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Republic Day 2025: इस बार गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार दिखेगी परमाणु हथियार ले जाने वाली यह खास मिसाइल, पाकिस्तान-चीन के छूटेंगे पसीने

Republic Day 2025: Pralay Missile Makes Its Grand Debut

Republic Day 2025: गणतंत्र दिवस परेड 2025 इस बार कई मायनों में खास होने जा रही है। इस ऐतिहासिक मौके पर स्वदेशी रूप से विकसित ‘प्रलय’ मिसाइल (Pralay Missile) को पहली बार कर्तव्यपथ पर प्रदर्शित किया जाएगा। रक्षा सचिव आर.एस. सिंह ने सोमवार को मीडिया से बातचीत के दौरान इसकी पुष्टि की।

Republic Day 2025: Pralay Missile Makes Its Grand Debut

Republic Day 2025: प्रलय मिसाइल की रेंज 150 से 500 किलोमीटर 

‘प्रलय’ मिसाइल (Pralay Missile) भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित एक शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (एसआरबीएम) है। यह सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल है, जिसकी रेंज 150 से 500 किलोमीटर तक है। अग्नि-V की तरह इसकी ‘बड़ी बहन’ 5,500 किलोमीटर की लंबी दूरी को निशाना बनाती है। कैनिस्टराइज्ड डिज़ाइन और सॉलिड प्रोपेलेंट मोटर और से लैस यह मिसाइल तेज़ी से लॉन्च होने की क्षमता रखती है।

प्रलय मिसाइल को आधुनिक युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया गया है। इसके अलावा, ‘प्रलय’ में दुश्मन के पारंपरिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा देने की क्षमता है। यह मिसाइल अपनी उड़ान के दौरान दिशा बदल सकती है, जिससे इसे रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

Republic Day 2025: गणतंत्र दिवस परेड में क्या होगा खास

इस बार परेड में ब्रह्मोस मिसाइल, बहु-बैरल रॉकेट लॉन्चर, टी-90 टैंक, और नाग मिसाइल जैसे अन्य प्रमुख हथियार भी प्रदर्शित किए जाएंगे। हालाँकि, ‘तेजस’ लड़ाकू विमान और ‘ध्रुव’ हेलीकॉप्टर परेड में शामिल नहीं होंगे। अधिकारियों के अनुसार, हाल ही में हुई एक दुर्घटना के बाद ‘ध्रुव’ हेलीकॉप्टर की जांच चल रही है, जिस कारण इन्हें शामिल करना संभव नहीं हो पाया।

Republic Day 2025: गणतंत्र दिवस पर दर्शक इस बार हो सकते हैं मायूस, फ्लाईपास्ट में नहीं सुनाई देगी LCA तेजस और ALH की गड़गड़ाहट

परेड सुबह 10:30 बजे शुरू होगी, जिसमें एक लाख से ज़्यादा लोग शामिल होंगे, जिनमें 77,000 आमंत्रित और 32,000 टिकट धारक शामिल होंगे। पूरे भारत से 10,000 ख़ास मेहमान भी इस समारोह के साक्षी बनेंगे। 90 मिनट की परेड में 31 झांकियां शामिल होंगी, जिनमें 16 राज्यों की और 15 केंद्रीय मंत्रालयों की होंगी। परेड में भाग लेने के लिए पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और चंडीगढ़ की झांकियां चुनी गई हैं। देश के संविधान की 75वीं वर्षगांठ और सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में विशेष झांकियां भी प्रदर्शित की जाएंगी। इसके अलावा, परेड के दौरान 300 सांस्कृतिक कलाकारों का एक समूह भी अपनी कला का प्रदर्शन करेगा।

गणतंत्र दिवस परेड में तीनों सेनाओं की टुकड़ी शामिल होगी, जो सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच एकता का प्रतीक होगी। नौसेना भी अपनी समर्पित झांकी पेश करेगी।

इंडोनेशियाई बैंड होगा शामिल

इस वर्ष परेड में इंडोनेशिया से आए 160 मार्चर्स और 190 बैंड सदस्यों का दल भी शामिल होगा। इसके अलावा, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो इस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे। यह साझेदारी भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच मज़बूत होते संबंधों की झलक दिखाती है।

ALH Dhruv: रक्षा सचिव बोले- ध्रुव हेलीकॉप्टर के बेड़े का ग्राउंड होना आर्म्ड फोर्सेस के लिए ‘बड़ा झटका’, ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर पड़ रहा असर

ALH Dhruv Grounding a 'Major Setback' for Armed Forces: Defence Secretary

ALH Dhruv: भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल के लिए अहम भूमिका निभाने वाले एडवांस लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर (ALH) ध्रुव की 330 हेलिकॉप्टरों वाला फ्लीट पिछले 15 दिनों से ग्राउंडेड है। वहीं, ध्रुव के ग्राउंड होने फैसले से आर्म्ड फोर्सेस की ऑपरेशनल क्षमताओं पर भी गहरा असर पड़ा है। देश के रक्षा सचिव आरके सिंह ने इसे ‘आर्म्ड फोर्सेस के लिए एक बड़ा झटका’ करार दिया है।

ALH Dhruv Grounding a 'Major Setback' for Armed Forces: Defence Secretary
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh

सोमवार को मीडिया को संबोधित करते हुए रक्षा सचिव ने बताया कि 15 दिनों से जारी सुरक्षा जांच के कारण ध्रुव हेलिकॉप्टर इस साल गणतंत्र दिवस परेड में शामिल नहीं हो पाएगा। यह फैसला 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर हवाई अड्डे पर तटरक्षक बल के एक ध्रुव एमके III हेलिकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद लिया गया, जिसमें तीन कर्मियों की मौत हो गई थी। इस बार एएलएच बेड़ा गणतंत्र दिवस परेड के फ्लाईपास्ट का हिस्सा बनने वाला था।

आरके सिंह ने कहा, “ध्रुव हेलिकॉप्टर बेड़े की ग्राउंडिंग से ऑपरेशन्स में कुछ दिक्कतें आई हैं। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) फिलहाल उसकी सुरक्षा जांच में जुटा है। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि जल्द ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा। हालांकि, यह तय है कि यह बेड़ा गणतंत्र दिवस परेड तक संचालन में वापस नहीं आएगा।”

