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यूएस-ईरान तनाव के बीच भारत का बड़ा कदम, गुआम में अमेरिका संग सबमरीन हंट का करेगा अभ्यास

Sea Dragon Exercise 2026

Sea Dragon Exercise 2026: एक तरफ जहां यूएस-ईरान वॉर में फंसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप हॉर्मुज में फंसे जहाजों की सुरक्षा के लिए नाटो देशों की नौसेनाओं का सहयोग मांग रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय नौसेना ने अमेरिका के नेतृत्व में आयोजित होने वाले बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास सी ड्रैगन एक्सरसाइज (Sea Dragon Exercise 2026) में हिस्सा लेने के लिए अपने अत्याधुनिक P-8I समुद्री निगरानी विमान को गुआम भेजा है। यह अभ्यास इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते समुद्री खतरों के बीच एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। खास बात यह है कि क्वॉड में शमिल ऑस्ट्रेलिया, जापान ने अमेरिका के होर्मुज मिशन से इनकार किया है।

यह अभ्यास 9 मार्च से शुरू हो चुका है, जो 24 मार्च तक चलेगा। इसमें क्वॉड देशों अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान के अलावा न्यूजीलैंड जैसे देशों की भागीदारी है। यह क्वाड+ फॉर्मेट में आती है। इन सभी देशों के समुद्री गश्ती विमान इस अभ्यास में शामिल हैं। यह एक्सरसाइज इंडो-पैसिफिक में बढ़ते सबमरीन थ्रेट्स (खासकर चीन की पीएलए नेवी) के खिलाफ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर स्किल्स को मजबूत करने के लिए की जाती है। (Sea Dragon Exercise 2026)

Sea Dragon Exercise 2026: गुआम में आयोजित हो रहा है अभ्यास

सी ड्रैगन एक्सरसाइज का आयोजन हर साल गुआम के एंडरसन एयर फोर्स बेस पर किया जाता है। यह क्षेत्र पश्चिमी प्रशांत महासागर में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अमेरिका की सातवीं फ्लीट भी इसी क्षेत्र में एक्टिव रहती है।

इस अभ्यास की शुरुआत साल 2019 में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच द्विपक्षीय स्तर पर हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे इसमें अन्य देशों को भी शामिल किया गया और अब यह एक बहुराष्ट्रीय अभ्यास बन चुका है। (Sea Dragon Exercise 2026)

किन देशों की भागीदारी

इस अभ्यास में अमेरिका की नौसेना के दो पी-8ए पोसाइडन विमान, भारत का एक पी-8आई विमान, ऑस्ट्रेलिया के दो पी-8ए, न्यूजीलैंड का एक पी-8ए और जापान का पी-1 समुद्री निगरानी विमान शामिल है।

इन सभी विमानों की खास बात यह है कि इनके मिशन सिस्टम, सेंसर और डेटा लिंक काफी हद तक एक जैसे हैं। इससे अलग-अलग देशों के बीच बेहतर तालमेल और रीयल टाइम जानकारी शेयर करना आसान हो जाता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

P-8I विमान की खूबियां

भारतीय नौसेना का पी-8आई विमान लंबी दूरी तक समुद्र की निगरानी करने में सक्षम है। यह विमान बोइंग 737 प्लेटफॉर्म पर आधारित है और इसमें आधुनिक सेंसर और हथियार सिस्टम लगाए गए हैं।

इस विमान में मैग्नेटिक एनोमली डिटेक्टर, एडवांस रडार सिस्टम, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड कैमरा जैसे उपकरण लगे होते हैं। यह समुद्र के अंदर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करता है।

इसके अलावा इसमें टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल जैसे हथियार भी लगाए जा सकते हैं, जिससे यह केवल निगरानी ही नहीं, बल्कि कार्रवाई करने में भी सक्षम होता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

कैसे होती है ट्रेनिंग

इस अभ्यास के दौरान पायलट और एयरक्रू पहले क्लासरूम में बैठकर जॉइंट स्ट्रेटेजी पर चर्चा करते हैं। इसके बाद सिमुलेशन के जरिए अभ्यास किया जाता है।

फिर वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में पनडुब्बियों को खोजने और ट्रैक करने का अभ्यास किया जाता है। इस पूरे अभ्यास के दौरान करीब 200 घंटे से ज्यादा उड़ान प्रशिक्षण किया जाता है।

ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के एक आधिकारिक बयान में कहा गया, “यह अभ्यास पनडुब्बी रोधी युद्ध में एयरक्रू की क्षमता को बेहतर बनाता है। इसमें प्रशिक्षण की शुरुआत ट्रैक-सिमुलेटेड लक्ष्यों से होती है और धीरे-धीरे वास्तविक पनडुब्बी का पता लगाने और उसे ट्रैक करने तक पहुंचती है। इस दौरान क्रू कुल मिलाकर 200 घंटे से अधिक उड़ान प्रशिक्षण में हिस्सा लेते हैं।”

इस प्रशिक्षण में शुरुआत आसान लक्ष्यों से होती है और धीरे-धीरे इसे असली पनडुब्बियों तक ले जाया जाता है। इससे एयरक्रू की क्षमता और कॉर्डिनेशन को परखा जाता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

कॉम्पिटिटिव फॉर्मेट भी शामिल

सी ड्रैगन एक्सरसाइज की एक खास बात यह भी है कि इसमें भाग लेने वाले देशों के प्रदर्शन को अंक दिए जाते हैं। जो देश सबसे बेहतर प्रदर्शन करता है उसे ड्रैगन बेल्ट अवॉर्ड दिया जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में जापान और ऑस्ट्रेलिया ने इस अवॉर्ड को जीता है। इससे यह अभ्यास केवल प्रशिक्षण ही नहीं बल्कि एक प्रतिस्पर्धात्मक चुनौती भी बन जाता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

गुआम ही क्यों?

इससे पहले मालाबार एक्सरसाइज भी नवंबर 2025 में गुआम के आसपास हुई थी। जो क्वॉड देशों (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) की सबसे प्रमुख और स्पेसिफिक नेवल एक्सरसाइज है। यह क्वॉड का कोर मिलिट्री कोऑपरेशन है, जो 1992 में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय से शुरू होकर अब पूर्ण क्वॉड फॉर्मेट में चलती है।

गुआम को इस अभ्यास के लिए चुनने के पीछे कई अहम रणनीतिक वजहें हैं। सबसे पहले इसकी लोकेशन की बात करें, तो गुआम पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिका का एक प्रमुख स्ट्रैटेजिक हब है, जहां एंडरसन एयर फोर्स बेस और नेवल बेस गुआम मौजूद हैं। यह इलाका “सेकंड आइलैंड चेन” का हिस्सा माना जाता है, जो चीन की पीएलए नेवी की बढ़ती गतिविधियों, खासकर ताइवान और साउथ चाइना सी के आसपास, को संतुलित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। (Sea Dragon Exercise 2026)

इसके अलावा गुआम का लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर भी अहम है। यहां बड़े एयरफील्ड, पोर्ट और सपोर्ट सुविधाएं मौजूद हैं, जिससे पी-8 जैसे मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट आसानी से ऑपरेट कर सकते हैं। वहीं नौसेना के जहाज अप्रा हार्बर में तैनात किए जा सकते हैं, जिससे ऑपरेशन को लगातार सपोर्ट मिलता रहता है।

ट्रेनिंग के लिहाज से भी गुआम के आसपास का खुला समुद्री क्षेत्र बेहद उपयुक्त है। यहां बड़े स्तर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, सतह और हवाई ऑपरेशन का अभ्यास किया जा सकता है। साथ ही यह अमेरिका की सातवीं फ्लीट का प्रमुख ऑपरेशनल बेस भी है। (Sea Dragon Exercise 2026)

भारत की लगातार भागीदारी

भारत ने 2021-22 के बाद से इस अभ्यास में लगातार भाग लिया है। भारतीय नौसेना के पी-8आई विमान अरक्कोनम स्थित आईएनएस राजाली और गोवा के आईएनएस हंसा से ऑपरेट किए जाते हैं। यह अभ्यास भारतीय नौसेना को आधुनिक पनडुब्बी रोधी तकनीकों और संयुक्त ऑपरेशन की बेहतर समझ देता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

इंडो-पैसिफिक में बढ़ीं सैन्य गतिविधियां

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हाल के समय में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। चीन की नौसेना द्वारा ताइवान के आसपास बढ़ती गतिविधियां और अन्य देशों की तैनाती ने इस क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है। इसी के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा इस तरह के अभ्यास आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि समुद्री सुरक्षा और निगरानी को मजबूत किया जा सके।

इस अभ्यास के साथ ही भारतीय नौसेना अरब सागर में भी सक्रिय है। हाल ही में नौसेना ने पश्चिम एशिया से आने वाले भारतीय जहाजों को एस्कॉर्ट करने का काम किया है। इसके अलावा भारतीय नौसेना ने हाल ही में एक सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में भी हिस्सा लिया, जब एक विदेशी युद्धपोत को नुकसान पहुंचने के बाद मदद की जरूरत पड़ी थी। भारतीय नौसेना का पी-8आई विमान और युद्धपोत तुरंत मौके पर पहुंचकर राहत कार्य में शामिल हुए। (Sea Dragon Exercise 2026)

IDS चीफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित बोले- कारगिल से मिला सबक, ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाई संयुक्त सैन्य ताकत

Indian Armed Forces
Chief of Integrated Defence Staff Air Marshal Ashutosh Dixit speaking at 5th CDS General Bipin Rawat Memorial Lecture organized by GBR Memorial Foundation of India at Constitution Club of India.

