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चीन ने पहली बार कबूला, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान एयरफोर्स के साथ थे चीनी एक्सपर्ट, दिया था ऑन-साइट सपोर्ट

Operation Sindoor China Helps Pakistan

Operation Sindoor China Helps Pakistan: चीन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना है कि उसने पिछले साल 6-7 मई से 10 मई तक चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान वायुसेना को तकनीकी मदद दी थी। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ मनाई जा रही है।

दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक चीन के सरकारी चैनल सीसीटीवी पर प्रसारित एक इंटरव्यू में चीनी इंजीनियरों ने बताया कि वे मई 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान पाकिस्तान में मौजूद थे और वहां चीनी लड़ाकू विमानों को टेक्निकल सपोर्ट दे रहे थे।

यह पहली बार है जब चीन ने सार्वजनिक रूप से माना है कि उसके कर्मचारी युद्ध के दौरान पाकिस्तान वायुसेना के साथ काम कर रहे थे। हालांकि चीन ने सीधे इस लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया।

22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बेहद बढ़ गया था। जिसके बाद भारत ने बेहद कंट्रोल्ड/कैलिब्रेटेड/लिमिटेड तरीके से 6-7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू करते हुए पाकिस्तान और पीओके में मौजूद 9 आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था।

Operation Sindoor China Helps Pakistan: क्या कहा चीनी इंजीनियरों ने

सीसीटीवी को दिए इंटरव्यू में एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना यानी एवीआईसी के इंजीनियर झांग हेंग ने बताया कि वह पाकिस्तान में सपोर्ट बेस पर तैनात थे।

उन्होंने कहा, “हम लगातार लड़ाकू विमानों के टेकऑफ की आवाज सुनते थे। एयर रेड सायरन लगातार बजते रहते थे। मई की गर्मी में तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता था। यह मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद कठिन समय था।”

झांग हेंग ने कहा कि ऑन-साइट सपोर्ट को लेकर उनकी टीम का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि चीनी उपकरण पूरी लड़ाकू क्षमता के साथ काम करें।

एक दूसरे इंजीनियर जु दा ने जे-10सीई लड़ाकू विमान की तुलना “बच्चे” से की। उन्होंने कहा, “हमने इसे पाला, इसकी देखभाल की और फिर यूजर को सौंप दिया। अब यह अपनी सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रहा था।”

उन्होंने यह भी कहा कि जे-10सीई के प्रदर्शन से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उनके मुताबिक विमान को सिर्फ सही मौका चाहिए था।

ये दोनों इंजीनियर जे-10सीई के मेंटेनेंस, सॉफ्टवेयर अपडेट, हार्डवेयर सपोर्ट, पीएल-15 मिसाइलों के इंटीग्रेशन और AESA रडार की परफॉर्मेंस सुनिश्चित करने के लिए पाकिस्तान गए थे। उन्होंने पाकिस्तानी ग्राउंड क्रू और पायलटों के साथ मिलकर काम किया था।

क्या है जे-10सीई लड़ाकू विमान

जे-10सीई चीन के जे-10सी फाइटर जेट का एक्सपोर्ट वर्जन है। इसे 4.5 जनरेशन मल्टी रोल फाइटर माना जाता है। इसमें एईएसए रडार लगा है, जो दुश्मन के विमान को काफी दूर से ट्रैक कर सकता है। यह पीएल-15 जैसी लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल ले जा सकता है। पीएल-15 मिसाइल की रेंज 200 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है। कई विशेषज्ञ इसे यूरोप की मीटियोर मिसाइल के बराबर या उससे बेहतर मानते हैं।

पाकिस्तान ने 2020 में चीन से 36 जे-10सीई विमान और 250 पीएल-15 मिसाइलें खरीदी थीं। चीन के बाहर पाकिस्तान ही इस विमान का सबसे बड़ा ऑपरेटर है।

भारत ने पहले ही लगाए थे आरोप

इससे पहले पिछले साल भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने पहले ही चीन पर पाकिस्तान को मदद देने का आरोप लगाया था।

भारतीय सेना के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने जुलाई 2025 में कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन से रियल टाइम इंटेलिजेंस मिल रही थी।

उन्होंने कहा था कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच डीजीएमओ स्तर की बातचीत चल रही थी, तब पाकिस्तान को भारतीय सैन्य गतिविधियों की लाइव जानकारी चीन से मिल रही थी।

लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने इसे “वन बॉर्डर, टू एडवर्सरीज” की स्थिति बताया था। उनके मुताबिक पाकिस्तान सामने था, लेकिन चीन पूरी तरह उसकी मदद कर रहा था।

सैटेलाइट और रडार सपोर्ट दिया

सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज (CENJOWS) के डीजी मेजर जनरल अशोक कुमार ने भी मई 2025 में दावा किया था कि चीन ने पाकिस्तान को सैटेलाइट और रडार सपोर्ट दिया। उन्होंने कहा था कि चीन ने भारत पर अपनी सैटेलाइट निगरानी बढ़ाई और पाकिस्तान को भारतीय सैनिकों और एयर मूवमेंट की जानकारी दी।

कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि चीन के बेइदोउ सैटेलाइट सिस्टम और याओगन-गाओफेन सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल पाकिस्तान की मदद के लिए किया गया।

चीन-पाकिस्तान रक्षा साझेदारी कितनी गहरी

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया। चीन ने पाकिस्तान को जेएफ-17 लड़ाकू विमान, अवाक्स सिस्टम, ड्रोन, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम भी दिए हैं। जेएफ-17 लड़ाकू विमान तो चीन और पाकिस्तान ने मिलकर तैयार किया था। अब जे-10सीई पाकिस्तान वायुसेना का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है।

रक्षा मंत्री बोले- दुश्मन को चौंकाने की रणनीति पर काम करें सेनाएं, ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया भारत का ‘न्यू मिलिट्री मॉडल’

Operation Sindoor New War Strategy
Raksha Mantri Rajnath Singh

Operation Sindoor New War Strategy: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना की सोच और तैयारी को पूरी तरह से बदल दिया है। ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरा होने के मौके पर जयपुर में आयोजित जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 में रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसके जरिए भारत ने दुनिया को अपनी नई सैन्य ताकत और रणनीति से परिचित कराया।

Operation Sindoor New War Strategy: आधुनिक युद्ध के लिए तैयार भारत

उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन कम समय का था, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा रहा। भारतीय सेनाओं ने बेहद तेज, सटीक और संयुक्त तरीके से कार्रवाई करते हुए दुश्मन को झुकने पर मजबूर कर दिया। रक्षा मंत्री के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया कि भारत अब आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा है।

जयपुर में हुई इस कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में तीनों सेनाओं के टॉप कमांडर्स शामिल हुए। जयपुर में हुई इस कॉन्फ्रेंस में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी, सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह मौजूद रहे। इसके अलावा रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत और रक्षा मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए।

इस बैठक में भविष्य के युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर खतरे, डेटा आधारित युद्ध, स्पेस और मल्टी डोमेन ऑपरेशन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।

“ऑपरेशन सिंदूर भारत की नई सैन्य सोच का प्रतीक”

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की “कलेक्टिव रिजॉल्व” यानी राष्ट्रीय संकल्प और नई सैन्य सोच को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने इसे “शॉर्ट ड्यूरेशन, डीप पेनिट्रेशन, हाई इंटेंसिटी और हाई इम्पैक्ट ऑपरेशन” बताया।

रक्षा मंत्री के मुताबिक भारतीय सेनाओं ने बेहद कम समय में पाकिस्तान में अंदर तक पहुंचकर सटीक कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन इस बात का उदाहरण है कि तीनों सेनाएं अब पहले की तुलना में ज्यादा तालमेल के साथ काम कर रही हैं।

राजनाथ सिंह ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर भारत की तेज, सटीक और संयुक्त सैन्य प्रतिक्रिया का उदाहरण है। इसने दिखाया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाने में सक्षम है।”

Operation Sindoor New War Strategy
Raksha Mantri Rajnath Singh

बदल रहा है युद्ध का तरीका

रक्षा मंत्री ने कहा कि दुनिया में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब सिर्फ टैंक, मिसाइल और लड़ाकू विमान ही निर्णायक नहीं रह गए हैं। आधुनिक युद्ध में डेटा, साइबर नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्पेस टेक्नोलॉजी की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध “हाइब्रिड थ्रेट” से प्रभावित होंगे। यानी दुश्मन केवल सीमा पर हमला नहीं करेगा, बल्कि साइबर अटैक, फेक इंफॉर्मेशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और डेटा नेटवर्क को भी निशाना बना सकता है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि अब युद्ध जमीन, समुद्र और हवा तक सीमित नहीं रह गया है। साइबर, स्पेस, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और कॉग्निटिव डोमेन भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

एआई और ऑटोनॉमस सिस्टम पर जोर

कॉन्फ्रेंस के दौरान रक्षा मंत्री ने सेना को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम और ऑटोनॉमस प्लेटफॉर्म पर तेजी से काम करने को कहा। उन्होंने कहा कि भारत को एआई, डेटा एनालिटिक्स और सिक्योर कम्युनिकेशन नेटवर्क में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।

उनके मुताबिक आधुनिक युद्ध में वही देश आगे रहेगा जिसके पास बेहतर डेटा, तेज कम्युनिकेशन और स्मार्ट सिस्टम होंगे। उन्होंने कहा कि सेना को ऐसे सिस्टम तैयार करने होंगे जो दुश्मन की गतिविधियों की रियल टाइम जानकारी दे सकें और तेजी से निर्णय लेने में मदद करें।

रक्षा मंत्री ने की जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन की तारीफ

राजनाथ सिंह ने कहा कि आने वाले समय की लड़ाई केवल हथियारों की ताकत से नहीं जीती जाएगी। उन्होंने कहा कि नई सोच, बेहतर तालमेल और तकनीक का सही इस्तेमाल सबसे बड़ा हथियार होगा।

उन्होंने तीनों सेनाओं के बीच बढ़ते जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन की तारीफ की। रक्षा मंत्री ने कहा कि अब सेना, नौसेना और वायुसेना पहले की तरह अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा नेटवर्क के रूप में काम कर रही हैं।

उन्होंने कहा, “भविष्य की जंग केवल हथियारों से नहीं, बल्कि इनोवेटिव सोच और बेहतर तालमेल से जीती जाएगी।”