साथ ही, रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि इस बार परेड में 39 विमान हिस्सा लेंगे और 12 फॉर्मेशंस बनाई जाएंगे। उन्होंने बताया कि कुल 77,000 लोग इस बार रिपब्लिक डे की परेड को देखेंगे, जिनमें 32,000 लोग टिकट खरीद चुके हैं।

वहीं, ध्रुव हेलिकॉप्टर (ALH Dhruv) के ग्राउंड होने आर्म्ड फोर्सेज की चुनौतियां बढ़ गई हैं। सेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल इस हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल बड़े स्तर पर अपने ऑपरेशंस के लिए करते रहे हैं। लेकिन इसके ग्राउंड होने के बाद उन्हें दूसरे  हेलिकॉप्टरों पर निर्भर होना पड़ रहा है।

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सेना के एक अधिकारी ने इसे “गंभीर स्थिति” बताते हुए कहा कि ध्रुव हेलिकॉप्टर की गैरमौजूदगी ने लॉजिस्टिक्स, सैनिकों की आवाजाही और नियमित अभियानों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। उन्होंने कहा, “हमने अन्य हेलिकॉप्टरों का सहारा लिया है, लेकिन ध्रुव हेलिकॉप्टर के न होने से ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर सीधा असर पड़ रहा है।”

वहीं, नौसेना और तटरक्षक बल भी ध्रुव री ग्राउंडिंग से प्रभावित हुए हैं। समुद्री खोज और बचाव अभियानों तथा गश्ती संचालन में रुकावट आई है। ध्रुव हेलिकॉप्टर का उपयोग निगरानी से लेकर मानवीय सहायता तक, कई तरह के मिशनों के लिए किया जाता है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव हेलिकॉप्टर बेड़े को इस तरह से ग्राउंड करना पड़ा हो। 2023 में भी नौसेना के एक दुर्घटना के बाद बेड़े को अस्थायी रूप से ग्राउंड किया गया था। तब दिक्कतों का समाधान करने के बाद हेलिकॉप्टरों को फिर से ऑपरेशन में लाया गया था।

Dhruv choppers: सेना दिवस परेड में स्वदेशी ALH ध्रुव और रूद्र ने नहीं भरी उड़ान, रिपब्लिक डे पर भी फ्लाईपास्ट से हो सकते हैं बाहर

हालांकि, इस बार सुरक्षा जांच अभी पूरी नहीं हुई है और HAL ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह प्रक्रिया कब तक पूरी होगी। इस बार की ग्राउंडिंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ध्रुव जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म की मेंटेनेंस प्रोटोकॉल को और मजबूत करने और सुरक्षा जांच के लिए समय सीमा तय करने की आवश्यकता है।

सेना के के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमारे लिए यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि हमारी क्षमता और ऑपरेशन किसी भी तकनीकी कमी के चलते प्रभावित न हो। इससे सीख लेकर हमें अपने प्रोटोकॉल और प्रणालियों को बेहतर बनाने की दिशा में काम करना होगा।”

Republic Day 2025 पर नहीं दिखेंगे LCA और ALH Dhruv

इस साल गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय वायुसेना के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA तेजस और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और रुद्र शामिल नहीं होंगे। तेजस को परेड में शामिल न करने का निर्णय भारतीय वायुसेना की नई नीति के तहत लिया गया है, जिसमें सिंगल-इंजन जेट्स को परेड के फ्लाईपास्ट से दूर रखने का प्रावधान है।

इसके साथ ही, एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का पूरा बेड़ा हाल ही में हुई दुर्घटनाओं के बाद फ्लाइट सेफ्टी जांच के कारण ग्राउंड कर दिया गया है। गौरतलब है कि ALH ध्रुव और रुद्र ने इसी महीने 15 जनवरी को आयोजित सेना दिवस परेड में भी हिस्सा नहीं लिया था। परेड में इनकी जगह चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया था।

सेना प्रमुख ने कही थी ये बात

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पुणे में आयोजित 77वें सेना दिवस परेड के दौरान ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर को लेकर कहा था, “ध्रुव हेलीकॉप्टर ने 2023-24 में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है, और इस दौरान केवल एक बार तकनीकी गड़बड़ी हुई। यह हेलीकॉप्टर 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। हमें इस प्लेटफॉर्म पर 100% भरोसा है।”

Daredevils: भारतीय सेना के डेयरडेविल्स ने बनाया नया वर्ल्ड रिकॉर्ड, कर्तव्य पथ पर दिखाए अद्भुत करतब

Daredevils: Indian Army Sets New World Record with Stunning Feat at Kartavya Path

Daredevils: भारतीय सेना की मोटरसाइकिल राइडर डिस्प्ले टीम “डेयरडेविल्स” ने 20 जनवरी 2025 को कर्तव्य पथ, नई दिल्ली पर अद्वितीय प्रदर्शन करते हुए चलती मोटरसाइकिलों पर सबसे ऊंचे मानव पिरामिड का विश्व रिकॉर्ड बनाया। यह पिरामिड 20.4 फीट ऊंचा था और इसमें 7 मोटरसाइकिलों पर 40 सैनिकों ने हिस्सा लिया। इस अद्वितीय प्रदर्शन ने विजय चौक से इंडिया गेट तक 2 किलोमीटर की दूरी तय की।

Daredevils: Indian Army Sets New World Record with Stunning Feat at Kartavya Path

डेयरडेविल्स, जो भारतीय सेना के कोर ऑफ सिग्नल्स से संबंधित है, ने अपने शानदार प्रदर्शनों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। इस नई उपलब्धि के साथ, टीम के नाम अब तक के 33 विश्व रिकॉर्ड हो चुके हैं। इनमें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज उपलब्धियां शामिल हैं।

कार्यक्रम के समापन पर सिग्नल्स फ्रेटरनिटी और कोर ऑफ सिग्नल्स के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल केवी कुमार ने इंडिया गेट पर टीम को झंडी दिखाकर सम्मानित किया। इस मौके पर भारी उत्साह और जोश के साथ टीम की सराहना की गई। यह प्रदर्शन केवल एक रिकॉर्ड नहीं था, बल्कि भारतीय सेना की दक्षता, आत्मविश्वास और अद्वितीय कौशल का प्रतीक था।