Indian Armed Forces: भारत के चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं की संयुक्त ताकत को दुनिया ने देखा। उन्होंने कहा कि जिस तरह कारगिल युद्ध के दौरान अलग-अलग काम करने की कमजोरी को उजागर किया था, उसी तरह ऑपरेशन सिंदूर ने इंटीग्रेटेड सैन्य कार्रवाई की ताकत को सामने रखा।

एयर मार्शल दीक्षित ने यह बात जनरल बिपिन रावत मेमोरियल लेक्चर के दौरान कही। यह कार्यक्रम भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत की 68वीं जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का आयोजन जीबीआर मेमोरियल फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में किया।

Indian Armed Forces: ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि मई 2025 में पहलगाम में हुए बड़े आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत की तीनों सेनाओं ने मिलकर जवाबी कार्रवाई की थी। इस संयुक्त अभियान को ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया था।

उन्होंने बताया कि भारत के स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने एक साथ मिलकर एक सीमा पार आतंकवाद विरोधी अभियान की योजना बनाई, उसे तैयार किया और फिर उसे अंजाम दिया।

एयर मार्शल दीक्षित के अनुसार इस अभियान में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय देखने को मिला। यह पूरी कार्रवाई एकीकृत दिशा और संयुक्त योजना के तहत की गई थी।

Indian Armed Forces

22 मिनट में शुरू हुआ अभियान

उन्होंने बताया कि यह ऑपरेशन 7 मई को शुरू किया गया था। ऑपरेशन की शुरुआत केवल 22 मिनट के भीतर कर दी गई थी। इसके बाद लगभग 88 घंटे तक सैन्य कार्रवाई जारी रही।

इस अभियान के दौरान नौ उच्च मूल्य वाले आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इनमें से सात ठिकानों को भारतीय सेना ने वायुसेना की मदद से निशाना बनाया।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि यह अभियान सटीकता और रणनीतिक गहराई का उदाहरण था। इस कार्रवाई में सभी सैन्य शाखाओं ने अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नौसेना की भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नौसेना ने अरब सागर में अपने कैरियर बैटल ग्रुप और युद्धपोत तैनात किए।

इन तैनातियों का उद्देश्य समुद्र में नियंत्रण स्थापित करना और क्षेत्र में संभावित खतरों को सीमित करना था। नौसेना की मौजूदगी के कारण पाकिस्तान के समुद्री और हवाई तत्वों पर भी दबाव बना रहा।

कारगिल युद्ध से मिला सबक

एयर मार्शल दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि कारगिल युद्ध ने यह दिखाया था कि जब सैन्य बलों के बीच समन्वय कम होता है तो उसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

उन्होंने कहा कि उस अनुभव से सीख लेते हुए भारत ने संयुक्त सैन्य संस्कृति विकसित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऑपरेशन सिंदूर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर सामने आया।

थिएटर कमांड अभी भी पेंडिंग

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत में इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड की स्थापना अभी पूरी तरह से नहीं हो पाई है। उन्होंने बताया कि सैन्य संस्थानों के बीच अभी भी कुछ अलग-अलग प्रोसीजर्स मौजूद हैं जिन्हें खत्म करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इसके लिए जॉइंट ट्रेनिंग, शेयर्ड मिलिटरी डॉक्ट्रिन और निरंतर शिक्षा की जरूरत है। साथ ही तीनों सेनाओं के बीच ज्ञान साझा करने की प्रक्रिया को भी मजबूत करना होगा।

जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि

कार्यक्रम के दौरान जनरल बिपिन रावत के जीवन और नेतृत्व को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि भारत में थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता में भी जनरल रावत की दूरदर्शी सोच का बड़ा योगदान रहा है।

इस कार्यक्रम में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे। इनमें भारत के पूर्व वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया, जनरल बिपिन रावत की पत्नी तरिणी रावत और एयर वाइस मार्शल राजेश भंडारी भी शामिल थे। कार्यक्रम में जनरल बिपिन रावत के नेतृत्व, सैन्य सेवा और देश के प्रति उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंसे भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकाल रही भारतीय नौसेना, युद्ध के बीच 3 वॉरशिप कर रहे एस्कॉर्ट

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Shivalik Arrival at LPG terminal Mundra Port. LPG vessel, Shivalik arrival at LPG terminal Mundra Port today. With total Quantity 46000MT. 20000MT will be unloaded at Mundra and 26000MT will be unloaded at Mangalore. Vessel is carrying the liquid LPG ordered by IOCL.

Strait of Hormuz Escort: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एस्कॉर्ट अभियान के तहत भारतीय नौसेना लगातार भारतीय ध्वज लगे जहाजों को सुरक्षित निकालने का काम कर रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार भारतीय नौसेना के युद्धपोत इस समय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और आसपास के समुद्री इलाकों में सक्रिय रूप से तैनात हैं और भारतीय जहाजों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।

हाल ही में भारतीय ध्वज वाला एक और जहाज सुरक्षित रूप से इस इलाके से निकलकर भारत के लिए रवाना हुआ है। इससे पहले भी दो भारतीय जहाजों को नौसेना के युद्धपोतों ने एस्कॉर्ट करते हुए सुरक्षित रास्ता दिया था। (Strait of Hormuz Escort)

Strait of Hormuz Escort: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकल रहे भारतीय जहाज

सरकारी सूत्रों के अनुसार एलपीजी कैरियर शिवालिक और नंदा देवी के बाद अब तीसरा भारतीय ध्वज वाला जहाज जग लाडकी भी सुरक्षित रूप से इस संवेदनशील समुद्री मार्ग से निकल चुका है। जग लाडकी फुजैराह ऑयल टर्मिनल पर हमले से बाल-बाल बचा था। बताया गया है कि यह जहाज पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्र से भारत के लिए रवाना हुआ।

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत देर रात से इस जहाज को एस्कॉर्ट करते हुए सुरक्षित समुद्री इलाके तक लेकर गया। इससे पहले भी भारतीय नौसेना के जहाजों ने शिवालिक और नंदा देवी को इसी तरह सुरक्षा प्रदान की थी।

ये तीनों जहाज सफलतापूर्वक निकल चुके हैं, लेकिन अन्य 22 जहाज अभी भी क्षेत्र में हैं, जिनकी एस्कॉर्ट की तैयारी है। इन जहाजों के सुरक्षित निकलने को भारतीय नौसेना के सक्रिय समुद्री निगरानी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। (Strait of Hormuz Escort)

मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट के तहत तैनाती

भारतीय नौसेना वर्ष 2017 से मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट रणनीति के तहत दुनिया के कई महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में अपने युद्धपोत तैनात कर रही है। इस रणनीति का उद्देश्य समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना है।

इस मिशन के तहत भारतीय नौसेना के युद्धपोत लगातार अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में तैनात रहते हैं और वहां की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। (Strait of Hormuz Escort)

ऑपरेशन संकल्प और एंटी पायरेसी ऑपरेशन

ओमान की खाड़ी के पास भारतीय नौसेना ऑपरेशन संकल्प चला रही है। इस ऑपरेशन का उद्देश्य क्षेत्र में मौजूद भारतीय जहाजों और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा करना है।

इसके अलावा अदन की खाड़ी में भारतीय नौसेना एंटी पायरेसी ऑपरेशन भी चला रही है। इस क्षेत्र में सोमालिया और जिबूती के समुद्री डाकुओं की गतिविधियों को देखते हुए यह अभियान शुरू किया गया था।

सूत्रों के अनुसार अदन की खाड़ी के पास फिलहाल भारतीय नौसेना के तीन युद्धपोत ऑपरेट कर रहे हैं। ये जहाज समुद्री गतिविधियों की निगरानी के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर जहाजों को सुरक्षा भी प्रदान कर रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि ये तीनों शिप डेस्ट्रॉयर कैटेगरी के हैं और इन पर मार्कोस कमांडोज तैनात हैं। (Strait of Hormuz Escort)

ओमान की खाड़ी में तैनात आईएनएस सूरत

ओमान की खाड़ी के पास भारतीय नौसेना का आधुनिक गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर आईएनएस सूरत तैनात है। यह युद्धपोत क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों की निगरानी कर रहा है।

सूत्रों के अनुसार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री ट्रैफिक प्रभावित होने के बाद से भारतीय नौसेना लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। नौसेना के युद्धपोत और निगरानी प्रणाली इस पूरे समुद्री इलाके की गतिविधियों को मॉनिटर कर रही है। (Strait of Hormuz Escort)

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रणनीतिक अहमियत

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी तक जाने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद अहम है।

भारत के लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के कुल ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है। अनुमान के अनुसार भारत के लगभग 80 फीसदी ऊर्जा व्यापार का संबंध इस समुद्री मार्ग से है।

इसी कारण इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सुरक्षा चुनौती का असर सीधे भारत के एनर्जी सप्लाई सिस्टम पर पड़ सकता है। (Strait of Hormuz Escort)

अदन की खाड़ी में तैनाती

भारतीय नौसेना की दूसरी बड़ी तैनाती अदन की खाड़ी में है। यह क्षेत्र भी वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

भारत का लगभग 90 फीसदी समुद्री व्यापार इस मार्ग से होकर गुजरता है। यह व्यापार सुएज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी से होते हुए अरब सागर के रास्ते भारत तक पहुंचता है।

अदन की खाड़ी लंबे समय से समुद्री डकैती के लिए संवेदनशील क्षेत्र रही है। सोमालिया के समुद्री डाकू इस क्षेत्र में कई बार व्यापारी जहाजों को निशाना बना चुके हैं।

इसी खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना लंबे समय से इस क्षेत्र में एंटी पायरेसी मिशन चला रही है। (Strait of Hormuz Escort)

वैकल्पिक समुद्री मार्ग की चुनौती

अदन की खाड़ी का मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सबसे छोटा समुद्री रास्ता माना जाता है। इसलिए यहां जहाजों की आवाजाही भी अधिक रहती है।

यदि किसी कारण से यह मार्ग बाधित हो जाए, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर केप ऑफ गुड होप के रास्ते आना-जाना पड़ता है। यह मार्ग काफी लंबा है और इससे यात्रा का समय बढ़ जाता है।