दुश्मन को चौंकाने की रणनीति पर जोर

रक्षा मंत्री ने कमांडरों से कहा कि आधुनिक युद्ध में “एलिमेंट ऑफ सरप्राइज” यानी दुश्मन को चौंकाने की क्षमता बेहद अहम है।

उन्होंने कहा कि भारतीय सेनाओं को हमेशा ऐसा कदम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए जिसकी दुश्मन को उम्मीद न हो। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सेनाओं को दुश्मन की रणनीति को समझकर उससे “दो कदम आगे” रहना होगा।

राजनाथ सिंह ने कहा कि युद्ध के दौरान अप्रत्याशित तरीके से कार्रवाई करना रणनीतिक बढ़त दिलाता है।

ऑपरेशन सिंदूर पर बनी डॉक्यूमेंट्री भी जारी

कॉन्फ्रेंस के दौरान रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर बनी एक विशेष डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी जारी की। इस फिल्म में ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेनाओं की तैयारी, समन्वय और कार्रवाई को दिखाया गया।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह फिल्म भारतीय सेनाओं की ऑपरेशनल तैयारी और निर्णायक प्रतिक्रिया क्षमता को दर्शाती है।

इसके साथ ही “विजन 2047” का हिंदी संस्करण और “जॉइंट डॉक्ट्रिन फॉर इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर” भी जारी किया।

अधिकारियों के अनुसार यह डॉक्ट्रिन भविष्य के मल्टी डोमेन ऑपरेशन के दौरान तीनों सेनाओं के बीच बेहतर कम्युनिकेशन और तालमेल बनाने में मदद करेगी।

साइबर और क्वांटम खतरों पर भी चर्चा

कॉन्फ्रेंस में साइबर सुरक्षा को लेकर भी लंबी चर्चा हुई। वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में साइबर अटैक सबसे बड़ा खतरा बन सकते हैं।

बैठक में क्वांटम टेक्नोलॉजी और एआई आधारित साइबर खतरों से निपटने की रणनीतियों पर भी विचार किया गया। अधिकारियों के मुताबिक सेना अब ऐसे सिस्टम विकसित कर रही है जो दुश्मन के साइबर हमलों से सैन्य नेटवर्क और कम्युनिकेशन सिस्टम को सुरक्षित रख सकें।

मल्टी डोमेन ऑपरेशन पर फोकस

इस बार की कमांडर्स कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय “मिलिट्री कैपेबिलिटी इन न्यू डोमेन्स” रखा गया था। इसमें मल्टी डोमेन ऑपरेशन पर खास जोर दिया गया।

सेना के अधिकारियों ने बताया कि अब युद्ध के दौरान जमीन, समुद्र, हवा, साइबर और स्पेस में एक साथ कार्रवाई की जरूरत होगी। इसी वजह से भारतीय सेना तेजी से डेटा सेंट्रिक और नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर की तरफ बढ़ रही है।

बैठक में इंटेलिजेंस फ्यूजन, ऑपरेशनल प्लानिंग और इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट से जुड़े एडवांस सिस्टम्स का प्रदर्शन भी किया गया।

Explained: क्या है भारतीय सेनाओं की नई MUM-T डॉक्ट्रिन? ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्यों बदल रही है वॉर स्ट्रैटेजी

MUM-T Doctrine India
CDS rGeneral Anil Chauhan released doctrine on Joint Primer on Manned and Unmanned Teaming (MUM-T)

MUM-T Doctrine India: भारतीय सेना अब जंग के पुराने तरीकों से आगे बढ़कर नई तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम पर तेजी से काम कर रही है। जयपुर में आयोजित जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 के दौरान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कई अहम मिलिटरी डॉक्यूमेंट्स जारी किए। इनमें सबसे अहम डॉक्ट्रिन “जॉइंट प्राइमर ऑन मैनड एंड अनमैनड टीमिंग” (MUM-T) भी शामिल है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ एक नई गाइडलाइन नहीं, बल्कि भारत की पूरी युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव है।

जयपुर में हुई इस कॉन्फ्रेंस में जनरल अनिल चौहान ने “मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी” और “बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ सर्विसेज ड्यूटी पैम्फलेट” भी जारी किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल टैंक, लड़ाकू विमान और सैनिकों के दम पर नहीं लड़े जाएंगे। बल्कि अब ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिस्टम और डेटा आधारित नेटवर्क भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

सीडीएस ने साफ कहा कि यह बदलाव केवल प्रक्रियाओं का अपडेट नहीं है, बल्कि भारत की “वारफाइटिंग फिलॉसफी” यानी युद्ध लड़ने की सोच में बड़ा परिवर्तन है।

क्या है MUM-T Doctrine India

MUM-T का पूरा नाम “मैनड एंड अनमैनड टीमिंग” है। इसका मतलब है इंसानों द्वारा चलाए जाने वाले मिलिट्री प्लेटफॉर्म और बिना पायलट वाले सिस्टम का एक साथ मिलकर काम करना। MUM-T फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करेगा।

इसमें लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक या दूसरे सैन्य प्लेटफॉर्म के साथ ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम जोड़े जाएंगे। युद्ध के दौरान इंसान और मशीन दोनों मिलकर ऑपरेशन को अंजाम देंगे।

MUM-T सिस्टम के तहत एक लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर या दूसरा मैनड प्लेटफॉर्म एक साथ कई ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम को कंट्रोल कर सकेगा। यानी एक पायलट अपने साथ उड़ रहे 4 से 10 या उससे ज्यादा ड्रोन को ऑपरेशन के दौरान निर्देश दे पाएगा। इससे सेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके की तरफ जा रहा है, तो उसके साथ कई ड्रोन भी उड़ सकते हैं। ये ड्रोन पहले दुश्मन की लोकेशन, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाएंगे। कुछ ड्रोन दुश्मन के रडार को कन्फ्यूज्ड करेंगे, जबकि कुछ सीधे हमला भी कर सकते हैं। इस दौरान असली फाइटर जेट सुरक्षित दूरी पर रहेगा।

सूत्रों का कहना है कि इससे पायलट और सैनिकों का जोखिम काफी कम हो जाएगा। हाई थ्रेट एरिया यानी जहां दुश्मन का मजबूत एयर डिफेंस मौजूद हो, वहां सबसे पहले अनमैन्ड सिस्टम और ड्रोन भेजे जाएंगे।

अंतिम फैसला इंसान ही लेगा

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि MUM-T प्राइमर मानव दिमाग की समझ और मशीन की सटीकता को एक साथ जोड़ने का स्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि अब भारत ऐसे “सॉवरेन एआई ड्रिवन सिस्टम” पर काम कर रहा है, जो पूरी तरह भारतीय कंट्रोल में होंगे और युद्ध के दौरान मैनड प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करेंगे।

सेना के अधिकारियों के मुताबिक आधुनिक युद्ध में कुछ सेकंड की देरी भी भारी पड़ सकती है। ऐसे में एआई आधारित सिस्टम तेजी से डेटा प्रोसेस कर कमांडरों की मदद करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से युद्ध के दौरान फैसले लेने की रफ्तार भी तेज होगी। सेना इसे OODA लूप कहती है, यानी स्थिति को देखना, समझना, फैसला लेना और तुरंत कार्रवाई करना। एआई सिस्टम तेजी से डेटा एनालिसिस कर कमांडरों को तुरंत जानकारी देंगे, जिससे सटीक और तेज कार्रवाई संभव होगी।

ड्रोन और लॉयल विंगमैन सिस्टम पर बढ़ा फोकस

भारतीय सेना पहले से ही कई अनमैन्ड सिस्टम पर काम कर रही है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का “कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम” (कैट्स वॉरियर) भी शामिल है। जिसमें लॉयल विंगमैन ड्रोन जैसे CATS Warrior, Hunter और Alfa-S जैसे अनमैन्ड सिस्टम तेजस या दूसरे लड़ाकू विमानों के साथ के साथ इंटीग्रेट होंगे। ये ड्रोन मुख्य विमान के साथ रहकर कई तरह के काम करेंगे। इनमें निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, दुश्मन के रडार की पहचान और हमला शामिल हो सकता है। “लॉयल विंगमैन” कॉन्सेप्ट में ड्रोन लड़ाकू विमान के साथ उड़ते हैं और उसके लिए सुरक्षा, निगरानी और हमला जैसे काम करते हैं।

सेना का मानना है कि आधुनिक युद्ध में अब केवल महंगे लड़ाकू विमान और बड़े हथियारों पर निर्भरता नहीं रह गई है। भविष्य के युद्धों में स्वार्म ड्रोन यानी बड़ी संख्या में एक साथ उड़ने वाले ड्रोन भी बड़ी भूमिका निभाएंगे। स्वार्म अटैक यानी एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन भेजकर दुश्मन के सिस्टम पर दबाव बनाया जा सकता है।

भारतीय सेना भी टैक्टिकल यूएवी, लॉइटरिंग म्यूनिशन और अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स को इन्फैंट्री और आर्मर्ड यूनिट्स के साथ जोड़ने पर काम कर रही है। यानी भविष्य में सैनिकों और टैंकों के साथ रोबोटिक सिस्टम और ड्रोन भी ऑपरेशन का हिस्सा होंगे।

वहीं, भारतीय नौसेना भी इस दिशा में आगे बढ़ रही है। नौसेना जहाजों के साथ यूएवी और अनमैन्ड सरफेस व्हीकल्स यानी बिना चालक वाली बोट्स को जोड़ने की तैयारी कर रही है, ताकि समुद्र में निगरानी और हमले की क्षमता बढ़ाई जा सके।

डीआरडीओ भी कई बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इनमें तपस ड्रोन, घातक यूसीएवी और अस्त्र आधारित कामिकाजे ड्रोन जैसे सिस्टम शामिल हैं। इनका इस्तेमाल निगरानी, दुश्मन की पहचान और सटीक हमलों के लिए किया जाएगा।

इसके साथ ही भारत सुरक्षित और तेज डाटा लिंक सिस्टम पर भी काम कर रहा है। बीईएल और एल एंड टी जैसी भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर हाई-बैंडविड्थ डाटा लिंक तैयार किए जा रहे हैं। इनके जरिए रियल टाइम वीडियो फीड, सेंसर डेटा और ड्रोन कंट्रोल संभव होगा। शुरुआत में इन्हें सुखोई-30 एमकेआई, तेजस, एलसीएच और एएमसीए जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ जोड़ा जाएगा।