डेयरडेविल्स टीम की शुरुआत 1935 में हुई थी। तब से लेकर अब तक टीम ने भारत भर में 1,600 से अधिक मोटरसाइकिल प्रदर्शन किए हैं। इनमें गणतंत्र दिवस परेड, सेना दिवस परेड और कई सैन्य कार्यक्रम शामिल हैं। हर प्रदर्शन के साथ, टीम ने दर्शकों को रोमांचित किया और भारतीय सेना की बहादुरी और तकनीकी कौशल को प्रदर्शित किया।

Tashi Namgyal: करगिल जंग के हीरो ताशी नामग्याल को मरणोपरांत सेना ने दिया बड़ा सम्मान, वॉर मेमोरियल में इस तरह दी खास जगह

Tashi Namgyal: Kargil Hero Honoured with Special Place at War Memorial

Tashi Namgyal: 15 जनवरी 2025 को भारतीय सेना ने 77वें सेना दिवस के अवसर पर ताशी नामग्याल को श्रद्धांजलि अर्पित की। लद्दाख के आर्यन घाटी के गार्कोन गांव के निवासी ताशी नामग्याल ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन की घुसपैठ की जानकारी देकर भारतीय सेना को एक निर्णायक बढ़त दिलाई थी। सेना ने इस वीर नायक की स्मृति को अमर बनाने के लिए बियामाह वॉर मेमोरियल पर एक स्मृति पट्टिका स्थापित की। रक्षा समाचार.कॉम ने उनके निधन की खबर सबसे पहले छापी थी। साथ ही, इस साल सेना दिवस के मौके पर सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी से एक स्मारक बनवाने की अपील की थी, तो उन्होंने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही इस पर कार्रवाई होगी।

Tashi Namgyal: Kargil Hero Honoured with Special Place at War Memorial

17 दिसंबर 2024 को, ताशी नामग्याल का निधन उनके पैतृक गांव गार्कोन में हो गया। उनके परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटी और दो बेटे हैं। भारतीय सेना ने उनके परिवार को हरसंभव समर्थन देने का वादा किया है और इसे उनकी देशभक्ति के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा रहा है।

1999 के मई महीने में ताशी नामग्याल ने अपने गांव के आसपास चरते हुए अपने याक को खोजते समय जुबेर रिज पर कुछ लोगों को देखा, जो काले पठानी सूट में बंकर बना रहे थे। अपनी गहरी समझ और सतर्कता के चलते उन्होंने हालात की गंभीरता को पहचाना और तुरंत भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी दी। उनकी इस जानकारी ने सेना को तेजी से जवाबी कार्रवाई करने में मदद की, जिसने अंततः कारगिल विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Tashi Namgyal: नहीं रहे करगिल जंग के गुमनाम हीरो ताशी नामग्याल, जिन्होंने सबसे पहले दी थी पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की खबर

कारगिल युद्ध के बाद भी, ताशी नामग्याल अपने गांव और समुदाय के लिए प्रेरणा बने रहे। उन्होंने अक्सर भारतीय सेना के कार्यों और कारगिल युद्ध की कहानियां सुनाकर लोगों को प्रेरित किया। वे 2024 में कारगिल विजय दिवस की 25वीं वर्षगांठ समारोह में भी शामिल हुए थे।

Tashi Namgyal: सेना ने दी श्रद्धांजलि

सेना दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने बियामाह वॉर मेमोरियल पर ताशी नामग्याल की स्मृति में एक पट्टिका स्थापित की। इस समारोह में उनके परिवार, स्थानीय नागरिकों और सैन्य अधिकारियों ने भाग लिया। यह न केवल उनके साहस को सम्मानित करने का अवसर था, बल्कि उनके योगदान को देश के सामने लाने का भी एक प्रयास था।

इसके अलावा, भारतीय सेना ने उनके पैतृक गांव गारकोन में उनकी एक प्रतिमा स्थापित करने की योजना बनाई है। यह प्रतिमा उनके बलिदान और देशभक्ति की स्थायी यादगार होगी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी।

भारतीय सेना ने इस अवसर पर कहा, “ताशी नामग्याल की निष्ठा और देशभक्ति का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। उनका योगदान हमें यह याद दिलाता है कि देश की सुरक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।”

कैसे बने Tashi Namgyal कारगिल युद्ध के नायक?

2024 में करगिल युद्ध की 25वीं वर्षगांठ पर ताशी नामग्याल से मुलाकात के दौरान उन्होंने अपनी खिन्नता जाहिर की। उनका कहना था कि सरकार ने उनके योगदान को न तो सराहा और न ही उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए कोई कदम उठाया। उन्होंने बताया, “हमने देश के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन हमें आज भी गुमनामी का जीवन जीना पड़ रहा है। हमारी गरीबी का किसी ने ध्यान नहीं दिया।”

ताशी नामग्याल ने बताया था कि मई 1999 में, जब उनकी उम्र 35 साल थी, वे अपने याक ढूंढने गरखुन नाला की ओर गए। वहां उन्होंने बर्फ पर कुछ अजीब निशान देखे। यह असामान्य था, क्योंकि वह क्षेत्र आमतौर पर निर्जन रहता था। उन्होंने अपने भाई मोरुप त्सेरिंग के साथ दूरबीन से देखा तो कुछ लोग काले पठानी कपड़ों में बंकर बनाते हुए दिखाई दिए।

यह संदिग्ध गतिविधि देखकर वे तुरंत निकटतम सेना चौकी पर गए और वहां तैनात बारा साहब को इसकी सूचना दी। शुरुआती संदेह के बावजूद, सेना ने उनकी बात को गंभीरता से लिया। एक दिन बाद, सेना के अधिकारी उनके साथ इलाके में गए।

सेना को घुसपैठ का सबूत कैसे मिला?

