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रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला, अब ‘जरूरत’ के आधार पर मिलेगी सरकारी नौकरी, बदले अनुकंपा नियुक्ति के नियम

Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026
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Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026: रक्षा मंत्रालय ने सेना, नौसेना, वायुसेना, डीआरडीओ और रक्षा मंत्रालय के दूसरे संगठनों में कंपैशनेट अपॉइंटमेंट यानी अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। मंत्रालय ने नया ऑफिस मेमोरेंडम जारी करते हुए “रिलेटिव मेरिट पॉइंट सिस्टम” को संशोधित कर दिया है। अब किसी कर्मचारी की मौत या मेडिकल आधार पर सेवा समाप्त होने के बाद उसके परिवार को नौकरी देने का फैसला पूरी तरह 100 पॉइंट मेरिट सिस्टम के आधार पर होगा।

रक्षा मंत्रालय का यह आदेश तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया गया है। मंत्रालय ने साफ कहा है कि अब हर आवेदन को तय पैरामीटर्स के हिसाब से नंबर दिए जाएंगे और सबसे ज्यादा जरूरतमंद परिवार को प्राथमिकता मिलेगी।

यह बदलाव ऐसे समय में किया गया है जब लंबे समय से कंपैशनेट अपॉइंटमेंट में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई परिवारों का आरोप था कि असली जरूरतमंद लोग पीछे रह जाते हैं जबकि बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों को नौकरी मिल जाती है। इसी वजह से अब पूरी प्रक्रिया को ज्यादा व्यवस्थित और डेटा बेस्ड बनाया गया है।

Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026: क्या है कंपैशनेट अपॉइंटमेंट

सरकारी नौकरी के दौरान अगर किसी कर्मचारी की अचानक मौत हो जाती है या फिर गंभीर बीमारी अथवा मेडिकल कारणों से उसे समय से पहले नौकरी छोड़नी पड़ती है, तो उसके परिवार की आमदनी अचानक रुक जाती है।

डिफेंस फोर्सेस में यह समस्या और गंभीर मानी जाती है क्योंकि कई बार कर्मचारी की उम्र कम होती है और परिवार पूरी तरह उसी की कमाई पर निर्भर होता है। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, शादी, इलाज और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी एक साथ परिवार पर आ जाती है।

इसी स्थिति में सरकार परिवार के एक सदस्य को नौकरी देकर आर्थिक सहारा देने की कोशिश करती है। इसे ही कंपैशनेट अपॉइंटमेंट कहा जाता है।

लेकिन नौकरी की सीटें सीमित होती हैं और आवेदन हजारों आते हैं। ऐसे में यह तय करना मुश्किल होता है कि सबसे ज्यादा जरूरत किस परिवार को है। इसी वजह से रक्षा मंत्रालय ने कुछ समय पहले 100 पॉइंट का मेरिट सिस्टम बनाया था, जिसे अब और ज्यादा विस्तृत और सख्त बनाया गया है।

नए सिस्टम में कैसे तय होंगे नंबर

रक्षा मंत्रालय ने परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को आठ बड़े हिस्सों में बांटा है। हर हिस्से के लिए अलग-अलग पॉइंट तय किए गए हैं।

सबसे ज्यादा 20 पॉइंट फैमिली पेंशन के लिए रखे गए हैं। यानी अगर परिवार को कम पेंशन मिल रही है तो उसे ज्यादा नंबर मिलेंगे। मंत्रालय का मानना है कि कम पेंशन वाला परिवार ज्यादा आर्थिक संकट में होगा।

वहीं, अगर किसी परिवार को 9 हजार रुपये तक पेंशन मिल रही है तो उसे पूरे 20 पॉइंट मिलेंगे। जैसे-जैसे पेंशन बढ़ेगी, पॉइंट कम होते जाएंगे। 31,500 रुपये से ज्यादा पेंशन होने पर कोई पॉइंट नहीं मिलेगा।

एकमुश्त रकम भी बनेगी बड़ा फैक्टर

किसी कर्मचारी की मौत के बाद परिवार को ग्रेच्युटी, जीपीएफ, लीव इनकैशमेंट, बीमा और दूसरी रकम मिलती है। मंत्रालय ने इसे भी बड़ा फैक्टर माना है।

अगर परिवार को 10 लाख रुपये तक की रकम मिली है, तो उसे पूरे 10 पॉइंट दिए जाएंगे। वहीं ज्यादा रकम मिलने पर पॉइंट घटते जाएंगे।

मंत्रालय का मानना है कि ज्यादा एकमुश्त राशि मिलने वाले परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ हद तक बेहतर मानी जा सकती है, इसलिए कम रकम पाने वाले परिवार को प्राथमिकता दी जाएगी।

अब प्रॉपर्टी और दूसरी आमदनी भी छिपाना मुश्किल

नए नियमों में परिवार की दूसरी आय और संपत्ति को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। अगर परिवार के पास जमीन, दुकान, मकान, बैंक बैलेंस या दूसरी संपत्ति है, तो उसका मूल्यांकन किया जाएगा।

इसके अलावा परिवार में दूसरे कमाने वाले सदस्यों की आय भी देखी जाएगी। अगर परिवार के पास कोई दूसरी आमदनी नहीं है तो उसे ज्यादा पॉइंट मिलेंगे। मंत्रालय का कहना है कि इससे वास्तविक आर्थिक स्थिति का बेहतर आकलन हो सकेगा।

बेटियों और छोटे बच्चों को किया शामिल

इस बार रक्षा मंत्रालय ने परिवार की जिम्मेदारियों को बहुत अहम माना है। अगर परिवार में अविवाहित बेटियां हैं तो उसके हिसाब से अलग पॉइंट दिए जाएंगे। तीन या उससे ज्यादा अविवाहित बेटियां होने पर परिवार को 15 पॉइंट तक मिल सकते हैं।

इसी तरह छोटे बच्चों की संख्या के लिए भी 15 पॉइंट तय किए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि जिन परिवारों में छोटे बच्चे और बेटियां ज्यादा हैं, वहां आर्थिक और सामाजिक दबाव ज्यादा होता है। इसलिए ऐसे परिवारों को नौकरी में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

अगर कम उम्र में हुई कर्मचारी की मौत…

नए सिस्टम में “लेफ्ट ओवर सर्विस” को भी शामिल किया गया है। यह देखा जाएगा कि कर्मचारी की नौकरी में कितने साल बाकी थे। अगर कर्मचारी की मौत तब हुई जब उसकी नौकरी में 20 साल या उससे ज्यादा समय बाकी था, तो परिवार को पूरे 10 पॉइंट मिलेंगे।

मंत्रालय का मानना है कि कम उम्र में कर्मचारी की मौत होने पर परिवार पर ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ता है क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की जिम्मेदारियां बाकी होती हैं।

विधवा और अनाथ बच्चों के लिए विशेष राहत

नए नियमों में कुछ मामलों को “स्पेशल केस” माना गया है। अगर कर्मचारी और उसकी पत्नी दोनों की मौत हो चुकी है और बच्चे पूरी तरह अनाथ हो गए हैं, तो ऐसे मामलों में 20 अतिरिक्त ग्रेस पॉइंट मिलेंगे।

अगर मृत कर्मचारी की पत्नी खुद नौकरी के लिए आवेदन करती है तो उसे 15 अतिरिक्त पॉइंट दिए जाएंगे। वहीं अगर परिवार में कोई सदस्य दिव्यांग है तो अलग से अतिरिक्त पॉइंट मिलेंगे।

देर से आवेदन करने वालों को भी राहत

पहले कई परिवार समय पर आवेदन नहीं कर पाते थे। कई बार परिवार को नियमों की जानकारी ही नहीं होती थी।
अब मंत्रालय ने ऐसे मामलों के लिए भी अलग पॉइंट सिस्टम बनाया है।

अगर मौत के दो साल के भीतर आवेदन किया गया है तो 10 पॉइंट मिलेंगे। दो से तीन साल के बीच आवेदन करने पर सात पॉइंट और पांच साल बाद आवेदन करने पर भी तीन पॉइंट दिए जाएंगे।

इसे बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि पहले देरी होने पर परिवार की स्थिति कमजोर हो जाती थी।

बराबर नंबर होने पर कैसे होगा फैसला

रक्षा मंत्रालय ने बराबर स्कोर वाले मामलों के लिए भी साफ नियम बना दिए हैं। अगर दो परिवारों के पॉइंट बराबर हैं तो सबसे पहले प्रति सदस्य उपलब्ध आय देखी जाएगी। यानी परिवार की कुल आय को आश्रितों की संख्या से बांटा जाएगा। जिस परिवार की प्रति सदस्य आय कम होगी, उसे प्राथमिकता मिलेगी।

अगर इसके बाद भी मामला बराबर रहता है तो कर्मचारी की बची हुई सेवा, दिव्यांग सदस्य, अविवाहित बेटियां और आवेदक की उम्र को देखा जाएगा। बड़ी उम्र वाले आवेदक को प्राथमिकता दी जाएगी।

पुराने मामलों के लिए भी अलग व्यवस्था

रक्षा मंत्रालय ने यह भी माना कि पुराने मामलों में पेंशन और टर्मिनल बेनिफिट आज की तुलना में बहुत कम थे। इसी वजह से प्री-2006 और प्री-2016 मामलों के लिए अलग पेंशन स्लैब और पॉइंट सिस्टम बनाया गया है ताकि पुराने परिवारों के साथ अन्याय न हो।

सेना, नौसेना, वायुसेना और डीआरडीओ सब पर लागू होंगे नियम

यह नया सिस्टम केवल सेना तक सीमित नहीं है। रक्षा मंत्रालय ने इसे आर्मी मुख्यालय, नेवल मुख्यालय, एयर मुख्यालय, डीआरडीओ, कोस्ट गार्ड, डीजीक्यूए और रक्षा मंत्रालय के बाकी संगठनों पर भी लागू किया है। अब रक्षा मंत्रालय से जुड़े हर कर्मचारी के परिवार के लिए यही नया नियम लागू होगा।

पुराने मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जिन मामलों पर पहले ही बोर्ड ऑफ ऑफिसर्स फैसला ले चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। हालांकि जो मामले अभी प्रक्रिया में हैं या नए आवेदन आएंगे, उन पर यही नया सिस्टम लागू होगा। (Defence Ministry Compassionate Job Rules 2026)

Defence Ministry Revises Compassionate Appointment Rules, New 100-Point Merit System to Prioritise Needy Families.

Exclusive: अग्निवीरों के रिस्क और हार्डशिप अलाउंस में 25% तक बढ़ोतरी, सियाचिन में तैनात जवानों को ज्यादा भत्ता

Agniveers Risk-Hardship Allowance Hike 2026
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Agniveers Risk-Hardship Allowance Hike 2026: अग्निपथ योजना के तहत भर्ती हुए अग्निवीरों के लिए बड़ा अपडेट है। भारतीय सेना ने अग्निवीरों के लिए बड़ा आर्थिक राहत पैकेज लागू किया है। सेना मुख्यालय से जारी एडवाइजरी में अग्निवीरों के ड्रेस अलाउंस और रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस में बढ़ोतरी की गई है। बता दें कि अग्निपथ योजना लागू होने के बाद पहली बार अग्निवीरों के लिए इतने बड़े स्तर पर जोखिम भत्तों में संशोधन देखने को मिला है।

इंटीग्रेटेड हेडक्वार्टर्स ऑफ मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस (आर्मी), एडजुटेंट जनरल ब्रांच की तरफ से जारी एडवाइजरी में अग्निपथ स्कीम 2022 के तहत सेवा दे रहे अग्निवीरों को मुश्किल और खतरे वाली जगहों की पोस्टिंग्स पर ज्यादा भत्ते देने की बात कही है। डॉक्यूमेंट में सियाचिन, हाई एल्टीट्यूड एरिया, काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन, फील्ड एरिया और स्पेशल फोर्सेस जैसी तैनातियों पर मिलने वाले भत्तों के नए रेट्स शामिल हैं।

Agniveers Risk-Hardship Allowance Hike 2026: क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव

अग्निपथ योजना लागू होने के बाद से लगातार यह बहस होती रही कि चार साल की सेवा अवधि में अग्निवीरों को कितनी आर्थिक सुरक्षा मिल रही है। सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी थी कि अग्निवीरों को बेसिक सैलरी के अलावा रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस, राशन, ट्रैवल अलाउंस और सेवा निधि पैकेज भी दिया जाएगा। लेकिन अब पहली बार इन अतिरिक्त भत्तों में बड़े स्तर पर संशोधन किया गया है।

सेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ समय से कठिन इलाकों में तैनात अग्निवीरों के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता बढ़ाने पर विचार चल रहा था। खासकर सियाचिन, लद्दाख, एलओसी, एलएसी और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन वाले इलाकों में काम कर रहे जवानों की परिस्थितियों को देखते हुए यह बदलाव जरूरी माना गया।

सेना के अंदर यह भी माना जा रहा है कि इससे अग्निवीरों का मनोबल बढ़ेगा।

सियाचिन अलाउंस में सबसे बड़ा बदलाव

एडवाइजरी में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सियाचिन अलाउंस में देखने को मिली है। नए ऑर्डर के मुताबिक सियाचिन में तैनात अग्निवीरों को मिलने वाला अलाउंस 30 हजार रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 37,500 रुपये कर दिया गया है। सियाचिन अलाउंस में लगभग 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है।

सियाचिन को दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है। यहां तापमान कई बार माइनस 40 से माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऑक्सीजन की कमी, बर्फीले तूफान और ग्लेशियर की खतरनाक परिस्थितियों के बीच सैनिकों को लंबे समय तक तैनात रहना पड़ता है। ऐसे में यहां मिलने वाला भत्ता सेना में सबसे कठिन पोस्टिंग्स में गिना जाता है।

सेना के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि सियाचिन में ड्यूटी करना केवल सैन्य चुनौती नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर बेहद कठिन होता है। ऐसे में अग्निवीरों को मिलने वाली अतिरिक्त राशि उनके परिवारों के लिए भी बड़ी राहत मानी जा रही है।

हाई एल्टीट्यूड और स्पेशल फोर्सेस अलाउंस भी बढ़ा

एडवाइजरी में हाई एल्टीट्यूड कैटेगरी-3 और स्पेशल फोर्सेस अलाउंस में भी बढ़ोतरी की गई है। पहले यह राशि 17,300 रुपये थी, जिसे बढ़ाकर 21,625 रुपये कर दिया गया है।

यह भत्ता उन जवानों को मिलता है जो 14 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात होते हैं। लद्दाख, पूर्वी लद्दाख और कुछ अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में यह कैटेगरी लागू होती है। इसके अलावा स्पेशल फोर्सेस में सेवा देने वाले जवानों को भी यह अलाउंस दिया जाता है।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कम ऑक्सीजन, बेहद ठंडे मौसम और सीमित संसाधनों के बीच ड्यूटी करना सामान्य फील्ड पोस्टिंग से काफी अलग माना जाता है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे इलाकों में लंबे समय तक रहने से शरीर पर गंभीर असर पड़ता है। इसलिए इन पोस्टिंग्स पर अतिरिक्त भत्ता दिया जाता है।

