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INS विक्रांत पर खत्म हुई नेवी की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल एक्सरसाइज MILAN 2026, 40 से ज्यादा युद्धपोत और 29 एयरक्राफ्ट हुए शामिल

Indian Navy MILAN 2026 Exercise

MILAN 2026 Exercise: भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित मल्टीनेशनल मैरीटाइम एक्सरसाइज मिलन 2026 का समापन 25 फरवरी को सफलतापूर्वक किया गया। इस अभ्यास की क्लोजिंग सेरेमनी विशाखापत्तनम के तट के पास समुद्र में भारत के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर आयोजित हुई। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता ईस्टर्न फ्लीट के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग रियर एडमिरल आलोक आनंदा ने की। इस मौके पर सभी भाग लेने वाले देशों के कमांडिंग ऑफिसर्स और अधिकारी मौजूद रहे।

मिलन 2026 भारतीय नौसेना की एक प्रमुख मल्टीनेशनल मैरीटाइम एक्सरसाइज है, जिसमें इस बार रिकॉर्ड स्तर पर भागीदारी देखने को मिली। इस एक्सरसाइज में कुल 42 युद्धपोत और पनडुब्बियां शामिल हुईं, जबकि 29 एयरक्राफ्ट ने भी इसमें हिस्सा लिया। इनमें 18 जहाज मित्र देशों की नौसेनाओं के थे, जो इस अभ्यास में शामिल हुए। इसके अलावा फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों के मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट ने भी इस अभ्यास में हिस्सा लिया। (MILAN 2026 Exercise)

Indian Navy MILAN 2026 Exercise

यह अभ्यास ‘कैमराडरी, कोऑपरेशन और कोलैबोरेशन’ थीम के तहत आयोजित किया गया था। इसका मकसद विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और सहयोग को मजबूत करना था। इस एक्सरसाइज की शुरुआत हार्बर फेज से हुई, जिसमें अलग-अलग देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट एक्सचेंज प्रोग्राम और इंटरनेशनल मैरीटाइम सेमिनार का आयोजन किया गया। इसके साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम, क्रॉस-डेक विजिट और अलग-अलग जगहों पर इंटरैक्शन भी आयोजित किए गए। (MILAN 2026 Exercise)

हार्बर फेज के दौरान टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन और यंग ऑफिसर्स के लिए खास इंटरैक्शन प्रोग्राम भी आयोजित किए गए। इससे अलग-अलग देशों के नौसेना अधिकारियों को एक-दूसरे के अनुभव और कार्यशैली को समझने का मौका मिला। इसके अलावा खेल गतिविधियों के जरिए भी अनौपचारिक बातचीत और संबंध मजबूत करने की कोशिश की गई।

Indian Navy MILAN 2026 Exercise

इसके बाद एक्सरसाइज का सी फेज शुरू हुआ, जिसमें समुद्र में हाई-इंटेंसिटी ऑपरेशनल ड्रिल्स आयोजित की गईं। इन ड्रिल्स में एडवांस्ड वारफेयर तकनीकों पर फोकस किया गया, जिसमें इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वारफेयर, मैरीटाइम इंटरडिक्शन ऑपरेशन्स और सरफेस स्ट्राइक ऑपरेशन्स शामिल थे। इसके साथ ही कम्युनिकेशन एक्सरसाइज और क्रॉस-डेक फ्लाइंग ऑपरेशन्स भी किए गए, जिससे सभी देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल को और बेहतर बनाया गया। (MILAN 2026 Exercise)

इस दौरान लाइव फायरिंग एक्सरसाइज भी की गई, जिसमें गन फायर और एंटी-एयर फायरिंग शामिल रही। समुद्र में रियल टाइम कोऑर्डिनेशन, जॉइंट मिशन प्लानिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी खास ध्यान दिया गया। इस अभ्यास में शामिल सभी नौसेनाओं ने मिलकर हाई-टेम्पो टैक्टिकल ऑपरेशन्स को अंजाम दिया।

मिलन 2026 के दौरान विभिन्न देशों की नौसेनाओं ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर कई जटिल ऑपरेशन्स किए, जिससे समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। इस अभ्यास ने यह दिखाया कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक साथ मिलकर समुद्र में किसी भी स्थिति का सामना कर सकती हैं। (MILAN 2026 Exercise)

पीएम मोदी के जेरूसलम दौरे में भारत को मिल सकती है आयरन डोम आयरन बीम की सौगात! सुदर्शन चक्र शील्ड होगी मजबूत

Israel India Defence Deal 2026

Israel India Defence Deal 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 फरवरी को दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर इजराइल पहुंचे हुए हैं। यह इजराइल की उनकी दूसरी यात्रा है। बेन गुरियन एयरपोर्ट पर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुद उनका स्वागत किया। इस दौरान गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी भरी मुलाकात हुई। यह स्वागत प्रोटोकॉल से अलग माना गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जेरूसलम यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच बड़े रक्षा समझौते होने की उम्मीद है, जिनकी कुल कीमत लगभग 8 से 10 अरब डॉलर तक बताई जा रही है। इन समझौतों में मिसाइल, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों पर खास फोकस है। (Israel India Defence Deal 2026)

यात्रा के पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने इजराइली संसद केनेस्सेट में संबोधन दिया, जहां बहुत कम विदेशी नेताओं को बोलने का मौका मिलता है। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से मुलाकात की और यद वशेम होलोकॉस्ट मेमोरियल का दौरा किया। इस दौरान दोनों देशों के बीच इनोवेशन समिट और संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित हुई। (Israel India Defence Deal 2026)

Israel India Defence Deal 2026: रक्षा समझौतों पर खास फोकस

इस यात्रा का सबसे ज्यादा फोकस भारत और इजराइल के बीच रक्षा सहयोग को लेकर है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन समझौतों की कुल कीमत लगभग 8.6 से 10 अरब डॉलर के बीच बताई जा रही है। इन डील्स में एयर डिफेंस, मिसाइल, ड्रोन और एडवांस टेक्नोलॉजी से जुड़े कई बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।

इन समझौतों के तहत भारत को मल्टी लेयर एयर डिफेंस सिस्टम मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसमें आयरन डोम, डेविड स्लिंग और एरो जैसे सिस्टम शामिल हैं। इसके साथ ही आयरन बीम लेजर सिस्टम भी चर्चा में है, जो लेजर आधारित तकनीक से दुश्मन के टारगेट को नष्ट करने की क्षमता रखता है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब हाल के सालों में युद्ध के तरीके तेजी से बदले हैं। 2023 से 2025 के बीच हुए मिडिल ईस्ट युद्ध में इजराइल के एयर डिफेंस सिस्टम ने अपनी ताकत साबित की थी। वहीं मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ड्रोन, मिसाइल और साइबर हमलों से जुड़े खतरे भी सामने आए थे। इसी अनुभव के आधार पर भारत अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। (Israel India Defence Deal 2026)

मल्टी लेयर एयर डिफेंस सिस्टम की तैयारी

इस यात्रा के दौरान इजराइल के मल्टी-लेयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम के चार बड़े हिस्सों पर सहयोग की संभावना है। इनमें एरो मिसाइल डिफेंस सिस्टम, डेविड्स स्लिंग, आयरन डोम और आयरन बीम शामिल है, जो लेजर आधारित तकनीक से दुश्मन के टारगेट को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इनमें से आयरन डोम और आयरन बीम पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि अभी तक इन कंपनियों की तरफ से किसी अंतिम समझौते की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है।

