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SPx Server V2: मॉडर्न वारफेयर के लिए कैम्ब्रिज पिक्सेल ने किया रडार टेक्नोलॉजी में बड़ा अपग्रेड, टारगेट ट्रैकिंग में AI करेगा मदद

Cambridge Pixel SPx Server V2
Cambridge Pixel SPx Server V2

SPx Server V2: यूनाइटेड किंगडम की रडार टेक्नोलॉजी कंपनी कैम्ब्रिज पिक्सेल ने अपने चर्चित रडार ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का नया वर्जन SPx Server V2 लॉन्च किया है। कंपनी के मुताबिक यह पहले से इस्तेमाल हो रहे सिस्टम का बड़ा अपग्रेड है, जिसमें कई नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं। यह सॉफ्टवेयर पहले से ही दुनिया के कई डिफेंस, सिक्योरिटी और मैरीटाइम प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल हो रहा है और अब इसमें कई नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं। यह सॉफ्टवेयर दुनिया भर में रडार डेटा प्रोसेसिंग, टारगेट ट्रैकिंग और सर्विलांस के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

क्या है SPx Server V2 और क्यों है अहम

SPx Server V2 दरअसल एक ऐसा सॉफ्टवेयर है, जो रडार से आने वाले डेटा को समझने, उसे प्रोसेस करने और टारगेट को ट्रैक करने में मदद करता है। आसान शब्दों में कहें तो यह सिस्टम यह बताता है कि रडार पर दिख रहा ऑब्जेक्ट क्या है, कहां है और किस दिशा में जा रहा है।

नए वर्जन में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि इसे अब आधुनिक युद्ध और सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। इसमें ऐसे फीचर्स जोड़े गए हैं जो ऑटोनॉमस सिस्टम, यानी बिना इंसान के चलने वाले प्लेटफॉर्म्स, और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं।

कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर मार्टिन होदर ने इस लॉन्च पर कहा कि SPx Server कई मैरीटाइम और नेवल प्लेटफॉर्म्स में रडार प्रोसेसिंग का मुख्य हिस्सा है। उन्होंने बताया कि नए वर्जन में पुराने सिस्टम्स के साथ पूरी संगतता बनाए रखते हुए नई तकनीकों को जोड़ा गया है, ताकि बदलती जरूरतों के हिसाब से इसका इस्तेमाल किया जा सके।

टकराव से बचाने की नई क्षमता

इस अपडेट में एक अहम फीचर प्रॉक्सिमिटी डिटेक्शन जोड़ा गया है। इसका काम है आसपास मौजूद दूसरे ऑब्जेक्ट्स की दूरी का अंदाजा लगाना और संभावित टकराव से पहले ही चेतावनी देना है।

यह फीचर खासतौर पर उन प्लेटफॉर्म्स के लिए जरूरी है जो अपने आप चलते हैं, इनमें अनमैन्ड सरफेस व्हीकल यानी यूएसवी शामिल हैं। समुद्र में ऐसे सिस्टम्स को सुरक्षित चलाने के लिए यह तकनीक काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि वहां हर समय इंसानी कंट्रोल संभव नहीं होता।

नए हार्डवेयर के साथ काम करने की सुविधा

SPx Server V2 को कंपनी के नए हार्डवेयर प्लेटफॉर्म HPx-700 के साथ भी जोड़ा गया है। यह एक एम्बेडेड रडार इनपुट और प्रोसेसिंग यूनिट है, जो सीधे सिस्टम के अंदर लगकर काम करता है।

इससे डेवलपर्स को एक पूरा रेडी-टू-यूज सॉल्यूशन मिलता है, जिसमें हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों एक साथ काम करते हैं। यह खासतौर पर उन सिस्टम्स के लिए उपयोगी है, जहां जगह कम होती है और कॉम्पैक्ट डिजाइन की जरूरत होती है।

आधुनिक कमांड सिस्टम के साथ जुड़ने की क्षमता

नए वर्जन में TAK और SAPIENT जैसे फॉर्मेट्स का सपोर्ट दिया गया है। ये ऐसे स्टैंडर्ड हैं जिनका इस्तेमाल आधुनिक सिचुएशनल अवेयरनेस और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम में किया जाता है।

इसका मतलब यह है कि अब यह सॉफ्टवेयर अलग-अलग सिस्टम्स के बीच आसानी से डेटा शेयर कर सकता है। इससे किसी ऑपरेशन के दौरान अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल बेहतर होता है और जानकारी तेजी से पहुंचती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल

SPx Server V2 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का भी इस्तेमाल किया गया है। इसके जरिए सिस्टम को सेट करना पहले से आसान हो जाता है।

मशीन लर्निंग की मदद से यह सॉफ्टवेयर खुद ही अपने पैरामीटर्स को बेहतर कर सकता है। यानी यूजर को हर चीज मैन्युअली सेट करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे समय बचता है और सिस्टम ज्यादा सटीक तरीके से काम करता है।

रडार कवरेज को देखने की नई सुविधा

इस अपडेट में एक ऐसा फीचर भी जोड़ा गया है जिससे यूजर यह देख सकता है कि रडार किस इलाके को कवर कर रहा है। इसे रडार कवरेज डिस्प्ले कहा जाता है। इससे यह समझना आसान हो जाता है कि कहां निगरानी मजबूत है और कहां गैप है। यह फीचर ऑपरेशन के दौरान सही फैसले लेने में मदद करता है।

ट्रैकिंग और रिपोर्टिंग में सुधार

SPx Server V2 में टारगेट ट्रैकिंग को और बेहतर किया गया है। अब सिस्टम पहले से ज्यादा साफ तरीके से यह दिखा सकता है कि कोई ऑब्जेक्ट कहां से आया और कहां जा रहा है।

इसके साथ ही प्लॉट हिस्ट्री विजुअलाइजेशन भी जोड़ा गया है, जिससे पुराने डेटा को देखना आसान हो जाता है। इसके अलावा ट्रैक लेबलिंग को भी कस्टमाइज किया जा सकता है, ताकि स्क्रीन पर जानकारी साफ और समझने लायक दिखे।

अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम करने की क्षमता

यह सॉफ्टवेयर लिनक्स और विंडोज दोनों प्लेटफॉर्म पर चलता है। साथ ही इसमें ARM प्लेटफॉर्म का भी सपोर्ट दिया गया है, जो आजकल कई एम्बेडेड सिस्टम्स में इस्तेमाल होता है।

इसका मतलब है कि इसे अलग-अलग तरह के सिस्टम्स में आसानी से लगाया जा सकता है, चाहे वह छोटा डिवाइस हो या बड़ा कमांड सिस्टम।

पुराने सिस्टम्स के साथ भी करेगा काम

कंपनी का कहना है कि नया वर्जन उन सभी सिस्टम्स के साथ काम करेगा जो पहले से इस्तेमाल में हैं। यानी पुराने यूजर्स बिना किसी रुकावट के इसे अपग्रेड कर सकते हैं।

यह बात इसलिए अहम है क्योंकि दुनिया भर में हजारों सिस्टम पहले से SPx Server पर काम कर रहे हैं। नए वर्जन में उन्हें बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

कैम्ब्रिज पिक्सेल रडार, कैमरा और सेंसर से जुड़ी तकनीकों पर काम करती है। इसके प्रोडक्ट्स दुनिया के कई देशों में इस्तेमाल हो रहे हैं। कंपनी सॉफ्टवेयर के साथ-साथ हार्डवेयर और डेवलपर टूल्स भी बनाती है, जिससे अलग-अलग तरह के सिस्टम्स तैयार किए जा सकें। कंपनी का फोकस ऐसे समाधान देने पर है, जो सुरक्षा, निगरानी और रक्षा से जुड़े कामों को आसान और प्रभावी बना सकें।

द्विपक्षीय बातचीत में भारत ने इटली से रखी अहम शर्त, संवेदनशील डिफेंस टेक्नोलॉजी को पाकिस्तान से रखें दूर

India-Italy Defence Talks

India-Italy Defence Talks: भारत ने इटली से कहा है कि वह पाकिस्तान के साथ संवेदनशील रक्षा तकनीक साझा न करे। भारत और इटली के बीच रक्षा सहयोग को लेकर एक अहम बैठक के दौरान रक्षा मंत्री ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को सामने रखते हुए यह बात कही। 30 अप्रैल को नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने इटली के समकक्ष गुइडो क्रोसेट्टो के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान डिफेंस से जुड़े कई अहम मसलों पर बातचीत की।

बैठक के दौरान भारत ने इटली के सामने यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया कि कोई भी ऐसी रक्षा तकनीक, जो भारत के लिए महत्वपूर्ण है, वह पाकिस्तान तक नहीं पहुंचनी चाहिए। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, राजनाथ सिंह ने इटली से कहा कि वह पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह का रक्षा तकनीक सहयोग करने से बचे।

