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अब हफ्तों तक पानी के नीचे रहेगी भारतीय सबमरीन, INS Khanderi पनडुब्बी में लगने जा रहा पहला स्वदेशी AIP सिस्टम

Air Independent Propulsion AIP: INS Khanderi

AIP System: भारतीय नौसेना को इस साल तक पहली स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन वाली सबमरीन मिल जाएगी। भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार यह काम वर्ष 2026 के अंत तक पूरा करने की योजना है। इस तकनीक के जुड़ने के बाद पनडुब्बी लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपकर काम कर सकेगी, जिससे उसकी ऑपरेशनल क्षमता और स्टेल्थ दोनों में बड़ा सुधार होगा।

इस सिस्टम को डीआरडीओ ने डेवलप किया है। इस तकनीक पर कई सालों से काम चल रहा था और अब इसे ऑपरेशनल पनडुब्बी में लगाने की तैयारी की जा रही है। (AIP System)

AIP System: क्या है एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP एक ऐसी तकनीक है जिससे डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी बिना सतह पर आए लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर कुछ दिनों में बैटरी चार्ज करने के लिए समुद्र की सतह के पास आना पड़ता है।

जब पनडुब्बी सतह के पास आती है, तो उसके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि उस समय दुश्मन के रडार या एंटी-सबमरीन सिस्टम उसे खोज सकते हैं।

वहीं एआईपी सिस्टम लगने के बाद पनडुब्बी कई हफ्तों तक पानी के अंदर रह सकती है। इस सिस्टम के साथ पनडुब्बी कम गति पर करीब 13 से 21 दिन तक लगातार पानी के अंदर रह सकती है। और इस दौरान उसे बैटरी चार्ज करने के लिए स्नॉर्कलिंग यानी सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती। (AIP System)

इसके विपरीत सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर 4 से 5 दिन में, और कई बार ऑपरेशन की स्थिति के अनुसार 2 से 3 दिन में ही सतह के पास आकर बैटरी चार्ज करनी पड़ती है। यही कारण है कि AIP सिस्टम पनडुब्बी की स्टेल्थ और ऑपरेशनल क्षमता को काफी बढ़ा देता है। इससे उसकी छिपकर काम करने की क्षमता काफी बढ़ जाती है। यह तकनीक पनडुब्बियों को दुश्मन की नजर से बचाकर लंबे समय तक ऑपरेशन करने में मदद करती है।

एआईपी तकनीक में फ्यूल-सेल के जरिए बिजली बनाई जाती है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से ऊर्जा पैदा होती है। इस प्रक्रिया में कोई धुआं या प्रदूषण नहीं निकलता और इसका मुख्य बाई-प्रोडक्ट्स साफ पानी होता है। खास बात यह है कि इसमें हाइड्रोजन को ऑनबोर्ड जेनरेट किया जाता है। (AIP System)

डीआरडीओ ने बनाया है स्वदेशी एआईपी

भारत का एआईपी सिस्टम पुणे स्थित नेवल मैटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी ने डेवलप किया है। यह प्रयोगशाला समुद्री तकनीकों के विकास के लिए जानी जाती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इसमें फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल-सेल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। यह तकनीक हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के जरिए बिजली पैदा करती है।

इस परियोजना को शुरू करने की मंजूरी लगभग 2014 में मिली थी। उस समय इस प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत करीब 270 करोड़ रुपये बताई गई थी। हालांकि तकनीकी चुनौतियों और ट्रायल प्रोसेस के चलते इस परियोजना को पूरा होने में कई साल लग गए। डीआरडीओ के साथ इस प्रोजेक्ट में इंडस्ट्री पार्टनर लार्सन एंड टूब्रो है। (AIP System)

लंबे परीक्षणों के बाद मिली मंजूरी

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस सिस्टम का जमीन पर आधारित प्रोटोटाइप कई सालों तक ट्रायल्स के दौर से गुजरा है। इन परीक्षणों में यह देखा गया कि फ्यूल-सेल आधारित यह सिस्टम लगातार बिजली बना सकता है या नहीं और पनडुब्बी की जरूरतों के अनुसार इसकी क्षमता कितनी है। सूत्रों के अनुसार इस सिस्टम ने परीक्षण के दौरान 200 किलोवॉट से अधिक बिजली उत्पादन की क्षमता दिखाई है। यह क्षमता कलवरी क्लास पनडुब्बियों के लिए पर्याप्त मानी जा रही है। लंबे ट्रायल्स के बाद अब इस सिस्टम को ऑपरेशनल पनडुब्बी में लगाने के लिए तैयार माना जा रहा है। बता दें कि भारतीय नेवी में स्कॉर्पीन क्लास को ही कलवरी क्लास कहा जाता है। (AIP System)

आईएनएस खंडेरी पर कैसे लगेगा एआईपी

इस तकनीक को लगाने के लिए पनडुब्बी को रिफिट यानी बड़े मेंटेनेंस के लिए डॉक में लाया जाएगा। इस दौरान पनडुब्बी के स्ट्रक्चर के अंदर एक विशेष “एनर्जी मॉड्यूल” लगाया जाएगा। यही मॉड्यूल फ्यूल-सेल के जरिए बिजली पैदा करेगा। रक्षा सूत्रों के अनुसार अगले तीन से चार महीनों में डीआरडीओ यह एनर्जी मॉड्यूल मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड को सौंप देगा। इसके बाद इस सिस्टम को आईएनएस खंडेरी में लगाने की प्रक्रिया शुरू होगी। (AIP System)

कब होंगे समुद्री ट्रायल्स

सूत्रों के अनुसार एआईपी सिस्टम लगाने के बाद पनडुब्बी के समुद्री परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह जांचना होगा कि सिस्टम वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। रक्षा अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती समुद्री परीक्षण 2027 के मध्य में शुरू हो सकते हैं। पूरी प्रक्रिया 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत तक पूरी होने की संभावना है। (AIP System)

पहले आईएनएस कलवरी पर लगना था सिस्टम

दिलचस्प बात यह है कि इस तकनीक को सबसे पहले भारतीय नौसेना की पहली कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस कलवरी पर लगाने की योजना थी। लेकिन उस समय एआईपी सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं था, इसलिए इसे बाद में लगाने का फैसला किया गया। अब इस तकनीक को आईएनएस खंडेरी पर लगाया जा रहा है, जो इस वर्ग की दूसरी पनडुब्बी है। (AIP System)

कलवरी क्लास पनडुब्बियों की खासियत

स्कॉर्पीन क्लास यानी कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियां भारत के प्रोजेक्ट-75 कार्यक्रम के तहत बनाई गई हैं। इन्हें मुंबई में तैयार किया गया है। इन पनडुब्बियों का निर्माण फ्रांस की कंपनी नेवल ग्रुप के सहयोग से किया गया है।
इस परियोजना के तहत कुल छह पनडुब्बियां बनाई गई हैं और सभी अब भारतीय नौसेना में शामिल हो चुकी हैं। इनके नाम हैं आईएनएस कलवरी (S21), आईएनएस खंडेरी (S22), आईएनएस करंज (S23), आईएनएस वेला (S24), आईएनएस वागीर (S25) और आईएनएस वाग्शीर (S26) हैं। इन पनडुब्बियों को आधुनिक सेंसर, टॉरपीडो और मिसाइल सिस्टम से लैस किया गया है। (AIP System)

भारत के पास कितनी हैं सबमरींस

भारतीय नौसेना के पास फिलहाल लगभग 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें से कई पनडुब्बियां 30 साल से अधिक पुरानी हो चुकी हैं और धीरे-धीरे उन्हें सेवा से हटाने की योजना बनाई जा रही है। नई पनडुब्बियों और आधुनिक तकनीक के जुड़ने से भारतीय नौसेना की समुद्री शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआईपी सिस्टम लगने के बाद डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की क्षमता काफी बढ़ जाती है।

वहीं, अगर यह तकनीक सफलतापूर्वक काम करती है तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने फ्यूल-सेल आधारित एआईपी तकनीक खुद विकसित की है। दुनिया में अभी बहुत कम देशों के पास यह क्षमता है। इनमें जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसे देश शामिल हैं। भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (AIP System)

असम में ट्रेनिंग मिशन के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुआ सुखोई-30 फाइटर जेट, दोनों पायलटों की मौत

Su-30MKI Crash
Flt Lt Purvesh Duragkar and Sqn Ldr Anuj

Su-30MKI Crash: भारतीय वायुसेना का एक सु-30एमकेआई फाइटर जेट असम के करबी आंगलोंग क्षेत्र में ट्रेनिंग मिशन के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में भारतीय वायुसेना के दो पायलटों, स्क्वाड्रन लीडर अनुज और फ्लाइट लेफ्टिनेंट पूर्वेश दुरागकर की मौत हो गई। भारतीय वायुसेना ने आधिकारिक बयान जारी कर दोनों अधिकारियों के निधन की पुष्टि की और उनके परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।

वायुसेना ने बताया कि दुर्घटनाग्रस्त विमान जोरहाट एयरबेस से नियमित प्रशिक्षण उड़ान के लिए रवाना हुआ था। उड़ान के दौरान विमान का संपर्क एयर ट्रैफिक कंट्रोल से टूट गया और इसके कुछ समय बाद दुर्घटना की सूचना सामने आई। हादसा जोरहाट से लगभग 60 किलोमीटर दूर असम के करबी आंगलोंग जिले के इलाके में हुआ।

भारतीय वायुसेना ने अपने बयान में कहा कि सभी वायुसेना कर्मी इस दुखद घटना से बेहद दुखी हैं और शोक संतप्त परिवारों के साथ मजबूती से खड़े हैं। (Su-30MKI Crash)

