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दिल्ली में जुटेंगे दुनिया के टॉप सैन्य और नीति दिग्गज, सीडीएस समेत तीनों सेनाओं के प्रमुख और विदेशी एक्सपर्ट दिखेंगे एक मंच पर

Synergia Conclave 2026

Synergia Conclave 2026: भारत की राजधानी में मार्च 2026 के दूसरे सप्ताह में एक अहम ग्लोबल स्ट्रेटेजिक कॉन्क्लेव आयोजित होने जा रहा है, जिसमें देश और दुनिया के बड़े नीति निर्माता, सैन्य अधिकारी, टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट और उद्योग जगत के नेता शामिल होंगे। सिनर्जिया कॉन्क्लेव 2026, 11 से 13 मार्च के बीच आयोजित होगा और इसका फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऊर्जा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और वैश्विक रणनीति जैसे अहम मुद्दों पर रहेगा। आयोजन का उद्देश्य सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति निर्माण और भविष्य की रणनीति को दिशा देना है।

यह कार्यक्रम ऐसे समय में आयोजित किया जा रहा है जब दुनिया तेजी से बदल रही है। टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है, जबकि नीतियां और नियम उससे पीछे रह जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन और साइबर खतरों जैसे मुद्दे अब पहले से ज्यादा जटिल हो चुके हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है और देशों के बीच आर्थिक व तकनीकी प्रतिस्पर्धा भी तेज हो गई है। ऐसे में यह सम्मेलन नीति निर्माताओं को एक साझा मंच देता है, जहां वे इन चुनौतियों को समझकर आगे की रणनीति तय कर सकें।

सिनर्जिया फाउंडेशन के फाउंडर और प्रेसिडेंट टोबी सिमोन ने कॉन्क्लेव को लेकर बताया, “हम ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां टेक्नोलॉजी और बदलाव की रफ्तार बहुत तेज हो गई है। एआई, एनर्जी ट्रांजिशन और जियो-इकोनॉमिक बदलाव, संस्थानों की क्षमता से भी तेज आगे बढ़ रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “रणनीतिक बढ़त केवल भविष्य की भविष्यवाणी से नहीं मिलेगी, बल्कि मजबूत और भरोसेमंद सिस्टम तैयार करने से मिलेगी। सिनर्जिया कॉन्क्लेव का मकसद चर्चा से आगे बढ़कर एक्शन पर फोकस करना है।”

इस कॉन्क्लेव का आयोजन सिनर्जिया फाउंडेशन कर रही है, जो बेंगलुरु स्थित एक स्ट्रेटेजिक थिंक टैंक है। यह संस्था सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और वैश्विक नीति से जुड़े मुद्दों पर काम करती है और सरकार, उद्योग और विशेषज्ञों के साथ मिलकर रणनीतिक समाधान तैयार करती है।

इस बार इस कॉन्क्लेव में देश के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी, चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी, और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह भी हिस्सा लेंगे। उनके साथ भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी भी मौजूद होंगे। पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन भी इसमें भाग ले रहे हैं।

इसके अलावा नीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ विशेषज्ञ मोंटेक सिंह आहलूवालिया भी इस मंच का हिस्सा हैं, जो पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अहम नामों में आलोक जोशी शामिल हैं, जो नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन और रॉ के पूर्व प्रमुख भी रह चुके हैं।

इसके अलावा इसमें कई देशों के बड़े नाम भी शामिल हो रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी मेजर जनरल क्रिस स्मिथ, अमेरिका के पूर्व नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर लेफ्टिनेंट जनरल माइकल फ्लिन, श्रीलंका के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल शवेंद्र सिल्वा, इजराइल की स्पेशल फोर्स यूनिट सायेरेट मतकल के पूर्व कमांडर और केनेसट के सदस्य भी इस मंच का हिस्सा होंगे।

वहीं, इस कॉन्क्लेव के लिए नई दिल्ली को चुना जाना भी एक रणनीतिक फैसला माना जा रहा है। राजधानी में ही देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और प्रशासन से जुड़े बड़े फैसले लिए जाते हैं। यहां सम्मेलन आयोजित करने से अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलेगी और राष्ट्रीय स्तर पर फैसलों को तेजी से लागू करने की दिशा में काम हो सकेगा।

सिनर्जिया फाउंडेशन के चीफ स्ट्रेटेजिक ऑफिसर, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जीए वी रेड्डी ने बताया कि यह सम्मेलन तीन दिनों तक चलेगा और हर दिन का अलग फोकस तय किया गया है। पहले दिन वैश्विक हालात को समझने और एक साझा तस्वीर बनाने पर जोर रहेगा। दूसरे दिन अनिश्चितताओं को अवसर में बदलने पर चर्चा होगी, जबकि तीसरे दिन ठोस रणनीति और ढांचा तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा।

इस तरह यह कार्यक्रम सिर्फ विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ठोस नीतिगत दिशा देने की कोशिश करेगा।

सिनर्जिया फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक ऑफिसर, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पी एस मिन्हास के मुताबिक, दिल्ली में इस कॉन्क्लेव का आयोजन पहली बार किया जा रहा है, क्योंकि यहां राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक नीति और कूटनीति से जुड़े फैसले एक साथ जुड़ते हैं। उन्होंने कहा, “दिल्ली वह जगह है जहां नीतियां बनती हैं और उन्हें लागू किया जाता है। ऐसे में यहां इस तरह का कॉन्क्लेव होना इसे और प्रभावी बनाता है।”

कॉन्क्लेव में कई बड़े रणनीतिक विषयों पर चर्चा होगी। इसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रभाव, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा भविष्य की टेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन और राष्ट्रीय शक्ति के नए स्वरूप पर भी बात की जाएगी। इन विषयों को आपस में जोड़कर देखा जाएगा, ताकि एक समग्र रणनीति तैयार की जा सके।

इस कॉन्क्लेव की एक खास बात यह है कि यहां केवल बातचीत नहीं होगी, बल्कि समाधान पर भी जोर रहेगा। अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ मिलकर ऐसे मॉडल और रास्ते तैयार करेंगे, जिन्हें आगे लागू किया जा सके।

इसमें क्रॉस-डोमेन स्ट्रेस टेस्टिंग, अर्ली वार्निंग सिस्टम, और पॉलिसी फ्रेमवर्क जैसे मुद्दों पर भी काम होगा, ताकि भविष्य के संकटों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके।

इस कॉन्फ्रेंस के दौरान कई अहम रिपोर्ट्स भी जारी की जाएंगी। इनमें “ग्लोबल फ्यूचर्स 2035”, “इंडियाज सिक्योरिटी फ्रॉम सीबेड टू स्पेस”, “क्वांटम अनलॉक्ड”, “कोविड कम्पेंडियम” और “6जी स्ट्रेटेजिक फ्रंटियर” जैसी रिपोर्ट्स शामिल हैं। इन रिपोर्ट्स में भविष्य की टेक्नोलॉजी, राष्ट्रीय सुरक्षा, और वैश्विक रणनीति से जुड़े मुद्दों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है, जो आने वाले समय में नीति निर्माण में मदद कर सकते हैं।

5,083 करोड़ की मेगा डील, कोस्ट गार्ड को मिलेंगे ALH Mk-III सुपर हेलिकॉप्टर, नेवी को घातक VL-Shtil मिसाइलें

ALH Mk-III and VL-Shtil Deal

ALH Mk-III and VL-Shtil Deal: भारत सरकार ने अपनी समुद्री सुरक्षा और वायु रक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए 5,083 करोड़ रुपये के दो अहम रक्षा कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं। इस डील के तहत भारतीय कोस्ट गार्ड के लिए एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर (ALH) Mk-III (मैरीटाइम रोल) और भारतीय नौसेना के लिए वर्टिकल लॉन्च श्टिल मिसाइल सिस्टम खरीदे जाएंगे। इन दोनों प्रोजेक्ट्स का मकसद समुद्री सुरक्षा, निगरानी और एयर डिफेंस क्षमता को और मजबूत करना है।

ALH Mk-III and VL-Shtil Deal: कोस्ट गार्ड को मिलेंगे आधुनिक हेलिकॉप्टर

इस डील का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय कोस्ट गार्ड के लिए है। करीब 2,901 करोड़ रुपये की लागत से 6 ट्विन-इंजन एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर एमके-III (MR) हेलिकॉप्टर खरीदे जाएंगे। ये हेलिकॉप्टर हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड से खरीदे जा रहे हैं और “बॉय (इंडियन-आईडीडीएम)” कैटेगरी के तहत आते हैं, जिसका मतलब है कि इनमें ज्यादातर तकनीक भारत में ही डिजाइन और विकसित की गई है।

ये हेलिकॉप्टर समुद्र से जुड़े कई अहम मिशनों के लिए इस्तेमाल होंगे। इनमें सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन, समुद्री निगरानी, मछुआरों की सुरक्षा, ऑफशोर इंस्टॉलेशन की सुरक्षा और पर्यावरण निगरानी जैसे काम शामिल हैं। इनकी खास बात यह है कि ये जमीन के एयरफील्ड के साथ-साथ समुद्र में जहाजों से भी ऑपरेट कर सकते हैं। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

तकनीकी रूप से ये हेलिकॉप्टर काफी आधुनिक हैं। इनमें दो शक्तिशाली “शक्ति” इंजन लगे हैं, जो इन्हें बेहतर परफॉर्मेंस देते हैं। इनकी अधिकतम उड़ान गति करीब 275 किलोमीटर प्रति घंटा है और ये एक बार में लगभग 3.5 घंटे तक उड़ान भर सकते हैं। इनका अधिकतम वजन करीब 5,750 किलोग्राम तक जा सकता है।

इन हेलिकॉप्टरों में ग्लास कॉकपिट, एडवांस्ड रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर, हाई-इंटेंसिटी सर्चलाइट और मशीन गन जैसी सुविधाएं दी गई हैं। इसके अलावा इनमें रेस्क्यू विंच, मेडिकल आईसीयू सेटअप और ऑटोमैटिक फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम जैसे फीचर्स भी मौजूद हैं, जिससे ये आपात स्थितियों में बेहद उपयोगी साबित होते हैं। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

इन हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी 2027 से शुरू होकर 2029 तक पूरी होने की संभावना है। इसके साथ ही कंपनी इंजीनियरिंग सपोर्ट और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी देगी, जिससे इनकी ऑपरेशनल उपलब्धता उच्च स्तर पर बनी रहेगी। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

200 से ज्यादा छोटे-मझोले उद्योगों को मिलेगा काम

इस प्रोजेक्ट का एक बड़ा पहलू यह भी है कि इसमें देश की 200 से ज्यादा एमएसएमई कंपनियां शामिल होंगी। इससे करीब 65 लाख मैन-आवर का रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। यह डील ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहल को भी मजबूती देती है।

