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पूर्व DGMO राजीव घई बोले- दुनिया के लिए गोल्ड स्टैंडर्ड बन गया ऑपरेशन सिंदूर

Operation Sindoor anniversary
Ex-DGMO Rajiv Ghai

Operation Sindoor anniversary: ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान ने खुद भारत से सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि भारत ने बहुत सोच-समझकर और सटीक तरीके से कार्रवाई को अंजाम दिया, अपने लक्ष्य हासिल किए और फिर संघर्ष को आगे बढ़ाने के बजाय रोक दिया।

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई उस समय मिलिट्री ऑपरेशंस के डायरेक्टर जनरल (डीजीएमओ) थे, जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। जयपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पूरे ऑपरेशन की रणनीति, तीनों सेनाओं के तालमेल और स्वदेशी रक्षा क्षमता पर विस्तार से बात की।

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया कि “आत्मनिर्भर भारत” सिर्फ एक नारा नहीं है, बल्कि यह भारत की सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ाने वाला कदम है। उनके मुताबिक, आज भारत के 65 प्रतिशत से ज्यादा रक्षा उपकरण देश में ही बनाए जा रहे हैं।

Operation Sindoor anniversary: “पाकिस्तान ने खुद कहा, अब रोक दीजिए”

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में लंबे समय तक युद्ध चल रहे हैं, लेकिन भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में अलग रणनीति अपनाई।

उन्होंने कहा, “हमने सटीक और सीमित कार्रवाई की। अपने लक्ष्य हासिल किए और फिर संघर्ष रोक दिया। जब पाकिस्तान बातचीत के लिए मजबूर हुआ और उसने हमसे रुकने की अपील की, तब हमने सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला लिया।”

उनके मुताबिक, भारत ने ऐसा जवाब दिया जिससे दुश्मन की जोखिम लेने की क्षमता कमजोर हो गई और उसका कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम प्रभावित हुआ। लेकिन भारत ने संघर्ष को लंबे युद्ध में बदलने से बचाया।

9 स्टैंड-ऑफ प्रिसीजन स्ट्राइक हुई

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने बताया कि कुल 9 स्टैंड-ऑफ प्रिसीजन स्ट्राइक की गई थीं। इनमें 7 हमले भारतीय सेना ने और 2 हमले भारतीय वायुसेना ने किए थे।

उन्होंने कहा कि सभी हमले पूरी सटीकता और सही समय पर किए गए। इनका मकसद पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़ा नुकसान पहुंचाना था।

“किसी भी सुरक्षित ठिकाने का भ्रम तोड़ा”

पूर्व डीजीएमओ ने कहा कि इन हमलों ने साफ संदेश दिया कि आतंकियों के लिए कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं है।
उन्होंने बताया कि भारतीय सेनाओं ने रियल टाइम इंटेलिजेंस और साझा ऑपरेशन प्लान के आधार पर कार्रवाई की। इससे हर हमला ज्यादा प्रभावी बना।

उनके मुताबिक, “ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सेना का ऑपरेशन नहीं था, बल्कि यह तीनों सेनाओं का संयुक्त अभियान था, जिसमें जमीन, हवा और समुद्र – तीनों क्षेत्रों की ताकत का इस्तेमाल किया गया।”

ब्रह्मोस और आकाश जैसे सिस्टम ने निभाई अहम भूमिका

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए गए कई हथियार और सिस्टम भारत में बने थे। उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, एडवांस सर्विलांस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरणों ने इस अभियान में निर्णायक भूमिका निभाई।

उन्होंने बताया कि स्वदेशी हथियारों का फायदा यह होता है कि सेना अपनी जरूरत के हिसाब से उन्हें इस्तेमाल कर सकती है और सप्लाई चेन पर भी पूरा नियंत्रण रहता है।

खुफिया एजेंसियों और साइबर यूनिट्स की भी बड़ी भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि कई दूसरी एजेंसियों ने भी अहम भूमिका निभाई। लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि खुफिया एजेंसियों ने सटीक जानकारी उपलब्ध कराई, जिससे लक्ष्य तय करने में मदद मिली। उन्होंने यह भी बताया कि साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यूनिट्स लगातार सक्रिय रहीं और सूचना के मोर्चे पर भारत की बढ़त बनाए रखी।

उनके मुताबिक, सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी माहौल संभाला और देश के अंदर सुरक्षा व्यवस्था तथा जनता का भरोसा बनाए रखा।

“तीनों सेनाओं का तालमेल बड़ी ताकत बना”

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बार-बार “जॉइंटनेस” यानी तीनों सेनाओं के तालमेल पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सेना, वायुसेना और नौसेना ने साझा स्थिति की जानकारी, साझा इंटेलिजेंस और रियल टाइम फैसलों के आधार पर काम किया।

उनके मुताबिक, यही वजह रही कि ऑपरेशन तेज, सटीक और प्रभावी बना। उन्होंने कहा कि शीर्ष स्तर पर स्पष्ट नेतृत्व और नीचे ऑपरेशनल स्तर पर सेना को मिली स्वतंत्रता, ऑपरेशन की सफलता की बड़ी वजह थी।

“अब दुनिया इसे गोल्ड स्टैंडर्ड मान रही”

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को अब दुनिया सैन्य और रणनीतिक योजना के “गोल्ड स्टैंडर्ड” के रूप में देख रही है। उन्होंने कहा कि इस पूरे अभियान में सरकार, सेना, खुफिया एजेंसियां, बीएसएफ, साइबर संस्थान और दूसरी एजेंसियां एक साथ काम कर रही थीं। उनके मुताबिक, यह “होल ऑफ गवर्नमेंट अप्रोच” का उदाहरण था, जहां हर संस्था ने मिलकर काम किया और पूरे ऑपरेशन को सफल बनाया।

ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर एयर मार्शल बोले- शांति चाहते हैं, लेकिन चुप नहीं रहेंगे

Operation Sindoor anniversary
Deputy Chief of Air Staff Air Marshal Awadesh Kumar Bharati

Operation Sindoor anniversary: ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस ब्रीफिंग के दौरान भारतीय वायुसेना के डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि भारत हमेशा शांति और सहअस्तित्व की नीति पर चलता आया है, लेकिन जब देश की शांति की इच्छा को कमजोरी समझा जाता है, तब भारत निर्णायक कार्रवाई करता है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर उसी सोच और संकल्प का प्रतीक था।

7 मई 2025 को शुरू हुए ऑपरेशन सिंदूर को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद अंजाम दिया था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी।

ऑपरेशन की पहली वर्षगांठ पर जयपुर में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में एयर मार्शल भारती ने पूरे ऑपरेशन की रणनीति, तीनों सेनाओं की भूमिका और भारत की सैन्य तैयारी पर विस्तार से बात की।

Operation Sindoor anniversary: “हम शांति चाहते हैं, लेकिन चुप नहीं रहेंगे”

एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने अपने संबोधन में कहा कि भारत सदियों से “जियो और जीने दो” की सोच पर चलता आया है। उन्होंने कहा, “22 अप्रैल 2025 को हमारे नागरिकों की जिस तरह हत्या की गई, उन्हें हम वापस नहीं ला सकते। लेकिन हम यह संकल्प जरूर ले सकते हैं कि ऐसी घटना दोबारा न हो।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारी शांति की इच्छा को जब कमजोरी समझा जाता है और हमारी चुप्पी को निष्क्रियता माना जाता है, तब कार्रवाई करना जरूरी हो जाता है। ऑपरेशन सिंदूर उसी कार्रवाई का नाम था।”

पहलगाम हमले के बाद लिया गया फैसला

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके की बैसरन घाटी में आतंकियों ने पर्यटकों को निशाना बनाया था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद केंद्र सरकार ने सेना और सुरक्षा एजेंसियों के साथ कई बैठकें कीं। इसके बाद आतंकवाद के खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई का फैसला लिया गया।

7 मई 2025 की सुबह भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान और पीओके में मौजूद कई बड़े आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन के कैंप शामिल थे।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि ऑपरेशन का मकसद सिर्फ जवाब देना नहीं था, बल्कि आतंक के पूरे ढांचे को नुकसान पहुंचाना था। उन्होंने कहा, “यह कार्रवाई पूरी स्पष्टता और सटीकता के साथ की गई थी। लक्ष्य तय थे और सेना को पूरी ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी गई थी।”

“आधी कार्रवाई नहीं करते भारत के सैनिक”

प्रेस ब्रीफिंग के दौरान एयर मार्शल भारती ने कहा कि जब भारत कार्रवाई करता है तो वह अधूरी नहीं होती। उन्होंने कहा, “जब हम कार्रवाई करते हैं तो उसमें कोई आधा कदम नहीं होता। वह निर्णायक होती है, घातक होती है और वही ऑपरेशन सिंदूर में दिखाई दिया।”

उन्होंने यह भी कहा कि कार्रवाई पूरी तरह संतुलित और सोच-समझकर की गई थी ताकि आम नागरिकों को नुकसान न पहुंचे।

पहले ही हमले ने दिया बड़ा संदेश

एयर मार्शल भारती ने कहा कि 7 मई 2025 की सुबह जब पहला हथियार अपने टारगेट पर हिट हुआ लगा, तब वह सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं था। उन्होंने कहा, “वह भारत की जनता के संकल्प और ताकत का प्रदर्शन था। वह पहलगाम में मारे गए लोगों के परिवारों के लिए आंशिक न्याय था।”

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के दौरान हर लक्ष्य की पहचान खुफिया एजेंसियों की मदद से की गई थी।

