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भारत आएगी मिड-एयर एडवांस्ड रिफ्यूलिंग तकनीक, पारस डिफेंस ने किया नॉर्थस्टार के साथ समझौता

Air to Air Refuelling India

Air to Air Refuelling India: भारतीय डिफेंस कंपनी पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड ने अमेरिका की कंपनी बंडाक एविएशन (डीबीए नॉर्थस्टार) के साथ एक समझौता किया है। इस समझौते के तहत भारत में एडवांस्ड एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग सिस्टम लाए जाएंगे।

यह करार भारतीय कंपनी पारस डिफेंस और अमेरिकी कंपनी नॉर्थस्टार के बीच हुआ है। इसका मकसद भारतीय सेना, खासकर वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मिड-एयर फ्यूलिंग सिस्टम और उससे जुड़े सपोर्ट सिस्टम उपलब्ध कराना है। इस सहयोग के जरिए भारत में ऐसी तकनीक लाई जाएगी, जो पहले से कई देशों में इस्तेमाल हो रही है।

मुंबई स्थित पारस डिफेंस के अधिकारियों के अनुसार, यह समझौता कंपनी की एयरोस्पेस क्षमता को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वहीं नॉर्थस्टार ने भी इस साझेदारी को भरोसेमंद और हाई-परफॉर्मेंस सिस्टम उपलब्ध कराने की दिशा में अहम बताया है। (Air to Air Refuelling India)

Air to Air Refuelling India: क्या होती है एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग

एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग, जिसे एरियल रिफ्यूलिंग भी कहा जाता है, एक ऐसी तकनीक है जिसमें एक विमान हवा में उड़ते हुए दूसरे विमान को ईंधन देता है। इसमें एक टैंकर एयरक्राफ्ट होता है, जो दूसरे फाइटर या ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को बीच आसमान में ही फ्यूल सप्लाई करता है।

इस प्रक्रिया से विमान को जमीन पर उतरकर ईंधन भरवाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मिशन के दौरान समय बचता है और विमान ज्यादा देर तक हवा में रह सकता है। (Air to Air Refuelling India)

क्यों है यह तकनीक अहम

मिड-एयर रिफ्यूलिंग सिस्टम से किसी भी एयरक्राफ्ट की रेंज और एंड्योरेंस बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि वह ज्यादा दूरी तक जा सकता है और लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकता है।

इसका इस्तेमाल लंबी दूरी के मिशन, मैरिटाइम पेट्रोलिंग और रिकॉनिसेंस ऑपरेशन में किया जाता है। इसके अलावा अचानक किसी क्षेत्र में तेजी से पहुंचने के लिए भी यह तकनीक मददगार होती है।

भारतीय वायुसेना पहले से इस तरह की क्षमता का इस्तेमाल करती है, लेकिन बढ़ती जरूरतों के चलते अब नई और एडवांस तकनीक की मांग बढ़ी है। (Air to Air Refuelling India)

इस समझौते के बाद भारत में एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग सिस्टम से जुड़े उपकरण और सर्विस उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके साथ ही देश में ही मेंटेनेंस और रिपेयर से जुड़ी सुविधाएं विकसित करने की योजना भी है।

इससे विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है और सिस्टम की देखभाल में तेजी आएगी। साथ ही भारतीय कंपनियों को नई तकनीक के साथ काम करने का मौका मिलेगा।

भारत फिलहाल आईएल-78 टैंकर एयरक्राफ्ट के जरिए मिड-एयर फ्यूलिंग की सुविधा इस्तेमाल करता है, लेकिन बदलती जरूरतों और नए एयरक्राफ्ट प्लेटफॉर्म्स को देखते हुए ज्यादा एडवांस और स्वदेशी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग सिस्टम की मांग बढ़ रही है। खास तौर पर एएमसीए और ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर जैसे भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए यह क्षमता और जरूरी मानी जा रही है।

नॉर्थस्टार की तकनीक पहले से कई प्लेटफॉर्म्स पर इस्तेमाल हो रही है और इसे भरोसेमंद माना जाता है। इसी वजह से इसके सिस्टम्स को अलग-अलग एयरक्राफ्ट के साथ जोड़ा जा सकता है। इसमें सुखोई-30 एमकेआई, राफेल, तेजस एमके-2 जैसे फाइटर जेट और सी-17 या आईएल-78 जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट शामिल हैं। (Air to Air Refuelling India)

पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड एक भारतीय कंपनी है, जो डिफेंस और स्पेस सेक्टर में काम करती है। यह कंपनी अलग-अलग तरह के डिफेंस इक्विपमेंट और सिस्टम डिजाइन और तैयार करती है।

कंपनी ऑप्ट्रॉनिक्स, सर्विलांस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। यह एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में पनडुब्बियों के लिए ऑप्ट्रॉनिक पेरिस्कोप बनाने वाली एकमात्र भारतीय कंपनी मानी जाती है।

वहीं, नॉर्थस्टार एक अमेरिकी कंपनी है, जिसे एरियल रिफ्यूलिंग सिस्टम के क्षेत्र में विशेषज्ञ माना जाता है। यह कंपनी डिजाइन, डेवलपमेंट और सप्लाई से लेकर इन सिस्टम्स को अपग्रेड करने तक का काम करती है। इसके सिस्टम दुनिया के कई एयरक्राफ्ट प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल किए जाते हैं। (Air to Air Refuelling India)

काउंटर टेरर ऑपरेशन के लिए बड़ी तैयारी! टाइगर डिविजन में सेना ने जम्मू-कश्मीर पुलिस को दी स्पेशल ट्रेनिंग

JK Police Anti Terror Training

JK Police Anti Terror Training: जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने की तैयारियों को और मजबूत करने के लिए भारतीय सेना अब सीधे पुलिस बल को ट्रेनिंग दे रही है। टाइगर डिविजन के तहत आयोजित खास काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म रिफ्रेशर कोर्स की ट्रेनिंग जम्मू-कश्मीर पुलिस को दी गई, जिसमें जवानों को जमीनी ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया।

यह कोर्स 7 अप्रैल से 18 अप्रैल तक आयोजित किया गया, जिसमें पुलिस के जवानों को अलग-अलग ऑपरेशनल हालात से निपटने की ट्रेनिंग दी गई।

यह ट्रेनिंग भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा मिलकर तैयार की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल, ऑपरेशन के दौरान एक जैसी प्रक्रिया अपनाना और जमीनी स्तर पर काम करने वाले जवानों की क्षमता को मजबूत करना था। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके में यह समन्वय बेहद जरूरी माना जाता है।

JK Police Anti Terror Training

JK Police Anti Terror Training: 108 जवानों ने लिया हिस्सा

इस कोर्स में कुल 108 पुलिसकर्मियों ने भाग लिया। ट्रेनिंग मिरान साहिब ब्रिगेड की ओर से कराई गई। खास ध्यान जूनियर लीडरशिप पर रखा गया, क्योंकि छोटे-छोटे टीम ऑपरेशन में यही अधिकारी सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। इनकी बेहतर तैयारी से पूरे ऑपरेशन की सफलता तय होती है।

ट्रेनिंग के दौरान जवानों को कई तरह के हालात के लिए तैयार किया गया। इसमें स्मॉल टीम ऑपरेशंस और पेट्रोलिंग की बारीकियां सिखाई गईं। क्विक रिएक्शन टीम और मोबाइल व्हीकल चेक पोस्ट ड्रिल्स पर भी अभ्यास कराया गया, ताकि अचानक आने वाले खतरे का तुरंत जवाब दिया जा सके।

