ड्रोन को रेडियो फ्रीक्वेंसी जैमिंग से रोका जा सकता है, लेकिन इस तरह के ड्रोन पर यह तरीका काम नहीं करता।

इन ड्रोन की लागत बहुत कम होती है, जबकि इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिस्टम काफी महंगे होते हैं। यही कारण है कि एक छोटा और सस्ता ड्रोन भी बड़े सैन्य सिस्टम पर भारी पड़ सकता है। जब ऐसे कई ड्रोन एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं, तो यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

इसके पीछे “मोजेक डिफेंस” रणनीति

इस तरह की रणनीति के पीछे ईरान की एक खास सैन्य सोच काम करती है, जिसे “मोजेक डिफेंस” कहा जाता है। इसमें सेना को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है, जो अलग-अलग जगहों पर स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। अगर एक जगह पर हमला होता है या नेतृत्व को नुकसान पहुंचता है, तब भी बाकी यूनिट्स अपना काम जारी रखती हैं। यही वजह है कि ईरान से जुड़े अलग-अलग समूह, जैसे लेबनान, इराक या यमन में सक्रिय संगठन, एक साथ कई मोर्चों पर कार्रवाई कर सकते हैं। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

हमलों का लगातार एक जैसा पैटर्न

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला कोई अलग घटना नहीं है। अक्टूबर 2023 के बाद से इराक में अमेरिकी ठिकानों पर ऐसे कई हमले हो चुके हैं। इन हमलों का तरीका भी लगभग एक जैसा है। पहले किसी सिक्योरिटी सिस्टम की पहचान की जाती है, फिर उसे निशाना बनाया जाता है और उसके बाद अगले हमले में उस कमजोरी का फायदा उठाया जाता है। इस मामले में भी पहले रडार सिस्टम को नष्ट किया गया और फिर ड्रोन के जरिए निगरानी की गई।

हालांकि इस हमले की जिम्मेदारी ईरान समर्थित मिलिशिया ने ली है। यह मिलिशिया इराक में सक्रिय है और खुद को “इस्लामिक रेजिस्टेंस” का हिस्सा बताती है।

इनका कहना है कि यह कार्रवाई अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में की गई है। इस पूरे क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है और अलग-अलग जगहों पर ऐसे हमले सामने आ रहे हैं। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

अमेरिकी संसाधनों पर बढ़ रहा दबाव

असिमेट्रिक वारफेयर के कारण अमेरिका के सामने कई तरह की चुनौतियां और असर साफ दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या इंटरसेप्टर की कमी से जुड़ी है। पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम सीमित संख्या में उपलब्ध हैं और लगातार हमलों के चलते इनके स्टॉक पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे हालात में हर छोटे ड्रोन या मिसाइल को रोकने के लिए महंगे इंटरसेप्टर का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे तेजी से संसाधन कम होते हैं। इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र के कई सहयोगी देश भी सीधे तौर पर एस्कॉर्ट मिशन में शामिल होने से हिचक रहे हैं, जिससे जिम्मेदारी और ज्यादा अमेरिका पर आ जाती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

दूसरी बड़ी चुनौती संसाधनों के बंटवारे की है, जिसे बैंडविड्थ ड्रेन कहा जा रहा है। एक तरफ बगदाद में दूतावास और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा करनी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा और वैश्विक सप्लाई चेन को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। इसके अलावा दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बनी हुई है। ऐसे में समय, संसाधन और सैन्य ध्यान कई दिशाओं में बंट जाता है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर पूरा फोकस करना मुश्किल हो जाता है।

हालांकि असिमेट्रिक वारफेयर केवल ड्रोन तक सीमित नहीं है। इसमें कई तरह की रणनीतियां शामिल होती हैं। समुद्र में जहाजों को निशाना बनाना, माइंस बिछाना, छोटे बोट्स के जरिए हमला करना और साइबर या सूचना के माध्यम से दबाव बनाना भी इसी का हिस्सा हैं। फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में जो हालात बने हुए हैं, उनमें भी इस तरह की रणनीति का असर देखा जा रहा है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

वर्ल्ड वॉर-2 में मिली जीत पर नई दिल्ली में बाइक रैली निकालेगा रूस, पढ़ें रूसी सेना का मोटरसाइकिल कनेक्शन

