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अरब सागर बना एक्टिव जोन! भारत-पाकिस्तान ने जारी किए बैक-टू-बैक NOTAM

India Pakistan NOTAM Missile Test
India-Pakistan Issue Back-to-Back NOTAMs for Missile Tests in Arabian Sea (Photo: @notam_in/X)

India Pakistan NOTAM Missile Test: अरब सागर में भारत और पाकिस्तान दोनों ने लगभग एक ही समय के आसपास मिसाइल परीक्षण से जुड़े नोटिस जारी किए हैं, जिसे नोटम यानी “नोटिस टू एयरमेन” कहा जाता है। इन नोटिस के जरिए समुद्र और आसमान में चलने वाले जहाजों और विमान को पहले से चेतावनी दी जाती है कि तय क्षेत्र में सैन्य गतिविधि होने वाली है।

India Pakistan NOTAM Missile Test: अरब सागर में जारी हुए नोटम

पाकिस्तान ने 20 अप्रैल की सुबह से 21 अप्रैल तक के लिए अपना नोटम जारी किया है। वहीं भारत ने 22 अप्रैल से 25 अप्रैल तक के लिए अलग नोटम जारी किया है। दोनों देशों के नोटम वाले क्षेत्र अरब सागर में एक-दूसरे के करीब हैं।

पाकिस्तान का नोटम करीब 200 किलोमीटर के इलाके को कवर करता है, जबकि भारत का क्षेत्र इससे लगभग दोगुना यानी करीब 400 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का नोटम ज्यादा बड़ा और व्यापक है। (India Pakistan NOTAM Missile Test)

क्या होता है नोटम

नोटम एक तरह का अलर्ट होता है, जिसे सिविल एविएशन और समुद्री गतिविधियों के लिए जारी किया जाता है। जब किसी इलाके में मिसाइल टेस्ट, लाइव फायरिंग या कोई बड़ा सैन्य अभ्यास होना होता है, तो उस क्षेत्र को कुछ समय के लिए खाली रखने की जानकारी दी जाती है। इसका मकसद सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है, ताकि कोई विमान या जहाज गलती से उस क्षेत्र में न पहुंच जाए।

पाकिस्तान के नोटम को हाल में किए गए उसके मिसाइल टेस्ट से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ दिन पहले पाकिस्तान ने अरब सागर में एक नए शिप-लॉन्च्ड एंटी-शिप मिसाइल का परीक्षण किया था। ऐसे में यह नया नोटम उसी का हिस्सा माना जा रहा है। (India Pakistan NOTAM Missile Test)

भारत की तरफ से जारी नोटम के बारे में माना जा रहा है कि इसमें नौसेना या मिसाइल से जुड़ा अभ्यास हो सकता है। भारत आमतौर पर ब्रह्मोस, अग्नि या समुद्र से लॉन्च होने वाले सिस्टम्स का परीक्षण करता रहा है। बड़ा इलाका तय होने से यह संकेत मिलता है कि रेंज लंबी हो सकती है।

इन नोटम के साथ-साथ अरब सागर में नौसैनिक गतिविधियां भी बढ़ी हुईहैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने अपने निगरानी जहाजों को इस इलाके में तैनात किया है, ताकि गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।

दूसरी तरफ पाकिस्तान के कुछ नौसैनिक जहाज श्रीलंका के दौरे पर हैं। ये जहाज वहां एक संयुक्त अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं। हालांकि यह दौरा पहले से तय कार्यक्रम का हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन नोटम के साथ इसकी टाइमिंग को लेकर चर्चा हो रही है। (India Pakistan NOTAM Missile Test)

क्यों अहम है यह इलाका

अरब सागर भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए बेहद अहम माना जाता है। पाकिस्तान के लिए कराची और ग्वादर जैसे बड़े बंदरगाह इसी इलाके में हैं, जबकि भारत के भी कई महत्वपूर्ण नौसैनिक ठिकाने यहां मौजूद हैं।

यही वजह है कि इस क्षेत्र में होने वाली हर सैन्य गतिविधि पर नजर रखी जाती है। मिसाइल टेस्ट के दौरान दूसरे देश आमतौर पर डेटा जैसे मिसाइल की गति, दिशा और तकनीकी जानकारी जुटाने की कोशिश भी करते हैं, ।

भारत और पाकिस्तान दोनों ही समय-समय पर मिसाइल परीक्षण करते रहते हैं। यह उनकी सामान्य सैन्य तैयारी का हिस्सा होता है। ऐसे परीक्षण पहले से तय होते हैं और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत उनकी जानकारी नोटम के जरिए दी जाती है।

हालांकि जब दोनों देश एक साथ या करीब-करीब समय पर ऐसे नोटिस जारी करते हैं, तो इस पर ज्यादा ध्यान जाता है। (India Pakistan NOTAM Missile Test)

ऑपरेशन सिंदूर का एक साल

यह गतिविधियां उस समय सामने आई हैं, जब करीब एक साल पहले दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा था। अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर किया था, जिसके तहत पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया था। उस घटना के बाद कुछ समय के लिए दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। (India Pakistan NOTAM Missile Test)

वियना में वर्ल्ड बॉर्डर सिक्योरिटी कांग्रेस में शामिल हुई भारतीय कोस्ट गार्ड, समुद्री सुरक्षा पर दुनिया के सामने रखा अपना मॉडल

India Maritime Security Vienna Congress

India Maritime Security Vienna Congress: भारत ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी समुद्री सुरक्षा क्षमता और नेतृत्व को मजबूती से पेश किया है। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में आयोजित वर्ल्ड बॉर्डर सिक्योरिटी कांग्रेस 2026 में भारतीय तटरक्षक बल के प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया और समुद्री सुरक्षा से जुड़े अपने अनुभव और मॉडल दुनिया के सामने रखे।

यह सम्मेलन 14 से 16 अप्रैल के बीच वियना में आयोजित किया गया था। इसमें दुनिया के कई देशों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, सुरक्षा विशेषज्ञ और इंडस्ट्री से जुड़े लोग शामिल हुए। सम्मेलन में सीमा सुरक्षा, नई चुनौतियों और तकनीक के इस्तेमाल पर विस्तार से चर्चा की गई।

यह सम्मेलन साल 2012 से लगातार आयोजित किया जा रहा है और आज इसे सीमा सुरक्षा से जुड़े सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय मंचों में गिना जाता है। यहां अलग-अलग देशों के अधिकारी, सुरक्षा विशेषज्ञ और इंडस्ट्री के लोग एक साथ बैठकर सीमा प्रबंधन, नई सुरक्षा चुनौतियों, तकनीक के इस्तेमाल और आपसी सहयोग पर चर्चा करते हैं। 2026 के इस संस्करण में 60 से ज्यादा देशों के करीब 450 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए।