इसके अलावा एम्बुश और काउंटर एम्बुश तकनीक, कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन और रूम इंटरवेंशन जैसी प्रक्रियाओं पर भी विस्तार से अभ्यास कराया गया। इन सभी का इस्तेमाल आतंकवाद विरोधी अभियानों में किया जाता है।

आधुनिक तकनीक और हथियारों पर फोकस

कोर्स में सिर्फ पारंपरिक तरीकों पर ही नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक पर भी खास ध्यान दिया गया। जवानों को हथियारों के इस्तेमाल और फायरिंग की ट्रेनिंग दी गई। साथ ही नए इक्विपमेंट्स के इस्तेमाल के बारे में जानकारी दी गई।

ड्रोन की पहचान और काउंटर ड्रोन उपायों की भी ट्रेनिंग दी गई, क्योंकि हाल के समय में ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ा है। इसके अलावा फर्स्ट एड, कैजुअल्टी एवैकुएशन और इंटेलिजेंस कलेक्शन जैसे विषयों को भी शामिल किया गया।

JK Police Anti Terror Training

प्रैक्टिकल एक्सरसाइज से बढ़ी समझ

ट्रेनिंग के दौरान सिर्फ थ्योरी नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल एक्सरसाइज पर ज्यादा जोर दिया गया। जवानों ने अलग-अलग ऑपरेशनल सिचुएशन में रिहर्सल किए, जिससे उन्हें वास्तविक हालात का अनुभव मिला। हाई-टेक सर्विलांस इक्विपमेंट, ड्रोन और काउंटर ड्रोन सिस्टम्स से भी उन्हें परिचित कराया गया।

बेहतर तालमेल पर जोर

इस पूरे कोर्स का मकसद सेना और पुलिस के बीच बेहतर कोऑर्डिनेशन बनाना था। साझा ऑपरेशन के दौरान एक जैसी समझ और भरोसा होना जरूरी होता है। इस तरह की ट्रेनिंग से दोनों के बीच तालमेल और मजबूत होता है, जिससे किसी भी सुरक्षा चुनौती का जवाब बेहतर तरीके से दिया जा सकता है।

यूक्रेन का नया वॉर फॉर्मूला, ड्रोन-रोबोट असॉल्ट मॉडल कैसे बदलेगा भविष्य के युद्धों की तस्वीर

Ukraine Drone War Model

Ukraine Drone War Model: 2022 से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध नई तकनीक के इस्तेमाल के मामले में बहुत अलग और खास माना जा रहा है। इसे “आधुनिक युद्ध की प्रयोगशाला” भी कहा जा रहा है। इस युद्ध की सबसे बड़ी खास बात यह है कि इसमें नई तकनीक को बहुत तेजी से अपनाया गया है। खासकर यूक्रेन ने सस्ती और आसानी से बनने वाली तकनीक को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। वहीं ड्रोन वॉर के बाद यह युद्ध अगले स्तर पर पहुंचता दिखाई दे रहा है।

हाल ही में यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने एक नए युद्ध मॉडल को लागू करने की बात कही है, जिसमें ड्रोन और जमीन पर चलने वाले रोबोट्स को सैनिकों के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब युद्ध के मैदान में लगातार ड्रोन हमले हो रहे हैं और दोनों देशों की सेनाएं नई रणनीतियों की तलाश में हैं।

Ukraine Drone War Model: 2022 में ड्रोन युद्ध की शुरुआत

साल 2022 में जब युद्ध शुरू हुआ, तब यूक्रेन ने छोटे-छोटे ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया। ये ड्रोन ऊपर उड़कर दुश्मन की लोकेशन बताते थे या सीधे हमला करते थे। इन्हें एफपीवी ड्रोन कहा जाता है। उस समय ये सिर्फ मदद के लिए इस्तेमाल हो रहे थे, लेकिन जल्दी ही ये बहुत जरूरी हथियार बन गए। इन ड्रोन की मदद से यूक्रेन ने रूसी टैंकों और गाड़ियों को काफी नुकसान पहुंचाया। अब हालात यह हैं कि युद्ध में होने वाले नुकसान का बड़ा हिस्सा ड्रोन की वजह से हो रहा है।

2023 और 2024 तक आते-आते युद्ध लंबा हो चला। अब सबसे बड़ी समस्या सैनिकों की कमी बन गई। यूक्रेन की आबादी रूस से कम है, इसलिए नए सैनिक जुटाना मुश्किल होने लगा। दूसरी तरफ, हर बार सीधे हमले में सैनिकों को आगे भेजना खतरनाक साबित हो रहा था और नुकसान भी ज्यादा हो रहा था। इसी वजह से यूक्रेन ने ड्रोन और मशीनों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। (Ukraine Drone War Model)

क्या है यूक्रेन का नया वॉर मॉडल

यूक्रेन ने जिस नए मॉडल की घोषणा की है, उसमें “ड्रोन-असॉल्ट यूनिट्स” बनाई जा रही हैं। इन यूनिट्स में एरियल ड्रोन, जमीन पर चलने वाले ग्राउंड अनमैन्ड सिस्टम यानी रोबोट और पारंपरिक इन्फैंट्री को एक साथ जोड़ा गया है।

इसके तहत अब किसी भी ऑपरेशन में पहले ड्रोन इलाके की निगरानी करेंगे, फिर ग्राउंड रोबोट्स आगे बढ़कर हमला करेंगे और आखिर में जरूरत पड़ने पर सैनिक वहां पहुंचेंगे। इससे सीधे टकराव की स्थिति कम हो जाती है।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस सिस्टम को एक इंटीग्रेटेड नेटवर्क की तरह तैयार किया गया है, जहां सभी मशीनें और सैनिक एक साथ काम करते हैं। (Ukraine Drone War Model)

Ukraine Drone War Model

ग्राउंड रोबोट्स का बढ़ता इस्तेमाल

इस नए मॉडल में सबसे ज्यादा ध्यान ग्राउंड रोबोट्स पर दिया गया है। ये ऐसे छोटे या बड़े वाहन होते हैं, जिन्हें दूर से कंट्रोल किया जाता है। इनमें कैमरे, सेंसर और कई बार हथियार या विस्फोटक भी लगाए जाते हैं।

यूक्रेन की एक थर्ड असाल्ट ब्रिगेड (थर्ड आर्मी कॉर्प्स), जिसे एनसी-13 कंपनी कहा जाता है, ने ऐसे 100 से ज्यादा ऑपरेशन किए हैं। इस यूनिट का काम ही इन रोबोट्स के जरिए दुश्मन की पोजीशन पर हमला करना है।

इन ऑपरेशंस में दुश्मन के बंकर, कमांड पोस्ट और अन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। साथ ही इन रोबोट्स की मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और घुसपैठ रोकने का काम भी किया गया।

एनसी-13 का कहना है कि अब 5-6 ग्राउंड कमिकाजे रोबोट्स और कॉम्बैट मॉड्यूल वाले रोबोट्स को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। इससे इन्फैंट्री असॉल्ट ग्रुप की जगह पूरी तरह रोबोट्स ले लेते हैं। दुश्मन अक्सर इसे इन्फैंट्री अटैक समझकर पोजीशन छोड़ देता है। वहीं, एक रोबोट ने तो बिना सैनिकों के 45 दिनों तक फ्रंटलाइन पर ड्यूटी भी की। (Ukraine Drone War Model)

कैसे हुआ पहला बड़ा रोबोटिक हमला

इस नई रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण साल 2025 में देखने को मिला। एक जगह पर यूक्रेनी सैनिकों ने दो बार हमला किया, लेकिन हर बार उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद ग्राउंड रोबोट्स का इस्तेमाल किया गया। चार रोबोट्स को दुश्मन की पोजीशन की तरफ भेजा गया, जिनमें भारी मात्रा में विस्फोटक लगे थे।