MUM-T प्राइमर इन सभी को एक मिलिट्री स्ट्रक्चर देने का काम करेगा। इसके जरिए कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स, अलग-अलग सेनाओं के बीच तालमेल और ऑपरेशन के नियमों को एक समान बनाया जाएगा।

सूत्रों का कहना है कि MUM-T प्राइमर के जरिए ट्रेनिंग, सैन्य अभ्यास, हथियार खरीद और रिसर्च से जुड़ी गाइडलाइंस भी तय की जाएंगी। इसके तहत भविष्य में जॉइंट MUM-T वॉर गेम्स और एक्सरसाइज भी कराए जाएंगे, जहां सैनिक और ड्रोन मिलकर ऑपरेशन का अभ्यास करेंगे।

मल्टी डोमेन ऑपरेशन का है हिस्सा

यह पूरी व्यवस्था मल्टी डोमेन ऑपरेशन (MDO) का हिस्सा है, जिसे 2025 में जारी किया गया था। इसका मकसद यह है कि जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे सभी क्षेत्रों में एक साथ मिलकर युद्ध लड़ा जा सके। सेना के अधिकारियों के मुताबिक 2026 को “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिक वॉरफेयर” का साल माना जा रहा है, जहां सबसे बड़ी ताकत केवल हथियार नहीं बल्कि सही समय पर सही डेटा होगा।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान का मानना है कि MUM-T भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोनॉमस सिस्टम और स्वार्म ड्रोन जैसी नई तकनीकों में आगे ले जाएगा। खास तौर पर चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों को देखते हुए भारत तेजी से ऐसे सिस्टम डेवलप कर रहा है, जो युद्ध के दौरान तेज और सटीक कार्रवाई कर सकें।

ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

जयपुर में जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस ऐसे समय में हो रही है, जब ऑपरेशन सिंदूर को एक साल पूरा हुआ है। इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेना ने मल्टी डोमेन ऑपरेशन का इस्तेमाल किया था। सेना के अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों को भी इस प्राइमर में शामिल किया गया है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब साइबर स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और डेटा नेटवर्क भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

क्या है मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी

कॉन्फ्रेंस के दौरान जारी की गई “मिलिट्री साइबर स्पेस पॉलिसी” भी काफी अहम मानी जा रही है। इसके जरिए सेना अपने साइबर नेटवर्क और सैन्य डेटा को सुरक्षित रखने की रणनीति पर काम करेगी।

आधुनिक युद्ध में साइबर अटैक बड़ा खतरा बन चुके हैं। दुश्मन किसी देश के कम्युनिकेशन सिस्टम, रडार नेटवर्क, सैटेलाइट लिंक और एयर डिफेंस नेटवर्क को निशाना बना सकता है।

इसी वजह से भारतीय सेना अब साइबर सुरक्षा को युद्ध का अहम हिस्सा मान रही है।

अधिकारियों के मुताबिक इस पॉलिसी के तहत आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की साइबर यूनिट्स मिलकर काम करेंगी। इसमें डीआरडीओ, एनटीआरओ और दूसरी राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ भी तालमेल बढ़ाया जाएगा।

बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ पैम्फलेट क्यों अहम

कॉन्फ्रेंस में जारी किया गया “बाइलिंगुअल जॉइंट स्टाफ सर्विसेज ड्यूटी पैम्फलेट” को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में तैयार किया गया है ताकि तीनों सेनाओं के अधिकारी एक जैसी प्रक्रिया और शब्दावली का इस्तेमाल कर सकें। अधिकारियों का मानना है कि इससे आपसी तालमेल बेहतर होगा।

Explained: क्या है DRDO का नया हथियार TARA? जो साधारण बम को बना देता है स्मार्ट, जगुआर से हुआ सफल ट्रायल

TARA Glide Weapon System
TARA Glide Weapon System

TARA Glide Weapon System: डीआरडीओ और भारतीय वायुसेना ने 7 मई को ओडिशा तट के पास “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” यानी तारा (TARA) वेपन सिस्टम का पहला सफल फ्लाइट ट्रायल किया। यह भारत का पहला स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम है, जो साधारण बमों को लंबी दूरी तक मार करने वाले प्रिसिजन वेपन्स में बदल सकता है।

तारा एक मॉड्यूलर रेंज एक्सटेंशन किट है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसा सिस्टम है, जिसे सामान्य बमों पर लगाया जाता है और फिर वही बम “स्मार्ट प्रिसीजन वेपन” बन जाता है। इसकी मदद से वायुसेना दुश्मन के ठिकानों पर ज्यादा दूरी से और ज्यादा सटीक हमला कर सकती है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण पर डीआरडीओ, वायुसेना और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों को बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

क्या है TARA Glide Weapon System?

तारा यानी “टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन” एक ग्लाइड वेपन सिस्टम है। इसे खास तौर पर इस तरह बनाया गया है कि पुराने और साधारण बमों को भी आधुनिक “प्रिसीजन गाइडेड वेपन” में बदला जा सके।

आमतौर पर जब कोई साधारण बम जहाज से गिराया जाता है, तो वह सीधे नीचे गिरता है और उसकी दूरी सीमित होती है। लेकिन तारा किट लगने के बाद वही बम हवा में लंबी दूरी तक ग्लाइड कर सकता है और तय टारगेट तक पहुंच सकता है।

यही वजह है कि इसे “रेंज एक्सटेंशन किट” कहा जा रहा है। यह बम की मारक दूरी और सटीकता दोनों बढ़ा देता है।

डीआरडीओ ने किया डिजाइन

तारा सिस्टम को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने तैयार किया है। यह डीआरडीओ की प्रमुख लैब मानी जाती है, जो मिसाइल गाइडेंस, नेविगेशन और एवियोनिक्स सिस्टम पर काम करती है।

तारा (TARA) प्रोजेक्ट को सबसे पहले 2022 में गणतंत्र दिवस परेड की झांकी में दिखाया गया था। उसी समय पहली बार सार्वजनिक तौर पर इस नए स्वदेशी ग्लाइड वेपन सिस्टम की जानकारी सामने आई थी।

इसके बाद 2023 और 2024 के दौरान इसके ग्राउंड फिटमेंट ट्रायल किए गए। इन परीक्षणों में तारा सिस्टम को जगुआर और मिग-29के जैसे लड़ाकू विमानों पर लगाकर जांचा गया कि यह विमान के साथ सही तरीके से फिट और काम कर रहा है या नहीं।

इस परियोजना में सिर्फ आरसीआई ही नहीं, बल्कि डीआरडीओ की दूसरी लैब्स जैसे डीआरडीएल और एएसएल ने भी अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा कई निजी भारतीय कंपनियां भी इससे जुड़ी रहीं। अपोलो माइक्रो सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने इसमें इस्तेमाल होने वाले एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तैयार करने में सहयोग दिया।

साधारण बम कैसे बनता है स्मार्ट हथियार?

तारा का सबसे अहम हिस्सा उसका “गाइडेंस और ग्लाइड सिस्टम” है। तारा के डिजाइन में खास एरोडायनामिक सिस्टम लगाए गए हैं। इसके पीछे कंट्रोल फिन्स और विंग्स लगे होते हैं, जो इसे हवा में ज्यादा स्थिर और लंबी दूरी तक ग्लाइड करने में मदद करते हैं। यह डिजाइन दुश्मन के रडार से बचने में भी मदद करता है।

जब विमान से बम छोड़ा जाता है, तो ये विंग्स खुल जाते हैं और बम हवा में आगे की तरफ ग्लाइड करने लगता है। इसके बाद गाइडेंस सिस्टम उसे लक्ष्य तक पहुंचाता है। इस पूरी प्रक्रिया में इंजन का इस्तेमाल नहीं होता। यही वजह है कि इसे “ग्लाइड बम” कहा जाता है।

वहीं, जब तारा अपने टारगेट के करीब पहुंचता है, तो वह उड़ान के अंतिम चरण में दिशा बदलने और खुद को एडजस्ट करने की क्षमता रखता है। इससे लक्ष्य पर ज्यादा सटीक हमला करना संभव होता है।

कितनी दूरी तक कर सकता है हमला?

तारा की आधिकारिक रेंज सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह लगभग 150 से 180 किलोमीटर तक मार कर सकता है। अगर तारा को 5 किलोमीटर की ऊंचाई से और तेज रफ्तार में लॉन्च किया जाए, तो यह काफी दूर तक ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंच सकता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की सीमा से बाहर रहते हुए हमला कर सकते हैं। इसे लगाने के बाद विमान को दुश्मन के बेहद करीब जाने की जरूरत नहीं होगी। वह दूर से ही बम छोड़ सकेगा और तारा सिस्टम उसे टारगेट तक पहुंचा देगा।

अलग-अलग वर्जन में तैयार

तारा को अलग-अलग वजन वाले बमों के लिए तैयार किया गया है। इसमें 250 किलोग्राम, 450 किलोग्राम और 500 किलोग्राम वाले वर्जन शामिल हैं। यानी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग मिशन में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। छोटे लक्ष्य के लिए हल्का वर्जन इस्तेमाल होगा, जबकि मजबूत बंकर या बड़े सैन्य ठिकानों के लिए भारी वर्जन काम आएंगे।

दिन और रात दोनों समय करेगा काम

तारा में एडवांस गाइडेंस सिस्टम लगाया गया है। इसमें जीपीएस, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड तकनीक शामिल है। इस वजह से यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकता है। खराब मौसम में भी इसकी प्रिसीजन क्षमता बनी रहती है।

सूत्रों के मुताबिक यह सिस्टम लक्ष्य को बहुत कम गलती के साथ हिट कर सकता है। इसकी सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) 5 मीटर से कम से कम है।

किन विमानों से किया जा सकेगा इस्तेमाल?

