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Project-17A का चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट INS Taragiri नौसेना में शामिल, पढ़ें कैसे स्वदेशी शिपबिल्डिंग इकोसिस्टम हो रहा मैच्योर

INS Taragiri Commission
INS Taragiri Commissioned: Rajnath Singh Calls Strong Navy a Strategic Necessity for India

INS Taragiri Commission: भारत की समुद्री क्षमता को शुक्रवार को बड़ा बूस्ट मिला, जब देश की तीसरी न्यूक्लियर सबरमरीन आईएनएस अरिदमन के साथ एडवांस स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को विशाखापत्तनम में नौसेना में शामिल किया गया। तारागिरी पूर्वी समुद्री तट पर ईस्टर्न फ्लीट का हिस्सा बनेगी।

इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। समारोह विशाखापत्तनम के नौसैनिक डॉकयार्ड में आयोजित किया गया, जहां नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

6,670 टन वजनी आईएनएस तारागिरी को प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार किया गया है और यह आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट्स की उसी सीरीज का हिस्सा है, जिसे भारतीय नौसेना के लिए खास तौर पर नई पीढ़ी के समुद्री युद्ध को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

INS Taragiri Commission: 11 हजार किमी से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा

समारोह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होना भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देश की 11 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा है और भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में देश के विकास को समुद्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने साफ कहा कि देश का लगभग 95 फीसदी व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और ऊर्जा सुरक्षा भी समुद्र पर निर्भर करती है। इसलिए एक मजबूत और सक्षम नौसेना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है।

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखती है, चाहे वह फारस की खाड़ी हो या मलक्का जलडमरूमध्य। किसी भी संकट की स्थिति में नौसेना हमेशा आगे रहती है, चाहे वह लोगों को सुरक्षित निकालना हो या मानवीय सहायता पहुंचाना। (INS Taragiri Commission)

12. बदलते हालात में बढ़ रही समुद्र की अहमियत

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि आज के समय में वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और समुद्र इन बदलावों का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब भी दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो उसका असर सबसे पहले समुद्री व्यापार और एनर्जी सप्लाई पर दिखाई देता है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत की नौसेना ने कई बार यह साबित किया है कि वह सिर्फ देश के हितों की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक स्तर पर भी अपने नागरिकों और व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित रखने में सक्षम है।

11. इंटरनेट केबल्स की सुरक्षा पर जताई चिंता

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में दुनिया का ज्यादातर डेटा समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स के जरिए चलता है। अगर इन केबल्स को कोई नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। इसलिए अब समुद्री सुरक्षा को सिर्फ पारंपरिक नजरिए से नहीं, बल्कि एक व्यापक और भविष्य के हिसाब से तैयार दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें केवल अपनी तटरेखा की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों, चोक पॉइंट्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भी सुरक्षा करनी होगी, जो सीधे देश के हितों से जुड़े हैं। भारतीय नौसेना इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रही है और यही सोच हमें आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करती है। उन्होंने कहा कि जब भी भारत आईएनएस तारागिरी जैसे आधुनिक युद्धपोत बनाता और तैनात करता है, तो यह पूरे क्षेत्र में शांति और समृद्धि की गारंटी जैसा होता है। (INS Taragiri Commission)

10. नेवी चीफ बोले- जीपीएस और सैटेलाइट सर्विसेज पर बढ़ा खतरा

वहीं, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि आज का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है और इसका सबसे ज्यादा असर समुद्री क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भी समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई दे रहा है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि अब समुद्री क्षेत्र में सिर्फ पारंपरिक खतरे ही नहीं हैं, बल्कि जीपीएस और सैटेलाइट सेवाओं में रुकावट जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं, जिससे समुद्री ऑपरेशन और भी जटिल हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि आज का समुद्री सुरक्षा माहौल पहले से ज्यादा जटिल हो गया है, जहां बदलती जियोपॉलिटिक्स, नई तकनीक और नए तरह के खतरे सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में भारतीय नौसेना का लक्ष्य है कि वह हमेशा कॉम्बैट-रेडी, भरोसेमंद और भविष्य के लिए तैयार फोर्स बनी रहे, जो कभी भी, कहीं भी देश के समुद्री हितों की रक्षा कर सके।

9. नौसेना की ताकत बढ़ाने पर जोर

नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय नौसेना ने लगातार अपनी ताकत बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में नौसेना ने कई नए जहाज, पनडुब्बियां और एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि देश के दोनों समुद्री तटों यानी पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों पर नौसेना की क्षमता को मजबूत किया जा रहा है, ताकि हर तरह की चुनौती का सामना किया जा सके। (INS Taragiri Commission)

8. पुराने तारागिरी की विरासत का किया जिक्र

नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में पुराने आईएनएस तारागिरी की विरासत को भी याद किया। उन्होंने बताया कि इसका नाम पहले लियंडर क्लास फ्रिगेट पर रखा गया था, जो 1980 में नौसेना में शामिल हुआ था और जिसने एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और ऑपरेशनल इनोवेशन में अहम भूमिका निभाई थी।

उन्होंने बताया कि पुराने तारागिरी ने 1999 के गुजरात चक्रवात के दौरान राहत और बचाव कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा 2004 की सुनामी के समय श्रीलंका में मानवीय सहायता पहुंचाने में भी इस जहाज ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

उन्होंने कहा कि उस समय इस जहाज पर सी किंग हेलीकॉप्टर का संचालन एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी, जिससे नौसेना की एंटी-सबमरीन क्षमता में भी सुधार हुआ था। (INS Taragiri Commission)

7. आधुनिक तकनीक से लैस नया युद्धपोत

नई आईएनएस तारागिरी पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस है। यह करीब 6,670 टन वजनी युद्धपोत है, जिसे मुंबई स्थित मझगांव जॉक शिपबिल्डर्स में बनाया गया है। इस जहाज को बनाने में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इसके निर्माण में देश के 200 से ज्यादा एमएसएमई यानी छोटे और मध्यम उद्योगों ने योगदान दिया है।

6. स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए चुनौती

आईएनएस तारागिरी की सबसे बड़ी खासियत इसका स्टेल्थ डिजाइन है। इसका मतलब यह है कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार पर आसानी से नजर नहीं आता।

इसका रडार क्रॉस सेक्शन काफी कम रखा गया है और इसके बाहरी ढांचे को इस तरह बनाया गया है कि यह समुद्र में आसानी से छिपा रह सके। इसके अलावा इसमें कम इंफ्रारेड सिग्नेचर तकनीक भी दी गई है, जिससे दुश्मन के सेंसर इसे पकड़ने में मुश्किल महसूस करते हैं।

5. लगे हैं आधुनिक हथियार और कॉम्बैट सिस्टम

इस युद्धपोत में आधुनिक हथियारों का पूरा सेट लगाया गया है। इसमें सुपरसोनिक सर्फेस-टू-सर्फेस मिसाइल सिस्टम, मीडियम रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम शामिल हैं।

इन सभी सिस्टम को एक आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे जहाज का क्रू तेजी से फैसले ले सकता है और तुरंत कार्रवाई कर सकता है।

4. तेज रफ्तार और लंबी तैनाती की क्षमता

आईएनएस तारागिरी में सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इससे जहाज जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टरबाइन का इस्तेमाल कर सकता है।

इस वजह से यह जहाज तेज रफ्तार से चल सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है। यह खासियत इसे अलग-अलग तरह के मिशन के लिए सक्षम बनाती है। (INS Taragiri Commission)

3. कई तरह के मिशन के लिए तैयार

आईएनएस तारागिरी को सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं बनाया गया है, बल्कि यह कई तरह के ऑपरेशन में काम आ सकता है। यह जहाज हाई इंटेंसिटी कॉम्बैट के साथ-साथ ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे मिशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

2. प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत सात फ्रिगेट

आईएनएस तारागिरी (एफ41) एक आधुनिक नीलगिरी क्लास स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत तैयार किया गया है। प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत कुल सात ऐसे फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें चार जहाज मझगांव डॉक द्वारा और तीन जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा बनाए जा रहे हैं। इनमें चार नीलगिरी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं। इनमें आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस हिमगिरि और अब आईएनएस तारागिरी शामिल हैं।

इसके अलावा कुछ अन्य जहाज जैसे दुनागिरी पहले ही नौसेना को डिलीवर हो चुके हैं, लेकिन उनका कमीशन होना अभी बाकी है। वहीं महेंद्रगिरि और विंध्यगिरि जैसे अन्य युद्धपोत अलग-अलग निर्माण और परीक्षण के चरण में हैं। इन जहाजों को सी ट्रायल यानी समुद्री परीक्षण के बाद ही नौसेना में शामिल किया जाता है।

इन फ्रिगेट्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये भारतीय नौसेना की ब्लू-वॉटर क्षमता को मजबूत करते हैं। इसका मतलब है कि अब भारतीय नौसेना सिर्फ अपने तटों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर समुद्र में भी लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। स्टेल्थ डिजाइन, तेज मिसाइलें और पनडुब्बी रोधी क्षमता के चलते ये युद्धपोत एक साथ कई तरह के खतरों का सामना करने में सक्षम हैं।