वहीं, भारत पहले से ही रूस के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम, आकाश और बाराक जैसे सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। इजराइल के साथ सहयोग से इन सभी सिस्टम को बेहतर तरीके से जोड़ने और उनकी क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे भारत लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल, मध्यम दूरी के रॉकेट और क्रूज मिसाइल के साथ-साथ कम दूरी के खतरों से भी निपट सकेगा।

इस सहयोग के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी जोर दिया गया है, जिससे भारत में ही इन सिस्टम का उत्पादन और विकास किया जा सके। यह आत्मनिर्भर भारत पहल के अनुरूप है। (Israel India Defence Deal 2026)

मिसाइल और हथियारों पर समझौते

इसके अलावा हमलावर हथियारों के क्षेत्र में भी कई समझौते सामने आ सकते हैं। इनमें स्पाइस 1000 गाइडेड बम, रैम्पेज एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, आइस ब्रेकर नेवल क्रूज मिसाइल और एयर लोरा सुपरसोनिक मिसाइल शामिल हैं। इन हथियारों की खासियत यह है कि ये लंबी दूरी से सटीक निशाना लगाने में सक्षम हैं।

इसके अलावा स्पाइक एंटी टैंक मिसाइल भी इस सहयोग का हिस्सा है, जो जमीन पर मौजूद टारगेट को नष्ट करने में इस्तेमाल होती है। (Israel India Defence Deal 2026)

ड्रोन और निगरानी क्षमता में बढ़ोतरी

ड्रोन युद्ध के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच बड़े समझौते की उम्मीद है। इजराइल की कई कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं और अलग-अलग तकनीक पेश कर रही हैं। इनमें हर्मीस 900 ड्रोन को लेकर बड़ा समझौता होने की संभावना जताई जा रही है, जो निगरानी और ऑपरेशन दोनों में अहम भूमिका निभा सकता है। भारत में इसे “दृष्टि 10 स्टारलाइनर” के नाम से डेवलप किया जा रहा है।

यह ड्रोन लंबी दूरी तक निगरानी करने और कई तरह के मिशन को अंजाम देने में सक्षम है। इससे सीमा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी। (Israel India Defence Deal 2026)

एयर डिफेंस सिस्टम की रेंज से बाहर से हमला

रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ऐसी क्षमता भी विकसित करना चाहता है, जिससे वह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की रेंज से बाहर रहकर हमला कर सके। इज़राइल ने जून 2025 में ईरान के खिलाफ इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया था।

इजराइल से भारत को 34 फीसदी रक्षा निर्यात

भारत और इजराइल के बीच रक्षा संबंध पहले से ही मजबूत रहे हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच इजराइल के कुल रक्षा निर्यात का लगभग 34 फीसदी हिस्सा भारत को गया। इसी अवधि में दोनों देशों के बीच करीब 20.5 अरब डॉलर के रक्षा सौदे हुए।

2012 से 2017 के बीच दोनों देशों के रक्षा सौदों में तेजी से बढ़ोतरी हुई थी, जिसमें बाराक एयर डिफेंस सिस्टम का बड़ा समझौता भी शामिल था। इसके बाद 2017 से 2023 के बीच यह रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी, क्योंकि भारत ने “मेक इन इंडिया” पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। (Israel India Defence Deal 2026)

हालांकि 2024 के बाद स्थिति फिर बदलने लगी, जब इजराइली कंपनियों ने भारत में निवेश बढ़ाया और यहां अपनी सहायक कंपनियां स्थापित कीं। अब दोनों देश केवल खरीद तक सीमित नहीं रहकर संयुक्त उत्पादन और लंबी अवधि की साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

इस यात्रा के दौरान साइबर सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की योजना है। इन क्षेत्रों में संयुक्त प्रोजेक्ट्स और जॉइंट वेंचर शुरू किए जा सकते हैं।

कुल मिलाकर, यह दौरा भारत और इजराइल के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है, जिसमें आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई अहम कदम उठाए जा रहे हैं। (Israel India Defence Deal 2026)

लोंगेवाला से कच्छ के रन तक- 3400 किमी के सफर के बाद दिल्ली पहुंचा सेना का काफिला, भारत रणभूमि दर्शन एक्सपेडिशन का समापन

Bharat Ranbhoomi Darshan Expedition

Bharat Ranbhoomi Darshan Expedition: भारतीय सेना द्वारा आयोजित “भारत रणभूमि दर्शन एक्सपेडिशन 2026” का समापन नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में किया गया। इस एक्सपेडिशन को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने फ्लैग-इन किया। इस मौके पर कई वरिष्ठ सैन्य और नागरिक अधिकारी मौजूद रहे।

यह एक्सपेडिशन 3 फरवरी को गुजरात के द्वारका से शुरू हुआ था और लगभग 3400 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद दिल्ली पहुंचा। इस पूरी यात्रा का नेतृत्व भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी ने किया। इस अभियान का उद्देश्य देश के ऐतिहासिक युद्ध स्थलों और सीमावर्ती इलाकों को लोगों तक पहुंचाना था।

इस एक्सपेडिशन के दौरान टीम ने गुजरात और राजस्थान के कई महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा किया। इसमें भुज, रण ऑफ कच्छ, मुनाबाव, गदरा, लोंगेवाला, जैसलमेर, बीकानेर और अंबाला जैसे स्थान शामिल रहे। यह सभी इलाके भारत की सुरक्षा और सैन्य इतिहास से जुड़े हुए हैं।

यात्रा के दौरान सैनिकों ने कई ऐतिहासिक युद्ध स्थलों और स्मारकों पर जाकर देश के वीर जवानों को श्रद्धांजलि दी। खास तौर पर लोंगेवाला जैसे स्थानों पर टीम ने 1971 के युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को याद किया।

Bharat Ranbhoomi Darshan Expedition

इस एक्सपेडिशन में करीब 35 सदस्यीय दल शामिल था, जिसमें भारतीय सेना के साथ नौसेना और सीमा सुरक्षा बल के जवान भी शामिल थे।

पूरी यात्रा के दौरान यह काफिला सीमा क्षेत्रों की सड़कों और दुर्गम रास्तों से होकर गुजरा। इससे यह भी दिखाया गया कि सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार हुआ है। इन सड़कों का निर्माण सीमा सड़क संगठन यानी बीआरओ द्वारा किया गया है, जो सैन्य और नागरिक दोनों के लिए उपयोगी है।

इस एक्सपेडिशन का एक अहम पहलू लोगों से जुड़ाव भी रहा। यात्रा के दौरान टीम ने वीर नारियों, पूर्व सैनिकों, एनसीसी कैडेट्स, छात्रों और स्थानीय लोगों से मुलाकात की। हर स्थान पर लोगों ने इस काफिले का स्वागत किया और सेना के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

यह पहल “रणभूमि दर्शन” कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे भारतीय सेना और पर्यटन मंत्रालय मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं। इसका मकसद देश के ऐतिहासिक युद्ध स्थलों को पर्यटन से जोड़ना और युवाओं को देश के सैन्य इतिहास से परिचित कराना है।

सेना प्रमुख ने इस अवसर पर कहा कि इस तरह के अभियान देश की विरासत को सुरक्षित रखने के साथ-साथ नई पीढ़ी को देशसेवा के लिए प्रेरित करते हैं।

हेलीकॉप्टर की भारी कमी के बीच नौसेना का बड़ा फैसला! प्राइवेट सेक्टर से लीज पर लेने के लिए हुई मजबूर!

