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अब बारूदी सुरंगों वाले इलाके में भी बेधड़क चलेंगे टैंक, नए माइंस क्लियरिंग सिस्टम के लिए 975 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत

Indian Army mine clearing system
MoD inks Rs 975 crore contracts for TRAWL Assembly for T-72/T-90 Tanks to enhance Indian Army’s minefield breaching capability

ndian Army mine clearing system: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के मेन बैटल टैंकों टी-72 और टी-90 के लिए ट्रॉल असेंबली की खरीद करने जा रही है। इसके लिए मंत्रालय ने आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत करीब 975 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं। ट्रॉल असेंबली सिस्टम टैंकों के सामने लगाया जाता है और युद्ध के दौरान माइंस वाले इलाकों को सुरक्षित बनाने में मदद करता है।

Indian Army mine clearing system: क्या है ट्रॉल असेंबली

ट्रॉल असेंबली एक खास तरह का माइन क्लियरिंग डिवाइस है। इसे टैंक के आगे लगाया जाता है ताकि रास्ते में बिछी एंटी-टैंक माइंस को हटाया जा सके।

इसमें दो मुख्य हिस्से होते हैं। पहला है ट्रॉल रोलर, जो भारी वजन के चलते जमीन पर दबाव डालकर माइंस को फटने पर मजबूर करता है। दूसरा है ट्रैक विड्थ माइन प्लाऊ, जो मिट्टी को हटाकर या धकेलकर माइंस को साइड में कर देता है। इन दोनों सिस्टम का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से एक साथ या अलग-अलग किया जा सकता है।

कैसे काम करता है यह सिस्टम

जब टैंक आगे बढ़ता है, तो ट्रॉल असेंबली उसके सामने रास्ता साफ करती चलती है। इससे टैंक यूनिट्स के लिए सुरक्षित रास्ता बन जाता है, जिसे व्हीकल सेफ लेन कहा जाता है।

यह सिस्टम खासतौर पर आधुनिक एंटी-टैंक माइंस के खिलाफ काम करता है, जिनमें मैग्नेटिक फ्यूज लगे होते हैं। ऐसे माइंस टैंक के पास आते ही एक्टिव हो जाते हैं, लेकिन ट्रॉल सिस्टम उन्हें पहले ही निष्क्रिय कर देता है।

इस सिस्टम को डीआरडीओ की आर एंड डी इंजीनियर्स लैब, पुणे ने डिजाइन और डेवलप किया है। इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है। रक्षा मंत्रालय ने इसे बाय इंडियन-आईडीडीएम कैटेगरी में खरीदा है, जिसका मतलब है कि इसका डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग भारत में ही हुआ है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड यानी बीईएमएल को लगभग 590 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। इसके अलावा इलेक्ट्रो न्यूमैटिक्स एंड हाइड्रोलिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा दिया गया है।

भारतीय सेना के टी-72 और टी-90 टैंक सेना की मुख्य ताकत माने जाते हैं। इन टैंकों पर ट्रॉल असेंबली लगाने से उनकी ऑपरेशन क्षमता और बढ़ जाएगी। अब ये टैंक माइंस से भरे इलाकों में भी बिना रुके आगे बढ़ सकेंगे। इससे आर्मर्ड यूनिट्स की मूवमेंट तेज होगी और जोखिम कम होगा।

मलक्का स्ट्रेट पार कर जकार्ता पहुंचा INS Sunayna, 16 मित्र देशों के नौसैनिक हैं सवार

INS Sunayna Jakarta IOS SAGAR Mission

INS Sunayna Jakarta IOS SAGAR Mission: भारतीय नौसेना का जहाज आईएनएस सुनयना इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंच गया है। यह जहाज आईओएस सागर पहल के तहत तैनात है और अपने ऑपरेशनल मिशन के दौरान यह तीसरे पोर्ट कॉल पर यहां पहुंचा है। इस मिशन का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में मित्र देशों के साथ समुद्री सहयोग को मजबूत करना है।

INS Sunayna Jakarta IOS SAGAR Mission: मलक्का और सिंगापुर स्ट्रेट्स से होकर पहुंचा जहाज

आईएनएस सुनयना जकार्ता पहुंचने से पहले मलक्का और सिंगापुर स्ट्रेट्स जैसे संकरे समुद्री रास्तों से होकर गुजरा। ये रास्ते दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में गिने जाते हैं। इस दौरान जहाज ने सुरक्षित नेविगेशन और आपसी तालमेल यानी इंटरऑपरेबिलिटी का प्रदर्शन किया।

इस जहाज की एक खास बात यह भी है कि इसमें 16 मित्र देशों के 39 अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक शामिल हैं। मल्टीनेशनल क्रू के साथ यह मिशन भारत की साझेदारी आधारित समुद्री नीति को दिखाता है।

क्या है आईओएस सागर पहल

आईओएस सागर दरअसल भारत के महासागर विजन “महासागर” का हिस्सा है। इसका पूरा मतलब है म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन।

इस पहल के जरिए भारत हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ मिलकर सुरक्षा, सहयोग और विकास को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इस मिशन का हार्बर फेज मार्च 2026 में भारत में पूरा हो चुका है, जबकि अब इसका सी फेज अप्रैल से मई के बीच चल रहा है।

INS Sunayna Jakarta IOS SAGAR Mission

इंडोनेशियाई नौसेना के साथ होंगे संयुक्त कार्यक्रम

जकार्ता में इस पोर्ट कॉल के दौरान आईएनएस सुनयना की टीम इंडोनेशिया की नौसेना यानी टीएनआई एएल के साथ कई गतिविधियों में हिस्सा लेगी। इसमें प्रोफेशनल बातचीत, सामाजिक कार्यक्रम और खेलकूद से जुड़े आयोजन शामिल हैं।

जहाज के कमांडिंग ऑफिसर ने कोडाएराल थ्री यानी इंडोनेशियाई नौसेना के क्षेत्रीय कमांड के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इसके अलावा दोनों देशों के नौसैनिकों के बीच योग सत्र, खेल मुकाबले और जहाज का दौरा जैसे कार्यक्रम भी तय किए गए हैं।

इस दौरान एक डेक रिसेप्शन भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों के लोग शामिल होंगे।

पासेक्स अभ्यास भी होगा आयोजित

आईएनएस सुनयना के जकार्ता से रवाना होने के समय भारतीय और इंडोनेशियाई नौसेना के बीच पासेक्स यानी पैसेज एक्सरसाइज भी की जाएगी। यह एक तरह का संयुक्त समुद्री अभ्यास होता है, जिसमें दोनों देश अपने तालमेल और ऑपरेशन क्षमता को बेहतर बनाते हैं। इस तरह के अभ्यास से समुद्र में एक-दूसरे के साथ काम करने की समझ मजबूत होती है।

यह मिशन भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। इसके जरिए भारत यह संदेश दे रहा है कि क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और खुले समुद्री रास्ते सभी देशों के लिए जरूरी हैं।

आईएनएस सुनयना की यह यात्रा अलग-अलग देशों के साथ भरोसा और सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

पहलगाम हमले के बाद कैसे कश्मीर में स्नो लेपर्ड्स और ‘सांप खाने वाले’ बने आतंकियों का काल, जंगलों में ढूंढ-ढूंढ कर बना रहे शिकार!

A year after Pahalgam attack
AI-Geenerated Image

A year after Pahalgam attack: पहलगाम आतंकी हमले को एक साल पूरा होने के साथ जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सुरक्षा एजेंसियों के भीतर इसे “हार्ड रीसेट” कहा जा रहा है। सुरक्षा बल अब सिर्फ जवाब देने के बजाय पहले से कार्रवाई करने और दुश्मन को ढूंढकर खत्म करने की रणनीति अपना रहे हैं।

इस बदलाव के तहत सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने अपने ऑपरेशन का तरीका बदला है। खासतौर पर जंगलों और पहाड़ी इलाकों में कार्रवाई पहले से ज्यादा तेज और लगातार की जा रही है।

A year after Pahalgam attack: जंगलों में तेज हुए सर्च ऑपरेशन

पहले ज्यादातर ऑपरेशन शहरों या आबादी वाले इलाकों में होते थे। वहां किसी घर या बिल्डिंग को घेरकर आतंकियों को खत्म करना अपेक्षाकृत आसान माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, आतंकी अब घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में छिपने लगे हैं। ऐसे इलाकों में ऑपरेशन करना ज्यादा मुश्किल होता है, क्योंकि वहां रास्ते कम होते हैं, मौसम खराब रहता है और हर मूवमेंट पर नजर रखना आसान नहीं होता।

इसी वजह से सेना ने इन इलाकों में लगातार कॉम्बिंग ऑपरेशन बढ़ा दिए हैं। जवान कई-कई दिनों तक जंगलों में रहकर सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं, ताकि आतंकियों को छिपने का मौका न मिले। (A year after Pahalgam attack)

