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RUAV-200 ड्रोन को देखने पहुंचे आर्मी चीफ, स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड में भरी उड़ान

RUAV-200 Drone
RUAV-200 Drone

RUAV-200 Drone: रणसंवाद कार्यक्रम में हिस्सा लेने बेंगलुरु पहुंचे आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी गुरुवार को हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) पहुंचे, जहां उन्होंने देश में डेवलप हो रहीं स्वदेशी एयरोस्पेस क्षमताओं और आर्मी एविएशन से जुड़े प्रोजेक्ट्स की जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर ध्रुव के अलावा RUAV-200 यानी रोटरी अनमैन्ड एरियल व्हीकल को करीब से देखा और उसकी ऑपरेशनल क्षमता को समझा। वहीं, इस दौरान उन्होंने भारत के स्वदेशी लाइट कॉम्बैट अटैक हेलीकॉप्टर प्रचंड में भी उड़ान भरी और उसकी ऑपरेशनल क्षमता का जायजा लिया।

RUAV-200 Drone: क्या है RUAV-200 ड्रोन

RUAV-200 यानी रोटरी अनमैन्ड एरियल व्हीकल, यह एक ऐसा ड्रोन है जो हेलीकॉप्टर की तरह उड़ता है और बिना पायलट के ऑपरेट होता है। इसे खास तौर पर निगरानी, जानकारी जुटाने और टारगेट पहचान जैसे कामों के लिए तैयार किया गया है।

यह ड्रोन पूरी तरह ऑटोनोमस यानी खुद से उड़ान भर सकता है और मिशन पूरा कर सकता है। इसमें नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशन की क्षमता है, यानी यह दूसरे सिस्टम्स के साथ मिलकर काम कर सकता है। इसमें लगे कैमरे और सेंसर दिन और रात दोनों समय काम कर सकते हैं, जिससे लगातार निगरानी संभव होती है।

RUAV-200 Drone
RUAV-200 Drone

RUAV-200 की तकनीकी खूबियां

RUAV-200 का वजन करीब 200 किलोग्राम है, जो समुद्र तल पर 250 किलोग्राम तक हो सकता है। यह लगभग 4.5 घंटे तक लगातार उड़ सकता है और इसकी डेटा लिंक रेंज करीब 100 किलोमीटर है। इसका मतलब है कि इसे काफी दूर से कंट्रोल किया जा सकता है।

यह ड्रोन करीब 6000 मीटर तक की ऊंचाई पर पहाड़ी इलाकों में भी उड़ान भर सकता है। इसकी अधिकतम स्पीड करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसमें 30 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने की क्षमता है, जो समुद्र तल पर 80 किलोग्राम तक पहुंच सकती है।

इसमें पोर्टेबल और फिक्स्ड दोनों तरह के ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन का विकल्प है, जिससे इसे अलग-अलग परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही इसमें रियल टाइम वीडियो और डेटा फीड देने की क्षमता भी है, जिससे जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर को तुरंत जानकारी मिलती रहती है।

जमीन और समुद्र दोनों जगह इस्तेमाल

RUAV-200 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे जमीन और समुद्र दोनों जगह इस्तेमाल किया जा सके। जमीन पर यह बॉर्डर निगरानी, टारगेट ट्रैकिंग, आईईडी और लैंडमाइन की पहचान जैसे काम कर सकता है। इसके अलावा यह जमीन का सर्वे और मैपिंग भी कर सकता है।

आपदा के समय राहत और बचाव कार्यों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं समुद्री ऑपरेशन में यह तटीय निगरानी, एंटी-पायरेसी ऑपरेशन और पोर्ट मॉनिटरिंग में काम आ सकता है। कुछ मामलों में इसे रडार और मिसाइल से बचाव के लिए डिकॉय के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

अलग-अलग मिशन के लिए बदल सकता है सिस्टम

इस हेलीकॉप्टर ड्रोन की एक खास बात यह है कि इसमें अलग-अलग तरह के पेलोड लगाए जा सकते हैं। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड कैमरा, सिंथेटिक एपर्चर रडार, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और कम्युनिकेशन इंटेलिजेंस सिस्टम लगाए जा सकते हैं।

इसके अलावा इसमें लिडार, हाईपर-स्पेक्ट्रल कैमरा, सर्च लाइट और लाउड हेलर जैसे उपकरण भी लगाए जा सकते हैं। इससे यह ड्रोन अलग-अलग मिशन के हिसाब से खुद को बदल सकता है।

लंबे समय से चल रहा है RUAV प्रोजेक्ट

RUAV-200 प्रोजेक्ट पर काम कई सालों से चल रहा है। पहले 2009 में एक अनमैन्ड हेलीकॉप्टर का कॉन्सेप्ट सामने आया था, जो बाद में डेवलप होकर RUAV के रूप में सामने आया। एरो इंडिया 2025 में इसे शोकेस भी किया गया था।

बीच में निजी कंपनियों के कुछ ड्रोन सिस्टम भी सेना में शामिल हुए, लेकिन एचएएल के बनाए इस प्रोजेक्ट को खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों और कठिन परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया है।

हाई एल्टीट्यूड ऑपरेशन के लिए तैयार

RUAV-200 को खास तौर पर ऐसे इलाकों के लिए बनाया गया है जहां हवा पतली होती है, तापमान बेहद कम होता है और मौसम तेजी से बदलता है। यह ड्रोन -35 डिग्री से लेकर +55 डिग्री तक के तापमान में काम कर सकता है।

यह 4000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों से भी उड़ान भर सकता है, जो पहाड़ी सीमाओं के लिए जरूरी है। इसी वजह से इसे बॉर्डर एरिया में तैनात सैनिकों के लिए उपयोगी माना जा रहा है।

RUAV-200 Drone
Light Combat Helicopter (LCH) Prachand

प्रचंड हेलीकॉप्टर में भरी उड़ान

इस दौरे के दौरान आर्मी चीफ ने स्वदेशी लाइट कॉम्बैट अटैक हेलीकॉप्टर प्रचंड में भी उड़ान भरकर उन्होंने इसकी स्पीड, कंट्रोल, मारक क्षमता को नजदीक से देखा। साथ ही यह भी बताया गया कि इन हेलीकॉप्टर्स का अपग्रेड, मेंटेनेंस और प्रोडक्शन किस तरह किया जा रहा है। यह हेलीकॉप्टर पूरी तरह ऑपरेशनल है और युद्ध के मैदान में अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार है। प्रचंड को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के खिलाफ सटीक और तेज हमला कर सके और जमीन पर लड़ रही सेना को सीधे हवाई सपोर्ट दे सके।

RUAV-200 Drone
Light Combat Helicopter (LCH) Prachand

हल्का और फुर्तीला होने की वजह से यह हेलीकॉप्टर हर तरह के इलाके में आसानी से ऑपरेट कर सकता है। चाहे पहाड़ी इलाका हो, रेगिस्तान हो या सामान्य मैदान, यह हर जगह अपनी भूमिका निभाने में सक्षम है। प्रचंड को खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों के लिए तैयार किया गया है। यह 6000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर भी प्रभावी तरीके से काम कर सकता है, जहां हवा पतली होती है और सामान्य हेलीकॉप्टरों के लिए उड़ान भरना मुश्किल होता है। इसमें एडवांस्ड एवियोनिक्स सिस्टम, सटीक हथियार और मजबूत सुरक्षा फीचर्स लगाए गए हैं, जिससे यह क्लोज एयर सपोर्ट, एंटी-आर्मर ऑपरेशन और निगरानी जैसे मिशनों में बेहद उपयोगी है।

RUAV-200 Drone
Light Combat Helicopter (LCH) Prachand

एयर लिटोरल पर सेना का फोकस

आज का युद्ध पहले से काफी बदल चुका है। अब सिर्फ टैंक और बंदूकें ही नहीं, बल्कि ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। युद्ध अब जमीन से आगे बढ़कर नीचे के हवाई क्षेत्र तक फैल चुका है, जिसे एयर लिटोरल कहा जाता है। यह वह इलाका है जहां कम ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर, ड्रोन और अन्य सिस्टम काम करते हैं। हाल के संघर्षों में यह देखा गया है कि इस इलाके पर नियंत्रण रखने वाली सेना को बड़ा फायदा मिलता है। इसी वजह से अब सेनाएं इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने पर जोर दे रही हैं। (RUAV-200 Drone)

तेजस को लेकर जीई और एचएएल के बीच हुई अहम बैठक, इंजन की समय पर डिलीवरी को लेकर हुई बात

Tejas engine delay GE HAL meeting

Tejas engine delay GE HAL meeting: लगभग दो महीने के ग्राउंडिंग के बाद, 34 तेजस फाइटर जेट्स की फ्लीट ने 8 अप्रैल से उड़ान भरनी शुरू कर दी है। वहीं बेंगलुरु में बुधवार को हिंदुस्ताान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) में अहम बैठक हुई। इस बैठक में तेजस के लिए इंजन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पेस के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने एचएएल के अधिकारियों से मुलाकात की। वहीं, इस अहम बैठक का फोकस तेजस के इंजन की डिलीवरी में देरी और आगे की योजना को लेकर था।

जीई एरोस्पेस की टीम का नेतृत्व कंपनी की वाइस प्रेसिडेंट रीटा फ्लेहर्टी कर रही थीं। जबकि एचएएल की तरफ से चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डीके सुनील और डायरेक्टर (ऑपरेशंस) रवि के. शामिल हुए।

Tejas engine delay GE HAL meeting: एफ-404 इंजन की देरी पर जताई चिंता

सूत्रों के मुताबिक इस बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा एफ-404 इंजन की सप्लाई का रहा। यही इंजन भारतीय वायुसेना के तेजस एमके1ए (मार्क अल्फा) फाइटर जेट में लगाया जाता है। एचएएल ने साल 2021 में जीई से (83 विमानों का ऑर्डर) कुल 99 एफ-404 इंजन का ऑर्डर दिया था, ताकि तेजस एमके1ए के प्रोडक्शन को तेज किया जा सके। लेकिन अब तक केवल 6 इंजन ही एचएएल को मिल पाए हैं। छठा इंजन हाल ही में अमेरिका में हैंडओवर किया गया है, जिसे भारत आने में थोड़ा वक्त लगेगा।

सूत्रों के बताया कि असल समस्या ग्लोबल सप्लाई चेन में आई दिक्कतों से जुड़ी है। कोरोना के बाद से दुनिया भर में मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स पर असर पड़ा था, जिसका असर अब भी कई डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर दिख रहा है। जीई भी इसी वजह से समय पर इंजन नहीं दे पाया।