पहले रोबोट ने बंकर की एंट्री पर धमाका किया। दूसरे रोबोट ने वहां जाकर रास्ता बंद कर दिया। इसके बाद अंदर मौजूद सैनिकों ने हालात को समझते हुए सरेंडर कर दिया।

इस पूरी कार्रवाई में किसी भी सैनिक को सीधे लड़ाई में शामिल नहीं होना पड़ा। बाद में जब सैनिक वहां पहुंचे, तो बिना किसी गोलीबारी के इलाके पर कब्जा कर लिया गया।

इस मॉडल ने दक्षिणी मोर्चे पर फरवरी 2026 से अब तक बड़े क्षेत्र को आजाद कराया है। मंत्रालय के अनुसार, अब तक दसियों हजार अनमैन्ड ग्राउंड सिस्टम्स (UGVs) तैयार हो चुके हैं, जो सैनिकों की जगह ले सकते हैं।

ब्रिगेड ने इसे “दुनिया का पहला रोबोटिक असॉल्ट बताया, जिसमें कैदियों को बिना इन्फैंट्री के अरेस्ट किया गया।” वहीं, जेलेंस्की ने इसे एतिहासिक बताया था। (Ukraine Drone War Model)

हवाई ड्रोन और रोबोट्स का टीमवर्क

इस नए मॉडल में सिर्फ ग्राउंड रोबोट्स ही नहीं, बल्कि हवाई ड्रोन भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। ड्रोन पहले इलाके की तस्वीरें और वीडियो भेजते हैं, जिससे यह पता चलता है कि दुश्मन कहां है।

इसके बाद रोबोट्स को उसी दिशा में भेजा जाता है। ड्रोन लगातार ऊपर से नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत जानकारी देते रहते हैं।

इस तरह से जमीन और आसमान दोनों से एक साथ ऑपरेशन चलता है, जिससे सटीक हमला करना आसान हो जाता है। (Ukraine Drone War Model)

सैनिकों की भूमिका में बदलाव

इस सिस्टम के आने के बाद सैनिकों की भूमिका भी बदल रही है। अब उन्हें सीधे आगे बढ़कर हमला करने की जरूरत कम पड़ रही है। रोबोट्स पहले दुश्मन की पोजीशन को कमजोर करते हैं। उसके बाद सैनिक वहां पहुंचकर इलाके को सुरक्षित करते हैं। इससे जान का खतरा कम होता है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने 13 अप्रैल को डिफेंस इंडस्ट्री वर्कर्स डे पर कहा है कि कई जगहों पर रोबोट्स और ड्रोन की मदद से बिना किसी सैनिक नुकसान के दुश्मन की पोजिशंस पर कब्जा किया गया। वो भी बिना किसी इन्फैंट्री के और बिना किसी नुकसान के। उन्होंने 3 महीनों में 22,000 से ज्यादा फ्रंटलाइन ड्रोन मिशन्स का भी जिक्र किया। (Ukraine Drone War Model)

बड़े स्तर पर तैयार हो रहे रोबोट्स

यूक्रेन अब बड़ी संख्या में ऐसे रोबोट्स और ड्रोन तैयार कर रहा है। बताया जा रहा है कि हजारों की संख्या में ये सिस्टम बनाए जा चुके हैं और लगातार उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। यूक्रेन में 280 से ज्यादा कंपनियां रोबोट/ड्रोन बना रही हैं। वहीं, इस साल 20,000 से ज्यादा UGVs का टारगेट है। इसके अलावा नॉर्वे-जर्मनी जैसे देशों से भी जॉइंट प्रोडक्शन हो रहा है।

इनमें अलग-अलग तरह के रोबोट शामिल हैं। कुछ केवल निगरानी के लिए हैं, कुछ सामान पहुंचाने के लिए और कुछ हमले के लिए बनाए गए हैं।

कुछ रोबोट्स में मशीन गन जैसे हथियार भी लगाए गए हैं, जिससे वे दुश्मन पर सीधा हमला कर सकते हैं।

तकनीक कैसे कर रही मदद

इन रोबोट्स और ड्रोन में एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें थर्मल कैमरे लगे होते हैं, जिससे रात में भी साफ नजर आता है।

इसके अलावा कई सिस्टम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से काम करते हैं, जिससे वे टारगेट को पहचान सकते हैं। इन्हें सैटेलाइट इंटरनेट और रेडियो सिस्टम के जरिए दूर से कंट्रोल किया जाता है। कई मामलों में एक ही ऑपरेटर कई रोबोट्स और ड्रोन को एक साथ कंट्रोल कर सकता है।

NC-13 कमांडर माइकोला “माकर” जिन्केविच कहते हैं कि रोबोट्स युद्ध का रुख बदल देंगे। मंत्रालय का मानना है कि ये यूनिट्स “लोगों को रिप्लेस” कर रही हैं।

यूक्रेन के इस नए मॉडल से यह साफ हो रहा है कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब सीधे आमने-सामने लड़ाई की जगह मशीनों और ऑटोमेटेड सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

ड्रोन और रोबोट्स के जरिए पहले जानकारी जुटाई जाती है, फिर हमला किया जाता है और आखिर में सैनिक आगे बढ़ते हैं। इस पूरे सिस्टम को एक साथ जोड़कर ऑपरेशन किया जा रहा है। इस बदलाव ने युद्ध के मैदान में नई तरह की रणनीति को जन्म दिया है, जहां टेक्नोलॉजी और सैनिक दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। (Ukraine Drone War Model)

चीन ने समंदर में छिपाई रहस्यमयी ‘जासूसी’ डिवाइस! अंडरवॉटर पनडुब्बियों की कर रही थी निगरानी

Undersea Monitoring Device Bali Lombok
Undersea Monitoring Device Bali Lombok

Undersea Monitoring Device Bali Lombok: इंडोनेशिया के बाली और लोम्बोक के बीच समुद्र में एक बड़ा और टॉरपीडो जैसा दिखने वाला डिवाइस मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। यह डिवाइस एक मछुआरे को गिली ट्रावांगन द्वीप के पास समुद्र में मिला था। इसके बाद इंडोनेशियाई नौसेना ने इसे अपने कब्जे में लेकर लोम्बोक के मातरम नेवल बेस पर जांच के लिए भेज दिया।

नौसेना के अधिकारियों ने कहा कि इस डिवाइस की गहराई से जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह कहां से आया, इसका इस्तेमाल किस लिए किया जा रहा था और इसमें किस तरह का डेटा स्टोर है।

Undersea Monitoring Device Bali Lombok: क्या है यह डिवाइस

यह डिवाइस एक अंडरसी मॉनिटरिंग सिस्टम है, जिसे समुद्र के अंदर निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसकी लंबाई करीब 3.7 मीटर बताई गई है और इसका आकार टॉरपीडो जैसा है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह एक “डीप-सी रियल टाइम ट्रांसमिशन मूरिंग सिस्टम” हो सकता है। इसे समुद्र की तलहटी में एंकर के जरिए बांध दिया जाता है और यह ऊपर लगे कम्युनिकेशन बॉय के माध्यम से डेटा भेजता है।

इस सिस्टम में कई तरह के सेंसर लगे होते हैं, जो समुद्र के अंदर की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। इसमें तापमान, गहराई, समुद्री धारा और आसपास चल रहे जहाजों या सबमरीन की आवाज जैसी जानकारी रिकॉर्ड करने की क्षमता होती है।

Undersea Monitoring Device Bali Lombok

कैसे काम करता है यह सिस्टम

यह डिवाइस समुद्र के नीचे एक जगह स्थिर होकर काम करती है। इसमें लगे सेंसर लगातार डेटा इकट्ठा करते रहते हैं। जहां से यह जानकारी ऊपर मौजूद एक बॉय तक भेजी जाती है, जहां से इसे आगे ट्रांसमिट किया जाता है।

