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मेक इन इंडिया और iDEX के बावजूद क्यों सिस्टम में अटक जाते हैं डिफेंस स्टार्टअप्स? नई किताब ‘Unfolded’ में पूर्व ब्यूरोक्रेट ने किया खुलासा

India MSME ecosystem problems
Writer P Sesh Kumar author of "Unfolded: What Ails India’s MSME and Startup Ecosystem?"

India MSME ecosystem problems: भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर यानी माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज को हमेशा बहुत अहम माना जाता है। सरकारें अक्सर कहती हैं कि यही छोटे उद्योग देश की आर्थिक रीढ़ हैं। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक नई किताब ने इस सेक्टर की वास्तविक स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पूर्व ब्यूरोक्रेट और पॉलिसी एक्सपर्ट पी. शेष कुमार की किताब “अनफोल्डेड: व्हाट एल्स इंडियाज एमएसएमई एंड स्टार्टअप इकोसिस्टम?” (Unfolded: What Ails India’s MSME and Startup Ecosystem?) भारत के एमएसएमई और स्टार्टअप इकोसिस्टम की कमजोरियों और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करती है। इस किताब में लेखक ने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को विस्तार से समझाने की कोशिश की है।

करीब 700 से अधिक पन्नों की इस किताब में 26 चैप्टर हैं, जिनमें भारत के छोटे उद्योगों, स्टार्टअप्स और खास तौर पर डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले एमएसएमई की समस्याओं को गहराई से बताया गया है। (India MSME ecosystem problems)

पी. शेष कुमार का नजरिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे इस सिस्टम को बाहर से नहीं बल्कि अंदर से समझते हैं। वे पहले एमएसएमई मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं और नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा भी रहे हैं। इसलिए किताब में उन्होंने केवल सैद्धांतिक चर्चा नहीं की, बल्कि अपने अनुभव और अवलोकन के आधार पर यह बताया है कि घोषणाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच कितना बड़ा अंतर मौजूद है। (India MSME ecosystem problems)

India MSME ecosystem problems: भारतीय अर्थव्यवस्था में एमएसएमई की बड़ी भूमिका

भारत में एमएसएमई सेक्टर का योगदान बहुत बड़ा माना जाता है। विभिन्न सरकारी आंकड़ों के अनुसार यह सेक्टर देश के जीडीपी में 30 फीसदी से ज्यादा योगदान देता है। इसके अलावा करीब 11 करोड़ लोगों को रोजगार देने में भी एमएसएमई की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हर साल बजट भाषण में इस सेक्टर को “भारतीय अर्थव्यवस्था की बैकबोन” कहा जाता है। लेकिन किताब में बताया गया है कि इस सेक्टर के सामने कई बुनियादी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं।

पी. शेष कुमार के मुताबिक भारत में केवल लगभग 14 फीसदी एमएसएमई को ही औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से कर्ज मिल पाता है। इसका मतलब है कि अधिकांश छोटे उद्योगों को फाइनेंस के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

किताब में यह भी बताया गया है कि एमएसएमई सेक्टर में 330 से 530 बिलियन डॉलर तक का क्रेडिट गैप मौजूद है। यानी छोटे उद्योगों को जितने वित्तीय संसाधनों की जरूरत है, उतने उपलब्ध नहीं हैं। (India MSME ecosystem problems)

नीतियों और योजनाओं के बावजूद समस्याएं

पिछले कई वर्षों में सरकार ने एमएसएमई सेक्टर के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें मुद्रा योजना, उद्यम रजिस्ट्रेशन, चैंपियंस प्लेटफॉर्म और रैंप प्रोग्राम जैसी पहल शामिल हैं।

लेकिन किताब में यह सवाल उठाया गया है कि इन योजनाओं का जमीनी स्तर पर असर कितना दिखाई देता है।

लेखक पी. शेष कुमार का कहना है कि अक्सर नई योजनाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन उनके क्रियान्वयन में कई समस्याएं सामने आती हैं। छोटे उद्योगों तक इन योजनाओं का लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाता।

इसके अलावा किताब में यह भी बताया गया है कि भारत में एमएसएमई से जुड़ा आखिरी व्यापक जनगणना सर्वे 2015 में हुआ था। ऐसे में कई नीतियां पुराने आंकड़ों के आधार पर बन रही हैं। (India MSME ecosystem problems)

नोटबंदी और कोविड का भी पड़ा असर

किताब में यह भी बताया गया है कि पिछले दशक में कुछ बड़े आर्थिक फैसलों का एमएसएमई सेक्टर पर गहरा असर पड़ा। नोटबंदी के दौरान कई छोटे उद्योगों को अचानक नकदी संकट का सामना करना पड़ा। इसके बाद कोविड महामारी ने भी हजारों छोटे कारोबारों को बंद होने की कगार पर पहुंचा दिया।

लेखक के अनुसार इन दोनों घटनाओं के बाद भी छोटे उद्योगों को पूरी तरह स्थिर होने में काफी समय लगा। (India MSME ecosystem problems)

दूसरे देशों के मुकाबले कहां खड़े हैं हम

किताब में लेखक ने भारत की तुलना दूसरे देशों के मॉडल से भी की है। उन्होंने जर्मनी के मिटेलस्टैंड मॉडल का उदाहरण दिया है, जहां छोटे और मध्यम उद्योगों को कम ब्याज पर फाइनेंसिंग मिलती है और स्किल ट्रेनिंग सिस्टम मजबूत है।

इसी तरह चीन के “लिटिल जायंट्स प्रोग्राम” का जिक्र किया गया है, जिसमें छोटे लेकिन तकनीकी रूप से मजबूत उद्योगों को सरकारी सहयोग दिया जाता है।

ब्राजील के टैक्स सिस्टम का भी उदाहरण दिया गया है, जहां छोटे कारोबारों के लिए टैक्स प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। इन उदाहरणों के जरिए किताब में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि भारत में भी सुधार की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। (India MSME ecosystem problems)

स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी सवाल

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी केंद्रित है। लेखक का कहना है कि भारत में स्टार्टअप्स को लेकर काफी उत्साह है, लेकिन कई बार वास्तविक बिजनेस मॉडल से ज्यादा ध्यान वैल्यूएशन और फंडिंग पर दिया जाता है।

उन्होंने कुछ चर्चित कंपनियों के उदाहरण देते हुए बताया है कि जब बिजनेस वैल्यू की जगह निवेशकों की उम्मीदों पर ज्यादा जोर दिया जाता है, तो लंबे समय में समस्याएं सामने आ सकती हैं।

किताब में यह भी कहा गया है कि भारत अभी भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर बहुत कम खर्च करता है। भारत जीडीपी का लगभग 0.7 फीसदी ही रिसर्च एंड डेपलपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन और इजराइल जैसे देशों में यह काफी ज्यादा है। (India MSME ecosystem problems)

डिफेंस सेक्टर में भी कम नहीं हैं एमएसएमई की चुनौतियां

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले एमएसएमई और स्टार्टअप्स की समस्याओं पर भी केंद्रित है। भारत में सरकार लंबे समय से आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के तहत डिफेंस प्रोडक्शन में छोटे उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने की बात कर रही है।

दरअसल पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, और iDEX जैसी पहल के जरिए डिफेंस सेक्टर में एमएसएमई और स्टार्टअप्स की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की है। नीति स्तर पर यह एक बड़ा बदलाव माना जाता है, क्योंकि लंबे समय तक रक्षा उत्पादन मुख्य रूप से बड़े सार्वजनिक उपक्रमों और विदेशी कंपनियों के हाथ में रहा है। लेकिन किताब के अनुसार जब इन नीतियों को जमीन पर लागू किया जाता है, तो कई ऐसी संस्थागत बाधाएं सामने आती हैं जो छोटे उद्यमों के लिए आगे बढ़ना मुश्किल बना देती हैं। (India MSME ecosystem problems)

DGQA कराता है लंबा इंतजार

डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले कई स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती DGQA यानी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस की प्रक्रिया बताई गई है।

किताब में एक उदाहरण दिया गया है जिसमें एक छोटे एमएसएमई ने सेना के लिए रेडियो सिस्टम डेवलप किया था। लेकिन उसकी टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल थी कि कंपनी को सालों तक इंतजार करना पड़ा।

टेस्टिंग कई बार टलती रही, दस्तावेजों में छोटी गलतियों पर फाइलें वापस लौटा दी गईं और बार-बार नए परीक्षण की मांग की गई। इस तरह की प्रक्रिया छोटे उद्योगों के लिए काफी मुश्किल हो जाती है। (India MSME ecosystem problems)

भुगतान में देरी भी बड़ी समस्या

किताब में यह भी बताया गया है कि डिफेंस सेक्टर में पेमेंट में देरी एमएसएमई के लिए गंभीर समस्या बन जाती है। एमएसएमई मंत्रालय के समाधान पोर्टल पर हजारों शिकायतें दर्ज हैं जिनमें कंपनियों ने भुगतान में देरी की शिकायत की है। छोटे उद्योगों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल होती है क्योंकि उनके पास बड़े उद्योगों जैसी वित्तीय क्षमता नहीं होती।

टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

कई डिफेंस स्टार्टअप्स के सामने एक और समस्या टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। कई बार उन्हें अपने उत्पादों के परीक्षण के लिए सरकारी प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां पहले से ही भारी काम का दबाव होता है।
इस वजह से नए उत्पादों की टेस्टिंग और प्रमाणन में काफी समय लग जाता है।

लेखक पी. शेष कुमार का कहना है कि भारत में एमएसएमई सेक्टर को सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है, बल्कि जरूरत ईमानदार समीक्षा, बेहतर डेटा और प्रभावी क्रियान्वयन की है। अगर नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को कम किया जाए, तो एमएसएमई और स्टार्टअप सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना सकते हैं। (India MSME ecosystem problems)

अब भारत में बनेंगे राफेल के क्रिटिकल सिस्टम! दसॉ एविएशन ने भारतीय कंपनी Hical Technologies को दिया बड़ा कॉन्ट्रैक्ट

Rafale control systems India

Rafale control systems India: भारत की एयरोस्पेस और डिफेंस इंडस्ट्री के लिए एक अच्छी खबर है। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी दसॉ एविएशन ने भारत की बेंगलुरु स्थित कंपनी हिकल टेक्नोलॉजीज के साथ एक लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। इस समझौते के तहत भारतीय कंपनी अब दुनिया के सबसे आधुनिक फाइटर जेट्स में से एक राफेल के लिए क्रिटिकल कंट्रोल सिस्टम से जुड़े हाई-प्रिसिजन प्रोडक्ट्स तैयार करेगी।

इस डील को भारत की एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इससे भारत की भूमिका वैश्विक एयरोस्पेस सप्लाई चेन में और मजबूत होगी। (Rafale control systems India)