वहीं, इस साल मार्च 2026 तक 5 और अतिरिक्त इंजन मिलने की उम्मीद थी, लेकिन वह भी पूरी नहीं हुई। इससे तेजस एमके1ए का प्रोडक्शन सीधे प्रभावित हुआ है। कई विमान बनकर तैयार हैं, लेकिन इंजन न होने की वजह से उन्हें उड़ान के लिए तैयार नहीं किया जा सका। वहीं, पहले तेजस एमके 1ए की डिलीवरी अब इस साल जून तक होने की उम्मीद है।

एचएएल ने लगाई जीई पर पेनल्टी

इंजन डिलीवरी में देरी को लेकर एचएएल ने अब सख्त रुख अपनाया है। कंपनी ने जीई पर कॉन्ट्रैक्चुअल पेनल्टी यानी लिक्विडेटेड डैमेज लगाना शुरू कर दिया है। जिसके तहत हर देरी वाले इंजन पर जीई को जुर्माना देना होगा। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि सप्लाई को लेकर गंभीरता बनी रहे।

बैठक में इसी मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई कि अब तक कितनी डिलीवरी हुई, कितनी बाकी है और आगे किस तरह से देरी को कम किया जा सकता है। जीई की तरफ से भी यह भरोसा दिलाया गया कि अब सप्लाई की रफ्तार बढ़ाई जाएगी।

बैठक के दौरान जीई ने एचएएल को भरोसा दिलाया कि 2026 के दूसरे हिस्से यानी जून से दिसंबर के बीच करीब 20 इंजन डिलीवर कर दिए जाएंगे। अगर ऐसा होता है तो तेजस एमके1ए प्रोग्राम को कुछ राहत मिल सकती है।

हालांकि पहले भी कई बार डेडलाइन मिस हो चुकी हैं, इसलिए एचएएल इस बार ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है। कंपनी अब हर डिलीवरी को करीब से मॉनिटर कर रही है, ताकि आगे किसी तरह की अनिश्चितता न रहे।

इंजन की कमी का असर सिर्फ सप्लाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरे प्रोडक्शन लाइन पर असर पड़ा है। एचएएल के पास कई विमान तैयार हैं, जिनमें सिस्टम इंस्टॉल हो चुके हैं, टेस्टिंग भी हो चुकी है, लेकिन इंजन न होने की वजह से वे हैंगर में खड़े हैं।

इंजन सप्लाई में सबसे बड़ी रुकावट सप्लाई चेन है। इंजन बन जाने के बाद भी उन्हें समय पर डिलीवर करना आसान नहीं होता। इंटरनेशनल शिपमेंट, एक्सपोर्ट क्लियरेंस और लॉजिस्टिक्स जैसी कई प्रक्रियाएं इसमें शामिल होती हैं।

तेजस एमके1ए भारतीय वायुसेना के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यह पुराने लड़ाकू विमानों को रिप्लेस करेगा। ऐसे में इंजन की देरी ने पूरे शेड्यूल को पीछे धकेल दिया है।

एफ-414 इंजन प्रोग्राम पर भी हुई चर्चा

इस बैठक में एफ-414 इंजन प्रोग्राम को लेकर भी चर्चा हुई। यह इंजन तेजस एमके2 फाइटर जेट के लिए लगाया जाना है। और यह इंजन एफ-404से ज्यादा ताकतवर है। इस पर भारत और जीई के बीच ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी यानी टी-ओ-टी को लेकर बातचीत चल रही है।

भारत चाहता है कि इस इंजन की तकनीक का बड़ा हिस्सा देश में आए, ताकि भविष्य में इन्हें भारत में ही बनाया जा सके। यह आत्मनिर्भरता के लिहाज से बहुत अहम माना जा रहा है। हालांकि इस डील पर अभी पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई है और बातचीत जारी है।

एचएएल और जीई के बीच सहयोग नया नहीं है। दोनों कंपनियां लंबे समय से साथ काम कर रही हैं, खासकर तेजस प्रोग्राम में जीई का अहम रोल रहा है। एफ-404 इंजन भी इसी साझेदारी का हिस्सा है।

इस बैठक में जीई के प्रतिनिधियों ने एचएएल के एयरक्राफ्ट डिवीजन का दौरा भी किया और तेजस एमके1ए के प्रोडक्शन को देखा।

हालांकि आज हुई इस बैठक में किसी नए प्रोजेक्ट की घोषणा नहीं हुई, बल्कि पहले से चल रहे प्रोग्राम्स की समीक्षा पर जोर रहा। खास तौर पर यह देखा गया कि कहां दिक्कत आ रही है और उसे कैसे दूर किया जाए। (Tejas engine delay GE HAL meeting)

रक्षा मंत्रालय की बड़ी मंजूरी, ‘वीराज’ एंटी-टैंक स्मार्ट माइन और एयर-ड्रॉप्ड ड्रोन स्वार्म सिस्टम को दी हरी झंडी!

Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System
AI-Generated Image

Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System: रक्षा मंत्रालय ने ‘मेक-II’ कैटेगरी के तहत दो नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। जिसके तहत एंटी टैंक माइन ‘वीराज’ और एयर-ड्रॉप्ड कैनिस्टराइज्ड स्वार्म सिस्टम को डेवलप किया जाएगा। इन दोनों प्रोजेक्ट्स को ‘मेक-II’ कैटेगरी के तहत इन-प्रिंसिपल अप्रूवल यानी शुरुआती मंजूरी दी गई है। जिसके बाद अब देश की कंपनियां इन सिस्टम्स को डिजाइन और डेवलप करने का काम शुरू कर सकती हैं। ये दोनों सिस्टम सेना और वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं और इनमें खास तौर पर स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया गया है।

Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System: क्या है मेक-II और क्यों अहम है

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मेक-II कैटेगरी क्या होती है। यह डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिजर का हिस्सा है जिसमें सरकार कंपनियों को सीधे पैसे नहीं देती, बल्कि कंपनियां खुद अपने खर्च पर प्रोटोटाइप यानी शुरुआती मॉडल तैयार करती हैं।

अगर वह सफल होता है और सेना की जरूरतों को पूरा करता है, तो बाद में उसी कंपनी को बड़े स्तर पर प्रोडक्शन का ऑर्डर मिल सकता है। इस मॉडल का मकसद यह है कि देश में नई टेक्नोलॉजी डेवलप हो और विदेशों पर निर्भरता कम हो।

इसमें एक शर्त यह भी होती है कि कम से कम 50 फीसदी तकनीक और सामग्री भारत में ही तैयार होनी चाहिए। इसी वजह से इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम कदम माना जाता है। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

क्या है वीराज’ एंटी-टैंक माइन

‘वीराज’ एंटी-टैंक माइन का इस्तेमाल दुश्मन के टैंक और भारी बख्तरबंद वाहनों को रोकने के लिए किया जाएगा। अभी तक सेना मुख्य रूप से जमीन पर हाथ से या मशीन के जरिए माइंस बिछाती रही है। जिसमें समय लगता है और कई बार जोखिम भी होता है, क्योंकि सैनिकों को दुश्मन के करीब जाकर यह काम करना पड़ता है।

वहीं नई ‘वीराज’ माइन को ज्यादा एडवांस बनाने की योजना है। इसमें सेंसर आधारित सिस्टम हो सकता है, जो टैंक या भारी वाहन की हलचल को पहचान सके। इसके अलावा इसमें सेल्फ-न्यूट्रलाइजेशन जैसी क्षमता भी हो सकती है, यानी एक तय समय के बाद यह खुद ही डिएक्टिवेट हो जाए।

इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि माइन्स को सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि ड्रोन या अन्य सिस्टम के जरिए भी तेजी से लगाया जा सकेगा। इससे सेना को किसी एरिया को जल्दी से ब्लॉक करने में मदद मिलेगी, जिसे सैन्य भाषा में ‘एरिया डिनायल’ कहा जाता है। इस तरह के सिस्टम से खास तौर पर सीमावर्ती इलाकों में दुश्मन के आगे बढ़ने की गति को रोका जा सकता है।

पहले कैसे बिछाई जाती थीं माइंस

अब तक माइंस बिछाने का तरीका काफी पारंपरिक रहा है। सैनिक या तो खुद जाकर माइंस लगाते थे या फिर विशेष वाहन के जरिए इन्हें जमीन पर फैलाया जाता था। इसमें समय ज्यादा लगता था और कई बार दुश्मन को पहले ही इसका अंदाजा हो जाता था। इसके अलावा पुरानी माइंस में स्मार्ट फीचर्स नहीं होते थे, जिससे उन्हें हटाना या इनएक्टिव करना भी आसान हो जाता था। नई ‘वीराज’ माइन इन कमियों को दूर करने की दिशा में एक कदम मानी जा रही है। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

क्या है ड्रोन स्वार्म सिस्टम

दूसरा प्रोजेक्ट एयर-ड्रॉप्ड कैनिस्टराइज्ड स्वार्म सिस्टम यानी एडीसी-एस से जुड़ा है। यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें एक साथ कई ड्रोन हवा में छोड़े जा सकते हैं और वे मिलकर हमला कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, एक बड़ा विमान हवा में एक कंटेनर गिराएगा और उस कंटेनर के अंदर से कई छोटे-छोटे ड्रोन बाहर निकलेंगे। ये ड्रोन अलग-अलग दिशा में जाकर अपने-अपने टारगेट पर हमला कर सकते हैं। जिसे इसे स्वार्म टेक्नोलॉजी कहा जाता है। इसमें ड्रोन एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और मिलकर काम करते हैं। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

इस सिस्टम को बड़े ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे सी-17, सी-130 या सी-295 से इस्तेमाल किया जा सकता है। विमान सुरक्षित दूरी से ही इस कैनिस्टर को गिराएगा और उसके बाद अंदर मौजूद ड्रोन एक्टिव होकर अपने टारगेट की ओर बढ़ेंगे।

इन ड्रोनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे वे बिना जीपीएस के भी काम कर सकें। यह खास तौर पर तब जरूरी होता है जब दुश्मन जीपीएस सिग्नल को जाम कर देता है। हर ड्रोन अपने साथ विस्फोटक ले जा सकता है और सटीक तरीके से टारगेट पर हमला कर सकता है।

अभी तक लंबी दूरी से हमला करने के लिए फाइटर जेट्स या मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था। फाइटर जेट्स को दुश्मन के इलाके के करीब जाना पड़ता था, जिससे खतरा बढ़ जाता था। वहीं, मिसाइलें महंगी होती हैं और हर स्थिति में उनका इस्तेमाल आसान नहीं होता। ड्रोन स्वार्म सिस्टम इन दोनों समस्याओं का समाधान देता है। इसमें एक साथ कई छोटे ड्रोन इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जो दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कन्फ्यूज्ड कर सकते हैं।

स्वार्म टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। इसमें कई ड्रोन एक साथ काम करते हैं और दुश्मन के सिस्टम को ओवरलोड कर देते हैं। अगर दुश्मन एक-दो ड्रोन को रोक भी ले, तो बाकी ड्रोन अपने टारगेट तक पहुंच सकते हैं।

इन दोनों प्रोजेक्ट्स के साथ एक बड़ा बदलाव यह भी है कि अब निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को इसमें शामिल होने का मौका दिया गया है। वे अपने स्तर पर इन सिस्टम्स को डिजाइन और डेवलप कर सकते हैं। अगर उनका मॉडल सफल होता है, तो उन्हें बड़े स्तर पर उत्पादन का मौका मिल सकता है। इससे देश में डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और नई तकनीक तेजी से विकसित हो सकेगी। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

किस चरण में हैं ये प्रोजेक्ट

फिलहाल ये दोनों प्रोजेक्ट शुरुआती चरण में हैं। इन्हें इन-प्रिंसिपल अप्रूवल मिल चुका है, यानी डिजाइन और डेवलपमेंट की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इसके बाद कंपनियां अपने प्रोटोटाइप बनाएंगी, उनका ट्रायल होगा और फिर सेना की जरूरतों के हिसाब से अंतिम सिस्टम तैयार किया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया समय लेती है, क्योंकि इसमें तकनीकी परीक्षण और सुरक्षा मानकों को पूरा करना जरूरी होता है। (Viraj Anti Tank Mine Drone Swarm System)

Explainer: क्या है भारतीय सेना का फ्यूचर वॉरफेयर प्लान? टैंक नहीं, ड्रोन तय करेंगे जंग का नतीजा!