पुलिस ने बनाई नई एलीट यूनिट्स

सूत्रों के मुताबिक पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी अपने स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव किया है। पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप यानी एसओजी के तहत दो नई एलीट यूनिट्स बनाई गई हैं, जिनके नाम “स्नो लेपर्ड्स” और “मार्खोर” रखे गए हैं। ये दोनों यूनिटें जम्मू क्षेत्र (पुंछ, राजौरी, उधमपुर, किश्तवाड़, कठुआ आदि) में बढ़ती आतंकी गतिविधियों के जवाब में बनाई गई हैं। इनकी वजह से ऊपरी इलाकों में आतंक-संबंधित घटनाओं में काफी कमी आई है।

स्नो लेपर्ड्स यूनिट को ऊंचाई वाले और बर्फीले इलाकों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। वहीं मार्खोर यूनिट को घने जंगलों में लड़ाई के लिए ट्रेनिंग दी गई है।

इन दोनों यूनिट्स को खास ट्रेनिंग दी गई है, जिसमें हाई एल्टीट्यूड वारफेयर, जंगल में मूवमेंट, सटीक निशाना और तेजी से प्रतिक्रिया जैसे कौशल शामिल हैं। ये यूनिट्स हमेशा तैयार स्थिति में रहती हैं और जरूरत पड़ते ही ऑपरेशन के लिए भेजी जाती हैं।

मार्खोर यूनिट को खासतौर पर जंगलों (फॉरेस्ट बेल्ट्स) और पहाड़ी इलाकों में आतंकवादियों का पीछा करने, घुसपैठ रोकने और काउंटर-टेरर ऑपरेशंस के लिए बनाया गया है। आतंकवादी अब जंगलों और पहाड़ों में छिपने की कोशिश करते हैं, इसलिए मार्खोर यूनिट को विशेष रूप से इन इलाकों में दबदबा बनाने के लिए ट्रेन किया गया है।

मार्खोर नाम एक ताकतवर, सर्पिले सींग वाली जंगली बकरी के नाम रखा गया है। यह हिमालय, कराकोरम और मध्य एशिया के पहाड़ी इलाकों (जैसे पाकिस्तान, भारत, अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान आदि) में पाई जाती है। यह कठिन पहाड़ी और जंगली इलाकों में बहुत चुस्ती-फुर्ती से घूमती है। यूनिट के जवान भी उसी तरह जंगलों और पहाड़ों में कुशलता से ऑपरेशन करते हैं।

मार्खोर शब्द फारसी भाषा से आया है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: “मार” का अर्थ सांप और “खोर” का मतलब है खाने वाला या मारने वाला। इसलिए इसका शाब्दिक अर्थ है “सांप खाने वाला” या “सांप मारने वाला”। (A year after Pahalgam attack)

सेना ने भी बदला अपना तैनाती का पैटर्न

भारतीय सेना ने भी अपने ऑपरेशन के तरीके में बदलाव किया है। खासतौर पर पहाड़ी इलाकों में एलीट पैराट्रूपर यूनिट्स को तैनात किया गया है। ये यूनिट्स कठिन इलाकों में तेजी से मूव करने और सटीक ऑपरेशन करने के लिए जानी जाती हैं।

इन्हीं एलीट यूनिट्स में से एक ने पिछले साल जुलाई में ऑपरेशन महादेव के तहत पहलगाम हमले के जिम्मेदार आतंकियों को ढूंढकर खत्म किया था। यह ऑपरेशन श्रीनगर के पास दाचीगाम जंगल क्षेत्र में हुआ था, जहां लंबे समय तक पीछा करने के बाद आतंकियों को घेरा गया। (A year after Pahalgam attack)

पीर पंजाल के दोनों तरफ बड़े ऑपरेशन

दिसंबर में सेना ने पीर पंजाल पहाड़ियों के दोनों तरफ बड़ा ऑपरेशन चलाया। यह इलाका कश्मीर घाटी को पुंछ-राजौरी और किश्तवाड़-डोडा से जोड़ता है। इस ऑपरेशन का मकसद उन आतंकी समूहों को खत्म करना था, जो इन इलाकों को अपने ठिकाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे। लंबे समय तक चले अभियान में जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े सैफुल्लाह ग्रुप को खत्म किया गया।

इसके साथ ही कई ठिकानों को नष्ट किया गया, जिससे आतंकियों को अपनी जगह बदलनी पड़ी। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इससे उनके नेटवर्क को बड़ा नुकसान हुआ। (A year after Pahalgam attack)

रणनीति में आया बड़ा बदलाव

सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार सबसे बड़ा बदलाव रणनीति में आया है। पहले सुरक्षा बल इंतजार करते थे कि आतंकी हमला करें और फिर जवाब दिया जाए।

अब हालात पलट गए हैं। अब सुरक्षा बल खुद आगे बढ़कर आतंकियों की तलाश कर रहे हैं। उन्हें पहले ही पकड़ने या खत्म करने की कोशिश की जा रही है। इस बदलाव के बाद आतंकियों पर लगातार दबाव बना हुआ है। उन्हें एक जगह टिककर रहने या योजना बनाने का समय नहीं मिल रहा। (A year after Pahalgam attack)

बेहतर हुआ एजेंसियों के बीच तालमेल

जम्मू-कश्मीर में अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जैसे सेना, पुलिस, सीआरपीएफ और खुफिया एजेंसियां। पहले इनके बीच तालमेल बिठाना एक चुनौती मानी जाती थी। अब इस पर खास ध्यान दिया गया है। जॉइंट कंट्रोल सेंटर के जरिए सभी एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं। हर हफ्ते बैठक होती है, जिसमें ऑपरेशन और इंटेलिजेंस की जानकारी साझा की जाती है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर एजेंसी एक ही दिशा में काम करे और कोई भी जानकारी छूटे नहीं।

आतंकियों के ठिकाने बदले, रणनीति भी बदली

पिछले कुछ वर्षों में आतंकियों के काम करने का तरीका भी बदला है। पहले वे शहरों और कस्बों में ज्यादा सक्रिय रहते थे। अब उन्होंने पहाड़ों और जंगलों का रुख किया है। खासतौर पर पीर पंजाल के आसपास के इलाके, जहां अलग-अलग जिलों की सीमा मिलती है, उनके लिए सुरक्षित ठिकाने बन गए थे। इन इलाकों में कंट्रोल रख पाना थोड़ा मुश्किल होता है, जिसका फायदा उठाकर आतंकी छिपते रहे है। अब सुरक्षा एजेंसियों ने इन इलाकों पर खास ध्यान देना शुरू किया है।

एनआईए ने की 1,113 लोगों से पूछताछ

पहलगाम हमले की जांच अभी भी जारी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए इस मामले की जांच कर रही है। एनआईए के मुताबिक, पहलगाम हमले की साजिश साजिद जट्ट नाम के आतंकी और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) तथा उसके सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने मिलकर बनाई थी। हमले से जुड़ी हर गतिविधि, जैसे आतंकियों की आवाजाही, हथियारों की ड्रोन के जरिए सप्लाई और पर्यटकों को निशाना बनाना, इन सबको पाकिस्तान में बैठे साजिद जट्ट कंट्रोल कर रहा था।

जांच के दौरान एनआईए ने बड़े स्तर पर पूछताछ की। कुल 1,113 लोगों से जानकारी जुटाई गई। इनमें 543 ढोक (ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले लोग), 117 घोड़े चलाने वाले पोनीवाले, 67 पशुपालक, 52 स्थानीय खाने-पीने के दुकानदार, 19 दुकानदार, 42 फोटोग्राफर, 36 टिकट काउंटर और जिपलाइन पर काम करने वाले लोग, 31 शॉल बेचने वाले, 25 टैक्सी ड्राइवर और 23 अन्य संदिग्ध शामिल थे।

जांच के दौरान कई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और सबूत मिले हैं, जिनमें एक गोप्रो कैमरा भी शामिल है। इससे आतंकियों की मूवमेंट और हमले से पहले की तैयारी को समझने में मदद मिली है। इसके अलावा कुछ डिवाइस चीन में बने पाए गए, जिनकी सप्लाई चेन की जानकारी के लिए वहां की अदालत से मदद मांगी गई है। (A year after Pahalgam attack)

भारतीय सेना की बढ़ेगी ताकत! रेगिस्तान से लद्दाख तक दम दिखाने वाली के9 वज्र की नई डील पर दक्षिण कोरिया से बातचीत

India South Korea K9 Vajra Deal
Prime Minister Narendra Modi held a bilateral meeting with President Lee Jae Myung of the Republic of Korea at Hyderabad House in New Delhi

India South Korea K9 Vajra Deal: दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की भारत यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग को लेकर बड़ी बातचीत हुई है। विदेश मंत्रालय ने बताया कि भारत को अब तक दो फेज में के9 वज्र की सप्लाई हो चुकी है, जबकि तीसरे फेज पर बातचीत जारी है। इस नए चरण में सिर्फ सिस्टम खरीदने के बजाय ज्यादा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर जोर दिया जा रहा है, ताकि इन प्लेटफॉर्म्स के निर्माण और तकनीक से जुड़ा काम भारत में ही आगे बढ़ाया जा सके।

India South Korea K9 Vajra Deal: के9 वज्र और एयर डिफेंस पर बड़ा बयान

विदेश मंत्रालय के सचिव पी. कुमारन ने इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को एक अहम जानकारी साझा की। बताया गया कि दक्षिण कोरिया भारत को पहले ही के9 वज्र और एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम्स के दो फेज में सप्लाई कर चुका है।