इस तरह का सिस्टम समुद्र के बड़े इलाके की निगरानी करने में मदद करता है। खास तौर पर यह पता लगाने में कि समुद्र के अंदर कौन सी गतिविधि हो रही है और कौन से जहाज या पनडुब्बियां उस इलाके से गुजर रही हैं।

क्यों अहम है लोम्बोक स्ट्रेट

जहां यह डिवाइस मिला है, वह इलाका रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। लोम्बोक स्ट्रेट हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला एक प्रमुख समुद्री रास्ता है।

यह रास्ता उन बड़े जहाजों के लिए इस्तेमाल होता है, जो मलक्का स्ट्रेट से नहीं गुजर पाते। ऐसे में यह इलाका व्यापार और सैन्य दोनों नजरियों से महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के रास्तों पर निगरानी रखने से किसी भी देश को समुद्री गतिविधियों की बेहतर जानकारी मिल सकती है। (Undersea Monitoring Device Bali Lombok)

क्या हो सकता है इसका इस्तेमाल

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के सिस्टम का इस्तेमाल दो तरह से हो सकता है। एक तरफ यह समुद्री रिसर्च और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उपयोगी होता है, वहीं दूसरी तरफ इसका इस्तेमाल सैन्य निगरानी के लिए भी किया जा सकता है।

इसमें लगे एकॉस्टिक सेंसर समुद्र के अंदर चल रही पनडुब्बियों की आवाज को पकड़ सकते हैं। हालांकि इस डेटा को समझने के लिए इसे किसी कंट्रोल स्टेशन तक भेजना जरूरी होता है।

इसी वजह से इसे “ड्यूल यूज” तकनीक कहा जाता है, यानी इसका इस्तेमाल सिविल और मिलिट्री दोनों कामों के लिए किया जा सकता है। (Undersea Monitoring Device Bali Lombok)

Undersea Monitoring Device Bali Lombok

क्या कहना है चीन का

इस पूरे मामले पर चीन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इसमें ज्यादा संदेह या चिंता की जरूरत नहीं है। चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि समुद्री रिसर्च के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरण कई बार तकनीकी खराबी या अन्य कारणों से दूसरे देशों के समुद्री क्षेत्र में पहुंच जाते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत समुद्री शोध गतिविधियां करता है। (Undersea Monitoring Device Bali Lombok)

पहले भी मिल चुके हैं ऐसे उपकरण

बताया जा रहा है कि इंडोनेशिया के मछुआरों को पहले भी समुद्र में ऐसे अंडरवॉटर ड्रोन मिल चुके हैं। हालांकि इस बार जो डिवाइस मिला है, वह थोड़ा अलग है क्योंकि यह एक जगह स्थिर रहने वाला सिस्टम बताया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहली बार है जब इस तरह का मूरिंग सिस्टम इस क्षेत्र में सामने आया है।

इस डिवाइस को लेकर यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत वैध था या नहीं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे किस उद्देश्य से लगाया गया था और क्या इसे किसी देश की अनुमति से तैनात किया गया था। (Undersea Monitoring Device Bali Lombok)

लोम्बोक स्ट्रेट इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र का हिस्सा है, जहां से अंतरराष्ट्रीय जहाजों को गुजरने की अनुमति होती है। लेकिन इस तरह के उपकरण की तैनाती को लेकर नियम स्पष्ट नहीं हैं।

इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने इस मामले में फिलहाल सावधानी बरतते हुए कहा है कि जांच पूरी होने से पहले कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि पहले तकनीकी जांच की जाएगी और उसके बाद ही कोई आधिकारिक बयान दिया जाएगा।

साथ ही, देश ने अपने समुद्री इलाकों में निगरानी बढ़ाने की बात भी कही है, ताकि इस तरह की घटनाओं पर नजर रखी जा सके। (Undersea Monitoring Device Bali Lombok)

स्टेल्थ फ्रिगेट तारागिरी है एडवांस स्पॉटर ड्रोन से लैस, चलते जहाज पर भी कर सकता काम

INS Taragiri spotter drone integration

INS Taragiri spotter drone integration: भारतीय नौसेना के नए स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी के साथ अब एक स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन भी जोड़ा गया है। इस इंटीग्रेशन को नौसेना की निगरानी और ऑपरेशन क्षमता में एक अहम बढ़त के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि यह शिप को डिस्ट्रिब्यूटेड आईएसआर नोड में बदल देता है, जिससे समुद्र और आसमान दोनों से एक साथ जानकारी जुटाना आसान हो जाता है।

आईएनएस तारागिरी भारतीय नौसेना का नया स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे 3 अप्रैल को विशाखापट्टनम में कमीशन किया गया था। यह प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनने वाले नीलगिरी क्लास के सात फ्रिगेट्स की सीरीज का चौथा जहाज है। इस जहाज को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में तैयार किया गया है।

करीब 6,670 टन वजन वाला यह जहाज मल्टी-रोल कैपेबिलिटी के साथ आता है। इसमें एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन करने की क्षमता है। स्टेल्थ डिजाइन की वजह से यह दुश्मन के रडार से आसानी से बच सकता है। इसके साथ ही इसमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, एडवांस्ड रडार और सोनार सिस्टम जैसे आधुनिक उपकरण लगे हैं। (INS Taragiri spotter drone integration)

INS Taragiri spotter drone integration: क्या है मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन

आईएनएस तारागिरी के साथ जिस मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन को जोड़ा गया है, वह पुणे की कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। यह एक मल्टी-कॉप्टर यूएवी है, जिसे खास तौर पर समुद्र में इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है।

इसका डिजाइन ऐसा बनाया गया है कि अगर इसमें कोई खराबी आती है, तो इसके पार्ट्स जल्दी बदले जा सकते हैं। इसमें कार्बन फाइबर और हल्की धातु का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह मजबूत के साथ हल्का भी रहता है।

इस ड्रोन की सबसे खास बात यह है कि यह चलते हुए जहाज से भी उड़ान भर सकता है और उसी पर वापस उतर सकता है। आम तौर पर ड्रोन को स्थिर प्लेटफॉर्म की जरूरत होती है, लेकिन यह सिस्टम समुद्र में 20 नॉट्स की स्पीड पर चलते जहाज पर भी काम कर सकता है।

यह ड्रोन लगभग 72 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है। तेज हवा में भी काम करने के लिए इसे मजबूत बनाया गया है और यह लगभग 16 मीटर प्रति सेकंड की हवा को झेल सकता है, जो समुद्र के हालात के हिसाब से जरूरी है।

यह ड्रोन रियल टाइम वीडियो और तस्वीरें भेज सकता है, जिससे दूर तक निगरानी करना आसान हो जाता है। इसकी रेंज करीब 20 किलोमीटर तक है और यह एक बार में करीब एक घंटे तक उड़ान भर सकता है। यह स्पॉटर 90 से 120 मिनट तक काम कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना ने इस ड्रोन की अहमियत को देखते हुए 2021 में करीब 30 यूनिट्स का ऑर्डर दिया था और बाद में 60 और ड्रोन मंगाए। इस तरह की तकनीक दुनिया में बहुत कम कंपनियों के पास है और सागर डिफेंस भी उनमें शामिल है। (INS Taragiri spotter drone integration)

कैसे काम करता है यह सिस्टम

आईएनएस तारागिरी और स्पॉटर ड्रोन का यह संयोजन एक तरह से समुद्र और आसमान के बीच तालमेल बनाता है। जहाज के अपने रडार और सेंसर की एक सीमा होती है, लेकिन ड्रोन उस सीमा से आगे जाकर निगरानी कर सकता है।