Indian Army Drone Roadmap Explained
Pic Source: Indian Army

Indian Army Drone Roadmap Explained: भारतीय सेना ने हाल ही में अनमैन्ड एरियल सिस्टम यानी यूएएस और लॉइटरिंग म्यूनिशन के लिए एक टेक्नोलॉजी रोडमैप जारी किया है। भारपतीय सेना ने पहली बार ड्रोन को लेकर कोई रोडमैप तैयार किया है। इसका मकसद आने वाले समय के युद्ध के लिए सेना को तैयार करना और देश में ही नई तकनीक विकसित करना है। यह रोडमैप सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो और ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के साथ मिलकर तैयार किया गया है

मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन का किस तरह से तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है इसकी झलक हालिया युद्धों ईरान-इजरायल वॉर और यूक्रेन वॉर में देखी जा सकती है। जहां सस्ते ड्रोन के जरिए महंगे वेपन सिस्टम को निशाना बनाया जा रहा है। इन संघर्षों में ड्रोन ने निगरानी, सटीक हमले, लॉजिस्टिक सपोर्ट और यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में भी अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि अब सेना यह समझ चुकी है कि अगर भविष्य के युद्ध में बढ़त बनानी है तो ड्रोन और ऑटोमैटिक सिस्टम पर फोकस करना ही होगा।

Indian Army Drone Roadmap Explained: क्या होते हैं यूएएस और लॉइटरिंग म्यूनिशन?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यूएएस यानी अनमैन्ड एरियल सिस्टम सिर्फ एक ड्रोन नहीं होता, बल्कि यह पूरा सिस्टम होता है जिसमें ड्रोन के साथ-साथ कैमरे, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम और ग्राउंड कंट्रोल शामिल होते हैं। इसी तरह लॉइटरिंग म्यूनिशन ऐसे ड्रोन होते हैं जो हवा में कुछ समय तक घूमते रहते हैं, टारगेट की पहचान करते हैं और फिर खुद ही जाकर उस पर हमला कर देते हैं। इन्हें आम भाषा में कामिकाजे ड्रोन भी कहा जाता है, क्योंकि ये हमला करने के बाद खुद भी नष्ट हो जाते हैं।

पांच हिस्सों में बंटा पूरा रोडमैप

इस रोडमैप की सबसे खास बात यह है कि इसे पांच बड़े हिस्सों में बांटा गया है, ताकि हर तरह के सैन्य ऑपरेशन के लिए अलग-अलग ड्रोन और सिस्टम तैयार किए जा सकें।

पहला हिस्सा निगरानी यानी सर्विलांस का है, जो किसी भी सेना की आंख और कान होता है। इसमें ऐसे ड्रोन शामिल हैं जो बहुत ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सकते हैं और लगातार दुश्मन की हरकतों पर नजर रख सकते हैं।

कुछ ड्रोन ऐसे होते हैं जो 20,000 फीट से भी ज्यादा ऊंचाई पर जाकर कई घंटों या दिनों तक उड़ान भर सकते हैं, जबकि कुछ मध्यम ऊंचाई पर रहकर लगातार जानकारी देते रहते हैं। इन ड्रोन की मदद से सेना को रियल टाइम इंटेलिजेंस मिलती है, जिससे सीमा पर किसी भी हलचल को तुरंत समझा जा सकता है। खासकर पहाड़ी इलाकों और कठिन सीमाओं पर यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित होती है।

स्पेशल रोल ड्रोन

दूसरा हिस्सा स्पेशल रोल का है, इसमें ऐसे ड्रोन शामिल हैं जो सिर्फ निगरानी नहीं करते, बल्कि कई तरह के ऑपरेशन कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर मदर ड्रोन से कई ड्रोन निकल कर अलग-अलग दिशाओं में उड़ सकते हैं, जिससे एक साथ कई जगहों पर निगरानी या हमला किया जा सकता है। कुछ ड्रोन वेपन से लैस होते हैं और जरूरत पड़ने पर सीधे हमला कर सकते हैं। कुछ ड्रोन दुश्मन के कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम करने के लिए बनाए गए हैं।

इसके अलावा ऐसे ड्रोन भी शामिल हैं जो माइंस यानी बारूदी सुरंगें बिछा सकते हैं या स्वार्म यानी झुंड में हमला कर सकते हैं। स्वार्म टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है, जहां एक साथ कई ड्रोन मिलकर दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को भ्रमित कर देते हैं और हमला करना आसान हो जाता है।

लॉइटरिंग म्यूनिशन

तीसरा हिस्सा लॉइटरिंग म्यूनिशन का है, जो सीधे तौर पर हमले से जुड़ा हुआ है। इसमें छोटे से लेकर लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन शामिल हैं। ये ड्रोन हवा में घूमते रहते हैं और सही समय आने पर टारगेट पर हमला करते हैं। कुछ ड्रोन सस्ते होते हैं ताकि बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जा सकें, जबकि कुछ हाई-टेक होते हैं जो बहुत सटीक निशाना लगा सकते हैं। इनका इस्तेमाल दुश्मन के बंकर, वाहन या महत्वपूर्ण ठिकानों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि ये ड्रोन कई बार इतने छोटे होते हैं कि उन्हें पहचानना भी मुश्किल होता है, जिससे दुश्मन के लिए उन्हें रोकना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

लॉजिस्टिक ड्रोन

चौथा हिस्सा लॉजिस्टिक ड्रोन का है, जो युद्ध के दौरान सप्लाई चेन को मजबूत बनाने में मदद करता है। सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है कि कठिन और दूरदराज के इलाकों में तैनात सैनिकों तक समय पर राशन, दवा और गोला-बारूद पहुंचाया जाए। ऐसे में ये ड्रोन बड़ी भूमिका निभाते हैं। ये बिना पायलट के उड़कर जरूरी सामान सीधे सैनिकों तक पहुंचा सकते हैं। इससे न सिर्फ समय की बचत होती है, बल्कि जोखिम भी कम होता है, क्योंकि हर बार हेलीकॉप्टर या गाड़ियों का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं रहता।

एयर डिफेंस रोल

पांचवां और आखिरी हिस्सा एयर डिफेंस रोल का है, जो दुश्मन के ड्रोन से रक्षा करने के लिए बनाया गया है। आज के समय में ड्रोन सिर्फ हमला ही नहीं करते, बल्कि खुद भी खतरा बन जाते हैं। इसलिए ऐसे सिस्टम जरूरी हैं जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोक सकें। इसमें ऐसे ड्रोन शामिल हैं जो दूसरे ड्रोन को मार सकते हैं या स्वार्म हमले को रोक सकते हैं। कुछ सिस्टम ऐसे भी हैं जो नकली लक्ष्य बनाकर दुश्मन को भ्रमित करते हैं, जिससे असली सिस्टम सुरक्षित रहते हैं।

इस रोडमैप में क्या खास है?

पहले सेना अपनी जरूरतें अलग-अलग टेंडर या दस्तावेजों में बताती थी। जिससे इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स को जरूरत समझने में मुश्किल होती थी। लेकिन अब एक ही दस्तावेज में करीब 30 तरह के प्लेटफॉर्म और उनकी जरूरतें बताई गई हैं। इससे कंपनियों को सेना की जरूरतों की स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि उन्हें किस तरह की तकनीक डेवलप करनी है।

इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स के लिए मौका

इस रोडमैप का एक बड़ा मकसद यह भी है कि देश की कंपनियां, स्टार्टअप्स और यूनिवर्सिटीज इसमें हिस्सा लें। इसके लिए एक पूरा प्रोसेस बनाया गया है, जिसमें कंपनियां आवेदन करके इस रोडमैप की डिटेल्स ले सकती हैं और उसी के अनुसार अपने प्रोडक्ट बना सकती हैं। इससे पहले कई बार ऐसा होता था कि कंपनियां कुछ और बनाती थीं और सेना को कुछ और चाहिए होता था। अब यह गैप कम होगा।

इस पूरे प्लान में सबसे ज्यादा जोर स्वदेशी तकनीक पर दिया गया है। यानी सेना चाहती है कि ड्रोन और संबंधित सिस्टम देश में ही डिजाइन और डेवलप किए जाएं। इससे बाहरी देशों पर निर्भरता कम होगी और देश के अंदर ही एक मजबूत डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार होगा। यह कदम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां देश अपनी जरूरतों को खुद पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

क्यों जरूरी है यह रोडमैप?