खुफिया एजेंसियों ने निभाई अहम भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर की योजना बनाने में कई एजेंसियों ने मिलकर काम किया था। भारतीय एजेंसियों ने पाकिस्तान और पीओके में मौजूद नौ बड़े आतंकी कैंपों की पहचान की थी। इसके बाद उन्हीं ठिकानों पर हमला किया गया।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि ऑपरेशन पूरी तरह इंटेलिजेंस आधारित था और हर चरण में सावधानी बरती गई थी।

तीनों सेनाओं ने मिलकर किया ऑपरेशन

प्रेस कॉन्फ्रेंस में एयर मार्शल भारती ने बार-बार “जॉइंटनेस” यानी तीनों सेनाओं के तालमेल पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर की योजना से लेकर उसे अंजाम देने तक हर चरण में जॉइंटनेस शामिल थी।”

उन्होंने बताया कि चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी यानी सीओएससी ने हर विकल्प पर चर्चा की थी। इस समिति में सीडीएस और तीनों सेनाओं के प्रमुख शामिल थे। उनके मुताबिक, हर फैसले को बहुत सोच-समझकर लिया गया था।

पाकिस्तान ने ड्रोन हमले किए

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ड्रोन और यूसीएवी हमले शुरू किए। इनका निशाना भारतीय एयरबेस और लॉजिस्टिक ठिकाने थे। लेकिन भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने इन हमलों को काफी हद तक रोक दिया।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि भारत की मल्टी लेयर एयर डिफेंस प्रणाली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम यानी आईसीसीएस ने रियल टाइम में खतरे की पहचान की।

इस सिस्टम की मदद से ड्रोन और अन्य हवाई खतरों को तुरंत ट्रैक किया गया और जवाबी कार्रवाई की गई। भारती ने कहा कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स और यूनिट्स के बीच तालमेल इसी सिस्टम की वजह से मजबूत बना रहा।

आकाश मिसाइल और पुराने सिस्टम भी हुए इस्तेमाल

एयर मार्शल भारती ने बतयाा कि ऑपरेशन के दौरान भारत ने स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल किया। इसके अलावा पेचोरा और ओएसए-एके जैसे पुराने एयर डिफेंस सिस्टम भी सक्रिय रहे। भारतीय वायुसेना और सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने मिलकर काम किया।

भारती ने कहा कि पाकिस्तान लगातार ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन भेजने की कोशिश कर रहा था, लेकिन भारतीय बलों ने सैन्य और नागरिक ठिकानों को सुरक्षित रखा।

समुद्र में नौसेना ने बनाई बढ़त

ऑपरेशन के दौरान भारतीय नौसेना भी पूरी तरह सक्रिय थी। भारतीय नौसेना ने अपने कैरियर बैटल ग्रुप को तैनात किया था, जिसमें मिग-29के लड़ाकू विमान और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टर शामिल थे। नौसेना ने समुद्री क्षेत्र में लगातार निगरानी रखी और पाकिस्तान की समुद्री गतिविधियों पर नजर बनाए रखी।

एयर मार्शल भारती ने कहा कि नौसेना की मौजूदगी ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया।

बीएसएफ ने रोकी घुसपैठ

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ ने भी अहम भूमिका निभाई। जम्मू-कश्मीर के सांबा सेक्टर में बीएसएफ जवानों ने घुसपैठ की कोशिश को नाकाम किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जवानों ने संदिग्ध गतिविधि देखते ही जवाबी कार्रवाई की और दो घुसपैठियों को मार गिराया। वहां से हथियार और गोला-बारूद भी बरामद किया गया था।

“यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं थी”

एयर मार्शल भारती ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक सैन्य मिशन नहीं था। उन्होंने कहा कि यह भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति, सैन्य पेशेवर क्षमता और तीनों सेनाओं के तालमेल का उदाहरण था। उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरे अभियान में सरकार, सेना, खुफिया एजेंसियों और विभिन्न विभागों के बीच लगातार समन्वय बना रहा।

ऑपरेशन सिंदूर पर बोले पूर्व DGMO: “यह सिर्फ ऑपरेशन नहीं, भारत की नई रणनीति की शुरुआत थी”

Operation Sindoor Anniversary

Operation Sindoor Anniversary: ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर जयपुर में आयोजित विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भारतीय सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने इसे भारत की रणनीतिक यात्रा का “निर्णायक मोड़” बताया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति और सोच में बड़ा बदलाव था।

7 मई 2025 को शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में अंजाम दिया था। उस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारतीय सेना, वायुसेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने मिलकर पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी।

ऑपरेशन की पहली वर्षगांठ पर जयपुर में आयोजित कार्यक्रम में पूर्व डीजीएमओ राजीव घई ने उस पूरे ऑपरेशन से जुड़ी कई अहम बातें साझा कीं।

Operation Sindoor Anniversary: “यह सिर्फ ऑपरेशन नहीं, रणनीतिक बदलाव था”

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की पुरानी रणनीति से आगे बढ़कर नई दिशा दिखाई।

उन्होंने कहा, “आज से ठीक एक साल पहले ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया गया था। उस समय मैं डीजीएमओ के पद पर था। पीछे मुड़कर देखता हूं तो यह सिर्फ सैन्य ऑपरेशन नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक यात्रा का एक निर्णायक क्षण था।”

उन्होंने कहा कि भारत ने इस कार्रवाई के दौरान बहुत सोच-समझकर नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार जाकर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया।

राजीव घई के मुताबिक, यह संदेश साफ था कि भारत अब सिर्फ रक्षात्मक रवैया नहीं अपनाएगा, बल्कि आतंकवाद के स्रोत तक पहुंचकर कार्रवाई करेगा।

पहलगाम हमले के बाद शुरू हुआ था ऑपरेशन

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके की बैसरन घाटी में आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला किया था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।

इस घटना के बाद पूरे देश में गुस्सा था। केंद्र सरकार ने सुरक्षा एजेंसियों और सेना के शीर्ष अधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें कीं।

इसके बाद 7 मई 2025 की रात ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया गया। भारतीय सेना और वायुसेना ने मिलकर पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकी लॉन्च पैड्स, ट्रेनिंग सेंटर और ठिकानों पर हमला किया।
नौ बड़े आतंकी ठिकाने बनाए गए थे निशाना

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कुल नौ बड़े आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया था। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन से जुड़े कैंप शामिल थे।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस कार्रवाई में 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए थे।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक, ऑपरेशन बेहद कम समय में पूरा किया गया था, लेकिन इसकी तैयारी कई दिनों से चल रही थी।

“ऑपरेशन सिंदूर अंत नहीं, शुरुआत थी”

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राजीव घई ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को किसी एक घटना की प्रतिक्रिया भर समझना गलत होगा।

उन्होंने मशहूर पंक्तियों का जिक्र करते हुए कहा, “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं। मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “ऑपरेशन सिंदूर अंत नहीं था। यह सिर्फ शुरुआत थी। आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई जारी रहेगी।”

सरकार ने सेना को दी थी पूरी छूट

राजीव घई ने कहा कि ऑपरेशन के दौरान सरकार ने सेना को स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य उद्देश्य दिए थे। उन्होंने बताया कि सेना को ऑपरेशन की योजना बनाने और उसे अंजाम देने की पूरी ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी गई थी।

उन्होंने कहा, “सरकार ने हमें साफ निर्देश दिए थे। लक्ष्य स्पष्ट था- आतंकी ढांचे को खत्म करना, उनकी योजना बनाने की क्षमता को कमजोर करना और भविष्य में होने वाले हमलों को रोकना।” उन्होंने कहा कि कार्रवाई के दौरान सटीकता, संतुलन और जिम्मेदारी का पूरा ध्यान रखा गया।

पाकिस्तान ने किया जवाबी हमला

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की ओर से भी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। पाकिस्तान ने ड्रोन हमले और सीमा पर गोलाबारी शुरू की थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच करीब चार दिन तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही।

भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान के कई रडार सिस्टम और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, लाहौर और गुजरांवाला के पास मौजूद रडार सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा था।

चार दिन तक चला था तनाव

7 मई से शुरू हुआ सैन्य तनाव 10 मई तक जारी रहा। इस दौरान सीमा पर लगातार निगरानी, एयर डिफेंस एक्टिविटी और सैन्य तैयारियां बढ़ा दी गई थीं।

भारतीय वायुसेना और सेना दोनों हाई अलर्ट पर थीं। कई इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल भी तैनात किए गए थे।

स्थिति उस समय बदली जब पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारतीय डीजीएमओ से संपर्क किया। दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत के बाद 10 मई को संघर्ष विराम पर सहमति बनी।

ऑपरेशन ने जॉइंटनेस की जरूरत भी दिखाई

उनका कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने सेना, वायुसेना और अन्य एजेंसियों के बीच तालमेल की अहमियत को और स्पष्ट किया। इसी कारण अब भारतीय सेनाएं जॉइंट ऑपरेशंस, डेटा शेयरिंग और थिएटर कमांड जैसे सिस्टम्स पर तेजी से काम कर रहे हैं।

जयपुर कार्यक्रम में भी कई अधिकारियों ने मल्टी-डोमेन वॉरफेयर, एयर डिफेंस इंटीग्रेशन और रियल टाइम ऑपरेशन को लेकर चर्चा की।

“भारत जिम्मेदारी के साथ जवाब देता है”

राजीव घई ने अपने संबोधन में कहा कि भारत हमेशा जिम्मेदारी के साथ कार्रवाई करता है। उन्होंने कहा, “भारत अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और अपने नागरिकों की रक्षा पूरी दृढ़ता, पेशेवर तरीके और जिम्मेदारी के साथ करेगा।”

उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर का उद्देश्य सिर्फ सैन्य जवाब देना नहीं था, बल्कि यह दिखाना भी था कि भारत आतंकवाद को लेकर अपनी नीति पर पूरी तरह स्पष्ट है।

मलक्का स्ट्रेट में चीन की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने वाला INS Baaz क्यों नहीं बढ़ पा रहा आगे?