इसके अलावा जहाजों की ऑपरेशनल लागत भी बढ़ जाती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। (Strait of Hormuz Escort)

छह इलाकों में भारतीय नौसेना की तैनाती

मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट के तहत भारतीय नौसेना दुनिया के छह अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में अपने युद्धपोत तैनात रखती है।

पहली तैनाती अरब सागर में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास है। दूसरी तैनाती अदन की खाड़ी में है। तीसरी तैनाती सेशेल्स के पास की जाती है, ताकि केप ऑफ गुड होप मार्ग से आने वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

इसके अलावा चौथी तैनाती मालदीव के पास, पांचवीं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पास और छठी तैनाती बंगाल की खाड़ी में म्यांमार और बांग्लादेश सीमा के आसपास की जाती है। (Strait of Hormuz Escort)

समुद्री सुरक्षा और सहयोग

इन तैनातियों के दौरान भारतीय नौसेना के युद्धपोत कई अन्य देशों की नौसेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास भी करते हैं। इसके अलावा समुद्र में किसी दुर्घटना की स्थिति में राहत और बचाव अभियान भी चलाए जाते हैं।

समुद्री डकैती, जहाजों पर हमले या किसी आपात स्थिति में भारतीय नौसेना तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता रखती है।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्र में स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और भारतीय ध्वज वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। (Strait of Hormuz Escort)

भारत की क्या है रणनीति

यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद हो जाता है, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे (केप ऑफ गुड होप) से गुजरना पड़ेगा, जो 10-15 दिन अतिरिक्त समय और लाखों डॉलर अतिरिक्त लागत बढ़ सकती है। इससे भारत में ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

भारतीय नौसेना की यह सक्रिय भूमिका न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि भारत की बढ़ती नौसैनिक क्षमता और क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान को भी दर्शाती है। सूत्रों के अनुसार, सभी भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। यह ऑपरेशन भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘सागरमाला’ जैसी नीतियों के साथ जुड़ा है, जहां समुद्री मार्गों की सुरक्षा राष्ट्रीय हितों का केंद्र है। (Strait of Hormuz Escort)

ईरान ने पहली बार दागी ‘डांसिंग मिसाइल’ सेज्जिल, 7 मिनट में 2000 किमी दूर तक मार

Sejjil Missile- Iran Fires Sejjil Ballistic Missile for First Time in War with US and Israel
Sejjil Missile- Iran Fires Sejjil Ballistic Missile for First Time in War with US and Israel

Sejjil Missile: पश्चिम एशिया में जारी यूएस-इजराइल ईरान वॉर को शुरू हुए 17 दिन हो गए हैं। इस बीच ईरान ने पहली बार अपनी एडवांस सेज्जिल बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया है। IRGC के मुताबिक यह सॉलिड फ्यूल से चलने वाली इस रणनीतिक मिसाइल को ईरान ने रविवार को लॉन्च किया। यह वही मिसाइल है जिसे ईरान की सबसे खतरनाक और शक्तिशाली मिसाइलों में से एक माना जाता है।

ईरान और इजराइल के बीच चल रहे इस संघर्ष के दौरान यह पहली बार है जब सेज्जिल मिसाइल को वास्तविक युद्ध में इस्तेमाल किए जाने की खबर सामने आई है। इस मिसाइल के इस्तेमाल के बाद पूरे क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं पर नई चर्चा शुरू हो गई है। यह मिसाइल करीब 2000–2500 किलोमीटर तक मारक क्षमता रखती है और इसे बहुत जल्दी लॉन्च किया जा सकता है। (Sejjil Missile)

Sejjil Missile: युद्ध के बीच पहली बार इस्तेमाल

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध लगातार तेज होता जा रहा है। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।

युद्ध के दौरान ईरान ने कई मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसी दौरान ईरान ने पहली बार सेज्जिल-2 बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया। इस मिसाइल को ईरान के सबसे एडवांस हथियारों में गिना जाता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार यह मिसाइल बहुत कम समय में अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है। इसकी लंबी दूरी और तेज गति के कारण इसे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। (Sejjil Missile)

क्या है सेज्जिल मिसाइल

सेज्जिल एक दो चरण वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसे ईरान के रक्षा उद्योग ने विकसित किया है। इस मिसाइल को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। इसे अशूरा या अशौरा मिसाइल भी कहा जाता है।

यह मिसाइल पूरी तरह सॉलिड प्रोपेलेंट यानी ठोस ईंधन से चलती है। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। पहले ईरान की कई मिसाइलें लिक्विड फ्यूल पर आधारित थीं, जिन्हें लॉन्च करने से पहले काफी तैयारी करनी पड़ती थी।

सॉलिड फ्यूल मिसाइल होने के कारण सेज्जिल को कम समय में लॉन्च किया जा सकता है। इससे दुश्मन को जवाबी कार्रवाई का कम समय मिलता है। (Sejjil Missile)

मिसाइल की लंबाई और वजन

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार सेज्जिल मिसाइल की लंबाई लगभग 18 मीटर है। इसका व्यास लगभग 1.25 मीटर बताया जाता है। इस मिसाइल का कुल वजन करीब 23,600 किलोग्राम तक हो सकता है। इसकी रफ्तार टर्मिनल वेलोसिटी मैक 12+ (ध्वनि की गति से 12 गुना ज्यादा) है, जो इंटरसेप्शन को मुश्किल बनाती है।

इसमें लगभग 700 किलोग्राम वजन का वारहेड लगाया जा सकता है। वारहेड का उपयोग लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इतने बड़े वारहेड के कारण यह मिसाइल बड़े सैन्य ठिकानों या बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने में सक्षम मानी जाती है। (Sejjil Missile)

लगभग 2000 किलोमीटर की रेंज

रिपोर्ट्स के अनुसार सेज्जिल मिसाइल की अधिकतम रेंज लगभग 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसका मतलब है कि ईरान से लॉन्च होने पर यह मिसाइल पश्चिम एशिया के बड़े हिस्से तक पहुंच सकती है।

इस दूरी में इजराइल, सऊदी अरब, तुर्की और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी आते हैं। यही वजह है कि इस मिसाइल को क्षेत्र की रणनीतिक संतुलन में महत्वपूर्ण माना जाता है। (Sejjil Missile)

क्यों कहा जाता है “डांसिंग मिसाइल”

रक्षा विशेषज्ञों के बीच सेज्जिल मिसाइल को कभी-कभी “डांसिंग मिसाइल” भी कहा जाता है। यह नाम इसकी उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता से जुड़ा है।

आमतौर पर बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च होने के बाद एक तय रास्ते पर चलती हैं। लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सेज्जिल मिसाइल उड़ान के दौरान अपनी दिशा में बदलाव कर सकती है।

अगर ऐसा होता है तो मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए इसे ट्रैक करना कठिन हो सकता है। इसी कारण इसे “डांसिंग मिसाइल” का नाम दिया गया है। (Sejjil Missile)

कब शुरू हुआ सेज्जिल मिसाइल का डेवलपमेंट

ईरान का मिसाइल कार्यक्रम कई दशकों से विकसित हो रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार सेज्जिल मिसाइल का विकास 1990 के दशक में शुरू हुआ था।

इस मिसाइल का पहला ज्ञात परीक्षण 2008 में किया गया था। उस समय यह मिसाइल लगभग 800 किलोमीटर तक गई थी। इसके बाद 2009 में इसका दूसरा परीक्षण किया गया जिसमें गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम को बेहतर बनाने की कोशिश की गई। (Sejjil Missile)

इसके बाद भी कई उड़ान परीक्षण किए गए। एक परीक्षण में यह मिसाइल लगभग 1900 किलोमीटर तक जाने की जानकारी सामने आई थी।

ईरान के सरकारी मीडिया ने दावा किया है कि हाल के हमलों में इस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। बताया गया कि यह हमला इजराइल और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को ध्यान में रखकर किया गया था।

इजराइल की ओर से भी मिसाइल हमलों की पुष्टि की गई है। कुछ रिपोर्ट्स में तेल अवीव के आसपास हमलों के दौरान घायल होने की जानकारी दी गई है। हालांकि हर हमले में किस प्रकार की मिसाइल इस्तेमाल हुई, इसकी स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। (Sejjil Missile)

लगातार गंभीर होता जा रहा है युद्ध

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच यह युद्ध लगातार गंभीर होता जा रहा है। संघर्ष शुरू होने के बाद से दोनों पक्षों की ओर से कई हमले किए जा चुके हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक इस युद्ध में 2000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। कई शहरों में बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं।

इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। विशेष रूप से ऊर्जा बाजार पर इसका प्रभाव देखा जा रहा है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने के बाद कई देशों को वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति के रास्ते तलाशने पड़े हैं। (Sejjil Missile)

पश्चिम एशिया में कई देशों ने पिछले वर्षों में अपनी मिसाइल क्षमताओं को बढ़ाया है। ईरान, इजराइल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां लगातार नए हथियार और मिसाइल तकनीक विकसित कर रही हैं। सेज्जिल मिसाइल के इस्तेमाल की खबर आने के बाद ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर फिर से वैश्विक ध्यान गया है। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह की लंबी दूरी की मिसाइलें क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित करती हैं। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव के बीच इस मिसाइल का उपयोग एक महत्वपूर्ण सैन्य घटनाक्रम माना जा रहा है। (Sejjil Missile)

भारतीय सेना की 7वीं पिनाका रेजिमेंट एक्टिव, 250 किमी रेंज वाले महेश्वरास्त्र की तैयारी!