अब तीसरे फेज को लेकर बातचीत चल रही है, जिसमें पहले से ज्यादा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर ध्यान दिया जा रहा है। इसका मतलब है कि सिर्फ सिस्टम खरीदने के बजाय अब उनके डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक को भारत में विकसित करने पर जोर रहेगा।

इसके साथ ही और ज्यादा गन सिस्टम्स और एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम्स को लेकर भी चर्चा हो रही है। वहीं दोनों देश एयर डिफेंस को मजबूत करने के लिए नए विकल्पों पर काम कर रहे हैं। (India South Korea K9 Vajra Deal)

के9 वज्र क्या है और क्यों अहम है

के9 वज्र दरअसल दक्षिण कोरिया के के9 थंडर का भारतीय वर्जन है, जिसे भारत में के9 वज्र-टी नाम से जाना जाता है। यह एक 155एमएम/52-कैलिबर ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर है, जिसे लार्सन एंड टुब्रो कंपनी गुजरात के हजीरा प्लांट में बनाती है। जिसमें दक्षिण कोरिया की कंपनी हनव्हा एयरोस्पेस की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होती है।

यह तोप करीब 50 किलोमीटर तक मार कर सकती है। इसकी खास बात यह है कि यह बहुत तेजी से फायर कर सकती है। शुरुआत में कुछ ही सेकंड में लगातार तीन गोल दाग सकती है और बाद में हर मिनट कई राउंड फायर कर सकती है। इसमें हाई मोबिलिटी और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम लगा होता है, जिससे निशाना ज्यादा सटीक लगता है। यह भारी होने के बावजूद शूट एंड स्काउट खूबी की वजह से तेजी से अपनी जगह बदल सकती है। के9 वज्र को अलग-अलग तरह के इलाकों, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में भी काम करने के लिए बनाया गया है।

शुरुआत में भारतीय सेना ने इस तोप को राजस्थान और पंजाब के रेगिस्तानी और खुले मैदानी इलाकों में इस्तेमाल के लिए शामिल किया था। लेकिन बाद में लद्दाख में चीन के साथ तनाव बढ़ने के बाद इसे बेहद ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में भी तैनात किया गया। माइनस 20 डिग्री तक की बर्फीली परिस्थितियों में भी इसने बिना किसी दिक्कत के काम किया और वहां अपनी क्षमता साबित की।

के9 वज्र-टी को अपग्रेड करने की योजना

इसके अलावा भारतीय सेना अपनी के9 वज्र-टी तोपों को और आधुनिक बनाने की योजना बना रही है। इसके तहत इनमें ऐसी नई तकनीक लगाई जाएगी, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से काम करेगी।

इस अपग्रेड में रिमोट कंट्रोल वेपन सिस्टम (आरसीडब्ल्यूएस) शामिल होगा, जो अपने आप ड्रोन को पहचान सकता है, उनका पीछा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें निशाना बना सकता है।

इसके साथ ही इनमें जैमर और खास सेंसर भी जोड़े जाएंगे, जिससे ये दुश्मन के ड्रोन और अन्य हवाई खतरों से बेहतर तरीके से निपट सकें। ऐसी सुविधाएं के9 के नए वर्जन, जैसे के9ए2 और के9ए3 में पहले से मौजूद हैं। (India South Korea K9 Vajra Deal)

कब साइन हुआ पहला कॉन्ट्रैक्ट

के9 वज्र का पहला कॉन्ट्रैक्ट 2017 में हुआ था। उस समय भारतीय सेना के लिए 4,875 करोड़ (646 मिलियन डॉलर) की लागत के साथ 100 के9 वज्र तोपों का ऑर्डर दिया गया था। इस डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल थी, जिसके बाद भारत में ही इसका निर्माण शुरू हुआ। उस समय इसमें आधे से ज्यादा हिस्से भारत में ही बनने लगे थे। इन तोपों की डिलीवरी तय समय से पहले पूरी कर ली गई और 2020-21 से सेना को मिलनी शुरू हो गई।

इसके बाद दूसरा फेज दिसंबर 2024 में शुरू हुआ। इसमें फिर से बड़ी संख्या में के9 वज्र सिस्टम के लिए लार्सन एंड टुब्रो को ऑर्डर दिया गया। इस डील की लागत लगभग 7,600 करोड़ (895-900 मिलियन डॉलर) थी। इस बार लोकल मैन्युफैक्चरिंग को और बढ़ाने पर जोर दिया गया, ताकि ज्यादा से ज्यादा काम भारत में ही हो सके। इस फेज में भी दक्षिण कोरिया की कंपनी हनव्हा एयरोस्पेस और भारतीय कंपनी लार्सन एंड टुब्रो के बीच समझौता हुआ, जिसमें अतिरिक्त पार्ट्स और सिस्टम्स की सप्लाई शामिल रही।

समुद्री और इंडस्ट्री सेक्टर में बढ़ा सहयोग

दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के इस दौरे के दौरान समुद्री क्षेत्र में भी बड़ा समझौता हुआ। भारत और दक्षिण कोरिया ने शिपबिल्डिंग, शिपिंग और मैरिटाइम लॉजिस्टिक्स के लिए एक कॉम्प्रिहेंसिव फ्रेमवर्क तैयार किया है।

इसका मकसद समुद्री व्यापार को मजबूत करना और सप्लाई चेन को बेहतर बनाना है। इसके साथ ही पोर्ट्स के विकास को लेकर भी एक एमओयू साइन किया गया है, जिससे बंदरगाहों के इंफ्रास्ट्रक्चर और मैनेजमेंट में सहयोग बढ़ेगा।

इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन के लिए एक नई कमेटी बनाने का फैसला भी हुआ है। इससे दोनों देशों की कंपनियों के बीच तालमेल बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। स्टील सप्लाई चेन से जुड़े टेक्नोलॉजी और ट्रेड पर भी समझौता हुआ है। (India South Korea K9 Vajra Deal)

डिजिटल और फाइनेंशियल सेक्टर में नई पहल

डिजिटल सेक्टर में ‘इंडिया-कोरिया डिजिटल ब्रिज’ की शुरुआत करने का फैसला लिया गया है। इसका उद्देश्य टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना है।

फाइनेंशियल कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भी कदम उठाए गए हैं। भारत की एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड और कोरिया की फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशंस संस्था के बीच समझौता हुआ है, जिससे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा मिलेगा।

इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर में रेगुलेटरी संस्थाओं के बीच भी सहयोग पर सहमति बनी है। (India South Korea K9 Vajra Deal)

क्लाइमेट, एनर्जी और साइंस पर जोर

दोनों देशों ने क्लाइमेट और एनवायरमेंट से जुड़े मुद्दों पर भी समझौते किए हैं। पेरिस एग्रीमेंट के तहत सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है।

एनर्जी रिसोर्स सिक्योरिटी पर भी जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया गया है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया है।

साइंस एंड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने का फैसला हुआ है, जिसमें रिसर्च और नई टेक्नोलॉजी के विकास पर ध्यान दिया जाएगा। (India South Korea K9 Vajra Deal)

इकोनॉमिक सिक्योरिटी डायलॉग शुरू करने का एलान

इस दौरान दोनों देशों ने इकोनॉमिक सिक्योरिटी डायलॉग शुरू करने की घोषणा की। इसके जरिए वैश्विक सप्लाई चेन और आर्थिक मुद्दों पर बातचीत होगी।

विदेश मंत्रालयों के बीच ग्लोबल मुद्दों पर नई बातचीत शुरू करने का भी फैसला लिया गया है, जिसमें क्लाइमेट चेंज, आर्कटिक और मैरिटाइम सहयोग शामिल हैं।

दक्षिण कोरिया ने इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव में शामिल होने का फैसला किया है। साथ ही कोरिया इंटरनेशनल सोलर एलायंस में जुड़ेगा, जबकि भारत ग्लोबल ग्रीन ग्रोथ इंस्टीट्यूट का हिस्सा बनेगा।

दोनों देशों ने 2028-29 को ‘इंडिया-कोरिया फ्रेंडशिप ईयर’ के रूप में मनाने की घोषणा भी की है, जिससे लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा दिया जाएगा। (India South Korea K9 Vajra Deal)

पहलगाम हमले के 93 दिन बाद कैसे सुरक्षा बलों ने ढेर किए तीनों आतंकी, जानें ऑपरेशन महादेव की इनसाइड स्टोरी

Pahalgam Attack Anniversary- Operation Mahadev
AI-Generated Image

Pahalgam Attack Anniversary: 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम के बैसरन इलाके में हुए आतंकी हमले को हुए एक साल हो चुका है। इस भीषण आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में पर्यटकों को निशाना बनाया गया और कई निर्दोष लोगों की जान चली गई। घटना के तुरंत बाद सुरक्षा बलों के लिए यह सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि जिम्मेदार आतंकियों को खोजकर उन्हें सजा देना एक बड़ा ऑपरेशन बन गया।

इसी के बाद शुरू हुआ “ऑपरेशन महादेव”, जो अगले कई हफ्तों तक लगातार चलता रहा और अंत में उसी इलाके में खत्म हुआ, जहां आतंकियों ने छिपने की कोशिश की थी।