Rafale control systems India: राफेल के लिए तैयार होंगे हाई-प्रिसिजन कंट्रोल सिस्टम

हिकल टेक्नोलॉजीज की तरफ से जारी प्रेस रीलिज के मुताबिक नए समझौते के तहत हिकल टेक्नोलॉजीज राफेल फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए हाई-प्रिसिजन कंट्रोल सिस्टम असेंबली और अन्य महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोमैकेनिकल प्रोडक्ट्स का निर्माण करेगी।

ये ऐसे कंपोनेंट होते हैं जो विमान के ऑपरेशन में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। कंट्रोल सिस्टम किसी भी फाइटर जेट का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि इसके जरिए विमान की उड़ान, नियंत्रण और कई तकनीकी प्रक्रियाएं ऑपरेट होती हैं।

दसॉ एविएशन ने कहा है कि हिकल को उन सभी इंजीनियरिंग और क्वालिटी मानकों को पूरा करना होगा जो कंपनी अपने फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए तय करती है। इन मानकों को दुनिया के सबसे कड़े एयरोस्पेस स्टैंडर्ड्स में गिना जाता है। (Rafale control systems India)

भारतीय मैन्युफैक्चरिंग के लिए बड़ी उपलब्धि

इस कॉन्ट्रैक्ट को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भारत केवल फाइनल असेंबली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अब हाई-वैल्यू इंजीनियरिंग और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग में भी सक्रिय भूमिका निभाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी फाइटर जेट के क्रिटिकल सिस्टम बनाना आसान काम नहीं होता। इसके लिए अत्यधिक सटीक इंजीनियरिंग, क्वालिटी कंट्रोल और तकनीकी क्षमता की जरूरत होती है।

हिकल टेक्नोलॉजीज को इस प्रोजेक्ट में शामिल करना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री अब वैश्विक स्तर पर भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर के रूप में उभर रही है।

दसॉ एविएशन के सीनियर एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट ब्रूनो कॉइफियर ने कहा कि हिकल टेक्नोलॉजीज ने क्वालिटी और रिलायबिलिटी के मामले में मजबूत क्षमता दिखाई है। यही वजह है कि कंपनी को राफेल जैसे एडवांस्ड फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए प्रोडक्ट्स तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है।

उन्होंने कहा कि दसॉ एविएशन की पहचान हमेशा उच्च गुणवत्ता और तकनीकी उत्कृष्टता के लिए रही है और हिकल की कार्यशैली इन मूल्यों के साथ मेल खाती है। (Rafale control systems India)

भारतीय कंपनी के लिए बड़ा मौका

हिकल टेक्नोलॉजीज के मैनेजिंग डायरेक्टर यशस जैवीर ने इस समझौते को कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता कई वर्षों की इंजीनियरिंग निवेश, प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और मजबूत क्वालिटी कल्चर का परिणाम है।

उनके अनुसार राफेल जैसे अत्याधुनिक फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए क्रिटिकल प्रोडक्ट्स बनाना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनकर गर्व महसूस हो रहा है। (Rafale control systems India)

भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग होगा मजबूत

यह समझौता भारत और फ्रांस के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को भी दर्शाता है। राफेल फाइटर जेट पहले से ही भारतीय वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा है। भारत ने फ्रांस से 36 राफेल फाइटर जेट खरीदे हैं जो अब भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा भारत और फ्रांस के बीच रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में कई अन्य सहयोग भी चल रहे हैं। वहीं इस तरह के इंडस्ट्रियल कॉन्ट्रैक्ट से दोनों देशों के बीच तकनीकी साझेदारी को और मजबूती मिलेगी।

साथ ही, इस समझौते को भारत सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार लंबे समय से यह कोशिश कर रही है कि भारत केवल हथियार खरीदने वाला देश न रहे, बल्कि रक्षा उपकरणों के निर्माण में भी बड़ी भूमिका निभाए। (Rafale control systems India)

बता दें कि राफेल प्रोग्राम दुनिया के सबसे सक्रिय फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम्स में से एक माना जाता है। इस विमान का इस्तेमाल फ्रांस की एयर फोर्स और नेवी के अलावा भारतीय वायुसेना समेत कई अन्य देशों की वायु सेनाएं भी करती हैं। इसके अलावा भारतीय नौसेना के लिए भी भारत ने अप्रैल 2025 में फ्रांस के साथ 26 राफेल मरीन जेट्स का सौदा साइन किया है। इनमें 22 सिंगल-सीटर (एक सीट वाले) और 4 ट्विन-सीटर (ट्रेनर वर्जन) शामिल हैं। ये जेट्स आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर तैनात किए जाएंगे। 26 राफेल मरीन जेट्स की डिलीवरी 2029 से शुरू होने की उम्मीद है, और यह 2030 तक पूरी हो जाएगी। (Rafale control systems India)

ब्रह्मोस को मिला नया खरीदार, फिलीपींस के बाद अब इंडोनेशिया खरीदेगा सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल

Indonesia BrahMos missile deal

Indonesia BrahMos missile deal: इंडोनेशिया ने भारत से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस खरीदने के लिए समझौता किया है। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता रिको रिकार्डो सिरैत ने बताया कि यह समझौता देश की सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने की योजना का हिस्सा है। खास तौर पर यह कदम समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।

हालांकि उन्होंने इस समझौते की कुल कीमत के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी। इससे पहले खबरें आई थीं कि इस डील की संभावित कीमत 200 से 350 मिलियन डॉलर के बीच हो सकती है।

अगर यह सौदा पूरी तरह लागू होता है तो इंडोनेशिया, भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला दूसरा देश बन जाएगा। इससे पहले फिलीपींस ने 2022 में भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदा था। (Indonesia BrahMos missile deal)

Indonesia BrahMos missile deal: मैरीटाइम डिफेंस क्षमता को कर रहा मजबूत

इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े द्वीप देशों में से एक है। उसके पास हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा है और कई महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते उसके आसपास से गुजरते हैं। इसी वजह से इंडोनेशिया लंबे समय से अपनी मैरीटाइम डिफेंस क्षमता को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की खरीद इसी रणनीति का हिस्सा है। इस मिसाइल को खास तौर पर कोस्टल डिफेंस, एंटी-शिप ऑपरेशन और ग्राउंड अटैक के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

इंडोनेशिया का मानना है कि इस तरह की लंबी दूरी की सुपरसोनिक मिसाइलें उसकी नौसैनिक क्षमता को काफी मजबूत कर सकती हैं। इससे देश अपने समुद्री इलाकों की बेहतर सुरक्षा कर सकेगा। (Indonesia BrahMos missile deal)

शुरुआती चरण में एक बैटरी खरीदने की योजना

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों के अनुसार इंडोनेशिया शुरुआती चरण में ब्रह्मोस मिसाइल की एक बैटरी खरीदने की योजना बना रहा है। मिसाइल की एक बैटरी में आम तौर पर लॉन्चर, कमांड पोस्ट, रडार और सपोर्ट सिस्टम शामिल होते हैं।

सूत्रों का कहना है कि इंडोनेशिया इस खरीद के लिए अपने किसी बैंक से फाइनेंसिंग की प्रक्रिया पूरी कर रहा है। जैसे ही बैंक से फंडिंग से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी होंगी, दोनों देशों के बीच आधिकारिक कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं।

अगले दो से तीन महीनों में इस सौदे को अंतिम रूप दिया जा सकता है। इसके बाद आने वाले समय में इंडोनेशिया ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की संख्या बढ़ाने पर भी विचार कर सकता है। (Indonesia BrahMos missile deal)

भारत और रूस मिल कर बना रहे हैं ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक मानी जाती है। यह मिसाइल भारत और रूस की संयुक्त परियोजना है। इसे भारत के डीआरडीओ और रूस की कंपनी एनपीओ मशिनोस्त्रोयेनीय ने मिलकर डेवलप किया है।

इस परियोजना की शुरुआत 1998 में हुई थी। इसके बाद से इस मिसाइल को लगातार अपग्रेड किया जाता रहा है। ब्रह्मोस का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम को मिलाकर रखा गया है।

ब्रह्मोस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी रफ्तार है। यह मिसाइल सुपरसोनिक स्पीड से उड़ती है, यानी इसकी गति आवाज की रफ्तार से लगभग तीन गुना तक हो सकती है। यही वजह है कि इसे रोकना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल माना जाता है। मिसाइल को जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। इसे जहाजों, पनडुब्बियों, मोबाइल लॉन्चर और लड़ाकू विमानों से भी दागा जा सकता है। भारत की सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल करती हैं। (Indonesia BrahMos missile deal)

एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज 290 किलोमीटर

ब्रह्मोस मिसाइल के अलग-अलग वर्जन मौजूद हैं। लेकिन जो मिसाइल विदेशों को बेची जाती है, उसकी रेंज 290 किलोमीटर तक सीमित रखी जाती है। यह सीमा अंतरराष्ट्रीय मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम (MTCR) के नियमों को ध्यान में रखकर तय की गई है। इस रेंज के भीतर ब्रह्मोस मिसाइल बेहद सटीक तरीके से लक्ष्य को निशाना बना सकती है। यह समुद्र में चल रहे युद्धपोतों, दुश्मन के ठिकानों और महत्वपूर्ण सैन्य ढांचों पर हमला करने में सक्षम है। (Indonesia BrahMos missile deal)

फिलीपींस के बाद दूसरा ग्राहक बनेगा इंडोनेशिया

भारत लंबे समय से ब्रह्मोस मिसाइल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात करने की कोशिश कर रहा था। इस दिशा में पहली बड़ी सफलता 2022 में मिली जब फिलीपींस ने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदने का समझौता किया। फिलीपींस ने तटीय रक्षा के लिए ब्रह्मोस मिसाइल की तीन बैटरियां खरीदने का फैसला किया था। अब अगर इंडोनेशिया के साथ यह सौदा पूरी तरह हो जाता है, तो वह ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला दूसरा विदेशी देश बन जाएगा। यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। (Indonesia BrahMos missile deal)

दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ रहा रक्षा सहयोग

इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस मिसाइल का सौदा केवल एक रक्षा खरीद नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच रणनीतिक सहयोग भी मजबूत होगा। भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत इस क्षेत्र के देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इंडोनेशिया हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण देश है। इसलिए भारत के लिए उसके साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। (Indonesia BrahMos missile deal)