Indian Navy Helicopter Lease- Leonardo AW139
Leonardo AW139

Indian Navy Helicopter Lease: भारतीय नौसेना ने यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों की कमी को पूरा करने के लिए एक बड़ा और अहम कदम उठाया है। नौसेना ने पहली बार प्राइवेट सेक्टर से हेलीकॉप्टर लीज पर लेकर अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना शुरू किया है। इस कदम के तहत नौसेना ने AW139 यूटिलिटी हेलीकॉप्टर को “वेट लीज” मॉडल पर शामिल किया है। इनमें से एक हेलीकॉप्टर पूर्वी तट पर और दूसरा पश्चिमी तट पर तैनात किया गया है।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारतीय सेनाओं में हेलीकॉप्टर की कमी लंबे समय से बनी हुई है। इससे पहले भारतीय सेना भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर प्राइवेट कंपनियों से हेलीकॉप्टर लीज पर ले चुकी है। अब नौसेना ने भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अपनी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। (Indian Navy Helicopter Lease)

Indian Navy Helicopter Lease: क्या है वेट लीज

नौसेना ने यह हेलीकॉप्टर एक प्राइवेट ऑपरेटर कंपनी से लिया है, जो इन्हें ऑपरेट और मेंटेन भी करेगी। इसे वेट लीज कहा जाता है, जिसमें हेलीकॉप्टर के साथ पायलट, मेंटेनेंस और सपोर्ट स्टाफ भी उसी कंपनी के होते हैं। इस मॉडल से बिना लंबे इंतजार के नौसेना को तुरंत ऑपरेशनल क्षमता मिल जाती है।

फरवरी 2026 की शुरुआत में इन हेलीकॉप्टरों में से एक ने पूर्वी समुद्री क्षेत्र में उड़ान भरनी शुरू कर दी है। यह हेलीकॉप्टर यूटिलिटी रोल में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, कम्युनिकेशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और सर्च ऑपरेशन जैसे काम शामिल हैं। दूसरे हेलीकॉप्टर को पश्चिमी तट पर इसी तरह के कार्यों के लिए तैनात किया गया है। (Indian Navy Helicopter Lease)

2021 में 24 में हेलीकॉप्टर लीज पर लेने की थी तैयारी

नौसेना ने पहले भी साल 2021 में 24 हेलीकॉप्टर लीज पर लेने की योजना बनाई थी। इस योजना में ग्राउंड सपोर्ट, मेंटेनेंस और ट्रेनिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल थीं, लेकिन यह प्रोग्राम आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद नौसेना और कोस्ट गार्ड ने एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर मार्क-3 (एएलएच एमके3) को शामिल किया, लेकिन हाल के वर्षों में इन हेलीकॉप्टरों के साथ कई हादसे हुए।

इन हादसों में कुल चार हेलीकॉप्टर खो गए, जिनमें से दो मामलों में जान का नुकसान भी हुआ। 5 जनवरी 2025 को हुए एक बड़े हादसे के बाद पूरे एएलएच फ्लीट को कुछ समय के लिए ग्राउंड कर दिया गया था। जांच में एक तकनीकी खराबी सामने आई थी, जिसके बाद इस फ्लीट की उड़ान पर असर पड़ा। (Indian Navy Helicopter Lease)

सी किंग पड़ चुके हैं पुराने

इस बीच पुराने हेलीकॉप्टर जैसे अलुएट-3 और सी किंग भी धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं। नए हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में समय लग रहा है, जिससे नौसेना के सामने ऑपरेशनल गैप की स्थिति बन गई। इसी वजह से लीज मॉडल को फिर से अपनाया गया है।

नौसेना द्वारा लिए गए AW139 हेलीकॉप्टर सिविल एविएशन नियमों के तहत ऑपरेट किए जाएंगे। इसके लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी डीजीसीए द्वारा तय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार काम किया जाएगा। इन हेलीकॉप्टरों का उपयोग तटीय इलाकों, जहाजों और ऑफशोर एसेट्स के बीच आवाजाही के लिए किया जाएगा।

हालांकि इन हेलीकॉप्टरों में कुछ सीमाएं भी हैं। इनमें रेस्क्यू विंच और ब्लेड फोल्डिंग की सुविधा नहीं है, जिसकी वजह से इन्हें जहाजों पर सीधे ऑपरेशन के लिए सीमित रूप से इस्तेमाल किया जा सकेगा। ऐसे में इनका उपयोग मुख्य रूप से ट्रांजिट और सपोर्ट मिशन के लिए किया जाएगा। (Indian Navy Helicopter Lease)

लियोनार्डो के AW139 को चुना

इस लीज प्रक्रिया के लिए ईस्टर्न नेवल कमांड और वेस्टर्न नेवल कमांड ने टेंडर जारी किया था। इसमें दो भारतीय कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। प्रतिस्पर्धा के बाद लियोनार्डो कंपनी के AW139 हेलीकॉप्टर को चुना गया, जिसने एयरबस डॉफिन N3 हेलीकॉप्टर को पीछे छोड़ा।

भारत में रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत हेलीकॉप्टर लीज करने का प्रावधान डीएपी 2020 में शामिल किया गया है। इसके जरिए सेना और नौसेना जैसी सेवाएं अपनी तत्काल जरूरतों को तेजी से पूरा कर सकती हैं। इसी मॉडल पर भारतीय सेना पहले से ही उत्तरी कमान में हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल कर रही है।

वर्तमान में सेना के पास AS350 B3 और बेल 407 जैसे हल्के हेलीकॉप्टर प्राइवेट कंपनियों से लीज पर लिए गए हैं, जिनका इस्तेमाल कठिन इलाकों में लॉजिस्टिक्स और कम्युनिकेशन के लिए किया जा रहा है। अब नौसेना ने भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। (Indian Navy Helicopter Lease)

यूटिलिटी हेलीकॉप्टर-मैरीटाइम में है देरी

भारतीय नौसेना द्वारा हेलीकॉप्टर की कमी को पूरा करने के लिए प्राइवेट कंपनियों से चॉपर लीज पर लेने के बीच एक और अहम अपडेट सामने आया है। सेंटरम इलेक्ट्रॉनिक्स को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल से लगभग 66 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। यह ऑर्डर यूटिलिटी हेलीकॉप्टर-मैरीटाइम यानी यूएच-एम के लिए एईएसए रडार के डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़ा है, जिसे अगले दो साल में पूरा किया जाना है।

एईएसए रडार एक आधुनिक रडार तकनीक है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक करने और ज्यादा सटीक जानकारी देता है। इस रडार का इस्तेमाल यूएच-एम हेलीकॉप्टर में किया जाएगा, जो भविष्य में नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

हालांकि, इस ऑर्डर से यह भी साफ संकेत मिलता है कि यूएच-एम प्रोग्राम अभी शुरुआती चरण में है। रडार के डेवलपमेंट में ही दो साल लगने हैं, इसके बाद हेलीकॉप्टर में इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी होगी। ऐसे में इस हेलीकॉप्टर के ऑपरेशनल रूप से शामिल होने में अभी करीब 4 से 5 साल का समय लग सकता है। यही वजह है कि फिलहाल नौसेना को अपनी तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए लीज मॉडल का सहारा लेना पड़ रहा है। (Indian Navy Helicopter Lease)

भारतीय सेना को चाहिए नया ‘ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम’, स्वॉर्म अटैक से निपटने की है तैयारी, जारी की RFI

Military Drone Security Framework

Drone Interception System RFI: भारतीय सेना अब ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रही है। रूस-यूक्रेन जंग से सबक लेते हुए आर्मी एयर डिफेंस विंग एक अहम रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी किया है। जिसमें ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम की खरीद के लिए कंपनियों से जानकारी मांगी गई है। यह सिस्टम खास तौर पर छोटे और कम रडार सिग्नेचर वाले ड्रोन और यूएएस यानी अनमैन्ड एरियल सिस्टम से निपटने के लिए तैयार किया जाएगा। हाल के समय में ड्रोन और स्वॉर्म अटैक का खतरा तेजी से बढ़ा है, इसलिए सेना अब ऐसे सिस्टम की तलाश में है जो इन खतरों का सीधे मुकाबला कर सके। (Drone Interception System RFI)

Drone Interception System RFI: क्या है यह RFI और क्यों जारी हुआ?

