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आंध्र प्रदेश में बनेगा दुनिया का पहला ऑटोनॉमस मैरीटाइम शिपबिल्डिंग सेंटर, सागर डिफेंस इंजीनियरिंग करेगी तैयार

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar CEO, Sagar Defence Engineering with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh Garu, has laid the foundation for the world's first autonomous maritime shipbuilding and systems centre in Andhra Pradesh

Autonomous Maritime Shipyard: समुद्री तकनीक और रक्षा निर्माण के क्षेत्र में भारत को बड़ी कामयाबी मिली है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में दुनिया का पहला ऑटोनॉमस मैरीटाइम शिपबिल्डिंग एंड सिस्टम्स सेंटर स्थापित किया जा रहा है। इस परियोजना की आधारशिला 12 मार्च को रखी गई। यह परियोजना भारतीय रक्षा तकनीक कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड द्वारा डेवलप की जा रही है।

रक्षा समाचार इस मौके का खास गवाह बना। यह नया शिपयार्ड आंध्र प्रदेश के जुव्वलादिन्नी फिशिंग हार्बर में बनाया जाएगा। इस जगह की खूबी यह है कि यहां से सीधे समुद्र तक पहुंच उपलब्ध है। इससे जहाजों का निर्माण, लॉन्चिंग, परीक्षण और तैनाती एक ही जगह से की जा सकेगी। इस परियोजना को भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता और समुद्री तकनीक को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard: 29.58 एकड़ क्षेत्र में बनेगा आधुनिक शिपयार्ड

इस परियोजना के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने जुव्वलादिन्नी फिशिंग हार्बर में कुल 29.58 एकड़ भूमि आवंटित की है। इस भूमि में लगभग 7.58 एकड़ वाटरफ्रंट क्षेत्र शामिल है, जबकि बाकी हिस्सा हार्बर क्षेत्र में आता है। समुद्र के पास होने के कारण यहां जहाजों के निर्माण और परीक्षण के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध होंगी।

यह केंद्र एक मॉडर्न एंड इंटीग्रेटिड कैंपस के तौर पर डेवलप किया जाएगा। यहां जहाज निर्माण सुविधा, परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर, जहाज मरम्मत और रखरखाव सुविधा तथा विशेष प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। इससे आटोनोमस मैरिन सिस्टम्स के डिजाइन से लेकर परीक्षण तक की पूरी प्रक्रिया एक ही परिसर में संभव होगी। (Autonomous Maritime Shipyard)

अनमैन्ड मरीन टेक्नोलॉजी पर होगा फोकस

यह केंद्र मुख्य रूप से ऑटोनॉमस और अनमैन्ड मैरीटाइम सिस्टम्स के डेवलपमेंट पर काम करेगा। इसमें ऐसे जहाज और उपकरण बनाए जाएंगे जो कम मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकें।

यहां अनमैन्ड सरफेस वेसल्स (यूएसवी) यानी समुद्र की सतह पर चलने वाले मानवरहित जहाज विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स (एयूवी) भी बनाए जाएंगे जो समुद्र के अंदर काम करने वाले रोबोटिक सिस्टम होंगे।

इन तकनीकों का उपयोग समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा, समुद्री अनुसंधान और विभिन्न व्यावसायिक कार्यों में किया जा सकेगा। इसके साथ ही केंद्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित नेविगेशन सिस्टम, समुद्री सेंसर, कम्युनिकेशन नेटवर्क और कमांड एंड कंट्रोल प्लेटफॉर्म भी विकसित किए जाएंगे। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar, CEO of Sagar Defence Engineering, along with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh, laid the foundation stone for the world’s first Autonomous Maritime Shipbuilding and Systems Centre in Andhra Pradesh.

रोबोटिक्स और एआई प्रोसेस-बेस्ड मैन्युफैक्चरिंग

इस शिपयार्ड में पारंपरिक जहाज निर्माण से अलग आधुनिक डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। यहां एआई आधारित शिपयार्ड मैनेजमेंट सिस्टम लगाया जाएगा जो डिजाइन, उत्पादन और परीक्षण प्रक्रियाओं का समन्वय करेगा।

निर्माण प्रक्रिया में रोबोटिक वेल्डिंग, ऑटोमेटेड कटिंग, पेंटिंग और असेंबली जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होगा। इसके अलावा 3डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग विशेष पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के निर्माण में किया जाएगा।

साथ ही यहां डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इसके तहत जहाज और शिपयार्ड के डिजिटल मॉडल तैयार किए जाएंगे, जिनकी मदद से वास्तविक परीक्षण से पहले ही उनके प्रदर्शन का आकलन किया जा सकेगा। (Autonomous Maritime Shipyard)

समुद्र में वास्तविक परीक्षण की सुविधा

जुव्वलादिन्नी हार्बर के पास होने के कारण इस केंद्र को समुद्र में एक्चुअल टेस्ट करने की सुविधा भी मिलेगी। यहां विकसित किए गए जहाजों और सिस्टम्स का परीक्षण सीधे समुद्री वातावरण में किया जाएगा।

परीक्षण के दौरान जहाजों की ऑटोनॉमस नेविगेशन, ऑब्स्टेकल अवॉयडेंस और डॉकिंग क्षमता को जांचा जाएगा। इसके अलावा सेंसर और नेविगेशन तकनीकों का भी परीक्षण किया जाएगा।

इस तरह के परीक्षण से नए सिस्टम्स की विश्वसनीयता और कार्यक्षमता का आकलन किया जा सकेगा। (Autonomous Maritime Shipyard)

आंध्र प्रदेश सरकार करेगी मदद

इस परियोजना को आंध्र प्रदेश सरकार भी सहयोग कर रही है। आधारशिला समारोह में राज्य के मानव संसाधन विकास, आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री नारा लोकेश ने हिस्सा लिया।

नारा लोकेश ने कहा कि यह परियोजना आंध्र प्रदेश की समुद्री तकनीक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक निकुंज पराशर का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस परियोजना से राज्य के समुद्री क्षेत्र को नई दिशा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि भारत की करीब 7500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और आंध्र प्रदेश देश की दूसरी सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था और तटीय समुदायों के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। (Autonomous Maritime Shipyard)

Autonomous Maritime Shipyard
Capt. Nikunj Parashar, CEO of Sagar Defence Engineering, along with Andhra Pradesh’s Minister for Human Resources Development, IT, Electronics & Communications and Real Time Governance, Nara Lokesh, laid the foundation stone for the world’s first Autonomous Maritime Shipbuilding and Systems Centre in Andhra Pradesh.

मैरीटाइम ऑपरेशंस में ऑटोनॉमस तकनीकों का बढ़ा इस्तेमाल

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैप्टन निकुंज पराशर ने कहा कि यह प्रोजेक्ट समुद्री तकनीक के क्षेत्र में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। उनके अनुसार दुनिया भर में मैरीटाइम ऑपरेशंस तेजी से ऑटोनॉमस तकनीकों की ओर बढ़ रहा है और यह केंद्र भारत को अगली पीढ़ी की अनमैन्ड मैरीटाइम सिस्टम्स को देश के भीतर डिजाइन करने, परीक्षण करने और निर्माण करने की क्षमता देगा।

उन्होंने यह भी बताया कि इस शिपयार्ड में स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें रोबोटिक सिस्टम के जरिए ऑटोमेटेड वेल्डिंग, कटिंग, पेंटिंग और असेंबली जैसे कार्य किए जाएंगे। इसके अलावा रोबोट और ऑटोमेटेड गाइडेड व्हीकल्स की मदद से सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाएगा। विशेष पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के तेज निर्माण के लिए 3डी प्रिंटिंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।

निकुंज पराशर ने कहा कि भारत की करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और आंध्र प्रदेश देश की दूसरी सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि और तटीय सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनके अनुसार यह परियोजना समुद्री तकनीक, रक्षा निर्माण और तटीय क्षेत्रों के विकास के लिए महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। (Autonomous Maritime Shipyard)

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग की स्थापना वर्ष 2015 में कैप्टन निकुंज पराशर और उनके सहयोगियों द्वारा की गई थी। कंपनी ने शुरुआत मुंबई में एक छोटे वर्कस्पेस से की थी। समय के साथ यह कंपनी रक्षा तकनीक क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल हो गई।

कंपनी पुणे में स्थित अपने 10 एकड़ के रिसर्च एंड मैन्युफैक्चरिंग परिसर में विभिन्न प्रकार के स्वायत्त सिस्टम्स विकसित कर रही है। इनमें समुद्री, हवाई और जमीन पर काम करने वाले मानवरहित सिस्टम शामिल हैं।

कंपनी ने जेनेसिस नाम का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम भी डेवलप किया है। यह तकनीक किसी भी जहाज को रिमोट, सेमी-ऑटोनॉमस या पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में ऑपरेट कर सकती है। (Autonomous Maritime Shipyard)

ब्लू इकोनॉमी को मिलेगा बढ़ावा

इस परियोजना से आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। इस केंद्र के संचालन से 300 से 1,000 तक नौकरियां प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। इसके अलावा इंजीनियर, तकनीशियन, जहाज डिजाइन विशेषज्ञ और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए भी अवसर उपलब्ध होंगे। इस सेंटर से न केवल ब्लू इकोनॉमी का विकास होगा बल्कि भारत को वैश्विक ऑटोनॉमस समुद्री टेक्नोलॉजी हब बनाने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही इस परियोजना से आसपास के क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स, हार्बर सेवाओं और सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। (Autonomous Maritime Shipyard)

मछुआरों के लिए भी होगा फायदा

इस परियोजना से स्थानीय मछुआरा समुदाय को भी फायदा मिलने की बात कही गई है। इस केंद्र में जहाजों की मरम्मत और रखरखाव की सुविधा उपलब्ध होगी, जिससे मछली पकड़ने वाली नौकाओं की मरम्मत जल्दी हो सकेगी।

इसके अलावा नई तकनीकों की मदद से रीयल टाइम मछली लोकेशन मैप्स, मौसम अलर्ट और समुद्री सुरक्षा सिस्टम जैसी सुविधाओं को भी विकसित करने की योजना है। इससे समुद्र में काम करने वाले मछुआरों की सुरक्षा और कार्यक्षमता बढ़ाई जा सकेगी। (Autonomous Maritime Shipyard)

भारत की समुद्री तकनीक क्षमता को बढ़ावा

यह केंद्र स्वदेशी समुद्री तकनीक के विकास में भूमिका निभाएगा। यहां विकसित होने वाले सिस्टम्स का उपयोग समुद्री निगरानी, अनुसंधान, आपदा प्रबंधन और विभिन्न औद्योगिक कार्यों में किया जा सकेगा। इस परियोजना के माध्यम से समुद्री तकनीक, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोनॉमस सिस्टम्स के क्षेत्र में नए अनुसंधान और विकास कार्य भी किए जाएंगे। (Autonomous Maritime Shipyard)

एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित बोले- भारत को साझेदार नहीं, प्रतिद्वंद्वी मानता है चीन

India China Pakistan Strategic Challenge
Chief of Integrated Defence Staff Air Marshal Ashutosh Dixit addressed a special session in seminar on ‘Changing Dynamics in the Indian Neighbourhood’

India China Pakistan Strategic Challenge: एक तरफ जहां सरकार अब एक तय सीमा में चीन से आने वाली एफडीआई में 2020 के सख्त नियमों में ढील देने का फैसला कर रही है, तो वहीं दूसरी चीन भारत को साझेदार के रूप में नहीं बल्कि संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। यह कहना है चीफ ऑफ डिफेंस इंटिग्रेटेड स्टाफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का। उन्होंने कहा कि एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने कहा कि आज भारत का पड़ोस वैसा नहीं है जैसा दस साल पहले था। हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक, और ढाका से काबुल तक रणनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं।

