Home Blog Page 19

मणिपुर में शांति के लिए पूर्व सैनिकों ने निकाला कैंडललाइट मार्च, पीड़ित परिवारों को दी आर्थिक मदद

Manipur Candlelight Appeal

Manipur Candlelight Appeal: मणिपुर में शांति और हालात सामान्य करने को लेकर पूर्व सैनिकों और उनके परिजनों ने इम्फाल में कैंडललाइट का आयोजन किया। इस दौरान उन्होंने मणिपुर में शांति बनाए रखने की अपील की। यह कार्यक्रम शहर के ऐतिहासिक कांगला गेट के सामने हुआ, जहां आर्मेड फोर्सेस एक्स-सर्विसमेन एसोसिएशन ऑफ मणिपुर (AFESAM) के बैनर तले बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। खराब मौसम और तेज बारिश के बावजूद लोग जुटे और सभी ने एक साथ मिलकर शांति का संदेश दिया।

Manipur Candlelight Appeal: कांगला गेट पर जली शांति की मोमबत्तियां

शाम करीब 6 बजे पूर्व सैनिकों, उनके परिजनों और वीर नारियों ने हाथों में मोमबत्तियां जलाकर शांति के लिए प्रार्थना की। इस मौके पर 150 से ज्यादा पूर्व सैनिक अपने परिवारों के साथ मौजूद रहे।

कार्यक्रम का नेतृत्व लेफ्टिनेंट जनरल के हिमालय सिंह (रिटायर्ड) और ब्रिगेडियर एल इबोटोंबी सिंह (रिटायर्ड) ने किया।

इस कैंडललाइट अपील से पहले 25 अप्रैल को एक वॉलंटरी ब्लड डोनेशन कैंप भी आयोजित किया गया था। यह कैंप लांफेलपत स्थित रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में लगाया गया था। जिसका थीम “ब्लड्स यूनाइट पीपल” रखा गया था। इस पहल के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि समाज के लोग एक-दूसरे की मदद करके ही मुश्किल समय से बाहर निकल सकते हैं।

Manipur Candlelight Appeal

कार्यक्रम के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल के हिमालय सिंह ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि राज्य के नागरिक हर तरह की हिंसा चाहे वह शारीरिक हमला हो, आगजनी हो या भड़काऊ बयानबाजी से दूर रहें।

उन्होंने कहा कि लोग संयम बरतें, ताकि जान-माल का और नुकसान न हो। उन्होंने सभी समुदायों, धर्मों और भाषाओं का सम्मान करने पर भी जोर दिया और मणिपुर की एकता को बनाए रखने की बात कही।

हाल की घटनाओं पर जताई चिंता

इस दौरान पूर्व सैनिकों ने राज्य में हुई हाल की हिंसक घटनाओं पर भी चिंता जताई। इस दौरान उखरुल में एक रिटायर्ड सैनिक की हत्या और त्रोंगलाओबी गांव में दो बच्चों की मौत पर भी चर्चा हुई।

बताया गया कि ये बच्चे रात में सो रहे थे, जब यह घटना हुई, और उनके पिता उस समय बीएसएफ में ड्यूटी पर बाहर तैनात थे। इसके अलावा राज्य के अलग-अलग हिस्सों में आम नागरिकों के साथ हो रहीं घटनाओं की भी निंदा की गई।

AFESAM के सदस्यों ने एक दिन की पेंशन पीड़ित परिवारों को देने का फैसला किया। यह सहायता विशेष रूप से हवलदार चाइनाओशांग शोकवुंगनाओ (रिटायर्ड) के परिवार और त्रोंगलाओबी की घटना से प्रभावित लोगों के लिए दी जाएगी।

Manipur Candlelight Appeal

वहीं, ब्रिगेडियर एल इबोटोंबी सिंह ने इस मौके पर सुरक्षा बलों से भी अपील की। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ लोगों के बीच भरोसा भी कायम करना जरूरी है।

उन्होंने सुझाव दिया कि सुरक्षा एजेंसियां सख्त कार्रवाई और सामुदायिक विश्वास दोनों के बीच संतुलन बनाकर काम करें, ताकि बातचीत के लिए अनुकूल माहौल तैयार हो सके।

पास किया प्रस्ताव

कार्यक्रम के दौरान पूर्व सैनिकों ने मिलकर सात बिंदुओं वाला एक प्रस्ताव भी पास किया। इसमें हिंसा को तुरंत रोकने, समाज में एकता बनाए रखने और सभी समुदायों के बीच भरोसा बढ़ाने की बात कही गई।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि राज्य में शांति के लिए सभी पक्षों के बीच बातचीत जरूरी है और इसके लिए एक साझा रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए। विस्थापित परिवारों की सुरक्षित वापसी और उनके पुनर्वास पर भी जोर दिया गया।

पूर्व सैनिकों ने इस दौरान यह स्पष्ट किया कि मणिपुर के सभी लोगों के लिए समान सामाजिक न्याय जरूरी है। उन्होंने कहा कि जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और सभी को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। इसके साथ ही नफरत फैलाने वाली बातों और प्रचार का विरोध करने का संकल्प भी लिया गया।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने एक साथ शपथ लेते हुए वादा किया कि वे हर उस पहल का समर्थन करेंगे, जो आपसी विश्वास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देती है।

उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर की एकता और अखंडता को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है और इसके लिए मिलकर काम करना जरूरी है।

भारतीय वायुसेना को चाहिए हैवी पेलोड वाला ‘सुपर लिफ्ट’ हेलीकॉप्टर! UHLH के लिए जारी की RFI

UHLH Helicopter IAF:

UHLH Helicopter IAF: भारतीय वायुसेना ने अपनी भारी लिफ्ट क्षमता को मजबूत करने के लिए अल्ट्रा हेवी लिफ्ट हेलीकॉप्टर यानी यूएचएलएच के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी की है। रक्षा मंत्रालय की तरफ से निकाली गई इस प्रक्रिया में ऐसे हेलीकॉप्टर की तलाश की जा रही है जो बेहद भारी वजन उठा सके और कम समय में ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाए। इस प्रस्ताव के तहत तीन हेलीकॉप्टर शुरुआती तौर पर दो साल के लिए डैम्प लीज मॉडल पर लिए जाएंगे, जिसके बाद इन्हें खरीदने का विकल्प भी रहेगा।

UHLH Helicopter IAF: क्या होता है डैम्प लीज मॉडल

डैम्प लीज को आसान भाषा में समझें तो इसमें हेलीकॉप्टर वेंडर से लिया जाता है, लेकिन उसे उड़ाने और ऑपरेट करने की जिम्मेदारी वायुसेना की होती है। यानी मशीन बाहर से आती है, लेकिन उसका इस्तेमाल और मेंटेनेंस इस्तेमाल करने वाला पक्ष संभालता है। इससे ट्रेनिंग, ऑपरेशन और कंट्रोल पूरी तरह सेना के पास रहता है।

इस मॉडल का फायदा यह है कि हेलीकॉप्टर कम समय में उपलब्ध हो जाते हैं और वायुसेना को नई क्षमता जल्दी मिल जाती है। साथ ही बाद में अगर जरूरत लगे तो उसी प्लेटफॉर्म को खरीदा भी जा सकता है। (UHLH Helicopter IAF)

हेलीकॉप्टर में क्या-क्या चाहिए

वायुसेना ने इस आरएफआई में कुछ साफ तकनीकी शर्तें रखी हैं। सबसे अहम शर्त इसकी पेलोड क्षमता है, जो करीब 20 टन होनी चाहिए। यह हेलीकॉप्टर भारी हथियार, वाहन या बड़ी मात्रा में सामान एक बार में ले जा सके।

इसके अलावा इसकी क्रूज स्पीड 230 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा होनी चाहिए, ताकि तेजी से मूवमेंट हो सके। अधिकतम स्पीड इससे भी ज्यादा रखी गई है, जिससे यह जरूरत पड़ने पर तेज ऑपरेशन कर सके।

हेलीकॉप्टर में कम से कम 45 सैनिक बैठ सकें, या इसे ऐसे बदला जा सके कि इसमें 20 स्ट्रेचर के साथ घायल सैनिकों को ले जाया जा सके। इससे यह हेलीकॉप्टर सिर्फ ट्रांसपोर्ट ही नहीं, बल्कि मेडिकल इवैक्यूएशन में भी काम आएगा।

ऊंचाई और मौसम में काम करने की क्षमता

इस हेलीकॉप्टर को ऊंचे इलाकों में उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए। इसके लिए ऑपरेटिंग एल्टीट्यूड करीब 5500 मीटर या उससे अधिक तय किया गया है। यह शर्त खासतौर पर हिमालयी इलाकों को ध्यान में रखकर रखी गई है, जहां ऑक्सीजन कम होती है और उड़ान चुनौतीपूर्ण होती है।

इसके साथ ही हेलीकॉप्टर को हर मौसम में उड़ान भरने के लिए आईएफआर सर्टिफाइड होना जरूरी है। इसका मतलब है कि खराब मौसम या कम विजिबिलिटी में भी यह सुरक्षित उड़ान भर सके।

हो ईड्ब्ल्यूएस सिस्टम से लैस

हेलीकॉप्टर में एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम भी होना जरूरी है। इसमें रडार वार्निंग रिसीवर और मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम जैसे उपकरण शामिल होंगे, जो खतरे का पहले से पता लगा सकें। इसके साथ काउंटर मेजर डिस्पेंसिंग सिस्टम भी होना चाहिए, जिससे जरूरत पड़ने पर दुश्मन के हमले से बचाव किया जा सके।

ये सभी सिस्टम एक-दूसरे से जुड़े होने चाहिए, ताकि खतरे की पहचान और प्रतिक्रिया जल्दी हो सके। इससे हेलीकॉप्टर की सर्वाइवल क्षमता बढ़ती है। (UHLH Helicopter IAF)

भारी वजन उठाने और लटकाकर ले जाने की क्षमता

इस हेलीकॉप्टर को सिर्फ अंदर ही नहीं, बल्कि बाहर लटकाकर भी वजन ले जाने की क्षमता होनी चाहिए। इसके लिए लगभग 10 टन तक का अंडरस्लंग लोड उठाने की शर्त रखी गई है। इसके साथ यह भी जरूरी है कि पायलट दिन और रात दोनों समय इस लटकाए गए लोड को देख और मॉनिटर कर सके।

यह क्षमता पहाड़ी इलाकों में बेहद काम आती है, जहां सीधे लैंडिंग संभव नहीं होती और सामान को रस्सी के जरिए नीचे उतारा जाता है।

वायुसेना ने इस हेलीकॉप्टर की उपलब्धता कम से कम 95 प्रतिशत रखने की शर्त रखी है। यानी यह मशीन ज्यादातर समय ऑपरेशन के लिए तैयार रहे। इसके साथ हर महीने करीब 30 घंटे के इस्तेमाल की क्षमता भी तय की गई है। यह शर्त इसलिए रखी गई है ताकि हेलीकॉप्टर सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि लगातार ऑपरेशन में इस्तेमाल हो सके। (UHLH Helicopter IAF)

करनी होगी जल्दी डिलीवरी

इस आरएफआई में सबसे खास बात इसकी डिलीवरी टाइमलाइन है। वेंडर्स को कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद 3 से 6 महीने के अंदर हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने होंगे। यह समय सीमा काफी कम मानी जाती है, जिससे साफ है कि वायुसेना को यह क्षमता जल्द से जल्द चाहिए।

यूएचएलएच हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कई तरह के ऑपरेशन में किया जा सकता है। इनमें भारी हथियार और वाहन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, सीमावर्ती इलाकों में सप्लाई पहुंचाना और आपदा राहत जैसे काम शामिल हैं।

