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सेना कर रही ‘सुपर कंट्रोल सिस्टम’ बनाने की तैयारी, “डिजिटल दिमाग” से जुड़ेंगे टैंक, मिसाइल और आर्टिलरी

LVCCS Indian Army RFI
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LVCCS Indian Army: भारतीय थलसेना एक नया सिस्टम डेवलप करने की तैयारी कर रही है, जिसका नाम है लैंड वेक्टर्स कंट्रोल एंड कोऑर्डिनेशन सिस्टम (LVCCS)। यह सिस्टम सेना के सभी लैंड बेस्ड वेपंस और फायर पावर को एक ही नेटवर्क में जोड़ने के लिए बनाया जा रहा है। इसके लिए सेना के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ इंफॉर्मेशन सिस्टम ने सेना को नेटवर्क सेंट्रिक बनाने के लिए एक ड्राफ्ट रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है।

यह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा, जिसमें जमीन पर चलने वाले सभी मिलिट्री वेक्टर्स जैसे टैंक, आर्टिलरी गन, हॉवित्जर, रॉकेट, मिसाइल, लॉइटरिंग अमुनिशन को रीयल-टाइम में कंट्रोल और कॉर्डिनेट करेगा।

LVCCS Indian Army: क्यों जरूरी है यह सिस्टम

अब तक सेना के अलग-अलग हथियार और यूनिट्स अपने-अपने तरीके से काम करते थे। टारगेट देखना, प्लान बनाना, फायर करना और नुकसान का आकलन करना – यह सब अलग-अलग सिस्टम से होता था। इससे समय ज्यादा लगता था और कई बार तालमेल में कमी आ जाती थी।

एलवीसीसीएस इस पूरी प्रक्रिया को एक साथ जोड़ देगा। यह ऑब्जर्वेशन से लेकर फायर डिलीवरी और डैमेज असेसमेंट तक सब कुछ ऑटोमेट करेगा। इसका मतलब है कि कमांडर को एक ही स्क्रीन पर पूरा बैटलफील्ड दिखेगा और वह तुरंत फैसला ले सकेगा। (LVCCS Indian Army)

कैसे काम करेगा एलवीसीसीएस

यह सिस्टम चार मुख्य हिस्सों में काम करेगा। पहला हिस्सा फायर कंट्रोल का होगा, जिसमें कमांडर और सेंसर जैसे रडार और ड्रोन शामिल होंगे। दूसरा हिस्सा फायरिंग यूनिट्स का होगा, जहां से असल में गोली या मिसाइल दागी जाएगी। तीसरा हिस्सा लॉजिस्टिक्स से जुड़ा होगा और चौथा हिस्सा सभी हथियारों को जोड़ने वाला नेटवर्क होगा।

इसमें टारगेट की जानकारी ड्रोन या सेंसर से आएगी, फिर सिस्टम खुद प्लान बनाएगा और गन या रॉकेट सिस्टम उस ऑर्डर को एग्जीक्यूट करेंगी। इससे समय की बचत होगी और सटीकता बढ़ेगी।

आर्टिलरी सिस्टम को मिलेगा बड़ा अपग्रेड

एलवीसीसीएस खास तौर पर आर्टिलरी यानी तोपखाने के लिए बहुत अहम माना जा रहा है। इसमें फायर कंट्रोल, टैक्टिकल कंट्रोल और फायर प्लानिंग जैसे फीचर्स होंगे। यह सिस्टम तय करेगा कि किस हथियार का इस्तेमाल कहां और कैसे करना है। इससे रिसोर्सेज का सही इस्तेमाल होगा और दुश्मन पर दबाव बढ़ेगा। इसके जरिए थिएटर लेवल पर भी फायर प्लान तैयार किया जा सकेगा, यानी बड़े स्तर पर ऑपरेशन को कंट्रोल करना आसान होगा।

जीआईएस और डिजिटल मैप का इस्तेमाल

इस सिस्टम में जीआईएस यानी जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके जरिए डिजिटल मैप पर पूरे इलाके की जानकारी मिलेगी। इसमें 3डी टेरेन मॉडलिंग, सैटेलाइट इमेज और रास्तों का विश्लेषण जैसे फीचर्स होंगे। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन सा इलाका फायरिंग के लिए सही है और कौन सा नहीं। इसके अलावा यह सिस्टम खुद सबसे छोटा रास्ता और वैकल्पिक मार्ग भी सुझा सकेगा। (LVCCS Indian Army)

नेटवर्क और कम्युनिकेशन सिस्टम

एलवीसीसीएस एक मजबूत नेटवर्क पर काम करेगा। इसमें सैटेलाइट, रेडियो, लाइन और लोकल नेटवर्क का इस्तेमाल होगा। यह सिस्टम आर्मी डेटा नेटवर्क से जुड़ा होगा और इसमें हाई लेवल एन्क्रिप्शन होगा, जिससे डेटा सुरक्षित रहेगा। इससे युद्ध के दौरान भी कम्युनिकेशन सुरक्षित और बिना रुकावट के चलता रहेगा।

लिनक्स पर होगा ऑपरेट

यह सिस्टम किसी एक खास मशीन पर निर्भर नहीं होगा। इसे लैपटॉप, टैबलेट या कंप्यूटर पर चलाया जा सकेगा।
इसमें लिनक्स जैसे भरोसेमंद ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही यह टच स्क्रीन फ्रेंडली होगा और इस्तेमाल में आसान रहेगा। हार्डवेयर के तौर पर मजबूत और टिकाऊ लैपटॉप और टैबलेट दिए जाएंगे, जो धूल, पानी और झटकों को सह सकें। (LVCCS Indian Army)

मौजूदा सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन

एलवीसीसीएस को इस तरह बनाया जा रहा है कि यह सेना के मौजूदा सिस्टम के साथ भी काम कर सके। यह बैटलफील्ड सर्विलांस सिस्टम और कमांड इंफॉर्मेशन सिस्टम से जुड़कर काम करेगा। इससे पुराने और नए सिस्टम के बीच तालमेल बना रहेगा और ऑपरेशन में कोई दिक्कत नहीं आएगी।

LVCCS आने से बदलेगी नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर की क्षमता

भविष्य में जब कभी युद्ध जैसी स्थिति होगी, तब सबसे बड़ा फर्क गति और सटीकता में दिखेगा। पहले मैनुअल प्रक्रिया में जो 10-15 मिनट लगते थे, अब कुछ सेकंड-मिनट में हो जाएगा। साथ ही, कमांडर को पूरा “ग्राउंड पिक्चर” दिखेगा, कौन सा हथियार कहां है, किस दिशा में फायर करना है और किस टारगेट को पहले लेना है। यह सब एक ही जगह से तय होगा। इससे गलत फैसलों की संभावना कम होगी।

