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ट्रंप ने भारत को बता दिया ‘नरक का गड्ढा’, इनफॉरमेशन वॉरफेयर में बाजी मार ले गया ईरान

Hellhole India Information Warfare
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Hellhole India Information Warfare: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप एक सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक वीडियो क्लिप शेयर करते हुए भारत और चीन को लेकर “हेलहोल” यानी “नरक का गड्ढा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। हालांकि विदेश मंत्रालय ने संयमित प्रतिक्रिया दी, लेकिन राजनीतिक स्तर पर चुप्पी साधे रखी। वहीं, ईरान का इस विवाद से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था, लेकिन भारत का बचाव करते हुए अमेरिका पर जमकर पलटवार किया।

यह क्लिप असल में एक पुराने पॉडकास्ट इंटरव्यू का हिस्सा थी, जिसमें जन्म आधारित नागरिकता यानी बर्थराइट सिटिजनशिप पर चर्चा हो रही थी। क्लिप में कहा गया, “यहां एक बच्चा तुरंत नागरिक बन जाता है और फिर पूरा परिवार चीन या भारत या दुनिया के किसी दूसरे नरक के गड्ढे से आ जाता है।” उसी दौरान भारत और चीन को लेकर यह टिप्पणी की गई थी। ट्रंप ने इसे दोबारा से शेयर कर दिया, जिसके बाद यह मामला तेजी से फैल गया।

Hellhole India Information Warfare: विदेश मंत्रालय का संयमित जवाब

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि ऐसी टिप्पणियां तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और पूरी तरह अनुचित हैं। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह के बयान भारत-अमेरिका संबंधों की असलियत को नहीं दर्शाते।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच संबंध आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि चल रही व्यापार और रणनीतिक बातचीत पर इस तरह की टिप्पणियों का कोई असर नहीं पड़ेगा।

सरकार ने बयान देते समय संतुलन बनाए रखा और किसी भी तरह के टकराव से बचने की कोशिश दिखाई।

ईरान की एंट्री, सोशल मीडिया पर पलटवार

इसी बीच ईरान ने इस पूरे मामले को अपने हाथों में लेते हुए जमकर प्रतिक्रिया दी। भारत में मौजूद ईरानी मिशनों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इस बयान का विरोध किया।

हैदराबाद मिशन ने पोस्ट में लिखा, “ट्रंप के पोस्ट से उनकी सोच साफ दिखती है और यह नस्लवाद (racism) को दर्शाता है। भारत और चीन बहुत पुरानी और समृद्ध सभ्यताएं हैं। असल हेल होल तो वो जगह है जहां इसका युद्ध अपराधी राष्ट्रपति ईरान की सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रहा था।” मुंबई कांसुलेट ने महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “कभी भारत आकर देखो।” ईरान ने भारत को “सभ्यताओं का केंद्र” बताते हुए ट्रंप की टिप्पणी को अमेरिका पर उलट दिया।

एक और पोस्ट में व्यंग्य करते हुए कहा गया कि “डिवाइड एंड रूल” की बात होती है, लेकिन ट्रंप सिर्फ लोगों को बांट रहे हैं, शासन नहीं कर पा रहे।

यह जवाब इतना तीखा और व्यंग्यपूर्ण था कि सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। भारतीय यूजर्स ने इसे “ईरान की मजबूत दोस्ती” बताया।

ईरान के इन पोस्ट्स के बाद सोशल मीडिया पर एक तरह का “मीम वॉर” शुरू हो गया। कई मीम्स में ट्रंप को अलग-अलग अंदाज में दिखाया गया। एक मीम में उन्हें वैज्ञानिक आइंस्टीन की तरह दिखाया गया, जबकि दूसरे में उन्हें बमबारी के बाद कमजोर हालत में दिखाया गया। इन मीम्स के जरिए ईरान ने ट्रंप के बयान का मजाक उड़ाया और अपनी बात लोगों तक पहुंचाई।

इनफॉरमेशन वॉरफेयर का बड़ा उदाहरण

हो सकता है कि मोबाइल स्कीन पर आप ईरान की तरफ से शेयर वडा पाव, बन मस्का, पाव भाजी या ईरानी चाय के वीडियोज को देख कर खुश हो रहे हों, और उन्हें रीट्वीट कर रहे हों, लेकिन यह ईरान की इनफॉरमेशन वॉरफेयर की रणनीति है।

आज के समय में किसी भी अंतरराष्ट्रीय घटना की शुरुआत अक्सर सोशल मीडिया से होती है। एक वीडियो या पोस्ट तेजी से लोगों तक पहुंचता है और उसी के आधार पर धारणा बनती है।

ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, इस तरह के पोस्ट भारत में ही तैयार किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और इजरायल की तरफ से जो प्रचार किया जाता है, उसका जवाब सिर्फ आधिकारिक बयान से नहीं दिया जा सकता। इसलिए लोगों तक पहुंचने के लिए क्रिएटिव और आसान तरीके अपनाए जा रहे हैं, ताकि ज्यादा लोग इसे समझ सकें और जुड़ सकें।

इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। पहले एक वीडियो क्लिप सामने आई, फिर उस पर प्रतिक्रिया आई और उसके बाद अलग-अलग देशों ने अपनी-अपनी तरह से संदेश देना शुरू किया।

ईरान की प्रतिक्रिया में व्यंग्य, सांस्कृतिक संदर्भ और सोशल मीडिया की भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिससे वह जल्दी वायरल हो गई।

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान से जुड़े कुछ ऑनलाइन नेटवर्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर काफी सक्रिय रहे हैं। इनमें “BRICS4CLICKS” और “Verified4War” जैसे ग्रुप शामिल बताए जाते हैं। कहा जाता है कि इन नेटवर्क्स ने बहुत कम समय में करोड़ों-करोड़ लोगों तक अपना कंटेंट पहुंचाया।

इन पोस्ट्स में एआई से बनाए गए वीडियो, एडिट की गई तस्वीरें और ऐसे संदेश शामिल होते हैं, जो एक खास नजरिया दिखाते हैं। इनमें अक्सर अमेरिका और इजरायल की छवि खराब दिखाने की कोशिश की जाती है, जबकि ईरान को मजबूत और सफल दिखाया जाता है।

हालांकि ईरान की तरफ से यह भी कहा गया कि एआई का इस्तेमाल जानकारी समझाने के लिए होना चाहिए, न कि गलत प्रचार फैलाने के लिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप ने कुछ ऐसी तस्वीरों का जिक्र किया था, जिन्हें बाद में एआई से बनाई गई फर्जी तस्वीरें बताया गया।

परेस्प्शन की लड़ाई

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने यह दिखाया है कि युद्ध अब सिर्फ जमीन, आसमान या समुद्र में नहीं लड़ा जाता, बल्कि धारणा (परेस्प्शन) की लड़ाई भी उतनी ही अहम हो गई है।

सोशल मीडिया पर जो पक्ष सबसे पहले लोगों का ध्यान खींच लेता है, वही आगे की पूरी कहानी को प्रभावित करता है। टीवी डिबेट, अखबारों की हेडलाइन और कूटनीतिक चर्चा तक उसी के असर में आती है।

ईरान ने इस बात को समझते हुए अपनी रणनीति बनाई। उसने सिर्फ सरकारी बयान नहीं दिए, बल्कि मीम्स, छोटे वीडियो, एआई से बने विजुअल्स और आसान भाषा का इस्तेमाल किया।

अलग-अलग दर्शकों के लिए अलग संदेश

ईरान ने अपने संदेश को अलग-अलग देशों और दर्शकों के हिसाब से तैयार किया। ग्लोबल साउथ के देशों के लिए उसने खुद को एक हमले का शिकार देश बताया। पश्चिमी देशों के लिए उसने इसे अमेरिकी दखल के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर उसने व्यंग्य, मजाक और इंटरनेट कल्चर का इस्तेमाल किया, जिससे युवा वर्ग जल्दी जुड़ गया।

वहीं भारत के मामले में यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी ईरान कई बार ऐसा कर चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का यह कदम सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत ने इस पूरे मामले में सीधे किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया, लेकिन ईरान ने इसे अपने तरीके से “दोस्ती” की तरह पेश करने की कोशिश की।

ईरान के बयानों में बार-बार भारत को एक पुरानी और महान सभ्यता बताया गया, ताकि लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाया जा सके।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के सामने संतुलन बनाए रखना जरूरी है। भारत के एक तरफ अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान और रूस के साथ भी ऊर्जा और सुरक्षा से जुड़े संबंध हैं।

जम्मू में सेना के पास पहुंची ‘चलती-फिरती ड्रोन फैक्ट्री’, अब मौके पर ही बनेंगे UAV