इसके अलावा यह हेलीकॉप्टर घायल सैनिकों को निकालने और कठिन इलाकों में तेजी से सैनिकों की तैनाती के लिए भी उपयोगी होगा। पहाड़ी, रेगिस्तानी और दूर-दराज के इलाकों में इसकी भूमिका अहम मानी जाती है।

मौजूदा फ्लीट और नई जरूरत

भारतीय वायुसेना के पास पहले से कुछ भारी हेलीकॉप्टर मौजूद हैं, लेकिन समय के साथ उनकी संख्या और क्षमता दोनों में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। कुछ पुराने हेलीकॉप्टर अब अपनी उम्र पूरी कर रहे हैं, जबकि नए ऑपरेशन के लिए ज्यादा क्षमता वाले प्लेटफॉर्म की जरूरत है।

इसी वजह से 20 टन क्षमता वाले हेलीकॉप्टर की मांग सामने आई है, जो एक बार में ज्यादा सामान और सैनिकों को ले जा सके। (UHLH Helicopter IAF)

इस पूरी प्रक्रिया को डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें भारतीय और विदेशी दोनों तरह के वेंडर्स भाग ले सकते हैं, लेकिन प्राथमिकता भारतीय लीज कैटेगरी को दी जाएगी। वायुसेना की जरूरत को देखते हुए यह कदम तेजी से क्षमता बढ़ाने के मकसद से उठाया गया है, ताकि बिना लंबी खरीद प्रक्रिया के तुरंत ऑपरेशनल जरूरत पूरी की जा सके।

आरएफआई जारी होने के बाद अब कंपनियां अपनी प्रतिक्रिया देंगी। इसके बाद अगला चरण यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल आएगा, जिसमें तकनीकी और फाइनेंशियल ऑफर मांगे जाएंगे। इस प्रक्रिया के जरिए तय किया जाएगा कि कौन सा हेलीकॉप्टर वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से सबसे उपयुक्त है। (UHLH Helicopter IAF)

Explained: क्या है DRDO का विक्रम VT-21 प्लेटफॉर्म? जो भारतीय इन्फैंट्री को बनाएगा दुनिया में सबसे घातक

DRDO Vikram VT-21 Project
DRDO Vikram VT-21 Project

DRDO Vikram VT-21 Project: भारतीय सेना की मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ ने एक नया आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पेश किया है, जिसका नाम ‘विक्रम VT-21’ रखा गया है। यह एक एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (AAP) है, जिसे भविष्य के इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (FICV) की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया जा रहा है।

यह प्रोजेक्ट खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह सेना के पुराने बीएमपी-2 व्हीकल्स को रिप्लेस करेगा। बीएमपी-2 पिछले कई दशकों से सेना में इस्तेमाल हो रहा है और अब उसे आधुनिक सिस्टम से बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है।

क्या है DRDO Vikram VT-21 Project

विक्रम VT-21 एक मॉडर्न मिलिट्री व्हीकल है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह युद्ध के दौरान सैनिकों को बेहतर सुरक्षा, तेज गति और ज्यादा मारक क्षमता दे सके। इसमें मजबूत आर्मर लगाया गया है, जो गोलियों, धमाकों और छर्रों से सुरक्षा प्रदान करता है।

इस प्लेटफॉर्म की खास बात यह है कि इसमें नई तकनीक के हथियार और निगरानी सिस्टम लगाए गए हैं, जिससे यह सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट व्हीकल नहीं बल्कि एक पूरी कॉम्बैट यूनिट की तरह काम कर सकता है।

दो अलग-अलग वेरिएंट में तैयार

विक्रम VT-21 को दो तरह के वेरिएंट में डेवलप किया गया है। पहला वेरिएंट व्हील्ड है, यानी इसमें टायर लगे होते हैं। यह सड़कों और शहर जैसे इलाकों में तेज चलता है और इसकी मेंटेनेंस भी आसान होती है।

दूसरा वेरिएंट ट्रैक्ड है, जो टैंकों की तरह ट्रैक पर चलता है। यह खराब और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में ज्यादा बेहतर पकड़ और स्टैबिलिटी देता है। पहाड़ी, रेगिस्तानी या ऑफ-रोड इलाकों में इसका प्रदर्शन ज्यादा प्रभावी माना जाता है।

इस प्लेटफॉर्म को डीआरडीओ की व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (VRDE) ने बनाया है। इसके साथ भारत फोर्ज लिमिटेड और उसकी डिफेंस कंपनी कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड (केएसएसएल) और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड जैसी कंपनियों ने भी मिलकर काम किया है। इसके अलावा कई छोटे उद्योग और डीआरडीओ की अन्य लैब्स ने भी इसमें सहयोग दिया है।

इस तरह यह प्रोजेक्ट सरकारी और निजी क्षेत्र के सहयोग से तैयार किया गया है, जिसमें स्वदेशी तकनीक पर खास जोर दिया गया है। (DRDO Vikram VT-21 Project)

खास है इसका आर्मर सिस्टम

विक्रम VT-21 में मजबूत सुरक्षा व्यवस्था दी गई है। इसे STANAG लेवल 4 और 5 के अनुसार तैयार किया गया है, जो नाटो के मानक हैं। इसका मतलब है कि यह भारी गोलीबारी, विस्फोट और आर्टिलरी के छर्रों से बचाव कर सकता है।

इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर प्रोटेक्शन सिस्टम लगाया गया है, जिसे जरूरत के हिसाब से बदला या अपग्रेड किया जा सकता है। इससे अलग-अलग मिशन के अनुसार इसकी सुरक्षा क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। (DRDO Vikram VT-21 Project)

30 मिमी का एक क्रूलेस टर्रेट

इस प्लेटफॉर्म में 30 मिमी का एक क्रूलेस टर्रेट लगाया गया है। इसका मतलब है कि इस गन सिस्टम को रिमोट से ऑपरेट किया जाता है और इसमें कोई सैनिक बैठता नहीं है। इससे सैनिकों की सुरक्षा बढ़ जाती है।

इसके साथ 7.62 मिमी की मशीन गन भी लगाई गई है, जो नजदीकी हमलों के लिए इस्तेमाल होती है। इसके अलावा इसमें नाग एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी फिट की जा सकती है, जो भारी बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए उपयोगी होती है। (DRDO Vikram VT-21 Project)

मोबिलिटी और परफॉर्मेंस

विक्रम VT-21 को एक पावरफुल इंजन और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के साथ तैयार किया गया है। इसका पावर-टू-वेट रेशियो अच्छा है, यानी इसके आकार के हिसाब से इसमें ज्यादा ताकत मिलती है। इससे यह तेज गति से चल सकता है और मुश्किल रास्तों पर भी आसानी से आगे बढ़ सकता है।

यह वाहन खाई पार कर सकता है, ऊंची ढलानों पर चढ़ सकता है और कठिन इलाकों में भी संतुलन बनाए रख सकता है। इसकी मोबिलिटी इसे अलग-अलग तरह के ऑपरेशन के लिए उपयोगी बनाती है।

पानी में चलने की क्षमता

इस प्लेटफॉर्म की एक और खासियत यह है कि यह एम्फीबियस है, यानी पानी में भी चल सकता है। इसमें हाइड्रो जेट और वॉटर प्रोपल्शन सिस्टम दिया गया है, जिससे यह नदियों और पानी के अन्य हिस्सों को पार कर सकता है।

यह क्षमता खासतौर पर उन इलाकों में काम आती है जहां नदी या पानी के रास्ते ऑपरेशन का हिस्सा होते हैं। (DRDO Vikram VT-21 Project)

मल्टीपर्पज डिजाइन

विक्रम VT-21 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सके। इसे सैनिकों को ले जाने, दुश्मन की जानकारी जुटाने या सीधे युद्ध में भाग लेने के लिए तैयार किया जा सकता है।

इसकी मॉड्यूलर डिजाइन की वजह से जरूरत के अनुसार इसमें बदलाव करना आसान होता है, जिससे एक ही प्लेटफॉर्म कई तरह के रोल निभा सकता है। (DRDO Vikram VT-21 Project)

FICV की जरूरत क्यों

भारतीय सेना लंबे समय से एक नए फ्यूचरिस्टिक इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल की जरूरत महसूस कर रही है। इसके पीछे मुख्य कारण बीएमपी-2 जैसे पुराने व्हीकल्स का लंबे समय से इस्तेमाल है।

आज के समय में युद्ध का तरीका बदल गया है। अब नेटवर्क आधारित युद्ध यानी नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर का महत्व बढ़ गया है, जिसमें अलग-अलग यूनिट्स, सेंसर और कमांड सिस्टम एक साथ जुड़े होते हैं।

इससे रियल टाइम में जानकारी साझा होती है, फैसले तेजी से लिए जाते हैं और ऑपरेशन ज्यादा प्रभावी बनते हैं। ऐसे माहौल में नए और तकनीकी रूप से एडवांस व्हीकल की जरूरत होती है।

सेना के लिए क्यों है जरूरी

विक्रम VT-21 जैसे प्लेटफॉर्म सेना के लिए इसलिए अहम हैं क्योंकि ये बेहतर सुरक्षा, ज्यादा फायरपावर और तेज मूवमेंट देते हैं। खासकर चीन और पाकिस्तान के साथ लगने वाले सीमावर्ती इलाकों में ऐसे व्हीकल की जरूरत ज्यादा महसूस होती है।

इन इलाकों में तेजी से तैनाती, बेहतर निगरानी और सटीक कार्रवाई बहुत जरूरी होती है, जिसके लिए ऐसे आधुनिक सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं।

हालांकि इस प्लेटफॉर्म को अभी कई चरणों से गुजरना होगा। इसमें डेवलपमेंट ट्रायल, यूजर ट्रायल और सेना की मंजूरी जैसे स्टेप शामिल हैं। इन सभी चरणों के बाद ही इसे सेना में शामिल किया जा सकेगा।

डीआरडीओ के अनुसार, इस सिस्टम में अभी करीब 65 प्रतिशत तक स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल हुआ है, जिसे आगे बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है। खास बात यह है कि विक्रम वीटी-21 प्लेटफॉर्म को कॉन्सेप्ट से लेकर कॉम्बैट-रेडी स्थिति तक पहुंचाने में तीन साल से भी कम समय लगा है। वहीं इस प्लेटफॉर्म को रक्षा मंत्रालय की टेक्निकल इवैल्यूएशन कमेटी से भी क्लियरेंस मिल चुकी है। (DRDO Vikram VT-21 Project)

भारतीय सेना को मिली 16वीं ‘भैरव’ बटालियन, मराठा लाइट इन्फैंट्री का है हिस्सा

16th Bhairav Battalion Indian Army
Photo: SPECIAL ARRANGEMENT

16th Bhairav Battalion Indian Army: भारतीय सेना ने अपनी ऑपरेशनल ताकत को और मजबूत करते हुए कर्नाटक के बेलगावी में एक नई यूनिट खड़ी की। यह यूनिट है 16वीं ‘भैरव’ बटालियन, जिसे भैरव लाइट कमांडो बटालियन भी कहा जाता है। इस बटालियन का गठन मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंटल सेंटर में किया गया, जो सेना के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित ट्रेनिंग सेंटर में से एक माना जाता है।

जिस रेजिमेंटल सेंटर में इस बटालियन का गठन हुआ, वह मराठा लाइट इन्फैंट्री का हिस्सा है। यह भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सम्मानित रेजिमेंट्स में से एक है। इस सेंटर ने वर्षों से सेना के लिए प्रशिक्षित और सक्षम सैनिक तैयार किए हैं। रेजिमेंटल सेंटर के कमांडेंट ब्रिगेडियर जॉयदीप मुखर्जी ने नई बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर को बटालियन का ध्वज सौंपा। इस दौरान नई यूनिट के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर भी पेश किया।