इस सिस्टम का फायदा यह है कि बिना नए हथियार खरीदे ही मौजूदा हथियार ज्यादा प्रभावी हो जाएंगे। टैक्टिकल कंट्रोल से एक ही टारगेट पर जरूरत से ज्यादा फायर नहीं होगा। सही हथियार सही जगह इस्तेमाल होगा। इससे गोला-बारूद की बचत होगी और असर ज्यादा दिखेगा। इसी वजह से इसे “फोर्स मल्टीप्लायर” कहा जाता है, यानी वही ताकत कई गुना असर दिखाएगी।

वहीं, अभी तक अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल बनाने में समय लगता है। एलवीसीसीएस के बाद यह काम आसान हो जाएगा। ऑब्जर्वेशन पोस्ट, कमांड पोस्ट और फायरिंग यूनिट्स एक ही सिस्टम से जुड़े होंगे। इससे जानकारी तुरंत शेयर होगी और आदेश भी तुरंत पहुंचेंगे।

यह सिस्टम इलाके की पूरी जानकारी देता है, जैसे कौन सा इलाका ऊंचा है, कहां रुकावट है और कहां से फायर ज्यादा असर करेगा। इससे हथियारों को सही जगह तैनात करना आसान होगा। गलत जगह फायरिंग करने की संभावना कम होगी और असर ज्यादा होगा।

एलवीसीसीएस सिर्फ फायरिंग तक ही सीमित नहीं है, यह लॉजिस्टिक्स पर भी नजर रखता है। किस यूनिट के पास कितना गोला-बारूद है, किसे जरूरत है और कहां सपोर्ट भेजना है, यह सब जानकारी सिस्टम में मिलेगी। इससे सप्लाई में तेजी आएगी। (LVCCS Indian Army)

प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट से शुरुआत

अभी इस प्रोजेक्ट की शुरुआत प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट यानी पीओसी से होगी। इसमें एक ब्रिगेड स्तर पर इस सिस्टम को टेस्ट किया जाएगा। इसमें 155 मिमी बोफोर्स गन और स्मर्च रॉकेट सिस्टम को जोड़कर देखा जाएगा कि सिस्टम कैसे काम करता है। अगर यह सफल रहा तो इसे धीरे-धीरे पूरे आर्मी स्तर पर लागू किया जाएगा।

सोर्स कोड सेना के पास

इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि इसका पूरा सोर्स कोड सेना के पास रहेगा। कोई बाहरी कंपनी इस सिस्टम पर कंट्रोल नहीं रखेगी। सभी डेटा और तकनीक सेना के पास ही रहेगी। इसके अलावा सिस्टम का सिक्योरिटी ऑडिट भी किया जाएगा ताकि किसी तरह की साइबर ​​वल्नरेबिलिटी न रहे।

मेंटेनेंस और सपोर्ट

एलवीसीसीएस को 10 साल तक इस्तेमाल में रखने की योजना है। इसके साथ 3 साल की वारंटी और लंबे समय तक तकनीकी सपोर्ट भी दिया जाएगा। इसमें ट्रेनिंग, रिपेयर और अपग्रेड की सुविधा भी शामिल होगी, ताकि सिस्टम हमेशा अपडेट बना रहे।

इस प्रोजेक्ट के लिए भारतीय कंपनियों को मौका दिया जाएगा। उन्हें अपनी क्षमता और अनुभव के आधार पर चुना जाएगा। सरकार चाहती है कि यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी हो और इसमें ज्यादा से ज्यादा भारतीय तकनीक का इस्तेमाल हो। (LVCCS Indian Army)

IAF चीफ के अमेरिका दौरे के बाद PACAF कमांडर पहुंचे भारत, इंडो-पैसिफिक पर फोकस!

India US defence ties
General Kevin B. Schneider, Commander PACAF & Air Component Commander, U.S. Indo-Pacific Command, called on Air Chief Marshal AP Singh, CAS, Indian Air Force, during his official visit to India.

India US defence ties: अप्रैल में भारत और अमेरिका के बीच वायुसेना स्तर पर दो अहम दौरे हुए हैं। एक तरफ जहां अमेरिकी प्रशांत वायुसेना के कमांडर जनरल केविन बी. श्नाइडर भारत आए हुए हैं, तो दूसरी तरफ इस महीने की शुरुआत में भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने अमेरिका का दौरा किया था। ये दोनों यात्राएं लगभग एक ही समय में हुईं और इन्हें आपसी सहयोग को मजबूत करने के तौर पर देखा जा रहा है। खस बात यह है कि भारतीय सेना प्रमुख जनल उपेंद्र द्विवेदी भी इन दिनों अमेरिका के दौरे पर हैं।

India US defence ties: पैसिफिक एयर फोर्स के कमांडर हैं श्नाइडर 

अप्रैल के तीसरे हफ्ते में जनरल केविन बी. श्नाइडर भारत पहुंचे हैं। वे अमेरिकी प्रशांत वायुसेना यानी पैसिफिक एयर फोर्स (PACAF) के कमांडर हैं और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी वायुसेना के बड़े ऑपरेशन्स को संभालते हैं। उनकी इस यात्रा का मकसद भारत के साथ वायुसेना सहयोग को और मजबूत करना था।

दिल्ली में उन्होंने भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह से मुलाकात की। इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर बात की। खास तौर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा हालात, संयुक्त अभ्यास, ट्रेनिंग और ऑपरेशनल तालमेल पर चर्चा हुई। इसके अलावा साइबर और स्पेस जैसे नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।

भारत यात्रा के दौरान जनरल श्नाइडर ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद उन्हें भारतीय वायुसेना की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

उन्होंने भारतीय वायुसेना के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी बैठक की, जिसमें दोनों देशों के बीच चल रहे सहयोग को आगे बढ़ाने के तरीकों पर बात हुई। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री संग्रहालय और गांधी स्मृति का दौरा भी किया।

अमेरिका गए थे वायुसेना प्रमुख

जनरल श्नाइडर की भारत यात्रा से पहले 6 से 9 अप्रैल तक एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह अमेरिका गए थे। उनका दौरा करीब एक हफ्ते तक चला। इस दौरान उन्होंने कई अहम सैन्य और तकनीकी संस्थानों का दौरा किया। अमेरिका पहुंचने पर जॉइंट बेस अनाकोस्टिया-बोलिंग पर उन्हें फुल ऑनर्स के साथ रिसीव किया गया।

पेंटागन में हुई अहम बैठकें

दौरे के दौरान एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने पेंटागन में अमेरिकी वायुसेना के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। इसमें यूएस एयर फोर्स के सचिव ट्रॉय मेइंक और वायुसेना प्रमुख जनरल केनेथ विल्सबैक शामिल रहे। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी एक साथ काम करने की क्षमता बढ़ाने पर चर्चा हुई।

इसके अलावा संयुक्त अभ्यास, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और वायुसेना के आधुनिकीकरण जैसे मुद्दों पर भी बात हुई। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों की साझा रणनीतिक प्राथमिकताओं पर भी चर्चा का फोकस रहा।