आज का युद्ध तेजी से बदल रहा है। अब फैसले सेकंडों में होते हैं, और ड्रोन इस प्रक्रिया को और तेज बना देते हैं।
छोटे-छोटे ड्रोन भी बड़े हथियारों को बेअसर कर सकते हैं। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी सेनाएं अब ड्रोन और ऑटोमैटिक सिस्टम पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। भारतीय सेना भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

ड्रोन बनाने वाली कंपनी अब भारत में बनाएगी एडवांस गोला-बारूद, सागर डिफेंस को मिला एक्सप्लोसिव्स लाइसेंस

Sagar Defence ammunition licence
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Sagar Defence ammunition licence: गोला-बारूद की विदेशों पर ने निर्भरता घटाने के लिए देश के डिफेंस सेक्टर ने बड़ा कदम उठाया है। अब तक ड्रोन और ऑटोमैटिक सिस्टम बनाने वाली प्राइवेट डिफेंस कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग को अब देश में ही विस्फोटक और गोला-बारूद बनाने का लाइसेंस मिल गया है। यह लाइसेंस इंडस्ट्रीज (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट 1951 के तहत मिला है, जिसके बाद कंपनी अब अगले दो साल में बड़े स्तर पर विस्फोटक और एम्युनिशन बनाने की तैयारी कर रही है।

Sagar Defence ammunition licence: महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में बनेगी नई फैक्ट्री

कंपनी के मुताबिक, यह नई सुविधा उत्पादन क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी और इसे खास तौर पर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है।

कंपनी ने जानकारी दी है कि वह महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में अपने नए प्रोडेक्शन नेटवर्क तैयार करेगी। खास तौर पर आंध्र प्रदेश के जुव्वालादिने फिशिंग हार्बर में एक बड़ी और मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी तैयार की जा रही है, जहां बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाएगा।

कंपनी के संस्थापक निकुंज पराशर के अनुसार, यह नई सुविधा उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाने में मदद करेगी। यहां बड़े पैमाने पर विस्फोटक और गोला-बारूद बनाए जाएंगे, ताकि देश की जरूरतों को पूरा किया जा सके। (Sagar Defence ammunition licence)

ड्रोन टेक्नोलॉजी से फुल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग तक

अब तक सागर डिफेंस इंजीनियरिंग भारत के डिफेंस टेक इकोसिस्टम में एक इनोवेटर के तौर पर जानी जाती रही है। कंपनी समुद्र, हवा और जमीन तीनों क्षेत्रों में बिना चालक वाले और ऑटोमैटिक सिस्टम तैयार करती है।

इनमें ऑटोनोमस वेपनाइज्ड बोट स्वार्म, अंडरवाटर व्हीकल और ड्रोन जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं, जो सिक्योरिटी ऑपरेशंस में इस्तेमाल हो रहे हैं। अब कंपनी इन प्लेटफॉर्म्स के साथ विस्फोटक और गोला-बारूद को जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ताकि पूरी तरह से इंटीग्रेटेड हथियार प्लेटफॉर्म तैयार किए जा सकें।

अगले दो साल में कंपनी का लक्ष्य है कि वह अपने ऑटोमैटिक सिस्टम और गोला-बारूद निर्माण को एक साथ जोड़कर नई क्षमताएं विकसित करे। (Sagar Defence ammunition licence)

सरकार की नीतियों से से मिला फायदा

भारत लंबे समय से रक्षा उपकरणों और गोला-बारूद के लिए आयात पर निर्भर रहा है। लेकिन अब सरकार का जोर इस बात पर है कि ज्यादा से ज्यादा उत्पादन देश में ही हो। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय सेना के लिए जरूरी 175 तरह के गोला-बारूद में से लगभग 154 को देश में ही बनाया जाने लगा है। यानी करीब 88 प्रतिशत जरूरतें अब स्वदेशी स्तर पर पूरी हो रही हैं।

भारत में गोला-बारूद का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2026 में यह बाजार करीब 2.66 अरब डॉलर का है, जो 2031 तक बढ़कर 4.44 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। बढ़ती सुरक्षा जरूरतों और आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

इस बढ़ोतरी की वजह सेना की बढ़ती जरूरतें, सीमाओं पर लगातार तनाव और आधुनिक हथियारों की मांग है। ऐसे में देश में ही उत्पादन बढ़ाना एक जरूरी कदम बन गया है।

वहीं, कंपनी की इस प्रगति में सरकार की नीतियों की भी बड़ी भूमिका रही है। ‘इनोवेशन्स फॉर डिफेंस एक्सीलेंस’ (आईडेक्स), ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक’ जैसे कार्यक्रमों ने स्टार्टअप्स और सेना के बीच सहयोग को बढ़ाया है।

इसी दिशा में रक्षा मंत्रालय ने भी कई नीतियां बनाई हैं, ताकि निजी कंपनियां इस क्षेत्र में आगे आएं। सागर डिफेंस इंजीनियरिंग को मिला यह लाइसेंस उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे देश में न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि नई तकनीक भी विकसित होगी और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। (Sagar Defence ammunition licence)

सरकारी और निजी कंपनियां भी आगे

सरकारी कंपनी म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड को भी अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए बड़ा बजट दिया गया है, ताकि उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सके। वहीं निजी क्षेत्र में भी तेजी देखने को मिल रही है।

इसके लिए कंपनियों को औद्योगिक लाइसेंस लेना पड़ता है, जो रक्षा मंत्रालय और पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन जैसी एजेंसियों के तहत जारी होता है।

हाल के सालों में नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। 2025-26 में रेवेन्यू प्रोक्योरमेंट मैन्युअल में संशोधन के बाद निजी कंपनियों को अब पहले की तरह म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड से एनओसी लेने की जरूरत नहीं रही। इससे निजी सेक्टर के लिए रास्ता काफी आसान हो गया है और अब वे आर्टिलरी शेल, मिसाइल, बम, मोर्टार, ग्रेनेड और छोटे-बड़े कैलिबर के गोला-बारूद बनाने में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। (Sagar Defence ammunition licence)

निजी क्षेत्र में अदाणी डिफेंस एंड एरोस्पेस भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अदाणी डिफेंस की बड़ी फैक्ट्री है, जहां छोटे हथियारों के गोला-बारूद का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है। कंपनी अपनी क्षमता को और बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।

इसी तरह भारत फोर्ज अब सिर्फ पार्ट्स बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा तैयार गोला-बारूद बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। महाराष्ट्र में इसकी नई फैसिलिटी तैयार की जा रही हैं।

नागपुर की सोलार इंडस्ट्रीज भी इस क्षेत्र में तेजी से उभरी है। यह कंपनी पहले कमर्शियल विस्फोटक बनाती थी, लेकिन अब डिफेंस सेक्टर के लिए भी गोला-बारूद तैयार कर रही है।

इसके अलावा आईडीएल एक्सप्लोसिव्स को भी हाई एनर्जी डिफेंस विस्फोटक बनाने का लाइसेंस मिला है। यह कंपनी टीएनटी और एचएमएक्स जैसे शक्तिशाली विस्फोटक तैयार कर रही है।

रिलायंस डिफेंस भी इस क्षेत्र में बड़ी योजना पर काम कर रही है। महाराष्ट्र में एक बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट के तहत विस्फोटक और गोला-बारूद बनाने की तैयारी की जा रही है, जिसमें विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी भी शामिल है। (Sagar Defence ammunition licence)

वहीं, गुडलक इंडिया को भी मिडियम कैलिबर के आर्टिलरी शेल बनाने का लाइसेंस मिला है। इनके अलावा कई और कंपनियां जैसे प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स और ह्यूजेस प्रिसिजन भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं।

दरअसल, देश में सैकड़ों लाइसेंस जारी किए गए हैं, लेकिन बड़े स्तर पर उत्पादन करने वाली कंपनियों की संख्या अभी सीमित है। छोटे हथियारों के गोला-बारूद में कुछ कंपनियां आगे हैं, जबकि बड़े विस्फोटक और प्रोपेलेंट बनाने में कुछ अन्य कंपनियां मजबूत स्थिति में हैं।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि लाइसेंस मिलने के बाद तुरंत उत्पादन शुरू नहीं होता। इसके लिए फैक्ट्री तैयार करना, परीक्षण करना और सुरक्षा मानकों को पूरा करना जरूरी होता है, जिसमें समय लगता है।

फिलहाल, भारत अपनी जरूरत के ज्यादातर गोला-बारूद का उत्पादन देश में ही करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से यह प्रक्रिया और तेज हो रही है और जिससे भविष्य में देश में ही एक मजबूत डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार होगा। (Sagar Defence ammunition licence)

भारतीय सेना का बड़ा कदम, ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन के लिए पहली बार जारी हुआ मेगा रोडमैप

Indian Army Drone Roadmap

Indian Army Drone Roadmap:सेना ने ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन के लिए पहली बार एक विस्तृत टेक्नोलॉजी रोडमैप जारी किया है। यह रोडमैप सेना ने ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के साथ मिलकर तैयार किया है और इसे राजधानी के भारत मंडपम में लॉन्च किया गया।

इस कार्यक्रम में सेना के वरिष्ठ अधिकारी और ड्रोन इंडस्ट्री से जुड़े लोग मौजूद रहे। इस रोडमैप को सेना के डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है, ताकि आने वाले समय की जरूरतों के हिसाब से तकनीक विकसित की जा सके।

Indian Army Drone Roadmap: बदलते युद्ध का असर, ड्रोन बने अहम हथियार

आज के समय में युद्ध सिर्फ टैंक और फाइटर जेट तक सीमित नहीं रह गया है। हाल के कई संघर्षों जैसे ईरान-इजरायल-अमेरिका वॉर और रूस-यूक्रेन युद्ध में यह साफ देखा गया है कि ड्रोन और बिना पायलट वाले सिस्टम अब युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

ये ड्रोन निगरानी करने, सटीक हमला करने, सामान पहुंचाने और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने में इस्तेमाल हो रहे हैं। यही वजह है कि दुनिया भर की सेनाएं अब इस तकनीक पर तेजी से काम कर रही हैं।

भारतीय सेना ने भी इसी बदलाव को समझते हुए यह रोडमैप तैयार किया है, ताकि वह भविष्य की जरूरतों के हिसाब से खुद को तैयार कर सके।

इस मौके पर सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने कहा कि हाल के युद्धों ने साफ कर दिया है कि बिना पायलट वाले सिस्टम आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। यह रोडमैप इस दिशा में एक मजबूत कदम है, जिससे सेना भविष्य के लिए तैयार हो सकेगी और उद्योग के साथ मिलकर नई तकनीक विकसित कर सकेगी।

आर्मी डिजाइन ब्यूरो में एडिशनल डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल सीएस मान लंबे समय से ड्रोन और बिना पायलट वाले सिस्टम से जुड़ी योजनाओं पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह पहली बार है जब भारतीय सेना ने यूएएस यानी अनमैन्ड एरियल सिस्टम और लॉइटरिंग म्यूनिशन से जुड़ी इतनी विस्तृत जानकारी एक साथ साझा की है। उनका कहना था कि इससे साफ पता चलता है कि सेना इन तकनीकों को कितना महत्व दे रही है।

वहीं ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष स्मित शाह ने कहा कि यह रोडमैप उद्योग, स्टार्टअप्स और रिसर्च संस्थानों को स्पष्ट दिशा देता है। इससे वे आत्मविश्वास के साथ निवेश कर पाएंगे और ऐसे सिस्टम बना सकेंगे जो वैश्विक स्तर पर भी प्रतिस्पर्धी हों। (Indian Army Drone Roadmap)