Russia WWII Victory Motorcycle Rally
WWII Victory Motorcycle Rally: Russia to Organise Grand Bike Rally in New Delhi

Russia WWII Victory Motorcycle Rally: नई दिल्ली में द्वितीय विश्व युद्ध में जीत की 81वीं वर्षगांठ के मौके पर एक विशेष मोटरसाइकिल रैली आयोजित की जाएगी। यह आयोजन वर्ल्ड वॉर II विक्ट्री मोटरसाइकिल रैली (WWII Victory Motorcycle Rally) के नाम से किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का आयोजन रूस के दूतावास और नई दिल्ली स्थित रशियन हाउस द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है।

यह रैली 21 मार्च को आयोजित होगी, जिसमें भारत और रूस सहित कई देशों के 300 से अधिक बाइक राइडर्स हिस्सा लेंगे। इस आयोजन में दिल्ली के विभिन्न मोटरसाइकिल ग्रुप भी शामिल होंगे।

Russia WWII Victory Motorcycle Rally: रैली का रूट और कार्यक्रम

इस मोटरसाइकिल रैली का रूट भी खास महत्व रखता है। रैली की शुरुआत रूस के दूतावास से होगी और इसके बाद यह इंडिया गेट और नेशनल वॉर मेमोरियल से होते हुए रशियन हाउस तक पहुंचेगी।

यह रूट उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से चुना गया है, जिन्होंने युद्ध के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी थी। इंडिया गेट और नेशनल वॉर मेमोरियल भारत के शहीद सैनिकों की याद में बनाए गए महत्वपूर्ण स्थल हैं। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

300 से ज्यादा राइडर्स लेंगे हिस्सा

इस कार्यक्रम में भारत और रूस के अलावा अन्य मित्र देशों के भी नागरिक हिस्सा लेंगे। कुल मिलाकर 300 से अधिक मोटरसाइकिल राइडर्स इस रैली में शामिल होंगे।

पिछले वर्ष आयोजित पहली रैली में करीब 100 से 150 राइडर्स ने हिस्सा लिया था। इस बार प्रतिभागियों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

द्वितीय विश्व युद्ध- “ग्रेट पैट्रियॉटिक वॉर”

द्वितीय विश्व युद्ध को रूस में “ग्रेट पैट्रियॉटिक वॉर” के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध 1941 से 1945 के बीच लड़ा गया था। इस दौरान सोवियत संघ के लगभग 2.7 करोड़ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।

रूस में हर साल 9 मई को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह देश के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दिनों में से एक है। नई दिल्ली में आयोजित यह रैली उसी ऐतिहासिक विजय की याद में आयोजित की जा रही है।

रैली के बाद रशियन हाउस में एक विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। इसमें विभिन्न देशों के कलाकार हिस्सा लेंगे और संगीत प्रस्तुति देंगे।

इसके साथ ही नई दिल्ली में आयोजित होने वाली फोटो प्रदर्शनी “Motorcycles in the Service of the Soviet Army” में इसी M-72 और अन्य सैन्य मोटरसाइकिलों की भूमिका को दिखाया जाएगा। इसमें युद्ध के दौरान ली गई पुरानी तस्वीरें, सैनिकों के साथ बाइक्स के दृश्य और उनके उपयोग से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित की जाएगी।

इस प्रदर्शनी का उद्देश्य यह दिखाना है कि कैसे इन मोटरसाइकिलों ने युद्ध के दौरान सेना को तेज, मोबाइल और प्रभावी बनाया। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

सोवियत सेना में मोटरसाइकिलों रहीं बेहद अहम

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत सेना ने मोटरसाइकिलों का जमकर इस्तेमाल किया था। इनका इस्तेमाल सैनिकों के संदेश पहुंचाने, टोही मिशन, हथियार ले जाने और घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जाता था। इस प्रदर्शनी के माध्यम से यह दिखाया जाएगा कि कैसे इन मोटरसाइकिलों ने युद्ध के दौरान सेना की मदद की थी।

खासकर एम-72 मॉडल ने युद्ध के मैदान में सेना की गति और क्षमता को काफी बढ़ाया। यह मोटरसाइकिल सेना के कई महत्वपूर्ण कामों में इस्तेमाल होती थी।