अपने दौरे के दौरान एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने कोलोराडो स्थित पीटरसन स्पेस फोर्स बेस का दौरा किया। यहां उन्हें नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड यानी नोराड के कामकाज के बारे में जानकारी दी गई। इसमें एयरस्पेस मॉनिटरिंग, चेतावनी सिस्टम और कंट्रोल से जुड़े पहलुओं के बारे में समझाया गया। इसके बाद उन्होंने नेवादा के नेलिस एयर फोर्स बेस का दौरा किया। यहां यूएस एयर फोर्स वॉरफेयर सेंटर में उन्हें ऑपरेशनल तैयारियों पर ब्रीफिंग दी गई।

India US defence ties

उड़ाया था एफ-15 फाइटर जेट

इस दौरे का एक खास हिस्सा वह रहा, जब एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने एफ-15ईएक्स ईगल-2 फाइटर जेट में उड़ान भरी। इसे फैमिलियराइजेशन सॉर्टी कहा जाता है, जिसमें किसी वरिष्ठ अधिकारी को विमान की क्षमता समझने का मौका दिया जाता है।

इस उड़ान के दौरान उन्होंने इस एडवांस्ड फाइटर जेट के सिस्टम और ऑपरेशन को करीब से देखा। एफ-15ईएक्स एक मल्टीरोल फाइटर जेट है, जो अपनी 2.5 मैक रफ्तार और आधुनिक तकनीक के लिए जाना जाता है।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर फोकस

इन दिनों दोनों देशों का ध्यान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर है। यह इलाका समुद्री रास्तों, सुरक्षा संतुलन और रणनीतिक सहयोग के लिहाज से काफी अहम माना जाता है, इसलिए इस पर लगातार चर्चा हो रही है।

दोनों देश क्वाड, मालाबार और ‘कोप इंडिया’ जैसे संयुक्त अभ्यास भी करते हैं। इन सबका मकसद भारत और अमेरिका के बीच सहयोग को मजबूत करना है।

दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को सुरक्षित, खुला और संतुलित बनाए रखने पर काम कर रहे हैं। जनरल श्नाइडर की यह यात्रा भी इसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है, जो अमेरिका की “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” सोच को आगे बढ़ाती है।

रक्षा मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि ऐसे दौरे नई बात नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से चल रहे सैन्य सहयोग का हिस्सा होते हैं। इनके जरिए दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के अनुभवों को समझती हैं और सहयोग के नए तरीके तलाशती हैं। इसी दौरान जॉइंट ट्रेनिंग, ऑपरेशन प्लानिंग और नई टेक्नोलॉजी से जुड़े विषयों पर भी विस्तार से चर्चा होती है।

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बना रनवे, हाईवे पर उतरे लड़ाकू विमान, रात में भी सफल लैंडिंग

IAF ELF Sultanpur

IAF ELF Sultanpur: भारतीय वायुसेना ने बुधवार को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर 3.2 किमी लंबी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी यानी ईएलएफ को दिन और रात दोनों समय एक्टिव करके अपनी ऑपरेशनल तैयारी का प्रदर्शन किया। इस अभ्यास में अलग-अलग तरह के फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर शामिल हुए।

इस अभ्यास की खास बात यह रही कि इसे केवल दिन में ही नहीं, बल्कि रात में भी इमरजेंसी लैंडिंग को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। वायुसेना ने कम समय में इस स्ट्रिप को एक्टिव कर अपनी तैयारियों को दिखाया। इस अभ्यास के जरिए यह जांचा गया कि इमरजेंसी के समय कितनी जल्दी एक्सप्रेसवे को रनवे में बदला जा सकता है।

IAF ELF Sultanpur: कई तरह के एयरक्राफ्ट हुए शामिल

इस ड्रिल में जगुआर, मिराज-2000 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे फाइटर जेट्स शामिल रहे। इनके अलावा सी-295 और एएन-32 जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी इस अभ्यास का हिस्सा बने। हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के लिए एमआई-17 वी5 का इस्तेमाल किया गया, जबकि गरुड़ कमांडो टीम ने भी अपनी भूमिका निभाई।

इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने अलग-अलग तरह की उड़ान और लैंडिंग ड्रिल की, जिससे वायुसेना की मल्टी-प्लेटफॉर्म क्षमता सामने आई।

इमरजेंसी में काम आने वाली स्ट्रिप

ईएलएफ एक ऐसी विशेष स्ट्रिप होती है, जिसे सामान्य दिनों में एक्सप्रेसवे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे रनवे में बदला जा सकता है। इस अभ्यास के दौरान वायुसेना, यूपीईआईडीए और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर अपने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को परखा।

इसमें यह देखा गया कि कम समय में सभी तैयारियां कैसे पूरी की जाएं और एयरक्राफ्ट को सुरक्षित तरीके से उतारा और उड़ाया जा सके।

ऑपरेशनल तैयारियों का प्रदर्शन

इस अभ्यास के जरिए वायुसेना ने यह दिखाया कि अगर सामान्य रनवे उपलब्ध न हों, तब भी ऑपरेशन जारी रखे जा सकते हैं। इससे वायुसेना की ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी और रेजिलिएंस सामने आई। इसके साथ ही पायलट्स की फ्लाइंग स्किल्स और ग्राउंड क्रू की तैयारी भी दिखाई दी, जो कम समय में ऐसे एयरस्ट्रिप को एक्टिव कर सकते हैं।

ऐसे एक्सप्रेसवे एयरस्ट्रिप आपात स्थिति में बेहद उपयोगी माने जाते हैं। इनके जरिए न केवल सैन्य ऑपरेशन किए जा सकते हैं, बल्कि आपदा के समय राहत और बचाव कार्य भी तेजी से किए जा सकते हैं।

इस पूरे अभ्यास में वायुसेना के साथ यूपी एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर काम किया। तीनों के बीच तालमेल के जरिए इस स्ट्रिप को सफलतापूर्वक एक्टिव किया गया।

इस दौरान कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर मौजूद रहे। इनमें यूपी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर, सेंट्रल एयर कमांड के एयर मार्शल बी. मणिकांतन और यूपीईआईडीए के सीईओ दीपक कुमार शामिल रहे।

बर्लिन में भारत-जर्मनी के बीच स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को लेकर बड़ी बैठक, को-डेवलपमेंट और मिलिट्री-टू-मिलिट्री कोऑपरेशन पर फोकस

India Germany defence cooperation

India Germany defence cooperation: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इन दिनों जर्मनी के दौरे पर हैं। जहां उन्होंने बुधवार को राजधानी बर्लिन में अपने जर्मन समकक्ष बोरिस पिस्टोरियस के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्ट्रैटेजिक डिफेंस पार्टनरशिप को और मजबूत करना था। बैठक से पहले रक्षा मंत्री को जर्मन रक्षा मंत्रालय में गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया। भारत और जर्मनी के बीच स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप के 25 साल पूरे हो चुके हैं, जबकि 2026 में दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों के 75 साल भी पूरे हो रहे हैं।

दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की इस मुलाकात के दौरान भारत और जर्मनी ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप पर सहमति जताई। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग ट्रेनिंग में सहयोग को लेकर एक इम्प्लीमेंटिंग अरेंजमेंट भी साइन किया गया। इन समझौतों का मकसद नई और विशेष तकनीकों से लैस रक्षा उपकरणों के को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन को बढ़ावा देना है।