जब सेना ताशी और उनके भाई के साथ 5 किलोमीटर दूर गरखुन नाला पहुंची, तो उन्होंने घुसपैठियों को अपनी आंखों से देखा। इसके बाद ताशी ने सेना को इलाके के दुर्गम रास्तों की सटीक जानकारी दी और यह भी बताया कि घुसपैठिए कहां-कहां बंकर बना रहे हैं।

उन्होंने दाह नाले का भी रास्ता दिखाया, जहां घुसपैठियों ने भारी मात्रा में गोला-बारूद और हथियार जमा कर रखे थे। उनकी सतर्कता और मार्गदर्शन के कारण सेना ने न केवल दुश्मन की गतिविधियों का खुलासा किया, बल्कि समय रहते रणनीतिक कदम उठाने में सक्षम हुई।

करगिल युद्ध में बने पोर्टर

युद्ध के दौरान, ताशी ने भारतीय सेना के लिए कुली यानी पोर्टर के तौर पर भी काम किया। उन्होंने रसद और हथियार पहुंचाने में मदद की। उनकी बहादुरी ने भारतीय सेना को न केवल रणनीतिक बढ़त दी, बल्कि दुश्मन की साजिशों को विफल करने में भी मदद की।

अपने इतने बड़े योगदान के बावजूद, ताशी नामग्याल ने हमेशा सादगी से जीवन बिताया। वे भेड़ और याक चराने के साथ-साथ अन्य छोटे-मोटे काम करके अपनी आजीविका चलाते रहे। उनके कपड़े और हाथों पर मिट्टी के निशान उनकी कठिनाइयों की कहानी बयां करते थे। ताशी ने कभी अपने योगदान को लेकर बड़ा दावा नहीं किया। उनके लिए देशभक्ति ही सबसे बड़ी पहचान थी।

Explainer Bhargavastra: महाभारत काल का यह हथियार अब भारतीय सेनाओं की बनेगा ‘रीढ़’, दुश्मन के ड्रोनों का होगा सर्वनाश

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Explainer Bhargavastra: भारत ने हाल ही में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। महाभारत के प्रसिद्ध दिव्यास्त्रों से प्रेरणा लेते हुए भारत ने अत्याधुनिक काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित किया है, जिसे भार्गवास्त्र नाम दिया गया है। भार्गवास्त्र का नाम महर्षि परशुराम द्वारा उपयोग किए गए शक्तिशाली दिव्यास्त्र से लिया गया है। महाभारत में वर्णित दिव्यास्त्रों में से एक, भार्गवास्त्र, अपनी अद्वितीय शक्ति और विनाशकारी क्षमताओं के लिए प्रसिद्ध है। यह नया भार्गवास्त्र न केवल देश के डिफेंस सिस्टम को मजबूत करेगा, बल्कि फ्यूचर वारफेयर में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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भार्गवास्त्र को सोलर ग्रुप और इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड (EEL) ने मिल कर डेवलप किया है। यह एक माइक्रो-मिसाइल आधारित काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे दुश्मन के ड्रोन्स और स्वार्म ड्रोन्स (झुंड में उड़ने वाले ड्रोन्स) को पहचानने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। हाल के युद्धों में स्वार्म ड्रोन्स बड़े खतरे के रूप में उभरे हैं।

Explainer Bhargavastra: कैसा है भार्गवास्त्र?

भार्गवास्त्र एक मल्टी-लेयर काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जो माइक्रो-मिसाइल तकनीक पर बेस्ड है। यह सिस्टम दुश्मन के छोटे और स्वार्म ड्रोन्स को पहचानने और नष्ट करने में सक्षम है। इसकी खासियत यह है कि यह 6 किलोमीटर की दूरी तक ड्रोन का पता लगा सकता है और 64 माइक्रो-मिसाइलों को एक साथ फायर करने की क्षमता रखता है। इसकी सॉफ्ट-किल तकनीक ड्रोन के नेविगेशन और कम्यूनिकेशन सिस्टम को जाम कर देती है, जबकि हार्ड-किल सिस्टम ड्रोन को पूरी तरह से बरबाद कर देता है।

यह सिस्टम 5,000 मीटर तक की ऊंचाई पर भी तैनात किया जा सकता है, जिससे यह दुर्गम इलाकों में भी ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है। यह मोबाइल प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिससे इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिस्टम भारत के लिए एक बड़े रणनीतिक सुरक्षा उपाय के रूप में उभरेगा।

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Explainer Bhargavastra: कैसे काम करता है भार्गवास्त्र?

भार्गवास्त्र को दुश्मन के ड्रोन और अन्य हवाई खतरों को पहचानने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह पूरी तरह से ऑटोमैटिक सिस्टम है, यानी कि इसे किसी मनुष्य द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है। जब कोई ड्रोन इसकी रडार सीमा में आता है, तो यह तुरंत उसे पहचान लेता है। इसके बाद, यह तय करता है कि हार्ड-किल या सॉफ्ट-किल तकनीक का उपयोग करना है।

इसकी C4I कमांड और कंट्रोल प्रणाली रडार के माध्यम से 10 किलोमीटर तक बड़े UAVs और 6 किलोमीटर तक छोटे ड्रोन्स का पता लगा सकती है। इसके EO/IR सिस्टम (इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड) कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले लक्ष्यों को भी ट्रैक करने में सक्षम हैं। यह प्रणाली खासतौर पर स्वार्म ड्रोन का सामना करने के लिए तैयार की गई है, जो सामान्य जामिंग तकनीकों से बच सकते हैं। भार्गवास्त्र का मोबाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म एक समय में 16 मिसाइलों को कैरी कर सकता है, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी में बढ़ोतरी होती है।

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भार्गवास्त्र का नाम महाभारत के महर्षि परशुराम के भार्गवास्त्र से लिया गया है। यह नाम इसके उद्देश्य को दर्शाता है, शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। इस आधुनिक प्रणाली ने 12 और 13 जनवरी, 2025 को अपने पहले ट्रायल्स में शानदार प्रदर्शन किया। गंजम, ओडिशा के गोपालपुर सीवर्ड फायरिंग रेंज में इसे ट्रायल के लिए तैनात किया गया था। पहले परीक्षण में, 2,500 मीटर दूर और 400 मीटर की ऊंचाई पर एक इलेक्ट्रॉनिक टारगेट पर मिसाइल ने सटीक निशाना लगाया। दूसरे परीक्षण में, एक चलते हुए इलेक्ट्रॉनिक UAV मिमिक को सफलतापूर्वक नष्ट किया।

क्या यह भारत का आयरन डोम है?  

