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ऑपरेशन सिंदूर की सालगिरह पर 88 घंटे तक बिना रुके दौड़ेगी वायुसेना, 88 घंटे की जंग को इस तरह करेगी याद

Operation Sindoor 88 Hour Relay Run
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Operation Sindoor 88 Hour Relay Run: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरा होने पर भारतीय वायुसेना इसे खास तरह से सेलिब्रेट कर रही है। इस मौके पर भारतीय सेनाओं की तरफ से कई तरह के आयोजन किए जा रहे हैं। वहीं, भारतीय वायुसेना 88 घंटे तक चले इस ऑपरेशन सिंदूर की याद में 88 घंटे का रिले रन आयोजित कर रही है। यह खास रन 7 मई से शुरू होकर 10 मई तक चलेगी।

इस आयोजन का मकसद उन एयर वॉरियर्स के समर्पण, ताकत और लगातार काम करने की क्षमता को दिखाना है, जिन्होंने बिना रुके लगातार 88 घंटे तक अभियान चलाकर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाया था।

Operation Sindoor 88 Hour Relay Run: 88 घंटे तक चला था ऑपरेशन सिंदूर

ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत पहलगाम आतंकी हमले के बाद हुई थी, जिसमें कई निर्दोष पर्यटक मारे गए थे। जिसके जवाब में भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर मौजूद आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे।

इन हमलों में बहावलपुर और मुरीदके जैसे इलाकों को निशाना बनाया गया, जहां जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के ठिकाने मौजूद थे। एयर फोर्स ने ब्रह्मोस और स्कैल्प जैसे स्टैंड-ऑफ वेपन का इस्तेमाल करते हुए शुरुआत में 9 ठिकानों को निशाना बनाया।

इसके बाद ऑपरेशन को और आगे बढ़ाते हुए दुश्मन के एयरबेस, रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को भी नुकसान पहुंचाया गया। यह पूरा अभियान लगातार 88 घंटे तक चला और 10 मई की सुबह तक एयर फोर्स ने अपनी मजबूत स्थिति बना ली थी।

क्या है 88 घंटे की रिले रन?

इस रिले रन की शुरुआत 7 मई को एओए (एयर ऑफिसर-इन-चार्ज एडमिनिस्ट्रेशन) एयर मर्शल एस शिवकुमार करेंगे। यह रिले रन 7 मई से 10 मई तक 88 घंटे का लगातार चलेगी। यह रन किसी प्रतियोगिता की तरह नहीं है, बल्कि एक “रिले ऑफ ऑनर” है।

इसमें अलग-अलग टीमें बारी-बारी से दौड़ती हैं, जिससे यह दौड़ बिना रुके चलती रहती है। हर रनर इस ऑपरेशन की भावना को आगे बढ़ाने का काम करता है।

10 मई को नेहरू पार्क में समापन

इस आयोजन की खास बात यह है कि यह 24 घंटे लगातार चलता रहेगा। यह पूरा आयोजन नई दिल्ली दिल्ली स्थित एयर फोर्स स्टेशन में किया जाएगा। दिन के समय दौड़ नेहरू पार्क में हो रही है, जबकि रात के समय सेंट्रल दिल्ली के अलग-अलग रास्तों पर दौड़ आयोजित की जाएगी। रिले रन के समापन के दौरान एयर चीफ की मौजूदगी की भी संभावना है। 10 मई को नेहरू पार्क में इसका अंतिम चरण पूरा किया जाएगा।

पूरी प्रक्रिया इस तरह बनाई गई है कि 88 घंटे तक दौड़ बिना रुके चलती रहे, ठीक उसी तरह जैसे ऑपरेशन के दौरान वायु सेना लगातार सक्रिय रही थी।

कितने लोग ले रहे हैं हिस्सा

इस आयोजन में एयर फोर्स के 243 एयर वॉरियर्स हिस्सा ले रहे हैं, जो देशभर की अलग-अलग कमांड्स से आए हैं। कुल मिला कर 10 टीमें बनाई गई हैं, जिनमें हर टीम में कम से कम 15 रनर शामिल हैं। हर टीम अपनी बारी पर दौड़ते हुए इस रिले को आगे बढ़ाएगी।

इसके अलावा आम नागरिकों और अन्य सुरक्षा बलों के लिए भी इसमें शामिल होने का मौका दिया गया है। हर दिन करीब 300 अतिरिक्त रजिस्ट्रेशन रखे गए हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस आयोजन का हिस्सा बन सकें।

वायु सेना के एक अधिकारी के मुताबिक, “यह 88 घंटे की दौड़ उन 88 घंटों की कहानी है, जब हमारे जवान लगातार ऑपरेशन में लगे रहे। हर कदम उस समर्पण को दिखाता है।”

इस आयोजन के जरिए फिटनेस को भी बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। एयर फोर्स का मानना है कि मजबूत शरीर और मन, दोनों ही देश की ताकत के लिए जरूरी हैं। साथ ही यह कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता का भी संदेश देता है, जहां सैनिक और नागरिक एक साथ भाग लेते हैं।

सिविल-मिलिट्री फ्यूजन को लेकर वायु सेना का बड़ा कदम, अब IAF अफसर बनेंगे IAS-IPS!

IAF Civil Services Support Survey
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IAF Civil Services Support Survey: भारतीय वायु सेना के अंदर एक ऐसा बदलाव शुरू हुआ है, जो अफसरों के करियर को एक नई दिशा दे सकता है। वायु सेना ने अपने अधिकारियों के करियर को लेकर एक अहम कदम उठाया है। एयर मुख्यालय की ओर से जारी एक आधिकारिक पत्र में यह संकेत दिया गया है कि अब सेना अपने अधिकारियों को यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जाम की तैयारी में मदद करने की संभावना तलाश रही है। इसके लिए पूरे संगठन में एक डिमांड सर्वे शुरू किया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि कितने अधिकारी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

यह पहल खास तौर पर उन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो सैन्य सेवा के बाद प्रशासनिक क्षेत्र में जाना चाहते हैं।

IAF Civil Services Support Survey: एयर हेडक्वार्टर से जारी हुआ आधिकारिक पत्र

23 अप्रैल को एयर मुख्यालय से एक पत्र जारी किया गया। यह पत्र सभी कमांड एजुकेशन ऑफिसर्स को भेजा गया है, जिनमें वेस्टर्न, साउथ वेस्टर्न, सेंट्रल, ईस्टर्न, साउदर्न, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस और अंडमान-निकोबार कमांड शामिल हैं।
सभी कमांड्स के एजुकेशन ऑफिसर्स को निर्देश दिया गया कि वे अपने-अपने क्षेत्र में अफसरों के बीच “सिविल-मिलिट्री फ्यूजन” पर सर्वे कराएं। जिसके तहत वायुसेना यह जानना चाहती है कि कितने अफसर भविष्य में प्रशासनिक सेवाओं जैसे आईएएस, आईपीएस या आईएफएस में जाना चाहते हैं और क्या उन्हें इसके लिए संस्थागत मदद दी जानी चाहिए।

किन अफसरों के लिए है यह सर्वे

इस सर्वे का केंद्र बिंदु शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी अधिकारी हैं। ये वे अधिकारी होते हैं जो आम तौर पर 10 से 14 साल की सेवा के बाद सेना से बाहर आते हैं और उसके बाद उन्हें नई करियर दिशा तलाशनी होती है।

ऐसे अफसरों के सामने अक्सर यह सवाल होता है कि आगे क्या किया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए वायु सेना अब उन्हें सिविल सर्विस की तैयारी में मदद देने का विकल्प देख रही है।

किन अधिकारियों को मिलेगा मौका

पत्र में साफ किया गया है कि यह सर्वे उन सभी अधिकारियों के लिए है, जिन्होंने कम से कम 5 साल की सेवा पूरी कर ली है। इसमें एसएससी अधिकारियों के साथ-साथ परमानेंट कमीशन यानी पीसी अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

हालांकि परमानेंट कमीशन यानी पीसी अफसर भी इस सर्वे में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन उन्हें सामान्य यूपीएससी प्रक्रिया से ही गुजरना होगा। उनके लिए किसी विशेष सुविधा की बात अभी नहीं कही गई है।