India Germany defence cooperation

इस दौरान दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने मिलिट्री-टू-मिलिट्री कोऑपरेशन को और मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। इसमें संयुक्त अभ्यास, ट्रेनिंग और सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने जैसे मुद्दे शामिल रहे। जर्मनी की तरफ से इस बात की सराहना की गई कि दोनों देशों के बीच सर्विस लेवल स्टाफ टॉक्स को नियमित किया जा रहा है।

राजनाथ सिंह ने यह भी बताया कि भारत इस साल सितंबर या अक्टूबर में होने वाली एयर एक्सरसाइज ‘एक्स-तरंग शक्ति’ में जर्मन एयर फोर्स की भागीदारी को लेकर उत्सुक है।

बैठक में हाल ही में बने भारत-यूरोपीय संघ सिक्योरिटी और डिफेंस पार्टनरशिप पर भी चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि यह फ्रेमवर्क दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करने में मदद करेगा। इसके जरिए क्षेत्रीय स्थिरता, संयुक्त क्षमताओं और आपसी तालमेल को बढ़ाने पर काम किया जाएगा।

India Germany defence cooperation

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आतंकवाद पर कहा कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसे बिना किसी शर्त के पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए।

बैठक से पहले राजनाथ सिंह ने जर्मनी के बुंडेसवेहर मेमोरियल पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। यह स्मारक उन सैनिकों की याद में बनाया गया है जिन्होंने ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवाई। इस मौके पर उन्होंने शहीद सैनिकों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

जर्मनी दौरे पर राजनाथ सिंह, भारतीय समुदाय से बोले- जुड़े रहिए अपनी जड़ों से

Rajnath Singh Germany visit 2026

Rajnath Singh Germany visit 2026: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जर्मनी दौरे के पहले दिन वहां रहने वाले भारतीय समुदाय से मुलाकात की। तीन दिन के इस दौरे की शुरुआत 21 अप्रैल को हुई। इस दौरान उन्होंने जर्मनी में बसे भारतीयों को दोनों देशों के रिश्तों का मजबूत आधार बताया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि जर्मनी में रहने वाला भारतीय समुदाय दोनों देशों के बीच सबसे मजबूत पुल की तरह काम करता है। करीब तीन लाख भारतीय वहां रहते हैं और बिजनेस, टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, एजुकेशन और आर्ट्स जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने इस भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह समुदाय भारत और जर्मनी को करीब लाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

Rajnath Singh Germany visit 2026: भारत की बढ़ती पहचान का जिक्र

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज दुनिया में भारत की पहचान पहले से ज्यादा मजबूत हुई है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब भारत की बात को गंभीरता से सुना जाता है। उन्होंने जर्मनी में रह रहे भारतीयों से अपील की कि वे दुनिया के सामने भारत का नजरिया रखने में योगदान दें और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने में मदद करें।

75 साल के रिश्तों का जिक्र

रक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि साल 2026 भारत और जर्मनी के बीच कूटनीतिक संबंधों के 75 साल पूरे होने का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते आपसी विश्वास, सम्मान और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हैं। इस मौके पर उन्होंने भारतीय समुदाय से कहा कि वे इन रिश्तों को और मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते रहें।

राजनाथ सिंह ने भारत की तेज आर्थिक प्रगति और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे विकास का भी जिक्र किया। उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप, स्पेस और डिजिटल इनोवेशन में हो रही प्रगति के बारे में बताया। साथ ही आत्मनिर्भर भारत के विजन को समझाते हुए कहा कि इसका उद्देश्य देश की अपनी क्षमता बढ़ाना और मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है।

रक्षा मंत्री ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों को यह भरोसा दिलाया कि सरकार उनके साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और सहयोग के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

नौसेना, वायुसेना प्रमुख के दौरे के बाद अब आर्मी चीफ पहुंचे US, क्या नया डिफेंस गेम प्लान बना रहे हैं भारत-अमेरिका?

India US defence chiefs visit

India US defence chiefs visit: भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को लेकर इन दिनों गर्मजोशी दिख रही है। इसकी वजह है तीनों भारतीय सेना प्रमुखों के अमेरिका दौरे, जो बेहद कम समय के अंतराल में हुए हैं। पहले नौसेना प्रमुख, फिर वायुसेना प्रमुख और अब थल सेना प्रमुख का दौरा, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत तेज हुई है।

नवंबर 2025 में भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी अमेरिका गए थे। इसके बाद इस साल अप्रैल की शुरुआत में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने अमेरिका का दौरा किया। अब अप्रैल के दूसरे हिस्से में थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी भी अमेरिका में हैं। इन लगातार दौरों को हाई-लेवल मिलिट्री-टू-मिलिट्री एक्सचेंज के तौर पर देखा जा रहा है।

India US defence chiefs visit: लगातार दौरों का क्या है मतलब

इन दौरों के दौरान अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों पर बातचीत हो रही है। नौसेना प्रमुख के दौरे में समुद्री सुरक्षा, सूचना साझा करने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा हुई। वायुसेना प्रमुख ने एयर पावर, जॉइंट एक्सरसाइज और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट जैसे मुद्दों पर बातचीत की। अब थल सेना प्रमुख का दौरा जमीन आधारित ऑपरेशंस और मल्टी-डोमेन कोऑर्डिनेशन पर फोकस है।

सुरक्षा मामलों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के दौरे दोनों देशों की सेनाओं के बीच समझ बढ़ाने के लिए होते हैं। इसमें ऑपरेशन के तरीके, ट्रेनिंग सिस्टम और नई तकनीकों को लेकर बातचीत होती है। (India US defence chiefs visit)

India US defence chiefs visit

हवाई में सेना प्रमुख को मिला गार्ड ऑफ ऑनर

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी इस हफ्ते अमेरिका के हवाई द्वीप स्थित फोर्ट शाफ्टर पहुंचे, जहां उन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी पैसिफिक यानी यूएसएआरपैक का दौरा किया। फोर्ट शाफ्टर में उन्हें औपचारिक सैन्य सम्मान गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

इस दौरान उन्होंने यूएसएआरपैक के कमांडिंग जनरल रोनाल्ड पी क्लार्क और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इन बैठकों में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। इसमें दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, संयुक्त ट्रेनिंग को बेहतर बनाना और जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में मिलकर काम करने पर जोर रहा। साथ ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते हालात के बीच शांति और स्थिरता बनाए रखने के तरीकों पर भी बातचीत हुई।

एक और अहम विषय टेक्नोलॉजी से जुड़ा रहा। दोनों पक्षों ने डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, को-प्रोडक्शन और नई तकनीकों पर साथ काम करने की संभावनाओं पर चर्चा की। इसका उद्देश्य यह है कि दोनों देश रक्षा क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर सकें। (India US defence chiefs visit)