कोस्ट गार्ड के लिए ये हेलिकॉप्टर इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि उसके पास मौजूद कई पुराने हेलिकॉप्टर अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। ऐसे में ये नए प्लेटफॉर्म उनकी जगह लेंगे और ऑपरेशन की क्षमता को बढ़ाएंगे। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

भारतीय नौसेना को मिलेंगी श्टिल मिसाइलें

इस डील का दूसरा हिस्सा भारतीय नौसेना से जुड़ा है। करीब 2,182 करोड़ रुपये की लागत से वर्टिकल लॉन्च श्टिल (VL-Shtil) मिसाइल सिस्टम खरीदे जाएंगे। यह कॉन्ट्रैक्ट रूस की कंपनी जेएससी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ किया गया है।

वर्टिकल लॉन्च श्टिल एक आधुनिक सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जो दुश्मन के लड़ाकू विमान, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए बनाया गया है। यह सिस्टम वर्टिकल लॉन्च तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिससे यह तेजी से जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

इस मिसाइल की रेंज करीब 50 किलोमीटर तक है और यह मैक 4.5 की रफ्तार से टारगेट को निशाना बना सकती है। इसमें एडवांस्ड गाइडेंस सिस्टम लगा होता है, जो लक्ष्य को ट्रैक कर उसे सटीक तरीके से मारने में मदद करता है। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

नेवी की एयर डिफेंस क्षमता होगी मजबूत

इन मिसाइलों को भारतीय नौसेना के फ्रंटलाइन युद्धपोतों पर लगाया जाएगा। इसमें दिल्ली क्लास, कोलकाता क्लास और तलवार क्लास के जहाज शामिल हैं। ये सिस्टम पुराने श्टिल मिसाइल सिस्टम की जगह लेगा और नौसेना की एयर डिफेंस क्षमता को नई मजबूती देगा।

वर्टिकल लॉन्च श्टिल सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह हर मौसम में काम कर सकता है और तेजी से बदलते हालात में तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है। इससे समुद्र में तैनात भारतीय युद्धपोतों की सुरक्षा और बढ़ जाएगी।

यह सिस्टम भारतीय नौसेना की लेयर्ड एयर डिफेंस रणनीति का हिस्सा होगा, जिसमें पहले से मौजूद अन्य मिसाइल सिस्टम के साथ मिलकर काम करेगा। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

समुद्री सुरक्षा को मिलेगा बड़ा सहारा

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन दोनों डील्स का सीधा असर भारत की समुद्री सुरक्षा पर पड़ेगा। भारतीय कोस्ट गार्ड को जहां नए हेलिकॉप्टरों से निगरानी और बचाव कार्यों में मदद मिलेगी, वहीं नौसेना को नई मिसाइल प्रणाली से अपने युद्धपोतों की सुरक्षा बढ़ाने में सहायता मिलेगी। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

भारत का समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा है, जिसमें ऑफशोर इंस्टॉलेशन, व्यापारिक मार्ग और मछुआरों की सुरक्षा जैसी कई जिम्मेदारियां शामिल हैं। ऐसे में इन नई क्षमताओं से इन सभी क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा मजबूत होगी।

इसके अलावा वर्टिकल लॉन्च श्टिल मिसाइल डील भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग को भी दर्शाती है। दोनों देशों के बीच पहले भी कई बड़े रक्षा समझौते हो चुके हैं और यह नया समझौता उसी कड़ी का हिस्सा है। (ALH Mk-III and VL-Shtil Deal)

पाकिस्तान बॉर्डर के पास भारतीय वायुसेना की बड़ी एक्सरसाइज, 8 दिन तक एयरस्पेस बंद होने से पाकिस्तान में मची खलबली

India Air Force Drill NOTAM

India Air Force Drill NOTAM: भारतीय वायुसेना एक बार फिर पाकिस्तान सीमा के पास बड़े पैमाने पर एयरफोर्स अभ्यास की तैयारी कर रही है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारत ने 5 मार्च से 12 मार्च के बीच भारतीय वायुसेना के अभ्यास के लिए एयरस्पेस रिजर्व करने का नोटिस जारी किया है, जिसे नोटम यानी नोटिस टू एयरमेन कहा जाता है। जिसके बाद पाकिस्तान में भी सुरक्षा सतर्कता बढ़ा दी गई है और वहां की सेना ने अपने रिसोर्सेज की तैनाती में बदलाव शुरू कर दिया है।

वहीं, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 2 मार्च 2026 को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के नेता खुले तौर पर एक और युद्ध की तैयारी कर रहे हैं। साथ ही जरदारी ने सिंधु जल संधि पर लगी रोक को “वाटर टेररिज्म” बताया और कश्मीर पर पाकिस्तान के नैतिक/राजनीतिक समर्थन को दोहराया। (India Air Force Drill NOTAM)

भारतीय वायुसेना की तरफ से जारी नोटम के अनुसार, यह एयरस्पेस अस्थायी रूप से नागरिक उड़ानों के लिए बंद रहेगा ताकि सैन्य अभ्यास सुरक्षित तरीके से किया जा सके। इस तरह के नोटिस आमतौर पर बड़े सैन्य अभ्यास से पहले जारी किए जाते हैं, जिससे सिविल एविएशन को अलर्ट किया जा सके और किसी तरह की दुर्घटना से बचा जा सके। (India Air Force Drill NOTAM)

India Air Force Drill NOTAM: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी सैन्य सक्रियता

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब हाल ही में भारत ने पोखरण में ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी सबसे बड़ी वायुशक्ति एक्सरसाइज को अंजाम दिया था। यह अभ्यास 27 फरवरी तक चला था और इसमें भारतीय वायुसेना की विभिन्न क्षमताओं का परीक्षण किया गया था। इसके तुरंत बाद अब नया एयरफोर्स अभ्यास घोषित किया गया है, जो भारत की लगातार सैन्य तैयारी को दर्शाता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस तरह के अभ्यास का उद्देश्य वायुसेना की ऑपरेशनल रेडीनेस को बनाए रखना और विभिन्न परिस्थितियों में तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता को परखना होता है। ऐसे अभ्यासों में फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलिकॉप्टर और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म शामिल होते हैं। (India Air Force Drill NOTAM)

पाकिस्तान में बढ़ी हलचल

भारत द्वारा जारी किए गए इस नोटम के बाद पाकिस्तान में चिंता देखी जा रही है। सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव में है और अब भारतीय वायुसेना के इस अभ्यास ने उसकी चिंता और बढ़ा दी है। बता दें कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में लगातार मोर्चा खोला हुआ है और अफगानिस्तान के कई इलाकों में लगातार हमले कर रहा है।

बताया जा रहा है कि पाकिस्तान इस समय अफगानिस्तान और ईरान सीमा पर निगरानी कर रहा है। इसके अलावा अरब सागर में भी उसकी नौसेना सतर्क स्थिति में है, क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ रहा है। ऐसे में भारत की ओर से अचानक एयरस्पेस रिजर्व करने के फैसले ने पाकिस्तान को अपने सैन्य संसाधनों को फिर से व्यवस्थित करने के लिए मजबूर कर दिया है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने अपने एयर और ग्राउंड एसेट्स को तैनात कर भारतीय अभ्यास पर नजर रखने की तैयारी शुरू कर दी है। यह कदम इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान इस गतिविधि को गंभीरता से ले रहा है। (India Air Force Drill NOTAM)

क्षेत्रीय तनाव के बीच बढ़ी तैयारी

यह अभ्यास ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में हालात पहले से ही तनावपूर्ण बने हुए हैं। ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात और सैन्य गतिविधियों पर भी पड़ा है। कई देशों ने अपने एयरस्पेस में बदलाव किए हैं और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।

इसी पृष्ठभूमि में भारत का यह कदम क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक नियमित सैन्य अभ्यास बताया गया है, लेकिन इसका समय और स्थान इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना देता है। (India Air Force Drill NOTAM)

क्या होता है NOTAM

नोटम यानी नोटिस टू एयरमेन एक आधिकारिक सूचना होती है, जिसे किसी भी देश की एविएशन अथॉरिटी जारी करती है। इसके जरिए पायलट और एयरलाइंस को बताया जाता है कि किसी खास इलाके में अस्थायी रूप से उड़ान भरना सुरक्षित नहीं है या वहां कुछ विशेष गतिविधि होने वाली है।

जब भी कोई सैन्य अभ्यास होता है, तो उस क्षेत्र का एयरस्पेस कुछ समय के लिए रिजर्व कर लिया जाता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि सैन्य गतिविधियों और नागरिक उड़ानों के बीच कोई टकराव न हो।

भारत और पाकिस्तान दोनों देश समय-समय पर इस तरह के नोटिस जारी करते रहे हैं, खासकर तब जब सीमा के पास सैन्य अभ्यास किए जाते हैं। (India Air Force Drill NOTAM)

अभ्यास भारत-पाकिस्तान सीमा के दक्षिणी हिस्से में

यह अभ्यास भारत-पाकिस्तान सीमा के दक्षिणी हिस्से में किया जा रहा है, जिसमें राजस्थान और सिंध के आसपास का इलाका शामिल है। यह क्षेत्र पहले भी कई बार सैन्य अभ्यास का केंद्र रहा है, खासकर तब जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हो।

इस क्षेत्र में खुले रेगिस्तानी इलाके और कम आबादी होने के कारण बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास करना आसान होता है। इसी वजह से वायुसेना अक्सर इस क्षेत्र को चुनती है। (India Air Force Drill NOTAM)

पाकिस्तान का राजनीतिक बयान

इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का बयान भी चर्चा में है। उन्होंने संसद में दिए अपने संबोधन में भारत को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान किसी भी तरह की आक्रामकता का जवाब देने के लिए तैयार है।

हालांकि, उन्होंने साथ ही बातचीत की बात भी कही और कश्मीर मुद्दे पर वार्ता की जरूरत पर जोर दिया। उनके इस बयान को भारत की ओर से ज्यादा महत्व नहीं दिया गया और इसे राजनीतिक बयानबाजी माना गया।

भारतीय खुफिया सूत्रों के अनुसार, इस तरह के बयान पाकिस्तान के अंदरूनी हालात से ध्यान हटाने के लिए दिए जाते हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान इस समय आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान इस समय एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक तरफ उसे अफगानिस्तान सीमा पर सक्रिय आतंकवादी संगठनों से निपटना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बलूचिस्तान में भी सुरक्षा स्थिति जटिल बनी हुई है। (India Air Force Drill NOTAM)

इसके अलावा समुद्री क्षेत्र में भी उसे निगरानी बढ़ानी पड़ी है। ऐसे में भारत की ओर से एयरफोर्स अभ्यास की घोषणा ने उसकी सैन्य तैयारियों पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के अनुसार, पाकिस्तान की सैन्य और हवाई क्षमता इस समय अपनी पूरी क्षमता के करीब काम कर रही है और कई मोर्चों पर फैली हुई है।