16th Bhairav Battalion Indian Army: कितनी बटालियन बनाने की योजना है

अभी तक कुल 16 भैरव बटालियन बनाई जा चुकी हैं। सेना की योजना है कि इनकी संख्या बढ़ाकर लगभग 25 तक की जाए। हर बटालियन में करीब 250 से 300 तक विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक होते हैं।

इन सैनिकों को सिर्फ इन्फैंट्री से ही नहीं, बल्कि आर्टिलरी, सिग्नल्स, एयर डिफेंस जैसी अलग-अलग शाखाओं से लिया जाता है, ताकि यूनिट ज्यादा सक्षम और मल्टीपर्पज बन सके।

ये यूनिट्स सीधे ब्रिगेड या डिवीजन कमांडर के कंट्रोल में काम करती हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत एक्शन लेती हैं। इनका फोकस तेजी, लचीलापन और कम समय में ऑपरेशन पूरा करने पर होता है।

किन-किन रेजिमेंट्स में बनाई जा रही हैं भैरव

भैरव बटालियन को सीधे किसी एक फोर्स से नहीं लिया जाता, बल्कि इन्हें अलग-अलग इन्फैंट्री रेजिमेंटल सेंटर में तैयार किया जाता है। यहां अलग-अलग यूनिट्स से चुने गए सैनिकों को एक साथ लाकर खास ट्रेनिंग दी जाती है।

इससे पहले चौथी भैरव बटालियन सिख लाइट इन्फैंट्री के तहत बनाई गई थी, जिसने रिपब्लिक डे परेड में भी हिस्सा लिया था। इसके अलावा राजपूत, गढ़वाल, कुमाऊं, जाट और डोगरा जैसी अलग-अलग इन्फैंट्री रेजिमेंट्स के सेंटर में भी भैरव बटालियन बनाई जा रही हैं।

इसमें “सन ऑफ द सॉयल” का कॉन्सेप्ट भी अपनाया जाता है, यानी सैनिकों को उनके क्षेत्र और रेजिमेंट से जोड़कर रखा जाता है, ताकि उनकी पहचान और तालमेल बना रहे।

एलसी और एलएसी पर हैं तैनात

भैरव लाइट कमांडो बटालियन को भारतीय सेना ने खास तौर पर संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों के लिए तैयार किया है। इनका मुख्य काम ऐसे क्षेत्रों में तेजी से कार्रवाई करना है, जहां हालात अचानक बदल सकते हैं। इसलिए इनकी तैनाती देश के अलग-अलग बॉर्डर सेक्टर में की जा रही है।

भैरव बटालियन को चार बड़े कमांड एरिया में रखा जा रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किया जा सके। इनकी सबसे ज्यादा तैनाती नॉर्दर्न कमांड में है। यह इलाका जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को कवर करता है, जहां चीन और पाकिस्तान दोनों तरफ से सुरक्षा चुनौतियां रहती हैं। लद्दाख के लेह सेक्टर में 14 कॉर्प्स के तहत इन बटालियनों को हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन के लिए रखा गया है। श्रीनगर वाले 15 कॉर्प्स और जम्मू के नगरोटा वाले 16 कॉर्प्स में भी इनकी मौजूदगी है, जहां ये लाइन ऑफ कंट्रोल के आसपास एक्टिव रहती हैं।

इसके अलावा वेस्टर्न कमांड के तहत राजस्थान और पाकिस्तान बॉर्डर के रेगिस्तानी इलाकों में भी इनकी तैनाती है। यहां इनका इस्तेमाल डेजर्ट वारफेयर के लिए किया जाता है। कुछ बटालियन को खास नाम भी दिए गए हैं, जैसे “डेजर्ट फाल्कंस”, जो उनके ऑपरेशन एरिया को दिखाता है।

ईस्टर्न कमांड में, यानी उत्तर-पूर्व के पहाड़ी और घने इलाकों में भी भैरव बटालियन तैनात की जा रही हैं। यहां इनका फोकस खासकर एलएसी के आसपास पहाड़ी और जंगल वाले क्षेत्रों में ऑपरेशन करना होता है। इसके अलावा कुछ यूनिट्स साउथ वेस्टर्न कमांड और अन्य सीमावर्ती इलाकों में भी रखी गई हैं।

भैरव बटालियन को आगे की चौकियों के पास रखा जाता है, ताकि किसी भी स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके। इनका मुख्य काम रैपिड रिस्पॉन्स, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना, अचानक कार्रवाई करना और हाइब्रिड वॉरफेयर जैसे ऑपरेशन को संभालना होता है।

16वीं भैरव बटालियन के गठन के साथ अब ऐसी यूनिट्स की संख्या बढ़कर सोलह हो गई है। सेना की योजना है कि ऐसी और बटालियन भी बनाई जाएं, ताकि जरूरत के हिसाब से अलग-अलग इलाकों में इन्हें तैनात किया जा सके।

इन यूनिट्स को देश के विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में रखा जा रहा है, जहां तेजी से प्रतिक्रिया देना जरूरी होता है। इससे सेना की कुल ऑपरेशनल क्षमता में बढ़ोतरी होती है और अलग-अलग तरह के ऑपरेशन करने की क्षमता मजबूत होती है।

क्या है ‘भैरव’ बटालियन

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने भैरव बटालियन को खड़ा किया था, जिसे मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। भैरव कमांडोज पारंपरिक इन्फैंट्री के घातक और स्पेशल फोर्सेज के बीच की एक कड़ी है। यानी यह यूनिट सामान्य सैनिकों से ज्यादा तेज है, लेकिन पूरी तरह स्पेशल फोर्स जैसी नहीं होती।

इन बटालियनों को “लीन” और “हाई मोबिलिटी” यूनिट कहा जाता है। इनमें सैनिकों की संख्या सीमित रखी जाती है, लेकिन उनकी ट्रेनिंग और मूवमेंट क्षमता बहुत तेज होती है। एक भैरव बटालियन में आम तौर पर करीब 250 के आसपास विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक होते हैं।

क्यों जरूरी हैं भैरव बटालियन

भारतीय सेना में पहले से ही पारंपरिक इन्फैंट्री और स्पेशल फोर्सेज मौजूद हैं, लेकिन बदलते युद्ध के स्वरूप में एक ऐसी फोर्स की जरूरत महसूस की जा रही थी, जो दोनों के बीच की भूमिका निभा सके। भैरव बटालियन इसी जरूरत को पूरा करती है।

आधुनिक युद्ध में अब तेजी, लचीलापन और सटीक जानकारी बहुत अहम हो गई है। ऐसे में छोटी लेकिन प्रशिक्षित यूनिट्स ज्यादा प्रभावी मानी जाती हैं। भैरव बटालियन को इसी सोच के तहत तैयार किया गया है, ताकि सेना के पास ऑपरेशन के लिए ज्यादा विकल्प मौजूद रहें।

स्पेशल फोर्सेज का दबाव कम करने में मदद

भैरव बटालियन का एक और अहम उद्देश्य स्पेशल फोर्सेज पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है। पहले कई ऐसे ऑपरेशन होते थे, जिन्हें स्पेशल फोर्सेज को ही अंजाम देना पड़ता था। अब इन बटालियनों के आने से कुछ जिम्मेदारियां इनके पास भी आ गई हैं।

इससे स्पेशल फोर्सेज को अपने खास और बेहद संवेदनशील मिशनों पर फोकस करने में आसानी होती है, जबकि भैरव यूनिट्स तेजी से प्रतिक्रिया देने वाले ऑपरेशन संभालती हैं।

भैरव बटालियन के सैनिकों का चयन अलग-अलग यूनिट्स से किया जाता है। इनमें इन्फैंट्री के अलावा आर्टिलरी, सिग्नल्स और एयर डिफेंस जैसी शाखाओं के सैनिक भी शामिल हो सकते हैं। चयन के बाद इन्हें विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।

इस ट्रेनिंग में स्नो क्राफ्ट, माउंटेन वारफेयर, क्लोज कॉम्बैट और आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल जैसी चीजें शामिल होती हैं। इसके अलावा इन्हें ऐसे हालात के लिए भी तैयार किया जाता है, जहां कम संसाधनों में काम करना पड़े।

एससीओ बैठक में रक्षा मंत्री ने किया ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र, बोले- अब सुरक्षित नहीं रहे आतंकवाद के ठिकाने

Operation Sindoor SCO Meeting
Photo: PIB

Operation Sindoor SCO Meeting: किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) के डिफेंस मिनिस्टर्स मीटिंग में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर साफ और कड़ा रुख रखा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया है कि अब आतंकवाद के केंद्र सुरक्षित नहीं रहे हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

Operation Sindoor SCO Meeting: ऑपरेशन सिंदूर का दिया उदाहरण

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि यह कार्रवाई भारत की जीरो टॉलरेंस नीति को दिखाती है, जिसमें आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ जवाब देने में कोई हिचक नहीं है। उन्होंने कहा कि जो जगहें पहले आतंकवाद का सुरक्षित ठिकाना मानी जाती थीं, अब वे भी जवाबी कार्रवाई से बाहर नहीं हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीमा पार से होने वाले आतंकवादी हमले किसी भी देश की संप्रभुता पर सीधा हमला होते हैं और ऐसे मामलों में दोहरे मापदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए। (Operation Sindoor SCO Meeting)

Operation Sindoor SCO Meeting
Photo: PIB

आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील

राजनाथ सिंह ने एससीओ के सदस्य देशों से कहा कि आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सभी देशों को एक साथ खड़ा होना होगा। उन्होंने कहा कि ऐसे तत्वों को पनाह देने, समर्थन देने या सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

उनके अनुसार, जब तक इन सुरक्षित ठिकानों को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अधूरी रहेगी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस मुद्दे पर किसी भी तरह का राजनीतिक अपवाद नहीं होना चाहिए।

“आतंकवाद का कोई धर्म या देश नहीं”

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि आतंकवाद का कोई देश या धर्म नहीं होता। इसलिए इसके खिलाफ सभी देशों को एक समान और सख्त रुख अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस खतरे से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं और यह तभी संभव है जब सभी देश बिना किसी भेदभाव के एक जैसी नीति अपनाएं।

उन्होंने पिछले साल जारी तियानजिन डिक्लेरेशन का भी जिक्र किया, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त रुख अपनाने की बात कही गई थी। इसे उन्होंने भारत की जीरो टॉलरेंस नीति का उदाहरण बताया।

राजनाथ सिंह ने कहा कि एससीओ की जिम्मेदारी सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक शांति और स्थिरता पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में दुनिया कई तरह की अनिश्चितताओं से गुजर रही है और ऐसे में एससीओ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि एससीओ के तहत काम कर रही रीजनल एंटी-टेररिस्ट स्ट्रक्चर (RATS) आतंकवाद के खिलाफ अहम भूमिका निभा रही है। इसके जरिए सदस्य देश मिलकर कट्टरपंथ और आतंकवाद से जुड़े खतरों का सामना कर रहे हैं।

दुनिया के बदलते हालात पर जताई चिंता

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में कहा कि आज दुनिया का माहौल काफी बदल रहा है। कई देश अब अंदरूनी मामलों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में कमी देखी जा रही है। ऐसे समय में यह जरूरी है कि देश आपसी सहयोग और भरोसे को मजबूत करें।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या दुनिया को एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की जरूरत है या मौजूदा व्यवस्था को और बेहतर बनाने की। उनके अनुसार, जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें हर व्यक्ति को सम्मान मिले और मतभेद विवाद में न बदलें।

