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IFR-Milan 2026: विशाखापत्तनम में खुला मिलन विलेज, 70 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं हो रहीं शामिल

IFR-Milan 2026

IFR-Milan 2026: विशाखापत्तनम इन दिनों अंतरराष्ट्रीय समुद्री गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। दुनिया की कई नौसेनाएं यहां एक साथ जुटी हैं, क्योंकि भारतीय नौसेना का प्रमुख बहुपक्षीय अभ्यास मिलन 2026 शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में 15 फरवरी को ईस्टर्न नेवल कमांड परिसर में “मिलन विलेज” का उद्घाटन किया गया। यह जगह खास तौर पर अलग-अलग देशों से आए नौसैनिकों और मेहमानों के लिए बनाई गई है, ताकि वे एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जान सकें।

इस कार्यक्रम का उद्घाटन वाइस एडमिरल संजय भल्ला ने किया। उन्होंने गांव जैसी इस खास व्यवस्था का दौरा किया और विदेशी नौसैनिकों से बातचीत भी की। मिलन विलेज को इस तरह तैयार किया गया है कि यहां 70 से अधिक देशों से आए प्रतिनिधि और नौसैनिक एक दोस्ताना माहौल में एक-दूसरे से जुड़ सकें।

इस विलेज की सबसे बड़ी खासियत इसका सांस्कृतिक स्वरूप है। यहां भारत की विविध परंपराओं और विरासत की झलक देखने को मिल रही है। लाइव सिंगिंग परफॉर्मेंस, पारंपरिक लोक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं। इन कार्यक्रमों के जरिए विदेशी मेहमानों को भारत की कला और संस्कृति से रूबरू कराया जा रहा है।

मिलन विलेज में नौसेना से जुड़े स्मृति चिन्हों के स्टॉल भी लगाए गए हैं। इसके अलावा देशभर के हस्तशिल्प और हैंडलूम उत्पाद यहां प्रदर्शित किए गए हैं। आगंतुकों के लिए अलग-अलग राज्यों के स्वादिष्ट भारतीय व्यंजन भी उपलब्ध हैं, जिससे उन्हें भारत के विविध स्वाद का अनुभव हो सके।

वाइस एडमिरल संजय भल्ला ने अपने संबोधन में कहा कि मिलन विलेज भाईचारे और सांस्कृतिक जुड़ाव की भावना को दर्शाता है, जो प्रोफेशनल नेवल कोआपरेशन को और मजबूत करता है। उन्होंने यह भी बताया कि विशाखापत्तनम में एक के बाद एक इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, मिलन 2026 और इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) जैसे आयोजन होना भारत की समुद्री पहुंच और सहयोग की बड़ी मिसाल है।

यह विलेज केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि आपसी भरोसा और दोस्ती बढ़ाने का माध्यम है। जब अलग-अलग देशों के सैनिक साथ बैठते हैं, बात करते हैं और एक-दूसरे की संस्कृति को समझते हैं, तो भविष्य में साथ काम करना और आसान हो जाता है।

मिलन 2026 का आयोजन 15 से 25 फरवरी तक चलेगा। इस दौरान समुद्र में भी संयुक्त अभ्यास होंगे, जिनमें पनडुब्बी रोधी अभ्यास, हवाई सुरक्षा, खोज और बचाव अभियान जैसे कई ऑपरेशन शामिल हैं।

‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ से ग्लोबल डिप्लोमैट तक, कैसे IFR-Milan 2026 से भारतीय नौसेना लिख रही है मैरीटाइम डिप्लोमेसी की नई कहानी

IFR-MILAN 2026 Indian Navy

IFR-Milan 2026: हिंद महासागर में जब कोई जहाज मुसीबत में फंसता है, तो कई बार सबसे पहले जो नाम याद आता है, वह है भारतीय नौसेना। बीते कुछ सालों में समुद्र में हुई कई घटनाओं ने यह साबित किया है कि अब भारतीय नौसेना केवल अपने तटों की सुरक्षा नहीं करती बल्कि वह समुद्री कूटनीति यानी मैरिटाइम डिप्लोमेसी का वैश्विक साझेदार भी बन चुकी है।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 और एक्सरसाइज मिलन इसी बदलती सोच की झलक हैं। इंडियन नेवी आज “फर्स्ट रिस्पॉन्डर” यानी संकट के समय सबसे पहले पहुंचने वाली ताकत भी है और “लास्टिंग एलाय” यानी भरोसेमंद साझेदार भी। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026: कैसे भारत ने मैरिटाइम डिप्लोमेसी को किया मजबूत

जनवरी 2025 में अंडमान सागर में जब एक मलेशियाई झंडे वाला सेलिंग वेसल, जिस पर चीनी क्रू सवार था, उसका ईंधन खत्म हो गया। इस संकट की घड़ी में भारतीय नौसेना सहारा बनी और अपने वॉरशिप आईएनएस किर्च के जरिए मुश्किल हालात में करीब 1,000 लीटर फ्यूल ट्रांसफर किया, ताकि वह जहाज सुरक्षित बंदरगाह तक पहुंच सके।

लेकिन यह केवल एक लॉजिस्टिक ऑपरेशन नहीं था, बल्कि मैरीटाइम डिप्लोमेसी का एक बड़ा उदाहरण था। जून 2025 में केरल तट के पास एमवी वान हाई 503 नामक जहाज में आग लग गई। हालात बेहद मुश्किल थे। आईएनएस गरुड़ से सीकिंग हेलीकॉप्टर ने रेस्क्यू टीम को सीधे जलते जहाज पर उतारा। बाद में चीन के दूतावास के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर इंडियन नेवी और मुंबई कोस्ट गार्ड का सार्वजनिक तौर पर धन्यवाद किया। (IFR-Milan 2026)

चक्रवात दित्वाह में भारत बना श्रीलंका का पहला सहारा

भारत की मैरीटाइम डिप्लोमेसी का एक शानदार उदाहरण पिछले साल नवंबर में देखने को मिला। नवंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में हिंद महासागर में एक शक्तिशाली तूफान धीरे-धीरे श्रीलंका की ओर बढ़ रहा था। 27 से 29 नवंबर के बीच इस चक्रवात दित्वाह ने श्रीलंका में लैंडफॉल किया। कुछ ही घंटों में तेज हवाओं, मूसलाधार बारिश और समुद्री लहरों ने हालात बिगाड़ दिए। इससे 600 से अधिक मौतें हुईं, हजारों लोग बेघर हुए, और सड़कें, पुल तथा अन्य कनेक्टिविटी पूरी तरह प्रभावित हो गई। श्रीलंका सरकार ने तत्काल मदद की अपील की, और भारत ने फर्स्ट रिस्पॉन्डर के तौर पर तुरंत कार्रवाई की।

भारतीय नौसेना ने तुरंत ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया। चक्रवात के लैंडफॉल के दिन ही भारतीय नौसेना के दो जहाज आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरी जो उस दिन श्रीलंका नेवी के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के चलते कोलंबो में मौजूद थे। इन जहाजों को तुरंत राहत कार्य के लिए टास्क किया गया। 28 नवंबर को ही 9.5 टन इमरजेंसी ड्राई रेशन श्रीलंकाई अधिकारियों को सौंपा गया। विक्रांत ने अपने हेलीकॉप्टर और संसाधनों से शुरुआती बचाव और सप्लाई में मदद की। (IFR–Milan 2026)

इसके बाद भारतीय सेना ने अतिरिक्त जहाजों की तैनाती करते हुए आईएनएस सुकन्या और आईएनएस घड़ियाल के साथ तीन लैंडिंग क्राफ्ट यूटिलिटी को तैनात किया गया। ये तमिलनाडु से 1,000 टन से अधिक राहत सामग्री लेकर कोलंबो और त्रिंकोमाली पहुंचे। इस दौरान नौसेना के जहाजों ने 1,000 टन से ज्यादा राहत सामग्री (ड्राई रेशन्स, टेंट, टार्पॉलिन, हाइजीन किट्स, कपड़े, वॉटर प्यूरीफिकेशन किट्स, दवाइयां, सर्जिकल इक्विपमेंट और स्पेशलाइज्ड इक्विपमेंट) पहुंचाई। इसके बाद श्रीलंका नेवी ने इस साल जनवरी में आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरी समेत 8 जहाजों को सम्मानित किया, क्योंकि वे सबसे पहले राहत में शामिल हुए थे। (IFR–Milan 2026)

IFC-IOR जो कभी सोता नहीं

गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर– इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) इस नई समुद्री सोच का केंद्र है। दिसंबर 2018 में स्थापित यह सेंटर हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है। यहां 15 से अधिक देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर तैनात हैं। 57 से ज्यादा मैरिटाइम सिक्योरिटी कंस्ट्रक्ट और 25 पार्टनर देश इसके साथ जुड़े हैं।

इसका काम है समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना, संदिग्ध मूवमेंट की जानकारी साझा करना और संकट के समय तुरंत प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना। यही वजह है कि हिंद महासागर में कोई भी डिस्ट्रेस सिग्नल अनसुना नहीं रहता और यह सिर्फ एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझा जवाबदेही है। भारतीय नौसेना खुद को एक “कोलैबोरेटिव हब” के तौर पर में स्थापित कर चुकी है। (IFR–Milan 2026)

‘सागर’ विजन से ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ तक

2016 के बाद से भारत की समुद्री कूटनीति का आधार रहा है सागर विजन (सिक्युरिटी एंड ग्रोथ फोर ऑल इन द रीजन)। इसका मकसद है क्षेत्र में सभी देशों की सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करना।

मालदीव के जल संकट में राहत पहुंचाना हो, श्रीलंका में चक्रवात के बाद ऑपरेशन सागर बंधु चलाना हो या मोजाम्बिक को फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट देना, भारत ने बार-बार साबित किया है कि वह संकट की घड़ी में सबसे पहले पहुंचने वाला देश है। वियतनाम को आईएनएस किर्पान उपहार में देना सिर्फ सैन्य मदद नहीं, बल्कि रणनीतिक भरोसे का प्रतीक था। (IFR–Milan 2026)

सागर से महासागर विजन तक

MAHASAGAR यानी म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन भारत की मैरीटाइम डिप्लोमेसी का नया और बड़ा विजन है। जिसका एलान पीएम नरेंद्र मोदी ने 12 मार्च 2025 को मॉरीशस की यात्रा के दौरान किया था। खास बात यह है कि इसी जगह पर 2015 में उन्होंने SAGAR विजन की शुरुआत की थी।

जहां सागर का फोकस मुख्य रूप से हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और सहयोग पर था। लेकिन बदलते वैशिक हालात को देखते हुए भारत ने इसे और व्यापक रूप दिया, जिसे महासागर कहा गया। इसका उद्देश्य सिर्फ समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास, तकनीकी सहयोग और पर्यावरणीय संतुलन को भी साथ लेकर चलना है।

प्रधानमंत्री ने इसे “ग्लोबल साउथ” यानी एशिया, अफ्रीका, कैरेबियन और पैसिफिक के विकासशील देशों के लिए एक विजन बताया। इसके तहत भारत इन देशों के साथ व्यापार बढ़ाने, क्षमता निर्माण, सस्ती ऋण सुविधा, अनुदान और तकनीकी सहायता देने पर जोर देगा। साथ ही समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, समुद्री निगरानी और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ेगा। (IFR–Milan 2026)

मॉरीशस के साथ समझौते में ईईजेड सुरक्षा, पुलिस अकादमी और मैरिटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर जैसे कदम शामिल रहे। यह दिखाता है कि भारत सिर्फ सुरक्षा साझेदार नहीं, बल्कि विकास सहयोगी भी बनना चाहता है। (IFR–Milan 2026)