इटली की तरफ से इस पर जवाब दिया गया कि भारत को जो भी तकनीक दी जाएगी, उसे अन्य देशों के साथ साझा नहीं किया जाएगा।

India-Italy Defence Talks: पाकिस्तान से कैसे हैं इटली के डिफेंस संबंध

पाकिस्तान और इटली के बीच साल 2013 में एक स्ट्रैटेजिक एंगेजमेंट प्लान साइन किया था, जिसमें डिफेंस और सिक्योरिटी सहयोग को शामिल किया गया। इसके बाद जनवरी 2025 में हुई एक बैठक में दोनों पक्षों ने इन संबंधों को और मजबूत करने की बात दोहराई। मार्च 2025 में भी पाकिस्तान ने इटली के साथ रक्षा, कृषि और आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।

इटली पाकिस्तान को रक्षा उपकरण और तकनीक देने वाला एक सप्लायर रहा है। इटली मुख्य रूप से नेवल सेक्टर, हेलीकॉप्टर और कुछ एयरक्राफ्ट तथा राडार सिस्टम सप्लाई करता है।

अगर सप्लाई की बात करें तो इटली की कंपनी लियोनार्डो द्वारा बनाए गए एडब्ल्यू139 हेलीकॉप्टर पाकिस्तान को दिए गए हैं। इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल ट्रांसपोर्ट, सर्च एंड रेस्क्यू और मेडिकल इमरजेंसी जैसी जरूरतों में किया जाता है। ये पाकिस्तान के सरकारी और एयर फोर्स फ्लीट का हिस्सा हैं और समय-समय पर इनके ऑर्डर भी दिए जाते रहे हैं।

इसके अलावा नेवल क्षेत्र में एक अहम प्रोजेक्ट ‘सी सुल्तान’ है, जिसमें पाकिस्तान अपनी नौसेना के लिए पुराने विमान की जगह नए लॉन्ग रेंज मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट तैयार कर रहा है। इसके तहत ब्राजील के एम्ब्रेयर लाइनिज 1000 जेट को मॉडिफाई किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट में इटली की कंपनी लियोनार्डो ने 2021 में एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया था, जिसमें एंटी-सबमरीन और मैरीटाइम स्ट्राइक सिस्टम लगाने का काम शामिल है। इस प्रोजेक्ट के तहत पहला विमान शामिल किया जा चुका है और आगे भी कई विमान शामिल करने की योजना बताई जाती है।

इसके अलावा इटली ने पाकिस्तान को रडार सिस्टम भी उपलब्ध कराए हैं। लियोनार्डो के ग्रिफो रडार मिराज-3 और एफ-7 जैसे फाइटर जेट्स में लगाए गए हैं। नेवल डोमेन में भी कुछ कॉम्पोनेंट्स और टॉरपीडो से जुड़े सिस्टम सप्लाई किए गए हैं।

हथियार और गोला-बारूद के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच लेन-देन हुआ है। साल 2019 में पाकिस्तान ने इटली से बड़ी मात्रा में हॉवित्जर गन के लिए गोले खरीदे थे। इससे पहले 2018 में इटली ने पाकिस्तान को सैकड़ों मिलियन डॉलर के रक्षा निर्यात की मंजूरी दी थी, जिससे पाकिस्तान उस साल इटली के प्रमुख खरीदारों में शामिल हो गया। हाल के वर्षों में भी छोटे स्तर पर हथियार, पार्ट्स और एम्यूनिशन की सप्लाई जारी रही है।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि हेलीकॉप्टर, ड्रोन और एयर डिफेंस से जुड़े कुछ कॉम्पोनेंट्स के क्षेत्र में भी सहयोग हुआ है। 2016 में पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री ने इटली की एक कंपनी के साथ समझौता किया था, जिससे तकनीकी सहयोग को बढ़ावा मिला।

बता दें कि इटली की लियोनॉर्डो कंपनी भारत में अदाणी डिफेंस के साथ मिल कर हेलीकॉप्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार कर रही है। जिसमें लिओनॉर्डो के AW169M (लाइट यूटिलिटी) और AW109 TrekkerM मिलिट्री हेलीकॉप्टर शामिल हैं।

रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर जोर

इस बैठक में दोनों देशों ने अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की बात दोहराई। भारत और इटली के बीच संबंध शांति, स्थिरता, स्वतंत्रता और आपसी सम्मान जैसे मूल्यों पर आधारित हैं। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि इन मूल्यों के आधार पर आगे भी सहयोग को बढ़ाया जाएगा।

रक्षा मंत्री ने बताया कि इस दौरान क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जिसमें पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति भी शामिल रही। इसके अलावा रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाने के रास्तों पर भी बातचीत की गई।

रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाने पर जोर

बैठक में आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम के तहत रक्षा उत्पादन और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत चाहता है कि विदेशी कंपनियां भारतीय उद्योग के साथ मिलकर काम करें, ताकि देश में ही आधुनिक रक्षा उपकरण तैयार किए जा सकें।

इटली की तरफ से भी इस दिशा में सहयोग की इच्छा जताई गई। दोनों देशों ने मिलकर ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने की संभावना पर चर्चा की, जिससे दोनों को फायदा हो सके।

2026-27 के लिए सैन्य सहयोग

इस बैठक के दौरान भारत और इटली के बीच 2026-27 के लिए द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना का भी आदान-प्रदान किया गया। इस योजना में दोनों देशों की सेनाओं के बीच होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की गई है।

इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, स्टाफ एक्सचेंज और ऑपरेशनल सहयोग जैसे पहलू शामिल हैं। इसका उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल और समझ को बढ़ाना है।

समुद्री सुरक्षा पर भी खास चर्चा

भारत और इटली दोनों ही समुद्री दृष्टि से महत्वपूर्ण देश हैं, इसलिए बैठक में समुद्री सुरक्षा पर भी खास ध्यान दिया गया। दोनों पक्षों ने हिंद महासागर क्षेत्र में जानकारी साझा करने और निगरानी को मजबूत करने पर सहमति जताई।

इसके लिए गुरुग्राम स्थित इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन के जरिए सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। यह सेंटर समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने और जानकारी साझा करने का एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है।

इससे पहले भारत दौरे के दौरान इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेट्टो ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि भी दी। इसके बाद मानेकशॉ सेंटर में उन्हें तीनों सेनाओं की तरफ से गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

अपने भारत दौरे के दौरान भारतीय तटरक्षक बल ने भी इटली के एक प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की। इसमें फिनकैंटियरी शिपयार्ड के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। बैठक में समुद्री तकनीकों के विकास और सह-विकास पर चर्चा हुई। इस दौरान दोनों पक्षों ने डायनेमिक पोजिशनिंग सिस्टम, एडवांस्ड थ्रस्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम, एंटी-ड्रोन तकनीक और ग्रीन प्रोपल्शन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विचार किया। इन तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य में समुद्री सुरक्षा और ऑपरेशन को और बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है।

एमडीएल ने भारतीय नौसेना को सौंपा नया स्टेल्थ फ्रिगेट महेंद्रगिरि, प्रोजेक्ट-17ए का है आखिरी जहाज

INS Mahendragiri
INS Mahendragiri

INS Mahendragiri: मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल ने प्रोजेक्ट-17ए के तहत तैयार किए गए चौथे स्टेल्थ फ्रिगेट ‘महेंद्रगिरि’ को नौसेना को सौंप दिया है। जल्द ही नौसेना औपचारिक रूप से आईएनएस महेंद्रगिरि कमीशन करेगी।

आईएनएस महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट-17ए के तहत एमडीएल में तैयार होने वाला आखिरी जहाज है। इस जहाज को तैयार करने में वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो, वॉरशिप ओवरसीइंग टीम और नौसेना के कई तकनीकी विभागों ने मिलकर काम किया।

इस मौके पर एमडीएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर कैप्टन जगमोहन (रिटायर्ड) और ईस्टर्न नेवल कमांड के चीफ स्टाफ ऑफिसर (टेक) रियर एडमिरल गौतम मरवाहा के बीच एक्सेप्टेंस डॉक्यूमेंट पर साइन किए।

एमडीएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर कैप्टन जगमोहन ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरि को नौसेना को सौंपना पूरे संगठन के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि के पीछे एमडीएल, वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो, वॉरशिप ओवरसीइंग टीम और भारतीय नौसेना के अलग-अलग विभागों की मेहनत और आपसी तालमेल है। सभी ने मिलकर इस युद्धपोत को तैयार किया है।