भारत की तरफ से तीन सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल इसमें शामिल हुआ, जिसकी अगुवाई भारतीय तटरक्षक बल के अतिरिक्त महानिदेशक आनंद प्रकाश बडोला ने की। आनंद प्रकाश बडोला नेविगेशन और डायरेक्शन के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने भारतीय नौसेना अकादमी से प्रशिक्षण लिया है और अमेरिका के यूएस नेवल वॉर कॉलेज, न्यूपोर्ट में भी पढ़ाई की है। इसके अलावा उन्होंने रसायन शास्त्र में मास्टर्स की डिग्री भी हासिल की है।

अपने करियर के दौरान उन्होंने तटरक्षक बल के लगभग हर तरह के जहाजों की कमान संभाली है, जिसमें इनशोर पेट्रोल वेसल, फास्ट पेट्रोल वेसल, ऑफशोर पेट्रोल वेसल और एडवांस ऑफशोर पेट्रोल वेसल शामिल हैं। वे पहले पॉलिसी एंड प्लान्स विंग के प्रमुख भी रह चुके हैं, जहां उन्होंने संगठन की लंबी अवधि की योजना और क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। नवंबर 2024 से वे अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

सम्मेलन के दौरान आनंद प्रकाश बडोला ने “मैरिटाइम सेफ्टी और सिक्योरिटी” विषय पर बोलते हुए कहा कि भारत का तटरक्षक बल समुद्र में सुरक्षा बनाए रखने, अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। (India Maritime Security Vienna Congress)

उन्होंने यह भी कहा कि समुद्री सीमाएं जमीन की सीमाओं से अलग होती हैं। यहां निगरानी और सुरक्षा का काम ज्यादा जटिल होता है, क्योंकि समुद्र खुला होता है और कई देशों की गतिविधियां एक साथ चलती रहती हैं। ऐसे में तस्करी, अवैध घुसपैठ और अन्य अपराधों का खतरा बना रहता है।

अपने संबोधन में भारतीय प्रतिनिधि ने इस बात पर जोर दिया कि समुद्री सुरक्षा के लिए देशों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। अलग-अलग एजेंसियों के बीच कॉर्डिनेशन और इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी स्ट्रक्चर होना चाहिए, ताकि बदलती चुनौतियों का सामना किया जा सके। (India Maritime Security Vienna Congress)

उन्होंने यह भी साफ किया कि हर देश की संप्रभुता का सम्मान करते हुए ही इस तरह का सहयोग आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

इस सम्मेलन में भारत ने अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए अपनाए गए तरीकों और सिस्टम को भी प्रस्तुत किया। इसमें तटरक्षक बल द्वारा किए जा रहे निगरानी कार्य, बचाव अभियान और कानून लागू करने की प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी दी गई।

भारत ने यह दिखाने की कोशिश की कि कैसे वह अपने विशाल समुद्री क्षेत्र में लगातार निगरानी रखता है और किसी भी आपात स्थिति में तेजी से कार्रवाई करता है। (India Maritime Security Vienna Congress)

बता दें कि भारतीय तटरक्षक बल देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। इसका काम सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समुद्र में होने वाली तस्करी, अवैध मछली पकड़ने और पर्यावरण से जुड़े मामलों पर भी नजर रखता है।

इसके अलावा समुद्र में फंसे लोगों को बचाने, आपदा के समय राहत पहुंचाने और समुद्री कानून लागू करने का काम भी इसी बल के जिम्मे होता है।

सम्मेलन में समुद्री सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसमें तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल, समुद्र में बढ़ती गतिविधियों और नए तरह के खतरों को लेकर विचार साझा किए गए। (India Maritime Security Vienna Congress)

भारत बना ऑस्ट्रेलिया का टॉप सिक्योरिटी पार्टनर, 887 बिलियन डॉलर का करेगा निवेश

Australia Defence Strategy 2026 India
Raksha Mantri Rajnath Singh with Australian Deputy Prime Minister and Minister for Defence Mr Richard Marles (File Photo)

Australia Defence Strategy 2026 India: ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नई नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी 2026 में भारत को एक खास दर्जा दिया है। इस डॉक्यूमेंट में भारत को “टॉप-टियर सिक्योरिटी पार्टनर” और हिंद महासागर के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण डिफेंस पार्टनर बताया गया है। इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने अगले दस साल में डिफेंस सेक्टर पर करीब 887 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने की योजना भी सामने रखी है।

Australia Defence Strategy 2026 India: भारत को क्यों दिया ये खास दर्जा

ऑस्ट्रेलिया की इस नई रणनीति में साफ कहा गया है कि भारत उसके लिए सिर्फ एक साझेदार नहीं, बल्कि बेहद अहम सुरक्षा सहयोगी है। खास तौर पर हिंद महासागर का उत्तर-पूर्वी हिस्सा ऑस्ट्रेलिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी रास्ते से तेल, गैस और कोयले जैसे जरूरी संसाधनों की सप्लाई होती है।

ऑस्ट्रेलिया का मानना है कि इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना जरूरी है और इसके लिए भारत की भूमिका अहम है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

किन क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग

इस रणनीति में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। इसमें रक्षा और सुरक्षा के साथ-साथ व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी और ग्रीन डेवलपमेंट जैसे सेक्टर शामिल हैं।

दोनों देश अब सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि जमीन पर काम करने वाले प्रोजेक्ट्स पर ध्यान दे रहे हैं। इसमें डिफेंस इंडस्ट्री को साथ लाना, नई तकनीक साझा करना और जरूरी सूचनाओं का आदान-प्रदान करना शामिल है।

इसके अलावा सेना के बीच तालमेल बढ़ाने यानी इंटरऑपरेबिलिटी पर भी जोर है। इसके तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के साथ ज्यादा अभ्यास करेंगी, जिससे ऑपरेशन के समय बेहतर तालमेल हो सके।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर फोकस

ऑस्ट्रेलिया की रणनीति में हिंद-प्रशांत क्षेत्र को खास अहमियत दी गई है। इस क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों और बदलते हालात को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की योजना बना रहा है।

इसमें समुद्र में नियमित तैनाती, संयुक्त अभ्यास और ट्रेनिंग शामिल हैं। भारत के साथ मिलकर समुद्री निगरानी यानी मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस को भी मजबूत किया जाएगा।