Pinaka Rocket System
Pinaka MBRL

Pinaka Rocket System: भारतीय सेना अपनी लंबी दूरी की फायरपावर क्षमता को मजबूत करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। भारतीय सेना ने इसी दिशा में आगे कदम बढ़ाते हुए एक और पिनाका रॉकेट सिस्टम की रेजिमेंट को ऑपरेशनल कर दिया है। सूत्रों के अनुसार अब भारतीय सेना की सातवीं पिनाका रेजिमेंट एक्टिव हो चुकी है और आठवीं रेजिमेंट को भी इस साल के आखिर तक पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने की तैयारी चल रही है।

सेना के अधिकारियों ने बताया कि आठवीं रेजिमेंट का गठन किया जा चुका है और इसके लिए जरूरी उपकरणों का आधे से ज्यादा हिस्सा भी मिल चुका है। इस समय यह यूनिट कन्वर्जन और ट्रेनिंग की प्रक्रिया से गुजर रही है। उम्मीद है कि यह रेजिमेंट भी साल खत्म होने से पहले पूरी तरह तैयार हो जाएगी। (Pinaka Rocket System)

Pinaka Rocket System: बढ़ रही पिनाका रेजिमेंट्स की संख्या

भारतीय सेना ने वर्ष 2020 में छह नई पिनाका रेजिमेंट्स के लिए ऑर्डर दिया था। इनमें से दो और रेजिमेंट अगले साल तक तैयार होने की संभावना है। अगर यह योजना तय समय के अनुसार पूरी होती है तो भारतीय सेना के पास कुल दस पिनाका रेजिमेंट एक्टिव हो जाएंगी।

2010 से 2020 के बीच सेना ने चार पिनाका रेजिमेंट का ऑर्डर दिया था। इसके बाद 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी क्षेत्र में चीन के साथ हुए सैन्य तनाव के बाद रॉकेट आर्टिलरी की क्षमता बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया गया। उसी के बाद इस सिस्टम के विस्तार की रफ्तार बढ़ाई गई। (Pinaka Rocket System)

2,580 करोड़ रुपये का रक्षा सौदा

2020 में रक्षा मंत्रालय ने लगभग 2,580 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। यह कॉन्ट्रैक्ट बीईएमएल, टाटा पावर कंपनी लिमिटेड और लार्सन एंड टुब्रो जैसी कंपनियों के साथ किया गया था। इस सौदे के तहत छह अतिरिक्त पिनाका रेजिमेंट के लिए उपकरणों की खरीद का फैसला लिया गया।

इस ऑर्डर में कुल 114 लॉन्चर, 45 कमांड पोस्ट और 330 सपोर्ट व्हीकल्स शामिल थे। इन लॉन्चर्स में ऑटोमेटेड गन एमिंग एंड पोजिशनिंग सिस्टम लगाया गया है, जिससे रॉकेट को टारगेट की ओर सटीक तरीके से दागा जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

आर्टिलरी रेजिमेंट का स्ट्रक्चर

आर्टिलरी की भाषा में एक रेजिमेंट सेना की मूल ऑपरेशनल यूनिट होती है। आमतौर पर एक रेजिमेंट में तीन बैटरियां होती हैं। हर बैटरी में छह पिनाका लॉन्चर होते हैं। इस तरह एक रेजिमेंट में कुल 18 लॉन्चर सक्रिय रूप से तैनात रहते हैं।

इसके अलावा दो अतिरिक्त लॉन्चर ट्रेनिंग और युद्ध के समय बैकअप के लिए रखे जाते हैं। इस तरह एक रेजिमेंट में कुल मिलाकर लगभग 20 लॉन्चर मौजूद होते हैं। (Pinaka Rocket System)

कुछ सेकंड में भारी फायरपावर

पिनाका रॉकेट सिस्टम की खासियत इसकी तेज और भारी फायरपावर है। एक बैटरी में मौजूद छह लॉन्चर लगभग 44 सेकंड में 72 रॉकेट दाग सकते हैं। इन रॉकेटों की बारिश से लगभग 1000 मीटर × 800 मीटर के क्षेत्र को कुछ ही मिनटों में निशाना बनाया जा सकता है।

इस तरह के हमले का उद्देश्य दुश्मन के सैनिक जमावड़े, आर्टिलरी पोजिशन, लॉजिस्टिक बेस और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को तेजी से निष्क्रिय करना होता है। (Pinaka Rocket System)

पिनाका के अलग-अलग वेरिएंट

भारतीय सेना पिनाका सिस्टम के कई अलग-अलग वेरिएंट का उपयोग करती है। इन वेरिएंट की मारक क्षमता धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है।

पिनाका का शुरुआती एमके-1 रॉकेट लगभग 37 से 40 किलोमीटर तक के लक्ष्य को निशाना बना सकता है। इसके बाद डेवलप किए गए एमके-2 एक्सटेंडेड रेंज रॉकेट की मारक क्षमता लगभग 60 किलोमीटर तक है।

इसके अलावा सेना के पास गाइडेड पिनाका रॉकेट भी हैं जो लगभग 75 से 90 किलोमीटर तक के लक्ष्य को ज्यादा सटीकता के साथ निशाना बना सकते हैं। (Pinaka Rocket System)

120 किलोमीटर रेंज का परीक्षण

पिछले साल दिसंबर में डीआरडीओ ने पिनाका लॉन्चर से एक लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण किया था। इस रॉकेट ने लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्य को सटीकता से निशाना बनाया।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस नए वेरिएंट में कई देशों ने रुचि दिखाई है और फ्रांस भी इस तकनीक में दिलचस्पी दिखा रहा है। (Pinaka Rocket System)

पिनाका रॉकेट में रैमजेट इंजन

रैमजेट पिनाका परियोजना में पिनाका रॉकेट सिस्टम को एडवांस बनाने पर काम हो रहा है। इसमें रैमजेट इंजन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इस तकनीक से रॉकेट की रेंज काफी बढ़ाई जा सकती है।

मौजूदा पिनाका सिस्टम की अधिकतम रेंज लगभग 120 किलोमीटर है। रामजेट तकनीक के इस्तेमाल से इसे 225 से 250 किलोमीटर तक बढ़ाने की योजना है।

यह परियोजना आईआईटी मद्रास और भारतीय सेना के सहयोग से विकसित की जा रही है। इस प्रोजेक्ट पर काम वर्ष 2020 में शुरू हुआ था। रिपोर्ट्स के अनुसार इसका परीक्षण चरण 2026 में शुरू हो सकता है।

रैमजेट तकनीक की मदद से रॉकेट की गति भी बढ़ेगी और इसकी अंतिम टर्मिनल वेलोसिटी अधिक होगी। इससे यह दुश्मन के एंटी-मिसाइल सिस्टम से बचते हुए लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम हो सकता है। (Pinaka Rocket System)

क्या है महेश्वरास्त्र-1 और महेश्वरास्त्र-2 प्रोजेक्ट

महेश्वरास्त्र भारत में विकसित की जा रही एक लंबी दूरी की आधुनिक रॉकेट प्रणाली है। इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार करने की योजना है। यह प्रोजेक्ट मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत विकसित किया जा रहा है। इस सिस्टम को सोलर इंडस्ट्रीज लिमिटेड नाम की भारतीय कंपनी विकसित कर रही है। यह प्रोजेक्ट रक्षा मंत्रालय की मेक-II कैटेगरी में आता है। इस कैटेगरी में कंपनियां अपने खर्च पर हथियार या तकनीक का प्रोटोटाइप बनाती हैं और बाद में सेना के परीक्षण के बाद उसका उपयोग तय किया जाता है।

महेश्वरास्त्र प्रोजेक्ट की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी। अभी यह सिस्टम सीएडी यानी कंप्यूटर-एडेड डिजाइन चरण में है। इसका मतलब है कि फिलहाल इसका डिजाइन और कंप्यूटर सिमुलेशन तैयार किया जा रहा है। इसके बाद प्रोटोटाइप तैयार किया जाएगा और फिर परीक्षण किए जाएंगे। (Pinaka Rocket System)

महेश्वरास्त्र का पहला संस्करण महेश्वरास्त्र-1 होगा। इसकी अनुमानित मारक क्षमता लगभग 150 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इस रॉकेट सिस्टम में लगभग 250 किलोग्राम वजन का वारहेड लगाया जा सकेगा। वारहेड यानी विस्फोटक भाग अलग-अलग प्रकार का हो सकता है। इसमें हाई-एक्सप्लोसिव, फ्रैगमेंटेशन या एंटी-पर्सनल वारहेड शामिल हो सकते हैं।

महेश्वरास्त्र-1 एक मल्टी-बैरेल गाइडेड रॉकेट लॉन्चर सिस्टम होगा। इसका मतलब है कि इसमें एक साथ कई रॉकेट दागने की क्षमता होगी। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह दुश्मन के सैनिक जमावड़े, आर्टिलरी पोजिशन, लॉजिस्टिक बेस और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बना सके। (Pinaka Rocket System)

इस रॉकेट का कैलिबर लगभग 300 मिलीमीटर के आसपास होगा। इसमें आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगाया जाएगा जिसमें इनर्शियल नेविगेशन और जीपीएस या नाविक सैटेलाइट सिस्टम का उपयोग किया जाएगा। इसकी सटीकता बहुत अधिक बताई जा रही है और इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी 10 मीटर से कम रखने की योजना है।

महेश्वरास्त्र का दूसरा और ज्यादा एडवांस वर्जन महेश्वरास्त्र-2 होगा। इसकी अनुमानित रेंज लगभग 250 से 290 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इस सिस्टम में भी लगभग 250 किलोग्राम या उससे अधिक वजन का वारहेड लगाया जा सकेगा।

महेश्वरास्त्र-2 में लंबी दूरी के लिए बेहतर प्रोपेलेंट और एडवांस गाइडेंस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे यह सिस्टम दूर स्थित लक्ष्यों को ज्यादा सटीकता के साथ निशाना बना सकेगा।

दोनों सिस्टम्स को हाई-मोबिलिटी व्हीकल पर लगाया जाएगा। आमतौर पर ऐसे सिस्टम्स को टाट्रा 8×8 जैसे सैन्य ट्रकों पर लगाया जाता है। इससे इन्हें तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत तैनात किया जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