Pahalgam Attack Anniversary: हमले के तुरंत बाद शुरू हुई कार्रवाई

सूत्रों ने बताया कि हमले के कुछ ही घंटों के अंदर भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां मौके पर पहुंच गईं। सबसे पहले इलाके को घेर लिया गया और वहां मौजूद लोगों से जानकारी जुटाई गई। प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए गए और घटना की पूरी कड़ी को समझने की कोशिश की गई।

सूत्रों का कहना है कि इस दौरान साफ हो गया कि हमले में तीन आतंकवादी शामिल थे। अलग-अलग इनपुट्स को जोड़कर उनकी पहचान की पुष्टि की गई। इसमें ह्यूमन इंटेलिजेंस ने बहुत मदद की। लोगों से मिली जानकारी, टेक्निकल इनपुट और जिंदा बचे हुए लोगों के बयानों के आधार पर रणनीति तैयार की गई।

ऊंचाई वाले इलाकों की तरफ बढ़ रहे थे आतंकी

सूत्रों ने बताया कि जांच के दौरान जिन तीन आतंकियों की पहचान हुई, वे लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े बताए गए। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उनके संभावित रास्तों और ठिकानों का अंदाजा लगाना शुरू किया। शुरुआत में यह माना गया कि हमले के बाद आतंकी इलाके से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। इसलिए सबसे पहले संभावित एस्केप रूट्स यानी बाहर निकलने के रास्तों को सील किया गया। घाटी से बाहर जाने वाले रास्तों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई।

सूत्रों के मुताबिक जांच के दौरान यह पता चला कि आतंकी दक्षिण कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाकों की तरफ बढ़ रहे हैं। वे हापतनार, बुगमार और त्राल जैसे इलाकों से होते हुए घने जंगलों की तरफ चले गए।

Pahalgam Attack Anniversary- Operation Mahadev

मुश्किल इलाके में ऑपरेशन की चुनौती

सूत्रों का कहनाा है कि आतंकी जिस इलाके में पहुंचे, वह घना जंगल और ऊंचाई वाला क्षेत्र था। यह इलाका दाचीगाम और महादेव रिज के आसपास का माना जाता है। यहां पेड़ों की घनी परत, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और कम दृश्यता के चलते ऑपरेशन करना आसान नहीं था।

इस तरह के इलाके में न सिर्फ आतंकियों को छिपने का मौका मिलता है, बल्कि सुरक्षा बलों के लिए भी मूवमेंट आसान नहीं होता। इसी वजह से ऑपरेशन को धीरे-धीरे और सावधानी से आगे बढ़ाया गया।

बढ़ाया गया ऑपरेशन का दायरा

सूत्रों ने आगे बताया कि मई के आखिर तक सुरक्षा एजेंसियों को आतंकियों की मूवमेंट का एक साफ पैटर्न समझ आने लगा। इसके बाद ऑपरेशन का दायरा बढ़ाया गया। ज्यादा संख्या में जवानों को तैनात किया गया और खास यूनिट्स को शामिल किया गया।

इस दौरान पैरा स्पेशल फोर्सेज को भी ऑपरेशन में शामिल किया गया। इन यूनिट्स को खास तौर पर ऐसे मुश्किल इलाकों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया जाता है।

ऑपरेशन के शुरुआती दिनों में जो इलाका 300 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा में फैला हुआ था, उसे धीरे-धीरे छोटा किया गया।

कई एजेंसियों ने मिलकर चलाया अभियान

ऑपरेशन महादेव केवल सेना का अभियान नहीं था। इसमें कई एजेंसियां एक साथ काम कर रही थीं। भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बीच लगातार कॉर्डिनेशन बना रहा।

हर एजेंसी अपने-अपने इनपुट साझा कर रही थी। जिससे ऑपरेशन को लगातार मदद मिल रही थी और आतंकियों की लोकेशन की स्पष्ट सामने आ रही थी।

सूत्रों ने बताया कि इस ऑपरेशन में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लगातार किया गया। ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट के जरिए जंगलों में नजर रखी गई। इसके अलावा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर जैसे उपकरणों का भी इस्तेमाल हुआ।

घने जंगलों में जहां इंसानी नजर सीमित हो जाती है, वहां इन उपकरणों की मदद से मूवमेंट को ट्रैक किया गया। इससे आतंकियों पर लगातार दबाव बना रहा।

Pahalgam Attack Anniversary- Operation Mahadev

धीरे-धीरे घिरते गए आतंकी

वहीं, जैसे-जैसे ऑपरेशन आगे बढ़ा, सुरक्षा बलों ने इलाके को छोटे हिस्सों में बांटना शुरू किया। हर हिस्से में सर्च ऑपरेशन चलाया गया और मूवमेंट को सीमित किया गया।

लगातार निगरानी और दबाव के कारण आतंकियों के पास विकल्प कम होते गए। वे एक छोटे इलाके में सिमटते चले गए। इस दौरान उनकी मूवमेंट पर लगातार नजर रखी जा रही थी।

सूत्रों ने आगे बताया कि करीब 93 दिनों तक चले इस ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने 250 किलोमीटर से ज्यादा इलाके में आतंकियों का पीछा किया।

वहीं, 10 जुलाई 2025 के आसपास ऑपरेशन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। नई जानकारी के आधार पर बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू की गई। लिडवास, हरवान और दाचीगाम इलाके में एक साथ ऑपरेशन चलाया गया।

इस दौरान सभी संभावित रास्तों को बंद कर दिया गया, ताकि आतंकी बाहर न निकल सकें। इलाके को पूरी तरह से घेर लिया गया और मूवमेंट पर रोक लगा दी गई।

25 वर्ग किलोमीटर में सिमटे आतंकी

जुलाई के आखिर तक ऑपरेशन का दायरा घटकर लगभग 25 वर्ग किलोमीटर रह गया। इसी इलाके में आतंकियों के होने की पुष्टि हुई।

सूत्रों का कहना है कि 28 जुलाई 2025 को पैरा स्पेशल फोर्सेज की एक टीम को अंतिम कार्रवाई के लिए भेजा गया। टीम ने बेहद कठिन रास्तों से होकर आगे बढ़ना शुरू किया। लगभग 3 किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करने में करीब 10 घंटे का समय लगा।

टीम ने पूरी तरह चुपचाप आगे बढ़ते हुए अपनी पोजीशन बनाई। इसके बाद जैसे ही आतंकियों की पहचान हुई, तुरंत कार्रवाई शुरू की गई।

Pahalgam Attack Anniversary- Operation Mahadev

तीनों आतंकियों का हुआ खात्मा

इस कार्रवाई में तीनों आतंकियों को मार गिराया गया। ऑपरेशन तेजी से और सटीक तरीके से पूरा किया गया। इसके साथ ही बैसरन हमले में शामिल सभी आतंकियों का अंत हो गया।

मौके से हथियार, गोला-बारूद और अन्य सामान भी बरामद किया गया, जिससे उनकी गतिविधियों के बारे में और जानकारी मिली।

ऑपरेशन की खास बात क्या रही

इस पूरे ऑपरेशन में कई चीजें खास रहीं। सबसे पहले, घटना के तुरंत बाद शुरू हुई कार्रवाई और लगातार जारी प्रयास। दूसरे, अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल, जिसने ऑपरेशन को दिशा दी।

तीसरा, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, जिससे घने जंगलों में भी निगरानी संभव हो सकी। और चौथा, लंबा समय लगने के बावजूद ऑपरेशन को लगातार जारी रखना।

“टाइम-स्पेस कंट्रोल” की रणनीति

इस ऑपरेशन में एक अहम रणनीति देखने को मिली, जिसे साधारण भाषा में “टाइम और स्पेस कंट्रोल” कहा जा सकता है। इसका मतलब है कि आतंकियों को न समय मिल सके और न ही जगह बदलने का मौका।

सुरक्षा बलों ने न सिर्फ इलाके को धीरे-धीरे छोटा किया, बल्कि आतंकियों की हर मूवमेंट पर नजर रखी। इससे वे लगातार दबाव में रहे और अपनी योजना के मुताबिक काम नहीं कर पाए।

यह तरीका पारंपरिक सर्च ऑपरेशन से अलग था, जिसमें सिर्फ इलाके को खंगाला जाता है। यहां पर लगातार ट्रैकिंग और मूवमेंट को सीमित करने पर ज्यादा ध्यान दिया गया।

लोगों के बयान भी बने अहम कड़ी

इस ऑपरेशन में सिर्फ तकनीक ही नहीं, बल्कि लोगों से मिली जानकारी भी अहम रही। हमले के बाद जो लोग बचे थे, उनके बयान से शुरुआती जानकारी मिली। इसी तरह स्थानीय स्तर पर मिली सूचनाओं ने भी ऑपरेशन को आगे बढ़ाने में मदद की। इससे यह साफ हुआ कि जमीनी स्तर की जानकारी अभी भी उतनी ही जरूरी है।