भारत के रक्षा निर्यात को मिलेगा बढ़ावा

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा निर्यात बढ़ाने पर खास ध्यान दिया है। सरकार का लक्ष्य है कि भारत केवल हथियार खरीदने वाला देश न रहे, बल्कि हथियार निर्यात करने वाले देशों में भी शामिल हो। ब्रह्मोस मिसाइल इस दिशा में भारत का सबसे सफल रक्षा उत्पाद माना जा रहा है। इंडोनेशिया के साथ संभावित सौदा इस बात का संकेत है कि दुनिया के कई देश अब भारतीय रक्षा तकनीक में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस मिसाइल का यह सौदा सफल रहता है, तो भविष्य में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और भी बढ़ सकता है। इंडोनेशिया अपनी नौसेना और तटीय रक्षा प्रणाली को लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे में एडवांस मिसाइल सिस्टम और समुद्री सुरक्षा उपकरणों की मांग भी बढ़ रही है। (Indonesia BrahMos missile deal)

ईरान-इजराइल जंग में अब ‘वॉटर वॉर’ की आहट! तेल के बाद अब पानी बना युद्ध का हथियार

Bahrain desalination plant drone attack

Bahrain desalination plant drone attack: पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के बीच एक नया मोर्चा खुल गया है। जिसने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। बहरीन में एक डिसेलिनेशन प्लांट पर ड्रोन हमला हुआ, जिसके लिए ईरान पर आरोप लगाए जा रहे हैं।

बहरीन के गृह मंत्रालय ने पुष्टि की है कि ड्रोन हमले में एक वॉटर डिसेलिनेशन फैसिलिटी को नुकसान पहुंचा है। हालांकि अधिकारियों ने उस प्लांट का नाम सार्वजनिक नहीं किया है। सरकार का कहना है कि बिजली और पानी की सप्लाई अभी सामान्य है और नेटवर्क क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा है।

लेकिन इस घटना ने खाड़ी क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है। कई जानकारों का मानना है कि अगर युद्ध में पानी से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जाने लगा, तो इसके गंभीर मानवीय और रणनीतिक परिणाम हो सकते हैं। (Bahrain desalination plant drone attack)

Bahrain desalination plant drone attack: बहरीन में कई बड़े डिसेलिनेशन प्लांट

बहरीन सरकार ने हमले की पुष्टि तो कर दी है, लेकिन जिस प्लांट को निशाना बनाया गया उसका नाम नहीं बताया गया है। बहरीन में कई बड़े डिसेलिनेशन प्लांट मौजूद हैं, जिनमें अल हिद्द प्लांट, रस अबू जरजूर, अद दुर और दुर्रत अल बहरीन जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। इन प्लांटों से हर दिन लाखों क्यूबिक मीटर पानी तैयार किया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि प्लांट का नाम सार्वजनिक न करने के पीछे एक सुरक्षा कारण हो सकता है। अगर यह जानकारी सामने आ जाती कि किस प्लांट को निशाना बनाया गया, तो इससे हमलावरों को यह पता चल सकता था कि कौन सा इंफ्रास्ट्रक्चर ज्यादा कमजोर है।

इसलिए बहरीन सरकार संभवतया उस प्लांट की पहचान छिपाकर सुरक्षा कारणों से जानकारी सीमित रख रही है। (Bahrain desalination plant drone attack)

खाड़ी देशों के लिए लाइफलाइन हैं डिसेलिनेशन प्लांट

खाड़ी क्षेत्र में प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बेहद कम हैं। यही वजह है कि यहां के अधिकांश देश डिसेलिनेशन टेक्नोलॉजी पर निर्भर हैं। डिसेलिनेशन का मतलब है समुद्र के खारे पानी से नमक और अन्य तत्व हटाकर उसे पीने योग्य बनाना।

बहरीन, कुवैत, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों में पीने के पानी का बड़ा हिस्सा इसी प्रक्रिया से आता है।

उदाहरण के लिए कुवैत अपनी लगभग 90 प्रतिशत पीने के पानी की जरूरत डिसेलिनेशन प्लांटों से पूरी करता है। बहरीन में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। ओमान करीब 86 प्रतिशत और सऊदी अरब लगभग 70 प्रतिशत पानी ऐसे ही प्लांटों से प्राप्त करता है।

पूरे खाड़ी क्षेत्र में करीब 400 डिसेलिनेशन प्लांट मौजूद हैं और दुनिया में तैयार होने वाले कुल डिसेलिनेटेड पानी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में बनता है।

यही वजह है कि इन प्लांटों को खाड़ी देशों की वॉटर लाइफलाइन माना जाता है। (Bahrain desalination plant drone attack)

जंग का नया मोर्चा बन सकता है पानी

अब तक पश्चिमी एशिया की जंगों में आम तौर पर तेल, गैस या सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाता रहा है। लेकिन बहरीन की इस घटना ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध में वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जाने लगे, तो इसका असर सीधे आम लोगों के जीवन पर पड़ेगा।

तेल और गैस की आपूर्ति किसी हद तक दूसरे देशों से की जा सकती है या वैकल्पिक रास्ते ढूंढे जा सकते हैं। लेकिन पानी के मामले में ऐसा करना बहुत मुश्किल होता है।

खाड़ी क्षेत्र में पानी के बड़े प्राकृतिक स्रोत नहीं हैं। अगर डिसेलिनेशन प्लांट बंद हो जाएं तो शहरों की पानी सप्लाई तुरंत प्रभावित हो सकती है।

इसी वजह से कई विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला युद्ध के सबसे खतरनाक चरणों में से एक हो सकता है। (Bahrain desalination plant drone attack)

ईरान ने अमेरिका को बताया जिम्मेदार

इस मामले में ईरान ने एक अलग दावा किया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि इस तरह के हमलों की शुरुआत अमेरिका ने की थी।

उनका आरोप है कि अमेरिका ने पहले केशम आइलैंड पर स्थित एक मीठे पानी के डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया था। केशम आइलैंड स्ट्रेट ऑफ होरमुज के पास स्थित है।

अराघची के अनुसार उस हमले से लगभग 30 गांवों की पानी सप्लाई प्रभावित हुई थी। उन्होंने कहा कि जब नागरिक ढांचे को निशाना बनाया जाता है तो इससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ जाता है।

ईरान का कहना है कि इस तरह की कार्रवाइयों ने एक खतरनाक मिसाल कायम की है। (Bahrain desalination plant drone attack)

ईरान की सैन्य रणनीति को लेकर भी चर्चा

कुछ सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की सैन्य रणनीति में हाल के वर्षों में बदलाव आया है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने एक ऐसी रणनीति विकसित की है जिसमें क्षेत्रीय कमांडरों को अधिक स्वतंत्रता दी जाती है।

इस रणनीति को कभी-कभी मोजेक डिफेंस डॉक्ट्रिन भी कहा जाता है। इसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद कमांडरों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने का अधिकार दिया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस तरह की रणनीति के तहत अलग-अलग कमांडरों को लक्ष्य चुनने की स्वतंत्रता मिलती है, तो इससे क्षेत्रीय संघर्ष और जटिल हो सकता है। (Bahrain desalination plant drone attack)

होरमुज और बाब अल मंदेब जैसे समुद्री रास्तों पर भी नजर

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे संघर्ष का असर समुद्री व्यापार मार्गों पर भी पड़ सकता है। स्ट्रेट ऑफ होरमुज और बाब अल मंदेब जैसे समुद्री रास्ते दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों में गिने जाते हैं। अगर इन क्षेत्रों में तनाव बढ़ता है, तो तेल और गैस के साथ-साथ समुद्री व्यापार भी प्रभावित हो सकता है।

इसके अलावा कई विश्लेषकों का कहना है कि अगर पानी से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जाने लगा तो खाड़ी देशों के सामने मानवीय संकट भी खड़ा हो सकता है। (Bahrain desalination plant drone attack)

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती चिंता

बहरीन की घटना के बाद खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में चिंता बढ़ गई है। इन देशों के लिए डिसेलिनेशन प्लांट केवल तकनीकी परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि लाखों लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े हैं।

अगर इन प्लांटों पर लगातार हमले होने लगे, तो इससे न केवल पानी की सप्लाई प्रभावित होगी बल्कि बड़े पैमाने पर मानवीय संकट भी पैदा हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इसीलिए कई सरकारें अब अपने वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने लगी हैं। (Bahrain desalination plant drone attack)

मिसाइल और ड्रोन हमलों का बढ़ता खतरा

बहरीन पहले भी मिसाइल और ड्रोन हमलों की आशंका को लेकर सतर्क रहा है। रिपोर्टों के अनुसार फरवरी के अंत से अब तक बहरीन की एयर डिफेंस प्रणाली कई मिसाइल और ड्रोन को रोक चुकी है।

बताया जाता है कि बहरीन के एयर डिफेंस सिस्टम ने इस दौरान दर्जनों मिसाइल और सैकड़ों ड्रोन को इंटरसेप्ट किया है।

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और मिसाइल हमलों की लागत बहुत कम होती है, जबकि उन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलें काफी महंगी होती हैं।

उदाहरण के तौर पर एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लाखों डॉलर हो सकती है, जबकि कई ड्रोन की लागत उससे बहुत कम होती है।

ऐसे में अगर लगातार ड्रोन हमले होते हैं, तो एयर डिफेंस सिस्टम पर भी दबाव बढ़ सकता है। (Bahrain desalination plant drone attack)

SIPRI Report 2026: यूक्रेन के बाद भारत सबसे बड़ा हथियार आयातक, चीन-पाकिस्तान तनाव बड़ी वजह

India arms importer SIPRI report

India arms importer SIPRI report: दुनिया में हथियारों के व्यापार और सैन्य खरीद को लेकर जारी की गई नई सिपरी रिपोर्ट में भारत की स्थिति को लेकर कई अहम बातें सामने आई हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2021 से 2025 के बीच दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है। इस सूची में पहला स्थान यूक्रेन का है, जो इस समय रूस के साथ चल रहे युद्ध के कारण बड़े पैमाने पर सैन्य सहायता और हथियार ले रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल आर्म्स इंपोर्ट्स में भारत की हिस्सेदारी करीब 8.3 फीसदी रही। इसके बावजूद पिछले पांच सालों की तुलना में भारत के कुल हथियार आयात में हल्की गिरावट भी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट भारत के बढ़ते स्वदेशी रक्षा उत्पादन की वजह से आई है, हालांकि कई घरेलू रक्षा परियोजनाओं में देरी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। (India arms importer SIPRI report)

India arms importer SIPRI report: रूस, फ्रांस और इजराइल भारत के प्रमुख आर्म्स सप्लायर

सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार भारत के लिए तीन प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता देश हैं, जिनमें रूस, फ्रांस और इजराइल शामिल हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2021 से 2025 के बीच भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी रही। इसके बाद फ्रांस का हिस्सा करीब 29 फीसदी और इजराइल का लगभग 15 फीसदी रहा।

रूस लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार रहा है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में इस्तेमाल होने वाले कई प्रमुख प्लेटफॉर्म जैसे फाइटर जेट, टैंक, मिसाइल सिस्टम और पनडुब्बियां रूसी तकनीक पर आधारित हैं।