इसमें एडवांस कैमरे इलेक्ट्रो-ऑप्टिक कैमरा और थर्मल इमेजर लगे होते हैं। इनकी मदद से यह दिन और रात दोनों समय टारगेट को देख सकता है। यह लाइव वीडियो भेज सकता है, तस्वीरें ले सकता है और आसपास की पूरी स्थिति की जानकारी देता है। कुछ वेरिएंट में जहाजों की पहचान करने वाला सिस्टम भी लगाया गया है।

ड्रोन से मिलने वाला यह डेटा सीधे जहाज तक पहुंचता है, जिससे आसपास की स्थिति की बेहतर समझ बनती है। इससे ऑपरेशन के दौरान फैसले लेने में मदद मिलती है और जहाज की पहुंच भी बढ़ जाती है।

यह ड्रोन पूरी तरह ऑटोमेटेड तरीके से काम कर सकता है। यानी यह खुद ही उड़ान भर सकता है, मिशन पूरा कर सकता है और वापस जहाज पर उतर सकता है। इसमें जियोफेंसिंग और फॉलो-मी जैसे फीचर्स भी होते हैं, जिससे इसे अलग-अलग कामों में इस्तेमाल करना आसान हो जाता है।

इसे जहाज के कंट्रोल सिस्टम से चलाया जा सकता है। इसके अलावा मार्कोस कमांडोज इसे हेंड हील्ड डिवाइस से भी ऑपरेट कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इसका कंट्रोल एक जहाज से दूसरे जहाज को भी दिया जा सकता है। इसमें एंटी-जैमिंग तकनीक भी होती है, जिससे दुश्मन इसके सिग्नल को बाधित नहीं कर पाता।

ऑपरेशन में क्या फायदा

इस सिस्टम के जरिए समुद्र में लगातार निगरानी रखना आसान हो जाता है। जहाज को हर समय अपने आसपास की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। इससे संदिग्ध जहाजों, तस्करी या अन्य गतिविधियों पर नजर रखना संभव होता है।

ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर ऐसे इलाकों में उपयोगी होता है, जहां समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा होता है और हर जगह एक साथ नजर रखना चुनौतीपूर्ण होता है। इस तरह का सिस्टम एक जहाज को ज्यादा इलाके को कवर करने में सक्षम बनाता है।

यह ड्रोन जहाज के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करता है। इसका मतलब है कि जहाज की ताकत और निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। जहाज के रडार की जो सीमा होती है, यह ड्रोन उससे आगे जाकर जानकारी देता है, जिससे लगातार निगरानी संभव होती है। (INS Taragiri spotter drone integration)

पहले भी हुआ इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल मार्च 2024 में पहले भी नौसेना के ऑपरेशन में किया जा चुका है। सोमाली पाइरेट्स को रोकने के लिए एंटी-पाइरेसी मिशन के दौरान इन ड्रोन ने आईएनएस कोलकाता को रियल टाइम जानकारी देने में अहम भूमिका निभाई थी। इससे मार्कोस को स्थिति समझने और कार्रवाई करने में आसानी हुई थी। हालांकि पाइरेट्स ने ड्रोन पर फायरिंग भी की थी, बावजूद इसके ड्रोन काम करता रहा।

आईएनएस तारागिरी और स्पॉटर ड्रोन दोनों ही स्वदेशी तकनीक पर आधारित हैं। जहाज के निर्माण में बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियों का योगदान रहा है, वहीं ड्रोन भी देश में ही डिजाइन और विकसित किया गया है। (INS Taragiri spotter drone integration)

30 दिन की छूट में भारत ने खरीदा ईरानी तेल, डॉलर नहीं युआन में किया भुगतान

India Iranian oil yuan payment
AI-Generated Image

India Iranian oil yuan payment: भारत की तेल रिफाइनरी कंपनियों ने हाल ही में ईरान से कच्चा तेल खरीदा और इसके लिए भुगतान अमेरिकी डॉलर की बजाय चीनी मुद्रा युआन में किया गया। यह खरीद तब हुई, जब अमेरिका ने कुछ समय के लिए अपने प्रतिबंधों में ढील दी थी। इस सीमित अवधि का इस्तेमाल करते हुए भारतीय कंपनियों ने तेल की सप्लाई सुनिश्चित करने की कोशिश की।

अमेरिका ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की कीमतों में तेजी को देखते हुए कुछ समय के लिए प्रतिबंधों में राहत दी थी। यह राहत लगभग 30 दिन की थी और इसका उद्देश्य बाजार में सप्लाई को बनाए रखना था। इसी दौरान भारत की सरकारी और निजी रिफाइनरी कंपनियों ने ईरान और रूस से तेल खरीदने का फैसला किया।

India Iranian oil yuan payment: डॉलर की जगह युआन में भुगतान

आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल होता है, लेकिन ईरान पर लगे प्रतिबंधों के चलते यह संभव नहीं था। ऐसे में ईरान ने भुगतान के लिए चीनी युआन को प्राथमिकता दी। इसी वजह से भारतीय कंपनियों को भी भुगतान का तरीका बदलना पड़ा।

इस प्रक्रिया में आईसीआईसीआई बैंक की शंघाई शाखा का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए युआन में पैसे ट्रांसफर किए गए। यह तरीका इसलिए चुना गया क्योंकि चीन में बैंकिंग चैनल के जरिए यह लेन-देन करना आसान था।

सूत्रों के मुताबिक, देश की सबसे बड़ी रिफाइनरी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने करीब 20 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल खरीदा। इसके अलावा निजी क्षेत्र की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी कुछ खेप मंगाई। यह पिछले कई सालों में पहली बार है जब भारत ने ईरान से फिर से तेल खरीदा है।

लेकिन इस बार भुगतान का तरीका भी सामान्य से अलग रहा। बताया जा रहा है कि तेल की कीमत का बड़ा हिस्सा उस समय ही चुका दिया गया जब तेल लेकर जहाज भारतीय समुद्री क्षेत्र में पहुंचा। आम तौर पर भुगतान डिलीवरी के बाद किया जाता है, लेकिन इस बार शर्तें अलग थीं।

पहले भी बदला है भुगतान का तरीका

हालांकि भारत पहले भी प्रतिबंधों के चलते भुगतान के अलग-अलग तरीके अपनाता रहा है। रूस से तेल खरीद के दौरान रुपये और यूएई दिरहम का इस्तेमाल किया गया था। कुछ मामलों में युआन में भी भुगतान किया गया था।

हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि जब डॉलर में भुगतान करना मुश्किल होता है, तब कंपनियां वैकल्पिक मुद्राओं का इस्तेमाल करती हैं। इसका मकसद सप्लाई को बनाए रखना होता है।

ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इन प्रतिबंधों के कारण उसे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम तक सीधी पहुंच नहीं मिलती। इसी वजह से वह तेल बेचने के लिए युआन में भुगतान या अन्य देशों के जरिए व्यापार जैसे वैकल्पिक रास्ते अपनाता है, ।

2019 के बाद भारत ने ईरान से तेल खरीद लगभग बंद कर दी थी। उस समय अमेरिका का दबाव काफी ज्यादा था और भारतीय कंपनियों को खरीद रोकनी पड़ी थी।

भारत की जरूरत और रणनीति

भारत दुनिया के बड़े तेल आयात करने वाले देशों में शामिल है और उसे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार कच्चे तेल की सप्लाई चाहिए होती है। ऐसे में जब भी अंतरराष्ट्रीय हालात बदलते हैं, कंपनियां उसी हिसाब से अपने विकल्प तलाशती हैं।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तेल मार्केटिंग कंपनियां घरेलू मांग को पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठा रही हैं और सभी फैसले सरकारी नियमों के तहत ही लिए जा रहे हैं।