भार्गवास्त्र को कई विशेषज्ञ भारत का आयरन डोम बता ररहे हैं। आयरन डोम इजरायल का प्रसिद्ध रक्षा प्रणाली है, जो मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में सक्षम है। भार्गवास्त्र भी इसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है और इसे स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है।

आधुनिक युद्ध में भार्गवास्त्र है जरूरी

आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन का उपयोग तेजी से बढ़ा है। हाल के वर्षों में अजरबैजान-आर्मेनिया और यूक्रेन-रूस जैसे युद्धों में ड्रोन तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई है। स्वार्म ड्रोन का उपयोग करते हुए दुश्मन बड़ी संख्या में हमले कर सकते हैं, जिन्हें रोकने के लिए पारंपरिक डिफेंस सिस्टम काफी नहीं हैं। हर साल 100,000 से ज़्यादा ड्रोन तैनात किए जाते हैं, जिनका मुकाबला अक्सर महंगी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से किया जाता है। भार्गवस्त्र दुश्मन के यूएवी को बेअसर करने के लिए एक किफायती और प्रभावी विकल्प प्रदान करता है।

भार्गवास्त्र इस चुनौती का समाधान प्रदान करता है। यह तकनीक दुश्मन के ड्रोन्स को कम लागत और उच्च दक्षता के साथ नष्ट कर सकती है। इसकी मोबाइल और स्वचालित क्षमताएं इसे किसी भी युद्धक्षेत्र के लिए उपयुक्त बनाती हैं। क्योंकि ड्रोन्स का बढ़ता इस्तेमाल भविष्य के युद्धक्षेत्र की वास्तविकता है। ऐसे में भार्गवास्त्र जैसे सिस्टम भारत की सुरक्षा को न केवल मजबूत बनाएंगे, बल्कि यह भारतीय सेनाओं को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करेंगे।

Republic Day 2025: गणतंत्र दिवस पर दर्शक इस बार हो सकते हैं मायूस, फ्लाईपास्ट में नहीं सुनाई देगी LCA तेजस और ALH की गड़गड़ाहट

Republic Day 2025: LCA Tejas, ALH to Miss Flypast, May Disappoint Spectators

Republic Day 2025: 26 जनवरी 2025 को भारत अपना 76वां गणतंत्र दिवस (Republic Day 2025) मनाने जा रहा है। हर साल की तरह इस बार भी राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, पर भव्य परेड का आयोजन होगा। परेड में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की ताकत और संस्कृति की झलक दिखाई जाएगी। हालांकि, इस बार कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जो चर्चा का विषय बने हुए हैं।

Republic Day 2025: LCA Tejas, ALH to Miss Flypast, May Disappoint Spectators

इस साल की परेड में भारतीय वायुसेना और तीनों सेनाओं के कुल 40 विमान हिस्सा लेंगे। इनमें 22 फाइटर जेट्स, 11 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और 7 हेलीकॉप्टर्स शामिल होंगे। इसके अलावा, भारतीय तटरक्षक बल के तीन डोर्नियर एयरक्राफ्ट भी हिस्सा लेंगे, जो “रक्षक” फॉर्मेशन का प्रदर्शन करेंगे। यह फ्लाईपास्ट देश की ताकत और तकनीकी क्षमता को दिखाता है, जिसे हर साल लाखों लोग टीवी और सोशल मीडिया पर देखते हैं।

Republic Day 2025: क्या दिखेगा, क्या नहीं

इस बार की परेड में भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA तेजस और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और रुद्र नजर नहीं आएंगे। तेजस को शामिल न करने का फैसला भारतीय वायुसेना की नीतियों के तहत लिया गया है, जिसमें सिंगल-इंजन जेट्स को गणतंत्र दिवस की परेड में उड़ान भरने से रोका गया है। इसके साथ ही, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का पूरा बेड़ा हालिया दुर्घटनाओं के बाद फ्लाइट सेफ्टी जांच के लिए ग्राउंड किया गया है। एएलएच ध्रुव और रूद्र ने 15 दिसंबर को हुई सेना दिवस परेड में भी हिस्सा नहीं लिया था।

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Republic Day 2025: भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की कोई अलग झांकी नहीं

इस बार भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की कोई अलग झांकी नहीं होगी। इसके बजाय, एक त्रि-सेवा झांकी (Tri-Service Tableau) प्रस्तुत की जाएगी, जिसमें तीनों सेनाओं के संयुक्त शक्ति और समन्वय को दर्शाया जाएगा। इससे पहले हर साल तीनों सेनाओं की अलग-अलग झांकियां परेड का हिस्सा होती थीं, जो उनके स्पेशल ऑपरेशंस और तकनीकी क्षमताओं की झलक देती थीं।

हालांकि, परेड में अलग-अलग सेनाओं की झांकियां न होने से कुछ लोगों को कमी महसूस हो सकती है। पिछले सालों में, इन झांकियों ने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के विशेष अभियानों और उपलब्धियों को दर्शाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

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भारतीय वायुसेना ने इस बार गणतंत्र दिवस परेड में अपनी नीति में बदलाव करते हुए सिंगल इंजन वाले विमानों को फ्लाईपास्ट से अलग रखने का फैसला किया है। तेजस जैसे अत्याधुनिक विमान की अनुपस्थिति का कारण भी यही है। ALH हेलीकॉप्टरों की अनुपस्थिति उनके हालिया सुरक्षा निरीक्षण और ग्राउंडिंग के कारण है, जो उनकी तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।

Republic Day 2025: कर्तव्य पथ पर हवाई ताकत का प्रदर्शन

इस बार परेड में कुल 40 विमानों का फ्लाईपास्ट किया जाएगा। इनमें फाइटर जेट्स, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स शामिल हैं। राजपथ के ऊपर आसमान में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान जैसे राफेल, सुखोई-30MKI और जगुआर जैसे विमान अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगे। यह फ्लाईपास्ट भारतीय वायुसेना की ताकत और क्षमता को प्रदर्शित करेगा।

