📍नई दिल्ली/पोरबंदर | 29 Dec, 2025, 8:48 PM
INSV Kaundinya: भारतीय नौसेना के लिए 29 दिसंबर का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। सोमवार को स्वदेशी पारंपरिक इंडियन नेवल सेलिंग वेसल (आईएनएसवी) कौंडिन्य ने अपनी पहली विदेशी समुद्री यात्रा शुरू की। गुजरात के पोरबंदर से ओमान की राजधानी मस्कट तक की यह यात्रा सिर्फ सफर नहीं है, बल्कि भारत की हजारों साल पुरानी समुद्री विरासत को फिर से जीवित करने की एक अनोखी कोशिश है।
यह यात्रा उस दौर की याद दिलाती है, जब भारतीय नाविक बिना आधुनिक तकनीक के, सिर्फ अपने अनुभव, खगोल ज्ञान और समुद्री समझ के दम पर हिंद महासागर पार करते थे। उस समय भारत और ओमान के बीच व्यापार, संस्कृति और लोगों का आना-जाना समुद्र के रास्ते ही होता था। आईएनएसवी कौंडिन्य की यह यात्रा उन्हीं प्राचीन समुद्री मार्गों को फिर से तलाशने और समझने की कोशिश है।
INSV Kaundinya: पोरबंदर से मस्कट तक ऐतिहासिक सफर
आईएनएसवी कौंडिन्य को पोरबंदर बंदरगाह से औपचारिक रूप से रवाना किया गया। इस मौके पर पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उनके साथ भारत में ओमान के राजदूत ईसा सालेह अल शिबानी और भारतीय नौसेना के कई वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।
नौसेना अधिकारियों ने बताया कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और लोगों से लोगों के संबंधों को और मजबूत करेगी। जब यह जहाज मस्कट पहुंचेगा, तो वह भारत-ओमान की सदियों पुरानी दोस्ती की यादें एक बार फिर ताजा होंगी।

क्या है INSV Kaundinya की खासियत
आईएनएसवी कौंडिन्य (INSV Kaundinya) कोई आम जहाज नहीं है। इसे पूरी तरह पारंपरिक स्टिच्ड शिपबिल्डिंग टेक्नीक यानी सिलाई से बने जहाज की तकनीक से तैयार किया गया है। इसमें लकड़ी के तख्तों को कीलों या वेल्डिंग से नहीं, बल्कि नारियल के रेशे से बनी मजबूत रस्सियों से सिला गया है। जोड़ को सील करने के लिए प्राकृतिक रेजिन का इस्तेमाल किया गया है।
⚓🇮🇳 INSV Kaundinya Sets Sail on a Historic Voyage
The Indian Navy flags off INSV Kaundinya from Porbandar, Gujarat, marking her maiden transoceanic voyage to Muscat, Oman on 29 December 2025. Built using ancient stitched-plank shipbuilding techniques, the vessel revives India’s… pic.twitter.com/IG96WHKA55— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 29, 2025
यह तकनीक सैकड़ों साल पहले भारत के तटीय इलाकों में आम थी। इसी तरह के जहाजों के जरिए भारतीय नाविक पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक सफर करते थे। आधुनिक स्टील जहाजों से यह पोत बिल्कुल अलग है, यह ऊंची लहरों में भी यह सुरक्षित रहता है।
INSV Kaundinya: अजंता गुफाओं से प्रेरित डिजाइन
INSV Kaundinya का डिजाइन 5वीं शताब्दी के उस जहाज से प्रेरित है, जो अजन्ता की गुफाओं की पेंटिंग्स में दिखाई देता है। उन चित्रों में बने जहाज भारत की प्राचीन समुद्री ताकत और जहाज निर्माण कौशल की कहानी कहते हैं। उसी ऐतिहासिक प्रमाण को आधार बनाकर इस जहाज की रूपरेखा तैयार की गई।

इस परियोजना की शुरुआत जुलाई 2023 में हुई थी, जब संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशंस के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसका उद्देश्य भारत की पारंपरिक समुद्री तकनीकों को दोबारा समझना और उन्हें व्यवहार में लाना था।
INSV Kaundinya: पारंपरिक कारीगरों की मेहनत
INSV Kaundinya का निर्माण सितंबर 2023 में शुरू हुआ। केरल के अनुभवी पारंपरिक कारीगरों की एक टीम ने इसे तैयार किया, जिनका नेतृत्व मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन ने किया। महीनों तक लकड़ी के तख्तों को एक-एक कर नारियल की रस्सियों से सिला गया। यह काम आसान नहीं था, क्योंकि हर जोड़ में संतुलन और मजबूती बनाए रखना जरूरी था।
फरवरी 2025 में गोवा में इस पोत को समुद्र में उतारा गया। इसके बाद कई तकनीकी और समुद्री परीक्षण किए गए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जहाज खुले समुद्र में लंबी दूरी की यात्रा के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।
INSV Kaundinya: क्या है कौंडिन्य नाम का मतलब
इस जहाज का नाम प्राचीन नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जिनका उल्लेख भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई इतिहास में मिलता है। माना जाता है कि कौंडिन्य भारत से समुद्र के रास्ते दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचे थे और वहां भारतीय संस्कृति के प्रसार में अहम भूमिका निभाई थी। इस नाम के जरिए भारतीय नौसेना ने भारत की उस समुद्री पहचान को सम्मान दिया है, जो समय के साथ इतिहास के पन्नों में दब गई थी।
कौन हैं INSV Kaundinya के कमांडर
आईएनएसवी कौंडिन्य की कमान कमांडर विकास श्योराण संभाल रहे हैं। वहीं, कमांडर वाई हेमंत कुमार इस अभियान के ऑफिसर-इन-चार्ज हैं, जो शुरुआत से ही इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे हैं। चालक दल में चार अधिकारी और 13 नौसैनिक शामिल हैं। सभी को पारंपरिक नौकायन, हवा और मौसम की समझ तथा आधुनिक सुरक्षा प्रक्रियाओं का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
नौसेना के अनुसार, यह यात्रा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि पारंपरिक पाल वाले जहाज में मौसम और समुद्री हालात का असर ज्यादा होता है। फिर भी चालक दल पूरी तरह तैयार है और उत्साह से भरा हुआ है।