कैप्टन जगमोहन ने यह भी कहा कि महेंद्रगिरि सिर्फ एक आधुनिक युद्धपोत नहीं है, बल्कि यह भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता का मजबूत उदाहरण है। इसमें अत्याधुनिक कॉम्बैट क्षमताएं हैं और इसके कमांडिंग ऑफिसर और क्रू इस पर गर्व करेंगे।

उन्होंने आगे कहा कि यह जहाज भारतीय नौसेना के विजन, रक्षा मंत्रालय के लगातार सहयोग और देश के शिपबिल्डिंग इकोसिस्टम की क्षमता को दिखाता है। एमडीएल ने साफ किया कि वह आगे भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान देने और भारत की समुद्री ताकत को मजबूत करने के लिए इसी तरह काम करता रहेगा।

INS Mahendragiri: क्या है प्रोजेक्ट-17ए

प्रोजेक्ट-17ए के तहत भारतीय नौसेना के लिए कुल सात एडवांस्ड स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। यह पहले के प्रोजेक्ट-17 यानी शिवालिक क्लास का अपग्रेडेड वर्जन माना जाता है।

इन जहाजों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये एक साथ कई तरह के मिशन संभाल सकें। इसमें एयर डिफेंस, एंटी-शिप ऑपरेशन, एंटी-सबमरीन वारफेयर और निगरानी जैसे काम शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट में चार जहाज एमडीएल और तीन गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा बनाए जा रहे हैं।

इन सभी जहाजों के नाम भारत की पर्वत श्रृंखलाओं पर नीलगिरि, हिमगिरि, उदयगिरि, दूनागिरि, तारागिरि, विंध्यगिरि और महेंद्रगिरि के नाम पर रखे हैं।

महेंद्रगिरि में है स्टेल्थ क्षमता

महेंद्रगिरि को खास तौर पर स्टेल्थ फीचर्स के साथ तैयार किया गया है। इसका डिजाइन ऐसा है कि दुश्मन के रडार पर इसकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इसे कम रडार क्रॉस सेक्शन के साथ डिजाइन किया गया है, जिससे यह समुद्र में ज्यादा सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन कर सकता है।

इसके अलावा जहाज में एडवांस्ड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है, जिससे इसके सभी सिस्टम एक नेटवर्क के जरिए जुड़े रहते हैं।

6,600 टन है वजनी

यह फ्रिगेट करीब 149 मीटर लंबा और लगभग 6,600 टन के आसपास का डिस्प्लेसमेंट रखता है। इसकी अधिकतम गति करीब 32 नॉट्स तक पहुंच सकती है। यह लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम है और समुद्र में लंबे समय तक तैनात रह सकता है।

इसमें सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल और गैस टर्बाइन प्रोपल्शन सिस्टम दिया गया है। इसमें जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टर्बाइन का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे ईंधन की बचत और बेहतर परफॉर्मेंस दोनों मिलते हैं।

जहाज में कंट्रोलेबल पिच प्रोपेलर लगाया गया है, जिससे इसकी मूवमेंट को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है।

कई आधुनिक हथियारों और सेंसर सिस्टम से है लैस

‘महेंद्रगिरि’ को कई तरह के आधुनिक हथियारों और सेंसर सिस्टम से लैस किया गया है। इसमें सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, मीडियम रेंज सर्फेस टू एयर मिसाइल, मुख्य गन, क्लोज-इन वेपन सिस्टम और टॉरपीडो जैसे सिस्टम शामिल हैं।

इसके साथ ही इसमें एडवांस्ड रडार और सोनार सिस्टम लगाए गए हैं, जो हवा और पानी दोनों में होने वाली गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं। इस जहाज पर हेलीकॉप्टर ऑपरेशन भी किए जा सकते हैं, जिससे इसकी निगरानी और हमला करने की क्षमता बढ़ जाती है।

इस जहाज में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें कई सिस्टम भारत में ही डिजाइन और बनाए गए हैं।

प्रोजेक्ट-17A के तहत एमडीएल ने पहले भी तीन जहाज नौसेना को सौंपे हैं। इस जहाज का निर्माण पिछले जहाजों के मुकाबले कम समय में पूरा किया गया है।

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन को मिलेगी नई धार, राष्ट्रीय राइफल्स के लिए सेना खरीदने जा रही है नए बुलेट प्रूफ ट्रूप्स कैरियर

Indian Army Bulletproof Troop Carrier RFI
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Indian Army Bulletproof Troop Carrier: भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में तैनात राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट्स के लिए एक नए तरह के सुरक्षित व्हीकल को खरीदने की तैयारी कर रही है। इसके तहत करीब 159 बुलेट प्रूफ ट्रूप्स कैरियर यानी बीपीटीसी खरीदने की योजना बनाई गई है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। यह व्हीकल खास तौर पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात जवानों के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन लगातार चलते रहते हैं।

Indian Army Bulletproof Troop Carrier: 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर करेगा काम

बीपीटीसी को इस तरह डिजाइन किया जाए कि यह अलग-अलग तरह के इलाकों में आसानी से काम कर सके। यह व्हीकल मैदानी जगहों के साथ-साथ पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में भी चल सके। इसे करीब 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर ऑपरेट करने के लिए तैयार रहे, जहां आम व्हीकल काम नहीं कर पाते।

इसमें हर मौसम में काम करने की क्षमता होगी। चाहे भारी बारिश हो, बर्फबारी हो या धूल भरे हालात, यह व्हीकल बिना रुकावट के चलता रहेगा। इसके अंदर हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगाया जाए, जिससे केबिन का तापमान कंट्रोल रहे। इससे ठंडे इलाकों में भी जवानों को परेशानी नहीं होगी। यह वाहन बेहद कठिन मौसम में भी काम करने के लिए तैयार हो। इसमें माइनस 5 से माइनस 10 डिग्री सेल्सियस तक की ठंड और 40 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी में पूरी तरह से ऑपरेशनल रहने की क्षमता हो। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

30 लोगों के बैठने की व्यवस्था

इस व्हीकल की सबसे बड़ी खूबी इसकी सुरक्षा है। इसमें कुल 30 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी, जिसमें ड्राइवर और को-ड्राइवर के अलावा 28 जवान बैठ सकेंगे। अंदर की सीट्स इस तरह बनाई गई हैं कि जवानों को लंबी दूरी के दौरान भी आराम मिल सके।

इसकी पेलोड क्षमता कम से कम 3 टन हो, ताकि यह भारी मात्रा में सामान और उपकरण एक साथ ले जा सके। वाहन का कुल वजन अधिकतम 20 टन तक हो, जिसमें वाहन का खुद का वजन और उसमें बैठने वाले जवानों का वजन शामिल है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

मजबूत इंजन और बेहतर मोबिलिटी

बीपीटीसी में टर्बोचार्ज्ड डीजल इंजन लगा हो, जो इसे अलग-अलग तरह के रास्तों पर चलने की ताकत देगा। यह 4×4 ड्राइव सिस्टम से लैस होना चाहिए, जिससे जरूरत के अनुसार इसे अलग-अलग मोड में चलाया जा सकेगा। इसकी लंबाई 9 मीटर, चौड़ाई 2.5 मीटर और 3.25 मीटर हो।

इस व्हीकल की स्पीड सड़क पर करीब 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे हो, जबकि खराब इलाकों में इसकी स्पीड 50 से 75 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए। साथ ही, इसकी रेंज भी मैदानी इलाकों के लिए 350 किमी और पहाड़ी इलाकों के लिए 300 किमी रखी गई है, जिससे यह एक बार में सैकड़ों किलोमीटर तक चल सकता है।

इसके साथ इसमें सेल्फ रिकवरी सिस्टम भी हो, यानी अगर व्हीकल कहीं फंस जाए तो यह खुद को बाहर निकाल सके। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

बैलिस्टिक प्रोटेक्शन से लैस

इस व्हीकल की सबसे अहम बात इसका STANAG लेवल-3 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन है। इसे इस तरह तैयार किया जाए कि यह अलग-अलग तरह की गोलियों और हमलों से जवानों को बचा सके।

व्हीकल के सभी हिस्सों, जैसे दरवाजे, दीवारें और छत, को मजबूत बुलेट प्रूफ स्टील से बनाया जाए। इसमें खास तरह का बुलेट रेसिस्टेंट ग्लास लगा हो, जो गोलियों को रोक सके।

इसके अलावा व्हीकल के नीचे वाले हिस्से भी मजबूत हो, ताकि यह ग्रेनेड या विस्फोट जैसे हमलों को झेल सके। इंजन और फ्यूल टैंक को भी अतिरिक्त सुरक्षा का फीचर हो, ताकि हमला होने पर भी व्हीकल तुरंत बंद न हो। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