1. इस साल 15 शिप शामिल करने का लक्ष्य

नौसेना का लक्ष्य 2035 तक 200 से ज्यादा जहाजों की फ्लीट तैयार करना है। जिनमें अभी सभी 50 से ज्यादा शिप भारतीय यार्ड्स में ही बन रहे हैं।

अगर साल 2025 की बात करें, तो इस दौरान भारतीय नौसेना में कुल 12 नए युद्धपोत, एक पनडुब्बी और एक एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया गया। वहीं, साल 2026 में यह रफ्तार और बढ़ने की उम्मीद है। नेवी चीफ के मुताबिक इस साल करीब 15 नए युद्धपोत नौसेना में शामिल किए जा सकते हैं। इस तेज रफ्तार के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है भारत का मजबूत होता स्वदेशी शिपबिल्डिंग सिस्टम। मझगांव डॉक, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, कोचीन शिपयार्ड और एलएंडटी जैसे शिपयार्ड अब एक साथ कई जहाजों का निर्माण कर रहे हैं। इसके साथ ही मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे अलग-अलग हिस्सों को पहले तैयार करके बाद में जोड़ा जाता है, और समय की बचत होती है।

वहीं, पहले किसी भी नए जहाज की पहली यूनिट बनने में ज्यादा समय लगता था, लेकिन अब उसी क्लास के अगले जहाज कम समय में तैयार हो रहे हैं। अनुभव और तकनीकी सुधार की वजह से अब बाद के जहाज 20 से 30 प्रतिशत कम समय में बन जाते हैं। इसके अलावा पहले नौसेना किसी जहाज को कमीशन करने से पहले कम से कम पांच सॉर्टी करती थी, जहां जहाज का परीक्षण करती थी, लेकिन अब 1-2 सॉर्टी में ही अप्रूवल मिल जाता है। इसकी वजह है कि जहाज बनाने वाली कंपनियों को इस बात का अनुभव हो गया कि नौसेना की असल जरूरत क्या है, जिसका फायदा जल्दी कमीशनिंग में देखने को मिल रहा है।

इसके अलावा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं ने भी इस रफ्तार को बढ़ाया है। अब जहाजों में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल हो रही है और सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्योग इसमें योगदान दे रहे हैं। सरकार की नीतियों और बेहतर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ने भी निर्माण प्रक्रिया को तेज किया है। (INS Taragiri Commission)

तीसरी परमाणु पनडुब्बी INS Aridhaman से बढ़ेगी चीन-पाकिस्तान की टेंशन, स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड में हुई शामिल

INS Aridaman
File Photo

INS Aridaman: स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को आज औपचारिक तौर पर भारतीय नौसेना में शामिल हो गई, वहीं इसकी जिम्मेदारी अब स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) के पास होगी। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद रहे। यह पनडुब्बी भारत की तीसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) है, जिसे लंबे समय से तैयार किया जा रहा था। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और अरिघात को पहले ही स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड में शामिल किया जा चुका है। वहीं, चौथी एसएसबीएन आईएनएस अरिसुदन अभी कंस्ट्रक्शन स्टेज में है जिसे 2027 के आसपास शामिल किया जा सकता है।

INS Aridaman: कई महीनों तक चले सी-ट्रायल्स

आईएनएस अरिदमन को नौसेना में शामिल करने से पहले इसका लंबा सी ट्रायल चला। इसकी सी ट्रायल्स 2022 से दिसंबर 2025 तक चले। इस दौरान समुद्र में कई महीनों तक इसके अलग-अलग सिस्टम, इंजन और हथियारों की जांच की गई। सभी परीक्षण पूरे होने के बाद इसे अब ऑपरेशनल भूमिका के लिए तैयार माना गया है।

यह पनडुब्बी विशाखापत्तनम के सीक्रेट शिप बिल्डिंग सेंटर में तैयार की गई है। इसके निर्माण में निजी कंपनी एलएंडटी सहित कई भारतीय संस्थानों का योगदान रहा है। यह पनडुब्बी एडवांस्ड टेक्लोनॉजी वेसल (ATV) प्रोजेक्ट का हिस्सा है।

अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी

आईएनएस अरिदमन, अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी है। इससे पहले इसी श्रेणी की आईएनएस अरिहंत को साल 2016 में और आईएनएस अरिघात को 2024 में नौसेना में शामिल किया गया था।

इस नई पनडुब्बी का आकार पहले की पनडुब्बियों से बड़ा है और इसमें ज्यादा मिसाइलें ले जाने की क्षमता है। यही वजह है कि इसे तकनीकी रूप से पहले के मुकाबले ज्यादा सक्षम माना जा रहा है।

कैसे काम करती है यह परमाणु पनडुब्बी

इस पनडुब्बी में प्रोपल्शन के लिए 83 मेगावॉट का स्वदेशी प्रेसराइज्ड लाइट वॉटर रिएक्टर लगाया गया है, जिसे भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने डिजाइन किया है। इस वजह से यह पनडुब्बी लंबे समय तक बिना सतह पर आए गहरे समुद्र में रह सकती है और इसे स्नॉर्कलिंग की जरूरत नहीं पड़ती। जिससे इसकी आवाज बहुत कम रहती है और दुश्मन के लिए इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है।

इसकी स्टेल्थ क्षमता बढ़ाने के लिए एडवांस अकॉस्टिक डैम्पिंग, एनेकोइक टाइल्स और सेवन-ब्लेड प्रोपेलर का इस्तेमाल किया गया है। पानी के अंदर इसकी स्पीड करीब 24 नॉट तक पहुंच सकती है, जबकि सतह पर यह 12 से 15 नॉट की रफ्तार से चलती है। इस पनडुब्बी में लगभग 95 लोगों का क्रू तैनात रहता है और इसकी ऑपरेशनल अवधि लगभग अनलिमिटेड मानी जाती है, जो सिर्फ खाने-पीने की सप्लाई पर निर्भर करती है। इसमें 533 एमएम के छह टॉरपीडो ट्यूब भी लगे हैं, जिनसे टॉरपीडो, क्रूज मिसाइल और माइन दागे जा सकते हैं।

मिसाइल क्षमता में बड़ा बदलाव

आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जहां करीब 6,000 टन की पनडुब्बियां हैं, वहीं नई आईएनएस अरिदमन उनसे बड़ी है और इसका वजन करीब 7,000 टन के आसपास है। इसकी लंबाई भी पहले से ज्यादा है, जो करीब 125 से 130 मीटर तक है।

आईएनएस अरिदमन की सबसे बड़ी खासियत इसकी मिसाइल क्षमता है। इसमें 8 वर्टिकल लॉन्च ट्यूब लगाए गए हैं, जबकि पहले की पनडुब्बियों में सिर्फ 4 ट्यूब होते थे। इसकी मदद से यह एक साथ ज्यादा मिसाइलें ले जा सकती है। एक मिशन में यह पनडुब्बी 24 K-15 सागरिका मिसाइलें ले जा सकती है, जिनकी मारक दूरी करीब 750 किलोमीटर है। इसके अलावा यह 8 K-4 मिसाइलें भी ले जा सकती है, जिनकी रेंज 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है। आगे चलकर इसमें K-5 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें भी जोड़ी जा सकती हैं।

इस पनडुब्बी की एक खास बात यह है कि इसमें ऐसी तकनीक पर काम किया जा रहा है, जिसमें एक ही मिसाइल कई वारहेड ले जा सके। इससे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को चकमा देना आसान हो जाता है।

समुद्र से जवाबी हमला करने की क्षमता

यह पनडुब्बी भारत की न्यूक्लियर ट्रायड का अहम हिस्सा मानी जाती है। यानी जमीन, हवा और समुद्र तीनों जगह से जवाबी हमला करने की क्षमता। इन पनडुब्बी के शामिल होने के बाद इससे कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस (एक पनडुब्बी हमेशा पेट्रोल पर) की दिशा में बड़ा कदम है।

यह पनडुब्बी हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की टाइप 094 और 096 एसएसबीएन पनडुब्बियों और पाकिस्तान की चीनी मूल की पनडुब्बियों से मुकाबला करेगी। इसकी शांत तरीके से काम करने की क्षमता और लंबी दूरी की मिसाइलें इसे और मजबूत बनाती हैं, जिससे दुश्मन की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम के लिए इसे पकड़ना और रोकना काफी मुश्किल हो जाता है। समुद्र में तैनात रहने की वजह से यह दुश्मन के लिए ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। अगर किसी संघर्ष की स्थिति बनती है, तो यह पनडुब्बी समुद्र के भीतर से जवाबी हमला कर सकती है।

स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड में तैनाती

नौसेना में शामिल होने के बाद आईएनएस अरिदमन को स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड के तहत रखा जाएगा। यह वही कमान है जो देश की परमाणु क्षमता से जुड़ी जिम्मेदारी संभालती है। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात भी इसी कमान के तहत काम कर रही हैं।

क्या है स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC)

स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड यानी एसएफसी भारत की परमाणु ताकत को संभालने वाला मुख्य ऑपरेशनल संगठन है। इसे आसान भाषा में समझें तो यही वह कमान है जो देश के परमाणु हथियारों की देखरेख और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की जिम्मेदारी निभाती है। यह भारत के न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है, जो पूरे परमाणु सिस्टम को कंट्रोल करता है।