बता दें कि महेश्वरास्त्र सिस्टम डिजाइन और सिमुलेशन चरण में है। इसका प्रोटोटाइप परीक्षण 2026-27 के आसपास शुरू हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि अगर डेवलपमेंट और ट्रायल्स तय समय पर पूरे हो जाते हैं तो यह सिस्टम 2028 से 2030 के बीच भारतीय सेना में शामिल किया जा सकता है। एक रेजिमेंट के लिए इसकी लागत लगभग 1000 से 1500 करोड़ रुपये तक हो सकती है। (Pinaka Rocket System)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

लंबी दूरी के रॉकेट सिस्टम की आवश्यकता पिछले वर्ष हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी महसूस की गई थी। इसके बाद भारतीय सेना ने आपात खरीद प्रक्रिया के तहत इजरायली एलबिट सिस्टम्स से दो सूर्यास्त्र (पुल्स यानी प्रीसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम) लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर सिस्टम भी हासिल किए थे। इनकी रेंज 150-300 किमी रेंज तक है। वहीं, इस साल जनवरी में दो लॉन्चर्स भी डिलीवर हो चुके हैं।

यह सिस्टम भारत और इजराइल के सहयोग से विकसित किए गए हैं। इनका परीक्षण फिलहाल लाइव फायर ट्रायल के रूप में किया जा रहा है। (Pinaka Rocket System)

सेना के पास मौजूद रॉकेट आर्टिलरी

वर्तमान समय में भारतीय सेना के पास लगभग 15 रॉकेट आर्टिलरी रेजिमेंट मौजूद हैं। जबकि साल 2007 में सेना के पास कुल 11 रॉकेट रेजिमेंट थीं। इनमें मुख्य रूप से तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इनमें सात पिनाका रेजिमेंट, तीन रूसी मूल के स्मर्च सिस्टम और पांच पुराने बीएम-21 ग्रैड रॉकेट सिस्टम शामिल हैं।

सेना की योजना है कि धीरे-धीरे पुराने ग्रैड सिस्टम को हटाकर उनकी जगह नए पिनाका यूनिट्स को शामिल किया जाए। योजना के अनुसार 2030 तक लगभग 22 से 30 पिनाका रेजिमेंट तक विस्तार किया जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

पाकिस्तान और चीन के सिस्टम

पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने फतह-2 गाइडेड रॉकेट दागा था, जिसे हरियाणा के सिरसा क्षेत्र के ऊपर भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने इंटरसेप्ट कर लिया था। पाकिस्तान का दावा है कि इस रॉकेट की रेंज लगभग 400 किलोमीटर तक हो सकती है।

अगस्त 2025 में पाकिस्तान ने सेना रॉकेट कमांड फोर्स बनाने की भी घोषणा की थी। बताया गया कि यह कमान लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम के ऑपरेशन के लिए बनाई गई है। (Pinaka Rocket System)

दूसरी ओर चीन के पास भी बड़े पैमाने पर रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम मौजूद हैं। चीनी सेना का पीएचएल-16 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम लगभग 130 किलोमीटर तक के गाइडेड रॉकेट दागने की क्षमता रखता है। इसके अलावा यह सिस्टम लगभग 290 किलोमीटर तक के टैक्टिकल मिसाइल भी लॉन्च कर सकता है।

चीनी सेना इन रॉकेट सिस्टम को सैटेलाइट, ड्रोन और डिजिटल कमांड नेटवर्क से जोड़कर इस्तेमाल करती है, जिससे सीमा क्षेत्रों में दूर तक टारगेट को पहचानकर हमला किया जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

रॉकेट-मिसाइल फोर्स बनाने की योजना

वहीं, इस साल जनवरी में सेना दिवस पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने बताया था कि भारतीय सेना एक समर्पित रॉकेट-कम-मिसाइल फोर्स बनाने की दिशा में काम कर रही है। इस फोर्स का उद्देश्य पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का ऑपरेशन होगा।

इस योजना के तहत पिनाका जैसे स्वदेशी सिस्टम को भी बड़े पैमाने पर शामिल किया जाएगा। सेना का मानना है कि आधुनिक युद्ध में लंबी दूरी की सटीक फायरपावर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय सेना के आर्टिलरी आधुनिकीकरण कार्यक्रम में पिनाका रॉकेट सिस्टम को महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। डीआरडीओ और भारतीय उद्योग के सहयोग से विकसित यह सिस्टम स्वदेशी रक्षा तकनीक का एक प्रमुख उदाहरण है। (Pinaka Rocket System)

इजरायल-ईरान युद्ध के बीच पीएम नेतन्याहू को लेकर उठ रहे सवाल, सोशल मीडिया पर अफवाहों की बाढ़

Where is Benjamin Netanyahu

Benjamin Netanyahu: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है। इस वीडियो के सामने आने के बाद कई यूजर्स ने उनकी मौजूदगी को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कुछ लोगों ने दावा किया कि वीडियो में दिखाई दे रही तस्वीर असली नहीं है और इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से बनाया गया है। हालांकि बाद में इन दावों को फैक्ट चेक करने वाली एजेंसियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने गलत बताया है।

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो में वह ईरान के साथ जारी तनाव और क्षेत्रीय हालात पर टिप्पणी करते दिखाई दे रहे थे। वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर इसके स्क्रीनशॉट तेजी से शेयर किए जाने लगे और कुछ यूजर्स ने दावा किया कि नेतन्याहू के हाथ में छह उंगलियां दिखाई दे रही हैं। (Benjamin Netanyahu)

Benjamin Netanyahu: सोशल मीडिया पर शुरू हुई अटकलें

वीडियो के वायरल होने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने यह सवाल उठाया कि क्या यह वीडियो असली है या फिर इसे एआई की मदद से तैयार किया गया है। कुछ यूजर्स ने वीडियो के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा कि नेतन्याहू के हाथ में छह उंगलियां दिखाई दे रही हैं, जो सामान्य नहीं है। इसी आधार पर कई लोगों ने वीडियो को फर्जी बताया।

अमेरिकी कंजरवेटिव कमेंटेटर कैंडेस ओवेन्स ने भी इस मामले पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर टिप्पणी की। उन्होंने लिखा कि नेतन्याहू कहां हैं और उनके दफ्तर की ओर से एआई वीडियो क्यों जारी किए जा रहे हैं। उनके इस पोस्ट के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आ गया और सोशल मीडिया पर कई तरह की अटकलें फैलने लगीं।

कुछ अन्य यूजर्स ने भी इसी तरह के सवाल उठाते हुए लिखा कि अगर वीडियो असली है तो फिर तस्वीर में छह उंगलियां क्यों दिखाई दे रही हैं। इस तरह के कई पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए। (Benjamin Netanyahu)

एआई चैटबॉट ने दी सफाई

सोशल मीडिया पर फैल रही इन अटकलों के बाद एक्स प्लेटफॉर्म के एआई चैटबॉट ग्रोक ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। चैटबॉट ने बताया कि वीडियो में दिखाई दे रही अतिरिक्त उंगली वास्तव में एक ऑप्टिकल इल्यूजन यानी दृश्य भ्रम है। यह कैमरे के एंगल और वीडियो के फ्रेम की वजह से ऐसा दिखाई दे रहा है।

ग्रोक ने स्पष्ट किया कि नेतन्याहू के हाथ में सामान्य रूप से पांच ही उंगलियां हैं और वीडियो में ऐसा लगना केवल तस्वीर के एंगल और रोशनी के कारण हुआ है। चैटबॉट ने यह भी कहा कि वीडियो प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रिकॉर्ड किया गया था और इसमें किसी तरह की छेड़छाड़ का कोई प्रमाण नहीं है। (Benjamin Netanyahu)

नेतन्याहू की मौत की अफवाहों को भी बताया गलत

सोशल मीडिया पर वीडियो से जुड़ी चर्चा के दौरान कुछ पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि नेतन्याहू की मौत हो चुकी है और इसी वजह से एआई वीडियो जारी किए जा रहे हैं। हालांकि इन दावों को भी विभिन्न फैक्ट चेक वेबसाइट्स ने गलत बताया है।

फैक्ट चेक रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली मीडिया और अन्य विश्वसनीय स्रोतों ने इन अफवाहों को निराधार बताया है। कई मीडिया संस्थानों ने स्पष्ट किया कि नेतन्याहू जीवित हैं और उनके बारे में फैल रही खबरें गलत जानकारी पर आधारित हैं। (Benjamin Netanyahu)

डिलीट किया ट्वीट

इस पोस्ट में दावा किया गया कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौत हो गई है। पोस्ट करने वाले अकाउंट ने कहा कि प्रधानमंत्री के आधिकारिक एक्स अकाउंट (@IsraeliPM) ने एक ट्वीट डिलीट कर दिया है और इसी वजह से यह खबर सामने आई है।

पोस्ट में यह भी लिखा गया कि पहले एक ट्वीट में बताया गया था कि इजरायल के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अचानक फोन कॉल लेने के लिए बाहर चले गए थे और वापस आने पर वह काफी घबराए हुए दिखाई दे रहे थे।

Where is Benjamin Netanyahu

इसके बाद दावा किया गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने नागरिकों से कहा है कि वे केवल वेरिफाइड अपडेट्स पर ही भरोसा करें। (Benjamin Netanyahu)

हालांकि नीचे दिखाए गए स्क्रीनशॉट में प्रधानमंत्री कार्यालय के नाम से एक बयान भी दिखाया गया है। उस कथित बयान में कहा गया है कि सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की स्थिति को लेकर फैल रही अफवाहों की पुष्टि नहीं हुई है। लोगों से अपील की गई है कि वे केवल आधिकारिक और विश्वसनीय जानकारी पर भरोसा करें।

बयान में यह भी लिखा है कि प्रधानमंत्री से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और नेतन्याहू इजरायल की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध हैं। (Benjamin Netanyahu)