Su-30MKI Crash: गुरुवार शाम 7:42 बजे टूटा संपर्क

जानकारी के अनुसार यह सु-30एमकेआई फाइटर जेट असम के जोरहाट एयरबेस से उड़ान भरकर एक नियमित ट्रेनिंग सॉर्टी पर गया था। उड़ान के दौरान विमान का अंतिम संपर्क शाम 7 बजकर 42 मिनट पर हुआ। इसके बाद विमान से कोई संपर्क नहीं हो पाया।

जब विमान निर्धारित समय पर वापस नहीं लौटा तो वायुसेना ने इसे ओवरड्यू घोषित कर दिया और तुरंत खोज और बचाव अभियान शुरू किया। इसके बाद हेलीकॉप्टर और जमीनी टीमों को खोज अभियान के लिए भेजा गया।

कुछ समय बाद करबी आंगलोंग के पहाड़ी और जंगल वाले इलाके में विमान के मलबे के मिलने की जानकारी सामने आई। इसके बाद बचाव दल तुरंत घटनास्थल पर पहुंचा और पूरे क्षेत्र को सुरक्षित किया गया। (Su-30MKI Crash)

दुर्घटना असम के करबी आंगलोंग जिले के एक दूरदराज और जंगल से घिरे इलाके में हुई। यह क्षेत्र पहाड़ी भूभाग और घने जंगलों के कारण कठिन माना जाता है। खोज और बचाव अभियान में स्थानीय प्रशासन, पुलिस और वायुसेना की टीमों ने मिलकर काम किया। घटनास्थल पर पहुंचने के बाद सुरक्षा कारणों से पूरे क्षेत्र को घेर लिया गया।

भारतीय वायुसेना ने इस हादसे की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी का आदेश दिया है। जांच में विमान के तकनीकी पहलुओं, उड़ान के दौरान हुई घटनाओं और अन्य संभावित कारणों की जांच की जाएगी। जांच टीम विमान के फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और अन्य तकनीकी जानकारी के आधार पर दुर्घटना के कारणों का पता लगाएगी।

इस बीच वायुसेना ने कहा है कि हादसे से जुड़े सभी तथ्यों की जांच की जा रही है और आधिकारिक जानकारी मिलने के बाद ही आगे की जानकारी साझा की जाएगी। (Su-30MKI Crash)

दो पायलटों की मौत

भारतीय वायुसेना ने पुष्टि की कि इस दुर्घटना में विमान में सवार दोनों पायलटों की मौत हो गई। मृतकों में स्क्वाड्रन लीडर अनुज और फ्लाइट लेफ्टिनेंट पूर्वेश दुरागकर शामिल हैं। वायुसेना ने दोनों अधिकारियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्र की सेवा करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। वायुसेना के सभी अधिकारी और जवान इस कठिन समय में उनके परिवारों के साथ खड़े हैं।

स्क्वाड्रन लीडर अनुज एक अनुभवी फाइटर पायलट थे और भारतीय वायुसेना में लंबे समय से सेवा दे रहे थे। वे मूल रूप से हरियाणा के गुरुग्राम के रहने वाले बताए जाते हैं। वायुसेना में अपने करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनल और प्रशिक्षण मिशनों में हिस्सा लिया। (Su-30MKI Crash)

जानकारी के अनुसार वे आईएएफ स्टेशन महाराजपुर में तैनात रहे थे, जहां वे मिराज-2000 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान उड़ाते थे। उनके बारे में उपलब्ध जानकारी बताती है कि वे एक कुशल और अनुशासित पायलट के रूप में जाने जाते थे। उनके साथ उन्हें एक समर्पित और शांत स्वभाव के अधिकारी के तौर पर याद करते हैं।

वहीं, फ्लाइट लेफ्टिनेंट पूर्वेश रवींद्र दुरागकर महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले थे। वे एक युवा और उत्साही पायलट थे जिन्होंने हाल ही में भारतीय वायुसेना में अपना करियर शुरू किया था। उन्होंने 17 दिसंबर 2022 को भारतीय वायुसेना में कमीशन प्राप्त किया था।


पूर्वेश ने नागपुर के डॉ. आंबेडकर कॉलेज से कंप्यूटर साइंस में बीएससी की पढ़ाई की थी। छात्र जीवन के दौरान वे नेशनल कैडेट कोर यानी एनसीसी से जुड़े रहे और उन्होंने महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हुए कई राष्ट्रीय एनसीसी कैंपों में भाग लिया। (Su-30MKI Crash)

वायुसेना में शामिल होने के लिए उन्होंने एयर फोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट यानी एएफकैट पास किया और वर्ष 2021 में हैदराबाद स्थित एयर फोर्स एकेडमी में प्रशिक्षण के लिए पहुंचे। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें फाइटर स्ट्रीम में शामिल किया गया।

उनके पिता रवींद्र दुरागकर सेंट्रल रेलवे में ट्रांसपोर्ट इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी मां संध्या दुरागकर गृहिणी हैं। परिवार और परिचितों के अनुसार पूर्वेश बचपन से ही सशस्त्र बलों में शामिल होकर देश की सेवा करना चाहते थे। वे फिटनेस और अनुशासन पर विशेष ध्यान देते थे और युवाओं को भी सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करते थे। वायुसेना में अपने छोटे लेकिन समर्पित करियर के दौरान उन्होंने कई प्रशिक्षण मिशनों में हिस्सा लिया। (Su-30MKI Crash)

अब तक कितने सुखोई हुए हादसे का शिकार

भारतीय वायुसेना ने रूस के साथ समझौते के बाद इस विमान को अपने बेड़े में शामिल किया था और वर्ष 2002 में यह सेवा में आया। आज भी यह विमान वायुसेना की मुख्य ताकत माना जाता है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारतीय वायुसेना के सु-30एमकेआई विमानों के कम से कम 12 से अधिक विमान दुर्घटनाओं में खो चुके हैं, जबकि कुछ मामलों में पायलटों की मौत भी हुई है। (Su-30MKI Crash)

इनमें से अधिकांश हादसे प्रशिक्षण उड़ानों या तकनीकी खराबी के दौरान हुए हैं। कई बार पायलट समय रहते इजेक्ट कर जाते हैं, जिससे उनकी जान बच जाती है।

भारतीय वायुसेना के सु-30 का पहला बड़ा हादसा 30 अप्रैल 2009 को राजस्थान के जैसलमेर के पास हुआ था। यह विमान नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था। दुर्घटना में एक पायलट की मौत हो गई जबकि दूसरे पायलट को गंभीर चोटें आई थीं। यह भारतीय वायुसेना में इस विमान का पहला बड़ा क्रैश माना जाता है। (Su-30MKI Crash)

उसी वर्ष नवंबर 2009 में एक और सु-30 विमान राजस्थान के पोखरण फायरिंग रेंज के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में दोनों पायलट सुरक्षित बाहर निकल आए थे।

इसके बाद दिसंबर 2011 में पुणे के पास एक सु-30 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में पायलटों ने समय रहते इजेक्ट कर लिया था और उनकी जान बच गई थी।

इसके बाद अप्रैल 2012 और फरवरी 2013 में भी प्रशिक्षण मिशनों के दौरान विमान दुर्घटनाएं हुईं। अक्टूबर 2014 में पुणे के पास एक और सु-30 हादसे का शिकार हुआ, लेकिन इस घटना में भी पायलट सुरक्षित बाहर निकल आए थे।

मई 2015 में असम के तेजपुर क्षेत्र के पास एक सु-30 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। यह विमान भी प्रशिक्षण उड़ान पर था और दोनों पायलटों ने इजेक्ट करके अपनी जान बचाई थी।

इसके बाद मार्च 2017 में राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र के पास एक सु-30 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इस घटना में विमान पूरी तरह नष्ट हो गया था, हालांकि पायलट सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे। (Su-30MKI Crash)

इसके बाद जून 2018 में नासिक में एक उत्पादनाधीन सुखोई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। उस समय विमान परीक्षण उड़ान पर था। इस घटना में भी पायलट सुरक्षित रहे थे।

2019 में असम के तेजपुर के पास भी एक सु-30 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। यह विमान उड़ान भरने के कुछ समय बाद ही खेतों में गिर गया था। उस समय भी पायलटों ने समय रहते इजेक्ट कर लिया था।

इसके बाद 2023 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पास एक प्रशिक्षण मिशन के दौरान सु-30 और मिराज-2000 विमान हादसे का शिकार हो गए थे। उस घटना में एक पायलट की मौत हुई थी जबकि अन्य पायलट सुरक्षित बच गए थे। (Su-30MKI Crash)

अमेरिकी हमले के बाद श्रीलंका के पास पहुंचा दूसरा ईरानी जहाज, कोलंबो में मांगी डॉकिंग की अनुमति

Iranian Ship Colombo Docking
Representative Image

Iranian Ship Colombo Docking: हिंद महासागर क्षेत्र में तनाव के बीच एक दूसरा ईरानी जहाज श्रीलंका के पास देखा गया है और उसने कोलंबो बंदरगाह पर आपातकालीन रूप से डॉक करने की अनुमति मांगी है। यह घटना उस समय सामने आई जब एक दिन पहले अमेरिकी नौसेना की एक पनडुब्बी ने हिंद महासागर में ईरान की नौसेना के युद्धपोत IRIS Dena को टॉरपीडो से निशाना बनाया था।

Iranian Ship Colombo Docking: श्रीलंका के पास दिखाई दिया दूसरा ईरानी जहाज

श्रीलंका सरकार के अनुसार यह जहाज गुरुवार को द्वीप देश के पास देखा गया। श्रीलंका के कैबिनेट प्रवक्ता और मंत्री नलिंदा जयतिस्सा ने संसद में बताया कि एक और ईरानी जहाज श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र के पास मौजूद है। उन्होंने कहा कि सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है और लोगों की सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

हालांकि मंत्री ने जहाज की विस्तृत जानकारी या उस पर मौजूद लोगों की संख्या के बारे में ज्यादा जानकारी साझा नहीं की। अधिकारियों के अनुसार जहाज के बारे में जांच की जा रही है और उससे जुड़े तथ्यों की पुष्टि की जा रही है। (Iranian Ship Colombo Docking)