नई दिल्ली में बुधवार को आयोजित सेंटर फॉर जॉइंट वारफेयर स्टडीज (CENJOWS) की तरफ से आयोजित सेमिनार “चेंजिंग डायनेमिक्स इन द इंडियन नेबरहुड” में बोलते चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि भारत का रणनीतिक माहौल पिछले दस सालों में तेजी से बदल गया है। कभी जो पड़ोस भारत के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माना जाता था, आज वही क्षेत्र बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान बनता जा रहा है। ऐसे समय में भारत को अपने पड़ोस में होने वाले बदलावों को बहुत ध्यान से समझना और उसके अनुसार अपनी रणनीति बनानी होगी।

India China Pakistan Strategic Challenge: तेजी से बदल रहा है भारत का रणनीतिक पड़ोस

एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने कहा कि भारत की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है। भारत की सीमाएं दो परमाणु हथियारों से लैस देशों चीन और पाकिस्तान से लगती हैं। इसके अलावा भारत के आसपास कई छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश हैं जैसे नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव। वहीं अफगानिस्तान मध्य एशिया की ओर जाने वाला महत्वपूर्ण रास्ता है और आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा के लिहाज से भी अहम क्षेत्र माना जाता है।

उन्होंने कहा कि पहले हिंद महासागर को अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र माना जाता था, लेकिन अब यहां बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। अब यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

चीन की बढ़ती आक्रामकता बड़ी चिंता

उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में सबसे बड़ा बदलाव चीन की भूमिका में आया है। पहले चीन को क्षेत्रीय स्तर पर एक सावधान खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन अब वह अपने प्रभाव को आक्रामक तरीके से बढ़ा रहा है। चीन भारत को साझेदार के रूप में नहीं बल्कि संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है।

उन्होंने कहा कि भारत-चीन संबंधों में बड़ा मोड़ 2017 के डोकलाम गतिरोध के समय आया। इसके बाद 2020 की गलवान घाटी झड़प ने यह साफ कर दिया कि सीमा पर तनाव कितनी तेजी से बढ़ सकता है। इस घटना के बाद दोनों देशों ने हिमालयी सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिक तैनात कर दिए। आज इस पूरे इलाके में एक लाख से अधिक सैनिक मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि भारत-चीन के बीच करीब 3488 किलोमीटर लंबी हिमालयी सीमा अब केवल एक एडमिनिस्ट्रेटिव सीमा नहीं रह गई है। यह अब एक बेहद संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र बन चुकी है जहां लगातार सैन्य दबाव बना हुआ है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

बेल्ट एंड रोड परियोजना से चीन का घेरा

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ने भारत की चिंता और बढ़ा दी है। इस परियोजना के तहत चीन ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में कई बड़े निवेश किए हैं।

पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट, बांग्लादेश में बंदरगाह परियोजनाएं, श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट और मालदीव में बढ़ता प्रभाव, ये सभी मिलकर एक बड़े रणनीतिक नेटवर्क का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं।

एयर मार्शल दीक्षित के मुताबिक चिंता केवल किसी एक परियोजना की नहीं है, बल्कि इस पूरे नेटवर्क के पीछे मौजूद रणनीतिक सोच की है। हर पोर्ट, हर सड़क और हर निवेश एक बड़े रणनीतिक ढांचे का हिस्सा है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

भारत को मजबूत करनी होगी तैयारी

आईडीएस चीफ ने कहा कि हाल के सालों में भारत और चीन के बीच कुछ बातचीत और समझौते भी हुए हैं। 2024 के बाद कुछ क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी और बातचीत के नए दौर शुरू हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद चीन अपनी सैन्य ताकत लगातार बढ़ा रहा है।

2025 में चीन का फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर सक्रिय हुआ और उसी साल एक बड़े सैन्य परेड के जरिए चीन ने अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन भी किया। साथ ही चीन ने रूस और ग्लोबल साउथ के कई देशों के साथ अपने संबंध भी मजबूत किए हैं।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा वास्तविक है और आने वाले समय में यह दबाव कम होने वाला नहीं है। इसलिए भारत को भी अपनी तैयारी मजबूत करनी होगी।

उन्होंने कहा कि भारत को सीमा क्षेत्रों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से डेवलप करना होगा। सड़कों, सुरंगों और एयरफील्ड का निर्माण तेज करना जरूरी है। लक्ष्य यह है कि 2027 तक बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन की 100 से ज्यादा परियोजनाएं पूरी हों। (India China Pakistan Strategic Challenge)

क्वाड एलायंस को मजबूत बनाए रखना जरूरी

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि भारत को क्वाड एलायंस जैसे सहयोगी ढांचे को भी मजबूत बनाए रखना होगा। इसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं, जो चीन की बढ़ती ताकत के संतुलन में भूमिका निभा सकते हैं।

बांग्लादेश का जिक्र करते हुए एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि यह उदाहरण है कि किस तरह एक भरोसेमंद पड़ोसी भी अचानक अनिश्चित दिशा में जा सकता है। (India China Pakistan Strategic Challenge)

बांग्लादेश में बदलती राजनीतिक दिशा

उन्होंने कहा कि भारत के लिए बांग्लादेश लंबे समय तक एक भरोसेमंद साझेदार रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में वहां की राजनीति में बदलाव देखने को मिला है।

2024 में शेख हसीना सरकार के हटने और नई सरकार के आने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में अनिश्चितता बढ़ी है। इसके साथ ही चीन के साथ बांग्लादेश के रिश्ते भी तेजी से मजबूत हो रहे हैं।

चीन ने बांग्लादेश में चटगांव इंडस्ट्रियल इकॉनॉमिक जोन और मोंगला पोर्ट विकास योजना जैसे बड़े निवेश किए हैं। इसके अलावा चीन ने बांग्लादेश को अपने बाजार में जीरो टैरिफ एक्सेस भी दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बांग्लादेश में ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की योजना भी शुरू हुई है। यह परियोजना चीन की कंपनी सीईटीसी के साथ मिलकर बनाई जा रही है।

इसके अलावा बांग्लादेश की सेना के लिए फोर्सेस गोल 2030 नाम का आधुनिकीकरण कार्यक्रम भी चल रहा है। इसके तहत बांग्लादेश नई पीढ़ी के फाइटर जेट खरीदने की योजना बना रहा है। इसमें पाकिस्तान के जेएफ-17 थंडर फाइटर जेट का भी विकल्प शामिल है।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि ये सभी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि बांग्लादेश अब भारत को अपनी सुरक्षा का स्वाभाविक साझेदार नहीं मान रहा। ये कदम किसी दुश्मन देश के नहीं बल्कि ऐसे पड़ोसी के हैं जो अब अपनी सुरक्षा नीति में नए विकल्प तलाश रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत को बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को संतुलित और समझदारी से आगे बढ़ाना होगा। कनेक्टिविटी परियोजनाएं जैसे अगरतला-अखौरा रेल लिंक जारी रहनी चाहिए और दोनों देशों को मिलकर नए सहयोग के रास्ते तलाशने चाहिए। (India China Pakistan Strategic Challenge)

पाकिस्तान की रणनीति में बड़ा बदलाव

भारत के लिए पाकिस्तान लंबे समय से एक प्रमुख सुरक्षा चुनौती रहा है। एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ शत्रुतापूर्ण नीति पर काम कर रहा है। आतंकवाद और सैन्य दबाव पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं। हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने अपनी मिलिट्री स्ट्रक्चर में भी बदलाव किए हैं।

ऑपरेशन सिंदुर के बाद पाकिस्तान ने अपनी सैन्य रणनीति में नए कदम उठाए। अगस्त 2025 में पाकिस्तान ने आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड बनाने की घोषणा की। यह कमांड चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स की तर्ज पर बनाई गई है। इसका उद्देश्य भारत के भीतर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता बढ़ाना है।

इसके अलावा पाकिस्तान ने 2025 में अपने संविधान में संशोधन कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस का पद बनाया। इसके तहत तीनों सेनाओं आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की कमान एक व्यक्ति के हाथ में दी गई है।

इस बदलाव का मतलब है कि पाकिस्तान में मिलिट्री फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे, लेकिन इससे गलत फैसलों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

भारत को बनानी होगी नई रणनीति

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत को इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए एक व्यापक रणनीति बनानी होगी। सबसे पहले भारत को अपनाा बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना होगा। इसके लिए सड़कों, सुरंगों और एयरफील्ड का निर्माण तेजी से किया जा रहा है। लक्ष्य है कि 2027 तक सीमा क्षेत्रों में 100 से अधिक परियोजनाएं पूरी की जाएं।

इसके साथ ही भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना होगा। विशेष रूप से ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता विकसित करना जरूरी है।

हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

एयर मार्शल दीक्षित के मुताबिक हिंद महासागर क्षेत्र भी अब पहले जैसा शांत नहीं रहा। यहां बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। मालदीव, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों में चीन की बढ़ती सक्रियता भारत के लिए चिंता का विषय है। हालांकि भारत ने कई मौकों पर इन देशों की मदद करके अपना भरोसा मजबूत किया है। उदाहरण के तौर पर श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत ने उसे खाद्य सामग्री, ईंधन और आर्थिक सहायता दी।

पड़ोस की स्थिरता भारत की सुरक्षा से जुड़ी

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत के पड़ोस में होने वाली हर अस्थिरता का असर भारत की सुरक्षा पर पड़ता है। अगर किसी पड़ोसी देश में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता या गृहयुद्ध होता है, तो उसका असर भारत की सीमाओं पर भी दिखाई देता है। इसलिए पड़ोस में स्थिरता बनाए रखना केवल कूटनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय हित से भी जुड़ा है।

पड़ोस के साथ भरोसे का रिश्ता जरूरी

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत को अपने पड़ोस के साथ भरोसे का रिश्ता बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा केवल युद्ध से नहीं होती। यह निवेश, बुनियादी ढांचे, तकनीक और आर्थिक सहयोग के जरिए भी होती है।

भारत को अपने पड़ोस में भरोसेमंद साझेदार के रूप में मौजूद रहना होगा। तभी भारत अपने क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगा।

उन्होंने कहा कि भारत का पड़ोस कोई दूर की जगह नहीं है, बल्कि वही क्षेत्र है जहां से भारत की सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत को अपने पड़ोस के साथ मजबूत, संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी। (India China Pakistan Strategic Challenge)

भारतीय सेना के डिप्टी चीफ बोले- AI से तेज हुए युद्ध के फैसले, लेकिन 10 प्रतिशत गलती भी पड़ सकती है भारी

AI in Modern Warfare
Lt Gen Vipul Shinghal, AVSM, SM, Deputy Chief indian army, IS&T, IDS, India at At the Synergia Conclave in New Delhi,

AI in Modern Warfare: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भारतीय सेना डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल का कहना है कि युद्ध का स्वरूप भी पहले की तुलना में बिल्कुल अलग हो गया है। ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई भविष्य के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा इंसान यानी कमांडर को ही लेना होगा। वहीं, आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान का कहना है कि एआई सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत डेटा होती है, लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है।