हालांकि पिछले एक दशक में भारत ने अपनी रक्षा खरीद को विविध बनाने की नीति अपनाई है। इसके तहत भारत ने फ्रांस, इजराइल और अमेरिका जैसे देशों से भी बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण खरीदने शुरू किए हैं। (India arms importer SIPRI report)

हथियार आयात में थोड़ी कमी, लेकिन बनी हुई निर्भरता

सिपरी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2016-2020 और 2021-2025 के बीच भारत के हथियार आयात में करीब 4 फीसदी की कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट भारत की बढ़ती डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की वजह से हुई है। भारत अब कई वेपन सिस्टम्स को खुद डिजाइन और विकसित करने की कोशिश कर रहा है।

उदाहरण के तौर पर भारत ने तेजस फाइटर जेट, अर्जुन टैंक, कई तरह की मिसाइल सिस्टम्स और ड्रोन टेक्नोलॉजी डेवलप करने की दिशा में काम किया है। इसके अलावा “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ाई जा रही है।

हालांकि सिपरी ने यह भी कहा है कि भारत की कई घरेलू रक्षा परियोजनाएं अक्सर देरी का शिकार हो जाती हैं। ऐसे में कई महत्वपूर्ण सैन्य प्लेटफॉर्म के लिए भारत को अभी भी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है। (India arms importer SIPRI report)

भविष्य में विदेशी हथियारों पर निर्भरता जारी रहने के संकेत

रिपोर्ट में भारत के कुछ बड़े रक्षा सौदों का भी जिक्र किया गया है। सिपरी के अनुसार भारत ने हाल के वर्षों में कई बड़े सैन्य सौदों की योजना बनाई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं होने वाली है। उदाहरण के तौर पर भारत फ्रांस से करीब 140 कॉम्बैट एयरक्राफ्ट खरीदने की योजना बना रहा है। इसके अलावा जर्मनी से छह पनडुब्बियां खरीदने की प्रक्रिया भी चल रही है।

ये सौदे बताते हैं कि भारत अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए अभी भी विदेशी तकनीक और प्लेटफॉर्म पर भरोसा कर रहा है। (India arms importer SIPRI report)

रूस पर निर्भरता कम करने की कोशिश

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले दस वर्षों में भारत ने धीरे-धीरे रूस पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश की है। 2011 से 2015 के बीच भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 70 फीसदी थी। इसके बाद 2016 से 2020 के बीच यह घटकर 51 फीसदी रह गई और 2021 से 2025 के बीच यह और घटकर करीब 40 फीसदी पर आ गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। इनमें रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंध, रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की नई रक्षा साझेदारियों का विस्तार शामिल है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में फ्रांस, अमेरिका और इजराइल के साथ रक्षा सहयोग को काफी मजबूत किया है। इससे भारत को नई तकनीक और आधुनिक हथियार प्रणालियां प्राप्त करने में मदद मिली है। (India arms importer SIPRI report)

चीन और पाकिस्तान से तनाव भी एक बड़ा कारण

सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार भारत द्वारा बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने के पीछे एक प्रमुख कारण चीन और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा तनाव है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से जारी है, जबकि पाकिस्तान के साथ भी कई बार सैन्य टकराव की स्थिति बन चुकी है। रिपोर्ट में 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सीमित सैन्य झड़प का भी जिक्र किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार ऐसे तनावपूर्ण माहौल में देशों को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए हथियार खरीदने पड़ते हैं। यही कारण है कि भारत लगातार अपने सैन्य प्लेटफॉर्म को आधुनिक बनाने पर जोर दे रहा है। (India arms importer SIPRI report)

पाकिस्तान भी तेजी से कर रहा हथियार आयात  

SIPRI की रिपोर्ट में पाकिस्तान की स्थिति का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा हथियार आयातक बन गया है।

2016-2020 के दौरान पाकिस्तान इस सूची में दसवें स्थान पर था, लेकिन पिछले पांच वर्षों में उसके हथियार आयात में 66 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में चीन की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत है। इससे साफ है कि पाकिस्तान की रक्षा खरीद का अधिकांश हिस्सा चीन से आता है।

दिलचस्प बात यह भी है कि चीन ने 2021-2025 के दौरान 47 देशों को हथियार बेचे, लेकिन उसके कुल निर्यात का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पाकिस्तान को गया। (India arms importer SIPRI report)

वैश्विक हथियार व्यापार में अमेरिका का दबदबा

सिपरी की रिपोर्ट में वैश्विक हथियार निर्यात की स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बना हुआ है।

2021 से 2025 के बीच वैश्विक हथियार निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 42 प्रतिशत रही। इसके बाद फ्रांस दूसरे स्थान पर रहा, जबकि रूस तीसरे स्थान पर रहा।

हालांकि रूस के हथियार निर्यात में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी गिरावट देखी गई है। 2016-2020 के दौरान रूस का वैश्विक हथियार निर्यात में हिस्सा करीब 21 प्रतिशत था, जो 2021-2025 के दौरान घटकर लगभग 6.8 प्रतिशत रह गया। (India arms importer SIPRI report)

यूरोप में हथियार आयात में बड़ी बढ़ोतरी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 1960 के दशक के बाद पहली बार यूरोप वैश्विक हथियार आयात में सबसे आगे निकल आया है।

2021 से 2025 के दौरान वैश्विक हथियार आयात में यूरोप की हिस्सेदारी करीब 33 प्रतिशत रही। इसके पीछे मुख्य कारण रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोपीय देशों की बढ़ती सुरक्षा चिंताएं हैं।

एशिया और ओशिनिया क्षेत्र का हिस्सा लगभग 31 प्रतिशत रहा, जबकि पश्चिम एशिया का हिस्सा करीब 26 प्रतिशत रहा। (India arms importer SIPRI report)

Fact Check: क्या IRIS Dena को डुबाने में भारत ने की अमेरिका की मदद? COMCASA-LEMOA पर क्यों उठे सवाल

IRIS Dena Sinking Fact Check

IRIS Dena Fact Check: हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और स्ट्रेटेजिक एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने IRIS Dena के साथ हुए हादसे को लेकर एक अहम सवाल उठाया है। उनका कहना है कि क्या ईरानी युद्धपोत को निशाना बनाने के लिए खुफिया जानकारी साझा की गई? जिसके बाद सवाल उठाए जाने लगे कि क्या इस घटना में भारत की भी किसी तरह की भूमिका है, खासकर अमेरिका के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग करने को लेकर।

जिसके बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस छिड़ गई। सोशल मीडिया पर कुछ एक्सपर्ट्स ने दावा किया कि भारत और अमेरिका के बीच मौजूद रक्षा समझौतों के तहत भारत की ओर से दी गई जानकारी का इस्तेमाल किया गया होगा।

हालांकि रक्षा मामलों के जानकारों और नौसेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस तरह की अटकलें वास्तविक सैन्य प्रक्रियाओं और अंतरराष्ट्रीय रक्षा समझौतों की सही समझ के बिना लगाई जा रही हैं। उनका कहना है कि भारत द्वारा अमेरिका को ऐसी कोई जानकारी देना, जिससे किसी ईरानी जहाज को निशाना बनाया जा सके, व्यावहारिक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से असंभव है। (IRIS Dena Fact Check)

IRIS Dena Fact Check: क्या लिखा है डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने

डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच दो महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हैं COMCASA और LEMOA हैं। इन समझौतों के तहत दोनों देश समुद्री गतिविधियों से जुड़ी कुछ संवेदनशील जानकारी साझा करते हैं। अगर ऐसी साझा जानकारी का इस्तेमाल किसी अमेरिकी अटैक सबमरीन ने ईरानी फ्रिगेट को खोजने और डुबाने के लिए किया हो, तो यह भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है।

उन्होंने आगे लिखा कि IRIS Dena जैसे मौद्गे-क्लास फ्रिगेट की सैन्य क्षमता एक अमेरिकी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन के सामने बहुत कम होती है। तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा जहाज अमेरिकी पनडुब्बी के मुकाबले टिक नहीं सकता। लेकिन इस पूरे मामले में असली मुद्दा ताकत का नहीं बल्कि परिस्थितियों का है। (IRIS Dena Fact Check)

डॉ. चेल्लानी के मुताबिक अगर यह सच है कि IRIS Dena पर उस समय बहुत कम हथियार या गोला-बारूद था, तो यह घटना सामान्य युद्ध कार्रवाई की बजाय एक योजनाबद्ध हमला लग सकती है। क्योंकि भारत द्वारा आयोजित MILAN-2026 नौसैनिक अभ्यास के दौरान जहाजों को एक तरह के “पीस प्रोटोकॉल” के तहत सीमित हथियारों के साथ भाग लेना होता है।

डॉ. चेल्लानी का कहना है कि यह दावा पूरी तरह असंभव भी नहीं लगता। आम तौर पर जब कई देशों की नौसेनाएं मिलकर कोई अभ्यास करती हैं, तो उस दौरान जहाज पूरी युद्ध तैयारी के साथ नहीं आते। ऐसे अभ्यासों का मकसद सहयोग और आपसी तालमेल बढ़ाना होता है, न कि वास्तविक युद्ध करना। (IRIS Dena Fact Check)

उन्होंने लिखा कि MILAN जैसे बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में जब जहाज बंदरगाह पर खड़े होते हैं, जिसे “हार्बर फेज” कहा जाता है, तब उन्हें सुरक्षित स्थिति यानी “सेफ कॉन्फिगरेशन” में रखा जाता है। इस दौरान जहाजों पर सार्वजनिक दौरे, कूटनीतिक कार्यक्रम और फ्लीट रिव्यू जैसी गतिविधियां होती हैं, इसलिए हथियारों को सुरक्षित रखा जाता है और गोला-बारूद का इस्तेमाल नहीं होता।

इसके बाद जब अभ्यास का “सी फेज” होता है, तब कुछ ऑपरेशनल ड्रिल और लाइव-फायर अभ्यास किए जाते हैं। लेकिन उस समय भी जहाजों में केवल उतना ही गोला-बारूद रखा जाता है जितना उन विशेष अभ्यासों के लिए जरूरी होता है। डॉ. चेल्लानी के मुताबिक अगर IRIS Dena अभ्यास खत्म होने के बाद उसी सीमित कॉन्फिगरेशन में बंदरगाह से रवाना हुआ था, तो फिर हमलावर और लक्ष्य के बीच असमानता और भी स्पष्ट हो जाती है। (IRIS Dena Fact Check)

एक तरफ एक ऐसा जहाज जो संभवतः हल्के हथियारों के साथ या शायद लगभग निहत्था था और एक नौसैनिक अभ्यास से लौट रहा था। वहीं, दूसरी तरफ दुनिया की सबसे एडवांस अंडरसी वॉरफेयर तकनीक से लैस अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी थी। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में एक सामान्य सैन्य टकराव था या फिर पहले से तय किया गया हमला। (IRIS Dena Fact Check)