30 तरह के ड्रोन हुए शामिल

इस रोडमैप में कुल 30 तरह के ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन प्लेटफॉर्म शामिल किए गए हैं। यह पूरा दस्तावेज आर्मी डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है, जिसमें पांच मुख्य कैटेगरी रखी गई हैं। इनमें निगरानी, हमला, लॉजिस्टिक्स यानी सामान पहुंचाने, एयर डिफेंस और कुछ खास ऑपरेशन से जुड़े रोल शामिल हैं। सेना अब हर तरह के ऑपरेशन के लिए अलग-अलग तरह के ड्रोन तैयार करना चाहती है, ताकि हर स्थिति में उनका इस्तेमाल किया जा सके।ॉ

मेजर जनरल मान पहले भी ड्रोन सेक्टर को लेकर कई अहम बातें कह चुके हैं। उन्होंने यह भी जोर दिया था कि सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन में विदेशी, खासकर चीनी पार्ट्स से बचना जरूरी है और इसके लिए सख्त जांच व्यवस्था होनी चाहिए। उनका यह भी मानना रहा है कि भविष्य में हर सैनिक के पास छोटे ड्रोन होने चाहिए, जो निगरानी और टारगेटिंग में मदद कर सकें।

दरअसल, पहले भी सेना ने ड्रोन से जुड़ी अपनी जरूरतें बताई थीं, लेकिन वे अलग-अलग टेंडर, आरएफआई या अन्य दस्तावेजों में बंटी होती थीं। इस बार पहली बार एक ही रोडमैप में करीब 30 तरह के प्लेटफॉर्म और कई तरह के वैरिएंट्स के साथ उनकी तकनीकी और ऑपरेशनल जरूरतें सामने रखी गई हैं। इसमें रेंज, उड़ान का समय, पेलोड, ऊंचाई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एंटी-जैमिंग और स्वॉर्म जैसे फीचर्स शामिल हैं। (Indian Army Drone Roadmap)

इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स को बताई जरूरत

इस रोडमैप का एक बड़ा मकसद यह भी है कि देश की कंपनियों, स्टार्टअप्स और रिसर्च संस्थानों को यह साफ समझ आ सके कि सेना को किस तरह की तकनीक चाहिए। अभी तक कई बार ऐसा होता था कि कंपनियां अपनी तरफ से तकनीक बनाती थीं, लेकिन वह सेना की जरूरतों से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी।

अब इस रोडमैप के जरिए सेना ने अपनी जरूरतों को स्पष्ट कर दिया है, जिससे उद्योग उसी दिशा में काम कर सके।

स्वदेशी विकास पर फोकस

इस पूरे प्लान में सबसे ज्यादा ध्यान स्वदेशी तकनीक पर दिया गया है। सेना चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा सिस्टम देश में ही डिजाइन और विकसित किए जाएं। इससे न सिर्फ बाहरी देशों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि देश के अंदर ही एक मजबूत डिफेंस इंडस्ट्री भी तैयार होगी। यह रोडमैप इसी सोच के साथ बनाया गया है, ताकि डिजाइन से लेकर उत्पादन तक का काम भारत में ही हो सके।

इस रोडमैप को तैयार करने से पहले सेना ने अंदरूनी स्तर पर कई दौर की चर्चा और विश्लेषण किया। इसमें यह समझने की कोशिश की गई कि आने वाले समय में युद्ध कैसे बदल सकता है और किस तरह की तकनीक की जरूरत होगी। इसका एक मकसद यह भी है कि नई तकनीकों के विकास में लगने वाला समय कम किया जा सके।

जब उद्योग को पहले से पता होगा कि सेना को क्या चाहिए, तो वह उसी हिसाब से तेजी से प्रोडक्ट तैयार कर पाएगा और बाद में खरीद प्रक्रिया भी आसान हो जाएगी। (Indian Army Drone Roadmap)

सेना और इंडस्ट्री के बीच बनेगा मजबूत तालमेल

इस पहल से सेना और निजी कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल बनेगा। अब तक कई बार ऐसा होता था कि दोनों के बीच सीधा संवाद कम होता था, लेकिन इस रोडमैप के जरिए एक प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है, जहां दोनों एक-दूसरे की जरूरतों और क्षमताओं को समझ सकेंगे। इससे नई तकनीकों के विकास में तेजी आएगी और बेहतर समाधान तैयार हो सकेंगे।

भारत में ड्रोन तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है। इस क्षेत्र में काम करने वाली कई कंपनियां और स्टार्टअप्स सामने आ चुके हैं। ड्रोन फेडरेशन इंडिया जैसे संगठन इस पूरे इकोसिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
यह संगठन सरकार, उद्योग और रिसर्च संस्थानों के साथ मिलकर ड्रोन तकनीक को बढ़ावा देने का काम करता है।

इस रोडमैप की पूरी जानकारी आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं होगी। इसे केवल उन्हीं कंपनियों और संस्थानों को दिया जाएगा, जो इसके लिए पात्र होंगे। इसके लिए उन्हें कुछ औपचारिक प्रक्रिया जैसे नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट यानी गोपनीयता समझौता करना होगा। इसका मकसद यह है कि संवेदनशील जानकारी सुरक्षित रहे और केवल सही लोगों तक ही पहुंचे।

क्या होता है लॉइटरिंग म्यूनिशन

लॉइटरिंग म्यूनिशन को आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसा ड्रोन होता है, जो टारगेट के ऊपर कुछ समय तक मंडराता रहता है और सही समय आने पर खुद ही हमला करता है। इसे “कामिकाजे ड्रोन” भी कहा जाता है। इसका इस्तेमाल खास तौर पर दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। इस तरह के सिस्टम आधुनिक युद्ध में तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं और इन्हें बेहद प्रभावी माना जाता है।

यह रोडमैप हाल के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से मिली सीख पर भी आधारित है, जहां ड्रोन ने युद्ध का तरीका बदल दिया है। इसमें ऐसे सिस्टम पर जोर दिया गया है जो जीपीएस के बिना भी काम कर सकें, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस हों, एक साथ कई ड्रोन मिलकर ऑपरेशन कर सकें और इलेक्ट्रॉनिक जामिंग का सामना कर सकें। (Indian Army Drone Roadmap)

1000 किलो का देसी ‘सुपर बम’ बनाएगा भारत, IAF को मिलेगी अमेरिका के MK-84 एरियल बम जैसी ताकत

IAF 1000 kg aerial bomb
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IAF 1000 kg aerial bomb: डिफेंस सेक्टर में स्वदेशी पहल के तहत रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 1000 किलोग्राम वजन वाले एरियल बम को देश में ही डिजाइन और डेवलप करने की तैयारियां शुरू दी हैं। यह बम क्षमता के लिहाज से अमेरिकी एमके-84 जैसे बम के बराबर माना जा रहा है।

इस पहल के तहत अब भारतीय कंपनियों से इस प्रोजेक्ट में भाग लेने के लिए “एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट” यानी ईओआई जारी किया गया है, जिसके जरिए कंपनियां इस प्रोजेक्ट में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकेंगी।

IAF 1000 kg aerial bomb: दो चरणों में पूरा होगा पूरा प्रोजेक्ट

इस पूरी योजना को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले चरण में इस बम का डिजाइन और डेवलपमेंट किया जाएगा। इस दौरान कुल छह प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे। इनमें कुछ असली यानी लाइव बम होंगे और कुछ डमी यानी इनर्ट बम होंगे, जिनका इस्तेमाल टेस्टिंग के लिए किया जाएगा।

इन प्रोटोटाइप के साथ टेल यूनिट और दूसरे जरूरी उपकरण भी डेवलप किए जाएंगे, ताकि बम को पूरी तरह ऑपरेशनल बनाया जा सके। दूसरे चरण में इन बमों की खरीद की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए योग्य कंपनियों को चुनने के बाद कमर्शियल रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया जाएगा। (IAF 1000 kg aerial bomb)

भारतीय वायुसेना की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन

इस बम को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि इसे भारतीय वायुसेना के अलग-अलग तरह के लड़ाकू विमानों से इस्तेमाल किया जा सके। खास बात यह है कि यह बम सिर्फ भारतीय या स्वदेशी विमान ही नहीं, बल्कि रूसी और राफेल पर लगाया जा सकेगा। इससे वायुसेना के मौजूदा बेड़े में इसे आसानी से शामिल किया जा सकेगा।

इस प्रोजेक्ट में स्वदेशीकरण पर खास जोर दिया गया है। डेवलपमेंट के दौरान कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री भारत में बनी होनी जरूरी होगी। यह परियोजना “मेक-II” श्रेणी के तहत शुरू की जा रही है, जिसका मतलब है कि इसमें शुरुआती निवेश उद्योग खुद करेगा। बाद में जब बम तैयार हो जाएगा, तो इसे “बाय (इंडियन-आईडीडीएम)” श्रेणी के तहत खरीदा जाएगा। आईडीडीएम का मतलब है कि सिस्टम का डिजाइन, विकास और निर्माण भारत में ही हुआ हो। (IAF 1000 kg aerial bomb)

600 एरियल बम खरीदने की योजना

इस परियोजना के तहत भारतीय वायुसेना करीब 600 एरियल बम खरीदने की योजना बना रही है। फिलहाल इस तरह के बम विदेशों से खरीदे जाते हैं और वायुसेना के पास पहले से मौजूद हैं। लेकिन अब सरकार चाहती है कि इस तरह के हथियार देश में ही बनाए जाएं, ताकि बाहरी निर्भरता कम हो सके।

यह 1000 किलोग्राम का एरियल बम एक हाई-कैलिबर हथियार होगा, जिसका इस्तेमाल बड़े और मजबूत लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इसमें “नेचुरल फ्रैगमेंटेशन” यानी विस्फोट के बाद छोटे-छोटे टुकड़े फैलने की क्षमता होगी, जिससे आसपास के इलाके में ज्यादा नुकसान होता है। इसके साथ ही इसमें हाई ब्लास्ट इफेक्ट और पीक ओवर-प्रेशर यानी तेज दबाव पैदा करने की क्षमता होगी, जिससे दुश्मन के बंकर, इमारतें या रनवे जैसे मजबूत ठिकाने भी निशाना बन सकते हैं। (IAF 1000 kg aerial bomb)