एलओसी और काउंटर इंसर्जेंसी इलाकों में भी राहत

जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर जैसे इलाकों में एक्टिव फील्ड एरिया और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में लगे जवानों के लिए भी भत्ते बढ़ाए गए हैं। एडवाइजरी के अनुसार पहले जहां यह अलाउंस 9,700 रुपये था, अब इसे बढ़ाकर 12,125 रुपये किया गया है।

ये वे इलाके होते हैं जहां आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन, घुसपैठ रोधी कार्रवाई और लगातार सैन्य सतर्कता बनी रहती है। एलओसी और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में जवानों को लंबे समय तक हाई अलर्ट पर रहना पड़ता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की पोस्टिंग्स में शारीरिक जोखिम के साथ मानसिक दबाव भी काफी ज्यादा होता है। ऐसे में अतिरिक्त आर्थिक सहायता को सेना की वेलफेयर पॉलिसी का हिस्सा माना जा रहा है।

फील्ड एरिया और पैरा अलाउंस में भी इजाफा

एडवाइजरी में फील्ड एरिया अलाउंस, सीआई ऑपरेशन पीस एरिया अलाउंस और पैरा अलाउंस में भी संशोधन किया गया है। पहले यह राशि 6 हजार रुपये थी, जिसे अब बढ़ाकर 7,500 रुपये किया गया है।

यह अलाउंस उन जवानों को मिलता है जो सामान्य फील्ड पोस्टिंग या पैरा यूनिट्स में तैनात होते हैं। सेना सूत्रों का कहना है कि यह कैटेगरी भले सबसे कठिन न मानी जाए, लेकिन यहां भी जवानों को सामान्य शांति क्षेत्र की तुलना में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

हाई एल्टीट्यूड और टफ लोकेशन कैटेगरी में बदलाव

हाई एल्टीट्यूड कैटेगरी-2 और टफ लोकेशन अलाउंस-1 में भी 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। पहले यह राशि 4,100 रुपये थी, जिसे अब 5,125 रुपये किया गया है।

इसी तरह हाई एल्टीट्यूड कैटेगरी-1 और टफ लोकेशन अलाउंस-2 को 2,700 रुपये से बढ़ाकर 3,375 रुपये किया गया है।

ये अलाउंस उन इलाकों में तैनात जवानों को मिलते हैं जहां मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य से कठिन होती हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में नहीं रखा जाता।

टफ लोकेशन अलाउंस-3 में भी बढ़ोतरी

कम जोखिम वाले लेकिन चुनौतीपूर्ण इलाकों के लिए मिलने वाले टफ लोकेशन अलाउंस-3 को भी बढ़ाया गया है। यह पहले एक हजार रुपये था और अब 1250 रुपये कर दिया गया है।

हालांकि राशि अपेक्षाकृत कम है, लेकिन सेना में इसे भी एक महत्वपूर्ण संशोधन माना जा रहा है। लगभग सभी कैटेगरी में एक समान 25 प्रतिशत वृद्धि लागू की गई है।

मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस भी बढ़ा

एडवाइजरी में मॉडिफाइड फील्ड एरिया और काउंटर इंसर्जेंसी मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस में भी संशोधन शामिल है। पहले जहां मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस 3,600 रुपये था, अब इसे बढ़ाकर 4,500 रुपये कर दिया गया है।

इसी तरह काउंटर इंसर्जेंसी मॉडिफाइड फील्ड एरिया अलाउंस 7,469 रुपये से बढ़ाकर 9,336 रुपये किया गया है।

ये वे इलाके होते हैं जहां पूरी तरह सक्रिय युद्ध जैसी स्थिति नहीं होती, लेकिन सुरक्षा जोखिम और ऑपरेशनल दबाव बना रहता है।

ड्रेस अलाउंस में भी 25 फीसदी बढ़ोतरी

सेना ने केवल रिस्क अलाउंस ही नहीं, बल्कि ड्रेस अलाउंस में भी बढ़ोतरी की है। पहले अग्निवीरों को सालाना 10 हजार रुपये ड्रेस अलाउंस मिलता था, जिसे अब बढ़ाकर 12,500 रुपये कर दिया गया है।

यह राशि यूनिफॉर्म, बूट्स, बैज और दूसरी सैन्य जरूरतों के रखरखाव के लिए दी जाती है। सेना सूत्रों का कहना है कि बढ़ती कीमतों और कठिन पोस्टिंग्स को देखते हुए इस राशि में संशोधन जरूरी माना गया।

दावा करने के लिए क्या करना होगा

एडवाइजरी में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बढ़े हुए भत्तों का लाभ पाने के लिए सही दस्तावेज जरूरी होंगे। पोस्टिंग ऑर्डर, संबंधित आरएच मैट्रिक्स कैटेगरी और यूनिट सर्टिफिकेशन जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।

सेना मुख्यालय ने यूनिट्स को निर्देश दिया है कि इस जानकारी को सैनिक सम्मेलन और रोल कॉल के जरिए नीचे तक पहुंचाया जाए ताकि सभी पात्र अग्निवीरों को इसकी जानकारी मिल सके।

8वें वेतन आयोग से पहले क्यों अहम माना जा रहा कदम

वहीं, इस बदलाव को 8वें वेतन आयोग से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। हालांकि यह बदलाव सभी अग्निवीरों के लिए समान वेतन वृद्धि नहीं है। इसका लाभ केवल उन्हीं जवानों को मिलेगा जो संबंधित कैटेगरी की पोस्टिंग में तैनात हैं।

पूर्व सैन्य अधिकारियों का कहना है कि सेना में लंबे समय से यह व्यवस्था रही है कि कठिन और जोखिम भरी पोस्टिंग्स के लिए अतिरिक्त भत्ते दिए जाएं। अग्निवीरों को भी उसी ढांचे में शामिल करना जरूरी था ताकि ऑपरेशनल ड्यूटी में कोई असमानता महसूस न हो। वहीं, इससे अग्निपथ योजना के तहत वेलफेयर स्ट्रक्चर को भी मजबूती मिलेगी।

भारत के अग्नि MIRV टेस्ट के पास क्यों मंडराता रहा चीन का ‘समुद्री जासूस’? हिंद महासागर में दिखी ड्रैगन की बेचैनी

China Spy Ship Agni MIRV Test
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China Spy Ship Agni MIRV Test: एक तरफ भारत जब एडवांस अग्नि मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेड री-एंट्री व्हीकल (MIRV) का हिंद महासागर में मिसाइल टेस्ट कर रहा था, तो उस दौरान एक चीनी रिसर्च वेसल उस इलाके में मौजूद थी। सैटेलाइट ट्रैकिंग मैप्स और ओपन सोर्स इंटेलिजेंस डेटा से पता चला कि यह जहाज 6 मई से 9 मई के बीच लगातार उसी समुद्री क्षेत्र के आसपास मौजूद रहा, जिसे भारत ने मिसाइल परीक्षण के लिए “डेंजर जोन” घोषित किया था।

हालांकि चीन की तरफ से इसे रिसर्च वेसल बताया गया, लेकिन इसका काम समुद्री रिसर्च के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और मिसाइल ट्रैकिंग से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखना है।

China Spy Ship Agni MIRV Test: क्या था भारत का अग्नि MIRV टेस्ट

भारत ने 8 मई को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल फ्लाइट ट्रायल किया। यह मिसाइल मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेड री-एंट्री व्हीकल यानी MIRV सिस्टम से लैस थी। यह मिसाइल कई अलग-अलग वारहेड लेकर जा सकती है और अलग-अलग लक्ष्यों पर हमला कर सकती है।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक मिसाइल को कई पेलोड्स के साथ लॉन्च किया गया और हिंद महासागर क्षेत्र में अलग-अलग जगहों पर मौजूद टारगेट्स को सफलतापूर्वक हिट किया गया।

इस टेस्ट में जमीन और समुद्र दोनों जगह मौजूद ट्रैकिंग सिस्टम्स ने मिसाइल की पूरी उड़ान को मॉनिटर किया। लॉन्च से लेकर पेलोड्स के इम्पैक्ट तक सभी डेटा रिकॉर्ड किए गए।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक यह टेस्ट केवल एक मिसाइल लॉन्च नहीं था, बल्कि भारत की न्यूक्लियर डिटरेंस क्षमता का बड़ा प्रदर्शन था।

MIRV तकनीक आखिर इतनी अहम क्यों है

MIRV तकनीक आधुनिक परमाणु रणनीति में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। सामान्य बैलिस्टिक मिसाइल में एक वारहेड होता है, लेकिन MIRV मिसाइल में कई वारहेड लगाए जा सकते हैं। ये वारहेड अंतरिक्ष में जाकर अलग-अलग दिशाओं में बंट जाते हैं और फिर अलग-अलग टारगेट्स की तरफ बढ़ते हैं।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि दुश्मन का मिसाइल डिफेंस सिस्टम भ्रमित हो जाता है। अगर एक साथ कई वारहेड अलग-अलग दिशाओं से आएं, तो उन्हें रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। भारत के लिए यह तकनीक खास इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि चीन पहले से DF-41 जैसी MIRV क्षमता वाली मिसाइलें तैनात कर चुका है। इस टेस्ट के साथ भारत ने भी साफ संकेत दिया है कि वह केवल पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों तक सीमित नहीं रहना चाहता।

क्या कर रहा था चीन का जहाज?

सैटेलाइट इमेज और ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक DA YANG HAO चीनी जहाज इस साल फरवरी में हिंद महासागर क्षेत्र में दाखिल हुआ था। इसके बाद यह अप्रैल में मॉरीशस के पास दिखाई दिया। फिर अप्रैल के आखिर तक यह भारत के पूर्वी समुद्री क्षेत्र के करीब पहुंच गया।

वहीं, 6 मई से 9 मई तक जहाज उसी इलाके के आसपास रुका रहा जहां भारत ने मिसाइल टेस्ट के लिए बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के बड़े हिस्से में NOTMAR और एरियल वॉर्निंग जारी की थी।

यह जहाज पहले धीमी गति से “लॉइटरिंग” कर रहा था, यानी लगातार एक सीमित इलाके में घूम रहा था। फिर 10 मई के बाद वह आगे बढ़ गया।

रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि चीन भारतीय मिसाइल टेस्ट से जुड़ा डेटा इकट्ठा करना चाहता था। हालांकि आधिकारिक तौर पर यह जहाज मिसाइल ट्रैकिंग शिप घोषित नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक रिसर्च वेसल्स में ऐसे कई सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम होते हैं, जो मिसाइल लॉन्च से जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड कर सकते हैं।

चीन क्यों रखता है भारत के मिसाइल टेस्ट पर नजर

भारत पिछले कुछ सालों से लगातार लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों, हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी और न्यूक्लियर डिलीवरी सिस्टम्स पर तेजी से काम कर रहा है। चीन के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि भारत की नई पीढ़ी की मिसाइलें अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहीं।

अग्नि-5 जैसी मिसाइलें चीन के अंदर तक मौजूद रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकती हैं। MIRV तकनीक जुड़ने के बाद एक ही मिसाइल कई शहरों या सैन्य ठिकानों पर हमला कर सकती है। इसी वजह से चीन भारतीय मिसाइलों की स्पीड, ट्रैजेक्टरी, वारहेड सेपरेशन और गाइडेंस सिस्टम को समझने की कोशिश करता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर किसी देश को मिसाइल की उड़ान से जुड़ा पर्याप्त डेटा मिल जाए, तो वह भविष्य में उसके खिलाफ डिफेंस सिस्टम विकसित कर सकता है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब भारत के मिसाइल टेस्ट के दौरान चीनी जहाज दिखाई दिए हों। पिछले कुछ सालों में कई बार चीन के “रिसर्च वेसल” हिंद महासागर में एक्टिव दिखाई दिए हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इनमें से कई जहाज “ड्यूल यूज” प्लेटफॉर्म होते हैं। यानी बाहर से वैज्ञानिक रिसर्च शिप दिखते हैं, लेकिन उनमें सैन्य निगरानी से जुड़े उपकरण भी लगे होते हैं। कुछ मामलों में भारत को अपने मिसाइल टेस्ट तक टालने पड़े थे क्योंकि चीनी जहाज संभावित ट्रैकिंग जोन में मौजूद थे।

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियां

पिछले एक साल में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी तेजी से बढ़ाई है। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक किसी भी समय औसतन 3 से 4 चीनी रिसर्च या सर्विलांस जहाज हिंद महासागर में सक्रिय रहते हैं।

इनमें “Shi Yan 6” जैसे जहाज भी शामिल हैं, जिन्हें हाल ही में बंगाल की खाड़ी के पास देखा गया था। भारतीय एजेंसियों का मानना है कि ये जहाज केवल समुद्री रिसर्च नहीं कर रहे, बल्कि भारत की नौसैनिक गतिविधियों, पनडुब्बी मूवमेंट और मिसाइल टेस्ट्स पर भी नजर रखते हैं।

हाइपरसोनिक तकनीक ने बढ़ाई चीन की चिंता

अग्नि MIRV टेस्ट के अगले ही दिन डीआरडीओ ने हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट इंजन का भी सफल लंबी अवधि वाला टेस्ट किया। यह टेस्ट करीब 1200 सेकंड तक चला। हाइपरसोनिक हथियार मैक 5 से ज्यादा स्पीड पर उड़ते हैं। इतनी तेज रफ्तार पर मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना बेहद कठिन हो जाता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक MIRV और हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी का एक साथ आगे बढ़ना भारत की रणनीतिक क्षमता में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। चीन पहले से DF-17 और दूसरे हाइपरसोनिक सिस्टम्स पर काम कर रहा है। भारत अब इस रेस में तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

अग्नि-5 और पाकिस्तान की अबाबील मिसाइल में क्या है फर्क

पाकिस्तान भी “अबाबील” नाम की MIRV क्षमता वाली मिसाइल का दावा करता रहा है। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और पाकिस्तान की तकनीक में बड़ा अंतर है। बताया जाता है कि अग्नि-5 अपने वारहेड्स को वायुमंडल के बाहर अलग करता है, जिससे वे अलग-अलग दिशाओं में जाकर टारगेट हिट कर सकते हैं।

जबकि पाकिस्तान की अबाबील मिसाइल में वारहेड सेपरेशन काफी देर से होता है। इस वजह से उसे ट्रैक करना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

भारत के न्यूक्लियर ट्रायड को मिल रही मजबूती

भारत लंबे समय से “न्यूक्लियर ट्रायड” यानी जमीन, हवा और समुद्र तीनों तरह से से परमाणु जवाबी हमला करने की क्षमता विकसित कर रहा है। अग्नि-5 MIRV टेस्ट को इसी दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

भारत पहले ही अरिहंत क्लास न्यूक्लियर सबमरीन और के-4 जैसी सबमरीन लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों पर काम कर चुका है। अब MIRV क्षमता जुड़ने के बाद भारत की सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी और मजबूत मानी जा रही है।

रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला, सेना को खराब हथियार या लेट सप्लाई दी तो 10 साल तक ब्लैकलिस्ट हो सकती है कंपनी

Defence Procurement New Rules

Defence Procurement New Rules: रक्षा खरीद में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बड़े बदलाव करते हुए नए संशोधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। अब अगर कोई कंपनी भ्रष्टाचार, कॉन्ट्रैक्ट उल्लंघन, खराब गुणवत्ता, सप्लाई में देरी या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में दोषी पाई जाती है, तो उसे पांच से लेकर दस साल तक के लिए बैन किया जा सकता है। नए नियमों के तहत सिर्फ मुख्य कंपनी ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सहयोगी कंपनियां, जॉइंट वेंचर और मर्जर के बाद बनी नई इकाइयां भी कार्रवाई के दायरे में आएंगी।

रक्षा मंत्रालय ने 27 अप्रैल को “एमेंडेड गाइडलाइंस ऑफ द मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस फॉर पेनल्टीज इन बिजनेस डीलिंग्स विद एंटिटीज” नाम का नया दस्तावेज जारी किया है। इसके साथ ही 21 नवंबर 2016 के पुराने नियमों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। यह नया फ्रेमवर्क तुरंत प्रभाव से लागू हो चुका है।

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि रक्षा खरीद में “जीरो टॉलरेंस” यानी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के प्रति बिल्कुल भी नरमी नहीं बरती जाएगी। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि अब केवल हथियार खरीदने पर ही फोकस नहीं होगा, बल्कि समय पर डिलीवरी, बेहतर परफॉर्मेंस और ऑपरेशनल रेडीनेस भी उतनी ही अहम होगी।

Defence Procurement New Rules: क्यों बदले गए पुराने नियम

रक्षा मंत्रालय ने अपने नए दस्तावेज में माना है कि 2016 के बाद डिफेंस प्रोक्योरमेंट का पूरा स्ट्रक्चर काफी बदल चुका है। अब सेना को हाई-टेक सिस्टम, एडवांस सेंसर, नेटवर्क-बेस्ड वारफेयर सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तेज सप्लाई चेन की जरूरत है। ऐसे में पुराने नियम काफी नहीं रह गए थे।

मंत्रालय ने कहा है कि नए दिशानिर्देशों का मकसद “हाइएस्ट स्टैंडर्ड्स ऑफ प्रॉप्रायटी, पब्लिक अकाउंटेबिलिटी, ट्रांसपेरेंसी और फेयर कॉम्पिटिशन” सुनिश्चित करना है। दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि रक्षा खरीद केवल उन्हीं कंपनियों से की जाएगी, जिनका रिकॉर्ड साफ और विश्वसनीय हो।

“अंडर परफॉर्मेंस” प्रोडक्ट्स देना पड़ेगा भारी

पुराने नियमों में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी पर कार्रवाई का प्रावधान तो था, लेकिन सप्लाई में देरी, खराब गुणवत्ता और तकनीकी परफॉर्मेंस को लेकर बहुत स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। नए नियमों में पहली बार सर्विसेबिलिटी, डाउनटाइम और फेलियर रेट जैसे तकनीकी मानकों को भी शामिल किया गया है।

अगर कोई कंपनी समय पर उपकरण नहीं देती, बार-बार तकनीकी खराबी आती है या सिस्टम लगातार फेल होता है, तो उसे “अंडर परफॉर्मेंस” माना जाएगा। ऐसी स्थिति में कंपनी पर पांच साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि कई बार महंगे हथियार समय पर नहीं पहुंचते या लंबे समय तक खराब पड़े रहते हैं, जिससे सेना की ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित होती है। नए नियम इसी समस्या को रोकने के लिए लाए गए हैं।

भ्रष्टाचार पर अधिकतम 10 साल तक बैन

नए नियमों के सेक्शन 4 में उन कारणों को विस्तार से बताया गया है, जिनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी। इनमें इंटीग्रिटी पैक्ट का उल्लंघन, रिश्वत, गलत जानकारी देना, एजेंट कमीशन नियम तोड़ना, राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाना, विदेशी अदालत में भ्रष्टाचार साबित होना और भारतीय कानूनों के तहत दोषी पाए जाना शामिल है।

ऐसे मामलों में शुरुआत में एक साल का प्रतिबंध लगाया जाएगा, जिसे हर साल रिव्यू के बाद बढ़ाया जा सकता है। कुल अवधि अधिकतम दस साल तक जा सकती है।

इससे पहले प्रतिबंध की अवधि को लेकर स्पष्ट समय सीमा नहीं थी। अब पहली बार अधिकतम सजा तय कर दी गई है।

सस्पेंशन और प्रतिबंध में क्या फर्क

नए दिशानिर्देशों में “सस्पेंशन” और “डिबारमेंट” को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है। सस्पेंशन अस्थायी रोक है, जबकि डिबारमेंट लंबी अवधि का प्रतिबंध माना जाएगा।

अगर किसी कंपनी के खिलाफ सीबीआई या दूसरी एजेंसी जांच शुरू करती है, एफआईआर दर्ज होती है या चार्जशीट दायर होती है, तो विभागीय सचिव कंपनी को सस्पेंड कर सकते हैं। शुरुआत में यह सस्पेंशन छह महीने का होगा। जरूरत पड़ने पर इसे छह-छह महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। सामान्य तौर पर यह अवधि दो साल तक सीमित रहेगी।

सस्पेंशन के दौरान कंपनी नई टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पाएगी। अगर कोई कंपनी एल-1 यानी सबसे कम बोली लगाने वाली भी हो, तब भी उसे प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है।

सहयोगी कंपनियां भी नहीं बच पाएंगी

नए नियमों का सबसे बड़ा बदलाव यह माना जा रहा है कि अब केवल मुख्य कंपनी पर ही कार्रवाई नहीं होगी। अगर किसी डिबार्ड या सस्पेंड कंपनी की दूसरी सहयोगी फर्म, जॉइंट वेंचर, मर्जर यूनिट या नई बनाई गई यूनिट है, तो उस पर भी कार्रवाई लागू हो सकती है।

दस्तावेज में “एलाइड फर्म्स” की विस्तृत परिभाषा दी गई है। अगर किसी दूसरी कंपनी में समान मैनेजमेंट, समान शेयरहोल्डिंग या कंट्रोल मौजूद है, तो उसे भी उसी श्रेणी में रखा जाएगा।

रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि पहले कई कंपनियां बैन से बचने के लिए नया नाम या नई यूनिट बनाकर फिर से टेंडर में हिस्सा ले लेती थीं। अब ऐसा करना मुश्किल होगा।

हेवी पेनल्टी का भी प्रावधान

नए दिशानिर्देशों में सिर्फ बैन ही नहीं, बल्कि भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान किया गया है। सेक्शन 13 के अनुसार, इंटीग्रिटी पैक्ट उल्लंघन की स्थिति में ईएमडी, परफॉर्मेंस बैंक गारंटी और एडिशनल बैंक गारंटी जब्त की जा सकती है।

अगर किसी कंपनी को पहले भुगतान किया जा चुका है, तो वह रकम ब्याज समेत वापस ली जा सकती है। ब्याज की दर एसबीआई बेस रेट से दो प्रतिशत ज्यादा या लिबोर प्लस दो प्रतिशत तक हो सकती है।

अगर एजेंट कमीशन या गिफ्ट से जुड़ा मामला सामने आता है, तो वह रकम भी वापस वसूली जाएगी।

30 दिन का शो-कॉज नोटिस अनिवार्य

नए नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भी शामिल किया गया है। अब किसी कंपनी पर सीधे कार्रवाई नहीं होगी। पहले उसे कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा। कंपनी को जवाब देने के लिए 30 दिन का समय मिलेगा।

अगर कंपनी जवाब नहीं देती, तो विभाग एक्स-पार्टी कार्रवाई कर सकता है। लेकिन हर आदेश लिखित कारणों के साथ जारी करना होगा। इसे “स्पीकिंग ऑर्डर” कहा गया है। रक्षा मंत्रालय की विजिलेंस शाखा सस्पेंड और डिबार कंपनियों की सूची वेबसाइट पर अपडेट करेगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में विशेष छूट

हालांकि नियम सख्त किए गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार ने लचीला रुख भी अपनाया है। अगर किसी वेपन सिस्टम का कोई दूसरा विकल्प नहीं है, तो सरकार विशेष अनुमति देकर उसी कंपनी से स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेड या मेंटेनेंस का काम जारी रख सकती है।

इसके लिए सेना के वरिष्ठ अधिकारियों या डीआरडीओ के सक्षम अधिकारी का प्रमाणपत्र जरूरी होगा कि संबंधित उपकरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

यह प्रावधान खास तौर पर उन मामलों के लिए रखा गया है, जहां किसी विदेशी सिस्टम या विशेष तकनीक का विकल्प उपलब्ध नहीं होता।

कर्मचारियों और एजेंटों पर भी कार्रवाई

नए दिशानिर्देशों में केवल कंपनियों ही नहीं, बल्कि उनके कर्मचारियों और एजेंटों को भी दायरे में लाया गया है। अगर किसी एजेंट या कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या अनियमितता की जांच चल रही है, तो उसे रक्षा खरीद प्रक्रिया में हिस्सा लेने से रोका जा सकता है। अगर अदालत में दोष साबित हो जाता है, तो ऐसे व्यक्ति का नाम भी विजिलेंस वेबसाइट पर डाला जाएगा।

रक्षा उद्योग पर पड़ेगा क्या असर

रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि नए नियमों का असर छोटे और बड़े दोनों वेंडर्स पर पड़ेगा। अब केवल कम कीमत पर टेंडर जीतना काफी नहीं होगा। कंपनियों को समय पर सप्लाई, तकनीकी गुणवत्ता और बेहतर सर्विस सपोर्ट भी देना होगा।

एलएंडटी, टाटा, एचएएल, बीईएल, अदाणी डिफेंस जैसी बड़ी कंपनियों के लिए भी परफॉर्मेंस मॉनिटरिंग पहले से ज्यादा सख्त हो जाएगी। वहीं छोटे और मध्यम उद्योगों को भी कॉन्ट्रैक्ट शर्तों का पालन बेहद सावधानी से करना होगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियमों के बाद कंपनियां मर्जर या एक्विजिशन से पहले ड्यू डिलिजेंस ज्यादा गंभीरता से करेंगी, क्योंकि अब पुरानी देनदारियां नई इकाइयों पर भी लागू हो सकती हैं।

पूरे रक्षा मंत्रालय पर लागू होंगे नियम

ये दिशानिर्देश रक्षा मंत्रालय के सभी विभागों पर लागू होंगे। इसमें डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस, डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन, डीआरडीओ, डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स और रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले सभी संगठन शामिल हैं।

दस्तावेज में साफ लिखा गया है कि ये नियम डीएपी, डीपीएम और रक्षा खरीद से जुड़े दूसरे नियमों का हिस्सा माने जाएंगे। रक्षा मंत्रालय ने इसे रक्षा खरीद प्रक्रिया में “पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता” मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया है।

India Tightens Defence Procurement Rules, Up To 10-Year Ban For Corruption And Delayed Supply

LAC और LoC से सटे गांवों में सेना के FM रेडियो स्टेशन बने लोगों की लाइफलाइन, मौसम से रोजगार तक मिल रही हर जानकारी

Indian Army FM Radio Stations
Indian Army FM Radio Stations

Indian Army FM Radio Stations: चीन और पाकिस्तान सीमा से सटे भारत के दूरदराज पहाड़ी इलाकों में अब सिर्फ सेना की चौकियां ही नहीं, बल्कि रेडियो की आवाज भी गूंज रही है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती गांवों में भारतीय सेना की मदद से चल रहे एफएम रेडियो स्टेशन अब स्थानीय लोगों के लिए सूचना, मौसम, खेती, स्वास्थ्य और रोजगार का बड़ा सहारा बनते जा रहे हैं। इन स्टेशनों का मकसद सिर्फ मनोरंजन करना नहीं है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को देश की मुख्यधारा से जोड़ना और अफवाहों का जवाब देना भी है।

भारतीय सेना के ऑपरेशन सद्भावना प्रोजेक्ट और केंद्र सरकार के वाइब्रेंट विलेजे प्रोग्राम के तहत शुरू किए गए ये एफएम स्टेशन अब एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास बसे गांवों की नई पहचान बन रहे हैं। जहां मोबाइल नेटवर्क कमजोर है, इंटरनेट कई बार दिनों तक बंद जैसा रहता है और मौसम के कारण सड़क संपर्क टूट जाता है, वहां यह रेडियो स्टेशन लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद माध्यम बन गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक पिछले करीब डेढ़ साल में हिमाचल प्रदेश में दो और उत्तराखंड में तीन एफएम स्टेशन शुरू किए गए हैं। इन स्टेशनों से हर दिन करीब 12 से 14 घंटे तक प्रसारण होता है। कार्यक्रम स्थानीय भाषाओं और बोलियों में तैयार किए जाते हैं ताकि गांव के लोग आसानी से उन्हें समझ सकें।

Indian Army FM Radio Stations: सीमावर्ती गांवों में क्यों जरूरी हैं ये एफएम स्टेशन

भारत-चीन सीमा से लगे हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांव आज भी नेटवर्क और संचार सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। कई जगहों पर मोबाइल सिग्नल नहीं आता, इंटरनेट बेहद धीमा रहता है और खराब मौसम में पूरा इलाका बाहरी दुनिया से कट जाता है।

ऐसे हालात में रेडियो अभी भी सबसे असरदार माध्यम माना जाता है। सेना और प्रशासन ने महसूस किया कि अगर स्थानीय लोगों तक समय पर सही जानकारी पहुंचानी है तो लोकल एफएम नेटवर्क सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है।

इसी सोच के तहत सेना ने सीमावर्ती गांवों में ऐसे रेडियो स्टेशन शुरू किए, जो सिर्फ समाचार नहीं सुनाते, बल्कि गांवों की अपनी आवाज बनकर उभरे हैं। यहां खेती-किसानी से लेकर बर्फबारी, सड़क बंद होने, लैंडस्लाइड, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी योजनाओं और सेना भर्ती तक की जानकारी दी जाती है।

इन स्टेशनों का एक बड़ा मकसद गलत सूचनाओं और अफवाहों को रोकना भी है। सीमावर्ती इलाकों में कई बार सोशल मीडिया या बाहरी स्रोतों से फैली गलत खबरें लोगों में भ्रम पैदा करती हैं। ऐसे में लोकल रेडियो स्टेशन भरोसेमंद जानकारी का माध्यम बन रहे हैं।

ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेजे प्रोग्राम का हिस्सा

इन एफएम स्टेशनों को भारतीय सेना के “ऑपरेशन सद्भावना” के तहत चलाया जा रहा है। सेना लंबे समय से सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामुदायिक विकास से जुड़े प्रोजेक्ट चलाती रही है।