ओआहू द्वीप का हवाई दौरा

दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने ओआहू द्वीप का हवाई सर्वे भी किया। इस दौरान उन्हें अमेरिकी सेना के ट्रेनिंग सिस्टम और उनकी ऑपरेशनल तैयारी को करीब से समझने का मौका मिला। खासतौर पर जंगल और समुद्र किनारे वाले इलाकों में होने वाले युद्ध अभ्यास और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन पर जानकारी दी गई।

यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच सैन्य स्तर पर कई बैठकों और बातचीत का दौर चला है। इससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में काम जारी है।

हवाई के बाद जनरल द्विवेदी का दौरा वॉशिंगटन डीसी में रहा। जहां भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने उन्हें इंडिया हाउस में होस्ट किया। इस दौरान आगे अमेरिकी रक्षा विभाग और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकों का कार्यक्रम तय किया गया है।

इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग, ट्रेनिंग और साझा ऑपरेशन के अनुभवों पर चर्चा की जा रही है। (India US defence chiefs visit)

India US defence chiefs visit

पिछले साल नवंबर में अमेरिका गए थे नेवी चीफ

इससे पहले 12 से 17 नवंबर 2025 में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने अमेरिका का दौरा किया था। उन्होंने यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड और यूएस पैसिफिक फ्लीट के अधिकारियों से मुलाकात की थी। इनमें यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो, यूएस पैसिफिक फ्लीट के कमांडर एडमिरल स्टीफन टी. कोहलर और यूएस मरीन फोर्सेज पैसिफिक के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेम्स एफ. ग्लिन शामिल रहे।

दौरे के दौरान उन्होंने जॉइंट बेस पर्ल हार्बर-हिकम और यूएसएस डेनियल इनोउये का भी दौरा किया। इसके अलावा अमेरिकी नौसेना के अलग-अलग ऑपरेशनल कमांड्स और संस्थानों को करीब से देखा और उनकी कार्यप्रणाली को समझा। उन्होंने अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय अधिकारियों से भी मुलाकात की, जो आइजनहावर स्कूल और नेशनल वॉर कॉलेज में ट्रेनिंग ले रहे हैं।

इस पूरे दौरे में भारत और अमेरिका की नौसेनाओं के बीच समुद्री सहयोग को मजबूत करने पर जोर रहा। समुद्री सुरक्षा, जानकारी साझा करने, समुद्री क्षेत्र में नजर रखने की क्षमता और आपसी तालमेल बढ़ाने जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े साझा मुद्दों, जैसे मिलन एक्सरसाइज और कंबाइंड मैरिटाइम फोर्सेज में सहयोग, पर भी बात हुई। इन बैठकों से दोनों नौसेनाओं के बीच तालमेल और ऑपरेशनल सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में काम हुआ। (India US defence chiefs visit)

India US defence chiefs visit

अप्रैल में अमेरिका पहुंचे वायुसेना प्रमुख

6 से 9 अप्रैल तक वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी अमेरिका दौरे पर थे। उन्होंने पेंटागन में बैठकों के अलावा अलग-अलग एयरबेस का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने फाइटर जेट ऑपरेशन और स्पेस आधारित सिस्टम के बारे में जानकारी ली।

अमेरिका दौरे के दौरान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह का जॉइंट बेस एनाकोस्टिया-बोलिंग पर फुल ऑनर्स के साथ स्वागत किया गया। इसके बाद उन्होंने पेंटागन में अमेरिकी वायुसेना के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की, जहां यूएस सेक्रेटरी ऑफ द एयर फोर्स ट्रॉय मिंक और यूएस एयर फोर्स चीफ जनरल केन विल्सबैक के साथ अहम बातचीत हुई।

दौरे के दौरान वे पीटरसन स्पेस फोर्स बेस (कोलोराडो) भी पहुंचे, जहां उन्हें नोराड (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) की एयरोस्पेस वॉर्निंग, कंट्रोल और मैरिटाइम वॉर्निंग सिस्टम्स के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इसके बाद उन्होंने नेलिस एयर फोर्स बेस (नेवादा) का दौरा किया, जहां यूएस एयर फोर्स वारफेयर सेंटर की ऑपरेशनल तैयारियों पर ब्रीफिंग ली।

इसी दौरान उन्होंने एफ-15ईएक्स ईगल-II फाइटर जेट में फेमिलराइजेशन फ्लाइट भी की, जिसे उन्होंने खुद उड़ाकर उसकी क्षमताओं को करीब से समझा। इस पूरे दौरे में दोनों देशों के बीच कम्बाइंड एक्सरसाइज, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और मॉडर्नाइजेशन जैसे अहम मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। (India US defence chiefs visit)

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर खास ध्यान

इन सभी दौरों में एक बात समान रही है, और वह है इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर फोकस। इस क्षेत्र में समुद्री रास्तों की सुरक्षा, सैन्य संतुलन और सहयोग जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही है।

भारत और अमेरिका दोनों ही इस क्षेत्र में अपने सहयोग को बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। इसी वजह से अलग-अलग सैन्य शाखाओं के बीच संपर्क बढ़ाया जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दौरे लंबे समय से चल रहे सैन्य सहयोग का हिस्सा होते हैं। इसमें दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के अनुभवों को समझती हैं और जरूरत के अनुसार सहयोग बढ़ाने के तरीके तलाशती हैं। इस प्रक्रिया में जॉइंट ट्रेनिंग, ऑपरेशन प्लानिंग और टेक्नोलॉजी से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत होती है। (India US defence chiefs visit)

तीनों सेनाओं के स्तर पर बढ़ा संपर्क

इन दौरों की खास बात यह है कि इसमें तीनों सेनाओं नौसेना, वायुसेना और थल सेना के प्रमुख शामिल रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि सहयोग केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी सैन्य क्षेत्रों में बातचीत हो रही है। इस तरह के संपर्क से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर काम किया जा रहा है, जिसमें अलग-अलग ऑपरेशन और ट्रेनिंग सिस्टम को समझना शामिल है। (India US defence chiefs visit)

NFU पर बड़ा फैसला, सरकार ने ठुकराई सेना की सैलरी पैरिटी मांग, सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई

NFU for Armed Forces

NFU for Armed Forces: भारतीय सेनाओं के मिड-लेवल अधिकारियों को सिविलियन अधिकारियों के बराबर वेतन और स्टेटस देने की मांग को सरकार की एक इंटर-मिनिस्टेरियल हाई-लेवल कमेटी ने खारिज कर दिया है। यह मामला लंबे समय से चर्चा में था और अब इस पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई होनी है। रक्षा मंत्रालय ने अदालत में एक अतिरिक्त एफिडेविट दाखिल कर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला दिया है।

NFU for Armed Forces: क्या है एनएफयू और क्यों उठी मांग

एनएफयू यानी नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन एक ऐसी व्यवस्था है, जो सिविलियन ब्यूरोक्रेसी और पुलिस अधिकारियों को मिलती है। इसमें एक तय समय तक सेवा देने के बाद, भले ही प्रमोशन न मिले, अधिकारी को अपने बैच के आधार पर उच्च वेतनमान मिल जाता है।