एयर फोर्स ने अपनी सभी यूनिट्स को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र के सभी इच्छुक अधिकारियों तक यह जानकारी पहुंचाएं और उन्हें सर्वे में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।

सभी इच्छुक अधिकारियों को एजुकेशन डायरेक्टरेट के पोर्टल पर जाकर एक प्रोफॉर्मा भरना होगा। इस प्रोफॉर्मा के जरिए यह जानकारी ली जा रही है कि कितने अफसर गंभीरता से सिविल सर्विस की तैयारी करना चाहते हैं।

इस सर्वे की अंतिम तारीख 8 मई तय की गई है, इसलिए इसे तेजी से पूरा कराने के निर्देश दिए गए हैं।

यूपीएससी सिविल सर्विस एग्जाम के जरिए आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और अन्य ग्रुप ए सेवाओं में भर्ती होती है। इसमें देशभर से लाखों उम्मीदवार हिस्सा लेते हैं।

बढ़ेगा सिविल-मिलिट्री फ्यूजन

वायुसेना की इस पहल को “सिविल-मिलिट्री फ्यूजन” की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। ताकि मिलिट्री और सिविल प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। अगर एयर फोर्स के अधिकारी सिविल सर्विस में जाते हैं, तो वे अपने साथ सैन्य अनुभव, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता भी लेकर जाएंगे, जो प्रशासन में काम आ सकती है।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल अमोल अवाते का कहना है कि अगर यह पहल सही है, तो यह एक अच्छा और आगे की सोच वाला कदम है, खासकर शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी अधिकारियों के लिए। इससे उन्हें सिविल सर्विस में जाने का एक साफ और तय रास्ता मिल सकता है।

उनके मुताबिक, सेना के अधिकारी अपने साथ कई अहम गुण लेकर आते हैं। उनमें अनुशासन होता है, ईमानदारी होती है, नेतृत्व की क्षमता होती है और दबाव में फैसले लेने की आदत होती है। इसके साथ ही वे कठिन परिस्थितियों में काम करने और संसाधनों को सही तरीके से संभालने का अनुभव रखते हैं। आज के जटिल प्रशासनिक माहौल में ये सभी गुण बहुत जरूरी हैं।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस व्यवस्था को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले सावधानी से सोचना होगा, खासकर परमानेंट कमीशन यानी पीसी अधिकारियों के मामले में। मेडिकल कैटेगरी, प्रमोशन पर असर और छोटे अनुशासनिक मामलों जैसे मुद्दों को स्पष्ट नियमों के जरिए तय करना जरूरी होगा। इसके साथ ही वेतन सुरक्षा और वरिष्ठता को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि सबके साथ न्याय हो सके और ज्यादा लोग इसमें भाग लेने के लिए आगे आएं।

उन्होंने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि ऐसे मॉडल पहले भी रहे हैं और आज भी कई देशों में, साथ ही भारत में सीएपीएफ, राज्य पुलिस और पीएसयू में काम कर रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि यह व्यवस्था संभव भी है और उपयोगी भी।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मिले विकल्प

वहीं, रिटायर्ड कमोडोर विनय कुमार कुशवाहा का कहना है कि सशस्त्र सेनाओं के स्थायी कमीशन अधिकारियों के साथ मौजूदा व्यवस्था में समानता नहीं है। अभी इन अधिकारियों को पेंशन पाने के लिए कम से कम 20 साल की सेवा करनी पड़ती है, जबकि सिविल सेवाओं में कम समय के बाद भी सेवानिवृत्ति के विकल्प मिल जाते हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी/भारतीय सैन्य अकादमी/वायु सेना अकादमी में चार साल को भी सेवा में जोड़ते हुए कुल 15 साल की सेवा के बाद अधिकारियों को प्रोराटा पेंशन के साथ स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प दिया जाए। इससे अधिकारी कम उम्र में ही सिविल सेवा या अन्य क्षेत्रों में दूसरा करियर शुरू कर सकेंगे।

उनके मुताबिक, इससे सेना के अधिकारियों के अनुभव और नेतृत्व का बेहतर उपयोग होगा, मनोबल बढ़ेगा और युवा अधिकारियों को आगे बढ़ने के मौके मिलेंगे। साथ ही, सरकार पर लंबे समय का पेंशन बोझ भी कम हो सकता है।

साथ ही, यह सुधार सशस्त्र बलों के भीतर स्वस्थ संगठनात्मक वातावरण बनाएगा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ सिविल-मिलिट्री फ्यूजन को मजबूत करेगा।

ऑपरेशन सिंदूर की बरसी पर जयपुर में सेना का महासम्मेलन, टॉप अफसर करेंगे प्रेस कॉन्फ्रेंस, क्या होगा बड़ा खुलासा?

Operation Sindoor Anniversary
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Operation Sindoor Anniversary: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने के मौके पर 7 और 8 मई को जयपुर में भारतीय सेना की साउथ वेस्टर्न कमांड यानी सप्तशक्ति कमाांड में जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस आयोजित की जा रही है। जिसमें तीनों सेनाएं थल सेना, वायु सेना और नौसेना की टॉप लीडरशिप पिछले ऑपरेशनों की समीक्षा से लेकर भविष्य की सैन्य रणनीति तक हर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करेगी। इस बार इस कॉन्फ्रेंस का सबसे बड़ा केंद्र जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर रहने वाला है, जिसे महीने के आखिर तक पूरी तरह तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।

पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके बाद 7 मई की रात भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना ने मिलकर ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान और पीओके के अंदर मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया।

कार्रवाई बेहद कम समय में पूरी की गई, लेकिन उसका असर कई दिनों तक दिखाई दिया। सेना के अंदर इसे एक ऐसे ऑपरेशन के तौर पर देखा गया, जिसने जॉइंट मिलिट्री आपरेशन की जरूरत को और स्पष्ट कर दिया।

Operation Sindoor Anniversary: क्या होने वाला है जयपुर में

जयपुर में होने वाली इस कॉन्फ्रेंस में सीडीएस जनरल अनिल चौहान, सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के अलावा तीनों सेनाओं के वरिष्ठ कमांडर शामिल होंगे।

यहां ऑपरेशन सिंदूर की पूरी समीक्षा की जाएगी। यह देखा जाएगा कि ऑपरेशन के दौरान क्या मजबूत रहा और किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है। इसके साथ ही पाकिस्तान और चीन से जुड़े सुरक्षा हालात पर भी विस्तार से चर्चा होगी।

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “यह कॉन्फ्रेंस सिर्फ समीक्षा नहीं है, बल्कि आने वाले समय की तैयारी का पूरा रोडमैप तय करने का मंच है।”

खास बात यह है कि सात मई को ही जयपुर में एक बेहद अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस भी होने वाली है, जिसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ रहे लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई, वायुसेना के डीजी एयर ऑपरेशंस रहे एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती, और डीजी नेवल ऑपरेशंस वाइस एडमिरल एएन प्रमोद संबोधित करेंगे। बता दें कि ये तीनों वही अफसर हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के बाद 6-7 मई को प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।

माना जा रहा है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद अहम एलान हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर बनाने को लेकर भी एलान हो सकता है।

क्या है जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर यानी जेओसी एक ऐसा केंद्रीय सिस्टम है, जहां तीनों सेनाओं की जानकारी और ऑपरेशन एक साथ जुड़ेंगे। यह सेंटर नई दिल्ली में बनाया जा रहा है और इसे मई 2026 के अंत तक पूरी तरह शुरू करने की योजना है। इसका मकसद अलग-अलग काम कर रही सेनाओं को एक साथ लाकर एक ही दिशा में काम करना है।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने हाल ही में एक इवेंट में कहा था, “जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर जॉइंटनेस को मजबूत करने का एक बड़ा कदम है और इसे जल्द ही पूरी तरह ऑपरेशनल कर दिया जाएगा।”

कैसे काम करेगा यह सेंटर

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर का काम सिर्फ जानकारी इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि उसे समझकर तुरंत निर्णय लेने में मदद करना है। अभी तक तीनों सेनाएं अपने-अपने सिस्टम के जरिए काम करती थीं, लेकिन अब सभी डेटा एक ही जगह पर आएगा।