इसके अलावा आपदा राहत और मानवीय सहायता जैसे कामों में भी सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है।

क्वाड की भूमिका भी अहम

इस रणनीति में क्वाड समूह का भी जिक्र किया गया है, जिसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि इस मंच के जरिए क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम किया जाएगा।

क्वाड के तहत समुद्री सुरक्षा, ऑपरेशनल तालमेल और आपदा के समय मदद जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाया जाएगा।

रक्षा निवेश पर बड़ा ऐलान

ऑस्ट्रेलिया ने इस रणनीति के साथ एक बड़ा निवेश कार्यक्रम भी घोषित किया है। इसके तहत अगले दस साल में करीब 887 बिलियन अमेरिकी डॉलर रक्षा क्षेत्र पर खर्च किए जाएंगे।

इसमें से लगभग 425 बिलियन डॉलर नई क्षमताओं को विकसित करने पर खर्च होंगे। यह पैसा नई तकनीक, हथियारों और सिस्टम को विकसित करने में लगाया जाएगा।

इस निवेश का मकसद ऑस्ट्रेलिया की सैन्य क्षमता को मजबूत करना और बदलते हालात के मुताबिक खुद को तैयार रखना है।

किन सेक्टर्स में होगा निवेश

इस फंडिंग के तहत कई अहम क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार, ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम, साइबर सुरक्षा और स्पेस टेक्नोलॉजी शामिल हैं।

इसके अलावा पानी के नीचे होने वाली लड़ाई यानी अंडरसी वॉरफेयर पर भी खास जोर रहेगा। पनडुब्बियों और उनसे जुड़ी तकनीक को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश किया जाएगा।

ऑस्ट्रेलिया अपने रक्षा उद्योग को भी मजबूत करना चाहता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा उपकरण देश के अंदर ही बनाए जा सकें। इसके लिए दूसरे देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने की भी योजना है, जिसमें भारत भी शामिल है।

बदलते वैश्विक हालात का असर

इस नई रणनीति में दुनिया के बदलते हालात का भी जिक्र किया गया है। ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि आज का माहौल पहले से ज्यादा अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण हो गया है।

कई जगह एक साथ तनाव की स्थिति बनी हुई है और नई तकनीकों के कारण युद्ध का तरीका भी बदल रहा है। ऐसे में देश अपनी सुरक्षा व्यवस्था को नए तरीके से तैयार कर रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने भी अपनी रणनीति में यही दिखाने की कोशिश की है कि वह सिर्फ अपने क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत इलाके में संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाना चाहता है।

भारत और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप के तहत जुड़े हुए हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा अभ्यास, ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी सहयोग लगातार बढ़ रहा है। वहीं, नई रणनीति सामने आने के बाद लगता है किऑस्ट्रेलिया भारत को अपने सबसे भरोसेमंद साझेदारों में गिनता है। खास तौर पर समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के मामले में भारत की भूमिका को अहम माना गया है। (Australia Defence Strategy 2026 India)

तीन दिन के दौरे पर जर्मनी जाएंगे राजनाथ सिंह, Project 75I पनडुब्बी डील पर लग सकती है मुहर

Project 75I Submarine Deal
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Project 75I Submarine Deal: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 21 अप्रैल से तीन दिवसीय दौरे पर जर्मनी जा रहे हैं। इस यात्रा को भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। इस दौरान बर्लिन में वे जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस से मिलेंगे, जहां कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। वहीं रक्षा मंत्री की जर्मनी यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना के लिए प्रस्तावित प्रोजेक्ट 75आई पनडुब्बी सौदे को भी अंतिम रूप दिया जा सकता है। इस सौदे की लागत लगभग 8 से 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 67,000 से 99,000 करोड़ रुपये) है, जिसके तहत भारतीय नौसेना को छह अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी।

सूत्रों के मुताबिक, इस दौरे में रक्षा मंत्री जर्मनी के शीर्ष सरकारी अधिकारियों, सैन्य नेतृत्व और डिफेंस इंडस्ट्री से जुड़े प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे। इस बातचीत का मकसद दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, निवेश और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप को आगे बढ़ाना है।

बर्लिन में होने वाली बैठकों में भारत और जर्मनी के बीच लंबे समय तक चलने वाले रणनीतिक सहयोग पर भी चर्चा होगी। खास तौर पर समुद्री सुरक्षा और नौसेना की क्षमता बढ़ाने पर जोर रहेगा।

सूत्रों का कहना है कि इस दौरे में प्रोजेक्ट 75आई के तहत सबमरीन डील पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय नौसेना के लिए छह आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां खरीदी जानी हैं। इन पनडुब्बियों में एडवांस एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम लगाया जाएगा।

इस सिस्टम की मदद से पनडुब्बियां ज्यादा समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। इससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है और ऑपरेशन के दौरान उनकी क्षमता बढ़ती है।

Project 75I Submarine Deal
Foreign Secretary Vikram Misri co-chaired India – Germany Foreign Office Consultations in Berlin with Dr. Géza Andreas von Geyr, State Secretary on 14 April 2026.

Project 75I Submarine Deal: जर्मनी पहुंचे विदेश सचिव

इससे पहले भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री मंगलवार, 14 अप्रैल को जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुंचे। यहां उन्होंने जर्मनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अहम स्तर की बातचीत की। बर्लिन में भारत-जर्मनी विदेश कार्यालय परामर्श की बैठक हुई, जिसकी सह-अध्यक्षता विक्रम मिस्री और जर्मनी के स्टेट सेक्रेटरी डॉ. गेजा आंद्रेयास वॉन गेयर ने की। इस बैठक में दोनों देशों के बीच रिश्तों के पूरे दायरे पर चर्चा हुई। भारत और जर्मनी ने अपने रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के तरीकों पर बात की। बातचीत के दौरान व्यापार और निवेश, रक्षा और सुरक्षा, तकनीक, ग्रीन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट और लोगों की आवाजाही जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसके अलावा दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी अपने विचार साझा किए।

Project 75I Submarine Deal: क्या है प्रोजेक्ट 75आई

प्रोजेक्ट 75आई भारतीय नौसेना का एक बड़ा कार्यक्रम है, जिसके जरिए नई पीढ़ी की पनडुब्बियां शामिल की जानी हैं। इससे पहले प्रोजेक्ट 75 के तहत फ्रांस से स्कॉर्पीन क्लास या कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियां शामिल की गई थीं। अब नया प्रोजेक्ट उससे आगे का कदम माना जा रहा है।

