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भारतीय नौसेना को मिल सकते हैं स्वदेशी मरीन इंजन, DAC की बैठक में 114 राफेल और P-8i को मिल सकती है हरी झंडी

मरीन गैस टर्बाइन इंजन किसी भी बड़े युद्धपोत का दिल माने जाते हैं। इन्हीं इंजनों की वजह से जहाज तेज रफ्तार से चल पाते हैं, लंबी दूरी तय कर सकते हैं और युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से मूवमेंट कर सकते हैं...

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📍नई दिल्ली | 8 Feb, 2026, 7:37 PM

DAC Meeting: अगले हफ्ते होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में एक बड़ा और अहम फैसला लिया जा सकता है। माना जा रहा है कि डीएसी की बैठक 12 फरवरी को हो सकती है। बैठक में नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन के डेवलपमेंट से जुड़े एक बड़े प्रोग्राम को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो यह फैसला सिर्फ नौसेना के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा। (DAC Meeting)

यह प्रोग्राम खास तौर पर 24 से 28 मेगावॉट क्षमता वाले मरीन गैस टर्बाइन इंजन के स्वदेशी विकास से जुड़ा है। ऐसे इंजन नौसेना के बड़े युद्धपोतों, जैसे डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट में इस्तेमाल होते हैं। अभी तक भारत इन इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: क्या है यह मरीन गैस टर्बाइन प्रोग्राम?

मरीन गैस टर्बाइन इंजन किसी भी बड़े युद्धपोत का दिल माने जाते हैं। इन्हीं इंजनों की वजह से जहाज तेज रफ्तार से चल पाते हैं, लंबी दूरी तय कर सकते हैं और युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से मूवमेंट कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना अब चाहती है कि ऐसे अहम इंजन भारत में ही डिजाइन हों, भारत में ही बनें और भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं। इसी उद्देश्य से यह नया प्रोग्राम तैयार किया गया है, जिसे डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 की मेक-1 कैटेगरी में लाया गया है।

मेक-1 कैटेगरी का मतलब होता है कि सरकार खुद इस प्रोजेक्ट में बड़ा निवेश करती है, ताकि देश के भीतर इन्हें तैयार किया जा सके। (DAC Meeting)

कितनी होगी लागत और सरकार कितना पैसा देगी?

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मरीन इंजन प्रोग्राम की लागत करीब 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये हो सकती है। मेक-1 नियमों के तहत सरकार प्रोटोटाइप यानी शुरुआती नमूने बनाने की लागत का 70 फीसदी तक खर्च उठाएगी। बाकी 30 फीसदी लागत उस इंडस्ट्री पार्टनर को वहन करनी होगी, जो इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

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नियमों के मुताबिक, एक डेवलपमेंट एजेंसी को प्रोटोटाइप बनाने के लिए सरकार की ओर से अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक की फंडिंग दी जा सकती है। लेकिन चूंकि यह एक बड़ा और अहम प्रोजेक्ट है, इसलिए इसमें कई चरणों में निवेश किया जाएगा। (DAC Meeting)

कितने इंजन बनेंगे और कहां होंगे इस्तेमाल?

इस प्रोग्राम के तहत सबसे पहले 4 प्रोटोटाइप इंजन बनाए जाएंगे। इन इंजनों को जमीन पर और बाद में जहाज पर टेस्ट किया जाएगा, ताकि यह देखा जा सके कि वे नौसेना की सभी जरूरतों पर खरे उतरते हैं या नहीं।

अगर ये प्रोटोटाइप सफल रहते हैं, तो इसके बाद शुरुआती तौर पर कम से कम 40 मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की योजना है। आगे चलकर यह संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में कई नए युद्धपोत शामिल करने वाली है।

ये इंजन खास तौर पर डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट जैसे बड़े सरफेस कॉम्बैटेंट्स के लिए बनाए जाएंगे, जो नौसेना की ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। (DAC Meeting)

अभी किन विदेशी इंजनों पर निर्भर है भारत?