तारा को भारतीय वायुसेना के कई लड़ाकू विमानों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें जगुआर, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000 और एलसीए तेजस जैसे विमान शामिल हैं। 2025 में इसके कुछ परीक्षण जगुआर विमान पर किए जा चुके थे। अब सफल फ्लाइट ट्रायल के बाद इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।

आज किस जहाज से हुआ ट्रायल

7 मई को हुआ तारा (TARA) वेपन सिस्टम का ट्रायल भारतीय वायुसेना के जगुआर लड़ाकू विमान से किया गया। TARA 500 सिस्टम जगुआर विमान के विंग के नीचे लगे पाइलॉन पर फिट किया गया है।

इससे पहले 2025 में इसके “कैप्टिव कैरी ट्रायल” भी जगुआर पर किए गए थे। इन ट्रायल्स में हथियार को विमान के साथ लगाकर उड़ाया गया था, लेकिन उसे छोड़ा नहीं गया था। इसका मकसद यह जांचना था कि विमान और हथियार का इंटीग्रेशन सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं।

जगुआर को भारतीय वायुसेना में “शमशेर” के नाम से भी जाना जाता है। यह विमान लंबे समय से डीप स्ट्राइक और ग्राउंड अटैक मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसी वजह से तारा जैसे प्रिसीजन ग्लाइड वेपन के परीक्षण के लिए इसे उपयुक्त प्लेटफॉर्म माना गया।

क्यों अहम माना जा रहा है यह सिस्टम?

आधुनिक युद्ध में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम लगातार मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में लड़ाकू विमानों के लिए सीधे दुश्मन के ऊपर जाकर हमला करना ज्यादा जोखिम भरा हो गया है।

इसी वजह से दुनिया की बड़ी वायु सेनाएं अब “स्टैंड-ऑफ वेपन” पर जोर दे रही हैं। यानी ऐसे हथियार जो लंबी दूरी से दागे जा सकें।

तारा इसी श्रेणी का सिस्टम माना जा रहा है। इससे भारतीय वायुसेना की “डीप स्ट्राइक” क्षमता मजबूत होगी। यानी दुश्मन के अंदर मौजूद ठिकानों पर भी सुरक्षित दूरी से हमला किया जा सकेगा।

कम लागत में बड़ा फायदा

तारा की एक बड़ी खासियत इसकी कम लागत भी मानी जा रही है। आमतौर पर लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें काफी महंगी होती हैं। लेकिन तारा पुराने बमों को ही स्मार्ट हथियार में बदल देता है। इससे लागत कम हो जाती है। और वायुसेना को पूरी तरह नए हथियार खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम कम लागत में ज्यादा असर देने की रणनीति का हिस्सा है।

कई देशों के पास है यह सिस्टम

दुनिया के कई देशों के पास ऐसे ग्लाइड बम सिस्टम पहले से मौजूद हैं। तारा (TARA) को आसान भाषा में समझें तो यह अमेरिका के जेडीएएम और इजरायल के स्पाइस-1000 जैसे स्मार्ट ग्लाइड बम सिस्टम की तरह है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है।

डीआरडीओ के दूसरे ग्लाइड बम “गौरव” की तुलना में तारा आकार में छोटा और ज्यादा टैक्टिकल सिस्टम माना जा रहा है। वहीं एसएएडब्ल्यू यानी स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन जहां खास तौर पर एयरबेस और रनवे को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया था, वहीं तारा का मुख्य फोकस साधारण बमों की मारक दूरी बढ़ाना और उन्हें ज्यादा सटीक बनाना है।

इसका डिजाइन मॉड्यूलर रखा गया है। यानी जरूरत के हिसाब से इसमें नए सेंसर, गाइडेंस सिस्टम या दूसरे अपग्रेड आसानी से जोड़े जा सकते हैं।

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी दुश्मन द्वारा जीपीएस और गाइडेंस सिस्टम को जाम करने की कोशिश बड़ी समस्या बन चुकी है। ऐसे में हथियार की प्रिसिजन क्षमता बनाए रखना जरूरी होता है। इसी वजह से तारा में डुअल और ट्राई-मोड गाइडेंस जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। वहीं भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टारगेटिंग और ज्यादा एडवांस सेंसर जैसी तकनीकें भी जोड़ी जा सकती हैं।

रक्षा मंत्रालय ने तारा सिस्टम के लिए भारतीय उद्योगों के साथ मिलकर उत्पादन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कई निजी कंपनियां और रक्षा क्षेत्र की भारतीय फर्म इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं। इससे देश में रक्षा उत्पादन और तकनीकी क्षमता दोनों बढ़ेंगी।

TARA Explained: India’s Indigenous Glide Weapon System Successfully Tested From Jaguar Fighter Jet.

उड़ने वाला ‘कलाश्निकोव’ बना भारत का नया हथियार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा प्रोडक्शन

IG Defence Kamikaze Drone
IG Defence Kamikaze Drone

IG Defence Kamikaze Drone: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने जिस तरह बड़े पैमाने पर ड्रोन और प्रिसीजन स्ट्राइक सिस्टम का इस्तेमाल किया, उसके बाद देश में स्वदेशी कामिकाजे ड्रोन की मांग तेजी से बढ़ गई है। भारतीय कंपनी आईजी डिफेंस ने दावा किया है कि वह अब रोजाना 200 एफपीवी कामिकाजे ड्रोन तैयार कर रही है। कंपनी को भारतीय सेना और नौसेना से 5000 से ज्यादा ड्रोन का बड़ा ऑर्डर भी मिला है।

पहले आईजी ड्रोंस के नाम से पहचान रखने वाली यह कंपनी अब भारतीय रक्षा क्षेत्र में तेजी से उभरती हुई कंपनियों में गिनी जा रही है। कंपनी के ड्रोन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस्तेमाल किए गए थे। इन ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, टारगेट की पहचान और सटीक हमलों के लिए किया गया।

IG Defence Kamikaze Drone: ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ड्रोन वॉरफेयर की ताकत

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर को भारत का बड़ा मल्टी-डोमेन ऑपरेशन माना जाता है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू हुए इस अभियान में सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर कार्रवाई की थी। इस ऑपरेशन में ड्रोन वॉरफेयर की भूमिका काफी अहम रही।

भारतीय सेना ने कई स्वदेशी ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल किया। इनमें एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू कामिकाजे ड्रोन भी शामिल थे। इन ड्रोन की मदद से दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करना आसान हुआ।

आईजी डिफेंस के मुताबिक कंपनी के ड्रोनों ने ऑपरेशन के दौरान आईएसआर यानी इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस मिशन में मदद की। इसके अलावा प्रिसीजन स्ट्राइक और टारगेट ट्रैकिंग में भी इनका इस्तेमाल किया गया।

क्या होता है एफपीवी कामिकाजे ड्रोन

एफपीवी कामिकाजे ड्रोन को ऑपरेटर लाइव वीडियो फीड के जरिए कंट्रोल करता है। इसमें कैमरा लगा होता है और ऑपरेटर को ऐसा विजुअल दिखाई देता है जैसे वह खुद ड्रोन के अंदर बैठा हो।

यह ड्रोन सीधे टारगेट से टकराकर विस्फोट करता है। इसी वजह से इसे कामिकाजे ड्रोन कहा जाता है। आधुनिक युद्ध में ऐसे ड्रोन तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं क्योंकि ये कम लागत में बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं।

“ड्रोन युग का कलाश्निकोव”

आईजी डिफेंस अपने एफपीवी स्ट्राइकर ड्रोन को “ड्रोन युग का कलाश्निकोव” बताती है। कंपनी का कहना है कि यह ड्रोन सस्ता, हल्का और बड़े पैमाने पर तेजी से तैयार किया जा सकता है।

कंपनी के मुताबिक यह ड्रोन 15 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक काम कर सकता है। इसकी फ्लाइट टाइम करीब 45 से 50 मिनट तक है। यह लगभग 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक पहुंच सकता है।

इस ड्रोन को ऊंचाई वाले इलाकों में भी सफलतापूर्वक टेस्ट किया गया है। सेना के सूत्रों के मुताबिक इसे एलएसी जैसे कठिन इलाकों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

अलग-अलग तरह के हमले करने में सक्षम

आईजी डिफेंस के एफपीवी ड्रोन में अलग-अलग तरह के वॉरहेड लगाए जा सकते हैं। इसका इस्तेमाल टैंक, बंकर, सैन्य वाहन और दुश्मन की पोस्ट को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

कंपनी का दावा है कि इसके ड्रोन में 95 प्रतिशत से ज्यादा फर्स्ट स्ट्राइक एक्यूरेसी है। यानी पहली बार में ही लक्ष्य को सटीक तरीके से हिट करने की क्षमता।

इन ड्रोन को मोबाइल लॉन्चर, पोर्टेबल सिस्टम और फिक्स्ड प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। यही वजह है कि इन्हें फ्रंटलाइन सैनिक भी आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं।

IG Defence Kamikaze Drone
IG Defence Kamikaze Drone

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी असरदार

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक जामिंग बड़ी चुनौती मानी जाती है। दुश्मन कई बार कम्युनिकेशन और जीपीएस सिस्टम को बाधित करने की कोशिश करता है।

आईजी डिफेंस का कहना है कि उसके ड्रोन जैम-रेजिस्टेंट कम्युनिकेशन सिस्टम के साथ आते हैं। इनमें एआई आधारित स्वार्म कोऑर्डिनेशन तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया है।

कंपनी के अनुसार ये ड्रोन बारिश, बर्फ और अत्यधिक गर्म मौसम में भी काम कर सकते हैं। इन्हें माइनस 20 डिग्री से लेकर 70 डिग्री तापमान तक टेस्ट किया गया है।

रोज 200 ड्रोन बना रही कंपनी

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने बड़ी संख्या में एफपीवी कामिकाजे ड्रोन की मांग की है। इसके बाद आईजी डिफेंस ने अपने प्रोडक्शन को “वार फुटिंग” पर बढ़ा दिया है।

कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल रोजाना करीब 200 ड्रोन तैयार किए जा रहे हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के झांसी और ओडिशा के गंजाम में नई फैक्ट्री लगाने की तैयारी चल रही है।

कंपनी ने इसके लिए करीब 300 करोड़ रुपये से ज्यादा निवेश की योजना बनाई है। लक्ष्य बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ाना है ताकि सेना की जरूरतें तेजी से पूरी की जा सकें।

सेना और नौसेना से मिला बड़ा ऑर्डर

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना और नौसेना ने कंपनी पर भरोसा जताया है। आईजी डिफेंस को 5000 से ज्यादा एफपीवी कामिकाजे ड्रोन का ऑर्डर मिला है।

कंपनी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मेजर जनरल आर.सी. पाढ़ी (रिटायर्ड) ने कहा कि यह ऑर्डर भारतीय सेना के भरोसे को दिखाता है।

उन्होंने कहा, “युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब केवल बड़े हथियार काफी नहीं हैं। कम लागत वाले स्मार्ट ड्रोन की भी बड़ी भूमिका है। हमारे ड्रोन ने हर मौसम और हर इलाके में अच्छा प्रदर्शन किया है।”

इन ड्रोन को पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है। कंपनी का दावा है कि उसके पास 25 से ज्यादा पेटेंट हैं और उसने कई स्वदेशी तकनीकों पर काम किया है।

Operation Sindoor Boosts India’s Kamikaze Drone Power, IG Defence Producing 200 FPV Drones Daily.