इसमें स्टेल्थ यानी छिपकर काम करने की क्षमता, लंबी दूरी तक ऑपरेशन और आधुनिक हथियारों पर खास ध्यान दिया गया है। इन पनडुब्बियों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे दुश्मन की नजर से दूर रहकर काम कर सकें।

इस सौदे में जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी कंपनी के डिजाइन पर आधारित पनडुब्बियां भारत को मिल सकती हैं। जो टाइप 214 नेक्स्ट जेनरेशन या समान वेरिएंट पर डेवलप की जाएंगी। इनका निर्माण भारत में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में किया जाएगा। इस सौदे में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल होगा, जिससे भारत को पनडुब्बी निर्माण की नई तकनीक सीखने का मौका मिलेगा।

इस सौदे की एक खास बात यह है कि पनडुब्बियों का ज्यादातर निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इससे देश के रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इनका निर्माण शुरू होने में 2-3 साल लग सकते हैं और पहली पनडुब्बी की डिलीवरी 2030 के आसपास हो सकती है।

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत यह सौदा एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे भारत की घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता मजबूत होगी।

इससे पहले मार्च 2026 में जर्मनी के राजदूत फिलिप अकरमैन ने कहा था कि यह सौदा 6 से 8 हफ्तों में फाइनल हो सकता है। कीमत को लेकर बातचीत पूरी हो चुकी है और अब सिर्फ मंजूरी और कॉन्ट्रैक्ट साइन करने की प्रक्रिया चल रही है। (Project 75I Submarine Deal)

क्या होंगी खूबियां

इन पनडुब्बियों का वजन करीब 3,000 टन होगा, और ये मौजूदा कलवरी क्लास से बड़ी होंगी। इनकी लंबाई करीब 65 से 80 मीटर के बीच होगी। इनका इंजन डीजल-इलेक्ट्रिक होगा, लेकिन इसमें खास फ्यूल सेल आधारित एआईपी सिस्टम भी लगाया जाएगा। इस तकनीक की वजह से पनडुब्बी एक बार में 2 से 3 हफ्ते तक पानी के अंदर रह सकती है, जबकि सामान्य पनडुब्बियां करीब 48 घंटे में ऊपर आने को मजबूर हो जाती हैं। इससे इन्हें छिपकर काम करने में ज्यादा मदद मिलती है, क्योंकि बार-बार स्नॉर्कलिंग की जरूरत नहीं पड़ती।

स्पीड की बात करें तो ये सतह पर 12 से 15 नॉट की रफ्तार से चल सकती हैं, जबकि पानी के अंदर इनकी गति 20 से 30 नॉट तक जा सकती है। (Project 75I Submarine Deal)

हथियारों के मामले में ये पनडुब्बियां काफी आधुनिक होंगी। इनमें टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल और जमीन पर हमला करने वाली क्रूज मिसाइलें लगाई जा सकेंगी। जरूरत पड़ने पर ये समुद्र में माइंस भी बिछा सकती हैं। इसके साथ ही इसमें एडवांस कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और कम आवाज करने वाला प्रोपेलर होगा, जिससे दुश्मन के लिए इन्हें पकड़ना मुश्किल होगा।

इनमें इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, टॉरपीडो से बचाव के उपाय और कम दिखने व कम आवाज करने की तकनीक भी होगी। एआईपी सिस्टम की वजह से ये पनडुब्बियां दुश्मन के रडार और सोनार से बचकर लंबे समय तक गुप्त मिशन कर सकती हैं। साथ ही, एआईपी वाली पनडुब्बियां खुफिया अभियान और दुश्मन की सप्लाई लाइनों को बाधित करने में बेहतर साबित होंगी। इससे भारतीय नौसेना की अंडरवाटर वारफेयर क्षमता में क्रांतिकारी सुधार होगा। (Project 75I Submarine Deal)

बातचीत और निवेश पर भी जोर

रक्षा मंत्री के इस दौरे में सिर्फ पनडुब्बी सौदे पर ही नहीं, बल्कि अन्य रक्षा क्षेत्रों में सहयोग पर भी चर्चा होगी। इसमें संयुक्त रिसर्च, नई तकनीक और रक्षा निवेश जैसे मुद्दे शामिल रहेंगे।

सूत्रों के अनुसार, इस दौरान एक डिफेंस इंडस्ट्री इवेंट भी हो सकता है, जिसमें दोनों देशों की कंपनियां हिस्सा लेंगी। इससे रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में नई संभावनाओं पर बातचीत होगी।

भारतीय नौसेना अपने बेड़े को लगातार आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रही है। पुराने प्लेटफॉर्म को धीरे-धीरे हटाकर नए सिस्टम शामिल किए जा रहे हैं। ऐसे में प्रोजेक्ट 75आई को नौसेना की जरूरतों के हिसाब से एक अहम कदम माना जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के जरिए पानी के नीचे काम करने की क्षमता को और मजबूत करने की तैयारी की जा रही है। (Project 75I Submarine Deal)

मोरक्को पहुंचा भारतीय नौसेना का सुदर्शिनी, ब्लू वाटर डिप्लोमेसी को मिलेगी मजबूती

INS Sudarshini Casablanca
CO call on Cmde Omar Nasri, Commodore Director of the Royal Naval School, Morocco

INS Sudarshini Casablanca: भारतीय नौसेना का सेल ट्रेनिंग शिप आईएनएस सुदर्शिनी 15 अप्रैल को मोरक्को के कासाब्लांका पोर्ट पर पहुंच गया। यह पोर्ट कॉल ‘लोकायन 26’ मिशन के तहत उसकी ट्रांसओशेनिक तैनाती का हिस्सा है। इस यात्रा को नौसेना के अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग और संपर्क बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

आईएनएस सुदर्शिनी के कासाब्लांका पहुंचने के साथ ही इस मिशन का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ। यह तैनाती ‘महासागर’ विजन के तहत की जा रही है, जिसका मकसद समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना है। इस पोर्ट विजिट से भारत और मोरक्को के बीच नौसैनिक रिश्तों को और मजबूती मिलने की बात कही जा रही है।

पोर्ट पर पहुंचने के बाद सुदर्शिनी के कमांडिंग ऑफिसर ने मोरक्को की नौसेना के सेंट्रल मेरीटाइम सेक्टर के कमांडर कमोडोर हसन अकौली और रॉयल नेवल स्कूल के डायरेक्टर कमोडोर ओमर नसरी से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच ट्रेनिंग, सहयोग और भविष्य के संयुक्त कार्यक्रमों पर चर्चा हुई।