एसएफसी की स्थापना 4 जनवरी 2003 को की गई थी। उस समय केंद्र सरकार ने इसे औपचारिक रूप से शुरू किया था। इसका मुख्य काम है परमाणु हथियारों को सुरक्षित रखना, उनका रखरखाव करना और जरूरत पड़ने पर उनका सही तरीके से उपयोग सुनिश्चित करना।

यह एक ट्राई-सर्विस कमांड है, यानी इसमें थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों के अधिकारी और संसाधन शामिल होते हैं। इसका प्रमुख एक तीन-स्टार अधिकारी होता है, जो बारी-बारी से तीनों सेनाओं से आता है।

एसएफसी तीनों तरह के परमाणु सिस्टम को संभालता है। जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें जैसे अग्नि और पृथ्वी सीरीज, हवा से छोड़े जाने वाले हथियार जो फाइटर जेट्स से ले जाए जाते हैं, और समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें जो पनडुब्बियों से छोड़ी जाती हैं।

समुद्र में मौजूद न्यूक्लियर अटैक सबमरींस भी इसी कमान के तहत काम करती हैं। इनसे K-15 और K-4 जैसी मिसाइलें दागी जा सकती हैं। भारत के पास तीन तरीके से जवाबी हमला करने की क्षमता है, जिसे न्यूक्लियर ट्रायड कहा जाता है। इसमें जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। इस पूरे सिस्टम का ऑपरेशनल कंट्रोल एसएफसी के पास होता है।

एसएफसी सीधे देश की शीर्ष कमान से निर्देश लेता है। यानी प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के स्तर से आदेश आते हैं। सामान्य समय में परमाणु हथियार और मिसाइलें अलग-अलग रखी जाती हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़कर तैयार किया जाता है। एसएफसी समय-समय पर मिसाइलों के परीक्षण करता रहता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी सिस्टम ठीक से काम कर रहे हैं और किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं।

यह कमान बहुत संवेदनशील और गोपनीय मानी जाती है। इसका काम देश की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। भारत की नीति के अनुसार पहले परमाणु हमला नहीं किया जाता, लेकिन अगर हमला होता है तो जवाब देने की पूरी तैयारी रखी जाती है। पनडुब्बियों की भूमिका इसमें खास होती है, क्योंकि वे समुद्र में छिपकर काम करती हैं और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई कर सकती हैं। इसी वजह से एसएफसी में समुद्री ताकत को बहुत अहम माना जाता है।

पश्चिम एशिया संकट पर IGoM की बैठक, रक्षा मंत्री बोले- सरकार अलर्ट, 24 घंटे निगरानी के आदेश

West Asia Crisis IGoM Meeting

West Asia Crisis IGoM Meeting: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच केंद्र सरकार ने एक बार फिर हालात की समीक्षा की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों का अनौपचारिक समूह (IGoM) की दूसरी अहम बैठक नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में हुई। इस बैठक में सरकार ने मौजूदा हालात, उनके भारत पर असर और उससे निपटने के कदमों पर विस्तार से चर्चा की।

बैठक के दौरान रक्षा मंत्री ने साफ कहा कि हालात अभी अनिश्चित बने हुए हैं, इसलिए चौबीसों घंटे निगरानी रखना और हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है।

West Asia Crisis IGoM Meeting: लगातार निगरानी और संतुलित प्रतिक्रिया पर जोर

बैठक में रक्षा मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि हालात पर लगातार नजर रखी जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पहले से तैयारी रखना जरूरी है, ताकि देश के लोगों पर इसका असर कम से कम पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को हर कदम संतुलित तरीके से उठाना होगा, ताकि अचानक होने वाले किसी भी बदलाव का सही तरीके से जवाब दिया जा सके।

मंत्रालयों ने दी तैयारी की जानकारी

इस बैठक में सात अलग-अलग सचिव समूहों ने अपनी-अपनी तैयारियों की जानकारी दी। इनमें वित्त मंत्रालय, ऊर्जा क्षेत्र और अन्य विभाग शामिल थे।

वित्त मंत्रालय ने बताया कि वैश्विक व्यापार में आई रुकावटों को देखते हुए कई राहत उपाय किए गए हैं। खास तौर पर 40 जरूरी पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी पूरी तरह हटा दी गई है, जिससे उद्योगों पर लागत का दबाव कम होगा।

इसके अलावा स्पेशल इकॉनमिक जोन यानी एसईजेड में काम करने वाली यूनिट्स को भी राहत दी गई है। अब वे अपने प्रोडक्ट देश के भीतर कम ड्यूटी पर बेच सकेंगी। इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फायदा मिलेगा।

निवेश और उद्योग को लेकर उठाए गए कदम

सरकार ने निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए भी कदम उठाए हैं। पुराने निवेशों पर जीएएआर नियम लागू न करने का फैसला लिया गया है, जिससे निवेशकों को स्पष्टता मिलेगी।

इन सभी उपायों का असर टेक्सटाइल, पैकेजिंग और फार्मा जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा, जहां कच्चे माल की लागत कम हो सकेगी और सप्लाई भी स्थिर रहेगी।

इसके अलावा बैठक में एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों पर भी चर्चा हुई। सरकार ने तय किया है कि घरेलू उड़ानों के लिए इसकी कीमतों में हर महीने 25 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होगी।

रक्षा मंत्री ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि इससे आम लोगों पर हवाई किराए का बोझ अचानक नहीं बढ़ेगा।

एलपीजी सप्लाई को दी गई प्राथमिकता

बैठक में घरेलू गैस यानी एलपीजी की सप्लाई पर भी खास ध्यान दिया गया। सरकार ने बताया कि देश में एलपीजी की उपलब्धता पूरी तरह सामान्य है और कहीं भी कमी की कोई रिपोर्ट नहीं है।

हालांकि कुछ जगहों पर घबराहट के कारण ज्यादा खरीदारी देखने को मिली, जिससे अस्थायी दबाव बना। इसके पीछे जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग को जिम्मेदार माना गया।

सरकार ने इस पर सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। कई राज्यों में छापेमारी की जा रही है और गलत तरीके से काम करने वाले गैस डिस्ट्रीब्यूटर के खिलाफ भी कदम उठाए गए हैं।

छोटे सिलेंडर की उपलब्धता बढ़ी

मजदूरों और कम खपत वाले परिवारों के लिए 5 किलो वाले छोटे एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता भी बढ़ाई गई है। 23 मार्च 2026 से अब तक 4.3 लाख से ज्यादा सिलेंडर बेचे जा चुके हैं।

सरकार उन राज्यों पर ज्यादा ध्यान दे रही है, जहां डिमांड ज्यादा है, ताकि किसी को भी गैस की कमी का सामना न करना पड़े।

उद्योगों के लिए भी जारी सप्लाई

बैठक में यह भी बताया गया कि उद्योगों को मिलने वाली एलपीजी सप्लाई भी लगभग सामान्य स्तर पर बनी हुई है। संकट से पहले की तुलना में करीब 80 प्रतिशत सप्लाई जारी है, जिससे उद्योगों का काम प्रभावित न हो।

सरकार अलग-अलग उद्योगों के साथ बैठक कर उनकी जरूरतों को समझ रही है और उसी के अनुसार सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है।

इसके साथ ही, ऑटो एलपीजी की सप्लाई भी जारी है, हालांकि निजी कंपनियों को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसी वजह से कुछ जगहों पर कतारें देखने को मिल रही हैं। जहां संभव है, वहां ड्यूल फ्यूल वाले वाहनों को पेट्रोल इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है।

इसके अलावा पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि उद्योगों को एक स्थिर विकल्प मिल सके।

अफवाहों पर सरकार की नजर 

बैठक में सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों का भी मुद्दा उठा। सरकार ने बताया कि कुछ लोग फर्जी तस्वीरें और गलत जानकारी फैलाकर डर का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और लोगों से अपील की गई है कि वे बिना पुष्टि की जानकारी पर भरोसा न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों पर ही विश्वास करें।

इस बैठक में कई बड़े मंत्री शामिल हुए। इनमें वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर, रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, विदेश मंत्री एस जयशंकर, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रहलाद जोशी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेन्द्र सिंह और रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव मौजूद रहे।

इससे पहले 28 मार्च को भी इसी समूह की पहली बैठक हुई थी, जिसमें अधिकारियों को हालात पर नजर रखने और तेजी से फैसले लेने के निर्देश दिए गए थे। इस दूसरी बैठक में उन निर्देशों की समीक्षा के साथ आगे की रणनीति पर चर्चा की गई।

मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री के रेजिंग डे पर सप्त शक्ति कमांड के कमांडर बोले- ‘स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी’ पर टिकी है देश की सुरक्षा

Mechanised Infantry Raising Day
Lieutenant General Manjinder Singh, Army Commander, Sapta Shakti Command

Mechanised Infantry Raising Day: भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट ने 2 अप्रैल को अपना 47वां रेजिंग डे पूरे सम्मान और सादगी के साथ मनाया। इस मौके पर जहां एक ओर दिल्ली स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल में शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, वहीं जयपुर में आयोजित एक अहम सेमिनार में आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने बदलते वैश्विक हालात पर बोलते हुए कहा कि आज के समय में “स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी” यानी रणनीतिक स्वतंत्रता अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि हर देश के लिए जरूरी जरूरत बन चुकी है।