इस नोटम का असर नागरिक उड़ानों पर भी पड़ सकता है। एयरलाइंस को इस अवधि के दौरान अपने रूट में बदलाव करना पड़ सकता है ताकि वे प्रतिबंधित क्षेत्र से दूर रह सकें। हालांकि यह एक सामान्य प्रक्रिया है और हर बड़े सैन्य अभ्यास के दौरान ऐसा किया जाता है। इससे यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। (India Air Force Drill NOTAM)

अगर ईरान को वक्त पर मिल जाते सुखोई-35 तो बदल जाती जंग की सूरत, जानें क्यों फेल हुआ चीनी HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम

Iran Air Force Weakness

Iran Air Force Weakness: पश्चिमी एशिया में जारी ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष में एक बड़ी वजह सामने आ रही है, जिसकी वजह से ईरान एरियल वॉरफेयर यानी हवाई युद्ध में पिछड़ता दिखाई दे रहा है। इसका कारण ईरान की कमजोर एयरफोर्स और रूस से सुखोई-35 फाइटर जेट की खरीद में हुई देरी है। मौजूदा हालात में इजरायल की आधुनिक वायुसेना के सामने ईरान के पुराने लड़ाकू विमान टिक नहीं पा रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को पहले से ही यह एहसास था कि उसकी एयरफोर्स कमजोर हो रही है। इसी वजह से उसने रूस के साथ आधुनिक फाइटर जेट खरीदने की योजना बनाई थी। लेकिन यह डील समय पर पूरी नहीं हो सकी, जिसका असर अब सीधे जंग के मैदान में दिखाई दे रहा है। (Iran Air Force Weakness)

Iran Air Force Weakness: 2023 में हुई थी सुखोई-35 डील

जानकारी के अनुसार, ईरान और रूस के बीच सुखोई-35 फाइटर जेट की डील 2023 में फाइनल हुई थी। इस डील में करीब 48 से 50 जेट खरीदे जाने थे। जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर में थी। इस पैकेज में अटैक हेलिकॉप्टर और ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट भी शामिल छे।

लेकिन, डिलीवरी की प्रक्रिया धीमी रही। कुछ रिपोर्ट्स में दो विमान मिलने की बात कही गई है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। बाकी जेट्स की डिलीवरी 2026 से 2028 के बीच होनी थी।

रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग, सप्लाई चेन की दिक्कतें और रूस की अपनी सैन्य जरूरतों के कारण इस डील में देरी हुई। इसी वजह से ईरान को समय पर आधुनिक फाइटर जेट नहीं मिल पाए।

प्रतिबंधों की वजह से हुई देरी

प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशे। अमेरिका और पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के कारण ज्यादातर देश ईरान को सैन्य उपकरण बेचने से बचते रहे। ऐसे माहौल में रूस और चीन ही दो ऐसे देश रहे, जिन्होंने इन प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग जारी रखा। चीन जहां लगातार ईरान से बड़े पैमाने पर तेल खरीदता रहा, वहीं रूस ने हथियारों और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बनाए रखा।

जानकारी के अनुसार, रूस और ईरान के बीच नए जेनरेशन के लड़ाकू विमानों को लेकर बातचीत काफी पहले, करीब 2016 से ही शुरू हो गई थी। कई वर्षों तक चर्चा और तैयारी चलने के बाद आखिरकार 2023 में इस डील को अंतिम रूप दिया गया। इसी दौरान दोनों देशों के बीच एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए, जिसमें सैन्य तकनीक, रक्षा सहयोग और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में साथ काम करने की सहमति बनी। (Iran Air Force Weakness)

इजरायल की मजबूत वायुसेना के सामने चुनौती

इजरायल की एयरफोर्स दुनिया की सबसे आधुनिक वायु सेनाओं में मानी जाती है। उसके पास F-15, F-16 और 5वीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर F-35 जैसे एडवांस्ड विमान मौजूद हैं।

इसके मुकाबले ईरान के पास जो फाइटर जेट हैं, उनमें से ज्यादातर 30 से 50 साल पुराने हैं। इनमें अमेरिकी एफ-4 फैंटम, एफ-14 टॉमकैट, एफ-5 टाइगर, रूसी मिग-29 और सुखोई-24 जैसे विमान शामिल हैं।

ईरान ने अपने स्तर पर कुछ स्वदेशी विमान भी बनाए हैं, जैसे हेसा कोवसार और सैकेह, लेकिन ये तकनीकी रूप से पुराने प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं और आधुनिक युद्ध में इनकी भूमिका बेहद सीमित हैं। (Iran Air Force Weakness)

अगर समय पर मिल जाते सुखोई-35

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ईरान को समय पर सुखोई-35 मिल जाते, तो मौजूदा हालात कुछ अलग हो सकते थे। सुखोई-35 एक 4.5 जेनरेशन का आधुनिक लड़ाकू विमान है, जो लंबी दूरी तक हमला करने और दुश्मन के विमान को रोकने में सक्षम है।

सुखोई-35 एक अत्याधुनिक दो इंजन वाला लड़ाकू विमान है, जो भारी मात्रा में हथियार ले जाने की क्षमता रखता है। यह विमान करीब 8,000 किलोग्राम तक का पेलोड अपने साथ ले जा सकता है। इसमें 12 हार्ड प्वाइंट दिए गए हैं, जिन पर अलग-अलग तरह की मिसाइलें और बम लगाए जा सकते हैं। यह विमान जरूरत पड़ने पर न्यूक्लियर हथियार ले जाने में भी सक्षम माना जाता है।

यह विमान करीब 2.25 मैक की स्पीड से उड़ सकता है और एक बार में करीब 3,600 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है। इसकी कॉम्बैट रेंज लगभग 1,600 किलोमीटर है, यानी यह लंबी दूरी तक जाकर मिशन पूरा कर सकता है। यह विमान करीब 59,000 फीट की ऊंचाई तक आसानी से ऑपरेट कर सकता है।

इस फाइटर जेट की खासियत यह है कि इसमें कई तरह के हथियार एक साथ लगाए जा सकते हैं, जैसे एयर-टू-एयर मिसाइल, एयर-टू-सरफेस मिसाइल, एंटी-शिप मिसाइल, एंटी-रेडिएशन मिसाइल और अलग-अलग तरह के बम। इसके अलावा इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर सिस्टम भी लगा होता है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइल हमलों से बचाव में मदद करता है।

अगर ऐसे 20-30 विमान भी ईरान के पास होते, तो इजरायल के लिए ईरानी हवाई क्षेत्र में ऑपरेशन करना ज्यादा कठिन हो सकता था। (Iran Air Force Weakness)

ईरान की रणनीति में बदलाव

ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति में लंबे समय तक मिसाइल, ड्रोन और बैलिस्टिक सिस्टम पर ज्यादा ध्यान दिया। उसने हाइपरसोनिक मिसाइल और लॉन्ग रेंज रॉकेट सिस्टम तैयार किए। ईरान का सोचना था कि उसकी सीमा कहीं से भी इजरायल या अमेरिका से नहीं लगती है और अमेरिका इतनी दूर से यहां आ कर जंग नहीं लड़ेगा। जिसके चलते कभी ईरान ने एयर डिफेंस सिस्टम या एयर सुपीरियरिटी पर फोकस ही नहीं किया।

लेकिन एयरफोर्स के आधुनिकीकरण पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। इसका परिणाम अब सामने आ रहा है, जब हवाई युद्ध में ईरान को सीमित विकल्पों के साथ काम करना पड़ रहा है।

ईरान अब सीधे एयर-टू-एयर मुकाबले की बजाय ड्रोन और मिसाइल के जरिए जवाबी कार्रवाई कर रहा है। (Iran Air Force Weakness)

डील के बावजूद चुनौतियां बनी रहतीं

रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि अगर सुखोई-35 समय पर मिल भी जाते, तब भी उन्हें पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने में समय लगता। पायलट ट्रेनिंग, सिस्टम इंटीग्रेशन और मेंटेनेंस में कई साल लग सकते हैं।

इसके अलावा, आधुनिक जंग में सिर्फ फाइटर जेट ही नहीं, बल्कि नेटवर्क, सैटेलाइट, इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (Iran Air Force Weakness)

एयर डिफेंस सिस्टम भी कमजोर पड़ा

ईरान ने पिछले कुछ सालों में अपनी एयर डिफेंस क्षमता को मजबूत करने की कोशिश की थी। उसके पास रूसी एस-300 सिस्टम, घरेलू बावर-373 और अन्य मीडियम और शॉर्ट रेंज डिफेंस सिस्टम मौजूद थे।

लेकिन मौजूदा संघर्ष की शुरुआत में ही अमेरिका और इजरायल ने इन सिस्टम्स को निशाना बनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जंग के शुरुआती दिनों में ही बड़ी संख्या में रडार, मिसाइल लॉन्चर और कमांड सेंटर नष्ट कर दिए गए।

इसके बाद इजरायल और अमेरिका को ईरान के ऊपर एयर सुपीरियरिटी हासिल करने में आसानी हो गई। अब हालात यह हैं कि विदेशी फाइटर जेट और ड्रोन ईरानी हवाई क्षेत्र में अंदर तक जाकर ऑपरेशन कर रहे हैं। (Iran Air Force Weakness)

चीनी एचक्यू9बी हुआ फेल

एचक्यू9बी चीन का बनाया हुआ लंबी दूरी का सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसे रूस के S-300 और अमेरिका के पैट्रियट सिस्टम जैसा माना जाता है। ईरान ने इसे हाल ही में हासिल किया था और इसे तेहरान, इस्फहान जैसे बड़े शहरों और न्यूक्लियर साइट्स की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। इसके बावजूद जब बड़े पैमाने पर हमले हुए, तो यह सिस्टम प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पाया।

रिपोर्ट के अनुसार, इसे नतांज परमाणु केंद्र जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास तैनात किया गया था, लेकिन यह एफ-35 विमानों और ड्रोन के बड़े हमलों को रोकने में नाकाम रहा। विश्लेषकों का कहना है कि हमलों के बड़े पैमाने के कारण यह सिस्टम दबाव में आ गया। (Iran Air Force Weakness)

एचक्यू9बी एक समय में 100 लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है, लेकिन केवल 8-10 पर ही एक साथ हमला कर सकता है, और यह स्वॉर्म हमलों के आगे बिल्कुल फेल हो गया।

रिपोर्टस के मुताबिक अमेरिका और इजरायल ने एक साथ बहुत बड़ी संख्या में मिसाइल, ड्रोन और क्रूज मिसाइल्स का इस्तेमाल किया। इस तरह के हमलों को सैचुरेशन अटैक कहा जाता है, जिसमें एक ही समय में इतने ज्यादा टारगेट आते हैं कि कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम उन्हें संभाल नहीं पाता। एचक्यू-9बी भी इसी वजह से ओवरलोड हो गया। इसके पास सीमित इंटरसेप्टर मिसाइलें थीं और रिएक्शन टाइम भी सीमित था, जिससे वह सभी खतरों को रोक नहीं सका। (Iran Air Force Weakness)

वहीं, इसका रडार सिस्टम स्टेल्थ एयरक्राफ्ट जैसे एफ-35 या बी-2 बॉम्बर्स को सही तरीके से पकड़ नहीं पाया। इसके अलावा, इसमें टारगेट को ट्रैक करने और बीच में अपडेट देने की क्षमता सीमित थी, जिससे तेजी से दिशा बदलने वाले टारगेट्स को मारना मुश्किल हो गया। भले ही यह सिस्टम कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता था, लेकिन एक साथ सीमित मिसाइल ही फायर कर सकता था, जिससे भारी हमलों के दौरान इसकी क्षमता जल्दी खत्म हो गई।

इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर भी एक अहम कारण रहा। अमेरिका और इजरायल ने एडवांस्ड जैमिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया, जिससे एचक्यू-9बी के रडार और कम्युनिकेशन सिस्टम प्रभावित हो गए। जब रडार सही से काम नहीं करता, तो एयर डिफेंस सिस्टम लगभग अंधा हो जाता है। इसी वजह से कई हमलों का समय पर पता नहीं चल पाया और इंटरसेप्शन नहीं हो सका।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके अलावा ऑपरेशनल समस्याएं भी सामने आईं। ईरान की एयर डिफेंस व्यवस्था अलग-अलग सिस्टम्स का मिश्रण है, जिसमें रूसी, चीनी और घरेलू सिस्टम शामिल हैं। इन सभी को एक साथ ठीक तरह से जोड़ना आसान नहीं होता। इन सिस्टम्स के बीच तालमेल की कमी भी हमलों के दौरान दिखी। साथ ही, ऑपरेटर्स को इस सिस्टम की पूरी ट्रेनिंग नहीं मिली थी और प्रतिबंधों की वजह से मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स की भी कमी थी, जिससे इसकी कार्यक्षमता प्रभावित हुई। (Iran Air Force Weakness)

एक और बड़ी बात यह रही कि इससे पहले के संघर्षों में ईरान के कई एयर डिफेंस सिस्टम पहले ही नुकसान झेल चुके थे। जब 2026 में नए हमले हुए, तो ये सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं थे। कई जगह इन्हें जल्दी-जल्दी दोबारा तैनात किया गया, लेकिन उनका नेटवर्क मजबूत नहीं बन पाया। (Iran Air Force Weakness)

क्षेत्रीय असर और बढ़ता तनाव

ईरान और इजरायल के बीच यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। इस जंग में आधुनिक तकनीक, इंटेलिजेंस और एयर पावर की भूमिका साफ तौर पर दिखाई दे रही है।

जहां एक तरफ इजरायल ने अपनी तकनीकी बढ़त का फायदा उठाया है, वहीं दूसरी तरफ ईरान को अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। (Iran Air Force Weakness)

इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी की भूमिका

इस संघर्ष ने यह भी दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस और रियल टाइम जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने सैटेलाइट, साइबर और ह्यूमन इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर ईरान के सिस्टम को कमजोर किया। इस वजह से ईरान की एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम को जल्दी निशाना बनाया जा सका। (Iran Air Force Weakness)

क्या खामेनेई को मारने में है पाकिस्तान का हाथ? शाहबाज शरीफ का गिफ्ट बना मौत की वजह!

Khamenei Death Conspiracy

Khamenei Death Conspiracy: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत को लेकर कई खुलासे हो रहे हैं। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियान के दौरान हुए हमलों में खामेनेई की मौत हुई थी। अब इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी एक नई कहानी चर्चा में है, जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा दिए गए एक कथित गिफ्ट को इस घटना से जोड़कर देखा जा रहा है।

यह दावा किया जा रहा है कि मई 2025 में तेहरान दौरे के दौरान शहबाज शरीफ ने खामेनेई को एक महंगी घड़ी गिफ्ट की थी। कुछ अनऑफिशियल रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स में कहा गया है कि यह घड़ी एक सामान्य गिफ्ट नहीं थी, बल्कि इसमें जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम लगा हुआ था। हालांकि इस दावे की किसी भी आधिकारिक स्तर पर पुष्टि नहीं हुई है और इसे साजिश से जुड़ी थ्योरी के तौर पर ही देखा जा रहा है। (Khamenei Death Conspiracy)

Khamenei Death Conspiracy: 26 मई को किया था ईरान का दौरा

जानकारी के अनुसार 26 मई 2025 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के साथ तेहरान का दौरा किया था। यह दौरा उनकी क्षेत्रीय यात्रा का हिस्सा था, जिसमें तुर्की, ईरान, अजरबैजान और ताजिकिस्तान शामिल थे। तेहरान में उनकी मुलाकात ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से हुई थी।

इस बैठक में मुस्लिम देशों की एकता, गाजा की स्थिति, क्षेत्रीय शांति और भारत-पाकिस्तान तनाव जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। बैठक के दौरान शहबाज शरीफ ने खामेनेई की नेतृत्व क्षमता की तारीफ की और दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करने की बात कही थी। इस दौरान शरीफ ने खामेनेई से मुलाकात को सम्मान की बात बताया और कहा कि हाल के दक्षिण एशिया संकट में ईरान ने शांति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। (Khamenei Death Conspiracy)

इस यात्रा के दौरान शहबाज शरीफ के साथ पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार, आर्मी चीफ असीम मुनीर, गृह मंत्री मोहसिन नकवी, सूचना मंत्री अत्ता तरार और प्रधानमंत्री के विशेष सहायक तारिक फातमी भी मौजूद थे।

इसी मुलाकात के दौरान कथित तौर पर एक लग्जरी घड़ी गिफ्ट किए जाने की बात सामने आई है। कुछ रिपोर्ट्स में इसे रोलेक्स ब्रांड की घड़ी बताया गया है। दावा यह भी किया गया कि इस घड़ी में जीपीएस आधारित ट्रैकिंग डिवाइस मौजूद था, जिससे लोकेशन ट्रैक की जा सकती थी। (Khamenei Death Conspiracy)

जीपीएस घड़ी और साजिश के आरोप

अनऑफिशियल रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि यह घड़ी खामेनेई की लोकेशन ट्रैक करने के लिए इस्तेमाल की गई। कुछ कथित इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के हवाले से कहा गया कि इस डिवाइस के जरिए उनकी मूवमेंट की जानकारी बाहर तक पहुंची।

हालांकि इस तरह के दावों को लेकर कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। न ही ईरान, पाकिस्तान या अमेरिका की सरकारों ने इस तरह के किसी आरोप की पुष्टि की है। मुख्यधारा की अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस दावे का उल्लेख नहीं मिलता है। (Khamenei Death Conspiracy)

ट्रंप ने शरीफ को दी थीं दो घड़ियां

ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई6 से जुड़ी कुछ कथित रिपोर्ट्स के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपनी दो पर्सनल रोलेक्स घड़ियां गिफ्ट की थीं। इन दावों में कहा गया है कि इनमें से एक घड़ी में जीपीएस ट्रैकिंग बीकन लगा हुआ था।

इसी दावे के अनुसार, शहबाज शरीफ ने हाल ही में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई से मुलाकात के दौरान वही जीपीएस वाली घड़ी उन्हें गिफ्ट कर दी। इसके बाद यह भी कहा जा रहा है कि इस घड़ी के जरिए खामेनेई की लोकेशन ट्रैक हो गई और उनकी लोकेशन उजागर हो गई। (Khamenei Death Conspiracy)

कैसे हुआ था हमला

28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर एक साथ प्रिसिजन स्ट्राइक्स यानी सटीक हमले किए। इस अभियान को अमेरिका की ओर से “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” और इजराइल की ओर से “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” नाम दिया गया। लेकिन असली कहानी उस इंटेलिजेंस सिस्टम की है, जिसने इसे आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे सटीक डेकैपिटेशन ऑपरेशन में बदल दिया।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की अपने वरिष्ठ सलाहकारों के साथ शनिवार शाम को तेहरान में एक अहम बैठक तय थी। इस बैठक में अली लारिजानी, अली शमखानी और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल होने वाले थे। यह एक सुरक्षित कंपाउंड में होने वाली सामान्य हाई-लेवल मीटिंग थी, जिसे सुरक्षा कारणों से शाम के समय रखा गया था। (Khamenei Death Conspiracy)

लेकिन अचानक इस बैठक का समय बदल दिया गया। शाम की जगह इसे शनिवार सुबह कर दिया गया। यहीं से पूरा खेल बदल गया। इजरायली इंटेलिजेंस को इस बदलाव खी भनक लग गई। जैसे ही यह जानकारी मिली, पूरे ऑपरेशन को रियल टाइम में बदल दिया गया। जो हमला बाद में होना था, उसे तुरंत आगे खिसका दिया गया।

इसके बाद फैसला लिया गया कि हमला दिन के उजाले में किया जाएगा। खामेनेई के कंपाउंड पर करीब 30 बम गिराए गए। पूरा इलाका जलकर तबाह हो गया। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि खामेनेई हमारी इंटेलिजेंस और एडवांस सर्विलांस सिस्टम से बच नहीं सके। (Khamenei Death Conspiracy)

इस पूरे ऑपरेशन का सबसे अहम हिस्सा यही था। इसका मतलब साफ है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सुरक्षा ढांचे के अंदर बहुत गहराई तक पैठ बना ली थी। उन्हें न सिर्फ बैठक की जानकारी थी, बल्कि समय में हुए बदलाव का भी पता चल गया। फिर उसी हिसाब से 200 विमान को हजारों किलोमीटर दूर दुश्मन के हवाई क्षेत्र में भेजा गया और एक तय समय पर सटीक हमला किया गया। (Khamenei Death Conspiracy)

यह हमले बेहद कम समय लगभग 60 सेकंड में किए गए और कई स्थानों को एक साथ निशाना बनाया गया। इसमें प्रिसिजन मिसाइल और एडवांस्ड गाइडेड हथियारों का इस्तेमाल किया गया।

इन हमलों में खामेनेई के अलावा ईरान के कई शीर्ष सैन्य अधिकारी, सुरक्षा अधिकारी और उनके करीबी लोग भी मारे गए। कम से कम 40 से अधिक टॉप सीनियर अधिकारी इन हमलों में मारे गए।

2003 के इराक युद्ध में “शॉक एंड ऑ” रणनीति के तहत बड़े पैमाने पर बमबारी हुई थी, लेकिन वहां टारगेट बिल्डिंग्स थीं। यहां टारगेट व्यक्ति थे। 2020 में कासिम सुलेमानी को एक ड्रोन हमले में मारा गया था, लेकिन इस ऑपरेशन में एक साथ कई शीर्ष नेताओं को खत्म किया गया। (Khamenei Death Conspiracy)

कैसे हुई ट्रैकिंग

इजरायल का दावा है कि इस पूरे ऑपरेशन में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद की अहम भूमिका रही। बताया गया है कि पिछले कई महीनों से खामेनेई की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