राजनाथ सिंह ने कहा कि देशों को हमेशा बातचीत और कूटनीति के रास्ते पर चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया को हिंसा और युद्ध की दिशा में नहीं बढ़ना चाहिए, बल्कि शांति और विकास की ओर जाना चाहिए।

उन्होंने महात्मा गांधी के संदेश का भी जिक्र किया और कहा कि हर कार्रवाई से पहले यह सोचना चाहिए कि उसका असर आम लोगों, खासकर गरीब और जरूरतमंदों पर क्या पड़ेगा। उन्होंने कहा कि असली ताकत वही है जो कमजोर लोगों की रक्षा के लिए इस्तेमाल की जाए।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत एससीओ के उद्देश्यों को लागू करने में सकारात्मक भूमिका निभाता रहेगा। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों के बीच आपसी सम्मान, समानता और विश्वास के आधार पर सहयोग बढ़ाना जरूरी है।

उनके अनुसार, अगर सदस्य देश मिलकर काम करें, तो एससीओ क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। (Operation Sindoor SCO Meeting)

बैठक में इन मुद्दों पर हुई चर्चा

इस बैठक में सदस्य देशों के बीच सुरक्षा, आतंकवाद और कट्टरपंथ से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। इन विषयों का असर न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी देखा जा रहा है। सदस्य देशों ने यह भी माना कि 2026 एससीओ के गठन के 25 साल पूरे होने का साल है और ऐसे समय में संगठन की भूमिका पहले से ज्यादा अहम हो गई है। बढ़ती अनिश्चितता के बीच एससीओ से स्थिरता और सहयोग की उम्मीद की जा रही है। (Operation Sindoor SCO Meeting)

NFU पर सरकार और वेटरंस आमने-सामने! 75 बार टली सुनवाई, क्या सेना को मिलेगा सिविल सर्विस जैसा दर्जा?

NFU for Armed Forces
AI-Generated Image

NFU for Armed Forces: देश के हजारों सैन्य वेटरंस इन दिनों एक अहम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। मामला है एनएफयू (नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन) का, जो लंबे समय से अदालत और सरकार के बीच फंसा हुआ है। सेना के पूर्व अधिकारी चाहते हैं कि उन्हें भी वही सुविधा मिले, जो सिविल सर्विसेज के अधिकारियों को मिलती है। लेकिन अब तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।

NFU for Armed Forces: क्या है पूरा मामला

एनएफयू को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। साल 2017 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इससे पहले 2016 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने सरकार को निर्देश दिया था कि सेना के अधिकारियों को भी एनएफयू का लाभ दिया जाए। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा था कि सेना को इससे बाहर रखना “अनुचित और बिना ठोस वजह” के है।

इसके बावजूद यह फैसला लागू नहीं हुआ और मामला आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। पिछले नौ सालों में इस पर कई बार सुनवाई तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से टलती रही। अब वेटरंस को कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है।

सरकारी स्तर पर हुई चर्चा के अनुसार, एक इंटर-मिनिस्ट्रीयल कमेटी ने सेना के अधिकारियों को एनएफयू देने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। कमेटी ने इसके पीछे कई वजहें बताईं हैं। इसमें कहा गया कि इसे लागू करना आसान नहीं होगा, इसमें कानूनी मुश्किलें हैं और इससे सरकार पर हर साल लगभग 800 से 1800 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त भार पड़ सकता है।

एनएफयू आखिर होता क्या है

एनएफयू एक तरह का पे और स्टेटस बेनिफिट है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी अधिकारी को प्रमोशन नहीं मिलता, तब भी उसे समय के साथ उच्च वेतन स्तर मिल जाता है।

इसे आसान भाषा में ऐसे समझें कि अगर एक ही बैच के दो अधिकारी हैं और उनमें से एक को प्रमोशन मिल जाता है, तो दूसरे अधिकारी को भी कुछ समय बाद उसी लेवल का वेतन मिल जाता है, भले ही उसे प्रमोशन न मिला हो। इसका उद्देश्य यह है कि एक ही बैच के अधिकारियों के बीच वेतन में ज्यादा अंतर न हो।

यह व्यवस्था छठे वेतन आयोग के बाद 2006 में लागू की गई थी। शुरुआत में यह सुविधा सिर्फ आईएएस और आईएफएस अधिकारियों को मिली थी, लेकिन बाद में इसे अन्य ग्रुप ‘ए’ सर्विसेज और सीएपीएफ तक बढ़ा दिया गया।

लेकिन सेना को क्यों रखा गया बाहर

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सिविल सर्विसेज को यह सुविधा मिल रही है, तो सेना को इससे बाहर क्यों रखा गया। सरकार का कहना है कि सेना का स्ट्रक्चर और काम करने का तरीका अलग है।

सेना में प्रमोशन पूरी तरह रैंक बेस्ड सिस्टम पर होता है। यहां हर स्तर पर सीमित पद होते हैं और प्रमोशन के लिए सख्त चयन प्रक्रिया होती है। अगर किसी अधिकारी को तय संख्या में मौके मिलने के बाद भी प्रमोशन नहीं मिलता, तो वह उसी रैंक पर रिटायर हो जाता है।

इसके उलट सिविल सर्विसेज में प्रमोशन का तरीका अलग है, जहां सीनियरिटी और फिटनेस के आधार पर आगे बढ़ने के ज्यादा मौके होते हैं।

सरकार का यह भी मानना है कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर रैंक जैसा वेतन दिया गया, तो इससे सेना के चेन ऑफ कमांड सिस्टम पर असर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में कमेटी ने दी रिपोर्ट

हाल ही में एक हाई लेवल कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। इस कमेटी ने साफ तौर पर कहा है कि सेना को एनएफयू देना सही नहीं होगा।

रिपोर्ट के अनुसार सेना के सर्विस कंडीशंस सिविल कर्मचारियों से अलग हैं। सेना के जवानों और अधिकारियों को पहले से ही कई खास सुविधाएं जैसे ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन) और एमएसपी (मिलिट्री सर्विस पे) मिलती हैं।

कमेटी ने यह भी कहा कि अगर एनएफयू लागू किया जाता है, तो इससे सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक इस पर सालाना हजारों करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। साथ ही इससे पेंशन सिस्टम में भी बड़े बदलाव करने पड़ेंगे।

वेटरंस क्यों कर रहे हैं विरोध

दूसरी तरफ, मिलिट्री वेटरंस इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं है, बल्कि मुद्दा बराबरी के दर्जे का है।

इस फैसले के बाद कई सैन्य वेटरंस ने नाराजगी जताई है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे और लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया (रिटायर्ड) ने इसे एक बड़ा मौका गंवाना बताया। उनका कहना है कि यह सालों से चली आ रही असमानता को खत्म करने का सही समय था। उनके मुताबिक एनएफयू कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि सेना के अधिकारियों के लिए बराबरी का अधिकार है, खासकर तब जब वे कठिन और जोखिम भरे माहौल में काम करते हैं और फिर भी करियर में रुकावट का सामना करते हैं।

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रिटायर्ड) ने भी इस मुद्दे पर साफ राय दी। उन्होंने कहा कि या तो एनएफयू सभी सेवाओं के लिए खत्म कर दिया जाए, या फिर सेना समेत सभी को दिया जाए।

इसी तरह लेफ्टिनेंट कर्नल आर के भारद्वाज (रिटायर्ड) ने एक खुले पत्र में कहा कि सेना और पूर्व सैनिक इस फैसले से बहुत निराश हैं। उन्होंने लिखा कि जहां बाकी सभी सिविल सर्विसेज और सीएपीएफ को एनएफयू का फायदा मिल रहा है, वहीं सेना को इससे बाहर रखना गलत है। उनका कहना है कि इससे सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ रहा है और उनके साथ भेदभाव का हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में याचिकाकर्ता रिटायर्ड कर्नल मुकुल देव का कहना है कि सिविल सर्विसेज के सभी अधिकारी एनएफयू का लाभ ले रहे हैं, लेकिन सेना को इससे बाहर रखा गया है। उनके मुताबिक यह एक तरह का भेदभाव है।

वेटरंस का यह भी तर्क है कि सेना में प्रमोशन के मौके बहुत सीमित होते हैं। कई अधिकारी 50-54 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं, जबकि सिविल सर्विसेज में रिटायरमेंट उम्र 60 साल है। इस वजह से उन्हें करियर में आगे बढ़ने और ज्यादा कमाने के कम मौके मिलते हैं।

सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सेना को एमएसपी और अन्य भत्ते मिलते हैं, इसलिए एनएफयू की जरूरत नहीं है। लेकिन वेटरंस इस बात से सहमत नहीं हैं।

उनका कहना है कि एमएसपी कोई अतिरिक्त फायदा नहीं है, बल्कि पहले से मिल रहे कई भत्तों को मिलाकर बनाया गया है। इसलिए इसे एनएफयू के बराबर नहीं माना जा सकता।

मौजूदा समय में कमीशंड अधिकारियों (लेफ्टिनेंट से ब्रिगेडियर) को हर महीने करीब 15,500 रुपये एमएसपी मिलता है, जबकि जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) को करीब 5,200 रुपये मिलते हैं।

सेना में कैसे मिलता है प्रमोशन

सेना में करियर ग्रोथ स्ट्रक्चर काफी सीमित है, जिसे पिरामिड जैसा माना जाता है। शुरुआत में सभी अधिकारियों को समय के साथ प्रमोशन मिलता है, लेकिन ऊपरी रैंक पर पहुंचते-पहुंचते मौके बहुत कम हो जाते हैं।

लेफ्टिनेंट, कैप्टन और मेजर रैंक तक लगभग सभी अधिकारियों को प्रमोशन मिल जाता है। लेफ्टिनेंट कर्नल तक भी यह प्रक्रिया टाइम स्केल पर होती है। लेकिन इसके बाद स्थिति बदल जाती है।

कर्नल रैंक पर सिर्फ लगभग 14 फीसदी अधिकारी ही पहुंच पाते हैं। ब्रिगेडियर बनने वालों की संख्या और भी कम होकर करीब 2.79 फीसदी रह जाती है। मेजर जनरल तक पहुंचने वालों की संख्या सीमित रहती है और लेफ्टिनेंट जनरल (हाईएस्ट लेवल) तक सिर्फ लगभग 1 फीसदी से भी कम अधिकारी पहुंच पाते हैं।

इसका मतलब यह है कि ज्यादातर अधिकारी लंबे समय तक सेवा करने के बावजूद पे लेवल 12 या 13 पर ही रुक जाते हैं। प्रमोशन के सीमित अवसरों की वजह से करियर में ठहराव आता है, जिसका असर मनोबल पर पड़ता है।

कमेटी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेना और सिविल सर्विसेज के प्रमोशन सिस्टम में मूलभूत अंतर है। सेना में कर्नल और उससे ऊपर के पदों के लिए चयन बोर्ड होते हैं और सीमित मौके मिलते हैं।

अगर अधिकारी इन मौकों में चयनित नहीं होता, तो वह आगे प्रमोशन के लिए योग्य नहीं रहता। वहीं सिविल सर्विसेज में प्रमोशन के अवसर लगातार बने रहते हैं।

इसी वजह से सरकार का मानना है कि एनएफयू को सेना पर लागू करना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों सिस्टम का स्ट्रक्चर अलग है।

क्यों लंबी खिंच रही है कानूनी लड़ाई, देखें टाइमलाइन

दिसंबर 2016 में दिल्ली की आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक अहम फैसला दिया। यह मामला कर्नल मुकुल देव बनाम भारत सरकार का था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि सेना को एनएफयू न देना गलत है और सरकार को इसे लागू करना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने इसे “अनुचित और बिना सही वजह” का फैसला बताया।