Mechanised Infantry Raising Day: स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी है जरूरी

जयपुर मिलिट्री स्टेशन के सप्त शक्ति ऑडिटोरियम में आयोजित जनरल के सुंदरजी मेमोरियल लेक्चर में सेना की सप्त शक्ति कमांड यानी साउथ वेस्टर्न कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने साफ कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

यह कार्यक्रम मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल और सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के सहयोग से आयोजित किया गया था। जिसका विषय था- “बदलती और तनावपूर्ण दुनिया में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी की चुनौतियां।” इसका मतलब यह है कि आज के समय में कोई भी देश अपनी सुरक्षा और फैसलों में कितना स्वतंत्र रह सकता है, यह एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

जनरल ऑफिसर इन कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि आज का वैश्विक माहौल काफी अस्थिर है। बड़े देशों के बीच टकराव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, टेक्नोलॉजी की होड़ और अलग-अलग क्षेत्रों में संघर्ष ने हालात को और मुश्किल बना दिया है। ऐसे में किसी भी देश के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने फैसले खुद ले सके और अपनी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और लंबे समय के हितों को सुरक्षित रख सके।

उन्होंने कहा कि पहले स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी को एक कूटनीतिक सोच के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। (Mechanised Infantry Raising Day)

बदलती दुनिया में नई चुनौतियां

आर्मी कमांडर ने अपने भाषण में यह भी बताया कि आज की दुनिया में सिर्फ सैन्य ताकत ही काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि अब टेक्नोलॉजी, साइबर स्पेस, ऊर्जा, सप्लाई चेन और स्पेस जैसे क्षेत्रों में भी मजबूत होना जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि देशों को ऐसे साझेदारी मॉडल बनाने होंगे, जिनमें सहयोग तो हो लेकिन निर्भरता न हो। यानी देश मिलकर काम करें, लेकिन अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें। (Mechanised Infantry Raising Day)

Mechanised Infantry Raising Day

जनरल सुंदरजी की विरासत को किया याद

इस मौके पर जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी को भी याद किया गया, जिन्हें भारतीय सेना के सबसे दूरदर्शी नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने सेना में कई बड़े बदलाव किए थे और आधुनिक युद्ध की सोच को आगे बढ़ाया था।

कार्यक्रम में यह बताया गया कि उनकी रणनीतिक सोच आज भी भारतीय सेना की योजना और प्रशिक्षण में दिखाई देती है। उनके योगदान को याद करते हुए इस लेक्चर का आयोजन किया गया।

इस सेमिनार में कई बड़े विशेषज्ञ भी शामिल हुए। पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज सरन और यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन के महानिदेशक वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह ने भी अपने विचार साझा किए।

उन्होंने बताया कि आज के समय में भारत को अपनी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति को नए तरीके से ढालना होगा। उन्होंने मल्टी पोलर वर्ल्ड यानी कई ताकतों वाली दुनिया में संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

चर्चा के दौरान टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और आर्थिक मजबूती जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से बात हुई। (Mechanised Infantry Raising Day)

मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री की अहम भूमिका

मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट भारतीय सेना का एक अहम हिस्सा है। यह रेजिमेंट आधुनिक बख्तरबंद गाड़ियों के साथ काम करती है, जिन्हें इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल कहा जाता है। इन वाहनों की मदद से सैनिक तेजी से आगे बढ़ सकते हैं और दुश्मन के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई कर सकते हैं।

इस रेजिमेंट की खासियत यह है कि इसमें गति और ताकत दोनों का मेल होता है। एक तरफ यह तेजी से मूव कर सकती है, वहीं दूसरी तरफ इसमें भारी फायरपावर भी होती है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ट्रेनिंग और तकनीक पर जोर

इस रेजिमेंट की ट्रेनिंग देने वाला मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल समय के साथ काफी आधुनिक हो चुका है। यहां सैनिकों को नई तकनीक और आधुनिक युद्ध के तरीकों की ट्रेनिंग दी जाती है। इस संस्थान ने अब तक कई बटालियन के सैनिकों को प्रशिक्षित किया है। इसके अलावा भारतीय सेना के अन्य हिस्सों, भारतीय तटरक्षक बल और मित्र देशों के सैनिकों को भी यहां प्रशिक्षण दिया जाता है।

यहां एक अर्बन वारफेयर ट्रेनिंग सेंटर भी तैयार किया जा रहा है, जहां शहरों में होने वाले युद्ध के लिए खास ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे सैनिकों को अलग-अलग परिस्थितियों में काम करने की तैयारी मिलती है। (Mechanised Infantry Raising Day)

Mechanised Infantry Raising Day
National War Memorial

दिल्ली में शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि

रेजिंग डे के मौके पर दिल्ली स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल पर एक श्रद्धांजलि समारोह भी आयोजित किया गया। इसमें मेजर जनरल आर प्रेमराज और अन्य सैनिकों ने शहीदों को याद करते हुए पुष्पांजलि अर्पित की।

इस दौरान उन सैनिकों के बलिदान को याद किया गया, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपनी जान दी। समारोह में मौजूद सभी लोगों ने मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। (Mechanised Infantry Raising Day)

INS सुनयना बना ‘IOS सागर’, 16 देशों का दल 50 दिनों के मिशन पर, नौसेना प्रमुख बोले- सहयोग ही रास्ता

IOS Sagar Mission
Raksha Rajya Mantri Flags Off IOS SAGAR from Mumbai

IOS Sagar Mission: भारतीय नौसेना का ऑफशोर पेट्रोल वेसल आईएनएस सुनयना अब “आईओएस सागर” के रूप में एक खास अंतरराष्ट्रीय मिशन पर रवाना हो गया है। इस मिशन को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड से हरी झंडी दिखाई गई। इस मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा कि दुनिया में बढ़ते तनाव और समुद्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच देशों के बीच सहयोग बेहद जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र अब सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र बनता जा रहा है।

इस मिशन की खास बात यह है कि इसमें भारत के साथ-साथ 16 मित्र देशों के नौसैनिक भी जहाज पर सवार हैं। सभी देशों के प्रतिनिधि एक साथ मिलकर इस पूरे अभियान में हिस्सा लेंगे। (IOS Sagar Mission)

IOS Sagar Mission: आईओएस सागर का दूसरा संस्करण

नौसेना प्रमुख ने कहा कि यह उनके लिए गर्व का क्षण है कि आईओएस सागर के दूसरे संस्करण को हरी झंडी दिखाई जा रही है। उन्होंने कहा कि भारत का विजन साफ है, हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना और अपनी क्षमताओं का उपयोग सभी के हित में करना है।

उन्होंने प्रधानमंत्री के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की सोच हमेशा से यह रही है कि क्षेत्र में मिलकर काम किया जाए और साझा समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित और स्थिर बनाया जाए। नौसेना प्रमुख ने कहा कि इसी सोच के तहत भारत लगातार क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा दे रहा है और आईओएस सागर उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

“बदल रहे वैश्विक हालात, असर सबसे पहले समुद्र में”

अपने संबोधन में एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां हालात तेजी से बदल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन बदलावों का असर सबसे पहले समुद्र में देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होरमुज जलडमरूमध्य में आई रुकावटों ने पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है।

नौसेना प्रमुख के अनुसार अब समुद्र में प्रतिस्पर्धा सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रही। यह अब रेयर अर्थ मिनरल, क्रिटिकल मिनरल, नए फिशिंग एरिया और डेटा जैसे संसाधनों तक फैल चुकी है। (IOS Sagar Mission)

समुद्री अपराध और अवैध गतिविधियां बड़ी चुनौती

नौसेना प्रमुख ने यह भी कहा कि समुद्र में अवैध गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। पायरेसी, हथियारबंद लूट और ड्रग्स तस्करी जैसे खतरे अब ज्यादा जटिल हो गए हैं। नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले साल हिंद महासागर क्षेत्र में करीब 3700 समुद्री घटनाएं दर्ज की गईं। वहीं 2025 में ड्रग्स की जब्ती एक अरब डॉलर से ज्यादा रही।

उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक अब नॉन-स्टेट एक्टर्स तक भी पहुंच रही है, जिससे इन खतरों से निपटना और चुनौतीपूर्ण हो गया है।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि ऐसे समय में 16 देशों का एक साथ आना और इस मिशन में हिस्सा लेना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब अलग-अलग देश अपने संसाधन, अनुभव और क्षमता साझा करते हैं, तो इससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत होती है। यह पहल न सिर्फ हिंद महासागर क्षेत्र बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। उन्होंने इसे एक ऐसा मंच बताया जहां सहयोग, विश्वास और साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा रहा है।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि इस मिशन में शामिल सभी लोग एक तरह से पूरे क्षेत्र के 2.7 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह मिशन सिर्फ एक नौसैनिक अभियान नहीं है, बल्कि साझा जिम्मेदारी और सहयोग का प्रतीक है, जो हिंद महासागर क्षेत्र को सुरक्षित और स्थिर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