युद्धपोत नहीं बल्कि तकनीकी जहाज होने की आशंका

रिपोर्टों में बताया गया है कि यह जहाज कोई युद्धपोत नहीं बल्कि एक लॉजिस्टिक या पाइप-लेइंग जहाज हो सकता है। ऐसे जहाज आम तौर पर समुद्र में तकनीकी कामों और पाइपलाइन बिछाने जैसे कार्यों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

सूत्रों के अनुसार यह जहाज श्रीलंका के पश्चिमी तट के करीब ऑपरेट हो रहा है और उस पर 100 से अधिक चालक दल के सदस्य मौजूद हो सकते हैं। जहाज ने कोलंबो बंदरगाह पर आपातकालीन रूप से रुकने की अनुमति मांगी है क्योंकि उसके इंजन में तकनीकी समस्या बताई जा रही है। (Iranian Ship Colombo Docking)

कोलंबो पोर्ट पर डॉकिंग की मांग

श्रीलंका के विपक्षी सांसद नमल राजपक्षे ने कहा कि जहाज ने औपचारिक रूप से कोलंबो बंदरगाह पर आपातकालीन रूप से प्रवेश की अनुमति मांगी है। हालांकि सरकार ने अभी तक इस अनुरोध पर अंतिम फैसला नहीं लिया है।

उन्होंने बताया कि सरकार इस मामले पर सावधानी से विचार कर रही है। इसी बीच श्रीलंका के राष्ट्रपति ने वरिष्ठ मंत्रियों और रक्षा अधिकारियों के साथ बैठक भी की है ताकि इस स्थिति का आकलन किया जा सके और आगे की कार्रवाई तय की जा सके। (Iranian Ship Colombo Docking)

एक दिन पहले डूबा था ईरानी युद्धपोत

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब हिंद महासागर में ईरान की नौसेना का युद्धपोत IRIS Dena डूब गया था। रिपोर्टों के अनुसार इस जहाज को अमेरिकी नौसेना की एक न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन ने टॉरपीडो से निशाना बनाया था।

इस हमले में जहाज पर मौजूद लगभग 100 नाविकों के मारे जाने की खबर सामने आई थी। घटना के बाद श्रीलंका की नौसेना और अन्य एजेंसियों ने समुद्र में खोज और बचाव अभियान भी चलाया था। (Iranian Ship Colombo Docking)

डूबा हुआ ईरानी युद्धपोत हाल ही में भारत में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रम में शामिल हुआ था। यह कार्यक्रम भारतीय नौसेना द्वारा विशाखापत्तनम में आयोजित किया गया था।

इस दौरान कई देशों की नौसेनाओं ने इसमें भाग लिया था। कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास मिलन भी आयोजित किया गया था।

यह कार्यक्रम 16 से 25 फरवरी के बीच आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम के बाद विभिन्न देशों के युद्धपोत अपने-अपने देशों की ओर लौट रहे थे। इसी दौरान हिंद महासागर क्षेत्र में यह घटना हुई। (Iranian Ship Colombo Docking)

अमेरिका ने की हमले की पुष्टि

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेठ ने एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान इस हमले की पुष्टि की थी। उन्होंने कहा कि अमेरिकी पनडुब्बी ने हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत को टॉरपीडो से निशाना बनाया।

उन्होंने कहा कि जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में था और अमेरिकी सबमरीन द्वारा दागे गए टॉरपीडो से वह डूब गया। (Iranian Ship Colombo Docking)

ईरान ने की निंदा

इस घटना के बाद ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। ईरान ने कहा कि जिस युद्धपोत को निशाना बनाया गया वह हाल ही में भारत में आयोजित नौसैनिक कार्यक्रम में शामिल हुआ था और वह वहां भारतीय नौसेना का अतिथि रहा था।

ईरानी अधिकारियों ने आरोप लगाया कि अमेरिकी पनडुब्बी ने बिना किसी चेतावनी के जहाज पर हमला किया। (Iranian Ship Colombo Docking)

हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ी हलचल

ईरानी जहाज के डूबने और दूसरे जहाज के श्रीलंका के पास पहुंचने के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ गई है। कई देशों की नौसेनाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और समुद्री गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।

श्रीलंका सरकार भी स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और कोलंबो बंदरगाह में जहाज को प्रवेश देने के अनुरोध पर विचार कर रही है। (Iranian Ship Colombo Docking)

ईरानी वॉरशिप IRIS Dena पर हमला क्यों अमेरिका को पड़ सकता है भारी, क्या हैं नियम? भारतीय नौसेना ने भी की थी मदद

IRIS Dena: US Submarine Torpedo Sinks Iranian Warship Near Sri Lanka in Indian Ocean
IRIS Dena: US Submarine Torpedo Sinks Iranian Warship Near Sri Lanka in Indian Ocean

IRIS Dena: हिंद महासागर क्षेत्र में ईरान की नौसेना के युद्धपोत आईआरआईएस देना को निशाना बनाना अमेरिका को भारी पड़ सकता है। देना को अमेरिकी नौसेना की न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन ने श्रीलंका के दक्षिणी समुद्री इलाके के पास टारपीडो दाग कर डुबा दिया था। इस घटना के बाद समुद्र में बचाव अभियान चलाया गया, जिसमें लगभग 30 नाविकों को बचाया गया, जबकि 100 से ज्यादा के मारे जाने की खबर है।

इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह युद्धपोत हाल ही में भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौट रहा था। (IRIS Dena)

विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि ईरानी युद्धपोत ने घटना के तुरंत बाद संकट संदेश यानी डिस्ट्रेस कॉल भेजा, जिसके बाद श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त रूप से खोज और बचाव अभियान शुरू किया। बचाए गए नाविकों को श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में स्थित अस्पतालों में पहुंचाया गया।

आईआरआईएस देना ईरानी नौसेना का एक आधुनिक फ्रिगेट था। यह ईरान के मौज-क्लास युद्धपोतों में शामिल माना जाता है। इस जहाज को वर्ष 2021 में नौसेना में शामिल किया गया था और इसका नाम ईरान के माउंट देना के नाम पर रखा गया था। ईरान की दक्षिणी नौसैनिक फ्लीट में इसे महत्वपूर्ण युद्धपोत माना जाता था।

फरवरी 2026 में यह जहाज भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर-मिलन एक्सरसाइज में शामिल हुआ था। यह कार्यक्रम कई देशों की नौसेनाओं के बीच सहयोग और पेशेवर संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। (IRIS Dena)

IRIS Dena: कैसे हुआ हमला

रिपोर्टों के अनुसार 3 मार्च को जब ईरानी युद्धपोत भारत से लौटकर ईरान की ओर जा रहा था। जहाज श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र से गुजर रहा था।

बताया गया है कि इसी दौरान अमेरिकी नौसेना की एक अटैक सबमरीन ने जहाज पर टॉरपीडो दागा। टॉरपीडो लगने के बाद जहाज को गंभीर नुकसान हुआ और उसने तुरंत डिस्ट्रेस कॉल भेजी। (IRIS Dena)

कुछ समय बाद जहाज समुद्र में डूब गया। घटना की जानकारी मिलने के बाद श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने बचाव अभियान शुरू किया। कई नाविक समुद्र में तैरते हुए पाए गए, जिन्हें सुरक्षित निकालकर किनारे लाया गया।

श्रीलंका के अधिकारियों के अनुसार जहाज से संकट संदेश मिलने के बाद तुरंत नौसेना के जहाज और हेलीकॉप्टर भेजे गए। बचाव दल ने समुद्र में तैरते हुए कई नाविकों को बचाया और उन्हें अस्पताल पहुंचाया।

श्रीलंका की नौसेना के प्रवक्ता ने बताया कि यह घटना देश की समुद्री सीमा के बाहर हुई थी, लेकिन यह क्षेत्र श्रीलंका के खोज और बचाव क्षेत्र में आता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में तत्काल सहायता प्रदान करना आवश्यक होता है।

रिपोर्टों के अनुसार बचाए गए नाविकों को गाले के करापिटिया अस्पताल में भर्ती कराया गया। बचाव अभियान के दौरान समुद्र में तेल का बड़ा धब्बा भी देखा गया, जिससे संकेत मिला कि जहाज को भारी नुकसान हुआ था। (IRIS Dena)

हमले को लेकर उठे सवाल

इस घटना के बाद कई रणनीतिक और कूटनीतिक सवाल उठे हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध के दौरान भी समुद्र में कुछ मानवीय नियम लागू होते हैं।

युद्ध के कानूनों में शामिल जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार यदि कोई जहाज डूबता है, तो जहां तक सैन्य परिस्थितियां अनुमति दें, वहां तक जीवित बचे लोगों की तलाश और बचाव का प्रयास किया जाना चाहिए। कई विशेषज्ञों ने इस मामले में यह सवाल उठाया कि हमले के बाद बचाव अभियान में अमेरिकी नौसेना की भूमिका क्यों नहीं दिखी।

हालांकि यह भी कहा जाता है कि पनडुब्बियां अक्सर अपनी सुरक्षा के कारण हमले के बाद तुरंत क्षेत्र छोड़ देती हैं। इस कारण बचाव कार्य अन्य नौसेनाओं द्वारा किया जाता है। (IRIS Dena)