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026: केवल परेड नहीं, बल्कि ताकत का संदेश

अक्सर लोग फ्लीट रिव्यू को सिर्फ जहाजों की परेड समझ लेते हैं। लेकिन यह मैरीटाइम डिप्लोमेसी का बड़ा प्लेटफॉर्म है। भारत का पहला प्रेसिडेंशियल फ्लीट रिव्यू 1953 में हुआ था, जब राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 33 जहाजों का निरीक्षण किया। उस समय भारतीय नाविक पहली बार अपने राष्ट्राध्यक्ष को सलामी दे रहे थे। आज यह सफर आज दर्जनों देशों की भागीदारी तक पहुंच चुका है।

2001 में मुंबई में पहला इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू हुआ, जिसमें 20 विदेशी नौसेनाएं शामिल हुईं। 2016 में विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर में लगभग 50 देशों की भागीदारी रही और करीब 100 जहाज शामिल हुए। यह संकेत था कि भारत अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। (IFR–Milan 2026)

वहीं आईएफआर 2026 इसी परंपरा को आगे बढ़ाएगा। 15 से 25 फरवरी तक विशाखापत्तनम एक ऐतिहासिक समुद्री आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है। इस दौरान यहां तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम एक साथ आयोजित हो रहे हैं, जिनमें इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, एक्सरसाइज मिलन 2026 और इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) के नौसेना प्रमुखों का 9वां सम्मेलन है। इन तीनों आयोजनों को मिलाकर “मैरीटाइम कन्वर्जेंस 2026” या “विजाग ट्रिफेक्टा” कहा जा रहा है। यह भारतीय नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी समुद्री कूटनीतिक पहल मानी जा रही है। (IFR–Milan 2026)

यह पूरा आयोजन भारत के महासागर विजन के तहत किया जा रहा है। “यूनाइटेड थ्रू ओशन्स” थीम के तहत दुनिया की नौसेनाएं एक मंच पर आ रही हैं, जहां सुरक्षा, सहयोग, क्षमता निर्माण और टिकाऊ विकास पर चर्चा और अभ्यास होंगे। कुल 72 देशों की भागीदारी तय हुई है। 71 युद्धपोतों की मौजूदगी के साथ यह आयोजन वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका को दिखाएगा। अमेरिका, रूस, जापान, जर्मनी, फिलीपींस, यूएई, ईरान, दक्षिण अफ्रीका, घाना, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका जैसे देशों के जहाज इसमें शामिल हो रहे हैं। पहली बार जर्मनी, फिलीपींस और यूएई के युद्धपोत भी भाग ले रहे हैं। (IFR–Milan 2026)

इन आयोजनों में सबसे प्रमुख है 18 फरवरी को होने वाला इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू। इस दिन तीनों सेनाओं की कमांडर इन चीफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समुद्र में खड़े जहाजों की समीक्षा करेंगी। वे आईएनएस सुमेधा पर सवार होकर प्रेसीडेंशियल याच्ट के रूप में फ्लीट का निरीक्षण करेंगी। कुल 71 जहाज छह कतारों में खड़े होंगे। इनमें आईएनएस विक्रांत जैसे स्वदेशी विमानवाहक पोत, विशाखापत्तनम श्रेणी के डेस्ट्रॉयर, नीलगिरि श्रेणी के स्टेल्थ फ्रिगेट और अरनाला श्रेणी के एंटी सबमरीन वॉरशिप शामिल रहेंगे। (IFR–Milan 2026)

एक्सरसाइज मिलन 2026: दुनिया की नौसेनाओं का महासागर में संगम

विशाखापत्तनम में ही 19 फरवरी को भारतीय नौसेना का प्रमुख मल्टीलेटरल नौसैनिक अभ्यास एक्सरसाइज मिलन 2026 का आयोजन होगा। यह मिलन का 13वां संस्करण है और 1995 से हर दो साल में आयोजित होता रहा है। इस बार यह आयोजन इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 और इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) के साथ होगा। तीनों कार्यक्रम मिलकर “मैरिटाइम कन्वर्जेंस 2026” का रूप ले रहे हैं। (IFR–Milan 2026)

इस बार इसकी थीम है – “कैमराडरी, कोऑपरेशन, कोलैबोरेशन”, यानी भाईचारा, सहयोग और साझा काम। इस बार 65 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं भाग ले रही हैं। 19 से अधिक विदेशी युद्धपोत विशाखापत्तनम पहुंच रहे हैं। अमेरिका, रूस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, यूएई, श्रीलंका जैसे कई देश इसमें शामिल होंगे। यह अब तक का सबसे बड़ा एडिशन माना जा रहा है।

एक्सरसाइज मिलन 2026 को दो हिस्सों हार्बर फेज और सी फेज में बांटा गया है। हार्बर फेज 19 फरवरी से शुरू होगा और तट पर आयोजित किया जाएगा। इसका मकसद आपसी भरोसा बढ़ाना और विचारों का आदान-प्रदान करना है। इसमें मिलन विलेज बनाया जाएगा, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, हस्तशिल्प स्टॉल और फूड फेस्टिवल होंगे। (IFR–Milan 2026)

समुद्री सुरक्षा, ड्रोन खतरे, साइबर सुरक्षा, आपदा राहत और समुद्री डकैती जैसे विषयों पर सेमिनार और विशेषज्ञ बैठकें होंगी। यह चरण नौसेनाओं के बीच विश्वास और समझ को मजबूत करेगा।

वहीं, 21 से 25 फरवरी के बीच बंगाल की खाड़ी में मिलन अभ्यास का सबसे अहम और चुनौतीपूर्ण हिस्सा आयोजित होगा, जिसे सी फेज कहा जाता है। यही वह चरण है जहां अलग-अलग देशों की नौसेनाएं समुद्र में उतरकर वास्तविक परिस्थितियों जैसी स्थितियों में संयुक्त ऑपरेशन का अभ्यास करेंगी। (IFR–Milan 2026)

इस दौरान युद्धपोत, पनडुब्बियां, नौसैनिक हेलीकॉप्टर और विशेष बल एक साथ काम करेंगे। पनडुब्बी रोधी युद्ध अभ्यास में समुद्र के नीचे छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की रणनीति पर काम किया जाएगा। हवाई रक्षा अभ्यास के तहत दुश्मन के हवाई हमलों से जहाजों की सुरक्षा की ट्रेनिंग दी जाएगी।

सर्च एंड रेस्क्यू मिशन के जरिए समुद्र में फंसे लोगों को बचाने की प्रक्रिया का अभ्यास होगा, जबकि एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन में समुद्री डकैती से निपटने की संयुक्त कार्रवाई दिखाई जाएगी। इसके अलावा ड्रोन और अन्य असिमेट्रिक खतरे, यानी छोटे लेकिन खतरनाक हमलों से बचाव की विशेष ट्रेनिंग भी दी जाएगी। आपदा राहत सिमुलेशन के माध्यम से तूफान या समुद्री दुर्घटना जैसी परिस्थितियों में राहत और सहायता पहुंचाने का अभ्यास किया जाएगा।

इस पूरे चरण का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना है, ताकि जरूरत पड़ने पर वे एकजुट होकर तेजी और प्रभावी तरीके से कार्रवाई कर सकें। यही इंटरऑपरेबिलिटी समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाती है। (IFR–Milan 2026)

क्यों है यह महत्वपूर्ण?

एक्सरसाइज मिलन 2026 केवल सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि मैरीटाइम डिप्लोमेसी का बड़ा मंच है। इससे भारत की भूमिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में मजबूत होती है। यह आयोजन दिखाता है कि भारत समुद्र को प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि सहयोग का क्षेत्र मानता है। मिलन 2026 भाईचारे से शुरू होकर साझा सुरक्षा तक पहुंचने की एक बड़ी पहल है।

सीधे शब्दों में कहें, तो अगर आईएफआर समुद्र में खड़े जहाजों के जरिए शांति और भरोसे का संदेश देता है, तो मिलन एक्सरसाइज उसी भरोसे को समुद्र में मिलकर अभ्यास करके मजबूत करती है। यानी कि आईएफआर शांत माहौल में दोस्त बनाता है, जबकि मिलन एक्सरसाइज समुद्र में साथ काम करके उस दोस्ती को व्यवहार में साबित करती है। (IFR–Milan 2026)

114 राफेल डील की आहट के बीच फ्रांस से नई डिफेंस पार्टनरशिप, अब भारत में बनेगी HAMMER मिसाइल!

HAMMER Missile India France

HAMMER Missile India France: फ्रांस से होने वाली 114 राफेल डील की आहट के बीच फ्रेंच रक्षा मंत्री कैथरीन वॉट्रिन 17 फरवरी को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात करेंगी। दोनों देशों के रक्षा मंत्री बेंगलुरु में छठे भारत-फ्रांस एनुअल डिफेंस डॉयलॉग की सह-अध्यक्षता करेंगे। इस बैठक में न केवल एक अहम रक्षा सहयोग समझौते को अगले दस साल के लिए बढ़ाने की तैयारी है, बल्कि हैमर मिसाइल के संयुक्त निर्माण को लेकर समझौता ज्ञापन पर दस्तखत होने की उम्मीद है। यह फैसला भारत की सैन्य ताकत और रक्षा उत्पादन क्षमता दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

HAMMER Missile India France: दस साल के लिए बढ़ सकता है रक्षा समझौता

कैथरीन वॉट्रिन अक्टूबर 2025 में फ्रांस की रक्षा मंत्री बनी थीं। यह उनकी भारत की पहली आधिकारिक यात्रा है। उनकी इस यात्रा के दौरान दोनों देश मौजूदा रक्षा सहयोग समझौते को फिर से दस वर्षों के लिए बढ़ाने पर सहमत हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि टेक्नोलॉजी, ट्रेनिंग, जॉइंट एक्सरसाइज, सैन्य उद्योग और रणनीतिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों में सहयोग पहले से अधिक मजबूत होगा।

रक्षा मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इस बैठक में दोनों देशों के रक्षा संबंधों के भविष्य की दिशा तय की जाएगी। दोनों देश रक्षा उत्पादन, तकनीकी साझेदारी और मिलिटरी कॉर्डिनेशन और मजबूत करने की योजना पर काम कर रहे हैं। (HAMMER Missile India France)

हैमर मिसाइल का भारत में निर्माण

बैठक में हैमर मिसाइल के जॉइंट प्रोडक्शन को लेकर भी एमओयू पर दस्तखत हो सकते हैं। हैमर, यानी हाईली एजाइल मॉड्यूलर म्यूनिशन एक्सटेंडेड रेंज, एक प्रिसिजन गाइडेड एयर-टू-ग्राउंड हथियार है। यानी यह जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को बेहद सटीक तरीके से निशाना बना सकता है। इसकी मारक क्षमता लगभग 70 किलोमीटर तक है। यह पहले से ही भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमानों में इंटीग्रेटेड है और ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर इसका निर्माण भारत में शुरू होता है, तो इससे आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में जरूरत पड़ने पर इसकी उपलब्धता आसान होगी।

यह मिसाइल खास तौर पर मजबूत और सुरक्षित ठिकानों पर हमला करने के लिए बनाई गई है। पहाड़ी इलाकों जैसे कठिन भूभाग में भी यह प्रभावी मानी जाती है। 36 राफेल विमानों की खरीद में यह हथियार शामिल नहीं था, लेकिन बाद में आपात खरीद प्रक्रिया के तहत इसे शामिल किया गया। अब अगर इसका निर्माण भारत में संयुक्त रूप से होता है, तो यह आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम होगा। (HAMMER Missile India France)

