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रक्षा खरीद में बड़ा बदलाव! DAP-2026 का ड्राफ्ट जारी, अब ‘ओन्ड बाय इंडिया’ पर फोकस

India Releases DAP-2026 Draft, Invites Public Comments to Boost Indigenous Defence Manufacturing
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (फाइल फोटो)

DAP 2026 Draft: देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 (डीएपी-2026) का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है और इसे सार्वजनिक सुझावों के लिए मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। नया ड्राफ्ट मौजूदा डीएपी-2020 की जगह लेगा, जो अभी लागू है। मंत्रालय ने साफ किया है कि यह ड्राफ्ट ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’ के तहत तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और आत्मनिर्भर बनाना है।

DAP 2026 Draft: क्या है डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर?

डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर यानी डीएपी वह डॉक्यूमेंट है, जिसके तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए बड़े हथियार, प्लेटफॉर्म, सिस्टम और उपकरण खरीदे जाते हैं। यह पूंजीगत बजट (कैपिटल बजट) से होने वाली खरीद पर लागू होती है।

ड्राफ्ट में स्पष्ट किया गया है कि डीएपी 2026 रक्षा बलों को समय पर, बेहतर गुणवत्ता वाले और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने का आधार है। वहीं, मेंटेनेंस और मरम्मत जैसे राजस्व खर्च से जुड़े मामलों के लिए अलग से डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 (डीपीएम-2025) लागू है। (DAP 2026 Draft)

आत्मनिर्भर भारत पर सबसे ज्यादा जोर

डीएपी-2026 का सबसे बड़ा फोकस “आत्मनिर्भर भारत” है। ड्राफ्ट के प्रस्तावना भाग में साफ लिखा गया है कि अब लक्ष्य सिर्फ मेड इन इंडिया नहीं, बल्कि ओन्ड बाय इंडिया है। इसका मतलब यह है कि अब सिर्फ विदेशी तकनीक लाकर भारत में असेंबली करने से काम नहीं चलेगा। यह बदलाव ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) मॉडल से आगे बढ़कर डिजाइन, सोर्स कोड, बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और अपग्रेड का अधिकार भारतीय संस्थाओं के पास होना चाहिए। (DAP 2026 Draft)

स्वदेशी डिजाइन और इंडिजिनस कंटेंट अनिवार्य

ड्राफ्ट में “इंडिजिनस डिजाइन (आईडी)” और “इंडिजिनस कंटेंट (आईसी)” को बेहद स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। आईसी यानी कुल कॉन्ट्रैक्ट कीमत में कितना हिस्सा भारत में खर्च हुआ। इसके लिए एक फार्मूला भी दिया गया है, जिसके अनुसार विदेशी सामग्री की लागत घटाकर प्रतिशत निकाला जाएगा। अब हर कैटेगरी में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कितना हिस्सा भारत में बना होना चाहिए।

सबसे पहले, बाय (इंडियन-आईडीडीएम) कैटेगरी की बात करें तो इसमें स्वदेशी डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग पर सबसे ज्यादा जोर है। इस कैटेगरी में ट्रायल के समय कम से कम 30 फीसदी इंडिजिनस कंटेंट होना जरूरी होगा। यानी जब सिस्टम या उपकरण का परीक्षण होगा, तब उसका कम से कम 30 फीसदी हिस्सा भारत में बना होना चाहिए। अंतिम कॉन्ट्रैक्ट साइन होने तक यह हिस्सा बढ़कर कम से कम 60 प्रतिशत होना अनिवार्य होगा। मतलब साफ है कि आखिरी चरण में आधे से ज्यादा नहीं, बल्कि कम से कम 60 फीसदी उत्पाद पूरी तरह देश में तैयार होना चाहिए। (DAP 2026 Draft)

दूसरी श्रेणी है बाय (इंडियन) एंड मैन्युफैक्चर इन इंडिया। इसमें भी स्वदेशी निर्माण पर जोर दिया गया है। खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग वाले हिस्से में कम से कम 60 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट जरूरी रखा गया है। यानी अगर कोई सिस्टम विदेशी डिजाइन पर आधारित भी हो, तो उसका निर्माण भारत में बड़े स्तर पर होना चाहिए और उसमें ज्यादातर हिस्सा देश में तैयार किया जाना चाहिए।

तीसरी श्रेणी है बाय (ग्लोबल)। इसमें विदेशी कंपनियों से सीधे खरीद की अनुमति होती है, लेकिन यहां भी पूरी तरह बाहर से तैयार सामान लाने की छूट नहीं है। इस कैटेगरी में अधिकतम 30 प्रतिशत तक इंडिजिनस कंटेंट की अनुमति है। यानी इसमें भारतीय हिस्सेदारी सीमित रहेगी। (DAP 2026 Draft)

सबसे अहम बात यह है कि पहली बार इंडिजिनस कंटेंट की गणना, उसका सर्टिफिकेशन प्रमाणन और वैरिफिकेशन इतने विस्तार से तय किया गया है। अब केवल दावा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह साबित करना होगा कि कितना हिस्सा भारत में बना है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और आत्मनिर्भरता को असली मजबूती मिलेगी। (DAP 2026 Draft)

खरीद के लिए बनाई 3 कैटेगरीज

डीएपी-2026 में रक्षा खरीद प्रक्रिया को तीन बड़े हिस्सों बाय स्कीम, डेवलपमेंट स्कीम और एडिशनल प्रोसीजर में बांटा गया है। बाय स्कीम के तहत “बाय (इंडियन-आईडीडीएम)” को सबसे ऊंची प्राथमिकता दी गई है, यानी पहले स्वदेशी डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग को मौका मिलेगा। डेवलपमेंट स्कीम में मेक-1, मेक-2, मेक-3, “आईडेक्स” और “टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड” जैसी कैटेगरी शामिल हैं, जिनका मकसद नई तकनीक और इनोवेशन को बढ़ावा देना है। इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार स्टार्टअप, एमएसएमई और निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन में बड़ी और सक्रिय भूमिका देना चाहती है। (DAP 2026 Draft)

टेस्टेड एंड डेवलप्ड टेक्नोलॉजी को ही मंजूरी

ड्राफ्ट में टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल यानी टीआरएल के बारे में लिखा गया है। टीआरएल से यह पता चलता है कि कोई तकनीक कितनी तैयार और मैच्योर है। यानी वह केवल लैब में है या वास्तव में उपयोग के लिए तैयार है। अलग-अलग खरीद श्रेणियों के लिए अलग टीआरएल तय किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, “बाय (इंडियन-आईडीडीएम)” श्रेणी में टीआरएल 5 से 9 के बीच की टेक्नोलॉजी ही स्वीकार की जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि आधी-अधूरी या सिर्फ प्रयोगात्मक तकनीक पर जल्दबाजी में खरीद नहीं होगी, बल्कि टेस्टेड एंड डेवलप्ड टेक्नोलॉजी को ही मंजूरी मिलेगी। (DAP 2026 Draft)

फास्ट ट्रैक प्रोसीजर की जरूरत

ड्राफ्ट में साफ कहा गया है कि अब तेजी से बदलती तकनीक को देखते हुए रक्षा खरीद प्रक्रिया को और तेज बनाया जाएगा। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, क्वांटम कंप्यूटिंग और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन जैसी नई तकनीकें तेजी से विकसित हो रही हैं, इसलिए लंबी और जटिल प्रक्रिया से काम नहीं चलेगा। इसी वजह से फास्ट ट्रैक प्रोसीजर को मजबूत किया गया है, ताकि जरूरी उपकरण जल्दी खरीदे जा सकें। इसके अलावा लो-कॉस्ट कैपिटल एक्विजिशन और लीजिंग जैसे विकल्प भी शामिल किए गए हैं, जिससे सेना जरूरत पड़ने पर उपकरण किराए पर लेकर तुरंत इस्तेमाल कर सके। (DAP 2026 Draft)

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अब MNS वेटरंस को भी मिलेगा पूरा हक! सरकार ने बदले एक्स-सर्विसमेन री-एम्प्लॉयमेंट रूल्स

Military Nursing Service ex-servicemen

Military Nursing Service: केंद्र सरकार ने एक्स-सर्विसमेन (री-एम्प्लॉयमेंट इन सेंट्रल सिविल सर्विसेज एंड पोस्ट्स) अमेंडमेंट रूल्स 2026 को नोटिफाई कर दिया है। यह अधिसूचना 9 फरवरी को जारी हुई और उसी दिन से लागू हो गई। यह संशोधन संविधान के आर्टिकल 309 के तहत किया गया है, जिसके जरिए सरकार सिविल सेवाओं से जुड़े नियम बना या बदल सकती है।

इस बदलाव का सबसे अहम पहलू यह है कि अब मिलिट्री नर्सिंग सर्विस के कर्मियों को भी साफ तौर पर एक्स-सर्विसमेन की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है। पहले नियमों में इस बात को लेकर अस्पष्टता थी कि क्या मिलिट्री नर्सिंग सर्विस अधिकारी अन्य वेटरन्स की तरह री-एम्प्लॉयमेंट के लाभ पाने के हकदार हैं या नहीं। अब यह संशोधन उस अस्पष्टता को पूरी तरह खत्म कर देता है। (Military Nursing Service)

Military Nursing Service: पहले क्या था नियम

मूल नियम 1979 में बनाए गए थे। उनमें एक्स-सर्विसमेन की परिभाषा दी गई थी, जिसमें नियमित सेना, नौसेना और वायुसेना में सेवा कर चुके कर्मियों को शामिल किया गया था। लेकिन मिलिट्री नर्सिंग सर्विस का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया था।