यह आरएफआई सेना के एयर डिफेंस निदेशालय द्वारा जारी किया गया है और इसका मकसद कंपनियों से तकनीकी और ऑपरेशनल जानकारी जुटाना है। यह कोई फाइनल खरीद प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आगे आने वाले टेंडर और ट्रायल की तैयारी का पहला चरण माना जाता है। इसमें साफ किया गया है कि सरकार इस प्रक्रिया को कभी भी बदल या रद्द कर सकती है और यह पूरी प्रक्रिया डीएपी 2020 के नियमों के तहत आगे बढ़ेगी। (Drone Interception System RFI)

तीन हिस्सों में पूरा नेटवर्क

इस प्रस्तावित सिस्टम को ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम यानी डीआईएस कहा गया है। यह एक ऐसा सिस्टम होगा जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोक सके और उन्हें नष्ट कर सके। इसमें तीन मुख्य हिस्से होंगे, जिनमें एक ड्रोन सेंसर, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और चार ड्रोन इंटरसेप्टर शामिल होंगे। इन तीनों हिस्सों के जरिए पूरा सिस्टम मिलकर काम करेगा और दुश्मन के ड्रोन पर नजर रखने से लेकर उसे खत्म करने तक का पूरा काम करेगा। (Drone Interception System RFI)

ड्रोन सेंसर: आसमान पर 360 डिग्री नजर

ड्रोन सेंसर इस सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा होगा। यह सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा। इसका काम आसमान में हर दिशा में नजर रखना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को पहचानना, ट्रैक करना और उनकी प्राथमिकता तय करना होगा। यह सेंसर बहुत छोटे ड्रोन को भी कई किलोमीटर दूर से पकड़ सकेगा और उनकी लोकेशन, दिशा और ऊंचाई की जानकारी देगा। (Drone Interception System RFI)

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन: पूरा ऑपरेशन यहीं से कंट्रोल

इसके बाद यह जानकारी ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचेगी। यह स्टेशन एक तरह का कंट्रोल सेंटर होगा, जिसमें लैपटॉप या टैबलेट आधारित सिस्टम होगा। इसमें ऑपरेटर को सभी जरूरी जानकारी रियल टाइम में दिखाई देगी। यह स्टेशन ड्रोन इंटरसेप्टर को कमांड देगा और उसे टारगेट तक पहुंचाएगा। इसमें डेटा रिकॉर्डिंग की सुविधा भी होगी, जिससे मिशन के बाद पूरा विश्लेषण किया जा सकेगा। यह स्टेशन आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा और फील्ड में जल्दी तैनात किया जा सकेगा। (Drone Interception System RFI)

ड्रोन इंटरसेप्टर: हवा में ही दुश्मन का खात्मा

ड्रोन इंटरसेप्टर इस पूरे सिस्टम का सबसे एक्टिव पार्ट होगा। यह एक खास तरह का ड्रोन होगा जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही खत्म करेगा। इसमें दो तरह की क्षमता होगी, एक काइनेटिक यानी सीधे टक्कर मारकर दुश्मन ड्रोन को गिराना और दूसरा हाई एक्सप्लोसिव यानी विस्फोट के जरिए उसे नष्ट करना। यह इंटरसेप्टर पूरी तरह ऑटोमैटिक होगा और फायर एंड फॉरगेट तकनीक पर काम करेगा। यानी एक बार लॉन्च होने के बाद यह खुद ही लक्ष्य तक पहुंचकर हमला करेगा।

हर इलाके में तैनाती के लिए तैयार

इस सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह हर तरह के भारतीय इलाके में काम कर सके। चाहे रेगिस्तान हो, पहाड़ी इलाका हो, समुद्र के पास का क्षेत्र हो या फिर ऊंचाई वाले इलाके, हर जगह यह सिस्टम काम करने में सक्षम होगा। इसे माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तापमान तक चलाने की क्षमता रखनी होगी और नमी वाले वातावरण में भी यह काम कर सकेगा। (Drone Interception System RFI)

आकाशतीर से इंटीग्रेशन

इस सिस्टम की एक खास बात यह भी है कि इसे मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम और आकाशतीर जैसे नेटवर्क से जोड़ा जा सकेगा। इससे सेना को एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल मिलेगा और सभी सिस्टम आपस में जुड़कर तेजी से काम कर सकेंगे। इसमें एंटी-जैमिंग क्षमता भी होगी, जिससे दुश्मन अगर इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की कोशिश करे तो भी सिस्टम सही तरीके से काम करता रहेगा।

सॉफ्टवेयर और AI की भूमिका

इसमें इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर पूरी तरह स्वदेशी होगा और भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक को इंटीग्रेट करने की भी संभावना रखी गई है। सिस्टम में डेटा स्टोरेज की सुविधा भी होगी, जिससे एक महीने तक का डेटा सुरक्षित रखा जा सकेगा और बाद में उसे ट्रेनिंग या विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

स्वदेशी तकनीक पर जोर

सेना ने इस आरएफआई में कंपनियों के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं। इसमें कहा गया है कि कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा स्वदेशी होना चाहिए। यानी सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले उपकरण, सॉफ्टवेयर और कंपोनेंट भारत में बने होने चाहिए। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

कंपनियों को अपनी जानकारी 25 मार्च तक जमा करनी होगी। इसके बाद सेना इन प्रस्तावों का अध्ययन करेगी और आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसमें ट्रायल, टेक्निकल इवैल्यूएशन और कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन जैसे कई चरण शामिल होंगे।

इस पूरी प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को भी मौका दिया जा रहा है। छोटे उद्यमों के लिए कुछ वित्तीय शर्तों में छूट भी दी गई है, ताकि ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियां इसमें भाग ले सकें। (Drone Interception System RFI)

बढ़ते ड्रोन खतरे के बीच अहम पहल

इस सिस्टम की जरूरत इसलिए महसूस की जा रही है क्योंकि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे ड्रोन भी अब बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं और स्वॉर्म अटैक यानी एक साथ कई ड्रोन के हमले को रोकना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में यह ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम सेना की सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। (Drone Interception System RFI)

Su-30MKI अपग्रेड पर बड़ा अपडेट! भारतीय वायुसेना ने अपनाई ड्यूल ट्रैक स्ट्रैटेजी, रूस के साथ पैरेलल प्लान शुरू

Super Sukhoi Upgrade

Super Sukhoi Upgrade: भारतीय वायुसेना अपने सबसे बड़े फाइटर जेट बेड़े सु-30एमकेआई को अपग्रेड करने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है। “सुपर सुखोई अपग्रेड” नाम से चल रहे इस प्रोग्राम को अभी तक कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। इसी देरी के चलते वायुसेना अब एक साथ दो विकल्पों पर काम करने की योजना बना रही है, जिसे ड्यूल-ट्रैक स्ट्रैटेजी कहा जा रहा है।

इस रणनीति के तहत एक तरफ स्वदेशी अपग्रेड प्रोग्राम जारी रहेगा, वहीं दूसरी तरफ रूस के साथ मिलकर एक पैरेलल अपग्रेड प्लान पर भी विचार किया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारी पर कोई असर न पड़े। (Super Sukhoi Upgrade)