114 राफेल विमानों की चर्चा भी तेज

इसके अलावा भारत 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमान खरीदने पर भी विचार कर रहा है। हालांकि इस बैठक में इसका औपचारिक ऐलान नहीं है, लेकिन इसे लेकर चर्चा तेज है। अगर यह सौदा आगे बढ़ता है तो इनमें से 96 विमानों का निर्माण भारत में ही किया जा सकता है, जबकि बाकी फ्लाई अवे कंडीशन में भारत आएंगे।

फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन इस परियोजना में अहम भूमिका निभा सकती है। इसके अलावा इंजन निर्माता सफरान पहले से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ जॉइंट वेंचर में हेलीकॉप्टर इंजन बना रही है। (HAMMER Missile India France)

टाटा एयरबस की हेलीकॉप्टर असेंबली लाइन

बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों कर्नाटक के वेमगल में टाटा एयरबस की एच-125 लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर फाइनल असेंबली लाइन का वर्चुअल उद्घाटन करेंगे। यह परियोजना भी मेक इन इंडिया पहल के तहत आगे बढ़ाई जा रही है।

एच-125 हल्का उपयोगी हेलीकॉप्टर है, जिसका इस्तेमाल नागरिक और सुरक्षा दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। भारत में इसकी अंतिम असेंबली लाइन शुरू होना मेक इन इंडिया पहल के तहत एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (HAMMER Missile India France)

सैन्य अधिकारियों की परस्पर तैनाती

बैठक में भारतीय सेना और फ्रांसीसी थल सेना के बीच अधिकारियों की परस्पर तैनाती की घोषणा भी हो सकती है। इसका उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच आपसी समझ, प्रशिक्षण और सामरिक तालमेल बेहतर बनाना है। इससे प्रशिक्षण और सामरिक अनुभव साझा करने में मदद मिलेगी। (HAMMER Missile India France)

लंबे समय से मजबूत रिश्ते

भारत और फ्रांस के संबंधों में रक्षा संबंध हमेशा से मजबूत रहे हैं। 2023 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के बैस्टिल डे परेड में मुख्य अतिथि थे। इसके बाद 2024 में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बने। जिसके बाद दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत हुए।

दोनों देश नियमित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करते हैं। थल सेना के साथ शक्ति अभ्यास, नौसेना के साथ वरुण अभ्यास और वायुसेना के साथ गरुड़ अभ्यास आयोजित किए जाते हैं। इन अभ्यासों से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल और जॉइंट ऑपरेशनल कैपेबिलिटी मजबूत होती है।

हाल ही में भारत-यूरोपीय संघ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी समझौता भी हुआ है। इससे यूरोपीय देशों के साथ सामूहिक सहयोग बढ़ाने का रास्ता खुला है। फ्रांस इस दिशा में भारत का प्रमुख साझेदार है। (HAMMER Missile India France)

406 करोड़ की लागत से मेरठ से होगी पाकिस्तान-चीन सीमा की निगरानी! पहला ड्रोन एयरबेस बनाने के पीछे यह है वजह

Meerut Drone Airbase

Meerut Drone Airbase: रक्षा मंत्रालय ने मेरठ में देश का पहला डेडिकेटेड ड्रोन एयरबेस बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। यह एयरबेस खास तौर पर ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट यानी आरपीए के लिए तैयार किया जाएगा। इसका मकसद सेना की निगरानी और स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत बनाना है। इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय के तहत काम काम करने वाले बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ को दी गई है। (Meerut Drone Airbase)

Meerut Drone Airbase: 406 करोड़ रुपये की लागत

यह परियोजना करीब 406 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगी। मेरठ के किला रोड इलाके में लगभग 900 एकड़ जमीन पर यह बेस बनाया जाएगा। इसे आधुनिक सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है, ताकि हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस यानी HALE कैटेगरी के ड्रोन यहां से ऑपरेट किए जा सकें। ऐसे ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और कई घंटों तक आसमान में रहकर निगरानी कर सकते हैं। (Meerut Drone Airbase)

2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे

इस एयरबेस का सबसे अहम हिस्सा होगा 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे। यह रनवे सिर्फ ड्रोन के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे सी-295 और सी-130 जैसे विमानों के लिए भी इस्तेमाल होगा। रनवे पर आईसीएओ कैट-2 मानक की लाइटिंग और नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, ताकि कम विजिबिलिटी यानी धुंध या खराब मौसम में भी सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग हो सके। (Meerut Drone Airbase)

हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन

बेस पर दो बड़े हैंगर बनाए जाएंगे, जिनका आकार 60 गुणा 50 मीटर होगा। इन हैंगरों में ड्रोन की मेंटेनेंस, मरम्मत और तेजी से तैनाती की सुविधा होगी। अनुमान है कि यह बेस हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन संभाल सकेगा। यानी औसतन रोजाना चार ड्रोन उड़ानें यहां से ऑपरेट की जा सकेंगी। यह अनमैन्ड सिस्टम्स के लिए एक स्ट्रैटेजिक नर्व सेंटर बनेगा। (Meerut Drone Airbase)

क्यों किया ड्रोन बेस बनाने का फैसला

सूत्रों का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके पीछे ऑपरेशन सिंदूर को बड़ी वजह माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था। उस दौरान ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। ड्रोन ने सटीक हमलों (प्रिसिजन टारगेटिंग) और निगरानी (सर्विलांस) में अहम भूमिका निभाई। इस अनुभव से सेना को यह समझ आया कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि अनमैन्ड सिस्टम यानी बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका और बढ़ेगी। (Meerut Drone Airbase)

एक वरिष्ठ सेना अधिकारी के मुताबिक, पाकिस्तान और चीन की तरफ से ड्रोन से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह लंबे समय तक लगातार काम करने वाले यूएवी (बिना पायलट वाले विमान) ऑपरेशन नेटवर्क तैयार करे। अगर ड्रोन के लिए अलग से एक समर्पित बेस होगा, तो सैनिकों की ट्रेनिंग, ड्रोन की मेंटेनेंस और उन्हें जरूरत के समय तुरंत तैनात करना आसान हो जाएगा। उनका कहना है कि भविष्य का डिफेंस सिस्टम डेटा पर आधारित और बिना पायलट वाले सिस्टम पर टिक होगा। उनके अनुसार, ऐसी तैयारी से भारत की ताकत इतनी बढ़ेगी कि दुश्मन देशों के लिए यह बड़ी चिंता की वजह बन जाएगी।

वह कहते हैं, मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन दुश्मन के इलाके में बिना सैनिकों को खतरे में डाले निगरानी कर सकते हैं। रीयल टाइम इंटेलिजेंस यानी तुरंत जानकारी उपलब्ध कराते हैं। लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सटीक हमले (प्रिसिजन टारगेटिंग) भी कर सकते हैं। ऐसे में एक समर्पित ड्रोन एयरबेस की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Meerut Drone Airbase)

प्रोजेक्ट के लिए क्यों चुना मेरठ को

मेरठ को इस प्रोजेक्ट के लिए चुनने के पीछे कई रणनीतिक वजहें हैं। सबसे पहले इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें यह दिल्ली के करीब 70 किमी दूर है और उत्तर भारत के केंद्र में स्थित है। यहां से पश्चिमी सीमा यानी पाकिस्तान बॉर्डर और उत्तरी सीमा यानी चीन की ओर निगरानी करना आसान होगा। यह आतंकी घुसपैठ या सैन्य गतिविधियों को तुरंत डिटेक्ट करने में मदद करेगा। यहां से ड्रोन आसानी से पंजाब, राजस्थान और जम्मू क्षेत्र की ओर तैनात किए जा सकते हैं। उत्तरी सीमा की निगरानी के लिए भी यह बेहतरीन जगह है।

दूसरा कारण है यहां का मौजूदा मिलिटरी और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। मेरठ के पास हिंडन एयरबेस है, जो भारतीय वायुसेना का महत्वपूर्ण अड्डा है। इससे सपोर्ट और तालमेल आसान होगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का हिस्सा होने के कारण यहां रक्षा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। (Meerut Drone Airbase)

वहीं तीसरी सबसे बड़ी वजह है कि मेरठ में सेना का बड़ा ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर) वर्कशॉप है। भारतीय सेना के ईएमई कोर के तहत देशभर में आठ आर्मी बेस वर्कशॉप हैं। इनमें से 515 आर्मी बेस वर्कशॉप का मुख्यालय मेरठ में है। इसके साथ 510 आर्मी बेस वर्कशॉप भी यहीं काम करती है। बेस वर्कशॉप ग्रुप का हेडक्वार्टर भी मेरठ में है, जो बाकी वर्कशॉप्स को कॉर्डिनेट करता है।

मेरठ की 510 बेस वर्कशॉप में एयर डिफेंस सिस्टम, गाइडेड मिसाइल, शिल्का और क्वाड्रेट जैसे हथियार सिस्टम, मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर और भारी सैन्य वाहनों की मरम्मत और ओवरहॉलिंग होती है। ईएमई का मुख्य काम इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल उपकरणों की मरम्मत, मेंटेनेंस और स्वदेशीकरण करना है। पिछले कुछ सालों में यहां यूएवी यानी बिना पायलट वाले विमानों के स्पेयर पार्ट्स भी बनाए और टेस्ट किए जा चुके हैं। हाल में आयोजित ड्रोन शक्ति (ईगल ऑन आर्म) के तहत ड्रोन की मरम्मत और सपोर्ट का पूरा सिस्टम ईएमई वर्कशॉप्स पर बेस्ड है, जिसमें मेरठ की भूमिका अहम है। (Meerut Drone Airbase)

85 महीने में पूरा होगा प्रोजेक्ट

इस प्रोजेक्ट की कुल अवधि 85 महीने तय की गई है। इसमें सात महीने प्री-अवार्ड प्लानिंग के लिए, 18 महीने कंस्ट्रक्शन कार्य के लिए और इसके बाद मेंटेनेंस व निगरानी की अवधि शामिल है। बीआरओ ने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के लिए ई-टेंडर भी जारी कर दिया है।

इस प्रोजेक्ट को बीआरओ के प्रोजेक्ट शिवालिक के चीफ इंजीनियर लीड करेंगे। एक बार पूरा होने पर, यह भारतीय सेना के लिए बॉर्डर रीजन पर निगरानी का हॉक आई बनेगा।

सूत्रों का कहना है कि यहां मौसम काफी सपोर्टिव है। अन्य जगहों जैसे जम्मू या लद्दाख की तुलना में, मेरठ कम रिस्की और स्केलेबल है। इसलिए यह जगह एक स्ट्रैटेजिक एविएशन हब बनाई जा सकती है, जो पूरे नॉर्थ इंडिया को कवर करेगी। (Meerut Drone Airbase)

ऑस्ट्रेलिया जाएंगे भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को देंगे मजबूती

Army Chief Australia Visit
Lieutenant General Simon Stuart, Chief of the Australian Army, welcomed by Indian Army Chief General Upendra Dwivedi (File Photo)

Army Chief Australia Visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ऑस्ट्रेलिया के आधिकारिक दौरे पर रवाना हो रहे हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते हालात और बढ़ती रणनीतिक चुनौतियों के बीच दोनों देश अपने सैन्य संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश में हैं।