ट्रैकिंग के लिए सैटेलाइट इमेजरी, ह्यूमन इंटेलिजेंस, कम्युनिकेशन इंटरसेप्ट और एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया। हमले से ठीक पहले एक महत्वपूर्ण मीटिंग की जानकारी मिली, जिसमें खामेनेई की मौजूदगी की पुष्टि हुई। इसी के आधार पर हमले की टाइमिंग तय की गई। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह ऑपरेशन कई वर्षों की तैयारी और डेटा कलेक्शन का परिणाम था। (Khamenei Death Conspiracy)

अब बड़े प्रोजेक्ट्स की तैयारी! नौसेना के लिए जहाज बनाने वाली कंपनी गोवा शिपयार्ड को मिला ‘A’ कैटेगरी का दर्जा

Goa Shipyard Limited Schedule A

GSL Schedule A Upgrade: भारत के डिफेंस शिपबिल्डिंग सेक्टर की प्रमुख कंपनी गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (जीएसएल) को भारत सरकार ने ‘शेड्यूल बी’ से ‘शेड्यूल ए’ कैटेगरी में अपग्रेड करने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला 25 फरवरी को वित्त मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज ने लिया। इस अपग्रेडेशन को कंपनी के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

गोवा शिपयार्ड लिमिटेड रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन के अंतर्गत आता है, पिछले कई सालों से भारतीय नौसेना और इंडियन कोस्ट गार्ड के लिए युद्धपोत और अन्य जहाज तैयार कर रहा है। कंपनी की इस उपलब्धि को उसकी मजबूत फाइनेंशियल परफॉर्मेंस, लगातार ग्रोथ और ऑपरेशनल एक्सीलेंस का परिणाम माना जा रहा है।

GSL Schedule A Upgrade: शेड्यूल ए स्टेटस का क्या मतलब है

भारत में सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज को अलग-अलग कैटेगरीज में बांटा जाता है, जिनमें शेड्यूल ए सबसे ऊंची कैटेगरी होती है। इस कैटेगरी में वही कंपनियां आती हैं जिनका स्ट्रैटेजिक महत्व ज्यादा होता है और जिनकी फाइनेंशियल स्थिति मजबूत होती है।

अब जीएसएल को इस श्रेणी में शामिल किए जाने का मतलब है कि कंपनी को बड़े फैसले लेने में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी। साथ ही बड़े प्रोजेक्ट्स को संभालने, फंडिंग जुटाने और ऑपरेशंस को विस्तार देने में भी आसानी होगी। इससे कंपनी की क्षमता और जिम्मेदारी दोनों बढ़ेंगी।

मजबूत ऑर्डर बुक और बड़े प्रोजेक्ट्स

गोवा शिपयार्ड लिमिटेड के पास इस समय 16,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का ऑर्डर बुक है। कंपनी एक साथ 20 से ज्यादा प्लेटफॉर्म्स पर काम कर रही है, जो उसकी उत्पादन क्षमता को दर्शाता है।

इन प्रोजेक्ट्स में भारतीय नौसेना के लिए नेक्स्ट जनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल्स शामिल हैं, जिनकी संख्या 7 है और जिनकी कुल वैल्यू करीब 6,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। इन जहाजों की डिलीवरी 2026 से शुरू होने की उम्मीद है।

इसके अलावा कंपनी इंडियन कोस्ट गार्ड के लिए पॉल्यूशन कंट्रोल वेसल्स, फास्ट पेट्रोल वेसल्स और अन्य प्लेटफॉर्म भी तैयार कर रही है। हाल ही में श्रीलंका नौसेना के लिए एक फ्लोटिंग ड्राई डॉक भी लॉन्च किया गया था।

इसके अलावा साल 2018 में जीएसएल ने फ्रांस की कंपनी नेवल ग्रुप के साथ एक समझौते और लेटर ऑफ इंटेंट साइन किया था। नेवल ग्रुप ने भारत की स्कॉर्पीन क्लास अटैक सबमरीन डिजाइन की हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पनडुब्बियों के लिए एडवांस सिमुलेटर्स और ट्रेनिंग सिस्टम्स तैयार करना था।

इन सिमुलेटर्स में थ्रीडी सिमुलेटर और ट्रेनिंग सूट्स शामिल हैं, जिनकी मदद से नेवी के जवानों को असली पनडुब्बी जैसी परिस्थितियों में ट्रेनिंग दी जा सकती है। इससे बिना वास्तविक मिशन के भी क्रू को ऑपरेशन की पूरी तैयारी कराई जा सकती है।

जीएसएल ने नेवल ग्रुप के साथ मिलकर भारतीय नौसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ऐसे ट्रेनिंग सिस्टम्स विकसित करने की योजना बनाई थी। यह साझेदारी आज भी महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि जीएसएल को सिमुलेटर और ट्रेनिंग टेक्नोलॉजी में अच्छी पकड़ हासिल है।

डिफेंस और एक्सपोर्ट दोनों पर फोकस

जीएसएल न केवल घरेलू जरूरतों बल्कि यह फ्रेंडली फॉरेन कंट्रीज के लिए भी जहाज बना रहा है। इससे भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिल रहा है।

कंपनी का फोकस ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत स्वदेशी डिजाइन और निर्माण पर है। इससे विदेशी निर्भरता कम होती है और देश के भीतर ही रक्षा उपकरण तैयार किए जा रहे हैं।

कंपनी भविष्य में अपने ऑपरेशंस को और बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही है। आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम में एक नया शिपबिल्डिंग यूनिट स्थापित किया जा रहा है। इससे बड़े युद्धपोत बनाने की क्षमता बढ़ेगी और हजारों रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

इसके अलावा आने वाले समय में नेक्स्ट जनरेशन कॉर्वेट्स और अन्य एडवांस्ड युद्धपोतों के ऑर्डर मिलने की संभावना जताई जा रही है। अगर ये ऑर्डर मिलते हैं तो कंपनी का ऑर्डर बुक 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा तक पहुंच सकता है।

फाइनेंशियल प्रदर्शन और ग्रोथ

जीएसएल का हाल का प्रदर्शन भी मजबूत रहा है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का रेवेन्यू हासिल किया। साथ ही कंपनी पर कर्ज नहीं होने की स्थिति भी उसकी मजबूत फाइनेंशियल हेल्थ को दिखाती है। सरकार द्वारा शेड्यूल ए कैटेगरी का दर्जा दिए जाने को इसी प्रदर्शन की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है।

अमेरिका का ‘साइलेंट स्ट्राइकर’! पहली बार युद्ध में दागी नई PrSM बैलिस्टिक मिसाइल, ईरान में मचा हड़कंप

PrSM vs ATACMS
Precision Strike Missile PrSM: US Uses New Ballistic Missile in Iran War for First Time

PrSM vs ATACMS: पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका ने पहली बार युद्ध में अपनी नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल (PrSM) का युद्ध में इस्तेमाल किया है। यह मिसाइल हाल ही में अमेरिकी सेना में शामिल हुई थी और अब इसे ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान में इस्तेमाल किया गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM ने इस ऑपरेशन के पहले 24 घंटों का वीडियो जारी किया, जिसमें HIMARS लॉन्चर से इस मिसाइल को दागते हुए साफ देखा जा सकता है। इसे इस मिसाइल का पहला कॉम्बैट डेब्यू माना जा रहा है।

PrSM vs ATACMS: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में नई मिसाइल की एंट्री

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे संयुक्त सैन्य अभियान को “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया है। इस ऑपरेशन में कई तरह के आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल को लेकर हो रही है। यह पहली बार है जब इस मिसाइल को किसी युद्ध में इस्तेमाल किया गया है।

सेंटकॉम की तरफ से जारी विजुअल्स में साफ दिखता है कि एक M142 HIMARS (हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम) से प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल लॉन्च की गई। यह सिस्टम अमेरिकी सेना का बेहद मोबाइल और तुरंत प्रतिक्रिया देने वाला प्लेटफॉर्म माना जाता है, जो कम समय में मिसाइल दागकर अपनी लोकेशन बदल सकता है। (PrSM vs ATACMS)

क्या है प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल मिसाइल

प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल अमेरिका की नई शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे लॉकहीड मार्टिन कंपनी ने बनाया है। यह पुरानी ATACMS मिसाइल का आधुनिक और ज्यादा एडवांस्ड वर्जन है। ATACMS यानी आर्मी टेक्टिकल मिसाइल सिस्टम, एक अमेरिकी सेना की शॉर्ट-रेंज टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसका आधिकारिक नाम एमजीएम-140 है। इसे “अटैकम्स” (ATACMS) कहा जाता है, जिसे लॉकहीड ने बनाया थाा। यह मिसाइल HIMARS और M270 MLRS यानी मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम से लॉन्च होती है। एक लॉन्च पॉड में सिर्फ एक ATACMS फिट होती है। वहीं, ATACMS की अधिकतम रेंज करीब 300 किलोमीटर थी, जबकि PrSM की रेंज 500 किलोमीटर से ज्यादा बताई जा रही है।

इस नई मिसाइल की खास बात इसकी लंबी दूरी और ज्यादा सटीकता है। इसमें जीपीएस और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे यह अपने टारगेट पर बहुत कम गलती के साथ हमला कर सकती है। यही वजह है कि इसे हाई-वैल्यू टारगेट्स जैसे मिसाइल लॉन्च साइट्स, रडार सिस्टम और कमांड सेंटर को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। (PrSM vs ATACMS)

HIMARS और MLRS से लॉन्च

PrSM मिसाइल को M142 HIMARS और M270 MLRS जैसे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जाता है। HIMARS की खासियत यह है कि इसमें पहले जहां एक ATACMS मिसाइल लगती थी, वहीं अब एक पॉड में दो PrSM मिसाइलें फिट हो सकती हैं। इससे एक ही लॉन्चर से ज्यादा फायरपावर मिलती है।

सेंटकॉम की तरफ से जारी तस्वीरों में दो-सेल वाले मिसाइल पॉड भी दिखाई दिए, जो PrSM सिस्टम की पहचान माने जा रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि इस ऑपरेशन में नई मिसाइल का इस्तेमाल किया गया है। (PrSM vs ATACMS)

ज्यादा रेंज, ज्यादा टारगेट

PrSM की सबसे बड़ी ताकत इसकी रेंज है। जहां ATACMS करीब 300 किलोमीटर तक ही मार कर सकती थी, वहीं PrSM 500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक हमला कर सकती है। अमेरिकी सेना भविष्य में इसकी रेंज को 650 किलोमीटर और उससे भी आगे तक बढ़ाने पर काम कर रही है।

इसका मतलब यह है कि अब अमेरिकी सेना दूर बैठे हुए भी दुश्मन के अंदरूनी इलाकों में मौजूद टारगेट्स को निशाना बना सकती है। इससे ऑपरेशन का दायरा काफी बढ़ जाता है और दुश्मन के ज्यादा ठिकाने खतरे में आ जाते हैं। (PrSM vs ATACMS)