नेतन्याहू के परिवार को लेकर भी चर्चा

इस पूरे विवाद के दौरान सोशल मीडिया पर नेतन्याहू के परिवार को लेकर भी चर्चा होने लगी। कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि उनके बेटे यायर नेतन्याहू ने 9 मार्च के बाद एक्स पर कोई पोस्ट नहीं किया है। इसी आधार पर कई तरह की अटकलें लगाई गईं।

हालांकि इन दावों के समर्थन में कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई। इसके बीच नेतन्याहू की पत्नी सारा नेतन्याहू ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक इंटरव्यू से जुड़ा बयान साझा किया। इसमें उन्होंने कहा कि देश में कई तरह की राजनीतिक चुनौतियां हैं, लेकिन जनता का समर्थन उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।

सारा नेतन्याहू ने अपने संदेश में कहा कि बहुत से लोग वर्षों से जिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं, उन्हें समझना आसान नहीं है। उन्होंने लिखा कि जनता का प्यार और समर्थन उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है। (Benjamin Netanyahu)

फैक्ट चेक में दावे निकले गलत

सोशल मीडिया पर फैल रही इन खबरों के बाद कई फैक्ट चेक संगठनों और मीडिया संस्थानों ने वीडियो की जांच की। जांच में पाया गया कि वीडियो में दिखाई देने वाली अतिरिक्त उंगली वास्तव में कैमरे के एंगल और तस्वीर के फ्रेम की वजह से भ्रम की स्थिति बनी।

फैक्ट चेक रिपोर्ट्स के अनुसार, नेतन्याहू से जुड़ी मौत की अफवाहों या वीडियो के एआई से बनाए जाने के दावों का कोई प्रमाण नहीं मिला है। विशेषज्ञों ने कहा कि सोशल मीडिया पर अक्सर तस्वीरों या वीडियो के छोटे हिस्सों को गलत तरीके से समझकर अफवाहें फैल जाती हैं।

इस मामले में भी वायरल स्क्रीनशॉट और अधूरी जानकारी के आधार पर कई तरह के दावे किए गए, जिन्हें बाद में गलत पाया गया। (Benjamin Netanyahu)

INS Taragiri: भारत का नया स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट अप्रैल में होगा नौसेना में शामिल, ब्रह्मोस-बराक से है लैस

INS Taragiri

INS Taragiri: भारतीय नौसेना को जल्द ही एक और आधुनिक युद्धपोत मिलने जा रहा है। स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी अप्रैल के पहले सप्ताह में विशाखापत्तनम में नौसेना में औपचारिक रूप से शामिल की जाएगी। इस समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। यह जहाज प्रोजेक्ट 17ए के तहत डेवलप नीलगिरी क्लास फ्रिगेट का हिस्सा है और भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण युद्धपोत माना जा रहा है।

आईएनएस तारागिरी को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) में बनाया गया है। यह प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनने वाले सात फ्रिगेट्स में चौथा जहाज है। इसे 28 नवंबर 2025 को भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया था। इसके कमीशनिंग समारोह को पहले मार्च 2026 में आयोजित किया जाना था, लेकिन बाद में कार्यक्रम में थोड़ा बदलाव किया गया है और अब इसे अप्रैल के पहले सप्ताह में आयोजित करने की तैयारी की गई है। (INS Taragiri)

INS Taragiri: प्रोजेक्ट 17ए में एडवांस वॉरशिप

प्रोजेक्ट 17ए भारतीय नौसेना का एक महत्वपूर्ण युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम है, जिसके तहत अत्याधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट्स डेवलप किए जा रहे हैं। इन जहाजों को नीलगिरी क्लास के नाम से जाना जाता है। इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय नौसेना की समुद्री क्षमता को मजबूत करना और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार नई तकनीक से लैस युद्धपोत तैयार करना है।

इस श्रृंखला का पहला जहाज आईएनएस नीलगिरी जनवरी 2025 में नौसेना में शामिल किया गया था। इसके बाद आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस हिमगिरि अगस्त 2025 में सेवा में आए। अब आईएनएस तारागिरी इस सीरीज का चौथी फ्रिगेट है, जो जल्द ही नौसेना के बेड़े में शामिल होगा। इसके बाद इस क्लास का पांचवां जहाज आईएनएस महेंद्रगिरि भी आने वाले समय में नौसेना में शामिल किया जाएगा। (INS Taragiri)

आधुनिक डिजाइन और स्टेल्थ तकनीक

आईएनएस तारागिरी को आधुनिक स्टेल्थ डिजाइन के साथ तैयार किया गया है। इसका कुल डिस्प्लेसमेंट 6700 टन से अधिक है। इस जहाज में कम से कम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जिससे भारत की रक्षा निर्माण क्षमता को भी मजबूती मिली है।

इस फ्रिगेट के डिजाइन में कई ऐसी तकनीकों का उपयोग किया गया है जो इसे दुश्मन के रडार और सेंसर से छिपाने में मदद करती हैं। जहाज का हल यानी बाहरी ढांचा अधिक स्मूद और स्लीकर बनाया गया है। इसके अलावा इसमें एनक्लोज्ड मूरिंग डेक और कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर जैसी विशेषताएं दी गई हैं। इससे जहाज की हीट और रडार पहचान कम हो जाती है और युद्ध की स्थिति में इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है। (INS Taragiri)

आधुनिक हथियारों से लैस युद्धपोत

आईएनएस तारागिरी और इसकी अन्य सिस्टर शिप्स को आधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस किया गया है। इस जहाज में ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल प्रणाली लगाई गई है, जो समुद्र और जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को तेजी से निशाना बना सकती है। इसके अलावा इसमें बराक-8 लॉन्ग-रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम भी लगाया गया है, जो हवाई खतरों से जहाज की सुरक्षा करता है।

जहाज में 76 मिलीमीटर की नौसैनिक गन भी लगाई गई है, जिसे लाइसेंस के तहत भारत में बनाया गया है। इसके अलावा इसमें टॉरपीडो और एंटी-सबमरीन हथियार भी मौजूद हैं, जिनका उपयोग समुद्र के अंदर मौजूद पनडुब्बियों के खिलाफ किया जा सकता है। इस युद्धपोत में आधुनिक रडार और सेंसर सिस्टम भी लगाए गए हैं, जो समुद्री क्षेत्र में निगरानी और लक्ष्य पहचान में मदद करते हैं। (INS Taragiri)

निर्माण में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल

आईएनएस तारागिरी के निर्माण में इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस तकनीक के तहत जहाज के अलग-अलग हिस्सों को पहले अलग-अलग मॉड्यूल के रूप में तैयार किया जाता है और बाद में उन्हें जोड़कर पूरा जहाज बनाया जाता है। इससे निर्माण प्रक्रिया तेज होती है और गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।

इस तकनीक के कारण प्रोजेक्ट 17ए के जहाजों के निर्माण का समय भी कम हुआ है। उदाहरण के तौर पर पहले जहाज आईएनएस नीलगिरी को बनाने में लगभग 93 महीने लगे थे, जबकि आईएनएस तारागिरी का निर्माण करीब 81 महीनों में पूरा किया गया। (INS Taragiri)

पूर्वी नौसेना कमान में होगी तैनाती

आईएनएस तारागिरी को भारतीय नौसेना की पूर्वी नौसेना कमान में शामिल किया जाएगा, जिसका मुख्यालय विशाखापत्तनम में है। यह कमान भारतीय महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और निगरानी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालती है। इस फ्रिगेट के शामिल होने के बाद पूर्वी फ्लीट की सतह युद्ध क्षमता और मजबूत होगी।

प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनने वाले फ्रिगेट्स भारतीय नौसेना के आधुनिक युद्धपोतों में शामिल हैं। इन जहाजों के निर्माण में देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े 200 से अधिक एमएसएमई उद्योगों ने भी योगदान दिया है। इसके माध्यम से स्वदेशी रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी बने हैं। (INS Taragiri)

LAMITIYE-2026 में ट्राई-सर्विसेज ड्रिल, भारत और सेशेल्स की सेनाएं कर रहीं आतंकवाद से निपटने की ट्रेनिंग पर फोकस

India–Seychelles Joint Military Exercise LAMITIYE-2026

Exercise LAMITIYE-2026: भारत-सेशेल्स संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘लामितिये-2026’ का 11वां संस्करण इन दिनों सेशेल्स में आयोजित किया जा रहा है। यह संयुक्त सैन्य अभ्यास 10 मार्च से 22 मार्च तक सेशेल्स डिफेंस एकेडमी में चल रहा है। इस अभ्यास में भारतीय सेनाओं और सेशेल्स डिफेंस फोर्स के सैनिक मिलकर विभिन्न सैन्य प्रशिक्षण गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं। अभ्यास का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, पेशेवर अनुभव साझा करना और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है।

इस बार का लामितिये-2026 अभ्यास कई मायनों में खास है क्योंकि यह पहली बार ट्राई-सर्विसेज यानी तीनों सेनाओं का संयुक्त अभ्यास है। इसमें भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के जवान शामिल हैं, जो सेशेल्स डिफेंस फोर्स के सैनिकों के साथ मिलकर ट्रेनिंग ले रहे हैं। इस अभ्यास में मुख्य रूप से सेमी-अर्बन क्षेत्रों में सब-कन्वेंशनल ऑपरेशंस और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों से जुड़े ऑपरेशंस पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। (Exercise LAMITIYE-2026)