सेनाओं में यह सुविधा लागू नहीं है। सेना, नौसेना और वायुसेना के कई अधिकारी लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि उन्हें भी एनएफयू का लाभ दिया जाए, क्योंकि प्रमोशन के मौके सीमित होते हैं और कई अधिकारी एक ही रैंक पर लंबे समय तक काम करते हैं।

कमेटी ने क्यों किया इनकार

जनवरी 2026 में बनाई गई इस हाई-लेवल कमेटी ने इस मुद्दे की विस्तृत समीक्षा की। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि एनएफयू को लागू करना आसान नहीं है। इसमें कई तरह की मुश्किलें हैं, जिनमें कानूनी और प्रशासनिक समस्याएं शामिल हैं।

कमेटी के मुताबिक, अगर सशस्त्र बलों में एनएफयू लागू किया जाता है, तो इसका असर पेंशन सिस्टम पर भी पड़ेगा। वेतन बढ़ने से पुराने रिटायर्ड अधिकारियों की पेंशन को भी दोबारा तय करना होगा। इससे वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी सिस्टम में भी बदलाव करना पड़ेगा, जो बेहद मुश्किल होगा। (NFU for Armed Forces)

आर्थिक बोझ भी बड़ी वजह

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस फैसले का वित्तीय असर काफी ज्यादा होगा। अब तक ओआरओपी के तीन संशोधनों पर करीब 22,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। अगर एनएफयू लागू किया जाता है, तो सिर्फ 7वें वेतन आयोग की अवधि में ही 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त खर्च आ सकता है।

इसके अलावा पेंशन में बदलाव के कारण और भी आर्थिक बोझ बढ़ने की संभावना जताई गई है। कमेटी का मानना है कि इतने बड़े खर्च को देखते हुए इस फैसले को सावधानी से लेना जरूरी है।

सेवा शर्तों में अंतर का हवाला

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि सिविल सर्विस और सशस्त्र बलों की सेवा शर्तें अलग-अलग हैं। दोनों के काम करने का तरीका, जिम्मेदारियां और परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए दोनों के बीच पूरी तरह समानता स्थापित करना संभव नहीं है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सशस्त्र बलों को पहले से ही कई विशेष लाभ मिलते हैं। इनमें ओआरओपी, मिलिट्री सर्विस पे और अन्य भत्ते शामिल हैं, जो उनकी कठिन कार्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं। (NFU for Armed Forces)

सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित

इस पूरे मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। इससे पहले 2016 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल ने सशस्त्र बलों के पक्ष में फैसला दिया था और एनएफयू लागू करने की बात कही थी। सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद से मामला लंबित है।

दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय को इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा करने को कहा था। उसी के बाद यह नई कमेटी बनाई गई और अब उसकी रिपोर्ट अदालत में पेश की गई है।

अधिकारियों को भी दिया गया पक्ष रखने का मौका

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, कमेटी ने इस मुद्दे पर कई दौर की चर्चा की और उन अधिकारियों को भी अपनी बात रखने का मौका दिया, जिन्होंने एनएफयू की मांग को लेकर अदालत का रुख किया था। उनके तर्कों को सुनने के बाद ही कमेटी ने अपनी सिफारिश तैयार की। (NFU for Armed Forces)

8वें वेतन आयोग को भेजने का सुझाव

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया है कि इस पूरे मामले को 8वें सेंट्रल पे कमीशन के पास भेजा जाए। इससे पहले भी वेतन से जुड़े कई बड़े फैसले पे कमीशन के जरिए लिए जाते रहे हैं।

इस तरह फिलहाल सशस्त्र बलों के अधिकारियों को एनएफयू देने की मांग पर रोक लग गई है और अब इस पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट और भविष्य में पे कमीशन की सिफारिशों के आधार पर होगा। (NFU for Armed Forces)

वेटरंस ने उठाए सवाल

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही रिटायर्ड कर्नल मुकुल ने कहा कि एनएफयू न देने का फैसला सशस्त्र बलों के साथ गलत व्यवहार जैसा है। उनके मुताबिक सरकार ने जो अतिरिक्त एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया, उसमें साफ कहा गया कि ज्यादा आर्थिक बोझ के कारण एनएफयू नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह एफिडेविट जनवरी में तैयार था, लेकिन तीन महीने बाद जमा किया गया। उनके अनुसार ऐसा जानबूझकर किया गया हो सकता है, ताकि सुनवाई के समय या हालात को ध्यान में रखकर फायदा लिया जा सके। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर लड़ाई आगे भी जारी रहेगी। (NFU for Armed Forces)

वहीं रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल सुशील सिंह श्योराण ने कहा कि अब इस मामले पर सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है, जहां आगे क्या फैसला आता है, यह अहम रहेगा।

एनएफयू को लेकर विवाद इस समय बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार, वायुसेना और नौसेना इस व्यवस्था के पक्ष में हैं, लेकिन सेना के अंदर खासकर ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी इसके खिलाफ हैं। उनका तर्क है कि इससे सिस्टम पर असर पड़ सकता है।

कुछ पूर्व अधिकारियों का यह भी कहना है कि सेना में संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर अलग तरह की व्यवस्था होती है। कई बार पद और जिम्मेदारी के आधार पर अधिकारियों को अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं, जिन्हें ‘प्रिविलेज’ कहा जाता है। इनके इस्तेमाल को लेकर भी बहस होती रही है। उनका मानना है कि इसी वजह से कुछ वरिष्ठ अधिकारी एनएफयू को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। (NFU for Armed Forces)

शांतिदूत जापान का बड़ा फैसला: वॉरशिप्स से मिसाइल तक…अब बेचेगा हथियार, बदले डिफेंस एक्सपोर्ट नियम

Japan defence export policy
Japan PM Sanae Takaichi (File Photo)

Japan defence export policy: जापान ने अपने रक्षा निर्यात नियमों में कई दशकों का सबसे बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने हथियारों के विदेश में निर्यात पर लगी ज्यादातर पाबंदियों को हटा दिया है। इस फैसले के बाद अब जापान के लिए वॉरशिप, मिसाइल और अन्य डिफेंस इक्विपमेंट को दूसरे देशों को बेचने का रास्ता खुल गया है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध चल रहे हैं और हथियारों की मांग तेजी से बढ़ी है।

Japan defence export policy: क्या बदला है नए नियमों में

पहले जापान केवल कुछ सीमित कैटेगरी में ही डिफेंस एक्सपोर्ट कर सकता था। इनमें रेस्क्यू, ट्रांसपोर्ट, सर्विलांस और माइन-स्वीपिंग जैसे उपकरण शामिल थे। अब इन सीमाओं को हटा दिया गया है। नई व्यवस्था के तहत हर डील को अलग-अलग आधार पर जांचा जाएगा और उसी के हिसाब से फैसला लिया जाएगा।