IOS Sagar Mission

मिशन करीब 50 दिनों तक चलेगा

आईओएस सागर मिशन को हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए शुरू किया गया है। यह मिशन करीब 50 दिनों तक चलेगा और इस दौरान जहाज दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों का दौरा करेगा। इस जहाज पर अलग-अलग देशों के नौसैनिक मौजूद हैं, जो एक साथ ट्रेनिंग लेंगे और समुद्र में एक्सरसाइज करेंगे। इस दौरान संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण और आपसी संवाद के जरिए देशों के बीच तालमेल बेहतर होगा और एक-दूसरे की कार्यशैली को समझने का मौका मिलेगा। (IOS Sagar Mission)

किन-किन देशों में जाएगा जहाज

आईओएस सागर अपने मिशन के दौरान कई महत्वपूर्ण देशों के बंदरगाहों पर जाएगा। जहाज श्रीलंका के कोलंबो, थाईलैंड के फुकेट, इंडोनेशिया के जकार्ता, सिंगापुर, बांग्लादेश के चटगांव, म्यांमार के यांगून और मालदीव के माले जैसे स्थानों पर पहुंचेगा। इसके बाद यह मिशन कोच्चि में समाप्त होगा। हर पड़ाव पर नौसैनिकों के बीच प्रशिक्षण, चर्चा और अभ्यास कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। (IOS Sagar Mission)

कोच्चि में मिली ट्रेनिंग का होगा इस्तेमाल

इस मिशन में शामिल विदेशी नौसैनिकों ने पहले कोच्चि में ट्रेनिंग ली है। अब वे उसी ट्रेनिंग का उपयोग समुद्र में करेंगे। जहाज पर किए जाने वाले अभ्यास से यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक साथ कैसे काम कर सकती हैं। इससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन करना आसान होगा। (IOS Sagar Mission)

सेना में भ्रष्टाचार के आरोप! लेफ्टिनेंट कर्नल की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सीबीआई, कैग और केंद्र को भेजा नोटिस

Army corruption case
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Army corruption case: भारतीय सेना से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई, केंद्र सरकार और सीएजी को नोटिस जारी किया है। यह याचिका एक लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारा दाखिल की गई है, जिसमें उन्होंने सेना के अंदर कथित भ्रष्टाचार की जांच की मांग की है।

Army corruption case: कोर्ट ने मांगा जवाब, अगली सुनवाई तय

इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रतीक जैन कर रहे हैं। कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों से चार हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी। अदालत के आदेश में कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने सीबीआई जांच और कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की मांग की है।

सेना अधिकारी ने लगाए ये आरोप

याचिका लेफ्टिनेंट कर्नल सुमित श्योराण की तरफ से दाखिल की गई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जब वह नई दिल्ली में तैनात थे, तब उन्होंने खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ियां देखीं।

उनके मुताबिक, यह मामला “एनुअल कंटिन्जेंट ग्रांट” यानी एसीजी से जुड़ा है, जिसके तहत जरूरी सामान खरीदा जाता है।

याचिका में कहा गया है कि खरीद प्रक्रिया में हेरफेर किया गया, रिकॉर्ड में गलत जानकारी दी गई और सरकारी सामान का गलत इस्तेमाल किया गया। आरोप यह भी है कि कुछ सामान को अधिकारियों के मेस का बताकर दिखाया गया, ताकि जांच से बचा जा सके। (Army corruption case)

शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप

लेफ्टिनेंट कर्नल ने दावा किया है कि उन्होंने सितंबर 2024 से लगातार इस मामले में शिकायतें दीं। उन्होंने अपने आरोपों के साथ दस्तावेज भी जमा किए और कुछ अधिकारियों की इस मामले में भूमिका होने की भी जानकारी दी।

इसके बावजूद किसी भी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। याचिका में कहा गया है कि शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, जिससे कथित गड़बड़ियां जारी रहीं और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी बनी रही।

उन्होंने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की गई, वही सिस्टम के अंदर जांच की जिम्मेदारी में थे।

साइबर घुसपैठ का भी दावा

याचिका में अफसर ने एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। अधिकारी का कहना है कि उनके कंप्यूटर सिस्टम को बिना अनुमति एक्सेस किया गया। इसे उन्होंने एक तरह की टारगेटेड साइबर घुसपैठ बताया है, जिससे उनके पास मौजूद जानकारी तक पहुंचने की कोशिश की गई।

सीबीआई ने नहीं दर्ज की एफआईआर

लेफ्टिनेंट कर्नल ने जनवरी 2025 में सीबीआई को भी इस मामले की विस्तृत शिकायत दी थी। उनका कहना है कि इतनी गंभीर शिकायत के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसी वजह से उन्होंने अदालत का रुख किया और कोर्ट से जांच की निगरानी करने की मांग की। (Army corruption case)

शिकायत के बाद बनाया दबाव

याचिका में यह भी कहा गया है कि शिकायत करने के बाद उन्हें दबाव का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, उनकी परफॉर्मेंस रिपोर्ट खराब की गई और उनका ट्रांसफर नागपुर कर दिया गया। इसे उन्होंने कार्रवाई से बचने के लिए उठाया गया कदम बताया है।

पेशे से वकील और पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल मुकुल देव ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा, इस मामले की गहराई से जांच होना बेहद जरूरी है। अधिकारी द्वारा उठाए गए मुद्दे काफी गंभीर हैं और इनकी जांच किसी बाहरी एजेंसी से कराई जानी चाहिए। पहली नजर में ऐसा लगता है कि बड़े स्तर पर गड़बड़ियां हुई हैं, जिनमें वरिष्ठ रैंक के अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने लिखा, सवाल यह उठता है कि जब छोटे अधिकारियों पर छोटी-छोटी बातों पर कोर्ट मार्शल हो जाता है, तो वरिष्ठ अधिकारियों को कानून से बाहर क्यों रखा जाए। जवाबदेही तय होना जरूरी है। उन्होंने आगे लिखा कि शिकायत करने वाले अधिकारी को लगातार परेशान किया जा रहा है और बार-बार उनका तबादला किया जा रहा है, ताकि जांच से बचा जा सके। अब समय आ गया है कि सेना जैसी प्रतिष्ठित संस्था अपने अंदर की कमियों को ठीक करे। (Army corruption case)

डिफेंस एक्सपोर्ट में बंपर उछाल! 38,000 करोड़ पार, सरकार ने खर्च किया पूरा बजट

India defence exports 2026

India defence exports 2026: वित्तीय वर्ष 2025-26 भारतीय डिफेंस सेक्टर के लिए शानदार साबित हुआ है। एक तरफ जहां देश का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, वहीं दूसरी तरफ रक्षा मंत्रालय ने अपने पूंजीगत बजट का लगभग पूरा इस्तेमाल भी कर लिया है।

India defence exports 2026: रक्षा निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड

वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। पिछले साल यह आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपये था। यानी एक ही साल में करीब 62.66 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रकम के हिसाब से देखें तो लगभग 14,800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निर्यात हुआ है।

इस बढ़ोतरी में सरकारी और निजी दोनों सेक्टर की अहम भूमिका रही है। रक्षा सार्वजनिक उपक्रम यानी डीपीएसयू ने कुल निर्यात में करीब 54.84 प्रतिशत योगदान दिया, जबकि निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 45.16 प्रतिशत रही।

सरकारी कंपनियों का निर्यात खास तौर पर तेजी से बढ़ा है। डीपीएसयू का निर्यात पिछले साल के मुकाबले 151 प्रतिशत बढ़ गया, जबकि निजी कंपनियों ने भी करीब 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की।

अगर रकम की बात करें तो निजी कंपनियों ने करीब 17,353 करोड़ रुपये का निर्यात किया, जबकि डीपीएसयू का योगदान 21,071 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल यह आंकड़ा काफी कम था, जिससे साफ है कि इस बार बड़ी छलांग लगी है। (India defence exports 2026)

80 से ज्यादा देशों को हुआ निर्यात

भारत अब सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए भी रक्षा उपकरण बना रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत अब 80 से ज्यादा देशों को रक्षा सामान निर्यात कर रहा है।

इनमें अलग-अलग तरह के सिस्टम, सब-सिस्टम, पार्ट्स और उपकरण शामिल हैं। सिर्फ निर्यात ही नहीं, बल्कि निर्यात करने वाली कंपनियों की संख्या भी बढ़ी है। पिछले साल जहां 128 एक्सपोर्टर थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 145 हो गई है। यानी करीब 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। (India defence exports 2026)

पांच साल में तीन गुना बढ़ा निर्यात

अगर पिछले पांच साल का आंकड़ा देखें तो भारत का रक्षा निर्यात करीब तीन गुना तक बढ़ चुका है। यह बढ़ोतरी अचानक नहीं हुई, बल्कि लगातार किए गए प्रयासों का नतीजा है। सरकार ने रक्षा निर्यात से जुड़े नियमों को आसान बनाया है, ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू की है और कंपनियों को ज्यादा मौके दिए हैं। इसके चलते अब भारतीय रक्षा उद्योग अब ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनता जा रहा है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि भारत अब धीरे-धीरे एक ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सफलता देश की नीतियों और उद्योगों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है। (India defence exports 2026)

रक्षा मंत्रालय ने पूरा किया पूंजीगत बजट

डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़ने के साथ रक्षा मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में अपने पूंजीगत बजट का पूरा इस्तेमाल कर लिया है। इस साल डिफेंस सर्विसेज के लिए करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत बजट रखा गया था, जिसे पूरी तरह खर्च कर दिया गया।