हालांकि मिलिट्री नर्सिंग सर्विस सेना का हिस्सा हैं, फिर भी कई मामलों में यह सवाल उठता रहा कि क्या इनके अधिकारी री-एम्प्लॉयमेंट के लाभों के पात्र हैं। कुछ जगहों पर लाभ दिए गए, तो कहीं नियमों की व्याख्या अलग तरीके से हुई। इससे कई मिलिट्री नर्सिंग सर्विस पूर्व कर्मियों को सिविल नौकरियों में आवेदन के दौरान दिक्कतों का सामना करना पड़ा। (Military Nursing Service)

नए नियम क्या कहते हैं

संशोधित नियम 2(c)(i) में अब स्पष्ट लिखा गया है कि जो भी व्यक्ति नियमित आर्मी, नेवी, एयर फोर्स या मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में किसी भी रैंक पर सेवा कर चुका है, वह एक्स-सर्विसमेन की परिभाषा में आएगा।

यह नियम उन सभी पर लागू होगा जिन्होंने कम से कम छह महीने की लगातार सेवा की हो और जिन्हें अनुशासनहीनता या अयोग्यता के कारण नहीं हटाया गया हो।

सरकार का कहना है कि यह कदम रिहैबिलिटेशन और सेकंड करियर के अवसरों को मजबूत करने के लिए उठाया गया है। (Military Nursing Service)

अब मिलिट्री नर्सिंग सर्विस कर्मियों को क्या मिलेगा

इस संशोधन के बाद मिलिट्री नर्सिंग सर्विस के पूर्व कर्मियों को वही लाभ मिलेंगे जो अन्य एक्स-सर्विसमेन को मिलते हैं। सेंट्रल गवर्नमेंट की ग्रुप ‘सी’ नौकरियों में 10 फीसदी और ग्रुप ‘डी’ में 20 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान पहले से है। अब मिलिट्री नर्सिंग सर्विस कर्मी भी इन कोटा का लाभ ले सकेंगे।

इसके अलावा आयु सीमा में राहत मिलेगी। नियम के अनुसार, उम्मीदवार अपनी वास्तविक उम्र में से सैन्य सेवा के वर्षों के साथ अतिरिक्त तीन साल घटा सकता है। इससे उम्र अधिक होने पर भी आवेदन का मौका मिलेगा।

यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन और स्टाफ सिलेक्शन कमीशन में भी उन्हें अन्य वेटरन्स की तरह समान दर्जा मिलेगा। (Military Nursing Service)

किसे होगा फायदा

इस बदलाव से हजारों मिलिट्री नर्सिंग सर्विस वेटरन्स को फायदा मिलने की उम्मीद है। खासकर वे अधिकारी जो रिटायरमेंट के बाद हेल्थकेयर, एडमिनिस्ट्रेशन या अन्य सिविल क्षेत्रों में करियर बनाना चाहते हैं, अब उन्हें स्पष्ट कानूनी आधार मिलेगा।

रक्षा मंत्रालय और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग का मानना है कि इससे महिला रक्षा कर्मियों को भी बराबरी का अवसर मिलेगा, क्योंकि मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में अधिकांश अधिकारी महिलाएं होती हैं। (Military Nursing Service)

क्यों अहम है यह कदम

सशस्त्र बलों में सेवा देने वाले कर्मियों का अनुभव और अनुशासन सिविल प्रशासन में भी उपयोगी माना जाता है। सरकार लंबे समय से वेटरन्स के पुनर्वास और रोजगार को लेकर योजनाएं चला रही है।

यह संशोधन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे न केवल नीति स्पष्ट हुई है, बल्कि एक बड़े वर्ग को औपचारिक रूप से मान्यता भी मिली है।

जो भी मिलिट्री नर्सिंग सर्विस वेटरन सिविल सेवाओं में आवेदन करना चाहते हैं, वे आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग की वेबसाइट पर नियम देख सकते हैं।

जरूरत पड़ने पर वे डायरेक्टरेट जनरल रिसेटलमेंट या डिपार्टमेंट ऑफ एक्स-सर्विसमेन वेलफेयर से भी संपर्क कर सकते हैं। (Military Nursing Service)

Indian Army’s Combat Leadership Course Concludes at NCO Academy Dhana, Focus on Counter-Drone Warfare

Combat Leadership Course

Counter-Drone Warfare: The Combat Leadership Course at the Non-Commissioned Officers (NCO) Academy in Dhana, near Sagar in Madhya Pradesh, successfully concluded on February 7, equipping NCOs from the Indian Army with essential skills for modern warfare. The rigorous program focused on contemporary operational insights, including counter-drone tactics and combat leadership in a technology-centric battlefield environment.

During the closing ceremony, Brigadier Lalit Sharma, SC, SM, the Commandant of the NCO Academy, delivered profound insights on the “Decade of Transformation” and the impact of neighborhood unrest on India, addressing the emerging military leaders. Brigadier Sharma, a decorated officer with the Shaurya Chakra and Sena Medal, emphasized the evolving nature of warfare and the need for adaptive leadership in tech-driven conflicts.

Combat Leadership Course

Naik Abhishek Dev from the RAJPUT Regiment was adjudged the overall best student for his outstanding performance throughout the course. The award highlights the high standards maintained during the specialized curriculum, which prepares NCOs to lead effectively in complex operational scenarios.

The NCO Academy, Dhana, is a key training establishment under the Army Training Command (ARTRAC), dedicated to nurturing junior leaders through structured programs that incorporate modern warfare techniques and peer learning. Located at the Dhana military station, it has a history of conducting flagship courses like this one, with previous iterations in 2025 training hundreds of NCOs in similar domains. These initiatives align with the Indian Army’s focus on enhancing combat readiness amid technological advancements and regional challenges.

Participants underwent intensive training designed to foster decision-making, problem-solving, and operational adaptability. The course’s emphasis on counter-drone strategies reflects the growing importance of unmanned systems in contemporary battlespaces.

This culmination marks another step in the Indian Army’s ongoing efforts to build a future-ready force, with NCOs playing a pivotal role as the backbone of its leadership structure.

सीमा पर सोते हुए हुई सेना के अफसर की मौत, अदालत ने कहा- ‘लाइन ऑफ ड्यूटी’ पर हुई शहादत

Liberalised Family Pension
File Photo

Liberalised Family Pension: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर आने वाले समय में हजारों सैनिक परिवारों पर पड़ सकता है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर कोई सैनिक या अधिकारी सरकार द्वारा घोषित ऑपरेशनल इलाके में तैनात है और उसी दौरान उसकी मौत हो जाती है, तो उसे “लाइन ऑफ ड्यूटी” यानी ड्यूटी पर हुई मौत माना जाएगा, चाहे मौत सोते समय ही क्यों न हुई हो।

यह मामला भारतीय सेना के अधिकारी मेजर सुशील कुमार सैनी से जुड़ा है। उनकी मौत मई 1991 में भारत-पाकिस्तान सीमा पर एक बंकर में हुई थी। उस समय वे “ऑपरेशन रक्षक” के तहत तैनात थे। यह इलाका सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से ऑपरेशनल क्षेत्र घोषित था। (Liberalised Family Pension)

Liberalised Family Pension: क्या हुआ था उस रात?

12 मई 1991 की रात मेजर सैनी को सूचना मिली कि 25 बांग्लादेशी नागरिक सीमा पार कर पाकिस्तान जाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने तुरंत अपने अधीनस्थ अधिकारी को निर्देश दिए। कार्रवाई हुई, लोगों को पकड़ा गया और स्थिति संभाल ली गई। रिपोर्ट मिलने के बाद मेजर सैनी अपने बंकर में आराम करने चले गए।

अगली सुबह लगभग सात बजे एक सैनिक ने उन्हें बेहोश पाया। तुरंत एम्बुलेंस से अमृतसर मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मौत का कारण “एक्यूट मायोकार्डियल इन्फार्क्शन” यानी तेज हार्ट अटैक बताया गया। वे पहले से हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से जूझ रहे थे और लगातार ऑपरेशनल तनाव में थे। (Liberalised Family Pension)

पेंशन को लेकर शुरू हुई कानूनी लड़ाई

मृत्यु के बाद उनकी पत्नी अनुराधा सैनी को सामान्य फैमिली पेंशन दी गई। लेकिन उन्होंने दावा किया कि उनके पति की मौत ऑपरेशनल तनाव के कारण हुई और इसे “बैटल कैजुअल्टी” माना जाना चाहिए। अगर ऐसा माना जाता है तो परिवार को “लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन” मिलती है, जो सामान्य पेंशन से ज्यादा होती है।

2023 में आर्मेड फोर्सेस ट्रिब्यूनल चंडीगढ़ ने अनुराधा सैनी के पक्ष में फैसला दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि यह मौत मिलिट्री सर्विस से जुड़ी है और ऑपरेशन रक्षक के दौरान हुई है, इसलिए ज्यादा पेंशन दी जानी चाहिए।

केंद्र सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि अधिकारी की मौत सोते समय हुई, इसलिए इसे ऑपरेशनल एक्टिविटी के दौरान हुई मौत नहीं माना जा सकता। (Liberalised Family Pension)

क्या कहा हाईकोर्ट ने?