Apollyon Dynamics- Mobile Drone Lab India
Sourya Choudhary, CTO of Apollyon Dynamics

Mobile Drone Lab India: भारतीय सेना को अब ड्रोन बनाने और उन्हें ठीक करने के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। युवा स्टार्टअप कंपनी अपोलियन डायनामिक्स ने भारत की पहली मोबाइल ड्रोन लैब तैयार की है, जिसे जम्मू के फॉरवर्ड एरिया में सेना के साथ तैनात कर दिया गया है। यह लैब एक चलती-फिरती यूनिट है, जो जरूरत के हिसाब से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकती है और सीधे फॉरवर्ड एरिया में काम कर सकती है। अभी तक यह सुविधा रूस और यूक्रेन जैसे देशों में ही थी, लेकिन अब भारत में भी यह उपलब्ध हो गई है।

मोबाइल ड्रोन लैब दरअसल एक ट्रक पर बनाई गई पूरी वर्कशॉप है। इसमें ड्रोन बनाने, उन्हें जोड़ने, टेस्ट करने और मरम्मत करने की सभी सुविधाएं मौजूद हैं। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि जहां सैनिक तैनात हैं, उसी इलाके के पास ड्रोन तैयार किए जा सकें। इससे पहले सेना को ड्रोन के लिए सप्लाई का इंतजार करना पड़ता था, लेकिन अब जरूरत के हिसाब से मौके पर ही ड्रोन तैयार किए जा सकते हैं। (Mobile Drone Lab India)

यह लैब हर महीने 100 से ज्यादा एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन तैयार कर सकती है। एफपीवी ड्रोन ऐसे ड्रोन होते हैं जिन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए सीधे कंट्रोल करता है और रियल टाइम में देख सकता है कि ड्रोन कहां जा रहा है। इससे सेना के पास ड्रोन की कमी नहीं होगी और ऑपरेशन के दौरान तुरंत नए ड्रोन उपलब्ध कराए जा सकेंगे।

इस मोबाइल लैब में 3डी प्रिंटर भी लगा है। जिसकी मदद से ड्रोन के छोटे-बड़े पार्ट्स वहीं पर बनाए जा सकते हैं। अगर किसी ड्रोन का कोई हिस्सा टूट जाए या उसे बदलने की जरूरत हो, तो उसे तुरंत प्रिंट करके लगाया जा सकता है। इससे समय की बचत होती है और ड्रोन जल्दी दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाते हैं। (Mobile Drone Lab India)

ड्रोन बनाने के अलावा इस लैब में उन्हें ठीक करने की सुविधा भी है। ऑपरेशन के दौरान अगर कोई ड्रोन खराब हो जाता है, तो उसे पीछे भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। उसी जगह पर उसकी मरम्मत की जा सकती है। जो काम पहले कई दिन लेता था, अब कुछ घंटों में पूरा हो जाता है। इससे सेना की कार्यक्षमता पर सीधा असर पड़ता है और ऑपरेशन बिना रुके चलते रहते हैं।

अपोलियन डायनामिक्स ने सेना के जवानों को ड्रोन असेंबल करने, उन्हें उड़ाने और जरूरत पड़ने पर ठीक करने की भी ट्रेनिंग दी है। इससे सैनिक खुद ही ड्रोन से जुड़े काम संभाल सकते हैं।

मोबाइल ड्रोन लैब के साथ-साथ जम्मू में एक स्थायी ड्रोन लैब भी बनाई गई है। यहां बड़े स्तर पर ड्रोन असेंबली, स्टोरेज और ट्रेनिंग का काम होता है। मोबाइल लैब जहां जरूरत के हिसाब से अलग-अलग जगह पहुंच सकती है, वहीं यह स्थायी लैब बैकअप और बड़े कामों के लिए इस्तेमाल होती है। दोनों मिलकर एक पूरा सिस्टम तैयार करते हैं, जिससे ड्रोन ऑपरेशन और भी आसान हो जाता है। (Mobile Drone Lab India)

इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि इसे शुरू करने वाली कंपनी काफी नई है। अपोलियन डायनामिक्स की शुरुआत 2025 में हैदराबाद स्थित बिट्स पिलानी दो छात्रों सौर्य चौधरी और जयंत खत्री ने की थी। उन्होंने अपने हॉस्टल रूम से काम शुरू किया और कुछ ही समय में सेना के साथ काम करने लगे। आज उनकी कंपनी ड्रोन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही है और सेना को अलग-अलग तरह के ड्रोन सिस्टम उपलब्ध करा रही है।

इस मोबाइल ड्रोन लैब को तैयार करने में ज्यादा समय नहीं लगा। कंपनी ने इसे करीब 15 से 20 दिनों में तैयार कर लिया और जनवरी 2026 में इसे जम्मू में तैनात कर दिया गया।

कंपनी को सरकार की NIDHI सीड सपोर्ट स्कीम के तहत भी मदद मिली है। इस योजना के जरिए नए स्टार्टअप्स को फंडिंग और जरूरी संसाधन दिए जाते हैं। (Mobile Drone Lab India)

भारत डायनेमिक्स ने बनाया ‘स्मार्ट स्ट्राइक’ लॉन्ग रेंज स्वदेशी टॉरपीडो, एडवांस वायर-गाइडेड टेक्नोलॉजी से है लैस

BDL Torpedo
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BDL Torpedo: देश की सरकारी कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) ने भारतीय नौसेना के लिए भारत का पहला प्रोडक्शन-ग्रेड वायर गाइडेड हेवी वेट टॉरपीडो तैयार किया है। बीडीएल ने टॉरपीडो को विशाखापत्तनम स्थित नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लैबोरेटरी (एनएसटीएल) को सौंप दिया है।

टॉरपीडो एक ऐसा पानी के अंदर चलने वाला हथियार होता है, जिसे दुश्मन के जहाज या पनडुब्बी को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

“हेवी वेट टॉरपीडो” उन टॉरपीडो को कहा जाता है जो आकार में बड़े होते हैं और ज्यादा दूरी तक जाकर ज्यादा ताकत के साथ हमला कर सकते हैं। इन्हें आमतौर पर पनडुब्बियों से लॉन्च किया जाता है।

इस नए टॉरपीडो की खास बात यह है कि यह वायर गाइडेड सिस्टम पर काम करता है। यानी लॉन्च करने के बाद भी इसे कंट्रोल किया जा सकता है और जरूरत के हिसाब से इसकी दिशा बदली जा सकती है।

BDL Torpedo: भारत का पहला प्रोडक्शन-ग्रेड सिस्टम

अब तक भारत इस तरह के एडवांस टॉरपीडो के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहा है। लेकिन इस बार जो सिस्टम बीडीएल ने तैयार किया है, वह पूरी तरह भारत में डिजाइन और विकसित किया गया है।

इस टारपीडो को “प्रोडक्शन-ग्रेड” कहा जा रहा है, जिसका मतलब है कि यह सिर्फ टेस्ट या प्रोटोटाइप नहीं, बल्कि इस्तेमाल के लिए तैयार सिस्टम है।

इस टॉरपीडो को प्रैक्टिस (ट्रेनिंग) और कॉम्बैट (युद्ध) दोनों तरह के कॉन्फिगरेशन में तैयार किया गया है, ताकि इसे ट्रेनिंग और असली ऑपरेशन दोनों में इस्तेमाल किया जा सके।

इस टॉरपीडो को डीआरडीओ की लैब एनएसटीएल ने डिजाइन किया है, जबकि इसका उत्पादन बीडीएल ने किया है।

बीडीएल को इस प्रोजेक्ट में डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर (डीसीपीपी) बनाया गया था। कंपनी न सिर्फ निर्माण ही नहीं बल्कि डेवलपमेंट प्रोसेस में भी शामिल हुई।

इस पूरे प्रोजेक्ट में कई छोटे और मझोले उद्योगों की भी भागीदारी रही है, जिससे देश के डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम को भी मजबूती मिली है।

कैसे काम करता है यह टॉरपीडो

यह टॉरपीडो कई एडवांस तकनीकों से लैस है। इसमें फाइबर ऑप्टिक वायर गाइडेंस सिस्टम होता है, जिससे इसे लॉन्च के बाद भी कंट्रोल किया जा सकता है।

इसके अलावा इसमें एक्टिव और पैसिव एकॉस्टिक होमिंग सिस्टम होता है, जो पानी के अंदर दुश्मन की पनडुब्बी या जहाज की आवाज पहचानकर उसे ट्रैक करता है।

यह सिस्टम पहले टारगेट को खोजता है, फिर उस पर हमला करता है और अगर पहली बार में निशाना चूक जाए तो दोबारा अटैक करने की क्षमता भी रखता है।