इस सेंटर में रियल टाइम डेटा शेयरिंग होगी। यानी जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस से जुड़ी जानकारी एक साथ दिखाई देगी। इसे कॉमन ऑपरेटिंग पिक्चर कहा जाता है।

जब किसी ऑपरेशन की योजना बनेगी, तो तीनों सेनाओं के अधिकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर बैठकर फैसला ले सकेंगे। इससे समय बचेगा और फैसले लेने की रफ्तार बढ़ेगी।

मल्टी डोमेन ऑपरेशन का बनेगा आधार

आज के युद्ध सिर्फ जमीन या हवा तक सीमित नहीं रहे हैं। अब साइबर अटैक, ड्रोन, सैटेलाइट और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। इसी को मल्टी डोमेन ऑपरेशन कहा जाता है।

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इन सभी क्षेत्रों को जोड़ने का काम करेगा। अगर कहीं सीमा पर हलचल होती है, तो उसका डेटा तुरंत एयर और नेवी तक भी पहुंच जाएगा।

एक अधिकारी के अनुसार, “अब युद्ध का फैसला तेजी से लेने वाले पक्ष के हाथ में होता है, इसलिए डेटा और निर्णय का एक साथ होना जरूरी है।”

OODA लूप को तेज करने की कोशिश

सैन्य भाषा में एक प्रक्रिया होती है, ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट। इसे ओओडीए लूप कहा जाता है। इसका मतलब है कि पहले स्थिति को देखो, समझो, फैसला लो और फिर कार्रवाई करो।

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर का मकसद इसी प्रक्रिया को तेज करना है। जितनी जल्दी फैसला होगा, उतनी ही जल्दी कार्रवाई हो सकेगी।

इस सेंटर के जरिए तीनों सेनाओं के एयर डिफेंस सिस्टम को भी जोड़ा जाएगा। अभी तक सेना, वायु सेना और नौसेना के अपने-अपने सिस्टम थे, लेकिन अब सभी एक साथ काम करेंगे।

कम्युनिकेशन सिस्टम भी इंटीग्रेट किया जा रहा है, ताकि किसी भी ऑपरेशन के दौरान जानकारी में देरी न हो। सुरक्षित मोबाइल कम्युनिकेशन और साझा साइबर सुरक्षा नीति भी इसी का हिस्सा है।

थिएटर कमांड्स की दिशा में कदम

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर को थिएटर कमांड सिस्टम की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। अभी भारत में अलग-अलग कमांड हैं, लेकिन भविष्य में उन्हें मिलाकर बड़े थिएटर बनाए जाएंगे। इस दिशा में तीन सेट की सिफारिशें पहले ही सरकार को भेजी जा चुकी हैं। जयपुर कॉन्फ्रेंस में इन पर भी चर्चा होगी।

टेक्नोलॉजी और डेटा पर जोर

2026 को सेना के अंदर “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिक” साल के रूप में देखा जा रहा है। इसका मतलब है कि अब युद्ध में तकनीक और डेटा की भूमिका सबसे अहम हो गई है।

जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इसी सोच का हिस्सा है, जहां डेटा के आधार पर फैसले लिए जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर लगातार काम हो रहा है। इसके तहत कम्युनिकेशन, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स और ऑपरेशन जैसे कई क्षेत्रों में बदलाव किए गए हैं। जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर इन्हीं प्रयासों को एक जगह लाकर मजबूत करेगा।

सेना के अंदर इस सेंटर को लेकर काफी समय से काम चल रहा है। अलग-अलग सिस्टम को जोड़ना, डेटा शेयरिंग की व्यवस्था बनाना और अधिकारियों को इसके लिए तैयार करना, ये सभी काम धीरे-धीरे किए गए हैं।

एक अधिकारी ने कहा, “यह बदलाव दिखने में छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे बहुत बड़ा काम हुआ है।”

ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

इस कॉन्फ्रेंस में ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों को भी विस्तार से रखा जाएगा। उस ऑपरेशन में मिसाइल, एयर स्ट्राइक और जमीनी कार्रवाई एक साथ हुई थी, लेकिन बेहतर तालमेल की जरूरत महसूस हुई थी।

सीडीएस ने अपने एक बयान में कहा था, “जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन एक धीमी प्रक्रिया है, लेकिन यही भविष्य के युद्ध की जरूरत है।”

7 मई को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े कुछ अहम पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए। इसमें ऑपरेशन की योजना, लक्ष्य और उसके परिणामों की जानकारी दी जा सकती है।

महिंद्रा डिफेंस की नई ‘वार मशीन’! थार बेस्ड ATV अब सेना के लिए है तैयार

Mahindra ATV for Indian Army

Mahindra ATV for Indian Army: महिंद्रा डिफेंस ने अपनी पॉपुलर एसयूवी थार रॉक्स पर बेस्ड नया एटीवी व्हीकल भारतीय सुरक्षा बलों के लिए पेश किया है। महिंद्रा का नया एटीवी यानी ऑल-टेरेन व्हीकल खास तौर पर कठिन और चुनौतीपूर्ण इलाकों में काम करने के लिए तैयार किया गया है।

कंपनी के मुताबिक यह व्हीकल उन सभी हालात के लिए तैयार किया गया है जहां सामान्य गाड़ियां काम नहीं कर पातीं। पहाड़, जंगल, रेगिस्तान या सीमावर्ती इलाके हर जगह इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका मकसद है कि सुरक्षा बलों को ऐसा वाहन मिले जो भरोसेमंद हो और हर स्थिति में साथ दे सके।

Mahindra ATV for Indian Army: डिजाइन में सादगी, काम में मजबूती

इस एटीवी की सबसे खास बात इसका डिजाइन है। इसमें गैरजरूरी चीजें नहीं रखी गई हैं। हर बार, हर स्ट्रक्चर और हर इंच की जगह का एक निश्चित काम है। वाहन को इस तरह तैयार किया गया है कि यह हल्का भी रहे और मजबूत भी। इसका लुक भी किसी शहर की सड़कों के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल हालात के लिए बनाया गया है।

कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता

यह एटीवी हर तरह के टेरेन पर चलने के लिए बनाया गया है। इसमें खास ऑफ-रोड टायर, 4×4 ड्राइव सिस्टम और मजबूत सस्पेंशन दिया गया है। चाहे ऊंचे पहाड़ी रास्ते हों, कच्चे और पथरीले इलाके हों या दलदली जमीन, यह वाहन आसानी से वहां पहुंच सकता है। इसकी ग्राउंड क्लियरेंस ज्यादा है, जिससे नीचे की तरफ से नुकसान का खतरा कम हो जाता है।

इसके साथ ही इसमें मजबूत सस्पेंशन और ऑफ-रोड टायर दिए गए हैं, जो इसे खराब रास्तों पर भी संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। सुरक्षा बलों के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि उनका वाहन किसी भी समय और किसी भी जगह पर उन्हें निराश न करे।

इंजन और परफॉर्मेंस

हालांकि महिंद्रा ने अभी पूरी तकनीकी जानकारी जारी नहीं की है, लेकिन माना जा रहा है कि यह थार प्लेटफॉर्म पर आधारित है। इसमें करीब 2.2 (172 hp, 370 Nm) लीटर डीजल इंजन या 2.0 लीटर (174 hp, 380 Nm) टर्बो पेट्रोल इंजन हो सकता है। डिफेंस इस्तेमाल के लिए इसमें ज्यादा ताकत (टॉर्क) और भरोसेमंद परफॉर्मेंस पर ध्यान दिया जाता है।

मिशन के हिसाब से तैयार फीचर्स

इस वाहन में कई ऐसे फीचर्स दिए गए हैं जो सीधे ऑपरेशन में काम आते हैं। इसमें गन माउंट की व्यवस्था है, जिससे सैनिक चलते वाहन से भी जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। यह खासतौर पर उन इलाकों में उपयोगी है जहां अचानक खतरा सामने आ सकता है।

वाहन के नीचे की तरफ पूरा प्रोटेक्शन दिया गया है। इससे माइन या आईईडी जैसे खतरों से सुरक्षा मिलती है। यह फीचर सुरक्षा बलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि कई ऑपरेशन ऐसे इलाकों में होते हैं जहां जमीन के नीचे बारूदी सुरंगें बिछी रहती हैं।