यह लगातार दूसरा साल है जब मंत्रालय ने पूरा बजट उपयोग किया है। कुल मिलाकर रक्षा मंत्रालय का कुल बजट उपयोग करीब 99.62 प्रतिशत रहा। (India defence exports 2026)

किन चीजों पर हुआ सबसे ज्यादा खर्च

इस बजट का बड़ा हिस्सा सेना के आधुनिकीकरण पर खर्च किया गया। इसमें खास तौर पर शामिल हैं: हवाई प्लेटफॉर्म जैसे एयरक्राफ्ट और एयरो इंजन पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ। इसके बाद जमीन से जुड़े सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरण, हथियार, जहाज निर्माण और एविएशन स्टोर्स पर भी बड़ा निवेश किया गया।

इन खर्चों का मकसद सेना की ऑपरेशनल क्षमता को बेहतर बनाना और आधुनिक तकनीक को शामिल करना रहा। (India defence exports 2026)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

बजट में बढ़ोतरी का एक कारण हाल के ऑपरेशन भी रहे हैं। खास तौर पर ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त फंड दिया गया। पहले पूंजीगत खर्च के लिए 1.80 लाख करोड़ रुपये तय किए गए थे, जिसे बाद में बढ़ाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये किया गया।

बड़े स्तर पर हुई रक्षा खरीद

इस साल रक्षा मंत्रालय ने बड़ी संख्या में नई परियोजनाओं को मंजूरी दी। कुल 109 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिनकी कुल कीमत करीब 6.81 लाख करोड़ रुपये है। इसके अलावा 503 डिफेंस प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट साइन किए गए, जिनकी कुल कीमत 2.28 लाख करोड़ रुपये रही। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है। (India defence exports 2026)

सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी असर

रक्षा बजट का असर सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं है। इसका एक हिस्सा सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार पर भी खर्च किया गया। इससे सड़कों, बेस और अन्य सुविधाओं का विकास हुआ, जिससे सेना की तैनाती और संचालन आसान हो सके।

वहीं, वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा मंत्रालय को पूंजीगत मद में करीब 2.19 लाख करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 22 प्रतिशत ज्यादा है। (India defence exports 2026)

Exclusive: ऑपरेशन सिंदूर से मिला बड़ा सबक! स्वार्म ड्रोन से निपटने के लिए सेना खरीदेगी नेक्स्ट जनरेशन एयर डिफेंस गन

ADG NG Air Defence Gun RFI

ADG NG Air Defence Gun RFI: ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेते हुए भारतीय सेना अब बड़ी तैयारी कर रही है। सेना की एयर डिफेंस क्षमता को और मजबूत करने के लिए सेना की एयर डिफेंस विंग ने नई पीढ़ी की एयर डिफेंस गन यानी एडीजी-एनजी की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब युद्ध के मैदान में ड्रोन, स्वार्म ड्रोन, क्रूज मिसाइल और प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन जैसे नए खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं।

सेना का मानना है कि पारंपरिक फाइटर जेट या हेलीकॉप्टर के मुकाबले दुश्मन अब बड़े प्लेटफॉर्म की बजाय छोटे और सस्ते हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। ड्रोन के जरिए निगरानी के साथ-साथ हमले भी किए जा रहे हैं। कई बार एक साथ कई ड्रोन यानी स्वार्म अटैक किए जाते हैं, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में एक ऐसी गन सिस्टम की जरूरत महसूस की गई है जो कम लागत में इन खतरों को तुरंत खत्म कर सके।

ADG NG Air Defence Gun RFI: ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

आरएफआई में ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि पश्चिमी मोर्चे पर दुश्मन ने ड्रोन और स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया था। इन हमलों में सिविल और डिफेंस ठिकानों को निशाना बनाया गया।

इन बदलते खतरों को देखते हुए अब एक नई पीढ़ी की गन सिस्टम की जरूरत महसूस की जा रही है। यह सिस्टम समय रहते टारगेट को पहचान सके, उसे ट्रैक कर सके और कम लागत में उसे खत्म कर सके, ताकि महत्वपूर्ण ठिकानों को किसी भी बड़े नुकसान से बचाया जा सके।

इसी वजह से सेना अब ऐसी गन सिस्टम चाहती है जो कम समय में ज्यादा टारगेट को ट्रैक और न्यूट्रलाइज कर सके। एडीजी-एनजी को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

कैसे काम करेगी यह गन

आर्मी एयर डिफेंस का काम होता है कि वह युद्ध क्षेत्र और पीछे के इलाकों में मौजूद महत्वपूर्ण ठिकानों की हर मौसम में सुरक्षा करे। इन ठिकानों को दुश्मन के हवाई हमलों से बचाना इसकी जिम्मेदारी होती है।

नई एयर डिफेंस गन को व्हीकल पर भी लगाया जा सकेगा या फिर इसे खींचकर भी ले जाया जा सकेगा। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे यह खुद ही टारगेट को पहचानकर उस पर हमला कर सकेगी।

यह सिस्टम अलग-अलग तरह के खतरों को निशाना बना सकेगा। इसमें फाइटर एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, रिमोट पायलटेड एयरक्राफ्ट, क्रूज मिसाइल और प्रिसीजन गाइडेड हथियार शामिल हैं।

नई एयर डिफेंस गन को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि यह कई तरह के हवाई खतरों को एक साथ संभाल सके। इसमें फिक्स्ड विंग एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और रॉकेट-आर्टिलरी-मोर्टार जैसे हथियार शामिल हैं।

इसका मुख्य काम होगा तेजी से टारगेट को पहचानना, उसे ट्रैक करना और सही समय पर सटीक फायर करके खत्म करना। खास बात यह है कि यह सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स के खिलाफ भी प्रभावी होगा, जो अक्सर रडार से बच निकलते हैं। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

क्या होंगी तकनीकी खूबियां

इस गन की मारक क्षमता कम से कम 4 किलोमीटर या उससे ज्यादा रखी गई है। यह 500 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से आने वाले टारगेट को भी निशाना बना सकेगी। फायरिंग स्पीड कम से कम 300 राउंड प्रति मिनट होगी, जिससे कम समय में ज्यादा फायर किया जा सकेगा। इसकी प्रभावी ऊंचाई 2500 मीटर या उससे ज्यादा होगी। इसमें छोटे टारगेट जैसे माइक्रो एयरक्राफ्ट, पैरा मोटर, पैराग्लाइडर और छोटे ड्रोन भी शामिल किए गए हैं।

इसमें इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी आधुनिक होगा। इसमें प्रोग्रामेबल और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज वाले राउंड होंगे, जो टारगेट के पास पहुंचकर खुद ही फट सकते हैं। इसके अलावा सामान्य हाई एक्सप्लोसिव राउंड और ट्रेनिंग अम्यूनिशन भी शामिल होंगे।

गन में ऑटोमैटिक लोडिंग सिस्टम होगा, जिससे फायरिंग के दौरान समय की बचत होगी। कम क्रू के साथ इसे ऑपरेट किया जा सकेगा और दो लोग भी इसे रीलोड कर पाएंगे।

पावर और सिस्टम इंटीग्रेशन

गन में अपना पावर सिस्टम होगा, जिसमें जनरेटर और बैटरी दोनों शामिल होंगे। बैटरी के जरिए साइलेंट ऑपरेशन भी किया जा सकेगा, जिससे दुश्मन को इसकी लोकेशन का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा।

यह सिस्टम मॉड्यूलर होगा, यानी जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव किया जा सकेगा। साथ ही इसे मौजूदा रडार और नेविगेशन सिस्टम के साथ भी जोड़ा जा सकेगा। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम

इस गन की सबसे बड़ी ताकत इसका इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम होगा। इसमें डे और नाइट दोनों में काम करने की क्षमता होगी। कैमरा, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर की मदद से यह दूर के टारगेट को भी पहचान सकेगा।

अगर किसी कारण से इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हो जाए, तब भी इसे मैनुअल ओपन साइट के जरिए चलाया जा सकेगा। इसका मतलब है कि खराब हालात में भी यह पूरी तरह बंद नहीं होगी। इस सिस्टम में रिकॉर्डिंग की सुविधा भी होगी, जिससे ऑपरेशन का डेटा बाद में देखा जा सकेगा। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

हर इलाके में काम करने की क्षमता

सेना चाहती है कि यह गन हर तरह के इलाके में काम कर सके। चाहे ऊंचे पहाड़ी इलाके हों, रेगिस्तान हो या सामान्य मैदान, यह हर जगह तैनात की जा सके। मैदानी इलाकों में इसकी मूवमेंट स्पीड करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है, जबकि पहाड़ों में 30 किलोमीटर प्रति घंटा और ऑफ रोड में 20 किलोमीटर प्रति घंटा की क्षमता होगी।

यह सिस्टम -30 डिग्री से लेकर +55 डिग्री तक के तापमान में काम करने के लिए तैयार किया जाएगा। साथ ही इसे समुद्र तल से 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से यह भी जानकारी मांगी है कि उनका सिस्टम अलग-अलग टारगेट को कितनी दूरी से पहचान सकता है। इसमें छोटे ड्रोन से लेकर हेलीकॉप्टर और फाइटर जेट तक शामिल हैं।

इसके लिए खास तौर पर DJI Mavic Pro 3 ड्रोन, चीता हेलीकॉप्टर और राफेल जैसे फाइटर जेट को उदाहरण के तौर पर लिया गया है। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