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 10 फरवरी को सरकार की अपील खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि इस मामले में मेजर सैनी की मौत को ड्यूटी से अलग नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जिस क्षेत्र में मेजर सैनी तैनात थे, उसे सरकार ने पहले से अधिसूचित ऑपरेशनल एरिया घोषित किया हुआ था। यानी वह सामान्य शांति क्षेत्र नहीं, बल्कि सक्रिय सैन्य तैनाती वाला इलाका था।

कोर्ट ने यह भी माना कि कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की रिपोर्ट में साफ उल्लेख है कि मेजर सैनी की मृत्यु मिलिट्री सर्विस से जुड़ी हुई थी। इसके अलावा उसी दिन उस इलाके में घुसपैठ की कोशिश की सूचना भी सामने आई थी, जिससे यह साबित होता है कि वहां ऑपरेशनल तनाव की स्थिति मौजूद थी। (Liberalised Family Pension)

अदालत ने 31 जनवरी 2001 को जारी सरकारी दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला “कैटेगरी ई(1)” के तहत आता है। इस कैटेगरी में उन मामलों को शामिल किया जाता है, जहां किसी विशेष रूप से घोषित ऑपरेशन या ऑपरेशनल क्षेत्र में तैनाती के दौरान सैनिक की मृत्यु होती है।

फैसले में अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जब कोई सैनिक ऐसे घोषित ऑपरेशनल क्षेत्र में तैनात होता है, तो उसे चौबीसों घंटे ड्यूटी पर माना जाता है। इसलिए उसकी मौत को ड्यूटी से अलग नहीं किया जा सकता। (Liberalised Family Pension)

क्यों अहम है यह फैसला?

अदालत के इस फैसले के बााद स्पष्ट हो गया है कि ऑपरेशनल क्षेत्र में तैनात सैनिक की जिम्मेदारी और जोखिम 24 घंटे का होता है। वह चाहे गश्त पर हो, बंकर में हो या आराम कर रहा हो- वह ड्यूटी पर ही माना जाएगा। (Liberalised Family Pension)

भारत ने नेपाल को सौंपे 50 मिलिट्री व्हीकल्स, इंडिया-नेपाल डिफेंस रिश्तों को मिलेगी मजबूती

India Nepal Defence Cooperation

India Nepal Defence Cooperation: भारतीय सेना ने नेपाल सेना को 50 मिलिट्री यूटिलिटी व्हीकल्स सौंपे हैं। यह हैंडओवर भारत-नेपाल सीमा पर उत्तर प्रदेश के महाराजगंज इलाके में हुआ। अधिकारियों ने इसे दोनों देशों की सेनाओं के बीच भरोसे और लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों का प्रतीक बताया है।

भारतीय सेना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए कहा कि इन वाहनों को औपचारिक रूप से काठमांडू में एक समारोह के दौरान नेपाल में भारत के राजदूत प्रस्तुत करेंगे। यानी सीमा पर तकनीकी तौर पर सौंपे जाने के बाद इनका औपचारिक कार्यक्रम नेपाल की राजधानी में होगा। (India Nepal Defence Cooperation)

India Nepal Defence Cooperation India Nepal Defence Cooperation

India Nepal Defence Cooperation: कितने और किस प्रकार के वाहन

कुल 50 मिलिट्री यूटिलिटी व्हीकल्स नेपाल सेना को दिए गए हैं। इनमें से 20 वाहन 7.5 टन क्षमता के हैं, जबकि बाकी 30 वाहन 2.5 टन क्षमता के हैं। इस तरह ये वाहन अलग-अलग ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से काम आ सकेंगे। भारी क्षमता वाले वाहन रसद, उपकरण और सैनिकों के परिवहन में उपयोगी होंगे, जबकि हल्के वाहन तेज मूवमेंट और फील्ड सपोर्ट के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

हैंडओवर कार्यक्रम में भारतीय सेना की ओर से कर्नल जपेंद्र सिंह और मेजर अर्जुन चौहान मौजूद थे। नेपाल सेना की ओर से कर्नल हरि प्रसाद भट्टराई ने औपचारिक रूप से वाहनों को रिसीव किया। इस मौके पर शस्त्र सीमा बल यानी एसएसबी के अधिकारी और जवान भी मौजूद रहे। (India Nepal Defence Cooperation)

मजबूत होंगे संबंध

अधिकारियों के मुताबिक यह पहल नेपाल सेना की क्षमता निर्माण यानी कैपेसिटी बिल्डिंग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत लंबे समय से नेपाल को मिलिट्री ट्रेनिंग, उपकरण और तकनीकी सहायता देता रहा है। यह नया सहयोग उसी श्रृंखला की कड़ी माना जा रहा है।

भारत और नेपाल के बीच रक्षा संबंध केवल औपचारिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच गहरा मानवीय और ऐतिहासिक जुड़ाव भी है। दोनों सेनाएं नियमित रूप से संयुक्त अभ्यास करती हैं और उच्च स्तरीय यात्राएं भी होती रहती हैं। (India Nepal Defence Cooperation)

भारत-नेपाल सैन्य संबंधों की जड़ें बहुत पुरानी हैं। वर्ष 1816 की सुगौली संधि के बाद गोरखा सैनिकों की भर्ती की परंपरा शुरू हुई थी। आज भी भारतीय सेना में बड़ी संख्या में गोरखा सैनिक सेवा दे रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 तक भारतीय सेना में लगभग 34,000 गोरखा सैनिक सक्रिय सेवा में हैं, जबकि बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक पेंशनभोगी भी हैं।

आजादी के बाद भी भारत ने नेपाल सेना को विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम, आधुनिक उपकरणों की सप्लाई और सैन्य शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए। दोनों देशों के सेना प्रमुख एक-दूसरे को मानद जनरल की उपाधि भी प्रदान करते हैं, जो इस रिश्ते की खूबसूरती है। (India Nepal Defence Cooperation)

आर्मी डे परेड में शामिल हुआ था नेपाली सेना बैंड

जनवरी में जयपुर में आयोजित भारतीय सेना दिवस परेड में 33 सदस्यीय नेपाली सेना बैंड ने हिस्सा लिया था। इस भागीदारी को दोनों सेनाओं के बीच गहरे विश्वास का प्रतीक माना गया। ऐसे सांस्कृतिक और औपचारिक सैन्य कार्यक्रम दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत बनाते हैं।

हालांकि वर्ष 2022 में लागू की गई अग्निपथ योजना के बाद नेपाल से गोरखा भर्ती को लेकर कुछ असहमति भी सामने आई थी। नेपाल ने कम अवधि की सेवा, पेंशन व्यवस्था और सामाजिक प्रभावों को लेकर चिंता जताई थी। इसके कारण गोरखा भर्ती प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई है। फिर भी दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को पूरी तरह रुकने नहीं दिया है। (India Nepal Defence Cooperation)

पहले भी करते रहे हैं मदद

यह पहली बार नहीं है जब भारत ने नेपाल को सैन्य वाहन दिए हों। पहली भी भारत समय-समय पर वाहन और अन्य रक्षा उपकरण नेपाल को सौंपता रहा है। अगस्त 2025 में भारत ने नेपाल सेना को हल्के स्ट्राइक वाहन, मेडिकल उपकरण, सैन्य कुत्ते और घोड़े भी सौंपे थे। इससे पहले 2011 में भी बड़ी संख्या में वाहन नेपाल सेना को उपहार स्वरूप दिए गए थे। (India Nepal Defence Cooperation)

रणनीतिक दृष्टि से अहम रिश्ता

भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है और दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ सामाजिक संबंध हैं। ऐसे में रक्षा सहयोग केवल सैन्य जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक स्थिरता का भी हिस्सा है। हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और आपदा राहत जैसे मुद्दों पर दोनों देशों की सेनाएं अक्सर साथ काम करती हैं।

नेपाल के लिए ये वाहन उसके पर्वतीय और दुर्गम इलाकों में संचालन क्षमता बढ़ाने में मददगार होंगे। वहीं भारत के लिए यह कदम पड़ोसी देश के साथ भरोसे को मजबूत करने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (India Nepal Defence Cooperation)

‘मेड इन इंडिया’ 120 kN सुपरक्रूज जेट इंजन का काउंटडाउन शुरू! AMCA के लिए GTRE ने जारी की RFI

Indigenous Jet Engine India

Indigenous Jet Engine India: भारत में पहली बार स्वदेशी फाइटर जेट AMCA के लिए स्वदेशी जेट इंजन बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। डीआरडीओ के तहत काम करने वाली बेंगलुरु स्थित गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडिजिनस एयरो गैस टरबाइन इंजन कंपोनेंट्स के निर्माण को लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन याानी आरएफआई जारी की है।

इसका मकसद भविष्य के फाइटर जेट, खासकर एएमसीए के लिए लगभग 120 किलो न्यूटन थ्रस्ट क्लास का स्वदेशी टर्बोफैन इंजन डेवलप करना है। (Indigenous Jet Engine India)

Indigenous Jet Engine India: क्यों जरूरी है यह कदम

भारत अभी तक अपने फाइटर जेट इंजन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। इंजन किसी भी लड़ाकू विमान का दिल होता है। अगर इंजन विदेश से आता है तो सप्लाई, अपग्रेड और मैंटेनेस के मामले में कई तरह की सीमाएं खड़ी हो सकती हैं। कावेरी इंजन प्रोग्राम से अनुभव मिला कि केवल रिसर्च काफी नहीं है, बल्कि मजबूत मैन्युफैक्चरिंग ढांचा भी उतना ही जरूरी है।

इसी अनुभव से सीखते हुए जीटीआरई अब इंजन के क्रिटिकल कंपोनेंट्स जैसे कंप्रेसर, टरबाइन, कंबस्टर, आफ्टरबर्नर और हाई टेम्परेचर मटेरियल्स के निर्माण के लिए देश में अत्याधुनिक उत्पादन क्षमता विकसित करना चाहता है। (Indigenous Jet Engine India)

क्या है आरएफआई का मकसद

फरवरी में जारी आरएफआई का मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि कौन सी भारतीय या विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर कंपनियां भारत में इंजन कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर सकती हैं।

यह आरएफआई कोई सीधा टेंडर नहीं है, बल्कि सूचना जुटाने की प्रक्रिया है। इसमें इच्छुक कंपनियों से उनकी तकनीकी क्षमता, अनुभव, मशीनिंग सुविधाएं, हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी सिस्टम के बारे में जानकारी मांगी गई है। जो कंपनियां इसमें शामिल होना चाहती हैं, उन्हें पहले नॉन डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर दस्तखत करने होंगे। उसके बाद विस्तृत दस्तावेज साझा किए जाएंगे।