इसके अलावा इसमें एक साथ दो अतिरिक्त टायर रखने की व्यवस्था है। लंबे मिशन के दौरान अगर टायर खराब हो जाए तो तुरंत बदला जा सकता है। साथ ही वाहन में अतिरिक्त डीजल या पेट्रोल रखने के लिए अलग जगह दी गई है। इससे वाहन ज्यादा दूरी तक जा सकता है और बीच रास्ते में ईंधन खत्म होने की समस्या नहीं होती।

इस एटीवी में आगे की तरफ एक मजबूत विंच लगाया गया है। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब वाहन कहीं फंस जाए। यह खुद को या दूसरे वाहन को खींचकर बाहर निकाल सकता है। पहाड़ी या दलदली इलाकों में यह फीचर बहुत काम आता है।

विंडशील्ड के सामने एक प्रोटेक्टर भी दिया गया है, जो पत्थरों या अन्य चीजों से सुरक्षा देता है। इससे चालक की सुरक्षा बढ़ती है और वाहन को नुकसान कम होता है।

एयरड्रॉप के लिए तैयार

इस वाहन की एक और खास बात यह है कि इसे एयरड्रॉप के लिए भी तैयार किया गया है। यानी जरूरत पड़ने पर इसे हवाई जहाज से पैराशूट के जरिए सीधे ऑपरेशन एरिया में उतारा जा सकता है। इससे सेना या अन्य सुरक्षा बलों को दूर-दराज के इलाकों में जल्दी पहुंचने में मदद मिलती है।

इस तरह के ऑपरेशन खासतौर पर उन जगहों पर किए जाते हैं जहां सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल होता है। ऐसे में यह वाहन तेजी से तैनाती के लिए उपयोगी साबित होता है।

सुरक्षा बलों के लिए क्यों है जरूरी

भारतीय सेना, सीमा सुरक्षा बल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को अक्सर ऐसे इलाकों में काम करना पड़ता है जहां सामान्य वाहन काम नहीं कर पाते। ऐसे में इस तरह के एटीवी उनकी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।

इसका इस्तेमाल पेट्रोलिंग, रेकी, क्विक रिएक्शन टीम और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए किया जा सकता है। छोटे आकार और तेज मूवमेंट की वजह से यह तेजी से कार्रवाई करने में मदद करता है।

AMCA जेट प्रोजेक्ट को मिली जमीन, 140 स्टेल्थ फाइटर यहीं होंगे तैयार

AMCA Fighter Jet India
AMCA Fighter Jet India (File Photo)

AMCA Fighter Jet India: भारत का सबसे महत्वाकांक्षी पांचवी पीढ़ी का फाइटर जेट प्रोजेक्ट एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट अब आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी में बनाया जाएगा। राज्य सरकार ने इस बड़े प्रोजेक्ट के लिए करीब 600 एकड़ जमीन डीआरडीओ को दे दी है। इस प्रोजेक्ट में करीब एक लाख करोड़ रुपये का निवेश आने की संभावना है और यहां लगभग 140 फाइटर जेट तैयार किए जाएंगे। यह भारत के रक्षा क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े निवेशों में से एक माना जा रहा है।

AMCA Fighter Jet India: क्यों चुना गया पुट्टापर्थी

पुट्टापर्थी को इस प्रोजेक्ट के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यह बेंगलुरु के काफी करीब है, जहां एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी एडीए स्थित है। यही एजेंसी इस पूरे प्रोजेक्ट की डिजाइन और डेवलपमेंट देख रही है।

सूत्रों के मुताबिक, फाइटर जेट के अलग-अलग हिस्सों की डिजाइनिंग, टेस्टिंग और मॉड्यूल असेंबली बेंगलुरु में होगी, जबकि फाइनल असेंबली और ग्राउंड टेस्टिंग पुट्टापर्थी में की जाएगी। यहां का एयरस्पेस अपेक्षाकृत खाली है और फ्लाइट टेस्टिंग के लिए ज्यादा सुविधाजनक माना गया है।

इन सभी मॉड्यूल्स को आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी भेजा जाएगा, जहां फाइटर जेट की फाइनल असेंबली यानी अंतिम जोड़ने का काम होगा। यहीं पर जमीन पर टेस्टिंग भी की जाएगी।

पुट्टापर्थी को इस प्रोजेक्ट के लिए खास वजह से चुना गया है। यह कर्नाटक की सीमा के करीब श्री सत्य साई जिले में स्थित है और बेंगलुरु से ज्यादा दूर नहीं है। इससे डिजाइन सेंटर और प्रोडक्शन यूनिट के बीच बेहतर तालमेल बना रहेगा।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “एएमसीए जैसे प्रोजेक्ट के लिए एक अलग फ्लाइट टेस्टिंग रेंज की जरूरत होती है। पुट्टापर्थी इस लिहाज से उपयुक्त है क्योंकि यहां एयर ट्रैफिक कम है और तेजी से टेस्टिंग संभव है।”

उन्होंने यह भी बताया कि बेंगलुरु में पहले से ही एयर ट्रैफिक काफी ज्यादा है, इसलिए वहां इस तरह की टेस्टिंग रेंज बनाना संभव नहीं था। इसी वजह से डीआरडीओ ऐसी जगह तलाश रहा था जो बेंगलुरु के करीब हो लेकिन जहां एयरस्पेस खाली हो। पुट्टापर्थी इस जरूरत को पूरा करता है।

क्या है एएमसीए प्रोजेक्ट

एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भारत का पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। यह पूरी तरह स्वदेशी प्रोजेक्ट है, जिसे एडीए और डीआरडीओ मिलकर विकसित कर रहे हैं।

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत साल 2000 के आसपास हुई थी, लेकिन लंबे समय तक यह अलग-अलग चरणों में चलता रहा। आखिरकार 2023 में इसका डिजाइन पूरी तरह तैयार हो गया। इसके बाद मार्च 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने इसके प्रोटोटाइप बनाने को मंजूरी दी। इस काम के लिए करीब 15,000 करोड़ की राशि तय की गई थी।

योजना के तहत कुल 5 प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे। इनमें से पहले तीन प्रोटोटाइप डेवलपमेंटल फ्लाइट ट्रायल्स के लिए इस्तेमाल होंगे, यानी यह देखा जाएगा कि सिस्टम हवा में कैसे काम करता है और उसकी परफॉर्मेंस कैसी है। इसके बाद बाकी दो प्रोटोटाइप वेपन ट्रायल्स के लिए होंगे, जिनमें हथियारों के साथ इसकी क्षमता को परखा जाएगा।

इस फाइटर जेट को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह दुश्मन के रडार से आसानी से बच सके और एक साथ कई तरह के मिशन पूरे कर सके। इसमें एयर टू एयर और एयर टू ग्राउंड दोनों तरह के ऑपरेशन की क्षमता होगी।

यह प्रोजेक्ट भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, ताकि देश को अत्याधुनिक फाइटर जेट मिल सके।

एएमसीए प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत करीब 15,803 करोड़ रुपये बताई गई है, जिसमें प्रोटोटाइप डेवलपमेंट शामिल है। इसके बाद बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए अतिरिक्त निवेश किया जाएगा।

इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए सात कंपनियों ने रुचि दिखाई थी, जिनमें से तीन को आगे के लिए चुना गया है।

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, “यह प्रोजेक्ट भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे देश की रक्षा उत्पादन क्षमता मजबूत होगी और नई तकनीक के विकास को बढ़ावा मिलेगा। पुट्टापर्थी में बनने वाली यह सुविधा फाइटर जेट निर्माण के लिए एक प्रमुख केंद्र बनेगी।”

प्राइवेट कंपनियों की भी होगी भूमिका

इस प्रोजेक्ट में निजी कंपनियों को भी शामिल किया जा रहा है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी और भारत फोर्ज जैसी कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया गया है।

इन कंपनियों के साथ मिलकर प्रोडक्शन यूनिट तैयार की जाएगी। जल्द ही एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी की तरफ से रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया जाएगा, जिसके बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