लगे हों रन-फ्लैट सिस्टम वाले टायर

बीपीटीसी में ऐसे टायर लगाए जाएं, जो खराब होने के बाद भी कुछ दूरी तक व्हीकल को चलने देंगे। इसे रन-फ्लैट सिस्टम कहा जाता है। इसका मतलब है कि अगर टायर पंचर भी हो जाए तो व्हीकल तुरंत नहीं रुकेगा।

इसमें अतिरिक्त टायर भी दिया जाए, जिससे जरूरत पड़ने पर उसे बदला जा सके। यह सुविधा ऑपरेशन के दौरान बहुत काम आती है, जहां रुकना जोखिम भरा हो सकता है।

इस बुलेटप्रूफ ट्रूप्स कैरियर में आधुनिक लाइटिंग सिस्टम होना चाहिए, जिसमें एलईडी हेडलाइट्स, फॉग लाइट्स, टेल लाइट्स, ब्रेक लाइट्स और कन्वॉय लाइट्स शामिल हैं। इसके साथ ब्लैकआउट स्विच की सुविधा भी हो, जिससे ऑपरेशन के दौरान जरूरत पड़ने पर पूरी लाइटिंग बंद की जा सके। वाहन पर एंटी-रायट वायर मेश भी लगा हो, जो सुरक्षा को और मजबूत बनाएगा।

गनर हैच और फायरिंग की सुविधा

इस व्हीकल को सिर्फ ट्रांसपोर्ट के लिए ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर फायरिंग के लिए भी तैयार हो। इसके ऊपर एक गनर हैच लगा हो, जहां से सैनिक मशीन गन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

इसके अलावा व्हीकल के दोनों तरफ छोटे-छोटे फायरिंग पोर्ट दिए जाएं, जिनसे अंदर बैठे जवान भी जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई कर सकें। इससे यह व्हीकल एक तरह से चलते-फिरते सुरक्षा प्लेटफॉर्म की तरह काम करता है।

बीपीटीसी में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम भी दिया जाएगा। इसमें ऐसे फीचर्स होंगे जो ड्राइवर को मुश्किल रास्तों पर व्हीकल को चलाने में मदद करेंगे।

इसमें 360 डिग्री कैमरा, टक्कर से बचाने वाला सिस्टम, ब्रेकिंग कंट्रोल और ड्राइवर की थकान को पहचानने वाले फीचर्स शामिल होंगे। इससे दुर्घटना की संभावना कम हो जाती है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

बेहतर कंट्रोल और ब्रेकिंग सिस्टम

इस व्हीकल में सभी पहियों पर डिस्क ब्रेक लगे हो और एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम भी दिया गया हो। इससे अचानक ब्रेक लगाने पर भी व्हीकल संतुलित रहेगा।

इसमें एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम यानी एडीएएस लेवल-2 फीचर्स भी अनिवार्य रूप से हो। यह सिस्टम खास तौर पर पहाड़ी इलाकों, कच्चे रास्तों और कम विजिबिलिटी जैसे कोहरा, बर्फ या धूल भरे माहौल में बेहतर ड्राइविंग में मदद करेगा। इसमें एडाप्टिव क्रूज कंट्रोल दिया गया हो, जो ट्रैफिक के हिसाब से खुद स्पीड को कंट्रोल करे। इसके साथ फॉरवर्ड कोलिजन वार्निंग और ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम भी हो, जो सामने खतरा आने पर वाहन को अपने आप रोक सकता है।

यह व्हीकल ढलान वाले रास्तों पर भी पूरी तरह लोड होने के बावजूद रुक सकता है। यह खासियत पहाड़ी इलाकों में काफी जरूरी मानी जाती है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

आसान रखरखाव और लंबी उम्र

सेना ने आरएफआई में कहा कि बीपीटीसी को इस तरह डिजाइन किया जाए कि इसका रखरखाव आसान हो। इसके अलग-अलग हिस्सों को जरूरत पड़ने पर आसानी से बदला जा सकता है। इससे फील्ड में ही इसकी मरम्मत की जा सकेगी।

इसकी उम्र भी 10 साल या एक लाख किमी रखी गई है, ताकि इसे कई सालों तक इस्तेमाल किया जा सके। इसके साथ कंपनियों को स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस सपोर्ट देना भी जरूरी होगा।

यह पूरी प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत आगे बढ़ाई जा रही है और इसे ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी में रखा गया है। इसका मतलब है कि इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनियों की भागीदारी होगी और स्वदेशी तकनीक पर जोर रहेगा।

इस प्रोजेक्ट के तहत चुनी गई कंपनी को तय समय में सभी व्हीकल तैयार करने होंगे। कॉन्ट्रैक्ट मिलने के बाद हर तीन साल तक 60 व्हीकलों की डिलीवरी करनी होगी, ताकि सेना को समय पर यह नई क्षमता मिल सके।

सेना की जरूरतों के मुतबिक यह व्हीकल सड़क और रेल दोनों के जरिए आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके। इसके साथ कंपनी को ट्रेनिंग के लिए एआर और वीआर वीडियो, सेक्शनाइज्ड मॉडल्स और डिटेल्ड मैनुअल्स भी देने होंगे, ताकि सैनिक इसे सही तरीके से ऑपरेट और मेंटेन कर सकें।

इसमें भाग लेने के लिए कंपनियों को यह भी दिखाना होगा कि उनके पास बड़े स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता है। (Indian Army Bulletproof Troop Carrier)

सुरक्षा बलों के खतरनाक मिशन के लिए लॉन्च किया नया आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, गोलियों और धमाकों का नहीं होगा असर

PAMA APC Armoured Vehicle

PAMA APC Armoured Vehicle: मुंबई की कंपनी शील्ड आर्मरिंग प्राइवेट लिमिटेड ने ‘पामा-एपीसी’ नाम का एक नया आर्मर्ड पर्सनल कैरियर लॉन्च किया है। यह व्हीकल खास तौर पर डिफेंस फोर्सेस, पैरामिलिट्री यूनिट्स और हाई-रिस्क सिक्योरिटी ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। कंपनी के अनुसार, यह गाड़ी आधुनिक खतरों को ध्यान में रखकर डिजाइन की गई है, जहां सुरक्षा, तेजी और अलग-अलग हालात में काम करने की क्षमता जरूरी होती है।

PAMA APC Armoured Vehicle: टोयोटा हिलक्स प्लेटफॉर्म पर तैयार

यह आर्मर्ड व्हीकल टोयोटा हिलक्स प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है, जिसे मजबूत और भरोसेमंद माना जाता है। इसी बेस पर इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह मुश्किल इलाकों में भी आसानी से चल सके। पामा-एपीसी का साइज कॉम्पैक्ट रखा गया है, जिससे यह शहरों की संकरी सड़कों में भी आसानी से मूव कर सके और जरूरत पड़ने पर तेजी से ऑपरेशन कर सके।

इस व्हीकल की लंबाई करीब 4900 मिमी, चौड़ाई 1730 मिमी और ऊंचाई 2210 मिमी है। इसके अंदर छह लोगों के बैठने की व्यवस्था है, जिसमें एक ड्राइवर और पांच जवान शामिल हो सकते हैं। यह कॉन्फिगरेशन छोटे दस्ते की तेजी से तैनाती के लिए उपयोगी माना जा रहा है। (PAMA APC Armoured Vehicle)

PAMA APC Armoured Vehicle

इंजन और परफॉर्मेंस

पामा-एपीसी में 2.8 लीटर का 4 सिलेंडर इंजन लगाया गया है। यह इंजन 201 बीएचपी की पावर और 500 न्यूटन मीटर का टॉर्क देता है। इसकी वजह से यह गाड़ी अलग-अलग तरह के इलाकों में चल सकती है। इसमें 4×4 ड्राइवट्रेन और मैनुअल ट्रांसमिशन दिया गया है, जिससे यह ऑफ-रोड और खराब रास्तों पर भी आसानी से चल सकती है।

इसका ग्राउंड क्लीयरेंस 200 मिमी से ज्यादा है, जो ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने में मदद करता है। व्हीलबेस 3085 मिमी रखा गया है। (PAMA APC Armoured Vehicle)

PAMA APC Armoured Vehicle

मल्टी-लेयर बुलेट रेजिस्टेंट ग्लास का इस्तेमाल

इस व्हीकल की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुरक्षा है। इसमें बैलिस्टिक स्टील और मल्टी-लेयर बुलेट रेजिस्टेंट ग्लास का इस्तेमाल किया गया है। यह गाड़ी सीईएन लेवल बीआर6 प्रोटेक्शन देती है, जिसका मतलब है कि यह तेज रफ्तार गोलियों से भी सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

इसके अलावा इसमें आर्मर्ड रूफ दिया गया है, जिससे ऊपर से होने वाले हमलों से भी बचाव हो सके। इसमें रन-फ्लैट टायर सिस्टम भी लगाया गया है। इसका मतलब है कि अगर टायर खराब हो जाए या गोली लग जाए, तब भी गाड़ी कुछ दूरी तक चलती रह सकती है।