ऑपरेशन का लंबा सफर

हमले के दिन से लेकर अंतिम कार्रवाई तक, यह ऑपरेशन लगातार चलता रहा। इसमें कई बार दिशा बदली गई, नई जानकारी के आधार पर रणनीति बदली गई और इलाके को धीरे-धीरे सीमित किया गया। करीब तीन महीने तक चले इस अभियान में हर चरण पर अलग तरह की चुनौती सामने आई, जिसे देखते हुए ऑपरेशन को आगे बढ़ाया गया।

इस तरह ऑपरेशन महादेव एक लंबा और लगातार चलने वाला अभियान रहा, जिसमें अलग-अलग स्तर पर काम करते हुए आतंकियों तक पहुंच बनाई गई और उन्हें खत्म किया गया।

उज्बेकिस्तान में चल रही भारत-उज्बेकिस्तान मिलिट्री एक्सरसइज ‘दस्तलिक 2026’, ड्रोन से लेकर स्नाइपर तक हो रही ट्रेनिंग

Exercise Dustlik 2026
Exercise Dustlik 2026

Exercise Dustlik 2026: भारत और उज्बेकिस्तान के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘एक्सरसाइज दस्तलिक 2026’ इन दिनों उज्बेकिस्तान के नमांगन क्षेत्र में आयोजित की जा रही है। यह अभ्यास 12 अप्रैल से शुरू होकर 25 अप्रैल तक चलेगा। यह इस सीरीज का सातवां संस्करण है और दोनों देशों की सेनाएं इसमें मिलकर ट्रेनिंग कर रही हैं।

इस अभ्यास का मकसद दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना और एक साथ ऑपरेशन करने की क्षमता को मजबूत करना है। यह अभ्यास हर साल आयोजित किया जाता है और बारी-बारी से दोनों देशों में होता है। इस बार इसकी मेजबानी उज्बेकिस्तान कर रहा है।

Exercise Dustlik 2026: गुरुमसराय फील्ड ट्रेनिंग एरिया में ट्रेनिंग

कुल 14 दिनों के इस अभ्यास में दोनों सेनाओं के लगभग 60-60 सैनिकों हिस्सा ले रहे हैं। भारत की तरफ से भारतीय सेना की महार रेजिमेंट के 45 सैनिक और भारतीय वायुसेना के 15 जवान इस अभ्यास में शामिल हैं।

इस बार अभ्यास का आयोजन गुरुमसराय फील्ड ट्रेनिंग एरिया में किया जा रहा है, जो अर्ध-पहाड़ी इलाका है। यहां का भूभाग ऊबड़-खाबड़ है और ऑपरेशन के लिहाज से चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे इलाके में काम करने के लिए सैनिकों को खास तरह की ट्रेनिंग की जरूरत होती है।

इसी वजह से इस अभ्यास में ऐसे हालात तैयार किए गए हैं, जहां सैनिकों को असली ऑपरेशन जैसा अनुभव मिल सके। दोनों देशों के सैनिक एक साथ मिलकर प्लानिंग और अभ्यास कर रहे हैं। (Exercise Dustlik 2026)

अभ्यास के शुरुआती दिनों में सैनिकों ने इलाके को समझने पर ध्यान दिया। इसे एरिया फैमिलराइजेशन कहा जाता है। इसमें सैनिक उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, रास्तों और संभावित खतरे वाले इलाकों को समझते हैं।

इसके साथ ही दोनों देशों की सेनाओं ने एक-दूसरे के तरीके भी सीखे। इसमें टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसीजर्स यानी काम करने के तरीके का आदान-प्रदान किया गया। इससे संयुक्त ऑपरेशन के दौरान काम आसान होता है।

अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग

अभ्यास के दौरान जवानों को कई तरह की ट्रेनिंग दी जा रही हैं। इसमें हथियार चलाने से लेकर नजदीकी लड़ाई तक के कौशल शामिल हैं। सैनिकों ने एम्बिडेक्स्ट्रस पिस्टल फायरिंग का अभ्यास किया, जिसमें दोनों हाथों से फायर करना सिखाया जाता है।

इसके अलावा रिफ्लेक्स शूटिंग पर भी काम किया गया, जिसमें तेजी से प्रतिक्रिया देना और तुरंत निशाना लगाना शामिल है। इसमें आरपीजी फायरिंग का अभ्यास भी कराया गया, जिससे भारी हथियारों के इस्तेमाल की समझ बढ़ती है। निहत्थे मुकाबले और बेयोनेट फाइटिंग की ट्रेनिंग भी दी गई, जिससे नजदीकी लड़ाई में सैनिकों की क्षमता मजबूत होती है।

ड्रोन और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल

इस अभ्यास में आधुनिक तकनीक पर भी खास ध्यान दिया गया है। सैनिकों को यूएवी एप्लीकेशन यानी ड्रोन के इस्तेमाल की ट्रेनिंग दी गई। ड्रोन की मदद से निगरानी करना, जानकारी जुटाना और लक्ष्य पहचानना सिखाया गया। आज के समय में ड्रोन युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं, इसलिए दोनों सेनाएं इस क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं।

शहरी इलाके में ऑपरेशन की तैयारी

अभ्यास का एक हिस्सा शहरी इलाके में ऑपरेशन से भी जुड़ा है। इसमें फायर एंड मूव ड्रिल्स कराई गईं। इसका मतलब है कि सैनिक एक-दूसरे को कवर देते हुए आगे बढ़ते हैं और दुश्मन की स्थिति पर हमला करते हैं। हाउस इंटरवेंशन ड्रिल्स के जरिए इमारतों के अंदर ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी गई। यह खास तौर पर आतंकवाद विरोधी अभियानों में इस्तेमाल होती है। (Exercise Dustlik 2026)

Exercise Dustlik 2026
Exercise Dustlik 2026

घायल सैनिकों को निकालने की ट्रेनिंग

अभ्यास में कॉम्बैट कैजुअल्टी एवैकुएशन पर भी ध्यान दिया गया। इसमें सिखाया जाता है कि घायल सैनिक को सुरक्षित तरीके से कैसे बाहर निकाला जाए और उसे प्राथमिक इलाज कैसे दिया जाए। यह किसी भी ऑपरेशन का अहम हिस्सा होता है, क्योंकि इससे जान बचाने में मदद मिलती है।

सैनिकों को माउंटेनियरिंग और रैपलिंग की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इसमें ऊंचे इलाकों में चढ़ाई करना और रस्सी के सहारे नीचे उतरना शामिल है। स्नाइपर ट्रेनिंग के जरिए दूर से सटीक निशाना लगाने की क्षमता पर काम किया गया। नेविगेशन एक्सरसाइज में सैनिकों को बिना गलती के रास्ता तय करना सिखाया गया। (Exercise Dustlik 2026)

फिटनेस और टीमवर्क पर जोर

अभ्यास के दौरान सिर्फ हथियारों की ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि फिटनेस और टीमवर्क पर भी ध्यान दिया गया। इसके लिए रनिंग, कैलिस्थेनिक्स और योग जैसी गतिविधियां कराई गईं। इनसे सैनिकों की शारीरिक क्षमता बढ़ती है और टीम के रूप में काम करने की आदत मजबूत होती है।

अभ्यास के अगले चरण में और कठिन मिशनों की तैयारी की जा रही है। इसमें दुश्मन के ठिकानों पर स्ट्राइक ऑपरेशन, तय लक्ष्यों पर कब्जा और हेलिबोर्न ऑपरेशन शामिल हैं।

हेलिबोर्न ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर के जरिए सैनिकों को उतारकर ऑपरेशन किया जाता है। इसके साथ ही संयुक्त कमांड और कंट्रोल सिस्टम बनाने का भी अभ्यास होगा।

इस पूरे अभ्यास का मुख्य फोकस यही है कि दोनों देशों की सेनाएं एक साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें। इसके लिए हर स्तर पर समन्वय बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

अभ्यास के दौरान अलग-अलग परिस्थितियों में मिलकर काम करने की ट्रेनिंग दी जा रही है, जिससे वास्तविक ऑपरेशन में तालमेल बना रहे। (Exercise Dustlik 2026)

तीन दिन के दौरे पर ब्रिटेन पहुंचे सीडीएस जनरल अनिल चौहान, रक्षा सहयोग पर होगी अहम चर्चा

CDS UK Visit
For the first time, India’s Chief of Defence Staff Gen Anil Chauhan is on an official visit to the UK, hosted by UK CDS Air Chief Marshal Sir Richard Knighton.