इस प्रोजेक्ट के लिए एक तय टाइमलाइन भी बनाई गई है। योजना के मुताबिक पहला प्रोटोटाइप सितंबर 2027 तक तैयार किया जाएगा। इसके बाद सितंबर 2028 में इसकी पहली उड़ान यानी मेडन फ्लाइट की योजना है।

मार्च 2034 तक इस फाइटर जेट को पूरी तरह प्रमाणित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद बड़े स्तर पर इसका उत्पादन शुरू किया जाएगा।

यह फैसला उस प्रस्ताव के बाद आया है, जो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने पिछले साल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के सामने रखा था।

बताया जाता है कि राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए जमीन मुफ्त में उपलब्ध कराई है। यहां न सिर्फ प्रोडक्शन यूनिट बनेगी, बल्कि वैज्ञानिकों के लिए रिहायशी टाउनशिप और फ्लाइट टेस्टिंग कॉम्प्लेक्स भी तैयार किया जाएगा।

एचएएल नहीं होगा इस प्रोजेक्ट का हिस्सा

इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि इस प्रोजेक्ट में सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल की भूमिका सीमित रहेगी।

पहले इस बात को लेकर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के बीच विवाद भी हुआ था, क्योंकि एचएएल बेंगलुरु में स्थित है। लेकिन अब यह प्रोजेक्ट प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।

करीब एक लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश में एक बड़ा डिफेंस और एयरोस्पेस इकोसिस्टम तैयार करेगा। इसके जरिए कई छोटी और मंझोली कंपनियों को भी काम मिलेगा।

इसके साथ ही इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इस प्रोजेक्ट के लिए सप्लाई चेन और सपोर्ट इंडस्ट्री भी विकसित की जाएगी।

रक्षा मंत्री बोले- युद्ध में रिसर्च और सरप्राइज ही जीत की कुंजी, ऑपरेशन सिंदूर बना मिसाल

Future Warfare Technology India

Future Warfare Technology India: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी और नए तरह के युद्ध के दौर में भारत अपनी सैन्य रणनीति को नए तरीके से तैयार कर रहा है। नॉर्थ टेक सिम्पोजियम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा कि अब सिर्फ ताकत ही नहीं, बल्कि रिसर्च, नई तकनीक और “सरप्राइज एलिमेंट” ही भविष्य के युद्ध में जीत तय करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों ने दिखा दिया है कि भारत अब बदलते युद्ध को समझकर उसी हिसाब से कार्रवाई कर रहा है।

Future Warfare Technology India: तकनीक ने बदल दिया युद्ध का तरीका

प्रयागराज में चल रहे तीन दिवसीय ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’ के उद्घाट समारोह में रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के समय में युद्ध का स्वरूप बहुत तेजी से बदल रहा है। पहले जहां टैंक और मिसाइलें युद्ध का मुख्य हिस्सा थीं, वहीं अब ड्रोन और सेंसर जैसे सिस्टम बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने रूस-यूक्रेन संघर्ष का उदाहरण देते हुए कहा कि सिर्फ तीन-चार साल में ही युद्ध का तरीका पूरी तरह बदल गया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अब रोजमर्रा की चीजें भी हथियार के तौर पर इस्तेमाल हो रही हैं। लेबनान और सीरिया में हुए पेजर हमलों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इन घटनाओं ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर किया है कि आधुनिक युद्ध अब किस दिशा में जा रहा है।

रक्षा मंत्री ने कहा, “आज की स्थिति में हमें हर तरह की चुनौती के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि अब युद्ध सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि टेक्नोलॉजी के जरिए कहीं भी और कभी भी हो सकता है।”

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सरप्राइज एलिमेंट सबसे बड़ा हथियार

रक्षा मंत्री ने कहा कि युद्ध में जीत उसी की होती है, जिसके पास सरप्राइज एलिमेंट होता है। यानी जो दुश्मन को बिना बताए और अचानक हमला करने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि भारत को भी अपनी सैन्य क्षमताओं को इस दिशा में और मजबूत करना होगा।

उन्होंने कहा, “इतिहास गवाह है कि युद्ध में वही पक्ष जीतता है, जिसके पास सरप्राइज का फायदा होता है। हमारी सेनाएं इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन हमें और ज्यादा सक्रिय होकर आगे बढ़ना होगा।

रिसर्च को बताया सबसे जरूरी

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में रिसर्च की अहमियत पर खास जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में रिसर्च का कोई विकल्प नहीं है और भविष्य के युद्ध आज लैबोरेटरी में तय हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार ने डिफेंस रिसर्च को अपनी प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखा है और डीआरडीओ के जरिए इसे आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि अब डीआरडीओ अकेले काम नहीं कर रहा, बल्कि इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम कर रहा है। सरकार ने रिसर्च और डेवलपमेंट बजट का 25 फीसदी हिस्सा इंडस्ट्री, स्टार्टअप्स और शिक्षण संस्थानों के लिए रखा है।

उन्होंने कहा, “अगर आप दूर तक जाना चाहते हैं, तो साथ मिलकर चलना होगा। डीआरडीओ अब इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम कर रहा है।”

इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स को बढ़ावा

रक्षा मंत्री ने बताया कि डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट बजट का 25 फीसदी हिस्सा इंडस्ट्री, स्टार्टअप्स और अकादमिक संस्थानों के लिए रखा गया है। अब तक इन क्षेत्रों ने 4500 करोड़ रुपये से ज्यादा का उपयोग किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पॉलिसी में बदलाव किया गया है और पहले जो 20 प्रतिशत फीस ली जाती थी, उसे हटा दिया गया है। इससे कंपनियों को नई तकनीक अपनाने में आसानी हो रही है।

उन्होंने बताया कि डीआरडीओ अब तक 2200 से ज्यादा टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री को दे चुका है, जिससे देश में रक्षा उत्पादन को मजबूती मिली है।

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GOC-in-C, Northern Command Lieutenant General Pratik Sharma with Defence Minister

नई तकनीकों पर फोकस

रक्षा मंत्री ने कहा कि आने वाले समय में कुछ खास क्षेत्रों में तेजी से काम करने की जरूरत है। इसमें डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स, हाइपरसोनिक वेपन्स, अंडरवॉटर सिस्टम, स्पेस टेक्नोलॉजी, क्वांटम टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शामिल हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि अब भारतीय कंपनियों को डीआरडीओ के पेटेंट्स का उपयोग करने की सुविधा दी जा रही है। इससे उनकी तकनीकी क्षमता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

उन्होंने बताया कि डीआरडीओ की टेस्टिंग फैसिलिटीज भी कंपनियों के लिए खोली गई हैं, जहां हर साल सैकड़ों कंपनियां रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए इनका इस्तेमाल करती हैं।

उन्होंने इंडस्ट्री से अपील की कि वे इन क्षेत्रों में आगे आएं और नई तकनीक विकसित करें। सरकार इस दिशा में पूरा सहयोग देने के लिए तैयार है।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

अपने भाषण में रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया और इसे आधुनिक तकनीकी युद्ध का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दुनिया को भारत की सैन्य ताकत और तकनीकी क्षमता का परिचय कराया।

उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर इस बात का साफ प्रमाण है कि भारत बदलते युद्ध के स्वरूप को समझता है और नई तकनीकों का इस्तेमाल पूरी आत्मविश्वास के साथ करता है।”

उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन में आकाशतीर, आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस जैसे आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया।

आत्मनिर्भर भारत पर जोर

रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने iDEX, ADITI और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड जैसी योजनाओं का जिक्र किया, जो इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश में डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर जैसे बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं, जो देश की रक्षा क्षमता को मजबूत कर रहे हैं।

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा उत्पादन

रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसके साथ ही रक्षा निर्यात भी 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि में निजी क्षेत्र का बड़ा योगदान रहा है और अब विदेशी कंपनियां भी भारत के साथ काम करने में रुचि दिखा रही हैं।

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General Officer Commanding-in-Chief (GOC-in-C), Central Command Lieutenant General Anindya Sengupta