इस तीन दिन के दौरे के दौरान सुदर्शिनी के क्रू और ट्रेनिंग में शामिल अधिकारी मोरक्को की रॉयल नेवी के कर्मियों के साथ बातचीत करेंगे। जहाज पर वरिष्ठ अधिकारियों और मेहमानों को आमंत्रित किया जाएगा। इसके अलावा प्रोफेशनल और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होंगे, जिससे दोनों देशों के बीच आपसी समझ और तालमेल बढ़ेगा।

INS Sudarshini Casablanca
CO call on Cmde Hassan Akouli, Cmde Commander of Central Maritime Sector, Moroccan Navy

यह यात्रा ट्रेनिंग ले रहे कैडेट्स के लिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुद्री माहौल में काम करने का अनुभव मिलेगा।

पिछले एक साल में भारतीय नौसेना के कई जहाज कासाब्लांका जा चुके हैं। इनमें आईएनएस तबर, आईएनएस तरकश, आईएनएस सुमेधा और आईएनएस तुशील शामिल हैं। इन दौरों के जरिए दोनों देशों के बीच भरोसा और तालमेल बेहतर हुआ है।

इसके अलावा नवंबर 2025 में मोरक्को की नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी रियर एडमिरल मोहम्मद ताहिन ने भारत का दौरा किया था और दक्षिणी नौसैनिक कमांड का निरीक्षण किया था।

आईएनएस सुदर्शिनी अपनी इस यात्रा के दौरान ऐतिहासिक समुद्री रास्तों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से गुजर रहा है। इस मिशन के जरिए भारत अपनी समुद्री पहुंच और वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ा रहा है।

इस पूरी तैनाती का उद्देश्य समुद्र के जरिए देशों के बीच संपर्क, सहयोग और आपसी समझ को मजबूत करना है, जहां भारतीय नौसेना लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।

एक साल बाद पहलगाम हमले की यादें होंगी ताजा, भारत अब वॉशिंगटन में दिखाएगा पाकिस्तानी ‘आतंक का असली चेहरा’

Pahalgam Attack Anniversary
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Pahalgam Attack Anniversary: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को एक साल पूरा होने जा रहा है। 22 अप्रैल 2025 को हुए इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी, जिनमें 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक शामिल थे। अब इस घटना की पहली बरसी से पहले भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश देने की तैयारी में है।

Pahalgam Attack Anniversary: अमेरिका में लगेगी खास प्रदर्शनी

सूत्रों के मुताबिक, वॉशिंगटन में भारतीय दूतावास एक खास एग्जिबिशन आयोजित करने जा रहा है। इस प्रदर्शनी की थीम “ह्यूमन कॉस्ट ऑफ टेररिज्म” रखी गई है। इसे कैपिटल हिल के पास किसी पब्लिक जगह पर लगाया जाएगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देख सकें।

इस एग्जिबिशन में पहलगाम हमले में मारे गए लोगों की कहानियों को दिखाया जाएगा। साथ ही यह भी बताया जाएगा कि आतंकवाद का असर सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है।

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में आतंकियों ने नागरिकों को निशाना बनाकर हमला किया था। यह हमला 2008 के मुंबई हमलों के बाद नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला माना गया। इस हमले की जिम्मेदारी “द रेसिस्टेंस फ्रंट” नाम के संगठन ने ली थी, जिसे पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी माना जाता है। हालांकि बाद में इस संगठन ने अपना बयान वापस ले लिया था। इस घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश देखने को मिला था और सुरक्षा एजेंसियों ने बड़े स्तर पर जांच शुरू की थी।

हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। इसके बाद कई कूटनीतिक कदम उठाए गए। भारत ने सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से रोक दिया और व्यापार व वीजा से जुड़े नियमों को भी सख्त कर दिया।

सात मई 2025 को भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू किया। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान के अंदर मौजूद आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया गया। भारतीय सेना ने नौ अलग-अलग लॉन्च पैड पर कार्रवाई की, जिसमें पाकिस्तान को अच्छा-खासा नुकसान उठाना पड़ा।

इस दौरान दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। तीन दिन बाद 10 मई को पाकिस्तान की तरफ से बातचीत की पहल हुई, जिसके बाद सीजफायर लागू हुआ। (Pahalgam Attack Anniversary)

दुनिया तक संदेश पहुंचाने की कोशिश

पहलगाम हमले के बाद भारत ने सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही नहीं की, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी अपनी बात मजबूती से रखी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव और अन्य अधिकारियों ने कई देशों के प्रतिनिधियों से बातचीत की और भारत का पक्ष रखा। इसके अलावा, अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं को भी विदेश भेजा गया, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को मजबूती से रख सकें।

अब वॉशिंगटन में होने वाली यह एग्ज़िबिशन उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। इसके जरिए भारत यह दिखाना चाहता है कि आतंकवाद की कीमत आम लोग चुकाते हैं। (Pahalgam Attack Anniversary)

पहले भी हो चुका है ऐसा आयोजन

इससे पहले जून 2025 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी इसी तरह की प्रदर्शनी लगाई गई थी। वहां भी आतंकवाद के मानवीय असर को दुनिया के सामने रखा गया था। अब अमेरिका में होने वाली यह नई एग्जिबिशन उसी प्रयास को आगे बढ़ाने के रूप में देखी जा रही है, जिसमें भारत वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ अपनी बात रख रहा है। (Pahalgam Attack Anniversary)

जयपुर में सप्त शक्ति कमांड ने मनाया 22वां स्थापना दिवस, पश्चिमी सीमा की सुरक्षा का है जिम्मा

Sapta Shakti Command Raising Day

Sapta Shakti Command Raising Day: भारतीय सेना की सप्त शक्ति कमांड ने बुधवार को जयपुर मिलिट्री स्टेशन में अपना 22वां स्थापना दिवस मनाया। इस कमांड की स्थापना 15 अप्रैल 2005 को हुई थी और यह भारतीय सेना की सातवीं और सबसे युवा कमांड मानी जाती है।

इस खास अवसर पर सप्त शक्ति कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने सभी रैंक्स, वेटरन्स, डिफेंस सिविलियंस और उनके परिवारों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि पिछले कई सालों में इस कमांड ने अपनी मेहनत, साहस और समर्पण से एक मजबूत पहचान बनाई है। उन्होंने वर्तमान और पूर्व सैनिकों के योगदान को याद करते हुए उनके बलिदान को कमांड की सबसे बड़ी ताकत बताया।