Super Sukhoi Upgrade: क्या है सुपर सुखोई प्रोग्राम

सुपर सुखोई प्रोग्राम के तहत भारतीय वायुसेना के सु-30एमकेआई फाइटर जेट्स को आधुनिक बनाया जाना है। शुरुआत में करीब 84 विमानों को अपग्रेड करने की योजना है, लेकिन आगे चलकर पूरी फ्लीट के बड़े हिस्से को अपग्रेड करने का टारगेट रखा गया है। फिलहाल वायुसेना के पास लगभग 260 से ज्यादा सु-30एमकेआई विमान हैं।

इस प्रोग्राम में स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया जा रहा है। इसमें डीआरडीओ और एचएएल मिलकर काम कर रहे हैं। अपग्रेड के तहत नए रडार, आधुनिक एवियोनिक्स, डिजिटल कॉकपिट और बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम लगाए जाने हैं। (Super Sukhoi Upgrade)

देरी क्यों बनी चिंता की वजह

इस प्रोजेक्ट को नवंबर 2023 में शुरुआती मंजूरी यानी एओएन मिल चुकी थी, लेकिन अंतिम मंजूरी अभी बाकी है। अधिकारियों के अनुसार, अगर मंजूरी जल्द भी मिलती है तो इस पूरे अपग्रेड को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। शुरुआती ऑपरेशनल क्लियरेंस में लगभग पांच साल और पूरी तरह तैयार होने में सात साल तक का समय लग सकता है।

यही वजह है कि वायुसेना केवल इसी प्रोग्राम पर निर्भर नहीं रहना चाहती और उसने दूसरा विकल्प भी तलाशना शुरू कर दिया है। (Super Sukhoi Upgrade)

रूस के साथ पैरेलल अपग्रेड प्लान

सूत्रों के अनुसार, वायुसेना रूस के साथ मिलकर सु-30 के लिए एक अलग अपग्रेड प्लान पर विचार कर रही है। हाल ही में रूस की एक टीम ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक प्लांट का दौरा भी किया है।

इस पैरेलल प्लान में खास तौर पर रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा रूस ने नए और ज्यादा ताकतवर एएल-41एफ-1 इंजन देने का प्रस्ताव भी रखा है, जिसे वर्तमान एएल-31 इंजन से बेहतर माना जाता है। नया इंजन 15 फीसदी ज्यादा थ्रस्ट देता है। (Super Sukhoi Upgrade)

दोनों ट्रैक कैसे करेंगे काम

इस योजना के तहत भारत और रूस दोनों अपने-अपने हिस्से का काम करेंगे। भारत में एचएएल और डीआरडीओ सिस्टम का इंटीग्रेशन और डेवलपमेंट करेंगे, जबकि रूस से कुछ जरूरी तकनीक और उपकरण लिए जा सकते हैं। यह मॉडल पहले मिग-21 बाइसन अपग्रेड में भी अपनाया गया था।

इसका उद्देश्य यह है कि अपग्रेड का काम तेजी से हो और वायुसेना के बेड़े में किसी तरह की क्षमता की कमी न आए। (Super Sukhoi Upgrade)

विरूपाक्ष एईएसए रडार की तैयारी

स्वदेशी अपग्रेड में विरूपाक्ष एईएसए रडार लगाया जाएगा, जो मौजूदा रडार से ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। इसमें गैलियम नाइट्राइड तकनीक का इस्तेमाल होगा, जिससे दुश्मन को ज्यादा दूरी से पहचानना संभव होगा।

इसके अलावा इन विमानों में ब्रह्मोस-ईआर मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल जैसे आधुनिक हथियार शामिल किए जाएंगे। इससे विमान की मारक क्षमता और बढ़ेगी। जबकि इंडीजीनियस कंटेंट 70 से 78 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। (Super Sukhoi Upgrade)

क्यों जरूरी है यह अपग्रेड

भारतीय वायुसेना के सामने स्क्वाड्रन की संख्या से जुड़ी चुनौती भी है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास जरूरी संख्या से कम स्क्वाड्रन हैं। ऐसे में मौजूदा विमानों को आधुनिक बनाना जरूरी हो जाता है, ताकि उनकी क्षमता बनी रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए वायुसेना ने यह ड्यूल-ट्रैक रणनीति अपनाने का फैसला किया है, जिसमें स्वदेशी और विदेशी दोनों विकल्पों को साथ लेकर चलने की कोशिश की जा रही है। (Super Sukhoi Upgrade)

ब्रह्मोस से लैस स्टेल्थ वॉरशिप INS तारागिरी नौसेना में होगा शामिल, Project 17A का चौथा युद्धपोत 14 मार्च को होगा कमीशन

INS Taragiri

INS Taragiri Commissioning: आईएनएस अंजदीप के बाद भारतीय नौसेना 14 मार्च को अपने बेड़े में एक और आधुनिक वॉरशिप शामिल करने जा रही है। आईएनएस तारागिरी को विशाखापत्तनम में आयोजित समारोह में आधिकारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार नीलगिरी क्लास का चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे ईस्टर्न नेवल कमांड में शामिल किया जाएगा।

तारागिरी को पूरी तरह भारत में डिजाइन और तैयार किया गया है। इसे मुंबई स्थित मजगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने बनाया है और पिछले साल 28 नवंबर को नौसेना को सौंपा गया था। इस जहाज को तैयार होने में करीब 81 महीने का समय लगा, जो पहले बने जहाजों की तुलना में कम है। (INS Taragiri Commissioning)

INS Taragiri Commissioning: पुराने नाम को नई पहचान

प्रोजेक्ट 17ए यानी नीलगिरि क्लास के युद्धपोतों के नाम रखने की एक खास परंपरा भारतीय नौसेना में लंबे समय से चली आ रही है। इन जहाजों के नाम भारत की अलग-अलग पर्वत श्रृंखलाओं के नाम पर रखे जाते हैं। यह परंपरा नई नहीं है, बल्कि पुराने नीलगिरि क्लास जहाजों के समय से ही जारी है और आज भी उसी तरह निभाई जा रही है।

इसी वजह से इस क्लास के जहाजों के नाम जैसे नीलगिरि, हिमगिरि, उदयगिरि, द्रोणागिरि, विंध्यगिरि और महेंद्रगिरि रखे गए हैं। ये सभी नाम भारत की अलग-अलग पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं और देश की भौगोलिक पहचान को दर्शाते हैं। (INS Taragiri Commissioning)

इसी परंपरा के तहत नए युद्धपोत का नाम तारागिरी रखा गया है। यह नाम उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय क्षेत्र की एक पर्वत श्रृंखला से लिया गया है। तारागिरी कोई बहुत बड़ी रेंज नहीं है, लेकिन यह हिमालय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है और भारत की प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है।

तारागिरी नाम रखने के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण भी है। यह नया युद्धपोत पुराने आईएनएस तारागिरी का ही एक तरह से “पुनर्जन्म” है। पुराना आईएनएस तारागिरी एक लिअंडर क्लास फ्रिगेट था, जिसने 1980 से 2013 तक करीब 33 साल तक भारतीय नौसेना में सेवा दी थी। वह जहाज भी इसी तारागिरी पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखा गया था।

अब नए युद्धपोत को वही नाम देकर उसकी पुरानी विरासत को आगे बढ़ाया गया है। भारतीय नौसेना में यह परंपरा रही है कि जो नाम पहले सफल और सम्मानित रहे हैं, उन्हें नए और आधुनिक जहाजों को दिया जाता है, ताकि उनकी पहचान और गौरव बना रहे। नया तारागिरी उसी नाम को आगे बढ़ाता है, लेकिन तकनीक और क्षमता के मामले में यह पूरी तरह आधुनिक है। इसे मल्टी-रोल फ्रिगेट के रूप में डिजाइन किया गया है, यानी यह एक साथ कई तरह के ऑपरेशन कर सकता है। (INS Taragiri Commissioning)