भारत में ही होगी टेस्टिंग

इस बम के सभी परीक्षण भारत में ही किए जाएंगे। इसके लिए भारतीय वायुसेना की यूनिट्स या अन्य तय स्थानों का इस्तेमाल किया जाएगा। टेस्टिंग के दौरान इस बम को अलग-अलग विमान प्लेटफॉर्म से गिराकर उसकी क्षमता और सटीकता को परखा जाएगा। इन परीक्षणों के आधार पर पहले पीएसक्यूआर यानी प्रारंभिक तकनीकी जरूरतों को तय किया जाएगा और फिर उन्हें एएसक्यूआर यानी अंतिम मानकों में बदला जाएगा।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में करीब ढाई साल का समय लगेगा। इसमें डिजाइन, प्रोटोटाइप तैयार करना, टेस्टिंग, मूल्यांकन और कॉन्ट्रैक्ट साइन करने जैसे सभी चरण शामिल होंगे। हर चरण में तकनीकी और वित्तीय मानकों के आधार पर कंपनियों का चयन किया जाएगा। (IAF 1000 kg aerial bomb)

इस प्रोजेक्ट में सिर्फ सरकारी संस्थानों ही नहीं, बल्कि निजी कंपनियों को भी हिस्सा लेने का मौका दिया गया है। भारतीय कंपनियां इस परियोजना में सीधे भाग ले सकती हैं। इसके अलावा कुछ शर्तों के तहत विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर या जॉइंट वेंचर के जरिए भी भागीदारी की अनुमति होगी। हालांकि, ऐसे मामलों में भी यह जरूरी होगा कि डिजाइन और निर्माण का मुख्य हिस्सा भारत में ही हो।

इससे पहले नवंबर 2023 में आर्डनेंस फैक्ट्री खमारिया के अगुवाई में मेटल स्टील फैक्ट्री इशापोर और आर्डनेंस फैक्ट्री दम दम के साथ मिलकर इस स्वदेशी बम को डेवलप करने को लेकर गठजोड़ किया था। इस नए बम में “प्रिसिजन गाइडेड” तकनीक भी जोड़ी जा रही है, जिससे यह अपने लक्ष्य पर ज्यादा सटीक तरीके से हमला कर सकेगा। इसके तहत आधुनिक 1000 किलोग्राम के एमके-84 जैसे बम बनाए जाने हैं। इस नए स्वदेशी बम में भी सटीक मार्गदर्शन तकनीक जोड़ने पर काम किया जा रहा है, इसमें गाइडेंस किट लगाकर इसे “स्मार्ट बम” में बदला जा सकता है, जो तय लक्ष्य पर सटीक तरीके से गिरता है और अनावश्यक नुकसान को कम करता है। (IAF 1000 kg aerial bomb)

IFC-IOR रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, होर्मुज में 9 दिन की ‘खामोशी’ का बताया सच, GPS जामिंग से रास्ता भटक रहे जहाज

Strait of Hormuz Maritime Threat

Strait of Hormuz Maritime Threat: 20-29 मार्च के आसपास स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज और पर्शियन गल्फ में जहाजों पर हमलों की संख्या अचानक घट गई थी, जिसके बाद यह अनुमान लगाए जा रहे थे कि ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर जल्दी ही कोई समझौता हो सकता है।

गुरुग्राम स्थित इंडियन नेवी के सहयोग से काम करने वाले इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) की रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में जो 9 दिन की शांति दिखी थी, वह असल में किसी सीजफायर या कूटनीतिक समझौते का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 28 फरवरी से शुरू हुई जंग के बाद अरब सागर क्षेत्र, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान में समुद्री सुरक्षा हालात बेहद खराब हो चुके हैं और खतरे का स्तर “क्रिटिकल” बना हुआ है। बता दें कि ने IFC-IOR कई देशों के साथ मिलकर समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है।

Strait of Hormuz Maritime Threat: 9 दिन की शांति: क्या थी असली वजह?

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि 9 दिन का जो शांत समय दिखा था, वह किसी भी तरह से युद्ध रुकने का संकेत नहीं था। यह एक “टैक्टिकल पॉज” यानी रणनीतिक ठहराव था।

IFR-IOR की रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान हमला करने वाले पक्ष ने अपनी गतिविधियों को रोकने के बजाय दोबारा हमले की तैयारी की। बाद में एमवी एक्सप्रेस रोम, एमवी अल सल्मी और एमवी एक्वा 1 जैसे जहाजों पर हुए हमलों ने यह साबित कर दिया कि यह सिर्फ एक अंतराल था, अंत नहीं।

इस पैटर्न में पहले तेज हमले होते हैं, फिर कुछ दिन का अंतर आता है और उसके बाद फिर से हमले शुरू हो जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर हमले दिन के समय या ऐसे समय पर हुए जब उनका सटीक समय तय नहीं किया जा सका। लेकिन जो पैटर्न सामने आया है उससे यह साफ होता है कि हमले मौके का फायदा उठाकर किए गए। खास तौर पर ऐसे जहाजों को निशाना बनाया गया जो समुद्र में अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। अधिकतर हमले सुबह या दोपहर के समय देखने को मिले, जब जहाज सामान्य रूप से अपनी यात्रा जारी रखते हैं।

रिपोर्ट बताती है कि अब समुद्री हमले सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं रहे हैं। शुरुआत में हमले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक सीमित थे, लेकिन अब यह खतरा बढ़कर उत्तरी अरब सागर, यूएई के पानी और प्रमुख बंदरगाहों तक फैल गया है।

हमलों का तरीका भी बदल गया है। अब सिर्फ मिसाइल या पारंपरिक हथियार ही नहीं, बल्कि ड्रोन, बिना चालक वाली नावें और इंटरसेप्शन के दौरान गिरने वाला मलबा भी खतरा बन रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी से 2 अप्रैल तक कुल 29 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से 23 जहाज सीधे हमलों का शिकार हुए। पिछले सात दिनों में भी तीन हमले सामने आए हैं, जो लगातार बने खतरे को दिखाते हैं। अरब सागर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान के पूरे क्षेत्र में खतरे का स्तर इस समय ‘क्रिटिकल’ बना हुआ है, यानी स्थिति बेहद गंभीर है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

जीपीएस जामिंग के खतरा बढ़ा

रिपोर्ट में जीपीएस और जीएनएसएस जामिंग पर चिंता जाहिर की गई है। जिसका मतलब है कि जहाजों के नेविगेशन सिस्टम सही काम नहीं कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास, गल्फ ऑफ ओमान और अरब सागर के इलाके में लगातार जीपीएस और जीएनएसएस सिस्टम में दिक्कत आ रही है। इसकी वजह से जहाजों को सही दिशा और लोकेशन का पता लगाने में परेशानी हो रही है। एआईएस सिस्टम, जिससे जहाजों की पहचान और ट्रैकिंग होती है, वह भी प्रभावित हो रहा है।

यह खतरा अचानक सामने आ सकता है और किसी भी जहाज को निशाना बना सकता है, चाहे वह किसी भी देश का हो, किस कंपनी का हो या उसमें क्या सामान हो। खास तौर पर वे जहाज ज्यादा जोखिम में हैं जो एक जगह खड़े होते हैं, आदेश का इंतजार कर रहे होते हैं या किसी अहम समुद्री रास्ते के पास काम कर रहे होते हैं, क्योंकि ऐसे समय में उनके पास तेजी से दिशा बदलने की क्षमता कम होती है।

इस वजह से जहाजों को सही दिशा का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है और समुद्र में उनकी स्थिति को समझना भी कठिन हो जाता है। यह खतरा इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि यह बिना किसी चेतावनी के सामने आता है और किसी भी जहाज को प्रभावित कर सकता है, चाहे उसका झंडा, मालिक या माल कुछ भी हो। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

कब और कैसे हो रहे हैं हमले

रिपोर्ट के अनुसार, हमले अब पूरी तरह अनिश्चित हो चुके हैं। ये हमले चलते हुए जहाजों पर भी हो रहे हैं और बंदरगाह के पास खड़े जहाजों पर भी। कई मामलों में जहाज जब एंकर पर खड़े होते हैं या एक जहाज से दूसरे जहाज में माल ट्रांसफर कर रहे होते हैं, तब भी उन्हें निशाना बनाया गया है।

हमलों में खासतौर पर जहाज के इंजन रूम या पानी की सतह के ऊपर के हिस्से को निशाना बनाया जाता है, जिससे आग लगने या विस्फोट होने की संभावना बढ़ जाती है। इससे कई बार जहाज छोड़कर भागना पड़ता है या जहाज डूब भी सकता है। ये हमले मिसाइलों, ड्रोन, यूएसवी से भी किए जा रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि इस समय कोई भी जहाज पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। हमलों में कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकर, कंटेनर जहाज, बल्क कैरियर और सपोर्ट जहाज सभी निशाने पर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से हर दिन करीब 2.1 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। इस रास्ते के प्रभावित होने का मतलब है कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और व्यापार दोनों पर असर पड़ना।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा हालात आधुनिक समय में अभूतपूर्व हैं और इसका असर दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

नए रास्तों का कर रहे इस्तेमाल

रिपोर्ट के मुताबिक समुद्री क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए शिपिंग इंडस्ट्री ने अपने तरीके बदलने शुरू कर दिए हैं।
कई जहाज अब केप ऑफ गुड होप के रास्ते जा रहे हैं, क्योंकि यह फिलहाल सबसे सुरक्षित माना जा रहा है। हालांकि लंबा रास्ता है और लागत बढ़ जाती है, साथ ही, वहां के बंदरगाहों पर ईंधन भरने की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

इसके साथ ही इस पूरे इलाके के लिए वॉर रिस्क प्रीमियम यानी बीमा की लागत काफी बढ़ गई है और बीमा कंपनियां भी अब ज्यादा सख्त रुख अपना रही हैं।

कुछ तेल शिपमेंट को सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए यनबू पोर्ट तक भेजा जा रहा है, जहां से आगे उन्हें लोड किया जाता है। इससे फिलहाल थोड़ी राहत मिली है, लेकिन यह भी एक सीमित रास्ता है और यमन के गैर-सरकारी समूहों से खतरे में बना रहता है।

वहीं, ओमान के डुक्म पोर्ट को भी कुछ ऑपरेटर्स एक वैकल्पिक ट्रांसशिपमेंट हब के तौर पर देख रहे हैं, क्योंकि यह सीधे खतरे वाले इलाके से थोड़ा बाहर स्थित है, लेकिन यह भी पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं माना जा रहा। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

यमन के समूहों की एंट्री से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि यमन के हूथी समूहों ने इस अभियान के साथ जुड़ने का ऐलान किया है। हालांकि इस चरण में उनके द्वारा कोई सीधा समुद्री हमला दर्ज नहीं हुआ है, लेकिन उनकी क्षमता और इरादे को देखते हुए खतरा बढ़ सकता है। इससे रेड सी, बाब-अल-मंदेब और गल्फ ऑफ एडन जैसे इलाकों में भी जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