हालांकि जापान ने कुछ बेसिक नियम बरकरार रखे हैं। जैसे किसी युद्ध में शामिल देशों को सीधे हथियार नहीं बेचे जाएंगे और थर्ड कंट्री ट्रांसफर पर भी नियंत्रण रहेगा। इसके बावजूद सरकार ने यह साफ किया है कि नेशनल सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए कुछ मामलों में छूट दी जा सकती है।

डिफेंस इंडस्ट्री को मजबूत करने की कोशिश

इस बदलाव का एक बड़ा उद्देश्य जापान की डिफेंस इंडस्ट्री को मजबूत करना है। लंबे समय से वहां की कंपनियां सिर्फ अपनी सेल्फ-डिफेंस फोर्स के लिए ही उपकरण बनाती रही हैं। ऑर्डर कम होने की वजह से प्रोडक्शन भी सीमित रहता था।

अब एक्सपोर्ट की अनुमति मिलने से प्रोडक्शन बढ़ेगा, लागत कम होगी और कंपनियों को नई टेक्नोलॉजी पर काम करने का मौका मिलेगा। मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां पहले से ही सबमरीन, फाइटर एयरक्राफ्ट और मिसाइल जैसे एडवांस सिस्टम बनाने की क्षमता रखती हैं।

एशिया में बढ़ते सहयोग पर जोर

जापान का यह कदम एशिया के देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। फिलीपींस, पोलैंड और अन्य देश अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए नए सप्लायर तलाश रहे हैं। ऐसे में जापान उनके लिए एक विकल्प बनकर उभर रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलीपींस को इस्तेमाल किए गए वॉरशिप देने की संभावना भी सामने आई है। फिलीपींस ने इस फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि इससे उन्हें बेहतर गुणवत्ता वाले डिफेंस उपकरण मिल सकेंगे।

वहीं, जापान के इस फैसले पर चीन ने चिंता जताई है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस कदम को लेकर सतर्क है और किसी भी तरह के आक्रामक रुख का विरोध करेगा। दोनों देशों के बीच पहले से ही ताइवान से जुड़े मुद्दों को लेकर तनाव बना हुआ है।

जापान के प्रधानमंत्री ने कहा है कि आज के समय में कोई भी देश अकेले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। इसलिए साझेदार देशों के बीच डिफेंस सहयोग जरूरी हो गया है।

अमेरिका और यूरोप का समर्थन

अमेरिका और यूरोप के देशों ने जापान के इस कदम का समर्थन किया है। अमेरिका के राजदूत ने इसे सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने वाला कदम बताया है। जर्मनी ने भी कहा है कि इससे रक्षा क्षेत्र में सहयोग के नए मौके खुलेंगे।

यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों की वजह से अमेरिका की हथियार उत्पादन क्षमता पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में उसके सहयोगी देश नए विकल्प तलाश रहे हैं, जहां जापान की एंट्री अहम मानी जा रही है।

जापान की सैन्य तैयारी भी तेज

रक्षा निर्यात के साथ-साथ जापान अपनी सैन्य क्षमता भी लगातार बढ़ा रहा है। सरकार ने हाल के वर्षों में डिफेंस बजट को बढ़ाकर जीडीपी के करीब 2 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है।

जापान मिसाइल, स्टेल्थ फाइटर जेट और ड्रोन जैसे सिस्टम्स पर निवेश कर रहा है। इसके अलावा वह ब्रिटेन और इटली के साथ मिलकर अगली पीढ़ी का फाइटर जेट भी विकसित कर रहा है, जिसे 2030 के दशक में तैनात करने की योजना है।

वहीं, जापान का यह कदम उसकी पारंपरिक शांति नीति से बिल्कुल है। अपनी मंद पड़ी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए अब वह वैश्विक स्तर पर डिफेंस सप्लायर के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है।

सुल्तानपुर में बुधवार को एक्सप्रेसवे बनेगा रनवे, लैंडिंग का रिहर्सल करेंगे सुखोई, जगुआर और मिराज

Sultanpur ELF Drill
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Sultanpur ELF Drill: उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में 22 अप्रैल को भारतीय वायुसेना का एक अहम अभ्यास होने जा रहा है। इस दौरान पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर बने इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड यानी ईएलएफ को एक्टिव किया जाएगा। इस खास स्ट्रिप पर फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर ऑपरेशन करेंगे।

Sultanpur ELF Drill: क्या है इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड

ईएलएफ एक खास तरह का रनवे होता है, जिसे एक्सप्रेसवे पर बनाया जाता है। यह आम दिनों में सड़क की तरह इस्तेमाल होता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे एयरक्राफ्ट लैंडिंग के लिए तैयार किया जा सकता है।

सुल्तानपुर में यह स्ट्रिप करीब 3.2 किलोमीटर लंबी है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि किसी आपात स्थिति में वायुसेना के विमान यहां उतर सकें और उड़ान भर सकें।

फाइटर जेट्स करेंगे टच एंड गो एक्सरसाइज

इस अभ्यास में वायुसेना के कई प्रमुख फाइटर जेट हिस्सा लेंगे। इनमें सुखोई सु-30 एमकेआई, जगुआर और मिराज 2000 शामिल हैं। ये जेट एक्सप्रेसवे पर टच एंड गो, लो एल्टीट्यूड मैन्यूवर और इमरजेंसी लैंडिंग जैसी ड्रिल करेंगे।

टच एंड गो का मतलब होता है कि विमान रनवे को छूकर तुरंत दोबारा उड़ान भरता है। इससे पायलट्स को मुश्किल हालात में तेजी से ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग मिलती है।

हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट विमान भी होंगे शामिल

फाइटर जेट्स के साथ-साथ हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी इस अभ्यास का हिस्सा होंगे। एमआई-17 हेलीकॉप्टर स्लिथरिंग ड्रिल करेगा। इसमें रस्सी के जरिए जवानों को तेजी से नीचे उतारा जाता है।

ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में एयरबस सी-295 और एंटोनोव एएन-32 शामिल होंगे। ये विमान फुल लैंडिंग, टेकऑफ और असॉल्ट लैंडिंग की प्रैक्टिस करेंगे।

इस पूरे अभ्यास में अलग-अलग तरह के एयरक्राफ्ट एक साथ काम करेंगे। इसे मल्टी प्लेटफॉर्म इंटीग्रेशन कहा जाता है। इसका मतलब है कि फाइटर, हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट विमान एक साथ तालमेल बनाकर ऑपरेशन करते हैं। इससे वायुसेना की ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी यानी अलग-अलग हालात में काम करने की क्षमता दिखाई जाती है।

देश में कितने इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड

देशभर में भारतीय वायुसेना और सड़क परिवहन मंत्रालय ने कुल 28 इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड (ELF) के लिए जगह तय की है। ये सभी अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बने हुए हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर कहीं भी एयरक्राफ्ट उतारे जा सकें।

इनकी सबसे ज्यादा संख्या असम में है, जहां 5 इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड साइट्स हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 4, आंध्र प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में 3-3 जगहों पर ऐसे रनवे बनाए गए हैं।