यह टारपीडो केवल एक बार इस्तेमाल होने वाला हथियार नहीं, बल्कि लगातार ट्रैकिंग और अटैक करने वाला स्मार्ट सिस्टम है।

इस टॉरपीडो के आने से भारतीय नौसेना की ताकत में सीधा इजाफा होगा। यह खासतौर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (एएसडब्ल्यू) यानी दुश्मन की पनडुब्बियों के खिलाफ कार्रवाई में काम आएगा। इसके अलावा यह सतह पर मौजूद जहाजों को भी निशाना बना सकता है।

समुद्र के अंदर लड़ाई यानी अंडरवॉटर वॉरफेयर में इस तरह के हथियार बेहद अहम होते हैं, क्योंकि दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढना और उन्हें खत्म करना आसान काम नहीं होता। इस नए सिस्टम से नौसेना को अपने ऑपरेशन ज्यादा सटीक और प्रभावी तरीके से करने में मदद मिलेगी।

BDL Torpedo

पहले के टॉरपीडो से कितना अलग

भारत ने इससे पहले भी टॉरपीडो बनाए हैं। वरुणास्त्र को जहाजों से लॉन्च किया जाता है। लेकिन यह नया सिस्टम खास तौर पर पनडुब्बियों के लिए डिजाइन किया गया है और इसमें इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन और कम आवाज जैसी खूबियां शामिल हैं, जिससे यह ज्यादा स्टेल्थ यानी छिपकर काम करने में सक्षम होता है।

इस वजह से इसे आधुनिक समुद्री युद्ध की जरूरतों के हिसाब से ज्यादा एडवंस माना जा रहा है। इस तरह के टॉरपीडो का इस्तेमाल उन इलाकों में ज्यादा अहम होता है जहां समुद्री गतिविधियां ज्यादा होती हैं।

भारतीय नौसेना के लिए यह सिस्टम हिंद महासागर क्षेत्र में काफी उपयोगी रहेगा, जहां अलग-अलग देशों की नौसेनाएं सक्रिय रहती हैं।

इसके अलावा पनडुब्बियों के जरिए होने वाले ऑपरेशन में भी यह अहम भूमिका निभाएगा, जहां दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना और समय पर कार्रवाई करना जरूरी होता है।

इस टॉरपीडो को तैयार करने से पहले कई चरणों में टेस्टिंग की गई है। इसमें हार्बर ट्रायल, सी ट्रायल और अलग-अलग परिस्थितियों में प्रदर्शन की जांच शामिल रही है। इसके बाद ही इसे प्रोडक्शन-ग्रेड के रूप में तैयार किया गया और अब इसे आधिकारिक तौर पर सौंपा गया है। इस पूरी प्रक्रिया में कई साल लगे हैं, जिसमें डिजाइन, डेवलपमेंट और फाइनल प्रोडक्शन शामिल रहा है।

क्या तक्षक है यह टॉरपीडो?

हालांकि कंपनी ने इस टॉरपीडो का नाम नहीं बताया है, लेकिन माना जा रहा है कि यह तक्षक है। क्योंकि इसकी खूबियां तक्षक से मेल खा रही हैं। तक्षक एक नया और एडवांस इलेक्ट्रिक हेवीवेट टॉरपीडो है, जिसे भारत में बनाया गया है। इसे खास तौर पर पनडुब्बियों से दुश्मन पर हमला करने के लिए तैयार किया गया है।

तक्षक में इलेक्ट्रिक इंजन लगा है, जो बहुत कम आवाज करता है। इसके अलावा यह “स्विम-आउट” तरीके से लॉन्च होता है, यानी बिना तेज आवाज के पानी में निकलता है। इससे दुश्मन को इसकी भनक लगाना मुश्किल होता है।

यह टॉरपीडो करीब 40 किलोमीटर तक जाकर हमला कर सकता है। यानी पनडुब्बी को दुश्मन के काफी करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। तक्षक की स्पीड लगभग 40 नॉट्स (करीब 70-75 किमी/घंटा) है। जो पानी के अंदर यह काफी तेज मानी जाती है।

यह टॉरपीडो करीब 400 मीटर या उससे ज्यादा गहराई में भी काम कर सकता है। इससे गहरे समुद्र में छिपी पनडुब्बियों को भी निशाना बनाया जा सकता है। वहीं इसमें भी फाइबर-ऑप्टिक वायर लगा है, जिससे इसे लॉन्च करने के बाद भी कंट्रोल किया जा सकता है और ऑपरेटर बीच में ही इसकी दिशा बदल सकता है।

तक्षक में ऐसा सिस्टम है जो पानी के अंदर आवाज (साउंड) के जरिए दुश्मन को ढूंढता है। यह अपने आप टारगेट को पहचानकर उस पर हमला कर सकता है। अगर पहली बार में निशाना नहीं लगता, तो यह फिर से टारगेट ढूंढकर दोबारा हमला कर सकता है। वहीं, अगर बीच में कंट्रोल वायर टूट जाए, तब भी यह अपने आप (ऑटोनॉमस मोड) में टारगेट पर हमला कर सकता है।

तक्षक सिर्फ पनडुब्बियों ही नहीं, बल्कि समुद्र में चल रहे जहाजों पर भी हमला कर सकता है। इसमें ऐसे सिस्टम लगे हैं जो दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक चालों (ECM) से बचकर काम कर सकते हैं। (BDL Torpedo)

‘लास्ट लाइन डिफेंस’ मजबूत करने की तैयारी, जेन टेक्नोलॉजीज को मिला एंटी-ड्रोन कैनन बनाने का लाइसेंस

Zen Technologies cannon licence
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Zen Technologies cannon licence: भारत की डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी जेन टेक्नोलॉजीज को सरकार से एक अहम मंजूरी मिली है। कंपनी को आर्म्स एक्ट 1959 के तहत हथियार बनाने का लाइसेंस दिया गया है। इस लाइसेंस के तहत अब कंपनी 12.7 मिमी, 23 मिमी, 30 मिमी और 40 मिमी कैनन यानी तोपें बना सकेगी।

यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब दुनिया भर में ड्रोन और लो-फ्लाइंग एरियल थ्रेट्स तेजी से बढ़ रहे हैं। इन खतरों से निपटने के लिए अब पारंपरिक सिस्टम के साथ नए उपायों की जरूरत महसूस की जा रही है।

Zen Technologies cannon licence: किन कामों में इस्तेमाल होंगी ये तोपें

सरकार से मिली अनुमति के बाद जेन टेक्नोलॉजीज जिन कैनन का निर्माण करेगी, उनका इस्तेमाल कई अहम क्षेत्रों में होगा। इनमें एयर डिफेंस, नेवल ऑपरेशन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम शामिल हैं।

ये तोपें खासतौर पर “लास्ट लेयर डिफेंस” के तौर पर काम करती हैं। जब कोई ड्रोन या हवाई खतरा बिल्कुल नजदीक पहुंच जाता है, तब ये सिस्टम उसे रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और छोटे एरियल टारगेट्स के खिलाफ ये कैनन तेजी से फायर कर सकते हैं। इसी वजह से इन्हें तेज और असरदार सुरक्षा सिस्टम माना जाता है।

एडवांस सिस्टम के साथ बढ़ेगी ताकत

फायर कंट्रोल सिस्टम, रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर जैसे आधुनिक सिस्टम लगाने के बाद कैनन की क्षमता और बढ़ जाती है। जिसके बाद यह सिस्टम बहुत तेजी से टारगेट को पहचान सकता है और उस पर सटीक हमला कर सकता है।

इसके अलावा प्रोग्रामेबल एम्यूनिशन का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जिससे अलग-अलग तरह के टारगेट के हिसाब से फायरिंग की जा सके। इससे कम लागत में ज्यादा असरदार सुरक्षा मिलती है।

पिछले कुछ सालों में युद्ध का तरीका तेजी से बदला है। अब ड्रोन और बिना पायलट वाले सिस्टम का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। ऐसे में पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के अलावा तेज और सस्ते समाधान की जरूरत भी बढ़ी है।

इसी को ध्यान में रखते हुए इस तरह के कैनन सिस्टम को अहम माना जा रहा है। ये न केवल सेना के लिए, बल्कि बॉर्डर एरिया और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के लिए भी उपयोगी होते हैं। एयरबेस, सैन्य ठिकाने, पावर प्लांट और अन्य जरूरी स्थानों की सुरक्षा में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