पूरे स्ट्रक्चर को इस तरह मजबूत बनाया गया है कि यह टक्कर और ब्लास्ट में भी अंदर बैठे लोगों को सुरक्षा दे सके। यह फीचर खास तौर पर हाई-रिस्क ऑपरेशन में काम आता है। (PAMA APC Armoured Vehicle)

कहां-कहां हो रही तैनाती

पामा-एपीसी को फिलहाल महाराष्ट्र पुलिस और अरुणाचल प्रदेश पुलिस में इस्तेमाल किया जा रहा है। कंपनी ने बताया कि अन्य राज्यों की पुलिस के साथ भी इस गाड़ी को लेकर बातचीत चल रही है और इसे जल्द ही और जगहों पर शामिल किया जा सकता है।

इस आर्मर्ड व्हीकल को कई तरह के ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। इसका इस्तेमाल जवानों को ले जाने, बॉर्डर पेट्रोलिंग, रेकॉनिसेंस यानी निगरानी मिशन और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में किया जा सकता है।

इसके अलावा संवेदनशील इलाकों में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। यह गाड़ी जरूरी उपकरण और सामान भी ले जा सकती है, जिससे ऑपरेशन के दौरान जवानों को अतिरिक्त सपोर्ट मिलता है।

PAMA APC Armoured Vehicle

लंबी दूरी तक ऑपरेशन की क्षमता

पामा-एपीसी एक बार में करीब 400 मील (लगभग 644 किमी) तक चल सकती है। इसे लंबे समय तक फील्ड में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका ब्रेकिंग सिस्टम भी मजबूत बनाया गया है, जिसमें आगे डिस्क ब्रेक और पीछे ड्रम ब्रेक दिए गए हैं। इससे गाड़ी को कंट्रोल करना आसान रहता है।

शील्ड आर्मरिंग प्राइवेट लिमिटेड मुंबई की एक कंपनी है, जो आर्मर्ड व्हीकल और बुलेटप्रूफ सॉल्यूशन बनाने के लिए जानी जाती है। कंपनी की शुरुआत 2011 में हुई थी और तब से यह डिफेंस, पुलिस, बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए काम कर रही है।

कंपनी के पास अहमदनगर में करीब 45,000 वर्ग फुट का मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है, जहां अलग-अलग तरह के आर्मर्ड व्हीकल तैयार किए जाते हैं। इसमें हल्के कंपोजिट आर्मर, मजबूत बैलिस्टिक स्टील और मल्टी-लेयर ग्लास का इस्तेमाल किया जाता है। कंपनी टोयोटा फॉर्च्यूनर, लैंड क्रूजर, मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू और रेंज रोवर जैसी गाड़ियों को भी बुलेटप्रूफ बनाने का काम करती है। (PAMA APC Armoured Vehicle)

राजनाथ सिंह का सख्त संदेश- आतंक पर अब भारत देगा जवाब, ऑपरेशन सिंदूर बना मिसाल

Operation Sindoor India Strategy

Operation Sindoor India Strategy: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की बदलती सुरक्षा नीति का उदाहरण बताते हुए कहा कि अब देश सिर्फ आतंकवादी हमलों के बाद बयान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर सीधे और सटीक कार्रवाई करने की क्षमता भी दिखा चुका है। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत अब पुराने तरीके से प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि हालात के अनुसार ठोस कदम उठाता है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने सिर्फ इरादे और बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस और निर्णायक कार्रवाई करके अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का रुख साफ है कि किसी भी हालत में आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर को इसी सख्त नीति का उदाहरण बताया।

Operation Sindoor India Strategy: लंबे समय से की थी ऑपरेशन सिंदूर की तैयारी

नई दिल्ली में आयोजित नेशनल सिक्योरिटी समिट में रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारत की तीनों सेनाओं थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच तालमेल और संयुक्त क्षमता का बड़ा उदाहरण रहा। उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन में तीनों सेनाओं ने एक साथ मिलकर काम किया और यह दिखाया कि अब भारतीय सेना अलग-अलग हिस्सों में नहीं, बल्कि मिलकर काम करती है।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को एक मजबूत संदेश देने वाला कदम बताया और कहा कि भले ही यह ऑपरेशन 72 घंटे में पूरा हो गया, लेकिन इसकी तैयारी लंबे समय तक की गई थी। उन्होंने कहा कि संसाधनों की उपलब्धता, हथियारों का भंडार और स्वदेशी तकनीक की विश्वसनीयता अब भारत की सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि इस ऑपरेशन को भारत ने अपने समय और अपनी शर्तों पर शुरू किया और अपनी शर्तों पर ही रोका। इसके दौरान केवल उन्हीं लक्ष्यों को निशाना बनाया गया, जो हमले से जुड़े थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन को इसलिए नहीं रोका गया क्योंकि संसाधन खत्म हो गए थे, बल्कि यह पूरी तरह रणनीति के तहत लिया गया फैसला था।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के पास ऐसी क्षमता है कि जरूरत पड़ने पर तेजी से अपने संसाधनों को बढ़ा सकता है। इस दौरान देश ने किसी भी तरह के दबाव या धमकी के आगे झुकने की बजाय अपने तय लक्ष्य को हासिल किया।

आतंकवाद को बताया पूरी मानवता के लिए खतरा

रक्षा मंत्री ने कहा कि आतंकवाद एक विकृत सोच से पैदा होता है और यह मानवता पर एक काला दाग है। उनके अनुसार, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह इंसानियत के मूल मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी खतरनाक विचारधारा के खिलाफ संघर्ष है, जो मानव मूल्यों के खिलाफ जाती है, और भारत ने इस सोच को देश और दुनिया दोनों के सामने रखा है।

उन्होंने आगे कहा कि जब तक आतंकवाद मौजूद रहेगा, तब तक यह शांति, विकास और समृद्धि के लिए चुनौती बना रहेगा। कई बार आतंकवाद को धर्म का रंग देकर या नक्सलवाद जैसी विचारधाराओं से जोड़कर सही ठहराने की कोशिश की जाती है, जो बेहद खतरनाक है। उनके मुताबिक इससे आतंकियों को आगे बढ़ने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद केवल देश विरोधी गतिविधि नहीं है, बल्कि इसके कई पहलू ऑपरेशनल, वैचारिक और राजनीतिक होते हैं। इन सभी पहलुओं पर एक साथ काम करके ही इससे निपटा जा सकता है।

इंटरनेशनल टेररिज्म के प्रसिद्ध है पाकिस्तान

अपने भाषण के दौरान रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान का जिक्र करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान एक ही समय पर आजाद हुए थे, लेकिन आज दोनों की पहचान अलग-अलग है। उन्होंने कहा कि भारत को दुनिया में इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के लिए जाना जाता है, जबकि पाकिस्तान को इंटरनेशनल टेररिज्म से जोड़ा जाता है।

स्वदेशी हथियारों पर बढ़ा भरोसा

रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया में भारत के स्वदेशी हथियारों और डिफेंस सिस्टम पर भरोसा बढ़ा है। उन्होंने बताया कि कई देशों ने भारत के रक्षा उपकरणों में रुचि दिखाई है।

उन्होंने आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट 38,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत के डिफेंस प्रोडक्ट्स को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया जा रहा है।

बदल रहा युद्ध का स्वरूप

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के समय में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब केवल पारंपरिक हथियारों से काम नहीं चलता, बल्कि साइबर, स्पेस और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी भी इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई इस बदलाव के केंद्र में है। इसके जरिए निगरानी, टारगेट की पहचान और सटीक हमले करने की क्षमता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि कई ऑपरेशन ऐसे होते हैं जो सामने नहीं आते, लेकिन एआई की मदद से पहले ही खतरे को पहचानकर रोका जाता है।

सेना में किए कई बदलाव

रक्षा मंत्री ने बताया कि भारतीय सेना अब तकनीक आधारित फोर्स बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसके तहत नई तरह की यूनिट्स जैसे रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन और शक्तिबाण आर्टिलरी रेजिमेंट बनाई जा रही हैं।

इन यूनिट्स को इस तरह तैयार किया गया है कि वे तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें और बदलते हालात में तुरंत काम कर सकें।

सुदर्शन एयर डिफेंस सिस्टम में मशीन लर्निंग और बिग डेटा जैसी तकनीकें

रक्षा मंत्री ने सुदर्शन एयर डिफेंस सिस्टम का भी जिक्र किया और कहा कि यह एआई के इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण है। इसमें मशीन लर्निंग और बिग डेटा जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे सेना की क्षमता को बेहतर किया जा सके।

उन्होंने बताया कि इस तरह के सिस्टम से सेना को तेजी से निर्णय लेने और बदलते हालात में प्रतिक्रिया देने में मदद मिलती है।