स्थापना दिवस के दौरान आयोजित सैनिक सम्मेलन में चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पीएस शेखावत ने सभी सैनिकों को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि सप्त शक्ति कमांड ने सेना की सोच के अनुसार अपनी तैयारियों को मजबूत किया है। मल्टी डोमेन ऑपरेशन और नई रणनीतियों को अपनाकर ऑपरेशनल क्षमता को बेहतर बनाया गया है।

उन्होंने सैनिकों के परिवारों, वेटरन्स और वीर नारियों के योगदान को भी याद किया और उनके सहयोग के लिए आभार जताया। कार्यक्रम के दौरान सभी रैंक्स को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहने और देश की सुरक्षा के लिए तैयार रहने का संदेश दिया गया।

पश्चिमी सीमा पर मजबूत मौजूदगी

पिछले 22 सालों में सप्त शक्ति कमांड ने पश्चिमी सीमाओं पर अपनी मजबूत मौजूदगी कायम की है। ‘सर्वदा विजयी भव’ के मंत्र के साथ काम करते हुए इस कमांड ने सीमा सुरक्षा के साथ-साथ ऑपरेशनल तैयारी को भी उच्च स्तर पर बनाए रखा है। नियमित ट्रेनिंग, नई रणनीतियों को अपनाना और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल इसकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।

कमांड ने समय के साथ खुद को एक टेक्नोलॉजी आधारित, तेज और प्रभावी फोर्स के रूप में तैयार किया है, जो बदलते युद्ध के माहौल के अनुसार खुद को ढाल रही है।

स्थापना दिवस के मौके पर प्रेरणा स्थल पर एक विशेष पुष्पांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पीएस शेखावत और वेटरन्स ने देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

इस आयोजन के तहत जयपुर मिलिट्री स्टेशन में सिम्फनी बैंड कॉन्सर्ट का भी आयोजन किया गया। इसके अलावा जवाहर कला केंद्र में आम नागरिकों के लिए भारतीय सेना का सिम्फनी बैंड प्रदर्शन रखा गया। देशभक्ति और सैन्य धुनों ने लोगों को सेना की परंपरा और शौर्य से जोड़ने का काम किया। (Sapta Shakti Command Raising Day)

टैंकों के बाद पनडुब्बियों पर भी ड्रोन हमलों का खौफ, ‘जुगाड़’ से लैस दिखीं रूसी सबमरींस

Russian Submarine Anti Drone System
Pic Source: Covert Shores/X

Russian Submarine Anti Drone System: मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन का खौफ कितना बढ़ गया है कि इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पारंपरिक हथियारों को सस्ते छोटे टॉप अटैक वाले FPV ड्रोन और लॉइटरिंग मुनिशन्स से निपटने के लिए जुगाड़ लगाने पड़ रहे हैं। टैंकों और आर्मर्ड व्हीकल्स पर एंटी-ड्रोन कोप कैज के वीडियो आपने सोशल मीडिया पर जरूर देखे होंगे। लेकिन अब खतरा समंदर तक पहुंच चुका है।

हाल ही में रूस की नौसेना की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें उनकी पनडुब्बियों पर अलग तरह के सुरक्षा इंतजाम दिखाई दे रहे हैं। सेंट पीटर्सबर्ग के पास क्रोनस्टाट नौसैनिक अड्डे पर खींची गई इन तस्वीरों में साफ दिखता है कि अब पनडुब्बियों को भी ड्रोन हमलों से बचाने की तैयारी की जा रही है।

इन तस्वीरें से पता चल रहा है कि समुद्र में होने वाले युद्ध का तरीका बदल रहा है और ड्रोन अब पनडुब्बियों जैसी ताकतवर हथियार प्रणालियों के लिए भी खतरा बन चुके हैं।

Russian Submarine Anti Drone System: नाटो भी खौफ खाता है इन पनडुब्बियों से

रूसी नौसेना की दो किलो क्लास पनडुब्बियों की तस्वीरें सेंट पीटर्सबर्ग के पास क्रोनस्टाट नौसैनिक अड्डे पर ली गई है, जहां इन पनडुब्बियों पर नए तरह के एंटी-ड्रोन डिफेंस सिस्टम दिखाई दे रहे हैं।

इस तस्वीर में दो अलग-अलग पनडुब्बियां पहचान में आई हैं। पहली है प्रोजेक्ट 06363 इम्प्रूव्ड किलो क्लास की “मोझाईस्क”, जो नई और आधुनिक पनडुब्बी है। दूसरी है पुरानी प्रोजेक्ट 877EKM किलो क्लास की “दिमित्रोव”, जो 1980 के दशक से सेवा में है।

दोनों ही डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं और अपनी कम आवाज के चलते काफी खतरनाक मानी जाती हैं। इन्हें इतना शांत माना जाता है कि नाटो इन्हें “ब्लैक होल” कहता है, क्योंकि ये आसानी से सोनार पर पकड़ में नहीं आती हैं।

क्या दिखा एंटी-ड्रोन सिस्टम में

तस्वीर में जो सबसे खास चीज दिखी, वह है पनडुब्बियों पर लगाए गए एंटी-ड्रोन सिस्टम्स। इनमें एक पेडेस्टल पर लगी हेवी मशीन गन दिखाई देती है, जो संभवतः 12.7 एमएम की एनएसवी मशीन गन है। यह हवा और सतह दोनों तरह के लक्ष्यों पर फायर कर सकती है।

इसके साथ ही नेविगेशन ब्रिज पर सर्चलाइट भी लगाई गई है, ताकि रात में आने वाले ड्रोन को आसानी से देखा जा सके। एक पनडुब्बी पर अतिरिक्त गन माउंट भी तैयार दिखता है, जिससे जरूरत पड़ने पर और हथियार लगाए जा सकते हैं।

दूसरी पनडुब्बी पर एक खास “एंटी-ड्रोन केज” भी दिखाई देता है। यह एक तरह की लोहे की जाली होती है, जो ड्रोन को सीधे संवेदनशील हिस्सों (जैसे पेरिस्कोप, सेंसर या टॉरपीडो ट्यूब्स) तक पहुंचने से रोकने के लिए लगाई जाती है।

पनडुब्बी पर क्या है ड्रोन का खतरा

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। यूक्रेन ने समुद्र में चलने वाले ड्रोन और हवा में उड़ने वाले ड्रोन दोनों का इस्तेमाल किया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दिसंबर 2025 में एक अंडरवॉटर ड्रोन “सब सी बेबी” ने रूसी पनडुब्बी को नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद से रूस को अपनी नौसेना की सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क होना पड़ा है।