Army Chief Australia Visit: रिश्ते को और मजबूत करने की तैयारी

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मिलिटरी-टू-मिलिटरी सहयोग को और गहरा करना है। खास तौर पर ट्रेनिंग, जॉइंट एक्सरसाइज, प्रोफेशनल एक्सचेंज और क्षमता निर्माण जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों देश पहले से ही कई सैन्य अभ्यासों और रणनीतिक संवादों के जरिए एक-दूसरे के करीब आए हैं। अब इस रिश्ते को और मजबूत करने की तैयारी है। (Army Chief Australia Visit)

इस दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस फोर्सेज के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। बातचीत का मुख्य फोकस सेना-से-सेना सहयोग बढ़ाने पर रहेगा। इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग, प्रोफेशनल एक्सचेंज और क्षमता निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। दोनों देश पहले से ही कई जॉइंट एक्सरसाइज में हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें “ऑस्ट्राहिंद” एक्सरसाइज भी शामिल है। इस अभ्यास में दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे के साथ मिलकर काउंटर-टेरर ऑपरेशन, शहरी युद्ध और सामरिक ड्रिल का अभ्यास करते हैं। 2026 में इसका अगला संस्करण भारत में आयोजित किया जाना है। (Army Chief Australia Visit)

जनरल द्विवेदी अपने दौरे की शुरुआत सिडनी से करेंगे। वहां वे ऑस्ट्रेलियन डिफेंस फोर्सेज के फोर्सेज कमांड, स्पेशल ऑपरेशंस कमांड और सेकंड डिवीजन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। सेकंड डिवीजन के सैनिक भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाले द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास “ऑस्ट्राहिंद” में भाग लेते हैं। यह अभ्यास हर साल बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित किया जाता है। 2026 में इसका अगला संस्करण भारत में होना तय है। माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान आने वाले संस्करण की तैयारियों पर भी चर्चा होगी। (Army Chief Australia Visit)

सिडनी के बाद सेना प्रमुख कैनबरा जाएंगे। वहां उनका औपचारिक स्वागत और गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। इसके बाद उनकी मुलाकात ऑस्ट्रेलियाई सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल साइमन स्टुअर्ट से होगी। खास बात यह है कि दोनों अधिकारी अमेरिका के यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के 2015 बैच के पूर्व छात्र रहे हैं। इससे उनके बीच प्रोफेशनल समझ पहले से मौजूद है। मुलाकात के दौरान दोनों देशों के सैन्य संबंधों, आधुनिकीकरण और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से बातचीत होगी। (Army Chief Australia Visit)

कैनबरा में ऑस्ट्रेलियन डिफेंस फोर्सेज मुख्यालय में एक राउंड टेबल चर्चा भी आयोजित की जाएगी। इसमें रक्षा सहयोग, आधुनिक तकनीक, भविष्य के युद्ध की तैयारी और मल्टी डोमेन ऑपरेशन जैसे विषय शामिल रहेंगे। आज के समय में युद्ध केवल जमीन पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि हवा, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष तक फैला हुआ है। ऐसे में दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के अनुभव और रणनीति को समझना जरूरी माना जा रहा है। (Army Chief Australia Visit)

सेना प्रमुख ऑस्ट्रेलियन डिफेंस कॉलेज और ऑस्ट्रेलियन कमांड एंड स्टाफ कॉलेज भी जाएंगे, जहां वे अधिकारियों को संबोधित करेंगे। इसके अलावा वे चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज और डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस के सचिव से भी मुलाकात करेंगे। जॉइंट ऑपरेशंस कमांड मुख्यालय का दौरा कर वे ऑस्ट्रेलिया के इंटीग्रेटेड और मल्टी डोमेन ऑपरेशन सिस्टम के बारे में जानकारी लेंगे। आज के समय में युद्ध केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि हवा, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष तक फैल चुका है। ऐसे में दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के अनुभव साझा करना महत्वपूर्ण है।

अपने दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ऑस्ट्रेलियन वॉर मेमोरियल पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि भी देंगे। यह कदम दोनों देशों के बीच सैन्य परंपराओं और बलिदान की साझा विरासत को सम्मान देने का प्रतीक है। वे ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय रक्षा पूर्व सैनिकों से भी मुलाकात करेंगे। इससे भारतीय सशस्त्र बलों और पूर्व सैनिकों के बीच संबंध और मजबूत होंगे। (Army Chief Australia Visit)

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। दोनों देश क्वाड समूह का हिस्सा हैं और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर देते हैं। समुद्री सुरक्षा, संयुक्त अभ्यास और आपसी सूचना साझेदारी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा है। हालांकि यह दौरा सैन्य स्तर पर भरोसा और तालमेल बढ़ाने के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

हाल ही में 2025 में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच संवाद हुआ था, जिसमें समुद्री सुरक्षा, सूचना साझा करना और आपसी सहयोग बढ़ाने जैसे मुद्दों पर सहमति बनी थी। उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के रूप में इस दौरे को देखा जा रहा है। (Army Chief Australia Visit)

पिछले साल ऑस्ट्रेलियाई सेना प्रमुख आए थे भारत

इससे पहले 11 अगस्त 2025 ऑस्ट्रेलियाई सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल साइमन स्टुअर्ट चार दिन की आधिकारिक यात्रा पर भारत आए थे। उनकी यह यात्रा 11 से 14 अगस्त तक चली। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करना था। दोनों देशों के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग बढ़ रहा है। इसी दिशा में जनरल स्टुअर्ट और जनरल द्विवेदी के बीच विस्तार से बातचीत हुई थी। चर्चा में मिलिटरी-टू-मिलिटरी कॉपरेशन, आधुनिकीकरण, संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण जैसे विषय शामिल रहे। (Army Chief Australia Visit)

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाला संयुक्त सैन्य अभ्यास “ऑस्ट्राहिंद” भी बातचीत का अहम हिस्सा रहा। अपनी यात्रा के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल स्टुअर्ट ने आगरा में 50 (इंडिपेंडेंट) पैराशूट ब्रिगेड का भी दौरा किया था। इससे उन्हें भारतीय सेना की ऑपरेशनल तैयारियों और क्षमताओं को करीब से देखने का अवसर मिला थ। खास बात यह है कि यह दौरा पारस्परिक था। (Army Chief Australia Visit)

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच “ऑस्ट्राहिंद” अभ्यास 2022 से शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियान, सामरिक अभ्यास और आपसी तालमेल बढ़ाना है। हर साल इस अभ्यास का स्तर और दायरा बढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा भारत ने 2025 में “टैलिस्मन सेबर” नामक बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में भी हिस्सा लिया था, जिसकी अगली कड़ी 2027 में प्रस्तावित है। (Army Chief Australia Visit)

जनरल द्विवेदी ने पिछले कुछ महीनों में जापान, नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका जैसे देशों का भी दौरा किया है। इन सभी यात्राओं का उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना रहा है। ऑस्ट्रेलिया का यह दौरा भी उसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ मिलकर काम करना चाहता है। (Army Chief Australia Visit)

चीन सीमा से 300 किमी दूर भारत की नई एयरस्ट्रिप रणनीति, जानें डुअल फ्रंट वार को देखते हुए कितनी है जरूरी

Assam Emergency Landing Facility

Assam Emergency Landing Facility: जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में बने नए इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी पर भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसे एक्टिव कर दिया। यह भारत की रक्षा तैयारी और बुनियादी ढांचे की सोच में आए बड़े बदलाव का संकेत था। अब देश के कुछ चुनिंदा नेशनल हाईवे सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर लड़ाकू और ट्रांसपोर्ट विमानों के लिए भी रनवे का काम कर सकते हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

मोरान में बना यह इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी यानी ईएलएफ पूर्वोत्तर भारत का पहला ऐसा हाईवे एयरस्ट्रिप है। यह नेशनल हाईवे-37 पर लगभग 4.2 किलोमीटर लंबा सीधा और मजबूत बनाया गया हिस्सा है। यह इलाका चीन सीमा से करीब 300 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए रणनीतिक रूप से भी काफी अहम माना जा रहा है। (Assam Emergency Landing Facility)

Assam Emergency Landing Facility: आखिर हाईवे पर एयरस्ट्रिप की जरूरत क्यों?

युद्ध की स्थिति में दुश्मन की पहली नजर अक्सर एयरबेस पर होती है। अगर किसी कारण से स्थायी एयरबेस को नुकसान पहुंचता है या वे अस्थायी रूप से इस्तेमाल के लायक नहीं रहते, तो वायुसेना को वैकल्पिक रनवे की जरूरत पड़ती है। ऐसे में हाईवे पर बने ये इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप बहुत काम आते हैं।

इसके अलावा, अगर किसी विमान में उड़ान के दौरान तकनीकी खराबी आ जाए या ईंधन कम हो जाए और वह अपने बेस तक न पहुंच सके, तो वह इन हाईवे रनवे पर सुरक्षित उतर सकता है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप या चक्रवात के समय भी इनका इस्तेमाल राहत और बचाव कार्यों के लिए किया जा सकता है। (Assam Emergency Landing Facility)

मोरान एयरस्ट्रिप की क्या हैं खूबियां

प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले राफेल और सुखोई-30 जैसे फाइटर जेट्स ने यहां लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। बाद में सी-130जे सुपर हरक्यूलिस जैसे भारी ट्रांसपोर्ट विमान ने भी सुरक्षित लैंडिंग की। इसके बाद एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर ‘ध्रुव’ ने कैजुअल्टी इवैक्यूएशन ड्रिल का प्रदर्शन किया।

सी-130जे एक चार इंजन वाला टर्बोप्रॉप विमान है, जिसका अधिकतम वजन लगभग 74,000 किलोग्राम तक हो सकता है। इतने भारी विमान का हाईवे पर उतरना यह दिखाता है कि इस स्ट्रिप को खास इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। (Assam Emergency Landing Facility)

कैसे बनाए जाते हैं ये इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी?

इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी कोई साधारण सड़क का हिस्सा नहीं होता। इसके लिए हाईवे का एक सीधा और लंबा हिस्सा चुना जाता है, जो आमतौर पर चार किलोमीटर से ज्यादा लंबा होता है।

इस हिस्से को खास तरीके से मजबूत किया जाता है ताकि वह तेज रफ्तार और भारी विमानों का भार सह सके। सड़क की सतह को हाई स्ट्रेंथ पेवमेंट से तैयार किया जाता है। दोनों ओर फेंसिंग और बैरियर लगाए जाते हैं ताकि ऑपरेशन के दौरान कोई वाहन, जानवर या आम लोग रनवे पर न आ सकें।

सड़क के बीच में सामान्य हाईवे की तरह डिवाइडर नहीं होता, क्योंकि विमान को एक सीधा और खुला रनवे चाहिए। इसके अलावा रनवे की तरह मार्किंग भी की जाती है, जिससे पायलट को लैंडिंग और टेकऑफ में आसानी हो। (Assam Emergency Landing Facility)

देशभर में कितनी ऐसी स्ट्रिप्स हैं?