फील्ड ट्रायल भारत में ही

सेना इस सिस्टम को खरीदने के लिए टू-बिड सिस्टम अपनाएगी। पहले टेक्निकल मूल्यांकन होगा और उसके बाद कमर्शियल बिड खोली जाएगी। फील्ड ट्रायल भारत में ही किए जाएंगे, जहां अलग-अलग परिस्थितियों में इसकी क्षमता को परखा जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में स्वदेशी हिस्सेदारी पर खास जोर दिया गया है। कम से कम 50 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट जरूरी रखा गया है, यानी इसका बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में सरकारी और निजी दोनों सेक्टर की कंपनियों के लिए मौका खुला है। रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली कई कंपनियां इसमें हिस्सा ले सकती हैं। उन्हें अपनी तकनीकी क्षमता, उत्पादन क्षमता और सपोर्ट सिस्टम की जानकारी देनी होगी।

सेना ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि वे कितनी जल्दी उत्पादन कर सकती हैं और कितनी संख्या में गन सप्लाई कर सकती हैं।

प्री-सबमिशन मीटिंग अप्रैल के मध्य में रखी गई है, जहां कंपनियों को अपनी शंकाएं दूर करने का मौका मिलेगा। रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों को 11 जून तक अपना जवाब जमा करने के लिए कहा है। इसके बाद आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल की थीं ये एयर डिफेंस गन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने बड़े स्तर पर ड्रोन हमलों का सामना किया। पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान ने 600 से ज्यादा छोटे ड्रोन और स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल किया, जिनका मकसद निगरानी करना और सैन्य ठिकानों पर हमला करना था। इन खतरों से निपटने के लिए आर्मी एयर डिफेंस ने मल्टी-लेयर सिस्टम अपनाया, जिसमें गन और मिसाइल दोनों का इस्तेमाल हुआ।

इस ऑपरेशन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल बोफोर्स एल-70 40 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन का हुआ। यह गन अपग्रेडेड सिस्टम के साथ थी, जिसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज अम्यूनिशन शामिल था। इसकी फायरिंग स्पीड 300 राउंड प्रति मिनट से ज्यादा है और इसने कई ड्रोन मार गिराए।

इसके अलावा जेडयू-23-2 ट्विन बैरल गन का भी इस्तेमाल किया गया। यह हल्की और तेज फायरिंग वाली गन है, जो छोटे ड्रोन को गिराने में काफी कारगर साबित हुई। वहीं कुछ जगहों पर व्हीकल माउंटेड जेडयू-23-4 शिल्का गन सिस्टम भी तैनात किया गया था, जो तेजी से मूव कर सकता है।

इन गन्स के साथ मिसाइल सिस्टम जैसे पिचोरा और ओसा-का भी इस्तेमाल हुए, जबकि सभी सिस्टम को एक साथ जोड़ने के लिए आधुनिक कमांड और कंट्रोल नेटवर्क का सहारा लिया गया। ऑपरेशन के दौरान इन गन्स ने बड़ी संख्या में ड्रोन को गिराकर महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा की। (ADG NG Air Defence Gun RFI)

तेजस एमके-1ए की डिलीवरी पर बड़ा फैसला जल्द, IAF और HAL की हाई-लेवल रिव्यू मीटिंग इसी महीने

Tejas Mk1A delivery delay

Tejas Mk1A delivery delay: स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए की डिलीवरी को लेकर इस महीने एक अहम मोड़ आने वाला है। भारतीय वायुसेना और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच जल्द ही एक बड़ी रिव्यू बैठक होने जा रही है। इस बैठक में यह तय किया जाएगा कि तेजस एमके-1ए आखिर कब तक वायुसेना को सौंपा जा सकेगा।

Tejas Mk1A delivery delay: देरी के बीच अहम समीक्षा बैठक

सूत्रों के मुताबिक, इस रिव्यू मीटिंग में दोनों पक्ष यह देखेंगे कि विमान के जरूरी ऑपरेशनल मानक कितने पूरे हुए हैं। ये वही मानक हैं जिन्हें बिना पूरा किए विमान को सेवा में शामिल नहीं किया जा सकता।

अगर इन जरूरी शर्तों को पूरा कर लिया जाता है, तो अगले दो से तीन महीनों में पहले तेजस एमके-1ए की डिलीवरी हो सकती है। लेकिन अगर इनमें कमी रह जाती है, तो देरी और बढ़ सकती है।

इसलिए यह बैठक सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूरे प्रोग्राम की दिशा तय करने वाली मानी जा रही है।

क्या हैं अनिवार्य ऑपरेशनल जरूरतें

तेजस एमके-1ए को वायुसेना में शामिल करने से पहले कुछ जरूरी तकनीकी और ऑपरेशनल शर्तों को पूरा करना होता है। इन्हें एयर स्टाफ क्वालिटी रिक्वायरमेंट कहा जाता है।

इनमें सबसे अहम मिसाइल फायरिंग ट्रायल का पूरा होना है। इसके अलावा रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का सही तरीके से इंटीग्रेशन भी जरूरी है। विमान में लगे सभी हथियारों के पैकेज का सफल परीक्षण और वैलिडेशन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

पांच तेजस एमके-1ए विमान डिलीवरी के लिए तैयार!

फरवरी 2026 में एचएएल ने बताया था कि पांच तेजस एमके-1ए विमान डिलीवरी के लिए तैयार हैं। इनमें कई जरूरी क्षमताएं शामिल की जा चुकी हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि अभी भी कुछ महत्वपूर्ण क्लीयरेंस बाकी हैं।
इसी वजह से वायुसेना अभी इंतजार की स्थिति में है और अंतिम फैसला इस रिव्यू के बाद ही लिया जाएगा।

इंजन और सिस्टम इंटीग्रेशन की चुनौती

तेजस एमके-1ए की देरी के पीछे कई वजहें रही हैं। सबसे बड़ी समस्या इंजन की सप्लाई में आई देरी रही है। इसके लिए अमेरिकी कंपनी से एफ-404 इंजन आने थे, जो समय पर नहीं मिल सके। इसके अलावा विमान में लगे एडवांस रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के इंटीग्रेशन में भी समय लगा। खासकर एईएसए रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को एक साथ जोड़ना भी मुश्किल प्रक्रिया है। इन सभी तकनीकी चुनौतियों के चलते पूरा प्रोग्राम तय समय से पीछे खिसकता गया।

तेजस एमके-1ए की तकनीकी खूबियां

तेजस एमके-1ए, तेजस के पुराने वर्जन से काफी ज्यादा एडवांस माना जाता है। इसमें कई नए सिस्टम और क्षमताएं जोड़ी गई हैं। इसमें एईएसए रडार लगाया गया है, जो दूर तक टारगेट को ट्रैक कर सकता है। इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट इसे दुश्मन के रडार और मिसाइल से बचाने में मदद करता है।

विमान में आधुनिक हथियार ले जाने की क्षमता है, जिसमें बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल भी शामिल हैं। इसके अलावा इसमें एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड दोनों तरह के मिशन करने की क्षमता है।

इसकी अधिकतम गति करीब मैक 1.6 तक है और यह करीब 50,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। इसमें डिजिटल फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम दिया गया है, जिससे नियंत्रण और स्थिरता बेहतर होती है।

भारतीय वायुसेना इस समय फाइटर स्क्वॉड्रन की कमी से जूझ रही है। जरूरत के मुकाबले उसके पास काफी कम स्क्वॉड्रन हैं, जिससे ऑपरेशनल दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में तेजस एमके-1ए को जल्दी शामिल करना जरूरी माना जा रहा है। यह विमान पुराने हो चुके फाइटर जेट की जगह लेने में अहम भूमिका निभाने वाला है।

हालांकि वायुसेना पहले ही तेजस के शुरुआती वर्जन एमके-1 को शामिल कर चुकी है, लेकिन नए और ज्यादा सक्षम एमके-1ए वर्जन का इंतजार काफी समय से किया जा रहा है।

जब भी कोई नया विमान तैयार होता है, तो उसे सीधे सेवा में शामिल नहीं किया जाता। पहले उसकी कई स्तर पर जांच होती है।

फैक्ट्री से निकलने के बाद वायुसेना की तकनीकी टीम उसका निरीक्षण करती है। इसके बाद टेस्ट पायलट उसकी उड़ान भरते हैं और अलग-अलग परिस्थितियों में उसकी क्षमता को परखते हैं।

हर टेस्ट के बाद रिपोर्ट तैयार की जाती है। अगर कोई कमी सामने आती है, तो उसे ठीक करने के लिए वापस निर्माता को भेजा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया समय लेने वाली होती है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित होता है कि विमान पूरी तरह भरोसेमंद हो।

भारतीय सेना में बड़ा फेरबदल, धीरज सेठ बने उप-सेना प्रमुख, सदर्न, ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड को मिले नए चीफ

Indian Army reshuffle 2026
From Left to Right: LT GEN DHIRAJ SETH, LT GEN SANDEEP JAIN, LT GEN VMB KRISHNAN and LT GEN PUSHPENDRA PAL SINGH