AI in Modern Warfare: कमांडर ही लेता है अंतिम फैसला

नई दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय सिनर्जिया कॉन्क्लेव में “द एआई होराइजन: इंटेलिजेंट सिस्टम में भरोसे की कमी” विषय पर बोलते हुए भारतीय सेना के डिप्टी चीफ (इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि तकनीक तेजी से बदल रही है और युद्ध का स्वरूप भी लगातार बदल रहा है, लेकिन इसके बावजूद अंतिम फैसला लेने की जिम्मेदारी अभी भी इंसान यानी कमांडर की ही होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल भारतीय सेना में डिप्टी चीफ (इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने करीब 35 साल पहले सेना जॉइन की थी, तब हालात बिल्कुल अलग थे। उस समय ऑपरेशन रूम में कागज के नक्शे होते थे और सूचनाएं धीरे-धीरे अलग-अलग सोर्सेज से आती थीं। कभी टेलीफोन कॉल के जरिए, कभी किसी रिपोर्ट के जरिए या किसी नोट के जरिए जानकारी मिलती थी। अधिकारी इन सूचनाओं को नक्शे पर पिन लगाकर चिन्हित करते थे और फिर सारी जानकारी जोड़कर कमांडर को दी जाती थी। कमांडर उसी आधार पर फैसला निर्णय लेते थे कि आगे क्या कार्रवाई करनी है। (AI in Modern Warfare)

उन्होंने कहा कि उस समय फैसला लेने की प्रक्रिया धीमी थी और जानकारी भी सीमित होती थी। लेकिन धीरे-धीरे तकनीक बढ़ने लगी। कुछ साल बाद कंप्यूटर, डिजिटल प्रेजेंटेशन और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम आने लगे। इससे जानकारी मिलने की गति बढ़ गई, लेकिन तब भी फैसला लेने की प्रक्रिया पूरी तरह इंसानों पर ही निर्भर थी। (AI in Modern Warfare)

एआई के कारण फैसले का समय हुआ कम

लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल ने कहा कि आज युद्ध के मैदान में सबसे बड़ा बदलाव फैसला लेने के समय में कमी है। आज के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब ऑपरेशन रूम में डिजिटल मैप्स, सैटेलाइट फीड, ड्रोन, सेंसर और सर्विलांस सिस्टम से लगातार जानकारी आती रहती है। कमांडर के सामने एक साथ कई सोर्सेज से डेटा पहुंचता है और एआई बेस्ड सिस्टम कुछ ही सेकंड में एनालिसिस करके सुझाव भी देने लगते हैं कि किस टारगेट पर कब और कैसे कार्रवाई करनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में कमांडर के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम समय होता है। यही कारण है कि एआई पर भरोसा करने और मानव निर्णय के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो जाता है। (AI in Modern Warfare)

एआई पर भरोसा करना क्यों चुनौती है

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में यह भी मानकर चलना पड़ता है कि दुश्मन के पास भी लगभग वही जानकारी होती है जो हमारे पास होती है। इसलिए फैसला लेने की रफ्तार बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी कि एआई पर पूरी तरह निर्भर होना भी खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम डेटा के आधार पर निर्णय सुझाते हैं। लेकिन युद्ध के मैदान में डेटा हमेशा साफ और सही नहीं होता। धूल, धुआं, छलावा, दुश्मन की चाल और कई अन्य कारकों के कारण सेंसर और सिस्टम कभी-कभी गलत जानकारी भी दे सकते हैं।

अगर ऐसी स्थिति में एआई गलत निष्कर्ष निकाल ले तो उससे बड़ा नुकसान हो सकता है। इसलिए अंतिम फैसला हमेशा इंसान के हाथ में ही रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर एआई 90 प्रतिशत सही है तो भी बाकी 10 प्रतिशत गलती युद्ध के मैदान में बहुत बड़ा जोखिम बन सकती है। (AI in Modern Warfare)

कमांडर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि मान लीजिए किसी इलाके में सेंसर को गतिविधि दिखाई देती है। एआई सिस्टम इसे दुश्मन की गतिविधि मान सकता है और हमला करने की सलाह दे सकता है। लेकिन एक अनुभवी कमांडर को महसूस हो सकता है कि कुछ गड़बड़ है। अगर वह थोड़ा रुककर जांच करता है तो पता चल सकता है कि वहां नागरिकों की आवाजाही हो रही थी, जो अभी सिस्टम के डेटा में शामिल नहीं हुई थी। अगर कमांडर ने बिना सोचे एआई की सलाह मान ली होती तो निर्दोष लोगों को बड़ा नुकसान हो सकता था।

उन्होंने कहा कि एआई को केवल एक सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, फैसला लेने वाला अंतिम साधन नहीं बनाना चाहिए। अंतिम जिम्मेदारी हमेशा कमांडर की ही होती है, क्योंकि युद्ध के फैसलों में इंसानों की जान दांव पर लगी होती है। (AI in Modern Warfare)

एआई सिस्टम के लिए कड़े मानक जरूरी

उन्होंने कहा कि जब एआई सिस्टम किसी वेपन सिस्टम से जुड़ जाते हैं तो वे खुद एक तरह से हथियार का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें भी वही ट्रायल और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना चाहिए जिससे पारंपरिक हथियार गुजरते हैं। जैसे किसी मिसाइल या हथियार को सेना में शामिल करने से पहले कई चरणों के परीक्षण होते हैं, उसी तरह एआई सिस्टम को भी कठोर परीक्षण से गुजरना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सिस्टम युद्ध के मैदान में सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करे।

तकनीक को बेहतर तरीके से समझें कमांडर

उप सेना प्रमुख ने कहा कि कमांडरों को भी तकनीक को बेहतर तरीके से समझना होगा। उन्हें यह जानना होगा कि एआई सिस्टम किस डेटा के आधार पर फैसले सुझा रहा है और उसका विश्लेषण कैसे किया गया है। अगर सिस्टम पूरी तरह “ब्लैक बॉक्स” की तरह होगा और उसके अंदर क्या चल रहा है यह समझ में नहीं आएगा, तो उस पर भरोसा करना मुश्किल होगा। इसलिए एआई सिस्टम को अधिक पारदर्शी बनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में शक्ति और धर्म साथ-साथ चलते हैं। इसका मतलब है कि ताकत का इस्तेमाल हमेशा जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई का इस्तेमाल भी इसी सिद्धांत के साथ होना चाहिए। तकनीक का उद्देश्य मानवता की रक्षा करना होना चाहिए, न कि उसे खतरे में डालना। (AI in Modern Warfare)

सिस्टम पर करना होगा भरोसा

वहीं, कॉन्क्लेव में बोलते हुए आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान ने कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में है जिसे अक्सर ग्रे-जोन युद्ध कहा जाता है। इसमें खतरे केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि साइबर स्पेस, इनफॉरमेशन सिस्टम और टेक्निकल सिस्टम तक फैल जाते हैं। ऐसे माहौल में एआई, ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम जैसी तकनीकें तेजी से सेना के काम का हिस्सा बन रही हैं।

मेजर जनरल मान ने कहा कि इन तकनीकों से सेना की क्षमता जरूर बढ़ती है, लेकिन एक बड़ी समस्या विश्वास की कमी है। युद्ध के समय सैनिक और कमांडर को सिस्टम पर पूरी तरह भरोसा होना चाहिए। अगर उन्हें मशीन के फैसले पर भरोसा नहीं होगा, तो उस तकनीक का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा।

उन्होंने कहा कि सैन्य क्षेत्र में “ट्रस्ट” यानी भरोसे का मतलब सिर्फ तकनीक का सही काम करना नहीं है। असली भरोसा तब बनता है जब कमांडर और सैनिक यह महसूस करें कि वे युद्ध की स्थिति में मशीन के सुझाव पर भरोसा कर सकते हैं। क्योंकि कई बार युद्ध के मैदान में फैसला कुछ ही सेकंड में लेना होता है और उसी पर सैनिकों की जान निर्भर करती है।

कई एआई सिस्टम “ब्लैक बॉक्स” की तरह

मेजर जनरल मान ने कहा कि कई रिसर्च बताती हैं कि मिलिट्री एआई सिस्टम पर अभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जाता। एक अध्ययन के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत ऑपरेटर एआई आधारित सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर होने में झिझक महसूस करते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कई एआई सिस्टम “ब्लैक बॉक्स” की तरह होते हैं। यानी वे निर्णय तो देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि उस निर्णय तक वे कैसे पहुंचे।

उन्होंने बताया कि एआई से जुड़ी मुख्य समस्याओं को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला है एक्सप्लेनबिलिटी, यानी सिस्टम अपने निर्णय का कारण समझा पाए। दूसरा है रॉबस्टनेस, यानी सिस्टम कठिन परिस्थितियों में भी सही तरीके से काम करे। तीसरा है ह्यूमन-एआई सहयोग, यानी इंसान और मशीन के बीच सही तालमेल। (AI in Modern Warfare)

डेटा पॉइजनिंग का शिकार हो सकता है एआई सिस्टम

मेजर जनरल मान ने समझाया कि अगर किसी एआई सिस्टम को गलत डेटा दे दिया जाए, जिसे डेटा पॉइजनिंग कहा जाता है, तो वह गलत निष्कर्ष निकाल सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी ड्रोन या सेंसर को दुश्मन द्वारा हैक कर लिया जाए, तो वह दोस्त और दुश्मन की पहचान गलत कर सकता है। इससे गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम की मजबूती यानी रॉबस्टनेस भी एक बड़ी चुनौती है। कई एआई सिस्टम अलग-अलग देशों के हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, डेटा सेट और ओपन सोर्स लाइब्रेरी पर आधारित होते हैं। अगर इनमें से किसी भी हिस्से में कमजोरी हो, तो पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है। (AI in Modern Warfare)

एआई और इंसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी

मेजर जनरल मान ने कहा कि एक सर्वे के अनुसार 60 प्रतिशत से ज्यादा सैनिक ऐसे मामलों में इंसान द्वारा लिया गया फैसला ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि एआई बेकार है, बल्कि यह बताता है कि एआई और इंसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

जनरल मान के मुताबिक एआई सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत डेटा होती है, लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है। एआई की एक और चुनौती डेटा से जुड़ी है। किसी भी एआई सिस्टम को काम करने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा की जरूरत होती है। लेकिन मिलिट्री एरिया में दुश्मन के हथियार, उपकरण और रणनीति से जुड़ा डेटा आसानी से उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में एआई मॉडल को सही ढंग से ट्रेनिंग करना मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने बताया कि कई बार सेना को अपने ही डेटा के आधार पर मॉडल तैयार करना पड़ता है और बाकी चीजों को दुश्मन मानकर विश्लेषण करना पड़ता है। लेकिन इसमें भी जोखिम होता है, क्योंकि अगर मॉडल 90 फीसदी सही है तो बाकी 10 प्रतिशत गलती भी गंभीर परिणाम दे सकती है। (AI in Modern Warfare)

“ट्रस्टवर्दी एआई” बनाना जरूरी

मेजर जनरल मान ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए भरोसेमंद एआई सिस्टम विकसित करना जरूरी है। इसके लिए दुनिया भर में कई प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में “ट्रस्टवर्दी एआई” यानी भरोसेमंद एआई को लेकर कई स्ट्रक्चर तैयार किए गए हैं।

इन ढांचों में कुछ मूल सिद्धांत तय किए गए हैं। इनमें विश्वसनीयता, मजबूती, सुरक्षा, पारदर्शिता और निष्पक्षता जैसे तत्व शामिल हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई सिस्टम सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करें।

उन्होंने यह भी कहा कि एआई सिस्टम को साइबर हमलों के खिलाफ परखने के लिए विशेष परीक्षण किए जाने चाहिए। इससे यह पता चलेगा कि सिस्टम कठिन परिस्थितियों में कितना भरोसेमंद है।