रक्षा मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय वायुसेना ने देशभर में 28 स्थानों की पहचान की है, जहां इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी बनाई जानी है या बनाई जा चुकी है।

इनमें असम में 5, पश्चिम बंगाल में 4, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में 3-3, तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में 2-2, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1-1 स्थान शामिल हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र में 2021 में देश की पहली ऐसी हाईवे एयरस्ट्रिप का उद्घाटन किया गया था। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और अन्य एक्सप्रेसवे पर भी फाइटर जेट्स की लैंडिंग का अभ्यास हो चुका है। आंध्र प्रदेश के अड्डंकी में भी हाल ही में ऐसी सुविधा सक्रिय की गई थी। (Assam Emergency Landing Facility)

सिर्फ सेना के लिए नहीं हैं ये एयरस्ट्रिप्स

हालांकि इनका मुख्य उद्देश्य सैन्य जरूरतों को पूरा करना है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल नागरिक विमानों के लिए भी किया जा सकता है। अगर किसी पैसेंजर विमान में आपात स्थिति बन जाए, तो वह भी यहां उतर सकता है। मेडिकल इवैक्यूएशन या किसी विशेष टीम और उपकरण को तुरंत पहुंचाने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है। (Assam Emergency Landing Facility)

दुनिया में भी है यह व्यवस्था

हाईवे को एयरस्ट्रिप के रूप में इस्तेमाल करने का विचार नया नहीं है। शीत युद्ध के दौर में यूरोप के कई देशों ने इस मॉडल को अपनाया था। फिनलैंड, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों में डुअल यूज हाईवे आम बात है। एशिया में भी कई देश इस प्रयोग को अपना चुके हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

रणनीतिक सोच में बदलाव

मोरान में बना यह नया इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं है। यह भारत की रक्षा नीति में उस सोच को दिखाता है, जिसमें नागरिक बुनियादी ढांचे को सैन्य जरूरतों के साथ जोड़ा जा रहा है।

इसे डुअल यूज इंफ्रास्ट्रक्चर कहा जाता है, यानी एक ही ढांचा सामान्य समय में आम लोगों के लिए और संकट के समय में सेना के लिए काम आता है। इससे अलग से बड़े खर्च की जरूरत भी कम पड़ती है और तैयारियां भी मजबूत रहती हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

असम में बने इस नए एयरस्ट्रिप से खास तौर पर पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता बढ़ेगी। सीमा के पास स्थित इलाकों में मिलिटरी इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना आज की जरूरत है। स्पष्ट है कि आने वाले समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे और इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी देखने को मिल सकते हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

असम में हाईवे पर उतरा सुपर हरक्यूलिस सी-130जे, पीएम ने क्यों चुना यही विमान? जानिए पूरी रणनीति

C-130J Super Hercules India

C-130J Super Hercules India: चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा से तकरीबन 300 किमी दूर असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में नेशनल हाईवे-37 पर बनी 4.2 किलोमीटर लंबी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी अब आधिकारिक रूप से सक्रिय हो गई है। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहली ऐसी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है, जो सीधे हाईवे पर तैयार की गई है। इसे नेशनल हाईवे-2 पर मोरान बाईपास के पास बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर यहां फाइटर जेट और ट्रांसपोर्ट विमान सुरक्षित रूप से उतर और उड़ान भर सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से यहां उतरकर इस एयर स्ट्रिप का उद्घाटन किया। सवाल उठता है कि इतने बड़े और अहम कार्यक्रम के लिए यही विमान क्यों चुना गया? (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India: क्या है सी-130जे सुपर हरक्यूलिस?

शनिवार को प्रधानमंत्री विशेष विमान से चाबुआ एयरफील्ड से उड़ान भरकर सीधे इस नई एयर स्ट्रिप पर उतरे। उनके विमान की लैंडिंग के साथ ही यह सुविधा आधिकारिक रूप से शुरू हो गई। प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने यहां अभ्यास किया। पहले राफेल और सुखोई-30 ने लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। इसके बाद सी-130जे ने रनवे को छुआ। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के दौरान फाइटर और ट्रांसपोर्ट विमानों ने टेकऑफ और लैंडिंग ड्रिल का प्रदर्शन किया।

सुखोई विमानों ने फ्लाई-पास्ट किया, फिर ओवरशूट करते हुए रनवे के ऊपर से दोबारा गुजरे और तीसरे विमान ने लैंडिंग की। राफेल ने भी इसी तरह अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटी दिखाई। बाद में एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां रनवे पर उतरा। लेकिन सबसे खास सी-130जे की लैंडिंग रही। (C-130J Super Hercules India)

सी-130जे एक आधुनिक टैक्टिकल एयरलिफ्टर है। इसे अमेरिका की कंपनी लॉकहीड मार्टिन बनाती है। भारत ने इसके कुल 12 विमान खरीदे हैं। यह विमान सैनिकों, हथियारों, राहत सामग्री और विशेष बलों को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में सक्षम है। पहले छह विमान वर्ष 2008 में लिए गए थे और उसके बाद 2011 से 2019 के बीच छह और शामिल किए गए। आज ये सभी विमान उत्तर प्रदेश के हिंडन एयरबेस से ऑपरेट होते हैं और कई अहम अभियानों का हिस्सा रह चुके हैं। लेकिन इसे सिर्फ माल ढोने वाला विमान समझना भूल होगी। यह एक बहुउद्देश्यीय यानी मल्टी-रोल विमान है। (C-130J Super Hercules India)

कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता

इसकी सबसे बड़ी है इसका कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता। भारत का भूगोल बहुत विविध है। एक तरफ ऊंचे हिमालयी क्षेत्र हैं, दूसरी तरफ रेगिस्तान और समुद्री द्वीप। लद्दाख और अरुणाचल जैसे इलाकों में छोटे और ऊंचाई पर बने रनवे हैं। ऐसे स्थानों पर सामान्य विमान पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। लेकिन सी-130जे कम लंबाई वाले और कच्चे रनवे पर भी उतर सकता है। दौलत बेग ओल्डी जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे एयरस्ट्रिप पर भी इस विमान ने सफल लैंडिंग की है। गर्म और ऊंचाई वाले इलाकों में भी इसका प्रदर्शन बेहतर रहता है, जहां दूसरे विमानों की क्षमता आधी रह जाती है। (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India

स्पेशल ऑपरेशन के लिए है बेहद काम का

सी-130जे को भारतीय स्पेशल फोर्सेस की जरूरतों को ध्यान में रखकर खरीदा गया था। भारतीय विशेष बलों को ऐसे विमान की जरूरत थी जो चुपचाप, कम ऊंचाई पर और रात में भी सटीक उड़ान भर सके। इसमें इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम, नाइट विजन गॉगल्स के साथ काम करने की क्षमता, कम रोशनी में उतरने की सुविधा और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा प्रणाली जैसी आधुनिक तकनीकें हैं।

यह दुश्मन की नजर से बचकर सैनिकों को किसी भी इलाके में उतार सकता है और जरूरत पड़ने पर तेजी से निकाल भी सकता है। इसलिए यह स्पेशल ऑपरेशन के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India

आपदा के समय है सबसे भरोसेमंद

सी-130जे केवल ट्रांसपोर्ट विमान नहीं है। यह पैराड्रॉप कर सकता है, राहत सामग्री गिरा सकता है, सर्च एंड रेस्क्यू मिशन कर सकता है, और जरूरत पड़ने पर निगरानी मिशन भी पूरा कर सकता है। जरूरत पड़ने पर हवाई ईंधन भरने की सुविधा के साथ लंबी दूरी तक उड़ सकता है। खोज और बचाव अभियान, प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत सामग्री पहुंचाना, घायलों को निकालना और निगरानी जैसे कई काम यह एक ही प्लेटफॉर्म से कर सकता है। 2011 में सिक्किम में आए भूकंप और बाद में उत्तराखंड की बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान इस विमान ने राहत कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी।

यह मेडिकल इवैक्यूएशन यानी घायल लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने में भी सक्षम है। बड़े केबिन और मजबूत इंजन के कारण यह भारी उपकरण भी ले जा सकता है। (C-130J Super Hercules India)

कई देशों की वायुसेनाएं करती हैं इसका इस्तेमाल

भारतीय वायुसेना ने इसे अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में परखा है। हिमालय, रेगिस्तान और समुद्री क्षेत्रों में इसकी उड़ान और लैंडिंग का परीक्षण किया गया। इन सभी जगहों पर यह भरोसेमंद साबित हुआ। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की वायुसेनाएं भी इसी विमान का इस्तेमाल करती हैं। इससे संयुक्त अभ्यास के दौरान तालमेल बेहतर होता है।

सी-130जे की विश्वसनीयता भी इसकी बड़ी ताकत है। अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स कार्यक्रम के तहत इसकी खरीद समय पर और तय लागत में पूरी हुई। शुरुआती छह विमानों के अच्छे प्रदर्शन के बाद भारत ने छह और खरीदने का फैसला किया। (C-130J Super Hercules India)

रणनीतिक और कूटनीतिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे। यह भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का एक बड़ा कदम था। कई दशकों बाद दोनों देशों के बीच इतना बड़ा रक्षा सौदा हुआ। भारत ने अपने सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें स्वदेशी तकनीकों को भी जोड़ा और जरूरत के अनुसार बदलाव किए। भविष्य में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इसके कुछ हिस्सों के निर्माण की संभावना भी जताई गई है।

सी-130जे की खासियत यह है कि यह रणनीतिक और सामरिक दोनों स्तर पर उपयोगी है। चीन सीमा के पास ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिक और उपकरण पहुंचाने हों या किसी आपदा में तुरंत राहत पहुंचानी हो, यह विमान हर परिस्थिति में काम आता है। इसकी गति, विश्वसनीयता और बहुउपयोगिता इसे भारतीय वायुसेना के सबसे अहम विमानों में से एक बनाती है। (C-130J Super Hercules India)

पूर्वोत्तर में इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी क्यों जरूरी?

युद्ध की स्थिति में दुश्मन सबसे पहले एयरबेस को निशाना बनाता है। अगर मुख्य रनवे क्षतिग्रस्त हो जाएं, तो वैकल्पिक रनवे जरूरी होते हैं। देश में कई जगहों पर ऐसी सुविधाएं बनाने की योजना है। असम में बनी यह पहली इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है।

असम की यह एयर स्ट्रिप रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र संवेदनशील इलाका है और यहां तेज सैन्य तैनाती की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी सुविधाएं सेना को तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती हैं। आपात स्थिति में विमान सीधे हाईवे पर उतरकर सैनिकों, राहत सामग्री या उपकरणों की आपूर्ति कर सकते हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी प्रभावित रहता है। ऐसे में यदि सामान्य एयरपोर्ट तक पहुंच संभव न हो, तो यह एयर स्ट्रिप राहत अभियान के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। (C-130J Super Hercules India)

और कहां इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी बनाने की है तैयारी

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार भारतीय वायुसेना ने देश के अलग-अलग राज्यों में कुल 28 स्थानों की पहचान की है, जहां ऐसी सुविधा बनाई जानी है। इनमें असम में 5, पश्चिम बंगाल में 4, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में 3-3, तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में 2-2, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1-1 स्थान शामिल हैं।

इनमें से कई स्थानों पर काम पूरा हो चुका है और कुछ जगहों पर अभ्यास भी किए जा चुके हैं। इससे पहले राजस्थान के बाड़मेर में 2021 में पहली इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी सक्रिय की गई थी।

दिल्ली-आगरा एक्सप्रेसवे और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर भी पहले वायुसेना अभ्यास कर चुकी है। आंध्र प्रदेश के अड्डंकी में भी ऐसी सुविधा हाल ही में शुरू की गई थी। (C-130J Super Hercules India)

 

IFR 2026 में पहली बार पूरे ‘लाव-लश्कर’ के साथ दिखेगा INS विक्रांत, जानें कैरियर बैटल ग्रुप में कौन-कौन से जंगी जहाज होते हैं शामिल

IFR 2026 INS Vikrant CBG

IFR 2026 INS Vikrant CBG: विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी के बीच होने जा रहे इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और एक्सरसाइज मिलन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। भारतीय नौसेना के इन दो बड़े मेगा इवेंट्स में भारतीय नौसेना का स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पूरे लावलश्कर के साथ दिखाई देगा। इस दौरान वे शिप भी शोकेस होंगे जो आईएनएस विक्रांत के साथ कैरियर बैटल ग्रुप (सीबीजी) के साथ प्रमुख भूमिका में नजर आते हैं। यह पहली बार होगा जब इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में स्वदेशी एयरक्राप्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत हिस्सा लेगा।

18 फरवरी को होने वाले इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के मुख्य कार्यक्रम में भारतीय सेनाओं की सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समुद्र में तैनात युद्धपोतों की समीक्षा करेंगी। इस अवसर पर आईएनएस विक्रांत भारतीय नौसेना के “सेंटर ऑफ अट्रैक्शन” के रूप में रहेगा। यह भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे देश में ही तैयार किया गया है। हालांकि इस दौरान विक्रांत सीबीजी की फॉर्मेशन में नहीं होगा, लेकिन सीबीजी में शामिल शिप जरूर दिखेंगे। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

IFR 2026 INS Vikrant CBG: क्या होता है कैरियर बैटल ग्रुप?