इसके बाद सरकार ने इस आदेश को नहीं माना और 2019 में सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। दिलचस्प बात यह है कि इसी तरह का मामला सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) का भी था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में उन्हें एनएफयू का फायदा दे दिया था। लेकिन सेना के मामले में अभी तक फैसला नहीं आया है।

दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दोबारा देखने के लिए रक्षा मंत्रालय को एक हाई-लेवल कमेटी बनाने को कहा। इस कमेटी के चेयरमैन फाइनेंशियल एडवाइजर (डिफेंस सर्विसेज) थे। जनवरी 2026 में इस कमेटी ने सेना के प्रतिनिधियों की बात भी सुनी और पूरे मामले का अध्ययन किया।

2026 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि सेना को एनएफयू नहीं दिया जाना चाहिए। इसके पीछे कई कारण बताए गए।

साथ ही कमेटी ने एक और चिंता जताई कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर जैसा वेतन मिलने लगे, तो इससे चेन ऑफ कमांड पर असर पड़ सकता है। कमेटी ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे को आगे 8वें वेतन आयोग में देखा जा सकता है।

अप्रैल 2026 में रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दाखिल किया। इसमें कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई और साफ कहा गया कि सेना को एनएफयू देना उचित नहीं है।

अप्रैल 2026 तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस दौरान कई बार सुनवाई की तारीख तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से सुनवाई टल गई।

अब तक इस केस में 75 से ज्यादा बार सुनवाई टली है। 22 अप्रैल 2026 को भी यह मामला सूची में था, लेकिन समय की कमी और जस्टिस जेके माहेश्वरी के रिटायरमेंट के कारण सुनवाई नहीं हो सकी।

मुख्य याचिकाकर्ता कर्नल मुकुल देव (रिटायर्ड) के अनुसार, पिछले 9 साल में इस मामले को सुनने के लिए 5 अलग-अलग बेंच बन चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर हैं, जहां इस मामले में अंतिम फैसला होना बाकी है। वेटरंस उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सिविल सर्विसेज के बराबर दर्जा मिलेगा, जबकि सरकार अपने रुख पर कायम है।

कितना पड़ेगा आर्थिक बोझ

सीजीडीए (CGDA) के इनपुट के अनुसार, अगर सेना को एनएफयू दिया जाता है, तो इसका वित्तीय असर काफी बड़ा होगा। सिर्फ आर्मी के लगभग 26,182 अधिकारियों पर इसका सालाना खर्च करीब 555.24 करोड़ रुपये आंका गया है। इसी आधार पर नेवी के लगभग 4,945 अधिकारियों पर करीब 106.59 करोड़ और एयरफोर्स के करीब 6,571 अधिकारियों पर लगभग 142.22 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

इस तरह तीनों सेनाओं के लिए कुल मिलाकर सालाना खर्च करीब 804.05 करोड़ रुपये बैठता है।

अगर इसमें पेंशन का असर जोड़ा जाए, तो यह खर्च बढ़कर करीब 1200 करोड़ रुपये प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा, ओआरओपी के तहत पेंशन को दोबारा तय करना पड़ेगा, जिससे खर्च और बढ़ सकता है।

सातवें वेतन आयोग के पूरे 10 साल के दौर में यह खर्च 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है। इसमें ब्याज और अन्य संभावित खर्च शामिल नहीं हैं, जिससे कुल राशि और बढ़ सकती है। सरकार का कहना है कि इतने बड़े वित्तीय बोझ और प्रशासनिक मुश्किलों को देखते हुए एनएफयू लागू करना आसान नहीं है। (Military Veterans Await Supreme Court Verdict on NFU, Demand for Equal Status with Civil Services)

क्या है चीन का ‘Atelasi’ ड्रोन सिस्टम? जो LAC पर बढ़ा सकता है भारत के लिए चुनौती!

China Atlas Drone Swarm System

China Atlas Drone Swarm System: चीन की सेना ने एक नया ड्रोन सिस्टम पेश किया है, जिसे “एटलस ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम” (Atelasi)कहा जा रहा है। पीएलए ने हाल ही में इस सिस्टम को शोकेस किया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह सिस्टम आधुनिक युद्ध के तरीके को बदलने वाला माना जा रहा है, क्योंकि इसमें एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन उड़ाने और उन्हें एक ही ऑपरेटर से कंट्रोल करने की क्षमता है।

क्या है China Atlas Drone Swarm System?

एटलस ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम को आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसा मोबाइल प्लेटफॉर्म है, जो ट्रक पर लगाया जाता है और उससे एक साथ कई ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं। यह सिस्टम एक तरह का “मिनी बैटलफील्ड नेटवर्क” की तरह काम करता है, जिसमें ड्रोन सिर्फ उड़ते नहीं हैं, बल्कि आपस में जुड़े रहते हैं और मिलकर मिशन को पूरा करते हैं। एटलस ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम को एक तरह से चलती-फिरती मिनी बैटलफील्ड नेटवर्क यूनिट कहा जा सकता है।

यह एक ट्रक पर लगाया गया सिस्टम है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें एक साथ करीब 96 छोटे और मध्यम आकार के हाई-स्पीड ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं। इन ड्रोन को लॉन्च करने में ज्यादा समय नहीं लगता। हर ड्रोन के बीच लॉन्च का समय तीन सेकंड से भी कम होता है, यानी लगभग 300 सेकंड यानी पांच मिनट के अंदर पूरा झुंड आसमान में पहुंच सकता है। इतनी तेज और बड़े पैमाने पर लॉन्चिंग किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

समझने के लिए एक उदाहरण लें तो हाल के पश्चिम एशिया युद्ध में सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर तैनात अमेरिका का एडवांस्ड ई-3 सेंट्री AWACS विमान सिर्फ 29 ड्रोन और कुछ बैलिस्टिक मिसाइलों के हमले में नष्ट हो गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले कितने प्रभावी हो सकते हैं।

यह सिस्टम इतना कॉम्पैक्ट है कि इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है, छुपाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत ऑपरेशन में लाया जा सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। (China Atlas Drone Swarm System)

एक ही ऑपरेटर करेगा कंट्रोल

इस सिस्टम में सबसे अलग बात यह है कि इतने सारे ड्रोन को सिर्फ एक ही इंसान कंट्रोल कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि वह हर ड्रोन को अलग-अलग चला रहा है, बल्कि सिस्टम में लगे एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से ड्रोन खुद भी फैसले ले सकते हैं।

ये ड्रोन अपने मिशन के दौरान लक्ष्य को पहचान सकते हैं, जरूरत पड़ने पर रास्ता बदल सकते हैं और दुश्मन की गतिविधियों के हिसाब से अपनी रणनीति बदल सकते हैं। यही वजह है कि इसे “इंटेलिजेंट स्वॉर्म” कहा जा रहा है।

क्या-क्या कर सकते हैं ये ड्रोन

एटलस सिस्टम के ड्रोन सिर्फ हमला करने के लिए नहीं हैं। ये कई तरह के काम कर सकते हैं। जैसे इलाके की निगरानी करना, दुश्मन की लोकेशन का पता लगाना, आपस में कम्युनिकेशन बनाए रखना और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कन्फ्यूज करना।

जब इतने सारे ड्रोन एक साथ उड़ते हैं, तो वे एक तरह का “डिफेंसिव स्ट्रक्चर” भी बना सकते हैं। इसका मतलब है कि कुछ ड्रोन आगे जाकर हमला करते हैं, कुछ पीछे रहकर जानकारी जुटाते हैं, जबकि कुछ दुश्मन के सिस्टम को कन्फ्यूज करने का काम करते हैं।

किसने बनाया यह सिस्टम

इस सिस्टम को चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉरपोरेशन यानी सीईटीसी ने तैयार किया है। यह चीन की सरकारी कंपनी है, जो डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकम्युनिकेशन के क्षेत्र में काम करती है।

सीईटीसी पहले भी कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुकी है। इसमें मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी और अन्य डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। इस कंपनी का सीधा संबंध चीन की सेना से है और यह सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन मॉडल के तहत काम करती है। (China Atlas Drone Swarm System)

“इंटेलिजेंट वॉरफेयर” चीन की रणनीति

चीन की सेना पिछले कई सालों से “इंटेलिजेंटाइजेशन वॉरफेयर” यानी बुद्धिमान युद्ध की दिशा में काम कर रही है। चीन के सैन्य दस्तावेजों में यह साफ कहा गया है कि भविष्य के युद्ध “अनमैन्ड” यानी बिना इंसानी सैनिकों के और “इंटेलिजेंट” यानी मशीनों और एल्गोरिदम पर आधारित होंगे। इसी रणनीति के तहत ड्रोन और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम किया जा रहा है।

पिछले कुछ सालों में चीन ने दुनिया के अलग-अलग युद्धों से सीख ली है। इसमें रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अन्य सैन्य अभियानों के अनुभव शामिल हैं। इन युद्धों में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल ने यह दिखाया है कि छोटे, सस्ते और बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन भी बड़े हथियारों को चुनौती दे सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए एटलस जैसे सिस्टम तैयार किए गए हैं।

जानकारी के अनुसार, चीन के पास पहले से ही हजारों ड्रोन मौजूद हैं, जो अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं। इनमें छोटे ड्रोन, मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन, हाई एल्टीट्यूड ड्रोन और स्टेल्थ ड्रोन शामिल हैं। इनका इस्तेमाल चीन अपने विभिन्न सैन्य क्षेत्रों में कर रहा है, जिनमें ताइवान स्ट्रेट, साउथ चाइना सी और भारत के साथ लगने वाली लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी के इलाके भी शामिल हैं। (China Atlas Drone Swarm System)

कैसे काम करता है यह स्वॉर्म सिस्टम

एटलस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसका नेटवर्क आधारित ऑपरेशन है। इसमें सभी ड्रोन आपस में जुड़े रहते हैं और लगातार डेटा शेयर करते हैं। अगर किसी एक ड्रोन को नुकसान पहुंचता है या वह नष्ट हो जाता है, तो बाकी ड्रोन तुरंत अपनी रणनीति बदल लेते हैं। वे नए तरीके से टारगेट को पहचानते हैं और मिशन को जारी रखते हैं। इस तरह यह सिस्टम किसी एक यूनिट पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि पूरी टीम की तरह काम करता है।

इस सिस्टम में “किल चेन” यानी लक्ष्य पहचानने से लेकर हमला करने तक की पूरी प्रक्रिया ऑटोमेटेड हो सकती है। इसका मतलब है कि ड्रोन खुद ही टारगेट को ढूंढ सकते हैं, उसे पहचान सकते हैं और उस पर हमला कर सकते हैं।

हालांकि दुनिया के कई देशों ने भी ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम डेवलप किए हैं। अमेरिका ने “पर्डिक्स” और “ऑफसेट” जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम किया है, जो 100 से ज्यादा माइक्रो ड्रोन और करीब 250 अनमैन्ड सिस्टम लॉन्च कर सकते हैं। चीन का “मदरशिप” ड्रोन भी 100 से 150 ड्रोन छोड़ने की क्षमता रखता है। लेकिन एटलस सिस्टम की खासियत सिर्फ इसकी संख्या नहीं है, बल्कि उनकी इंटेलिजेंस और आपसी तालमेल है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे सिस्टम एयर डिफेंस के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। जब एक साथ इतने सारे ड्रोन हमला करते हैं, तो उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। इससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है और संसाधनों का तेजी से इस्तेमाल होता है। (China Atlas Drone Swarm System)