INS Baaz Expansion
INS Baaz (File Photo)

INS Baaz Expansion: हिंद महासागर में ग्रेट निकोबार द्वीप के कैंपबेल बे पर स्थित भारत के सबसे अहम स्ट्रेटेजिक फॉरवर्ड बेस में शामिल भारतीय नौसेना का आईएनएस बाज का विस्तार पिछले करीब पांच साल से मंजूरी का इंतजार कर रहा है। भारतीय नौसेना का दक्षिणी सबसे नौसैनिक एयर स्टेशन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में शामिल मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब स्थित है।

भारतीय नौसेना यहां रनवे बढ़ाने और नई नौसैनिक जेटी बनाने की योजना पर काम कर रही है, लेकिन जमीन अधिग्रहण और मंजूरी से जुड़ी प्रक्रियाओं के कारण यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इसी बीच, इसी द्वीप के दूसरे हिस्से गलतिया बे में 81 हजार करोड़ रुपये की राशि से विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पर तेजी से काम चल रहा है।

रक्षा और रणनीतिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रेट निकोबार सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की “फॉरवर्ड पोस्ट” है। यही वजह है कि यहां सैन्य और आर्थिक दोनों तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ डेवलप किया जा रहा है।

INS Baaz Expansion: क्या है आईएनएस बाज

आईएनएस बाज भारतीय नौसेना का सबसे दक्षिण में स्थित एयर स्टेशन है। यह ग्रेट निकोबार द्वीप के कैंपबेल बे इलाके में मौजूद है। इसे जुलाई 2012 में कमीशन किया गया था।

यह एयर स्टेशन मलक्का स्ट्रेट के मुहाने के पास स्थित है। यह सिक्स डिग्री चैनल और मलक्का स्ट्रेट के मुहाने से लगभग 130-150 नॉटिकल माइल या 240 किमी दूर है। यही वह समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापारिक और रणनीतिक जहाजों का आवागमन होता है।

चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देशों का तेल और व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस इलाके पर नजर रखना भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

एक नौसैनिक अधिकारी ने कहा, “आईएनएस बाज हिंद महासागर में भारत की आंख की तरह काम करता है। यहां से गुजरने वाली गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती है।”

रनवे बढ़ाने की योजना क्यों जरूरी

अभी आईएनएस बाज का रनवे करीब 3000 फीट लंबा है। इस रनवे पर डोर्नियर 228 जैसे छोटे समुद्री निगरानी विमान और वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान सीमित क्षमता में ऑपरेट कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना लंबे समय से इस रनवे को बढ़ाकर करीब 9000 से 10000 फीट तक करने की योजना बना रही है।

अगर रनवे बड़ा हो जाता है, तो बोइंग पी-8आई जैसे लंबी दूरी के समुद्री निगरानी विमान सीधे ग्रेट निकोबार से उड़ान भर सकेंगे। अभी इन विमानों को मुख्य भूमि भारत या पोर्ट ब्लेयर से ऑपरेट करना पड़ता है।

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने कहा कि बहुत कम लोग इस बात का जिक्र करते हैं कि ग्रेट निकोबार द्वीप में 2016 से भारतीय नौसेना का एयर स्टेशन आईएनएस बाज मौजूद है। उन्होंने बताया कि कैंपबेल बे में मलक्का स्ट्रेट की तरफ एक बेहद अच्छा प्राकृतिक बंदरगाह भी है।

उनके मुताबिक, अंडमान और निकोबार कमांड कई वर्षों से यहां रनवे बढ़ाने और बंदरगाह को अपग्रेड करने की मांग कर रहा है, ताकि बड़े सैन्य विमान और बड़े नौसैनिक जहाज वहां तैनात किए जा सकें। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे हिंद महासागर में निगरानी क्षमता काफी मजबूत हो जाएगी। आईएनएस बाज अकेले पूरे क्षेत्र की जरूरतें पूरी नहीं कर सकता। एक एयर स्टेशन निगरानी तो कर सकता है, लेकिन बड़े ऑपरेशन के लिए बंदरगाह, ईंधन भंडारण, मरम्मत सुविधा, सैनिकों की तैनाती और रसद नेटवर्क भी जरूरी होते हैं। इसी वजह से पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह को धीरे-धीरे विकसित किया जा रहा है।

लड़ाकू विमानों की तैनाती भी हो सकेगी

रनवे विस्तार का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि यहां से लड़ाकू विमानों को ऑपरेट करना संभव हो सकेगा।

भारतीय नौसेना के पास मिग-29के जैसे मैरिटाइम फाइटर जेट हैं। वहीं भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई और जगुआर विमान भी समुद्री मिशनों में इस्तेमाल किए जाते हैं।

अगर बड़ा रनवे तैयार हो जाता है, तो इन विमानों को भी जरूरत पड़ने पर ग्रेट निकोबार में तैनात किया जा सकेगा।

जेटी प्रोजेक्ट भी अटका

सिर्फ रनवे ही नहीं, बल्कि कैंपबेल बे में प्रस्तावित नौसैनिक जेटी का काम भी मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इस जेटी का उद्देश्य नौसैनिक जहाजों को सपोर्ट देना, ईंधन और रसद उपलब्ध कराना और लंबे समय तक समुद्री ऑपरेशन को बनाए रखना है।

सूत्रों के अनुसार, जमीन और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों के कारण इस परियोजना में देरी हो रही है।

दूसरी तरफ तेजी से चल रहा है मेगा प्रोजेक्ट

दिलचस्प बात यह है कि आईएनएस बाज से कुछ किलोमीटर दूर गलतिया बे में विशाल ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।

करीब 81 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, नया एयरपोर्ट, टाउनशिप और बिजली परियोजनाएं शामिल हैं।

इस परियोजना का मुख्य हिस्सा एक बड़ा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है, जिसे सिंगापुर और कोलंबो जैसे वैश्विक बंदरगाहों से मुकाबले के लिए तैयार किया जा रहा है।

नया एयरपोर्ट भी बन रहा

ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत चिंगेन इलाके में एक नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है। करीब 8573 करोड़ रुपये की लागत वाले इस एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया संभाल रही है।

हालांकि इसे नागरिक उड्डयन के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल नौसेना और वायुसेना के विमान भी कर सकेंगे। इस तरह ग्रेट निकोबार में दो एयरफील्ड मौजूद होंगे, एक आईएनएस बाज और दूसरा नया एयरपोर्ट।

आखिर क्यों इतना अहम है ग्रेट निकोबार

ग्रेट निकोबार द्वीप बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के बीच बेहद रणनीतिक स्थान पर स्थित है। यह इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से करीब 150 किलोमीटर दूर है।

यह इलाका “सिक्स डिग्री चैनल” और मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब आता है। यही वजह है कि भारत यहां अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत करना चाहता है।

रक्षा मामलों के जानकार बताते हैं कि केवल निगरानी करना काफी नहीं होता। लंबे समय तक ऑपरेशन चलाने के लिए लॉजिस्टिक्स, एयरबेस, जेटी, ईंधन और सपोर्ट सिस्टम भी जरूरी होते हैं।

एक रणनीतिक विशेषज्ञ ने कहा, “आईएनएस बाज सिर्फ निगरानी का केंद्र नहीं है। इसे पूरी सैन्य क्षमता वाले फॉरवर्ड बेस में बदलने की कोशिश हो रही है।”

अंडमान-निकोबार कमांड की भूमिका

अंडमान और निकोबार कमांड भारत का एकमात्र ट्राई-सर्विस कमांड है, जहां सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ काम करती हैं।

इस कमांड के तहत पोर्ट ब्लेयर में आईएनएस जरावा, उत्तर अंडमान में आईएनएस कोहासा, कार निकोबार एयरबेस और ग्रेट निकोबार का आईएनएस बाज़ जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने आते हैं।

इन सभी ठिकानों को मिलाकर भारत हिंद महासागर में अपनी निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता बनाए रखता है।

चीन पर नजर रखने में अहम भूमिका

मलक्का स्ट्रेट से चीन का 80% व्यापार और तेल सप्लाई गुजरता है। इसी वजह से चीन इस इलाके को लेकर हमेशा संवेदनशील रहता है।

भारत के लिए ग्रेट निकोबार ऐसा स्थान है, जहां से हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। यही कारण है कि भारत यहां सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित कर रहा है।

बस आदेश का इंतजार था! ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान पर पहली मिसाइल दागने को तैयार थीं भारतीय सबमरीन

Operation Sindoor Indian Navy Submarines
AI-Generated Image

Operation Sindoor Indian Navy Submarines: पहलगाम हमले के जवाब में पिछले साल 6-7 मई की रात को शुरू हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना ने समुद्र में ऐसा दबाव बनाया था कि पाकिस्तान की नौसेना अपने ही बंदरगाहों तक सीमित होकर रह गई। इस पूरे अभियान में सबसे बड़ी भूमिका भारतीय सबमरीनों की रही, जो चुपचाप पाकिस्तानी समुद्री इलाके के बेहद करीब पहुंच गई थीं। हालात ऐसी थी कि अगर नौसेना को हमला करने का आदेश मिलता, तो पहली मिसाइल या टॉरपीडो दागने के लिए भारतीय सबमरीनें पूरी तरह तैयार थीं।

ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर अब इस अभियान से जुड़ी कई अहम जानकारियां सामने आ रही हैं। सेना और वायु सेना की कार्रवाई के बीच भारतीय नौसेना ने अरब सागर में ऐसी तैनाती की थी, जिसने पाकिस्तान पर लगातार मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाए रखा।