कैरियर बैटल ग्रुप का मतलब है एयरक्राफ्ट कैरियर के चारों तरफ तैनात ऐसे युद्धपोत, जो उसे हर दिशा से सुरक्षा देते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं। यह एक मल्टी-लेयर्ड सिक्युरिटी घेरा होता है, जिसमें उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सपोर्ट शिप और कई बार पनडुब्बियां भी शामिल रहती हैं। सीबीजी केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर की नौसेनाएं जिनके पास एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, वे इस ग्रुपिंग को ऑपरेट करती हैं।

भारतीय नौसेना का सीबीजी स्थायी रूप से तय नहीं होता। यह ऑपरेशन, खतरे के स्तर और अभ्यास के अनुसार बदलता रहता है। आमतौर पर इसमें 8 से 12 सरफेस वॉरशिप शामिल होते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

केंद्र में रहेगा आईएनएस विक्रांत

मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। करीब 45 हजार टन वजनी यह विशाल युद्धपोत 262 मीटर लंबा है और लगभग 28 नॉट्स की अधिकतम गति हासिल कर सकता है। इसमें करीब 1600 नौसैनिक तैनात रह सकते हैं। यह एक साथ लगभग 30 एयरक्राफ्ट ऑपरेट किया जा सकते हैं, इसमें मिग-29के फाइटर जेट, एमएच-60आर मल्टी रोल हेलीकॉप्टर, कामोव-31 अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टर, चेतक, रोमियो हेलीकॉप्टर और एएलएच ध्रुव जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह एसटीओबार सिस्टम पर आधारित है, जिसमें शॉर्ट टेक ऑफ और अरेस्टेड रिकवरी की सुविधा होती है।

इस बार का फ्लीट रिव्यू इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि लगभग छह दशक बाद किसी स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को इस स्तर पर प्रदर्शित किया जाएगा।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के तुरंत बाद 19 फरवरी से एक्सरसाइज मिलन 2026 शुरू होगी, जो 25 फरवरी तक चलेगी। यह अभ्यास विशाखापत्तनम और बंगाल की खाड़ी में दो चरणों हार्बर फेज और सी फेज में आयोजित किया जाएगा। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

सीबीजी में डेस्ट्रॉयर्स की भूमिका अहम

मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत अपने कैरियर बैटल ग्रुप के साथ ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। यह ग्रुप एंटी सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस और सर्च एंड रेस्क्यू जैसे अभ्यास करेगा। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और एंटी सबमरीन वॉरफेयर जहाज शामिल होते हैं, जो मिलकर एक सुरक्षा घेरा बनाते हैं।

इसमें सबसे अहम भूमिका डेस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स निभाते हैं। डेस्ट्रॉयर्स के तौर पर कोलकाता क्लास या विशाखापत्तनम क्लास जैसे गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के लिए आईएनएस कोलकाता (D63), आईएनएस मोरमुगाओ (D67) और आईएनएस सूरत (D69) जैसे बड़े युद्धपोत शामिल होते हैं। ये जहाज लंबी दूरी की एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और एंटी-शिप मिसाइल क्षमता के लिए जाने जाते हैं और कैरियर को हवाई तथा समुद्री खतरों से बचाते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देते हैं फ्रिगेट्स

डेस्ट्रॉयर्स के बाद फ्रिगेट्स भी इस ग्रुप का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। तलवार क्लास के तहत आईएनएस ताबर, (F44) और आईएनएस तेग (F45) जैसे जहाज शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा नीलगिरी क्लास (प्रोजेक्ट 17ए, शिवालिक क्लास (प्रोजेक्ट 17) और ब्रह्मपुत्र क्लास (प्रोजेक्ट 16ए) के 2 से 3 फ्रिगेट भी तैनात किए जाते हैं।

इमें शिवालिक क्लास स्टेल्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट्स हैं, जो एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर और लैंड अटैक में अहम भूमिका निभाते हैं। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो नीलगिरी या शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। इनमें से आईएनएस शिवालिक (F47), आईएनएस सतपुड़ा (F48) और आईएनएस सहयाद्री (F49) प्रमुख हैं। वहीं, नीलगिरी क्लास में इन तीनों में से किसी भी दो जहाजों को अक्सर आईएनएस विक्रांत के साथ तैनात देखा जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

शिवालिक क्लास को भारतीय नौसेना की पहली स्टेल्थ फ्रिगेट श्रेणी माना जाता है। इन जहाजों का मुख्य काम एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देना और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रदान करना होता है। इनमें श्टिल-1 और बराक-1 जैसी एयर डिफेंस मिसाइल प्रणालियां लगी होती हैं, जो हवाई खतरों से सुरक्षा देती हैं।

शिवालिक क्लास के अलावा विक्रांत के साथ ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स भी देखे जाते हैं। ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स सीबीजी की उस सुरक्षा परत का हिस्सा होते हैं, जो समुद्र के नीचे से आने वाले खतरों पर लगातार नजर रखती है और पूरे समूह को सुरक्षित बनाए रखने में अहम योगदान देती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स की बात करें, तो ये भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल युद्धपोत हैं। जो शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स का अपग्रेडेड वर्जन हैं। इनमें बेहतर स्टेल्थ फीचर्स, कम रडार क्रॉस सेक्शन, आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली लगाई गई है। इसका मतलब है कि ये दुश्मन के रडार पर आसानी से पकड़ में नहीं आते और लंबी दूरी से सटीक वार करने में सक्षम हैं।

इस क्लास में कुल सात फ्रिगेट्स शामिल हैं। इनमें से तीन आईएनएस नीलगिरी (एफ33), आईएनएस हिमगिरी (एफ34) और आईएनएस उदयगिरी (एफ35) नेवी में कमीशन हो चुकी हैं। बाकी जल्द ही सेवा में शामिल हो जाएंगी। ये फ्रिगेट्स मल्टी रोल क्षमता वाली हैं। यानी ये हवा से आने वाले खतरे, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन जहाज और पानी के नीचे छिपी पनडुब्बियों – तीनों से मुकाबला कर सकती हैं। इनमें ब्रह्मोस एंटी शिप मिसाइल, बराक-8 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, 76 मिमी मुख्य तोप, टॉरपीडो और एंटी सबमरीन रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

ब्रह्मपुत्र क्लास भारतीय नौसेना के ऐसे युद्धपोत हैं, जिनका मुख्य फोकस एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियान पर होता है। करीब 3,850 टन वजनी ये फ्रिगेट पुराने गोदावरी क्लास के अपग्रेडेड संस्करण माने जाते हैं और समुद्र के नीचे छिपे खतरों से निपटने में खास भूमिका निभाते हैं।

कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस ब्रह्मपुत्र (F31), आईएनएस बेतवा (F39) और आईएनएस ब्यास (F37) जैसे जहाज इस श्रेणी में आते हैं। इन तीनों में से किसी भी दो को अक्सर आईएनएस विक्रांत के नेतृत्व वाले सीबीजी के साथ तैनात किया जाता है। इनमें टॉरपीडो और आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर जैसी प्रणालियां लगी होती हैं, जो अंडरवाटर टारगेट्स के खिलाफ प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

इसके अलावा तलवार क्लास फ्रिगेट्स भी आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप का अहम हिस्सा मानी जाती हैं। प्रोजेक्ट 11356 के तहत बनी ये रूसी डिजाइन वाली स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स हैं, जिन्हें मल्टी-रोल भूमिका के लिए तैयार किया गया है। इनमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, श्टिल-1 एयर डिफेंस सिस्टम और एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता मौजूद है।

2025-2026 की हाल की फॉर्मेशन और एक्सरसाइज की तस्वीरों तथा वीडियो विश्लेषण में अक्सर दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स को विक्रांत के साथ देखा गया है। एक सामान्य फॉर्मेशन में केंद्र में आईएनएस विक्रांत होता है, दोनों ओर कोलकाता क्लास के डेस्ट्रॉयर तैनात रहते हैं, और तिरछी दिशा में शिवालिक क्लास, ब्रह्मपुत्र क्लास के साथ दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स दिखाई देती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी तलवार क्लास के जहाज, जैसे आईएनएस तबार, आईएनएस तेग और आईएनएस त्रिखंड, विक्रांत सीबीजी के साथ तैनात रहे। एक्सरसाइज कोंकण 2025 में भी आईएनएस तेग ने विक्रांत के साथ जॉइंट ऑपरेशन में हिस्सा लिया था।

तलवार क्लास के अन्य जहाजों में आईएनएस तलवार, आईएएस तरकश और हाल में शामिल आईएनएस तुशील भी आते हैं। हालांकि सीबीजी की संरचना हर मिशन के अनुसार बदलती रहती है, लेकिन ब्रह्मोस से लैस होने के कारण तलवार और नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स ज्यादा खतरे वाले ऑपरेशनों में मजबूत एंटी-शिप क्षमता देते हैं और विक्रांत के सुरक्षा घेरे को और मजबूत बनाते हैं।

इसके अलावा इन फ्रिगेट्स की डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है। यही कारण है कि कैरियर बैटल ग्रुप में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि ये न सिर्फ पनडुब्बियों और दुश्मन जहाजों पर नजर रखते हैं, बल्कि हवा से आने वाले हमलों से भी कैरियर की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

वहीं डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट की बात करें, तो डेस्ट्रॉयर बड़े होते हैं और ज्यादा ताकतवर होते हैं। इनकी एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता छोटे फ्रिगेट्स के मुकाबले ज्यादा होती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

कॉर्वेट्स भी होते हैं कैरियर बैटल ग्रुप में

आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में अक्सर कॉर्वेट्स को भी शामिल किए जाते हैं। कॉर्वेट्स नौसेना में मध्यम आकार के युद्धपोत होते हैं, जो फ्रिगेट्स से छोटे लेकिन पेट्रोल क्राफ्ट या मिसाइल बोट्स से बड़े होते हैं। ये आमतौर पर 500 से 3,000 टन तक के डिस्प्लेसमेंट वाले होते हैं और मुख्य रूप से (तटीय और उथले समुद्र) में काम करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