सिम्पोजियम से सेना और इंडस्ट्री में बढ़ेगा तालमेल

इस मौके पर सेंट्रल कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने कहा कि यह सिम्पोजियम सेना और इंडस्ट्री के बीच तालमेल बढ़ाने का एक बड़ा मंच है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य ऐसी तकनीक तैयार करना है, जो सीधे ऑपरेशन में काम आ सके।

वहीं नॉर्दर्न कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने कहा कि इस कार्यक्रम का मकसद नए आइडिया और अनुभव को जमीन पर लागू करने वाली क्षमता में बदलना है। उन्होंने कहा कि हाल के संघर्षों को देखते हुए ड्रोन, काउंटर ड्रोन सिस्टम, एआई आधारित निर्णय प्रणाली और प्रिसीजन स्ट्राइक जैसी तकनीकें अब बेहद जरूरी हो गई हैं।

इस सिम्पोजियम में 284 कंपनियों ने अपने स्टॉल लगाए हैं। इनमें एमएसएमई, स्टार्टअप्स, निजी कंपनियां और सेना से जुड़े इनोवेटर्स शामिल हैं। यहां कई नई तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है, जो सेना के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इस कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ मिलकर यह भी तय करेंगे कि किन तकनीकों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए और कैसे उन्हें सेना में लागू किया जा सकता है।

हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, भर्ती के समय फिट सैनिक को बीमारी पर मिलेगी डिसेबिलिटी पेंशन

Disability pension army India
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Disability pension army India: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पूर्व सैनिकों और जवानों के हक में एक बेहद अहम फैसला दिया है। दिव्यांग पेंशन से जुड़े मामले पर अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर कोई सैनिक भर्ती के समय पूरी तरह फिट था और सेवा के दौरान उसे कोई बीमारी या दिव्यांगता हो जाती है, तो उसे सैन्य सेवा से जुड़ा माना जाएगा और ऐसे में पेंशन देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक अपनी दिव्यांग पेंशन के लिए अलग-अलग अदालतों और ट्राइब्यूनल में लड़ाई लड़ रहे थे। इस आदेश को एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है।

Disability pension army India: भर्ती के समय फिट, तो जिम्मेदारी सेना की

अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि अगर कोई जवान भर्ती के समय मेडिकल तौर पर फिट था, तो सेवा के दौरान होने वाली बीमारी या दिव्यांगता की जिम्मेदारी सैन्य सेवा की मानी जाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि ऐसे मामलों में सरकार यह नहीं कह सकती कि बीमारी का सेवा से कोई संबंध नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि सैनिक देश की सेवा करते हैं और कई बार कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, ऐसे में उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए ऐसी स्थिति में उन्हें पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने खारिज कीं सरकार की दलीलें

इस मामले में केंद्र सरकार ने अदालत के सामने यह तर्क दिया था कि कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जिन्हें सेवा से जुड़ा नहीं माना जा सकता। सरकार का कहना था कि हर बीमारी को सैन्य सेवा से जोड़ना सही नहीं है।

लेकिन अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक सरकार यह साबित नहीं कर देती कि बीमारी पूरी तरह से सेवा से अलग है, तब तक उसे सेवा से जुड़ा ही माना जाएगा।

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि इन सिद्धांतों का पालन करना जरूरी है।

मेडिकल बोर्ड की राय पर भी सवाल

इस फैसले की एक बड़ी खास बात यह रही कि अदालत ने मेडिकल बोर्ड की भूमिका पर भी टिप्पणी की। कई मामलों में देखा गया है कि सिर्फ मेडिकल बोर्ड की एक लाइन की राय के आधार पर सैनिकों की पेंशन रोक दी जाती है।

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय अंतिम नहीं मानी जा सकती, खासकर तब जब उसमें ठोस कारण नहीं दिए गए हों। अगर बोर्ड यह स्पष्ट नहीं करता कि बीमारी सेवा से जुड़ी क्यों नहीं है, तो उस आधार पर पेंशन नहीं रोकी जा सकती।

सैनिकों के परिवार को भी मिलेगा लाभ

अदालत ने यह भी साफ किया कि इस फैसले का फायदा सिर्फ सैनिक तक सीमित नहीं रहेगा। अगर किसी पूर्व सैनिक को दिव्यांग पेंशन का हक मिलता है, तो उसके परिवार को भी उससे जुड़े सभी लाभ मिलेंगे।

इसमें पत्नी, बच्चे और अन्य आश्रित शामिल हैं, जिन्हें नियमों के अनुसार फैमिली पेंशन या अन्य लाभ मिलते हैं। इससे उन परिवारों को राहत मिलेगी, जो लंबे समय से आर्थिक परेशानी झेल रहे थे।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “अगर कोई सैनिक भर्ती के समय फिट था और सेवा के दौरान उसे बीमारी होती है, तो उसे सैन्य सेवा से जुड़ा माना जाएगा।” कोर्ट ने यह भी कहा कि सैनिकों के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, क्योंकि वे देश के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं।

हजारों मामलों पर पड़ेगा असर

यह फैसला सिर्फ एक या दो मामलों तक सीमित नहीं है। देशभर में ऐसे हजारों मामले हैं, जहां सैनिकों की दिव्यांग पेंशन अटकी हुई है या उन्हें मना कर दिया गया है।

अब इस फैसले के बाद ऐसे मामलों में स्पष्टता आएगी और सैनिकों को अपने हक के लिए लंबी कानूनी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी। इससे ट्रिब्यूनल और अदालतों में लंबित मामलों पर भी असर पड़ेगा।

पेंशन नियमों को लेकर साफ संदेश

इस फैसले के जरिए अदालत ने सरकार को यह भी संदेश दिया है कि पेंशन से जुड़े मामलों में नियमों का सही तरीके से पालन किया जाए। खासकर उन मामलों में जहां सैनिकों ने सेवा के दौरान स्वास्थ्य समस्याएं झेली हैं।

कोर्ट ने कहा कि सरकार को एक जिम्मेदार नियोक्ता की तरह व्यवहार करना चाहिए और सैनिकों के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

प्रयागराज में डिफेंस टेक्नोलॉजी का महाकुंभ, रक्षा मंत्री करेंगे नॉर्थ टेक सिम्पोजियम का उद्घाटन, 284 कंपनियां दिखाएंगी सैन्य तकनीक

North Tech Symposium 2026

North Tech Symposium 2026: देश में डिफेंस टेक्नोलॉजी एंड मिलिट्री इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए 4 मई से प्रयागराज में तीन दिन का ‘नॉर्थ टेक सिम्पोजियम’ शुरू होने जा रहा है। जिसका उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। इस कार्यक्रम की थीम है ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’, जिसका मतलब है तकनीक, इंडस्ट्री और सैनिकों के अनुभव का एक साथ मिलना।

यह आयोजन भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के साथ-साथ सोसायटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) द्वारा मिलकर किया जा रहा है। यह कार्यक्रम 4 मई से शुरू होकर 6 मई तक चलेगा और इसमें देशभर से रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, उद्योग प्रतिनिधि और स्टार्टअप्स हिस्सा लेंगे।

North Tech Symposium 2026: प्रयागराज में जुटेंगे सेना, उद्योग और वैज्ञानिक

प्रयागराज को इस आयोजन के लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि इसे ‘संगम नगरी’ के रूप में जाना जाता है। इसी सोच के साथ इस सिम्पोजियम का नाम ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’ रखा गया है। यहां सेना, टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्री एक प्लेटफॉर्म पर आएंगे।

इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह भी शामिल होंगे।

284 कंपनियां दिखाएंगी अपनी टेक्नोलॉजी

इस सिम्पोजियम की सबसे खास बात यह है कि इसमें करीब 284 कंपनियां अपने स्टॉल लगाकर नई तकनीकों का प्रदर्शन करेंगी। इनमें एमएसएमई, प्राइवेट डिफेंस टेक कंपनियां, स्टार्टअप्स और सेना से जुड़े इनोवेटर्स शामिल होंगे।

यहां कई तरह की आधुनिक तकनीकें दिखाई जाएंगी, जिनका सीधा इस्तेमाल सेना के ऑपरेशन में हो सकता है। इसका मकसद यह समझना है कि कौन-सी तकनीक फील्ड में काम आ सकती है और किस तरह उसे जल्दी अपनाया जा सकता है।