केंद्र सरकार का “वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम” भी इसी दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य चीन सीमा के पास बसे गांवों को खाली होने से रोकना और वहां बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना है।

सरकार और सेना का मानना है कि अगर सीमावर्ती गांव मजबूत और आबाद रहेंगे तो राष्ट्रीय सुरक्षा भी मजबूत होगी। एफएम स्टेशन इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में कहां चल रहे हैं एफएम स्टेशन

हिमाचल प्रदेश में फिलहाल दो बड़े एफएम स्टेशन चल रहे हैं। दोनों स्टेशन ऐसे इलाकों में हैं जो चीन सीमा के बेहद करीब माने जाते हैं।

पहला स्टेशन “वॉयस ऑफ किन्नौर” है, जो 88.4 एफएम फ्रीक्वेंसी पर चलता है। यह किन्नौर जिले के पूह इलाके में स्थापित किया गया है। यह इलाका हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के पास स्थित है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस स्टेशन से किन्नौरी बोली में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। यहां के कार्यक्रमों का मुख्य फोकस सेब और ड्राई फ्रूट की खेती पर रहता है। किसानों को मंडियों में फलों के ताजा दाम, नई ग्राफ्टिंग तकनीक, कीट नियंत्रण और मौसम की जानकारी दी जाती है।

किन्नौर में अक्सर भारी बर्फबारी और लैंडस्लाइड के कारण सड़कें बंद हो जाती हैं। ऐसे समय में यह स्टेशन लोगों को सड़क की स्थिति और मौसम से जुड़े अलर्ट भी देता है।

दूसरा स्टेशन “वॉयस ऑफ स्पीति” है, जो 88.8 एफएम पर चलता है। यह लाहौल-स्पीति जिले के ग्यू गांव में स्थापित किया गया है। यह इलाका बेहद ऊंचाई पर स्थित है और सर्दियों में कई महीनों तक कट जाता है।

यह स्टेशन स्थानीय बोली में कार्यक्रम प्रसारित करता है। यहां खेती, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों के अलावा लोक संस्कृति पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। गांव के बुजुर्गों की मौखिक कहानियां और लोक गीत भी प्रसारित किए जाते हैं।

उत्तराखंड में तीन बड़े स्टेशन ऑपरेशनल

उत्तराखंड में फिलहाल तीन एफएम स्टेशन काम कर रहे हैं। इनका दायरा बद्रीनाथ, गंगोत्री, हेमकुंड साहिब और कैलाश मानसरोवर यात्रा रूट तक फैला हुआ है।

जोशीमठ में चल रहे स्टेशन का नाम “तराना” है। इसे कई जगह “आइबेक्स तराना 88.4 एफएम” के नाम से भी जाना जाता है। यह स्टेशन चमोली जिले में स्थित है।

जोशीमठ बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब जाने वाले यात्रियों के लिए मुख्य पड़ाव माना जाता है। यहां का रेडियो स्टेशन गढ़वाली और हिंदी भाषा में कार्यक्रम प्रसारित करता है।

इस स्टेशन पर एग्रो-टूरिज्म, पहाड़ी खेती, स्थानीय हस्तशिल्प और टिकाऊ पर्यटन से जुड़े कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। स्थानीय महिलाएं और युवा भी रेडियो कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।

उत्तरकाशी जिले के हर्षिल में भी “आइबेक्स तराना 88.4 एफएम” स्टेशन चल रहा है। यह गंगोत्री मार्ग पर स्थित है। यहां का स्टेशन मौसम, सड़क की स्थिति, बर्फबारी और लैंडस्लाइड की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाता है।

गंगोत्री यात्रा के दौरान हजारों तीर्थयात्री इस इलाके से गुजरते हैं। ऐसे में यह स्टेशन यात्रियों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए उपयोगी साबित हो रहा है।

पिथौरागढ़ में “पंचशूल पल्स 88.4 एफएम” स्टेशन चल रहा है। इसका टैगलाइन है “हिल से दिल तक”। यह स्टेशन लिपुलेख पास की तरफ जाने वाले इलाके में स्थित है, जहां से कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग भी गुजरता है।

यह स्टेशन मुख्य रूप से कृषि और बागवानी पर केंद्रित है। यहां किसानों को फल और सब्जियों की खेती, मौसम और बाजार से जुड़ी जानकारी दी जाती है।

अब चार और स्टेशन शुरू करने की तैयारी

सेना और प्रशासन अब उत्तराखंड में चार और एफएम स्टेशन शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। ये सभी स्टेशन भी चीन सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में बनाए जाएंगे।

इनमें पहला स्टेशन गूंजी में प्रस्तावित है। गूंजी पिथौरागढ़ जिले में भारत-नेपाल-तिब्बत ट्राई-जंक्शन के पास स्थित है। यह इलाका सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

दूसरा स्टेशन धाराली में बनाया जाएगा, जो गंगोत्री के पास स्थित है।

इसके अलावा लैंसडाउन और रानीखेत में भी नए स्टेशन शुरू किए जाने की योजना है। ये दोनों इलाके अपेक्षाकृत निचले पहाड़ी क्षेत्रों में आते हैं।

अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी शुरुआत

पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी भारतीय सेना अब कम्युनिटी रेडियो के जरिए लोगों तक पहुंच बना रही है। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे चीन सीमा से जुड़े दूरदराज क्षेत्रों में सेना की मदद से कई आर्मी-बैक्ड एफएम और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन शुरू किए गए हैं।

ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले के दिरांग इलाके में रेडियो दिरांग 88.4 एफएम शुरू किया गया है। इसकी टैगलाइन है “अपनी मिट्टी, अपनी कहानी”। यह भारत-चीन सीमा के पास स्थित क्षेत्र में स्थापित किया गया है। दिसंबर 2025 में ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने इसका उद्घाटन किया था। इसे ईस्टर्न थिएटर का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है।

यह स्टेशन 4 गजराज कोर द्वारा संचालित किया जा रहा है। यहां स्थानीय संस्कृति, परंपराएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, मौसम और सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। खास बात यह है कि लोग इसे मोबाइल ऐप के जरिए भी सुन सकते हैं। एंड्रॉयड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर इसकी लाइव स्ट्रीमिंग और पॉडकास्ट सुविधा उपलब्ध है।

इसके अलावा सिक्किम में भी सेना ने “रेडियो सिक्किम सुंदरी 88.4 एफएम” शुरू किया है। इसे अप्रैल 2026 में लॉन्च किया गया था। यह सिक्किम का पहला बॉर्डर विलेज कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। यह स्टेशन ट्राई शक्ति कोर के तहत हाई-ऑल्टीट्यूड सीमा क्षेत्र में चलाया जा रहा है।

इस रेडियो स्टेशन पर स्थानीय समाचार, मौसम अपडेट, सरकारी योजनाएं, लोकल संस्कृति और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। सिक्किम के कई गांव कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और कमजोर नेटवर्क की समस्या से जूझते हैं। ऐसे में यह स्टेशन लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रहा है। इसका मोबाइल ऐप भी उपलब्ध है, जिससे लोग कहीं से भी कार्यक्रम सुन सकते हैं। इन रेडियो स्टेशनों से रोज करीब 12 से 14 घंटे या उससे ज्यादा समय तक प्रसारण किया जाता है। कार्यक्रम स्थानीय भाषाओं और बोलियों में तैयार किए जाते हैं ताकि गांव के लोग आसानी से समझ सकें।

लद्दाख में भी सेना चला रही है पांच स्टेशन

लद्दाख के दूर-दराज और भारत-चीन सीमा से जुड़े इलाकों में भी भारतीय सेना रेडियो के जरिए लोगों तक जरूरी जानकारी भी पहुंचा रही है। इन रेडियो स्टेशनों से स्थानीय लोगों को मौसम, बर्फबारी, सड़क बंद होने, सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती और सेना भर्ती जैसी जानकारी मिलती है। खास बात यह है कि कार्यक्रम लद्दाखी, शीना, हिंदी और दूसरी लोकल भाषाओं में प्रसारित किए जाते हैं, ताकि गांव के लोग आसानी से समझ सकें।

लेह में “एफएम यांग स्यान” नाम का स्टेशन 90 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी पर चलता है। इसे जून 2024 में शुरू किया गया था। यह स्टेशन फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के तहत चलता है। यहां लोकल संस्कृति, युवाओं से जुड़े कार्यक्रम, शिक्षा और सामुदायिक मुद्दों पर प्रसारण होता है। इसका सिग्नल लेह और आसपास के इलाकों तक पहुंचता है।

कारगिल जिले की द्रास घाटी में “रेडियो द्रास” या “सीआरएस द्रास 90.4 एफएम” चल रहा है। द्रास को दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा आबादी वाला इलाका माना जाता है। इस स्टेशन की टैगलाइन “दिल की धड़कन” रखी गई है। यहां मौसम अलर्ट, लैंडस्लाइड, सरकारी योजनाएं, स्वास्थ्य और खेती से जुड़ी जानकारी दी जाती है। यह स्टेशन लोकल लोगों के लिए काफी मददगार माना जा रहा है। इसकी लाइव स्ट्रीमिंग भी उपलब्ध है। स्टेशन को सेना ने शुरू किया, लेकिन अब इसमें स्थानीय लोग भी काम कर रहे हैं।

इसके अलावा लेह जिले के बेहद दूरदराज इलाके हानले में “सीआरएस अनले” या “कम्युनिटी रेडियो हनले” 89.6 मेगाहर्ट्ज पर चलता है। इसे नवंबर 2024 में शुरू किया गया था। इस इलाके को तारों से भरे आसमान के लिए जाना जाता है, इसलिए इसकी टैगलाइन “जहां सितारे मिले” रखी गई। यहां लद्दाखी, हिंदी और अंग्रेजी में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। स्टेशन पर शिक्षा, मनोरंजन, लोकल संस्कृति और जरूरी सूचनाओं से जुड़े शो चलते हैं।

कारू इलाके में भी सेना ने एक कम्युनिटी रेडियो स्टेशन शुरू किया है। यह भी ऑपरेशन सद्भावना प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इसका मकसद आसपास के गांवों को जानकारी और संचार से जोड़ना है।

वहीं, नुब्रा वैली के त्याक्षी गांव में “रेडियो श्योक” 89.2 एफएम पर प्रसारण करता है। इसे 3 कुमाऊं राइफल्स मैनेज करती है। यहां शिक्षा, बॉर्डर गांवों के विकास, युवाओं के मोटिवेशन और लोकल न्यूज पर कार्यक्रम होते हैं। हाल ही में शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने यहां पॉडकास्ट भी रिकॉर्ड किए थे।

लद्दाख में ऐसे पांच से ज्यादा रेडियो स्टेशन सेना के सहयोग से चल रहे हैं। ये स्टेशन रोज करीब 12 से 14 घंटे या उससे ज्यादा समय तक प्रसारण करते हैं।

पाकिस्तान से सटे इलाकों में भी चल रहे हैं स्टेशन

केवल चीन सीमा से सटे इलाके ही नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान सीमा यानी एलओसी के पास भी भारतीय सेना अब कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों के जरिए लोगों तक पहुंच बना रही है।

एलओसी पर सबसे प्रमुख स्टेशन “रेडियो संगम 88.8 एफएम” माना जाता है। यह जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के केरी गांव में स्थित है। यह गांव एलओसी से करीब एक किलोमीटर दूर है। जनवरी 2026 में भारतीय सेना और सिविल प्रशासन ने मिलकर इसे शुरू किया था।

रेडियो संगम को एलओसी का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। इसकी आवाज पाकिस्तान की तरफ भी सुनी जा सकती है। यहां स्थानीय मुद्दों, सरकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और लोकल संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं।

इसके अलावा कुपवाड़ा जिले के तंगधार-कर्नाह इलाके में “रूह-ए-कर्नाह” नाम का स्टेशन भी चल रहा है। यह इलाका एलओसी के बेहद करीब माना जाता है। इस स्टेशन का मुख्य फोकस स्थानीय कला, संगीत, सामुदायिक कहानियां, शिक्षा और सकारात्मक संदेशों पर है। इसका उद्देश्य सीमावर्ती गांवों की आवाज को सामने लाना है।

कुपवाड़ा के त्रेहगाम इलाके में “रेडियो चिनार” भी शुरू किया गया था। यहां युवाओं से जुड़े कार्यक्रमों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा बारामूला और दूसरे सीमावर्ती इलाकों में भी सेना की मदद से ऐसे रेडियो प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं।

वहीं एलओसी से सटे कारगिल-द्रास इलाके में भी सेना की मदद से “रेडियो द्रास 90.4 एफएम” चलाया जा रहा है। यह द्रास घाटी में स्थित है, जिसे दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा आबादी वाला इलाका कहा जाता है। इसकी टैगलाइन “दिल की धड़कन” रखी गई है।

इस स्टेशन की शुरुआत फरवरी 2023 में फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेन गुप्ता ने की थी। यहां हिंदी, उर्दू और शीना भाषा में कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इसका कवरेज द्रास और आसपास के गांवों तक फैला हुआ है।

रेडियो द्रास पर सरकारी योजनाएं, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं और युवाओं से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। साथ ही मौसम, बर्फबारी, पर्यटन और लोकल संस्कृति पर भी शो चलते हैं।

यह स्टेशन मुश्कोह वैली, कारगिल वॉर मेमोरियल और आसपास के पर्यटन स्थलों की जानकारी भी देता है। लोकल फोक म्यूजिक और सामुदायिक कार्यक्रम यहां की खास पहचान बन चुके हैं।

कारगिल शहर में “आरगाजोम 90.8 मेगाहर्ट्ज” नाम का एक और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन भी है। इसे 2022 में शुरू किया गया था और इसे लद्दाख का पहला कम्युनिटी रेडियो स्टेशन माना जाता है। इसे भी भारतीय सेना का सहयोग मिला हुआ है।

सिर्फ मनोरंजन नहीं, सुरक्षा से भी जुड़ा मिशन

इन रेडियो स्टेशनों को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना जा रहा। सेना इन्हें सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक और रणनीतिक जुड़ाव के रूप में देख रही है।

सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोग कई बार खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। ऐसे में जब उनकी अपनी भाषा में रेडियो कार्यक्रम चलते हैं तो उनमें अपनापन पैदा होता है।

इन स्टेशनों पर सेना भर्ती से जुड़ी जानकारी भी दी जाती है। स्थानीय युवाओं को भर्ती प्रक्रिया, शारीरिक तैयारी और जरूरी दस्तावेजों के बारे में बताया जाता है।

सरकारी योजनाओं की जानकारी भी लगातार प्रसारित की जाती है ताकि गांवों तक सही जानकारी पहुंच सके।

लोक संस्कृति को भी मिल रहा नया मंच

इन एफएम स्टेशनों का एक बड़ा असर स्थानीय संस्कृति पर भी पड़ा है। पहाड़ी इलाकों के कई लोक गीत और परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थीं।

अब रेडियो पर लोक संगीत, पारंपरिक कहानियां और स्थानीय इतिहास को जगह मिल रही है। बुजुर्ग अपनी पुरानी यादें और अनुभव साझा करते हैं। महिलाएं लोक गीत गाती हैं और युवा रेडियो एंकरिंग सीख रहे हैं।

कई जगह किसानों और महिला स्वयं सहायता समूहों को भी रेडियो पर अपनी बात रखने का मौका दिया जा रहा है।

मौसम और आपदा अलर्ट में बड़ी मदद

हिमालयी इलाकों में मौसम बेहद तेजी से बदलता है। कई बार अचानक बर्फबारी, बारिश या लैंडस्लाइड होने से लोग फंस जाते हैं। ऐसे समय में ये एफएम स्टेशन तुरंत अलर्ट जारी करते हैं। किस सड़क पर भूस्खलन हुआ, कहां बर्फ ज्यादा है, कौन सा रास्ता बंद है, ऐसी जानकारी लगातार प्रसारित की जाती है। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड और चारधाम यात्रा मार्गों पर यह जानकारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

स्थानीय लोग भी बन रहे हैं रेडियो की आवाज

इन स्टेशनों की खास बात यह है कि यहां सिर्फ बाहरी लोग कार्यक्रम नहीं चलाते। स्थानीय युवाओं, महिलाओं और शिक्षकों को भी प्रशिक्षण देकर कार्यक्रमों से जोड़ा गया है। कई कार्यक्रम गांव के लोग खुद तैयार करते हैं। इससे रेडियो स्टेशन स्थानीय समुदाय का हिस्सा बन गए हैं। रेडियो पर खेती की समस्याओं पर चर्चा होती है, बच्चों के लिए शैक्षणिक कार्यक्रम चलते हैं और स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाक के बीच ‘सीक्रेट डायलॉग’! पूर्व विदेश सचिव और रॉ चीफ ने उठाए सवाल

India-Pakistan Track 2 Talks
Former Foreign Secretary Kanwal Sibal and Formerly R& AW Chief Vikram Sood..