इनका मुख्य काम समुद्र के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से होता है, इसलिए सीबीजी में एक मजबूत एंटी-सबमरीन लेयर बनाना जरूरी माना जाता है। कॉर्वेट्स एस्कॉर्ट ड्यूटी भी निभाते हैं। जब जहाजों का समूह एक साथ यात्रा करता है, तो कॉर्वेट्स उन्हें पनडुब्बी या दुश्मन जहाजों से बचाने में मदद करते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

कई कॉर्वेट्स ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों से लैस होते हैं। इसके अलावा ये सीमित एंटी-एयर वारफेयर क्षमता भी रखते हैं, यानी कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान, हेलिकॉप्टर या ड्रोन से सुरक्षा कर सकते हैं। इसके लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, जैसे बराक सीरीज, लगाई जाती हैं। फ्रिगेट्स की तुलना में कॉर्वेट्स सस्ते, तेज और उथले पानी में ज्यादा प्रभावी होते हैं। हालांकि इनकी मारक क्षमता और लंबी दूरी तक संचालन की क्षमता कुछ कम होती है। इसी कारण इन्हें कम स्तर के बहु-भूमिका युद्धपोत कहा जाता है, लेकिन आधुनिक समुद्री सुरक्षा में इनकी अहमियत बहुत ज्यादा है।

कामोर्टा क्लास को प्रोजेक्ट 28 के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय नौसेना की विशेष स्टेल्थ कॉर्वेट कैटेगरी है। इस क्लास के चारों जहाज आईएनएस कामोर्ता, आईएनएस कदमत्त, आईएनएस किल्टन और आईएनएस कवरत्ती सक्रिय सेवा में हैं। करीब 3,500 टन वजनी और 109 मीटर लंबे ये जहाज 25 नॉट्स से अधिक की रफ्तार पकड़ सकते हैं। इनमें आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर, वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस्ड सोनार सिस्टम और एंटी-सबमरीन हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की क्षमता होती है। इनकी डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है और शोर स्तर भी कम रहता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

आईएनएस विक्रांत मुख्य रूप से वेस्टर्न कमांड से ऑपरेट होता है, जहां सबमरीन गतिविधियों की संभावना को ध्यान में रखते हुए एंटी-सबमरीन सुरक्षा बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में कामोर्टा क्लास कॉर्वेट्स सीबीजी के उस सुरक्षा घेरे का हिस्सा बनती हैं, जो समुद्र की सतह के नीचे से आने वाले खतरों पर नजर रखता है। हालांकि हर मिशन में इनकी संख्या तय नहीं होती, लेकिन खतरे के स्तर के अनुसार एक या दो कामोर्टा क्लास जहाज विक्रांत के साथ तैनात किए जा सकते हैं।

वहीं आईएनएस विक्रमादित्य के सीबीजी में आमतौर पर कोलकाता श्रेणी के डेस्ट्रॉयर, तलवार श्रेणी के फ्रिगेट और दीपक श्रेणी के टैंकर शामिल होते हैं। इस ग्रुप में कॉर्वेट्स हमेशा मुख्य हिस्सा नहीं होते, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़ा जा सकता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

रिप्लेनिशमेंट शिप्स होते हैं सीबीजी की लॉजिस्टिक्स रीढ़

फ्लीट सपोर्ट या रिप्लेनिशमेंट शिप्स किसी भी कैरियर बैटल ग्रुप की असली लॉजिस्टिक्स रीढ़ मानी जाती हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट चाहे कितने भी आधुनिक क्यों न हों, अगर उन्हें समय-समय पर ईंधन, गोला-बारूद और जरूरी सामान न मिले, तो वे लंबे समय तक समुद्र में नहीं टिक सकते। यही काम ये सपोर्ट शिप्स करती हैं।

इनका सबसे अहम काम अंडरवे रिप्लेनिशमेंट यानी यूएनआरईपी होता है। इसका मतलब समुद्र में चलते हुए जहाजों को ही डीजल, एविएशन फ्यूल, गोला-बारूद, भोजन, पानी और जरूरी स्पेयर पार्ट्स पहुंचाना है। यह ट्रांसफर जहाज के बराबर चलकर या पीछे से किया जाता है। कई सपोर्ट शिप्स पर हेलिपैड और हैंगर भी होते हैं, जिससे हेलीकॉप्टर ऑपरेशन और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे काम भी किए जा सकते हैं। आपदा या मानवीय सहायता के समय ये जहाज एचएडीआर ऑपरेशन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। आम तौर पर कैरियर बैटल ग्रुप में एक या दो ऐसी शिप्स शामिल होती हैं और वे फॉर्मेशन के पीछे सुरक्षित दूरी पर रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

आईएनएस विक्रांत के साथ अक्सर दीपक क्लास फ्लीट टैंकर तैनात की जाती है। इस क्लास की प्रमुख शिप है आईएनएस दीपक (A50) है। लगभग 27,500 टन वजनी यह जहाज बड़े पैमाने पर ईंधन और सप्लाई ट्रांसफर करने में सक्षम है और एक साथ कई जहाजों को यूएनआरईपी दे सकता है। इसके अलावा आईएनएस शक्ति (A57) भी जरूरत पड़ने पर विक्रांत सीबीजी का हिस्सा बनती है।

साथ ही, आईएनएस आदित्य (A59) और आईएनएस ज्योति (A58) जैसे टैंकर भी लंबे डिप्लॉयमेंट में सपोर्ट देते हैं। भविष्य में बड़े एचएसएल क्लास सपोर्ट जहाज भी शामिल होने वाले हैं, जिससे समुद्र में भारत की ब्लू-वाटर क्षमता और मजबूत होगी। कुल मिलाकर, ये फ्लीट सपोर्ट शिप्स ही वह ताकत हैं जो विक्रांत और उसके कैरियर बैटल ग्रुप को हफ्तों और महीनों तक समुद्र में सक्रिय बनाए रखती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

IFR 2026 INS Vikrant CBG

गुपचुप विक्रांत को सुरक्षा देती हैं सबमरींस

आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में सबमरीन्स भी शामिल होती हैं, लेकिन ये सरफस पर दिखाई नहीं देतीं। ये पानी के भीतर तैनात रहकर पूरे ग्रुप को अंडरवाटर सुरक्षा देती हैं। इनका मुख्य काम एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से माना जाता है, इसलिए सीबीजी में अंडरवाटर सुरक्षा बेहद अहम होती है।

ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण भारतीय नौसेना हर मिशन में शामिल सबमरीन्स के नाम सार्वजनिक नहीं करती, लेकिन हाल की एक्सरसाइज और रिपोर्ट्स में देखा गया है कि आम तौर पर एक से तीन सबमरींस सीबीजी के साथ तैनात रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

विक्रांत के साथ सीबीजी में आदर्श तौर पर न्यूक्लियर पावर वाली अटैक सबमरीन, यानी एसएसएन, शामिल होनी चाहिए। चूंकि भारतीय नौसेना के पास कोई स्वदेशी ऑपरेशनल एसएसएन मौजूद नहीं है। इसी वजह से अभी सीबीजी की सुरक्षा के लिए कलवरी क्लास की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन, जिन्हें एसएसके भी कहा जाता है, तैनात की जाती हैं। खासकर आईएनएस विक्रांत के साथ इन्हीं पनडुब्बियों को लगाया जाता है।

दुनिया की बड़ी नौसेनाएं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस, अपने कैरियर ग्रुप के साथ एसएसएन तैनात करती हैं। इसका कारण साफ है। न्यूक्लियर प्रोपल्शन की वजह से ऐसी पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। उन्हें बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी रफ्तार भी ज्यादा होती है और वे कैरियर के साथ तेज रफ्तार में चल सकती हैं। दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर हमला करने में एसएसएन बहुत प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

भारत में स्वदेशी एसएसएन परियोजना अभी डिजाइन और विकास के चरण में है। माना जा रहा है कि 2030 के दशक में पहली स्वदेशी एसएसएन नौसेना में शामिल हो सकती है। रूस से लीज पर ली गई आईएनएस चक्रा अब सेवा में नहीं है और अगली लीज भी अभी समय ले रही है। इसलिए फिलहाल भारतीय नौसेना के पास सीबीजी के साथ स्थायी रूप से तैनात करने के लिए कोई एसएसएन उपलब्ध नहीं है।

ऐसी स्थिति में कलवरी क्लास की यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित ये पनडुब्बियां काफी शांत यानी लो एकॉस्टिक सिग्नेचर वाली हैं। पानी के अंदर इनका पता लगाना आसान नहीं होता। इनके पास एंटी-शिप मिसाइल और भारी टॉरपीडो जैसे हथियार हैं। जरूरत पड़ने पर ये समुद्र में माइंस भी बिछा सकती हैं। इनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि ये दुश्मन की पनडुब्बियों की खोज और निगरानी कर सकती हैं, जिससे कैरियर की सुरक्षा मजबूत होती है।

कलवरी क्लास, यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस में आईएनएस कलवरी, आईएनएस खंडेरी, आईएनएस करंज, आईएनएस वेला और आईएनएस वाग्शीर जैसी सबमरींस शामिल हैं। लगभग 1,800 टन वजनी ये सबमरीन्स स्टेल्थ क्षमता से लैस हैं और एक्सोसेट मिसाइल तथा हेवीवेट टॉरपीडो दागने में सक्षम हैं। पूर्वी नौसैनिक बेड़े के साथ विक्रांत के संचालन के दौरान इन्हें प्राथमिक अंडरवाटर एस्कॉर्ट माना जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

जब आईएनएस विक्रांत समुद्र में ऑपरेशन पर निकलता है, तो उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, फ्लीट टैंकर और एयर विंग के अलावा पनडुब्बियां भी तैनात रहती हैं। यही पनडुब्बियां समुद्र के नीचे एक सुरक्षा घेरा बनाती हैं। वे आसपास के क्षेत्र को साफ यानी सैनेटाइज करती हैं, ताकि कोई दुश्मन पनडुब्बी या जहाज पास न आ सके। हिंद महासागर के उथले और तटीय इलाकों में डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां काफी कारगर मानी जाती हैं। इसलिए मौजूदा हालात में विक्रांत के मुकाबले स्पीड कम होने के बाद भी कलवरी क्लास भारतीय सीबीजी के लिए एक प्रभावी समाधान साबित हो रही हैं।

अक्टूबर 2025 में हुई एक्सरसाइज कोंकण के दौरान एक कलवरी क्लास सबमरीन ने ब्रिटेन की नौसेना के साथ संयुक्त पनडुब्बी खोज अभ्यास में हिस्सा लिया था। इसी तरह ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी विक्रांत सीबीजी के साथ कवलरी क्लास सबमरीन्स की तैनाती देखी गई थी।

इसके अलावा शिशुमार क्लास और सिंधुघोष क्लास की कुछ पुरानी लेकिन सक्रिय सबमरींस भी जरूरत के अनुसार शामिल की जा सकती हैं। शिशुमार क्लास को टाइप 209/1500 के नाम से जाना जाता है। ये पुरानी जरूर हैं, लेकिन अब भी सक्रिय सेवा में है। इस श्रेणी में आईएनएस शाल्कि और आईएनएस शंकुश जैसी पनडुब्बियां शामिल हैं। अपनी विश्वसनीयता और ऑपरेशनल अनुभव के कारण ये अब भी नौसेना के बेड़े का हिस्सा बनी हुई हैं।

वहीं सिंधुघोष क्लास, जिसे किलो क्लास भी कहा जाता है, रूसी मूल की पनडुब्बियां हैं। इस श्रेणी में आीएनएस सिधुंरक्षक शामिल रही हैं। ये लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम हैं और कई वर्षों तक भारतीय नौसेना की अंडरवाटर स्ट्राइक क्षमता का आधार रही हैं। हालांकि समय के साथ इनकी जगह धीरे-धीरे आधुनिक कलवरी क्लास पनडुब्बियां ले रही हैं, जो ज्यादा स्टेल्थ और एडवांस तकनीक से लैस हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)

अब दुश्मन के ड्रोनों को ‘बंदी’ बनाएगी भारतीय सेना! खरीदेगी ये खास ‘जाल’

Indian Army Drone Catcher System
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Indian Army Drone Catcher System: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से पाकिस्तान ने खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए सस्ते और छोटे ड्रोन इस्तेमाल किए थे, उसे देखते हुए भारतीय सेना भी कमर कस रही है। अब छोटे और कम दिखाई देने वाले दुश्मन ड्रोनों से निपटने के लिए सेना नई तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए “ड्रोन कैचर सिस्टम” यानी डीसीएस खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए सेना की तरफ से रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। (Indian Army Drone Catcher System)

पिछले कुछ समय से कम रडार सिग्नेचर यानी लो-आरसीएस वाले ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे आकार और कम रडार पहचान के कारण इन्हें पकड़ना और गिराना पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बनता जा रहा है। (Indian Army Drone Catcher System)

Indian Army Drone Catcher System: क्यों जरूरी हुआ ड्रोन कैचर सिस्टम?