भारत में ही बनेगा पूरा सिस्टम

इस लाइसेंस के साथ अब इन कैनन का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। यह “इंडिजेनस्ली डिजाइन, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड” यानी आईडीडीएम मॉडल के तहत बनाया जाएगा। जिसके तहत भारत अपनी जरूरत के हिसाब से खुद सिस्टम तैयार करेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी। वहीं, जेन टेक्नोलॉजीज पहले से ही डिफेंस ट्रेनिंग और एंटी-ड्रोन सिस्टम पर काम करती रही है। अब इस नए लाइसेंस के बाद कंपनी हार्ड-किल सिस्टम भी बना सकेगी।

हैदराबाद स्थित ज़ेन टेक्नोलॉजीज पिछले कई सालों से डिफेंस सेक्टर में काम कर रही है। कंपनी ने ट्रेनिंग सिमुलेटर, लाइव फायर सिस्टम और काउंटर-ड्रोन सॉल्यूशन जैसे कई प्रोडक्ट विकसित किए हैं।

कंपनी के पास दर्जनों इंडिजेनस प्रोडक्ट्स का पोर्टफोलियो है और यह देश-विदेश में अपने सिस्टम सप्लाई कर चुकी है।

इस नए लाइसेंस के बाद कंपनी का फोकस अब पूरी तरह इंटीग्रेटेड डिफेंस सॉल्यूशन तैयार करने पर होगा, जिसमें ड्रोन की पहचान से लेकर उसे नष्ट करने तक की पूरी क्षमता शामिल होगी। (Zen Technologies cannon licence)

यूक्रेन युद्ध में जमकर मिलिट्री इनोवेशन कर रही कंपनियां, 6 महीने में बन रहे हथियार, 22 हजार से ज्यादा ड्रोन मिशन

Ukraine drone warfare Innovation

Ukraine drone warfare Innovation: अक्सर कहा जाता है कि युद्ध केवल तबाही लाता है, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि युद्ध के दौरान तकनीक बहुत तेजी से बदलती है और नए इनोवेशन भी होते हैं। रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष सैनिकों के साथ-साथ ड्रोन और रोबोट भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि युद्ध के दौरान मिलिट्री टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है।

Ukraine drone warfare Innovation: छोटे रोबोट, बड़ा काम

यूक्रेन में एक खास तरह का अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल यानी यूजीवी इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे ‘रैटल एच’ कहा जाता है। यह देखने में साधारण लगता है और इसकी रफ्तार भी ज्यादा नहीं है, करीब 8 किलोमीटर प्रति घंटा है। लेकिन इसका काम बेहद अहम है। यह ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आसानी से चल सकता है और जब इसे ऊपर से खतरा दिखाई देता है, तो यह रुककर एक जाल फेंकता है और दुश्मन के ड्रोन को गिरा देता है।

इस रोबोट को बनाने वाली कंपनी पहले स्ट्रीट लाइटिंग का काम करती थी, लेकिन 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद कंपनी ने अपना काम बदल दिया और अब यह यूक्रेन की प्रमुख डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनियों में शामिल हो गई है। अब यह कंपनी यूक्रेन की सेना के लिए अलग-अलग तरह के रोबोट तैयार कर रही है।

छह महीने में तैयार हो जाता है नया सिस्टम

यूक्रेन में टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट की रफ्तार काफी तेज हो गई है। कंपनी के संस्थापक तारास ओस्तापचुक के मुताबिक, अब कोई नया डिजाइन बनने के बाद उसे करीब छह महीने के भीतर बैटलफील्ड में भेज दिया जाता है।

तारास ओस्तापचुक ने बताया कि उनकी टीम लगातार नए तरह के रोबोट बना रही है। कुछ ऐसे हैं जो ड्रोन लॉन्च कर सकते हैं, कुछ में मशीनगन लगाने की तैयारी है। पानी में चलने वाले यानी एंफीबियस मॉडल पर भी काम हो रहा है।

सेना में बढ़ रहा है रोबोट और ड्रोन का इस्तेमाल

यूक्रेन की सेना अब इन यूजीवी और ड्रोन का इस्तेमाल कई कामों में कर रही है। ये मशीनें सैनिकों तक हथियार और जरूरी सामान पहुंचाती हैं, घायल जवानों को सुरक्षित निकालती हैं और जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर हमला भी करती हैं।

13 अप्रैल को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कहा कि सेना ने पहली बार केवल ड्रोन और रोबोट की मदद से रूस की एक पोजीशन पर कब्जा किया, जिसमें किसी सैनिक को सीधे मोर्चे पर नहीं भेजा गया।

ड्रोन बन गए सबसे बड़ा हथियार

वोलोदिमिर जेलेंस्की के अनुसार, इस साल के शुरुआती तीन महीनों में यूक्रेन ने 22 हजार से ज्यादा मिशन ड्रोन और रोबोट के जरिए पूरे किए। उन्होंने बताया कि मार्च महीने में रूस को भारी नुकसान हुआ, जिसमें ज्यादातर हमले ड्रोन के जरिए किए गए थे।

यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, कुल नुकसान का बड़ा हिस्सा ड्रोन हमलों की वजह से हुआ है, जिससे युद्ध का तरीका बदलता दिख रहा है।।

रूस ने बदली रणनीति

ड्रोन के बढ़ते असर के कारण रूस को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है। अब बड़े टैंक हमलों की जगह छोटे-छोटे समूहों में सैनिकों को आगे भेजा जा रहा है। ये सैनिक पेड़ों और झाड़ियों का सहारा लेकर आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं।

इसके बावजूद जमीन पर ज्यादा बढ़त नहीं मिल पा रही है। ऐसे में रूस ने शहरों पर हवाई हमले बढ़ा दिए हैं, जिनमें मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

Ukraine drone warfare Innovation

यूक्रेन में कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा

यूक्रेन में डिफेंस टेक्नोलॉजी का एक बड़ा नेटवर्क बन गया है। यहां करीब 2300 कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। इनमें आपस में प्रतिस्पर्धा भी है, जिससे नए आइडिया तेजी से सामने आ रहे हैं।

यूक्रेन की डिफेंस कंपनी यूफोर्स के सह-संस्थापक ओलेक्सी होंचारुक के अनुसार, यह प्रतिस्पर्धा ही तकनीक को बेहतर बना रही है। इस प्रतिस्पर्धा का असर यह हुआ है कि उपकरण सस्ते होते जा रहे हैं और उनकी गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है। साथ ही उत्पादन भी तेजी से बढ़ा है।

ड्रोन उत्पादन में भारी बढ़ोतरी

यूक्रेन में ड्रोन का उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। जहां पहले लाखों ड्रोन बनते थे, अब यह संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। कुछ ड्रोन अब 1500 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकते हैं।

इसके अलावा इंटरसेप्टर ड्रोन भी बनाए जा रहे हैं, जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोक सकते हैं। यह पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम की तुलना में सस्ते विकल्प माने जाते हैं। हालांकि रूस के पास अब भी बैलिस्टिक मिसाइल जैसे हथियारों में बढ़त बनी हुई है।

टेक्नोलॉजी के साथ डेटा का इस्तेमाल

यूक्रेन ने अपने सिस्टम में डेटा का भी बड़ा इस्तेमाल किया है। हर ऑपरेशन को वीडियो के जरिए रिकॉर्ड किया जाता है, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि कौन सी रणनीति काम कर रही है।

इस डेटा के आधार पर सेना और कंपनियां अपने सिस्टम में सुधार करती हैं। इससे टेक्नोलॉजी और रणनीति दोनों बेहतर होती हैं।

मौसम खराब तो ड्रोन बेकार

यूक्रेन की 128वीं ब्रिगेड के एक अधिकारी “बोटानिक” के अनुसार, जब मौसम साफ होता है तो ड्रोन और रोबोट ज्यादा असरदार होते हैं। लेकिन जैसे ही मौसम खराब होता है, सैनिकों को आगे आना पड़ता है।

उन्होंने बताया कि घने जंगलों में यूजीवी सही तरीके से काम नहीं कर पाते, इसलिए जमीन पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए सैनिक जरूरी होते हैं।

बढ़ रहा है भ्रष्टाचार

वहीं, तेजी से हो रहे इस विकास के बावजूद कुछ दिक्कतें भी सामने आई हैं। सरकारी प्रक्रियाएं अभी भी धीमी हैं, जिससे कंपनियों को लंबी अवधि की योजना बनाने में परेशानी होती है। कई बार भुगतान में देरी भी होती है।

इसके अलावा उपकरणों की जांच और मंजूरी की प्रक्रिया भी समय लेती है, जो युद्ध जैसी स्थिति में चुनौती बन सकती है।