होर्मुज में लगभग ठप हुआ ट्रैफिक

रिपोर्ट के बताया गया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। जहां पहले हर दिन करीब 130 से 140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर सिर्फ 4 से 5 जहाज प्रतिदिन रह गई है। कुछ दिनों में तो यह संख्या लगभग शून्य तक पहुंच गई।

यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि जहाज संचालकों ने जोखिम से बचने के लिए इस रास्ते से गुजरना लगभग बंद कर दिया है। वहीं, खतरे से बचने के लिए कई जहाज अब ईरान के क्षेत्रीय जल के करीब से गुजरने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे जोखिम कम होगा, लेकिन इससे नई समस्याएं पैदा हो रही हैं।

इसमें कानूनी, राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी अड़चनें शामिल हैं। इसके बावजूद यह रास्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा रहा। (Strait of Hormuz Maritime Threat)

होर्मुज से गाजा तक बारूदी सुरंगों ने कैसे पूरी दुनिया को खतरे में डाला, दशकों तक ‘साइलेंट किलर’ बने रहते हैं डबल एज्ड वेपंस

International Mine Awareness Day 2026

International Mine Awareness Day 2026: दुनिया भर में आज इंटरनेशनल डे फॉर माइन अवेयरनेस एंड असिस्टेंस इन माइन एक्शन मनाया जा रहा है। यह दिन उन खतरों की याद दिलाता है, जो लड़ाई खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक जमीन और समुद्र में बने रहते हैं। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें और अनफटे गोला-बारूद ऐसे ही खतरे हैं, जो सालों तक लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान में चल रहे टकराव के बीच यह मुद्दा और गंभीर हो गया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैनिटेरियन माइन एक्शन स्टडीज (IIFOMAS) के डायरेक्टर जनरल और होराइजन ग्रुप के चेयरमैन रिटायर्ड कर्नल नवनीत एम.पी. मित्तल ने रक्षा समाचार को खास बातचीत में बताया कि युद्ध का असर सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह दशकों तक समाज, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करता है।

International Mine Awareness Day 2026: “युद्ध समाधान नहीं, बातचीत है जरूरी”

डिफेंस और पोस्ट-कॉन्फ्लिक्ट एनवायरमेंट मैनेजमेंट के एक्सपर्ट कर्नल नवनीत मित्तल का साफ कहना है कि किसी भी जंग का अंत बातचीत से ही होता है। किसी भी युद्ध में जिम्मेदारी और समझदारी बेहद जरूरी होती है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि युद्ध दोनों पक्षों के आम लोगों को बराबर नुकसान पहुंचाता है।

वह कहते हैं, “युद्ध कोई समाधान नहीं है। यह कुछ समय के लिए दबाव जरूर बना सकता है, लेकिन आखिर में बातचीत से ही रास्ता निकलता है। मैंने खुद गाजा जैसे इलाकों में हालात देखे हैं, जहां लोग बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जी रहे हैं। बमबारी का असर हर चीज पर पड़ता है, यात्रा, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी सब प्रभावित होती है।”

उनका कहना है कि पश्चिम एशिया के कई देश सीधे तौर पर किसी एक पक्ष के साथ नहीं हैं, लेकिन वे अस्थिरता भी नहीं चाहते। “इन देशों के बीच भले दोस्ती न हो, लेकिन खुली दुश्मनी भी नहीं है। वे बस अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि मिसाइल या हमले उनके इलाके तक पहुंचें।” (International Mine Awareness Day 2026)

बढ़ते संघर्ष का वैश्विक असर

अमेरिका-ईरान वॉर को जिक्र करते हुए मित्तल कहते हैं, यह संघर्ष सीमित नहीं है। “अगर युद्ध लंबा चलता है तो दूसरे देशों की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। वे पूछना शुरू कर देंगे कि यह कब खत्म होगा।” उनके अनुसार, इसका असर पहले ही तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर दिखने लगा है। हवाई यात्रा, शिपिंग और सप्लाई चेन तक प्रभावित हो रहे हैं। (International Mine Awareness Day 2026)

बारूदी सुरंगें: युद्ध का सबसे खतरनाक हथियार

हॉर्मुज और खार्ग में ईरान की बारूदी सुरंग बिछाने की खबरों पर कर्नल मित्तल कहते हैं कि आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली बारूदी सुरंगें और समुद्री माइंस सबसे खतरनाक हथियारों में मानी जाती हैं।

वह कहते हैं, “हर साल औसतन 5 से 6 हजार लोग माइंस की वजह से मारे जाते हैं या घायल होते हैं।” लेकिन असली खतरा आंकड़ों से बड़ा है। “अगर सड़क पर एक्सीडेंट हो जाए तो लोग गाड़ी चलााना नहीं छोड़ते, उस रास्ते पर फिर भी चलते हैं। लेकिन अगर किसी इलाके में माइंस होने की खबर हो, तो कोई वहां कदम भी नहीं रखता। यही इसका सबसे बड़ा डर है।”

ईरान-अमेरिका तनाव में समुद्री माइंस का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे इलाकों में, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।

उन्होंने कहा, “समुद्री माइंस दो तरह की होती हैं, कुछ एक जगह बंधी रहती हैं और कुछ पानी में तैरती रहती हैं। तैरने वाली माइंस ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि वे बहकर कहीं भी पहुंच सकती हैं और बड़ा हादसा कर सकती हैं।” International Mine Awareness Day 2026)

डबल एज्ड वेपन: लगाने वाला भी फंसता है

बारूदी सुरंगों को कर्नल मित्तल “दो धार वाली तलवार” बताते हैं। उनके मुताबिक, “जो देश माइंस बिछाता है, उसे यह भी पता होता है कि एक दिन उसे ही इन्हें हटाना पड़ेगा। लेकिन जब तक ये जमीन में रहती हैं, तब तक पूरा इलाका ठप हो जाता है।” उन्होंने बताया कि माइंस का सबसे बड़ा असर डर होता है, जो पूरे इलाके को बेकार बना देता है। यहां तक कि न तो वहां खेती की जा सकती है और न ही वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप हो सकता है। पूरा इलाका नो मेंस लैंड में बदल जाता है।

दशकों तक जिंदा रहती हैं माइंस

लैंड माइंस की सबसे खतरनाक बात यह है कि वे दशकों तक सक्रिय रह सकती हैं। कर्नल मित्तल बताते हैं, “कई बार 10-15 साल बाद भी अनफटे गोला-बारूद मिलते हैं। किसी भी युद्ध में 2-5 फीसदी हथियार अनफटे रह जाते हैं।”

कर्नल मित्तल ने कुवैत का उदाहरण देते हुए बताया कि 1991 के गल्फ वॉर खत्म होने के 12-13 साल बाद भी हमें अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) मिलते रहे। आमतौर पर सफाई (माइन क्लीयरेंस) बाद भी 2-3 प्रतिशत विस्फोटक जमीन में रह जाते हैं।

उन्होंने बताया कि उनकी टीम अब तक दुनिया भर में 1 लाख 77 हजार से ज्यादा अनफटे गोला-बारूद को हटाकर नष्ट कर चुकी है और 400 मिलियन वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन को सुरक्षित बनाया जा चुका है। वहीं अकेले कुवैत में होराइजन ग्रुप ने 50,000 से अधिक अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस को हटाया है।

International Mine Awareness Day 2026
(Left) Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board, (Middle) CDS General Anil Chauhan, (Right) Col Navneet MP Mittal (Retd), Director General, IIFOMAS

विकास पर पड़ता है सीधा असर

माइंस की वजह से कई देशों में बड़े इलाके पूरी तरह बेकार हो जाते हैं। वहां न खेती हो सकती है, न घर बन सकते हैं और न ही कोई विकास कार्य हो सकता है।

मित्तल के अनुसार, “यूक्रेन में माइंस हटाने के लिए करीब 35 अरब डॉलर की जरूरत होगी और इसमें दशकों लग सकते हैं। गाजा में यह खर्च लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। जब तक जमीन से बारूदी सुरंगें नहीं हटाई जाती, तब तक वह किसी काम की नहीं होती।”

माइंस हटाने का काम धीमा और कठिन

बारूदी सुरंगों को हटाना बेहद कठिन और खतरनाक प्रक्रिया है। इसमें कई चरण होते हैं, पहले सर्वे किया जाता है, फिर माइंस को ढूंढा जाता है, उसके बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाया जाता है।

मित्तल बताते हैं, “एक व्यक्ति एक दिन में मुश्किल से 20 वर्ग मीटर क्षेत्र ही साफ कर पाता है। यह बहुत धीमा और जोखिम भरा काम है। कई बार मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हर कदम बहुत सावधानी से उठाना पड़ता है।”

उन्होंने बताया कि कई जगहों पर कुत्तों और चूहों जैसे जानवरों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो माइंस की पहचान करने में मदद करते हैं। लेकिन अंत में इंसान को ही जाकर उन्हें हटाना पड़ता है। इसके अलावा ड्रोन तकनीक का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। (International Mine Awareness Day 2026)

युद्ध के बाद भी जारी रहती है लड़ाई

मित्तल का कहना है कि युद्ध कागजों पर खत्म हो सकता है, लेकिन जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए यह लंबे समय तक खत्म नहीं होता। हर कदम पर जान का जोखिम होता है, क्योंकि यह पता नहीं होता कि जमीन के नीचे क्या छिपा है। यही वजह है कि माइंस को “साइलेंट किलर” भी कहा जाता है।

उन्होंने कहा, “माइंस वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए हर कदम जिंदगी और मौत के बीच का फैसला होता है। यही युद्ध की असली सच्चाई है।”

आज जब दुनिया नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी हो गया है कि युद्ध का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें उस खतरे की याद दिलाती हैं, जो दशकों तक तक बना रहता है।

वह कहते हैं, दुनिया आज जब नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी है कि युद्ध की असली कीमत सिर्फ लड़ाई में नहीं, बल्कि उसके बाद की लंबी और कठिन प्रक्रिया में चुकानी पड़ती है। (International Mine Awareness Day 2026)

International Mine Awareness Day 2026

लैंडमाइन की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक

लागत के लिहाज से देखें तो लैंडमाइन्स एक बेहद खतरनाक असमानता पैदा करती हैं। कर्नल नवनीत मित्तल बताते हैं कि एक लैंडमाइन बिछाने में मुश्किल से 3 डॉलर, यानी करीब 250 रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जब उसे हटाने की बारी आती है, तो यही लागत बढ़कर 1000 से 2000 डॉलर, यानी लगभग 80 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाती है।