रक्षा सचिव का बड़ा बयान, भारत ने बदली अपनी मिसाइल पॉलिसी, “कन्वेंशनल डिटरेंस” पर फोकस

India Conventional Missile Force
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh (File Photo)

India Conventional Missile Force: रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भारत की डिफेंस स्ट्रेटेजी में अहम बदलाव के संकेत दिए हैं। अब तक मिसाइलों को मुख्य रूप से न्यूक्लियर डिटरेंस यानी परमाणु ताकत के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अब सरकार ने साफ किया है कि यह सोच बदल रही है। रक्षा सचिव ने कहा है कि बदलते वैश्विक हालात और पड़ोसी देशों की गतिविधियों को देखते हुए भारत अब कन्वेंशनल मिसाइल फोर्स यानी पारंपरिक मिसाइल क्षमता को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।

रक्षा सचिव का यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है और मिसाइलों का इस्तेमाल सिर्फ परमाणु हथियार के तौर पर नहीं, बल्कि सीधे युद्ध के मैदान में भी हो रहा है।

India Conventional Missile Force: बदल रहा है मिसाइलों को देखने का नजरिया

नई दिल्ली में आयोजित एक कर्यक्रम में रक्षा सचिव ने साफ शब्दों में कहा कि पहले यह माना जाता था कि मिसाइलों का इस्तेमाल ज्यादातर स्ट्रैटेजिक उद्देश्यों के लिए होगा, लेकिन अब यह “पैराडाइम” बदल चुका है। इसका मतलब यह है कि अब मिसाइलें सिर्फ न्यूक्लियर बैकअप के तौर पर नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में सीधे इस्तेमाल के लिए भी तैयार की जाएंगी।

उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और पाकिस्तान की तरफ से पारंपरिक मिसाइल क्षमता बढ़ाने की कोशिशों ने भारत को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।

अब मिसाइलों को सिर्फ दूर से डर दिखाने वाले हथियार के तौर पर नहीं, बल्कि सीधे युद्ध के दौरान इस्तेमाल होने वाले हथियार के रूप में देखा जा रहा है।

पिछले कुछ समय में वेस्ट एशिया में हुए संघर्षों ने यह दिखाया है कि मिसाइल और ड्रोन अब युद्ध का मुख्य हिस्सा बन चुके हैं। इजरायल-ईरान के बीच तनाव, हूती हमले और अन्य घटनाओं में देखा गया कि पारंपरिक मिसाइलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि बिना परमाणु हथियारों के भी मिसाइलों के जरिए बड़े सैन्य और रणनीतिक लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

पाकिस्तान बढ़ा रहा मिसाइल क्षमता

रक्षा सचिव ने यह भी संकेत दिया कि पाकिस्तान लगातार अपनी मिसाइल ताकत को बढ़ा रहा है।

पाकिस्तान की बाबर, राद और शाहीन जैसी मिसाइलें जैसी मिसाइलें अब सिर्फ स्ट्रैटेजिक नहीं बल्कि कन्वेंशनल रोल में भी इस्तेमाल के लिए तैयार की जा रही हैं। ऐसे में भारत के लिए भी अपनी क्षमता को उसी स्तर पर ले जाना जरूरी हो गया है।

“कन्वेंशनल मिसाइल फोर्स” का क्या है मतलब

कन्वेंशनल मिसाइल फोर्स का मतलब है ऐसी मिसाइलें जो बिना न्यूक्लियर वॉरहेड के इस्तेमाल की जाएं, लेकिन उनकी मारक क्षमता और सटीकता इतनी ज्यादा हो कि वे बड़े सैन्य ठिकानों, एयरबेस, कमांड सेंटर और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को नुकसान पहुंचा सकें। इस तरह की फोर्स का मकसद दुश्मन पर दबाव बनाना होता है, ताकि बिना न्यूक्लियर एस्केलेशन के ही युद्ध में बढ़त हासिल की जा सके। इसे “मिसाइल-बेस्ड कन्वेंशनल डिटरेंस” भी कहा जाता है।

अब उत्पादन बढ़ाने पर जोर

सरकार ने यह भी साफ किया है कि मिसाइल उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जाएगा। अब तक मिसाइल निर्माण में मुख्य रूप से डीआरडीओ और एक पब्लिक सेक्टर यूनिट पर ज्यादा निर्भरता रही है। लेकिन अब इस व्यवस्था को बदलने की तैयारी है। रक्षा सचिव ने कहा कि उत्पादन को बढ़ाने के लिए पूरे इंडस्ट्री सेक्टर को इसमें शामिल किया जाएगा। निजी कंपनियों को भी इस क्षेत्र में ज्यादा भूमिका दी जाएगी, ताकि उत्पादन तेजी से बढ़ सके।

वहीं, पहले रक्षा परियोजनाओं में लंबा समय सिर्फ मंजूरी और प्रक्रिया में लग जाता था। अब सरकार इस सिस्टम को बदल रही है। डिफेंस सेक्रेटरी के मुताबिक, फोर्स तैयार करने की प्रक्रिया और इंडस्ट्री को सप्लाई ऑर्डर देने का काम साथ-साथ चलेगा।

इसका फायदा यह होगा कि जब तक फोर्स औपचारिक रूप से तैयार होगी, तब तक मिसाइलों का पर्याप्त स्टॉक भी उपलब्ध रहेगा। यह मॉडल तेज और अधिक प्रभावी माना जा रहा है।

“सुदर्शन चक्र मिशन” का किया जिक्र

इस दौरान प्रधानमंत्री द्वारा घोषित सुदर्शन चक्र मिशन का भी जिक्र किया गया। यह एक मल्टीलेयर एयर डिफेंस और ऑफेंसिव सिस्टम के रूप में देखा जा रहा है। इस मिशन पर काम शुरू हो चुका है और डीआरडीओ चेयरमैन की अगुवाई में इस मिशन की प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट पहले ही तैयार हो चुकी है और इसे आगे बढ़ाने पर काम चल रहा है। इसका उद्देश्य एक ऐसा नेटवर्क बनाना है, जिसमें एयर डिफेंस, रडार और मिसाइल सिस्टम एक साथ काम करें।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई कॉन्ट्रैक्ट्स में तेजी

डिफेंस सेक्रेटरी ने बताया कि हाल के ऑपरेशनों और संघर्षों से कई महत्वपूर्ण सबक मिले हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने करीब 30,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट्स दिए, जिनमें ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, लॉइटरिंग म्यूनिशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले ढाई साल में करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये के रक्षा सौदे किए गए हैं। रक्षा मंत्रालय अब फास्ट-ट्रैक प्रोक्योरमेंट पर भी काम कर रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि जरूरत के हिसाब से हथियार और सिस्टम जल्दी खरीदे जा सकें। यह भी बताया कि मौजूदा प्रक्रिया के अंदर रहते हुए भी काम को तेज किया जा सकता है, अगर उसे सही तरीके से आगे बढ़ाया जाए।

भारतीय सेना को चाहिए आकाशतीर के साथ 83 नए डिफेंस कैरियर, जो टैंकों के साथ चलते हुए दुश्मन को करेगा ट्रैक

Akashteer CADET Air Defence Carriers
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Akashteer CADET Air Defence Carriers: भारतीय सेना ने अपनी मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन्स की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 83 कैरियर एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम (CADET) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। ये खास ट्रैक्ड व्हीकल होंगे, जिन पर ‘आकाशतीर’ एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम लगाया जाएगा। इसका मकसद युद्ध के मैदान में टैंक और आर्मर्ड यूनिट्स को एरियल थ्रेट्स से सुरक्षा देना है।

Akashteer CADET Air Defence Carriers: क्या है ‘आकाशतीर’ सिस्टम

आकाशतीर’ एक एडवांस्ड एयर डिफेंस कमांड एंड रिपोर्टिंग सिस्टम है, जिसे डीआडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम अलग-अलग रडार, सेंसर और हथियारों को एक ही नेटवर्क में जोड़ता है।

यह सिस्टम युद्ध के दौरान आसमान में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखता है और तुरंत जानकारी संबंधित यूनिट्स तक पहुंचाता है। इससे फैसले जल्दी लिए जा सकते हैं और खतरे का जवाब तुरंत दिया जा सकता है।

क्यों लगाया जा रहा है ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर

अब तक एयर डिफेंस के कई सिस्टम फिक्स्ड या व्हील्ड प्लेटफॉर्म पर चलते थे। लेकिन समस्या यह थी कि ये टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स के साथ हर इलाके में बराबर रफ्तार से नहीं चल पाते थे। टैंक जहां ऊबड़-खाबड़ इलाकों, रेगिस्तान या पहाड़ों में आसानी से आगे बढ़ते हैं, वहीं व्हील्ड सिस्टम कई बार पीछे रह जाते थे।