कुछ मामलों में भ्रष्टाचार और पक्षपात की शिकायतें भी सामने आई हैं। यूक्रेन की एक कंपनी के तकनीकी प्रमुख आर्तेम कोलेसनिक ने कहा कि कुछ जगहों पर नियमों को खास कंपनियों के पक्ष में बदला जाता है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ज्यादातर एजेंसियां सही तरीके से काम कर रही हैं और बेहतर तकनीक सेना तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं।

भारत में बनेगा 5 टन का ताकतवर ड्रोन, भारत-जर्मनी मिलकर बनाएंगे 40 घंटे उड़ान भरने वाला AeroForce X

AeroForce X UAV India Germany Deal

AeroForce X UAV India Germany Deal: भारत और जर्मनी अब डिफेंस सेक्टर में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। जर्मनी की एयरोडेटा एजी और भारत की डायनॉटन सिस्टम्स ने एक समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत भारत में एक नए तरह के एडवांस्ड ड्रोन यानी यूएवी प्लेटफॉर्म “एयरोफोर्स एक्स” का को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन किया जाएगा। यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर निगरानी और खुफिया मिशनों के लिए तैयार किया जाएगा। बता दें कि रक्षा मंत्री ने भी अपने जमर्नी दौरे में को-डेवलप और को-प्रोड्यूस करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि आज के समय में भरोसेमंद साझेदारी कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है। भारत जर्मन इंडस्ट्री को एडवांस टेक्नोलॉजी में हमारे साथ मिलकर को-डेवलप और को-प्रोड्यूस करने के लिए आमंत्रित करता है।

AeroForce X UAV India Germany Deal: भारत में बनेगा एडवांस्ड यूएवी प्लेटफॉर्म

डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के प्रमुख डॉ. उदयंत टोबी मल्होत्रा ने कहा कि जर्मनी की कंपनी एयरोडेटा एजी और डायनॉटन सिस्टम्स, जो डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज का हिस्सा है, ने मिलकर एक नया ड्रोन सिस्टम बनाने का फैसला किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत “एयरोफोर्स एक्स” नाम का एडवांस्ड यूएवी भारत में बनाया जाएगा।

22 अप्रैल को हुए इस समझौते का मकसद भारत में ही बड़े और आधुनिक अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी यूएवी तैयार करना है। यह ड्रोन सिस्टम मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस कैटेगरी में आएगा, जिन्हें शॉर्ट में MALE और HALE कहा जाता है।

यह प्लेटफॉर्म करीब 5 टन वेट कैटेगरी का होगा और लंबे समय तक लगातार उड़ान भर सकेगा। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह पहाड़ी इलाकों और समुद्री क्षेत्रों दोनों में काम कर सके। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

AeroForce X UAV India Germany Deal

लंबी उड़ान और ऊंचाई इसकी खासियत

एयरोफोर्स एक्स एक नया और एडवांस्ड ड्रोन सिस्टम है, जिसे एमएएलई यूएएस कहा जाता है। इसका वजन लगभग 5 टन है, यानी यह काफी बड़ा और ताकतवर प्लेटफॉर्म है। इसमें करीब सेंसर और कैमरे समेत 1300 किलो तक के उपकरण लगाए जा सकते हैं।

यह ड्रोन एक बार में करीब 40 घंटे तक लगातार उड़ सकता है, इसलिए लंबे समय तक निगरानी करने के लिए यह बहुत उपयोगी है। इसका एक वर्जन 30 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर उड़ सकता है, जबकि दूसरा वर्जन 50 हजार फीट से भी ऊपर उड़ान भर सकता है।

इसकी एक खास बात यह भी है कि यह ITAR-फ्री प्लेटफॉर्म है, यानी इस पर अमेरिकी एक्सपोर्ट नियमों की पाबंदी नहीं होगी। इससे दूसरे देशों के साथ मिलकर काम करना आसान हो जाता है। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

हिमालय और समुद्र दोनों पर नजर

इस प्लेटफॉर्म को खास तौर पर हिमालय क्षेत्र और हिंद महासागर क्षेत्र के लिए तैयार किया जा रहा है। हिमालय में ऊंचाई और मौसम बड़ी चुनौती होती है, जहां लंबे समय तक निगरानी रखना आसान नहीं होता। ऐसे में यह ड्रोन लगातार उड़ान भरकर इलाके पर नजर रख सकेगा।

वहीं समुद्री क्षेत्र में इसका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, गतिविधियों पर नजर रखने और सुरक्षा से जुड़े कामों में किया जा सकेगा। यह प्लेटफॉर्म इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी आईएसआर मिशनों के लिए उपयोगी होगा।

इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी डायनॉटन सिस्टम्स की अहम भूमिका होगी। कंपनी अपने खुद के विकसित सॉफ्टवेयर, कस्टम हार्डवेयर और सेंसर सिस्टम इस प्लेटफॉर्म में लगाएगी। बताया गया है कि इसमें 50 लाख लाइनों का कोड इस्तेमाल किया जाएगा, जो पूरे सिस्टम को कंट्रोल करेगा।

इसे प्लेटफॉर्म का “नर्वस सिस्टम” कहा जा रहा है, जो सभी हिस्सों को आपस में जोड़कर काम करने में मदद करेगा। इस तरह यह सिर्फ एक ड्रोन नहीं, बल्कि एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

AeroForce X UAV India Germany Deal

दोनों कंपनियां मिलकर करेंगी काम

डॉ. मल्होत्रा के अनुसार, यह सिर्फ एक सामान्य साझेदारी नहीं है, बल्कि दोनों कंपनियां मिलकर इस तकनीक को विकसित करेंगी। यानी डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन सब कुछ साथ में होगा। इस प्रोजेक्ट में बनने वाली टेक्नोलॉजी पर दोनों कंपनियों का साझा अधिकार होगा।

इस समझौते के तहत दोनों कंपनियां मिलकर इस प्लेटफॉर्म को विकसित करेंगी। इसमें डिजाइन से लेकर निर्माण तक का काम शामिल होगा। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ी टेक्नोलॉजी और आईपी यानी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का स्वामित्व दोनों कंपनियों के पास रहेगा।

इसका मतलब है कि भारत को इस टेक्नोलॉजी पर सीधा नियंत्रण मिलेगा और भविष्य में इसमें बदलाव या सुधार करना आसान होगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

जर्मनी के दौरे पर थे रक्षा मंत्री

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जर्मनी के दौरे पर थे। उन्होंने म्यूनिख में डिफेंस इन्वेस्टर समिट के दौरान जर्मन उद्योग जगत को भारत के साथ मिलकर काम करने का न्योता दिया था।

उन्होंने कहा था कि आज के समय में भरोसेमंद साझेदारी बहुत जरूरी हो गई है और भारत ऐसे सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है। उन्होंने साफ किया कि भारत अब सिर्फ रक्षा उपकरण खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन में भागीदार बनना चाहता है।

इस प्रोजेक्ट को “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” अभियान से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत लंबे समय से ड्रोन टेक्नोलॉजी के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहा है। ऐसे में इस तरह का प्लेटफॉर्म देश में विकसित होने से घरेलू क्षमता मजबूत होगी। वहीं, भारतीय कंपनियों को नई टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा क्षेत्र में उनका अनुभव भी बढ़ेगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

बता दें कि एयरोडेटा एजी जर्मनी की एक कंपनी है, जो एयरबोर्न सर्विलांस और मिशन सिस्टम्स के क्षेत्र में काम करती है। वहीं डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज भारत की एक जानी-मानी इंजीनियरिंग कंपनी है, जो एयरोस्पेस और अन्य क्षेत्रों में काम करती है। उसकी डायनॉटन सिस्टम्स यूनिट खास तौर पर ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम्स पर काम कर रही है।

AeroForce X UAV India Germany Deal

डॉ. मल्होत्रा ने यह भी बताया कि इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है और शुरुआती चरण की तस्वीरें भी सामने आई हैं। इसमें डिजाइन, सिस्टम इंटीग्रेशन और अलग-अलग तकनीकों को जोड़ने का काम चल रहा है। यह पूरा प्रोजेक्ट चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगा, जिसमें पहले डिजाइन और टेस्टिंग होगी, उसके बाद उत्पादन की दिशा में काम किया जाएगा। (AeroForce X UAV India Germany Deal)

प्रोजेक्ट दंतक ने 65 साल में बदला भूटान का नक्शा, BRO ने बिछाया 1500 किमी सड़कों का जाल और एयरपोर्ट

Project Dantak Raising Day

Project Dantak Raising Day: भूटान में चल रहे प्रोजेक्ट दंतक के 65 साल पूरे हो चुके हैं। शुक्रवार को राजधानी थिम्पू में बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ ने अपना 66वां रेजिंग डे मनाया। प्रोजेक्ट दंतक भूटान में पिछले 65 वर्षों से चल रही उस साझेदारी का प्रतीक है, जिसने इस छोटे हिमालयी देश की तस्वीर बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है।