Indian Army reshuffle 2026: भारतीय सेना में एक अप्रैल को कई बड़े फेरबदल हुए हैं। इन बदलावों के तहत सेना के कई महत्वपूर्ण पदों पर नए अधिकारियों की नियुक्ति हुई है। इस फेरबदल में सबसे अहम बदलाव यह रहा कि लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ नए वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ बन गए हैं। इसके साथ ही सदर्न, ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड में भी नए कमांडर तैनात किए गए हैं। यह बदलाव सेना की ऑपरेशनल तैयारी और लीडरशिप सिस्टम के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।

Indian Army reshuffle 2026: वाइस चीफ बने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ

सेना में इस समय वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने एक अप्रैल को वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ यानी वीसीओएएस का पद संभाला है। वे इससे पहले सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग थे। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ नेशनल डिफेंस एकेडमी, खड़कवासला के पूर्व छात्र रहे हैं और दिसंबर 1986 में आर्मर्ड कोर में कमीशन हुए थे। करीब चार दशक के लंबे करियर में उन्होंने अलग-अलग तरह के ऑपरेशनल क्षेत्रों में काम किया है।

उन्होंने रेगिस्तान इलाके में आर्मर्ड रेजिमेंट की कमान संभाली, इसके बाद एक आर्मर्ड ब्रिगेड का नेतृत्व किया और जम्मू-कश्मीर में काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स की कमान भी संभाली। बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बनने के बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र कोर की कमान संभाली और दिल्ली एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में भी काम किया।

Indian Army reshuffle 2026
LT GEN DHIRAJ SETH

उन्हें दो बड़ी ऑपरेशनल कमांड संभालने का भी अनुभव है। वे साउथ वेस्टर्न कमांड और सदर्न कमांड दोनों के कमांडर रह चुके हैं। वे उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्हें दो अलग-अलग कमांड संभालने का मौका मिला। माना जा रहा है कि मौजूदा आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी के 30 जून को रिटायर होने के बाद वे अगले आर्मी चीफ का पदभार संभालेंगे। वहीं उनकी जगह पर ईस्टर्न कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहित मल्होत्रा नए वीसीओएस बनेंगे। (Indian Army reshuffle 2026)

लेफ्टिनेंट जनरल सेठ के पास लंबा रणनीतिक और प्रशासनिक अनुभव

लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने सिर्फ फील्ड कमांड ही नहीं संभाली, बल्कि कई अहम स्टाफ और रणनीतिक पदों पर भी काम किया है। वे आर्मी हेडक्वार्टर में असिस्टेंट मिलिट्री सेक्रेटरी रहे और साउथ वेस्टर्न कमांड में ऑपरेशंस से जुड़े पदों पर भी रहे।

इसके अलावा उन्होंने यूनाइटेड नेशंस मिशन इन अंगोला में ऑपरेशंस ऑफिसर के तौर पर भी काम किया। आर्मी में कैपेबिलिटी डेवलपमेंट और लॉन्ग टर्म प्लानिंग से जुड़े कई पदों पर रहकर उन्होंने आधुनिकीकरण योजनाओं में योगदान दिया।

ट्रेनिंग के दौरान भी उनका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। उन्होंने जूनियर कमांड कोर्स में टॉप किया और डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में बेस्ट ऑल राउंड स्टूडेंट ऑफिसर का मेडल हासिल किया।

उनके कार्यकाल के दौरान सेना ने कई बड़े और अहम सैन्य अभ्यास किए, जिनका मकसद भविष्य के युद्ध के लिए तैयारी को मजबूत करना था।

इनमें सबसे प्रमुख था एक्सरसाइज अमोघ ज्वाला, जो हाल ही में झांसी के बबीना फायरिंग रेंज में हुई थी। इसमें सेना ने ड्रोन, अटैक हेलीकॉप्टर, फाइटर एयरक्राफ्ट और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके युद्ध की नई रणनीतियों का अभ्यास किया। माना जा रहा है कि आर्मर्ड कोर में डेडिकेटेड ड्रोन प्लाटून शौर्य स्क्वाड्रन बनाने के पीछे उनकी ही अहम रणनीति है।

वहीं राजस्थान के रेगिस्तान में एक्सरसाइज मरु ज्वाला और अखंड प्रहार का आयोजन उनके ही कार्यकाल में हुआ, जहां सैनिकों ने कठिन हालात में ऑपरेशन करने की क्षमता को परखा। पोखरण में एक्सरसाइज रुद्र शक्ति के दौरान लाइव फायरिंग के साथ मैकेनाइज्ड फोर्स, आर्टिलरी और आर्मी एविएशन की जॉइंट एक्सरसाइज हुई।

इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबसे बड़ी ट्राई सर्विसेस एक्सरसाइज त्रिशूल का आयोजन भी उनके नेतृत्व में सदर्न कमांड ने किया था, जिसमें थल, जल और वायु सेना ने मिलकर काम किया। इन सभी अभ्यासों में लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने खुद समीक्षा की और सैनिकों की तैयारियों को परखा। (Indian Army reshuffle 2026)

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने संभाली सदर्न कमांड की कमान

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने पुणे स्थित सदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाल लिया है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ की जगह यह जिम्मेदारी ली है। वे इससे पहले सदर्न कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर तैनात थे। लेफ्टिनेंट जनरल जैन इससे पहले अंबाला स्थित सेकंड कोर, जिसे खड़गा कोर भी कहा जाता है, की कमान संभाल चुके हैं। यह सेना की पश्चिमी मोर्चे पर तैनात सबसे अहम स्ट्राइक फॉर्मेशन में से एक मानी जाती है।

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LT GEN SANDEEP JAIN

वे भी नेशनल डिफेंस एकेडमी से प्रशिक्षित हैं और जून 1988 में महार रेजिमेंट में कमीशन हुए थे। अपने करियर में उन्होंने अलग-अलग ऑपरेशनल क्षेत्रों में काम किया है। वे देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए) के 52वें कमांडेंट के पद पर भी रह चुके हैं। लेफ्टिनेंट जनरल जैन दिसंबर 2022 से दिसंबर 2023 तक जम्मू के नागरोटा में तैनात व्हाइट नाइट कॉर्प्स के जनरल ऑफिसर कमांडिंग भी रह चुके हैं।

उन्होंने एक इन्फैंट्री बटालियन महार रेजिमेंट की कमान संभाली और संयुक्त राष्ट्र मिशन साउथ सूडान में भी सेवा दी। इसके अलावा उन्होंने स्ट्राइक कोर में इन्फैंट्री ब्रिगेड और नॉर्दर्न कमांड में पिवट कोर का नेतृत्व किया।

वे ऑपरेशन पवन का भी हिस्सा रहे हैं और लाइन ऑफ कंट्रोल तथा नॉर्थ ईस्ट में कई बार काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में तैनात रहे हैं।

सदर्न कमांड का कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने वार मेमोरियल पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि कमांड अपने सभी क्षेत्रों में ऑपरेशनल तैयारी पर ध्यान बनाए रखेगी। (Indian Army reshuffle 2026)

ईस्टर्न कमांड की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन को

लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने ईस्टर्न कमांड के नए कमांडर के तौर पर जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी की जगह ली है, जो 31 मार्च को रिटायर हुए। लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन
डोगरा रेजिमेंट से हैं। वे इससे पहले सेना में क्वार्टरमास्टर जनरल (QMG) के पद पर तैनात थे।

Indian Army reshuffle 2026
LIEUTENANT GENERAL VMB KRISHNAN

वे जून 1988 में सेना में शामिल हुए थे और उनके पास करीब चार दशक का अनुभव है। उन्होंने सियाचिन जैसे कठिन हाई-एल्टीट्यूड इलाके में इन्फैंट्री बटालियन और ब्रिगेड की कमान संभाली है।

इसके अलावा वे 28 इन्फैंट्री डिवीजन (वज्र डिवीजन), जम्मू-कश्मीर और ब्रह्मास्त्र कोर (माउंटेन स्ट्राइक कोर) के कमांडर भी रह चुके हैं। आर्मी हेडक्वार्टर में उन्होंने डायरेक्टर जनरल इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के रूप में काम किया और लंदन में डिफेंस अटैची के पद पर भी रह चुके हैं। (Indian Army reshuffle 2026)

वेस्टर्न कमांड की कमान लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह को

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह ने वेस्टर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाल लिया है। इससे पहले वे वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ के पद पर थे। वे पैराशूट रेजिमेंट स्पेशल फोर्सेज के अधिकारी रहे हैं और दिसंबर 1987 में सेना में कमीशन हुए थे। उन्होंने अपने करियर में नॉर्दर्न और वेस्टर्न सीमाओं पर कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं।

Indian Army reshuffle 2026
LT GEN PUSHPENDRA PAL SINGH

उन्होंने ऑपरेशन पवन में हिस्सा लिया और लाइन ऑफ कंट्रोल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी कई बार तैनात रहे हैं। इससे पहले वे डायरेक्टर जनरल ऑपरेशनल लॉजिस्टिक्स के पद पर भी रह चुके हैं, जहां उन्होंने सेना की लॉजिस्टिक क्षमता को मजबूत करने का काम किया।

कमांड संभालने के बाद उन्होंने ऑपरेशनल तैयारी बनाए रखने, नई तकनीक अपनाने और सैनिकों के मनोबल पर ध्यान देने की बात कही। (Indian Army reshuffle 2026)