India-Pakistan Track 2 Talks: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर बैक चैनल बातचीत को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत और पाकिस्तान के रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों और पूर्व राजनयिकों के बीच तीसरे देशों में ट्रैक-2 मीटिंग्स हुई हैं। इन बैठकों को लेकर अब देश के रणनीतिक और सुरक्षा हलकों में बहस छिड़ गई है।

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद जैसे वरिष्ठ अधिकारियों ने इन बैठकों को लेकर खुलकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं दिख रहा, तब भारत में कुछ लॉबी फिर से पाकिस्तान के साथ बातचीत बहाल करने का माहौल बनाने में जुटी है।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले तीन महीनों में भारत और पाकिस्तान के रिटायर्ड जनरलों और पूर्व डिप्लोमैट्स के बीच कम से कम दो अनौपचारिक बैठकें हो चुकी हैं। इनमें से एक बैठक कतर में हुई, जबकि दूसरी किसी अन्य एशियाई देश की राजधानी में आयोजित की गई।

India-Pakistan Track 2 Talks: क्या है ट्रैक-2 बातचीत का मकसद

ट्रैक-2 डायलॉग ऐसे अनौपचारिक संवाद होते हैं, जिनमें सरकार के मौजूदा अधिकारी शामिल नहीं होते। इसमें रिटायर्ड सैन्य अधिकारी, पूर्व राजनयिक, थिंक टैंक विशेषज्ञ या रणनीतिक मामलों के जानकार हिस्सा लेते हैं।

आमतौर पर इन बैठकों का मकसद दोनों देशों के बीच तनाव कम करना, एक-दूसरे की सोच को समझना और संकट की स्थिति में बातचीत के रास्ते खुले रखना होता है। हालांकि इनका कोई आधिकारिक दर्जा नहीं होता।

भारत और पाकिस्तान के बीच पहले भी कई बार ऐसे ट्रैक-2 संपर्क होते रहे हैं। अतीत में बैंकॉक, दुबई, कतर और यूरोप के कुछ देशों में ऐसी बैठकें आयोजित की जाती रही हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार हुईं ऐसी बैठकें

रिपोर्ट के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहली बार है जब दोनों देशों के पूर्व अधिकारियों के बीच इस तरह की बातचीत हुई है।

पाकिस्तान समर्थक आतंकी संगठनों ने 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले को अंजाम दिया था। जिसके बाद भारत ने 6-7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था, जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच चार दिन तक सैन्य तनाव बना रहा।

उस दौरान डीजीएमओ हॉटलाइन के अलावा कोई एक्टिव कम्यूनिकेशन सिस्टम नहीं था। अब माना जा रहा है कि इसी अनुभव के बाद कुछ रणनीतिक हलकों में यह सोच बनी कि अगर भविष्य में कोई बड़ा संकट पैदा होता है, तो कम से कम कोई एक अनौपचारिक कम्यूनिकेशन सिस्टम मौजूद होना चाहिए।

एनएसए अजित डोभाल के ऑफिस तक पहुंची जानकारी

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि इन बैठकों की जानकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल के कार्यालय तक पहुंचाई गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट (NSCS) को पाकिस्तान की तरफ से दिखाई गई “विलिंगनेस” यानी बातचीत की इच्छा के बारे में भी जानकारी दी गई है।

हालांकि अभी तक भारत सरकार की तरफ से किसी आधिकारिक बैक चैनल को मंजूरी नहीं दी गई है।

सूत्रों के हवाले से कहा गया कि यह कोई औपचारिक बातचीत नहीं है, बल्कि केवल क्राइसिस मैनेजमेंट के दौरान कम्यूनिकेशन सिस्टम के संभावित विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

भारत की नीति में बदलाव नहीं

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि भारत की आधिकारिक नीति अभी भी वही है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का मानना है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद खत्म किए बिना औपचारिक बातचीत का कोई मतलब नहीं है। इसी वजह से इन ट्रैक-2 बैठकों को किसी नए शांति प्रयास या आधिकारिक डायलॉग की शुरुआत नहीं माना जा रहा।

पूर्व विदेश सचिव ने उठाए सवाल

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इन बैठकों को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मीडिया में ‘सूत्रों’ के जरिए जानबूझकर ऐसी खबरें प्लांट की जा रही हैं, ताकि भारत में पाकिस्तान के साथ फिर से बैक चैनल डायलॉग शुरू करने के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

कंवल सिब्बल ने लिखा कि कुछ अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय लॉबी इन बैठकों को बढ़ावा दे रही हैं। उनका कहना था कि इन रिपोर्टों का उद्देश्य यह दिखाना है कि आधिकारिक बातचीत बंद होने के कारण पैदा हुए “वैक्यूम” को भरने के लिए ट्रैक-2 डायलॉग जरूरी है।

उनके मुताबिक अमेरिका और पाकिस्तान के बेहतर होते संबंधों को देखकर कुछ लोग चाहते हैं कि भारत खुद ही पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू कर दे, ताकि भविष्य में अमेरिका का दबाव न बढ़े।

सिब्बल का आरोप है कि कुछ लोग चाहते हैं कि भारत पाकिस्तान के प्रति अपनी सख्त नीति को नरम कर दे, जबकि पाकिस्तान की सोच और भारत विरोधी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है।

उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक माहौल पहले जैसा मजबूत नहीं रहा और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की भारत की कोशिशें भी पूरी तरह सफल नहीं हुईं हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब पाकिस्तान की भारत विरोधी नीति में कोई बदलाव नहीं आया, तब भारत को अपनी मूल नीति क्यों बदलनी चाहिए। कंवल सिब्बल ने इसे “व्यावहारिक कूटनीति” के नाम पर “हार मानने वाली सोच” बताया। उनका कहना है कि इससे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को दिया गया सख्त संदेश कमजोर पड़ सकता है।

उनके मुताबिक कुछ लोग अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में आई गर्माहट के कारण भारत को डिफेंसिव पोजिशन स्थिति में धकेलना चाहते हैं। उन्होंने इसे “प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी” के नाम पर “डिफीटिस्ट एटीट्यूड” बताया।

पूर्व रॉ चीफ ने भी जताई चिंता

रॉ के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद ने भी कंवल सिब्बल की बातों का समर्थन किया। विक्रम सूद ने कहा कि भारत में कुछ लोग पाकिस्तान की असली सोच को समझना ही नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि हर बार जब पाकिस्तान किसी मुश्किल में फंसता है, तब वह भारत में शांति और बातचीत की बात करने वाले लोगों को आगे कर देता है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की मानसिकता और नीतियां नहीं बदलेंगी।

विक्रम सूद ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने इस्लामिक और जिहादी विचारधारा की बात की थी।

उन्होंने कहा कि भारत की मौजूदा नीति, पाकिस्तान को नजरअंदाज करना और जरूरत पड़ने पर जवाब देना, फिलहाल सही तरीके से काम कर रही है।

अमेरिका फैक्टर क्यों बना चर्चा का विषय

इस पूरे मामले में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है। सूत्रों के हवाले से कहा गया कि पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके करीबी अधिकारियों ने पाकिस्तान के नेतृत्व, खासकर फील्ड मार्शल असीम मुनीर को खुला समर्थन दिया है।

सूत्रों के मुताबिक भारत को चिंता है कि अगर भविष्य में कोई बड़ा आतंकी हमला होता है, तो पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। इसी वजह से भारत चाहता है कि उसके पास अपने “पॉइंट्स ऑफ एंगेजमेंट” मौजूद रहें, ताकि किसी संकट की स्थिति में अमेरिका सीधे हस्तक्षेप न करे।

क्या भारत पर अमेरिकी दबाव है?

इस पूरे विवाद के बीच सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जाने लगा कि अमेरिका भारत पर पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने का दबाव बना रहा है। हालांकि सूत्रों ने इस पर कुछ नहीं कहा, लेकिन ये जरूर कहा कि भारत खुद चाहता है कि कोई ऐसा अनौपचारिक चैनल मौजूद रहे, जिससे किसी संकट के समय तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से बचा जा सके।

सूत्रों ने कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। ऐसे में किसी भी बड़े सैन्य तनाव के दौरान वैश्विक दबाव बढ़ सकता है। इसी कारण कुछ रणनीतिक हलकों में यह सोच उभरी है कि कम से कम संवाद का एक सीमित और अनौपचारिक रास्ता खुला रहना चाहिए।

पाकिस्तान में भी पावर स्ट्रक्चर में बदलाव

इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान में भी पावर स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव हुआ है। पिछले साल 30 अप्रैल को पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद असीम मलिक को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी नियुक्त किया गया। वह पाकिस्तान के पहले ऐसे एनएसए बने हैं जो एक साथ आईएसआई चीफ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दोनों पद संभाल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तान में सैन्य और नागरिक सत्ता केंद्र लगभग एक हो गए हैं। यानी पाकिस्तान की सुरक्षा और विदेश नीति पर अब सेना का नियंत्रण पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है।

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान की तरफ से इन ट्रैक-2 मीटिंग्स को संभव बनाने में अब पाकिस्तान के एनएसए और आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक की अहम भूमिका मानी जा रही है। उनक कहना है कि मई 2025 में एनएसए बनने के बाद असीम मलिक ने बैकडोर कम्युनिकेशन चैनल फिर से एक्टिव किए।

पहले ऐसी बैठकों में पाकिस्तान की तरफ से रिटायर्ड जनरल या पूर्व डिप्लोमैट शामिल होते थे, जिनकी बात को ज्यादा आधिकारिक नहीं माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब इन मीटिंग्स में ऐसे लोग शामिल बताए जा रहे हैं जो सीधे पाकिस्तान के असली पावर सेंटर यानी आर्मी और आईएसआई के करीब हैं।

इसका मतलब है कि बातचीत में जो भी चर्चा होती है, उसकी जानकारी सीधे पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व तक पहुंच सकती है। इसलिए अब ट्रैक-2 मीटिंग्स को पहले से ज्यादा “अथॉरिटेटिव” माना जा रहा है। वहीं, भारतीय पक्ष में भी इन बैठकों पर नजर रखी जा रही है। बताया जा रहा है कि अजित डोभाल का ऑफिस इन मीटिंग्स की जानकारी ले रहा है। सूत्रों का कहना है कि मई 2025 के बाद से डोभाल और असीम मलिक के बीच इनडायरेक्ट संपर्क चैनल भी मौजूद है।

इसी वजह से अब ट्रैक-2 बातचीत को सिर्फ रिटायर्ड अधिकारियों की औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे किसी बड़े संकट की स्थिति में “क्राइसिस मैनेजमेंट बैकअप” के तौर पर देखा जा रहा है।

पहले भी चलती रही हैं बैक चैनल बातचीत

भारत और पाकिस्तान के बीच बैक चैनल संपर्क कोई नई बात नहीं है। 2015 से 2018 के बीच एनएसए अजित डोभाल और पाकिस्तान के तत्कालीन एनएसए नासिर खान जंजुआ के बीच कई गुप्त बैठकें हुई थीं।

बाद में यह भी सामने आया कि डोभाल की बातचीत पाकिस्तान के पूर्व एनएसए मोईद यूसुफ और सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से भी होती रही थी। इन बैठकों का मकसद सीमा तनाव कम करना और सैन्य टकराव को रोकना बताया गया था। हालांकि इन प्रयासों के बावजूद भारत-पाकिस्तान संबंधों में स्थायी सुधार नहीं हो पाया।

Explainer: हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने के करीब पहुंचा भारत! DRDO ने किया 20 मिनट तक स्क्रैमजेट इंजन का सफल टेस्ट

DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test
DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test

DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test: भारत ने हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी को लेकर बड़ी कामयाबी हासिल की है। डीआरडीओ ने एक्टिवली कूल्ड फुल स्केल स्क्रैमजेट कॉम्बस्टर का 1200 सेकंड से ज्यादा समय तक सफल ट्रायल किया है। यह टेस्ट डीआरडीओ की अत्याधुनिक “स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट फैसिलिटी” में किया गया। डीआरडीओ के मुताबिक यह ट्रायल करीब 20 मिनट तक चला, जो हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी के लिए बेहद बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पहले डीआरडीओ ने इसी साल जनवरी में इसी सिस्टम का 700 सेकंड का टेस्ट किया था।

रक्षा मंत्रालय ने इसे भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम में बड़ी कामयाबी बताया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, इंडस्ट्री पार्टनर्स और वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि भारत के हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की मजबूत नींव बनेगी। आइए जानते हैं इस टेस्ट के बारे में…

DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test: क्या होती है हाइपरसोनिक मिसाइल

हाइपरसोनिक मिसाइलें दुनिया की सबसे खतरनाक और तेज हथियारों में गिनी जाती हैं। ऐसी मिसाइलें ध्वनि की रफ्तार से पांच गुना या उससे ज्यादा रफ्तार से उड़ती हैं।