फ्लाईपास्ट में इस बार भारतीय तटरक्षक बल के तीन डोर्नियर विमान भी हिस्सा लेंगे। ये विमान “रक्षक” फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे, जो समुद्री सुरक्षा में तटरक्षक बल की भूमिका को दर्शाएंगे।

Indian Navy MRSAM: भारतीय नौसेना को मिलेगी स्वदेशी मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलों की ताकत, रक्षा मंत्रालय और BDL के बीच हुआ 2,960 करोड़ रुपये का समझौता

Indian Navy MRSAM: Rs 2,960 Crore Deal Inked Between MoD and BDL for Indigenous Missiles

Indian Navy MRSAM: भारतीय रक्षा मंत्रालय (MoD) ने आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। मंत्रालय ने भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के साथ लगभग 2,960 करोड़ रुपये के समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल्स (MRSAM) की आपूर्ति की जाएगी। यह करार 16 जनवरी, 2025 को रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में नई दिल्ली में हुआ।

Indian Navy MRSAM: Rs 2,960 Crore Deal Inked Between MoD and BDL for Indigenous Missiles

यह मिसाइल सिस्टम भारतीय नौसेना के कई युद्धपोतों पर स्टैंडर्ड फिट किया जाएगा और भविष्य में आने वाले अधिकांश जहाजों पर भी इसका इस्तेमाल होगा। इस समझौते को भारतीय रक्षा क्षेत्र की ताकत बढ़ाने और एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी के स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

Indian Navy MRSAM: रक्षा मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि MRSAM सिस्टम ‘बाय (इंडियन)’ श्रेणी के तहत खरीदा जाएगा। इसका अर्थ है कि अधिकांश सामग्री और प्रौद्योगिकी स्वदेशी होगी। इस परियोजना से रक्षा उद्योग, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), में लगभग 3.5 लाख मानव-दिवस (मैनडेज़) का रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।

MRSAM सिस्टम को नौसेना के युद्धपोतों की वायु रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मिसाइल सिस्टम दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों को प्रभावी ढंग से रोकने और नष्ट करने में सक्षम है। भारतीय नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि यह प्रणाली युद्धपोतों की सुरक्षा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी और ऑपरेशनल क्षमता में सुधार करेगी।

यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने का एक और उदाहरण है। सरकार का उद्देश्य उन्नत तकनीक और स्वदेशी विकास के जरिए भारत को रक्षा उत्पादक देशों की श्रेणी में अग्रणी बनाना है। BDL की भूमिका इस योजना में अहम है, क्योंकि कंपनी ने कई अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियां विकसित की हैं जो भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की जरूरतों को पूरा करती हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत के रक्षा उद्योग के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है। MRSAM सिस्टम की सप्लाई से न केवल नौसेना को मजबूती मिलेगी, बल्कि यह परियोजना स्वदेशी अनुसंधान और विकास के लिए भी एक प्रेरणा बनेगी। इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले उपकरण और प्रौद्योगिकी भारतीय कंपनियों द्वारा प्रदान की जाएंगी, जिससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

इस समझौते के तहत BDL मिसाइलों की सप्लाई के साथ-साथ उनके रखरखाव और समर्थन के लिए भी जिम्मेदार होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि MRSAM का स्वदेशी उत्पादन भारत की युद्धक क्षमताओं को न केवल वर्तमान में बल्कि भविष्य में भी मजबूत करेगा।

रक्षा क्षेत्र में यह कदम भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस समझौते से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक उत्पादक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

Indian Navy MRSAM: क्या है मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (MRSAM)?

मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (MRSAM) भारतीय नौसेना के लिए एक अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली है, जिसे दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह प्रणाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के सहयोग से स्वदेशी रूप से विकसित की गई है।

  • MRSAM 70 किलोमीटर तक की रेंज में दुश्मन के विमानों, मिसाइलों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन जैसे हवाई खतरों को प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकती है।
  • यह प्रणाली आधुनिक रडार, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, और सक्रिय इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार से लैस है।
  • MRSAM का रेस्पॉन्स टाइम बेहद तेज़ है, जो इसे अचानक होने वाले खतरों को तुरंत रोकने में सक्षम बनाता है।
  • यह मिसाइल पूरी तरह से भारत में डिजाइन और विकसित की गई है।
  • यह प्रणाली एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक और नष्ट करने की क्षमता रखती है।
  • MRSAM एक स्मार्ट लॉन्च यूनिट से लैस है, जो इसे तेजी से तैनात और पुनः लोड करने में सक्षम बनाती है।
  • MRSAM उच्च सटीकता के साथ लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम है, जिससे यह दुश्मन के किसी भी हवाई खतरे का प्रभावी जवाब दे सकती है।
  • यह मिसाइल सिस्टम नौसेना के जहाजों पर आसानी से फिट किया जा सकता है और समुद्री युद्ध की विभिन्न परिस्थितियों में ऑपरेट करने में सक्षम है।

ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के इस वर्कहॉर्स को लेकर आर्मी चीफ ने कही ये बड़ी बात, पांच साल में हो चुके हैं 15 क्रैश

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ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन अटैक हेलीकॉप्टर रुद्र पर हाल के हादसों के बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सेना दिवस परेड में इन हेलीकॉप्टरों की गैरमौजूदगी ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भरोसा दिलाते हुए कहा है कि ALH ध्रुव भारतीय सेना का ‘वर्कहॉर्स’ है और रहेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन हेलीकॉप्टरों की फ्लाइंग सेफ्टी सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है।

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जनरल द्विवेदी ने पुणे में आयोजित 77वें सेना दिवस परेड के मौके पर कहा, “ध्रुव हेलीकॉप्टर ने 2023-24 में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है। इस दौरान केवल एक बार तकनीकी गड़बड़ी हुई। यह हेलीकॉप्टर कठिन इलाकों में 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक काम कर रहा है। हमें इस प्लेटफॉर्म पर 100% भरोसा है।”

ALH Dhruv Crash: सेना दिवस परेड में नहीं शामिल हुआ ध्रुव

हालांकि, सेना दिवस परेड में ALH और रुद्र हेलीकॉप्टरों का शामिल न होना कई सवाल खड़े करता है। सेना दिवस परेड में चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया था। आर्मर्ड फोर्सेज ने हाल ही में इन हेलीकॉप्टरों की उड़ानों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर में तटरक्षक बल का एक ALH ध्रुव दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की जान चली गई थी।

रिपब्लिक डे परेड में नहीं होंगे शामिल!