इससे पहले सी बेबी सरफेस ड्रोन्स ने सेवस्तोपोल में रूसी बेड़े को परेशान किया था। इन हमलों के बाद रूस को ब्लैक सी फ्लीट की कई पनडुब्बियों को पीछे हटाना पड़ा। यूक्रेन के पास लंबी दूरी के यूएवी, यूएसवी और यूयूवी हैं, जो सस्ते लेकिन घातक हैं।

अब यह खतरा सिर्फ ब्लैक सी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बाल्टिक सागर जैसे क्षेत्रों में भी महसूस किया जा रहा है। यही वजह है कि पनडुब्बियों पर ऐसे फील्ड-लेवल बदलाव किए जा रहे हैं।

कितना असरदार है ये जुगाड़

हालांकि ये एंटी-ड्रोन सिस्टम दिखने में उपयोगी लगते हैं, लेकिन इनकी क्षमता पर सवाल भी उठ रहे हैं। पनडुब्बियां जब पानी के अंदर होती हैं, तब वे सुरक्षित रहती हैं, लेकिन सतह पर या बंदरगाह में वे ज्यादा कमजोर होती हैं।

मैनुअल मशीन गन से छोटे और तेज ड्रोन को निशाना बनाना आसान नहीं होता। ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़ सकते हैं या पानी के नीचे से भी आ सकते हैं। ऐसे में सिर्फ मशीन गन और सर्चलाइट से पूरी सुरक्षा मिलना मुश्किल माना जा रहा है।

एंटी-ड्रोन केज कुछ हद तक सुरक्षा दे सकता है, लेकिन अगर एक साथ कई ड्रोन हमला करें, तो यह नाकाफी है।

दरअसल समुद्री युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब सिर्फ बड़े युद्धपोत या पनडुब्बियां ही निर्णायक नहीं हैं, बल्कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं। जिसके चलते रूस जैसी बड़ी नौसेना को भी अपनी पनडुब्बियों पर अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लगाने पड़ रहे हैं।

“कॉम्पिटिशन से कॉन्फ्लिक्ट तक”, नौसेना कॉन्फ्रेंस 2026 में नेवी चीफ ने बताई बदलती दुनिया की तस्वीर

Indian Navy Commanders Conference 2026

Indian Navy Commanders Conference 2026: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी का कहना है कि दुनिया तेजी से बदल रही है और युद्ध का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों में दुनिया में हालात तेजी से बदले हैं और अब देश प्रतिस्पर्धा के दौर से आगे बढ़कर सीधे टकराव के दौर में पहुंच चुके हैं।

14 अप्रैल से नौसेना भवन में भारतीय नौसेना की तीन दिवसीय कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2026 में बोलते हुए नेवी चीफ ने पश्चिम एशिया के हालात का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी एक क्षेत्र का तनाव अब दूर-दराज के समुद्री रास्तों और व्यापार को भी प्रभावित करता है, इसलिए समुद्री सुरक्षा को लगातार मजबूत रखना जरूरी है।

कॉन्फ्रेंस के पहले दिन अलग-अलग ऑपरेशनल मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इसमें जॉइंटनेस, क्षमता बढ़ाने, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग, विदेशी सहयोग और नई तकनीकों को अपनाने जैसे विषय शामिल रहे।

Indian Navy Commanders Conference 2026: पश्चिम एशिया के हालात का असर

कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन संबोधन में नौसेना प्रमुख ने दौरान पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के अस्थिर हालात का असर समुद्री रास्तों और व्यापार पर साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने बताया कि समुद्र के रास्ते चलने वाले जहाजों की सुरक्षा आज ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि किसी एक क्षेत्र में तनाव होने का असर दूर-दूर तक पड़ता है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा का माहौल पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है। कई जगह एक साथ युद्ध जैसी स्थितियां बन रही हैं, विरोधी देशों की क्षमताएं बढ़ रही हैं और नॉन स्टेट एक्टर्स भी अब सस्ती तकनीक के जरिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इन सभी वजहों से समुद्र का क्षेत्र अब ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है, जहां हर दिन नई स्थिति का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि आज युद्ध केवल मैदान में नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि नैरेटिव वॉरफेयर के जरिए लोगों की सोच और धारणा को भी प्रभावित किया जा रहा है। यानी कौन क्या दिखा रहा है और लोगों को क्या समझाया जा रहा है, यह भी उतना ही अहम हो गया है जितना असली ऑपरेशन। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

Indian Navy Commanders Conference 2026

ऑपरेशनल तैयारियों पर जोर

कॉन्फ्रेंस के पहले दिन नौसेना की ऑपरेशनल तैयारियों पर खास ध्यान दिया गया। नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले पांच से दस सालों में नौसेना की तैनाती में काफी बढ़ोतरी हुई है। समुद्र की सतह, पानी के नीचे और हवा में काम करने वाली क्षमताओं को लगातार मजबूत किया गया है। इसके लिए नए जहाज, पनडुब्बियां और एयर सिस्टम शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर, मेंटेनेंस और तकनीकी विकास पर भी लगातार काम किया गया है, ताकि ऑपरेशन के दौरान कोई रुकावट न आए। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

बजट का पूरा इस्तेमाल

नौसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि उपलब्ध बजट का पूरी तरह उपयोग किया गया है और 90 से ज्यादा कैपिटल कॉन्ट्रैक्ट पूरे किए गए हैं। इसके साथ ही स्वदेशी डिजाइन और निर्माण वाले कई प्लेटफॉर्म को शामिल किया गया है और इस साल 15 से ज्यादा नए प्लेटफॉर्म डिलीवर होने वाले हैं।

समुद्र मार्गों की सुरक्षा में भारत की भूमिका

नौसेना ने हाल के समय में समुद्री मार्गों की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाई है। खासकर फारस की खाड़ी से निकलने वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में नौसेना सक्रिय रही है। नौसेना की मौजूदगी से भारतीय नाविकों और जहाजों को भरोसा मिला है कि जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा मिलेगी।

कॉन्फ्रेंस में उन्होंने नौसेना की कई अहम गतिविधियों का भी जिक्र किया, जिनमें आईएनएसवी कौंडिन्य की पहली यात्रा, मैरिटाइम महाकुंभ, इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू, मिलन अभ्यास और आईओएनएस कॉन्क्लेव जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं। उन्होंने बताया कि आईओएस सागर-2 मिशन में 16 मित्र देशों की भागीदारी ने भारत की वैश्विक स्तर पर विश्वसनीयता को और मजबूत किया है। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