भारत के लिए क्यों है बड़ी चुनौती

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम एयर डिफेंस के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। जब एक साथ इतने सारे ड्रोन हमला करते हैं, तो उन्हें रोकना आसान नहीं होता। इससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है और रिसोर्सेज का तेजी से इस्तेमाल होता है।

चीन इस सिस्टम को खासतौर पर सीमावर्ती इलाकों में इस्तेमाल कर सकता है। तिब्बत क्षेत्र में चीन ने सड़क और रेल नेटवर्क को काफी मजबूत किया है, जिससे ऐसे सिस्टम को जल्दी तैनात किया जा सकता है।

अगर इस तरह के ड्रोन स्वॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह आगे की चौकियों तक जाने वाले रास्तों और सप्लाई लाइनों को निशाना बना सकता है। इससे सेना के लॉजिस्टिक्स और मूवमेंट पर असर पड़ सकता है। (China Atlas Drone Swarm System)

जामिंग से बचने की क्षमता

आमतौर पर ड्रोन को रोकने के लिए जामिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें उनके कम्युनिकेशन सिस्टम को बाधित किया जाता है। लेकिन स्वॉर्म सिस्टम में यह काम आसान नहीं होता।

एटलस सिस्टम के ड्रोन आपस में लगातार जानकारी साझा करते रहते हैं और अगर एक लिंक टूटता है, तो वे दूसरा रास्ता चुन लेते हैं। इस वजह से इन्हें पूरी तरह जाम करना मुश्किल हो जाता है।

चीन की सेना ने इस सिस्टम के कई परीक्षण किए हैं। मार्च महीने में इसका एक बड़ा डेमो भी किया गया, जिसमें इसकी लॉन्च क्षमता, कंट्रोल सिस्टम और ड्रोन के बीच तालमेल को दिखाया गया। इस डेमो के बाद से यह सिस्टम वैश्विक स्तर पर चर्चा में आ गया है और इसे आधुनिक युद्ध के नए ट्रेंड के रूप में देखा जा रहा है। (China Atlas Drone Swarm System)

डीआरडीओ बना रहा 500 किमी तक ‘हैकप्रूफ’ कम्युनिकेशन नेटवर्क, दुश्मन के साइबर अटैक होंगे फेल

DRDO QKDN Technology
Photo: PIB (For Reference Only)

DRDO QKDN Technology: साइबर सिक्योरिटी और सुरक्षित कम्युनिकेशन को लेकर डीआरडीओ बड़ी तैयारी कर रहा है। डीआरडीओ ने क्वांटम टेक्नोलॉजी पर आधारित हैकप्रूफ कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी को और विस्तृत रूप देने जा रहा है। डीआरडीओ ने 500 किमी तक हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन के लिए “एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट” यानी ईओआई नोटिस जारी किया है। इसके तहत ‘क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क’ (QKDN) सिस्टम बनाया जाएगा।

क्या है DRDO QKDN Technology?

QKDN का पूरा नाम है क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन ओवर नेटवर्क। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी तकनीक है, जिसमें डेटा को सुरक्षित रखने के लिए क्वांटम फिजिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें दो जगहों के बीच एक खास तरह की “की” यानी कोड भेजी जाता है, जो डेटा को एन्क्रिप्ट करती है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अगर कोई तीसरा व्यक्ति इस कम्युनिकेशन को बीच में पकड़ने की कोशिश करता है, तो सिस्टम तुरंत पहचान लेता है कि कोई हैकिंग की कोशिश कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि क्वांटम सिस्टम में सिग्नल को छूते ही उसकी स्थिति बदल जाती है। इसी वजह से इसे “अनहैकबल” या बेहद सुरक्षित कम्युनिकेशन माना जाता है।

QKDN सिस्टम कैसे करता है काम?

डीआरडीओ के नए प्रोजेक्ट में अब केवल दो पॉइंट के बीच नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क में क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को जोड़ने की योजना है। इसका मतलब है कि स्टार, रिंग, हाइब्रिड और पॉइंट-टू-पॉइंट जैसे अलग-अलग नेटवर्क टोपोलॉजी में यह सिस्टम काम करेगा।

इस प्रोजेक्ट का टारगेट है कि लगभग 500 किलोमीटर तक की दूरी में सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क बनाया जाए। इसके लिए क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स और सॉफ्टवेयर डिफाइंड नेटवर्किंग (SDN) का इस्तेमाल किया जाएगा। एसडीएन एक ऐसा सिस्टम होता है, जिसमें नेटवर्क को सॉफ्टवेयर के जरिए कंट्रोल किया जाता है, जिससे उसे जरूरत के हिसाब से जल्दी बदला जा सके।

स्वदेशी तकनीक पर फोकस

इस प्रोजेक्ट में COTS यानी कमर्शियल ऑफ द शेल्फ प्रोडक्ट्स का स्वदेशी वर्जन इस्तेमाल किया जाएगा। यानी भारत में ही बने हुए सिस्टम को नेटवर्क में लगाया जाएगा और उसे एसडीएन के साथ जोड़ा जाएगा।

डीआरडीओ की योजना है कि यह पूरा सिस्टम देश में ही डिजाइन और डेवलप हो, ताकि डिफेंस और अन्य महत्वपूर्ण सेक्टर के लिए पूरी तरह सुरक्षित और कंट्रोल्ड नेटवर्क तैयार किया जा सके।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 500 किलोमीटर के नेटवर्क को कवर करने के लिए कई क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट्स लगाई जाएंगी। इनमें डीपीएस क्यूकेडी (Differential Phase Shift) और सीओडब्ल्यू क्यूकेडी (Coherent One-Way) यूनिट्स शामिल होंगी, जो नेटवर्क में अलग-अलग जगहों पर लगाकर पूरे सिस्टम को सुरक्षित बनाएंगी। इसके साथ एसडीएन के जरूरी कंपोनेंट्स भी लगाए जाएंगे।

हालांकि डीआरडीओ ने साफ किया है कि ये संख्या और डिजाइन भविष्य में बदल भी सकते हैं, क्योंकि यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है और आगे की जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव किया जाएगा।

पहले भी हो चुके हैं सफल परीक्षण

भारत में क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम नया नहीं है। पहले भी डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर कई अहम टेस्ट किए हैं। साल 2022 में पहली बार प्रयागराज और विंध्याचल के बीच 100 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक बनाया गया था। यह देश का पहला इंटर-सिटी क्यूकेडी डेमो था, जिसमें टेलीकॉम ग्रेड ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल किया गया था।

इससे पहले 2020 में हैदराबाद में डीआरडीओ की दो लैब्स के बीच भी क्यूकेडी का शुरुआती टेस्ट किया गया था। इसके बाद 2024 में 100 किलोमीटर लंबी फाइबर लाइन पर क्वांटम की ट्रांसमिशन को सफलतापूर्वक दिखाया गया।

फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन में बड़ी उपलब्धि

पिछले साल 16 जून को डीआरडीओ और आईआईटी दिल्ली ने मिल कर बिना फाइबर की मदद के हवा के जरिए क्वांटम कम्युनिकेशन का डेमो किया गया था। इस प्रयोग में एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर लेजर आधारित ऑप्टिकल लिंक के जरिए सुरक्षित की ट्रांसफर की गई।

इस दौरान सिक्योर की रेट करीब 240 बिट्स प्रति सेकंड रहा और एरर रेट 7 प्रतिशत से कम था, जो इस तरह के सिस्टम के लिए अच्छा माना जाता है। इस तरह का फ्री-स्पेस सिस्टम पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में बेहद उपयोगी है, जहां फाइबर केवल बिछाना मुश्किल होता है।

क्यों जरूरी है यह तकनीक

आज के डिजिटल युग में जहां डेटा ही सबसे बड़ी ताकत है, उनमें ज्यादातर कम्युनिकेशन सिस्टम क्लासिकल एन्क्रिप्शन पर आधारित होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे क्वांटम कंप्यूटर विकसित हो रहे हैं, वैसे-वैसे पुराने एन्क्रिप्शन सिस्टम को हैक करने का खतरा बढ़ रहा है। DRDO QKDN Technology भारत के सिक्योरिटी सिस्टम में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। क्योंकि  500 किमी तक बनने वाले इस हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन नेटवर्क के तैयार होने से न केवल हमारी सैन्य सूचनाएं सुरक्षित होंगी, बल्कि दुश्मन के बड़े से बड़े साइबर अटैक भी पूरी तरह विफल हो जाएंगे।

ऐसे में क्यूकेडी और क्यूकेडीएन जैसी तकनीक भविष्य की जरूरत बनती जा रही है। इसका इस्तेमाल डिफेंस कम्युनिकेशन, बैंकिंग नेटवर्क, डेटा सेंटर, 5जी और 6जी नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां डेटा की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी होती है। (DRDO QKDN Technology)

Pakistan NYT Censorship: न्यूयॉर्क टाइम्स की इस खबर से क्यों डरा पाकिस्तान? जानें पूरी सच्चाई

Pakistan NYT censorship

Pakistan NYT censorship: पाकिस्तान में मीडिया पर सेंसरशिप कितनी जबरदस्त है, इसका अंदाजा हाल ही में हुई एक घटना से लगाया जा सकता है। यह मामला अंतरराष्ट्रीय अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स से जुड़ा है। अखबार के मुताबिक पाकिस्तान में छपने वाले इसके इंटरनेशनल एडिशन से एक अहम खबर हटा दी गई। यह खबर पाकिस्तान के शिया समुदाय के गुस्से और उनके हालात से जुड़ी हुई थी। इस खबर से पाकिस्तान के हुक्मरान इतना घबरा गए कि उन्होंने इसे हटाने का फरमान जारी कर दिया। वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने खबर हटा तो दी, लेकिन पहले पन्ने पर छपी खबर के स्पेस को खाली छोड़ दिया और एक नोट लिख दिया, “यह खबर पाकिस्तान में प्रिंट होने से पहले हटा दी गई है और इसमें अखबार के एडिटोरियल स्टाफ की कोई भूमिका नहीं है।”

Pakistan Media Censorship: न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर क्यों हटाई गई?

इस खबर में पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बीच पाकिस्तान के शिया समुदाय के गुस्से और उनकी आवाज को दिखाया गया था। लेकिन पाकिस्तान में इसे छापने की अनुमति नहीं दी गई। यह पहली बार नहीं है जब न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर पाकिस्तान में रोकी गई हो। इससे पहले भी कुछ संवेदनशील विषयों पर खबरों को सेंसर किया जा चुका है।

NYT Report on Pakistan: क्या था ओरिजिनल आर्टिकल में?