पाकिस्तान सीमा पर तैनात होंगे नए स्वदेशी हथियार, सेना को मिले ULPGM मिसाइल और AGNIKAA ड्रोन

ULPGM Missile And AGNIKAA Drone

ULPGM Missile And AGNIKAA Drone: अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड को दो नए स्वदेशी हथियार सिस्टम सौंपे हैं, जिन्हें आधुनिक युद्ध के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। अदाणी डिफेंस ने भारतीय सेना को यूएवी लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल (ULPGM) और अग्निका (AGNIKAA) VTOL-1 एफपीवी कामिकाजे ड्रोन सप्लाई किए हैं। दोनों सिस्टम इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-6 (EP-6) के तहत दिए गए हैं। इनका हैंडओवर हैदराबाद में हुआ।

इन दोनों हथियार प्रणालियों को ऊंचाई वाले इलाकों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर वाले माहौल में सफलतापूर्वक टेस्ट किया जा चुका है। यही वजह है कि इन्हें सीधे ऑपरेशनल जरूरतों के लिए शामिल किया गया है।

इन हथियारों को खास तौर पर ऐसे युद्ध के लिए तैयार किया गया है, जहां दुश्मन जीपीएस सिग्नल को जाम करने, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बाधित करने और हाई वैल्यू टारगेट को छिपाने की कोशिश करता है। भारतीय सेना का मानना है कि ये सिस्टम सीमावर्ती इलाकों में तैनात सैनिकों की ताकत को काफी बढ़ाएंगे।

ULPGM Missile And AGNIKAA Drone: क्या है ULPGM और कैसे करती है काम

ULPGM यानी यूएवी लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल एक हल्की लेकिन बेहद सटीक मिसाइल है, जिसे ड्रोन या छोटे यूएवी से दागा जा सकता है। इसे डीआरडीओ के रिसर्च सेंटर इमारत ने तैयार किया है। इसके निर्माण में अदाणी डिफेंस, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और कई भारतीय एमएसएमई कंपनियों ने मिलकर काम किया है।

यह मिसाइल “फायर एंड फॉरगेट” तकनीक पर आधारित है। यानी मिसाइल लॉन्च होने के बाद खुद अपने लक्ष्य तक पहुंचती है और ऑपरेटर को लगातार उसे कंट्रोल नहीं करना पड़ता।

सेना के अधिकारियों के अनुसार यह मिसाइल छोटे बंकर, दुश्मन की पोस्ट, हल्के बख्तरबंद वाहन और आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत कम नुकसान के साथ सटीक हमला करती है।

ULPGM Missile And AGNIKAA Drone

ULPGM के कई वर्जन

इस मिसाइल के कई वर्जन बनाए गए हैं। शुरुआती मॉडल हल्के वजन का था और उसे ऊंचाई से गिराकर इस्तेमाल किया जाता था। बाद के वर्जन में रॉकेट मोटर जोड़ी गई, जिससे इसकी मारक दूरी बढ़ गई।

सबसे एडवांस वर्जन ULPGM-V3 माना जा रहा है। इसमें हाई डेफिनिशन इंफ्रारेड सीकर, लेजर गाइडेंस और टू-वे डाटा लिंक जैसी तकनीक शामिल है। सेना के सूत्रों के मुताबिक यह मिसाइल दिन और रात दोनों समय इस्तेमाल की जा सकती है।

इसमें अलग-अलग तरह के वॉरहेड लगाए जा सकते हैं। जरूरत के हिसाब से इसे टैंक, बंकर या दुश्मन के सैनिकों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

जीपीएस जाम होने पर भी काम करेगी मिसाइल

आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को माना जाता है। कई बार दुश्मन जीपीएस सिग्नल को जाम कर देता है। ऐसे हालात में सामान्य हथियार टारगेट तक नहीं पहुंच पाते।

लेकिन ULPGM को इस तरह तैयार किया गया है कि यह जीपीएस जाम होने के बाद भी काम कर सके। इसमें इमेजिंग इंफ्रारेड और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल गाइडेंस सिस्टम लगाया गया है। यही वजह है कि इसे इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर वाले माहौल में भी प्रभावी माना जा रहा है।

आसानी से ले जा सकेंगे सैनिक

इस मिसाइल को हल्का और पोर्टेबल बनाया गया है। सेना के जवान इसे आसानी से साथ लेकर चल सकते हैं। इसे क्वाडकॉप्टर, हेक्साकॉप्टर और दूसरे छोटे ड्रोन प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों और सीमा पर छोटी टीमों के लिए यह सिस्टम काफी उपयोगी साबित होगा, क्योंकि इसमें भारी लॉन्चर या बड़े वाहन की जरूरत नहीं पड़ती।

ULPGM Missile And AGNIKAA Drone

AGNIKAA VTOL-1 क्या है

अदाणी डिफेंस ने सेना को जो दूसरा सिस्टम दिया है, वह अग्निका VTOL-1 एफपीवी कामिकाजे ड्रोन है। यह एक ऐसा ड्रोन है, जो लक्ष्य पर जाकर खुद विस्फोट करता है।

यह वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग यानी VTOL तकनीक पर आधारित है। इसका मतलब है कि इसे उड़ान भरने के लिए रनवे की जरूरत नहीं होती। इसे पहाड़ी इलाकों, जंगलों और सीमित जगहों से भी लॉन्च किया जा सकता है।

एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू सिस्टम की वजह से ऑपरेटर को ड्रोन से रियल टाइम वीडियो दिखाई देता है। इससे लक्ष्य पर बेहद सटीक हमला करना आसान हो जाता है।

कामिकाजे ड्रोन कैसे करता है हमला

यह ड्रोन सीधे दुश्मन के लक्ष्य से टकराकर विस्फोट करता है। इसमें करीब एक से डेढ़ किलो तक का वॉरहेड लगाया जा सकता है।

सेना के अधिकारियों के मुताबिक इसका इस्तेमाल दुश्मन के वाहन, रडार, बंकर, कमांड पोस्ट और सैनिकों के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

इस ड्रोन को खास तौर पर फ्रंटलाइन सैनिकों के लिए डिजाइन किया गया है ताकि जरूरत पड़ने पर कुछ मिनटों में इसे लॉन्च किया जा सके।

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी असरदार

AGNIKAA VTOL-1 को एंटी-जैमिंग तकनीक के साथ तैयार किया गया है। यानी दुश्मन अगर कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम करने की कोशिश करे, तब भी यह काम कर सकता है। इसे हाई एल्टीट्यूड और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर वाले माहौल में टेस्ट किया गया है। सेना का कहना है कि यह सिस्टम सीमा पर तेजी से बदलते युद्ध माहौल में काफी उपयोगी रहेगा।

पश्चिमी सीमा पर बढ़ेगी ताकत

दोनों हथियार सिस्टम भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड को दिए गए हैं। यह कमांड पाकिस्तान सीमा से जुड़े इलाकों की जिम्मेदारी संभालती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रेगिस्तानी इलाकों, सीमा चौकियों और संभावित पहाड़ी ऑपरेशन में ये सिस्टम काफी अहम साबित होंगे।

सेना के एक अधिकारी ने बताया कि आधुनिक युद्ध में छोटे लेकिन सटीक हथियारों की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे सिस्टम सैनिकों को कम जोखिम में ज्यादा प्रभावी हमला करने की क्षमता देते हैं।

आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती

इन दोनों सिस्टम को पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है। इसमें डीआरडीओ, अदाणी डिफेंस, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और कई भारतीय स्टार्टअप्स ने योगदान दिया है।

रक्षा मंत्रालय लंबे समय से विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इन स्वदेशी सिस्टम्स को रक्षा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इससे न केवल सेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि भारतीय रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। इसके जरिए देश में नई तकनीक, रोजगार और उत्पादन क्षमता को बढ़ावा मिलेगा।

आधुनिक युद्ध में बढ़ रही ड्रोन और प्रिसीजन हथियारों की भूमिका

हाल के वर्षों में दुनिया के कई संघर्षों में ड्रोन और प्रिसीजन हथियारों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद लगभग हर देश ने छोटे ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है।

भारतीय सेना भी अब ऐसे हथियारों को तेजी से शामिल कर रही है। सेना का मानना है कि भविष्य के युद्ध में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सटीक गाइडेड हथियारों की भूमिका काफी बड़ी होगी।

इसी वजह से अब छोटे, हल्के और सटीक हथियारों पर जोर दिया जा रहा है, जिन्हें सीमित समय में तैनात किया जा सके और दुश्मन को तुरंत निशाना बनाया जा सके।

Adani Defence Delivers Indigenous ULPGM Missiles And AGNIKAA Kamikaze Drones To Indian Army.

ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने क्या सीखा? बना रहा ड्रोन और मिसाइल रोकने वाला नया सुरक्षा कवच

Operation Sindoor Military Strategy
Lieutenant General Rajiv Ghai, Air Marshal Awadhesh Kumar Bharti

Operation Sindoor Military Strategy: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भारतीय सेना और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने पहली बार खुलकर बताया कि इस अभियान से भारत ने क्या सीखा और अब देश की सैन्य रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ रही है। जयपुर में आयोजित एक विशेष प्रेस ब्रीफिंग में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसने भारत की युद्ध नीति, हथियार खरीद रणनीति, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन युद्ध, स्पेस क्षमताओं और मिसाइल स्ट्रक्चर को बदलने का काम किया।

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक के बाद भारत अब अपने मिलिट्री स्ट्रक्चर, हथियार प्रणालियों और ऑपरेशनल तैयारी में बड़े बदलाव कर रहा है।

Operation Sindoor Military Strategy: “ऑपरेशन अभी खत्म नहीं हुआ”

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जब ऑपरेशन सिंदूर की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल पूछा गया, तो अधिकारियों ने साफ संकेत दिया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई अभी रुकी नहीं है।

अधिकारियों ने कहा कि भारत की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लगातार जारी रहेगी। उनके मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर को किसी एक दिन की सैन्य कार्रवाई की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक लंबी रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कहा, “भारत की आतंकवाद के खिलाफ जंग जारी रहेगी। ऑपरेशन उतने समय तक जारी रहेगा, जितनी जरूरत होगी।”

ऑपरेशन सिंदूर से क्या सीखा भारत ने

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इसके बाद पाकिस्तान ने ड्रोन, मिसाइल और अन्य हथियारों के जरिए भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी।

एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि इस पूरे 88 घंटे तक चलते संघर्ष ने भारत को कई महत्वपूर्ण सबक दिए। उन्होंने कहा कि सेना लगातार अपनी ट्रेनिंग, तैयारी और हथियार प्रणालियों की समीक्षा करती रहती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस प्रक्रिया को और तेज किया गया।

उन्होंने कहा, “हम लगातार यह देखते रहते हैं कि हमारी ट्रेनिंग कैसी है, हमारे उपकरण कैसे हैं और हमारी तैयारी किस स्तर की है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी यह प्रक्रिया लगातार चल रही है।”

भरोसेमंद इंटेलिजेंस के लिए आईएसआर पर निवेश

एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना अपनी खरीद रणनीति और सैन्य क्षमताओं को और मजबूत करने पर काम कर रही है। उन्होंने बताया कि भारत के पास जरूरी क्षमताएं तो थीं, लेकिन कुछ सिस्टम्स की संख्या उतनी नहीं थी जितनी बड़े स्तर के ऑपरेशन के लिए होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी कार्रवाई में सही जानकारी और भरोसेमंद इंटेलिजेंस सबसे अहम होती है। अगर दुश्मन के बारे में सही जानकारी ही नहीं होगी, तो सटीक लक्ष्य तय करना मुश्किल हो जाएगा। इसी वजह से भारत अब अपनी आईएसआर यानी इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस क्षमताओं को तेजी से मजबूत कर रहा है।

उन्होंने बताया कि एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट, मेडिकल इवैक्युएशन सिस्टम और दूसरे “फोर्स मल्टीप्लायर” प्लेटफॉर्म्स की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। उनका कहना था कि ये सिस्टम युद्ध के दौरान सेना की पहुंच, निगरानी क्षमता और ऑपरेशनल ताकत को कई गुना बढ़ा देते हैं।

मिसाइल और एयर डिफेंस क्षमताओं को मजबूत करने पर फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मिनवाला ने कहा, “हम ऐसा इंटीग्रेटेड और मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहे हैं, जो ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और मिसाइल जैसे कई तरह के खतरों से एक साथ सुरक्षा दे सके।”

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिले अनुभवों के बाद भारत ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम को और मजबूत बनाने पर तेजी से काम शुरू किया है।

वहीं, एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि भारत लगातार अपनी स्वदेशी मिसाइल और एयर डिफेंस क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। उन्होंने बताया कि स्वदेशी अस्त्र मिसाइल, क्यूआर-एसएएम और दूसरे कई प्रोजेक्ट्स पर लगातार काम चल रहा है। उनका कहना था कि यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है और सेना अपनी क्षमताओं को समय-समय पर बेहतर करती रहती है।

उन्होंने कहा कि आज खतरा तेजी से बदल रहा है। अब सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों का दौर है। इसी वजह से भारत नए सेंसर और एडवांस एयर डिफेंस तकनीकों पर काम कर रहा है, ताकि ऐसी तेज रफ्तार मिसाइलों को भी समय रहते ट्रैक और इंटरसेप्ट किया जा सके।

एस-400 सिस्टम की नई खेप जल्द मिलेगी

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एयर डिफेंस सिस्टम की भूमिका काफी अहम रही। इस पर बोलते हुए अधिकारियों ने बताया कि भारत जल्द ही रूस से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की नई यूनिट्स हासिल करेगा।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि कुछ एस-400 यूनिट्स पहले ही आ चुकी हैं और बाकी यूनिट्स भी अगले कुछ महीनों में भारत को मिल जाएंगी। उन्होंने बताया, “अगले एक महीने के भीतर एस-400 की अगली यूनिट हमारे पास होगी और इस साल के अंत तक आखिरी यूनिट भी मिलने की उम्मीद है।”

एस-400 को दुनिया के सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। यह लंबी दूरी से दुश्मन के विमान, ड्रोन और मिसाइलों को ट्रैक कर उन्हें मार गिराने में सक्षम माना जाता है।

“सुदर्शन चक्र” और “कुशा” पर तेजी से काम

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान अधिकारियों ने पहली बार “सुदर्शन चक्र” और “कुशा” जैसे प्रोजेक्ट्स का भी खुलकर जिक्र किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही “सुदर्शन चक्र” को लेकर दिशा-निर्देश दे चुके हैं और इस पर काम जारी है।

इसके साथ ही स्वदेशी लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम “कुशा” पर भी तेजी से काम हो रहा है। अधिकारियों ने कहा कि अब खतरे बदल रहे हैं। पहले जहां सामान्य मिसाइलें चुनौती थीं, वहीं अब सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों का खतरा बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत ऐसे सेंसर और सिस्टम डेवलप कर रहा है जो इन तेज रफ्तार वाली मिसाइलों का भी समय रहते पता लगा सकें।

ड्रोन वॉरफेयर ने बदली रणनीति

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल किया था। इसके बाद भारत ने ड्रोन और काउंटर ड्रोन सिस्टम (C-UAS) पर अपना फोकस और बढ़ा दिया।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि अब भारत बड़ी संख्या में ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे सिस्टम युद्ध के दौरान सेना की ताकत कई गुना बढ़ा देते हैं। इसके अलावा भारत अब बड़ी संख्या में ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम्स की जरूरत को भी समझ रहा है। इसी वजह से सरकार ड्रोन सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रोत्साहन दे रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर तेजी से बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सके।

उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार की पीएलआई योजना के तहत एमएसएमई और निजी कंपनियों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “अगर युद्ध के समय हमें हजारों ड्रोन की जरूरत पड़े, तो हमारी इंडस्ट्री उन्हें तेजी से बना सके। हम इसी क्षमता को विकसित कर रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब हार्ड किल और सॉफ्ट किल दोनों तरह के काउंटर ड्रोन सिस्टम पर काम कर रहा है।

“हर हथियार का अपना रोल होता है”

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की लागत और सस्ते विकल्पों को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर एयर मार्शल भारती ने कहा कि आधुनिक युद्ध में हाई कॉस्ट और लो कॉस्ट दोनों तरह के हथियार जरूरी होते हैं।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस जैसी हाई एंड मिसाइलों की अपनी अलग भूमिका होती है, जिन्हें सस्ते ड्रोन या छोटे सिस्टम पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा कि ड्रोन और छोटे अनमैन्ड सिस्टम दुश्मन को परेशान कर सकते हैं, लेकिन निर्णायक असर पैदा करने के लिए भारी और ताकतवर हथियारों की जरूरत होती है। ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें बड़े लक्ष्य को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि ब्रह्मोस भारत की स्वदेशी ताकत का बड़ा उदाहरण है और देश को इस पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने बताया कि आने वाले एक-दो साल में कई नए स्वदेशी हथियार सिस्टम भारतीय सेनाओं में शामिल होते दिखाई देंगे।

भारतीय वायुसेना बढ़ा रही अपनी ताकत

एयर मार्शल भारती ने कहा कि भारतीय वायुसेना अब अपनी ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने वाले सिस्टम्स और प्लेटफॉर्म्स पर बड़े स्तर पर काम कर रही है। उन्होंने बताया कि एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट जैसे महत्वपूर्ण “फोर्स मल्टीप्लायर” सिस्टम्स की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ रही है और इसके लिए आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल पहले ही जारी किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि एलसीए मार्क-1ए जल्द वायुसेना में शामिल होगा। इसके अलावा एलसीए मार्क-2 और पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए फाइटर जेट पर भी काम जारी है।

उन्होंने एमआरएफए प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया, जिसके तहत भारतीय वायुसेना 114 नए मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदने की योजना पर काम कर रही है।

उन्होंने कहा कि इस बार वायुसेना के बजट में भी बढ़ोतरी की गई है। पिछले साल जहां लगभग 1.30 लाख करोड़ रुपये का बजट था, वहीं अब यह बढ़कर करीब 1.55 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

मिसाइल फोर्स और नए स्ट्रक्चर पर काम कर रहा भारत

इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान के “न्यूक्लियर ब्लैकमेल” को भी चुनौती दी।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अपने मिसाइल स्ट्रक्चर और रॉकेट फोर्स को मजबूत करने की कोशिश शुरू की है, लेकिन भारत उसकी पूरी क्षमता को अच्छी तरह समझता है।

उन्होंने कहा कि भारत अब पारंपरिक मिसाइल फोर्स और नए स्ट्रक्चर पर भी काम कर रहा है।

मिनवाला ने कहा कि दुनिया में मिसाइलों का इस्तेमाल अब केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है। अब उन्हें पारंपरिक युद्ध में भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “यह एक बड़ा पैराडाइम शिफ्ट है। मिसाइलों की भूमिका अब केवल स्ट्रैटेजिक नहीं रही।”

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि भारत अलग-अलग रेंज और अलग-अलग प्रकार की मिसाइल क्षमताओं पर काम कर रहा है।

उन्होंने कहा कि डीआरडीओ द्वारा हाल के महीनों में किए गए कई परीक्षण इसी दिशा का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के पास पहले से ही प्रभावी डिलीवरी सिस्टम मौजूद हैं और दुश्मन यह जानता है कि भारत के पास मजबूत स्ट्राइक क्षमता है।

India Revamps Military Strategy After Operation Sindoor, Focus on Missiles, Drones and Air Defence.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली भारत की वॉर स्ट्रैटेजी! बना रहा जॉइंट आईएसआर और टारगेटिंग डॉक्ट्रिन, समझें क्या है ये

Operation Sindoor Joint Doctrine
AI-Generated Image

Operation Sindoor Joint Doctrine: भारतीय सेना अब युद्ध की तैयारी केवल सीमा पर सैनिक और हथियार तैनात करके नहीं कर रही, बल्कि पूरा फोकस “जॉइंट वॉरफेयर” पर है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपनी मिलिट्री स्ट्रैटेजी में बड़े बदलाव शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ यानी आईडीएस के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मिनवाला ने खुलासा किया है कि भारत अब जॉइंट आईएसआर डॉक्ट्रिन और जॉइंट टारगेटिंग डॉक्ट्रिन पर तेजी से काम कर रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर का एक साल पूरा होने पर जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान उन्होंने बताया कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना अब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा नेटवर्क के जरिए युद्ध लड़ने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसी तरह के तालमेल ने भारत को तेजी से और सटीक कार्रवाई करने में मदद की।