Operation Sindoor Indian Navy Submarines: पहलगाम हमले के बाद शुरू हुई तैयारी

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ था, जिसमें कई निर्दोष पर्यटकों की जान गई थी। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ तीनों सेनाओं को सक्रिय कर दिया।

जहां वायु सेना और थल सेना ने सीधे जवाबी कार्रवाई की तैयारी शुरू की, वहीं भारतीय नौसेना ने समुद्र में अपनी सबसे ताकतवर तैनाती शुरू कर दी।

आईएनएस विक्रांत को आगे बढ़ाया गया

भारतीय नौसेना ने अपने सबसे बड़े युद्धपोत आईएनएस विक्रांत को फॉरवर्ड डिप्लॉयमेंट पर भेजा। इसके साथ पूरा कैरियर बैटल ग्रुप भी अरब सागर में सक्रिय किया गया।

इस ग्रुप में कई युद्धपोत, डेस्ट्रॉयर, स्टील्थ फ्रिगेट, फास्ट अटैक क्राफ्ट और सबमरीन शामिल थीं। कुल मिलाकर उत्तरी अरब सागर में 36 से ज्यादा भारतीय युद्धपोत तैनात कर दिए गए थे।

पाकिस्तानी जलक्षेत्र के करीब पहुंचीं सबमरीनें

ऑपरेशन के दौरान भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास सबमरीनें बेहद अहम भूमिका में थीं। ये सबमरीनें पाकिस्तानी समुद्री इलाके के करीब तक पहुंचकर लगातार निगरानी कर रही थीं।

सबसे खास बात यह रही कि पाकिस्तान की नौसेना अपने एंटी-सबमरीन सिस्टम और लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमानों के बावजूद भारतीय सबमरीनों का पता नहीं लगा सकी।

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सबमरीनें इतनी रणनीतिक जगहों पर तैनात थीं कि आदेश मिलते ही कराची पोर्ट, ग्वादर और पाकिस्तानी युद्धपोत सीधे निशाने पर आ सकते थे।

“हम हर समय स्ट्राइक के लिए तैयार थे”

ऑपरेशन से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, “हम दुश्मन के इलाके के बेहद करीब थे। हमारी स्थिति ऐसी थी कि आदेश मिलते ही कार्रवाई शुरू हो सकती थी। लेकिन हमारी सबसे बड़ी ताकत यह थी कि दुश्मन को हमारी मौजूदगी का पता ही नहीं चला।”

भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन के दौरान अपनी सबमरीनों को बेहद शांत मोड में चलाया, ताकि वे दुश्मन के सोनार सिस्टम से बच सकें।

चार सबमरीन कमांडरों को मिला सम्मान

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान साहस और रणनीतिक क्षमता दिखाने वाले चार सबमरीन कमांडरों को नौसेना मेडल (वीरता) से सम्मानित किया गया।

इन अधिकारियों ने लंबे समय तक उच्च जोखिम वाले इलाके में रहकर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी और अपने मिशन को पूरा किया।

हार्बर तक सीमित रही पाकिस्तानी नौसेना

भारतीय नौसेना की इस तैनाती का असर पाकिस्तान की नौसेना पर साफ दिखाई दिया। पाकिस्तान के कई युद्धपोत खुले समुद्र में आने की बजाय कराची और ग्वादर बंदरगाहों के आसपास ही सीमित रहे।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने भारतीय नौसेना की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अपने मेरिटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट “सी ईगल” को भेजा था, लेकिन भारतीय नौसेना ने तुरंत प्रतिक्रिया दी।

मिग-29के ने रोका पाकिस्तानी विमान

जैसे ही पाकिस्तानी विमान भारतीय रडार पर दिखाई दिया, आईएनएस विक्रांत से मिग-29के लड़ाकू विमान उड़ाए गए।

भारतीय फाइटर जेट्स ने पाकिस्तानी विमान को इंटरसेप्ट किया और चेतावनी दी। इसके बाद वह विमान वापस कराची की दिशा में लौट गया।

समुद्र में पूरी तरह नेटवर्क आधारित ऑपरेशन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना का पूरा बेड़ा नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर सिस्टम से जुड़ा हुआ था। यानी युद्धपोत, सबमरीन, हेलिकॉप्टर और फाइटर जेट लगातार एक-दूसरे से जानकारी साझा कर रहे थे।

इससे किसी भी खतरे पर तुरंत प्रतिक्रिया देना आसान हो गया था।

पी-8आई विमान भी थे सक्रिय

भारतीय नौसेना के पी-8आई पोसीडॉन समुद्री निगरानी विमान भी लगातार अरब सागर में गश्त कर रहे थे। इन विमानों की मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर लंबी दूरी से नजर रखी जा रही थी।

इनकी वजह से पाकिस्तान की समुद्री गतिविधियों को लगातार ट्रैक किया जा रहा था।

आईएनएस विक्रांत सिर्फ एक विमानवाहक पोत नहीं, बल्कि पूरा चलता-फिरता युद्ध प्लेटफॉर्म माना जाता है।

इस पर मिग-29के फाइटर जेट, एमएच-60 रोमियो हेलिकॉप्टर, चेतक और सीकिंग हेलिकॉप्टर तैनात थे। इसके अलावा बराक-8 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम भी मौजूद था।

अगर समुद्र से हमला शुरू होता, तो विक्रांत की भूमिका सबसे आगे रहती।

सबमरीनें क्यों थीं सबसे खतरनाक

समुद्र में सबमरीन सबसे मुश्किल लक्ष्य मानी जाती हैं, क्योंकि वे लंबे समय तक बिना दिखाई दिए ऑपरेट कर सकती हैं।

भारतीय सबमरीनों के पास आधुनिक सोनार, टॉरपीडो और स्टेल्थ क्षमता थी। यही वजह रही कि पाकिस्तान की नौसेना उन्हें खोज नहीं सकी।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, समुद्र में सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक दबाव तब बनता है, जब दुश्मन को पता हो कि सबमरीन आसपास है, लेकिन उसकी सही स्थिति मालूम न हो।

बिना गोली चलाए बनाया दबाव

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय नौसेना ने कोई सीधा हमला नहीं किया, लेकिन उसकी मौजूदगी ही पाकिस्तान के लिए बड़ा दबाव बन गई।

अरब सागर में भारतीय नौसेना की तैनाती इतनी मजबूत थी कि पाकिस्तान को हर समय समुद्र से संभावित हमले का डर बना रहा। यही वजह थी कि उसकी नौसेना खुले समुद्र में आक्रामक गतिविधियां नहीं दिखा सकी।

Indian Navy Submarines Entered Pakistani Waters During Operation Sindoor

अंडमान में पानी के नीचे फहराया गया विशाल तिरंगा, बनाया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड

Largest Underwater Indian Flag
उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी वर्ल्ड रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट लेते हुए।

Largest Underwater Indian Flag: अंडमान और निकोबार प्रशासन ने समुद्र के अंदर सबसे बड़ा भारतीय तिरंगा फहराकर नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। यह खास आयोजन स्वराज द्वीप पर किया गया, जहां करीब 200 गोताखोरों ने मिलकर पानी के नीचे विशाल तिरंगे को फैलाया। इस रिकॉर्ड में सबसे खास बात यह रही कि अंडमान और निकोबार के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी भी खुद डाइविंग टीम का हिस्सा बने।

समुद्र के अंदर फहराए गए इस तिरंगे की लंबाई 60 मीटर और चौड़ाई 40 मीटर थी। इसे बंगाल की खाड़ी के साफ पानी में फैलाया गया। प्रशासन का कहना है कि इस आयोजन का मकसद सिर्फ रिकॉर्ड बनाना नहीं था, बल्कि अंडमान और निकोबार को दुनिया के बड़े स्कूबा डाइविंग और मरीन टूरिज्म केंद्र के रूप में पेश करना भी था।

Largest Underwater Indian Flag: स्वराज द्वीप पर हुआ खास आयोजन

यह आयोजन शनिवार सुबह करीब 10 बजे स्वराज द्वीप पर किया गया। स्वराज द्वीप अंडमान और निकोबार का प्रमुख पर्यटन स्थल माना जाता है, जहां हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।

इस रिकॉर्ड प्रयास के लिए कई सरकारी एजेंसियों और निजी डाइविंग विशेषज्ञों को शामिल किया गया। इसमें फॉरेस्ट डिपार्टमेंट, मरीन पुलिस और निजी गोताखोरों ने हिस्सा लिया। पूरे कार्यक्रम को सुरक्षा नियमों और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के दिशा-निर्देशों के तहत आयोजित किया गया।

200 गोताखोरों ने संभाली जिम्मेदारी

इतने बड़े तिरंगे को समुद्र के अंदर फैलाना आसान काम नहीं था। इसके लिए करीब 200 प्रशिक्षित गोताखोरों की टीम बनाई गई। सभी गोताखोरों ने एक साथ मिलकर तिरंगे को पानी के अंदर सही तरीके से फैलाया।

समुद्र के अंदर तेज बहाव और सीमित दृश्यता जैसी चुनौतियों के बीच इस पूरे ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। आयोजन के दौरान तकनीकी टीम और सुरक्षा कर्मी भी लगातार निगरानी करते रहे।

उपराज्यपाल भी बने डाइविंग टीम का हिस्सा

इस आयोजन में अंडमान और निकोबार के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी ने भी हिस्सा लिया। वे खुद डाइविंग टीम के साथ समुद्र में उतरे और रिकॉर्ड प्रयास का हिस्सा बने।

प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि उपराज्यपाल की भागीदारी यह दिखाती है कि प्रशासन पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर कितना गंभीर है।

पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिश

अंडमान और निकोबार प्रशासन इस आयोजन को पर्यटन से जोड़कर देख रहा है। अधिकारियों का कहना है कि द्वीपों की पहचान सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का समुद्री जीवन और साफ पानी भी दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है।

पर्यटन विभाग के निदेशक विनायक चामड़िया ने कहा, “इस आयोजन का मकसद दुनिया को यह दिखाना है कि अंडमान और निकोबार स्कूबा डाइविंग और मरीन टूरिज्म के लिए कितना खास स्थान है।”

उन्होंने कहा कि यहां का समुद्री इकोसिस्टम, रंग-बिरंगी मछलियां और साफ पानी इसे एडवेंचर टूरिज्म के लिए बेहद उपयुक्त बनाते हैं।

समुद्री जैव विविधता को दिखाने की कोशिश

प्रशासन का कहना है कि इस रिकॉर्ड प्रयास के जरिए अंडमान और निकोबार की समृद्ध समुद्री जैव विविधता को भी दुनिया के सामने लाने की कोशिश की गई।

यह इलाका कोरल रीफ, समुद्री जीवों और साफ पानी के लिए जाना जाता है। बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक यहां स्कूबा डाइविंग और अंडरवॉटर एक्टिविटी के लिए आते हैं।

सुरक्षा नियमों का रखा गया ध्यान

इतने बड़े स्तर पर समुद्र के अंदर आयोजन करने के लिए विशेष सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। तकनीकी विशेषज्ञों और सपोर्ट टीम को पहले से तैनात किया गया था।

गोताखोरों को अलग-अलग टीमों में बांटा गया था और हर टीम को खास जिम्मेदारी दी गई थी। पूरे आयोजन के दौरान अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन किया गया।

अधिकारियों के मुताबिक, इस आयोजन का एक उद्देश्य जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देना भी था। प्रशासन चाहता है कि पर्यटन बढ़ने के साथ समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा भी बनी रहे।

इसी वजह से आयोजन के दौरान इस बात का ध्यान रखा गया कि समुद्री जीवन और कोरल रीफ को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।

अंडमान और निकोबार प्रशासन का मानना है कि इस रिकॉर्ड के जरिए द्वीपों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी।

अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के आयोजन से दुनिया भर के डाइवर्स, एडवेंचर पसंद करने वाले लोग और पर्यटक अंडमान की तरफ आकर्षित होंगे। साथ ही इससे भारत के समुद्री पर्यटन को भी नई पहचान मिलने में मदद मिलेगी।

अरब सागर में फंसा भारतीय जहाज, पाकिस्तान नेवी की मदद की पूरी सच्चाई आई सामने

Pakistan Navy assists Indian vessel
MV Gautam

Pakistan Navy assists Indian vessel: अरब सागर में पाकिस्तान नेवी ने समुद्र में फंसे एक भारतीय जहाज की मदद करने की खबर को पाकिस्तान ने इस तरह प्रचारित किया कि उसने अनुशासन और राजनीतिक तनावों किनारे रख कर मदद पहुंचाई। लेकिन असलियत यह है कि जहाज की बिजली पूरी तरह बंद हो जाने के कारण समुद्र में बह रहे इस जहाज पर सात लोग सवार थे। पाकिस्तानी टीम ने जहाज तक पहुंचकर क्रू को खाने-पीने का सामान दिया, जबकि भारतीय तटरक्षक बल ने आगे की कार्रवाई शुरू की।

यह मामला भारतीय मर्चेंट वेसल “एमवी गौतम” से जुड़ा है, जो ओमान से गुजरात के अलंग शिपब्रेकिंग यार्ड की ओर जा रहा था। रास्ते में जहाज का जनरेटर खराब हो गया, जिसके बाद उसमें पूरी तरह बिजली चली गई और वह समुद्र में बहने लगा।

Pakistan Navy assists Indian vessel: अलंग जा रहा था जहाज

एमवी गौतम (मोरोनी पंजीकृत) एक पुराना मल्टी-पर्पज ऑफशोर वेसल था, जिसे तोड़ने के लिए गुजरात के अलंग भेजा जा रहा था। अलंग दुनिया के सबसे बड़े शिपब्रेकिंग यार्ड में गिना जाता है, जहां पुराने जहाजों को काटा जाता है।

यह जहाज ओमान के शिनास पोर्ट से भारत की तरफ आ रहा था। जहाज पर कुल सात क्रू सदस्य मौजूद थे, जिनमें छह भारतीय और एक इंडोनेशियाई नागरिक था।

अचानक बंद हुआ पूरा पावर सिस्टम

3 मई को समुद्र में सफर के दौरान जहाज का मुख्य जनरेटर खराब हो गया। इसके बाद जहाज में पूरी बिजली सप्लाई बंद हो गई। बिजली बंद होने से इंजन, नेविगेशन सिस्टम और कई जरूरी उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया।

हालात ऐसे हो गए कि जहाज खुद से आगे बढ़ने में सक्षम नहीं रहा और समुद्र में धीरे-धीरे बहने लगा। उस समय यह पाकिस्तान के सर्च एंड रेस्क्यू (SAR) क्षेत्र में मौजूद था।

पाकिस्तान के SAR क्षेत्र में हुई घटना

समुद्र में अलग-अलग देशों के जिम्मेदारी वाले सर्च एंड रेस्क्यू क्षेत्र तय होते हैं। जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां बचाव की जिम्मेदारी पाकिस्तान की थी।

मुंबई स्थित मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर ने पाकिस्तान के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। इसके बाद पाकिस्तान मैरीटाइम सिक्योरिटी एजेंसी और पाकिस्तान नेवी ने जहाज तक पहुंचने की कार्रवाई शुरू की।

पाकिस्तानी टीम जहाज पर पहुंची

पाकिस्तान मैरीटाइम सिक्योरिटी एजेंसी की तकनीकी टीम जहाज पर चढ़ी और उन्होंने खराबी की जांच की। जांच के बाद पता चला कि जहाज का मुख्य जनरेटर पूरी तरह खराब हो चुका है और उसे मौके पर ठीक करना संभव नहीं है।

इसके बाद पाकिस्तानी टीम ने जहाज पर मौजूद लोगों को जरूरी खाने-पीने का सामान उपलब्ध कराया। लेकिन यह मदद केवल इमरजेंसी सप्लाई तक सीमित रही, क्योंकि जहाज की तकनीकी खराबी को ठीक करना उनकी क्षमता से बाहर था।

सूत्रों के मुताबिक, “जहाज में मुख्य समस्या पावर जेनरेशन सिस्टम की थी। यह खराबी इतनी बड़ी थी कि समुद्र में उसे ठीक करना संभव नहीं था।”

लगातार बहता रहा जहाज

बिजली और इंजन बंद होने के कारण जहाज समुद्र की लहरों के सहारे बहता रहा। शुरुआत में यह करीब 1.5 नॉट की रफ्तार से पूर्व-उत्तर दिशा की तरफ बढ़ रहा था। धीरे-धीरे उसकी रफ्तार घटकर करीब 0.6 नॉट रह गई थी।

धीरे-धीरे बहते हुए जहाज भारतीय सर्च एंड रेस्क्यू क्षेत्र के करीब पहुंच गया। 4 मई की शाम तक यह द्वारका लाइटहाउस से करीब 262 नॉटिकल मील दूर पहुंच चुका था।

भारतीय तटरक्षक बल भी सक्रिय हुआ

भारतीय तटरक्षक बल के गांधीनगर स्थित रीजनल हेडक्वॉर्टर (उत्तर-पश्चिम) को 4 मई की रात 11:22 पर इस मामले की जानकारी मिली। इसके बाद आईसीजी जहाज “राजरतन” को इलाके में भेजा गया।

जहाज के पास पहुंचने के बाद भारतीय तटरक्षक बल ने उससे संपर्क स्थापित किया। हालांकि जहाज की कम्युनिकेशन क्षमता बहुत सीमित थी। केवल वीएचएफ और एआईएस सिस्टम बैटरी बैकअप पर चल रहे थे।

क्रू की स्थिति सामान्य बताई गई, लेकिन जहाज बिना लाइट और बिना इंजन के समुद्र में मौजूद था, जिससे आसपास गुजरने वाले दूसरे जहाजों के लिए खतरा पैदा हो गया।

टग बोट बुलाने की तैयारी

भारतीय तटरक्षक बल ने डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ शिपिंग को जहाज की स्थिति की जानकारी दी। जहाज को सुरक्षित जगह तक खींचकर ले जाने के लिए अब टग बोट की जरूरत बताई गई है।

क्योंकि जहाज खुद से चल नहीं सकता, इसलिए उसे खींचकर अलंग तक पहुंचाना ही एकमात्र विकल्प माना जा रहा है।

समुद्र में क्यों खतरनाक होती है ऐसी स्थिति

जब किसी जहाज की बिजली और इंजन पूरी तरह बंद हो जाते हैं, तो वह समुद्र में अनियंत्रित हो जाता है। रात के समय लाइट्स बंद होने पर दूसरे जहाजों के लिए उसे देख पाना मुश्किल हो जाता है।

ऐसी स्थिति में टक्कर का खतरा बढ़ जाता है। इसी वजह से भारतीय तटरक्षक बल लगातार जहाज की निगरानी कर रहा है।

एंटी-पाइरेसी और SAR सहयोग का हिस्सा

भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव के बावजूद समुद्र में सर्च एंड रेस्क्यू सहयोग पहले भी होता रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों (UNCLOS) और IMO (International Maritime Organization) के तहत किसी भी संकट में फंसे जहाज की मदद करना जरूरी माना जाता है।