फिलहाल भारतीय नौसेना के ज्यादातर बड़े युद्धपोत विदेशी गैस टर्बाइन इंजनों पर चलते हैं। इनमें मुख्य रूप से दो नाम आते हैं। उनमें एक यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट और दूसरी अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई)है।

इन कंपनियों के इंजन वर्षों से भारतीय नौसेना के जहाजों में लगे हुए हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में वैश्विक हालात ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी सप्लाई पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। युद्ध, प्रतिबंध या राजनीतिक तनाव की स्थिति में स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, इस प्रोग्राम से भारत में हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी, एडवांस्ड मटीरियल्स और प्रिसीजन इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़ी तकनीकी तरक्की होगी।

इसी वजह से नौसेना अब चाहती है कि भविष्य में ऐसे अहम सिस्टम्स पूरी तरह से स्वदेशी हों। (DAC Meeting)

पहले भी हुए हैं स्वदेशी प्रयास, लेकिन यह प्रोग्राम क्यों है अलग?

भारतीय नौसेना और डीआरडीओ पहले भी मरीन इंजन के क्षेत्र में स्वदेशी प्रयास कर चुके हैं। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने कावेरी इंजन का एक मरीन वर्जन डेवलप करने की कोशिश की थी।

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इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) जैसी सार्वजनिक कंपनियों ने भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए लोकलाइजेशन पर काम किया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार मौजूदा मरीन इंजन प्रोग्राम का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक रखा गया है। इस बार विकास की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि प्राइवेट इंडस्ट्री की अगुवाई में, नौसेना की सक्रिय भागीदारी के साथ इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की योजना है। इससे स्वदेशी तकनीक के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। (DAC Meeting)

प्राइवेट इंडस्ट्री से क्या है उम्मीद?

पिछले साल के आखिर में नौसेना ने भारतीय प्राइवेट कंपनियों से संपर्क किया था और उनसे जानकारी मांगी थी कि क्या वे ऐसे हाई-पावर मरीन गैस टर्बाइन इंजन बना सकती हैं। कंपनियों से यह पूछा गया कि क्या उनके पास गैस टर्बाइन डिजाइन करने का अनुभव है। क्या वे फोर्जिंग, कास्टिंग और प्रिसीजन मशीनिंग जैसे अहम काम कर सकती हैं। साथ ही, क्या उनके पास टेस्टिंग फैसिलिटी और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है और वे इंजन का मेंटेनेंस और लाइफ-साइकिल सपोर्ट कैसे देंगे। इस कवायद का मकसद यह समझना था कि भारतीय इंडस्ट्री इस चुनौती के लिए कितनी तैयार है। (DAC Meeting)

खुल सकती है निर्यात की संभावना भी

अगर भारत इस 24-28 मेगावॉट मरीन गैस टर्बाइन को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो भविष्य में इसे इंडियन ओशन रीजन की मित्र नौसेनाओं को निर्यात भी किया जा सकता है। आज कई छोटे और मध्यम देश अपने युद्धपोतों के लिए भरोसेमंद और किफायती इंजन की तलाश में रहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए एक नया विकल्प बन सकता है। (DAC Meeting)

डीएसी बैठक में और किस पर हो सकती है चर्चा

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की होने वाली बैठक में वायुसेना के लिए 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित खरीद पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जिससे यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी रक्षा खरीद योजनाओं में शामिल मानी जा रही है। इसके अलावा डीएसी में भारतीय नौसेना के लिए छह अतिरिक्त पी-8आई समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान खरीदने का प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है।

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फिलहाल भारतीय नौसेना के पास 12 पी-8आई विमान हैं, जिनका इस्तेमाल हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए किया जाता है। नौसेना अपनी निगरानी क्षमता को और मजबूत करने के लिए छह और विमानों की जरूरत महसूस कर रही है। यह खरीद अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) रूट के जरिए की जानी है। (DAC Meeting)

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने मई 2021 में इस बिक्री को मंजूरी दे दी थी और उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 2.42 अरब डॉलर बताई गई थी। हालांकि, लागत से जुड़े सवालों और पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद बने राजनीतिक माहौल के कारण यह सौदा आगे नहीं बढ़ पाया।

इसके बावजूद बातचीत बंद नहीं हुई। सितंबर में अमेरिकी रक्षा विभाग और बोइंग के वरिष्ठ अधिकारी भारत आए थे और इस सौदे को लेकर विस्तृत चर्चा की गई थी। अब सूत्रों का कहना है कि डीएसी से मंजूरी मिलने की स्थिति में यह सौदा अगले वित्त वर्ष में औपचारिक रूप से साइन किया जा सकता है। (DAC Meeting)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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