इसी वजह से अब ‘आकाशतीर’ को ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर लगाया जा रहा है। ये प्लेटफॉर्म टैंकों की तरह ही मुश्किल इलाकों में चल सकते हैं।

कैसे काम करेगा CADET सिस्टम

कैडेट को एक तरह से मोबाइल कमांड पोस्ट माना जा रहा है। यह सीधे आर्मर्ड कॉलम के साथ रहेगा और एयर डिफेंस यूनिट्स को रियल टाइम में जानकारी देता रहेगा। जब कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या फाइटर जेट जैसे खतरे सामने आएंगे, तो यह सिस्टम तुरंत उनकी जानकारी देगा और हथियारों को एक्टिव करने में मदद करेगा। इससे युद्ध के दौरान प्रतिक्रिया देने का समय काफी कम हो जाएगा और यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित रह सकेंगी। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

ड्रोन खतरों को ध्यान में रखकर किया डिजाइन

पिछले कुछ सालों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदला है। अब छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कैडेट प्लेटफॉर्म को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि भविष्य में इसमें ड्रोन डिटेक्शन और ड्रोन काउंटर सिस्टम भी जोड़े जा सकें। इससे यह सिस्टम सिर्फ पारंपरिक खतरों के लिए नहीं, बल्कि नए तरह के युद्ध के लिए भी तैयार रहेगा।

इसमें आकाशतीर सिस्टम के सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए जाएंगे, जिन्हें सेना खुद उपलब्ध कराएगी। यह वाहन टैंकों की तरह ही हर तरह के मैदानी इलाकों, रेगिस्तान और पहाड़ों में 5000 मीटर ऊंचाई तक आसानी से चल सकेगा।

इस ट्रैक्ड व्हीकल को बेहद कठिन हालात में काम करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। यह माइनस 30 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकेगा।

यह एक बार में 300 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकता है। सड़क पर इसकी गति करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि कठिन इलाकों में यह करीब 15 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकेगा।

इसमें कम से कम चार लोगों की टीम बैठ सकेगी और उनके लिए अंदर क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम भी होगा, ताकि हर मौसम में काम करना आसान रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

Akashteer
Akashteer System (Pic: Indian Army)

सुरक्षा और पावर सिस्टम

कैडेट में STANAG लेवल-2 बैलिस्टिक प्रोटेक्शन भी दिया जाएगा, जिससे यह गोलीबारी और हमलों से कुछ हद तक सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा इसमें एक अलग पावर यूनिट होगी, जो बिना मुख्य इंजन चालू किए भी सिस्टम को करीब छह घंटे तक चला सकेगी। यह सुविधा खासतौर पर तब काम आएगी, जब व्हीकल को किसी एक जगह पर खड़े रहकर निगरानी करनी हो।

इस प्लेटफॉर्म में आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, जो जीपीएस, ग्लोनास और भारत के नाविक सिस्टम से जुड़ेंगे। इससे यह हर स्थिति में अपनी लोकेशन को सटीक तरीके से ट्रैक कर सकेगा। साथ ही, इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी सिस्टम को जैमिंग से बचाया जा सके। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। इसके तहत 83 सिस्टम खरीदे जाएंगे।
इनकी डिलीवरी एडवांस पेमेंट के बाद 36 महीने के अंदर पूरी करनी होगी। अगर दो कंपनियां इस प्रक्रिया में योग्य पाई जाती हैं, तो ऑर्डर को 60 और 40 प्रतिशत के अनुपात में बांटा जाएगा। इन सिस्टम्स की वारंटी 24 महीने की होगी और इन्हें करीब 20 साल तक इस्तेमाल करने के हिसाब से डिजाइन किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट को ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ कैटेगरी के तहत रखा गया है। इसका मतलब है कि इसमें कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही डिजाइन और बनाया जाएगा। इससे देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

सेना के लिए क्यों जरूरी है यह सिस्टम

सेना की मैकेनाइज्ड यूनिट्स टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स युद्ध के दौरान सबसे आगे रहते हैं। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें हवाई हमलों से तुरंत सुरक्षा न मिले, तो उन्हें भारी नुकसान हो सकता है। कैडेट और ‘आकाशतीर’ सिस्टम मिलकर इस कमी को पूरा करेंगे। ये सिस्टम सीधे फ्रंटलाइन पर मौजूद रहकर हर तरह के हवाई खतरे की जानकारी देंगे और उससे निपटने में मदद करेंगे।

इस प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि इसे एयरलिफ्ट भी किया जा सके। यह बड़े सैन्य विमान जैसे सी-17 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में आसानी से ले जाया जा सकेगा। इससे जरूरत पड़ने पर इसे किसी भी इलाके में जल्दी तैनात किया जा सकता है। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

बदलते युद्ध के अनुसार तैयारी

सेना अब अपने सिस्टम्स को मॉडर्न वॉरफेयर को देखते हुए तैयार कर रही है। आज के समय में नेटवर्क आधारित युद्ध, रियल टाइम डेटा और तुरंत जवाबी कार्रवाई आज की जरूरत बन चुके हैं। कैडेट और ‘आकाशतीर’ इसी दिशा में एक अहम कदम माने जा रहे हैं, जहां जमीन पर चल रही यूनिट्स को आसमान से होने वाले खतरों के खिलाफ लगातार सुरक्षा मिलती रहे। (Akashteer CADET Air Defence Carriers)

क्या है हेलीकॉप्टर से दागी जाने वाली मिसाइल NASM-SR? और जानें सल्वो लॉन्च क्यों है बेहद अहम

DRDO NASM-SR Missile Test
DRDO NASM-SR Missile Test

DRDO NASM-SR Missile Test: भारत ने समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बंगाल की खाड़ी में स्वदेशी एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम का सफल परीक्षण किया है। डीआरडीओ और भारतीय नौसेना ने मिलकर नौसेना एंटी-शिप मिसाइल-शॉर्ट रेंज (NASM-SR) का पहला सल्वो लॉन्च सफलतापूर्वक किया। यह परीक्षण ओडिशा के तट के पास किया गया, जहां नौसेना के हेलीकॉप्टर से एक साथ दो मिसाइलें दागी गईं।

इस टेस्ट में एक ही हेलीकॉप्टर से दो मिसाइलें तेजी से दागी गईं। यह भारत का पहला ऐसा परीक्षण है जिसमें एयर-लॉन्च्ड एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम को सल्वो मोड में इस्तेमाल किया गया। दोनों ने अपने लक्ष्य को सटीक तरीके से हिट किया।

DRDO NASM-SR Missile Test: क्या है NASM-SR

NASM-SR एक शॉर्ट रेंज एंटी-शिप मिसाइल है, जिसे खास तौर पर दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे हेलीकॉप्टर से लॉन्च किया जा सकता है।

इसका मतलब है कि नौसेना को अब समुद्र में किसी जहाज के पास जाकर सीधे हमला करने की जरूरत नहीं होगी। हेलीकॉप्टर हवा में रहते हुए ही दूर से मिसाइल दाग सकता है और टारगेट को हिट कर सकता है।

यह मिसाइल पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और इसे डीआरडीओ की अलग-अलग लैब्स और भारतीय इंडस्ट्री के सहयोग से डेवलप किया गया है। (DRDO NASM-SR Missile Test)

क्या होता है सल्वो लॉन्च और क्यों जरूरी है

इस परीक्षण का सबसे अहम हिस्सा सल्वो लॉन्च था। आसान भाषा में समझें तो सल्वो लॉन्च का मतलब है कि एक ही प्लेटफॉर्म से बहुत कम समय के अंतराल में एक से ज्यादा मिसाइलें दागना।

इसका फायदा यह होता है कि दुश्मन के पास प्रतिक्रिया देने का समय बहुत कम रह जाता है। अगर एक मिसाइल को इंटरसेप्ट भी कर लिया जाए, तो दूसरी मिसाइल टारगेट तक पहुंच सकती है।

इस टेस्ट में दो मिसाइलें एक ही हेलीकॉप्टर से लगातार दागी गईं। यानी कि भारत अब इस तरह के मल्टी-शॉट अटैक करने में सक्षम है। (DRDO NASM-SR Missile Test)

परीक्षण में हासिल किए गए सभी लक्ष्य

डीआरडीओ के मुतबिक इस परीक्षण के दौरान तय किए गए सभी टारगेट पूरे हुए। परीक्षण के दौरान मिसाइलों की ट्रैकिंग के लिए अलग-अलग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। इनमें रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम और टेलीमेट्री जैसे उपकरण शामिल थे, जिन्हें चांदीपुर की इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में तैनात किया गया था। इन सिस्टम्स के जरिए मिसाइल की दिशा, रफ्तार और टाारगेट पर हमले की पुष्टि की गई।