बैलिस्टिक मिसाइल की खासियत

बैलिस्टिक मिसाइलें अपनी तेज रफ्तार के लिए जानी जाती हैं। ये मिसाइलें जब अपने अंतिम चरण यानी टर्मिनल फेज में पहुंचती हैं, तो बहुत ज्यादा स्पीड से टारगेट पर गिरती हैं। इसी वजह से इन्हें रोकना एयर डिफेंस सिस्टम के लिए मुश्किल होता है।

PrSM भी इसी तरह की मिसाइल है, जो तेजी से हमला करती है और खासकर ऐसे टारगेट्स के लिए उपयोगी होती है जो जल्दी बदल सकते हैं, जैसे मोबाइल मिसाइल लॉन्चर या एयर डिफेंस यूनिट्स। इसके अलावा, इसकी गति और ताकत इसे मजबूत और भूमिगत ठिकानों को भी नुकसान पहुंचाने में सक्षम बनाती है। (PrSM vs ATACMS)

किन टारगेट्स पर हुआ इस्तेमाल

हालांकि अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं बताया है कि PrSM मिसाइलें किन खास जगहों पर दागी गईं, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार इनका इस्तेमाल ईरान के मिसाइल ठिकानों, रडार सिस्टम और सैन्य कमांड सेंटर को निशाना बनाने के लिए किया गया।

ऑपरेशन के शुरुआती चरण में ऐसे टारगेट्स को खत्म करना जरूरी माना जाता है, ताकि आगे होने वाले एयर स्ट्राइक्स के लिए रास्ता साफ हो सके। इस लिहाज से PrSM का उपयोग एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। (PrSM vs ATACMS)

अन्य हथियारों का भी इस्तेमाल

इस ऑपरेशन में सिर्फ PrSM ही नहीं, बल्कि कई अन्य हथियारों का भी इस्तेमाल किया गया है। अमेरिकी नौसेना ने टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से लंबी दूरी के हमले किए। वहीं B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स ने प्रिसिजन गाइडेड बम गिराए।

इसके अलावा ड्रोन और अन्य मिसाइल सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया, जिससे एक साथ कई टारगेट्स पर हमला किया जा सके। लेकिन PrSM का इस्तेमाल इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि यह पहली बार युद्ध में इस्तेमाल हुई है। (PrSM vs ATACMS)

ईरान में ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ से तबाही! अमेरिका की नई वॉर स्ट्रैटेजी से कैसे हिला तेहरान

Decapitation Strikes Strategy

Decapitation Strikes Strategy: पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ इस बार एक नई तरह की सैन्य रणनीति अपनाई है, जो पारंपरिक युद्ध से अलग मानी जा रही है। एक तरफ जहां ईरान ड्रोन-मिसाइलों के जरिए पारंपरिक युद्ध लड़ रहा है, तो वहीं इजरायल और अमेरिका ने बड़े पैमाने पर जमीनी सेना भेजने या लंबा युद्ध छेड़ने के बजाय, ईरान की टॉप लीडरशिप, सैन्य ठिकानों और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया है। इस रणनीति को डिकैपिटेशन स्ट्राइक्स कहा जा रहा है।

फरवरी के आखिरी दिन अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर प्रिसिजन स्ट्राइक्स यानी सटीक हमले किए। इन हमलों में हाई-टेक मिसाइलों, ड्रोन और गाइडेड बमों का इस्तेमाल किया गया, जिससे कम समय में ज्यादा प्रभाव डालने की कोशिश की गई। (Decapitation Strikes Strategy)

क्या है Decapitation Strikes Strategy

डिकैपिटेशन स्ट्राइक एक सैन्य रणनीति है, जिसमें दुश्मन के लीडरशिप, कमांड एंड कंट्रोल (सी2) सिस्टम या प्रमुख कमांडरों को निशाना बनाकर संगठन या राज्य की कमान को कमजोर या नष्ट करने की कोशिश की जाती है। इसका मूल विचार है: “शीर्ष को काट दो, तो पूरा शरीर गिर जाएगा”। यह रणनीति प्राचीन काल से मौजूद है, लेकिन आधुनिक रूप में तकनीकी विकास (जैसे एयर स्ट्राइक्स, ड्रोन, प्रिसिजन मिसाइल्स) के साथ यह ज्यादा प्रभावी और चर्चित हुई है।

डिकैपिटेशन की अवधारणा बहुत पुरानी है। प्राचीन चीनी सैन्य रणनीतिकार सन त्जु (Sun Tzu) ने लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व लिखी गई अपनी किताब द आर्ट ऑफ वॉर में लिखा था कि दुश्मन के नेतृत्व को निशाना बनाना युद्ध को जल्दी खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है। यह विचार तब से सैन्य सिद्धांतों में शामिल रहा। (Decapitation Strikes Strategy)

क्यों बढ़ा तनाव

ईरान और अमेरिका के बीच टकराव नया नहीं है। इसकी जड़ें 1979 की इस्लामिक क्रांति से जुड़ी हैं, जब ईरान में शाह शासन खत्म हुआ और नया इस्लामिक सिस्टम स्थापित हुआ। इसके बाद से दोनों देशों के बीच रिश्ते लगातार तनावपूर्ण रहे हैं।

2015 में न्यूक्लियर डील यानी जेसीपीओए के जरिए कुछ समय के लिए स्थिति सामान्य हुई थी, लेकिन 2018 में अमेरिका के इससे बाहर निकलने के बाद फिर तनाव बढ़ गया। 2020 में अमेरिका ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के टॉप कमांडर कासिम सुलेमानी को बगदाद में ड्रोन हमले में मार गिराया था। हमला इराक की राजधानी बगदाद के बगदाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास हुआ। सुलेमानी सीरिया से आए एक फ्लाइट से उतरे थे और एयरपोर्ट से निकलते समय उनके काफिले (दो कारों) पर हमला किया गया। जिसे इस तरह की रणनीति की शुरुआती मिसाल माना जाता है।

2026 में हालात और ज्यादा बिगड़ गए, जब ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर बातचीत पूरी तरह विफल हो गई। इसके बाद अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा दी और बड़े स्तर पर एयर पावर को सक्रिय किया। (Decapitation Strikes Strategy)

लीडरशिप को खत्म करने की नई रणनीति

इस बार अमेरिका की रणनीति का मुख्य फोकस ईरान के नेतृत्व को निशाना बनाना है। पारंपरिक युद्ध में जहां सेना शहरों पर कब्जा करती है और लंबे समय तक लड़ाई चलती है, वहीं इस रणनीति में केवल अहम टारगेट्स पर हमला किया जाता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान का मौजूदा सिस्टम कमजोर नहीं हो जाता। इस रणनीति का मकसद सीधे जनता को प्रभावित करना नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र को निशाना बनाना है। इजरायल का कहना है कि वह अब तक 1200 से ज्यादा बम ईरान पर गिरा चुका है।

इस दौरान ईरान के कई शीर्ष सैन्य अधिकारियों और सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। इन हमलों में ईरान के सुप्रीम धार्मिक लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई भी मारे गए। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और आधिकारिक बयानों के अनुसार, करीब 30 से 40 या उससे ज्यादा वरिष्ठ अधिकारी इन हमलों में मारे गए। (Decapitation Strikes Strategy)

इनमें सबसे बड़ा नाम ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का है, जो 1989 से देश की सत्ता संभाल रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान में उनके कंपाउंड पर एयरस्ट्राइक की गई, जिसमें उनकी मौत हो गई। इन हमलों में अली शमखानी भी मारे गए, जो सुप्रीम लीडर के करीबी सलाहकार थे और देश की नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े अहम पदों पर रह चुके थे। इसके अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर मोहम्मद पाकपुर भी हमले में मारे गए। ईरान की सैन्य ताकत में आईआरजीसी की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए यह नुकसान काफी अहम माना जा रहा है।

ईरान के रक्षा मंत्री अजीज नसीरजादेह की मौत की भी पुष्टि कई रिपोर्ट्स में की गई है। साथ ही ईरान की पूरी सेना के प्रमुख यानी चीफ ऑफ स्टाफ अब्दोलरहीम मौसावी भी इन हमलों में मारे गए बताए गए हैं। इसके अलावा
सुप्रीम लीडर के मिलिट्री ऑफिस से जुड़े मोहम्मद शिराज़ी, इंटेलिजेंस से जुड़े सालेह असादी और न्यूक्लियर व केमिकल प्रोजेक्ट्स से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारी शामिल बताए गए हैं। हालांकि इन सभी नामों की पुष्टि अलग-अलग स्तर पर हुई है और कुछ मामलों में आधिकारिक जानकारी अभी भी सामने आ रही है। (Decapitation Strikes Strategy)

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि शुरुआती हमलों में बहुत कम समय के भीतर कई कमांडरों को निशाना बनाया गया। इज़राइल की सेना के अनुसार, कुछ हमलों में एक ही समय में कई वरिष्ठ अधिकारियों को खत्म किया गया। इन ऑपरेशनों को अमेरिका की तरफ से “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” और इजरायल की तरफ से “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” नाम दिया गया है। इन हमलों के बाद ईरान के अंदर राजनीतिक और सैन्य स्तर पर हलचल तेज हो गई। (Decapitation Strikes Strategy)

प्रिसिजन स्ट्राइक्स से किए जा रहे हैं हमले

इस पूरे अभियान में “प्रिसिजन स्ट्राइक्स” यानी सटीक हमले सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसमें ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है जो जीपीएस, लेजर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या अन्य गाइडेंस सिस्टम की मदद से बिल्कुल सटीक निशाना लगाते हैं।

अमेरिका ने टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिन्हें दूर समुद्र से लॉन्च किया गया। ये मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर तक जाकर सटीक हमला कर सकती हैं। इसके अलावा स्टेल्थ फाइटर जेट जैसे एफ-35 का इस्तेमाल किया गया, जो दुश्मन के रडार से बचकर अंदर तक घुस सकते हैं।

इजराइल ने भी अपने एडवांस्ड गाइडेड बम और स्पाइस सिस्टम का इस्तेमाल किया। इन हमलों में ड्रोन की भूमिका भी काफी अहम रही। खासकर “वन-वे अटैक ड्रोन” यानी कामिकेज ड्रोन, जो सीधे टारगेट से टकराकर उसे नष्ट कर देते हैं। (Decapitation Strikes Strategy)

ड्रोन और साइबर ऑपरेशन का बढ़ता रोल

इस बार के हमलों में सिर्फ मिसाइल और विमान ही नहीं, बल्कि ड्रोन और साइबर ऑपरेशन का भी बड़ा रोल देखा गया। अमेरिका ने लो-कॉस्ट ड्रोन का इस्तेमाल किया, जो सस्ते होते हुए भी प्रभावी साबित हो रहे हैं।