Project Dantak Raising Day: भूटान में 65 साल की लगातार सेवा

प्रोजेक्ट दंतक की शुरुआत 24 अप्रैल 1961 को हुई थी। तब भूटान में सड़कें बहुत कम थीं और ज्यादातर इलाकों तक पहुंचने के लिए खच्चरों या पैदल रास्तों का सहारा लेना पड़ता था। ऐसे समय में भारत की इस पहल ने भूटान में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव रखी।

धीरे-धीरे यह प्रोजेक्ट सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाला एक मजबूत नेटवर्क बन गया। आज प्रोजेक्ट दंतक को भूटान के विकास और कनेक्टिविटी की रीढ़ माना जाता है।

Project Dantak Raising Day

सड़क से लेकर एयरफील्ड तक निर्माण

इन 65 वर्षों में प्रोजेक्ट दंतक ने 1500 किलोमीटर से ज्यादा सड़कों का निर्माण किया है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट हाईवे है, जो ट्राशीगांग से थिम्पू तक देश को जोड़ता है। इसके अलावा फुंटशोलिंग-थिम्पू हाईवे भी इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जो व्यापार और यात्रा के लिए बेहद अहम माना जाता है।

प्रोजेक्ट दंतक ने भूटान के पारो एयरफील्ड का निर्माण भी किया, जो आज इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रूप में काम करता है। इसके साथ ही योंगफुला एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड भी डेवलप किया गया, जो अब घरेलू हवाई सेवाओं के लिए इस्तेमाल होता है।

सिर्फ सड़क और एयरफील्ड ही नहीं, बल्कि पुल, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क, अस्पताल, स्कूल और कई संस्थागत ढांचे भी इस प्रोजेक्ट के तहत बनाए गए हैं।

Project Dantak Raising Day

हाल के सालों में तेजी से काम

पिछले कुछ सालों में प्रोजेक्ट दंतक के तहत कई महत्वपूर्ण सड़कों को डबल लेन में बदला गया है, जिससे यात्रा आसान और सुरक्षित हुई है। कॉन्फ्लुएंस से हा रोड के एक हिस्से का विस्तार इसका उदाहरण है, जिसका उद्घाटन अगस्त 2025 में हुआ था।

इसके अलावा करीब 168 किलोमीटर लंबे समद्रुप जोंगखर-ट्राशीगांग हाईवे पर भी काम किया गया, जिससे लोगों के आने-जाने में लगने वाला समय कम हुआ है। यह सड़क पूर्वी भूटान के लिए काफी अहम मानी जाती है।

प्रोजेक्ट दंतक ने प्राकृतिक आपदाओं के समय भी तेजी से काम किया है। भूस्खलन या सड़क टूटने की घटनाओं के बाद कम समय में कनेक्टिविटी बहाल करना इसकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।

नए प्रोजेक्ट्स पर जारी काम

फिलहाल भूटान के कई हिस्सों में नए रोड प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। इनमें दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र के नंगलम-देवथांग, समरांग-जोमोटसांखा और खोटकापा-त्शोबाले जैसे मार्ग शामिल हैं। इसके अलावा डामछू-छुखा हाईवे को मजबूत करने का काम भी जारी है।

कुछ जगहों पर वैकल्पिक रास्ते तैयार किए जा रहे हैं, ताकि हर मौसम में आवाजाही बनी रहे। पनबांग-नंगलम और देवथांग-समद्रुपचोलिंग जैसे रूट इसी योजना का हिस्सा हैं। इन प्रोजेक्ट्स में पर्यावरण का खास ध्यान रखा जा रहा है।

Project Dantak Raising Day

फुंटशोलिंग-थिम्पू रोड पर रिसर्फेसिंग का काम

प्रोजेक्ट दंतक के के तहत पूर्वी भूटान के मोटांगा इंडस्ट्रियल पार्क में नदी को नियंत्रित करने का काम किया जा रहा है, जिससे औद्योगिक क्षेत्र सुरक्षित रहे। वहीं फुंटशोलिंग-थिम्पू रोड पर रिसर्फेसिंग का काम चल रहा है, जिससे सड़क की गुणवत्ता बेहतर हो सके।

ऊंचाई वाले इलाकों में भी काम जारी है। हा-पारो रोड पर चाले ला पास में बर्फ हटाने का काम नियमित रूप से किया जाता है, ताकि रास्ता खुला रहे। इसके अलावा नंगलम-देवथांग रोड पर नई सड़क बनाने के लिए जमीन काटने का काम भी चल रहा है।

भारत-भूटान रिश्तों का अहम हिस्सा

प्रोजेक्ट दंतक ने भारत और भूटान के रिश्तों को मजबूत करने का भी काम किया है। दोनों देशों के बीच सहयोग और भरोसे की जो परंपरा है, यह प्रोजेक्ट उसी का हिस्सा माना जाता है।

इस साल का रेजिंग डे एक और वजह से खास रहा, क्योंकि भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक की 70वीं जयंती भी इसी समय मनाई जा रही है। उनके नेतृत्व में भूटान के विकास की दिशा तय हुई थी, जिसमें ऐसे प्रोजेक्ट्स का बड़ा योगदान रहा।

रेजिंग डे के मौके पर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। थिम्पू में 14 अप्रैल को इंटर-स्कूल क्विज प्रतियोगिता हुई, जिसमें छात्रों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा प्रोजेक्ट से जुड़े कर्मचारियों को सम्मानित किया गया और ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी गई।

इन कार्यक्रमों के जरिए स्थानीय लोगों और प्रोजेक्ट के बीच जुड़ाव भी देखने को मिला। भूटान के आम नागरिकों के साथ प्रोजेक्ट दंतक का रिश्ता लंबे समय से बना हुआ है।

अमेरिका में जनरल उपेंद्र द्विवेदी को मिला बड़ा सम्मान, यूएस के इस प्रतिष्ठित संस्थान के ‘हॉल ऑफ फेम’ में मिली जगह

Gen Upendra Dwivedi US visit-COAS inducted into USAWC International Hall of Fame
General Upendra Dwivedi, COAS, visited the Army War College (AWC), Carlisle Barracks, USA

Gen Upendra Dwivedi US visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का अमेरिका दौरा बेहद ही खास रहा है। उनका नाम अमेरिका के प्रतिष्ठित यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी वॉर कॉलेज के इंटरनेशनल फेलोज हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया है। इसके साथ ही वह इस सम्मान को पाने वाले तीसरे भारतीय सेना प्रमुख बन गए हैं। उनसे पहले जनरल वी.के. सिंह और जनरल बिक्रम सिंह को यह सम्मान मिल चुका है।

Gen Upendra Dwivedi US visit: अमेरिका में मिला बड़ा सम्मान

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्थित कार्लिसल बैरक्स में मौजूद आर्मी वॉर कॉलेज का दौरा किया। यहीं पर उन्हें इंटरनेशनल हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया। यह सम्मान उन विदेशी सैन्य अधिकारियों को दिया जाता है, जिन्होंने इस संस्थान से पढ़ाई करने के बाद अपने देश की सेना के शीर्ष पद तक पहुंच हासिल की हो।

इस मौके पर उन्होंने वहां मौजूद फैकल्टी और अलग-अलग देशों से आए सैन्य अधिकारियों को संबोधित भी किया। अपने संबोधन में उन्होंने नेतृत्व, प्रोफेशनल मिलिट्री एजुकेशन और बदलते सुरक्षा हालात जैसे मुद्दों पर बात की।

उसी संस्थान के रहे हैं छात्र

जनरल द्विवेदी खुद भी इस प्रतिष्ठित संस्थान के छात्र रह चुके हैं। उन्होंने साल 2014-15 में यहां से स्ट्रैटेजिक स्टडीज से जुड़ा हाई लेवल कोर्स किया था। उन्हें डिस्टिंग्विश्ड फेलो का सम्मान भी मिला हुआ है। इस कोर्स को भारत के नेशनल डिफेंस कॉलेज के बराबर माना जाता है, जहां वरिष्ठ सैन्य अधिकारी रणनीतिक स्तर की ट्रेनिंग लेते हैं।

दौरे के दौरान उन्होंने कॉलेज की अलग-अलग सुविधाओं का भी निरीक्षण किया। इसके साथ ही उन्होंने पैनल डिस्कशन में हिस्सा लिया, स्कॉलर्स प्रोग्राम के तहत तैयार किए गए एडवांस्ड स्टडी प्रोजेक्ट्स को देखा और संस्थान के वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत की।