आरएफआई के शुरुआत में साफ कहा गया है कि लो-आरसीएस ड्रोन, चाहे अकेले आएं या झुंड यानी स्वॉर्म में, अब एक बड़ा खतरा बन चुके हैं। हाल के ऑपरेशनों में भी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल देखा गया, जिसने सेना को अलग से “ड्रोन पकड़ने” वाली क्षमता डेवलप करने की जरूरत का अहसास कराया।

अब तक ज्यादातर सिस्टम ड्रोन को जाम करने या मार गिराने में एक्सपर्ट थे, लेकिन कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं जिनमें ड्रोन को सही सलामत पकड़ना ज्यादा उपयोगी होता है। इससे उसकी तकनीक, कैमरा, डेटा और सोर्स के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। यही काम यह नया ड्रोन कैचर सिस्टम करेगा। (Indian Army Drone Catcher System)

ड्रोन कैचर सिस्टम में क्या-क्या होगा?

आरएफआई के मुताबिक यह सिस्टम तीन मुख्य हिस्सों से मिलकर बनेगा– ड्रोन सेंसर, ड्रोन कैचर और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (जीसीएस)। ड्रोन सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (ईएसए) टेक्नोलॉजी या उससे बेहतर तकनीक पर आधारित होगा। इसे 360 डिग्री कवरेज देना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को डिटेक्ट और ट्रैक करने की क्षमता रखनी होगी। यह भी शर्त रखी गई है कि ये सेंसर 0.01 वर्ग मीटर के छोटे आरसीएस वाले टारगेट्स को भी कम से कम 4 किलोमीटर की दूरी से पहचान सकें।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन इस पूरे सिस्टम का दिमाग होगा। सेंसर से मिली जानकारी यहीं आएगी, जहां माइक्रोप्रोसेसर के जरिए टारगेट की गणना की जाएगी और ड्रोन कैचर को निर्देश भेजे जाएंगे। जीसीएस में लैपटॉप या टैबलेट आधारित इंटरफेस होगा, जिसमें दुश्मन ड्रोन की दिशा, दूरी और ऊंचाई जैसी जानकारी दिखेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

तीसरा और सबसे अहम हिस्सा है ड्रोन कैचर। यह खुद एक ड्रोन होगा, जो दुश्मन ड्रोन के पास जाकर उस पर जाल फेंकेगा और उसे निष्क्रिय करेगा। इसे पूरी तरह ऑटोनॉमस यानी स्वायत्त रूप से काम करने में सक्षम होना होगा।

सिर्फ जाल ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक हमला भी

इस सिस्टम में केवल जाल फेंककर ड्रोन पकड़ने की सुविधा ही नहीं होगी, बल्कि एक जैमर सबसिस्टम भी होगा । यह रेडियो फ्रीक्वेंसी डिनायल, सिलेक्टिव जीएनएसएस डिनायल और जीएनएसएस डीसैप्शन जैसी इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेगा।

अगर दुश्मन ड्रोन सैटेलाइट नेविगेशन या रेडियो सिग्नल के जरिए कंट्रोल हो रहा है, तो यह सिस्टम उसके सिग्नल को काट या भ्रमित कर सकता है। इससे ड्रोन अपना रास्ता भटक सकता है या जमीन पर गिर सकता है। (Indian Army Drone Catcher System)

हर इलाके में करे काम

सेना ने स्पष्ट किया है कि यह सिस्टम भारत के हर तरह के इलाके में काम करने योग्य होना चाहिए। इसमें मैदान, रेगिस्तान, तटीय इलाके और 4500 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं।

साथ ही, ये सिस्टम ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस के अलावा 95 प्रतिशत तक नमी में काम करना चाहिए। (Indian Army Drone Catcher System)

मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि ड्रोन सेंसर को “आकाशतीर” कमांड एंड रिपोर्टिंग मॉड्यूल के साथ इंटीग्रेट करने की क्षमता होनी चाहिए। इसका मतलब है कि यह सिस्टम अलग-थलग नहीं रहेगा, बल्कि सेना के मौजूदा एयर डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा बन सकेगा।

इस तरह दुश्मन ड्रोन की जानकारी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम तक भी पहुंचाई जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर मिसाइल या अन्य हथियारों से भी कार्रवाई हो सकेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

इंडिजिनियस कंटेंट पर जोर

आरएफआई में साफ कहा गया है कि कुल इंडिजिनियस कंटेंट यानी स्वदेशी सामग्री कम से कम 50 फीसदी होनी चाहिए, जो डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर 2020 के नियमों के मुताबिक है।

इसका मतलब है कि कंपनियों को भारत में ही ज्यादा से ज्यादा निर्माण और तकनीक विकसित करनी होगी। इससे देश की रक्षा इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

यह अभी शुरुआती चरण है। कंपनियों को 17 मार्च तक जानकारी और प्रपोजल जमा करने होंगे। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, ट्रायल और फिर कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन की प्रक्रिया चलेगी। अगर सब कुछ तय समय पर आगे बढ़ा, तो आने वाले कुछ सालों में सेना के पास एक डेडिकेटेड ड्रोन कैचर क्षमता होगी। (Indian Army Drone Catcher System)

असम राइफल्स ने ऑर्डर कीं 1013 स्वदेशी ‘अस्मी’ कार्बाइन, लोकेश मशींस को मिली बड़ी कामयाबी

ASMI SMG
Assam Rifles Orders 1013 Indigenous ASMI Carbines from Lokesh Machines

ASMI SMG: अर्धसैनिक बल असम राइफल्स ने हैदराबाद की कंपनी लोकेश मशींस लिमिटेड को 1013 ‘अस्मी’ कार्बाइन की सप्लाई का ऑर्डर दिया है। टेक्नो-कमर्शियल इवैल्यूएशन के बाद कंपनी सबसे कम बोली लगाने वाली यानी एल-1 (L1) के तौर पर चुनी गई। ‘अस्मी’ सब-मशीन गन (एसएमजी) पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण (आईडीडीएम) कैटेगरी के तहत बनाया गया है। इससे देश में छोटे हथियारों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूती मिलती है।

ASMI SMG: स्पेशल फोर्सेज को ‘अस्मी’ सब-मशीन गन

यह लोकेश मशींस लिमिटेड की यह दूसरी बड़ी सफलता है। इससे पहले 6 अप्रैल 2024 को कंपनी ने भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज के लिए 550 ‘अस्मी’ सब-मशीन पिस्टल का ऑर्डर हासिल किया था। उस समय कंपनी ने कई बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़ते हुए लगभग 4.6 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट जीता था। यह ‘इंसास’ राइफल के बाद स्वदेशी छोटे हथियारों का पहला बड़ा ऑर्डर माना गया था। (ASMI SMG)

क्या है ‘अस्मी’ कार्बाइन?

‘अस्मी’ 9×19 मिमी कैलिबर की कॉम्पैक्ट कार्बाइन है। इसे करीब एक दशक से भी ज्यादा समय से सेवा में रही ब्रिटिश डिजाइन की स्टर्लिंग कार्बाइनों की जगह लेने के उद्देश्य से तैयार किया गया। पुराने हथियारों को बदलने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

इस हथियार को बेहद कम लागत पर तैयार किया गया है। इसकी अनुमानित कीमत प्रति यूनिट 50 हजार रुपये से कम बताई जाती है। कम कीमत और भरोसेमंद डिजाइन के कारण इसे भविष्य में निर्यात के लिए भी उपयुक्त माना जा रहा है। (ASMI SMG)

किसने किया डिजाइन?

‘अस्मी’ का डिजाइन भारतीय सेना के कर्नल प्रसाद बंसोड़ ने तैयार किया। पिछले 75 वर्षों में वे ऐसे सैन्य अधिकारी हैं जिन्होंने स्वयं हथियार डिजाइन किया। इसका विकास डीआरडीओ के तहत आने वाली पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) में किया गया।

यह कार्बाइन लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन है और भारतीय सेना के अलावा एनएसजी, आईटीबीपी और बीएसएफ जैसी एजेंसियों को भी सीमित संख्या में दी जा चुकी है। (ASMI SMG)

क्यों है यह सौदा अहम?

असम राइफल्स पूर्वोत्तर क्षेत्र में तैनात देश का एक प्रमुख अर्धसैनिक बल है। वहां के दुर्गम इलाकों में हल्के और भरोसेमंद हथियारों की जरूरत होती है। ‘अस्मी’ कार्बाइन हल्की, कॉम्पैक्ट और नजदीकी मुकाबले में उपयोगी मानी जाती है। ऐसे इलाकों में इस तरह के हथियार होने से जवानों को फायदा मिलता है। वहीं, असम राइफल्स को अस्मी की सप्लाई इस बात का संकेत भी है कि स्वदेशी छोटे हथियारों पर सुरक्षा बलों का भरोसा बढ़ रहा है।

हाल ही में जिंदल डिफेंस ने ब्राजील की कंपनी टॉरस के साथ साझेदारी में टी-9 मशीन पिस्टल का भी ऑर्डर हासिल किया था। वह ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के तहत भारत में निर्मित की जा रही है। इससे स्पष्ट है कि छोटे हथियारों के क्षेत्र में निजी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ रही है। (ASMI SMG)

मशीन गन भी बनाई

लोकेश मशीन टूल्स ने एआरडीई के साथ मिलकर 7.62×51 मिमी बेल्ट-फेड मीडियम मशीन गन (एमएमजी) भी विकसित की है। यह प्रति मिनट लगभग 800 राउंड फायर कर सकती है और इसकी प्रभावी मारक दूरी 1800 मीटर तक बताई जाती है। इसे जहाजों, बख्तरबंद वाहनों और हेलीकॉप्टर पर भी लगाया जा सकता है। (ASMI SMG)

कंपनी को अगस्त 2025 में 17.7 करोड़ रुपये का एक और ऑर्डर मिला था, जिसमें सेवा में मौजूद बेल्जियम मूल की मैग-58 मशीन गन के पुर्जों की सप्लाई शामिल थी। यह गन भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित होती रही है।

सरकार लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता कम करने पर जोर दे रही है। छोटे हथियारों के क्षेत्र में पहले बड़े पैमाने पर आयात होता था। अब निजी उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से स्वदेशी विकल्प सामने आ रहे हैं। (ASMI SMG)