समुद्र में पहले से मौजूद तेल का इस्तेमाल

इस बार जो तेल खरीदा गया, वह पहले से समुद्र में मौजूद था। यानी जहाजों में लदा हुआ तेल खरीदा गया, जिसे सीधे भारत लाया गया। इस तरह की खरीद को जल्दी सप्लाई सुनिश्चित करने का तरीका माना जाता है।

सूत्रों के मुताबिक, प्रतिबंधों में मिली इस अस्थायी छूट के खत्म होने से पहले और भी कुछ खेप आने की संभावना जताई गई थी, ताकि सप्लाई में कोई कमी न रहे।

पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ रहा है। कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग रास्ते अपना रहे हैं। भारत ने भी इसी रणनीति के तहत यह कदम उठाया, जिसमें भुगतान के लिए नई मुद्रा का इस्तेमाल किया गया। (India Iranian oil yuan payment)

सेना के अफसर ने बनाया खास स्वदेशी ‘हंस’ मिलिट्री पैराशूट सिस्टम, स्पेशल फोर्सेस के मिशन होंगे आसान

Indigenous Combat Free Fall Parachute System
India Develops Indigenous Combat Free Fall Parachute System ‘Hans’ for Special Forces Operations

Indigenous Combat Free Fall Parachute System: आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत भारतीय सेना के एक अधिकारी ने स्पेशल फोर्सेस के लिए पूरी तरह स्वदेशी कॉम्बैट फ्री फॉल पैराशूट सिस्टम तैयार किया है। इस सिस्टम को “हंस” नाम दिया गया है और इसे हाई एल्टीट्यूड यानी ऊंचाई से होने वाले गुप्त ऑपरेशनों के लिए डिजाइन किया गया है।

Indigenous Combat Free Fall Parachute System: क्या है कॉम्बैट फ्री फॉल सिस्टम

मिलिट्री ऑपरेशनों में पैराशूट का इस्तेमाल बहुत पुराना है, लेकिन आज भी इसकी अहमियत बनी हुई है। खास तौर पर स्पेशल फोर्सेस के जवानों को दुश्मन के इलाके में चुपचाप उतारने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।

अब तक सैनिकों को पैराशूट और अपने सामान के लिए अलग-अलग सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता था। इसके अलावा कई जरूरी उपकरणों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी रहती थी। इसी कमी को दूर करने के लिए नया सिस्टम तैयार किया गया है।

इस सिस्टम को भारतीय सेना के स्पेशल फोर्सेस अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल अनुज चंद्र श्रीवास्तव ने तैयार किया है। उन्हें डिफेंस इनोवेशन के क्षेत्र में एक खास पहचान मिली है।

उन्होंने पहले डीआरडीओ की लैब में भी काम किया है और स्वदेशी रिसर्च पर लगातार फोकस रखा है। उनके नाम कई पेटेंट भी दर्ज हैं। (Indigenous Combat Free Fall Parachute System)

‘हंस’ सिस्टम की खासियत

इस नए मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS) को एक इंटीग्रेटेड सिस्टम के तौर पर तैयार किया गया है। इसमें पैराशूट के साथ-साथ ऑपरेशन से जुड़े कई जरूरी उपकरण एक साथ शामिल किए गए हैं।

इस सिस्टम में हाई एल्टीट्यूड ऑपरेशन के लिए खास ऑक्सीजन सिस्टम, नेविगेशन सिस्टम और मल्टी लेयर कपड़े दिए गए हैं, जिससे जवान बेहद ठंड और मुश्किल हालात में भी काम कर सकें।

इसके अलावा इसमें बुलेटप्रूफ हेलमेट, प्रोटेक्टिव गॉगल्स और टैक्टिकल बैग भी शामिल हैं, जिससे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा और सुविधा दोनों मिलती हैं। (Indigenous Combat Free Fall Parachute System)

Indigenous Combat Free Fall Parachute System

अलग-अलग किट्स से लैस सिस्टम

इस पैराशूट सिस्टम में कई तरह की किट्स जोड़ी गई हैं। इसमें किट शशि नाम का हल्का बुलेटप्रूफ हेलमेट दिया गया है, जो कॉम्बैट फ्री फॉल ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है।

अदिति गॉगल्स जवानों की आंखों को सुरक्षित रखते हैं, जबकि पीबीओएस (पैराशूट ब्रीदिंग ऑक्सीजन सिस्टम) ऊंचाई पर सांस लेने में मदद करता है।

इसके साथ ही नाविक (NAVIC) आधारित नेविगेशन सिस्टम भी दिया गया है, जिससे जवान सही लोकेशन पर उतर सकें। इसके अलावा किट वार्तिका के जरिए जरूरी सामान को आसानी से साथ ले जाया जा सकता है। (Indigenous Combat Free Fall Parachute System)

200 से ज्यादा सफल परीक्षण

इस सिस्टम को तैयार करने के बाद इसके 200 से ज्यादा लाइव ट्रायल किए गए हैं। इन सभी परीक्षणों में यह सिस्टम सफल रहा है और जरूरी सर्टिफिकेशन भी हासिल कर चुका है।

इन ट्रायल्स के दौरान अलग-अलग हालात में इसकी जांच की गई, ताकि ऑपरेशन के दौरान किसी तरह की परेशानी न आए।

लेफ्टिनेंट कर्नल अनुज चंद्र श्रीवास्तव ने इस पैराशूट सिस्टम के अलावा उन्होंने कई अन्य उपकरण भी डेवलप किए हैं। इनमें किट आदी भी है, जो ऊंचाई का पता लगाने और सुरक्षित जंप में मदद करता है। (Indigenous Combat Free Fall Parachute System)

इसके साथ ही किट शाम्भवी भी तैयार किया गया है, जो आपदा राहत कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पुराने पैराशूट मटेरियल से बनाया गया है।

इस नए सिस्टम के आने से स्पेशल फोर्सेस के ऑपरेशन में आसानी होती है। अब जवानों को अलग-अलग उपकरणों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और सभी जरूरी चीजें एक ही सिस्टम में मिल जाएंगी।

इससे ऑपरेशन के दौरान तेजी और सटीकता दोनों में सुधार होता है, खासकर तब जब जवानों को दुश्मन के इलाके में गुपचुप तरीके से उतरना होता है। (Indigenous Combat Free Fall Parachute System)

हिंद महासागर में इंडियन नेवी की मैरीटाइम डिप्लोमेसी! MAHASAGAR विजन के तहत 9 साल में ट्रेन किए मॉरीशस के 516 कोस्ट गार्ड

India Mauritius Maritime Security
Stealth frigate INS Trikand of the Indian Navy called at Port Louis, Mauritius, during her operational deployment in the South-West Indian Ocean Region.