वहीं जम्मू-कश्मीर, बिहार, हरियाणा और तमिलनाडु में 2-2 इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड साइट्स मौजूद हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, पंजाब और कुछ अन्य राज्यों में 1 या उससे ज्यादा साइट्स हैं। कुल मिला कर 11 साइट्स पश्चिमी सेक्टर में, 9 पूर्वी सेक्टर में, 5 दक्षिणी हिस्से में और 3 मध्य भारत में स्थित हैं।

असम में पीएम मोदी ने किया था उद्घाटन

इससे पहले 14 फरवरी को चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा से तकरीबन 300 किमी दूर असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में नेशनल हाईवे-37 पर बनी 4.2 किलोमीटर लंबी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी का उद्घाटन पीएम मोदी ने किया था। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहली ऐसी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है, जो सीधे हाईवे पर तैयार की गई है। इसे नेशनल हाईवे-2 पर मोरान बाईपास के पास बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर यहां फाइटर जेट और ट्रांसपोर्ट विमान सुरक्षित रूप से उतर और उड़ान भर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से यहां उतरकर इस एयर स्ट्रिप का उद्घाटन किया था।

सुल्तानपुर में होगा तीसरी बार

सुल्तानपुर जिले में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर करवल खेड़ी, कुरेभार इलाके में करीब 3.2 किलोमीटर लंबा खास स्ट्रिप बनाया गया है। यह सामान्य दिनों में एक्सप्रेसवे का हिस्सा रहता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे रनवे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यही स्ट्रिप अब एक बार फिर एक्टिवेट होने जा रहा है। इससे पहले यहां दो बार ऐसे इवेंट 2021 और 2023 में हो चुके हैं, इसलिए यह सुल्तानपुर का तीसरा बड़ा इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड एक्टिवेशन माना जा रहा है।

पहली बार यह स्ट्रिप 16 नवंबर 2021 को चर्चा में आया था, जब पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ था। उस दिन प्रधानमंत्री खुद भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान में यहां उतरे थे। उसी दौरान एयर शो भी हुआ था, जिसमें सुखोई-30, मिराज 2000 और जगुआर जैसे फाइटर जेट्स ने टच-एंड-गो और लो अल्टीट्यूड उड़ान का प्रदर्शन किया था। एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान ने असॉल्ट लैंडिंग कर कमांडो और उपकरण उतारे थे।

इसके बाद 24 जून 2023 को यहां दूसरी बार इमरजेंसी एक्सरसाइज हुई। उस दौरान करीब 10 एयरक्राफ्ट ने इस स्ट्रिप का इस्तेमाल किया। मिराज 2000 और जगुआर जैसे फाइटर जेट्स ने टच-एंड-गो अभ्यास किया, जबकि एएन-32 ने पूरी लैंडिंग की।

भारत में इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी की शुरुआत 2017 में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर हुई थी, जहां पहली बार बड़े स्तर पर फाइटर जेट्स को हाईवे पर उतारा गया था। इसके बाद सितंबर 2021 में राजस्थान के बाड़मेर में पहला हाईवे-बेस्ड इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी तैयार हुआ। मार्च 2024 में आंध्र प्रदेश के अड्डंकी इलाके में भी ऐसा ही रनवे एक्टिवेट किया गया, जहां फाइटर और ट्रांसपोर्ट दोनों तरह के एयरक्राफ्ट ने हिस्सा लिया।

अप्रैल 2024 में ‘गगन शक्ति’ अभ्यास के दौरान कश्मीर घाटी में भी हाईवे स्ट्रिप का इस्तेमाल किया गया, जहां चिनूक, एमआई-17 और एएलएच जैसे हेलीकॉप्टर्स ने रात में ऑपरेशन किए।

अब बारूदी सुरंगों वाले इलाके में भी बेधड़क चलेंगे टैंक, नए माइंस क्लियरिंग सिस्टम के लिए 975 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत

Indian Army mine clearing system
MoD inks Rs 975 crore contracts for TRAWL Assembly for T-72/T-90 Tanks to enhance Indian Army’s minefield breaching capability

ndian Army mine clearing system: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के मेन बैटल टैंकों टी-72 और टी-90 के लिए ट्रॉल असेंबली की खरीद करने जा रही है। इसके लिए मंत्रालय ने आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत करीब 975 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं। ट्रॉल असेंबली सिस्टम टैंकों के सामने लगाया जाता है और युद्ध के दौरान माइंस वाले इलाकों को सुरक्षित बनाने में मदद करता है।

Indian Army mine clearing system: क्या है ट्रॉल असेंबली

ट्रॉल असेंबली एक खास तरह का माइन क्लियरिंग डिवाइस है। इसे टैंक के आगे लगाया जाता है ताकि रास्ते में बिछी एंटी-टैंक माइंस को हटाया जा सके।

इसमें दो मुख्य हिस्से होते हैं। पहला है ट्रॉल रोलर, जो भारी वजन के चलते जमीन पर दबाव डालकर माइंस को फटने पर मजबूर करता है। दूसरा है ट्रैक विड्थ माइन प्लाऊ, जो मिट्टी को हटाकर या धकेलकर माइंस को साइड में कर देता है। इन दोनों सिस्टम का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से एक साथ या अलग-अलग किया जा सकता है।

कैसे काम करता है यह सिस्टम

जब टैंक आगे बढ़ता है, तो ट्रॉल असेंबली उसके सामने रास्ता साफ करती चलती है। इससे टैंक यूनिट्स के लिए सुरक्षित रास्ता बन जाता है, जिसे व्हीकल सेफ लेन कहा जाता है।

यह सिस्टम खासतौर पर आधुनिक एंटी-टैंक माइंस के खिलाफ काम करता है, जिनमें मैग्नेटिक फ्यूज लगे होते हैं। ऐसे माइंस टैंक के पास आते ही एक्टिव हो जाते हैं, लेकिन ट्रॉल सिस्टम उन्हें पहले ही निष्क्रिय कर देता है।

इस सिस्टम को डीआरडीओ की आर एंड डी इंजीनियर्स लैब, पुणे ने डिजाइन और डेवलप किया है। इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है। रक्षा मंत्रालय ने इसे बाय इंडियन-आईडीडीएम कैटेगरी में खरीदा है, जिसका मतलब है कि इसका डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग भारत में ही हुआ है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड यानी बीईएमएल को लगभग 590 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। इसके अलावा इलेक्ट्रो न्यूमैटिक्स एंड हाइड्रोलिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा दिया गया है।

भारतीय सेना के टी-72 और टी-90 टैंक सेना की मुख्य ताकत माने जाते हैं। इन टैंकों पर ट्रॉल असेंबली लगाने से उनकी ऑपरेशन क्षमता और बढ़ जाएगी। अब ये टैंक माइंस से भरे इलाकों में भी बिना रुके आगे बढ़ सकेंगे। इससे आर्मर्ड यूनिट्स की मूवमेंट तेज होगी और जोखिम कम होगा।