अमेरिकी पनडुब्बी रख रही थी अभ्यास पर नजर

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि इस तरह की घटना समुद्री सहयोग के माहौल पर सवाल खड़े करती है। सिबल ने कहा कि मिलन एक्सरसाइज का उद्देश्य विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच आपसी समझ, भरोसा और पेशेवर सहयोग को बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि इस अभ्यास का मकसद समुद्री क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि जिस ईरानी फ्रिगेट को बाद में निशाना बनाया गया, वह भारतीय नौसेना के निमंत्रण पर इस अभ्यास में शामिल हुआ था। उनका कहना था कि अमेरिकी पनडुब्बी इस पूरे अभ्यास पर नजर रख रही थी और जब यह जहाज भारत से वापस ईरान जा रहा था, तब श्रीलंका के पास उस पर टॉरपीडो से हमला किया गया। उनके अनुसार इस कार्रवाई से मिलान अभ्यास की भावना को ठेस पहुंची है और यह स्थिति किसी के लिए भी सकारात्मक नहीं कही जा सकती। (IRIS Dena)

मेजबान देश के प्रति असम्मान

रणनीतिक मामलों के विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने भी इस घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी बहुराष्ट्रीय अभ्यास से लौट रहे जहाज पर हमला होना समुद्री कूटनीति के लिहाज से संवेदनशील मामला है। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा और विश्वास से जुड़े सवाल पैदा करती हैं।

चेलानी के अनुसार इस घटना से ऐसा लगता है कि भारत के समुद्री पड़ोस को एक तरह से युद्ध क्षेत्र में बदल दिया गया है। कूटनीतिक दृष्टि से यह कदम नौसैनिक मेजबानी से जुड़े एक अनलिखे नियम का उल्लंघन माना जा सकता है। आम तौर पर यह माना जाता है कि यदि कोई जहाज किसी देश के आमंत्रण पर उसके सैन्य अभ्यास में शामिल हुआ हो, तो उसके वहां से निकलने के तुरंत बाद उस पर हमला करना उस मेजबान देश के प्रति असम्मान माना जाता है। उनका कहना था कि इस घटना से अन्य देशों की नौसेनाओं के सामने यह संदेश जा सकता है कि भारत में होने वाले नौसैनिक अभ्यासों में भाग लेने के बाद भी उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। (IRIS Dena)

क्या कहते हैं समुद्री कानून और अंतरराष्ट्रीय नियम

समुद्र से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय नियम भी इस घटना के संदर्भ में चर्चा में आए हैं। समुद्र के कानूनों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन यानी UNCLOS समुद्री गतिविधियों के लिए कुछ नियम तय करता है। इन नियमों के तहत अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में जहाजों को नेविगेशन की स्वतंत्रता होती है। हालांकि युद्ध की स्थिति में सैन्य कार्रवाई के अपने अलग नियम भी लागू होते हैं। (IRIS Dena)

कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि समुद्र में युद्ध के दौरान भी मानवीय नियमों का पालन किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि बेहतर यही होता कि अमेरिका पहले भारत और ईरान दोनों को यह जानकारी दे देता कि विशाखापत्तनम से लौटते समय देना संभावित लक्ष्य बन सकता है। यदि ऐसा होता, तो जहाज का कप्तान संभवतः किसी तटस्थ बंदरगाह में शरण लेने का फैसला कर सकता था।

जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में जहाजों को आवाजाही की स्वतंत्रता जरूर मिलती है, लेकिन युद्ध की स्थिति में इसका मतलब यह नहीं होता कि उन पर हमला नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि युद्ध के दौरान भी कुछ मानवीय नियम लागू होते हैं। (IRIS Dena)

जिनेवा कन्वेंशन के तहत यदि कोई जहाज डूबने की स्थिति में हो, तो हमलावर पक्ष को जहां तक सैन्य परिस्थितियां अनुमति दें, वहां तक जीवित बचे लोगों की तलाश और बचाव का प्रयास करना चाहिए। इस मामले में रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी पनडुब्बी हमले के बाद तुरंत वहां से निकल गई और बचाव कार्य श्रीलंका की नौसेना को करना पड़ा।

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि जब अमेरिकी नौसेना की किसी कार्रवाई ने भारत को असहज स्थिति में डाला हो। वर्ष 2021 में भी अमेरिकी नौसेना ने लक्षद्वीप के आसपास सैन्य अभ्यास किया था।

अमेरिका ने अभी तक UNCLOS की पुष्टि नहीं की है, जबकि भारत इस संधि का हिस्सा है। इस संधि के अनुसार किसी देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन में सैन्य अभ्यास करने के लिए संबंधित देश की सहमति आवश्यक मानी जाती है। (IRIS Dena)

भारतीय नौसेना का खोज और बचाव अभियान

भारतीय नौसेना की तरफ से जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक श्रीलंका की नौसेना के अनुसार 4 मार्च की सुबह तड़के देना शिप से एक डिस्ट्रेस कॉल कोलंबो स्थित मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी एमआरसीसी को मिला था। उस समय यह जहाज गाले से लगभग 20 नॉटिकल मील पश्चिम में मौजूद था। यह इलाका समुद्री खोज और बचाव क्षेत्र यानी एसएआर रीजन के अंतर्गत आता है, जिसकी जिम्मेदारी श्रीलंका के पास है। (IRIS Dena)

यह जानकारी मिलते ही भारतीय नौसेना ने तुरंत खोज और बचाव अभियान शुरू कर दिया। 4 मार्च को सुबह लगभग 10 बजे भारतीय नौसेना के एक लंबी दूरी के मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट को खोज अभियान में सहायता के लिए भेजा गया। यह विमान श्रीलंका द्वारा शुरू किए गए बचाव अभियान को मजबूत करने के उद्देश्य से तैनात किया गया था। (IRIS Dena)

इसके अलावा एक और विमान को भी तैयार रखा गया, जिसमें हवा से गिराए जा सकने वाले लाइफ राफ्ट मौजूद थे। जरूरत पड़ने पर इस विमान को तुरंत भेजने की व्यवस्था की गई थी ताकि समुद्र में फंसे लोगों को मदद पहुंचाई जा सके।

उस समय आसपास के क्षेत्र में मौजूद भारतीय नौसेना का जहाज आईएनएस तरंगिणी भी बचाव अभियान में मदद के लिए भेजा गया। यह जहाज 4 मार्च को शाम करीब 4 बजे खोज क्षेत्र में पहुंच गया और बचाव प्रयासों में शामिल हो गया। तब तक श्रीलंका की नौसेना और अन्य एजेंसियां समुद्र में खोज और बचाव का काम शुरू कर चुकी थीं। (IRIS Dena)

इसके अलावा भारतीय नौसेना का एक और जहाज आईएनएस इक्क्षक कोच्चि से रवाना किया गया ताकि खोज अभियान को और मजबूत किया जा सके। यह जहाज अब भी उस क्षेत्र में मौजूद है और समुद्र में लापता लोगों की तलाश कर रहा है। यह अभियान मानवीय आधार पर चलाया जा रहा है ताकि जहाज दुर्घटना में फंसे लोगों की सहायता की जा सके।

भारतीय नौसेना और श्रीलंका के अधिकारियों के बीच खोज और बचाव अभियान को लेकर लगातार समन्वय जारी है और दोनों देश मिलकर इस मानवीय अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। (IRIS Dena)

घटना के बाद क्षेत्र में बढ़ी सतर्कता

इस घटना के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ गई है। कई देशों की नौसेनाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और समुद्री गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।

जहाज के डूबने की घटना के बाद आसपास के समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने भी इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। (IRIS Dena)

चूरू में भारतीय सेना का गौरव सेनानी समारोह, 6000 से ज्यादा पूर्व सैनिकों को मिलेगा लाभ

Gaurav Senani Samaroh
Gaurav Senani Samaroh

Gaurav Senani Samaroh: भारतीय सेना के सप्त शक्ति कमान के अंतर्गत रणबांकुरा डिवीजन 8 मार्च को राजस्थान के चूरू में “गौरव सेनानी समारोह” का आयोजन करने जा रही है। यह कार्यक्रम एसएआई स्पोर्ट्स स्टेडियम, चूरू में आयोजित होगा। इस समारोह का उद्देश्य जिले की सभी आठ तहसीलों के पूर्व सैनिकों, वीर नारियों और वीरांगनाओं को सम्मानित करना और उनसे सीधे संवाद स्थापित करना है।

भारतीय सेना की ओर से जारी जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम से लगभग 6,000 से अधिक पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है। समारोह में भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी और नागरिक प्रशासन के प्रतिनिधि भी मौजूद रहेंगे। इस दौरान सेना पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएगी।

कार्यक्रम के दौरान एक विशेष कल्याण शिविर भी लगाया जाएगा, जहां पूर्व सैनिकों को पेंशन से जुड़ी सेवाएं प्रदान की जाएंगी। एसपीएआरएसएच पेंशन सिस्टम के माध्यम से पेंशन संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाएगा। इसके अलावा रिकॉर्ड ऑफिस और सीडीए से जुड़े अधिकारी भी मौजूद रहेंगे, जो पेंशन और बैंकिंग से जुड़े मामलों में मदद देंगे।

नागरिक प्रशासन की ओर से भी कई स्टॉल लगाए जाएंगे। इन स्टॉलों पर जमीन और कानूनी मामलों से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए मदद दी जाएगी। साथ ही आधार सेवाएं और विभिन्न सरकारी कल्याण योजनाओं की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाएगी।

समारोह के दौरान एक मेडिकल कैंप भी लगाया जाएगा, जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा स्वास्थ्य जांच, दंत चिकित्सा और अन्य चिकित्सा सुविधाएं दी जाएंगी। इससे पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिलेगा।

इसके अलावा आर्मी वेलफेयर प्लेसमेंट ऑर्गनाइजेशन यानी एडब्ल्यूपीओ के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। वे पूर्व सैनिकों को कौशल विकास, करियर मार्गदर्शन और रोजगार के अवसरों के बारे में जानकारी देंगे। एडब्ल्यूपीओ नेटवर्क के माध्यम से पूर्व सैनिकों को विभिन्न संस्थाओं और संगठनों से जोड़ने की कोशिश की जाएगी।

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण सेना के उपकरणों की प्रदर्शनी भी होगी। इसमें भारतीय सेना के विभिन्न उपकरण और सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया जाएगा, जिससे लोगों को सेना की परंपरा और कार्यशैली के बारे में जानकारी मिलेगी। समारोह के दौरान पूर्व सैनिकों, वीर नारियों और वीरांगनाओं को राष्ट्र के प्रति उनके योगदान और बलिदान के लिए सम्मानित किया जाएगा।

साइप्रस के ब्रिटिश एयरबेस पर ईरान के ड्रोन हमले का सच आया सामने, कौन रच रहा है ‘फॉल्स फ्लैग’ ऑपरेशंस की साजिश?