Operation Sindoor Joint Doctrine: क्या है जॉइंट आईएसआर डॉक्ट्रिन

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि आईएसआर का मतलब होता है इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है दुश्मन की जानकारी जुटाना, उस पर लगातार नजर रखना और उसकी गतिविधियों की टोह लेना। अब तक सेना, नौसेना और वायुसेना अपने-अपने सिस्टम के जरिए यह काम करती थीं। कई बार जानकारी अलग-अलग जगहों पर रहती थी, जिससे फैसले लेने में समय लगता था।

नई जॉइंट आईएसआर डॉक्ट्रिन का मकसद इन सभी सिस्टम्स को एक साथ जोड़ना है। इसका मतलब यह है कि अब सैटेलाइट, ड्रोन, रडार, जासूसी विमान, समुद्री निगरानी सिस्टम और खुफिया एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी एक ही नेटवर्क में आएगी। इससे युद्ध क्षेत्र की पूरी तस्वीर रियल टाइम में तीनों सेनाओं को एक साथ दिखाई देगी।

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

इस नई व्यवस्था में कई तरह की तकनीकों को जोड़ा जा रहा है। इसमें स्पेस बेस्ड निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस का इस्तेमाल होगा। आसमान से निगरानी के लिए एडवांस ड्रोन, एडब्ल्यूएसीएस विमान और रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट काम करेंगे। जमीन और समुद्र में रडार, सोनार और अन्य निगरानी सिस्टम लगाए जाएंगे। इसके साथ साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम को भी नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इस पूरी व्यवस्था का मकसद दुश्मन की गतिविधियों का जल्दी पता लगाना और तुरंत जवाब देने की क्षमता बढ़ाना है।

Operation Sindoor Joint Doctrine 1
Lieutenant General Zubin A. Minwalla

ऑपरेशन सिंदूर से मिला बड़ा सबक

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने महसूस किया कि आधुनिक युद्ध केवल बंदूक और मिसाइल से नहीं लड़े जाते। उन्होंने बताया कि उस दौरान अलग-अलग एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी को तेजी से जोड़ना और सही समय पर कार्रवाई करना सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण काम था।

उनके मुताबिक, “ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि मल्टी डोमेन ऑपरेशन कितना जरूरी हो चुका है।” उन्होंने कहा कि आज युद्ध केवल जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब साइबर स्पेस, डेटा नेटवर्क और सूचना युद्ध भी उतने ही अहम हो चुके हैं।

क्या है जॉइंट टारगेटिंग डॉक्ट्रिन

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने जॉइंट टारगेटिंग डॉक्ट्रिन को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि पहले तीनों सेनाएं अपने-अपने लक्ष्य तय करती थीं। लेकिन अब एक जॉइंट टारगेटिंग सिस्टम बनाया जा रहा है।

इसका मतलब यह होगा कि सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर तय करेंगी कि कौन सा लक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण है और उस पर हमला किस हथियार या प्लेटफॉर्म से करना सबसे प्रभावी होगा।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी दुश्मन एयरबेस पर हमला करना है, तो पहले आईएसआर सिस्टम उसके बारे में जानकारी जुटाएगा। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि वहां ब्रह्मोस मिसाइल इस्तेमाल करनी है, ड्रोन हमला करना है या लड़ाकू विमान भेजना है। इसके बाद हमले के असर का आकलन भी उसी नेटवर्क के जरिए किया जाएगा।

छह चरणों में होगा पूरा ऑपरेशन

भारतीय सेना अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक एक नई “जॉइंट टारगेटिंग साइकिल” पर काम कर रही है। इसमें सबसे पहले ऑपरेशन का उद्देश्य तय किया जाएगा। फिर दुश्मन के लक्ष्यों की पहचान होगी। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि कौन सा हथियार सबसे सही रहेगा। उसके बाद कमांड स्तर पर मंजूरी मिलेगी और फिर मिशन को अंजाम दिया जाएगा। आखिर में यह जांचा जाएगा कि हमला कितना सफल रहा।

डेटा बेस्ड वॉरफेयर की तरफ बढ़ रहा भारत

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में आईएसीसीएस और आकाशतीर जैसे सिस्टम को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया गया। इससे पूरे एयर स्पेस की एक संयुक्त तस्वीर तैयार हुई और खतरे की पहचान तेजी से हो सकी। उन्होंने कहा कि भारत अब “नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर” से आगे बढ़कर “डेटा सेंट्रिक वॉरफेयर” की दिशा में जा रहा है।

इसका मतलब है कि भविष्य के युद्धों में सबसे बड़ी ताकत केवल हथियार नहीं, बल्कि सही समय पर सही डेटा होगा। मल्टी सेंसर इनपुट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रियल टाइम डेटा फ्यूजन के जरिए युद्ध के दौरान फैसले तेजी से लिए जाएंगे।

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि भारतीय सेनाएं अब ऐसे सिस्टम बना रही हैं, जहां हर प्लेटफॉर्म और हर एजेंसी एक साझा नेटवर्क से जुड़ी हो।

उन्होंने बताया कि पिछले एक साल में कई ट्राई सर्विस एक्सरसाइज और वॉर गेमिंग अभ्यास किए गए हैं। इन अभ्यासों का मकसद यही है कि युद्ध के समय सेना, नौसेना और वायुसेना बिना किसी देरी के एक साथ काम कर सकें। उन्होंने कहा कि भारतीय तटरक्षक बल, बीएसएफ, डीआरडीओ, एनटीआरओ और दूसरी एजेंसियों के साथ भी तालमेल मजबूत किया गया है। उनके मुताबिक, आधुनिक युद्ध में केवल एक सेना नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की संयुक्त शक्ति काम करती है।

India Developing Joint ISR and Targeting Doctrine After Operation Sindoor, Reveals Lt Gen Minwalla

ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ‘न्यू एज वॉरफेयर’ की झलक, भारत तैयार कर रहा मल्टी डोमेन वॉर सिस्टम

Operation Sindoor New Warfare Model
Lieutenant General Zubin A. Minwalla, Lieutenant General Rajiv Ghai, Air Marshal Awadhesh Kumar Bharti and Vice Admiral A.N. Pramod address a press conference on the anniversary of 𝐎𝐩𝐞𝐫𝐚𝐭𝐢𝐨𝐧 𝐒𝐢𝐧𝐝𝐨𝐨𝐫 in Jaipur, Rajasthan.

Operation Sindoor New Warfare Model: ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस ऑपरेशन आधुनिक युद्ध का नया मॉडल बताया। इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसमें साइबर स्पेस, सूचना युद्ध और मल्टी डोमेन ऑपरेशन का भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया।

उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दिखाया कि अब भारत की सेनाएं सिर्फ पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहीं, बल्कि नई तकनीक और अलग-अलग डोमेन्स को जोड़कर तेज और सटीक कार्रवाई करने में सक्षम हैं।

जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीनों सेनाओं के तालमेल, इंटेलिजेंस नेटवर्क, एयर डिफेंस सिस्टम, साइबर क्षमताओं और सूचना युद्ध की भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी।

Operation Sindoor New Warfare Model: ऑपरेशन सिंदूर में दिखा नया वॉर मॉडल

लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन मिनवाला ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच ऐसा तालमेल देखने को मिला, जो पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत था। उन्होंने बताया कि पूरे ऑपरेशन को चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के निर्देशों के तहत हेडक्वार्टर आईडीएस के ऑपरेशन डायरेक्टरेट ने ऑपरेट किया।

उन्होंने कहा, “ऑपरेशन के दौरान सिर्फ पारंपरिक सैन्य क्षेत्र ही नहीं, बल्कि साइबर स्पेस और सूचना क्षेत्र को भी साथ लेकर काम किया गया। यह हमारी युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव दिखाता है।”

उनके मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया कि भारत अब मल्टी डोमेन ऑपरेशन को तेजी से, सटीकता और स्पष्ट उद्देश्य के साथ अंजाम दे सकता है।

सिर्फ पाकिस्तान पर हमला नहीं था यह ऑपरेशन

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को किसी एक घटना की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे कई सालों की तैयारी, सैन्य सुधार और अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय शामिल था।

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि इस अभियान की सफलता अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके लिए लंबे समय से मिलिट्री स्ट्रक्चर, प्रक्रियाओं और क्षमता निर्माण पर काम किया जा रहा था। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर कोई अकेली सफलता नहीं थी। यह संस्थागत मजबूती का परिणाम था।”

सीडीएस और रक्षा सुधारों की अहम भूमिका

उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद बनाए जाने और रक्षा सुधारों पर लगातार काम करने से तीनों सेनाओं के बीच तालमेल मजबूत हुआ। रक्षा मंत्री द्वारा 2025 को “रिफॉर्म्स का वर्ष” घोषित किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इससे जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन को आगे बढ़ाने में मदद मिली।

उन्होंने कहा कि स्ट्रक्चर्स, प्रोसेसेस, एंड आर्गेनाइजेशंस को एक-दूसरे से जोड़ने का असर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान साफ दिखाई दिया।

इंटेलिजेंस और कम्युनिकेशन नेटवर्क ने निभाई बड़ी भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अलग-अलग एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया गया। लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बताया कि मजबूत जॉइंट कम्युनिकेशन सिस्टम की वजह से हर स्तर पर बेहतर स्थिति की जानकारी मिलती रही।

उन्होंने कहा कि सेना, खुफिया एजेंसियों और निगरानी प्रणालियों से मिलने वाले इनपुट को तेजी से साझा किया गया, जिससे फैसले लेने की प्रक्रिया काफी तेज हो गई।

उनके मुताबिक, अब इस पूरे नेटवर्क को और मजबूत किया जा रहा है और इसे एक फुली फंक्शनल जॉइंट ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर में बदला जा रहा है। उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में टारगेट तय करने और ऑपरेशन के दौरान फैसले लेने की क्षमता और बेहतर होगी।

एयर डिफेंस सिस्टम ने संभाला मोर्चा

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों का इस्तेमाल किया गया था। इस पर बोलते हुए लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने बताया कि आईएसीसीएस और आकाशतीर जैसे सिस्टम को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया गया। इससे पूरे एयर स्पेस की एक संयुक्त तस्वीर तैयार हुई और खतरे की पहचान तेजी से हो सकी।