India–Seychelles Joint Military Exercise LAMITIYE-2026

अभ्यास के दौरान कई पेशेवर चर्चाएं, लेक्चर, डेमोंस्ट्रेशन और प्रैक्टिकल ड्रिल्स आयोजित की जा रही हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य संयुक्त ऑपरेशनल प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना और दोनों देशों की सेनाओं के बीच अनुभव साझा करना है। ट्रेनिंग प्रोग्राम में काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस यानी आतंकवाद विरोधी अभियानों से जुड़े कई विषयों पर चर्चा की गई। इसमें भारतीय सेना के एक बड़े ऑपरेशन का केस स्टडी भी शामिल था, जिसमें ऑपरेशनल प्लानिंग, इंटेलिजेंस आधारित टारगेटिंग और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय जैसे पहलुओं को समझाया गया।

अभ्यास के दौरान सैनिकों को अर्बन और सेमी-अर्बन इलाकों में कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन यानी घेराबंदी और तलाशी अभियान की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इसमें इलाके की योजना बनाना, सर्च तकनीक, भीड़ प्रबंधन और अलग-अलग सैन्य इकाइयों के बीच तालमेल जैसे विषय शामिल हैं। इन अभ्यासों का उद्देश्य मिशन के दौरान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए ऑपरेशन को सफल बनाना है। (Exercise LAMITIYE-2026)

लामितिये-2026 अभ्यास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ऑपरेशनल डेमोंस्ट्रेशन और प्रैक्टिकल ड्रिल्स भी हैं। सैनिकों ने क्लोज क्वार्टर बैटल और रूम इंटरवेंशन ड्रिल्स का अभ्यास किया। इन ड्रिल्स में टैक्टिकल एंट्री तकनीक, कमरे पर नियंत्रण स्थापित करना और समन्वित हमले की रणनीति का अभ्यास कराया गया। दोनों देशों के सैनिकों ने मिलकर इन अभ्यासों को अंजाम दिया और संयुक्त टीमों के रूप में काम किया।

India–Seychelles Joint Military Exercise LAMITIYE-2026

अभ्यास के दौरान एक विशेष डेमोंस्ट्रेशन भी आयोजित किया गया जिसमें हाइजैक बस को रेस्क्यू करने की रणनीति दिखाई गई। इस अभ्यास में सैनिकों ने बंधक स्थिति से निपटने के लिए तेज प्रतिक्रिया, समन्वित कार्रवाई और निर्णय लेने की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया। (Exercise LAMITIYE-2026)

इसके अलावा अभ्यास में आधुनिक ऑपरेशनल क्षेत्रों से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की गई। इसमें हेलीकॉप्टर के जरिए आपदा राहत अभियानों में मदद के तरीकों को दिखाया गया। इस दौरान हेलीकॉप्टर की भूमिका जैसे कैजुअल्टी इवैक्यूएशन, राहत सामग्री पहुंचाना और एरियल रेकॉन्सेंस पर जानकारी दी गई। साथ ही आपदा प्रबंधन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग पर भी चर्चा की गई, जिसमें डेटा एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी आधारित लॉजिस्टिक्स के उपयोग को समझाया गया।

सैन्य चिकित्सा अधिकारियों ने भी अभ्यास के दौरान बैटलफील्ड मेडिकल सपोर्ट और टैक्टिकल कॉम्बैट क्रिटिकल केयर से जुड़ी चर्चाएं कीं। इसमें घायल सैनिकों को तुरंत चिकित्सा सहायता देना, सुरक्षित तरीके से निकासी करना और मेडिकल संसाधनों के समन्वय जैसे विषय शामिल रहे। (Exercise LAMITIYE-2026)

लैंड बेस्ड ट्रेनिंग के साथ-साथ इस अभ्यास में समुद्री सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर भी ध्यान दिया गया। सेशेल्स कोस्ट गार्ड और स्पेशल फोर्स ने विजिट, बोर्ड, सर्च एंड सीजर यानी VBSS प्रक्रिया का प्रदर्शन किया। यह प्रक्रिया संदिग्ध जहाजों को रोकने और उनकी तलाशी लेने के दौरान अपनाई जाती है। इस डेमोंस्ट्रेशन में बोर्डिंग तकनीक, संयुक्त कार्रवाई और समुद्री कानून प्रवर्तन के तरीकों को दिखाया गया।

सैन्य प्रशिक्षण के अलावा सांस्कृतिक और शारीरिक गतिविधियां भी इस अभ्यास का हिस्सा हैं। दोनों देशों के सैनिकों ने योग सत्रों और आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन यानी AMAR में भाग लिया। इन गतिविधियों का उद्देश्य सैनिकों की शारीरिक फिटनेस और मानसिक मजबूती को बढ़ाना है। इसके साथ ही दोनों सेनाओं के बीच दोस्ताना माहौल बनाने के लिए एक फ्रेंडली फुटबॉल मैच भी आयोजित किया गया।

लामितिये शब्द सेशेल्स की क्रियोल भाषा का शब्द है जिसका अर्थ “फ्रेंडशिप” यानी दोस्ती होता है। यह संयुक्त सैन्य अभ्यास कई वर्षों से भारत और सेशेल्स के बीच रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मौजूदा अभ्यास के दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच पेशेवर संवाद, संयुक्त प्रशिक्षण और अनुभव साझा करने की प्रक्रिया जारी है, जिससे दोनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल समझ और तालमेल को और मजबूत किया जा रहा है। (Exercise LAMITIYE-2026)

15 मार्च को जयपुर में पहली बार Soldierathon 2026, मिलिट्री स्टेशन में सैनिकों के सम्मान में दौड़ेगा शहर

Wonder Cement Jaipur Soldierathon 2026

Wonder Cement Jaipur Soldierathon 2026: वंडर सीमेंट जयपुर सोल्जरथॉन 2026 का पहला संस्करण 15 मार्च 2026 को जयपुर में आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम का आयोजन गांडीव स्टेडियम में किया जा रहा है, जहां बड़ी संख्या में धावक, फिटनेस प्रेमी और आम नागरिक एक साथ दौड़ लगाकर भारतीय सेनाओं के साहस और बलिदान को श्रद्धांजलि देंगे। यह कार्यक्रम देशभक्ति और फिटनेस को एक साथ जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है।

इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य लोगों को स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना और साथ ही देश की रक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। जयपुर में होने वाले इस पहले संस्करण में अलग-अलग आयु वर्ग के धावकों, रनिंग कम्युनिटी, कॉरपोरेट प्रतिभागियों और युवा स्वयंसेवकों की भागीदारी देखने को मिलेगी। इस आयोजन को फिटनेस कम्युनिटी फिटिस्तान – एक फिट भारत की पहल के तहत आयोजित किया जा रहा है, जिसका मुख्य संदेश “रन विद सोल्जर्स – रन फॉर सोल्जर्स” रखा गया है।

दौड़ में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के लिए कई कैटेगरी रखी गई हैं। इनमें हाफ मैराथन यानी 21 किलोमीटर, 10 किलोमीटर, 5 किलोमीटर और 3 किलोमीटर की दौड़ शामिल है। रनिंग कम्युनिटी के एंबेसडर और पेसर पूरे कार्यक्रम के दौरान धावकों को मार्गदर्शन और सहयोग देंगे। प्रतियोगिता में विजेताओं को पुरस्कार भी दिए जाएंगे, जबकि सभी प्रतिभागियों को मेडल और सर्टिफिकेट प्रदान किए जाएंगे।

यह दौड़ जयपुर मिलिट्री स्टेशन के अंदर आयोजित की जाएगी। यह एक सुरक्षित सैन्य क्षेत्र है जहां आमतौर पर नागरिकों की एंट्री सीमित रहती है। ऐसे में प्रतिभागियों को सेना के अनुशासित वातावरण के बीच दौड़ने का दुर्लभ अवसर मिलेगा। दौड़ के सभी रूट गांडीव स्टेडियम से शुरू होकर वहीं समाप्त होंगे। रेस के दौरान रास्ते में हाइड्रेशन पॉइंट भी बनाए गए हैं, जहां प्रतिभागियों को पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स उपलब्ध कराए जाएंगे।

कार्यक्रम के लिए रजिस्ट्रेशन पहले ही पूरा हो चुका है। पंजीकृत प्रतिभागियों को फिटिस्तान ऐप के जरिए क्यूआर टिकट दिया गया है, जिसके आधार पर उन्हें एंट्री मिलेगी। कार्यक्रम के दिन सुबह जल्दी गेट खोले जाएंगे और सुरक्षा जांच के बाद प्रतिभागियों को मिलिट्री स्टेशन के अंदर प्रवेश दिया जाएगा। पार्किंग की भी सीमित व्यवस्था की गई है।

इस आयोजन को टाइटल स्पॉन्सर के तौर पर वंडर सीमेंट सहयोग कर रहा है। इसके अलावा वंडर होम फाइनेंस, फेडरल बैंक और अन्य सामुदायिक पार्टनर भी इस कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं। आयोजकों के अनुसार यह दौड़ फिटनेस, अनुशासन और देशभक्ति की भावना को एक साथ जोड़ने वाला विशेष कार्यक्रम है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेने वाले हैं।

इस कार्यक्रम में मिजोरम के राज्यपाल वी.के. सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल मंजिंदर सिंह, साउथ वेस्टर्न आर्मी कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पदम सिंह शेखावत और वंडर सीमेंट के चेयरमैन अशोक पतनी भी शामिल होंगे।

आंध्र प्रदेश में बनेगा दुनिया का पहला ऑटोनॉमस मैरीटाइम शिपबिल्डिंग सेंटर, सागर डिफेंस इंजीनियरिंग करेगी तैयार

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar CEO, Sagar Defence Engineering with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh Garu, has laid the foundation for the world's first autonomous maritime shipbuilding and systems centre in Andhra Pradesh

Autonomous Maritime Shipyard: समुद्री तकनीक और रक्षा निर्माण के क्षेत्र में भारत को बड़ी कामयाबी मिली है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में दुनिया का पहला ऑटोनॉमस मैरीटाइम शिपबिल्डिंग एंड सिस्टम्स सेंटर स्थापित किया जा रहा है। इस परियोजना की आधारशिला 12 मार्च को रखी गई। यह परियोजना भारतीय रक्षा तकनीक कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड द्वारा डेवलप की जा रही है।