US-Iran War

US-Iran War: पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा खुलासा किया है। मंत्रालय के अनुसार साइप्रस में स्थित ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स के अक्रोटिरी एयरबेस को निशाना बनाकर एक ड्रोन भेजा गया था। शुरुआती जांच में यह ड्रोन ईरानी डिजाइन के शाहेद-टाइप ड्रोन जैसा बताया गया, लेकिन ब्रिटेन ने स्पष्ट किया कि यह ड्रोन सीधे ईरान से लॉन्च नहीं किया गया था। इस घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों ने जांच तेज कर दी है और एयर डिफेंस सिस्टम को अलर्ट मोड पर रखा गया है। इससे पहले सऊदी अरब में स्थित अरामको रिफइनरी को लेकर भी कुछ ऐसी ही बातें सामने आई थीं। (US-Iran War)

US-Iran War: ईरान से सीधे लॉन्च नहीं

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मध्य पूर्व में चल रहे अपने सैन्य अभियानों पर अपडेट जारी करते हुए इस घटना का उल्लेख किया। मंत्रालय के अनुसार यह ड्रोन 2 मार्च की आधी रात के आसपास अक्रोटिरी एयरबेस की दिशा में भेजा गया था। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया कि यह ड्रोन शाहेद-टाइप डिजाइन का हो सकता है। शाहेद सीरीज के ड्रोन आमतौर पर ईरान से जुड़े माने जाते हैं और कई क्षेत्रीय संघर्षों में इनका इस्तेमाल देखा गया है। हालांकि ब्रिटिश अधिकारियों ने जांच के बाद कहा कि यह ड्रोन ईरान से सीधे लॉन्च नहीं किया गया था। (US-Iran War)

अक्रोटिरी एयरबेस ब्रिटेन का एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना

अक्रोटिरी एयरबेस साइप्रस द्वीप पर स्थित ब्रिटेन का एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना है। इस बेस का इस्तेमाल रॉयल एयर फोर्स द्वारा मध्य पूर्व में निगरानी, एयर ऑपरेशन और अन्य सैन्य गतिविधियों के लिए किया जाता है। ब्रिटेन की सैन्य रणनीति में इस एयरबेस की अहम भूमिका मानी जाती है क्योंकि यह यूरोप और मध्य पूर्व के बीच रणनीतिक स्थिति में स्थित है। इसी कारण इस बेस को निशाना बनाए जाने की घटना को सुरक्षा के दृष्टिकोण से गंभीर माना गया।

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ड्रोन की पहचान और उसके लॉन्च स्थान को लेकर विस्तृत जांच की जा रही है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस घटना में किसी प्रकार का बड़ा नुकसान नहीं हुआ और न ही किसी के घायल होने की सूचना है। हालांकि एहतियात के तौर पर एयरबेस और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया गया है। (US-Iran War)

इस घटना के बाद क्षेत्र में तैनात एयर डिफेंस सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ब्रिटेन की सैन्य इकाइयों को निर्देश दिए गए हैं कि वे किसी भी संभावित खतरे के लिए तैयार रहें। सुरक्षा एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि ड्रोन किस दिशा से आया और उसके पीछे किस संगठन या समूह की भूमिका हो सकती है।

अक्रोटिरी एयरबेस का इतिहास भी काफी पुराना और रणनीतिक महत्व का रहा है। साइप्रस में ब्रिटेन के दो प्रमुख सैन्य क्षेत्र हैं, जिनमें अक्रोटिरी और डेकलिया शामिल हैं। इन बेसों का उपयोग लंबे समय से ब्रिटिश सैन्य अभियानों के लिए किया जाता रहा है। खास तौर पर मध्य पूर्व में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अक्रोटिरी बेस महत्वपूर्ण माना जाता है। (US-Iran War)

अरामको पर हमला: ईरान का हाथ या ‘फॉल्स फ्लैग’?

2 मार्च को सऊदी अरब की रास तनुरा तेल रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ। यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा सुविधाओं में से एक मानी जाती है। इस हमले के बाद रिफाइनरी के कुछ हिस्सों में आग लग गई और वहां का ऑपरेशन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। सऊदी अधिकारियों ने बताया कि एयर डिफेंस सिस्टम ने दो ड्रोनों को रास्ते में ही मार गिराया था, लेकिन इसके बावजूद हमले से कुछ नुकसान हुआ।

कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया कि इस हमले में इस्तेमाल किए गए ड्रोन ईरान से जुड़े हो सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के ठिकानों पर किए गए हमलों के जवाब के रूप में किया गया हो सकता है। लेकिन अब इस मामले की भी कलई खुलती नजर आ रही है। (US-Iran War)

ईरान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा दावा किया कि यह हमला उसकी ओर से नहीं किया गया। ईरान का कहना है कि यह इजराइल की तथाकथित “फॉल्स फ्लैग” कार्रवाई हो सकती है। फॉल्स फ्लैग का मतलब ऐसी कार्रवाई से है जिसमें हमला कोई और करे, लेकिन जिम्मेदारी किसी दूसरे देश या संगठन पर डाल दी जाए। ईरान का आरोप है कि इजराइल इस तरह के हमलों के जरिए खाड़ी देशों को ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल करने की कोशिश कर रहा है।

ईरानी मीडिया संगठन तस्नीम न्यूज एजेंसी ने भी इसी तरह का दावा किया। एजेंसी के मुताबिक, इजराइल नागरिक ठिकानों पर हो रहे हमलों से ध्यान हटाने के लिए ऐसी कार्रवाई कर सकता है। एजेंसी ने एक खुफिया सोर्स के हवाले से कहा कि ईरान ने पहले ही स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका और इजराइल से जुड़े हितों को निशाना बना सकता है, लेकिन अरामको जैसी ऊर्जा सुविधाएं उसकी सूची में नहीं हैं। (US-Iran War)

क्या सऊदी ने हमले के लिए उकसाया था अमेरिका को?

ईरान पर किए गए हमलों से पहले एक दावा सामने आया कि सऊदी अरब ने अमेरिकी प्रशासन को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया था। यह चर्चा खास तौर पर जनवरी और फरवरी 2026 में आई कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के बाद तेज हुई। हालांकि सऊदी अरब ने इन दावों को पूरी तरह गलत बताया।

28 फरवरी को एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कई निजी फोन कॉल किए थे। इन कॉल्स में कथित तौर पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया गया था। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इजराइल के साथ मिलकर अमेरिका को हमलों के लिए उकसाया गया। (US-Iran War)

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों देशों के संबंध कई वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। 2019 में ईरान समर्थित हूतियों ने सऊदी अरब की अरामको रिफाइनरी पर हमला हुआ था, जिसके बाद सऊदी ने अमेरिका से सुरक्षा सहयोग की उम्मीद की थी। इसके बाद 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिश हुई और एक समझौता भी हुआ। जनवरी 2026 में सऊदी अरब ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह ईरान की संप्रभुता का सम्मान करता है और अमेरिका को अपने एयरस्पेस का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा।

लेकिन जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इसी दौरान ईरान की ओर से कुछ जवाबी हमलों की खबरें भी सामने आईं, जिनमें ड्रोन हमले शामिल थे। इन घटनाओं ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को और जटिल बना दिया। (US-Iran War)

इन सभी रिपोर्टों के बाद सऊदी अरब की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया भी आई। सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह क्षेत्र में बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित है और वह किसी युद्ध का हिस्सा बनने की योजना नहीं बना रहा है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि ईरान द्वारा किए गए जवाबी हमलों की वह निंदा करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसने किसी सैन्य कार्रवाई को बढ़ावा दिया था। (US-Iran War)

सऊदी के कुछ विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने भी इन रिपोर्टों को खारिज किया। सऊदी राजनीतिक शोधकर्ता सलमान अल-अंसारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि मीडिया में आई रिपोर्टें पूरी तरह गलत हैं। उनका कहना था कि सऊदी अरब ने हमेशा क्षेत्र में तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान की बात की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ रिपोर्टों का उद्देश्य सऊदी अरब को युद्ध में शामिल दिखाना था।

विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान खाड़ी देशों को निशाना बनाकर अमेरिका और इजराइल पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ स्रोत इजराइल को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका दावा है कि इजरायल जानबूझ कर ईरान के पड़ोसी देशों पर हमला करके उन्हें ईरान के खिलाफ खड़ा करना चाहता है। (US-Iran War)

अमेरिका-ईरान युद्ध पर प्रोफेसर जियांग का बड़ा दावा, ‘यूएस को करना पड़ सकता है हार का सामना’

Professor Jiang Predicts US-Iran War
Professor Jiang

US-Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई विश्लेषण सामने आ रहे हैं। इसी बीच भू-राजनीति और इतिहास का अध्ययन करने वाले प्रोफेसर जियांग ने एक इंटरव्यू में दावा किया है कि मौजूदा संघर्ष अगर लंबे समय तक चलता है तो अमेरिका के लिए स्थिति मुश्किल हो सकती है।

प्रोफेसर जियांग अपनी ऑनलाइन रिसर्च और विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं और वे “प्रिडिक्टिव हिस्ट्री” नाम के एक लोकप्रिय चैनल से जुड़े हैं। इस प्लेटफॉर्म पर वे गेम थ्योरी और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर वैश्विक राजनीति और युद्ध से जुड़े संभावित घटनाक्रमों का अध्ययन करते हैं।