उन्होंने कहा कि अब इन नेटवर्क्स को और मजबूत बनाया जा रहा है ताकि ड्रोन, मिसाइल और दूसरे हवाई खतरों से एक साथ निपटा जा सके।

ड्रोन और नई तकनीकों पर बढ़ा फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि हाल के संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि अब युद्ध में अनमैन्ड और ऑटोनॉमस सिस्टम की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि भारतीय सेनाएं अब लंबी दूरी तक मार करने वाली सटीक हथियार प्रणालियों और मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग पर काम कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय और सिविल एविएशन मंत्रालय के साथ मिलकर एक नेशनल काउंटर यूएएस पॉलिसी तैयार की जा रही है। इसका मकसद ड्रोन खतरों से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत ढांचा तैयार करना है।

स्पेस और डेटा आधारित युद्ध की तैयारी

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि भारतीय सेनाएं अब नेटवर्क सेंट्रिक सिस्टम से आगे बढ़कर डेटा सेंट्रिक आर्किटेक्चर की तरफ जा रही हैं। उन्होंने बताया कि स्पेस डोमेन में भी तेजी से काम हो रहा है। इसरो और डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस के साथ समन्वय बढ़ाया गया है ताकि रियल टाइम निगरानी और टारगेटिंग क्षमता मजबूत हो सके।

उनके मुताबिक, मल्टी सेंसर इनपुट और डेटा आधारित फैसलों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फेक न्यूज से लड़ने के लिए बनेगा नया डिवीजन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सोशल मीडिया और सूचना युद्ध भी बड़ा मुद्दा बना रहा। इसे लेकर लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि अब रक्षा क्षेत्र में एक नया “डिफेंस स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन डिवीजन” बनाया जा रहा है। यह डिवीजन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स का इस्तेमाल करेगा।

उन्होंने कहा कि इसका मकसद गलत जानकारी, दुष्प्रचार और फेक नैरेटिव को रियल टाइम में जवाब देना होगा।

उनके मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सूचना और संज्ञानात्मक क्षेत्र में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया गया था। इससे सरकार और सेना का पक्ष प्रभावी तरीके से सामने रखा जा सका।

तीनों सेनाओं के बीच बढ़ा तालमेल

लेफ्टिनेंट जनरल मिनवाला ने कहा कि पिछले एक साल में कई ट्राई सर्विस एक्सरसाइज, वॉर गेमिंग और सिमुलेशन किए गए, जिससे मल्टी डोमेन ऑपरेशन की अवधारणा को मजबूत किया गया। उन्होंने बताया कि सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट और मेंटेनेंस प्रोटोकॉल को भी जोड़ा गया है। इससे ऑपरेशनल तैयारी और क्षमता में सुधार हुआ है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय तटरक्षक बल, बीएसएफ, खुफिया एजेंसियों, डीआरडीओ, एनटीआरओ और निजी इंडस्ट्री के साथ भी समन्वय बढ़ा है। उनके मुताबिक, पब्लिक सेक्टर, प्राइवेट कंपनियां और स्टार्टअप्स भी अब रक्षा तैयारियों का हिस्सा बन रहे हैं।

उन्होंने कहा, “आज हमारे पास ऐसा सिस्टम है जिसमें सेनाएं, मंत्रालय और सरकारी एजेंसियां एक साथ काम कर रही हैं। यही पूरे राष्ट्र की संयुक्त शक्ति का उदाहरण है।”

Operation Sindoor Showed India’s New-Age Warfare Model with Cyber, AI and Multi-Domain Operations: Lt Gen Zubin Minwalla

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की परमाणु धमकी हुई थी फेल, भारत ने खोल दी थी न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग की पोल

Operation Sindoor anniversary
Director General Naval Operations, Vice Admiral AN Pramod

Operation Sindoor anniversary: ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर भारतीय नौसेना के डायरेक्टर जनरल नेवल ऑपरेशंस (DGNO) वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने कहा कि भारत ने इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान की “न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग” को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। उन्होंने कहा कि भारत ने पाकिस्तान के अंदर गहराई तक मौजूद आतंकी ठिकानों पर लंबी दूरी के सटीक हथियारों से हमला करके साफ संदेश दिया कि परमाणु धमकियों के पीछे छिपकर आतंकवाद नहीं चलाया जा सकता।

जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान वाइस एडमिरल प्रमोद ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की नई सोच, तेज जवाबी क्षमता और तीनों सेनाओं के तालमेल का उदाहरण था।

Operation Sindoor anniversary: “ऑपरेशन सिंदूर भारत के संकल्प का प्रतीक”

वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारत की आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट नीति को दिखाता है। उन्होंने कहा, “यह ऑपरेशन भारत के संकल्प और राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीतिक सोच का मजबूत उदाहरण था।”

उन्होंने बताया कि पहलगाम आतंकी हमले के तुरंत बाद सरकार ने सेना को साफ और बिना किसी भ्रम वाला आदेश दिया। इसके साथ ही तीनों सेनाओं को कार्रवाई की पूरी ऑपरेशनल स्वतंत्रता भी दी गई।

उनके मुताबिक, इसी वजह से भारतीय सेनाएं तेजी से कार्रवाई कर सकीं।

पहलगाम हमले के बाद शुरू हुआ ऑपरेशन

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके में बड़ा आतंकी हमला हुआ था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी ढांचे को निशाना बनाने का फैसला लिया।

7 मई 2025 की रात भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया।

इस ऑपरेशन के दौरान लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन से जुड़े नौ बड़े आतंकी ठिकानों पर हमला किया गया। भारतीय कार्रवाई में 100 से ज्यादा आतंकियों के मारे जाने की जानकारी सामने आई थी।

“भारत ने पाकिस्तान की न्यूक्लियर धमकियों की पोल खोली”

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वाइस एडमिरल प्रमोद ने सबसे बड़ा बयान पाकिस्तान की परमाणु धमकियों को लेकर दिया।
उन्होंने कहा, “पाकिस्तान लंबे समय से परमाणु हथियारों की धमकी देकर दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान के अंदर गहराई तक हमला करके उसकी इस ब्लैकमेलिंग की पोल खोल दी।”

उनके मुताबिक, भारत ने लंबी दूरी के प्रिसीजन हथियारों का इस्तेमाल करते हुए आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया और यह दिखाया कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को परमाणु धमकियों से रोका नहीं जा सकता।

समुद्र में भारतीय नौसेना ने बनाई बढ़त

वाइस एडमिरल प्रमोद ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान भारतीय नौसेना ने बहुत तेजी से खुद को युद्ध के लिए तैयार किया। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना ने उत्तरी अरब सागर में अपने कैरियर बैटल ग्रुप, फ्रंटलाइन युद्धपोत, सबमरीन, समुद्री निगरानी विमान और स्पेशल फोर्स को तैनात किया।

उनके मुताबिक, नौसेना की इस “फॉरवर्ड डिप्लॉयमेंट” ने पाकिस्तान की नौसेना और वायुसेना को डिफेंसिव स्थिति में पहुंचा दिया। उन्होंने कहा, “पाकिस्तानी नौसैनिक और हवाई यूनिट्स अपने बंदरगाहों या समुद्री तट के पास ही सीमित होकर रह गए थे।”

INS विक्रांत और स्वदेशी युद्धपोतों का जिक्र

वाइस एडमिरल प्रमोद ने भारतीय नौसेना के स्वदेशी युद्धपोतों की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन के दौरान एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, कोलकाता क्लास और विशाखापट्टनम क्लास डेस्ट्रॉयर ने शानदार प्रदर्शन किया।

उन्होंने कहा कि इससे यह साबित हुआ कि भारत की “आत्मनिर्भर” रक्षा क्षमता अब बड़े ऑपरेशनों को संभालने में सक्षम है। उनके मुताबिक, “भारतीय नौसेना का ब्लू वॉटर रेडीनेस और इंटीग्रेटेड वॉर फाइटिंग सिस्टम पूरी तरह प्रभावी साबित हुआ।”

ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम ने किया कमाल

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन, एयर डिफेंस और काउंटर-ड्रोन सिस्टम का भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल हुआ। वाइस एडमिरल प्रमोद ने कहा कि हाल के युद्धों ने यह दिखा दिया है कि बिना चालक वाले सिस्टम यानी अनक्रूड और ऑटोनॉमस प्लेटफॉर्म अब युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय सेनाओं ने ड्रोन, लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम और काउंटर यूएवी सिस्टम का प्रभावी इस्तेमाल किया।

“इनफॉरमेशन वॉरफेयर भी उतना ही अहम”

वाइस एडमिरल प्रमोद ने कहा कि आज के समय में युद्ध सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। सूचना और नैरेटिव का मोर्चा भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान गलत जानकारी और भ्रामक प्रचार का भी जवाब दिया गया। उनके मुताबिक, सरकार और अलग-अलग एजेंसियों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि भारत का पक्ष मजबूत तरीके से सामने आए।

तीनों सेनाओं के तालमेल पर जोर

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने “जॉइंटनेस” यानी तीनों सेनाओं के तालमेल को ऑपरेशन की सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच लगातार बैठकें होती रहीं और हर फैसले को रियल टाइम जानकारी के आधार पर लिया गया। उन्होंने बताया कि जॉइंट ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर ने तीनों सेनाओं की कार्रवाई को एक साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा भारतीय तटरक्षक बल, खुफिया एजेंसियों और समुद्री सुरक्षा एजेंसियों ने भी मिलकर काम किया।

“भारत कहीं भी, कभी भी हमला करने में सक्षम”

वाइस एडमिरल प्रमोद ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि भारतीय नौसेना, सेना और वायुसेना हर समय तैयार हैं। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर ने दिखा दिया कि भारत दूर तक, गहराई तक और पूरी सटीकता के साथ हमला करने की क्षमता रखता है।” उन्होंने कहा कि भारतीय सेनाओं ने यह साबित किया है कि जरूरत पड़ने पर वे “कहीं भी, कभी भी और किसी भी तरीके से” कार्रवाई कर सकती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन तक सैन्य तनाव बना रहा। पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में ड्रोन और गोलाबारी की कोशिश की, लेकिन भारतीय सेनाओं ने कई हमलों को नाकाम किया। 10 मई 2025 को दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम पर सहमति बनी थी।