वजन लगभग 6,670 टन

यह जहाज करीब 149 मीटर लंबा है और इसका कुल वजन लगभग 6,670 टन है। इसमें करीब 225 से 226 कर्मियों की तैनाती की जा सकती है। जहाज में ऑटोमेशन का ज्यादा इस्तेमाल किया गया है, जिससे कम लोगों में भी यह आसानी से ऑपरेट हो सकता है।

इसकी रफ्तार 28 नॉट्स से ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक बिना रुके ऑपरेशन कर सकता है। इसमें दो हेलीकॉप्टर रखने की सुविधा भी है, जिनमें ध्रुव, सी किंग या चेतक जैसे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। (INS Taragiri Commissioning)

स्टेल्थ तकनीक की खासियत

आईएनएस तारागिरी में स्टेल्थ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह दुश्मन के रडार पर आसानी से दिखाई नहीं देता। इसकी डिजाइन इस तरह बनाई गई है कि इसका रडार सिग्नेचर कम हो और यह कम शोर पैदा करे। इससे यह समुद्र में दुश्मन की नजर से बचकर काम कर सकता है। तारागिरी को खास तौर पर समुद्र में उभरते खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। यह दुश्मन के जहाज, मिसाइल और पनडुब्बियों से लड़ने में सक्षम है। (INS Taragiri Commissioning)

ताकतवर हथियारों से है लैस

इस युद्धपोत में कई आधुनिक हथियार लगाए गए हैं। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल लगाई गई है, जो बहुत तेज गति से लंबी दूरी तक हमला कर सकती है। इसके अलावा इसमें एमआर-सैम एयर डिफेंस सिस्टम है, जो हवाई खतरों से सुरक्षा देता है।

जहाज में 76 मिमी की मुख्य तोप लगी है, जो समुद्र और जमीन दोनों पर हमला कर सकती है। इसके अलावा 30 मिमी की गन और 12.7 मिमी मशीन गन भी मौजूद हैं, जो नजदीकी खतरों से सुरक्षा देती हैं। पनडुब्बियों से निपटने के लिए इसमें टॉरपीडो और एंटी-सबमरीन रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। (INS Taragiri Commissioning)

आधुनिक रडार और सेंसर सिस्टम भी लगे

तारागिरी में एडवांस रडार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं। इसमें मल्टी-फंक्शन रडार, सोनार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल हैं, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। यह सिस्टम दुश्मन के जहाज, मिसाइल और पनडुब्बियों को ट्रैक करने में मदद करते हैं।

यह जहाज नेटवर्क-इनेबल्ड सिस्टम से जुड़ा है, जिससे यह अन्य युद्धपोतों और कमांड सेंटर के साथ रियल टाइम में जानकारी साझा कर सकता है। (INS Taragiri Commissioning)

डीजल इंजन और गैस टरबाइन दोनों

इस जहाज में सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इसमें डीजल इंजन और गैस टरबाइन दोनों का इस्तेमाल होता है। इससे जहाज को तेज गति और बेहतर ईंधन क्षमता मिलती है। इसके साथ इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है, जो पूरे सिस्टम को कंट्रोल करता है। इसकी स्पीड 28 नॉट्स से ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक बिना रुके ऑपरेशन कर सकता है। (INS Taragiri Commissioning)

कम क्रू, ज्यादा ऑटोमेशन

तारागिरी की एक खास बात यह भी है कि इसमें ऑटोमेशन का ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। इसकी वजह से कम क्रू में भी यह जहाज आसानी से ऑपरेट किया जा सकता है। इससे मानव संसाधन की जरूरत कम होती है और काम तेजी से होता है।

75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक

तारागिरी में करीब 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा भारतीय कंपनियों और एमएसएमई ने हिस्सा लिया है। इसके निर्माण से हजारों लोगों को रोजगार भी मिला है।

प्रोजेक्ट 17ए के तहत कुल 7 स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ पहले ही नौसेना में शामिल हो चुके हैं, जबकि बाकी जहाज अलग-अलग चरणों में तैयार हो रहे हैं। ये सभी जहाज आधुनिक तकनीक से लैस हैं और भारतीय नौसेना की ताकत को बढ़ाने के लिए तैयार किए गए हैं। तारागिरी को ईस्टर्न फ्लीट में शामिल किया जाएगा, जहां यह अन्य आधुनिक युद्धपोतों के साथ ऑपरेशन करेगा। (INS Taragiri Commissioning)

पोखरण के रण में नहीं दिखेगा LCA तेजस? वायु शक्ति 2026 के रिहर्सल से हुआ गायब!

Tejas Mk1A delivery delay

LCA Tejas Vayu Shakti 2026: भारतीय वायुसेना के बड़े ऑपरेशनल डेमॉन्स्ट्रेशन वायु शक्ति 2026 में स्वदेशी लड़ाकू विमान एलसीए तेजस एमके1 (LCA Tejas) की भागीदारी को लेकर असमंजस बना हुआ है। यह कार्यक्रम 27 फरवरी को राजस्थान के पोखरण एयर-टू-ग्राउंड रेंज में आयोजित होने वाला है, लेकिन उससे पहले हुई फुल ड्रेस रिहर्सल में तेजस शामिल नहीं हुआ। इसके बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या तेजस इस बार इस बड़े एयर शो का हिस्सा बनेगा या नहीं।

सूत्रों के अनुसार, तेजस फाइटर जेट को इस बार अभ्यास में अपनी एजिलिटी और एडवांस एवियोनिक्स दिखाने के लिए शामिल किया जाना था। यह भी तैयारी थी कि यह विदेशी फाइटर जेट्स के साथ हाई-इंटेंसिटी ड्रिल्स में हिस्सा लेगा, लेकिन रिहर्सल में इसकी गैरमौजूदगी ने हालात को बदल दिया है। (LCA Tejas Vayu Shakti 2026)

LCA Tejas Vayu Shakti 2026: तकनीकी घटना है वजह

तेजस की गैरमौजूदगी की वजह हाल ही में हुआ एक तकनीकी घटना को बताया जा रहा है। 7 फरवरी को गुजरात के नालिया एयरबेस पर एक तेजस विमान के साथ ग्राउंड इंसिडेंट हुआ था। हालांकि यह बेहद मामूली घटना थी, और यह उड़ान के दौरान नहीं, बल्कि लैंडिंग के बाद हुई थी, इसलिए इसे क्रैश नहीं माना गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, लैंडिंग के समय ब्रेक फेलियर या टायर से जुड़ी दिक्कतों के चलते विमान रनवे से आगे निकल गया था। इस घटना में पायलट सुरक्षित रहा, लेकिन उसे मामूली चोट आई।

इस घटना के बाद भारतीय वायुसेना और इसे बनाने वाली सरकारी कंपनी एचएएल की संयुक्त टीम ने पूरी तेजस फ्लीट की जांच शुरू कर दी है। इस जांच को कॉम्प्रिहेंसिव मेंटेनेंस इंस्पेक्शन कहा जा रहा है, जिसमें सभी विमानों की तकनीकी स्थिति को बारीकी से जांचा जा रहा है। जब तक इस जांच का निष्कर्ष सामने नहीं आता, तब तक फ्लीट की उड़ान सीमित या रोक दी गई है। बता दें कि भारतीय वायुसेना के पास 38 तेजस एमके1 हैं, जिनमें 6 द्विन सीटर ट्रेनर एयरक्रफ्ट हैं। (LCA Tejas Vayu Shakti 2026)