वे एक चीनी-कनाडाई शिक्षक, लेखक, इतिहासकार और भू-राजनीतिक विश्लेषक हैं, जो बीजिंग (चीन) में रहते और काम करते हैं। 2026 में चल रहे अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान संघर्ष के समय भारत और दुनिया भर में उनके यूट्यूब लेक्चर्स और भविष्यवाणियां बहुत वायरल हो रही हैं।

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा टकराव अब एक लंबे “एट्रिशन वॉर” यानी थकावट वाले युद्ध का रूप ले सकता है। इस तरह के युद्ध में दोनों पक्ष लंबे समय तक एक-दूसरे की सैन्य क्षमता, संसाधनों और आर्थिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। (US-Iran War)

US-Iran War: 2024 में की थीं तीन बड़ी भविष्यवाणियां

प्रोफेसर जियांग ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2024 में तीन बड़ी भविष्यवाणियां की थीं। पहली भविष्यवाणी यह थी कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी चुनाव जीत सकते हैं। दूसरी यह कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की संभावना बढ़ेगी।

उनकी तीसरी और सबसे बड़ी भविष्यवाणी यह थी कि अगर यह युद्ध होता है तो अमेरिका को इसमें गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात को देखकर उन्हें लगता है कि यह संघर्ष अब कई स्तरों पर फैल चुका है और इसमें सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दबाव भी शामिल हैं। (US-Iran War)

ईरान की लंबी तैयारी का दावा

प्रोफेसर जियांग के अनुसार ईरान पिछले कई वर्षों से इस तरह के संभावित संघर्ष की तैयारी कर रहा था। उनका कहना है कि ईरान ने लगभग दो दशकों तक अपनी सैन्य रणनीति, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क को मजबूत किया है।

उन्होंने दावा किया कि ईरान ने पहले भी कई छोटे संघर्षों और सैन्य घटनाओं के जरिए अमेरिका और इजरायल की सैन्य क्षमता का अध्ययन किया है। इससे उसे अपनी रणनीति तैयार करने में मदद मिली।

जियांग ने कहा कि ईरान इस संघर्ष को केवल सैन्य टकराव के रूप में नहीं देख रहा बल्कि इसे व्यापक आर्थिक और क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में देख रहा है। (US-Iran War)

प्रॉक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल

प्रोफेसर जियांग के मुताबिक ईरान क्षेत्र में मौजूद अपने सहयोगी संगठनों के जरिए भी रणनीति बना रहा है। उन्होंने कहा कि यमन के हूती समूह, लेबनान के हिज्बुल्लाह, फिलिस्तीन के हमास और इराक में मौजूद शिया मिलिशिया जैसे समूह इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

उनका कहना है कि इन संगठनों के जरिए ईरान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर अलग-अलग क्षेत्रों में दबाव बना सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के नेटवर्क के कारण युद्ध का दायरा एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता और कई जगहों पर तनाव बढ़ सकता है। (US-Iran War)

ऊर्जा और समुद्री मार्गों पर असर

प्रोफेसर जियांग ने अपने विश्लेषण में यह भी कहा कि मध्य पूर्व का संघर्ष केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। इसके असर एनर्जी सप्लाई और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकते हैं।

उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र के देश वैश्विक तेल बाजार में अहम भूमिका निभाते हैं और यहां के समुद्री रास्ते अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

जियांग के अनुसार अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और ऊर्जा ढांचे पर असर पड़ सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव देखने को मिल सकता है। (US-Iran War)

महंगे पड़े रहे मिसाइल और एयर डिफेंस

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हथियारों की लागत पर भी चर्चा की। उनका कहना था कि कई मामलों में सस्ते ड्रोन या मिसाइलों को रोकने के लिए बहुत महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि कुछ स्थितियों में एक सस्ता ड्रोन या मिसाइल को गिराने के लिए कई इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत काफी अधिक होती है।

इस तरह के असंतुलन को उन्होंने युद्ध की लागत बढ़ाने वाला एक बड़ा कारक बताया। (US-Iran War)

प्रोफेसर जियांग ने कहा कि अमेरिकी सैन्य रणनीति लंबे समय तक अत्याधुनिक तकनीक और महंगे हथियारों पर आधारित रही है। उनके अनुसार यह मॉडल शीत युद्ध के दौर में विकसित हुआ था।

उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में कई बार कम लागत वाले हथियार और ड्रोन भी बड़ी भूमिका निभाने लगे हैं। इससे युद्ध के स्वरूप में बदलाव देखने को मिल रहा है। (US-Iran War)

ग्राउंड ऑपरेशन के बिना सरकार बदलना संभव नहीं

इंटरव्यू में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या अमेरिका भविष्य में ईरान के खिलाफ जमीनी अभियान शुरू कर सकता है।

इस पर प्रोफेसर जियांग ने कहा कि केवल हवाई हमलों से किसी देश की सरकार को बदला नहीं जा सकता है। जो ऐसा सोचता है वह बड़ी भूल कर रहा है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह का निर्णय पूरी तरह राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

इससे पहले ट्रंप ने 2 मार्च को न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में साफ कहा था कि वे अमेरिकी जमीनी सैनिकों (बूट्स ऑन द ग्राउंड) को ईरान भेजने से पीछे नहीं हटेंगे, अगर जरूरत पड़ी तो। उन्होंने कहा, “मुझे बूट्स ऑन द ग्राउंड से कोई डर नहीं है। हर राष्ट्रपति कहता है कि ‘कोई जमीनी सैनिक नहीं भेजेंगे’। मैं ऐसा नहीं कहता। मैं कहता हूं ‘शायद जरूरत नहीं पड़ेगी’, या ‘अगर जरूरी हुई तो’।” उन्होंने जोड़ा कि ऑपरेशन अभी हवाई और नौसेना से चल रहा है, लेकिन “जरूरत पड़ी तो” ग्राउंड ट्रूप्स भेज सकते हैं। (US-Iran War)

इराक से कुर्द लड़ाकों को ईरान भेजा

कुर्द लड़ाके ईरान की जमीन पर पहुंच चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इराक के हजारों कुर्द लड़ाके पश्चिमी ईरान में सीमा पार करके दाखिल हुए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि फॉक्स न्यूज से बातचीत में की है।

बताया जा रहा है कि इस हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कुर्द नेताओं से फोन पर बात की थी। विशेषज्ञों का कहना है कि कुर्द क्षेत्रीय सरकार यानी केआरजी इतनी बड़ी संख्या में लड़ाकों को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं करा सकती, जब तक उसे अमेरिका की लॉजिस्टिक सपोर्ट, हवाई समन्वय और इंटेलिजेंस सहायता न मिले। आधुनिक इतिहास में कुर्दों के लगभग हर सीमा पार सैन्य अभियान में इसी तरह का सहयोग देखा गया है।

हालांकि इस बीच व्हाइट हाउस ने तुरंत यह कह दिया कि अमेरिका ने कुर्द लड़ाकों को हथियार नहीं दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ एक वरिष्ठ कुर्द अधिकारी ने मीडिया से कहा कि अभी तक कोई हमला शुरू नहीं हुआ है। (US-Iran War)

इन दोनों बयानों को साथ-साथ देखें तो स्थिति थोड़ी उलझी हुई नजर आती है, क्योंकि एक तरफ अमेरिकी अधिकारी इस गतिविधि की पुष्टि कर रहे हैं और दूसरी तरफ आधिकारिक तौर पर इससे दूरी बनाई जा रही है।

दरअसल इस पूरे घटनाक्रम को कुछ विशेषज्ञ अलग तरीके से समझा रहे हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने साफ कहा था कि अमेरिका ईरान में अपने सैनिक नहीं भेजेगा। ऐसे में प्रशासन को अगर जमीन पर किसी बल की जरूरत पड़े, तो वह ऐसा बल ढूंढेगा जो अमेरिकी न हो। (US-Iran War)

इराकी कुर्द लड़ाके इस भूमिका में फिट बैठते हैं। वे लंबे समय से ईरान समर्थित मिलिशिया के खिलाफ लड़ते रहे हैं और उनके अपने राजनीतिक और सुरक्षा कारण भी हैं। इसके अलावा वे संगठित हैं, युद्ध का अनुभव रखते हैं और पहले से ही ईरान की सीमा के करीब मौजूद हैं। इस नजरिए से देखा जाए तो यह “नो अमेरिकन बूट्स ऑन द ग्राउंड” वाले वादे का सीधा विरोधाभास नहीं माना जा रहा है। प्रशासन ने यह कहा था कि अमेरिकी सैनिक ईरान की जमीन पर नहीं होंगे। लेकिन कुर्द लड़ाकों के बारे में ऐसी कोई स्पष्ट बात नहीं कही गई थी।

अगर इन रिपोर्ट्स की पुष्टि होती है तो इसका मतलब यह होगा कि जंग की तस्वीर बदल सकती है। अभी तक इसे मुख्य रूप से हवाई हमलों और सीमित सैन्य कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन अगर जमीन पर लड़ाके सक्रिय हो जाते हैं, तो यह संघर्ष एक अलग स्तर का युद्ध बन सकता है। (US-Iran War)

ऐसी स्थिति में यह केवल कुछ हफ्तों का एयर कैंपेन नहीं रहेगा, बल्कि एक लंबा और जटिल जमीनी संघर्ष बन सकता है। यही वजह है कि कई विश्लेषक कह रहे हैं कि अगर यह घटनाक्रम सच साबित होता है, तो मध्य पूर्व का यह टकराव एक बिल्कुल नए चरण में प्रवेश कर सकता है।