India Mauritius Maritime Security: हिंद महासागर क्षेत्र में भारत ने मैरीटाइम डिप्लोमेसी का बड़ा उदाहरण पेश किया है। महासागर (MAHASAGAR) विजन के तहत भारतीय नौसेना ने पिछले नौ सालों में मॉरीशस के नेशनल कोस्ट गार्ड के 516 कर्मियों को ट्रेनिंग दी है। यह सहयोग केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर मॉरीशस की ब्लू इकोनॉमी यानी समुद्री अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, जो वहां की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है।

India Mauritius Maritime Security: ब्लू इकोनॉमी क्यों है अहम

मॉरीशस जैसे द्वीपीय देश के लिए समुद्र ही सबसे बड़ा संसाधन है। यहां की अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सीधे ब्लू इकोनॉमी से आता है। मछली पकड़ने, समुद्री व्यापार और अन्य गतिविधियों से हजारों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है।

ऐसे में समुद्री इलाकों की सुरक्षा सिर्फ रणनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ मामला बन जाता है। अगर समुद्र सुरक्षित रहेगा, तभी वहां का व्यापार और रोजगार सुरक्षित रह पाएगा। (India Mauritius Maritime Security)

अलग-अलग चरणों में दी ट्रेनिंग

भारतीय नौसेना ने मॉरीशस के नेशनल कोस्ट गार्ड के 516 कर्मियों को अलग-अलग चरणों में ट्रेनिंग दी है। यह ट्रेनिंग पिछले नौ सालों में लगातार चलती रही है। इस ट्रेनिंग में केवल बुनियादी जानकारी ही नहीं, बल्कि ऑपरेशन से जुड़ी अहम स्किल्स भी सिखाई गईं। इसमें जहाज की निगरानी, फायर फाइटिंग यानी आग से निपटना और डैमेज कंट्रोल जैसी ट्रेनिंग शामिल रही।

इन स्किल्स का फायदा यह होता है कि कोस्ट गार्ड के जवान किसी भी आपात स्थिति में तेजी से और सही तरीके से कार्रवाई कर सकें। (India Mauritius Maritime Security)

INS त्रिकंड पहुंचा पोर्ट लुई

मार्च 2026 के दूसरे हफ्ते में भारतीय नौसेना का युद्धपोत आईएनएस त्रिकंड मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई पहुंचा। यह यात्रा केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि इसके दौरान समुद्र में ऑपरेशनल गतिविधियां और ट्रेनिंग भी हुई।

जहाज पर मौजूद भारतीय नौसैनिकों ने मॉरीशस के जवानों को कई अहम विषयों पर प्रशिक्षण दिया। इससे दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करने का काम हुआ।

आईएनएस त्रिकंड के पोर्ट लुई से रवाना होने के बाद मॉरीशस के जहाज सीजीएस वैलिएंट के साथ संयुक्त अभ्यास भी किया गया। इसे पासेज एक्सरसाइज कहा जाता है। (India Mauritius Maritime Security)

इसके साथ ही दोनों देशों ने मॉरीशस के समुद्री क्षेत्र यानी ईईजेड (एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन) में संयुक्त निगरानी भी की। यह निगरानी किसी औपचारिक गतिविधि से ज्यादा एक वास्तविक अभ्यास थी, जिससे समुद्र में सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।

मॉरीशस का समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा है। उसका ईईजेड करीब 23 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जो उसके जमीन के आकार से कई गुना ज्यादा है।

इतने बड़े क्षेत्र की निगरानी करना आसान नहीं है, खासकर तब जब संसाधन सीमित हों। ऐसे में टेक्नोलॉजी और ट्रेनिंग दोनों की जरूरत होती है, जिसमें भारत लगातार सहयोग कर रहा है। (India Mauritius Maritime Security)

भारत ने अहम उपकरण भी दिए

भारत ने केवल ट्रेनिंग ही नहीं दी, बल्कि मॉरीशस को कई अहम उपकरण भी उपलब्ध कराए हैं। इसमें इंटरसेप्टर बोट, डॉर्नियर एयरक्राफ्ट और कोस्टल सर्विलांस रडार सिस्टम शामिल हैं।

इन उपकरणों की मदद से समुद्र में निगरानी करना आसान हो जाता है। लेकिन इनका सही इस्तेमाल तभी संभव है, जब इन्हें चलाने वाले लोग पूरी तरह प्रशिक्षित हों। इसी कमी को दूर करने के लिए ट्रेनिंग पर खास जोर दिया गया।

भारत और मॉरीशस के बीच सहयोग केवल ट्रेनिंग और उपकरण तक सीमित नहीं है। साल 2024 में अगालेगा आइलैंड पर एयरस्ट्रिप और जेट्टी का निर्माण भी किया गया, जिससे दूरदराज के इलाकों में तेजी से पहुंचना संभव हो सका।

इसके अलावा भारत ने मॉरीशस के समुद्री नक्शों को बेहतर बनाने के लिए हाइड्रोग्राफिक सर्वे में भी मदद की है। इससे जहाजों की आवाजाही और समुद्री संसाधनों के प्रबंधन में सुधार हुआ है। (India Mauritius Maritime Security)

हिंद महासागर क्षेत्र में बेहतर निगरानी के लिए भारत का इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर भी अहम भूमिका निभा रहा है। इसके जरिए अलग-अलग देशों के बीच समुद्री जानकारी साझा की जाती है।

इस तरह की व्यवस्था से किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखना आसान हो जाता है और समय रहते कार्रवाई की जा सकती है।

भारत और मॉरीशस के बीच यह सहयोग केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें कूटनीतिक, आर्थिक और मानवीय पहलू भी शामिल हैं।

चक्रवात जैसे प्राकृतिक संकट के समय भारत ने तेजी से मदद पहुंचाई है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दोनों देशों के बीच सहयोग देखने को मिलता है। (India Mauritius Maritime Security)

नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में बोले नेवी चीफ- कॉम्बैट रेडीनेस और टेक्नोलॉजी से बदलेगी नौसेना

Naval Commanders Conference 2026
INMSS 2026 Release. (Photo: Indian Navy)

Naval Commanders Conference 2026: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने स्पष्ट कहा है कि मौजूदा सुरक्षा माहौल में कॉम्बैट रेडीनेस यानी युद्ध के लिए तैयारी को लगातार मजबूत रखना बेहद जरूरी है। भारतीय नौसेना की अहम नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 में बोलते हुए उन्होंने नई और उभरती टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाने पर जोर दिया, ताकि नौसेना को एक फ्यूचर रेडी फोर्स के रूप में तैयार किया जा सके।

चार दिन तक चली भारतीय नौसेना की अहम नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस शुक्रवार को खत्म हो गई। यह कॉन्फ्रेंस 14 से 17 अप्रैल तक नई दिल्ली में आयोजित की गई थी, जिसमें नौसेना के शीर्ष कमांडर्स और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इस दौरान नौसेना की ऑपरेशनल तैयारी, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

Naval Commanders Conference 2026: बदलते समुद्री हालात पर फोकस

कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा का माहौल पहले से ज्यादा जटिल हो गया है। एक साथ कई क्षेत्रों में तनाव, नियम आधारित व्यवस्था में कमजोरी और नॉन-स्टेट एक्टर्स के बढ़ते खतरे ने समुद्र को ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

उन्होंने बताया कि अब नौसेना को हर समय तैयार रहना होगा, क्योंकि समुद्री क्षेत्र में हालात तेजी से बदल रहे हैं और हर दिन नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। (Naval Commanders Conference 2026)

कॉम्बैट रेडीनेस और टेक्नोलॉजी पर जोर

नौसेना प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि कॉम्बैट रेडीनेस यानी युद्ध के लिए तैयारी को लगातार मजबूत रखना जरूरी है। इसके साथ ही नई और उभरती टेक्नोलॉजी को अपनाने पर भी ध्यान देना होगा, ताकि नौसेना को फ्यूचर रेडी फोर्स बनाया जा सके।

कॉन्फ्रेंस में यह भी चर्चा हुई कि ऑपरेशन के दौरान बेहतर नतीजे पाने के लिए आधुनिक सिस्टम, नेटवर्किंग और बेहतर कम्युनिकेशन का इस्तेमाल जरूरी है।

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका पर जोर

बैठक के दौरान इंडियन ओशन रीजन (IOR) में भारत की भूमिका पर भी जोर दिया गया। नौसेना प्रमुख ने कहा कि इस क्षेत्र में भारत की जिम्मेदारी अहम है और इसे निभाने के लिए लगातार सक्रिय रहना जरूरी है।

इसके लिए फ्रेंडली फॉरेन कंट्रीज के साथ मिलकर मल्टीलेटरल और बाइलेटरल एक्सरसाइज में भाग लेने और तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया गया, ताकि समुद्री सुरक्षा मजबूत बनी रहे। (Naval Commanders Conference 2026)