इस टेस्ट के दौरान मिसाइलों ने पानी की सतह के पास यानी वाटरलाइन पर टारगेट को हिट करने की क्षमता भी दिखाई। यह क्षमता समुद्री युद्ध में काफी अहम मानी जाती है क्योंकि इससे जहाज को ज्यादा नुकसान पहुंचता है और उसके डूबने की संभावना बढ़ जाती है। (DRDO NASM-SR Missile Test)

हेलीकॉप्टर से लॉन्च होने वाली मिसाइल

NASM-SR एक ऐसी मिसाइल है जिसे खास तौर पर हेलीकॉप्टर से लॉन्च करने के लिए तैयार किया गया है। इसे हवा में उड़ रहे हेलीकॉप्टर से दुश्मन के जहाजों पर दागा जा सकता है।

इस तरह के सिस्टम से नौसेना को ज्यादा फायदा मिलता है क्योंकि हेलीकॉप्टर तेजी से किसी भी दिशा में जाकर हमला कर सकता है। इससे समुद्र में निगरानी और हमला दोनों आसान हो जाते हैं।

कैसे काम करती है मिसाइल

NASM-SR में सॉलिड प्रोपल्शन बूस्टर और लॉन्ग बर्न सस्टेनर इंजन लगाया गया है। लॉन्च के समय बूस्टर मिसाइल को तेजी से आगे बढ़ाता है और उसके बाद सस्टेनर इंजन इसे लगातार रफ्तार देता रहता है।

मिसाइल के अंदर एडवांस नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम लगाए गए हैं। इसमें फाइबर ऑप्टिक जाइरोस्कोप आधारित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और रेडियो अल्टीमीटर का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह अपनी ऊंचाई और दिशा को सही बनाए रखती है।

इसके साथ ही इसमें हाई-बैंडविड्थ टू-वे डेटा लिंक दिया गया है, जिससे मिसाइल और हेलीकॉप्टर के बीच जानकारी का आदान-प्रदान होता रहता है। (DRDO NASM-SR Missile Test)

पूरी तरह स्वदेशी तकनीक

इस मिसाइल के सभी महत्वपूर्ण सिस्टम भारत में ही विकसित किए गए हैं। डीआरडीओ की अलग-अलग लैब्स और भारतीय इंडस्ट्री ने मिलकर इसे तैयार किया है। इसमें रिसर्च सेंटर इमारत, डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी, हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी और टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी शामिल हैं।

इसके अलावा भारतीय इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। प्रोडक्शन के लिए डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर्स के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। (DRDO NASM-SR Missile Test)

भारतीय सेना ने बदला ऑफिसर बनने का नियम, जानें SSB प्रोसेस में क्या हुआ बड़ा बदलाव

Indian Army SSB Test Update
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Indian Army SSB Test Update: भारतीय सेना में अफसर बनने की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। सर्विस सिलेक्शन बोर्ड यानी एसएसबी के जरिए होने वाले सिलेक्शन प्रोसेस को अब पहले से ज्यादा आधुनिक और पारदर्शी बनाने की तैयारी चल रही है। इसी कड़ी में एसएसबी के पहले चरण को कंप्यूटर बेस्ड करने का फैसला लिया गया है। इसके साथ ही टेक्निकल ग्रेजुएट्स के लिए भी अब एक नया एंट्रेंस एग्जाम शुरू किया जाएगा।

भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए एसएसबी एक अहम विकल्प है। इसमें उम्मीदवार की मानसिक क्षमता, लीडरशिप क्वालिटी, निर्णय लेने की क्षमता और व्यक्तित्व का पूरा आकलन किया जाता है। कई युवा इसे अपने करियर का सबसे कठिन और अहम टेस्ट मानते हैं। वहीं, अब इस प्रक्रिया में बदलाव करके इसे और ज्यादा सटीक और पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा रही है। (Indian Army SSB Test Update)

Indian Army SSB Test Update: पहला चरण अब कंप्यूटर बेस्ड

अभी तक एसएसबी की पहले चरण में कैंडिडेट्स को पेपर बेस्ड टेस्ट देना होता था। इसमें ऑफिसर इंटेलिजेंस रेटिंग (OIR) टेस्ट और पिक्चर परसेप्शन एंड डिस्क्रिप्शन टेस्ट (PPDT) शामिल होते थे।

लेकिन अब इसे बदलकर कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) किया जा रहा है। इस नए सिस्टम को कम्प्यूटराइज्ड स्टेज-1 सिलेक्शन सिस्टम कहा जा रहा है। इसमें उम्मीदवारों को कंप्यूटर स्क्रीन पर सवालों के जवाब देने होंगे।

इस टेस्ट में कैंडिडेट्स की कॉग्निटिव स्किल्स यानी मानसिक क्षमता और पर्सनैलिटी से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे। इसमें स्पेस परसेप्शन, मेमोरी, अटेंशन और डिसीजन मेकिंग जैसे पहलुओं को परखा जाएगा।

इस बदलाव से चयन प्रक्रिया तेज होने के साथ-साथ मानवीय गलतियों की संभावना भी कम होगी। इससे रिजल्ट तैयार करने में भी कम समय लगेगा। (Indian Army SSB Test Update)

टेक्निकल ग्रेजुएट्स के लिए नया एग्जाम

वहीं, अब तक टेक्निकल ग्रेजुएट्स यानी इंजीनियरिंग करने वाले छात्रों को उनके मार्क्स के आधार पर सीधे एसएसबी के लिए बुलाया जाता था। उनके लिए कोई लिखित परीक्षा नहीं होती थी।

लेकिन अब इस व्यवस्था में बदलाव किया जा रहा है। अगले साल से टेक्निकल एंट्री के लिए भी एक अलग एंट्रेंस एग्जाम होगा, जिसे कम्बाइंड डिफेंस सर्विसेज टेक्निकल एक्जामिनेशन (CDSTE) कहा जाएगा।

यह परीक्षा यूपीएससी के जरिए कराई जाएगी और इसमें पास होने के बाद ही उम्मीदवार एसएसबी में जा सकेंगे। यह नियम परमानेंट कमीशन और शॉर्ट सर्विस कमीशन दोनों तरह की एंट्री पर लागू होगा।

क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव

सेना के भर्ती निदेशालय के अनुसार, पिछले कुछ समय से यह देखा गया कि कई प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों में छात्रों को ज्यादा नंबर दिए जाते हैं। इससे बड़ी संख्या में उम्मीदवार एसएसबी के लिए बुलाए जाते थे।

जब ये उम्मीदवार एसएसबी में पहुंचते थे, तो पहले ही चरण में बड़ी संख्या में बाहर हो जाते थे। इससे एसएसबी सेंटर पर भीड़ बढ़ रही थी और चयन प्रक्रिया पर दबाव पड़ रहा था।

इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया कि पहले ही एक लिखित परीक्षा के जरिए योग्य उम्मीदवारों को चुना जाए। (Indian Army SSB Test Update)

एनसीसी कैडेट्स को मिलेगा फायदा

भर्ती प्रक्रिया में एनसीसी कैडेट्स के लिए भी कुछ बदलाव किए गए हैं। जिन उम्मीदवारों के पास एनसीसी का ‘सी’ सर्टिफिकेट है, उन्हें बोनस मार्क्स दिए जाएंगे। इससे उन उम्मीदवारों को फायदा मिलेगा जिन्होंने एनसीसी के जरिए पहले से मिलिट्री ट्रेनिंग ली है। यह व्यवस्था मेरिट लिस्ट तैयार करने में मदद करेगी। (Indian Army SSB Test Update)

एसएसबी प्रक्रिया को आधुनिक बनाने पर जोर

सेना अब पूरी चयन प्रक्रिया को मॉडर्न बनाने पर काम कर रही है। इसके तहत रिजल्ट तैयार करने में ऑटोमेशन बढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा कैंडिडेट्स के मूल्यांकन के लिए टैबलेट जैसे डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। इनका ट्रायल पूरा हो चुका है और इन्हें जल्द ही बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी है।

इन सभी बदलावों का मुख्य मकसद एसएसबी सेंटर पर होने वाली भीड़ को कम करना और चयन प्रक्रिया को ज्यादा प्रभावी बनाना है। अब पहले ही चरण में लिखित परीक्षा और कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट के जरिए उम्मीदवारों की छंटनी हो जाएगी। इससे आगे के चरणों में वही उम्मीदवार पहुंचेंगे, जिनमें जरूरी योग्यता होगी।

एसएसबी की प्रक्रिया में यह बदलाव लंबे समय बाद किया जा रहा है। सेना की भर्ती प्रणाली में इसे एक बड़ा सुधार माना जा रहा है। (Indian Army SSB Test Update)