सबमिशन की अंतिम तारीख 23 अप्रैल तय की गई है। जीटीआरई स्पष्ट कर चुका है कि इस प्रक्रिया का मकसद लंबी अवधि के लिए डिजाइन के साथ-साथ पूरा स्वदेशी इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार करना है। (Indigenous Jet Engine India)

ईओआई के जरिए पार्टनर की तलाश

आरएफआई से पहले जीटीआरई ने इसी साल जनवरी में ईओआई जारी की थी। इसका उद्देश्य एक डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर चुनना है। यानी ऐसी भारतीय कंपनी जो इंजन के डिजाइन को वास्तविक उत्पादन, असेंबली, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन तक ले जा सके।

इस प्रोग्राम के तहत अगले लगभग दस सालों में 18 प्रोटोटाइप और प्री-प्रोडक्शन इंजन डेवलप किए जाने हैं। सातवें साल से इंजन की डिलीवरी शुरू होगी और दसवें साल तक यह संख्या 18 तक पहुंच जाएगी। आगे चलकर 200 से ज्यादा इंजनों के सीरियल प्रोडक्शन का रास्ता भी इसी आधार पर खुलेगा।

वहीं इस पूरे प्रोजेक्ट में डिजाइन अथॉरिटी बना रहेगा। इसका मतलब है कि तकनीकी नियंत्रण और बौद्धिक संपदा अधिकार भारत सरकार के पास रहेंगे। चुनी गई कंपनी उत्पादन और इंडस्ट्रियल एग्जिक्यूशन की जिम्मेदारी निभाएगी। (Indigenous Jet Engine India)

कैसा होगा यह इंजन

यह एक मॉडर्न टर्बोफैन जेट इंजन होगा। इसमें लो प्रेशर कंप्रेसर, हाई प्रेशर कंप्रेसर, कंबस्टर, हाई और लो प्रेशर टरबाइन, आफ्टरबर्नर और एडवांस्ड एग्जॉस्ट सिस्टम शामिल होंगे। इंजन में फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल यानी फाडेक सिस्टम होगा, जो पूरी तरह डिजिटल कंट्रोल देगा।

इंजन का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो लगभग 10:1 रखने का टारगेट है। इसका मतलब है कि इंजन हल्का होते हुए भी ज्यादा ताकत देगा। इसमें सुपरक्रूज क्षमता होगी, यानी फाइटर जेट बिना आफ्टरबर्नर के भी सुपरसोनिक गति से उड़ सकेगा। इंफ्रारेड सिग्नेचर कम रखने की कोशिश की जाएगी ताकि दुश्मन के सेंसर से बचाव हो सके। (Indigenous Jet Engine India)

किन कंपनियों की हो सकती है भूमिका

हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर यह घोषित नहीं किया गया है कि कौन सी कंपनी अंतिम रूप से चुनी जाएगी। लेकिन इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में देश की कई बड़ी कंपनियों की संभावित भूमिका देखी जा रही है। एचएएल पहले से ही एयरोस्पेस निर्माण में अग्रणी है और असेंबली तथा इंटीग्रेशन में उसकी मजबूत पकड़ है। वहीं भारत फोर्ज लिमिटेड हाई स्ट्रेंथ फोर्जिंग और टरबाइन ब्लेड निर्माण में विशेषज्ञता रखती है। लार्सन एंड टूब्रो जटिल डिफेंस सिस्टम और सब-सिस्टम इंटीग्रेशन में अनुभवी है। (Indigenous Jet Engine India)

इसी तरह पीटीसी इंडस्ट्रीज हाई प्रिसिजन कास्टिंग में जानी जाती है और मिश्र धातु निगम लिमिटेड हाई टेम्परेचर अलॉय और विशेष धातुओं के उत्पादन में अग्रणी है। इंजन के लिए निकेल बेस्ड सुपर अलॉय, टाइटेनियम और सिंगल क्रिस्टल ब्लेड जैसे उन्नत मटेरियल्स की जरूरत होगी, जहां मिधानी की भूमिका अहम हो सकती है।

जीटीआरई ने साफ कर दिया है कि यह प्रोजेक्ट किसी आम कंपनी के बस का नहीं है। इच्छुक कंपनी के पास कम से कम 1500 करोड़ रुपये का टर्नओवर, मजबूत वित्तीय स्थिति, एयरोस्पेस क्वालिटी सिस्टम जैसे एएस9100 का अनुपालन और हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव होना जरूरी है।

साथ ही एयरवर्थिनेस एजेंसियों के साथ समन्वय, सर्टिफिकेशन प्रक्रिया और लाइफ साइकिल सपोर्ट की क्षमता भी जरूरी होगी। (Indigenous Jet Engine India)

बदल सकती है तस्वीर

अगर यह प्रोग्राम अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जो खुद का एडवांस्ड फाइटर जेट इंजन डिजाइन और बना सकते हैं। इससे न केवल रक्षा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि देश में हाई टेक मैन्युफैक्चरिंग, मटेरियल साइंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नई दिशा मिलेगी। (Indigenous Jet Engine India)

हिंद महासागर में भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत! जर्मनी और यूरोपीय यूनियन के बाद IFC-IOR में ग्रीस की एंट्री

India-Greece Defence Deal: IFC-IOR Greece Liaison Officer

India-Greece Defence Deal: भारत और ग्रीस के बीच सोमवार को अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ग्रीस के रक्षा मंत्री निकोलास-जॉर्जियोस डेंडियास ने हिस्सा लिया। इस बैठक की अहम बात यह रही कि ग्रीस ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह गुरुग्राम स्थित इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) में एक ग्रीक इंटरनेशनल लायजन ऑफसर तैनात करेगा। पिछले एक महीने में ग्रीस तीसरा देश है, जिसने समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए IFC-IOR में शामिल होने का ऐलान किया है। ग्रीस के इस कदम के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका काफी अहम हो गई है।

सोमवार को दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ग्रीस के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री निकोलास-जॉर्जियोस डेंडियास के बीच नई दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक हुई। बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने पर सहमति जताई। इस दौरान एक जॉइंट डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर भी हुए, जिसका मकसद रक्षा उद्योग में साझेदारी को मजबूत करना है। साथ ही वर्ष 2026 के लिए द्विपक्षीय मिलिट्री कोऑपरेशन प्लान का आदान-प्रदान भी किया गया। (India-Greece Defence Deal)

India-Greece Defence Deal: क्या है आईएफसी-आईओआर?

यह केंद्र भारतीय नौसेना ने साल 2018 में गुरुग्राम स्थापित किया था। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना और मित्र देशों के साथ रियल-टाइम सूचना साझा करना है। समुद्री डकैती, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, अवैध मछली पकड़ना और संदिग्ध जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने में यह केंद्र अहम भूमिका निभाता है।

जब कोई देश यहां अपना इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर भेजता है, तो उसका मतलब होता है कि वह भारत के साथ सीधे तौर पर समुद्री सुरक्षा सहयोग में जुड़ रहा है। लायजन ऑफिसर अपने देश की नौसेना और आईएफसी-आईओआर के बीच सूचना का सेतु बनता है। इससे किसी भी आपात स्थिति में तेजी से कॉर्डिनेशन संभव होता है।

ग्रीस का यह फैसला इसलिए भी खास है क्योंकि ग्रीस एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र है। भूमध्य सागर में उसकी सक्रिय भूमिका रही है। अब वह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करेगा। यह भारत-ग्रीस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगा। (India-Greece Defence Deal)

आईएफसी-आईओआर में कितने देश हैं शामिल

आईएफसी-आईओआर में पहले से कई देशों के लायजन ऑफिसर तैनात हैं। सूत्रों के मुताबिक आईएफसी-आईओआर से दुनियाभर की 50 ज्यादा संस्थाएं जुड़ी हैं। जबकि इसमें 28 पर्टनर देश हैं। वहीं इसमें तैनात इंटरनेशनल लायजन अफसरों की संख्या फिलहाल 15 है। सूत्रों ने बताया कि अगले 6 से 12 महीनों में इसमें 5 से 6 सदस्दीय देश और शामिल होने वाले हैं।

पहले से तैनात देशों में ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, फ्रांस, जापान, म्यामार, इटली, मालदीव, केन्या, मॉरीशस, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, थाईलैंड, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स जैसे देश शामिल हैं। अब ग्रीस के जुड़ने से यह नेटवर्क और मजबूत होगा। इस साल जर्मनी और यूरोपीय यूनियन ने भी प्रस्ताव दिया है कि वह अपना प्रतिनिधि भेजेगा। वहीं पिछले साल अप्रैल 2025 में इंडोनेशिया ने भी यहां अधिकारी तैनात करने की घोषणा की थी। (India-Greece Defence Deal)

यह भारत के लिए क्यों है अहम कदम?