सेना की जरूरतों के हिसाब से तकनीक

भारतीय सेना लगातार यह कोशिश कर रही है कि बदलते युद्ध के माहौल के अनुसार नई तकनीकों को अपनाया जाए। आज के समय में युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नेटवर्क सिस्टम से भी लड़ा जा रहा है।

इस सिम्पोजियम में सेना उन तकनीकों पर ध्यान दे रही है, जो सीधे ऑपरेशनल चुनौतियों को हल कर सकें। इसमें निगरानी, कम्युनिकेशन, मोबिलिटी और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी तकनीकें शामिल हैं।

North Tech Symposium 2026

लाइव डेमो में दिखेगा भविष्य का युद्ध

इस आयोजन में कई तकनीकों का लाइव डेमोंस्ट्रेशन भी किया जाएगा। इसमें खास तौर पर एआई आधारित सर्विलांस सिस्टम और हैवी-लिफ्ट लॉजिस्टिक्स ड्रोन शामिल हैं। ये ड्रोन दूर-दराज और कठिन इलाकों में सेना की मदद कर सकते हैं।

इसके अलावा ऐसे सिस्टम भी दिखाए जाएंगे, जो सैनिकों की सुरक्षा बढ़ाने और ऑपरेशन को ज्यादा प्रभावी बनाने में मदद करते हैं। इन तकनीकों को खासतौर पर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों के लिए तैयार किया गया है।

स्वदेशी हथियारों और सिस्टम पर फोकस

सिम्पोजियम में स्वदेशी यानी इंडिजिनस तकनीकों पर खास ध्यान दिया जाएगा। इसमें आर्टिलरी सिस्टम, नए प्रोटोटाइप और अन्य रक्षा उपकरण शामिल होंगे, जो देश में ही डेवलप किए गए हैं।

सरकार का फोकस ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर है, इसलिए इस तरह के आयोजनों के जरिए विदेशी निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है। यहां कंपनियां यह दिखाएंगी कि कैसे उनके इनोवेशन को असली रक्षा उत्पाद में बदला जा सकता है।

इंडस्ट्री और सेना के बीच सीधा संपर्क

इस आयोजन का एक बड़ा मकसद यह भी है कि सेना और इंडस्ट्री के बीच सीधा संपर्क बने। अक्सर देखा जाता है कि तकनीक तैयार होने के बाद भी उसे फील्ड में लाने में समय लग जाता है।

नॉर्थ टेक सिम्पोजियम को ‘सिंगल विंडो प्लेटफॉर्म’ की तरह तैयार किया गया है, जहां सेना अपनी जरूरत सीधे कंपनियों के सामने रख सकती है और कंपनियां उसी हिसाब से समाधान दे सकती हैं।

मेंटेनेंस और प्रोक्योरमेंट पर भी ध्यान

इस कार्यक्रम में सिर्फ नई तकनीक पर ही नहीं, बल्कि उसके रखरखाव और खरीद प्रक्रिया पर भी चर्चा होगी। इसका उद्देश्य यह है कि सिस्टम को फील्ड में तैनात करने के बाद उसे लंबे समय तक सही तरीके से चलाया जा सके।

साथ ही प्रोक्योरमेंट यानी खरीद प्रक्रिया को भी आसान बनाने पर जोर दिया जाएगा, ताकि नई तकनीकों को तेजी से सेना तक पहुंचाया जा सके।

सिम्पोजियम के दौरान कई थीमैटिक सेशन भी आयोजित किए जाएंगे, जहां वैज्ञानिक, रक्षा विशेषज्ञ और इंडस्ट्री लीडर्स अपने अनुभव साझा करेंगे। इन सेशन्स में रक्षा निर्माण, नई तकनीक और ऑपरेशन से जुड़े विषयों पर चर्चा होगी।

यह मंच रिसर्च, डेवलपमेंट और फील्ड एक्सपीरियंस को जोड़ने का काम करेगा, जिससे नई तकनीकों को बेहतर तरीके से समझा जा सके।

रिटायर्ड मेजर की पेंशन में देरी पर सेना प्रमुख और रक्षा सचिव पर 2 लाख रुपये का जुर्माना, सैलरी काटने का आदेश

Army pension delay case

Army pension delay case: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक रिटायर्ड आर्मी मेजर की दिव्यांग पेंशन में देरी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए रक्षा सचिव और सेना प्रमुख पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदलत ने कहा है कि यह रकम उनकी सैलरी से काटकर याचिकाकर्ता को दी जाए। यह मामला एक ऐसे पूर्व अधिकारी से जुड़ा है, जिसने सेवा के दौरान गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं झेली और कई बार सर्जरी करवाई, लेकिन उन्हें समय पर पेंशन नहीं मिल पाई।

Army pension delay case: सेवा के दौरान बिगड़ी तबीयत

महाराष्ट्र के पुणे निवासी मेजर राजदीप दिनकर पांडेर साल 2012 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे। शुरुआत में वह पूरी तरह फिट थे और उन्हें लद्दाख स्काउट्स यूनिट के साथ ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात किया गया। उन्होंने फील्ड एरिया, पीस स्टेशन और हाई-ऑल्टीट्यूड पोस्टिंग जैसे कठिन इलाकों में ड्यूटी की।

साल 2017 में ड्यूटी के दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई। उन्हें दिल्ली कैंट के बेस अस्पताल में मेडिकल जांच के लिए लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनकी बीमारी की पहचान ‘सिस्टाइटिस सिस्टिका ग्लैंडुलरिस’ के रूप में की। यह बीमारी मूत्राशय से जुड़ी होती है और लगातार इलाज की जरूरत होती है। इसके बाद उनकी सर्जरी हुई और उन्हें लो मेडिकल कैटेगरी में डाल दिया गया।

कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेशी

बीमारी के बाद मेजर पांडेर को कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया। अलग-अलग मेडिकल बोर्ड ने उनकी स्थिति का आकलन किया और उन्हें लगातार इलाज की जरूरत बताई गई। इस दौरान उनकी कई सर्जरी भी हुईं। बाद में 2022 में उन्हें चंडीमंदिर स्थित वेस्टर्न कमांड अस्पताल में रिलीज मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया।

यहां मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता 15 फीसदी तय की, लेकिन यह भी कहा कि यह बीमारी सैन्य सेवा से जुड़ी नहीं है और न ही सेवा के कारण बढ़ी है। इसके आधार पर उन्हें सितंबर 2022 में सेना से रिटायर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने दिव्यांग पेंशन के लिए आवेदन किया, जिसे नवंबर 2022 में खारिज कर दिया गया।

ट्रिब्यूनल ने उठाए सवाल

इस फैसले के खिलाफ मेजर पांडेर ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि मेजर पांडेर की कई बार सर्जरी हुई और उनकी बीमारी सेवा के दौरान ही विकसित हुई थी। ऐसे में यह समझ से परे है कि अंतिम मेडिकल बोर्ड ने इसे सेवा से जुड़ा क्यों नहीं माना।

ट्रिब्यूनल ने 2008 के गाइडलाइन के आधार पर उनकी दिव्यांगता 40 प्रतिशत मानी और सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया। इसके साथ ही उन्हें जुलाई 2022 से दिव्यांग पेंशन देने का आदेश दिया गया।

हाई कोर्ट ने भी दी राहत

केंद्र सरकार ने ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन जुलाई 2025 में हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि मेजर पांडेर को पेंशन मिलने का अधिकार है और इसमें कोई संदेह नहीं है।

इसके बाद भी जब पेंशन जारी नहीं की गई, तो मेजर पांडेर ने हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने आदेश को लागू कराने की मांग की। अक्टूबर 2025 में अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया और पेंशन देने का निर्देश दिया।

आदेश के बावजूद नहीं मिला भुगतान

अदालत के आदेश के बावजूद भी संबंधित अधिकारियों ने पेंशन जारी नहीं की। इस पर मेजर पांडेर ने कंटेम्प्ट पिटीशन दाखिल की। उनके वकील ने अदालत में कहा कि आदेश के बाद काफी समय बीत चुका है, लेकिन न तो कोई भुगतान हुआ है और न ही पेंशन से जुड़ा कोई आधिकारिक पत्र जारी किया गया है।