INSV Kaundinya कोई वारशिप नहीं है। इसमें कोई हथियार नहीं हैं और न ही कोई इंजन। यह पूरी तरह हवा और पाल के सहारे चलता है। चालक दल को पाल खोलना, रस्सियां खींचना और दिशा संभालने जैसे काम हाथ से करने पड़ते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। इस जहाज पर कई ऐसे चिह्न और सजावट हैं, जो भारत की समुद्री विरासत और अजंता की कला से प्रेरित हैं।
संजीव सान्याल ने बताई INSV Kaundinya की पूरी कहानी
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य संजीव सान्याल इस पूरी परियोजना से शुरुआत से ही जुड़े रहे हैं। वे बताते हैं, आईएनएसवी कौंडिन्य का विचार सिर्फ एक जहाज बनाने का नहीं था, बल्कि यह समझने का प्रयास था कि भारत ने सदियों पहले बिना आधुनिक तकनीक के महासागरों को कैसे पार किया। उनके शब्दों में, यह परियोजना इतिहास को किताबों से निकालकर समुद्र पर उतारने जैसा है।
उन्होंने बताया, “इसकी शुरुआत दिसंबर 2021 में हुई थी। उस समय उनके और भारतीय नौसेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बातचीत हो रही थी। चर्चा के दौरान यह सवाल उठा कि क्या प्राचीन सिलाई वाली जहाज निर्माण तकनीक को दोबारा से जीवित किया जा सकता है। यही सवाल आगे चलकर एक बड़े प्रोजेक्ट में बदल गया। इसके बाद करीब दो साल तक गहन शोध किया गया। पुराने ग्रंथों और किताबों का अध्ययन हुआ, केरल के पारंपरिक कारीगरों से बातचीत की गई और नौसेना के विशेषज्ञों ने इस विचार को व्यावहारिक रूप देने की योजना बनाई।”
उन्होंने आगे बताया, जुलाई 2023 में इस परियोजना को औपचारिक अनुमति मिली। संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होदी इनोवेशंस कंपनी के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसके बाद जहाज के निर्माण का काम शुरू किया गया। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बिना कील और धातु के सिर्फ रस्सी से सिले गए लकड़ी के तख्ते समुद्र की ऊंची लहरों और तूफानी हालात को कैसे झेल पाएंगे।
संजीव सान्याल के मुताबिक, इस चुनौती का समाधान आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के मेल से निकाला गया। भारतीय नौसेना के नौसैनिक वास्तुकारों ने डिजाइन को आधुनिक इंजीनियरिंग के सिद्धांतों से परखा। आईआईटी मद्रास में जहाज के छोटे मॉडल बनाए गए और उनका परीक्षण किया गया। टोइंग टैंक में मॉडल को पानी में खींचकर देखा गया कि उसे कितना प्रतिरोध मिलता है। वेव बेसिन में अलग-अलग मौसम और लहरों की स्थिति में परीक्षण किए गए। इन सभी परीक्षणों के बाद यह भरोसा हुआ कि यह जहाज खुले समुद्र में सुरक्षित रूप से यात्रा कर सकता है।
सितंबर 2023 में रखी गई जहाज की नींव
सितंबर 2023 में जहाज की नींव (कील सेरेमनी) रखी गई। केरल के प्रसिद्ध मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन और उनकी 20 कारीगरों की टीम ने इस काम की जिम्मेदारी संभाली। ये कारीगर उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जो आज भी इस प्राचीन सिलाई तकनीक को जानते हैं। धीरे-धीरे लकड़ी के तख्तों को एक-एक कर सिलते हुए जहाज को आकार दिया गया। यह काम महीनों चला और इसमें अत्यंत धैर्य और कौशल की जरूरत पड़ी।
वह बताते हैं कि फरवरी 2025 में महाशिवरात्रि की रात को जहाज को पहली बार पानी में उतारा गया। इसके बाद जहाज पर मस्तूल लगाए गए, पाल बांधे गए और अन्य जरूरी साजो-सामान जोड़े गए। मई 2025 में इसे औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया और करवार नौसैनिक अड्डे पर इसका नाम आईएनएसवी कौंडिन्य रखा गया।
INSV Kaundinya: भारत-ओमान रिश्ते होंगे मजबूत
भारत और ओमान के रिश्ते सदियों पुराने हैं। गुजरात के तट से ओमान तक व्यापारिक जहाज नियमित रूप से आते-जाते थे। मसाले, कपड़ा, हाथीदांत और कई अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। इस यात्रा के जरिए उसी इतिहास को फिर से सामने लाया जा रहा है।
INSV Kaundinya की मस्कट में मौजूदगी न सिर्फ एक वहां की नेवी के लिए खास होगी, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क गतिविधियों का भी हिस्सा बनेगी। इससे दोनों देशों के लोगों को अपने साझा इतिहास को करीब से जानने का मौका मिलेगा।
भारतीय नौसेना इस अभियान के जरिए यह संदेश भी दे रही है कि समुद्री ताकत सिर्फ युद्धपोतों और मिसाइलों तक सीमित नहीं है। संस्कृति, इतिहास और विरासत भी किसी देश की समुद्री पहचान का अहम हिस्सा होती है।