प्रोफेसर जियांग ने यह भी कहा कि मध्य पूर्व की राजनीति में कई देशों के अपने-अपने हित होते हैं। उनके अनुसार खाड़ी क्षेत्र के देशों और इजरायल की सुरक्षा चिंताएं अलग-अलग हैं, जबकि ईरान की अपनी क्षेत्रीय रणनीति है। इस कारण क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों का प्रभाव भी इस संघर्ष पर पड़ सकता है। (US-Iran War)

भारत से लौट रहे ईरानी युद्धपोत को अमेरिका ने श्रीलंका के पास समुद्र में डुबाया, पनडुब्बी के टॉरपीडो से किया था हमला

Iran Warship IRIS Dena Sinks

Iran Warship IRIS Dena Sinks: अमेरिका ने अब हिंद महासागर क्षेत्र में भी ईरानी नौसेना के जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और एक्सरसाइज मिलन में हिस्सा लेने आए ईरान की नौसेना के युद्धपोत आईआरआईएस देना को अमेरिका ने निशाना बनाया है। यह घटना उस समय हुई जब जहाज भारत से लौटकर ईरान की ओर जा रहा था। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

रिपोर्ट्स के अनुसार यह युद्धपोत अमेरिकी नौसेना की एक न्यूक्लियर पावर्ड अटैक सबमरीन द्वारा दागे गए टॉरपीडो का निशाना बना। घटना के बाद जहाज ने तुरंत संकट संदेश यानी डिस्ट्रेस कॉल भेजी, जिसके बाद श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने बचाव अभियान शुरू किया। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

Iran Warship IRIS Dena Sinks: श्रीलंका के पास समुद्र में हुआ हादसा

जानकारी के मुताबिक यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट से लगभग 40 नॉटिकल मील दूर गाले के पास हुई। उस समय जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में था। श्रीलंका की नौसेना के प्रवक्ता बुद्धिका संपथ ने बताया कि जहाज से संकट संदेश मिलने के बाद तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। नौसेना के जहाज और हेलीकॉप्टर मौके पर भेजे गए। इसके साथ ही श्रीलंका की वायुसेना भी इस अभियान में शामिल हुई।

संपथ के मुताबिक यह घटना श्रीलंका की समुद्री सीमा के बाहर हुई थी, लेकिन यह इलाका श्रीलंका के खोज और बचाव क्षेत्र में आता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के तहत ऐसी स्थिति में सबसे पहले प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी श्रीलंका की नौसेना की होती है।

बचाव दल को समुद्र में कई नाविक तैरते हुए मिले, जिन्हें तुरंत सुरक्षित निकालकर किनारे लाया गया। घायलों को गाले स्थित करापिटिया टीचिंग हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

करीब 180 नाविक थे सवार

रिपोर्ट्स के अनुसार इस युद्धपोत पर लगभग 180 नाविक मौजूद थे। शुरुआती जानकारी में लगभग 30 नाविकों के घायल होने की बात सामने आई थी। बाद की रिपोर्ट्स में बताया गया कि कई नाविकों को समुद्र से बचाया गया है, जबकि कुछ लोग लापता बताए जा रहे हैं।

श्रीलंका के अधिकारियों ने बताया कि बचाव अभियान अभी भी जारी है और समुद्र में खोजबीन की जा रही है। इस दौरान कुछ शव मिलने की भी जानकारी सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार फिलहाल प्राथमिकता घायलों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाना और बाकी नाविकों की तलाश करना है। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

भारत के कार्यक्रम से लौट रहा था जहाज

आईआरआईएस देना हाल ही में भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास मिलन में शामिल हुआ था। दोनों आयोजन 15 से 25 फरवरी तक विशाखापत्तनम के वाइजाग में आयोजित किए गए थे। इस कार्यक्रम को भारतीय नौसेना की पूर्वी नेवल कमांड ने आयोजित किया था। खास बात यह थी कि अमेरिकी नौसेना का युद्धपोत यूएसएस पिंकनी भी विशाखापत्तनम में होने वाले कार्यक्रम में शामिल होने वाला था, लेकिन ऑपरेशनल जरूरतों के कारण वह कार्यक्रम में नहीं पहुंच सका। आखिरी वक्त पर अमेरिका ने अपना शिप यहां नहीं भेजा और केवल अपना पी8आई जहाज भेजा था। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

इन आयोजनों की मेजबानी भारतीय नौसेना ने की थी, जिसमें कई देशों के युद्धपोत और नौसेना प्रमुख शामिल हुए थे। ईरानी नौसेना प्रमुख रियर एडमिरल शहराम ईरानी भी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विशाखापत्तनम आए थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद ईरानी युद्धपोत अपने देश वापस लौट रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक आईआरआईएस डेना को आगे बढ़ने से पहले कोच्चि में ईंधन भरने के लिए रुकना था, लेकिन उससे पहले ही समुद्र में यह घटना हो गई।

आईआरआईएस डेना ईरानी नौसेना का एक आधुनिक फ्रिगेट था। यह मौज-क्लास युद्धपोतों में शामिल है और इसे ईरान की दक्षिणी नौसैनिक फ्लीट का हिस्सा माना जाता था। यह जहाज 2021 में सेवा में शामिल किया गया था और इसका नाम ईरान के माउंट देना के नाम पर रखा गया था। इस फ्रिगेट में एंटी-शिप मिसाइलें, टॉरपीडो और एयर डिफेंस सिस्टम जैसे कई हथियार लगे थे। इसके अलावा इसमें हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की सुविधा भी मौजूद थी। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि जहाज को अमेरिकी नौसेना की न्यूक्लियर अटैक सबमरीन ने टॉरपीडो से निशाना बनाया। घटना के समय अमेरिकी नौसेना के जहाज और पनडुब्बियां हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय थे।

श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिता हेराथ ने संसद में बताया कि यह हादसा देश के खोज और बचाव क्षेत्र के भीतर हुआ, इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के तहत तुरंत मदद भेजी गई। श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त रूप से अभियान चलाकर कई नाविकों को बचाया और उन्हें अस्पताल पहुंचाया। अधिकारियों के अनुसार यह अभियान समुद्री कानूनों के तहत किया गया और इसमें मानवीय आधार पर मदद दी गई। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

समुद्र में तेल का रिसाव मिला

बचाव दल जब घटनास्थल पर पहुंचा तो वहां जहाज दिखाई नहीं दिया। अधिकारियों के मुताबिक समुद्र में तेल का बड़ा धब्बा देखा गया, जिससे यह संकेत मिला कि जहाज गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका था। इसके बाद आसपास के समुद्री इलाके में खोज अभियान शुरू किया गया। श्रीलंका की नौसेना ने कहा है कि घटना के कारणों की तकनीकी जांच बाद में की जाएगी। फिलहाल प्राथमिक ध्यान बचाव अभियान पर है। (Iran Warship IRIS Dena Sinks)

4,000 करोड़ की लागत से भारतीय सेना खरीदेगी 300 धनुष तोपें, 15 नई रेजिमेंट्स होंगी तैयार

Dhanush Artillery Gun India
Indian Army Dhanush Howitzer Photo By Raksha Samachar

Indian Army Dhanush Howitzer: भारतीय सेना अपनी फायरपावर बढ़ाने के लिए जल्द ही 300 स्वदेशी धनुष हॉवित्जर तोपों के लिए ऑर्डर देने वाली है। यह फैसला रक्षा मंत्रालय की उच्च स्तरीय बैठक में मंजूरी मिलने के बाद आगे बढ़ेगा। इस खरीद के जरिए सेना में 15 नई आर्टिलरी रेजिमेंट्स तैयार की जाएंगी।

Indian Army Dhanush Howitzer: धनुष तोपों का दूसरा बड़ा ऑर्डर

यह धनुष हॉवित्जर का दूसरा बड़ा ऑर्डर होगा। इससे पहले भारतीय सेना 114 तोपों का ऑर्डर दे चुकी है, जिनमें से कई पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी हैं। इन तोपों के आधार पर अभी तक चार रेजिमेंट्स ऑपरेशनल हो चुकी हैं, जबकि दो और रेजिमेंट्स को शामिल करने की प्रक्रिया जारी है। अब नए 300 तोपों के ऑर्डर से सेना की आर्टिलरी क्षमता में बड़ा विस्तार होगा।

धनुष तोपों का निर्माण एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) द्वारा किया जा रहा है, जो पहले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड का हिस्सा था। इन तोपों का उत्पादन जबलपुर स्थित गन कैरिज फैक्ट्री में किया जाता है। (Indian Army Dhanush Howitzer)

क्या है धनुष हॉवित्जर

धनुष एक 155 मिमी और 45-कैलिबर की आधुनिक तोप है, जिसे 1980 के दशक में भारत द्वारा खरीदी गई बोफोर्स तोप की टेक्नोलॉजी के आधार पर विकसित किया गया है। इसे पूरी तरह आधुनिक जरूरतों के हिसाब से अपग्रेड किया गया है।

यह तोप अलग-अलग तरह के गोला-बारूद यानी एम्यूनिशन का इस्तेमाल कर सकती है और इसमें बाय-मॉड्यूलर चार्ज सिस्टम लगाया गया है, जिससे इसकी मारक क्षमता बढ़ जाती है। सामान्य स्थिति में इसकी रेंज करीब 36 किलोमीटर है, जबकि खास एम्यूनिशन के साथ यह 38 से 40 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तक निशाना साध सकती है।

इसमें डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया गया है, जिससे निशाना अधिक सटीक होता है। इसके अलावा इसमें ऑटोमैटिक लोडिंग असिस्ट, बेहतर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और हाई-एल्टीट्यूड यानी ऊंचाई वाले इलाकों में बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता भी है। (Indian Army Dhanush Howitzer)

क्यों जरूरी है यह खरीद

भारतीय सेना लंबे समय से अपनी आर्टिलरी यानी तोपखाने को आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रही है। सेना का लक्ष्य है कि वह धीरे-धीरे पुराने 105 मिमी और 130 मिमी की तोपों को हटाकर 155 मिमी स्टैंडर्ड की आधुनिक तोपों को शामिल करे।