CDS UK Visit: भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान तीन दिन के आधिकारिक दौरे पर ब्रिटेन पहुंचे हुए हैं। यह किसी भारतीय सीडीएस का यूके का पहला औपचारिक दौरा माना जा रहा है। इस यात्रा का मुख्य मकसद भारत और ब्रिटेन के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करना है। दौरे की शुरुआत 19 अप्रैल से हुई और इसमें कई अहम बैठकों का कार्यक्रम तय किया गया है।

CDS UK Visit: पहली बार हो रहा है ऐसा दौरा

यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि पहली बार भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यूके पहुंचे हैं। ब्रिटेन के सीडीएस एयर चीफ मार्शल रिचर्ड नाइटन ने जनरल अनिल चौहान का स्वागत किया। दोनों देशों के शीर्ष सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत में कई अहम मुद्दों को शामिल किया गया है।

इस यात्रा को दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा रिश्तों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच कई हाई लेवल सैन्य मुलाकातें हो चुकी हैं, जिनके बाद यह दौरा तय हुआ।

को-प्रोडक्शन पर फोकस

दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच ट्रेनिंग, ऑपरेशनल कोऑर्डिनेशन और डिफेंस इंडस्ट्री पार्टनरशिप पर चर्चा हो रही है। दोनों पक्ष इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सेनाओं के बीच तालमेल को और बेहतर बनाया जाए।

इसके साथ ही को-प्रोडक्शन यानी संयुक्त उत्पादन पर भी बातचीत हो रही है। इसका मतलब है कि दोनों देश मिलकर रक्षा उपकरण और सिस्टम तैयार करने के विकल्प तलाश रहे हैं।

जनरल अनिल चौहान अपने दौरे के दौरान ब्रिटेन के कई वरिष्ठ सैन्य और सिविल अधिकारियों से मुलाकात कर रहे हैं। इन बैठकों में रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा हो रही है और दोनों देशों के बीच सहयोग के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

इसके अलावा वे ब्रिटिश डिफेंस इंडस्ट्री से जुड़े प्रतिनिधियों से भी मिल रहे हैं। इन बैठकों में खासतौर पर रक्षा निर्माण और टेक्नोलॉजी से जुड़े सहयोग पर बात हो रही है।

इस दौरे में रक्षा उद्योग को भी खास महत्व दिया गया है। भारत और ब्रिटेन दोनों इस बात पर काम कर रहे हैं कि डिफेंस सेक्टर में साझेदारी को आगे बढ़ाया जाए। ब्रिटिश कंपनियों के साथ मिलकर भारत में निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है। इससे भारत में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।

जाएगें रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज

दौरे के दौरान जनरल चौहान रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज भी जाएंगे। यहां वे अलग-अलग देशों से आए अधिकारियों और छात्रों से बातचीत करेंगे। इस मुलाकात का मकसद सैन्य शिक्षा और रणनीतिक समझ को साझा करना है। इस तरह के प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग देशों के अधिकारी एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं।

इंडो-पैसिफिक पर भी चर्चा

बातचीत में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। यह क्षेत्र दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों देश इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इस क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए किस तरह सहयोग किया जा सकता है।

इस दौरे से पहले भी भारत और ब्रिटेन के बीच कई अहम सैन्य संपर्क हो चुके हैं। मार्च 2026 में ब्रिटेन के एयर चीफ मार्शल भारत आए थे और दोनों देशों के बीच सहयोग पर बातचीत हुई थी। इन लगातार बैठकों के बाद अब यह दौरा दोनों देशों के रिश्तों को और आगे बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

ब्रिटेन के उच्चायोग की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि यह दौरा दोनों देशों के बीच भरोसे और सहयोग को दर्शाता है। इसमें यह भी कहा गया कि भारत यूके के लिए एक महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है। साथ ही, दोनों देश मिलकर इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाने, इनोवेशन को बढ़ावा देने और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं।

दौरे के दौरान इस बात पर भी चर्चा होगी कि सेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यास और ट्रेनिंग को और बढ़ाया जाए। इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच काम करने का तरीका एक जैसा हो सकेगा। इसके अलावा नई तकनीक, साइबर सिक्योरिटी और आधुनिक युद्ध से जुड़े विषयों पर भी सहयोग की बात होनी है।

राजनाथ सिंह 21 से 23 तक जर्मनी दौरे पर, P-75I सबमरीन डील और रक्षा साझेदारी को मिल सकती है नई रफ्तार

Rajnath Singh Germany Visit
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Rajnath Singh Germany Visit: भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा देने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 21 से 23 अप्रैल तक तीन दिन के दौरे पर जर्मनी जाएंगे। रक्षा समाचार ने पहले ही इस दौरे के बारे में जानकारी दी थी, और अब यह यात्रा औपचारिक रूप से तय हो चुकी है। इस दौरान बर्लिन में उनकी मुलाकात जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस और अन्य वरिष्ठ नेताओं से होगी, जहां कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने वाली है।

Rajnath Singh Germany Visit: रक्षा सहयोग पर रहेगा फोकस

इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करना है। बातचीत में डिफेंस इंडस्ट्रियल कोलैबोरेशन यानी रक्षा उद्योग में साझेदारी, मिलिट्री-टू-मिलिट्री एंगेजमेंट और नई टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में सहयोग पर जोर रहेगा।

खास तौर पर साइबर सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ड्रोन जैसे उभरते क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने के विकल्पों पर चर्चा होगी। इसके अलावा दोनों देशों के बीच एक डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप और यूएन पीसकीपिंग ऑपरेशन ट्रेनिंग से जुड़ा समझौता भी साइन किया जा सकता है। (Rajnath Singh Germany Visit)

प्रोजेक्ट 75आई पनडुब्बी डील पर नजर

सूत्रों के मुताबिक, इस दौरे के दौरान भारतीय नौसेना के लिए प्रस्तावित प्रोजेक्ट 75आई पनडुब्बी डील पर भी प्रगति हो सकती है। इस प्रोजेक्ट के तहत छह आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां शामिल की जानी हैं।

इन पनडुब्बियों में एडवांस एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे ये ज्यादा समय तक पानी के अंदर रह सकेंगी। इससे उनकी पहचान करना मुश्किल होगा और ऑपरेशन क्षमता बेहतर होगी।

इस डील में जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स की अहम भूमिका मानी जा रही है। इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में किया जाएगा, जिससे देश के रक्षा उत्पादन को भी मजबूती मिलेगी।

सात साल बाद हो रहा है दौरा

भारत और जर्मनी के बीच पहले से ही मजबूत रणनीतिक साझेदारी है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर आधारित है। पिछले कुछ वर्षों में रक्षा और सुरक्षा सहयोग इस रिश्ते का अहम हिस्सा बनकर उभरा है।

रक्षा मंत्री का यह दौरा सात साल बाद हो रहा है। इससे पहले फरवरी 2019 में तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने जर्मनी का दौरा किया था। वहीं जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस जून 2023 में भारत आए थे और दोनों देशों के बीच विस्तृत बातचीत हुई थी। (Rajnath Singh Germany Visit)

इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी पर भी बातचीत

इस यात्रा के दौरान राजनाथ सिंह जर्मनी की डिफेंस इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेंगे। इसका उद्देश्य संयुक्त विकास और को-प्रोडक्शन को बढ़ावा देना है, खासकर मेक इन इंडिया पहल के तहत।

दोनों देशों के बीच रक्षा निवेश, नई तकनीक और रिसर्च के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी। इससे भारतीय कंपनियों को आधुनिक तकनीक के साथ काम करने का मौका मिल सकता है। (Rajnath Singh Germany Visit)

पहले से चल रही परियोजनाओं की समीक्षा

इस दौरे के दौरान भारत और जर्मनी के बीच पहले से चल रही रक्षा परियोजनाओं की भी समीक्षा की जाएगी। साथ ही नए क्षेत्रों में सहयोग के अवसर तलाशे जाएंगे।

यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक स्तर पर सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं और देशों के बीच रक्षा सहयोग की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है। इस दौरान दोनों पक्ष क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी अपने विचार साझा करेंगे।

भारत की ओर से इस दौरे को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां रक्षा, तकनीक और इंडस्ट्री के कई पहलुओं पर एक साथ बातचीत होगी। (Rajnath Singh Germany Visit)

Opinion: गल्फ वॉर की रणनीति खत्म? क्या अब बिना ग्राउंड फोर्स के जीते जा सकते हैं युद्ध? एयर पावर कैसे बन सकती है गेमचेंजर

Air Power Future Warfare
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Air Power Future Warfare: एयर पावर की रणनीतिक क्षमता तकनीकी सीमाओं से नहीं, बल्कि 1991 के गल्फ वॉर की सोच पर आधारित पुरानी सैन्य सोच यानी डॉक्ट्रिन के कारण सीमित हो जाती है। आज एयर पावर में लगातार निगरानी (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी ISR), सटीक हमले (मास प्रिसिजन) और रियल-टाइम लॉजिस्टिक्स मॉनिटरिंग जैसी क्षमताएं मौजूद हैं, जो किसी भी युद्ध को निर्णायक बना सकती हैं या युद्ध से पहले ही स्थिति बदल सकती हैं। मिलिट्री हिस्ट्री बताता है कि जब तक युद्ध के मैदान में झटके नहीं लगते, तब तक ऐसी पुरानी सोच बनी रहती है। इसलिए जरूरी है कि तकनीक की तेजी के साथ सैन्य सोच भी बदली जाए।

Air Power Future Warfare: आधुनिक युद्ध में गल्फ वॉर की सोच क्यों पड़ रही है पुरानी

1991 के ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म के दौरान जो टारगेटिंग रणनीति अपनाई गई, उसने सैन्य सोच को बदल दिया था। उस समय एयर पावर का इस्तेमाल इराक के कमांड और कंट्रोल सिस्टम को कमजोर करने, एयर डिफेंस को खत्म करने, स्कड मिसाइल सिस्टम को तबाह करने और जमीन पर सेना भेजने से पहले एयर सुपीरियरिटी हासिल करने के लिए किया गया था।

इस सोच का आधार यह था कि एयर पावर जमीन पर लड़ने वाली सेना की मदद के लिए है, उसे बदलने के लिए नहीं। बाद में कोसोवो, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे ऑपरेशनों में भी यही मॉडल अपनाया गया। लेकिन आज बदलते वैश्विक हालात, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, इस सोच को फिर से परखने की जरूरत दिखाते हैं।

क्या एयर पावर जमीन पर कब्जा नहीं कर सकती?