यानी जो हथियार सस्ते में तैयार होकर जमीन में दबा दिए जाते हैं, उन्हें हटाने में कई गुना ज्यादा पैसा और संसाधन लगते हैं। इसी वजह से युद्ध खत्म होने के बाद असली आर्थिक बोझ शुरू होता है, क्योंकि तब देशों को अपने ही इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता है।

कर्नल मित्तल इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि हर 5000 लैंडमाइन्स को साफ करते समय एक व्यक्ति की जान चली जाती है। यानी यह सिर्फ महंगा काम ही नहीं, बल्कि बेहद जानलेवा भी है।

आज स्थिति यह है कि दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन लैंडमाइन्स और अनफटे विस्फोटकों से प्रभावित है। इन इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली फंडिंग काफी कम है। पिछले दस वर्षों में यह फंडिंग औसतन 700 से 800 मिलियन डॉलर सालाना ही रही है, जबकि जरूरत इससे कई गुना ज्यादा है।

यही कारण है कि कई देशों में युद्ध खत्म होने के बाद भी जमीन सालों तक उपयोग के लायक नहीं बन पाती और विकास की रफ्तार थम जाती है। (International Mine Awareness Day 2026)

खतरनाक काम में महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी

माइन क्लीयरेंस जैसे खतरनाक काम में अब महिलाएं भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। मित्तल बताते हैं कि 2008-09 के आसपास श्रीलंका में माइंस हटाने की मुहिम के दौरान महिलाओं को भी इस काम में शामिल करना शुरू किया गया था। हमने महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया और उन्होंने शानदार काम किया। आज यह एक ऐसा क्षेत्र बन गया है, जहां जेंडर इक्वालिटी साफ दिखाई देती है।”

माइन एक्शन के पांच स्तंभ

कर्नल मित्तल ने बताया कि माइंस से निपटने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे माइन एक्शन कहा जाता है। इसके पांच मुख्य हिस्से होते हैं- माइंस को हटाना, लोगों को जागरूक करना, पीड़ितों की मदद करना, हथियारों के भंडार को नष्ट करना और माइंस पर रोक लगाने के प्रयास करना।

हालांकि, मित्तल का कहना है कि इन सभी में बराबर ध्यान नहीं दिया जाता। “ज्यादातर बजट माइंस हटाने में खर्च हो जाता है, जबकि पीड़ितों की मदद के लिए बहुत कम पैसा मिलता है।” (International Mine Awareness Day 2026)

पीड़ितों के लिए जरूरी है पुनर्वास

माइंस से प्रभावित लोगों को लंबे समय तक इलाज और सहारे की जरूरत होती है। कई लोगों के हाथ-पैर चले जाते हैं और उन्हें कृत्रिम अंग की जरूरत होती है।

मित्तल कहते हैं, “विक्टिम असिस्टेंस बहुत जरूरी है। इसमें मेडिकल केयर, प्रोस्थेटिक्स और पुनर्वास शामिल है। भारत ने जयपुर फुट जैसे प्रोग्राम के जरिए कई देशों में मदद की है।”

PPP मॉडल से निकल सकता है रास्ता

कर्नल नवनीत मित्तल माइन क्लियरेंस के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल को एक प्रभावी समाधान मानते हैं। वह कहते हैं कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल में कंपनियां माइंस क्लियर कर विकास कार्य कर सकती हैं। उनके अनुसार, कंपनियां युद्ध प्रभावित जमीन को “एडॉप्ट” करें, वहां खुद माइन हटाने का काम करें और उसके बाद उसी जमीन पर खेती, खनन या इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें। इससे एक साथ कई फायदे होते हैं। देश को सुरक्षित और उपयोगी जमीन मिलती है, कंपनियों को संसाधन और निवेश का अवसर मिलता है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलते हैं। इस तरह यह मॉडल विकास और पुनर्निर्माण दोनों को साथ लेकर चलता है। (International Mine Awareness Day 2026)

भारत की भूमिका: ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का है मौका

कर्नल नवनीत मित्तल के मुताबिक अगर हम ग्लोबल साउथ की बात करते हैं, तो हमें इन देशों की मदद करनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी भी है और अवसर भी। वह कहते हैं कि ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों पर लैंडमाइंस और अनफटे विस्फोटकों का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है। अफ्रीका के अंगोला, मोजाम्बिक और सूडान, दक्षिण एशिया के श्रीलंका और अफगानिस्तान, दक्षिण-पूर्व एशिया के कंबोडिया और लाओस, और मध्य पूर्व के इराक, सीरिया और गाजा जैसे इलाके आज भी इस खतरे से जूझ रहे हैं। इन देशों में समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां संसाधन कम हैं, अर्थव्यवस्था कमजोर है और कई जगह लंबे समय तक युद्ध चलता रहा है।

कर्नल नवनीत मित्तल का मानना है कि भारत को इस क्षेत्र में आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए। भारत माइन एक्शन प्रोग्राम शुरू कर सकता है, पूर्व सैनिकों को इसमें शामिल कर सकता है और श्रीलंका की तरह दूसरे देशों को सीधी मदद दे सकता है।

वह कहते हैं, “आज दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन चुकी है। एक जगह का संघर्ष पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। अगर दूसरे देश अस्थिर हैं, तो उसका असर हम पर भी पड़ेगा। भारत के पास तकनीकी क्षमता और अनुभव है, इसलिए उसे आगे आना चाहिए।” (International Mine Awareness Day 2026)

रिकॉर्ड में दर्ज हुआ भारतीय सेना का ये इनोवेशन, LAC पर 16,000 फीट पर चल रहे मोनोरेल सिस्टम से दुनिया हुई हैरान

High Altitude Monorail System Indian Army
High Altitude Monorail System Indian Army

High Altitude Monorail System Indian Army: पिछले साल भारतीय सेना ने एलएसी से सटे बॉर्डर इलाके में एक ऐसा सिस्टम तैयार किया था, जिसने पहाड़ों में लॉजिस्टिक्स यानी जरूरी सामान पहुंचाने के तरीके को बदल दिया। भारतीय सेना की गजराज कोर ने समुद्र तल से 16,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर एक खास मोनोरेल ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैनात किया था। वहीं खास बात यह है कि सेना के इस इनोवेशन को एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी जगह मिली है।

यह सिस्टम उन इलाकों में काम कर रहा है, जहां सामान्य गाड़ियां चल ही नहीं पातीं। बर्फ, खड़ी चट्टानें और बेहद खराब मौसम के बीच यह लगातार काम कर रहा है और सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचा रहा है।

High Altitude Monorail System Indian Army: चार महीने से लगातार चल रहा है सिस्टम

इस मोनोरेल सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पिछले चार महीनों से बिना रुके काम कर रहा है। दिन हो या रात, तेज बर्फबारी हो या शून्य से नीचे तापमान यह सिस्टम हर हाल में चलता रहा है।

ऊंचाई वाले इलाकों में अक्सर मौसम अचानक खराब हो जाता है, जिससे हेलीकॉप्टर उड़ नहीं पाते और सड़क रास्ते बंद हो जाते हैं। ऐसे में यह मोनोरेल सिस्टम लगातार सप्लाई बनाए रखने में मदद कर रहा है। इससे सैनिकों को समय पर राशन, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान मिल रहा है। (High Altitude Monorail System Indian Army)

High Altitude Monorail System Indian Army: रिकॉर्ड में दर्ज भारतीय सेना का ये इनोवेशन, LAC पर

रिकॉर्ड बुक में दर्ज हुआ नाम

इस मोनो रेल सिस्टम को उसकी खास उपलब्धि के लिए आधिकारिक तौर पर एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। इतनी ऊंचाई पर इस तरह का सिस्टम बनाना और उसे लगातार चलाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

आसान नहीं था तैयार करना

इस सिस्टम को तैयार करना आसान नहीं था। इसे भारतीय सेना की इंजीनियर टीम ने बेहद कठिन परिस्थितियों में बनाया। जहां ऑक्सीजन कम होती है और ठंड बहुत ज्यादा होती है, वहां काम करना खुद एक बड़ी चुनौती होती है।

इसके बावजूद इंजीनियरों ने कम समय में इसे तैयार कर दिया। यह पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन पर आधारित है, यानी इसमें किसी विदेशी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया। यही वजह है कि इसे आत्मनिर्भर भारत का मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। (High Altitude Monorail System Indian Army)

High Altitude Monorail System Indian Army: रिकॉर्ड में दर्ज भारतीय सेना का ये इनोवेशन, LAC पर

कैसे काम करता है यह मोनोरेल सिस्टम

यह मोनोरेल एक ट्रैक पर चलने वाला सिस्टम है, जो पहाड़ों के बीच एक तय ट्रैक पर चलता है। इसके जरिए एक बार में काफी मात्रा में सामान भेजा जा सकता है। इसमें राशन, गोला-बारूद, ईंधन और मेडिकल सप्लाई जैसी चीजें आसानी से पहुंचाई जा रही हैं।

यह सिस्टम खड़ी ढलानों और बर्फीले रास्तों पर भी बिना रुकावट काम करता है। जहां पहले सैनिकों को भारी सामान खुद उठाकर ले जाना पड़ता था या खच्चरों का सहारा लेना पड़ता था, वहां अब यह काम मशीन के जरिए हो रहा है।

सैनिकों के लिए बड़ी राहत

पहले ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों को सप्लाई पहुंचाना बहुत मुश्किल काम होता था। कई बार खराब मौसम की वजह से दिनों तक सप्लाई रुक जाती थी। इससे सैनिकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।

अब इस मोनोरेल सिस्टम के आने से यह समस्या काफी हद तक कम हो गई है। सप्लाई लगातार बनी रहती है और सैनिकों को जरूरी चीजों के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता। इससे उनका ध्यान अपने ऑपरेशन पर ज्यादा रहता है।

घायल सैनिकों को निकालने में भी मदद

यह सिस्टम सिर्फ सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल घायल सैनिकों को सुरक्षित स्थान तक लाने के लिए भी किया जा सकता है। ऐसे इलाकों में जहां हेलीकॉप्टर उतर नहीं पाते, वहां यह एक अहम विकल्प बन जाता है। इससे आपात स्थिति में जल्दी मदद पहुंचाना संभव हो पाता है और समय की बचत होती है। (High Altitude Monorail System Indian Army)

सीमा के पास बढ़ी ऑपरेशनल क्षमता

यह मोनोरेल सिस्टम ऐसे क्षेत्र में लगाया गया है, जो रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां मौसम और भू-भाग की वजह से अक्सर सप्लाई लाइन प्रभावित होती थी।

अब इस सिस्टम के जरिए अग्रिम चौकियों तक बिना रुकावट सामान पहुंचाया जा रहा है। इससे सैनिकों की ऑपरेशनल क्षमता मजबूत हुई है और वे बेहतर तरीके से अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं। (High Altitude Monorail System Indian Army)