जहां ध्वनि की रफ्तार लगभग 1235 किलोमीटर प्रति घंटा मानी जाती है। वहीं, मैक-5 की स्पीड लगभग 6100 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। कई हाइपरसोनिक सिस्टम मैक-10 से लेकर मैक-20 तक की रफ्तार हासिल कर सकते हैं।

इतनी तेज गति की वजह से इन्हें रोकना बेहद मुश्किल होता है। आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी ऐसी मिसाइलों को आसानी से इंटरसेप्ट नहीं कर पाते हैं।

जहां सामान्य बैलिस्टिक मिसाइलें तय रास्ते पर चलती हैं, लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइलें उड़ान के दौरान दिशा बदल सकती हैं। यही वजह है कि रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए इनको ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

दो तरह की होती हैं हाइपरसोनिक मिसाइलें

विशेषज्ञ हाइपरसोनिक हथियारों को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटते हैं। पहली होती है हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल यानी एचजीवी। इसमें मिसाइल को पहले रॉकेट से ऊंचाई तक ले जाया जाता है और फिर वह ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंचती है।

दूसरी होती है हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल यानी एचसीएम। यह स्क्रैमजेट इंजन की मदद से लगातार हाइपरसोनिक स्पीड पर उड़ सकती है। डीआरडीओ ने हाल ही में जो टेस्ट किया है वह हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल यानी एचसीएम का ही है।

क्या होता है स्क्रैमजेट इंजन

स्क्रैमजेट का पूरा नाम “सुपरसोनिक कंबशन रैमजेट” है। यह एक खास तरह का एयर ब्रीदिंग इंजन होता है। सामान्य जेट इंजन में टर्बाइन और कई घूमने वाले हिस्से होते हैं, लेकिन स्क्रैमजेट इंजन में ऐसा नहीं होता। इसमें हवा बहुत तेज रफ्तार से इंजन के अंदर जाती है और उसी दौरान ईंधन के साथ उसका कंबस्शन यानी दहन होता है।

यह तकनीक बेहद मुश्किल मानी जाती है क्योंकि हाइपरसोनिक स्पीड पर इंजन के अंदर आने वाली हवा का तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच जाता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक मैक-6 या उससे ज्यादा रफ्तार पर तापमान 2000 से 3000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इतनी गर्मी में आम मेटल भी पिघल सकता है।

यही वजह है कि स्क्रैमजेट इंजन को डेवलप करना दुनिया की सबसे कठिन डिफेंस टेक्नोलॉजी में गिना जाता है।

डीआरडीओ ने यह परीक्षण हैदराबाद स्थित “स्क्रैमजेट कनेक्ट पाइप टेस्ट फैसिलिटी” में किया। इस फैसिलिटी में जमीन पर ही ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं, जैसी हाइपरसोनिक उड़ान के दौरान होती हैं। टेस्ट के दौरान इंजन को लगातार हाइपरसोनिक एयरफ्लो दिया गया और पूरे समय उसके तापमान, दहन, दबाव और एयरफ्लो की निगरानी की गई। वैज्ञानिकों के मुताबिक टेस्ट ने एक्टिव कूल्ड स्क्रैमजेट डिजाइन और टेस्ट फैसिलिटी दोनों को सफलतापूर्वक वैलिडेट किया।

सबसे बड़ी चुनौती थी इंजन को ठंडा रखना

डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंजन के कॉम्बस्टर को सुरक्षित रखना होता है। कॉम्बस्टर वह हिस्सा होता है जहां हवा और ईंधन मिलकर जलते हैं। हाइपरसोनिक स्पीड पर यह हिस्सा बेहद गर्म हो जाता है।
लेकिन “एक्टिव कूलिंग” तकनीक के जरिए इसका हल निकाला जाता है।

डीआरडीओ ने ऐसा सिस्टम तैयार किया जिसमें ईंधन को पहले इंजन की दीवारों के आसपास घुमाया जाता है। इससे ईंधन गर्मी को सोख लेता है और इंजन ठंडा रहता है। उसके बाद वही ईंधन कंबस्शन के लिए इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए स्वदेशी “लिक्विड हाइड्रोकार्बन एंडोथर्मिक फ्यूल” डेवलप किया है।

1200 सेकंड का टेस्ट क्यों है अहम

हाइपरसोनिक इंजन को कुछ सेकंड तक चलाना ही बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। लेकिन डीआरडीओ ने इसे 1200 सेकंड यानी 20 मिनट से ज्यादा समय तक सफलतापूर्वक चलाया। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतना लंबा रन टाइम दिखाता है कि भारत अब लंबे समय तक उड़ान भरने वाली हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ चुका है।

वहीं, डीआरडीओ ने फुल स्केल यानी वास्तविक आकार के कॉम्बस्टर का परीक्षण किया। इसका मतलब है कि डीआरडीओ इस तकनीक में काफी आगे तक कदम बढ़ा चुका है।

भारत पिछले कई सालों से हाइपरसोनिक तकनीक पर काम कर रहा है। डीआरडीओ ने 2016 के आसपास “हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल” यानी एचएसटीडीवी प्रोग्राम शुरू किया था।

2020 में डीआरडीओ ने पहली बार मैक-6 स्पीड पर स्क्रैमजेट तकनीक का सफल प्रदर्शन किया था। उस समय यह टेस्ट कुछ सेकंड तक चला था। इसके बाद लगातार इंजन डिजाइन, एयरफ्लो कंट्रोल, थर्मल मैनेजमेंट और फ्यूल सिस्टम पर काम हुआ।

इस साल जनवरी में डीआरडीओ ने 700 सेकंड का लंबा परीक्षण किया। अब मई 2026 में यह अवधि बढ़कर 1200 सेकंड से ज्यादा हो गई है।

किन तकनीकों का हुआ इस्तेमाल

डीआरडीओ ने इस परीक्षण में कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। वैज्ञानिकों ने हाई टेम्परेचर थर्मल बैरियर कोटिंग का उपयोग किया, जो इंजन को अत्यधिक गर्मी से बचाती है। इसके अलावा एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों और खास सुपर अलॉय मटेरियल का भी इस्तेमाल किया गया।

सूत्रों के मुताबिक कुछ हिस्सों में 3डी प्रिंटिंग आधारित निर्माण तकनीक भी इस्तेमाल की गई। यह पूरा सिस्टम डीआरडीओ की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी ने डिजाइन किया जबकि कई भारतीय इंडस्ट्री पार्टनर्स ने इसके निर्माण में सहयोग दिया।

हाइपरसोनिक मिसाइलें बदल देंगी युद्ध का तरीका

दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतें अब हाइपरसोनिक हथियारों पर तेजी से काम कर रही हैं। रूस के पास जिरकोन और अवांगार्ड जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। वहीं, चीन डीएफ-17 और दूसरे हाइपरसोनिक सिस्टम पर काम कर चुका है। जबकि अमेरिका भी एचएडब्ल्यूसी और एक्स-51 वेवराइडर जैसे प्रोग्राम चला रहा है।

हाइपरसोनिक मिसाइलों की सबसे बड़ी ताकत उनकी गति और मैन्यूवर करने की क्षमता है। ये मिसाइलें दुश्मन के एयर डिफेंस नेटवर्क को चकमा देकर बेहद कम समय में हमला कर सकती हैं। यही वजह है कि इन्हें भविष्य के युद्ध का अहम हथियार माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक के सफल होने से भारत की स्ट्राइक क्षमता काफी मजबूत होगी। ऐसी मिसाइलें समुद्र, जमीन या हवा से लॉन्च की जा सकती हैं। इनका इस्तेमाल दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड सेंटर, रडार स्टेशन और हाई वैल्यू टारगेट्स पर तेज हमला करने के लिए किया जा सकता है। इतनी तेज रफ्तार की वजह से दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय बहुत कम मिलेगा।

डीआरडीओ के इस प्रोजेक्ट में कई इंडस्ट्री पार्टनर्स, निजी कंपनियां और शैक्षणिक संस्थानों ने भी सहयोग किया।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और कई निजी कंपनियों ने अलग-अलग तकनीकी हिस्सों पर काम किया। आईआईटी और आईआईएससी जैसे संस्थानों के वैज्ञानिक भी रिसर्च में शामिल रहे है।

डिफेंस गलियारों में इस टेस्ट को ब्रह्मोस-2 जैसी भविष्य की हाइपरसोनिक मिसाइल परियोजनाओं से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि डीआरडीओ ने किसी विशेष मिसाइल का नाम नहीं लिया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी लंबी अवधि का स्क्रैमजेट टेस्ट भविष्य की लंबी दूरी वाली हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के लिए बेहद अहम कदम है। भारत पहले ही ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है। अब हाइपरसोनिक तकनीक को अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।

DRDO Achieves Major Breakthrough In Hypersonic Missile Technology With 1200-Second Scramjet Test

एक ‘अग्नि-6’ मिसाइल और कई निशाने…MIRV टेस्ट से बढ़ेगी चीन-पाकिस्तान की टेंशन!

Agni MIRV Missile Test
Agni MIRV Missile Test

Agni MIRV Missile Test: भारत ने 8 मई 2026 को ओडिशा तट से एडवांस अग्नि मिसाइल का सफल फ्लाइट ट्रायल कर अपनी लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता का बड़ा प्रदर्शन किया। इस परीक्षण की सबसे अहम बात यह रही कि मिसाइल में मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेड री-एंट्री व्हीकल (MIRV) सिस्टम लगाया गया था। इसका मतलब यह है कि अब एक ही मिसाइल अलग-अलग दिशाओं में मौजूद कई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है।

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक यह परीक्षण डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया। मिसाइल में कई पेलोड लगाए गए थे, जिन्हें भारतीय महासागर क्षेत्र में फैले अलग-अलग लक्ष्यों की तरफ भेजा गया। ग्राउंड और शिप आधारित ट्रैकिंग सिस्टम ने लॉन्च से लेकर सभी पेलोड के लक्ष्य तक पहुंचने तक पूरी उड़ान को मॉनिटर किया। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि परीक्षण के सभी मिशन आब्जेक्टिव्स सफलतापूर्वक हासिल हुए।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, भारतीय सेना और रक्षा उद्योग को इस सफलता पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह परीक्षण देश की रक्षा तैयारियों को नई ताकत देगा।

Agni MIRV Missile Test: क्या है यह नई अग्नि-6 मिसाइल?

हालांकि डीआरडीओ ने आधिकारिक तौर पर मिसाइल का नाम सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन रक्षा सूत्रों ने इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) श्रेणी का परीक्षण बताया गया। एक सूत्र ने कहा कि यह परीक्षण आईसीबीएम कैटेगरी का था, भले ही इसका डिजाइन पारंपरिक अग्नि-6 जैसा न दिखता हो।

इससे पहले डीआरडीओ चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत भी कह चुके थे कि अग्नि-6 कार्यक्रम को लेकर उनकी तकनीकी तैयारियां पूरी हैं और सरकार की मंजूरी मिलते ही आगे बढ़ा जाएगा।

परीक्षण से पहले भारत ने 6 से 9 मई के लिए बंगाल की खाड़ी में 3600 किलोमीटर क्षेत्र के लिए NOTMAR यानी नोटिस टू मेरिनर्स जारी किया था। यह आमतौर पर बड़े मिसाइल परीक्षणों से पहले किया जाता है ताकि समुद्री और हवाई क्षेत्र सुरक्षित रखा जा सके।

8 मई की शाम को मिसाइल को ओडिशा तट पर मौजूद डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्च किया गया। यह द्वीप पहले व्हीलर आइलैंड के नाम से जाना जाता था और डीआरडीओ के प्रमुख मिसाइल परीक्षण केंद्रों में शामिल है।

मिसाइल के लॉन्च होते ही ग्राउंड आधारित रडार, टेलीमेट्री सिस्टम और समुद्र में तैनात ट्रैकिंग जहाजों ने इसकी उड़ान पर नजर रखी। मिसाइल ने तय रास्ते का पालन किया और उसके सभी पेलोड अलग-अलग लक्ष्यों की तरफ बढ़े।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक पूरे मिशन के दौरान सभी सिस्टम सामान्य तरीके से काम करते रहे और सभी पेलोड अपने निर्धारित क्षेत्रों तक पहुंचे।

किन तकनीकों का हुआ इस्तेमाल

एडवांस अग्नि मिसाइल में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया माना जा रहा है। इनमें एडवांस नेविगेशन सिस्टम, हाई प्रिसिजन गाइडेंस, री-एंट्री टेक्नोलॉजी और मल्टीपल पेलोड डिप्लॉयमेंट शामिल हैं।

री-एंट्री टेक्नोलॉजी सबसे अहम मानी जाती है। जब मिसाइल अंतरिक्ष जैसी ऊंचाई से वापस वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच सकता है। ऐसे में वॉरहेड को सुरक्षित रखना बेहद कठिन होता है।

रक्षा वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तरह की तकनीक केवल कुछ देशों के पास ही होती है।

रफ्तार करीब मैक 24 तक

इस एडवांस अग्नि मिसाइल की सबसे ज्यादा स्पीड तब होती है, जब इसका री-एंट्री व्हीकल यानी MIRV पेलोड अंतरिक्ष से वापस धरती के वायुमंडल में प्रवेश करता है। इस दौरान इसकी रफ्तार करीब मैक 24 तक पहुंच जाती है। जो आवाज की गति से 24 गुना ज्यादा तेज होती है। इसकी स्पीड लगभग 29,400 किलोमीटर प्रति घंटा या करीब 8 किलोमीटर प्रति सेकंड मानी जाती है।

बैलिस्टिक मिसाइल की उड़ान कई चरणों में होती है। शुरुआत में जब मिसाइल लॉन्च होती है और उसका रॉकेट इंजन जल रहा होता है, तब उसकी गति धीरे-धीरे बढ़ती है। इसके बाद मिसाइल अंतरिक्ष में पहुंचती है, जहां वह मिड-कोर्स फेज में तय रास्ते पर आगे बढ़ती है।

सबसे अहम चरण टर्मिनल फेज होता है। इसी समय मिसाइल का री-एंट्री व्हीकल बहुत तेज गति से धरती की तरफ लौटता है। यही वह चरण होता है, जब इसकी स्पीड मैक 20 से मैक 25 तक पहुंच सकती है। अग्नि-5 के लिए भी करीब मैक 24 की स्पीड बताई जाती है और इस नई एडवांस अग्नि मिसाइल की गति भी लगभग इसी स्तर की मानी जा रही है।

MIRV तकनीक की वजह से एक ही मिसाइल के अंदर मौजूद अलग-अलग पेलोड अलग दिशाओं में जाकर अलग-अलग टारगेट को निशाना बना सकते हैं। हालांकि उनकी मुख्य री-एंट्री स्पीड बेहद ज्यादा रहती है।

इतनी तेज गति का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि दुश्मन के एयर डिफेंस और मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। दुनिया की दूसरी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें भी लगभग इसी स्पीड रेंज में उड़ती हैं।

क्या होती है ICBM मिसाइल

आईसीबीएम यानी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल ऐसी लंबी दूरी की मिसाइल होती है जो हजारों किलोमीटर दूर मौजूद लक्ष्य को निशाना बना सकती है। सामान्य तौर पर 5500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को आईसीबीएम श्रेणी में रखा जाता है।

अगर भारत पूरी तरह आईसीबीएम क्षमता हासिल कर लेता है, तो दुनिया के किसी भी हिस्से तक उसकी मिसाइल पहुंच सकती है। अभी अमेरिका, रूस, चीन और उत्तर कोरिया के पास ऐसी क्षमता मानी जाती है। फ्रांस और ब्रिटेन के पास लंबी दूरी की परमाणु क्षमता वाली सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलें हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आईसीबीएम तकनीक केवल लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता नहीं दिखाती, बल्कि यह एडवांस रॉकेट प्रोपल्शन, गाइडेंस सिस्टम और री-एंट्री टेक्नोलॉजी में महारत का संकेत भी होती है।

कैसे शुरू हुआ अग्नि मिसाइल कार्यक्रम

भारत का अग्नि मिसाइल कार्यक्रम डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत शुरू हुआ था। शुरुआत छोटी दूरी की अग्नि-1 से हुई, जिसकी रेंज करीब 700 किलोमीटर थी। इसके बाद अग्नि-2, अग्नि-3, अग्नि-4 और अग्नि-5 विकसित की गईं।

अग्नि-5 को भारत की सबसे आधुनिक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल माना जाता है। इसकी रेंज 5000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है। अब एडवांस अग्नि मिसाइल और MIRV तकनीक को अग्नि श्रृंखला की अगली पीढ़ी माना जा रहा है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह केवल रेंज बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि मिसाइल को ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा सटीक और ज्यादा घातक बनाने की दिशा में कदम है।

क्या होती है MIRV तकनीक?