पहला, इससे भारत की समुद्री सुरक्षा में नेतृत्व की भूमिका मजबूत होती है। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना, तस्करी और आतंकवाद जैसी चुनौतियों से निपटने में यह केंद्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

दूसरा, यह भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति और “सागर” यानी क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास की नीति को मजबूत करता है। क्वाड देशों के अलावा यूरोपीय देशों की भागीदारी से भारत का सहयोग दायरा और व्यापक हुआ है।

तीसरा, समुद्री मार्गों की बेहतर निगरानी से व्यापारिक सुरक्षा बढ़ती है। हिंद महासागर से होकर दुनिया का बड़ा हिस्सा व्यापार गुजरता है, इसलिए सूचना साझाकरण बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

कुल मिलाकर, IFC-IOR में लगातार बढ़ती आईएलओ की तैनाती भारत की समुद्री कूटनीति के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। यह भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक भरोसेमंद और सक्रिय साझेदार के रूप में स्थापित करती है।

यह सब दर्शाता है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा का केंद्र बनता जा रहा है। दुनिया के कई देश यह मानने लगे हैं कि अगर इस क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षित समुद्री व्यापार सुनिश्चित करना है, तो भारत के साथ सहयोग जरूरी है। वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री क्षेत्र से गुजरता है। ऐसे में सूचना साझा करने का यह सिस्टम बेहद अहम हो जाता है। (India-Greece Defence Deal)

भारत-ग्रीस के बीच स्वदेशी रक्षा उद्योग पर जोर

बैठक के दौरान दोनों देशों ने इस बात पर भी जोर दिया कि वे अपने स्वदेशी रक्षा उद्योग को आगे बढ़ाएंगे। भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल और ग्रीस के एजेंडा 2030 रक्षा सुधार कार्यक्रम को जोड़कर सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। इसका मतलब है कि भविष्य में दोनों देश रक्षा उत्पादन, टेक्नोलॉजी और संयुक्त परियोजनाओं में साथ काम कर सकते हैं।

इस यात्रा के दौरान ग्रीक रक्षा मंत्री ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि भी दी और मानेकशॉ सेंटर में ट्राई-सर्विस गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण किया। ग्रीक प्रतिनिधिमंडल ने बेंगलुरु में रक्षा और औद्योगिक प्रतिष्ठानों का दौरा भी किया, जहां उन्होंने डीपीएसयू, निजी रक्षा कंपनियों और स्टार्ट-अप से बातचीत की। (India-Greece Defence Deal)

भारतीय नेवल डिप्लोमेसी का कमाल, जब विशाखापत्तनम में एक साथ दिखेंगे 75 देश और उनके 90 से ज्यादा जंगी जहाज

IFR Milan 2026 Indian Naval Diplomacy

IFR Milan 2026: एक तरफ जहां पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका तनावपूर्ण संबंध बने हुए हैं, तो वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पूरी दुनिया दो धड़ों में बंटी हुई है। लेकिन इसी दुनिया में, पश्चिमी एशिया से तकरीबन तीन हजार किलोमीटर दूर, हिंद महासागर के किनारे बसे भारत के विशाखापत्तनम में एक बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिलने वाली है। यहां दुनिया के 75 देश एक साथ एक ही मंच पर दिखने वाले हैं। जहां दुनिया के कई धुरविरोधी देश कुछ दिन ही सही, लेकिन एक-दूसरे के ‘दोस्त’ बन कर रहेंगे। यह सब संभव हुआ है भारतीय नौसेना की डिप्लोमेसी के चलते।

फरवरी 2026 में आयोजित IFR और मिलन अभ्यास में इस साल में ऐसा पहली बार होगा, जब कई देश अपनी युद्धपोतों के साथ भारतीय नौसेना के बुलावे पर एक ही समुद्र में एक साथ अभ्यास करेंगे, एक-दूसरे को सलामी देंगे और साझा सुरक्षा पर बातचीत करेंगे। भारत ने इन इवेंट्स में उन देशों को आमंत्रित किया है, जो मुख्य रूप से इंडियन ओशन और इंडो-पैसिफिक में भारत के सहयोगी हैं। देखा जाए तो यह केवल एक मिलिट्री प्रोग्राम नहीं है, बल्कि भारत की मजबूत और संतुलित नेवल डिप्लोमेसी की सबसे बड़ी मिसाल है। (IFR Milan 2026)

हिंद महासागर से सटे विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी तक तीन बड़े मेगा इवेंट इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज मिलन 2026, और इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम (आईओएनएस) कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन हो रहा है। ये तीनों कार्यक्रम एक ही शहर, एक ही समय और एक ही उद्देश्य के साथ आयोजित हो रहे हैं। (IFR Milan 2026)

IFR Milan 2026: विशाखापत्तनम से पूरी दुनिया के लिए संदेश

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम सिर्फ एक बंदरगाह शहर नहीं रहेगा। यह भारत की समुद्री कूटनीति की राजधानी बन जाएगा। यही वह शहर है, जहां भारतीय नौसेना का ईस्टर्न नेवल कमांड स्थित है और जहां से बंगाल की खाड़ी से लेकर पूरे हिंद महासागर पर नजर रखी जाती है।

15 फरवरी से 25 फरवरी तक चलने वाले इन कार्यक्रमों में दुनिया के दर्जनों देशों के युद्धपोत, हजारों नौसैनिक अधिकारी और सैकड़ों डिफेंस एक्सपर्ट्स एक साथ जुटेंगे। समुद्र में युद्धपोतों की कतारें होंगी, तो जमीन पर कूटनीतिक बैठकों और सेमिनारों का दौर चलेगा। (IFR Milan 2026)

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026: महासागरों के माध्यम से एकजुटता

इस बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की थीम है यूनाइटेड थ्रो ओशन्स यानी महासागरों के माध्यम से एकजुटता। यह किसी भी देश की नौसेना के लिए सबसे प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में से एक माना जाता है। इसमें राष्ट्रपति या राष्ट्राध्यक्ष नौसेना के जहाजों का निरीक्षण करते हैं। लेकिन भारत के लिए यह सिर्फ ताकत दिखाने का मंच नहीं है, बल्कि भरोसा और पारदर्शिता दिखाने का जरिया भी है।

18 फरवरी को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बंगाल की खाड़ी में भारतीय और विदेशी युद्धपोतों का निरीक्षण करेंगी। इस दौरान उन्हें गन सैल्यूट दिया जाएगा। भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत इस इवेंट का मुख्य आकर्षण होगा। यह भारत की “बिल्डर्स नेवी” यानी खुद बनाने वाली नौसेना की पहचान है।

खास बात यह है कि इस मेगा इवेंट में हिस्सा लेने वाला कोई भी देश दुश्मन या दोस्त के तौर पर नहीं, बल्कि एक समुद्री साझेदार के तौर पर मौजूद रहेगा।

बता दें कि भारत अब तक दो बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की मेजबानी कर चुका है। पहला आयोजन साल 2001 में मुंबई में हुआ था। यह भारत के गणतंत्र की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था और देश का पहला आईएफआर था। इसमें 29 देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था और कुल 97 जहाज इस आयोजन में शामिल हुए, जिनमें 20 देशों के जहाज थे और 24 विदेशी युद्धपोत भी शामिल थे। इसके अलावा 54 सैन्य विमान फ्लाईपास्ट में शामिल हुए थे। उस समय यह आयोजन भारत की बढ़ती समुद्री क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का बड़ा प्रदर्शन माना गया था।

इसके बाद दूसरा और अब तक का सबसे बड़ा आयोजन साल 2016 में विशाखापत्तनम में हुआ। इसमें लगभग 52 देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। इस आयोजन में करीब 95 से 100 जहाज शामिल हुए, जिनमें 24 विदेशी युद्धपोत और बाकी भारतीय नौसेना के जहाज थे। 50 से अधिक विदेशी नौसेनाओं के प्रतिनिधिमंडल भी इसमें पहुंचे थे। इसमें अमेरिका, रूस, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई बड़े देशों की नौसेनाएं शामिल हुई थीं। 2016 का आईएफआर अब तक का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है, जहां दुनिया भर से नौसेनाएं भारत के साथ समुद्री सहयोग के लिए एक मंच पर आई थीं। (IFR Milan 2026)

मिलन 2026 में दिखेगा भाईचारा, सहयोग और तालमेल 

अगर आईएफआर को नौसेना की परेड कहा जाए, तो मिलन अभ्यास उसकी असली परीक्षा है। इस बार मिलन एक्सरसाइज की थीम है भाईचारा, सहयोग, तालमेल। इस अभ्यास की शुरुआत 1995 में पोर्ट ब्लेयर से हुई थी, जब इसमें सिर्फ चार-पांच देश शामिल थे। आज यह दुनिया के सबसे बड़े मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज में से एक बन चुकी है। मिलन 2026 के लिए 135 से अधिक देशों को निमंत्रण भेजा गया है।

मिलन 2026 में 40 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं। इस अभ्यास का मकसद सिर्फ वॉर एक्सरसाइज करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं आपदा, समुद्री खतरे और मानवीय संकट के समय एक साथ कैसे काम कर सकती हैं। यह अभ्यास दो चरणों सी फेज और हार्बर फेज में होगा। हार्बर फेज में सेमिनार, प्रोफेशनल बातचीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल होते हैं। जबकि सी फेज में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास जैसे- एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस, सर्च एंड रेस्क्यू, और ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे अभ्यास किए जाएंगे।

मिलन 2024 भी विशाखापत्तनम में आयोजित हुआ था। इसमें लगभग 40 से ज्यादा ने हिस्सा लिया था। करीब 15 से 20 देशों ने अपने युद्धपोत या विमान भेजे, जबकि बाकी देशों ने अपने प्रतिनिधि या नौसेना प्रमुख भेजे। इस एडिशन में 35 से ज्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां तथा 50 से अधिक विमान शामिल हुए थे।

वहीं मिलन 2022 में करीब 39 से 42 देशों ने भाग लिया था। 13 देशों ने अपने युद्धपोत भेजे थे और कुल 39 विदेशी डेलीगेशन शामिल हुए थे। यह कोविड महामारी के बाद पहला बड़ा आयोजन था।

जबकि मिलन 2018 में 17 देश शामिल हुए थे। मिलन 2014 में भी 17 देशों ने भाग लिया था और उस समय तक वह सबसे बड़ा एडिशन माना गया था। 2010 और 2012 के संस्करणों में भी करीब 16 विदेशी देश शामिल हुए थे। (IFR Milan 2026)

IFR Milan 2026 Indian Naval Diplomacy
IONS Conclave (File Photo)