30 अप्रैल को सुनवाई के दौरान जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा कि पिछली सुनवाई में भी अधिकारियों को जवाब देने का आखिरी मौका दिया गया था, लेकिन उन्होंने कोई जवाब दाखिल नहीं किया। अदालत ने कहा कि अब एक और मौका दिया जा रहा है, लेकिन इसके साथ दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “अगर निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है, तो लागत लगाई जाएगी।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह रकम रक्षा सचिव और सेना प्रमुख की सैलरी से बराबर हिस्से में काटी जाएगी और डिमांड ड्राफ्ट के जरिए याचिकाकर्ता को दी जाएगी।

इस पूरे मामले में अदालत ने यह भी साफ किया कि मेडिकल बोर्ड के अलग-अलग आकलन में अंतर क्यों आया, यह स्पष्ट नहीं है। ट्रिब्यूनल ने भी इसी पर सवाल उठाए थे कि जब पहले कई बार बीमारी को सेवा से जुड़ा माना गया, तो आखिरी समय में इसे अलग क्यों बताया गया।

AI डिफेंस कंपनी Shield AI ने खोला दिल्ली में ऑफिस, V-BAT और X-BAT ड्रोन बनाने की तैयारी

Shield AI India

Shield AI India: डिफेंस टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वाली अमेरिकी कंपनी शील्ड एआई (Shield AI) ने नई दिल्ली में अपना नया ऑफिस शुरू किया है। कंपनी ने यह कदम भारत के रक्षा मंत्रालय और यहां के इंडस्ट्री इकोसिस्टम के साथ बढ़ते सहयोग को ध्यान में रखते हुए उठाया है।

कंपनी के इस फैसले को भारत में उसके लंबे समय के निवेश और साझेदारी के तौर पर देखा जा रहा है। इस मौके पर कंपनी के प्रेसिडेंट और को-फाउंडर रयान त्सेंग और यूएस नेवी के रिटायर्ड एडमिरल जॉन सी. एक्विलिनो भी नई दिल्ली पहुंचे, जहां इस नई शुरुआत का ऐलान किया गया।

Shield AI India: भारत में बनाई नई कंपनी

शील्ड एआई ने भारत में अपनी पूरी तरह स्वामित्व वाली एक नई कंपनी भी बनाई है, जिसका नाम शील्ड एआई इंडिया रखा गया है। इस कंपनी का मकसद भारत में सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन, इंजीनियरिंग और ऑटोनॉमी डेवलपमेंट पर काम करना है। इसके जरिए भारत में ही इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की क्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

कंपनी ने बताया कि फिलहाल नई दिल्ली का ऑफिस शुरू हो चुका है, जबकि बेंगलुरु में दूसरा ऑफिस जल्द खोला जाएगा। बेंगलुरु का सेंटर खास तौर पर टेक्नोलॉजी और डेवलपमेंट गतिविधियों के लिए अहम माना जा रहा है, जहां स्थानीय इंजीनियर्स और डेवलपर्स के साथ मिलकर काम किया जाएगा।

इस मौके पर कंपनी के को-फाउंडर रयान त्सेंग ने कहा, “भारत शील्ड एआई के ग्लोबल मिशन का एक अहम हिस्सा है। यहां का इंजीनियरिंग टैलेंट, हमारे मौजूदा स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और भारतीय सेनाओं का भरोसा, इन सब वजहों से भारत हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक बन गया है। शील्ड एआई इंडिया के जरिए हम सिर्फ अपने प्रोडक्ट्स बेचने नहीं, बल्कि देश में स्थायी क्षमता बनाने के लिए काम कर रहे हैं।”

भारत में कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सृजन शाह ने कहा, “मजबूत साझेदारी का मतलब है कि हम अपने ग्राहकों के साथ मौजूद रहें और उनके साथ मिलकर काम करें। नई दिल्ली ऑफिस और बेंगलुरु विस्तार की योजना के जरिए हम भारत की ऑटोनॉमी प्राथमिकताओं को सपोर्ट करने और देश के अंदर ही सिस्टम विकसित और बनाए रखने की क्षमता को मजबूत कर रहे हैं।”

वहीं एडमिरल जॉन सी. एक्विलिनो ने कहा, “अमेरिका और भारत के बीच संबंध हमेशा अहम रहे हैं। शील्ड एआई जिस तरह भारत के साथ काम कर रही है, वह इस साझेदारी को और मजबूत बनाता है। सही तरीके से काम करने पर यह संबंध दोनों देशों के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण साबित होता है।”

Shield AI India
V-BAT vertical take-off and landing (VTOL) reconnaissance UAS was selected by the Indian Army

भारत में बनेगा V-BAT अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम

शील्ड एआई पहले से ही भारतीय रक्षा क्षेत्र के साथ काम कर रही है। कंपनी ने नवंबर 2024 में जेएसडब्ल्यू डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की थी। इस साझेदारी के तहत कंपनी के V-BAT अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम को भारत में ही बनाना और डेवलप करना है।

इस प्रोजेक्ट के तहत जेएसडब्ल्यू डिफेंस ने हैदराबाद के महेश्वरम में एक बड़ा प्रोडक्शन प्लांट तैयार करना शुरू किया है। दिसंबर 2025 में इस प्लांट का निर्माण शुरू हुआ था, जिसमें करीब 90 मिलियन डॉलर का निवेश किया गया है। इस सुविधा को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ ग्लोबल प्रोडक्शन हब के रूप में भी काम कर सके।

इसी साल भारत ने शील्ड एआई को हाइवमाइंड सॉफ्टवेयर से लैस V-BAT ड्रोन उपलब्ध कराने के लिए चुना है। इसके अलावा भारतीय सेना को हाइवमाइंड ऑटोनॉमी सॉफ्टवेयर के लाइसेंस भी दिए जा रहे हैं।

हाइवमाइंड एक तरह का ऑटोनॉमस सॉफ्टवेयर है, जो ड्रोन को बिना लगातार मानव नियंत्रण के काम करने की क्षमता देता है। यह सॉफ्टवेयर ड्रोन को खुद से निर्णय लेने, लक्ष्य पहचानने और मिशन पूरा करने में मदद करता है।

V-BAT ड्रोन की खासियत

V-BAT एक ग्रुप-3 कैटेगरी का ड्रोन है, जो वर्टिकल टेकऑफ एंड लैंडिंग (VTOL) क्षमता के साथ आता है। इसका मतलब है कि इसे रनवे की जरूरत नहीं होती और यह सीधा ऊपर उठकर उड़ान भर सकता है।

इस ड्रोन की उड़ान क्षमता 12 घंटे से ज्यादा बताई जाती है और इसमें भारी ईंधन का इस्तेमाल होता है। यह ड्रोन इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) मिशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए लक्ष्य की पहचान और निगरानी की जा सकती है।

इस ड्रोन में हाइवमाइंड सॉफ्टवेयर को ऑटोनॉमस पायलट के तौर पर जोड़ा जा रहा है। इससे यह ड्रोन एआई की मदद से खुद काम करने की क्षमता हासिल करता है और बिना नजर में आए भी ऑपरेशन कर सकता है।

कंपनी ने यह भी बताया है कि वह एक नई पीढ़ी के ऑटोनॉमस कॉम्बैट एयरक्राफ्ट X-BAT पर भी काम कर रही है। यह भी VTOL कैटेगरी का होगा और इसे भविष्य के सैन्य ऑपरेशन्स के हिसाब से तैयार किया जा रहा है।

शील्ड एआई की स्थापना साल 2015 में हुई थी। यह कंपनी डिफेंस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम करती है और इसका फोकस ऐसे सिस्टम तैयार करना है, जो सैनिकों और नागरिकों की सुरक्षा में मदद कर सकें। कंपनी के प्रोडक्ट्स में हाइवमाइंड सॉफ्टवेयर और V-BAT व X-BAT जैसे ड्रोन शामिल हैं। कंपनी के ऑफिस अमेरिका, यूरोप, मिडिल ईस्ट और एशिया-पैसिफिक क्षेत्रों में मौजूद हैं और इसकी तकनीक का इस्तेमाल दुनिया के कई हिस्सों में किया जा रहा है।