क्या हैं COMCASA और LEMOA

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ सालों में कई रक्षा समझौते हुए हैं। इनमें प्रमुख रूप से COMCASA (कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) और LEMOA (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) शामिल हैं।

जिसके बाद कुछ लोगों ने यह मान लिया कि इन समझौतों के चलते भारत की ओर से मिलने वाली जानकारी सीधे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में इस्तेमाल हो सकती है। (IRIS Dena Fact Check)

लेकिन सूत्र सोशल मीडिया पर चल रहे इन दावों को सिरे से नकारते हैं। उनका कहना है कि यह समझ पूरी तरह सही नहीं है। वह बताते हैं कि COMCASA का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन सिस्टम को सक्षम बनाना है। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त अभ्यास, मानवीय मिशन या समुद्री सुरक्षा जैसे कार्यों के दौरान सुरक्षित कम्यूनिकेशन कर सकें। यह समझौता किसी देश को दूसरे देश को सीधे टार्गेटिंग इंटेलिजेंस देने की अनुमति नहीं देता।

इसी तरह LEMOA एक लॉजिस्टिक एग्रीमेंट है। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल ईंधन, मेंटेनेंस या सप्लाई के लिए कर सकते हैं। इसका कॉम्बैट आपरेशंस या इंटेलिजेंस शेयरिंग से कोई सीधा संबंध नहीं होता। सूत्रों का कहना है कि इन समझौतों को लेकर अक्सर सार्वजनिक चर्चा में गलत धारणाएं बन जाती हैं। (IRIS Dena Fact Check)

क्या करती है समुद्री निगरानी प्रणाली

भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बड़े स्तर पर मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस सिस्टम डेवलप किया है। गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर – इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) इसी सिस्टम का हिस्सा है।

इस सेंटर में कई देशों के लायजन ऑफिसर मौजूद रहते हैं और यहां जहाजों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी साझा की जाती है। यह जानकारी आम तौर पर व्हाइट शिपिंग डेटा यानी कमर्शियल जहाजों और समुद्री यातायात से संबंधित होती है।

इस तरह की जानकारी का इस्तेमाल समुद्री सुरक्षा, एंटी-पायरेसी ऑपरेशन और व्यापारिक जहाजों की निगरानी के लिए किया जाता है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम किसी वॉरशिप पर हमला करने के लिए जरूरी रीयल-टाइम टार्गेटिंग डेटा नहीं देती। किसी पनडुब्बी से हमला करने के लिए टारगेट की बहुत सटीक स्थिति, गति और दिशा का पता होना जरूरी होता है। यह जानकारी आमतौर पर पनडुब्बी के अपने सेंसर और सैन्य निगरानी प्रणाली से मिलती है। (IRIS Dena Fact Check)

क्या है सबमरीन वॉरफेयर की असलियत

सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले में एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि किसी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन को किसी युद्धपोत को निशाना बनाने के लिए बाहरी सहायता जरूरी होती है। उनका कहना है कि दरअसल IRIS Dena जैसे जहाज एक सरफेस वॉरशिप होते हैं, जिनका वजन करीब 1500 टन होता है और जो खुले समुद्र में चलते हैं। जब कोई जहाज समुद्र में चलता है तो उसके इंजन, मशीनरी और पानी में बनने वाले प्रवाह से खास तरह की आवाजें पैदा होती हैं। इन्हें अकॉस्टिक सिग्नेचर कहा जाता है। आधुनिक पनडुब्बियों के सोनार सिस्टम इन आवाजों को काफी दूर से पहचान सकते हैं। (IRIS Dena Fact Check)

एक न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन खुद ही लक्ष्य को खोजने और ट्रैक करने की क्षमता रखती हैं। इन पनडुब्बियों में बेहद संवेदनशील पैसिव सोनार सिस्टम लगे होते हैं जो समुद्र में मौजूद जहाजों की आवाज और मशीनरी के कंपन को दूर से पहचान सकते हैं। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी स्टेल्थ क्षमता, लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता और एडवांस सेंसर सिस्टम होते हैं।

सूत्रों ने बताया कि पनडुब्बियों में लगे पैसिव सोनार सिस्टम आसपास के जहाजों की आवाज को पकड़ लेते हैं, लेकिन खुद कोई सिग्नल नहीं भेजते। इससे पनडुब्बी की स्थिति दुश्मन को पता नहीं चलती। इस तरह पनडुब्बी बिना सामने आए ही सतह पर चल रहे जहाजों को पहचान और ट्रैक कर सकती है। क्योंकि समुद्र में चलने वाला हर जहाज एक खास तरह की ध्वनि पैदा करता है। इंजन, प्रोपेलर और पानी के प्रवाह से बनने वाली आवाज को पनडुब्बी के सोनार सिस्टम पकड़ सकते हैं। (IRIS Dena Fact Check)

इसके अलावा आधुनिक मिलिटरी आपरेशंस में अक्सर सैटेलाइट निगरानी भी मदद करती है। सैटेलाइट पहले लक्ष्य की सामान्य लोकेशन का पता लगा सकते हैं और फिर यह जानकारी पनडुब्बी तक भेजी जा सकती है, जबकि पनडुब्बी समुद्र के भीतर ही रहती है। साथ ही, अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा रीमोट सेंसिंग सैटेलाइट नेटवर्क भी है, जो समुद्री गतिविधियों पर नजर रखता है। इसलिए यह मानना कि अमेरिकी नौसेना को किसी वॉरशिप को निशाना बनाने के लिए किसी अन्य देश से जानकारी लेनी पड़ी होगी, यह जानकारी बिल्कुल गलत है।

उनका कहना है कि लगभग 1500 टन के आकार का एक फ्रिगेट जैसे IRIS Dena खुले समुद्र में पनडुब्बी के लिए एक स्पष्ट टारगेट हो सकता है। ऐसे में किसी तीसरे देश से मिली जानकारी की जरूरत नहीं होती। (IRIS Dena Fact Check)

बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास को लेकर हैं गलतफहमियां

सूत्रों का कहना है कि यह सोचना कि IRIS Dena संभवतः किसी “पीस प्रोटोकॉल” या “सेफ कॉन्फिगरेशन” में था क्योंकि उसने भारत में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास MILAN में हिस्सा लिया था। यह सोचना गलत है।

उनका कहना है कि MILAN जैसे बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास के दौरान कुछ सुरक्षा नियम जरूर लागू होते हैं, लेकिन उनका मतलब यह नहीं होता कि जहाज पूरी तरह हथियारों से खाली या निहत्थे होते हैं। जब ऐसे अभ्यासों का हार्बर फेज होता है, यानी जब जहाज बंदरगाह पर खड़े होते हैं, मेहमानों का स्वागत कर रहे होते हैं या सार्वजनिक दौरे कराए जा रहे होते हैं, तब सुरक्षा वजहों से कुछ वेपन सिस्टम को सुरक्षित स्थिति में रखा जाता है। इसी तरह लाइव-फायर अभ्यास के लिए इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी सख्त निगरानी में रखा जाता है और जरूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जाता है। यह प्रक्रिया दुनिया की लगभग सभी नौसेनाओं में सामान्य रूप से अपनाई जाती है। (IRIS Dena Fact Check)

लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि जहाज बंदरगाह से निकलने के बाद पूरी तरह निहत्था हो जाता है। जब कोई युद्धपोत बंदरगाह से निकलता है, तो वह बिना हथियारों के ही समुद्र में जाता है। हर युद्धपोत अपने डिजाइन के अनुसार अपने मूल हथियारों के साथ ही चलता है और वह हमेशा एक कॉम्बैट प्लेटफॉर्म बना रहता है।

भले ही अभ्यास के दौरान गोला-बारूद की मात्रा सीमित रखी जाए, लेकिन जहाज अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखता है। इसके अलावा जब कोई जहाज अभ्यास क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पहुंच जाता है, तब उसकी ऑपरेशनल स्थिति उस देश की नौसेना तय करती है, जिससे वह जहाज संबंधित होता है। (IRIS Dena Fact Check)

भारत की क्या है रणनीतिक स्थिति

सूत्रों का कहना है कि भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता आया है। भारत के ईरान, अमेरिका और कई अन्य देशों के साथ अलग-अलग रणनीतिक संबंध हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत किसी ऐसे जहाज के खिलाफ कार्रवाई में जानकारी देता जो भारतीय नौसेना के आमंत्रण पर किसी अभ्यास में शामिल हुआ था, तो यह कूटनीतिक भरोसे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता था।

भारतीय नौसेना की पहचान एक पेशेवर और तटस्थ समुद्री शक्ति के रूप में रही है। भारत ने हमेशा हिंद महासागर को सहयोग और स्थिरता का क्षेत्र बनाए रखने की बात कही है।

इसी वजह से सूत्रों का मानना है कि भारत द्वारा किसी विदेशी युद्धपोत को निशाना बनाने में अप्रत्यक्ष मदद देने की बात पूरी तरह से बेबुनियाद है। (IRIS Dena Fact Check)

रक्षा साझेदारी और ऑपरेशनल कंट्रोल अलग चीजें

सूत्रों का कहना है कि अक्सर रक्षा साझेदारी को लेकर एक बड़ी गलतफहमी यह होती है कि लोग मान लेते हैं कि इससे एक देश दूसरे देश के मिलिटरी ऑपरेशंस को प्रभावित कर सकता है।

असल में ऐसा नहीं होता। रक्षा समझौते केवल तकनीकी सहयोग, ट्रेनिंग या लॉजिस्टिक मदद के लिए होते हैं। हर देश अपनी सैन्य जानकारी और सेंसर नेटवर्क पर पूरी तरह से कंट्रोल बनाए रखता है। भारत भी अपने सभी सैन्य सेंसर, सैटेलाइट और इंटेलिजेंस नेटवर्क पर पूरी तरह संप्रभु नियंत्रण रखता है। (IRIS Dena Fact Check)

जिम्मेदारी से करें सोशल मीडिया पर चर्चा

सूत्रों ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में सार्वजनिक चर्चा बेहद सावधानी के साथ होनी चाहिए। बिना ठोस प्रमाण के किसी देश को किसी सैन्य कार्रवाई से जोड़ देना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकता है।

उन्होंने कहा कि नेवल ऑपरेशंस और समुद्री युद्ध की प्रक्रियाएं बेहद जटिल होती हैं। इन्हें समझे बिना की गई टिप्पणियां अक्सर गलतफहमियां पैदा कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि खुफिया जानकारी साझा करने या किसी मिलिटरी ऑपरेशंस की जिम्मेदारी से जुड़े दावे बहुत सावधानी से किए जाने चाहिए और उन्हें पुख्ता तथ्यों के आधार पर ही रखा जाना चाहिए। (IRIS Dena Fact Check)