एचएएल ने अपने बयान में कहा है कि यह कोई बड़ा हादसा नहीं था, बल्कि जमीन पर हुआ एक मामूली तकनीकी मामला था। कंपनी ने यह भी कहा कि तेजस का सेफ्टी रिकॉर्ड दुनिया के सबसे बेहतर फाइटर एयरक्राफ्ट्स में गिना जाता है। साथ ही यह भी बताया गया कि समस्या की गहराई से जांच की जा रही है और जल्द समाधान निकालने की कोशिशें जारी हैं।

तेजस के साथ तीसरा हादसा है। इससे पहले मार्च 2024 में जैसलमेर के पास एक दुर्घटना हुई थी और 2025 में दुबई एयर शो के दौरान एक और बड़ा हादसा हुआ था। जिसमें पायलट विंग कमांडर नमन स्याल की मौत हो गई थी। इन घटनाओं के बाद से तेजस प्रोग्राम पर सवाल उठने लगे। (LCA Tejas Vayu Shakti 2026)

वायु शक्ति 2026 भारतीय वायुसेना का एक बड़ा फायरपावर प्रदर्शन है, जिसमें 100 से ज्यादा एयरक्राफ्ट हिस्सा लेते हैं। इसमें राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज 2000, जगुआर और मिग-29 जैसे फाइटर जेट्स अपनी ताकत दिखाते हैं। इस बार भी दिन और रात दोनों समय ऑपरेशन दिखाए जाने हैं, जिसमें प्रिसीजन स्ट्राइक और मल्टी-डोमेन क्षमता का प्रदर्शन शामिल रहेगा।

तेजस को इस अभ्यास में शामिल करना खास माना जा रहा था, क्योंकि यह भारत का स्वदेशी फाइटर जेट है और इसे आत्मनिर्भर भारत की पहचान के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, मौजूदा स्थिति को देखते हुए इसकी भागीदारी को लेकर अंतिम फैसला अभी स्पष्ट नहीं है। (LCA Tejas Vayu Shakti 2026)

रक्षा मंत्रालय ने पहले ही तेजस एमके-1ए के लिए बड़े कॉन्ट्रैक्ट दिए हैं। 2021 में 83 विमानों के लिए करीब 48,000 करोड़ रुपये का समझौता हुआ था, जबकि 2025 में 97 और विमानों के लिए 62,370 करोड़ रुपये का दूसरा सौदा किया गया। यह विमान सिंगल-इंजन मल्टी-रोल फाइटर है, जो हाई-थ्रेट एनवायरनमेंट में भी बखूबी काम कर सकता है। (LCA Tejas Vayu Shakti 2026)

हिमाचल में भारत-अमेरिकी स्पेशल कमांडोज की हाई-इंटेंसिटी ट्रेनिंग, ‘वज्र प्रहार’ में दिखेगा एलिट फोर्सेस का दम

Exercise Vajra Prahar 2026
Exercise Vajra Prahar 2026

Exercise Vajra Prahar 2026: भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग को और मजबूत करने के लिए जॉइंट एक्सरसाइज ‘वज्र प्रहार’ शुरू हो गई है। यह इस अभ्यास का 16वां संस्करण है, जो हिमाचल प्रदेश के बकलोह स्थित स्पेशल फोर्सेस ट्रेनिंग स्कूल में आयोजित किया जा रहा है। यह अभ्यास 24 फरवरी से 16 मार्च तक चलेगा, यानी करीब तीन हफ्तों तक दोनों देशों की स्पेशल फोर्सेस साथ मिलकर ट्रेनिंग करेंगी।

यह अभ्यास आम सैन्य ड्रिल जैसा नहीं होता, बल्कि इसमें दुनिया की सबसे चुनिंदा और प्रशिक्षित सैनिक टुकड़ियां हिस्सा लेती हैं। इसका मकसद है कठिन परिस्थितियों में मिलकर ऑपरेशन करना और आधुनिक खतरों से निपटने की तैयारी को मजबूत करना है। (Exercise Vajra Prahar 2026)

Exercise Vajra Prahar 2026: कौन ले रहा है हिस्सा?

इस अभ्यास में भारत और अमेरिका दोनों तरफ से छोटी लेकिन बेहद खास टीम शामिल है। भारतीय सेना की तरफ से करीब 45 स्पेशल फोर्सेस कमांडो हिस्सा ले रहे हैं। ये जवान आमतौर पर पैराशूट रेजिमेंट जैसी यूनिट्स से होते हैं, जो देश के सबसे कठिन ऑपरेशंस को अंजाम देते हैं।

वहीं अमेरिका की तरफ से यूएस आर्मी के ग्रीन बेरेट्स के करीब 12 कमांडो इस अभ्यास में शामिल हुए हैं। ग्रीन बेरेट्स दुनिया की सबसे प्रोफेशनल स्पेशल फोर्सेस में गिने जाते हैं।

स्पेशल फोर्सेस की खासियत यह होती है कि वे कम तादाद में होते हुए भी बेहद सटीक और खतरनाक ऑपरेशन कर सकते हैं। इसलिए इस अभ्यास में बड़ी सेना नहीं, बल्कि छोटे-छोटे एलिट ग्रुप्स ही भाग लेते हैं। (Exercise Vajra Prahar 2026)

कहां और क्यों हो रहा है अभ्यास?

यह अभ्यास हिमाचल प्रदेश के बकलोह में हो रहा है, जो पहाड़ी और जंगल वाले इलाके में आता है। इस तरह का इलाका ट्रेनिंग के लिए इसलिए चुना जाता है क्योंकि यहां ऊंचाई, ठंड, ऊबड़-खाबड़ जमीन और सीमित संसाधन जैसी कठिन हालात होते हैं।

ऐसी जगहों पर ऑपरेशन करना आसान नहीं होता, लेकिन आज के समय में कई सैन्य ऑपरेशन इसी तरह के इलाकों में होते हैं। इसलिए सैनिकों को यहां ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे हर तरह की चुनौती के लिए तैयार रहें। (Exercise Vajra Prahar 2026)

क्या सीखेंगे सैनिक?

इस अभ्यास में सैनिकों को कई तरह की ट्रेनिंग दी जाएगी, जो असली ऑपरेशन जैसी होती है। सबसे पहले उन्हें जॉइंट मिशन प्लानिंग सिखाई जाएगी, यानी दोनों देशों के सैनिक मिलकर कैसे ऑपरेशन की योजना बनाते हैं।

इसके बाद वे अलग-अलग तरह की टैक्टिकल ड्रिल्स जैसे- किसी इलाके में घुसकर दुश्मन को पकड़ना या खत्म करना, बंधकों को छुड़ाने का ऑपरेशन, गुप्त तरीके से जानकारी जुटाना, और जरूरत पड़ने पर अचानक हमला करना जैसे ऑपरेशन करेंगे।

इन सबके अलावा सैनिकों को माउंटेन वारफेयर यानी पहाड़ों में लड़ाई की खास ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें यह सिखाया जाता है कि ऊंचाई पर सांस की कमी, ठंड और सीमित संसाधनों के बीच कैसे ऑपरेशन किया जाए। (Exercise Vajra Prahar 2026)

इस अभ्यास की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें सिर्फ ट्रेनिंग ही नहीं होती, बल्कि दोनों देशों के सैनिक अपने-अपने अनुभव भी साझा करते हैं। भारतीय सेना को पहाड़ी और काउंटर-टेरर ऑपरेशन्स का अच्छा अनुभव है, जबकि अमेरिकी सेना के पास दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ऑपरेशन करने का अनुभव है। (Exercise Vajra Prahar 2026)

‘वज्र प्रहार’ नाम का मतलब

इस अभ्यास का नाम भी अपने आप में खास है। ‘वज्र’ का मतलब होता है बहुत शक्तिशाली हथियार, और ‘प्रहार’ का मतलब है हमला। यानी ‘वज्र प्रहार’ का अर्थ हुआ, जिसका मतलब तेज, सटीक और जबरदस्त हमला है।

यह नाम स्पेशल फोर्सेस के काम करने को पूरी तरह से दर्शाता है, जहां कम समय में सटीक और निर्णायक कार्रवाई की जाती है। (Exercise Vajra Prahar 2026)

क्यों जरूरी है यह अभ्यास?