इस मामले में भी पाकिस्तान नेवी और भारतीय एजेंसियों के बीच जानकारी साझा की गई। पूरी प्रक्रिया मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सिस्टम के जरिए आगे बढ़ाई गई।

क्रू की सुरक्षा बनी सबसे बड़ी प्राथमिकता

जहाज पर मौजूद सात लोगों की सुरक्षा इस पूरे ऑपरेशन का सबसे अहम हिस्सा रही। पाकिस्तानी टीम ने जहाज पर पहुंचकर उनकी स्थिति देखी और जरूरी सप्लाई दी, जबकि भारतीय तटरक्षक बल आगे की निगरानी में लगा हुआ है।

6 मई की सुबह तक जहाज धीरे-धीरे भारतीय क्षेत्र की तरफ बह रहा था और उसकी रफ्तार घटकर करीब 0.6 नॉट रह गई थी। फिलहाल जहाज समुद्र में बहता हुआ निगरानी में रखा गया है और उसे सुरक्षित तरीके से बाहर निकालने की तैयारी जारी है।

राफेल और मिराज-2000 की जान MICA मिसाइल अब भारत में होगी तैयार, IAF-एमबीडीए की बड़ी डील

MICA Missile MRO India

MICA Missile MRO India: यूरोप की प्रसिद्ध मिसाइल कंपनी एमबीडीए और भारतीय वायुसेना के बीच एक बेहद अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत राफेल और मिराज-2000 में इस्तेमाल होने वाली एयर-टू-एयर मीका मिसाइलों की मरम्मत, रखरखाव और मिड लाइफ ओवरहॉल (MRO) की सुविधा भारत में ही तैयार की जाएगी। ये वही मीका मिसाइलें हैं जिनका इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर में क्लोज कॉम्बैट फाइट में किया गया था।

इस फैसले के बाद भारतीय वायुसेना को अपनी एयर टू एयर मिसाइलों के मेंटेनेंस के लिए विदेश पर पहले जैसी निर्भरता नहीं रखनी पड़ेगी। वहीं इस कदम को भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है।

MICA Missile MRO India: क्या है इस पूरे समझौते में

यूरोपीयन मल्टी-नेशनल डिफेंस कंपनी मैट्रा बे डायनेमिक्स एलेनिया यानी एमबीडीए ने भारतीय वायुसेना के साथ मीका मिसाइलों के लिए एमआरओ यानी मेंटेनेंस, रिपेयर और मिड लाइफ ओवरहॉल क्षमता डेवलप करने का एग्रीमेंट किया है। इस सुविधा को भारतीय वायुसेना ही स्थापित करेगी और उसका ऑपरेशन भी वायुसेना के हाथ में रहेगा। वहीं एमबीडीए कंपनी मशीनें, विशेष उपकरण, तकनीकी डेटा, ट्रेनिंग और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराएगी। इसका मतलब यह है कि अब मीका मिसाइलों की जांच, मरम्मत और उनकी सर्विस लाइफ बढ़ाने का काम भारत में ही किया जा सकेगा।

एमबीडीए नाम चार बड़ी यूरोपीय रक्षा कंपनियों के नामों को मिलाकर बना है। इसमें “एम” फ्रांस की कंपनी मैट्रा से लिया गया है। “बी” ब्रिटेन की बीएई सिस्टम्स को दर्शाता है। “डी” का मतलब डायनेमिक्स है, जबकि “ए” इटली की एलेनिया कंपनी से जुड़ा है, जो पहले एलेनिया मार्कोनी सिस्टम्स और फिनमेकेनिका का हिस्सा थी। अब यह कंपनी लियोनार्डो ग्रुप के नाम से जानी जाती है। (MICA Missile MRO India)

क्या होती है एमआरओ सुविधा

एमआरओ का मतलब होता है किसी हथियार या सिस्टम की समय-समय पर तकनीकी जांच, खराब हिस्सों की मरम्मत और लंबे समय तक इस्तेमाल के लिए उसकी क्षमता बनाए रखना।

हर मिसाइल की एक तय सर्विस लाइफ होती है। कुछ सालों बाद उसकी जांच और ओवरहॉल जरूरी हो जाता है। अभी तक इस तरह का काम कई बार विदेशों में करना पड़ता था, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ते थे।

अब भारत में यह सुविधा बनने के बाद मिसाइलों को जल्दी तैयार किया जा सकेगा। (MICA Missile MRO India)

MICA Missile MRO India

क्या है मीका मिसाइल

मीका एक आधुनिक एयर टू एयर मिसाइल है, जिसका इस्तेमाल दुश्मन के लड़ाकू विमान, ड्रोन और क्रूज मिसाइलों को मार गिराने के लिए किया जाता है।

इसका पूरा नाम “मिसाइल डी इंटरसेप्शन एट डी कॉम्बैट एरियन” है। यह फ्रांस में डेवलप की गई मिसाइल है और दुनिया की एडवांस एयर कॉम्बैट मिसाइलों में गिनी जाती है। भारतीय वायुसेना इसे मिराज 2000 और राफेल लड़ाकू विमानों पर इस्तेमाल करती है। लॉकहीड मर्टिन के बाद एमबीडीए दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मिसाइल कंपनी है, जो मीटियोर, मीकाा, स्कैल्प, स्ट्रॉम, शैडो, ब्रिमस्टोन, एक्सोसेट और एस्टर जैसे प्रोडक्ट्स बनाती है।

MICA मिसाइल भारतीय वायु सेना के मिराज 2000 लड़ाकू विमान की मुख्य एयर-टू-एयर मिसाइल मानी जाती है और इसका इस्तेमाल राफेल फाइटर जेट पर भी किया जाता है। यह मिसाइल दुश्मन के विमान को दूर से मार गिराने यानी बीवीआर (बियॉन्ड विजुअल रेंज) लड़ाई में भी काम आती है और करीब से होने वाले हवाई मुकाबले में भी इस्तेमाल की जा सकती है।

इसके दो अलग-अलग संस्करण हैं। एक इंफ्रारेड सीकर वाला और दूसरा रडार आधारित सीकर वाला। इससे यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकती है। यह करीब 60 किलोमीटर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है। यह हाई मैन्यूवरेबिलिटी (50G) वाली मिसाइल है। इसकी सबसे बड़ी खासियत “फायर एंड फॉरगेट” क्षमता है, यानी मिसाइल दागने के बाद पायलट को लगातार उसे कंट्रोल नहीं करना पड़ता। इसके अलावा यह बहुत तेजी से मोड़ लेने और हवा में तेजी से दिशा बदलने में सक्षम है।

ऑपरेशन सिंदूर में मिराज 2000 और राफेल पर मीटियोर जैसी लंबी दूरी की मिसाइल की जगह मीका लगाई गई थी। क्योंकि यह कॉम्बैट एयर पेट्रोल और सीमित एंगेजमेंट वाले मिशनों में यह ज्यादा उपयुक्त थी। (MICA Missile MRO India)

बालाकोट में हुई थी इस्तेमाल

बता दें कि बालाकोट एयर स्ट्राइक में मीका मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन इसका इस्तेमाल जमीन पर हमला करने के लिए नहीं हुआ था। यह मिसाइल भारतीय लड़ाकू विमानों को हवाई सुरक्षा देने के लिए इस्तेमाल की गई थी।

26 फरवरी 2019 को भारतीय वायु सेना ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर हमला किया था। इस मिशन में 12 से 20 मिराज 2000 लड़ाकू विमान शामिल थे। इनमें से कुछ विमान स्पाइस 2000 स्मार्ट बम और क्रिस्टल मेज मिसाइल लेकर गए थे, जो हमले में शामिल थे।

इसके अलावा चार मिराज 2000 विमान मीका आरएफ और मीका आईआर एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस थे। इनका काम स्ट्राइक मिशन को सुरक्षा देना था। ये विमान पीछे रहकर नजर रख रहे थे ताकि अगर पाकिस्तान की तरफ से एफ-16 जैसे लड़ाकू विमान हमला करने आएं, तो तुरंत जवाब दिया जा सके।

मीका मिसाइल मिराज 2000 की मुख्य एयर-टू-एयर मिसाइल है। यह लंबी दूरी की बियोंड द विजुअल रेंज (बीवीआर) लड़ाई और क्लोज कॉम्बैट हवाई मुकाबलों दोनों में इस्तेमाल की जा सकती है। बालाकोट मिशन के दौरान इसे पूरी तरह तैयार रखा गया था, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किया जा सके। (MICA Missile MRO India)

भारतीय वायुसेना के लिए क्यों है अहम

भारतीय वायुसेना पिछले कई सालों से मीका मिसाइलों का इस्तेमाल कर रही है। खास तौर पर राफेल और मिराज जैसे फाइटर जेट्स की एयर कॉम्बैट क्षमता में इसकी बड़ी भूमिका है। अब भारत में एमआरओ सुविधा बनने से इन मिसाइलों की उपलब्धता बढ़ेगी। वहीं, एमबीडीए की मीटियोर और स्कैल्प जैसी मिसाइलें भी भारतीय वायुसेना की ताकत का हिस्सा हैं।

ऑपरेशनल तैयारी होगी मजबूत

कंपनी ने अपने बयान में कहा कि भारत में इस तरह की क्षमता विकसित करने से देश की रणनीतिक स्वतंत्रता मजबूत होगी। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारतीय इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को आधुनिक मिसाइल सिस्टम पर काम करने का मौका मिलेगा। एमबीडीए भारतीय वायुसेना को तकनीकी प्रशिक्षण भी देगी। इससे भविष्य में भारत के भीतर ही उच्च स्तर की मिसाइल तकनीक से जुड़ा अनुभव विकसित होगा। (MICA Missile MRO India)

INS विक्रांत से उड़ा भारत का पहला स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन, भारतीय नौसेना को मिली नई ‘आंख’