इसी योजना के तहत धनुष तोपों की खरीद की जा रही है। यह योजना फील्ड आर्टिलरी रैशनलाइजेशन प्लान का हिस्सा है, जिसके तहत सेना को हजारों नई तोपों की जरूरत है।

धनुष तोपों की खास बात यह है कि इनका इस्तेमाल पहाड़ी इलाकों में भी आसानी से किया जा सकता है। इन्हें लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों में टेस्ट किया जा चुका है, जहां इनका प्रदर्शन संतोषजनक पाया गया है। (Indian Army Dhanush Howitzer)

लागत करीब 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये

पहले ऑर्डर में 114 तोपों की लागत करीब 1,260 करोड़ रुपये थी। नए 300 तोपों के ऑर्डर की कुल लागत 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये के बीच होने का अनुमान है।

इन तोपों की डिलीवरी चरणबद्ध तरीके से होगी और यह प्रक्रिया 2028 से 2032 के बीच पूरी हो सकती है। हालांकि पहले ऑर्डर की डिलीवरी में कुछ देरी भी देखी गई है, जिसका कारण सप्लाई चेन और कुछ इंपोर्टेड कंपोनेंट्स की उपलब्धता बताया गया है। (Indian Army Dhanush Howitzer)

सेना में मौजूदा स्थिति

मार्च 2026 तक धनुष तोपों की चार रेजिमेंट्स सेना में शामिल हो चुकी हैं। दो और रेजिमेंट्स को जल्द शामिल किया जाना है। एक रेजिमेंट में आमतौर पर 18 तोपें होती हैं। नए ऑर्डर के बाद कुल धनुष रेजिमेंट्स की संख्या काफी बढ़ जाएगी।

इन तोपों का इस्तेमाल मुख्य रूप से उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर किया जा रहा है, जहां तेजी से प्रतिक्रिया देने और लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाने की जरूरत होती है। (Indian Army Dhanush Howitzer)

स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा

धनुष तोपों का एक बड़ा फायदा यह है कि इनमें 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से स्वदेशी हैं। इसका मतलब है कि इनके स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस में विदेशी निर्भरता कम रहती है।

इस प्रोजेक्ट से देश के रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिल रहा है। इसमें कई छोटे और मध्यम उद्योग भी शामिल हैं, जो अलग-अलग पार्ट्स और उपकरण तैयार करते हैं। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं। (Indian Army Dhanush Howitzer)

धनुष तोप की तकनीकी खूबियां

धनुष तोप की फायरिंग स्पीड काफी तेज है। यह एक मिनट में कई राउंड फायर कर सकती है। इसमें नाटो मानकों के अनुसार गोला-बारूद का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी बनती है।

इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो लक्ष्य की पहचान और सटीकता को बेहतर बनाते हैं। इसके अलावा इसे भविष्य में और अपग्रेड करने की भी योजना है, जिसमें 52-कैलिबर वर्जन शामिल हो सकता है, जिसकी रेंज और ज्यादा होगी।

धनुष तोप का परीक्षण 2018 में राजस्थान के पोखरण में किया गया था। इस दौरान हजारों राउंड फायर किए गए और इसके प्रदर्शन को संतोषजनक पाया गया। इसके बाद ही इसे सेना में शामिल करने का रास्ता साफ हुआ। (Indian Army Dhanush Howitzer)

US-इजरायल जंग के बीच ईरान ने पहली बार इस्तेमाल की कामिकाजे ड्रोन बोट, हॉर्मुज पर बढ़ा खतरा

Iran Kamikaze Drone Boat Attack
MKD VYOM

Iran Kamikaze Drone Boat Attack: पश्चिमी एशिय में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने पहली बार एक ऑयल टैंकर पर हमला करने के लिए कामिकाजे ड्रोन बोट यानी अनक्रूड सरफेस व्हीकल (USV) का इस्तेमाल किया है। यह हमला ओमान के पास समुद्र में हुआ, जहां एक बड़े ऑयल टैंकर को निशाना बनाया गया।

मैरिटाइम सिक्योरिटी फर्म एम्ब्रे के मुताबिक, मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला ऑयल टैंकर एमकेडी व्योम इस युद्ध के दौरान ड्रोन बोट से हमला झेलने वाला पहला जहाज बना। शुरुआत में इसे मिसाइल या प्रोजेक्टाइल अटैक माना गया था, लेकिन बाद में जांच में सामने आया कि यह हमला एक अनक्रूड बोट के जरिए किया गया था। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

Iran Kamikaze Drone Boat Attack: कैसे हुआ हमला और क्या हुआ नुकसान

जानकारी के अनुसार यह घटना 1 मार्च को ओमान के मस्कट तट से करीब 50 नॉटिकल माइल दूर हुई। जहाज पर जोरदार धमाका हुआ, जिसके बाद उसमें आग लग गई। जहाज के मालिक वी.शिप्स एशिया ने पुष्टि की कि इस हमले में इंजन रूम में मौजूद एक क्रू मेंबर की मौत हो गई।

ब्रिटेन की रॉयल नेवी के तहत काम करने वाली यूनाइटेड किंगडम मैरिटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने भी इस घटना की पुष्टि की है। संगठन ने बताया कि जहाज को ड्रोन बोट से निशाना बनाया गया और सभी क्रू मेंबर्स को सुरक्षित निकालकर किनारे पहुंचाया गया।

यूनाइटेड किंगडम मैरिटाइम ट्रेड ऑपरेशंस ने आसपास के सभी जहाजों को सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना देने की सलाह दी है। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

क्या होती है ड्रोन बोट और कैसे करती है हमला

ड्रोन बोट या अनक्रूड सरफेस व्हीकल एक ऐसी बिना चालक वाली नाव होती है, जिसे रिमोट कंट्रोल या प्रोग्रामिंग के जरिए चलाया जाता है। इसमें विस्फोटक भरे होते हैं और इसे सीधे टारगेट से टकराकर धमाका करने के लिए डिजाइन किया जाता है।

इसे कामिकाजे अटैक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह खुद को नष्ट करके लक्ष्य को नुकसान पहुंचाती है। हाल के वर्षों में इस तरह की तकनीक तेजी से विकसित हुई है और इसे युद्ध में ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है।

यूक्रेन ने रूस के खिलाफ और यमन में हूती विद्रोहियों ने रेड सी में जहाजों के खिलाफ इसी तरह की ड्रोन बोट का इस्तेमाल किया है। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

अंडरसी व्हीकल्स बना रहा था ईरान

ईरान लंबे समय से ड्रोन बोट और अंडरसी व्हीकल्स विकसित कर रहा था। अब इस हमले के जरिए उसने पहली बार खुले तौर पर इनका इस्तेमाल किया है।

ईरान और उसके सहयोगी, खासकर यमन के हूती समूह, पहले भी समुद्री लक्ष्यों पर इस तरह के हमले कर चुके हैं। इससे यह साफ होता है कि ईरान इस तकनीक को अपनी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बना चुका है।

यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी से ईरान पर बड़े पैमाने पर एयर स्ट्राइक शुरू किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने समुद्री रास्तों को निशाना बनाना शुरू किया है। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की चेतावनी

ईरान की इस कार्रवाई के साथ ही एक और बड़ा कदम सामने आया है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की चेतावनी दी है।

यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से करीब 20 प्रतिशत वैश्विक कच्चा तेल गुजरता है।

ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि अब कोई भी जहाज इस रास्ते से नहीं गुजर सकता और अगर कोई कोशिश करेगा तो उसे निशाना बनाया जाएगा।

इस चेतावनी के बाद इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रैफिक में लगभग 85 प्रतिशत तक कमी आ गई है। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

एक के बाद एक कई जहाज बने निशाना

एमकेडी व्योम के अलावा भी इस संघर्ष में कई जहाजों को निशाना बनाया गया है। ओमान की खाड़ी में कम से कम चार जहाजों पर हमले की खबर सामने आई है।

इसके अलावा बहरीन पोर्ट पर मौजूद अमेरिकी झंडे वाले ऑयल टैंकर स्टेना इम्परेटिव पर भी हमला हुआ। इस जहाज को दो बार निशाना बनाया गया, जिससे उसमें आग लग गई। हालांकि सभी क्रू मेंबर्स को सुरक्षित निकाल लिया गया।

अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि इस जहाज पर हमला मिसाइल से हुआ या ड्रोन के जरिए। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव

जहां एक तरफ ईरान समुद्री हमले कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ईरान की नौसेना को निशाना बना रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस अभियान का एक प्रमुख उद्देश्य ईरान की नौसेना को कमजोर करना है। रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक ईरान के कई नौसैनिक जहाजों को नुकसान पहुंचाया गया है।

सैटेलाइट तस्वीरों में ईरान के बंदर अब्बास नौसैनिक बेस को भी भारी नुकसान पहुंचने के संकेत मिले हैं। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)

समुद्री व्यापार और सुरक्षा पर असर

इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर वैश्विक समुद्री व्यापार पर पड़ा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या तेजी से कम हो गई है। कई जहाजों ने अपनी ट्रैकिंग सिस्टम यानी एआईएस बंद कर दिए हैं, ताकि उनकी लोकेशन ट्रैक न की जा सके। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और ऊर्जा सप्लाई चेन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।

यह हमला इस बात का संकेत है कि आधुनिक युद्ध अब तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ ड्रोन, साइबर और अनक्रूड सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। ड्रोन बोट जैसे हथियार कम लागत में बड़े नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं, जिससे समुद्री सुरक्षा और भी जटिल हो गई है। इस घटना के बाद दुनिया भर की नौसेनाएं और सुरक्षा एजेंसियां इस तरह के खतरों को लेकर सतर्क हो गई हैं। (Iran Kamikaze Drone Boat Attack)