चूरू में उमड़ा पूर्व सैनिकों का सैलाब, गौरव सैनानी रैली में शामिल हुए 10 हजार से ज्यादा वेटरन्स

Gaurav Senani Rally Churu

Gaurav Senani Rally Churu: राजस्थान के चूरू जिले में 8 मार्च को भारतीय सेना की ओर से एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का नाम गौरव सैनानी रैली रखा गया था। यह रैली भारतीय सेना की रणबांकुरा डिविजन ने सप्त शक्ति कमांड के नेतृत्व में आयोजित की गई। कार्यक्रम का आयोजन चूरू के एसएआई स्टेडियम में किया गया, जहां बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक, वीर नारियां और उनके परिवार शामिल हुए।

इस रैली में क्षेत्र के आठों तहसीलों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। सेना के अधिकारियों के अनुसार इस कार्यक्रम में 10 हजार से अधिक वेटरन्स, वीर नारियां, वीर माताएं और उनके परिवार के सदस्य शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य पूर्व सैनिकों के सम्मान के साथ-साथ उनके कल्याण से जुड़े मुद्दों पर सीधी बातचीत करना और उन्हें विभिन्न सरकारी सुविधाओं की जानकारी देना था। (Gaurav Senani Rally Churu)

Gaurav Senani Rally Churu: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा रहे मुख्य अतिथि

इस कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। उनके साथ भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। कार्यक्रम में सप्त शक्ति कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मंजिंदर सिंह, चेतक कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल शमशेर सिंह विर्क और सप्त शक्ति आर्मी वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन (AWWA) की रीजनल प्रेसिडेंट बरिंदर जीत कौर भी उपस्थित रहीं। इसके अलावा राज्य सरकार और जिला प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए। (Gaurav Senani Rally Churu)

सांस्कृतिक कार्यक्रम और सैन्य प्रदर्शन रहे आकर्षण

गौरव सैनानी रैली में कई आकर्षक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ एडवेंचर एक्टिविटीज, सैन्य हेलीकॉप्टरों का कॉम्बैट डेमोन्स्ट्रेशन और सैन्य उपकरणों की प्रदर्शनी भी दिखाई गई।

कार्यक्रम में भारतीय सेना के मिलिट्री पाइप बैंड की प्रस्तुति ने लोगों का ध्यान खींचा। सेना की ओर से किए गए इन प्रदर्शनों का उद्देश्य लोगों को सैनिकों के जीवन और सेना की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी देना था। इन गतिविधियों के माध्यम से सैनिकों के साहस और अनुशासन को भी दर्शाया गया।

पूर्व सैनिकों की मदद के लिए लगाए गए स्टॉल

रैली में पूर्व सैनिकों की सहायता के लिए कई हेल्प डेस्क और स्टॉल लगाए गए। इन स्टॉलों पर विभिन्न रिकॉर्ड ऑफिस, बैंक, और कई सरकारी एजेंसियों के प्रतिनिधि मौजूद थे। यहां पूर्व सैनिकों को पेंशन, दस्तावेज अपडेट, शिकायत निवारण और रोजगार से जुड़े मामलों में मदद दी गई।

इस कार्यक्रम में डीआईएवी, आर्मी वेलफेयर प्लेसमेंट ऑर्गनाइजेशन, ईसीएचएस और जिला सैनिक बोर्ड जैसी संस्थाओं ने भी भाग लिया। इन संस्थाओं ने पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी।

इस बार एक खास पहल यह रही कि पहली बार राजस्व विभाग की ओर से भी स्टॉल लगाए गए। इससे भूमि और अन्य प्रशासनिक मामलों से जुड़ी समस्याओं के समाधान में मदद मिली। (Gaurav Senani Rally Churu)

मेडिकल कैंप में हुआ स्वास्थ्य परीक्षण

कार्यक्रम के दौरान एक बड़ा मेडिकल कैंप भी लगाया गया। इसमें पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था की गई थी। डॉक्टरों की टीम ने लोगों की जांच की और विशेषज्ञ परामर्श भी दिया।

इस मेडिकल कैंप में कई प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई गईं, ताकि दूर-दराज के इलाकों से आए लोगों को मौके पर ही इलाज और सलाह मिल सके।

वीर नारियों और युद्ध में घायल सैनिकों का सम्मान

गौरव सैनानी रैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सम्मान समारोह भी था। इस दौरान वीर नारियों, वीर माताओं और युद्ध में घायल हुए पूर्व सैनिकों को सम्मानित किया गया। उन्हें राष्ट्र के लिए उनके योगदान और बलिदान के लिए स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

इसके अलावा कई जरूरतमंद पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को विभिन्न सहायक उपकरण भी दिए गए। कार्यक्रम में 16 थ्री-व्हीलर स्कूटर, 113 व्हील चेयर, 80 हियरिंग एड, 29 वॉकर और 29 इलेक्ट्रॉनिक पेशेंट बेड वितरित किए गए। साथ ही कुछ लाभार्थियों को बीपी मशीन और आर्थिक मदद भी दी गई।

इन उपकरणों का उद्देश्य उन पूर्व सैनिकों की मदद करना था, जो स्वास्थ्य समस्याओं या शारीरिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। (Gaurav Senani Rally Churu)

इंटीग्रेटेड वेटरन वेलफेयर कॉम्प्लेक्स बनाने की तैयारी

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार इंटीग्रेटेड वेटरन वेलफेयर कॉम्प्लेक्स स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है, जहां पूर्व सैनिकों को एक ही जगह पर सभी जरूरी सुविधाएं मिल सकें।

वहीं आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मंजिंदर सिंह ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना अपने वेटरन्स, वीर नारियों और वीर माताओं के कल्याण के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि आज के वैश्विक माहौल में, जब दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष चल रहे हैं, तब देश की सुरक्षा के लिए तैयार रहना बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में पूर्व सैनिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वे देश की रक्षा व्यवस्था में दूसरी और तीसरी लाइन ऑफ डिफेंस के रूप में योगदान दे सकते हैं। उनके मुताबिक वेटरन वेलफेयर केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी है। (Gaurav Senani Rally Churu)

अमेरिका का दावा- निहत्था नहीं था IRIS Dena, जारी किया फैक्टचेक, क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सही था हमला?

IRIS Dena attack fact check

IRIS Dena attack fact check: हिंद महासागर में ईरानी नौसेना के युद्धपोत IRIS Dena के डूबने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अमेरिका ने इस घटना को लेकर कहा है कि ईरान का यह दावा गलत है कि जहाज निहत्था था। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह एक सैन्य फ्रिगेट था और युद्ध के नियमों यानी लॉ ऑफ आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (LOAC) के तहत उस पर हमला करना वैध था। अमेरिका ने यह भी कहा कि हमले के बाद नाविकों को बचाने की योजना बनाई गई थी और श्रीलंका ने बचाव अभियान चलाकर कई लोगों की जान बचाई।

लेकिन ईरान, कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और कानूनी विश्लेषकों ने इन दावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस परिस्थिति में देना वॉरशिप को निशाना बनाया गया, वह कई मायनों में विवादित है। इस घटना ने समुद्री युद्ध के नियमों, अंतरराष्ट्रीय कानून और सैन्य कार्रवाई की सीमाओं को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है। (IRIS Dena attack fact check)

IRIS Dena attack fact check: क्या कहा अमेरिका ने…

अमेरिकी सेना की यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड @INDOPACOM ने अपने एक्स हेंडल पर फैक्टचेक करके लिखा कि ईरान की यह बात सही नहीं है कि यह जहाज उस समय निहत्था था। अमेरिका के अनुसार IRIS Dena एक सैन्य युद्धपोत था और उस पर हथियार मौजूद थे, इसलिए उसे पूरी तरह “अनआर्म्ड” यानी निहत्था बताना गलत है।

अमेरिका ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों, जिन्हें लॉ ऑफ आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (LOAC) कहा जाता है, के तहत किसी वैध सैन्य लक्ष्य पर हमला करना अनुमति प्राप्त कार्रवाई होती है। उनके अनुसार देना एक सैन्य जहाज था और इसलिए उसे वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता था। अमेरिका का कहना है कि युद्ध के दौरान दुश्मन देश की सैन्य संपत्तियों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत संभव है, और इसी सिद्धांत के आधार पर कार्रवाई की गई। (IRIS Dena attack fact check)

अमेरिका ने यह भी दावा किया है कि हमले के बाद नाविकों की जान बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए गए थे। अमेरिकी पक्ष के अनुसार इस ऑपरेशन की योजना बनाते समय बचाव से जुड़े पहलुओं को भी ध्यान में रखा गया था। उन्होंने कहा कि हमले के बाद क्षेत्र में मौजूद एजेंसियों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और श्रीलंका की नौसेना ने बचाव अभियान चलाकर कई नाविकों की जान बचाई।

अमेरिका के अनुसार यह पूरा अभियान अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुरूप था। उनका कहना है कि युद्ध के दौरान भी मानवीय नियमों का पालन करना जरूरी होता है और इसी कारण बचाव अभियान को भी प्राथमिकता दी गई। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि श्रीलंका द्वारा चलाए गए सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन ने कई लोगों की जान बचाई और यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप थी। (IRIS Dena attack fact check)

IRIS Dena को लेकर अलग-अलग दावे

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि जिस समय हमला हुआ, उस समय देना किसी युद्ध अभियान में शामिल नहीं था। उनका कहना है कि यह जहाज भारत द्वारा आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास मिलन-2026 में हिस्सा लेने के बाद अपने देश लौट रहा था। इस अभ्यास में कई देशों की नौसेनाएं शामिल होती हैं और जहाज आम तौर पर सहयोग और प्रशिक्षण के उद्देश्य से आते हैं।

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि यह जहाज भारतीय नौसेना का “मेहमान” था और अभ्यास खत्म होने के बाद वापस जा रहा था। उनके अनुसार जहाज को बिना किसी चेतावनी के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में निशाना बनाया गया।

भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहाली ने भी इसी तरह का बयान दिया। उन्होंने कहा कि जहाज उस समय युद्ध के लिए तैयार स्थिति में नहीं था और वह केवल अपने देश लौट रहा था। (IRIS Dena attack fact check)

कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि जहाज तकनीकी रूप से एक युद्धपोत था, लेकिन अभ्यास से लौटते समय वह नॉन-ऑपरेशनल या नॉन-कॉम्बैट कॉन्फिगरेशन में था। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि जहाज पर स्थायी रूप से लगे सिस्टम जैसे डेक गन मौजूद हो सकते थे, लेकिन उस समय वह किसी युद्ध के लिए तैयार नहीं था और संभव है कि उसमें ऑपरेशनल एम्यूनिशन भी न हो।