क्या होता है इंटरनेशनल हॉल ऑफ फेम

आर्मी वॉर कॉलेज का इंटरनेशनल फेलोज हॉल ऑफ फेम एक खास सम्मान माना जाता है। इसकी शुरुआत 1988 में हुई थी। इसमें उन्हीं अधिकारियों को जगह दी जाती है, जो इस कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद अपने देश में सेना प्रमुख या उसके बराबर के उच्च पद तक पहुंचे हों।

दुनिया भर के हजारों इंटरनेशनल फेलोज में से बहुत कम लोगों को यह सम्मान मिलता है। किसी अधिकारी का नाम पहले उसके देश की ओर से प्रस्तावित किया जाता है, जिसके बाद अमेरिकी सैन्य नेतृत्व की मंजूरी के बाद उसे औपचारिक रूप से शामिल किया जाता है।

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हवाई और वॉशिंगटन में भी अहम कार्यक्रम

अमेरिका दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने हवाई स्थित फोर्ट शाफ्टर का भी दौरा किया, जो यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी पैसिफिक का मुख्यालय है। यहां उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। उन्होंने यूएसएआरपैक के कमांडिंग जनरल रोनाल्ड पी क्लार्क और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकें कीं।

इन बैठकों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने, संयुक्त ट्रेनिंग और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस पर चर्चा हुई। मल्टी-डोमेन का मतलब है जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे सभी क्षेत्रों में मिलकर काम करना।

इसके अलावा टेक्नोलॉजी से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत हुई, जिसमें डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, को-प्रोडक्शन और नई तकनीकों पर सहयोग जैसे विषय शामिल रहे।

ओआहू द्वीप का हवाई दौरा

दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने ओआहू द्वीप का हवाई सर्वे भी किया। इस दौरान उन्हें अमेरिकी सेना के ट्रेनिंग सिस्टम और ऑपरेशनल तैयारी को करीब से समझने का मौका मिला। खासतौर पर जंगल और समुद्री इलाकों में होने वाले अभ्यास और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की जानकारी दी गई।

इस सर्वे में यह देखा गया कि अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ ऑपरेशन कैसे किए जाते हैं और सेना किस तरह अपनी तैयारी बनाए रखती है।

लगातार बढ़ रहा सैन्य संपर्क

जनरल द्विवेदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के बीच सैन्य स्तर पर लगातार संपर्क बढ़ रहा है। पिछले कुछ महीनों में तीनों भारतीय सेना प्रमुख अमेरिका जा चुके हैं।

नवंबर 2025 में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने अमेरिका का दौरा किया था। इसके बाद अप्रैल 2026 की शुरुआत में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह भी वहां गए। अब थल सेना प्रमुख का दौरा हुआ है।

इन दौरों के दौरान अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों में बातचीत हुई है। नौसेना ने समुद्री सुरक्षा और सहयोग पर ध्यान दिया, वायुसेना ने एयर ऑपरेशन और लॉजिस्टिक्स पर चर्चा की, जबकि थल सेना ने जमीन आधारित ऑपरेशन और आपसी तालमेल को लेकर बातचीत की। (Gen Upendra Dwivedi US visit)

नई किताब के लॉन्च पर जनरल नरवणे ने बताया “जो उचित समझो, वो करो” का असली मतलब? पहली बार तोड़ी चुप्पी

Gen MM Naravane Remark
Gen MM Naravane

Gen MM Naravane Remark: सैन्य अधिकारी से लेखक बने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे एक बार फिर चर्चा में हैं। उनकी नई किताब “द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड” (The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries) काफी चर्चा में है। इस किताब में उन्होंने भारतीय सेनाओं से जुड़ी कई अनसुनी कहानियों, रहस्यों और परंपराओं को सामने लाने की कोशिश की है।

किताब के लॉन्च के दौरान उन्होंने अपनी पिछली किताब को लेकर हुए विवाद पर भी खुलकर बात की और कहा कि उन्हें बेवजह उस मामले में घसीटा गया था। साथ ही उन्होंने “जो उचित समझो, वो करो” वाले बयान का मतलब भी समझाया।

Gen MM Naravane Remark: नई किताब में क्या है खास

जनरल नरवणे की नई किताब का फोकस उनकी पिछली किताब से अलग है। पहले जहां उन्होंने अपने करियर और बड़े सैन्य घटनाक्रमों के बारे में लिखा था, वहीं इस बार उन्होंने हल्के अंदाज में सेना की कहानियों को सामने रखा है।

इस किताब में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े ऐसे किस्से शामिल हैं, जो आमतौर पर लोगों को पता नहीं होते। इसमें मिलिट्री लाइफ के अलग-अलग पहलुओं, परंपराओं और दिलचस्प घटनाओं को सरल तरीके से समझाया गया है।

पब्लिशर रूपा पब्लिकेशंस के मुताबिक, यह किताब उन कहानियों को सामने लाती है जो अब तक पर्दे के पीछे रही हैं। इसमें मिलिट्री से जुड़े मिथक, रहस्य और अंदर की बातें शामिल हैं।

पिछली किताब से शुरू हुआ विवाद

जनरल नरवणे की पिछली किताब “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। लेकिन उसके कुछ हिस्सों को लेकर पिछले संसदीय सत्र में विवाद खड़ा हो गया था।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस किताब के कुछ हिस्सों का जिक्र किया था। इसके बाद संसद में इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई। सत्तापक्ष के नेताओं ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि एक ऐसी किताब का जिक्र नहीं किया जाना चाहिए, जो अभी आधिकारिक रूप से जारी ही नहीं हुई है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी थी और बिना पुष्टि वाली सामग्री का हवाला देने की आलोचना की थी। इसके बाद संसद में माहौल काफी गर्म हो गया था।

“मुझे गलत तरीके से घसीटा गया”

इस पूरे विवाद पर जनरल नरवणे ने कहा कि यह उनके लिए ठीक नहीं था। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें ऐसे मामले में शामिल कर दिया गया, जिसका उनसे सीधा कोई लेना-देना नहीं था।

उन्होंने कहा कि देश में और भी कई अहम मुद्दे हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उस समय सरकार ने उनका समर्थन किया था।

उनके अनुसार, उनकी किताब एक सामान्य प्रक्रिया से गुजर रही थी और उसे लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा करना सही नहीं था।

“जो उचित समझो, वो करो” की बताई सच्चाई

पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी किताब से जुड़े विवाद के बाद पहली बार विस्तार से बात करते हुए “जो उचित समझो, वो करो” वाले बयान का मतलब साफ किया। उन्होंने कहा कि इस वाक्य का मतलब यह नहीं था कि सरकार जिम्मेदारी से पीछे हट गई थी, बल्कि इसका मतलब था कि सरकार को सेना पर पूरा भरोसा था।

जनरल नरवणे के मुताबिक, जब चीन के साथ सीमा पर तनाव चल रहा था, उस समय सरकार ने सेना को हालात के हिसाब से फैसले लेने की पूरी छूट दी थी। उन्होंने कहा कि “जो उचित समझो, वो करो” यह दिखाता है कि सरकार को सेना, उसके वरिष्ठ अधिकारियों और पूरी कमांड चेन पर पूरा विश्वास था।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सेना पूरी तरह गैर-राजनीतिक संस्था होती है। उन्होंने कहा कि सेना हमेशा देश के हित में काम करती है और फैसले लेते समय सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।

जनरल नरवणे ने यह भी बताया कि उस समय सरकार और सेना के बीच पूरा तालमेल था और सभी फैसले मिलकर लिए जा रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी किताब उनके निजी अनुभवों पर आधारित है और इसमें किसी भी गोपनीय दस्तावेज का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

चीन सीमा विवाद पर भी दिया जवाब

जनरल नरवणे ने 2020 के भारत-चीन सीमा तनाव को लेकर भी अपनी बात रखी। जब एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की स्थिति और सीमा पर तनाव को लेकर सवाल पूछा गया, तो जनरल नरवणे ने साफ कहा कि भारत के जमीन खोने की बात सही नहीं है। उन्होंने बताया कि सेना ऑपरेशन के दौरान कुछ तय गाइडलाइंस के तहत काम करती है, लेकिन जमीन पर फैसले मौके की स्थिति के अनुसार लिए जाते हैं।

जनरल नरवणे के मुताबिक, सीमा पर हालात को संभालने में सेना और सरकार के बीच अच्छा समन्वय था और उसी के आधार पर फैसले लिए गए।

उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि अगर किसी को शक है कि भारत ने जमीन खोई है, तो इसका जवाब जानने के लिए चीन से ही पूछ लेना चाहिए कि क्या उसने हाल में भारत की कोई जमीन हासिल की है।