एआई को लेकर हो लीगल फ्रेमवर्क 

मेजर जनरल मान ने आगे कहा कि कमांडरों को एआई सिस्टम की कार्यप्रणाली समझने का अधिकार होना चाहिए। जब कमांडर को यह पता होगा कि मशीन किस आधार पर फैसला दे रही है, तभी वह उस पर भरोसा कर सकेगा। उन्होंने कहा कि एआई के इस्तेमाल में एक लीगल फ्रेमवर्क भी जरूरी है। अगर युद्ध के दौरान एआई आधारित सिस्टम के कारण कोई गलती हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी होगी, यह पहले से तय होना चाहिए। इससे कमांडर अनावश्यक कानूनी डर के बिना फैसले ले सकेंगे।

उन्होंने भरोसा जताया कि भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और भविष्य में “मेड-इन-इंडिया” भरोसेमंद एआई सिस्टम सेना की ताकत को और मजबूत बनाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सबसे बड़ी चुनौती इन नीतियों को जमीन पर लागू करना है।

उनके अनुसार अगर सही तरीके से काम किया जाए तो एआई भविष्य में सेना के लिए एक शक्तिशाली और भरोसेमंद उपकरण बन सकता है। (AI in Modern Warfare)

भारतीय नौसेना को मिलेगा नया अंडरवाटर हथियार, जर्मन कंपनी TKMS भारत में बनाएगी आधुनिक हेवीवेट टॉरपीडो

Heavyweight Torpedo India

Heavyweight Torpedo India: जर्मनी की प्रमुख नौसैनिक कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) और हैदराबाद स्थित भारतीय डिफेंस कंपनी वीईएम टेक्नोलॉजीज ने भारत में संयुक्त रूप से हेवीवेट टॉरपीडो बनाने के लिए एक बड़ा समझौता किया है। दोनों कंपनियों के बीच हुआ यह टीमिंग एग्रीमेंट भारत में टॉरपीडो टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर और “मेक-इन-इंडिया” के तहत आधुनिक टॉरपीडो डेवलप करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समझौते के तहत देश में ही भारतीय नौसेना के लिए आधुनिक हेवीवेट टॉरपीडो का निर्माण किया जाएगा।

Heavyweight Torpedo India: भारत में बनेगा आधुनिक हेवीवेट टॉरपीडो

इस समझौते के तहत भारत में एक अत्याधुनिक हेवीवेट टॉरपीडो डेवलप और तैयार किया जाएगा। यह टॉरपीडो भारतीय नौसेना की मौजूदा पनडुब्बियों के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। टॉरपीडो एक ऐसा अंडरवाटर हथियार होता है जिसे पनडुब्बियों या युद्धपोतों से लॉन्च किया जाता है। इसका इस्तेमाल दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

हेवीवेट टॉरपीडो आमतौर पर लंबी दूरी तक हमला करने और ज्यादा शक्तिशाली वारहेड ले जाने की क्षमता रखते हैं। इसलिए आधुनिक नौसेनाओं के लिए यह एक बेहद महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। नई योजना के तहत इस टॉरपीडो को भारतीय नौसेना की मौजूदा सबमरीन फ्लीट के अनुसार डिजाइन किया जाएगा। (Heavyweight Torpedo India)

हैदराबाद में होगा निर्माण

टीकेएमएस के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट माइकल ओजेगोव्स्की ने इस समझौते को दोनों कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह समझौता टीकेएमएस और वीईएम के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगा। उनके अनुसार, इस सहयोग के माध्यम से टॉरपीडो टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर भारत को नौसैनिक रक्षा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनने में मदद करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि इस परियोजना के जरिए वीईएम भारतीय नौसेना को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकेगी और भारत की तकनीकी स्वतंत्रता को भी बढ़ावा मिलेगा।

इस प्रोजेक्ट में मुख्य उत्पादन जिम्मेदारी वीईएम टेक्नोलॉजीज संभालेगी। कंपनी हैदराबाद में अपनी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी में टॉरपीडो के निर्माण की तैयारी करेगी। रॉ मटेरियल की खरीद से लेकर फैब्रिकेशन, मैन्युफैक्चरिंग और फाइनल असेंबली तक का पूरा काम भारत में ही किया जाएगा। रिपोर्ट्स के अनुसार भविष्य में यहां हर साल लगभग 500 टॉरपीडो तक बनाने की क्षमता विकसित की जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह भारतीय नौसेना की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ भारत को टॉरपीडो उत्पादन के क्षेत्र में भी मजबूत बना सकता है। (Heavyweight Torpedo India)

समझौते में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी होगा

इस सहयोग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है। टीकेएमएस की सहयोगी कंपनी एटलस इलेक्ट्रोनिक टॉरपीडो से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीक और सॉफ्टवेयर लाइसेंस वीईएम को उपलब्ध कराएगी। इससे भारतीय कंपनी को अत्याधुनिक टॉरपीडो टेक्नोलॉजी तक पहुंच मिलेगी और वह इसे भारत में विकसित और उत्पादन कर सकेगी। जानकारों का मानना है कि इससे भारत की तकनीकी स्वतंत्रता बढ़ेगी और रक्षा उत्पादन में विदेशी निर्भरता कम होगी। (Heavyweight Torpedo India)

सितंबर 2025 में एमओयू हुआ था साइन

टीकेएमएस और वीईएम के बीच सहयोग की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। सितंबर 2025 में दोनों कंपनियों के बीच एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) साइन किया गया था। उस समझौते में टॉरपीडो के डेवलपमेंट, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और मॉडर्नाइजेशन पर काम करने की योजना बनाई गई थी। अब नया टीमिंग एग्रीमेंट उसी सहयोग का अगला चरण माना जा रहा है, जिसमें वास्तविक उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की दिशा में आगे बढ़ा गया है। (Heavyweight Torpedo India)

भविष्य में बन सकता है जॉइंट वेंचर

दोनों कंपनियां इस सहयोग को आगे और भी बढ़ाने की योजना बना रही हैं। मध्यम अवधि में टीकेएमएस और वीईएम मिलकर एक जॉइंट वेंचर भी स्थापित कर सकते हैं। इस जॉइंट वेंचर का उद्देश्य भारतीय बाजार को लंबे समय तक उच्च गुणवत्ता वाले हेवीवेट टॉरपीडो उपलब्ध कराना होगा। इसके साथ-साथ भविष्य में निर्यात के अवसर भी तलाशे जा सकते हैं। अगर भारत में बने टॉरपीडो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरते हैं तो उन्हें दूसरे देशों को भी निर्यात किया जा सकता है। (Heavyweight Torpedo India)

भारतीय नौसेना को मिलेगा फायदा

इस परियोजना का सबसे बड़ा फायदा भारतीय नौसेना को मिलेगा। फिलहाल कई महत्वपूर्ण हथियार सिस्टम्स के लिए भारत को विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है। अगर टॉरपीडो का निर्माण भारत में ही शुरू हो जाता है तो नौसेना को समय पर हथियार उपलब्ध कराना आसान होगा। इसके अलावा रखरखाव, अपग्रेड और मरम्मत जैसे काम भी देश के भीतर ही किए जा सकेंगे। इससे ऑपरेशनल रेडीनेस यानी युद्ध के लिए तैयारी की क्षमता भी बढ़ेगी।

आत्मनिर्भर भारत को मिलेगी मजबूती  

यह परियोजना भारत की आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन-इंडिया पहल को भी मजबूत करेगी। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर सरकार लगातार जोर दे रही है। ऐसे सहयोग से भारत की रक्षा इंडस्ट्री को नई तकनीक, निवेश और रोजगार के अवसर मिलते हैं। इसके साथ ही देश की रणनीतिक स्वतंत्रता भी मजबूत होती है क्योंकि महत्वपूर्ण हथियार प्रणालियों के लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो जाती है।

टीकेएमएस दुनिया की प्रमुख नेवल डिफेंस कंपनियों में से एक है। कंपनी जर्मनी के कील, विस्मार और ब्राजील के इटाजाई जैसे शहरों में शिपयार्ड संचालित करती है और दुनिया भर में नौसैनिक तकनीक उपलब्ध कराती है। यह कंपनी पनडुब्बियों, युद्धपोतों, समुद्री इलेक्ट्रॉनिक्स और सुरक्षा तकनीकों के क्षेत्र में काम करती है। करीब 185 सालों के अनुभव के साथ टीकेएमएस नेवल डिफेंस टेक्नोलॉजी में अग्रणी कंपनियों में गिनी जाती है। (Heavyweight Torpedo India)

देश की सेवा के साथ फिटनेस में भी अव्वल, सेना की महिला डॉक्टरों ने 100 किमी रिले में दिखाया दम

Pinkathon Ultra Delhi
Col Richa Joshi - Top left , Lt Col Priyamvada Chaubey, Col Smitha Thadathil and Col Shivani Sangwan

Pinkathon Ultra Delhi: नई दिल्ली में आयोजित पिंकाथॉन अल्ट्रा दिल्ली में इस बार भारतीय सेना की चार महिला अफसरों ने शानदार प्रदर्शन करके इतिहास रच दिया। खास बात यह है कि ये चारों महिला अधिकारी आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज से जुड़ी हैं और इन्होंने 100 किलोमीटर रिले अल्ट्रा रन में भाग लेकर दूसरा स्थान हासिल किया।

यह प्रतियोगिता अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर 7 मार्च को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित की गई थी। सुबह लगभग 5 बजे शुरू हुई इस अल्ट्रा रन में देशभर से बड़ी संख्या में महिला धावकों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं में फिटनेस, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को बढ़ावा देना था।

इस पिंकाथॉन का आयोजन मशहूर फिटनेस आइकन मिलिंद सोमन और उनकी पत्नी अंकिता कोनवार ने किया था। (Pinkathon Ultra Delhi)

Pinkathon Ultra Delhi: महिलाओं के लिए खास एंड्योरेंस रन

पिंकाथॉन अल्ट्रा को भारत के प्रमुख महिला एंड्योरेंस रनिंग इवेंट्स में से एक माना जाता है। इस प्रतियोगिता में अलग-अलग दूरी की कैटेगरी रखी गई थीं, ताकि अलग-अलग स्तर की धावक इसमें हिस्सा ले सकें। इस इवेंट में 50 किलोमीटर, 75 किलोमीटर, 100 किलोमीटर सोलो और 100 किलोमीटर रिले जैसी अल्ट्रा दूरी की कैटेगरी शामिल थीं।

अल्ट्रा रनिंग आमतौर पर बेहद मुश्किल मानी जाती है क्योंकि इसमें लंबे समय तक लगातार दौड़ना पड़ता है। इसमें केवल शारीरिक ताकत ही नहीं बल्कि मानसिक मजबूती भी बहुत जरूरी होती है।

दिल्ली में आयोजित इस संस्करण में कई प्रोफेशनल रनिंग क्लब और अनुभवी रर्नस ने हिस्सा लिया था। ऐसे मुश्किल मुकाबले के बीच आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज की चार महिला अफसरों ने शानदार प्रदर्शन किया। (Pinkathon Ultra Delhi)

100 किलोमीटर रिले कैटेगरी में लिया हिस्सा

इस प्रतियोगिता में चार महिला अधिकारियों की एक टीम ने 100 किलोमीटर रिले कैटेगरी में भाग लिया। रिले फॉर्मेट में पूरी दूरी चार हिस्सों में बांटी जाती है। हर धावक को 25 किलोमीटर दौड़ना होता है। इन चारों अधिकारियों ने मिलकर पूरी 100 किलोमीटर दूरी पूरी की।

दिल्ली की गर्मी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने बेहतरीन तालमेल और सहनशक्ति का प्रदर्शन किया।