आम तौर पर माना जाता है कि केवल आसमान से युद्ध नहीं जीता जा सकता। यह सोच इतिहास पर आधारित है, लेकिन अब यह पूरी तरह सही नहीं रह गई है। आलोचकों का कहना है कि एयर पावर जमीन पर कब्जा नहीं कर सकती, लोगों को नियंत्रित नहीं कर सकती और दुश्मन के नेटवर्क को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।

ये सीमाएं पहले सही थीं, लेकिन अब तकनीक में हुए बदलावों को नजरअंदाज करना सही नहीं है। पहले एयर पावर सीमित सेंसर, कमजोर संचार और धीमी जानकारी के कारण बाधित थी। दुश्मन आसानी से छिप सकता था और खुद को फिर से संगठित कर सकता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस में हुई क्रांति

इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) में जो बदलाव आया है, वह एयर पावर के लिए सबसे बड़ा और असरदार बदलाव माना जाता है। आज के आधुनिक ISR सिस्टम, जैसे सैटेलाइट नेटवर्क, ऊंचाई पर उड़ने वाले बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म (ड्रोन), आपस में जुड़े सेंसर सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से डेटा का विश्लेषण, इन सबने मिलकर बहुत बड़े इलाके में भी दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना संभव बना दिया है।

पहले के समय, खासकर कोल्ड वॉर और गल्फ वॉर के दौरान, सेना को “फॉग ऑफ वॉर” यानी युद्ध के दौरान अनिश्चितता और जानकारी की कमी की चिंता रहती थी। लेकिन अब आधुनिक ISR सिस्टम की वजह से सेंसर से लेकर हमले तक का समय बहुत कम हो गया है और निगरानी का दायरा भी बहुत बड़ा हो गया है।

इसका असर टारगेट चुनने की रणनीति पर भी साफ दिखता है। पहले एयर ऑपरेशन में ज्यादा ध्यान ऐसे टारगेट्स पर होता था जो स्थिर होते थे, जैसे एयरबेस, कमांड सेंटर, रडार स्टेशन या फैक्ट्रियां। लेकिन अब एयर पावर चलते-फिरते टारगेट्स पर भी लगातार नजर रख सकती है। दुश्मन की सप्लाई और मूवमेंट को लगभग रियल टाइम में देखा जा सकता है और उसके काम करने के तरीके को समझकर पहले ही उसकी मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है।

यह सिर्फ टारगेटिंग की सटीकता बढ़ने भर की बात नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा बदलाव है, जिसे कुछ विशेषज्ञ “पूरे युद्ध क्षेत्र की लगभग पूरी जानकारी होना” यानी हर गतिविधि पर नजर रखने की क्षमता के रूप में देखते हैं।

मास प्रिसिजन का क्या है नया मतलब

“मास प्रिसिजन” शब्द पहली नजर में थोड़ा उल्टा या अजीब लग सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जो पुरानी सैन्य सोच से परिचित हैं। पहले माना जाता था कि सटीक हमला (प्रिसिजन) और बड़े पैमाने पर हमला (मास) एक साथ संभव नहीं हैं। प्रिसिजन वेपंस कम होते थे, महंगे होते थे और उन्हें चलाने के लिए खास हालात चाहिए होते थे। वहीं बड़े पैमाने पर किए गए हमले अक्सर कम सटीक होते थे और इनमें गलती से आम लोगों को नुकसान पहुंचने का खतरा ज्यादा रहता था।

लेकिन अब यह फर्क पहले जैसा नहीं रहा। आज के समय में प्रिसिजन गाइडेड हथियारों को बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। नई गाइडेंस टेक्नोलॉजी, बेहतर मैन्युफैक्चरिंग और नेटवर्क के जरिए टारगेट चुनने की क्षमता ने इसे आसान बना दिया है। अब एक साथ कई प्लेटफॉर्म कई टारगेट्स पर सटीक हमला कर सकते हैं और सफल होने की संभावना भी ज्यादा रहती है।

अब “मास प्रिसिजन” का मतलब है कि एक बड़े इलाके में एक साथ या बहुत कम समय के अंतर में कई सटीक हमले किए जाएं। इससे दुश्मन को सोचने और जवाब देने का समय नहीं मिलता और उसके सिस्टम में एक के बाद एक गड़बड़ी शुरू हो जाती है।

जब इसे एडवांस आईएसआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस) के साथ जोड़ा जाता है, तो टारगेट करने का तरीका भी बदल जाता है। अब सिर्फ बड़े ठिकानों पर हमला करने के बजाय दुश्मन के पूरे सिस्टम को कमजोर करने पर ध्यान दिया जाता है। जैसे उसकी सप्लाई ले जाने वाले काफिले, मरम्मत करने वाली जगहें, कम्युनिकेशन सिस्टम, ईंधन के भंडार और वो लोग या नेटवर्क जो उसकी सेना को चलाते हैं।

इस तरह टारगेट केवल दुश्मन को खत्म करना नहीं, बल्कि उसकी पूरी क्षमता को कमजोर करना होता है, ताकि उसका सैन्य सिस्टम काम करने लायक न बचे।

दुश्मन के लिए फिर से खड़ा होना हुआ मुश्किल

पहले के समय में एयर पावर की एक बड़ी कमजोरी यह थी कि दुश्मन अपने नुकसान की भरपाई कर लेता था। अगर एयर स्ट्राइक में फैक्ट्रियां नष्ट हो जाती थीं, तो उन्हें कहीं और शिफ्ट कर लिया जाता था। टैंक यूनिट्स खत्म हो जाती थीं, तो नई यूनिट्स तैयार कर ली जाती थीं। यानी एयर पावर का असर होता था, लेकिन दुश्मन धीरे-धीरे फिर से खड़ा हो जाता था।

अब हालात बदल गए हैं। आधुनिक एयर पावर में एक नई चीज जुड़ गई है, जिसे “पर्सिस्टेंस” कहा जाता है, यानी लगातार मौजूद रहना। आज ड्रोन और लंबे समय तक उड़ान भरने वाले सिस्टम कई दिनों या हफ्तों तक एक ही इलाके पर नजर रख सकते हैं।

इसका मतलब यह है कि अगर आज किसी सप्लाई काफिले को नष्ट किया गया, तो अगले दिन उसकी नई व्यवस्था बनने से पहले ही उस पर नजर रखकर उसे रोका जा सकता है। अगर किसी रिपेयर फैसिलिटी को नुकसान पहुंचाया गया है, तो उसे ठीक होने से पहले ही फिर निशाना बनाया जा सकता है। इसी तरह, दुश्मन के लीडर या कमांड सिस्टम को दोबारा संगठित होने से पहले ही दबाव में लाया जा सकता है।

इस तरह दुश्मन धीरे-धीरे नहीं, बल्कि लगातार कमजोर होता जाता है। उसे दोबारा ताकत जुटाने का मौका ही नहीं मिलता। इसी सोच को अब कुछ विशेषज्ञ “टाइम-सेंसिटिव टारगेटिंग” कहते हैं। इसका मतलब है कि सही समय पर, लगातार और समझदारी से सटीक हमले किए जाएं, ताकि दुश्मन अपनी रणनीति बदलने या खुद को फिर से तैयार करने से पहले ही कमजोर हो जाए।

सैन्य सोच में बदलाव की जरूरत

इस बदलाव को लागू करने में सबसे बड़ी रुकावट तकनीक नहीं, बल्कि सोच और सिस्टम की है। कई सैन्य संस्थाएं, जैसे अमेरिकी एयर फोर्स, आज भी पुराने मॉडल पर काम कर रही हैं, जो 1991 के गल्फ वॉर के समय बना था।

आज भी एयर पावर को पूरी तरह स्वतंत्र ताकत की तरह नहीं, बल्कि जमीन पर लड़ने वाली सेना की मदद करने वाले साधन के रूप में देखा जाता है। हथियार खरीदने की योजनाएं भी पुराने तरह के युद्ध को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ट्रेनिंग और पढ़ाई में भी उन्हीं तरीकों पर जोर दिया जाता है, जो अब बदल चुके हालात में उतने उपयोगी नहीं हैं।

अगर युद्ध के तरीके को सच में बदलना है, तो इस पुरानी सोच को बदलना होगा। इसके लिए जरूरी है कि एयर पावर को अकेले इस्तेमाल करने की रणनीति भी बनाई जाए, न कि हमेशा जमीनी सेना के साथ जोड़कर ही देखा जाए।

इसके साथ ही कुछ और बातों को भी ध्यान में रखना होगा, जैसे आम लोगों को नुकसान कम से कम हो, दुश्मन की कमजोरियों को समझा जाए, और साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाए।