MIRV यानी मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेड री-एंट्री व्हीकल आधुनिक मिसाइल तकनीक की सबसे मुश्किल सिस्टम्स में से एक मानी जाती है।

सामान्य बैलिस्टिक मिसाइल में केवल एक वॉरहेड होता है, जो एक टारगेट पर हमला करता है। लेकिन MIRV सिस्टम में एक ही मिसाइल के अंदर कई री-एंट्री व्हीकल या वॉरहेड लगाए जाते हैं। मिसाइल जब अंतरिक्ष जैसी ऊंचाई तक पहुंचती है, तो उसका ऊपरी हिस्सा खुलता है और अलग-अलग वॉरहेड अलग दिशाओं में निकल जाते हैं।

इसके बाद हर वॉरहेड अपने अलग लक्ष्य की तरफ बढ़ता है। यानी एक ही मिसाइल कई शहरों, सैन्य ठिकानों या रणनीतिक लक्ष्यों पर एक साथ हमला कर सकती है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक MIRV तकनीक दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है, क्योंकि उसे एक साथ कई वॉरहेड रोकने पड़ते हैं।

दुश्मन के मिसाइल डिफेंस को कैसे चुनौती देती है MIRV

आज कई देशों ने एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम विकसित किए हैं, जो आने वाली मिसाइलों को हवा में नष्ट करने की कोशिश करते हैं। लेकिन MIRV सिस्टम इन डिफेंस नेटवर्क के लिए मुसिबत है।

अगर एक मिसाइल में पांच या उससे ज्यादा वॉरहेड हों, तो डिफेंस सिस्टम को हर वॉरहेड को अलग-अलग ट्रैक करना पड़ेगा। कई बार इनमें डिकॉय यानी नकली टारगेट भी शामिल किए जाते हैं, जिससे असली वॉरहेड की पहचान मुश्किल हो जाती है।

इसी वजह से MIRV तकनीक को स्ट्रैटेजिक डिटरेंस यानी न्यूक्लियर डिटरेंस का अहम हिस्सा माना जाता है।

भारत के लिए यह परीक्षण क्यों अहम

भारत लंबे समय से “नो फर्स्ट यूज” नीति पर चलता रहा है। यानी भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ तो वह जवाब देने में सक्षम रहेगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि MIRV तकनीक भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को मजबूत करती है। इसका मतलब है कि अगर दुश्मन पहले हमला करता है, तब भी भारत जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

भारत के सामने चीन और पाकिस्तान दोनों की चुनौती है। चीन के पास पहले से DF-41 जैसी लंबी दूरी की MIRV क्षमता वाली मिसाइल मौजूद है। पाकिस्तान भी अपनी मिसाइल क्षमता लगातार बढ़ा रहा है।

ऐसे में एडवांस अग्नि मिसाइल का यह परीक्षण भारत की रणनीतिक तैयारी के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।

दुनिया के दूसरे देशों के पास क्या क्षमता है

रूस के पास RS-28 सरमत जैसी मिसाइल है, जिसकी रेंज 12000 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है। अमेरिका के पास मिनुटमैन-3 और नया सेंटिनल कार्यक्रम है। चीन के DF-41 को दुनिया की सबसे खतरनाक MIRV मिसाइलों में गिना जाता है।

उत्तर कोरिया भी लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण कर चुका है। कई रिपोर्टों में उसकी मिसाइल रेंज 10000 किलोमीटर से ज्यादा बताई गई है।

भारत अब उन देशों की सूची में तेजी से आगे बढ़ रहा है जिनके पास लंबी दूरी की मल्टीपल वॉरहेड क्षमता मौजूद है।

भारतीय नौसेना को मिला टेक्नोलॉजी-ड्रिवन चीफ, जानिए कौन हैं वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन

New Navy Chief India Vice Admiral Krishna Swaminathan
Vice Admiral Krishna Swaminathan

New Navy Chief India: वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन भारतीय नौसेना के अगले चीफ ऑफ द नेवल स्टाफ होंगे। वह 31 मई को एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी की जगह पदभार संभालेंगे। वर्तमान में वह पश्चिमी नौसेना फ्लीट के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के पद पर तैनात हैं। पश्चिमी नौसेना फ्लीट को भारतीय नौसेना की “स्वॉर्ड आर्म” यानी सबसे अहम युद्धक ताकत माना जाता है।

नौसेना में तकरीबन चार दशक लंबा अनुभव रखने वाले वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन को भारतीय नौसेना के सबसे अनुभवी ऑपरेशनल अधिकारियों में गिना जाता है। उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, पाकिस्तान अपनी नौसैनिक ताकत को मजबूत कर रहा है और भारतीय नौसेना बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रमों पर काम कर रही है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक उनका कार्यकाल दिसंबर 2028 तक रह सकता है। यानी उन्हें करीब ढाई साल से ज्यादा समय मिलेगा। नौसेना के बड़े सुधारों और लंबे प्रोजेक्ट्स को देखते हुए इसे अहम माना जा रहा है।

New Navy Chief India: ऐसे समय में मिली जिम्मेदारी जब समुद्र में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा

कृष्णा स्वामीनाथन ऐसे दौर में नौसेना प्रमुख बन रहे हैं जब हिंद महासागर क्षेत्र तेजी से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है। चीन लगातार हिंद महासागर में अपने युद्धपोत, सर्विलांस जहाज और पनडुब्बियां भेज रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपनी नौसेना को आधुनिक बना रहा है।

हाल ही में पाकिस्तान ने चीन से हैंगोर क्लास एआईपी पनडुब्बी शामिल की है। इसे पाकिस्तान नौसेना के लिए बड़ी ताकत माना जा रहा है। ऐसे में भारतीय नौसेना भी अपनी अंडरवॉटर क्षमता और समुद्री निगरानी को मजबूत करने पर जोर दे रही है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगले कुछ साल भारतीय नौसेना के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं। वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन को ऑपरेशनल अनुभव के साथ टेक्नोलॉजी और भविष्य के युद्ध की अच्छी समझ है।

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के हैं एक्सपर्ट

वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन को कम्युनिकेशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का विशेषज्ञ माना जाता है। उन्हें 1 जुलाई 1987 को भारतीय नौसेना में कमीशन मिला था।

नौसेना के अंदर उनकी पहचान ऐसे अधिकारी के रूप में रही है जो भविष्य के युद्ध और नई तकनीकों पर खास ध्यान देते हैं। उन्होंने नौसेना में आधुनिक टेक्नोलॉजी, नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली और अनमैन्ड सिस्टम्स को लेकर कई महत्वपूर्ण काम किए हैं।

सूत्रों का कहना है कि वह मानते हैं कि आने वाले समय में युद्ध केवल बड़े युद्धपोतों या मिसाइलों से नहीं बल्कि डेटा, नेटवर्किंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अनमैन्ड सिस्टम्स से तय होंगे।

कई बड़े युद्धपोतों की संभाली है कमान

अपने लंबे करियर के दौरान कृष्णा स्वामीनाथन ने नौसेना के कई अहम युद्धपोतों और युद्धक प्लेटफॉर्म्स की कमान संभाली है।

वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने वीर-क्लास मिसाइल बोट आईएनएस विद्युत (K48) और आईएनएस विनाश (K47) को कमांड किया है। इसके बाद उन्होंने कोरा-क्लास मिसाइल कॉर्वेट आईएनएस कुलिश (P63) की जिम्मेदारी भी संभाली।

बाद में उन्हें दिल्ली-क्लास गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर आईएनएस मैसूर (D60) की कमान सौंपी गई, जिसे भारतीय नौसेना के सबसे ताकतवर युद्धपोतों में गिना जाता है। उन्होंने भारतीय नौसेना के फ्लैगशिप एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य (R33) के दूसरे कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर भी जिम्मेदारी निभाई थी।

नौसेना में आईएनएस विक्रमादित्य जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर की कमान संभालना बेहद अहम जिम्मेदारी माना जाता है क्योंकि यह भारतीय नौसेना की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकतों में शामिल है।

“स्वॉर्ड आर्म” वेस्टर्न फ्लीट का कर चुके हैं नेतृत्व

कृष्णा स्वामीनाथन ने भारतीय नौसेना की वेस्टर्न फ्लीट का भी नेतृत्व किया। इसे नौसेना की “स्वॉर्ड आर्म” यानी हमला करने वाली मुख्य ताकत कहा जाता है।

वेस्टर्न फ्लीट पाकिस्तान के समुद्री मोर्चे और अरब सागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की सबसे अहम ऑपरेशनल फॉर्मेशन मानी जाती है। युद्ध जैसी स्थिति में यही फ्लीट सबसे पहले कार्रवाई करती है।

उनके कार्यकाल के दौरान समुद्री ऑपरेशंस, फ्लीट ट्रेनिंग और मल्टी-शिप ऑपरेशनल एक्सरसाइज पर खास फोकस किया गया था।

इंडियन नेवल सेफ्टी टीम की स्थापना में अहम रोल

रियर एडमिरल बनने के बाद उन्होंने कोच्चि स्थित दक्षिणी नौसेना कमान में चीफ स्टाफ ऑफिसर ट्रेनिंग के तौर पर काम किया। यहां उन्होंने नौसेना के ट्रेनिंग सिस्टम को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।

उन्होंने इंडियन नेवल सेफ्टी टीम की स्थापना में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह टीम नौसेना के अलग-अलग ऑपरेशनल क्षेत्रों में सुरक्षा मानकों की निगरानी करती है।

नौसेना के अधिकारियों के मुताबिक आधुनिक युद्धपोतों, पनडुब्बियों और एयरक्राफ्ट कैरियर के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ऑपरेशनल सुरक्षा बेहद अहम हो गई है। इसी वजह से इस सिस्टम को काफी महत्व दिया जाता है।

नौसेना मुख्यालय में भी संभाले कई अहम पद

कृष्णा स्वामीनाथन ने नौसेना मुख्यालय में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। वह पश्चिमी नौसेना कमान के चीफ ऑफ स्टाफ रहे। इसके अलावा कंट्रोलर ऑफ पर्सनल सर्विसेज और चीफ ऑफ पर्सनल जैसे अहम पद भी संभाले।

बाद में वह वाइस चीफ ऑफ द नेवल स्टाफ बने। इस पद पर रहते हुए उन्होंने नौसेना के आधुनिकीकरण और नई तकनीकों से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया। पिछले साल जुलाई में उन्हें मुंबई स्थित पश्चिमी नौसेना कमान का प्रमुख बनाया गया था।

ऑपरेशन सिंदूर में 30 से ज्यादा युद्धपोतों और पनडुब्बियों की तैनाती

पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल के. स्वामीनाथन ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना की आक्रामक तैयारी पाकिस्तान द्वारा युद्धविराम की मांग करने की बड़ी वजहों में से एक थी।

उन्होंने बताया था कि बहुत कम समय में भारतीय नौसेना ने 30 से ज्यादा युद्धपोतों और पनडुब्बियों की तैनाती कर दी थी। आईएनएस विक्रांत एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप के साथ भारतीय नौसेना के फ्रंटलाइन युद्धपोत पाकिस्तान के मकरान तट के पास युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार स्थिति में मौजूद थे।

वाइस एडमिरल स्वामीनाथन के मुताबिक भारतीय नौसेना की आक्रामक तैनाती और लगातार दबाव की वजह से पाकिस्तान नौसेना अपने तट के पास ही सीमित होकर रह गई। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना की संभावित कार्रवाई का खतरा पाकिस्तान के युद्धविराम मांगने की अहम वजहों में शामिल था।

उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ था और भारतीय नौसेना तथा पश्चिमी नौसेना कमान देश के समुद्री हितों की रक्षा के लिए किसी भी मिशन को अंजाम देने के लिए तैयार थी।

अब पनडुब्बियों और अनमैन्ड सिस्टम पर रहेगा बड़ा फोकस

रक्षा सूत्रों के मुताबिक कृष्णा स्वामीनाथन के कार्यकाल में भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर ताकत पर खास ध्यान दिया जाएगा।

भारतीय नौसेना लंबे समय से नई पनडुब्बियों की जरूरत महसूस कर रही है। प्रोजेक्ट-75 इंडिया के तहत छह नई पनडुब्बियों की योजना लंबे समय से लंबित है। माना जा रहा है कि नए नौसेना प्रमुख इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर जोर देंगे।

इसके अलावा भारत की अगली न्यूक्लियर पावर्ड पनडुब्बी परियोजना पर भी तेजी से काम हो सकता है।

नौसेना अब केवल पारंपरिक युद्धपोतों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अनमैन्ड सिस्टम्स और नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर पर तेजी से फोकस बढ़ाया जा रहा है।

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि समुद्री युद्ध अब पूरी तरह बदल चुका है। अब ड्रोन, अनमैन्ड अंडरवॉटर व्हीकल्स, नेटवर्क आधारित सेंसर और रियल टाइम डेटा युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

आत्मनिर्भर भारत पर रहेगा जोर

सरकार “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत स्वदेशी युद्धपोत निर्माण पर जोर दे रही है। नए नौसेना प्रमुख को भी इस दिशा में अहम भूमिका निभानी होगी।