कुल 10 टीमों के बीच हुए मुकाबले में इनकी टीम ने दूसरा स्थान हासिल किया। दिलचस्प बात यह रही कि वे विजेता टीम से केवल चार मिनट पीछे रह गईं।

100 किलोमीटर जैसी लंबी और कठिन दौड़ में यह अंतर बेहद कम माना जाता है और इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। (Pinkathon Ultra Delhi)

इस टीम में शामिल थीं ये महिला अफसर

इस टीम में शामिल चारों अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में बेहद अनुभवी और समर्पित प्रोफेशनल्स हैं। कर्नल शिवानी सांगवान इस टीम का हिस्सा थीं। वह आर्म्ड फोर्सेज हॉस्पिटल रिसर्च एंड रेफरल में पैथोलॉजी और साइटोजेनेटिक्स की सीनियर एडवाइजर हैं। अपने मेडिकल काम के साथ-साथ वह एक अनुभवी अल्ट्रा रनर भी हैं।

उन्होंने पहले भी कई कठिन दौड़ों में हिस्सा लिया है। वर्ष 2022 में “हंड्रेड डेज ऑफ रनिंग” प्रतियोगिता में उन्होंने पोडियम फिनिश हासिल किया था। इसके अलावा उन्होंने 2024 में “बॉर्डर अल्ट्रा 100 किलोमीटर” दौड़ सफलतापूर्वक पूरी की थी। (Pinkathon Ultra Delhi)

उसी साल लद्दाख में आयोजित “खारदुंग ला चैलेंज 72 किलोमीटर अल्ट्रा मैराथन” में भी वह शीर्ष दस महिला धावकों में शामिल रही थीं। हाल ही में गुरुग्राम में आयोजित “ट्रेल-ए-थॉन 28 किलोमीटर” दौड़ में भी उन्होंने पोडियम स्थान हासिल किया।

इस टीम की दूसरी सदस्य कर्नल ऋचा जोशी हैं। वह ऑन्कोसर्जरी की सीनियर एडवाइजर हैं और कैंसर सर्जरी के क्षेत्र में काम करती हैं। अपने व्यस्त मेडिकल करियर के बावजूद वह फिटनेस के लिए समय निकालती हैं और कई हाफ मैराथन में पोडियम फिनिश हासिल कर चुकी हैं। (Pinkathon Ultra Delhi)

तीसरी सदस्य कर्नल स्मिता थडाथिल हैं, जो मिलिट्री नर्सिंग सर्विस की अधिकारी हैं और कमांड हॉस्पिटल एयर फोर्स बेंगलुरु में मैट्रन-इन-चार्ज के रूप में कार्यरत हैं। वह एक अनुभवी फुल मैराथन रनर हैं और लंबे समय से दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही हैं।

चौथी सदस्य लेफ्टिनेंट कर्नल प्रियंवदा चौबे हैं, जो मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में अधिकारी हैं और मिलिट्री हॉस्पिटल प्रयागराज में तैनात हैं। वह भी एक मजबूत मैराथन और अल्ट्रा रनर के रूप में जानी जाती हैं।

उन्होंने कई प्रमुख रनिंग इवेंट्स में हिस्सा लिया है, जिनमें नई दिल्ली मैराथन, लद्दाख मैराथन और 55 किलोमीटर लेक-टू-लेक अल्ट्रा रन शामिल हैं। (Pinkathon Ultra Delhi)

अनुशासन और टीमवर्क की मिसाल

इन चारों अधिकारियों की उपलब्धि केवल एक खेल उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, मेहनत और टीमवर्क का शानदार उदाहरण भी है।

सैन्य सेवा में काम करने वाली इन अधिकारियों की जिम्मेदारियां पहले से ही काफी मुश्किल होती हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी फिटनेस बनाए रखते हुए इतनी लंबी दूरी की दौड़ के लिए खुद को तैयार किया।

100 किलोमीटर रिले अल्ट्रा रन को पूरा करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए महीनों की तैयारी, नियमित अभ्यास और मजबूत मानसिक शक्ति की जरूरत होती है।

इन अधिकारियों ने यह साबित किया कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो व्यस्त जीवन के बीच भी बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। (Pinkathon Ultra Delhi)

महिला सशक्तिकरण का दिया संदेश

पिंकाथॉन जैसे कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को स्वास्थ्य और फिटनेस के प्रति जागरूक करना है। इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाली महिलाओं में प्रोफेशनल एथलीट से लेकर आम कामकाजी महिलाएं भी शामिल होती हैं।

आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज की इन अधिकारियों की उपलब्धि खास इसलिए भी है क्योंकि वे देश की सेवा करने के साथ-साथ खेल और फिटनेस में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। यह उपलब्धि देश की उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने व्यस्त जीवन के बावजूद फिट और सक्रिय रहना चाहती हैं। (Pinkathon Ultra Delhi)

पिंकाथॉन का उद्देश्य

पिंकाथॉन की शुरुआत वर्ष 2012 में की गई थी। इसका उद्देश्य महिलाओं में फिटनेस और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। आज यह भारत के सबसे बड़े महिला रनिंग इवेंट्स में से एक बन चुका है। इसमें छोटी दूरी से लेकर अल्ट्रा दूरी तक की दौड़ आयोजित की जाती हैं।

इस कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं को यह संदेश दिया जाता है कि उम्र, काम या जिम्मेदारियां फिटनेस के रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए। (Pinkathon Ultra Delhi)

समुद्र में फंसे जहाजों तक अब फटाफट पहुंचेगी मदद, P-8I विमान से DRDO और नेवी ने गिराया स्वदेशी एयर ड्रॉपेबल कंटेनर ADC-150

ADC-150 Air Droppable Container
ADC-150 Air Droppable Container

ADC-150 Air Droppable Container: भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए डीआरडीओ और भारतीय नौसेना मंगलवार को एक खास परीक्षण किया। दोनों ने मिलकर स्वदेशी एयर ड्रॉपेबल कंटेनर ‘एडीसी-150’ के इन-फ्लाइट रिलीज ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया। यह परीक्षण गोवा के तट से दूर समुद्र में 21 फरवरी से 1 मार्च के बीच किया गया।

इन ट्रायल के दौरान कंटेनर को बोइंग पी-8आई पोसाइडन विमान से अलग-अलग ऊंचाई और परिस्थितियों में रिलीज किया गया। चारों ट्रायल सफल रहे, जिससे यह साबित हो गया कि यह सिस्टम वास्तविक ऑपरेशन में भी भरोसेमंद तरीके से काम कर सकता है।

यह स्वदेशी सिस्टम समुद्र में तैनात नौसैनिक जहाजों तक जरूरी सामान, मेडिकल सहायता और उपकरण तेजी से पहुंचाने में मदद करेगा। (ADC-150 Air Droppable Container)

ADC-150 Air Droppable Container: क्या है एयर ड्रॉपेबल कंटेनर एडीसी-150

एडीसी-150 एक खास तरह का कंटेनर है, जिसे विमान से समुद्र में ड्रॉप करके जहाजों तक जरूरी सामान पहुंचाने के लिए बनाया गया है। यह कंटेनर लगभग 150 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकता है। इसका मतलब है कि इसमें मेडिकल सप्लाई, जरूरी स्पेयर पार्ट्स, टेक्निकल इक्विपमेंट, फूड पैकेट या अन्य जरूरी सामग्री रखकर सीधे समुद्र में मौजूद जहाज तक पहुंचाया जा सकता है।

जब यह कंटेनर विमान से छोड़ा जाता है, तो इसके साथ लगा पैराशूट खुल जाता है, जिससे यह धीरे-धीरे समुद्र की सतह पर उतरता है। बाद में जहाज के कर्मचारी इसे आसानी से रिकवर कर सकते हैं। इस कंटेनर का रंग चमकीला नारंगी रखा गया है और उस पर काले-पीले मार्किंग्स बनाए गए हैं ताकि समुद्र में इसे आसानी से देखा जा सके। (ADC-150 Air Droppable Container)

समुद्र के बीच जहाजों के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम

समुद्र में कई बार जहाज लंबे समय तक तट से सैकड़ों किलोमीटर दूर तैनात रहते हैं। ऐसी स्थिति में अगर किसी जहाज को अचानक किसी जरूरी सामान की जरूरत पड़ जाए, तो उसे तुरंत उपलब्ध कराना आसान नहीं होता।

अक्सर जहाजों को सप्लाई देने के लिए दूसरे जहाज भेजने पड़ते हैं या जहाज को खुद पोर्ट की ओर लौटना पड़ता है। इससे समय भी लगता है और ऑपरेशन भी प्रभावित हो सकते हैं। (ADC-150 Air Droppable Container)

एडीसी-150 जैसे सिस्टम से यह समस्या काफी हद तक हल हो सकती है। अब विमान सीधे समुद्र के ऊपर पहुंचकर जरूरी सामान कंटेनर के जरिए ड्रॉप कर सकता है। इससे जहाज को तुरंत मदद मिल सकती है और उसका मिशन जारी रह सकता है।

इस प्रोजेक्ट में डीआरडीओ की कई लैबोरेट्री ने मिलकर काम किया है। इस पूरे प्रोग्राम की मुख्य जिम्मेदारी विशाखापत्तनम स्थित नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी के पास थी। कंटेनर के पैराशूट सिस्टम को आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने विकसित किया है। वहीं बेंगलुरु के सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थिनेस एंड सर्टिफिकेशन ने इस सिस्टम को फ्लाइट क्लियरेंस और सर्टिफिकेशन दिया। जबकि हैदराबाद स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी ने ट्रायल के दौरान इंस्ट्रुमेंटेशन सपोर्ट दिया। इन सभी संस्थानों के संयुक्त प्रयास से यह सिस्टम कम समय में तैयार किया गया। (ADC-150 Air Droppable Container)

पी-8आई विमान की क्षमता भी बढ़ेगी

जिस विमान से यह कंटेनर ड्रॉप किया गया, वह भारतीय नौसेना का बेहद एडवांस मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट है। पी-8आई विमान को मुख्य रूप से लंबी दूरी की निगरानी, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और समुद्री गश्त के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

अब एडीसी-150 के इस्तेमाल से इस विमान की भूमिका और भी बढ़ जाएगी। यह केवल दुश्मन की निगरानी ही नहीं करेगा बल्कि जरूरत पड़ने पर समुद्र में मौजूद जहाजों को सप्लाई भी पहुंचा सकेगा। इससे नौसेना की ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी और रिस्पॉन्स कैपेबिलिटी दोनों मजबूत होंगी। (ADC-150 Air Droppable Container)

इन परीक्षणों के दौरान कंटेनर को अलग-अलग ऊंचाई, गति और मौसम जैसी परिस्थितियों में रिलीज किया गया। इन सभी स्थितियों को इसलिए चुना गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वास्तविक ऑपरेशन में भी यह सिस्टम सही तरीके से काम करेगा।

चारों ट्रायल सफल रहे और कंटेनर सुरक्षित तरीके से समुद्र में उतरा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि सिस्टम भरोसेमंद है और नौसेना की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। वहीं, सभी डेवलपमेंटल फ्लाइट ट्रायल पूरे होने के बाद अब इस सिस्टम को जल्द ही नौसेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है।

वहीं, एडीसी-150 का डेवलपमेंट भारत की आत्मनिर्भर भारत नीति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पहले इस तरह के कई सिस्टम विदेशों से आयात करने पड़ते थे। लेकिन अब डीआरडीओ और भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक के जरिए ऐसा समाधान तैयार किया है जो भारतीय नौसेना की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी बल्कि रक्षा तकनीक के क्षेत्र में देश की क्षमता भी मजबूत होगी। (ADC-150 Air Droppable Container)