ईरान का उदाहरण इसे समझने में मदद करता है। वहां का मिलिट्री स्ट्रक्चर काफी जटिल है, अलग-अलग जगहों पर फैला नेतृत्व, मजबूत कमांड सिस्टम, सुरंगों का नेटवर्क, मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और ऐसी आबादी जो एक जैसी सोच नहीं रखती।

पुरानी सोच के मुताबिक, पहले इन सभी ठिकानों को कमजोर किया जाएगा और फिर जमीन पर हमला किया जाएगा, जो शायद कभी हो ही न।

लेकिन नई सोच यह कहती है कि सीधे हमला करने की बजाय दुश्मन की पूरी सैन्य क्षमता को उसके सपोर्ट सिस्टम से अलग किया जाए। जैसे उसका एनर्जी सिस्टम, इकोनॉमिक नेटवर्क, सप्लाई चेन और तकनीकी संसाधनों को निशाना बनाया जाए। साथ ही लगातार निगरानी रखी जाए, ताकि वह दोबारा खुद को मजबूत न कर सके।

निष्कर्ष: बदलती सोच की जरूरत

“ऑम्निसिएंट अवेयरनेस” का मतलब है युद्ध के मैदान की लगभग पूरी और लगातार जानकारी होना, यानी दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना।

यह कहना कि सिर्फ एयर पावर से युद्ध नहीं जीता जा सकता, यह कहना गलत है। यह बस पुराने युद्धों के अनुभव पर आधारित एक बात है। अब तक एयर पावर जिस तरह इस्तेमाल हुई है, वह उस समय की सोच, तकनीक और राजनीतिक सीमाओं पर निर्भर थी। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। अब बेहतर आईएसआर (निगरानी और जानकारी जुटाने की क्षमता), सटीक हमले (मास प्रिसिजन), लगातार मौजूद रहने की क्षमता (पर्सिस्टेंस) और नई रणनीतियों के साथ एयर पावर की ताकत पहले से काफी अलग हो सकती है।

सैन्य इतिहास बताता है कि जब भी नई तकनीक आती है, तो उसे अपनाने में समय लगता है। अक्सर सेनाएं पुरानी सोच पर ही काम करती रहती हैं, जब तक कोई बड़ी असफलता उन्हें बदलाव के लिए मजबूर नहीं करती। आज अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव और बदलते युद्ध के हालात इस बात का संकेत देते हैं कि अब पुरानी रणनीतियों को फिर से देखने की जरूरत है।

आने वाले समय में एयर पावर का इस्तेमाल 1991 के गल्फ वॉर जैसा नहीं होगा। अब ऑपरेशन नेटवर्क के जरिए जुड़े हुए होंगे, जहां बड़े पैमाने पर तेजी से सटीक हमले किए जाएंगे। एयर पावर लगातार मौजूद रहकर दुश्मन को संभलने का मौका नहीं देगी। अब फोकस दुश्मन की पूरी सिस्टम को कमजोर करने पर होगा, न कि सिर्फ उसकी सेना को खत्म करने पर।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन नई सोच और तकनीकों को सही तरीके से लागू किया जाए और पुरानी सोच को पीछे छोड़ा जाए।

एयर पावर हमेशा भविष्य की ताकत मानी जाती रही है। अब सवाल यह है कि क्या आज की सेनाएं इस नए भविष्य को अपनाएंगी या फिर 35 साल पुरानी सोच में ही फंसी रहेंगी। (Air Power Future Warfare)

(डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में लिखे गए विचार और राय लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे रक्षा समाचार की राय को दिखाते हों)

वेस्ट एशिया तनाव पर केंद्र सरकार की बड़ी बैठक, समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए बनाया ‘भारत मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल’

IGoM Meeting West Asia crisis

IGoM Meeting West Asia crisis: वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत सरकार ने शनिवार को हालात और अपनी तैयारियों की समीक्षा के लिए अहम बैठक की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में इंटर-मिनिस्टीरियल ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (आईजीओएम) की बैठक में मौजूदा स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई। इस दौरान समुद्री व्यापार को सुरक्षित बनाए रखने के लिए ‘भारत मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल’ योजना को भी मंजूरी दी गई, जिसके लिए करीब 12,980 करोड़ रुपये की सॉवरेन गारंटी तय की गई है।

बैठक के दौरान रक्षा मंत्री ने वेस्ट एशिया के हालात पर कहा कि भारत को हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा। सरकार की तरफ से यह भी कहा गया कि किसी भी संभावित जोखिम से निपटने के लिए जरूरी कदम लगातार उठाए जा रहे हैं।

IGoM Meeting West Asia crisis: समुद्री व्यापार के लिए बड़ा फैसला

बैठक में समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने के लिए एक अहम योजना का जिक्र किया गया। सरकार ने ‘भारत मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल’ बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें करीब 12,980 करोड़ रुपये की सॉवरेन गारंटी दी गई है।

इस व्यवस्था का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय जहाजों और कार्गो को अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों से गुजरते समय सस्ती और लगातार इंश्योरेंस सुविधा मिलती रहे। खासकर उन इलाकों में, जहां हालात अस्थिर हैं, वहां यह कदम व्यापार को सुरक्षित बनाए रखने में मदद करेगा। (IGoM Meeting West Asia crisis)

ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता

सरकार ने बताया कि वैश्विक स्तर पर सप्लाई में झटके के बावजूद भारत में ईंधन का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। देश के पास कच्चा तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ का भंडार 60 दिनों से ज्यादा के उपयोग के लिए उपलब्ध है।

इसके अलावा एलएनजी का स्टॉक लगभग 50 दिन और एलपीजी का स्टॉक करीब 40 दिन के लिए मौजूद है। सरकार ने यह भी जानकारी दी कि आयात कई स्रोतों से किया जा रहा है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से भी सप्लाई सुनिश्चित की गई है। (IGoM Meeting West Asia crisis)

पीएनजी को बढ़ावा, एलपीजी पर निर्भरता कम

घरेलू स्तर पर एलपीजी की खपत कम करने के लिए पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी को बढ़ावा दिया जा रहा है। मार्च 2026 से अब तक 4.76 लाख से ज्यादा नए पीएनजी कनेक्शन शुरू किए जा चुके हैं।

इसके अलावा 5.33 लाख से ज्यादा लोगों ने नए कनेक्शन के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। हजारों उपभोक्ताओं ने एलपीजी कनेक्शन छोड़कर पीएनजी अपनाया है, जिससे गैस सप्लाई सिस्टम में बदलाव देखने को मिल रहा है।

केमिकल और फार्मा सेक्टर के लिए व्यवस्था

बैठक में बताया गया कि घरेलू उद्योगों के लिए जरूरी कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए इंटर-मिनिस्टीरियल जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाया गया है। इसके तहत पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक की उपलब्धता पर नजर रखी जा रही है।

सरकार ने रिफाइनरी कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे कुछ जरूरी केमिकल्स की न्यूनतम मात्रा घरेलू सेक्टर के लिए उपलब्ध कराएं। फार्मा और केमिकल इंडस्ट्री के लिए रोजाना 1000 मीट्रिक टन तक सप्लाई की व्यवस्था की गई है।

खाद्य वस्तुओं की कीमतें स्थिर

सरकार ने जानकारी दी कि देश में खाद्य वस्तुओं की कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं। थोक और खुदरा बाजार में कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया है।

गेहूं के निर्यात के लिए अतिरिक्त आवंटन की भी सिफारिश की गई है। वहीं एलपीजी से जुड़ी शिकायतों में कमी आई है, जिससे सप्लाई व्यवस्था के बेहतर होने का संकेत मिलता है। (IGoM Meeting West Asia crisis)

देश में उर्वरक की पर्याप्त उपलब्धता

बैठक में उर्वरक की स्थिति पर भी चर्चा हुई। सरकार के अनुसार देश में यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य उर्वरकों का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। मार्च से अप्रैल के बीच लाखों टन उर्वरक की आपूर्ति की गई है, जिससे भंडार मजबूत हुआ है।

एलएनजी के जरिए यूरिया उत्पादन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसके अलावा अन्य विकल्पों के जरिए भी उर्वरक की सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है।

साथ ही, उर्वरकों की कालाबाजारी और जमाखोरी रोकने के लिए राज्यों के साथ मिलकर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। अप्रैल महीने में हजारों छापे मारे गए, कई लाइसेंस रद्द किए गए और कई मामलों में एफआईआर दर्ज की गई।

जागरूकता बढ़ाने के लिए देशभर में निगरानी समितियां भी बनाई गई हैं, जो किसानों को संतुलित उपयोग के बारे में जानकारी दे रही हैं। (IGoM Meeting West Asia crisis)

विदेशों में भारतीयों पर खास ध्यान

बैठक में विदेशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया। सरकार ने कहा कि भारतीय मिशन लगातार संपर्क में हैं और जरूरत पड़ने पर हर संभव मदद उपलब्ध कराई जा रही है।

इसके साथ ही राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल बनाकर हालात से निपटने की कोशिश की जा रही है, ताकि देश के भीतर किसी तरह की दिक्कत न हो। (IGoM Meeting West Asia crisis)