INS Vikrant Maritime Spotter Drone
INS Vikrant Maritime Spotter Drone

INS Vikrant Maritime Spotter Drone: देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से भारत के पहले स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन का सफल ऑपरेशन किया गया है। इस ड्रोन को खास तौर पर समुद्री मिशनों के लिए तैयार किया गया है। यह ड्रोन समुद्र में निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने, एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन और अवैध तस्करी रोकने जैसे मिशनों में नौसेना की मदद करेगा। भारतीय नौसेना ने इस उपलब्धि को देश में एडवांस्ड ऑटोनॉमस नेवल सिस्टम के विकास की दिशा में अहम मील का पत्थर बताया है। नौसेना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह सिस्टम अब समुद्र में भारतीय जहाजों की “आंख” की तरह काम करेगा।

अब तक समुद्री निगरानी के लिए बड़े हेलीकॉप्टर या विमान का इस्तेमाल करना पड़ता था। लेकिन छोटे मिशनों के लिए ऐसा करना हमेशा आसान नहीं होता। स्पॉटर ड्रोन इस कमी को पूरा करता है। यह कम समय में उड़ान भर सकता है और कम खर्च में निगरानी कर सकता है।

INS Vikrant Maritime Spotter Drone: आईएनएस विक्रांत से भरी उड़ान

इस ड्रोन को भारत के पहले स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत के डेक से उड़ाया गया। चलते हुए विशाल युद्धपोत से किसी ड्रोन का सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग आसान नहीं माना जाता, क्योंकि समुद्र में जहाज लगातार हिलता रहता है और तेज हवाएं भी चुनौती पैदा करती हैं। इसके बावजूद इस ड्रोन ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी और मिशन पूरा करने के बाद सुरक्षित वापसी भी की। इस उपलब्धि को नौसेना की तकनीकी तैयारी और भारतीय कंपनियों की क्षमता का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।

आईएनएस विक्रांत भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी विमानवाहक पोत है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में डिजाइन और तैयार किया गया। यह युद्धपोत भारतीय नौसेना की ब्लू वॉटर क्षमता का प्रमुख हिस्सा माना जाता है। करीब 45 हजार टन वजनी यह पोत लंबी दूरी के समुद्री अभियानों को अंजाम देने में सक्षम है।

इस विमानवाहक पोत पर मिग-29के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और दूसरे एयर प्लेटफॉर्म तैनात किए जा सकते हैं। अब इसमें स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन की क्षमता भी जुड़ गई है। इससे इसकी समुद्री निगरानी और इंटेलिजेंस क्षमता और मजबूत हो गई है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

क्या है मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन

मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन एक छोटा लेकिन बेहद आधुनिक समुद्री निगरानी सिस्टम है। इसे पुणे की कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। यह ड्रोन खास तौर पर नौसेना के लिए बनाया गया है ताकि समुद्र में जहाजों को दूर तक नजर रखने में मदद मिल सके। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह समुद्र के कठिन वातावरण में भी काम कर सके। तेज हवा, नमकीन पानी और लगातार हिलते प्लेटफॉर्म पर भी इसकी कार्यक्षमता बनी रहती है।

बता दें कि भारतीय नौसेना के नए स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को भी स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन भी जोड़ा गया है, जिसे सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

चलते जहाज से उड़ान भरने की क्षमता

इस ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह चलते हुए युद्धपोत से भी उड़ान भर सकता है और उसी पर वापस उतर सकता है। आम तौर पर यह काम बेहद मुश्किल माना जाता है। यह ड्रोन 20 से 45 नॉट की रफ्तार से चल रहे जहाज से भी ऑपरेट हो सकता है। दुनिया की बहुत कम कंपनियों के पास ऐसी तकनीक है। समुद्री इलाकों में तेज हवा, नमी और लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच ड्रोन ऑपरेट करना आसान नहीं होता। इसी वजह से इस सिस्टम को कठिन समुद्री माहौल में काम करने के लिए तैयार किया गया है।

एक नौसैनिक अधिकारी ने कहा, “समुद्र में जहाज लगातार गति और दिशा बदलता रहता है। ऐसे में ड्रोन का सुरक्षित उतरना तकनीकी रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण होता है।” (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

कितनी है इसकी क्षमता

यह ड्रोन करीब 20 किलोमीटर तक निगरानी कर सकता है। एक बार उड़ान भरने के बाद यह लगभग एक घंटे तक हवा में रह सकता है। इसमें आधुनिक कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी मदद से दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकती है। ड्रोन रियल टाइम वीडियो और डेटा सीधे जहाज तक भेजता है। यानी समुद्र में क्या हो रहा है, उसकी जानकारी तुरंत कंट्रोल रूम तक पहुंच जाती है।

ड्रोन में AIS रिसीवर और दूसरे इंटेलिजेंस उपकरण लगाने की क्षमता भी है। इससे समुद्र में जहाजों की गतिविधियों और संदिग्ध मूवमेंट पर नजर रखना आसान हो जाता है।

कंपनी के अनुसार यह ड्रोन करीब 5 किलो तक पेलोड ले जा सकता है। इसमें रीयल टाइम डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम लगाया गया है, जिससे जहाज पर मौजूद ऑपरेटर को तुरंत जानकारी मिलती रहती है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

समुद्र में कैसे करेगा मदद

भारतीय नौसेना के लिए यह ड्रोन कई तरह के मिशनों में उपयोगी साबित हो रहा है। अगर किसी जहाज के आसपास संदिग्ध नाव दिखाई देती है, तो यह ड्रोन तुरंत वहां पहुंचकर तस्वीरें और वीडियो भेज सकता है। एंटी पाइरेसी ऑपरेशन में भी इसकी बड़ी भूमिका मानी जा रही है। समुद्र में समुद्री लुटेरों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए यह काफी उपयोगी है। इसके अलावा अवैध तस्करी रोकने, संदिग्ध जहाजों की पहचान करने और खोज एवं बचाव अभियान में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

पहले भी ऑपरेशन में हो चुका इस्तेमाल

भारतीय नौसेना पहले भी इस तरह के ड्रोन का इस्तेमाल एंटी-पाइरेसी मिशनों में कर चुकी है। साल 2024 में यमन के पास एक मर्चेंट जहाज को समुद्री लुटेरों ने हाईजैक कर लिया था। उस दौरान आईएनएस कोलकाता ने ऑपरेशन चलाकर जहाज को सुरक्षित कराया था।

उस मिशन में स्पॉटर ड्रोन ने रीयल टाइम तस्वीरें और जानकारी उपलब्ध कराई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार ऑपरेशन के दौरान एक समुद्री लुटेरे ने ड्रोन पर गोली भी चलाई थी, लेकिन ड्रोन सुरक्षित वापस लौट आया।

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के को-फाउंडर कैप्टन निकुंज पराशर ने उस समय कहा था, “अगर ड्रोन पर गोली चलती है तो इसका मतलब है कि हमारे सैनिक सुरक्षित हैं। यही इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत है।”

कई मिशनों में मदद करेगा यह सिस्टम

भारतीय नौसेना के लिए यह ड्रोन सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल समुद्री तस्करी रोकने, संदिग्ध नौकाओं की पहचान करने, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन और फ्लीट कोऑर्डिनेशन में भी किया जा सकता है।

ड्रोन की मदद से जहाजों को आसपास के समुद्री इलाके की ज्यादा स्पष्ट जानकारी मिलती है। इससे ऑपरेशन के दौरान तेजी से फैसले लेने में मदद मिलती है और जोखिम भी कम होता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना में इस तरह के 60 से ज्यादा ड्रोन शामिल किए जा चुके हैं। इन्हें अलग-अलग युद्धपोतों और समुद्री मिशनों में इस्तेमाल किया जा रहा है। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

हिंद महासागर में बढ़ती चुनौतियां

भारतीय नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। इस क्षेत्र में समुद्री तस्करी, पाइरेसी और विदेशी जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी माना जाता है।

भारत की समुद्री सीमा लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी है। ऐसे में समुद्री निगरानी के लिए एडवांस्ड ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। यह ड्रोन नौसेना को समुद्र में दूर तक निगरानी रखने में मदद करेगा और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जल्दी पहचान हो सकेगी। (INS Vikrant Maritime Spotter Drone)

केवल 2 साल पुराने डिफेंस स्टार्टअप को मिला 100 करोड़ रुपये का ऑर्डर, सेना को मिलेगा एआई से लैस ‘ड्रोन का शिकारी’

SURGE Counter Drone System

SURGE Counter Drone System: भारत के स्वदेशी डिफेंस टेक स्टार्टअप आर्मरी को रक्षा मंत्रालय से कुल 100 करोड़ रुपये के तीन बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं। कंपनी इन कॉन्ट्रैक्ट्स के तहत भारतीय सेनाओं को अपना स्वदेशी एआई-पावर्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम सर्ज (SURGE) उपलब्ध कराएगी। यह सिस्टम दुश्मन या संदिग्ध ड्रोन की पहचान करने, उन्हें ट्रैक करने और बिना गोली चलाए इनएक्टिव कर सकता है।

गुरुग्राम स्थित आर्मरी के फाउंडर और सीईओ अमरदीप सिंह के मुताबिक कंपनी ने फील्ड ट्रायल्स और ऑपरेशनल इवैल्यूएशन सफलतापूर्वक पूरे किए, जिसके बाद रक्षा मंत्रालय ने यह ऑर्डर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में ड्रोन खतरे तेजी से बदल रहे हैं और हर क्षेत्र में अलग तरह की चुनौती सामने आ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए सर्ज सिस्टम को डिजाइन किया गया है।