समुद्री ऑपरेशन होंगे ज्यादा प्रभावी

विशेषज्ञों का मानना है कि एडीसी-150 जैसे सिस्टम से नौसेना के समुद्री ऑपरेशन और अधिक प्रभावी बनेंगे। समुद्र के बीच तैनात जहाजों को अब किसी भी आपात स्थिति में तेजी से सहायता मिल सकेगी। चाहे जहाज में टेक्निकल खराबी हो, किसी उपकरण की जरूरत हो या किसी सैनिक को तत्काल मेडिकल सहायता चाहिए हो, विमान के जरिए तुरंत सप्लाई भेजी जा सकेगी। इससे मिशन की निरंतरता बनी रहेगी और जहाजों को ऑपरेशन छोड़कर वापस लौटने की जरूरत भी कम होगी।

वहीं, भविष्य में इस तरह के एयर डिलीवरी सिस्टम को और भी एडवांस बनाया जा सकता है। आने वाले समय में बड़े पेलोड वाले कंटेनर, स्मार्ट नेविगेशन सिस्टम और जीपीएस आधारित ड्रॉप टेक्नोलॉजी विकसित की जा सकती है, जिससे कंटेनर को बिल्कुल सटीक स्थान पर गिराया जा सके। डीआरडीओ पहले से ही कई नई टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है, जो भारतीय सेना और नौसेना की लॉजिस्टिक क्षमता को और मजबूत बना सकती हैं। (ADC-150 Air Droppable Container)

सेना प्रमुख बोले- ऑपरेशन सिंदूर से बदली भारत की सुरक्षा रणनीति, भविष्य के युद्धों में एआई, ड्रोन और डेटा वारफेयर तय करेंगे जीत

Army Chief Upendra Dwivedi Indian Army transformation
Army Chief General Upendra Dwivedi

Indian Army transformation: देश के विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य को देखते हुए सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का कहना है कि भारतीय सेना एक नए दौर के मुहाने पर खड़ी है, जहां तकनीकी प्रगति, संगठनात्मक लचीलापन और आत्मनिर्भरता भविष्य की सैन्य शक्ति की पहचान होंगे। सिकंदराबाद स्थित कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट में बोलते हुए उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में भारतीय सेना को तेजी से बदलना होगा और नई तकनीकों, डेटा आधारित युद्ध और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस को अपनाना समय की जरूरत बन चुका है।

मंगलवार को जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने तेलंगाना के सिकंदराबाद में स्थित कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट का दौरा किया, जहां इस समय 21वां हायर डिफेंस मैनेजमेंट कोर्स (HDMC-21) चल रहा हैं। कोर्स में शामिल अधिकारियों, संस्थान की फैकल्टी और स्टाफ को संबोधित करते हुए जनरल द्विवेदी ने बदलते सुरक्षा माहौल के बीच भारतीय सेना के परिवर्तन की जरूरत पर विस्तार से बात की। (Indian Army transformation)

Indian Army transformation: भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के पांच प्रमुख स्तंभ

उन्होंने कहा कि सेना के आधुनिकीकरण के लिए पांच प्रमुख स्तंभों पर काम किया जा रहा है। इनमें नई तकनीकों को अपनाना और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करना, संगठनात्मक ढांचे में बदलाव और सेना का आधुनिकीकरण, मानव संसाधन और नेतृत्व विकास, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल तथा रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना शामिल है।

सेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय सेना इस समय एक नए दौर के मुहाने पर खड़ी है, जहां तकनीकी प्रगति, संगठनात्मक लचीलापन और आत्मनिर्भरता बेहद महत्वपूर्ण होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सेना की मूल ताकत सत्य, विश्वास और पारदर्शिता जैसे मूल्यों पर आधारित है। (Indian Army transformation)

ऑपरेशन सिंदूर से बदली भारत की रणनीति

जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर से यह साफ हुआ है कि भारत की सुरक्षा रणनीति अब धीरे-धीरे प्रतिक्रिया आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर सक्रिय रोकथाम यानी प्रोएक्टिव डिटरेंस की दिशा में जा रही है। भविष्य के युद्धों में मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस, डेटा-सेंट्रिक वारफेयर और अनमैन्ड सिस्टम्स जैसे ड्रोन और रोबोटिक प्लेटफॉर्म्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। (Indian Army transformation)

सेना में बदलाव रणनीतिक जरूरत

सेना प्रमुख ने अधिकारियों से कहा कि सेना में बदलाव को अपनाना एक रणनीतिक जरूरत है, न कि कोई विकल्प। इसके लिए अधिकारियों को अपनी सोच को और व्यापक बनाना होगा। उन्होंने पांच प्रकार की सोच जिनमें क्रिएटिव, क्रिटिकल, सिस्टम्स, कॉग्निटिव और इमेजिनेटिव थिंकिंग विकसित करने पर जोर दिया। उनके अनुसार इससे सेना के भीतर नई सोच और इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा। (Indian Army transformation)

भविष्य के युद्ध में मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस की बढ़ती भूमिका

सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आज के संघर्षों में कई प्रकार के युद्ध एक साथ देखने को मिलते हैं। इसलिए भविष्य के युद्धों में मल्टी-डोमेन अप्रोच बेहद जरूरी होगी, जहां जमीन, समुद्र, हवा, साइबर और स्पेस जैसे सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई की जा सके।

उन्होंने कमांड स्तर पर ग्रे-जोन वारफेयर को समझने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि यूनिट कमांडर से लेकर उच्च सैन्य नेतृत्व तक हर स्तर पर अधिकारियों को इन नई चुनौतियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। (Indian Army transformation)

Army Chief Upendra Dwivedi Indian Army transformation
Army Chief General Upendra Dwivedi

मानव संसाधन और जेसीओ की भूमिका पर जोर

अपने संबोधन में जनरल द्विवेदी ने सेना में मानव संसाधन के बेहतर इस्तेमाल पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) को और सशक्त बनाना जरूरी है, ताकि अधिकारियों की कमी को संतुलित किया जा सके और जमीनी स्तर पर नेतृत्व को मजबूत किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि बदलती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सेना नई ऑपरेशनल स्ट्रक्चर भी तैयार कर रही है। इनमें भैरव बटालियन और स्पेशल ऑपरेशंस फोर्सेज ब्रिगेड जैसी नई यूनिट्स भी शामिल हैं, जो भविष्य के खतरों से निपटने के लिए तैयार की जा रही हैं।

इस दौरान सेना प्रमुख ने संस्थान की फैकल्टी और मित्र देशों से आए अंतरराष्ट्रीय अधिकारियों से भी बातचीत की। उन्होंने रणनीतिक प्रबंधन, नेतृत्व विकास और संसाधनों के बेहतर उपयोग जैसे विषयों पर विचार साझा किए। उन्होंने कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान भारतीय सशस्त्र बलों के लिए रणनीतिक नेतृत्व तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (Indian Army transformation)

सिमुलेटर तकनीक से बदलेगी सैनिकों की ट्रेनिंग

इस दौरान जनरल द्विवेदी ने सिमुलेटर डेवलपमेंट डिवीजन का भी दौरा किया। यहां उन्हें कई आधुनिक प्रशिक्षण तकनीकों का प्रदर्शन देखा। इनमें ऑगमेंटेड रियलिटी, वर्चुअल रियलिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रोबोटिक्स और सिमुलेटर आधारित प्रशिक्षण प्रणालियां शामिल थीं।

इन प्रणालियों का उद्देश्य सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में प्रशिक्षण देना है, जिससे उनकी तैयारी और फैसले लेने की क्षमता बेहतर हो सके। सिमुलेटर आधारित ट्रेनिंग भविष्य के जटिल युद्धक्षेत्र के लिए सैनिकों को अधिक प्रभावी ढंग से तैयार करने में मदद करेगा। (Indian Army transformation)

इस दौरान सिमुलेटर डेवलपमेंट डिवीजन के कमांडेंट ब्रिगेडियर आशीष जोहर ने सेना प्रमुख को संगठन की विकास योजनाओं और नई तकनीकों पर चल रहे कार्यों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह डिवीजन भारतीय सशस्त्र बलों के लिए स्वदेशी और अत्याधुनिक तकनीकों के विकास पर काम कर रहा है।

सेना प्रमुख ने इन प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि तकनीक आधारित प्रशिक्षण भविष्य के युद्धों के लिए सैनिकों को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। (Indian Army transformation)

2047 तक बदल जाएगी भारतीय सेनाओं की तस्वीर! रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जारी किया बड़ा रोडमैप

Defence Forces Vision 2047

Defence Forces Vision 2047: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को ‘डिफेंस फोर्सेज विजन 2047’ डॉक्यूमेंट जारी किया। यह दस्तावेज भारतीय सशस्त्र बलों के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक बड़ा रणनीतिक खाका माना जा रहा है। इस विजन डॉक्यूमेंट को हेडक्वार्टर्स इंटीग्रेटिड डिफेंस स्टाफ ने तैयार किया है। इसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक भारतीय सेना को एक ऐसी आधुनिक, एकीकृत और तकनीकी रूप से एडवांस सैन्य ताकत बनाना है जो भविष्य के युद्धों और सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।

सरकार का लक्ष्य है कि जब भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे करे, तब देश की सैन्य शक्ति न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक मजबूत और सम्मानित ताकत के रूप में खड़ी हो।

रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि तेजी से बदलते वैश्विक हालात, नई टेक्नोलॉजी और नए तरह के युद्धों को देखते हुए भारतीय सेना को भी उसी गति से खुद को बदलना होगा। यही बदलाव इस विजन डॉक्यूमेंट का मूल उद्देश्य है। (Defence Forces Vision 2047)

भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया Defence Forces Vision 2047

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह विजन डॉक्यूमेंट केवल एक नीति दस्तावेज नहीं है बल्कि अगले दो दशकों में भारतीय सशस्त्र बलों के विकास की दिशा तय करने वाला रोडमैप है। इसमें बताया गया है कि आने वाले समय में युद्ध केवल जमीन, समुद्र और हवा तक सीमित नहीं रहेंगे। भविष्य के संघर्षों में स्पेस, साइबर, इंफॉर्मेशन और कॉग्निटिव डोमेन जैसे नए क्षेत्रों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होगी।

इसी कारण इस दस्तावेज में भारतीय सेना को एक मल्टी-डोमेन फोर्स के रूप में विकसित करने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि सेना को एक साथ कई क्षेत्रों में ऑपरेशन करने के लिए तैयार किया जाएगा। दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि भारत के बढ़ते वैश्विक हितों की रक्षा के लिए सेना को अधिक लचीला, तेज प्रतिक्रिया देने वाला और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना होगा। (Defence Forces Vision 2047)

तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल पर जोर

इस विजन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू तीनों सेनाओं थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल को बढ़ाना है। दस्तावेज में स्पष्ट कहा गया है कि भविष्य के युद्धों में अलग-अलग सेनाओं के स्वतंत्र ऑपरेशन पर्याप्त नहीं होंगे। इसके बजाय एक इंटीग्रेटेड ऑपरेशनल स्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी।

इसी दिशा में लंबे समय से चर्चा में रहे इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की अवधारणा को भी इस विजन में महत्वपूर्ण माना गया है। इस व्यवस्था के तहत किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में तीनों सेनाओं की क्षमताओं को एक ही कमांड के तहत लाया जा सकता है ताकि ऑपरेशन अधिक प्रभावी और तेज हो सकें। वहीं, यह कदम भारतीय सैन्य संरचना में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। (Defence Forces Vision 2047)