रक्षा समाचार इस मौके का खास गवाह बना। यह नया शिपयार्ड आंध्र प्रदेश के जुव्वलादिन्नी फिशिंग हार्बर में बनाया जाएगा। इस जगह की खूबी यह है कि यहां से सीधे समुद्र तक पहुंच उपलब्ध है। इससे जहाजों का निर्माण, लॉन्चिंग, परीक्षण और तैनाती एक ही जगह से की जा सकेगी। इस परियोजना को भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता और समुद्री तकनीक को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard: 29.58 एकड़ क्षेत्र में बनेगा आधुनिक शिपयार्ड

इस परियोजना के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने जुव्वलादिन्नी फिशिंग हार्बर में कुल 29.58 एकड़ भूमि आवंटित की है। इस भूमि में लगभग 7.58 एकड़ वाटरफ्रंट क्षेत्र शामिल है, जबकि बाकी हिस्सा हार्बर क्षेत्र में आता है। समुद्र के पास होने के कारण यहां जहाजों के निर्माण और परीक्षण के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध होंगी।

यह केंद्र एक मॉडर्न एंड इंटीग्रेटिड कैंपस के तौर पर डेवलप किया जाएगा। यहां जहाज निर्माण सुविधा, परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर, जहाज मरम्मत और रखरखाव सुविधा तथा विशेष प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। इससे आटोनोमस मैरिन सिस्टम्स के डिजाइन से लेकर परीक्षण तक की पूरी प्रक्रिया एक ही परिसर में संभव होगी। (Autonomous Maritime Shipyard)

अनमैन्ड मरीन टेक्नोलॉजी पर होगा फोकस

यह केंद्र मुख्य रूप से ऑटोनॉमस और अनमैन्ड मैरीटाइम सिस्टम्स के डेवलपमेंट पर काम करेगा। इसमें ऐसे जहाज और उपकरण बनाए जाएंगे जो कम मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकें।

यहां अनमैन्ड सरफेस वेसल्स (यूएसवी) यानी समुद्र की सतह पर चलने वाले मानवरहित जहाज विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स (एयूवी) भी बनाए जाएंगे जो समुद्र के अंदर काम करने वाले रोबोटिक सिस्टम होंगे।

इन तकनीकों का उपयोग समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा, समुद्री अनुसंधान और विभिन्न व्यावसायिक कार्यों में किया जा सकेगा। इसके साथ ही केंद्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित नेविगेशन सिस्टम, समुद्री सेंसर, कम्युनिकेशन नेटवर्क और कमांड एंड कंट्रोल प्लेटफॉर्म भी विकसित किए जाएंगे। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar, CEO of Sagar Defence Engineering, along with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh, laid the foundation stone for the world’s first Autonomous Maritime Shipbuilding and Systems Centre in Andhra Pradesh.

रोबोटिक्स और एआई प्रोसेस-बेस्ड मैन्युफैक्चरिंग

इस शिपयार्ड में पारंपरिक जहाज निर्माण से अलग आधुनिक डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। यहां एआई आधारित शिपयार्ड मैनेजमेंट सिस्टम लगाया जाएगा जो डिजाइन, उत्पादन और परीक्षण प्रक्रियाओं का समन्वय करेगा।

निर्माण प्रक्रिया में रोबोटिक वेल्डिंग, ऑटोमेटेड कटिंग, पेंटिंग और असेंबली जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होगा। इसके अलावा 3डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग विशेष पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के निर्माण में किया जाएगा।

साथ ही यहां डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इसके तहत जहाज और शिपयार्ड के डिजिटल मॉडल तैयार किए जाएंगे, जिनकी मदद से वास्तविक परीक्षण से पहले ही उनके प्रदर्शन का आकलन किया जा सकेगा। (Autonomous Maritime Shipyard)

समुद्र में वास्तविक परीक्षण की सुविधा

जुव्वलादिन्नी हार्बर के पास होने के कारण इस केंद्र को समुद्र में एक्चुअल टेस्ट करने की सुविधा भी मिलेगी। यहां विकसित किए गए जहाजों और सिस्टम्स का परीक्षण सीधे समुद्री वातावरण में किया जाएगा।

परीक्षण के दौरान जहाजों की ऑटोनॉमस नेविगेशन, ऑब्स्टेकल अवॉयडेंस और डॉकिंग क्षमता को जांचा जाएगा। इसके अलावा सेंसर और नेविगेशन तकनीकों का भी परीक्षण किया जाएगा।

इस तरह के परीक्षण से नए सिस्टम्स की विश्वसनीयता और कार्यक्षमता का आकलन किया जा सकेगा। (Autonomous Maritime Shipyard)

आंध्र प्रदेश सरकार करेगी मदद

इस परियोजना को आंध्र प्रदेश सरकार भी सहयोग कर रही है। आधारशिला समारोह में राज्य के मानव संसाधन विकास, आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री नारा लोकेश ने हिस्सा लिया।

नारा लोकेश ने कहा कि यह परियोजना आंध्र प्रदेश की समुद्री तकनीक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक निकुंज पराशर का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस परियोजना से राज्य के समुद्री क्षेत्र को नई दिशा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि भारत की करीब 7500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और आंध्र प्रदेश देश की दूसरी सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था और तटीय समुदायों के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar, CEO of Sagar Defence Engineering, along with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh, laid the foundation stone for the world’s first Autonomous Maritime Shipbuilding and Systems Centre in Andhra Pradesh.

मैरीटाइम ऑपरेशंस में ऑटोनॉमस तकनीकों का बढ़ा इस्तेमाल

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैप्टन निकुंज पराशर ने कहा कि यह प्रोजेक्ट समुद्री तकनीक के क्षेत्र में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। उनके अनुसार दुनिया भर में मैरीटाइम ऑपरेशंस तेजी से ऑटोनॉमस तकनीकों की ओर बढ़ रहा है और यह केंद्र भारत को अगली पीढ़ी की अनमैन्ड मैरीटाइम सिस्टम्स को देश के भीतर डिजाइन करने, परीक्षण करने और निर्माण करने की क्षमता देगा।

उन्होंने यह भी बताया कि इस शिपयार्ड में स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें रोबोटिक सिस्टम के जरिए ऑटोमेटेड वेल्डिंग, कटिंग, पेंटिंग और असेंबली जैसे कार्य किए जाएंगे। इसके अलावा रोबोट और ऑटोमेटेड गाइडेड व्हीकल्स की मदद से सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाएगा। विशेष पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के तेज निर्माण के लिए 3डी प्रिंटिंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।

निकुंज पराशर ने कहा कि भारत की करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और आंध्र प्रदेश देश की दूसरी सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि और तटीय सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनके अनुसार यह परियोजना समुद्री तकनीक, रक्षा निर्माण और तटीय क्षेत्रों के विकास के लिए महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। (Autonomous Maritime Shipyard)

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग की स्थापना वर्ष 2015 में कैप्टन निकुंज पराशर और उनके सहयोगियों द्वारा की गई थी। कंपनी ने शुरुआत मुंबई में एक छोटे वर्कस्पेस से की थी। समय के साथ यह कंपनी रक्षा तकनीक क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल हो गई।

कंपनी पुणे में स्थित अपने 10 एकड़ के रिसर्च एंड मैन्युफैक्चरिंग परिसर में विभिन्न प्रकार के स्वायत्त सिस्टम्स विकसित कर रही है। इनमें समुद्री, हवाई और जमीन पर काम करने वाले मानवरहित सिस्टम शामिल हैं।

कंपनी ने जेनेसिस नाम का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम भी डेवलप किया है। यह तकनीक किसी भी जहाज को रिमोट, सेमी-ऑटोनॉमस या पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में ऑपरेट कर सकती है। (Autonomous Maritime Shipyard)

ब्लू इकोनॉमी को मिलेगा बढ़ावा

इस परियोजना से आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। इस केंद्र के संचालन से 300 से 1,000 तक नौकरियां प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। इसके अलावा इंजीनियर, तकनीशियन, जहाज डिजाइन विशेषज्ञ और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए भी अवसर उपलब्ध होंगे। इस सेंटर से न केवल ब्लू इकोनॉमी का विकास होगा बल्कि भारत को वैश्विक ऑटोनॉमस समुद्री टेक्नोलॉजी हब बनाने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही इस परियोजना से आसपास के क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स, हार्बर सेवाओं और सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। (Autonomous Maritime Shipyard)

मछुआरों के लिए भी होगा फायदा

इस परियोजना से स्थानीय मछुआरा समुदाय को भी फायदा मिलने की बात कही गई है। इस केंद्र में जहाजों की मरम्मत और रखरखाव की सुविधा उपलब्ध होगी, जिससे मछली पकड़ने वाली नौकाओं की मरम्मत जल्दी हो सकेगी।

इसके अलावा नई तकनीकों की मदद से रीयल टाइम मछली लोकेशन मैप्स, मौसम अलर्ट और समुद्री सुरक्षा सिस्टम जैसी सुविधाओं को भी विकसित करने की योजना है। इससे समुद्र में काम करने वाले मछुआरों की सुरक्षा और कार्यक्षमता बढ़ाई जा सकेगी। (Autonomous Maritime Shipyard)

भारत की समुद्री तकनीक क्षमता को बढ़ावा

यह केंद्र स्वदेशी समुद्री तकनीक के विकास में भूमिका निभाएगा। यहां विकसित होने वाले सिस्टम्स का उपयोग समुद्री निगरानी, अनुसंधान, आपदा प्रबंधन और विभिन्न औद्योगिक कार्यों में किया जा सकेगा। इस परियोजना के माध्यम से समुद्री तकनीक, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोनॉमस सिस्टम्स के क्षेत्र में नए अनुसंधान और विकास कार्य भी किए जाएंगे। (Autonomous Maritime Shipyard)