भारतीय नौसेना पहले ही कई स्वदेशी युद्धपोत, डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट शामिल कर चुकी है। अब अगली पीढ़ी के युद्धपोतों और पनडुब्बियों के निर्माण पर भी तेजी से काम हो रहा है।

सूत्रों का कहना है कि वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन स्वदेशी टेक्नोलॉजी और “निश टेक्नोलॉजी” के इस्तेमाल पर खास फोकस करते हैं। यही वजह है कि उन्हें टेक्नोलॉजी-ड्रिवन अधिकारी माना जाता है।

थिएटर कमांड और जॉइंटनेस में भी निभाएंगे बड़ी भूमिका

नए नौसेना प्रमुख को केवल समुद्री चुनौतियों से ही नहीं बल्कि सैन्य सुधारों से जुड़े बड़े बदलावों में भी भूमिका निभानी होगी।

हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि को नया सीडीएस नियुक्त किया गया है। सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच जॉइंटनेस और थिएटर कमांड सिस्टम पर तेजी से काम चल रहा है।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन और नए सीडीएस मिलकर ट्राई-सर्विस इंटीग्रेशन को आगे बढ़ाएंगे।

थिएटर कमांड मॉडल के तहत तीनों सेनाओं के संसाधनों को इंटीग्रेट करने की योजना है ताकि युद्ध के दौरान संयुक्त ऑपरेशन तेजी से किए जा सकें।

रणनीतिक सोच रखने वाले अधिकारी

कृष्णा स्वामीनाथन को केवल ऑपरेशनल अधिकारी ही नहीं बल्कि रणनीतिक सोच रखने वाला अधिकारी भी माना जाता है।

उन्होंने नेशनल डिफेंस अकादमी खड़कवासला से सैन्य प्रशिक्षण लिया। इसके अलावा ब्रिटेन के जॉइंट सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज और अमेरिका के यूनाइटेड स्टेट्स नेवल वॉर कॉलेज से भी अध्ययन किया।

उनके पास जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से बीएससी की डिग्री है। कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से टेलीकम्युनिकेशन में एमएससी भी किया है।

उन्होंने लंदन के किंग्स कॉलेज से डिफेंस स्टडीज में एमए, मुंबई यूनिवर्सिटी से स्ट्रैटेजिक स्टडीज में एमफिल और इंटरनेशनल स्टडीज में पीएचडी भी की है।

नौसेना के अधिकारियों के मुताबिक उनकी यही अकादमिक और रणनीतिक समझ उन्हें बाकी अधिकारियों से अलग बनाती है।

भविष्य के युद्ध की तैयारी पर खास नजर

नौसेना के अंदर कृष्णा स्वामीनाथन की पहचान ऐसे अधिकारी के तौर पर रही है जो हमेशा भविष्य के युद्ध की तैयारी पर जोर देते हैं।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक वह बार-बार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि आने वाले समय में समुद्री युद्ध केवल जहाजों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रहेगा। साइबर वॉरफेयर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, डेटा नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अनमैन्ड सिस्टम्स की भूमिका तेजी से बढ़ेगी।

इसी वजह से उनके कार्यकाल में नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर, रियल टाइम सेंसर फ्यूजन और समुद्री निगरानी क्षमता पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है।

भारतीय नौसेना फिलहाल हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने, समुद्री सुरक्षा मजबूत करने और नई पीढ़ी के युद्धपोतों को शामिल करने पर तेजी से काम कर रही है। अब इन बड़े कार्यक्रमों की जिम्मेदारी वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन के हाथ में होगी।

Vice Admiral Krishna Swaminathan Appointed New Navy Chief Amid China-Pakistan Maritime Challenges

सिर्फ जनरल नहीं, ‘वॉर आर्किटेक्ट’ हैं लेफ्टिनेंट जनरल राजा सुब्रमणि, इसलिए सरकार ने उन्हें चुना नया CDS

CDS Appointment 2026
Lieutenant General NS Raja Subramani

CDS Appointment 2026: भारत सरकार ने रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि को देश का नया चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) नियुक्त किया है। वह 30 मई को पदभार संभालेंगे। वर्तमान में वह नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट यानी एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर के पद पर कार्यरत हैं। सेना में चार दशक से ज्यादा सेवा देने वाले राजा सुब्रमणि को पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों का अनुभवी अधिकारी माना जाता है।

उनकी नियुक्ति को केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि भारतीय सेना के बड़े सैन्य सुधारों से जोड़कर देखा जा रहा है। खासतौर पर थिएटर कमांड, ट्राई-सर्विस इंटीग्रेशन और जॉइंट वॉरफेयर जैसे लंबे समय से चल रहे सैन्य सुधार अब अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। ऐसे समय में सरकार ने एक ऐसे अधिकारी को चुना है, जिसे ऑपरेशनल अनुभव के साथ-साथ रणनीतिक और सुधारवादी सोच वाला अधिकारी माना जाता है।

राजा सुब्रमणि मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान की जगह लेंगे। जनरल चौहान को पिछले साल छह महीने का एक्सटेंशन दिया गया था ताकि वह मिलिट्री इंटीग्रेशन और थिएटराइजेशन से जुड़े काम को आगे बढ़ा सकें।

CDS Appointment 2026: सरकार ने फिर चुना रिटायर्ड अधिकारी

लेफ्टिनेंट जनरल राजा सुब्रमणिकी नियुक्ति ने यह भी साफ कर दिया है कि अब सीडीएस का पद केवल सबसे वरिष्ठ सेवा प्रमुख के लिए तय नहीं माना जा रहा। इस बार भी सरकार ने मौजूदा फोर स्टार सर्विस चीफ्स को पीछे छोड़ते हुए एक रिटायर्ड थ्री-स्टार अधिकारी को चुना है।

इससे पहले पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत और मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान भी सेना से आए थे। जनरल चौहान भी रिटायरमेंट के बाद सीडीएस बने थे। अब राजा सुब्रमणि तीसरे सेना अधिकारी होंगे जो यह पद संभालेंगे।

रणनीतिक हलकों में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी और सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी को भी मजबूत दावेदार माना जा रहा था। लेकिन सरकार ने अनुभव और सैन्य सुधारों से जुड़े ट्रैक रिकॉर्ड को प्राथमिकता दी।

सूत्रों का कहना है कि वर्तमान समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां जमीन आधारित हैं। चीन और पाकिस्तान दोनों सीमाओं पर तनाव को देखते हुए सरकार ऐसे अधिकारी को आगे लाना चाहती थी, जिसे दोनों मोर्चों का अनुभव हो।

थिएटर कमांड सुधारों के बीच बड़ी जिम्मेदारी

राजा सुब्रमणि ऐसे समय में सीडीएस का पद संभाल रहे हैं जब भारतीय सेना के सबसे बड़े सैन्य पुनर्गठन पर काम तेजी से चल रहा है। थिएटर कमांड सुधारों को आजादी के बाद भारतीय सेना का सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव माना जा रहा है।

पिछले कई सालों से सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच थिएटर कमांड मॉडल को लेकर चर्चा चल रही थी। हालांकि कमांड स्ट्रक्चर, संसाधनों के बंटवारे और ऑपरेशनल कंट्रोल जैसे मुद्दों पर तीनों सेनाओं के बीच मतभेद भी रहे।

जनरल अनिल चौहान के कार्यकाल में इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया गया। उन्होंने अलग-अलग सेनाओं के बीच बातचीत और सहमति बनाने पर जोर दिया। हाल ही में जयपुर में आयोजित एक सेमिनार में जनरल चौहान ने कहा था कि थिएटर कमांड से जुड़ी तीन सिफारिशें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सौंप दी गई हैं।

उन्होंने कहा था, “इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड के तहत सेनाओं के पुनर्गठन को लेकर तीन सेट की सिफारिशें रक्षा मंत्री को भेजी गई हैं।” जनरल चौहान ने यह भी बताया था कि मई के अंत तक एक नया जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर शुरू हो जाएगा, जिसका उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और इंटीग्रेशन को मजबूत करना है। उनके मुताबिक थिएटर कमांड की पूरी नींव “जॉइंटनेस” और “इंटीग्रेशन” पर आधारित होगी।

क्या है थिएटर कमांड

वर्तमान में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना अपने-अपने कमांड सिस्टम के तहत काम करती हैं। थिएटर कमांड मॉडल में तीनों सेनाओं के रिर्सोसेज को इंटीग्रेट किया जाएगा। इस व्यवस्था के तहत किसी खास क्षेत्र के लिए एक संयुक्त कमांडर होगा, जिसके पास आर्मी, एयरफोर्स और नेवी की ताकत एक साथ होगी।

मौजूदा योजना के अनुसार उत्तरी थिएटर का फोकस चीन सीमा पर होगा। वहीं, पश्चिमी थिएटर पाकिस्तान मोर्चे को संभालेगा। वहीं मैरिटाइम थिएटर हिंद महासागर क्षेत्र की जिम्मेदारी देखेगा।

सेना के अधिकारियों का मानना है कि इससे युद्ध के दौरान तेजी से फैसले लेने और संयुक्त ऑपरेशन चलाने में मदद मिलेगी।

पाकिस्तान और चीन मोर्चे का अनुभव

राजा सुब्रमणि को सेना में बेहद अनुभवी ऑपरेशनल कमांडर माना जाता है। उन्होंने अपने करियर में पाकिस्तान और चीन दोनों सीमाओं पर अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। दिसंबर 1985 से 31 जुलाई 2025 तक करीब 39 वर्ष सेवा करने के बाद वे 47वें वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ (VCOAS) के पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने यह पद 1 जुलाई 2024 से संभाला था।

उन्होंने भारतीय सेना की 2 कोर की कमान संभाली थी, जिसे पश्चिमी मोर्चे की सबसे अहम स्ट्राइक कोर माना जाता है। यह फॉर्मेशन पाकिस्तान सीमा पर बड़े ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है।

इसके अलावा उन्होंने जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और उत्तरी सीमाओं पर भी कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया।

उन्होंने असम में ऑपरेशन राइनो के दौरान 16 गढ़वाल राइफल्स की कमान संभाली। जम्मू-कश्मीर में 168 इन्फैंट्री ब्रिगेड और सेंट्रल सेक्टर में 17 माउंटेन डिवीजन का नेतृत्व भी किया।

सेना में उन्हें शांत लेकिन सख्त अधिकारी माना जाता है। कई अधिकारी उन्हें “सोल्जर-स्कॉलर” यानी सैन्य रणनीति समझने वाला युद्ध अनुभव रखने वाला अधिकारी बताते हैं।

एनएससीएस में निभा रहे थे अहम भूमिका

सेना से रिटायर होने के बाद सितंबर 2025 में उन्हें नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट में मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया था। यह संस्था राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में काम करती है।

एनएससीएस राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की कार्यकारी इकाई मानी जाती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को सलाह और अलग-अलग मंत्रालयों के बीच समन्वय का काम करती है।

इस संस्था में मिलिट्री अफेयर्स, टेक्नोलॉजी, इंटेलिजेंस कोऑर्डिनेशन और मैरिटाइम सिक्योरिटी जैसे कई विभाग होते हैं। मिलिट्री एडवाइजर का दफ्तर सेना और एनएससीएस के बीच मुख्य कड़ी माना जाता है। यहां से ऑपरेशनल तैयारी, फोर्स प्लानिंग और क्षमता विकास से जुड़ी जानकारी दी जाती है।

लंबा सैन्य और अकादमिक अनुभव

राजा सुब्रमणि ने 14 दिसंबर 1985 को 8वीं बटालियन गढ़वाल राइफल्स में कमीशन लिया था। वह नेशनल डिफेंस अकादमी और इंडियन मिलिट्री अकादमी के पूर्व छात्र हैं।

उन्होंने ब्रिटेन के ब्रैकनेल स्थित जॉइंट सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज से भी प्रशिक्षण लिया। इसके अलावा नई दिल्ली के नेशनल डिफेंस कॉलेज से उच्च सैन्य शिक्षा हासिल की।

उनके पास किंग्स कॉलेज लंदन से मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री और मद्रास यूनिवर्सिटी से डिफेंस स्टडीज में एमफिल की डिग्री भी है।

मिलिट्री इंटेलिजेंस और ऑपरेशंस का अनुभव

राजा सुब्रमणि ने सेना में कई रणनीतिक पदों पर भी काम किया है। वह मिलिट्री इंटेलिजेंस में डिप्टी डायरेक्टर जनरल रहे। इसके अलावा ईस्टर्न कमांड में ब्रिगेडियर जनरल स्टाफ ऑपरेशंस और कर्नल जनरल स्टाफ ऑपरेशंस की जिम्मेदारी भी संभाली।

उन्होंने डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज वेलिंगटन में चीफ इंस्ट्रक्टर के रूप में भी काम किया। नॉर्दर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ और बाद में सेंट्रल कमांड के प्रमुख भी रहे।

विदेश में भारत के डिफेंस अटैची के तौर पर उन्होंने कजाकिस्तान में भी सेवा दी हैं।

जॉइंटनेस पर रहेगा बड़ा फोकस

राजा सुब्रमणि ऐसे समय में सीडीएस बन रहे हैं जब भारतीय सेना “जॉइंट वॉरफेयर” मॉडल पर तेजी से काम कर रही है। हाल ही में जयपुर में हुई जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भी मल्टी-डोमेन ऑपरेशन, साइबर वॉरफेयर, एआई और जॉइंटनेस पर जोर दिया गया था।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान लगातार कह रहे थे कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं बल्कि डेटा, नेटवर्किंग, साइबर और इंटीग्रेटेड ऑपरेशन से तय होंगे।

राजा सुब्रमणि अब उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे, जिसमें तीनों सेनाओं को अलग-अलग सोच से निकालकर एक जॉइंट कॉम्बैट स्ट्रक्चर्स में लाने की कोशिश हो रही है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि थिएटराइजेशन केवल नया कमांड सिस्टम नहीं बल्कि पूरी सैन्य सोच में बदलाव है। इसमें संसाधनों का साझा इस्तेमाल, संयुक्त ऑपरेशन और तेज फैसले लेने पर जोर दिया जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा फोकस

सैन्य हलकों में यह भी माना जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद जॉइंट ऑपरेशन और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर को लेकर फोकस और बढ़ा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना, वायुसेना और दूसरे सुरक्षा तंत्रों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत महसूस की गई थी। इसके बाद थिएटर कमांड और जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर को लेकर काम तेज हुआ।

राजा सुब्रमणि को ऐसे अधिकारी के रूप में देखा जा रहा है जो ऑपरेशनल अनुभव और रणनीतिक समझ दोनों रखते हैं। यही वजह है कि सरकार ने उन्हें देश की सबसे बड़ी सैन्य जिम्मेदारी सौंपी है।

अब वह सीडीएस के साथ-साथ डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स के सचिव की भूमिका भी निभाएंगे। इस पद पर रहते हुए उन्हें सैन्य सुधारों, तीनों सेनाओं के तालमेल और थिएटर कमांड जैसे बड़े बदलावों को जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी संभालनी होगी।