SURGE Counter Drone System: फील्ड ट्रायल्स के बाद मिला बड़ा कॉन्ट्रैक्ट

कंपनी के मुताबिक रक्षा मंत्रालय ने अलग-अलग इलाकों में कई चरणों में सर्ज सिस्टम के ट्रायल किए। इन ट्रायल्स के दौरान सिस्टम को ड्रोन डिटेक्शन, आइडेंटिफिकेशन और न्यूट्रलाइजेशन जैसी जरूरी ऑपरेशनल जरूरतों पर परखा गया। परीक्षण सफल रहने के बाद कंपनी को यह कॉन्ट्रैक्ट मिला।

आर्मरी ने बताया कि सर्ज सिस्टम को मथुरा, मेरठ, बबीना और जम्मू जैसे कई सैन्य इलाकों में टेस्ट किया गया। अलग-अलग मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में इसकी क्षमता को जांचा गया। कंपनी का कहना है कि सिस्टम ने सभी ऑपरेशनल मानकों को पूरा किया।

क्या है सर्ज सिस्टम

सर्ज एक एआई बेस्ड काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम (C-UAS) प्लेटफॉर्म है। इसका मुख्य काम संदिग्ध ड्रोन की पहचान करना और उन्हें टारगेट तक पहुंचने से रोकना है। यह सिस्टम रेडियो फ्रीक्वेंसी तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करता है।

कंपनी के अनुसार सर्ज किसी भी ड्रोन की मौजूदगी को लगभग 5 किलोमीटर की दूरी से पहचान सकता है। इसके बाद यह करीब 3 किलोमीटर तक ड्रोन के कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम कर सकता है। इससे ड्रोन अपना कंट्रोल खो देता है और मिशन पूरा नहीं कर पाता।

सर्ज “सॉफ्ट किल” तकनीक पर काम करता है। इसका मतलब है कि यह ड्रोन को फिजिकली गिराने के बजाय उसकी कम्युनिकेशन या नेविगेशन सिस्टम को ब्लॉक करता है। इसके लिए जैमिंग और स्पूफिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

समारिटन बना सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा

सर्ज सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका प्रोप्राइटरी ऑपरेटिंग सिस्टम समारिटन (Samaritan OS) है। आर्मरी ने इसे पूरी तरह भारत में तैयार किया है। कंपनी का दावा है कि यह एआई और मशीन लर्निंग बेस्ड सिस्टम है, जो रीयल टाइम स्कैनिंग करता है।

सर्ज सिस्टम रेडियो फ्रीक्वेंसी यानी RF तकनीक के जरिए करीब 5 किलोमीटर दूर तक किसी भी ड्रोन की मौजूदगी का पता लगा सकता है। इसके बाद यह लगभग 3 किलोमीटर की दूरी तक ड्रोन के कम्युनिकेशन और जीपीएस सिग्नल को जाम या स्पूफ करके उसे इनएक्टिव कर देता है। यानी ड्रोन पर बिना गोली चलाए ही कंट्रोल से बाहर किया जा सकता है।

यह सिस्टम लेयर्ड इंटरडिक्शन तकनीक पर काम करता है। फिलहाल इसमें “सॉफ्ट किल” क्षमता मौजूद है, जिसमें जैमिंग और स्पूफिंग के जरिए ड्रोन को रोका जाता है। कंपनी भविष्य में इसमें “हार्ड किल” क्षमता भी जोड़ने पर काम कर रही है, जिसके तहत ड्रोन को फिजिकली गिराया जा सकेगा।

सर्ज की खास बात यह भी है कि इसकी अलग-अलग यूनिट्स एक नेटवर्क की तरह काम कर सकती हैं। हैंडहेल्ड, ट्राइपॉड माउंटेड और व्हीकल माउंटेड सिस्टम आपस में जानकारी साझा करते हैं और मिलकर ड्रोन खतरे की निगरानी करते हैं। इससे सुरक्षा बलों को रीयल टाइम में बेहतर इंटेलिजेंस मिलती है।

SURGE Counter Drone System

यह सिस्टम कठिन मौसम और मुश्किल इलाकों में भी काम करने के लिए तैयार किया गया है। यह माइनस 30 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तापमान तक काम कर सकता है। इसके अलावा 95 प्रतिशत तक ह्यूमिडिटी यानी नमी वाले वातावरण में भी इसकी क्षमता प्रभावित नहीं होती।

कंपनी के अनुसार समारिटन ओएस हर सेकंड लाखों बार स्कैन करता है। इससे सिस्टम को तेजी से रेस्पॉन्स देने में मदद मिलती है। यह ऑपरेटर को ड्रोन की दिशा, ऊंचाई और लोकेशन जैसी जानकारी भी देता है। खास बात यह है कि यह केवल पहले से मौजूद डेटा लाइब्रेरी पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि नए और अनजान ड्रोन पैटर्न को भी पहचान सकता है।

आर्मरी के सीईओ अमरदीप सिंह के मुताबिक हर क्षेत्र में ड्रोन खतरे अलग होते हैं। कहीं पहाड़ी इलाका होता है, कहीं घना शहरी क्षेत्र और कहीं खुला मैदान। मौसम, ऊंचाई, लाइन ऑफ साइट और रेडियो क्लटर जैसी परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं।

उन्होंने कहा, “हमारा सिस्टम अलग-अलग इलाकों की जरूरत के हिसाब से कस्टमाइज किया गया है। ड्रोन खतरे तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए हमें ऐसे समाधान तैयार करने पड़े जो लगातार खुद को एडाप्ट कर सकें।”

कंपनी के अनुसार सर्ज सिस्टम कई ड्रोन को एक साथ ट्रैक और हैंडल कर सकता है। यह ऑपरेटर को केवल महत्वपूर्ण खतरों की जानकारी दिखाता है ताकि अनावश्यक अलर्ट से बचा जा सके।

सर्ज और समारिटन ओएस दोनों पूरी तरह भारत में विकसित किए गए हैं। कंपनी का दावा है कि सिस्टम का कोड, एल्गोरिदम और मैन्युफैक्चरिंग भारत में ही की गई है।

तीन अलग-अलग वेरिएंट में उपलब्ध

सर्ज सिस्टम को अलग-अलग ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से कई वेरिएंट्स में तैयार किया गया है। इसका हैंडहेल्ड या मैनपैक वर्जन एक सैनिक अपने साथ आसानी से लेकर चल सकता है। यह खासतौर पर उन इलाकों जैसे पहाड़ी क्षेत्र, जंगल या कठिन टेरेन में उपयोगी है जहां बड़े सिस्टम तैनात करना मुश्किल होता है, ।

इसका दूसरा वेरिएंट ट्राइपॉड माउंटेड है, जिसे किसी एक जगह स्थायी रूप से तैनात किया जा सकता है। यह सिस्टम लगातार निगरानी करने में सक्षम है और चेकपॉइंट्स, सैन्य ठिकानों या पेरिमीटर सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

वहीं, तीसरा वेरिएंट व्हीकल माउंटेड है, जिसे सैन्य वाहनों या चलती गाड़ियों पर लगाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल मूविंग कन्वॉय, मोबाइल ऑपरेशन और संवेदनशील सैन्य मूवमेंट की सुरक्षा के दौरान किया जाता है।

कंपनी का कहना है कि सिस्टम को 60 सेकंड से कम समय में ऑपरेशनल किया जा सकता है।

हार्ड किल तकनीक पर भी काम जारी

अमरदीप सिंह ने बताया कि कंपनी अब “हार्ड किल” सॉल्यूशन पर भी काम कर रही है। इसमें दुश्मन ड्रोन को फिजिकली नष्ट करने की क्षमता शामिल होगी। फिलहाल सर्ज सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक तरीके से ड्रोन को निष्क्रिय करता है, लेकिन आने वाले समय में इसमें डायरेक्ट इंटरसेप्शन क्षमता भी जोड़ी जाएगी।

उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में दुनिया भर में ड्रोन खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में केवल जैमिंग ही नहीं, बल्कि फिजिकल न्यूट्रलाइजेशन की जरूरत भी बढ़ रही है।

2024 में शुरू हुई थी कंपनी

आर्मरी की शुरुआत साल 2024 में हुई थी। सिर्फ दो साल के भीतर कंपनी को इतना बड़ा रक्षा ऑर्डर मिलना भारतीय डिफेंस स्टार्टअप सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमरदीप सिंह ने कहा, “यह 100 करोड़ रुपये का ऑर्डर आर्मरी को संभवतः देश की सबसे युवा डिफेंस-टेक स्टार्टअप बनाता है, जिसने इतने कम समय में इतना बड़ा रक्षा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है।”

कंपनी अब तक 35 करोड़ की इक्विटी फंडिंग जुटा चुकी है। इसमें ग्रोएक्स वेंचर्स, एंटलर, इंडस्ट्रियल 47, डेक्सटर वेंचर्स और एसी वेंचर्स जैसे निवेशकों ने हिस्सा लिया है। आर्मरी अब एक नए फंडिंग राउंड की तैयारी कर रही है। इस निवेश का इस्तेमाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने, हार्डवेयर डेवलपमेंट और नए टैलेंट की भर्ती के लिए किया जाएगा।

रक्षा बजट में बढ़ोतरी के बीच मिला ऑर्डर

यह ऑर्डर ऐसे समय में मिला है जब भारत सरकार रक्षा क्षेत्र में लगातार निवेश बढ़ा रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 7.85 ट्रिलियन आवंटित किए हैं। यह देश की जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत है।

पिछले वित्त वर्ष में रक्षा बजट 6.81 ट्रिलियन था, जबकि उससे पहले यह लगभग 6.22 ट्रिलियन था। सरकार लगातार स्वदेशी रक्षा तकनीक और आत्मनिर्भर भारत पर जोर दे रही है।