इस खबर की हेडलाइन थी…ईरान युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका, अल्पसंख्यक समुदाय के तेहरान से रिश्तों के कारण जटिल हुई…

इसे न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जिया-उर-रहमान ने लिखा था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ देश के अंदर हालात संभालना मुश्किल हो रहा है।

पढ़ें ओरिजिनल खबर…

पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म कराने की बातचीत में एक अहम मध्यस्थ बन गया है, लेकिन उसके नेताओं के लिए देश के अंदर पैदा हो रहे असर को संभालना मुश्किल हो रहा है।

18 मार्च को, अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य वार्ताकार की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रमुख शिया धर्मगुरुओं को बैठक के लिए बुलाया था। दुनिया भर के कई शिया मुसलमान ईरान के सुप्रीम लीडर को अपना धार्मिक मार्गदर्शक मानते हैं, लेकिन उनकी हत्या की खबर के बाद पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में हालात बिगड़ गए। वहीं, इस बैठक को हिंसा फैलने की आशंका से रोकने की कोशिश के तौर पर देखा गया।

सेना के मीडिया विंग के अनुसार, फील्ड मार्शल ने धर्मगुरुओं से कहा, “किसी दूसरे देश में हुई घटना के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

Pakistan NYT censorship

बैठक में शामिल कुछ धर्मगुरुओं ने इसे तनावपूर्ण बताया और कहा कि उन्हें लगा जैसे पाकिस्तान ने उनकी वफादारी पर सवाल उठाया है। वहीं कुछ अन्य लोगों ने कहा कि सेना प्रमुख के बयान को गलत समझा गया और उन्होंने व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश के लिए उनकी सराहना की।

अयातुल्लाह खामेनेई के भाषण सुनकर बड़ी हुईं सैयदा फातिमा बटूल ने कहा कि उन्होंने भी लाखों अन्य शिया मुसलमानों की तरह उन्हें अपना धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शक माना है।

इस बीच, पाकिस्तान की कूटनीति को जहां अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य नेताओं से तारीफ मिली है, वहीं देश के लगभग 3.5 करोड़ शिया मुसलमानों के बीच असंतोष और बढ़ गया है। यह एक ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है, जो अक्सर आतंकी हिंसा का निशाना बनता रहा है।

ईरान में चल रहा युद्ध अब पाकिस्तान के अंदर एक बड़ा मुद्दा बन गया है। यह महंगाई और लंबे समय से चल रही बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। अधिकारियों को चिंता है कि इससे फिर से सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है और पाकिस्तान की “शांतिदूत” की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।

पाकिस्तान की लगभग 25 करोड़ की आबादी में शिया एक अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इस युद्ध ने उनके बीच वफादारी और पहचान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ लोग “विलायत अल-फकीह” नाम की विचारधारा को मानते हैं, जिसके तहत ईरान के सुप्रीम लीडर को शिया मुसलमानों पर धार्मिक और राजनीतिक अधिकार दिया जाता है।

30 वर्षीय शिया कार्यकर्ता सैयद अली ओवैस ने कहा, “हम पाकिस्तानी हैं।” उन्होंने 1 मार्च को कराची में हुए उस प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया था और जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी।

उन्होंने कहा, “लेकिन जब हमारे धार्मिक नेताओं पर हमला होता है, तो चुप रहना संभव नहीं है। और जब हम शोक मनाते हैं, तो हमें गोलियां मिलती हैं।” उन्होंने बताया कि उनके एक दोस्त सैयद अदील जैदी भी इस घटना में मारे गए।

कराची और देश के अन्य हिस्सों में शिया समुदाय के लोग रैलियों और निजी बैठकों में अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए शोक मना रहे हैं और उनके बेटे व उत्तराधिकारी मोजतबा खामेनेई के प्रति समर्थन जता रहे हैं। शिया धर्मगुरु इस संघर्ष को धार्मिक युद्ध के रूप में पेश कर रहे हैं और इसकी तुलना सातवीं सदी की करबला की लड़ाई से कर रहे हैं, जो शिया इतिहास की एक अहम घटना है।

25 साल की डॉक्टर सैयदा फातिमा बटूल ने बताया कि उनके बचपन से ही खामेनेई के भाषण सुनना उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा है। उनके घर, आसपास की गलियों और पूजा स्थलों में उनकी तस्वीरें हमेशा लगी रहती थीं।

उन्होंने कहा, “वह भले ही ईरान के राष्ट्राध्यक्ष रहे हों, लेकिन मैंने, और लाखों अन्य शिया मुसलमानों ने, उन्हें अपना धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शक चुना है।”

अमेरिकी दूतावास पर हुआ था हमला

जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई, तो पाकिस्तान के कई हिस्सों में शिया समुदाय के बीच गुस्सा फैल गया और कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए और हालात तनावपूर्ण हो गए थे।

कराची में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी कॉन्सुलेट पर धावा बोल दिया था, जिसके बाद अमेरिकी मरीन ने गोलीबारी की और कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई। इस्लामाबाद में डिप्लोमैटिक एन्क्लेव की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया। स्कर्दू में प्रदर्शनकारियों ने संयुक्त राष्ट्र के एक दफ्तर में आग लगा दी। वहीं स्थानीय सूत्रों के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान में भी कई लोगों की जान गई।

सूचना को रोकने पर उठे सवाल

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ईरान का युद्ध अब पाकिस्तान के अंदर एक बड़ा मुद्दा बन गया है। यह महंगाई और लंबे समय से चल रही बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा है। अधिकारियों को डर है कि इससे फिर से सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है।

इस खबर को हटाए जाने के बाद पाकिस्तान के पत्रकारों और मीडिया से जुड़े लोगों ने इसकी आलोचना की। उनका कहना है कि जनता को ऐसी खबरों से दूर रखना सही नहीं है। कुछ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सरकार नहीं चाहती कि लोग शिया समुदाय के गुस्से और असली स्थिति को समझें।

पाकिस्तान के पत्रकार अलिफ्या सोहैल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पाकिस्तान में छपे न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पेज को खाली छोड़ दिया गया, क्योंकि उसमें शिया समुदाय के नजरिए और सरकार की मध्यस्थता की कोशिशों पर रिपोर्ट थी। उन्होंने कहा कि सरकार नहीं चाहती कि लोग ऐसी खबर पढ़ें।

मुनीर ने कहा था धर्मगुरुओं से ईरान जाने के लिए

इससे पहले पिछले महीने रावलपिंडी में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने शिया धर्मगुरुओं से कहा था, “अगर आपको ईरान से इतना प्यार है, तो वहां चले जाओ।” इस बयान को लेकर काफी विवाद हुआ था।

पाकिस्तान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिया समुदाय रहता है, जो कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत है।

शिया धर्म गुरुओं ने इस बयान को अपमानजनक बताते हुए इसे भड़काऊ बताया और आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना अमेरिका और इजरायल के दबाव में काम कर रही है और देश के हितों के खिलाफ फैसले ले रही है।

शिया उलेमा काउंसिल के नेता अल्लामा सैयद सिब्तैन हैदर सब्जवारी ने भी जवाब देते हुए कहा कि अगर सेना प्रमुख को अमेरिका और इजरायल से इतना लगाव है, तो उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए।

मार्च में एक अन्य शिया धर्मगुरु शेख करामत हुसैन नजफी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी पार्टी से गाजा पीस बोर्ड से बाहर निकलने की मांग की थी। उनका आरोप था कि यह मंच बाहरी दबाव में बनाया गया है।

सेना प्रमुख का यह बयान उसी दिन आया था, जब पाकिस्तान ने खाड़ी क्षेत्र में ईरान की जवाबी कार्रवाई की आलोचना करने वाले अरब और इस्लामी देशों के समूह का समर्थन किया था।

DRDO ने लॉन्च किए दो नए आर्मर्ड प्लेटफॉर्म, WhAP से भी एडवांस है AAP, अमेरिकी स्ट्राइकर को दे रहा टक्कर!

AAP vs WhAP vs Stryker
Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled)

AAP vs WhAP vs Stryker: डीआरडीओ ने दो नए एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पेश किए हैं। इनमें एक ट्रैक्ड यानी चेन वाला व्हीकल है और दूसरा व्हील्ड यानी पहियों पर चलने वाला 8×8 प्लेटफॉर्म है। इन दोनों को महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में स्थित व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (VRDE) में लॉन्च किया गया। वहीं, इसके एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) का व्हील्ड वर्जन को पुराने व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (WhAP) का आधुनिक विकल्प माना जा रहा है। साथ ही, नया AAP अमेरिका के स्ट्राइकर को कड़ी टक्कर दे रहा है।

AAP vs WhAP vs Stryker: पूरी तरह देश में डिजाइन और डेवलप

ये दोनों आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पूरी तरह भारत में डिजाइन और डेवलप किए गए हैं। इन्हें आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। आज के समय में सेना को ऐसे वाहनों की जरूरत होती है जो तेज हों, ज्यादा सुरक्षित हों और अलग-अलग तरह के मिशन में इस्तेमाल किए जा सकें।

इसी को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ ने ट्रैक्ड और व्हील्ड दोनों तरह के वर्जन बनाए हैं, ताकि अलग-अलग इलाकों में इन्हें इस्तेमाल किया जा सके। (AAP vs WhAP vs Stryker)

30 मिमी क्रूलेस टरेट सबसे बड़ी खूबी

इन प्लेटफॉर्म्स की सबसे बड़ी खासियत इन पर लगा 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसका मतलब है कि इस टरेट में कोई क्रू बैठता नहीं है, बल्कि इसे रिमोट कंट्रोल या ऑटोमेटेड सिस्टम से चलाया जाता है।

इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप लगी है, साथ में 7.62 मिमी पीकेटी मशीन गन भी है। इसके अलावा यह एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी एटीजीएम भी लॉन्च कर सकता है।

यह वाहन दुश्मन के टैंक, बंकर और लो-फ्लाइंग टारगेट्स पर हमला कर सकता है। टरेट का डिजाइन ऐसा है कि इसे अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बदला भी जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

AAP vs WhAP vs Stryker
Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled)

खराब रास्तों पर चल सकता है

इन दोनों प्लेटफॉर्म्स में हाई पावर इंजन और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन दिया गया है। इससे ये तेजी से चलते हैं और मुश्किल रास्तों पर भी आसानी से आगे बढ़ते हैं।

इनका पावर टू वेट रेशियो बेहतर रखा गया है, यानी कम वजन में ज्यादा ताकत मिलती है। इससे यह वाहन ऊंची चढ़ाई, कीचड़, रेत और पत्थरीले इलाकों में भी आसानी से आगे बढ़ सकता है।

ट्रैक्ड वर्जन खास तौर पर पहाड़ और जंगल जैसे कठिन इलाकों के लिए उपयोगी है, जबकि व्हील्ड वर्जन सड़क और खुले मैदान में तेजी से चल सकता है।

एम्फीबियस क्षमता

इन प्लेटफॉर्म्स में एम्फीबियस क्षमता भी दी गई है, यानी यह पानी में भी चल सकते हैं। इसमें हाइड्रो जेट्स लगाए गए हैं, जिनकी मदद से यह नदी या तालाब जैसे पानी के रास्तों को पार कर सकते हैं।

सुरक्षा के लिए मजबूत प्रोटेक्शन

इन वाहनों में सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है। इन्हें STANAG लेवल 4 और लेवल 5 प्रोटेक्शन के हिसाब से डिजाइन किया गया है, जो नाटो का एक स्टैंडर्ड है।

इस पर भारी गोलीबारी और ब्लास्ट का भी कोई असर नहीं पड़ता। इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर ब्लास्ट और बैलिस्टिक प्रोटेक्शन दिया गया है, जिसे जरूरत के हिसाब से बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे वाहन के अंदर बैठे सैनिक सुरक्षित रहते हैं।

इन प्लेटफॉर्म्स में करीब 65 प्रतिशत तक स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसे आगे बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है।

इन प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों की भी अहम भूमिका रही है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज लिमिटेड ने इसमें सहयोग किया है। इसके अलावा कई छोटे और मझोले उद्योगों ने भी इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया है। इससे देश का डिफेंस इंडस्ट्री इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

AAP vs WhAP vs Stryker

ट्रैक्ड और व्हील्ड वर्जन में क्या है अंतर

भारत का भूगोल काफी अलग-अलग तरह का है, जिसमें पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और मैदान शामिल हैं। इसी वजह से सेना को अलग-अलग तरह के वाहनों की जरूरत होती है। एक पहियों पर चलता है (व्हील्ड 8×8) और दूसरा चेन या ट्रैक पर (ट्रैक्ड)। सेना दोनों का इस्तेमाल अलग-अलग परिस्थितियों में करती है, क्योंकि दोनों की ताकत अलग है।