आज का युद्ध पारंपरिक युद्ध से काफी अलग हो चुका है। अब खतरे सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। आतंकवाद, हाइब्रिड वॉरफेयर, ड्रोन अटैक और गुप्त ऑपरेशन जैसे नए खतरे सामने आ रहे हैं।

ऐसे में स्पेशल फोर्सेस की भूमिका बहुत अहम हो जाती है। ‘वज्र प्रहार’ जैसे अभ्यास सैनिकों को इन नए खतरों से निपटने के लिए तैयार करते हैं। (Exercise Vajra Prahar 2026)

इसके अलावा यह अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को भी मजबूत करता है। दोनों देश पहले से ही कई बड़े समझौतों और साझेदारियों के जरिए एक-दूसरे के करीब आए हैं। यह अभ्यास उसी दिशा में एक और कदम है।

इससे पहले ‘वज्र प्रहार’ का 15वां संस्करण अमेरिका के आइडाहो में आयोजित किया गया था। हर साल यह अभ्यास भारत और अमेरिका में बारी-बारी से होता है, जिससे दोनों सेनाओं को अलग-अलग तरह के इलाकों में ट्रेनिंग का मौका मिलता है। (Exercise Vajra Prahar 2026)

उत्तराखंड में ‘धर्मा गार्डियन’ में दिखेगा भारत-जापान के बीच कॉम्बैट तालमेल, लद्दाख स्काउट्स लेगें हाई-टेक वॉर ड्रिल में हिस्सा

Exercise Dharma Guardian 2026
Exercise Dharma Guardian 2026

Exercise Dharma Guardian 2026: भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘धर्मा गार्डियन’ एक बार फिर शुरू हो गया है। इस बार इसका आयोजन उत्तराखंड के चौबट्टिया स्थित फॉरेन ट्रेनिंग नोड में किया जा रहा है। यह अभ्यास 24 फरवरी से लेकर 9 मार्च तक चलेगा और करीब दो हफ्तों तक दोनों देशों के सैनिक साथ मिलकर ट्रेनिंग करेंगे।

यह अभ्यास केवल एक रूटीन एक्सरसाइज नहीं है, बल्कि यह भारत और जापान के बीच बढ़ते भरोसे और साझेदारी का बड़ा प्रतीक है। खास बात यह है कि यह अभ्यास हर साल बारी-बारी से भारत और जापान में होता है, जिससे दोनों सेनाएं एक-दूसरे के काम करने के तरीके को करीब से समझती हैं। (Exercise Dharma Guardian 2026)

Exercise Dharma Guardian 2026: दोनों देशों के सैनिक साथ-साथ

इस बार के अभ्यास में भारत और जापान- दोनों तरफ से करीब 120-120 सैनिकों की टुकड़ी हिस्सा ले रही है। भारतीय सेना की तरफ से लद्दाख स्काउट्स के जवान शामिल हैं, जो कठिन इलाकों में ऑपरेशन करने के लिए जाने जाते हैं। वहीं जापान की ओर से जापान ग्राउंड सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JGSDF) की 32वीं इन्फैंट्री रेजिमेंट के सैनिक इसमें भाग ले रहे हैं।

जब अलग-अलग देशों के सैनिक एक साथ ट्रेनिंग करते हैं, तो वे न सिर्फ नई तकनीक सीखते हैं, बल्कि एक-दूसरे की रणनीति और काम करने के तरीके को भी समझते हैं। यही इस अभ्यास की सबसे बड़ी खासियत है। (Exercise Dharma Guardian 2026)

किस तरह की ट्रेनिंग होगी?

यह अभ्यास खास तौर पर सेमी-अर्बन एनवायरनमेंट यानी ऐसे इलाकों के लिए किया जा रहा है, जहां शहर और गांव दोनों जैसी परिस्थितियां होती हैं। आज के समय में ज्यादातर ऑपरेशन ऐसे ही इलाकों में होते हैं, इसलिए यह ट्रेनिंग बेहद जरूरी मानी जाती है।

अभ्यास के दौरान सैनिक कई तरह की ड्रिल्स करेंगे। जैसे, अस्थायी ऑपरेटिंग बेस बनाना, जहां से ऑपरेशन चलाया जा सके। इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर ग्रिड तैयार करना, जिससे दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। मोबाइल चेक पोस्ट लगाना, ताकि आने-जाने वाले वाहनों की जांच की जा सके और दुश्मन वाले इलाके में घेराबंदी और सर्च ऑपरेशन चलाना, शामिल है।

इसके अलावा सैनिक हेलिबोर्न ऑपरेशन भी करेंगे, जिसमें हेलीकॉप्टर के जरिए सीधे ऑपरेशन एरिया में उतरकर कार्रवाई की जाती है। सबसे अहम हिस्सा होगा हाउस इंटरवेंशन ड्रिल, यानी किसी बिल्डिंग या घर के अंदर घुसकर ऑपरेशन करना। इसे क्लोज क्वार्टर बैटल भी कहा जाता है, जो काउंटर-टेरर ऑपरेशन में बेहद जरूरी होता है। (Exercise Dharma Guardian 2026)

आधुनिक युद्ध की तैयारी

आज का युद्ध पहले जैसा नहीं रहा। अब सिर्फ हथियारों की ताकत काफी नहीं होती, बल्कि जानकारी, तकनीक और तालमेल भी उतना ही जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए इस अभ्यास में मॉडर्न टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है।

सैनिकों को सिखाया जाएगा कि कैसे रियल टाइम जानकारी के आधार पर तुरंत फैसला लिया जाए, कैसे अलग-अलग यूनिट्स मिलकर काम करें और कैसे तेजी से ऑपरेशन को अंजाम दिया जाए। इसे ही आसान भाषा में इंटरऑपरेबिलिटी कहा जाता है, यानी अलग-अलग देशों की सेनाएं भी बिना किसी परेशानी के साथ काम कर सकें। (Exercise Dharma Guardian 2026)

क्यों खास है यह अभ्यास?

भारत और जापान के बीच यह अभ्यास सिर्फ सैन्य ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा रणनीतिक मतलब भी है। दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।

पिछले कुछ सालों में भारत और जापान के रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है और दोनों देश एक-दूसरे के साथ ज्यादा अभ्यास कर रहे हैं। ‘धर्मा गार्डियन’ इसी साझेदारी का अहम हिस्सा है।

इस अभ्यास की शुरुआत साल 2018 में हुई थी और अब यह इसका सातवां संस्करण है। हर साल इसे अलग-अलग जगहों पर आयोजित किया जाता है। पिछले संस्करण जापान और भारत के अलग-अलग इलाकों में हो चुके हैं।

हर बार इस अभ्यास का दायरा थोड़ा और बढ़ता है और नई तकनीकों को इसमें शामिल किया जाता है। इससे दोनों देशों की सेनाएं लगातार बेहतर होती जा रही हैं। (Exercise Dharma Guardian 2026)