इन ड्रोन को बड़ी संख्या में लॉन्च किया जाता है, जिससे दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है। इसके साथ ही साइबर अटैक के जरिए ईरान के कम्युनिकेशन और डिफेंस सिस्टम को भी प्रभावित करने की कोशिश की गई। (Decapitation Strikes Strategy)

बिना ग्राउंड ट्रूप्स के युद्ध

इस अभियान की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें अमेरिका ने जमीनी सेना भेजने से साफ इनकार किया है। इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों से मिले अनुभव के बाद अब अमेरिका ऐसे ऑपरेशन से बचना चाहता है।

इसलिए पूरी रणनीति एयर पावर, मिसाइल, ड्रोन और इंटेलिजेंस पर आधारित है। इससे युद्ध की लागत कम होती है और सैनिकों की जान का खतरा भी कम रहता है। (Decapitation Strikes Strategy)

ईरान ने भी की जवाबी कार्रवाई

इन हमलों के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की है। ईरान ने इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। कई जगहों पर अलर्ट जारी किए गए और एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय हो गए।

ईरान के अधिकारियों ने इन हमलों को “रेड लाइन” पार करना बताया और बदला लेने की बात कही। इसके साथ ही क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया।

इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है। रूस और चीन ने इन हमलों की आलोचना की है, जबकि यूरोपीय देशों ने तनाव कम करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। (Decapitation Strikes Strategy)

भारत के लिए क्यों अहम

भारत ने भी संयम बरतने की बात कही है और सभी पक्षों से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। भारत के लिए यह स्थिति काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मध्य पूर्व से उसका बड़ा आर्थिक और ऊर्जा संबंध है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है।

इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं। ऐसे में क्षेत्र में अस्थिरता का असर सीधे भारत पर पड़ सकता है।

भारत सरकार ने स्थिति पर नजर रखने की बात कही है और अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी भी जारी की गई है। (Decapitation Strikes Strategy)

LUCAS Vs Shahed 136: पहली बार अमेरिका ने कामिकेज ड्रोन से किया हमला, ईरानी टेक्नोलॉजी को किया कॉपी

LUCAS Vs Shahed 136

LUCAS Vs Shahed 136: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी सेना ने पहली बार लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन का इस्तेमाल असली युद्ध में किया है। यह ड्रोन LUCAS नाम से जाना जाता है, जिसे “लो-कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट अटैक सिस्टम” कहा जाता है। यह हमला अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर चलाए गए ऑपरेशन “एपिक फ्यूरी” का हिस्सा था, जिसमें ईरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी सेंटकॉम ने इस बात की पुष्टि की है कि इन ड्रोन को जमीन से लॉन्च किया गया था। इस ऑपरेशन को टास्क फोर्स स्कॉर्पियन स्ट्राइक नाम की यूनिट ने अंजाम दिया, जिसे खास तौर पर ईरान की रणनीति का जवाब देने के लिए बनाया गया था। (LUCAS Vs Shahed 136)

LUCAS Vs Shahed 136: क्या होता है कामिकेज ड्रोन

कामिकेज ड्रोन को वन-वे अटैक ड्रोन भी कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि यह ड्रोन एक बार उड़ान भरने के बाद सीधे अपने टारगेट से टकराकर उसे नष्ट कर देता है। इसमें वापसी का कोई सिस्टम नहीं होता। इसे लोइटरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है, यानी यह कुछ समय तक हवा में रह कर सही मौके पर हमला करता है।

यह ड्रोन पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में काफी सस्ता होता है और बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध में इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

सरल शब्दों में कहें तो शाहेद ड्रोन की डिजाइन पूरी तरह नई नहीं है। इसकी जड़ें पहले इजरायल की एक अवधारणा में मिलती हैं, और उस अवधारणा की प्रेरणा भी जर्मनी के पुराने डिजाइन से जुड़ी थी। यानी यह तकनीक कई देशों के विचारों और विकास से होकर आगे बढ़ी है, इसलिए इसकी पृष्ठभूमि काफी जटिल और मिश्रित मानी जाती है। (LUCAS Vs Shahed 136)

क्या है LUCAS ड्रोन की खासियत

LUCAS ड्रोन को कम लागत में ज्यादा असर देने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे स्पेक्ट्रेवर्क्स ने डिजाइन किया है। एक ड्रोन की कीमत करीब 35,000 डॉलर बताई गई है, जो किसी भी मिसाइल से काफी कम है। इस वजह से इसे बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है और एक साथ कई ड्रोन भेजकर हमला किया जा सकता है।

इस ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी दूरी तक उड़ान भरने की क्षमता है। यह “बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट” यानी आंखों से दिखाई देने वाली दूरी से भी आगे जाकर काम कर सकता है। इसमें ऑटोमेटेड सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह खुद टारगेट पहचानकर हमला कर सकता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

इस ड्रोन की रेंज करीब 444 मील तक बताई गई है और यह लगभग 6 घंटे तक हवा में रह सकता है। इसका मतलब है कि यह लंबे समय तक टारगेट ढूंढ सकता है और सही मौके पर हमला कर सकता है। इसमें करीब 40 पाउंड तक पेलोड ले जाने की क्षमता होती है, यानी यह एक सीमित लेकिन प्रभावी वारहेड लेकर जाता है।

वहीं इसकी क्रूज स्पीड लगभग 74 नॉट्स है, जो जरूरत पड़ने पर 105 नॉट्स तक पहुंच सकती है। LUCAS को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह ऑटोनॉमस यानी अपने आप काम कर सके और नेटवर्क के जरिए दूसरे ड्रोन के साथ मिलकर हमला कर सके। इसे अलग-अलग तरीकों ग्राउंड लॉन्चर, कैटापल्ट या वाहन से लॉन्च किया जा सकता है।

इसके अलावा इसमें स्वार्म यानी झुंड में काम करने की क्षमता भी है। इसका मतलब है कि कई ड्रोन एक साथ मिलकर एक ही लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इससे दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है और उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

ईरान के ड्रोन से प्रेरित है अमेरिकी LUCAS

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार LUCAS ड्रोन का डिजाइन काफी हद तक ईरान के मशहूर शाहेद-136 ड्रोन से लिया गया है। अमेरिकी सेना ने एक ईरानी ड्रोन को हासिल किया और उसकी तकनीक को समझकर उसे अपने तरीके से विकसित किया।

शाहेद-136 ड्रोन पहले से ही कई युद्धों में इस्तेमाल हो चुका है। यह लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है और तय किए गए टारगेट पर जाकर हमला करता है। रूस ने भी इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में किया है।

LUCAS ड्रोन उसी डिजाइन पर आधारित है, लेकिन इसमें अमेरिकी टेक्नोलॉजी और नए फीचर्स जोड़े गए हैं। (LUCAS Vs Shahed 136)

शाहेद-136 ड्रोन की खूबियां

शाहेद-136 ईरान का एक कामिकेज ड्रोन है, जो अपनी लंबी रेंज और भारी वारहेड के लिए जाना जाता है। इसमें छोटा इंजन लगा होता है, लेकिन इसके बावजूद यह लगभग 2,000 किलोमीटर तक उड़ सकता है, जो इसे बहुत लंबी दूरी का हथियार बनाता है।

शाहेद ड्रोन का डिजाइन पूरी तरह नया नहीं है। इसकी जड़ें पहले इजरायल की एक अवधारणा में मिलती हैं, और उस अवधारणा की प्रेरणा भी जर्मनी के पुराने डिजाइन से जुड़ी थी। 1980 के दशक में दुनिया ने पहली बार जर्मनी के एक खास ड्रोन द्रोहने एंटी-रडार (डीएआर) को देखा था, जिसे डोर्नियर कंपनी ने बनाया था। इसका मकसद दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर करना था।

करीब चार दशक बाद, इसी तरह की सोच पर आधारित तकनीक और आगे बढ़ी। ईरान ने अपना मशहूर ड्रोन शाहेद-136 तैयार किया, जिसका इस्तेमाल रूस ने यूक्रेन युद्ध में बड़े पैमाने पर किया। बाद में ईरान ने भी इसे इजरायल के खिलाफ संघर्ष में इस्तेमाल किया। (LUCAS Vs Shahed 136)

इसी तरह भारत ने भी इज़राइली एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के हेरोप और हार्पी जैसे ड्रोन का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने के लिए किया।

अब अमेरिका ने भी इसी की नकल करके अपना नया ड्रोन LUCAS बनाया जिसे FLM-136 भी कहा जाता है।

शाहेद ड्रोन की टॉप स्पीड करीब 100 नॉट्स (लगभग 185 किमी/घंटा) है और यह करीब 40 किलोग्राम तक का वारहेड लेकर जा सकता है। इसका मतलब है कि यह एक बार में ज्यादा नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। इसे पहले से प्रोग्राम किए गए टारगेट पर हमला करने के लिए डिजाइन किया गया है, यानी लॉन्च से पहले इसमें लक्ष्य की जानकारी डाल दी जाती है।

ईरान ने इसके कई नए वेरिएंट भी बनाए हैं, जैसे शाहेद-238, जिसमें बेहतर गाइडेंस सिस्टम, रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इंफ्रारेड ट्रैकिंग जैसी तकनीक शामिल की गई है। इसके अलावा रूस भी इसी डिजाइन पर आधारित “गेरान” ड्रोन बना रहा है।

शाहेद-136 की एक बड़ी खासियत यह है कि इसे बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है और यह एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बन जाता है। हाल के संघर्षों में इसने कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया है, जिससे इसकी प्रभावशीलता सामने आई है। (LUCAS Vs Shahed 136)

कैसे लॉन्च किया गया ड्रोन

इस ऑपरेशन में LUCAS ड्रोन को जमीन से लॉन्च किया गया। इसके लिए अलग-अलग लॉन्च सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे कैटापल्ट, रॉकेट असिस्टेड टेकऑफ या मोबाइल वाहन से लॉन्च किया जा सकता है।

अमेरिकी नौसेना ने पहले एक युद्धपोत से भी इस ड्रोन का परीक्षण किया था। इससे यह साफ होता है कि भविष्य में इसे समुद्र से भी लॉन्च किया जा सकता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

ड्रोन की रेंज सैकड़ों किलोमीटर तक

इस तरह के ड्रोन की रेंज सैकड़ों किलोमीटर तक हो सकती है और यह कई घंटों तक हवा में रह सकता है। इसमें सीमित वजन का वारहेड लगाया जाता है, जो टारगेट पर जाकर विस्फोट करता है।

यह ड्रोन जीपीएस और अन्य नेविगेशन सिस्टम की मदद से उड़ान भरता है। कुछ आधुनिक वर्जन में रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर भी लगाए जाते हैं, जिससे यह चलते हुए लक्ष्य को भी पहचान सकता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

आधुनिक युद्ध में ड्रोन का बढ़ता इस्तेमाल

हाल के वर्षों में ड्रोन युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां महंगे मिसाइल सिस्टम पर निर्भरता थी, अब कम लागत वाले ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ गया है। इससे छोटे देशों को भी बड़ी सैन्य ताकत मिल रही है।