आईओएनएस कॉनक्लेव में कई देशों के नेवी चीफ शामिल

विशाखापत्तनम में 20 फरवरी को 9वें इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम कॉनक्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन होगा। इसमें 42 देशों के नौसेना प्रमुख शामिल होने की उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक इस आयोजन में ईरानी नौसेना के कमांडर रियर एडमिरल शाहराम ईरानी भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि ईरान पिछले आईओएनएस इवेंट्स में नियमित रूप से भाग लेता रहा है।

आईओएनएस के 25 मुख्य सदस्य देश हिंद महासागर क्षेत्र के तटीय देश हैं। इन्हें चार हिस्सों में बांटा गया है-दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया व ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र। इन सदस्य देशों में भारत, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका, सेशेल्स, ईरान, ओमान, सऊदी अरब, यूएई, केन्या, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, फ़्रांस (रीयूनियन), मोजाम्बिक, तंजानिया, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, तिमोर, कोमोरोस, जिबूती, मेडागास्कर और अन्य देश शामिल हैं। (IFR Milan 2026)

इसके अलावा कुछ देश ऑब्जर्वर के रूप में जुड़े हैं, इनमें जर्मनी, इटली, यूके, जापान, रूस, स्पेन, नीदरलैंड और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। कुछ अन्य देशों को विशेष निमंत्रण दिया गया है। इनमें सदस्य और ऑब्जर्वर देशों में पाकिस्तान, चीन और तुर्किए भी शामिल हैं, लेकिन उन्हें इस मेगा इवेंट से बाहर रखा गया है।

इस बैठक में समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत, समुद्री डकैती और साइबर हमलों जैसी चुनौतियों, सूचना साझा करने की व्यवस्था, ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों के उपयोग और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा होगी। आईओएनएस का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में साझा चुनौतियों से मिलकर निपटना है। वहीं इस दौरान भारत 2026 से 2028 तक के लिए आईओएनएस की चेयरमैनशिप भी संभालेगा। हालांकि इससे पहले भारत 2008 से 2010 तक चेयरमैन रह चुका है। (IFR Milan 2026)

भारत की नेवल डिप्लोमेसी की बड़ी जीत

इस पूरे आयोजन की सबसे दिलचस्प तस्वीर तब बनेगी, जब कई धुर विरोधी देश रूस, ईरान और अमेरिका के युद्धपोत एक साथ एक ही जगह पर दिखाई देंगे। पश्चिमी एशिया में जहां ईरान और अमेरिका एक-दूसरे के धुरविरोधी हैं, तो यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और अमेरिका दोनों देशों के रिश्ते बेहद खराब हैं। लेकिन विशाखापत्तनम में ये सभी देश भारत के मंच पर साथ होंगे।

वहीं भारत के लिए सिर्फ बड़े देश ही अहम नहीं हैं। बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की मौजूदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश नौसेना भी अपने फ्रिगेट के साथ इस आयोजन का हिस्सा बन रही है। भले ही भारत बांग्लादेश के बीच राजनीतिक और राजनयिक संबंध कितने खराब हों, लेकिन नेवल डिप्लोमेसी आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले हुआ करती थी। बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश की साझा जिम्मेदारियां हैं, जिनमें चक्रवात, समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना और आपदा राहत शामिल हैं। ऐसे में मिलन और आईएफआर जैसे मंच दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करते हैं। (IFR Milan 2026)

इन तीनों कार्यक्रमों में ईरान और अमेरिका, रूस और अमेरिका, छोटे और बड़े देशों को लेकर एक साथ बुला कर भारत ने साफ कर दिया है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि सभी के साथ मिलकर चलने वाला देश है। जहां दुनिया टकराव और ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है, वहीं भारत समुद्र के रास्ते संवाद और सहयोग की राह दिखा रहा है। भारत ने यह दिखा दिया है कि उसकी नौसेना राजनीति से ऊपर उठकर साझा समुद्री सुरक्षा की बात करती है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। (IFR Milan 2026)

विशाखापत्तनम में होगा नेवी का एयर शो

इस मेगा इवेंट के दौरान 19 फरवरी को विशाखापत्तनम में ही आयोजित आरके बीच पर इंटरनेशल सिटी परेड में भारतीय नौसेना अपनी एयर पावर का डेमोन्स्ट्रेशन भी करेगी। जो मुख्य रूप से ऑपरेशनल डेमोन्स्ट्रेशन का हिस्सा है। भारतीय नौसेना के लगभग 45 एयरक्राफ्ट इस पूरे आयोजन में भाग ले रहे हैं, जो समुद्र और आसमान दोनों में उसकी तैयारियों और क्षमताओं को दिखाएंगे।

एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत से मिग-29के फाइटर जेट्स उड़ान भरेंगे। ये जेट फॉर्मेशन फ्लाइट्स और एयर डिफेंस डेमो में हिस्सा लेंगे, जिससे समुद्र के ऊपर नौसेना की मारक क्षमता का प्रदर्शन होगा।इसमें भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स लाइव डिस्प्ले करेंगे। इस दौरान कुछ फॉर्मेशंस भी दिखाई जाएंगी। जिनमें एयरक्राफ्ट फॉर्मेशन जैसे एरोहेड और डायमंड, हेलीकॉप्टर मैन्यूवर्स, और सिमुलेटेड ऑपरेशन्स (जैसे एंटी-सबमरीन वारफेयर या सर्च एंड रेस्क्यू) शामिल हैं।

वहीं, हेलीकॉप्टर श्रेणी में स्वदेशी एएलएच ध्रुव, एमएच-60आर सीहॉक भी भाग लेगा, जो एंटी-सबमरीन ऑपरेशन्स और मल्टी-रोल मिशनों के लिए इस्तेमाल होता है। वहीं कामोव केए-31 एयरबोर्न अर्ली वार्निंग की भूमिका निभाएगा और दूर से आने वाले खतरों की जानकारी देगा। इसके अलावा विमानों में लंबी दूरी की समुद्री गश्त के लिए बोइंद पी8आई पोसीडॉन, डोर्नियर 228, आईएआई सर्चर या आईएआई हेरॉन जैसे यूएवी भी शामिल हो सकते हैं। (IFR Milan 2026)

75 से ज्यादा देश ले रहे हैं हिस्सा

इन तीनों आयोजनों में 75 से ज्यादा देश और 4000 से ज्यादा डेलीगेट्स हिस्सा ले रहे हैं। जिनमें ईरान, अमेरिका, रूस और बांग्लादेश जैसे देश भी शामिल हैं। इस आयोजन में अभी तक भारत के अलावा 67 जहाजों के अलावा विदेशी देशों के 22 युद्धपोत और प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। भारतीय नौसेना की ओर से एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सबमरीन और अन्य युद्धपोत शामिल किए गए हैं। साथ ही कई मिलिट्री एयरक्राफ्ट भी इस कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

भारत की तरफ से प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत (R11), डिस्ट्रॉयर आईएनएस चेन्नई (D65), आईएनएस विशाखापत्तनम (D66), आईएनएस मैसूर (D60), आईएनएस मुंबई (D62), आईएनएस राणा (D52) और आईएनएस रणविजय (D55) शामिल हैं। फ्रिगेट कैटेगरी में आईएनएस तरकश (F50), आईएनएस तमाल (F71) और आईएनएस नीलगिरि (F33) भी भाग ले रहे हैं। इनके अलावा कई अन्य युद्धपोत और पनडुब्बियां भी हैं। (IFR Milan 2026)

सबमरींस की बात करें, तो इन आयोजनों में भारत की तरफ से सिंधुघोष क्लास (प्रोजेक्ट 877EKM) यानी किलो क्लास की तीन पनडुब्बियां हिस्सा ले रही हैं। इनमें आईएनएस सिंधुकेसरी (S60), आईएनएस शंकुल (S47), आईएनएस सिंधुकीर्ति (S61) शामिल हैं।

इनमें आईएनएस सिंधुकेसरी 1989 में कमीशन हुई थी, जो हाल ही में रिफिट से गुजरी है। जिसमें नए सोनार और वेपन सिस्टम्स लगाए गए हैं। आईएफआर में फ्लीट रिव्यू के दौरान यह सबमर्ज्ड या सरफेस पोजीशन में हिस्सा लेगी, जो भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर कैपेबिलिटी दिखाएगी। वहीं, मिलन के सी फेज में एंटी-सबमरीन एक्सरसाइज में यह शामिल होगी।

वहीं, 1992 में कमीशन हुई आईएनएस शंकुल सबमरीन स्टेल्थ फीचर्स के लिए जानी जाती है और यह मिसाइल कैपेबल है। आईएफआर में 18 फरवरी को प्रेसिडेंशियल रिव्यू के दौरान यह फॉर्मेशन में रहेगी। जबकि मिलन में इंटरऑपरेबिलिटी ड्रिल्स (जैसे सर्च एंड रेस्क्यू या एंटी सबमरीन वॉरफेयर) में अपना जलवा बिखेरेगी।

आईएनएस सिंधुकीर्ति की बात करें, तो यह 1990 में कमीशन हुई थी। यह भारत की पहली सबमरीन है जो पूरी तरह से भारत में विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड में रिफिट हुई है। यह आईएफआर में डिस्प्ले का हिस्सा बनेगी, और मिलन अभ्यास के दौरान विदेशी नौसेनाओं के साथ कोऑर्डिनेटेड ऑपरेशंस में शामिल होगी। (IFR Milan 2026)