Indian Navy Commanders Conference 2026

नई तकनीक और भविष्य की तैयारियों पर चर्चा

तकनीकी क्षेत्र में हो रहे बदलावों पर बात करते हुए नौसेना प्रमुख ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों को ऑपरेशनल सिस्टम में शामिल किया जा रहा है, ताकि भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहा जा सके। इन तकनीकों के जरिए जानकारी जुटाने, फैसले लेने और ऑपरेशन को बेहतर बनाने में मदद मिल रही है। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

कॉन्फ्रेंस में उन्होंने उन प्राथमिकताओं का भी जिक्र किया, जिन पर नौसेना आगे काम करेगी। इनमें युद्ध क्षमता को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखना, फोर्स लेवल और क्षमता का विकास, मेंटेनेंस और लॉजिस्टिक्स, नई तकनीकों का उपयोग, मानव संसाधन प्रबंधन, संगठनात्मक लचीलापन और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल शामिल हैं।

इस दौरान सीडीएस अनिल चौहान ने भी नौसेना कमांडर्स को संबोधित किया। उन्होंने बदलते वैश्विक माहौल और युद्ध के नए तरीकों पर बात की। उन्होंने नौसेना से कहा कि वह तेजी से बदलते हालात के हिसाब से अपनी योजना तैयार करे, जिसमें आर्थिक और तकनीकी पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाए। (Indian Navy Commanders Conference 2026)

भारतीय सेना को मिले 500 से ज्यादा ये खास ड्रोन, बिना जीपीएस भी करेंगे काम

Ajeet Drone
Indian Army Gets 500+ Cyber-Secure Ajeet Drones, Boost to Indigenous ISR Capabilities

Ajeet Drone: भारतीय सेना की निगरानी और ऑपरेशन क्षमता को मजबूत करने के लिए चेन्नई की कंपनी जुप्पा जियो नेविगेशन टेक्नोलॉजीज ने पिछले तीन महीनों में सेना को 500 से ज्यादा साइबर-सिक्योर “अजीत” सीरीज के ड्रोन सौंपे हैं। यह डिलीवरी जनवरी से अप्रैल के बीच पूरी की गई है और इन ड्रोन को खास तौर पर फ्रंटलाइन यूनिट्स के लिए तैयार किया गया है।

क्या है Ajeet Drone सीरीज

अजीत सीरीज छोटे और हल्के ड्रोन का एक परिवार है, जिसे निगरानी और जानकारी जुटाने के काम के लिए बनाया गया है। सेना इन्हें दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, इलाके की तस्वीरें लेने और रियल टाइम जानकारी जुटाने के लिए इस्तेमाल करती है।

इन ड्रोन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि सैनिक इन्हें आसानी से अपने साथ ले जा सकें। कुछ मॉडल इतने छोटे हैं कि बैकपैक में रखकर भी ले जाए जा सकते हैं।

साइबर सिक्योरिटी पर फोकस

इन ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत उनकी साइबर सुरक्षा मानी जा रही है। आज के समय में ड्रोन सिर्फ उड़ने वाली मशीन नहीं रहे, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में हैकिंग, जैमिंग और स्पूफिंग जैसे खतरे बढ़ गए हैं।

अजीत ड्रोन को इन खतरों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इनमें इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और सॉफ्टवेयर ज्यादातर देश में ही तैयार किए गए हैं। इससे बाहरी सिस्टम पर निर्भरता कम होती है और सुरक्षा बेहतर रहती है।

इनमें कंपनी का अपना ऑटो पायलट सिस्टम “नवगति” लगाया गया है, जो ऐसे इलाकों में भी काम कर सकता है जहां जीपीएस सिग्नल उपलब्ध नहीं होते।

ये ड्रोन खास तौर पर ऐसे इलाकों के लिए बनाए गए हैं जहां इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का खतरा ज्यादा होता है। यानी दुश्मन रेडियो सिग्नल को जैम करने या सिस्टम को भ्रमित करने की कोशिश कर सकता है।

अजीत ड्रोन इन हालात में भी अपनी दिशा और काम को बनाए रखने में सक्षम हैं। कुछ बड़े मॉडल लगभग एक घंटे तक उड़ान भर सकते हैं और कई किलोमीटर तक की दूरी कवर कर सकते हैं।

इनमें डे और नाइट कैमरा लगे होते हैं, जिससे दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकती है।

कंपनी ने सेना के जवानों को इन ड्रोन के इस्तेमाल की ट्रेनिंग भी दी है। इस ट्रेनिंग में ड्रोन उड़ाना, उनकी देखभाल करना और एक साथ कई ड्रोन चलाने की तकनीक शामिल है। इसका मकसद यह है कि सेना की यूनिट्स खुद ही अलग-अलग ऑपरेशन में इनका इस्तेमाल कर सकें।

स्वॉर्म ऑपरेशन की क्षमता

इन ड्रोन की एक खास क्षमता यह भी है कि इन्हें एक साथ समूह में उड़ाया जा सकता है। इसे स्वॉर्म ऑपरेशन कहा जाता है। इस तकनीक में कई ड्रोन मिलकर एक साथ काम करते हैं, जिससे निगरानी का दायरा बढ़ जाता है और ज्यादा जानकारी एक साथ मिल सकती है।

बता दें कि भारत लंबे समय तक विदेशी ड्रोन, खासकर चीनी कंपनियों के सिस्टम पर निर्भर रहा है। लेकिन अब सरकार और सेना दोनों ही इस निर्भरता को कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। अजीत सीरीज को इसी लक्ष्य के तहत विकसित किया गया है। इसमें हार्डवेयर से लेकर सॉफ्टवेयर तक अधिकतर चीजें देश में ही बनाई गई हैं।

यह पहली बार नहीं है जब इस कंपनी ने सेना को ड्रोन दिए हों। इससे पहले भी अलग-अलग ऑपरेशन के दौरान इनके ड्रोन इस्तेमाल में लाए जा चुके हैं। कंपनी ने पहले भी कई ड्रोन सिस्टम और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी सेना को उपलब्ध कराई है।

कंपनी का फोकस सिर्फ ड्रोन बनाने पर नहीं, बल्कि पूरी अनमैन्ड सिस्टम टेक्नोलॉजी को विकसित करने पर है। इसमें नेविगेशन, ऑटो पायलट और डेटा प्रोसेसिंग जैसे हिस्से शामिल हैं।

इन ड्रोन के शामिल होने से सेना की निगरानी क्षमता को सीधा फायदा मिलेगा। खास तौर पर सीमावर्ती इलाकों और संवेदनशील क्षेत्रों में इनका इस्तेमाल बढ़ेगा, जहां लगातार नजर बनाए रखना जरूरी होता है।