वेस्ट एशिया के हालात का असर

कॉन्फ्रेंस में वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष का भी जिक्र हुआ। अधिकारियों ने कहा कि इस क्षेत्र में तनाव का असर समुद्री रास्तों और व्यापार पर पड़ रहा है।

इसी वजह से नौसेना की तैनाती और ऑपरेशनल एक्टिविटी में भी बढ़ोतरी देखी गई है। समुद्री रास्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस समय एक अहम जिम्मेदारी बन गया है।

ऑपरेशनल और लॉजिस्टिक्स तैयारियों की समीक्षा

चार दिन चली इस बैठक में नौसेना की ऑपरेशनल तैयारी के साथ-साथ मैटेरियल रेडीनेस, इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स और ह्यूमन रिसोर्स से जुड़े मुद्दों की भी समीक्षा की गई।

इस दौरान यह देखा गया कि किस तरह से अलग-अलग यूनिट्स बेहतर तरीके से काम कर रही हैं और किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है। (Naval Commanders Conference 2026)

नई मैरिटाइम सिक्योरिटी स्ट्रेटजी जारी

कॉन्फ्रेंस के दौरान नौसेना प्रमुख ने इंडियन नेवी मैरिटाइम सिक्योरिटी स्ट्रेटजी (INMSS 2026) भी जारी की। इस डॉक्यूमेंट में आने वाले समय के लिए समुद्री सुरक्षा की रणनीति को विस्तार से बताया गया है।

इसमें बदलते भू-राजनीतिक हालात, नई टेक्नोलॉजी, रक्षा सुधार और युद्ध के बदलते तरीके को ध्यान में रखते हुए योजना तैयार की गई है।

कॉन्फ्रेंस में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और होम सेक्रेटरी भी शामिल हुए। सीडीएस ने बदलते वैश्विक हालात और युद्ध के नए स्वरूप पर बात करते हुए नौसेना को तैयार रहने की सलाह दी। वहीं होम सेक्रेटरी ने तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए नौसेना और पैरामिलिट्री फोर्स के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई। उन्होंने ट्रांसनेशनल क्राइम और अवैध गतिविधियों से निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों पर जोर दिया। (Naval Commanders Conference 2026)

‘सागर मंथन’ में इंडस्ट्री की भूमिका पर चर्चा

कॉन्फ्रेंस के दौरान एक खास सत्र ‘सागर मंथन’ भी आयोजित किया गया। इसमें नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों के बीच रक्षा अनुसंधान और क्षमता विकास पर चर्चा हुई। जिसमें रक्षा क्षेत्र में इंडस्ट्री की भागीदारी बढ़ाने से नई टेक्नोलॉजी और बेहतर सिस्टम विकसित करने पर जोर दिया गया। (Naval Commanders Conference 2026)

आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में नेटवर्किंग और टेक्नोलॉजी पर बड़ा फोकस, अब डेटा से जीता जाएगा युद्ध!

Army Commanders Conference 2026
Photo: Indian Army

Army Commanders Conference 2026: भारतीय सेना की अहम आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस चार दिन की चर्चा के बाद शुक्रवार को खत्म हो गई। इस बैठक में सेना के शीर्ष अधिकारी, सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधि और सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर विचार किया गया। इस कॉन्फ्रेंस की अध्यक्षता आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने की।

इस बार कॉन्फ्रेंस का फोकस बदलते युद्ध के तरीके, नई टेक्नोलॉजी और सेना को ज्यादा आधुनिक बनाने पर रहा। सेना ने साल 2026 को “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिसिटी” का वर्ष भी घोषित किया है।

Army Commanders Conference 2026: बदलते युद्ध पर हुई चर्चा

कॉन्फ्रेंस में यह बात सामने आई कि अब युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। पहले जहां केवल हथियार और सैनिक अहम होते थे, अब डेटा, कम्युनिकेशन और टेक्नोलॉजी की भूमिका बहुत बढ़ गई है।

आज के समय में युद्ध केवल मैदान में नहीं, बल्कि साइबर, स्पेस और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए भी लड़ा जा रहा है। ऐसे में सेना को हर मोर्चे पर तैयार रहने की जरूरत है।

ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

इस बैठक में ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इस ऑपरेशन के दौरान तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल को अहम माना गया। खास तौर पर ड्रोन यानी अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) और उन्हें रोकने वाले सिस्टम काउंटर-यूएएस (सी-यूएएस) की भूमिका पर जोर दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि अब ड्रोन युद्ध का एक जरूरी हिस्सा बन चुके हैं, इसलिए इनके इस्तेमाल और उनसे बचाव दोनों पर ध्यान देना जरूरी है। (Army Commanders Conference 2026)

टेक्नोलॉजी और मॉर्डनाइजेशन पर फोकस

कॉन्फ्रेंस में सेना को आधुनिक बनाने के लिए नई टेक्नोलॉजी को अपनाने पर जोर दिया गया। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और नेटवर्क आधारित सिस्टम को शामिल करने की बात कही गई। सेना अब ऐसी व्यवस्था पर काम कर रही है, जहां अलग-अलग यूनिट्स के बीच रियल टाइम में जानकारी साझा हो सके। इससे ऑपरेशन के दौरान फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे और समन्वय बेहतर होगा। (Army Commanders Conference 2026)

“नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिसिटी” क्यों अहम

सेना ने 2026 को “नेटवर्किंग और डेटा सेंट्रिसिटी” का वर्ष घोषित किया है। इसका मतलब है कि अब ऑपरेशन में डेटा और कम्युनिकेशन सिस्टम को केंद्र में रखा जाएगा। इससे अलग-अलग मोर्चों पर तैनात यूनिट्स एक साथ जुड़ी रहेंगी और किसी भी स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। इससे सेना की ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

कॉन्फ्रेंस में दुनिया के बदलते हालात पर भी चर्चा हुई। अधिकारियों ने बताया कि अलग-अलग देशों में चल रहे संघर्षों से यह साफ है कि सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। इस दौरान यह भी कहा गया कि अब केवल सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि आर्थिक और तकनीकी ताकत भी उतनी ही जरूरी हो गई है। इसलिए सभी क्षेत्रों में तैयारी रखना जरूरी है।

बैठक में यह भी सामने आया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाना जरूरी है। हाल के समय में सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए देश के अंदर ही ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करने पर जोर दिया गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि अगर जरूरी सैन्य उपकरण देश में ही बनेंगे, तो किसी भी संकट के समय सेना को परेशानी नहीं होगी। इसके लिए रक्षा उत्पादन को तेज करने की जरूरत बताई गई।

कॉन्फ्रेंस में सिविल और मिलिट्री संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर भी जोर दिया गया। इसमें अलग-अलग मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने की बात कही गई। अधिकारियों ने बताया कि आज के समय में सुरक्षा से जुड़े मुद्दे जटिल हो गए हैं, इसलिए पूरे देश के स्तर पर मिलकर काम करना जरूरी है। (Army Commanders Conference 2026)

किन-किन मुद्दों पर हुई चर्चा

चार दिन चली इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर विचार हुआ। इसमें सेना की तैयारी, ट्रेनिंग, नई रणनीति, मेंटेनेंस, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी विकास जैसे विषय शामिल रहे। इसके अलावा जॉइंटनेस यानी तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

इस कॉन्फ्रेंस में केवल सेना के अधिकारी ही नहीं, बल्कि सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। इसमें कैबिनेट सेक्रेटरी, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, डिफेंस सेक्रेटरी और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन जैसे लोग मौजूद रहे। नौसेना प्रमुख ने भी इस बैठक में हिस्सा लिया और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार रखे। (Army Commanders Conference 2026)