एम-72 की शुरुआत जर्मनी की BMW R71 बाइक से हुई। सोवियत यूनियन ने इस बाइक के कुछ नमूने हासिल किए और फिर अपने इंजीनियरों की मदद से उसी तरह की मोटरसाइकिल तैयार की। 1941 के आसपास इसका उत्पादन शुरू हुआ। यह एक मजबूत और भारी बाइक थी, जिसमें साइडकार लगा होता था। इस साइडकार में सैनिक बैठ सकते थे या हथियार और जरूरी सामान रखा जा सकता था।

इस बाइक का इंजन करीब 750cc का था और यह अच्छी स्पीड के साथ खराब रास्तों पर भी चल सकती थी। इसे खास तौर पर सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, इसलिए इसमें मजबूत फ्रेम, ऊंचे मडगार्ड और हथियार लगाने की सुविधा दी गई थी। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

सोवियत सेना में M-72 का इस्तेमाल कई तरह के कामों के लिए किया जाता था। सबसे पहले इसका उपयोग टोही यानी रिकॉनिसेंस मिशन में होता था। सैनिक इस बाइक पर आगे जाकर दुश्मन की स्थिति का पता लगाते थे और जानकारी वापस लाते थे। इसकी तेज रफ्तार और आसानी से चलने की क्षमता इसे इस काम के लिए बहुत उपयोगी बनाती थी।

इसके अलावा यह मोटरसाइकिल संदेश पहुंचाने के लिए भी इस्तेमाल होती थी। युद्ध के दौरान कई बार रेडियो संपर्क सही तरीके से काम नहीं करता था, ऐसे में सैनिक इन बाइक्स के जरिए जरूरी संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक जल्दी पहुंचाते थे।

M-72 का एक खास उपयोग यह भी था कि इसके साइडकार पर मशीन गन लगाई जा सकती थी। इससे यह एक चलती-फिरती फायरिंग यूनिट बन जाती थी। सैनिक चलते हुए भी दुश्मन पर हमला कर सकते थे। इससे पैदल सेना को काफी मदद मिलती थी। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने और जरूरी सामान सप्लाई करने में भी यह बाइक काम आती थी। साइडकार में घायल सैनिकों को ले जाया जा सकता था या फिर जरूरी दवाइयां और हथियार पहुंचाए जा सकते थे।

इसका इस्तेमाल पेट्रोलिंग और एस्कॉर्ट के लिए भी किया जाता था। कई बार वरिष्ठ अधिकारियों की सुरक्षा के लिए या सड़क पर निगरानी के लिए इन बाइक्स को तैनात किया जाता था।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान M-72 ने सोवियत सेना को तेजी से आगे बढ़ने में मदद की। खासकर बड़े सैन्य अभियानों के दौरान यह बाइक सेना की मूवमेंट को तेज बनाने में काम आई। उस समय जर्मन सेना भी इसी तरह की मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल कर रही थी, इसलिए सोवियत M-72 ने मुकाबले में बराबरी बनाए रखने में मदद की। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

Russia WWII Victory Motorcycle Rally

कई देशों के राजनयिकों होंगे शामिल

इस कार्यक्रम में 10 से अधिक देशों के राजनयिकों के शामिल होने की संभावना है। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और मित्रता का भी प्रतीक माना जा रहा है।

रैली के लिए सुबह के समय रूस दूतावास के पास सभी बाइकर्स जुटेंगे, इसके बाद निर्धारित समय पर रैली को रवाना किया जाएगा।

प्रतिभागियों के लिए सुरक्षा नियम भी तय किए गए हैं। सभी राइडर्स को हेलमेट और अन्य सुरक्षा उपकरण पहनना अनिवार्य होगा। इसके अलावा ट्रैफिक नियमों का पालन करना भी जरूरी होगा।

रैली में हिस्सा लेने वाले सभी प्रतिभागियों को आयोजकों की ओर से स्मृति चिन्ह भी दिए जाएंगे। यह आयोजन को यादगार बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। इस पूरे कार्यक्रम का मकसद द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास को याद करने और शहीदों को श्रद्धांजलि देने का कोशिश है। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)