स्पीड की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म सड़क पर काफी तेज चलता है। इसकी रफ्तार आम तौर पर 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। इसलिए यह लंबी दूरी जल्दी तय कर सकता है। वहीं ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म की स्पीड कम होती है, लगभग 50 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा, लेकिन इसकी असली ताकत स्पीड नहीं बल्कि कठिन इलाकों में चलने की क्षमता है।

जबकि ट्रैक्ड वाहन मिट्टी, बर्फ, पहाड़ और जंगल जैसे इलाकों में आसानी से चलता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन को पकड़कर आगे बढ़ते हैं। वहीं व्हील्ड वाहन ऐसे इलाकों में चल तो सकता है, लेकिन उसकी क्षमता सीमित होती है। यही वजह है कि पहाड़ी या दलदली इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।

वहीं, मेंटेनेंस के मामले में व्हील्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा आसान होता है। इसके पार्ट्स जल्दी बदल जाते हैं और खर्च भी कम आता है। ट्रैक्ड वाहन में चेन सिस्टम होता है, जिसकी देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है और खर्च भी ज्यादा होता है। इसलिए लंबे समय तक ऑपरेशन के लिए व्हील्ड प्लेटफॉर्म लॉजिस्टिक के लिहाज से आसान रहता है।

आवाज और स्टील्थ यानी छिपकर चलने की क्षमता भी अहम होती है। व्हील्ड वाहन कम आवाज करता है, जिससे दुश्मन को इसकी मौजूदगी का पता लगाना मुश्किल होता है। ट्रैक्ड वाहन ज्यादा आवाज करता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन से रगड़ खाते हुए चलते हैं। इस वजह से सरप्राइज मूवमेंट में व्हील्ड प्लेटफॉर्म को फायदा मिलता है।

वजन और ट्रांसपोर्ट के मामले में भी अंतर है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म आमतौर पर हल्का होता है, करीब 24 से 26 टन के आसपास, इसलिए इसे पुलों से पार कराना और लंबी दूरी तक ले जाना आसान होता है। ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भारी होता है और इसके लिए मजबूत पुल या खास ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है।

फायरिंग के दौरान स्थिरता की बात करें तो यहां ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म आगे रहता है। इसकी ग्रिप मजबूत होती है, जिससे चलते समय भी गन ज्यादा सटीक फायर कर सकती है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म में भी अच्छी स्टैबिलिटी होती है, लेकिन ट्रैक्ड जितनी नहीं। इसलिए भारी कॉम्बैट में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म को बेहतर गन प्लेटफॉर्म माना जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

AAP vs WhAP vs Stryker

इस्तेमाल की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म मैदान, रेगिस्तान, शहर और हाईवे जैसे इलाकों के लिए बेहतर है। यह काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में भी काम आता है, जहां तेजी से मूव करना जरूरी होता है। दूसरी तरफ ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पहाड़, जंगल और भारी लड़ाई वाले इलाकों के लिए बनाया जाता है, जहां जमीन कठिन होती है और ज्यादा ग्रिप की जरूरत होती है।

भारतीय सेना को दोनों तरह के प्लेटफॉर्म इसलिए चाहिए क्योंकि देश का भूगोल बहुत अलग-अलग तरह का है। पंजाब और राजस्थान जैसे मैदान और रेगिस्तान वाले इलाकों में व्हील्ड प्लेटफॉर्म तेजी से काम करता है। वहीं लद्दाख, हिमालय और उत्तर-पूर्व के इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद रहता है, क्योंकि वहां बर्फ, कीचड़ और ढलान ज्यादा होती है।

इन प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इन्हें अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
इनका इस्तेमाल इंफैंट्री कॉम्बैट, टोही मिशन, कमांड पोस्ट और एंटी टैंक ऑपरेशन जैसे कई रोल में किया जा सकता है। इससे एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

WhAP और नए AAP में क्या है अंतर

WhAP पहला मजबूत बेस था, और AAP उसी का अगला, ज्यादा एडवांस्ड वर्जन है। WhAP 8×8 दरअसल डीआरडीओ और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का बनाया हुआ एक पहियों वाला आर्मर्ड वाहन था। इसे इंफैंट्री को सुरक्षित तरीके से ले जाने और जरूरत पड़ने पर लड़ाई में इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसमें सैनिक अंदर बैठकर मूव करते थे और ऊपर लगे टरेट से फायरिंग होती थी। पुराने WhAP में आमतौर पर मैन्ड टरेट लगाया जाता था, यानी टरेट के अंदर भी सैनिक बैठता था, या फिर कुछ मामलों में रिमोट कंट्रोल्ड वेपन सिस्टम लगाया जाता था।

तकनीकी तौर पर WhAP करीब 24 टन वजन का होता है और इसमें लगभग 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया जाता है। यह पानी में भी चल सकता है, यानी इसमें एम्फीबियस क्षमता होती है। सुरक्षा के लिए इसमें STANAG लेवल 3 से 4 तक का प्रोटेक्शन दिया गया था, जो गोलियों और छोटे ब्लास्ट से बचाव करता है। इस प्लेटफॉर्म को मोरक्को जैसे देशों को एक्सपोर्ट भी किया गया और भारत में कुछ सुरक्षा बलों ने भी इसका इस्तेमाल किया। (AAP vs WhAP vs Stryker)

वहीं, नए Advanced Armoured Platform यानी AAP की बत करें, तो यह उसी WhAP का अगला और ज्यादा आधुनिक रूप है। सबसे बड़ा बदलाव इसके टरेट में है। नए AAP में 30 मिमी का क्रूलेस टरेट लगाया गया है। क्रूलेस का मतलब है कि टरेट के अंदर कोई सैनिक नहीं बैठता, बल्कि इसे पूरी तरह रिमोट से ऑपरेट किया जाता है। इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि सैनिक वाहन के अंदर सुरक्षित रहते हैं और उन्हें सीधे खतरे का सामना नहीं करना पड़ता।

इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप के साथ 7.62 मिमी की मशीन गन भी लगी होती है। इसके अलावा इसमें एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM लॉन्च करने की क्षमता भी होती है। सुरक्षा के मामले में भी नया AAP काफी आगे है। इसमें STANAG लेवल 4 और 5 तक का प्रोटेक्शन दिया गया है, जो पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। इसमें मॉड्यूलर आर्मर लगाया गया है, यानी जरूरत के हिसाब से सुरक्षा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे यह अलग-अलग ऑपरेशन के हिसाब से खुद को ढाल सकता है।

डिजाइन की बात करें तो AAP पूरी तरह मॉड्यूलर है। एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग रोल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे इसे इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, कमांड पोस्ट, रेकी व्हीकल या मोर्टार कैरियर में बदला जा सकता है।

मोबिलिटी यानी चलने-फिरने की क्षमता भी बेहतर की गई है। इसमें हाई पावर इंजन और बेहतर पावर-टू-वेट रेशियो दिया गया है, जिससे यह तेज रफ्तार से चल सकता है और मुश्किल रास्तों को पार कर सकता है। पानी में चलने के लिए इसमें बेहतर हाइड्रो जेट सिस्टम लगाया गया है, जिससे इसकी एम्फीबियस क्षमता पहले से ज्यादा प्रभावी हो गई है।

इसके अलावा इसमें रन-फ्लैट टायर्स भी होते हैं, यानी अगर टायर को नुकसान भी हो जाए, तब भी वाहन कुछ दूरी तक चलता रह सकता है। साथ ही इसमें एडवांस्ड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो युद्ध के दौरान बेहतर जानकारी और कंट्रोल देते हैं।

वहीं ट्रैक्ड AAP एक बिल्कुल अलग और नया प्लेटफॉर्म है। इसे ट्रैक्ड इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल के तौर पर डेवलप किया गया है, जो भविष्य में पुराने बीएमपी-2 जैसे वाहनों की जगह ले सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

स्ट्राइकर और 8×8 AAP में क्या है अंतर

स्ट्राइकर और भारत का नया एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) दोनों ही 8×8 व्हील्ड आर्मर्ड व्हीकल हैं, लेकिन इनका डिजाइन और इस्तेमाल अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है। स्ट्राइकर अमेरिकी सेना के लिए बना एक हल्का और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म है, जबकि AAP भारत की परिस्थितियों—जैसे ऊंचाई, नदियां और अलग-अलग इलाकों—को ध्यान में रखकर तैयार किया गया नया और ज्यादा एडवांस्ड सिस्टम है।

वजन की बात करें तो स्ट्राइकर का वजन 16.5 से 19 टन के बीच है। वहीं AAP का वजन ज्यादा है, लगभग 24 से 26 टन। हल्का होने की वजह से स्ट्राइकर को एयरक्राफ्ट (जैसे सी-130) से आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। लेकिन ज्यादा वजन होने के बावजूद AAP में ताकत ज्यादा मिलती है।

इंजन पावर की बात करें, तो स्ट्राइकर में लगभग 350 हॉर्सपावर का इंजन होता है, जबकि AAP में करीब 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया गया है। AAP कठिन इलाकों जैसे पहाड़ या ऊंचाई वाले क्षेत्र में बेहतर काम कर सकता है। इसका पावर-टू-वेट रेशियो भी ज्यादा है, जो लगभग 24-25 एचपी/टन के आसपास माना जाता है, जबकि स्ट्राइकर में यह करीब 17-18 एचपी/टन है।

स्पीड दोनों की लगभग बराबर है। सड़क पर दोनों 90 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकते हैं। लेकिन असली फर्क पानी में देखने को मिलता है। स्ट्राइकर पूरी तरह एम्फीबियस नहीं है, सिर्फ सीमित पानी (फोर्डिंग) पार कर सकता है। दूसरी तरफ AAP में हाइड्रो जेट्स लगे होते हैं, जिससे यह पानी में 8 से 10 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है।

प्रोटेक्शन की बात करें, तो स्ट्राइकर में STANAG लेवल 3 से 4 तक की सुरक्षा मिलती है और इसमें IED ब्लास्ट से बचने के लिए डबल वी-हुल डिजाइन दिया गया है। वहीं AAP में STANAG लेवल 4 से 5 तक का प्रोटेक्शन मिलता है, जो ज्यादा मजबूत है। इसके साथ मॉड्यूलर आर्मर भी है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

अब फायरपावर की बात करें तो AAP यहां ज्यादा एडवांस्ड है। इसमें 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसके साथ 7.62 मिमी मशीन गन और एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM भी एक ही टरेट में इंटीग्रेटेड होती है।

स्ट्राइकर में 2.7 मिमी मशीन गन या 40 मिमी ग्रेनेड लॉन्चर लगा होता है। कुछ वर्जन में 30 मिमी गन भी होती है, लेकिन ATGM अलग सिस्टम के जरिए लगाया जाता है, जैसे TOW मिसाइल वाला अलग वेरिएंट या Javelin मिसाइल के साथ रिमोट वेपन स्टेशन। यानी AAP में फायरपावर ज्यादा इंटीग्रेटेड है।

दोनों वाहनों में 2 क्रू मेंबर और 9-10 सैनिक बैठ सकते हैं। मॉड्यूलर डिजाइन के मामले में भी दोनों मजबूत हैं। स्ट्राइकर के कई वेरिएंट हैं, जैसे एम्बुलेंस, कमांड, रिकॉन। वहीं, AAP को भी अलग-अलग रोल जैसे इंफैंट्री कॉम्बैट, कमांड पोस्ट या मोर्टार कैरियर के लिए बदला जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)