गणतंत्र दिवस के फ्लाईपास्ट में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के हेलीकॉप्टर हिस्सा लेते हैं, लेकिन इस बार ध्रुव हेलीकॉप्टरों की भागीदारी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अधिकारियों के अनुसार, तटरक्षक बल के तीन ALH हेलीकॉप्टर फ्लाईपास्ट का हिस्सा बनने वाले थे, लेकिन हाल की दुर्घटनाओं के चलते इन्हें शामिल करने पर संशय है। ऐसी अटकलें हैं कि उनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं। फिलहाल, गणतंत्र दिवस पर ध्रुव हेलीकॉप्टरों के शामिल होने को लेकर किसी भी आधिकारिक बयान का इंतजार किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव हेलीकॉप्टर पर सवाल उठे हैं। पिछले पांच वर्षों में ALH ध्रुव से जुड़ी 15 से अधिक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। 2023 में ही कई बार इन हेलीकॉप्टरों की उड़ान रोककर गहन जांच की गई थी। हाल के हादसों ने एक बार फिर इनकी सुरक्षा और डिजाइन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु भेजा

पोरबंदर हादसे के बाद तटरक्षक बल और सेना ने अपने ALH बेड़े को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया है। इसके तहत सभी हेलीकॉप्टरों के ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स और रोटर हब सहित अन्य उपकरणों की जांच की जा रही है। दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु ले जाया गया है, जहां HAL इसके ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स और रोटर हब की गहन जांच कर रहा है। इस प्रक्रिया में दो सप्ताह तक का समय लग सकता है। विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं दोबारा न हों।

ALH ध्रुव, जिसे HAL द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है, भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का एक प्रमुख उदाहरण है। यह हेलीकॉप्टर भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और तटरक्षक बल के अलावा सीमा सुरक्षा बल और अन्य नागरिक एजेंसियों द्वारा भी उपयोग में लिया जाता है। वर्तमान में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के पास लगभग 330 ALH ध्रुव और 90 से अधिक रुद्र हेलीकॉप्टर हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल और अन्य सिविल एजेंसियां भी एएलएच का उपयोग करती हैं। इस सभी हेलीकॉप्टरों को फिलहाल निरीक्षण और फ्लाइट सेफ्टी चेक के लिए खड़ा कर दिया गया है।

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हालांकि, इन हेलीकॉप्टरों के हाल में हुए हादसों से इनकी विश्वसनीयता को झटका मिला है। 2023 में, ALH बेड़े में इस्तेमाल होने वाले बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की डिजाइन की समीक्षा की गई थी। ये रॉड्स हेलीकॉप्टर की उड़ान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। HAL ने पुराने एल्युमिनियम रॉड्स को स्टील के नए रॉड्स से बदलने का काम किया था। इसके बावजूद हादसों का सिलसिला जारी रहा है।

पोरबंदर हादसे से पहले भी सितंबर 2024 में एक तटरक्षक बल यानी कोस्टगार्ड का एक ALH ध्रुव दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। उस समय की गई जांच में कई सुरक्षा खामियां सामने आईं थीं। यह हादसा अरब सागर में हुआ था और इसमें भी तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद HAL ने मुख्य ड्राइव शाफ्ट, टेल रोटर असेंबली और अन्य उपकरणों की स्ट्रक्चरल सेफ्टी पर फोकस किया था।

सेना और HAL दोनों ने आश्वासन दिया है कि इस बार की जांच में सुरक्षा मानकों को और मजबूत किया जाएगा। जांच पूरी होने के बाद ही इन हेलीकॉप्टरों को दोबारा उड़ान भरने की अनुमति दी जाएगी। सेना का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद ALH ध्रुव और रुद्र हेलीकॉप्टर इस साल गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा बन पाएंगे या नहीं, इस पर अब भी संशय बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, यदि जांच समय पर पूरी नहीं हुई तो इनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं।

ALH ध्रुव भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। यह कठिन से कठिन इलाकों में काम करने में सक्षम है और इसे भारतीय सेनाओं के “वर्कहॉर्स” के रूप में देखा जाता है। हालांकि, लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने इसकी छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सेना प्रमुख ने कहा, “छोटी गड़बड़ियां”

सेना प्रमुख का कहना है कि दुनिया के अन्य हेलीकॉप्टरों के साथ भी हादसे होते हैं। उन्होंने इसे “छोटी गड़बड़ियां” बताया, जो किसी भी आधुनिक तकनीक के साथ हो सकती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ALH ध्रुव की बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं का कारण इसके डिजाइन में कुछ मूलभूत खामियां हो सकती हैं, जिन्हें तुरंत सुधारने की जरूरत है।

सेना, वायुसेना और तटरक्षक बल द्वारा ALH हेलीकॉप्टरों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। आगे की जांच और सुधारों से यह साफ होगा कि यह प्लेटफॉर्म भविष्य में कितनी विश्वसनीयता के साथ काम कर सकेगा।

Siachen 5G Network: सेना की ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ ने रचा इतिहास, दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन में अब जवानों को मिलेगा 5जी इंटरनेट

Siachen 5G Network: Fire and Fury Corps Makes History, Brings 5G to the World’s Highest Battlefield

Siachen 5G Network: सियाचिन ग्लेशियर, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है, अब 5G कनेक्टिविटी से लैस हो गया है। रिलायंस जियो ने इस दुर्गम क्षेत्र में अपनी 4G और 5G सेवाएं शुरू कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। सेना दिवस के मौके पर इसका एलान किया गया।

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सियाचिन ग्लेशियर कराकोरम रेंज में 16,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, और दुनिया के सबसे दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। यहां का तापमान -50°C तक गिर सकता है और बर्फीले तूफान आम बात हैं। इन कठोर परिस्थितियों में भी जियो ने 5G मोबाइल टॉवर स्थापित करके भारतीय सेना के जवानों को बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई है।

Siachen 5G Network: कैसे हुआ यह संभव?