नेवी सूत्रों का भी कहना है कि ऐसा जहाज जब किसी एक्सरसाइज के लिए जाते हैं, तो वे पूरी तरह से अन-आर्म्ड नहीं होते। हालांकि इस दौरान उनमें पूरी तरह से कॉम्बैट रेडी वेपंस नहीं होते, लेकिन अपनी सुरक्षा को देखते हुए जरूरत के लिहाज से कुछ वेपंस जरूर होते हैं। हालांकि देना ने मिलन एक्सरसाइज के सी फेज में हिस्सा लिया था, जिसमें हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है। (IRIS Dena attack fact check)

युद्ध के नियमों के तहत हमला कितना सही

अमेरिका का कहना है कि युद्ध के दौरान किसी भी सैन्य जहाज को वैध लक्ष्य माना जा सकता है। यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत आता है, जिसे लॉ ऑफ आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट कहा जाता है।

लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में परिस्थिति अलग थी। रिपोर्टों के अनुसार जहाज किसी सक्रिय युद्ध क्षेत्र में नहीं था और वह हिंद महासागर में अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में था। इसके अलावा वह एक बहुराष्ट्रीय अभ्यास से लौट रहा था और उस समय किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल नहीं था। (IRIS Dena attack fact check)

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून में दो महत्वपूर्ण सिद्धांत होते हैं- मिलिट्री नेसेसिटी और प्रोपोर्शनैलिटी। इन सिद्धांतों के अनुसार किसी सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए और उससे होने वाला नुकसान आवश्यक सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।

ईरान के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत अमीर सईद इरावानी ने इस घटना को अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है। उन्होंने कहा कि जहाज को अंतरराष्ट्रीय जल में बिना चेतावनी के निशाना बनाया गया और यह समुद्री नेविगेशन की स्वतंत्रता के सिद्धांत के खिलाफ है।

उनका कहना है कि यह घटना उस समय हुई जब जहाज ईरान के तट से लगभग दो हजार मील दूर था। इस वजह से उन्होंने इसे युद्ध अपराध तक बताया है। (IRIS Dena attack fact check)

श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र को लेकर भी चर्चा

कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि यह घटना श्रीलंका के एक्सक्लूसिव इकॉनॉमिक जोन (ईईजेड) के भीतर हुई। यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (UNCLOS) के तहत किसी देश को अपने ईईजेड में कुछ आर्थिक और प्रशासनिक अधिकार मिलते हैं। हालांकि यह क्षेत्र पूरी तरह उस देश की संप्रभु सीमा नहीं होता, लेकिन वहां होने वाली गतिविधियों से जुड़े कुछ नियम होते हैं।

इसी वजह से कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि क्या इस क्षेत्र में किसी तीसरे देश द्वारा सैन्य कार्रवाई करना अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप था या नहीं।

कानूनी विशेषज्ञ मार्को मिलानोविक जैसे विद्वानों का कहना है कि सिद्धांत रूप में किसी सैन्य जहाज को लक्ष्य बनाया जा सकता है, लेकिन पूरे सैन्य अभियान की वैधता को लेकर भी चर्चा जारी है। उनके अनुसार संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत बल प्रयोग के नियमों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

बता दें कि ईईजेड यानी विशेष आर्थिक क्षेत्र की रेंज 200 समुद्री मील होती है। (IRIS Dena attack fact check)

क्या है सैन रेमो मैनुअल

समुद्र में युद्ध से जुड़े नियमों पर चर्चा करते समय कई विशेषज्ञ सैन रेमो मैनुअल का भी उल्लेख करते हैं। यह दस्तावेज समुद्री युद्ध में अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को स्पष्ट करता है।

इस मैनुअल के अनुसार समुद्र में किसी जहाज को निशाना बनाने से पहले कई बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसमें लक्ष्य की स्पष्ट पहचान, संभावित नुकसान का आकलन और जहां संभव हो चेतावनी देना शामिल है।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अगर कोई जहाज अंतरराष्ट्रीय अभ्यास से लौट रहा हो और किसी सक्रिय सैन्य अभियान में शामिल न हो, तो उस पर हमला करने से भविष्य में खतरनाक उदाहरण बन सकता है। (IRIS Dena attack fact check)

बचाव अभियान को लेकर उठे सवाल

अमेरिका ने कहा है कि हमले के बाद नाविकों को बचाने की योजना बनाई गई थी और श्रीलंका ने बचाव अभियान चलाया। वास्तव में श्रीलंका की नौसेना ने बड़े स्तर पर सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया।

रिपोर्टों के अनुसार इस अभियान में 32 नाविकों को जीवित बचाया गया और 87 शव समुद्र से बरामद किए गए। बचाए गए लोगों को बाद में अस्पतालों में उपचार के लिए ले जाया गया।

लेकिन इस मामले में एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि हमला करने वाली पनडुब्बी ने बचाव कार्य में कितनी भूमिका निभाई।

दूसरा जिनेवा कन्वेंशन कहता है कि समुद्री युद्ध में शामिल पक्षों को जहाज डूबने के बाद नाविकों को बचाने की कोशिश करनी चाहिए, यदि सैन्य परिस्थितियां इसकी अनुमति दें।

कुछ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्पष्ट नहीं है कि हमले के बाद पनडुब्बी ने सतह पर आकर बचाव कार्य में हिस्सा लिया या नहीं। रिपोर्टों के अनुसार बचाव अभियान मुख्य रूप से श्रीलंका की नौसेना ने ही चलाया। (IRIS Dena attack fact check)

घटना के बाद बढ़ा कूटनीतिक तनाव

ईरान ने इस हमले की कड़ी निंदा की है और कहा है कि वह इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाएगा। ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतिबजादेह ने भी इस हमले की आलोचना करते हुए कहा कि इसका गंभीर असर हो सकता है।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय अभ्यास में शामिल जहाजों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, तो इससे भविष्य में बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यासों पर भी असर पड़ सकता है। (IRIS Dena attack fact check)

ईरान के शाहेद की मार से बचने के लिए जेलेंस्की की शरण में ट्रंप! अमेरिका को चाहिए यूक्रेनी इंटरसेप्टर ड्रोन सिस्टम

Ukraine interceptor drones

Ukraine interceptor drones: पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन अब ईरान के शाहेद ड्रोन से बचाव के लिए यूक्रेन की तकनीक का सहारा लेने पर विचार कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और कुछ खाड़ी देशों ने यूक्रेन से सस्ते इंटरसेप्टर ड्रोन खरीदने को लेकर बातचीत शुरू की है। इन ड्रोन का इस्तेमाल ईरान के शाहेद हमलावर ड्रोन को हवा में ही रोकने के लिए किया जाता है।

इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी पुष्टि की है कि अमेरिका ने उनसे मध्य पूर्व क्षेत्र में शाहेद ड्रोन से सुरक्षा के लिए विशेष सहयोग मांगा है। (Ukraine interceptor drones)

Ukraine interceptor drones: अमेरिका ने यूक्रेन से मांगा तकनीकी सहयोग

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में शाहेद ड्रोन के खिलाफ सुरक्षा में मदद के लिए यूक्रेन से अनुरोध किया है। जेलेंस्की ने कहा कि उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं और यूक्रेनी विशेषज्ञों की मौजूदगी सुनिश्चित की जाए, ताकि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि यूक्रेन उन देशों की मदद करता है जो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और उसके नागरिकों की रक्षा में सहयोग करते हैं।

यूक्रेन लंबे समय से रूस के खिलाफ युद्ध में ईरानी डिजाइन वाले शाहेद ड्रोन का सामना कर रहा है। इस दौरान यूक्रेन ने कम लागत वाले इंटरसेप्टर ड्रोन विकसित किए हैं जो इन ड्रोन को हवा में ही नष्ट कर सकते हैं। (Ukraine interceptor drones)

क्यों जरूरी पड़े यूक्रेनी इंटरसेप्टर ड्रोन

रिपोर्टों के अनुसार खाड़ी देशों ने अब तक ईरानी ड्रोन से बचाव के लिए महंगे मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल किया है। इनमें सबसे प्रमुख अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम की PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल हैं।

लेकिन इन मिसाइलों की कीमत बहुत अधिक होती है और लगातार हमलों के कारण इनका भंडार तेजी से कम हो रहा है।

दूसरी ओर ईरान के शाहेद ड्रोन अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं। इनकी कीमत लगभग 30 हजार डॉलर के आसपास बताई जाती है, जबकि एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लाखों डॉलर तक हो सकती है।

ऐसी स्थिति में कई देशों ने सस्ते विकल्पों की तलाश शुरू कर दी है। इसी वजह से यूक्रेन के इंटरसेप्टर ड्रोन को लेकर रुचि बढ़ी है। (Ukraine interceptor drones)

यूक्रेन के पास है ड्रोन युद्ध का अनुभव

यूक्रेन पिछले कई वर्षों से रूस के साथ चल रहे युद्ध में बड़ी संख्या में ड्रोन हमलों का सामना कर रहा है। रूस ने कई बार शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के शहरों और ऊर्जा ढांचे पर हमला करने के लिए किया है।

इन हमलों से निपटने के लिए यूक्रेन ने सस्ते और बड़े पैमाने पर तैयार किए जाने वाले इंटरसेप्टर ड्रोन विकसित किए हैं। ये छोटे लेकिन तेज ड्रोन होते हैं जो हमलावर ड्रोन का पीछा करके उसे टक्कर मारते हैं या विस्फोट से नष्ट कर देते हैं।

यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार रूस ने पिछले वर्ष हजारों ड्रोन यूक्रेन पर दागे थे। इस लगातार खतरे के कारण यूक्रेन ने अपने ड्रोन रोधी सिस्टम को तेजी से विकसित किया है। (Ukraine interceptor drones)

तेज रफ्तार वाले इंटरसेप्टर ड्रोन

यूक्रेन के कुछ इंटरसेप्टर ड्रोन की अधिकतम रफ्तार लगभग 250 किलोमीटर प्रति घंटे तक बताई जाती है। इसके मुकाबले शाहेद ड्रोन की अधिकतम गति लगभग 185 किलोमीटर प्रति घंटे होती है।

इस वजह से ये इंटरसेप्टर ड्रोन हमलावर ड्रोन को पकड़कर नष्ट करने में सक्षम होते हैं।

कुछ ड्रोन कंप्यूटर विजन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे लक्ष्य को पहचान कर उस पर हमला कर सकते हैं। वहीं कुछ ड्रोन को जमीन से ऑपरेटर द्वारा नियंत्रित किया जाता है। (Ukraine interceptor drones)