नई टेक्नोलॉजी और इनोवेशन पर विशेष ध्यान

विजन 2047 का एक प्रमुख लक्ष्य भारतीय सेना को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाना भी है। दस्तावेज में बताया गया है कि भविष्य के युद्धों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम, साइबर ऑपरेशन और डेटा-सेंट्रिक वारफेयर जैसी तकनीकों की भूमिका तेजी से बढ़ेगी। इसलिए सेना की ट्रेनिंग, ऑपरेशनल प्लानिंग और हथियार प्रणालियों में इन तकनीकों को शामिल करने की योजना बनाई गई है।

इसके अलावा सेना के ट्रेनिंग स्ट्रक्चर को भी आधुनिक बनाने पर जोर दिया गया है। इसमें सिमुलेशन-आधारित प्रशिक्षण, संयुक्त सैन्य अभ्यास और टेक्नोलॉजी आधारित ट्रेनिंग को बढ़ावा दिया जाएगा। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इससे सैनिकों को भविष्य के जटिल युद्धों के लिए बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकेगा। (Defence Forces Vision 2047)

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा

विजन डॉक्यूमेंट में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भी बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। सरकार का मानना है कि देश की सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना जरूरी है। इसलिए दस्तावेज में घरेलू रक्षा उद्योग, स्टार्टअप्स और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका को मजबूत करने की बात कही गई है।

स्वदेशी तकनीक और हथियार प्रणालियों का विकास न केवल सेना की जरूरतों को पूरा करेगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा। सरकार पहले से ही ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। यह विजन उसी दिशा में एक दीर्घकालिक रणनीति माना जा रहा है। (Defence Forces Vision 2047)

चरणबद्ध तरीके से लागू होगा विजन

इस विजन को लागू करने के लिए एक चरणबद्ध रणनीति तैयार की गई है। पहले चरण में अगले कुछ वर्षों के भीतर सैन्य संरचना में बुनियादी सुधारों और समन्वय को मजबूत किया जाएगा। दूसरे चरण में नई तकनीकों को सेना में शामिल करने और संयुक्त कमांड व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा। वहीं, अंतिम चरण में वर्ष 2047 तक भारतीय सेना को पूरी तरह आधुनिक, एकीकृत और तकनीकी रूप से उन्नत सैन्य शक्ति के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है जिसमें लगातार सुधार, निवेश और रणनीतिक योजना की जरूरत होगी। (Defence Forces Vision 2047)

राष्ट्रीय शक्ति के सभी पहलुओं को जोड़ने की कोशिश

विजन डॉक्यूमेंट में यह भी कहा गया है कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होती। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए सैन्य ताकत के साथ-साथ डिप्लोमैटिक, टेक्नोलॉजिकल और आर्थिक शक्ति को भी जोड़ना जरूरी है।

इसे “होल-ऑफ-नेशन अप्रोच” कहा जाता है, जिसमें सरकार के अलग-अलग विभाग, उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान और कूटनीतिक संस्थाएं मिलकर काम करते हैं। इस रणनीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत किसी भी प्रकार के सुरक्षा संकट का प्रभावी तरीके से सामना कर सके।

इस कार्यक्रम में भारतीय सेना के कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। इनमें सीडीएस जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और एयरफोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल एपीसी सिंह भी शामिल थे। इसके अलावा रक्षा सचिव और सेना के कई वरिष्ठ अधिकारी भी इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे। इन अधिकारियों ने इस विजन डॉक्यूमेंट को भारतीय सेना के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया। (Defence Forces Vision 2047)

2047 तक मजबूत सैन्य शक्ति बनाने का लक्ष्य

भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा। सरकार का लक्ष्य है कि उस समय तक देश न केवल आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्र बने बल्कि उसकी सैन्य शक्ति भी विश्व स्तर पर मजबूत हो। ‘डिफेंस फोर्सेज विजन 2047’ इसी दीर्घकालिक लक्ष्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस दस्तावेज के जरिए भारतीय सेना को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार करने, तकनीकी रूप से सक्षम बनाने और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की योजना बनाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस विजन को प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो आने वाले वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों की क्षमता और प्रभाव दोनों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। (Defence Forces Vision 2047)

ट्रंप के सलाहकार क्यों चाहते हैं ईरान युद्ध का ‘एग्जिट प्लान’? असली संकट तेल नहीं, बल्कि ये है

Iran war oil crisis

Iran war oil crisis: अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को हिला कर रख दिया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ करीबी सलाहकार उन्हें ईरान युद्ध से निकलने की रणनीति तैयार करने की सलाह दे रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार सलाहकारों को डर है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और इसका राजनीतिक असर भी अमेरिका की घरेलू राजनीति पर पड़ सकता है। खासकर 2026 के चुनावों के लिहाज से यह मुद्दा ट्रंप प्रशासन के लिए परेशानी बन सकता है।

हालांकि ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर इस तरह की किसी भी जल्दबाजी से इनकार किया है। उनका कहना है कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान “काफी हद तक पूरा हो चुका है” और यह उनकी शुरुआती योजना से भी आगे बढ़ चुका है।

व्हाइट हाउस ने भी यह साफ किया है कि फिलहाल किसी तत्काल युद्ध समाप्ति योजना की जरूरत नहीं है। लेकिन इसके बावजूद अंदरखाने चल रही चर्चाओं ने एक नई बहस छेड़ दी है। (Iran war oil crisis)

Iran war oil crisis: तेल की कीमतों में अचानक गिरावट

ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई थी। कुछ ही दिनों में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। लेकिन हाल ही में यह कीमत अचानक गिरकर 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई। इस गिरावट के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।

पहला कारण यह है कि जी-7 देशों ने रणनीतिक तेल भंडार के इस्तेमाल पर चर्चा शुरू कर दी है। अगर जरूरत पड़ी तो ये देश अपने स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व बाजार में उतार सकते हैं।

दूसरा कारण ट्रंप की हाल की बयानबाजी है, जिसमें उन्होंने कहा कि यह युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा।

तीसरा कारण ईरान की तरफ से आया एक संकेत है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी आईआरजीसी ने संकेत दिया है कि अगर कुछ शर्तें पूरी होती हैं तो हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोला जा सकता है।

इन तीनों संकेतों के बाद बाजार में राहत की देखी गई और तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। (Iran war oil crisis)

लेकिन असली समस्या तेल नहीं, इंश्योरेंस है

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संकट को सिर्फ तेल की कीमतों के नजरिए से देखना एक बड़ी गलती हो सकती है। तेल की कीमतें अक्सर राजनीतिक बयान और खबरों के आधार पर ऊपर-नीचे होती रहती हैं। लेकिन समुद्री व्यापार और तेल आपूर्ति को नियंत्रित करने वाली असली व्यवस्था कहीं ज्यादा जटिल है।

दरअसल हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज मरीन इंश्योरेंस होती है। अगर जहाजों को इंश्योरेंस कवर नहीं मिलता तो वे उस रास्ते से गुजर ही नहीं सकते।

यहीं से शुरू होता है इस संकट का असली आर्थिक पहलू।

सात बड़ी इंश्योरेंस कंपनियों का फैसला

मार्च की शुरुआत में दुनिया की सात बड़ी पी-एंड-आई क्लब्स ने एक बड़ा फैसला लिया। इन कंपनियों ने हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए वॉर-रिस्क इंश्योरेंस कवरेज बंद कर दिया। ये कंपनियां वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत इंश्योरेंस कवर देती हैं। इनमें गार्ड, स्कुल्ड, नॉर्थस्टैंडर्ड, लंदन पी-एंड-आई क्लब, स्टीमशिप म्यूचुअल, अमेरिकन क्लब और स्वीडिश क्लब जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इन कंपनियों का कहना था कि मौजूदा युद्ध की स्थिति में जोखिम इतना ज्यादा बढ़ गया है कि इंश्योरेंस जारी रखना संभव नहीं है। (Iran war oil crisis)

क्या है सॉल्वेंसी-II

इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण यूरोपीय यूनियन का सॉल्वेंसी-II रेगुलेशन है। यह नियम यह तय करता है कि इंश्योरेंस कंपनियों के पास संभावित नुकसान को कवर करने के लिए कितना पूंजी भंडार होना चाहिए।

इस नियम के तहत मरीन वॉर इंश्योरेंस में जोखिम की गणना बहुत सख्ती से की जाती है। अगर किसी इलाके में युद्ध चल रहा हो तो कंपनियों को बहुत ज्यादा पूंजी रिजर्व रखना पड़ता है।

ईरान युद्ध के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट में हमलों, ड्रोन हमलों और जहाजों पर हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ गईं। इससे इंश्योरेंस कंपनियों के लिए जोखिम का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया।

कई कंपनियों के लिए यह स्थिति उनके पूंजी नियमों का उल्लंघन करने जैसी हो गई। इसलिए उन्होंने कवरेज वापस लेने का फैसला किया। (Iran war oil crisis)

युद्ध खत्म होने पर भी तुरंत नहीं लौटेगा व्यापार

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर युद्ध कल खत्म भी हो जाए तो भी हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का सामान्य व्यापार तुरंत शुरू नहीं होगा। इंश्योरेंस कंपनियों को अपने जोखिम मॉडल को फिर से अपडेट करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए कम से कम 12 से 24 महीने का समय लग सकता है। इस दौरान उन्हें यह देखना होगा कि क्षेत्र में हमले पूरी तरह बंद हुए हैं या नहीं और जहाजों के लिए जोखिम कितना कम हुआ है।

यानी युद्ध राजनीतिक रूप से खत्म हो सकता है, लेकिन आर्थिक असर काफी लंबे समय तक बना रह सकता है।

तेल बाजार इस खतरे को समझ रहा है

तेल की कीमतें इस जोखिम को पहले ही ध्यान में रख चुकी हैं। यही वजह है कि कीमतें गिरने के बावजूद अभी भी युद्ध से पहले के स्तर तक नहीं पहुंची हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान कीमतों में लगभग 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल का अतिरिक्त प्रीमियम शामिल है। यह प्रीमियम सिर्फ युद्ध का नहीं बल्कि इंश्योरेंस संकट का प्रीमियम है। बाजार यह मानकर चल रहा है कि हॉर्मुज स्ट्रेट से सामान्य व्यापार शुरू होने में काफी समय लग सकता है। (Iran war oil crisis)

हॉर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण

हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

अमेरिका की सैन्य लागत भी बढ़ रही है

ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान की लागत भी तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार युद्ध के पहले दो दिनों में ही अमेरिका ने करीब 5.6 बिलियन डॉलर के हथियार इस्तेमाल कर लिए। इनमें टॉमहॉक क्रूज मिसाइल, एयर डिफेंस इंटरसेप्टर और अन्य एडवांस्ड प्रिसीजन हथियार शामिल थे। रिपोर्टों के अनुसार अब अमेरिकी सेना महंगे प्रिसीजन हथियारों की बजाय अपेक्षाकृत सस्ते लेजर-गाइडेड बम का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना बना रही है। इससे अभियान की लागत कुछ हद तक कम हो सकती है। (Iran war oil crisis)

हथियारों के भंडार को लेकर चिंता

अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने यह चिंता भी जताई है कि लंबे युद्ध से अमेरिका के एडवांस्ड हथियारों का भंडार तेजी से कम हो सकता है। अमेरिका पहले से ही यूक्रेन युद्ध के दौरान बड़ी मात्रा में हथियार भेज चुका है। इसके अलावा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के साथ संभावित टकराव को देखते हुए भी हथियारों का पर्याप्त भंडार जरूरी माना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से थाड एयर डिफेंस सिस्टम के कुछ हिस्सों को मध्य पूर्व भेजने का फैसला किया है। इसके अलावा पैट्रियट मिसाइल सिस्टम की भी अतिरिक्त तैनाती की जा रही है। (Iran war oil crisis)