रिलायंस जियो ने भारतीय सेना की ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ के साथ मिलकर इस मुश्किल काम को अंजाम दिया है। सेना के फायर एंड फ्यूरी सिग्नलर्स और सियाचिन वारियर्स ने जियो की टीम के साथ मिलकर उत्तरी ग्लेशियर पर पहला 5G मोबाइल टॉवर स्थापित किया।

जियो के उपकरणों को कठिन इलाकों और ठंडे मौसम में एयरलिफ्ट कर फ्रंट पोस्ट तक पहुंचाया गया। सेना ने रसद प्रबंधन और उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा किया। जियो ने अपनी स्वदेशी फुल-स्टैक 5G टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। इसके तहत प्लग-एंड-प्ले प्री-कॉन्फिगर्ड उपकरणों को लगाया गया है, ताकि ग्लेशियर के कठिन वातावरण में भी यह बेहतर ढंग से काम कर सके।

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इस प्रोजेक्ट के तहत 5G मोबाइल टॉवर उत्तरी ग्लेशियर पर एक अग्रिम चौकी पर लगाया गया है। सेना और जियो की संयुक्त टीम ने अत्यधिक दुर्गम इलाके और बर्फीले मौसम के बावजूद इस टॉवर को सफलतापूर्वक स्थापित किया।

रिलायंस जियो ने इस उपलब्धि को टेलीकॉम उद्योग में एक नई ऊंचाई के रूप में बताया। रिलायंस जियो का दावा है कि वह सियाचिन ग्लेशियर में 4G और 5G सेवाएं देने वाला पहला टेलीकॉम ऑपरेटर है। कंपनी के एक बयान में कहा गया, “सियाचिन ग्लेशियर पर 5G सेवाएं शुरू करके जियो ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह न केवल तकनीकी प्रगति का प्रतीक है, बल्कि हमारी सेना के जवानों के प्रति सम्मान और समर्थन का भी एक उदाहरण है।”

रिलायंस जियो के एक अधिकारी ने कहा, “यह प्रोजेक्ट हमारे सैनिकों की वीरता और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह कदम सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सैनिकों की ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाएगा।”

इस पहल के जरिए जियो ने लेह-लद्दाख क्षेत्र में अपनी नेटवर्क पहुंच को और मजबूत किया है। कंपनी पहले ही इस क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में 4G सेवाएं प्रदान कर रही थी।

सेना बोली- हमारे बहादुर सैनिकों को समर्पित

भारतीय सेना ने इस उपलब्धि को “अदम्य साहस और तकनीकी दक्षता” का प्रतीक बताया। सेना ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह उपलब्धि हमारे बहादुर सैनिकों को समर्पित है, जो कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हैं। इतनी ऊंचाई पर टावर लगाना न केवल तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था, बल्कि अत्यधिक कठोर मौसम में इसे पूरा करना भी साहसिक कार्य था।”

सैनिकों के लिए क्यों जरूरी है यह सेवा?

सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात भारतीय सेना के जवान कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हैं। बर्फीली हवाओं, अत्यधिक ठंड और दुर्गम इलाकों में सैनिकों को अक्सर डिजिटल कनेक्टिविटी की कमी का सामना करना पड़ता है।
वहीं, सैनिक अब अपनी यूनिट्स और मुख्यालय से लगातार संपर्क में रह सकेंगे। इसके अलावा रियल-टाइम डेटा ट्रांसफर और निगरानी और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान में आसानी होगी। साथ ही, सैनिकों को अपने परिवारों से जुड़े रहने का अवसर मिलेगा, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होगा। इस नेटवर्क के जरिए सैनिकों को न केवल बेहतर संचार सुविधा मिलेगी, बल्कि आपातकालीन स्थितियों में मदद भी जल्दी मिलेगी।

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2024 के अंत तक 42 से ज्यादा लगाए टावर

सिर्फ सियाचिन ही नहीं, लद्दाख के अन्य दुर्गम क्षेत्रों में भी 4G नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने भारती एयरटेल के साथ मिलकर 2024 के अंत तक 42 नए 4G टावर स्थापित किए थे। ये टावर कारगिल, देमचोक, दौलत बेग ओल्डी (DBO), गलवान और पैंगोंग झील जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इससे पहले, नवंबर 2024 तक केवल 20 टावर ही लगाए गए थे। लेकिन सेना और एयरटेल के संयुक्त प्रयासों से इस संख्या को मात्र डेढ़ महीने में दोगुना कर दिया गया।

सियाचिन और लद्दाख में इन परियोजनाओं को सफल बनाने के पीछे भारतीय सेना का महत्वपूर्ण योगदान है। सेना ने इन दुर्गम इलाकों में रसद पहुंचाने, उपकरणों को एयरलिफ्ट करने और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय करने में अग्रणी भूमिका निभाई। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस परियोजना को “राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक” बताया। उन्होंने कहा कि लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में डिजिटल कनेक्टिविटी केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीमावर्ती क्षेत्रों में संचार नेटवर्क मजबूत होने से भारतीय सेना की ऑपरेशनल क्षमता में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, यह दुश्मन के किसी भी दावे का स्पष्ट जवाब भी है कि ये क्षेत्र भारतीय संप्रभुता के अभिन्न अंग हैं।

उन्होंने बताया कि सैनिकों और स्थानीय नागरिकों दोनों के लिए यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रही है। पहले जहां सैनिकों के लिए अपने परिवारों से संपर्क साधना एक बड़ी चुनौती थी, अब वे इन 4G और 5G सेवाओं की मदद से वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा, स्थानीय समुदाय, जो अब तक डिजिटल सुविधाओं से अछूते थे, अब शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के नए अवसरों से जुड़ रहे हैं।