ये विदेशी जहाज बन रहे हैं हिस्सा

आईएफआर और मिलन एक्सरसाइज में ईरान के तीन शिप IRINS देना, बुशहर और लवन हिस्सा ले रहे हैं। इनमें देना माउज-क्लास की स्वदेशी फ्रिगेट है, जिसे ईरान ने अपने देश में डेवलप किया है, जो एंटी-शिप और एयर डिफेंस क्षमताओं से लैस है। यह फ्रिगेट आमतौर पर पर्शियन गल्फ और हिंद महासागर क्षेत्र में ऑपरेट करती है। वहीं, बुशहर कामन-क्लास की फास्ट अटैक क्राफ्ट या कोरवेट श्रेणी की मिसाइल बोट है। इसकी खासियत इसकी तेज रफ्तार है। यह छोटे आकार की होने के बावजूद एंटी-शिप मिसाइलों से लैस है। जबकि लवन एक ऑक्जिलियरी या सपोर्ट वेसल है। इसका मुख्य काम लॉजिस्टिक सपोर्ट देना होता है, जैसे समुद्र में ईंधन, रसद और अन्य जरूरी सामग्री की सप्लाई करना है। (IFR Milan 2026)

वहीं, रूस की नौसेना भी इस बार मिलन 2026 में सक्रिय भागीदारी कर रही है। रूसी पैसिफिक फ्लीट से आने वाला आरएफएस मार्शल शापोशनिकोव (543) एक उडालॉय-क्लास डेस्ट्रॉयर/फ्रिगेट है, जिसे पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता और लंबी दूरी के ऑपरेशन्स के लिए जाना जाता है। इसके साथ आरएफएस बोरिस बुटोमा (P234) भी शामिल है, जो एक ऑक्जिलियरी या रिप्लेनिशमेंट शिप है और समुद्र में तैनात युद्धपोतों को ईंधन, रसद और अन्य जरूरी सपोर्ट उपलब्ध कराने का काम करता है।

जबकि अमेरिकी नौसेना की तरफ से इस बार मिलन और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में यूएसएस पिंकनी (DDG 91) हिस्सा ले रहा है। यह आर्ले बर्क-क्लास गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर है, जिसे आधुनिक हथियार प्रणालियों और मजबूत एयर डिफेंस क्षमता के लिए जाना जाता है। इसकी मौजूदगी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है। जो भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती नौसैनिक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग का मजबूत संदेश है। (IFR Milan 2026)

इसके अलावा बांग्लादेश नौसेना का प्रमुख युद्धपोत बीएनएस सोमुद्र अविजान (F29) इस बार विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर और मिलन 2026 में हिस्सा ले रहा है। यह बांग्लादेश नेवी का एक अहम पेट्रोल फ्रिगेट है, जो लंबे समुद्री गश्त और सुरक्षा अभियानों के लिए तैनात किया जाता है। यह जहाज मूल रूप से अमेरिका के कोस्ट गार्ड का हाई एंड्यूरेंस कटर रूश था। इसे हैमिल्टन-क्लास कटर के रूप में बनाया गया था, जिसे बाद में बांग्लादेश नौसेना ने 2016 में पेट्रोल फ्रिगेट के तौर पर अपने बेड़े में शामिल किया था।

इन जहाजों के अलावा तो ऑस्ट्रेलिया से HMAS वाररामुंगा, इंडोनेशिया से केआरआई बंग तोमो, जापान की ओर से जेएस युदाची और मलेशिया की ओर से केडी श्री इंद्र शक्ति, मालदीव से सीजीएस हुरावी, म्यांमार से यूएमएस किंग आंग जेया, ओमान से आरएनओवी साध और फिलिपींस से बीआरपी मिगुएल मालवर, दक्षिण कोरिया की नौसेना ROKS गैंग गाम चान शिप के साथ पहुंच रही है। इसके अलावा सेशेल्स से एससीजीएस जोरोस्टर, दक्षिण अफ्रीका से एसएएस अमाटोला और श्रीलंका से एसएलएनएस सागर और एसएलएनएस नंदीमित्रा हिस्सा ले रहे हैं। इस कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। (IFR Milan 2026)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद SCALP मिसाइल फिर चर्चा में? पाकिस्तान में तबाही के बाद भारत क्यों बढ़ा रहा है स्टॉक?

SCALP Cruise Missile Deal India France

SCALP Cruise Missile Deal: भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर जेट के अलावा स्कैल्प (SCALP) क्रूज मिसाइलों के लेकर भी बात हो सकती है। स्कैल्प मिसाइल पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बेहद चर्चा में रही थीं। सूत्रों के मुताबिक, भारत और फ्रांस लगभग 300 मिलियन यूरो (करीब 2,700 करोड़ रुपये) की डील पर चर्चा हो रही है, जिसके तहत भारतीय वायु सेना के लिए बड़ी संख्या में स्कैल्प मिसाइलें खरीदी जा सकती हैं।

यह वही मिसाइल है, जिसका इस्तेमाल भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर मौजूद आतंकवादी ठिकानों को पूरी तरह तबाह करने के लिए किया था। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल लड़ाकू विमानों से दागी गई इन मिसाइलों ने यह साबित कर दिया कि भारत अब दुश्मन की सीमा के भीतर गहराई तक जाकर सटीक हमला करने की पूरी क्षमता रखता है। (SCALP Cruise Missile Deal)

SCALP Cruise Missile Deal: जैश-लश्कर के मुख्यालयों को निशाना बनाया

मई 2025 की रात, जब भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों पर हमला किया, तब पूरी दुनिया की नजरें इस ऑपरेशन पर थीं। इस कार्रवाई में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों को निशाना बनाया गया। बहावलपुर और मुरिदके जैसे इलाकों में मौजूद आतंकी ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

इस ऑपरेशन में भारतीय वायु सेना ने राफेल फाइटर जेट्स से स्कैल्प क्रूज मिसाइल और ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल दोनों का इस्तेमाल किया। जहां ब्रह्मोस ने तेजी से बड़े हमले किए, तो वहीं स्कैल्प मिसाइलों ने बेहद सटीक तरीके से बंकरों और मजबूत इमारतों को निशाना बनाया।

सूत्रों के मुताबिक, जिन टारगेट्स पर स्कैल्प मिसाइलें गिरीं, वहां पूरी तरह तबाही हुई और आतंकवादी संगठनों का इंफ्रास्ट्रक्चर जड़ से खत्म हो गया। (SCALP Cruise Missile Deal)

स्कैल्प मिसाइल आखिर है क्या?

स्कैल्प एक एयर-लॉन्च्ड स्टैंडऑफ क्रूज मिसाइल है। इसे फ्रांस और यूरोप की जानी-मानी रक्षा कंपनी एमबीडीए बनाती है। ब्रिटेन में इसी मिसाइल को स्टॉर्म शैडो के नाम से जाना जाता है।

इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से बाहर रहकर लॉन्च किया जा सकता है। यानी पायलट को खतरे वाले इलाके में घुसने की जरूरत नहीं पड़ती।

स्कैल्प मिसाइल की मारक क्षमता करीब 250 से 500 किलोमीटर तक मानी जाती है। यह मिसाइल बेहद कम ऊंचाई पर उड़ती है, पेड़ों की ऊंचाई के आसपास, ताकि दुश्मन के रडार इसे पकड़ न सकें। इसके अंदर एडवांस गाइडेंस सिस्टम होता है, जिसमें जीपीएस, टेर्रेन रेफरेंस नेविगेशन और इंफ्रारेड सीकर शामिल हैं। इसी वजह से यह मिसाइल “पिनपॉइंट एक्युरेसी” के लिए जानी जाती है। (SCALP Cruise Missile Deal)

पाकिस्तान के एयरबेस पर भी हुआ इस्तेमाल

ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब हालात और तनावपूर्ण हुए, तब भारतीय वायु सेना ने स्कैल्प मिसाइलों का दोबारा बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। यहां तक कि पाकिस्तान एयर फोर्स के कई एयरबेस को भी निशाना बनाया था।

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के 12 प्रमुख एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में रनवे, हैंगर, फाइटर जेट्स और जासूसी विमानों को जमीन पर ही तबाह कर दिया गया। स्कैल्प मिसाइलों ने यहां भी अपनी सटीकता और भरोसेमंद क्षमता साबित की। (SCALP Cruise Missile Deal)

अब क्यों जरूरी हो गई नई डील?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सुरक्षा सोच में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अब सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि डीप स्ट्राइक कैपेबिलिटी को मजबूत करने पर जोर है। इसी कड़ी में भारतीय वायु सेना अपने हथियार भंडार को और मजबूत करना चाहती है।

सूत्रों के अनुसार, वायु सेना अब स्कैल्प मिसाइलों का स्टॉक बढ़ाना चाहती है, ताकि भविष्य में किसी भी आपात स्थिति में पर्याप्त संख्या में ये मिसाइलें उपलब्ध रहें। इसी वजह से फ्रांस के साथ नई डील पर बातचीत चल रही है। (SCALP Cruise Missile Deal)

राफेल के साथ स्कैल्प का मजबूत कॉम्बिनेशन

स्कैल्प मिसाइल को खास तौर पर राफेल फाइटर जेट के साथ इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय वायु सेना के पास फिलहाल 36 राफेल विमान हैं, और ये सभी स्कैल्प से लैस हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल और स्कैल्प की जोड़ी भारत को ऐसी ताकत देती है, जिससे दुश्मन के सबसे सुरक्षित ठिकानों को भी बिना सीमा पार किए खत्म किया जा सकता है। (SCALP Cruise Missile Deal)

नौसेना के राफेल मरीन में भी होगा इस्तेमाल

भारत ने हाल ही में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया है। ये विमान अगले तीन से चार साल में भारत पहुंचेंगे और विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से ऑपरेट करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, स्कैल्प मिसाइल को इन राफेल मरीन विमानों में भी इंटीग्रेट किया जाएगा। इससे भारतीय नौसेना को समुद्र से जमीन पर गहरे हमले की क्षमता मिलेगी, जो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की ताकत को और बढ़ाएगी। (SCALP Cruise Missile Deal)