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

ईरान युद्ध का असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं है। कई एशियाई और यूरोपीय शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी गई है। कुछ अनुमानों के अनुसार इस संकट के कारण वैश्विक बाजारों से सैकड़ों अरब डॉलर की पूंजी गायब हो चुकी है। इसके अलावा यूरोप में गैस की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी देखी गई है। अगर हॉर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहता है तो यह संकट और गहरा सकता है। (Iran war oil crisis)

भारत जैसे देशों पर भी असर

भारत जैसे देश भी इस संकट से अछूते नहीं रह सकते। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। इनमें से बड़ी मात्रा मध्य पूर्व से आती है और उसका एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता है। अगर इस मार्ग में अवरोध जारी रहता है तो भारत के लिए तेल की कीमतें और आयात लागत दोनों बढ़ सकती हैं। हालांकि भारत के पास कुछ स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व मौजूद हैं, जो सीमित समय तक आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का राजनीतिक समाधान भी निकल जाता है, तब भी आर्थिक असर लंबे समय तक जारी रह सकता है। युद्ध को समाप्त करना राजनीतिक निर्णय हो सकता है, लेकिन समुद्री व्यापार और इंश्योरेंस प्रणाली को सामान्य स्थिति में लौटने में समय लगेगा।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस संकट की असली समयरेखा राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था तय करेगी। और जब तक इंश्योरेंस बाजार सामान्य नहीं होता, तब तक दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत समुद्री तेल आपूर्ति जोखिम में बनी रह सकती है। (Iran war oil crisis)

मेक इन इंडिया और iDEX के बावजूद क्यों सिस्टम में अटक जाते हैं डिफेंस स्टार्टअप्स? नई किताब ‘Unfolded’ में पूर्व ब्यूरोक्रेट ने किया खुलासा

India MSME ecosystem problems
Writer P Sesh Kumar author of "Unfolded: What Ails India’s MSME and Startup Ecosystem?"

India MSME ecosystem problems: भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर यानी माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज को हमेशा बहुत अहम माना जाता है। सरकारें अक्सर कहती हैं कि यही छोटे उद्योग देश की आर्थिक रीढ़ हैं। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक नई किताब ने इस सेक्टर की वास्तविक स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पूर्व ब्यूरोक्रेट और पॉलिसी एक्सपर्ट पी. शेष कुमार की किताब “अनफोल्डेड: व्हाट एल्स इंडियाज एमएसएमई एंड स्टार्टअप इकोसिस्टम?” (Unfolded: What Ails India’s MSME and Startup Ecosystem?) भारत के एमएसएमई और स्टार्टअप इकोसिस्टम की कमजोरियों और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करती है। इस किताब में लेखक ने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को विस्तार से समझाने की कोशिश की है।

करीब 700 से अधिक पन्नों की इस किताब में 26 चैप्टर हैं, जिनमें भारत के छोटे उद्योगों, स्टार्टअप्स और खास तौर पर डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले एमएसएमई की समस्याओं को गहराई से बताया गया है। (India MSME ecosystem problems)

पी. शेष कुमार का नजरिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे इस सिस्टम को बाहर से नहीं बल्कि अंदर से समझते हैं। वे पहले एमएसएमई मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं और नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा भी रहे हैं। इसलिए किताब में उन्होंने केवल सैद्धांतिक चर्चा नहीं की, बल्कि अपने अनुभव और अवलोकन के आधार पर यह बताया है कि घोषणाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच कितना बड़ा अंतर मौजूद है। (India MSME ecosystem problems)

India MSME ecosystem problems: भारतीय अर्थव्यवस्था में एमएसएमई की बड़ी भूमिका

भारत में एमएसएमई सेक्टर का योगदान बहुत बड़ा माना जाता है। विभिन्न सरकारी आंकड़ों के अनुसार यह सेक्टर देश के जीडीपी में 30 फीसदी से ज्यादा योगदान देता है। इसके अलावा करीब 11 करोड़ लोगों को रोजगार देने में भी एमएसएमई की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हर साल बजट भाषण में इस सेक्टर को “भारतीय अर्थव्यवस्था की बैकबोन” कहा जाता है। लेकिन किताब में बताया गया है कि इस सेक्टर के सामने कई बुनियादी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं।

पी. शेष कुमार के मुताबिक भारत में केवल लगभग 14 फीसदी एमएसएमई को ही औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से कर्ज मिल पाता है। इसका मतलब है कि अधिकांश छोटे उद्योगों को फाइनेंस के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

किताब में यह भी बताया गया है कि एमएसएमई सेक्टर में 330 से 530 बिलियन डॉलर तक का क्रेडिट गैप मौजूद है। यानी छोटे उद्योगों को जितने वित्तीय संसाधनों की जरूरत है, उतने उपलब्ध नहीं हैं। (India MSME ecosystem problems)

नीतियों और योजनाओं के बावजूद समस्याएं

पिछले कई वर्षों में सरकार ने एमएसएमई सेक्टर के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें मुद्रा योजना, उद्यम रजिस्ट्रेशन, चैंपियंस प्लेटफॉर्म और रैंप प्रोग्राम जैसी पहल शामिल हैं।

लेकिन किताब में यह सवाल उठाया गया है कि इन योजनाओं का जमीनी स्तर पर असर कितना दिखाई देता है।

लेखक पी. शेष कुमार का कहना है कि अक्सर नई योजनाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन उनके क्रियान्वयन में कई समस्याएं सामने आती हैं। छोटे उद्योगों तक इन योजनाओं का लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाता।

इसके अलावा किताब में यह भी बताया गया है कि भारत में एमएसएमई से जुड़ा आखिरी व्यापक जनगणना सर्वे 2015 में हुआ था। ऐसे में कई नीतियां पुराने आंकड़ों के आधार पर बन रही हैं। (India MSME ecosystem problems)

नोटबंदी और कोविड का भी पड़ा असर

किताब में यह भी बताया गया है कि पिछले दशक में कुछ बड़े आर्थिक फैसलों का एमएसएमई सेक्टर पर गहरा असर पड़ा। नोटबंदी के दौरान कई छोटे उद्योगों को अचानक नकदी संकट का सामना करना पड़ा। इसके बाद कोविड महामारी ने भी हजारों छोटे कारोबारों को बंद होने की कगार पर पहुंचा दिया।

लेखक के अनुसार इन दोनों घटनाओं के बाद भी छोटे उद्योगों को पूरी तरह स्थिर होने में काफी समय लगा। (India MSME ecosystem problems)

दूसरे देशों के मुकाबले कहां खड़े हैं हम

किताब में लेखक ने भारत की तुलना दूसरे देशों के मॉडल से भी की है। उन्होंने जर्मनी के मिटेलस्टैंड मॉडल का उदाहरण दिया है, जहां छोटे और मध्यम उद्योगों को कम ब्याज पर फाइनेंसिंग मिलती है और स्किल ट्रेनिंग सिस्टम मजबूत है।

इसी तरह चीन के “लिटिल जायंट्स प्रोग्राम” का जिक्र किया गया है, जिसमें छोटे लेकिन तकनीकी रूप से मजबूत उद्योगों को सरकारी सहयोग दिया जाता है।

ब्राजील के टैक्स सिस्टम का भी उदाहरण दिया गया है, जहां छोटे कारोबारों के लिए टैक्स प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। इन उदाहरणों के जरिए किताब में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि भारत में भी सुधार की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। (India MSME ecosystem problems)

स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी सवाल

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी केंद्रित है। लेखक का कहना है कि भारत में स्टार्टअप्स को लेकर काफी उत्साह है, लेकिन कई बार वास्तविक बिजनेस मॉडल से ज्यादा ध्यान वैल्यूएशन और फंडिंग पर दिया जाता है।

उन्होंने कुछ चर्चित कंपनियों के उदाहरण देते हुए बताया है कि जब बिजनेस वैल्यू की जगह निवेशकों की उम्मीदों पर ज्यादा जोर दिया जाता है, तो लंबे समय में समस्याएं सामने आ सकती हैं।

किताब में यह भी कहा गया है कि भारत अभी भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर बहुत कम खर्च करता है। भारत जीडीपी का लगभग 0.7 फीसदी ही रिसर्च एंड डेपलपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन और इजराइल जैसे देशों में यह काफी ज्यादा है। (India MSME ecosystem problems)

डिफेंस सेक्टर में भी कम नहीं हैं एमएसएमई की चुनौतियां

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले एमएसएमई और स्टार्टअप्स की समस्याओं पर भी केंद्रित है। भारत में सरकार लंबे समय से आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के तहत डिफेंस प्रोडक्शन में छोटे उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने की बात कर रही है।

दरअसल पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, और iDEX जैसी पहल के जरिए डिफेंस सेक्टर में एमएसएमई और स्टार्टअप्स की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की है। नीति स्तर पर यह एक बड़ा बदलाव माना जाता है, क्योंकि लंबे समय तक रक्षा उत्पादन मुख्य रूप से बड़े सार्वजनिक उपक्रमों और विदेशी कंपनियों के हाथ में रहा है। लेकिन किताब के अनुसार जब इन नीतियों को जमीन पर लागू किया जाता है, तो कई ऐसी संस्थागत बाधाएं सामने आती हैं जो छोटे उद्यमों के लिए आगे बढ़ना मुश्किल बना देती हैं। (India MSME ecosystem problems)

DGQA कराता है लंबा इंतजार

डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले कई स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती DGQA यानी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस की प्रक्रिया बताई गई है।

किताब में एक उदाहरण दिया गया है जिसमें एक छोटे एमएसएमई ने सेना के लिए रेडियो सिस्टम डेवलप किया था। लेकिन उसकी टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल थी कि कंपनी को सालों तक इंतजार करना पड़ा।

टेस्टिंग कई बार टलती रही, दस्तावेजों में छोटी गलतियों पर फाइलें वापस लौटा दी गईं और बार-बार नए परीक्षण की मांग की गई। इस तरह की प्रक्रिया छोटे उद्योगों के लिए काफी मुश्किल हो जाती है। (India MSME ecosystem problems)

भुगतान में देरी भी बड़ी समस्या

किताब में यह भी बताया गया है कि डिफेंस सेक्टर में पेमेंट में देरी एमएसएमई के लिए गंभीर समस्या बन जाती है। एमएसएमई मंत्रालय के समाधान पोर्टल पर हजारों शिकायतें दर्ज हैं जिनमें कंपनियों ने भुगतान में देरी की शिकायत की है। छोटे उद्योगों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल होती है क्योंकि उनके पास बड़े उद्योगों जैसी वित्तीय क्षमता नहीं होती।

टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

कई डिफेंस स्टार्टअप्स के सामने एक और समस्या टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। कई बार उन्हें अपने उत्पादों के परीक्षण के लिए सरकारी प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां पहले से ही भारी काम का दबाव होता है।
इस वजह से नए उत्पादों की टेस्टिंग और प्रमाणन में काफी समय लग जाता है।

लेखक पी. शेष कुमार का कहना है कि भारत में एमएसएमई सेक्टर को सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है, बल्कि जरूरत ईमानदार समीक्षा, बेहतर डेटा और प्रभावी क्रियान्वयन की है। अगर नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को कम किया जाए, तो एमएसएमई और स्टार्टअप सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना सकते हैं। (India MSME ecosystem problems)