ईरान ने इस क्षेत्र में काफी पहले काम शुरू कर दिया था और अब अमेरिका भी उसी मॉडल को अपनाता दिख रहा है। इससे यह साफ होता है कि भविष्य के युद्ध में ड्रोन की भूमिका और बढ़ने वाली है।

क्यों एक जैसे दिखते हैं ये ड्रोन

अगर अलग-अलग देशों के कामिकेज ड्रोन को देखा जाए, तो उनमें काफी समानता नजर आती है। इसका मुख्य कारण उनका डिजाइन है। इन ड्रोन में डेल्टा विंग यानी त्रिकोण आकार के पंख होते हैं, जो उन्हें ज्यादा स्थिरता और लंबी दूरी देते हैं।

इस डिजाइन से ड्रोन को ज्यादा ईंधन रखने की जगह मिलती है और वह ज्यादा समय तक उड़ सकता है। साथ ही यह डिजाइन सस्ता और आसान भी होता है, इसलिए कई देश इसी तरह के ड्रोन बना रहे हैं। (LUCAS Vs Shahed 136)

कितना प्रभावी है यह हथियार

इस तरह के ड्रोन दुश्मन के ठिकानों, रडार सिस्टम और एयर डिफेंस को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी खासियत यह है कि ये अचानक हमला करते हैं और कम लागत में ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। ये कम ऊंचाई पर लो लेवल पर उड़ान भरते हैं, जिससे ये रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते। हालांकि एयर डिफेंस सिस्टम इन्हें रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में आने पर इन्हें पूरी तरह रोकना मुश्किल हो जाता है।

ऑपरेशन में कितने ड्रोन इस्तेमाल हुए

अमेरिका ने इस ऑपरेशन में कितने LUCAS ड्रोन इस्तेमाल किए और किन-किन ठिकानों को निशाना बनाया, इस बारे में आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। अमेरिकी अधिकारियों ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार किया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि यह पहली बार है जब अमेरिका ने इस तरह के लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन को सीधे युद्ध में इस्तेमाल किया है। (LUCAS Vs Shahed 136)

हाइपरसोनिक से क्लस्टर वारहेड तक, ईरान के पास है 3000 से ज्यादा मिसाइलों, ड्रोन आर्मी और खतरनाक हथियारों का जखीरा

Iran military power

Iran Military Power: पश्चिमी एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान की सैन्य ताकत एक बार फिर चर्चा में है। ईरान की सेना, जिसे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान आर्म्ड फोर्सेस कहा जाता है, और खास तौर पर इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें, ड्रोन, टैंक और अन्य हथियार मौजूद हैं। हाल के संघर्ष के दौरान ईरान ने अपने हथियारों का इस्तेमाल किया, जिससे उसकी सैन्य क्षमता को लेकर नई जानकारी सामने आई है।

Iran Military Power: मिसाइल प्रोग्राम ईरान की सबसे बड़ी ताकत

ईरान का मिसाइल प्रोग्राम उसकी सैन्य शक्ति का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। ईरान के पास अलग-अलग रेंज की हजारों बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुल मिलाकर यह संख्या 3,000 से ज्यादा हो सकती है। ईरान ने अपनी मिसाइलों की अधिकतम रेंज लगभग 2,000 किलोमीटर तक सीमित रखी है, जो क्षेत्रीय स्तर पर इजरायल जैसे बड़े लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए काफी है। (Iran Military Power)

MaRV तकनीक वाली मिसाइलें

शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों में शाहाब-1 और शाहाब-2 जैसे सिस्टम शामिल हैं, जिनकी रेंज 300 से 500 किलोमीटर तक है। इसके अलावा फतेह-110 और जोलफागर जैसी मिसाइलें भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। मीडियम रेंज मिसाइलों में शाहाब-3, सिज्जिल और खोर्रमशहर जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो 1,000 से 2,000 किलोमीटर तक मार कर सकते हैं।

ईरान ने हाल के सालों में फत्ताह-1 और फत्ताह-2 जैसी हाइपरसोनिक क्षमता वाली मिसाइलों का भी दावा किया है। इसके अलावा क्रूज मिसाइलों में होवेइजेह और अबू महदी जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो लंबी दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम हैं। फत्ताह-1 और फत्ताह-2 असल में बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनमें मैन्यूवेरेबल री-एंट्री व्हीकल यानी MaRV तकनीक होती है। इसका मतलब यह है कि मिसाइल लक्ष्य के पास पहुंचते समय दिशा बदल सकती है और बहुत तेज गति से हमला करती है। इनकी रेंज करीब 1,400 से 1,500 किलोमीटर बताई जाती है। (Iran Military Power)

इसी तरह खोर्रमशहर-4 मिसाइल भी ईरान की ताकत का हिस्सा है, जिसकी रेंज लगभग 2,000 किलोमीटर है और यह भारी वारहेड ले जा सकती है। ईरान का दावा है कि यह मिसाइल एक से ज्यादा वारहेड भी ले जा सकती है, हालांकि इसे लेकर पूरी पुष्टि नहीं है। कुछ अन्य क्रूज मिसाइलें जैसे होवेइजेह और अबू महदी को भी तेज बताया जाता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में वे सब-सोनिक या टर्मिनल फेज में ही ज्यादा स्पीड पकड़ती हैं।

सुपरसोनिक मिसाइलें भी हैं मौजूद

ईरान के पास सुपरसोनिक मिसाइलें भी मौजूद हैं, यानी ऐसी मिसाइलें जो आवाज की रफ्तार (मैक 1) से कई गुना तेज उड़ती हैं। आम तौर पर ये क्षमता उसकी क्रूज मिसाइलों में और बैलिस्टिक मिसाइलों के आखिरी चरण यानी टर्मिनल फेज में देखने को मिलती है। ईरान की ज्यादातर बैलिस्टिक मिसाइलें, जैसे शाहाब और सिज्जिल, अपने टारगेट के पास पहुंचते समय हाइपरसोनिक स्पीड (मैक 5 से ज्यादा) हासिल कर लेती हैं। हालांकि, अगर बात पूरी तरह विकसित सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की करें, तो ईरान के पास अभी उनकी संख्या सीमित है। (Iran Military Power)

क्लस्टर वारहेड वाली मिसाइलें

इसके अलावा ईरान के पास क्लस्टर वारहेड वाली मिसाइलें भी हैं, जो हवा में जाकर कई छोटे बम छोड़ती हैं। खोर्रमशहर-4 को लेकर ईरान ने दावा किया है कि यह मल्टी-वारहेड कैपेबल है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह एक साथ कई टारगेट्स को हिट कर सकती है, लेकिन विशेषज्ञ इसे पूरी तरह MIRV नहीं बल्कि क्लस्टर या मल्टीपल पेलोड सिस्टम मानते हैं।

इसके अलावा कद्र, जोलफागर और फतेह सीरीज की कुछ मिसाइलों में क्लस्टर म्यूनिशन इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। इन मिसाइलों में मुख्य वारहेड हवा में खुलता है और कई छोटे बम गिराता है, जो बड़े इलाके को कवर करते हैं। 2025 के हमलों में ऐसी मिसाइलों के इस्तेमाल की रिपोर्ट भी सामने आई थी, जहां एक मिसाइल से कई सबम्यूनिशन गिराए गए।

इन क्लस्टर हथियारों की खासियत यह है कि ये एक साथ बड़े इलाके को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन क्योंकि ये पूरी तरह गाइडेड नहीं होते, इसलिए नागरिक इलाकों में इनके इस्तेमाल से ज्यादा खतरा होता है। (Iran Military Power)

ड्रोन और यूएवी: स्ट्राइक मिशन के लिए इस्तेमाल

ईरान की सैन्य रणनीति में ड्रोन यानी अनमैन्ड एरियल व्हीकल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। ईरान के पास हजारों की संख्या में ड्रोन मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया जाता है। शाहेद-136 जैसे कामिकेज ड्रोन हाल के संघर्षों में चर्चा में रहे हैं।

शाहेद-129 और मोहाजेर-6 जैसे ड्रोन सर्विलांस और स्ट्राइक मिशन के लिए इस्तेमाल होते हैं। वहीं अराश और मेराज जैसे लॉइटरिंग म्यूनिशन यानी खुद टारगेट पर गिरकर हमला करने वाले ड्रोन भी ईरान के आर्सेनल का हिस्सा हैं। इन ड्रोन का इस्तेमाल कम लागत में बड़े नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। (Iran Military Power)

टैंक और आर्टिलरी

ईरान के पास बड़ी संख्या में जमीनी हथियार भी मौजूद हैं। टैंकों की संख्या 1,500 से ज्यादा बताई जाती है। इनमें करार, जुल्फिकार और टी-72 जैसे टैंक शामिल हैं। इसके अलावा ईरान के पास अलग-अलग तरह की आर्टिलरी गन और मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम भी हैं।

बीएम-21 ग्रैड और फजर-5 जैसे रॉकेट सिस्टम लंबी दूरी तक फायरिंग करने में सक्षम हैं। इन्फैंट्री हथियारों में जी3 राइफल, एके-103 और मशीन गन जैसे सिस्टम शामिल हैं। इसके अलावा एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसे तुफान और देहलावियेह भी सेना के पास हैं।

एयर फोर्स: पुराने प्लेटफॉर्म पर निर्भरता

ईरान की एयर फोर्स को उसकी कमजोर कड़ी माना जाता है। इसके पास कई पुराने फाइटर जेट हैं, जिनमें एफ-14 टॉमकैट, मिग-29 और एफ-4 फैंटम शामिल हैं। हालांकि ईरान इन विमानों को अपग्रेड करके इस्तेमाल कर रहा है।

हेलीकॉप्टर फ्लीट में एमआई-17, बेल-214 और एएच-1जे जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। हाल ही में रूस से एमआई-28 अटैक हेलीकॉप्टर मिलने की भी जानकारी सामने आई है। (Iran Military Power)

नौसेना और एंटी-शिप क्षमता

ईरान की नौसेना खास तौर पर पर्शियन गल्फ क्षेत्र में सक्रिय रहती है। यहां उसकी रणनीति तेज गति वाली बोट्स और एंटी-शिप मिसाइलों पर आधारित है। नूर, कादेर और घादिर जैसी मिसाइलें समुद्री लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।

इसके अलावा ईरान ने नेवल ड्रोन और छोटे हमलावर प्लेटफॉर्म भी विकसित किए हैं, जो समुद्री युद्ध में इस्तेमाल होते हैं।

हाल के सालों में ईरान ने अपने सैन्य सिस्टम में लगातार बदलाव किए हैं। 2025 और 2026 के दौरान नए मिसाइल सिस्टम और उपकरणों को शामिल किया गया। कुछ सैन्य ठिकानों को नुकसान भी पहुंचा, लेकिन इसके बावजूद ईरान अपनी सैन्य क्षमता को बनाए हुए है। (Iran Military Power)