मीटियोर मिसाइलों की भी तैयारी

स्कैल्प के साथ-साथ भारतीय वायु सेना मीटियोर एयर-टू-एयर मिसाइल की भी बड़ी खरीद की प्रक्रिया में है। मीटियर मिसाइल हवा में दुश्मन के लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी से मार गिराने में सक्षम मानी जाती है। यानी राफेल फ्लीट को हवा और जमीन दोनों मोर्चों पर और ज्यादा घातक बनाया जा रहा है। (SCALP Cruise Missile Deal)

114 और राफेल की तैयारी

ऑपरेशन सिंदूर में राफेल के प्रदर्शन के बाद भारतीय वायु सेना का भरोसा इस विमान पर और मजबूत हुआ है। यही वजह है कि अब 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की योजना पर काम चल रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, यह प्रस्ताव जल्द ही डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) के सामने रखा जा सकता है। अगर यह डील मंजूर हो जाती है, तो आने वाले 10 से 15 साल में भारतीय वायु सेना के पास करीब 200 राफेल विमान हो सकते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कैल्प मिसाइल की यह संभावित डील सिर्फ एक हथियार खरीद नहीं है। यह भारत और फ्रांस के बीच गहरे होते रणनीतिक रिश्तों का संकेत भी है। पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच सबमरीन, फाइटर जेट, इंजन और मिसाइल जैसे कई बड़े रक्षा सौदे हो चुके हैं। यह डील भारत की सैन्य तैयारी को नई धार देगी और यह साफ संदेश भी देगी कि भारत अब आतंकवाद और किसी भी सुरक्षा चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। (SCALP Cruise Missile Deal)

भारतीय नौसेना को मिल सकते हैं स्वदेशी मरीन इंजन, DAC की बैठक में 114 राफेल और P-8i को मिल सकती है हरी झंडी

Indigenous Marine Gas Turbine Engine for Indian Navy in DAC Meeting

DAC Meeting: अगले हफ्ते होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में एक बड़ा और अहम फैसला लिया जा सकता है। माना जा रहा है कि डीएसी की बैठक 12 फरवरी को हो सकती है। बैठक में नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन के डेवलपमेंट से जुड़े एक बड़े प्रोग्राम को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो यह फैसला सिर्फ नौसेना के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा। (DAC Meeting)

यह प्रोग्राम खास तौर पर 24 से 28 मेगावॉट क्षमता वाले मरीन गैस टर्बाइन इंजन के स्वदेशी विकास से जुड़ा है। ऐसे इंजन नौसेना के बड़े युद्धपोतों, जैसे डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट में इस्तेमाल होते हैं। अभी तक भारत इन इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: क्या है यह मरीन गैस टर्बाइन प्रोग्राम?

मरीन गैस टर्बाइन इंजन किसी भी बड़े युद्धपोत का दिल माने जाते हैं। इन्हीं इंजनों की वजह से जहाज तेज रफ्तार से चल पाते हैं, लंबी दूरी तय कर सकते हैं और युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से मूवमेंट कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना अब चाहती है कि ऐसे अहम इंजन भारत में ही डिजाइन हों, भारत में ही बनें और भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं। इसी उद्देश्य से यह नया प्रोग्राम तैयार किया गया है, जिसे डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 की मेक-1 कैटेगरी में लाया गया है।

मेक-1 कैटेगरी का मतलब होता है कि सरकार खुद इस प्रोजेक्ट में बड़ा निवेश करती है, ताकि देश के भीतर इन्हें तैयार किया जा सके। (DAC Meeting)

कितनी होगी लागत और सरकार कितना पैसा देगी?

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मरीन इंजन प्रोग्राम की लागत करीब 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये हो सकती है। मेक-1 नियमों के तहत सरकार प्रोटोटाइप यानी शुरुआती नमूने बनाने की लागत का 70 फीसदी तक खर्च उठाएगी। बाकी 30 फीसदी लागत उस इंडस्ट्री पार्टनर को वहन करनी होगी, जो इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

नियमों के मुताबिक, एक डेवलपमेंट एजेंसी को प्रोटोटाइप बनाने के लिए सरकार की ओर से अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक की फंडिंग दी जा सकती है। लेकिन चूंकि यह एक बड़ा और अहम प्रोजेक्ट है, इसलिए इसमें कई चरणों में निवेश किया जाएगा। (DAC Meeting)

कितने इंजन बनेंगे और कहां होंगे इस्तेमाल?

इस प्रोग्राम के तहत सबसे पहले 4 प्रोटोटाइप इंजन बनाए जाएंगे। इन इंजनों को जमीन पर और बाद में जहाज पर टेस्ट किया जाएगा, ताकि यह देखा जा सके कि वे नौसेना की सभी जरूरतों पर खरे उतरते हैं या नहीं।

अगर ये प्रोटोटाइप सफल रहते हैं, तो इसके बाद शुरुआती तौर पर कम से कम 40 मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की योजना है। आगे चलकर यह संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में कई नए युद्धपोत शामिल करने वाली है।

ये इंजन खास तौर पर डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट जैसे बड़े सरफेस कॉम्बैटेंट्स के लिए बनाए जाएंगे, जो नौसेना की ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। (DAC Meeting)

अभी किन विदेशी इंजनों पर निर्भर है भारत?

फिलहाल भारतीय नौसेना के ज्यादातर बड़े युद्धपोत विदेशी गैस टर्बाइन इंजनों पर चलते हैं। इनमें मुख्य रूप से दो नाम आते हैं। उनमें एक यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट और दूसरी अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई)है।

इन कंपनियों के इंजन वर्षों से भारतीय नौसेना के जहाजों में लगे हुए हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में वैश्विक हालात ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी सप्लाई पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। युद्ध, प्रतिबंध या राजनीतिक तनाव की स्थिति में स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, इस प्रोग्राम से भारत में हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी, एडवांस्ड मटीरियल्स और प्रिसीजन इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़ी तकनीकी तरक्की होगी।

इसी वजह से नौसेना अब चाहती है कि भविष्य में ऐसे अहम सिस्टम्स पूरी तरह से स्वदेशी हों। (DAC Meeting)

पहले भी हुए हैं स्वदेशी प्रयास, लेकिन यह प्रोग्राम क्यों है अलग?

भारतीय नौसेना और डीआरडीओ पहले भी मरीन इंजन के क्षेत्र में स्वदेशी प्रयास कर चुके हैं। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने कावेरी इंजन का एक मरीन वर्जन डेवलप करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) जैसी सार्वजनिक कंपनियों ने भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए लोकलाइजेशन पर काम किया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार मौजूदा मरीन इंजन प्रोग्राम का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक रखा गया है। इस बार विकास की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि प्राइवेट इंडस्ट्री की अगुवाई में, नौसेना की सक्रिय भागीदारी के साथ इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की योजना है। इससे स्वदेशी तकनीक के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। (DAC Meeting)

प्राइवेट इंडस्ट्री से क्या है उम्मीद?

पिछले साल के आखिर में नौसेना ने भारतीय प्राइवेट कंपनियों से संपर्क किया था और उनसे जानकारी मांगी थी कि क्या वे ऐसे हाई-पावर मरीन गैस टर्बाइन इंजन बना सकती हैं। कंपनियों से यह पूछा गया कि क्या उनके पास गैस टर्बाइन डिजाइन करने का अनुभव है। क्या वे फोर्जिंग, कास्टिंग और प्रिसीजन मशीनिंग जैसे अहम काम कर सकती हैं। साथ ही, क्या उनके पास टेस्टिंग फैसिलिटी और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है और वे इंजन का मेंटेनेंस और लाइफ-साइकिल सपोर्ट कैसे देंगे। इस कवायद का मकसद यह समझना था कि भारतीय इंडस्ट्री इस चुनौती के लिए कितनी तैयार है। (DAC Meeting)

खुल सकती है निर्यात की संभावना भी

अगर भारत इस 24-28 मेगावॉट मरीन गैस टर्बाइन को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो भविष्य में इसे इंडियन ओशन रीजन की मित्र नौसेनाओं को निर्यात भी किया जा सकता है। आज कई छोटे और मध्यम देश अपने युद्धपोतों के लिए भरोसेमंद और किफायती इंजन की तलाश में रहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए एक नया विकल्प बन सकता है। (DAC Meeting)

डीएसी बैठक में और किस पर हो सकती है चर्चा

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की होने वाली बैठक में वायुसेना के लिए 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित खरीद पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जिससे यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी रक्षा खरीद योजनाओं में शामिल मानी जा रही है। इसके अलावा डीएसी में भारतीय नौसेना के लिए छह अतिरिक्त पी-8आई समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान खरीदने का प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है।

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास 12 पी-8आई विमान हैं, जिनका इस्तेमाल हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए किया जाता है। नौसेना अपनी निगरानी क्षमता को और मजबूत करने के लिए छह और विमानों की जरूरत महसूस कर रही है। यह खरीद अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) रूट के जरिए की जानी है। (DAC Meeting)

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने मई 2021 में इस बिक्री को मंजूरी दे दी थी और उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 2.42 अरब डॉलर बताई गई थी। हालांकि, लागत से जुड़े सवालों और पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद बने राजनीतिक माहौल के कारण यह सौदा आगे नहीं बढ़ पाया।

इसके बावजूद बातचीत बंद नहीं हुई। सितंबर में अमेरिकी रक्षा विभाग और बोइंग के वरिष्ठ अधिकारी भारत आए थे और इस सौदे को लेकर विस्तृत चर्चा की गई थी। अब सूत्रों का कहना है कि डीएसी से मंजूरी मिलने की स्थिति में यह सौदा अगले वित्त वर्ष में औपचारिक रूप से साइन किया जा सकता है। (DAC Meeting)