यूक्रेन के प्रमुख इंटरसेप्टर ड्रोन

यूक्रेन में कई कंपनियां इस तरह के इंटरसेप्टर ड्रोन बना रही हैं। इनमें कुछ प्रमुख ड्रोन सिस्टम भी शामिल हैं जो पहले से तैनात किए जा चुके हैं।

इनमें से एक मेरोप्स इंटरसेप्टर ड्रोन है, जो फिक्स्ड-विंग डिजाइन वाला ड्रोन है। इसके अलावा यूक्रेनी कंपनी वाइल्ड हॉर्नेट्स द्वारा बनाया गया स्टिंग क्वाडकॉप्टर ड्रोन भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसके अलावा जनरल चेरी नाम की कंपनी भी तेज गति वाले “शाहेद हंटर” इंटरसेप्टर ड्रोन तैयार करती है।

इन ड्रोन की कीमत आमतौर पर कुछ हजार डॉलर के आसपास बताई जाती है, इसलिए इन्हें बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है। (Ukraine interceptor drones)

खाड़ी देशों की बढ़ती चिंता

हाल के दिनों में मध्य पूर्व में ईरान और उसके सहयोगी समूहों द्वारा ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। इन हमलों का लक्ष्य कई बार सैन्य और रणनीतिक ठिकाने भी रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार शाहेद ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें आसानी से छिपाया जा सकता है और इन्हें अलग-अलग स्थानों से लॉन्च किया जा सकता है।

इस वजह से पारंपरिक मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए इनका पता लगाना और इन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। (Ukraine interceptor drones)

पेंटागन की टीम ने किया यूक्रेन का दौरा

अमेरिकी रक्षा विभाग की काउंटर-ड्रोन टास्क फोर्स के अधिकारियों ने हाल ही में यूक्रेन का दौरा किया था। इस दौरे का उद्देश्य यह समझना था कि यूक्रेन किस तरह ड्रोन हमलों से अपने शहरों और सैन्य ठिकानों की रक्षा कर रहा है।

इस टास्क फोर्स का नेतृत्व ब्रिगेडियर जनरल मैट रॉस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूक्रेन ने ड्रोन हमलों से बचाव के लिए एक एकीकृत नेटवर्क विकसित किया है, जिसमें कई तरह के सेंसर और निगरानी प्रणाली शामिल हैं।

यह नेटवर्क ध्वनि, रडार और अन्य तकनीकों के माध्यम से आने वाले ड्रोन का पता लगाने में मदद करता है। इसके बाद इंटरसेप्टर सिस्टम को सक्रिय किया जाता है। (Ukraine interceptor drones)

मध्य पूर्व में ड्रोन खतरे को लेकर चिंता

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए ड्रोन खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में मध्य पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन हमलों की खबरें भी सामने आई थीं।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और इनसे निपटने के लिए नई तकनीक विकसित करना जरूरी हो गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन के पास इस तरह के युद्ध का सबसे अधिक अनुभव है क्योंकि वहां लंबे समय से ड्रोन हमले हो रहे हैं। इसी वजह से कई देश यूक्रेन की एंटी-ड्रोन तकनीक में रुचि दिखा रहे हैं। (Ukraine interceptor drones)

IRIS Dena पर हमले से पहले भारत ने दी ईरानी जहाज IRIS Lavan को शरण, कोच्चि में रुके 183 नाविक

IRIS Lavan

IRIS Lavan: हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका-इजराइल के साथ बढ़ते संघर्ष के दौरान भारत से अपने एक जहाज आईआरआईएस लावन को सुरक्षित डॉकिंग देने का अनुरोध किया था। यह अनुरोध 28 फरवरी को भारत को भेजा गया था। जहाज में तकनीकी खराबी आने के चलते उसे तुरंत किसी सुरक्षित बंदरगाह पर रुकने की जरूरत थी।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक भारत सरकार ने इस अनुरोध पर विचार करने के बाद 1 मार्च को जहाज को कोच्चि पोर्ट पर डॉक करने की अनुमति दे दी। इसके बाद यह ईरानी जहाज 4 मार्च को केरल के कोच्चि बंदरगाह पर पहुंच गया। फिलहाल जहाज के 183 क्रू मेंबर्स को भारतीय नौसेना की फैसिलिटीज में ठहराया गया है। (IRIS Lavan)

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसी समय हिंद महासागर में एक और ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस देना को अमेरिकी नेवी की न्यूक्लियर सबमरीन ने टॉरपीडो से डुबो दिया था। इस हमले में बड़ी संख्या में ईरानी नाविकों की मौत हुई थी और क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया था। (IRIS Lavan)

IRIS Lavan: मिलन और आईएफआर में आए थे ईरानी जहाज

इस साल 18 फरवरी से 25 फरवरी तक भारत ने विशाखापत्तनम में दो बड़े नौसैनिक कार्यक्रम आयोजित किए थे। पहला था इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और दूसरा था मिलन 2026 नेवल एक्सरसाइज। इन दोनों कार्यक्रमों में दुनिया के कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। लगभग 70 से ज्यादा देशों के जहाज और प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए थे।

इन्हीं कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए ईरान की नौसेना के कुछ जहाज भी भारत आए थे। इनमें आईआरआईएस देना, आईआरआईएस लवन और आईआरआईएस बुशेहर शामिल थे। हालांकि केवल देना ने ही भारतीय नौसेना के साथ अभ्यास और समारोहों में भाग लिया था। कार्यक्रम खत्म होने के बाद ये जहाज वापस अपने देश की ओर लौट रहे थे। इसी दौरान क्षेत्र में सैन्य तनाव तेजी से बढ़ गया। (IRIS Lavan)

28 फरवरी को ईरान ने भारत से मांगी मदद

सरकारी सूत्रों के मुताबिक 28 फरवरी को ईरान ने भारत से संपर्क किया। उस समय तक अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी थी और पूरे पश्चिम एशिया तथा हिंद महासागर क्षेत्र में तनाव बढ़ चुका था।

ईरान ने भारत को बताया कि उसका जहाज लवन में तकनीकी समस्या थी। जहाज के सिस्टम में गंभीर खराबी आने के कारण उसे तुरंत किसी सुरक्षित बंदरगाह पर पहुंचना जरूरी था। ईरान ने भारत से अनुरोध किया कि जहाज को कोच्चि पोर्ट में डॉक करने की अनुमति दी जाए ताकि मरम्मत और तकनीकी जांच की जा सके। (IRIS Lavan)

भारत ने 1 मार्च को दी डॉकिंग की अनुमति

भारत सरकार ने इस अनुरोध पर विचार किया और 1 मार्च को जहाज को डॉक करने की अनुमति दे दी। यह फैसला मानवीय आधार पर लिया गया बताया जा रहा है। समुद्र में अगर किसी जहाज को तकनीकी समस्या हो जाती है तो अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के अनुसार उसे सहायता देना एक सामान्य प्रथा मानी जाती है। इसी सिद्धांत के तहत भारत ने जहाज को सुरक्षित बंदरगाह तक आने की अनुमति दी।

इसके बाद ईरानी जहाज लवन ने हिंद महासागर से आगे बढ़ते हुए केरल के कोच्चि बंदरगाह की ओर रुख किया। (IRIS Lavan)

4 मार्च को कोच्चि पहुंचा ईरानी जहाज

सरकारी सूत्रों के अनुसार यह जहाज 4 मार्च को कोच्चि पहुंच गया और वहां सुरक्षित तरीके से डॉक किया गया। जहाज के साथ मौजूद 183 क्रू मेंबर्स फिलहाल भारतीय नौसेना की देखरेख में हैं। नौसेना की ओर से उन्हें रहने और जरूरी सहायता की व्यवस्था दी गई है। जहाज की तकनीकी जांच और मरम्मत की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
अधिकारियों के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया मानवीय आधार पर की जा रही है और इसका किसी सैन्य गतिविधि से कोई संबंध नहीं है। (IRIS Lavan)

इसी दौरान डूबा ईरान का युद्धपोत IRIS Dena

हालांकि जिस समय लवन को भारत में शरण मिली, उसी समय एक और ईरानी जहाज बड़ी घटना का शिकार हो गया। 4 मार्च को श्रीलंका के दक्षिण में हिंद महासागर में ईरानी नौसेना का युद्धपोत देना अमेरिकी नेवी की न्यूक्लियर सबमरीन के हमले में डूब गया।

रिपोर्टों के अनुसार इस जहाज पर टॉरपीडो हमला किया गया था। इस हमले में कम से कम 87 ईरानी नाविकों की मौत हो गई जबकि 32 नाविकों को बचाया गया। कई अन्य नाविकों के लापता होने की भी खबर है।

श्रीलंका औऱ भारतीय नौसेना नौसेना ने जहाज से आए डिस्ट्रेस सिग्नल और इमरजेंसी कॉल के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया था और कई नाविकों को समुद्र से निकाला था। (IRIS Lavan)

ईरानी विदेश मंत्री ने फोन पर की बात

IRIS Dena के डूबने की घटना के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है। ईरान ने इस हमले की कड़ी निंदा की है और कहा है कि जहाज पर बिना किसी चेतावनी के हमला किया गया।

ईरान के विदेश मंत्री सेयद अब्बास अराघची ने इस मामले में भारत और श्रीलंका के विदेश मंत्रियों से फोन पर बातचीत भी की। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजराइल द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।

उन्होंने यह भी कहा कि देना पर हमला अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में किया गया था और इस घटना को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया जाएगा। ईरान ने श्रीलंका का धन्यवाद भी किया क्योंकि वहां की नौसेना ने डूबते जहाज के नाविकों को बचाने में मदद की थी। (IRIS Lavan)

तीसरा जहाज भी फंसा था

सूत्रों के अनुसार ईरान का एक और जहाज आईआरआईएस बुशेहर भी इस पूरे घटनाक्रम के दौरान क्षेत्र में मौजूद था। बताया जाता है कि इस जहाज में इंजन खराबी आ गई थी और इसे श्रीलंका के बंदरगाह में सहायता लेनी पड़ी।
इस जहाज के कई क्रू मेंबर्स को भी सुरक्षित स्थान पर रखा गया है जबकि जहाज की तकनीकी जांच की जा रही है।
इस तरह एक ही समय में ईरान के तीन जहाज हिंद महासागर क्षेत्र में अलग-अलग परिस्थितियों का सामना कर रहे थे।

वहीं, भारत ने इस पूरे मामले में संतुलित और सावधानी भरा रुख अपनाया है। भारत ने किसी भी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया है लेकिन समुद्री नियमों और मानवीय सिद्धांतों के तहत सहायता दी है। कोच्चि में ईरानी जहाज को डॉकिंग की अनुमति देना इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षित समुद्री मार्ग बहुत जरूरी हैं। इसलिए भारत का प्रयास रहता है कि क्षेत्र में तनाव कम हो और समुद्री गतिविधियां सामान्य रूप से चलती रहें। (IRIS Lavan)