क्या हुआ था संसद में

फरवरी में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया गया था। उस दौरान राहुल गांधी ने एक मैगजीन में छपे अंश का हवाला दिया था, जो इस किताब से जुड़ा बताया गया।

इस पर सत्तापक्ष ने विरोध जताया और कहा कि यह सामग्री प्रमाणित नहीं है। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।

बाद में विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया, लेकिन इसे बाद में वॉयस वोट से खारिज कर दिया गया।

कैसे मिली किताब लिखने की प्रेरणा

नई किताब के बारे में बात करते हुए जनरल नरवणे ने बताया कि उन्हें यह विचार अचानक आया। उन्होंने कहा कि जब वह एक अन्य लेखक की किताब पढ़ रहे थे, तब उन्हें लगा कि भारतीय सेना के पास भी ऐसी कई कहानियां हैं, जिन्हें लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि उनके दिमाग में सेना से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियां थीं, जिन्हें वे नजरअंदाज नहीं कर सके। इसी वजह से उन्होंने इस विषय पर लिखने का फैसला किया।

किताब में अंतरराष्ट्रीय सैन्य संबंधों की झलक

जनरल नरवणे ने एक और घटना का जिक्र किया, जो 2025 में दुबई एयर शो के दौरान हुई थी। उस समय तेजस एमके-1 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें एक भारतीय पायलट की मौत हो गई थी।

उन्होंने बताया कि इस घटना के बाद रूसी एरोबेटिक टीम ने भारतीय पायलट को श्रद्धांजलि दी थी। उन्होंने अपने प्रदर्शन को भारतीय पायलट के नाम समर्पित किया था।

जनरल नरवणे के मुताबिक, यह दिखाता है कि अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच पेशेवर स्तर पर आपसी सम्मान और जुड़ाव कितना गहरा होता है।

सैन्य जीवन के अलग पहलुओं को दिखाती किताब

जनरल नरवणे की नई किताब का मकसद सैन्य जीवन के उस पहलू को सामने लाना है, जो आमतौर पर खबरों में नहीं दिखता। इसमें युद्ध या रणनीति के बजाय लोगों, परंपराओं और अनुभवों पर ज्यादा ध्यान दिया गया है।

इस किताब के जरिए उन्होंने सेना के मानवीय और सांस्कृतिक पक्ष को सामने रखने की कोशिश की है, जिससे आम लोगों को सेना को समझने का एक नया नजरिया मिल सके।

म्यूनिख में राजनाथ सिंह का बड़ा ऐलान, जर्मन कंपनियों को दिया भारत के साथ काम करने का ऑफर

India Germany Defence Cooperation

India Germany Defence Cooperation: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जर्मनी दौरे के आखिरी दिन म्यूनिख में आयोजित डिफेंस इन्वेस्टर समिट में कहा कि जर्मनी का उद्योग जगत भारत के साथ मिलकर काम करे। उन्होंने जर्मन डिफेंस इंडस्ट्री को भारत आने का निमंत्रण भी दिया और एडवांस टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में साथ मिलकर साथ विकास करने और उत्पादन करने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा दुनिया से अलग होने की नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदारों के साथ मिलकर डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन करने की है।

म्यूनिख में आयोजित डिफेंस इन्वेस्टर समिट में रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि आज के दौर में केवल मजबूत देश ही नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदारी भी जरूरी हो गई है। दुनिया में तेजी से बदल रहे जियोपॉलिटिकल हालात, सप्लाई चेन में आ रही दिक्कतें और टेक्नोलॉजी में तेज बदलाव के बीच देशों और कंपनियों को अपने साझेदारों का चयन सोच-समझकर करना पड़ रहा है।

India Germany Defence Cooperation: भरोसे पर आधारित साझेदारी पर जोर

राजनाथ सिंह ने साफ कहा कि आने वाले समय में वही साझेदार टिक पाएंगे जिनके बीच भरोसा और साझा हित होंगे। उन्होंने जर्मन कंपनियों से कहा कि भारत उनके लिए सिर्फ एक बाजार नहीं है, बल्कि एक लंबे समय का स्ट्रैटेजिक पार्टनर बन सकता है।

उन्होंने भारत की खासियतों को भी सामने रखा। भारत को उन्होंने एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, युवा और स्किल्ड वर्कफोर्स वाला देश बताया। साथ ही कहा कि यहां का इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है और निवेश के लिए स्थिर माहौल मौजूद है। सरकार की नीतियां पारदर्शी हैं और कानून व्यवस्था मजबूत है, जो किसी भी बड़े निवेश के लिए जरूरी होती है।

आत्मनिर्भर भारत का नया मतलब

अपने भाषण में रक्षा मंत्री ने “आत्मनिर्भर भारत” को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं है कि भारत दुनिया से अलग होकर काम करेगा। बल्कि इसका अर्थ है कि भारत अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ मिलकर डिजाइन, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन करेगा।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत अब केवल डिफेंस उपकरण खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता। लक्ष्य यह है कि भारत खुद डिजाइन और निर्माण में भागीदार बने। इससे देश की तकनीकी क्षमता भी बढ़ेगी और इंडस्ट्री को भी मजबूती मिलेगी।

India Germany Defence Cooperation

किन क्षेत्रों में सहयोग की बात

म्यूनिख समिट के दौरान उन्होंने ‘री-आर्म यूरोप’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत और जर्मनी के बीच मिलकर काम करने की काफी संभावनाएं हैं। राजनाथ सिंह ने कुछ खास क्षेत्रों का जिक्र किया, जहां भारत जर्मनी के साथ मिलकर काम करना चाहता है। इनमें एडवांस्ड रडार और सेंसर टेक्नोलॉजी, मल्टी-सेंसर सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आधारित ड्रोन सिस्टम, सोनाबॉय और अंडरवॉटर कम्युनिकेशन सिस्टम शामिल हैं।

इन क्षेत्रों को “निश टेक्नोलॉजी” कहा जाता है, यानी ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी, जो भविष्य के युद्ध और सुरक्षा जरूरतों के लिए बेहद अहम मानी जाती हैं।

2047 तक विकसित राष्ट्र बन जाएगा भारत

रक्षा मंत्री ने भारत के विकास के लक्ष्य का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि देश 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में काम कर रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने में डिफेंस सेक्टर को अहम भूमिका दी गई है।

उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से बढ़े हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों को उन्होंने इनोवेशन के बड़े केंद्र बताया, जहां नई तकनीकों पर काम हो रहा है।

सरकार ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बेहतर बनाने के लिए कई सुधार किए हैं, जिससे विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना आसान हुआ है।

सप्लाई चेन और इंडस्ट्री सहयोग पर फोकस

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारत ने डिफेंस सेक्टर को अपनी इंडस्ट्रियल और टेक्नोलॉजिकल रणनीति के केंद्र में रखा है। उनका कहना था कि मजबूत डिफेंस इंडस्ट्री न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करती है, बल्कि आर्थिक विकास में भी योगदान देती है।

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि दुनिया भर की कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाने पर ध्यान दे रही हैं। ऐसे में भारत एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभर रहा है।

उन्होंने बताया कि भारत में निर्माण लागत कम है, स्किल्ड मैनपावर उपलब्ध है और सप्लायर का बड़ा नेटवर्क मौजूद है। इससे कंपनियों को उत्पादन और सप्लाई दोनों में फायदा मिल सकता है।

भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे नई तकनीकों के विकास के लिए अच्छा माहौल तैयार हो रहा है।

म्यूनिख समिट से पहले रक्षा मंत्री ने बर्लिन में जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। इस बैठक में दोनों देशों ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप पर सहमति जताई। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग ट्रेनिंग में सहयोग के लिए एक इम्प्लीमेंटिंग अरेंजमेंट भी साइन किया गया।

इस दौरान दोनों देशों ने मिलिट्री-टू-मिलिट्री कोऑपरेशन को बढ़ाने पर भी चर्चा की, जिसमें संयुक्त अभ्यास और ट्रेनिंग शामिल हैं।

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कील में सबमरीन फैसिलिटी का दौरा

जर्मनी यात्रा के दौरान राजनाथ सिंह ने कील शहर में स्थित टीकेएमएस सबमरीन बिल्डिंग फैसिलिटी का भी दौरा किया। इस दौरान उन्होंने समुद्री रक्षा क्षमताओं और नौसेना से जुड़ी एडवांस तकनीकों को करीब से देखा।

इस दौरे को भारत की नौसेना के आधुनिकीकरण और सबमरीन प्रोजेक्ट्स के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां दोनों पक्षों के बीच तकनीकी सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई।