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राफेल का सोर्स कोड देने से फ्रांस ने किया फिर इनकार, तकनीक को बताया बेहद संवेदनशील

Rafale Source Code India

Rafale Source Code India: भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जा रहे राफेल लड़ाकू विमानों को लेकर फ्रांस ने साफ कर दिया है कि वह भारत को राफेल फाइटर जेट के अहम सोर्स कोड तक पहुंच नहीं देगा। यह जानकारी फ्रांस के बिजनेस आउटलेट L’Essentiel de l’Éco ने अपनी एक रिपोर्ट में दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस ने खास तौर पर तीन अहम सिस्टम्स के सोर्स कोड देने से इनकार किया है। इनमें राफेल का एडवांस एईएसए रडार, मिशन कंप्यूटर सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट शामिल हैं।

इन सिस्टम्स को किसी भी फाइटर जेट का “दिमाग” माना जाता है। यही सिस्टम तय करते हैं कि विमान कैसे दुश्मन को पहचानता है, कैसे प्रतिक्रिया देता है और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में खुद को कैसे सुरक्षित रखता है।

फ्रांस का कहना है कि ये तकनीक बेहद संवेदनशील है और इसे कई सालों की मेहनत से तैयार किया गया है, इसलिए इसे साझा नहीं किया जा सकता।

Rafale Source Code India: क्या होता है सोर्स कोड और क्यों है जरूरी

सोर्स कोड किसी भी सिस्टम का वह मूल सॉफ्टवेयर होता है, जिसके जरिए वह पूरे जहाज को कंट्रोल करता है। अगर किसी देश के पास इसका एक्सेस होता है, तो वह सिस्टम में अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव कर सकता है।

लेकिन अगर सोर्स कोड नहीं मिलता, तो हर बदलाव के लिए मूल निर्माता कंपनी या देश पर निर्भर रहना पड़ता है। राफेल के मामले में इसका मतलब यह होगा कि भारत को हर बड़े बदलाव के लिए फ्रांस की मंजूरी लेनी होगी।

स्वदेशी हथियार जोड़ने में आ सकती है दिक्कत

इस फैसले का असर भारत के अपने हथियार सिस्टम पर भी पड़ सकता है। भारत लंबे समय से अपने स्वदेशी हथियार जैसे अस्त्र मिसाइल या ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की कोशिश कर रहा है।

लेकिन अगर राफेल के सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल नहीं होगा, तो ऐसे हथियारों को सीधे जोड़ना आसान नहीं होगा। इसके लिए बार-बार फ्रांसीसी कंपनियों से अनुमति और तकनीकी सहयोग लेना पड़ेगा। (Rafale Source Code India)

बड़े राफेल सौदे पर भी असर

यह मुद्दा उस समय सामने आया है जब भारत 114 नए रफाल फाइटर जेट खरीदने की योजना पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट को मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम कहा जाता है।

इस संभावित डील की कीमत काफी बड़ी बताई जा रही है और इसमें राफेल भी एक प्रमुख विकल्प माना जा रहा है। लेकिन सोर्स कोड न मिलने की स्थिति में भारत के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है।

2016 में भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल विमान का सौदा हुआ था। यह सौदा तत्काल जरूरतों को देखते हुए किया गया था। लेकिन इसमें भी सोर्स कोड एक्सेस का विकल्प शामिल नहीं था। यानी भारत को विमान तो मिले, लेकिन उसके सभी सिस्टम पर पूरा नियंत्रण नहीं मिला। (Rafale Source Code India)

ऑपरेशन के दौरान क्या असर पड़ सकता है

अगर किसी विमान के सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल नहीं होता है, तो युद्ध के समय तेजी से बदलाव करना मुश्किल हो सकता है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे मामलों में, जहां हर सेकंड की अहमियत होती है।

रडार की सेटिंग बदलना, जामिंग सिस्टम को अपडेट करना या नए खतरे के हिसाब से प्रतिक्रिया देना, ये सभी काम सॉफ्टवेयर पर निर्भर होते हैं। ऐसे में बार-बार फ्रांस की मंजूरी लेने से समय लग सकता है।

हालांकि फ्रांस का यह रुख पूरी तरह अलग नहीं है। दुनिया के कई देश अपनी संवेदनशील तकनीक और सॉफ्टवेयर को साझा करने से बचते हैं। इसका मकसद अपनी तकनीकी बढ़त बनाए रखना और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करना होता है।

पूरा सोर्स कोड नहीं, API मॉडल की पेशकश

इससे पहले खबरें आई थीं कि फ्रांस की तरफ से एक बीच का रास्ता भी सामने आया है, जिसे एपीआई यानी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस कहा जाता है। इस मॉडल में भारत को पूरा सोर्स कोड नहीं मिलेगा, लेकिन इतना एक्सेस दिया जाएगा कि वह अपने सिस्टम और हथियार जोड़ सके। इसे आसान भाषा में “प्लग एंड प्ले” तरीका कहा जा सकता है। इसमें जेट के असली सॉफ्टवेयर को छुए बिना नए हथियार या सिस्टम जोड़े जाते हैं। यानी भारत सीधे सॉफ्टवेयर में बदलाव नहीं करेगा, बल्कि एक इंटरफेस के जरिए काम करेगा। (Rafale Source Code India)

नेटवर्क वॉरफेयर है समय की जरूरत

राफेल जैसे आधुनिक विमान नेटवर्क आधारित युद्ध का हिस्सा होते हैं। इसमें अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर काम करते हैं और रियल टाइम में जानकारी साझा करते हैं। इसे नेट-सेंट्रिक वारफेयर कहा जाता है। इसमें सॉफ्टवेयर और डेटा लिंक की भूमिका बहुत अहम होती है। भारत चाहता है कि उसके विमान भारतीय और विदेशी दोनों तरह के सिस्टम के साथ आसानी से काम कर सकें।

बता दें कि भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट की नई डील को लेकर चर्चा चल रही है। 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी – एओएन दी जा चुकी है। यह डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। इसके साथ ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन भी पहले ही तय किए जा चुके हैं। 114 राफेल में से 18 राफेल सीधे फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में 2030 तक आएंगे, जबकि बाकी बचे 90-96 राफेल मेक इन इंडिया के तहत भारत में असेंबल या निर्मित होंगे। भारत में बने राफेल की डिलीवरी 2031-2032 से शुरू हो सकती है। (Rafale Source Code India)

तेजस एमके-1ए और ट्रेनर जेट एचटीटी-40 की डिलीवरी क्यों अटकी? HAL ने बताई वजह

Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay

Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay: स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए और बेसिक ट्रेनर जेट एचटीटी-40 की डिलीवरी को लेकर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने कहा कि इन दोनों प्रोजेक्ट्स में देरी की बड़ी वजह सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याएं हैं। एचएएल के अनुसार, ज्यो-पॉलिटिक्स दिक्कतों और तकनीकी चुनौतियों के चलते ये दिक्कतें हुईं, जिससे जरूरी उपकरण और इंजन समय पर नहीं मिल सके।

Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay: तेजस एमके-1ए: बार-बार बदला डिलीवरी शेड्यूल

तेजस एमके-1ए भारतीय वायुसेना के लिए तैयार किया जा रहा आधुनिक हल्का लड़ाकू विमान है। पहले इसकी डिलीवरी मार्च 2024 तक करने का लक्ष्य रखा गया था। उस समय योजना यह थी कि इसके बाद लगातार विमान वायुसेना को मिलते रहेंगे।

लेकिन ऐसा नहीं हो सका। समय के साथ इसका शेड्यूल बदलता गया। पहले इसे 2024 के आखिर तक खिसकाया गया, फिर 2025 के आखिर तक कुछ विमानों की डिलीवरी देने का नया लक्ष्य रखा गया। बाद में एचएएल ने कहा कि मार्च 2026 तक पांच विमानों की डिलीवरी कर देगी।

इस देरी की सबसे बड़ी वजह जीई एयरोस्पेस से एफ-404 इंजन की सप्लाई में रुकावट रही। विमान के लिए जरूरी इंजन समय पर नहीं पहुंच पाए, जिससे तैयार एयरफ्रेम भी आगे नहीं बढ़ सके। इसके अलावा विमान के सिस्टम को पूरी तरह जोड़ने और टेस्ट करने में भी समय लगा। वायुसेना इन विमानों को पूरी तरह तैयार स्थिति में ही लेना चाहती है, इसलिए अधूरी तैयारी के साथ डिलीवरी नहीं हो पाई।

एचएएल के पास तेजस मार्क-1ए के कुल 180 विमानों के ऑर्डर हैं। ये ऑर्डर दो बड़े चरणों में दिए गए हैं। इसमें 83 विमान पहले चरण के हैं और 97 विमान दूसरे चरण के। इनमें सिंगल सीटर फाइटर और ट्विन सीटर ट्रेनर दोनों शामिल हैं।

पहला ऑर्डर फरवरी 2021 में रक्षा मंत्रालय ने एचएएल के साथ लगभग 48,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट दिया था। इस डील में 83 तेजस एमके-वन-ए विमान शामिल थे, जिनमें 73 सिंगल सीटर फाइटर और 10 ट्विन सीटर ट्रेनर विमान थे।

वहीं, दूसरा 62,370 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर 25 सितंबर 2025 को साइन हुआ। इसमें 97 तेजस एमके-वन-1ए विमान शामिल हैं, जिनमें 68 सिंगल सीटर फाइटर और 29 ट्विन सीटर ट्रेनर हैं।

एचएएल ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए बेंगलुरु और नासिक में असेंबली लाइनें तैयार की हैं। कंपनी का लक्ष्य सालाना 16 से 24 विमान बनाने का है। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

एचटीटी-40: ट्रेनर विमान डिलीवरी में हुई देरी

एचटीटी-40 एक बेसिक ट्रेनर विमान है, जिसका इस्तेमाल नए पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए शुरुआत में 2025 सितंबर तक ज्यादा संख्या में विमान देने का लक्ष्य तय किया गया था।

लेकिन इसकी डिलीवरी भी समय से पीछे चली गई। हनीवेल कंपनी से इंजन मिलने में समस्या आई। दिसंबर 2025 में लक्ष्य घटाकर सिर्फ तीन विमान कर दिया गया। इंजन की पहली खेप सितंबर 2025 में आने वाली थी, जो जनवरी 2026 तक टल गई। कंपनी ने उत्पादन लाइन तेज करने की कोशिश की, लेकिन उत्पादन की तैयारी होने के बावजूद जरूरी पार्ट्स की कमी ने काम की रफ्तार को धीमा कर दिया।

एचएएल के पास एचटीटी-40 के कुल 70 विमानों का फर्म ऑर्डर है। इसके अलावा 38 और विमानों का विकल्प भी रखा गया है। रक्षा मंत्रालय ने मार्च 2023 में एचएएल के साथ यह कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। अनुबंध की कुल कीमत लगभग 6,828 करोड़ रुपये है। इसमें विमान के साथ जरूरी उपकरण, सिमुलेटर और प्रशिक्षण सामग्री भी शामिल है। डिलीवरी छह साल के अंदर पूरी करने की योजना थी।

वायुसेना को बेसिक ट्रेनर विमानों की जरूरत है। पुराने एचपीटी-32 दीपक ट्रेनर 2014 में सर्विस से बाहर हो गए थे। उसके बाद 75 पिलाटस पीसी-7 एमके-टू ट्रेनर आयात किए गए। लेकिन स्वदेशी विकल्प की जरूरत महसूस होने पर एचटीटी-40 प्रोजेक्ट को बढ़ावा दिया गया। एचएएल ने 2016 में इसका पहला प्रोटोटाइप उड़ाया। उसके बाद अक्टूबर 2022 और मार्च 2023 में अंतिम अनुबंध तय हुआ। इस विमान में हनीवेल का टीपीई331-12बी टर्बोप्रॉप इंजन लगा है।

क्या है सप्लाई चेन की समस्या

एयरोस्पेस सेक्टर में किसी भी विमान को बनाने के लिए कई तरह के पार्ट्स और सिस्टम अलग-अलग जगहों से मंगाए जाते हैं। इनमें इंजन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और कई अहम कंपोनेंट शामिल होते हैं।

अगर इनमें से कोई एक भी हिस्सा समय पर नहीं मिलता, तो पूरा उत्पादन रुक जाता है। एचएएल ने बताया कि तेजस और एचटीटी-40 के साथ भी यही हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और तकनीकी दिक्कतों के कारण सप्लाई में रुकावट आई, जिसका सीधा असर डिलीवरी पर पड़ा। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

दूसरे प्रोडक्ट्स ने संभाली स्थिति

इन दोनों प्रोजेक्ट्स में देरी के बावजूद एचएएल ने अपने दूसरे प्रोडक्ट्स की डिलीवरी तेज कर दी। कंपनी ने एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, एएल-31 एफपी इंजन, आरडी-33 इंजन और अन्य सेवाओं की सप्लाई बढ़ाई।

इन प्रोडक्ट्स की वजह से कंपनी की कुल आय पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। यानी जहां एक तरफ तेजस और एचटीटी-40 की डिलीवरी धीमी रही, वहीं बाकी काम तेजी से चलता रहा, जिससे कंपनी का प्रदर्शन संतुलित बना रहा।

एचएएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डीके सुनील ने कहा कि कंपनी ने मुश्किल हालात में भी अपना काम जारी रखा। उनके मुताबिक, वैश्विक तनाव, संघर्ष और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद कंपनी ने स्थिर ग्रोथ बनाए रखी।

उन्होंने यह भी बताया कि पिछले एक साल में कंपनी ने अपने ऑर्डर बढ़ाए और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत किया।

इन चुनौतियों के बावजूद एचएएल का वित्तीय प्रदर्शन मजबूत रहा। वित्तीय वर्ष 2025-26 में कंपनी का कुल रेवेन्यू बढ़कर 32,250 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल यह 30,981 करोड़ रुपये था।

यह बढ़ोतरी इसलिए संभव हो सकी क्योंकि कंपनी ने दूसरे प्रोडक्ट्स और सेवाओं की डिलीवरी तेज कर दी थी। इससे कुल आय और मुनाफा संतुलित बना रहा। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

ऑर्डर बुक करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये

31 मार्च तक एचएएल की ऑर्डर बुक करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इससे पहले यह 1.89 लाख करोड़ रुपये थी। इस बढ़ोतरी में रक्षा मंत्रालय के साथ हुए बड़े समझौते शामिल हैं। इनमें तेजस एमके-वन-ए विमान के लिए बड़ा ऑर्डर भी शामिल है। इसके अलावा हेलीकॉप्टर और अन्य एयरक्राफ्ट के ऑर्डर भी कंपनी को मिले हैं। (Tejas Mk1A-HTT-40 delivery delay)

अब पहाड़ों में नहीं बनेंगे रडार शैडो जोन! भारतीय वायुसेना हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में तैनात करेगी स्वदेशी माउंटेन रडार

IAF Mountain Radar India

IAF Mountain Radar India: भारतीय वायुसेना की निगरानी क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ करीब 1,950 करोड़ रुपये का समझौता किया है, जिसके तहत दो नए माउंटेन रडार खरीदे जाएंगे। इन रडार का मकसद उन इलाकों में निगरानी बढ़ाना है जहां अब तक नजर रखना मुश्किल रहा है।

यह डील पूरी तरह स्वदेशी श्रेणी के तहत की गई है, यानी इन रडार को भारत में ही डिजाइन, डेवलप और मैन्युफैक्चर किया जाएगा। इनका डिजाइन डीआरडीओ के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट ने तैयार किया है, जबकि निर्माण का जिम्मा बीईएल को दिया गया है।

IAF Mountain Radar India: कहां लगाए जाएंगे नए रडार

इन दोनों रडार को देश के दो बेहद संवेदनशील इलाकों में तैनात करने की योजना है। पहला जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग क्षेत्र में लगाया जाएगा, जबकि दूसरा नागालैंड के फुत्सेरो इलाके में तैनात किया जाएगा। ये दोनों स्थान ऐसे हैं जहां पहाड़ी इलाके और गहरी घाटियां मौजूद हैं, जिससे निगरानी करना काफी मुश्किल होता है।

इन क्षेत्रों में लंबे समय से यह समस्या रही है कि आम रडार हर दिशा में सही तरीके से काम नहीं कर पाते। पहाड़ों की ऊंची-नीची बनावट के चलते कई जगहों पर “रडार शैडो जोन” बन जाते हैं, यानी ऐसे हिस्से जहां रडार की नजर नहीं पहुंच पाती।

क्या होती है रडार शैडो की समस्या

पहाड़ी इलाकों में निगरानी करना मैदानों की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। जब रडार किसी ऊंचे पहाड़ के पीछे के हिस्से को नहीं देख पाता, तो वहां एक तरह का ब्लाइंड स्पॉट बन जाता है। इसी को रडार शैडो कहा जाता है।

इसका फायदा दुश्मन उठा सकता है। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले फाइटर जेट, ड्रोन या क्रूज मिसाइल ऐसे इलाकों का इस्तेमाल करके बिना पकड़े आगे बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि इन इलाकों में अतिरिक्त और खास तरह के रडार की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

नए रडार कैसे करेंगे मदद

ये नए माउंटेन रडार खास तौर पर पहाड़ी इलाकों के लिए बनाए गए हैं। इन्हें ऐसे स्थानों पर लगाया जाएगा जहां से वे घाटियों और पहाड़ों के बीच छिपे हिस्सों को भी कवर कर सकें। इनकी खासियत यह है कि ये छोटे आकार वाले टारगेट्स जैसे छोटे ड्रोन या कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को भी ट्रैक कर सकते हैं।

इन रडार को आगे की पोजिशन पर तैनात किया जाएगा, ताकि दुश्मन की गतिविधियों का पहले ही पता लगाया जा सके। साथ ही ये लगातार निगरानी बनाए रखने में सक्षम होंगे, जिससे किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।

एयर डिफेंस सिस्टम का होंगे हिस्सा

भारतीय वायुसेना पहले से ही एक मजबूत सर्विलांस नेटवर्क का इस्तेमाल करती है। इसमें अलग-अलग तरह के रडार, हवाई चेतावनी सिस्टम, एयरोस्टैट और स्पेस बेस्ड इनपुट शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर एक पूरा एयर पिक्चर तैयार करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि आसमान में क्या गतिविधि चल रही है।

नए माउंटेन रडार भी इसी नेटवर्क का हिस्सा होंगे। इन्हें इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा जाएगा। इस सिस्टम के जरिए अलग-अलग जगहों से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर रीयल टाइम में स्थिति का आकलन किया जाता है। (IAF Mountain Radar India)

मौजूदा रडार सिस्टम के साथ तालमेल

भारतीय वायुसेना के पास पहले से कई तरह के रडार सिस्टम मौजूद हैं। इनमें रोहिणी मीडियम रेंज रडार शामिल है, जो मध्यम दूरी तक निगरानी कर सकता है। इसके अलावा अरुद्र रडार है, जिसकी रेंज काफी ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक नजर रख सकता है।

अश्विनी लो लेवल रडार भी इस्तेमाल किया जाता है, जो कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को पकड़ने में सक्षम है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में इन रडार की क्षमता सीमित हो जाती है। ऐसे में नए माउंटेन रडार इन सिस्टम्स के बीच की कमी को पूरा करेंगे और एक बेहतर कवरेज देंगे। (IAF Mountain Radar India)

ड्रोन और मिसाइल से बढ़ी चुनौती

हाल के युद्धों में यह साफ देखा गया है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और प्रिसीजन गाइडेड हथियार एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ये छोटे आकार के होते हैं और कई बार पारंपरिक रडार से बच निकलते हैं।

पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन युद्ध में इस तरह के हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। इससे यह समझ आया है कि केवल लंबी दूरी के रडार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि हर स्तर पर निगरानी जरूरी है।

इस पूरे प्रोजेक्ट की एक खास बात यह भी है कि यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। रडार का डिजाइन देश में तैयार किया गया है और इसका निर्माण भी भारतीय कंपनी द्वारा ही किया जाएगा।

इन रडार के साथ जरूरी उपकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जाएगा, ताकि इन्हें सीमावर्ती इलाकों में आसानी से ऑपरेट किया जा सके। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां काफी कठिन होती हैं, इसलिए इन सिस्टम को उसी हिसाब से डिजाइन किया गया है।

रडार के इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग के बाद यह लगातार काम करते हुए सीमाओं पर नजर रखेंगे। इनके जरिए वायुसेना को समय पर जानकारी मिलेगी, जिससे जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। (IAF Mountain Radar India)

भारतीय नौसेना को डिलीवर हुआ माहे क्लास का दूसरा जहाज INS Malwan, उथले समुद्र में दुश्मन पनडुब्बियों का करेगा शिकार

INS Malwan
INS Malwan

INS Malwan: भारतीय नौसेना को एक और स्वदेशी युद्धपोत मिला है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में तैयार किया गया माहे क्लास कैटेगरी का एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस मालवान नौसेना को सौंपा गया। इस कैटेगरी के आठ जहाज बनाए जाने हैं, जिनमें यह दूसरा जहाज है, जिसे खास तौर पर समुद्र के उथले इलाकों में पनडुब्बियों से निपटने के लिए तैयार किया गया है।

यह जहाज पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है और इसे नौसेना की जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया है।

INS Malwan: ‘मालवान’ नाम के पीछे की कहानी

इस जहाज का नाम महाराष्ट्र के एतिहासिक तटीय शहर मालवान के नाम पर रखा गया है। यह इलाका छत्रपति शिवाजी महाराज की समुद्री ताकत और रणनीति से जुड़ा रहा है। समुद्र में उनकी मजबूत पकड़ और किलों के नेटवर्क के कारण मालवान का खास महत्व रहा है।

इसके साथ ही यह नाम भारतीय नौसेना के पुराने जहाज आईएनएस मालवान की परंपरा को भी आगे बढ़ाता है, जो पहले माइंसवीपर के रूप में सर्विस में था और 2003 तक नौसेना का हिस्सा रहा। इस तरह पुराने गौरवशाली नामों को नए जहाजों में जीवित रखने की परंपरा जारी रखी गई है। (INS Malwan)

किस तरह का जहाज है ‘मालवान’

‘मालवान’ को एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट कहा जाता है। इसका मतलब है कि यह जहाज खास तौर पर समुद्र के कम गहराई वाले हिस्सों में काम करने के लिए बनाया गया है, जहां पनडुब्बियों का पता लगाना मुश्किल होता है।

इसकी लंबाई करीब 78 मीटर के आसपास है, जबकि चौड़ाई लगभग 11.3 से 11.36 मीटर तक है। जहाज का ड्रॉट यानी पानी में डूबने की गहराई अधिकतम 2.7 मीटर है, जिससे यह उथले पानी में भी आसानी से ऑपरेशन कर सकता है। इसका कुल वजन करीब 900 से 1100 टन के बीच है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह तेजी से मूव कर सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सके।

यह जहाज अधिकतम 25 नॉट्स की रफ्तार से चल सकता है, जो समुद्र में तेज गति मानी जाती है। अगर इसे सामान्य गति यानी 14 नॉट्स पर चलाया जाए, तो यह करीब 1800 नॉटिकल मील तक बिना रुके सफर कर सकता है। इसमें कुल 57 लोग तैनात रहते हैं, जिनमें 7 अधिकारी और 50 नाविक शामिल होते हैं।

इस जहाज में तीन डीजल इंजन लगे हैं, जो वॉटरजेट प्रोपल्शन सिस्टम के जरिए इसे आगे बढ़ाते हैं। इसका मतलब यह है कि जहाज पानी को पीछे की ओर तेजी से फेंककर आगे बढ़ता है, जिससे इसकी दिशा बदलने की क्षमता बेहतर होती है और यह कम आवाज के साथ चलता है। यही वजह है कि दुश्मन पनडुब्बियों के लिए इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा इसमें स्टीथ और सिग्नेचर रिडक्शन तकनीक भी दी गई है, जिससे यह रडार और सोनार पर आसानी से नजर नहीं आता। (INS Malwan)

पनडुब्बियों से मुकाबले की खास तैयारी

इस जहाज की सबसे बड़ी खासियत इसकी पनडुब्बी रोधी क्षमता है। इसमें ऐसे आधुनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो पानी के नीचे छिपे दुश्मन का पता लगाने में मदद करते हैं।

इसमें अभय हल-माउंटेड सोनार लगाया गया है, जो पानी के अंदर छिपे टारगेट्स का पता लगाने में मदद करता है। इसके साथ ही लो फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार भी है, जिसे पानी में नीचे उतारकर गहराई में मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाया जा सकता है।

जहाज के हथियारों की बात करें तो ‘मालवान’ को खास तौर पर पनडुब्बियों से लड़ने के लिए तैयार किया गया है। इसमें आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर लगाया गया है, जो दुश्मन पनडुब्बियों पर रॉकेट से हमला करता है। इसके अलावा इसमें दो ट्रिपल लाइटवेट टॉरपीडो लॉन्चर हैं, जिनसे कुल छह टॉरपीडो दागे जा सकते हैं। ये टॉरपीडो खास तौर पर उथले पानी में पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं।

इसके अलावा सतह पर मौजूद खतरों से निपटने के लिए इसमें 30 मिलीमीटर की नेवल सरफेस गन लगाई गई है, जो नजदीकी लक्ष्य पर हमला करने के काम आती है। इसके अलावा दो 12.7 मिलीमीटर की रिमोट कंट्रोल गन भी हैं, जिन्हें दूर से ऑपरेट किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तेज फायरिंग की जा सकती है। (INS Malwan)

कई तरह के ऑपरेशन में काम आने वाला जहाज

‘मालवान’ सिर्फ पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए ही नहीं, बल्कि कई अन्य ऑपरेशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह जहाज पानी के नीचे निगरानी करने के अलावा लो इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशंस में भी काम आता है।

जहाज में माइन बिछाने की भी क्षमता है, जिससे समुद्र में दुश्मन के रास्ते को रोका जा सकता है। जरूरत पड़ने पर माइन वॉरफेयर यानी समुद्र में बिछे खतरों से निपटने का काम भी किया जा सकता है। साथ ही टॉरपीडो डिकॉय लॉन्चर भी लगाए गए हैं, जो दुश्मन के टॉरपीडो को भ्रमित कर जहाज को सुरक्षित रखते हैं। इसके जरिए समुद्र में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

तटीय सुरक्षा और गश्त के दौरान यह जहाज लगातार निगरानी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे किसी भी खतरे का समय रहते पता लगाया जा सके। (INS Malwan)

आधुनिक तकनीक से लैस

मालवान में आधुनिक रडार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं, जो समुद्र में दूर तक निगरानी कर सकते हैं। इनकी मदद से जहाज आसपास की गतिविधियों पर नजर रख सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई कर सकता है।

ऑपरेशन को आसान और प्रभावी बनाए रखने के लिए जहाज के अंदर कई ऑटोमेटेड सिस्टम भी लगाए गए हैं, जिससे जहाज पर काम करने वाले क्रू को भी बेहतर सहायता मिलती है।

‘मालवान’ की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। जहाज पर लगे कई उपकरण और सिस्टम भारत में ही विकसित किए गए हैं। (INS Malwan)

क्या है माहे क्लास

यह जहाज माहे क्लास का हिस्सा है। इस क्लास के तहत कुल आठ जहाज बनाए जा रहे हैं, जिन्हें कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड, कोच्चि में तैयार किया जा रहा है। ‘मालवान’ इस पूरी सीरीज का दूसरा जहाज है। ‘माहे’ इस सीरीज का पहला यानी लीड शिप माना जाता है। इसे अक्टूबर 2025 में नौसेना को सौंपा गया था और बाद में नवंबर 2025 में इसे औपचारिक तौर पर नौसेना में शामिल किया गया। (INS Malwan)

इस पूरे प्रोजेक्ट के तहत कुल 16 ऐसे जहाज बनाए जा रहे हैं। इनमें से आठ कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड बना रहा है, जिन्हें माहे क्लास कहा जाता है, जबकि बाकी आठ जहाज कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स बना रही है, जिन्हें अर्णाला क्लास के नाम से जाना जाता है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत अप्रैल 2019 में हुई थी, जब रक्षा मंत्रालय ने इन जहाजों के निर्माण का अनुबंध किया था। इसके बाद अलग-अलग चरणों में इन जहाजों का निर्माण और लॉन्चिंग शुरू हुई।

इस कैटेगरी के जहाजों का मुख्य काम तटीय इलाकों में निगरानी रखना, पानी के नीचे होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर पनडुब्बियों को निशाना बनाना होता है। इसके अलावा ये जहाज लो इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशन, सर्च एंड रेस्क्यू और माइन वॉरफेयर जैसे कामों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। (INS Malwan)

दुश्मनों पर नजर रखने आया ‘शाची’, भारतीय नौसेना को मिला नया दमदार नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल

Shachi Offshore Patrol Vessel NGOPV
Shachi Offshore Patrol Vessel NGOPV

Shachi Offshore Patrol Vessel: गोवा शिपयार्ड लिमिटेड ने पहले नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल ‘शाची’ को आज नौसेना को डिलीवर किया। इस जहाज को यार्ड 1280 के नाम से तैयार किया गया है और यह कुल 11 ऐसे जहाजों की सीरीज का पहला प्लेटफॉर्म है। लॉन्चिंग के दौरान पारंपरिक तरीके से जहाज को पानी में उतारा गया, जिसे नौसेना में एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।

इस मौके पर डिप्टी चीफ ऑफ नेवल स्टाफ वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने इसे एक ऐतिहासिक क्षण बताया और कहा कि यह नए क्लास के युद्धपोत की शुरुआत है, जो भारत की समुद्री क्षमता को नए स्तर पर ले जाएगा।

उन्होंने कहा कि यह जहाज कई सालों की योजना, डिजाइन और मेहनत का परिणाम है और इससे भारतीय नौसेना की भूमिका हिंद महासागर क्षेत्र और उससे आगे भी और मजबूत होगी।

Shachi Offshore Patrol Vessel: ‘शाची’ नाम का क्या है मतलब

इस जहाज का नाम ‘शाची’ रखा गया है, जो भारतीय पौराणिक परंपरा से लिया गया है। इस नाम का अर्थ होता है सहायता देने वाली। नौसेना के अनुसार, यह नाम जहाज की भूमिका के मुताबिक है, क्योंकि ऐसे जहाज कई तरह के मिशन में मददगार होते हैं।

जहाज के प्रतीक चिन्ह में उर्सा मेजर नक्षत्र और लाल-सफेद लाइटहाउस दिखाया गया है। यह समुद्र में मार्गदर्शन और सुरक्षा का संकेत देता है।

दो शिपयार्ड में बन रहे हैं जहाज

नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (NGOPV) प्रोजेक्ट के तहत कुल 11 जहाज बनाए जा रहे हैं। इनका निर्माण गोवा और कोलकाता, दोनों जगहों पर एक साथ किया जा रहा है। गोवा शिपयार्ड लिमिटेड और कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स मिलकर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहे हैं। दो शिपयार्डों में बनाने का मकसद यह है कि इससे जहाजों की डिलीवरी समय पर हो सके और नौसेना को जल्दी नई क्षमता मिल सके। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

क्या काम करेंगे यह जहाज

ये नए ऑफशोर पेट्रोल वेसल कई तरह के काम के लिए तैयार किए गए हैं। इनका इस्तेमाल समुद्र में निगरानी करने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के लिए किया जाएगा।

इसके अलावा ये जहाज सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में भी काम आएंगे, जहां समुद्र में फंसे लोगों को बचाने की जरूरत होती है। समुद्री इलाकों में मौजूद ऑयल रिग्स और अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों की सुरक्षा में भी इनकी भूमिका होगी।

इन जहाजों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ यानी एचएडीआर ऑपरेशन में भी इस्तेमाल हो सकें। प्राकृतिक आपदा के समय राहत सामग्री पहुंचाने और बचाव कार्य करने में ये काफी मददगार होते हैं। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

शाची में क्या हैं खूबियां

‘शाची’ जैसे जहाज पुराने ऑफशोर पेट्रोल वेसल की तुलना में ज्यादा आधुनिक हैं। इसमें नए तरह के सिस्टम लगाए गए हैं, जिससे इसकी ऑपरेशन क्षमता बेहतर हुई है। इसमें एडवांस रडार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं, जिससे समुद्र में दूर तक निगरानी की जा सकती है।

जहाज में हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के लिए डेक और हैंगर की सुविधा दी गई है। इससे जरूरत पड़ने पर हवाई मदद भी ली जा सकती है। यह जहाज लंबे समय तक समुद्र में रहकर काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इन्हें इस तरह बनाया गया है कि ये तटीय इलाकों से लेकर गहरे समुद्र तक आसानी से ऑपरेशन कर सकें।

इस जहाज का डिजाइन और निर्माण भारत में ही किया गया है। इसमें बड़ी मात्रा में स्वदेशी तकनीक और सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

नौसेना के लिए क्यों है अहम

भारतीय नौसेना पहले से ही ऑफशोर पेट्रोल वेसल का इस्तेमाल करती रही है, लेकिन अब नए जहाजों के आने से उसकी क्षमता और बढ़ेगी। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए ऐसे जहाजों की जरूरत महसूस की जा रही थी।

इस मौके पर भारतीय नौसेना के वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने कहा कि नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल जैसे प्लेटफॉर्म को नौसेना में शामिल करना जरूरी कदम है, जिससे वर्तमान और उभरती चुनौतियों के लिए तैयार रहा जा सके। यह पहल आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान की सोच को मजबूत करती है और यह भी दिखाती है कि भारत अब जटिल नौसैनिक प्लेटफॉर्म को खुद डिजाइन और तैयार करने की क्षमता हासिल कर चुका है।

उन्होंने आगे कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र और उससे आगे के भू-राजनीतिक माहौल को आकार देने में भारतीय नौसेना की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हाल के वैश्विक घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि एक मजबूत नौसेना कितनी जरूरी है। बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और संघर्षों के बीच भारतीय नौसेना देश की समुद्री शक्ति का प्रमुख प्रतीक बनी हुई है और कूटनीति व क्षेत्रीय स्थिरता में भी अहम भूमिका निभा रही है। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की क्षमता

इन जहाजों को मल्टी-डोमेन ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। ये एक साथ कई तरह के मिशन को अंजाम दे सकता हैं। इस तरह के प्लेटफॉर्म आधुनिक जरूरतों के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं, ताकि अलग-अलग परिस्थितियों में उनका उपयोग किया जा सके। (Shachi Offshore Patrol Vessel)

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में न्याय की धीमी रफ्तार, 11 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग

Armed Forces Tribunal pending cases

Armed Forces Tribunal pending cases: देश की अदालतों की तरह सैनिकों और पूर्व सैनिकों को न्याय देने के लिए बनाया गया आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) भी केसों के बोझ तले दबा है। यहां पेंडिंग मामलों की संख्या हजारों में पहुंच गई है और कई जगहों पर जरूरी पद खाली होने के चलते मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है।

रक्षा मंत्रालय ने 30 मार्च को राज्यसभा में जानकारी दी कि पिछले पांच साल में एएफटी के सामने कुल 44,622 मामले आए। इनमें से 33,525 मामलों का निपटारा हो चुका है, लेकिन अभी भी 11,097 मामले लंबित हैं। यह कुल मामलों का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।

Armed Forces Tribunal pending cases: क्या है आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल

आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल की स्थापना साल 2007 में एक विशेष कानून के तहत की गई थी। इसका मकसद था कि सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े मामलों का जल्दी और विशेषज्ञ तरीके से निपटारा हो सके।

यह ट्रिब्यूनल उन मामलों को सुनता है जो सैनिकों की भर्ती, नियुक्ति, प्रमोशन, पेंशन, सेवा शर्तों और अनुशासन से जुड़े होते हैं। इसके अलावा कोर्ट मार्शल के फैसलों के खिलाफ अपील भी यहीं की जाती है।

पहले ऐसे मामलों के लिए सैनिकों को हाई कोर्ट या अन्य सिविल अदालतों का सहारा लेना पड़ता था, जहां मामलों में काफी समय लग जाता था। इसी वजह से एएफटी को बनाया गया था ताकि न्याय जल्दी मिल सके।

पांच साल में बढ़े मामलों के आंकड़े

रक्षा मंत्रालय के अनुसार 2021 से लेकर जनवरी 2026 तक लगातार मामले दर्ज होते रहे। इस दौरान कुल 44,622 केस दाखिल हुए। इनमें से 33,525 मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन 11,097 मामले अभी भी बाकी हैं। इसका मतलब यह है कि हर चार में से एक मामला अभी भी पेंडिंग है।

साल के हिसाब से देखें तो पेंडिंग केसों की संख्या में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। 2021 में 3,431 मामले लंबित थे। इसके बाद 2023 में यह संख्या घटकर 534 रह गई थी।

लेकिन इसके बाद फिर बढ़ोतरी हुई और 2025 में लंबित मामलों की संख्या 2,795 तक पहुंच गई। 2026 के शुरुआती महीनों में 406 मामले पेंडिंग बताए गए हैं, हालांकि यह शुरुआत के महीनों का ही आंकड़ा है।

अलग-अलग बेंच में खाली पद बड़ी वजह

एएफटी की सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग बेंच में खाली पदों की है। कई रीजनल बेंच पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं क्योंकि वहां जरूरी सदस्य मौजूद नहीं हैं। श्रीनगर, जबलपुर और गुवाहाटी बेंच में दो-दो पद खाली हैं। इसके अलावा चंडीगढ़, लखनऊ, कोच्चि, चेन्नई और कोलकाता जैसी बेंचों में भी स्टाफ की कमी है।

इसके उलट नई दिल्ली की प्रिंसिपल बेंच पूरी तरह से भरी हुई है, जहां चेयरपर्सन सहित सभी पद मौजूद हैं। एएफटी में दो तरह के सदस्य होते हैं, न्यायिक सदस्य और प्रशासनिक सदस्य। न्यायिक सदस्य आमतौर पर हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं, जबकि प्रशासनिक सदस्य सेना के वरिष्ठ अधिकारी होते हैं। जब इन पदों में कमी होती है तो मामलों की सुनवाई धीमी पड़ जाती है।

सुनवाई में देरी का असर 

केस की सुनवाई समय पर न होने से इसका सीधा असर सैनिकों और उनके परिवारों पर पड़ता है। अधिकतर मामले पेंशन, प्रमोशन, मेडिकल बोर्ड, सेवा शर्तों और कोर्ट मार्शल से जुड़े होते हैं। कई बार सैनिक या उनके परिवार सालों तक फैसले का इंतजार करते रहते हैं। कई मामलों खासकर पेंशन से जुड़े केसों में यह देरी आर्थिक परेशानी भी पैदा करती है। पूर्व सैनिकों के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि रिटायरमेंट के बाद उनकी आय का मुख्य स्रोत पेंशन ही होता है।

देशभर में फैली हैं एएफटी की बेंच

एएफटी की बेंच देश के अलग-अलग हिस्सों में बनाई गई हैं, ताकि सैनिकों को अपने इलाके में ही न्याय मिल सके।
उत्तर भारत में चंडीगढ़ और लखनऊ, पूर्वोत्तर में गुवाहाटी, दक्षिण में चेन्नई और कोच्चि, मध्य भारत में जबलपुर और जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर जैसी जगहों पर बेंच काम करती हैं। इन बेंचों का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि सैनिक देश के अलग-अलग और दूरदराज इलाकों में तैनात रहते हैं। अगर इन बेंचों में स्टाफ की कमी रहती है, तो वहां के सैनिकों को ज्यादा परेशानी होती है।

सरकार ने मानी कमी, लेकिन समयसीमा नहीं बताई

रक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा में यह स्वीकार किया कि कई बेंच में स्टाफ की कमी है और इससे काम प्रभावित हो रहा है। हालांकि, मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि इन खाली पदों को कब तक भरा जाएगा। यही वजह है कि यह मुद्दा अब चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

लगातार बढ़ रहा काम का दबाव

एएफटी पर काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है। हर साल नए मामले दर्ज हो रहे हैं और पुराने मामलों का निपटारा भी करना होता है। हालांकि ट्रिब्यूनल ने बड़ी संख्या में मामलों को निपटाया है, लेकिन फिर भी पेंडिंग मामलों की संख्या काफी ज्यादा बनी हुई है। इससे साफ है कि मौजूदा संसाधनों के साथ सभी मामलों को समय पर निपटाना आसान नहीं है।

रेड कॉरिडोर से विकास के गलियारे तक: कैसे खत्म हुआ 50 साल का नक्सल संकट

Naxalism End in India

Naxalism End in India: भारत सरकार ने औपचारिक तौर पर यह घोषणा कर दी है कि देश में नक्सल समस्या यानी लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म (एलडब्ल्यूई) अब खत्म हो चुकी है। यह वही समस्या थी जिसने करीब पांच दशक तक देश के आदिवासी इलाकों, खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को आतंक के साये में रखा था।

इस आंदोलन की शुरुआत साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी, जहां जमीन और अधिकारों को लेकर एक किसान विद्रोह हुआ था। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक बड़े सशस्त्र संघर्ष में बदल गया, जिसने देश के कई हिस्सों में हिंसा और अस्थिरता पैदा की।

लेकिन अब सरकार का कहना है कि यह समस्या केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नहीं, बल्कि विकास और जनकल्याण योजनाओं के जरिए धीरे-धीरे खत्म की गई है।

Naxalism End in India: सुरक्षा के साथ विकास पर भी बराबर ध्यान

सरकार ने 2014 के बाद अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। पहले नक्सल समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा माना जाता था, लेकिन बाद में इसे विकास की कमी से जुड़ी समस्या के रूप में भी देखा गया।

यही वजह रही कि सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और बैंकिंग सेवाओं को तेजी से बढ़ाया गया। जिन इलाकों में पहले सरकारी पहुंच बेहद कम थी, वहां धीरे-धीरे प्रशासन की मौजूदगी बढ़ाई गई।

जंगलों तक पहुंची स्वास्थ्य सुविधाएं

छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर जैसे इलाकों में लंबे समय तक स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं। लोगों को इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था या फिर पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना पड़ता था।

इस स्थिति को बदलने के लिए जगदलपुर में 240 बेड का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया गया। इसके अलावा बीजापुर और सुकमा में फील्ड हॉस्पिटल तैयार किए गए, जिससे संघर्ष वाले इलाकों में ही इलाज की सुविधा मिल सके।

इनके साथ ही छह और फील्ड हॉस्पिटल को अपग्रेड किया गया। इसका असर यह हुआ कि 2017 के बाद से करीब 67,500 मरीजों का इलाज इन सुविधाओं के जरिए किया गया।

ग्रामीण स्तर पर भी स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत की गई। मितानिन प्रोग्राम के तहत 70,000 से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स को तैयार किया गया, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और आदिवासी समुदाय से थीं।

शहरी क्षेत्रों में महिला आरोग्य समितियों ने भोजन, सफाई और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों पर काम किया। 12,927 हेल्थ कैंप लगाए गए, जिसका फायदा 7.66 लाख से ज्यादा लोगों को मिला।

गांव-गांव तक पहुंचीं बैंकिंग सेवाएं

नक्सल प्रभावित इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या थी। लोग कर्ज के लिए साहूकारों पर निर्भर रहते थे, जो उनका आर्थिक शोषण करते थे।

इस स्थिति को बदलने के लिए पोस्ट ऑफिस और बैंकिंग नेटवर्क का विस्तार किया गया। 6,025 नए पोस्ट ऑफिस खोले गए, जहां बैंकिंग सुविधाएं भी दी जाने लगीं।

इसके अलावा 1,804 बैंक ब्रांच और 1,321 एटीएम शुरू किए गए। सबसे अहम कदम था 75,000 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट्स की नियुक्ति, जो गांव-गांव जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देने लगे। इससे लोगों को बचत, बीमा और सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे मिलने लगा। (Naxalism End in India)

शिक्षा ने बदली तस्वीर

नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा की कमी लंबे समय तक एक बड़ी समस्या रही। कई गांवों में स्कूल ही नहीं थे या बच्चों को पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता था। 2014 के बाद इस दिशा में तेजी से काम किया गया। अब तक 9,303 नए स्कूल बनाए गए। आदिवासी बच्चों के लिए एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल शुरू किए गए, जिनमें से 179 स्कूल अब पूरी तरह से चालू हैं। यहां बच्चों को रहने और पढ़ने दोनों की सुविधा मिलती है।

इसके अलावा 11 केंद्रीय विद्यालय और 6 नवोदय विद्यालय भी शुरू किए गए, जिससे बेहतर शिक्षा की पहुंच बढ़ी।

अब जमीन पर दिखने लगीं सरकारी योजनाएं

पहले जिन इलाकों में सरकारी योजनाएं पहुंच ही नहीं पाती थीं, वहां अब तेजी से काम हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर पाने वाले लोगों की संख्या एक साल में काफी बढ़ी। 2024 में जहां 92,847 लोगों को घर मिले थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,54,045 हो गई।

मनरेगा में भी लोगों की भागीदारी बढ़ी। 2024 में 8.19 लाख लोग जुड़े थे, जो 2025 में बढ़कर 9.87 लाख हो गए। वहीं अब इन इलाकों में प्रशासन की सक्रिय भागीदारी भी बढ़ी है। (Naxalism End in India)

सड़क, मोबाइल और रेल से जुड़े इलाके

नक्सल प्रभावित इलाकों की सबसे बड़ी समस्या थी उनका अलग-थलग होना। इसे खत्म करने के लिए बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया गया। अब तक 17,500 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई गईं। मोबाइल कनेक्टिविटी भी बढ़ाई गई। करीब 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए, जिनमें से 2,343 को 4जी में अपग्रेड किया गया।

रेलवे कनेक्टिविटी भी धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है। दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर रेल लाइन तैयार हो चुकी है। रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर का काम पूरा किया गया है। इसके अलावा दंतेवाड़ा से तेलंगाना के मुनुगुरु तक नई रेल लाइन के लिए सर्वे किया जा रहा है। (Naxalism End in India)

लोकतंत्र में बढ़ी भागीदारी

नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले चुनावों का बहिष्कार आम बात थी। कई जगहों पर लोगों को वोट डालने से रोका जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। बस्तर में 2019 के मुकाबले 2024 में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। इसी तरह कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में भी मतदान में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

बाल विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी काम हुआ है। बालोद जिला पूरी तरह बाल विवाह मुक्त घोषित किया गया। वन अधिकार कानून के तहत आदिवासी परिवारों को जमीन के अधिकार दिए गए, जिससे उनकी भागीदारी और भरोसा बढ़ा। (Naxalism End in India)

दो मोर्चों पर साथ-साथ चला अभियान

इस पूरे बदलाव के पीछे एक बड़ी रणनीति रही, जिसमें सुरक्षा और विकास दोनों को साथ लेकर चला गया। एक तरफ सुरक्षा बलों ने जंगलों में ऑपरेशन चलाए, वहीं दूसरी तरफ गांवों में सड़क, स्कूल, अस्पताल और बैंकिंग जैसी सुविधाएं पहुंचाई गईं। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और सरकारी योजनाओं का असर जमीन पर दिखने लगा। देश के जिन इलाकों को कभी “रेड कॉरिडोर” कहा जाता था, वहां अब प्रशासन, विकास और लोकतंत्र की मौजूदगी साफ नजर आने लगी है। (Naxalism End in India)

स्टेल्थ फ्रिगेट से लेकर एंटी-सबमरीन शिप तक, भारतीय नौसेना को मिले ‘दुनागिरी’, ‘संशोधक’ और ‘अग्रय’

Indian Navy new ships- Delivery of Agray
Delivery of Agray

Indian Navy new ships: भारतीय नौसेना को एक साथ तीन नए स्वदेशी जहाज मिले हैं, जिससे समुद्री सुरक्षा और ऑपरेशनल क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ है। कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान स्टेल्थ फ्रिगेट ‘दुनागिरी’, सर्वे वेसल ‘संशोधक’ और एंटी-सबमरीन वारफेयर शिप ‘अग्रय’ को नौसेना को सौंपे गए।

Indian Navy new ships: स्टेल्थ फ्रिगेट ‘दुनागिरी’ की डिलीवरी

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण ‘दुनागिरी’ रहा, जो प्रोजेक्ट 17ए (Project 17A) के तहत बनने वाला एक एडवांस स्टेल्थ फ्रिगेट है। यह नीलगिरी क्लास का पांचवां जहाज है और इसी श्रेणी का दूसरा जहाज है जिसे जीआरएसई ने बनाया है।

यह जहाज भारतीय नौसेना के पुराने आईएनएस दुनागिरी का नया अवतार माना जा रहा है, जिसने 1977 से 2010 तक करीब 33 साल सेवा दी थी।

Indian Navy new ships- Delivery of Dunagiri
Delivery of Dunagiri

नए दुनागिरी में आधुनिक डिजाइन, कम रडार सिग्नेचर यानी स्टेल्थ क्षमता, बेहतर फायरपावर और ऑटोमेशन सिस्टम दिए गए हैं। इसे इस तरह तैयार किया गया है कि यह समुद्र में अलग-अलग तरह के मिशन आसानी से पूरा कर सके।

इस जहाज में ब्रह्मोस एंटी-शिप मिसाइल, एडवांस रडार सिस्टम और एंटी-सबमरीन हथियार लगाए गए हैं, जिससे यह सतह और पानी के नीचे दोनों तरह के खतरों से निपट सकता है।

दुनागिरी को भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है। इसमें इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे जहाज बनाने का समय कम हुआ है।

इस जहाज में डीजल इंजन और गैस टरबाइन का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल किया गया है, जिसे सीओडीओजी (कम्बाइंड डीजल या गैस) प्रोपल्शन कहा जाता है। इसके साथ ही इसमें इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है, जो जहाज के अलग-अलग सिस्टम को कंट्रोल करता है।

दुनागिरी में करीब 75 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा एमएसएमई कंपनियों ने हिस्सा लिया है। (Indian Navy new ships)

सर्वे वेसल ‘संशोधक’ भी शामिल

दूसरा महत्वपूर्ण जहाज ‘संशोधक’ है, जो एक बड़ा सर्वे वेसल है। यह चार जहाजों की उस सीरीज का आखिरी जहाज है, जिसका कॉन्ट्रैक्ट 2018 में साइन हुआ था। इससे पहले इसी श्रेणी के तीन जहाज नौसेना में शामिल हो चुके हैं।

संशोधक का काम समुद्र के अंदर और तटीय इलाकों का सर्वे करना है। यह जहाज समुद्र की गहराई, रास्तों और नेविगेशन चैनल्स की जानकारी जुटाता है, जिससे जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सके।

Indian Navy new ships- Delivery of Sanshodhak
Delivery of Sanshodhak

यह जहाज ओशनोग्राफिक और जियोफिजिकल डेटा भी जुटाता है, जिसका इस्तेमाल रक्षा और सिविल दोनों क्षेत्रों में होता है। इसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

संशोधक करीब 3400 टन वजनी और 110 मीटर लंबा जहाज है। इसमें आधुनिक हाइड्रोग्राफिक उपकरण लगाए गए हैं, जिसमें डेटा एक्विजिशन सिस्टम, ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल और डिजिटल सोनार सिस्टम शामिल हैं। यह जहाज 18 नॉट्स से ज्यादा की स्पीड से चल सकता है। (Indian Navy new ships)

एंटी-सबमरीन शिप ‘अग्रय’ भी सौंपा

तीसरा जहाज ‘अग्रय’ है, जो अर्नाला क्लास का एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है। यह इस श्रेणी का चौथा जहाज है। इस जहाज को खास तौर पर समुद्र के कम गहराई वाले इलाकों में पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह करीब 77 मीटर लंबा जहाज है और इसे वॉटरजेट प्रोपल्शन से चलाया जाता है।

Indian Navy new ships- Delivery of Agray
Delivery of Agray

अग्रय में लाइटवेट टॉरपीडो, रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सोनार सिस्टम लगाए गए हैं। ये सिस्टम समुद्र के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों को ढूंढने और उन पर हमला करने में मदद करते हैं। यह जहाज तटीय निगरानी और माइन वारफेयर में भी अहम भूमिका निभाता है।

अग्रय भी भारतीय नौसेना के पुराने जहाज का नया रूप है, जिससे परंपरा और तकनीक दोनों का मेल देखने को मिलता है। (Indian Navy new ships)

स्वदेशी निर्माण पर जोर

इन तीनों जहाजों में एक बात समान है कि इन्हें स्वदेश में ही बनाया गया है। दुनागिरी में करीब 75 प्रतिशत और संशोधक व अग्रय में 80 प्रतिशत से ज्यादा इंडिजिनस कंटेंट है। इन प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योगों ने हिस्सा लिया, जिससे देश के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिली।

इन जहाजों के निर्माण से हजारों लोगों को रोजगार मिला है। दुनागिरी प्रोजेक्ट में ही करीब 4000 लोगों को सीधे और 10,000 से ज्यादा लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिला। इसके अलावा शिपबिल्डिंग से जुड़े सप्लाई चेन नेटवर्क को भी मजबूती मिली है। (Indian Navy new ships)

Explainer: रूस-फ्रांस-अमेरिका और इजरायल से क्यों दूरी बना रहा भारत? क्या है देश का नया मिलिट्री डिप्लोमेसी प्लान?

India Defence Attache Reshuffle
File Photo: ADGPI

India Defence Attache Reshuffle: भारत ने अपनी मिलिट्री डिप्लोमेसी में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसका सीधा असर कई देशों में देखने को मिलेगा। संसदीय समिति को सरकार ने बताया कि भारत अब विदेश में तैनात अपने डिफेंस अटैची नेटवर्क में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है। अब भारत उन देशों में अपनी मौजूदगी कम कर रहा है, जहां से वह लंबे समय से हथियार खरीदता रहा है। वहीं, नई रणनीति के तहत उन देशों पर ध्यान बढ़ा रहा है जहां भारतीय हथियारों के खरीदार मौजूद हैं। यह बदलाव चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है और इसका मकसद रक्षा निर्यात को बढ़ाना है।

India Defence Attache Reshuffle: क्या होता है डिफेंस अटैची और क्या है इसकी भूमिका

डिफेंस अटैची किसी भी देश के दूतावास में तैनात एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होता है। उसका काम दो देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना, सैन्य सूचनाओं का आदान-प्रदान करना और रणनीतिक संवाद बनाए रखना होता है।

अब तक इन अधिकारियों की भूमिका मुख्य रूप से उन देशों में ज्यादा महत्वपूर्ण रही है, जहां से भारत हथियार और सैन्य तकनीक खरीदता था। लेकिन अब इस सिस्टम को बदला जा रहा है।

नई नीति के तहत डिफेंस अटैची सिर्फ सैन्य संपर्क अधिकारी नहीं रहेंगे, बल्कि वे भारत के रक्षा उद्योग का प्रतिनिधित्व भी करेंगे। (India Defence Attache Reshuffle)

सीडीएस ने क्यों लिया यह फैसला

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने डिफेंस अटैचियों में किए गए इस बदलाव पर संसदीय रक्षा स्थायी समिति के साथ बातचीत के दौरान चर्चा की। यह वही समिति है, जिसकी हालिया रिपोर्ट पिछले हफ्ते लोकसभा में पेश की गई थी।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने संसदीय रक्षा समिति को बताया कि भारत अब एक एक्सपोर्टर की भूमिका निभाना चाहता है। इसके लिए जरूरी है कि सैन्य कूटनीति का फोकस भी बदला जाए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन देशों से भारत हथियार आयात करता था, वहां बड़ी संख्या में अटैची तैनात थे। अब उन्हें वहां से हटाकर उन देशों में भेजा जा रहा है जहां भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग बनने की संभावना है।

किन देशों में घट रही है तैनाती

इस बदलाव के तहत भारत ने उन देशों में अपनी सैन्य कूटनीतिक मौजूदगी कम करनी शुरू कर दी है, जो लंबे समय से उसके प्रमुख सप्लायर रहे हैं। इनमें रूस, फ्रांस, अमेरिका और इजरायल जैसे देश शामिल हैं।

पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि 2021 से 2025 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से आया था। रूस अकेले करीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा सप्लायर रहा, जबकि फ्रांस और इजरायल का योगदान भी काफी बड़ा था।

अब इन देशों में अटैचियों की संख्या घटाई जा रही है, क्योंकि यहां भारत की भूमिका मुख्य रूप से खरीदार की रही है।

कहां बढ़ रही है भारत की मौजूदगी

दूसरी ओर, भारत अब उन क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है जहां रक्षा निर्यात की संभावनाएं ज्यादा हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में रक्षा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। इन देशों के पास सीमित बजट होता है, इसलिए वे ऐसे विकल्प तलाशते हैं जो सस्ते, भरोसेमंद और टिकाऊ हों।

भारत खुद को इसी रूप में पेश कर रहा है और डिफेंस अटैची नेटवर्क के जरिए इन देशों तक अपनी पहुंच मजबूत कर रहा है। (India Defence Attache Reshuffle)

तेजी से बढ़ता भारतीय रक्षा निर्यात

भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 23,682 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में करीब 12 प्रतिशत ज्यादा है।

सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2029-30 तक इसे बढ़ाकर 50,000 करोड़ रुपये किया जाए।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निर्यात को बढ़ावा देना जरूरी है, और इसी दिशा में डिफेंस अटैची नेटवर्क को फिर से व्यवस्थित किया जा रहा है।

हाल ही में जारी सिपरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016-20 से 2021-25 के बीच भारत के हथियार आयात में करीब 4 फीसदी की कमी आई है। इसके बावजूद भारत अब भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य उपकरण आयातक बना हुआ है और वैश्विक हथियार आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 8.2 फीसदी है।

क्या-क्या बेच रहा है भारत

भारत अब दुनिया के करीब 100 देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। इनमें मिसाइल, आर्टिलरी गन, रॉकेट, आर्मर्ड व्हीकल, ऑफशोर पेट्रोल वेसल, रडार, सर्विलांस सिस्टम और गोला-बारूद जैसे कई उत्पाद शामिल हैं।

इसमें निजी कंपनियों और सरकारी रक्षा उपक्रमों दोनों का योगदान है। निजी सेक्टर ने इस क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बनाई है। (India Defence Attache Reshuffle)

ब्रह्मोस की बढ़ रही मांग

भारत अब छोटे उपकरणों के साथ-साथ बड़े और एडवांस हथियार सिस्टम भी निर्यात करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल इसका प्रमुख उदाहरण है। फिलीपींस को इस मिसाइल सिस्टम की आपूर्ति पहले ही की जा चुकी है। इसके अलावा इंडोनेशिया के साथ भी इस मिसाइल को लेकर बातचीत चल रही है।

इसके साथ ही हल्के लड़ाकू विमान, एडवांस हेलीकॉप्टर और अन्य प्लेटफॉर्म भी निर्यात के लिए तैयार किए जा रहे हैं। (India Defence Attache Reshuffle)

क्या होगी डिफेंस अटैची की नई भूमिका

अब डिफेंस अटैची की जिम्मेदारी सिर्फ सैन्य संपर्क तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें यह निर्देश दिए गए हैं कि वे भारत के पूरे रक्षा उद्योग का प्रतिनिधित्व करें। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ-साथ निजी कंपनियां भी शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि अब अटैची विदेशी देशों में जाकर भारतीय रक्षा उत्पादों को बढ़ावा देने और नए बाजार तलाशने का काम करेंगे।

नीति सुधारों का असर

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कई अहम सुधार किए हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, कई कंपोनेंट्स को लाइसेंस की जरूरत से बाहर किया गया है और निर्यात अनुमति प्रक्रिया को सरल किया गया है। इन सुधारों के कारण रक्षा क्षेत्र में कंपनियों की संख्या बढ़ी है और निर्यात में तेजी आई है। (India Defence Attache Reshuffle)

शिपबिल्डिंग सेक्टर पर जोर

भारत अब खुद को वैश्विक शिपबिल्डिंग हब के रूप में भी स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में निवेश और तकनीकी सहयोग के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य समुद्री क्षमता को मजबूत करना और नए रोजगार के अवसर पैदा करना है।

हालांकि भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है, लेकिन इसमें धीरे-धीरे कमी आ रही है। इससे साफ है कि भारत अब आयात पर निर्भरता कम करने और निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

चरणबद्ध तरीके से हो रहा बदलाव

डिफेंस अटैची नेटवर्क में यह बदलाव एक साथ नहीं किया गया है, बल्कि इसे चरणों में लागू किया गया है। पहले चरण में उन देशों से अटैचियों को हटाया गया जहां से आयात होता था, जबकि दूसरे चरण में नए बाजार वाले देशों में उनकी तैनाती बढ़ाई गई। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद यह है कि भारत की सैन्य कूटनीति सीधे उसके आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों को मजबूत करे। (India Defence Attache Reshuffle)

मलक्का के पास भारत की बड़ी तैयारी! तट और द्वीपों की सुरक्षा को लेकर तीनों सेनाओं ने की ऑपरेशनल एक्सरसाइज

Exercise Dweep Shakti 2026

Exercise Dweep Shakti 2026: पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान-अमेरिका युद्ध में जिस तरह से अमेरिका मरीन कमांडोज के जरिए ईरान के खार्ग द्वीप पर कब्जे की रणनीति बना रहा है, उस पर पूरी दुनिया की नजरें हैं। यह द्वीप ईरान की आर्थिक जीवनरेखा है, जहां से देश के लगभग 90% क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट होता है।

वहीं, भारतीय सेनाओं ने हाल ही में भारत की तटीय और द्वपीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़ा संयुक्त अभ्यास किया। 24 से 28 मार्च तक चली एक्सरसाइज “द्वीप शक्ति” (DWEEP SHAKTI) में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर कई ऑपरेशंस को अंजाम दिया। इस अभ्यास का मकसद था कि समुद्र और द्वीपों से जुड़े किसी भी खतरे की स्थिति में तीनों सेनाएं कितनी तेजी और तालमेल के साथ कार्रवाई कर सकती हैं।

Exercise Dweep Shakti 2026

इस एक्सरसाइज में आधुनिक उपकरणों, ड्रोन और नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। पांच दिनों तक चले इस अभियान में अलग-अलग परिस्थितियों में ऑपरेशन करके यह देखा गया कि सेना की तैयारी कितनी मजबूत है।

Exercise Dweep Shakti 2026: तटीय और द्वीपीय सुरक्षा पर फोकस

भारत के पास 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा और 1,300 से ज्यादा द्वीप समूहों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। खासकर अंडमान और निकोबार जैसे द्वीप सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसी वजह से इस अभ्यास में तटीय इलाकों और द्वीपों पर फोकस रखा गया।

अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) के नेतृत्व में चले इस अभ्यास के दौरान ऐसी परिस्थितियां तैयार की गईं, जिनमें दुश्मन समुद्र के रास्ते हमला करने की कोशिश करता है या किसी द्वीप पर कब्जा करने की कोशिश करता है। इन परिस्थितियों में सेना को तेजी से प्रतिक्रिया देनी होती है। इसी तरह की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सैनिकों ने अभ्यास किया।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित हैं, जो वैश्विक समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण चोक पॉइंट है। चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियां और क्षेत्रीय तनावों को देखते हुए ऐसी संयुक्त तैयारियां अत्यंत आवश्यक हैं।

तीनों सेनाओं का देखने को मिला तालमेल

इस अभ्यास की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें तीनों सेनाओं ने एक साथ मिलकर काम किया। थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर समन्वय बनाने पर जोर दिया गया।

नौसेना ने समुद्र में ऑपरेशन संभाला, थलसेना के जवानों ने जमीन पर कार्रवाई की और वायुसेना ने हवाई सपोर्ट दिया। तीनों सेनाओं के बीच रियल टाइम में जानकारी साझा की गई, जिससे ऑपरेशन और ज्यादा प्रभावी बन सके।

इस तरह का तालमेल किसी भी आधुनिक युद्ध में बेहद जरूरी होता है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई करनी होती है। (Exercise Dweep Shakti 2026)

Exercise Dweep Shakti 2026

स्पेशल फोर्सेस भी हुईं शामिल

अभ्यास में स्पेशल फोर्सेस ने भी हिस्सा लिया। इन यूनिट्स ने तेज और सटीक ऑपरेशन का प्रदर्शन किया। कठिन परिस्थितियों में काम करने की उनकी क्षमता को परखा गया। इन सैनिकों ने सर्च ऑपरेशन और हाई रिस्क मिशन जैसे कार्यों का अभ्यास किया। (Exercise Dweep Shakti 2026)

समुद्र से हमला और बीच लैंडिंग का अभ्यास

अभ्यास के दौरान एंफीबियस ऑपरेशन यानी समुद्र से जमीन पर हमला करने की ड्रिल की गई। इसमें सैनिकों को जहाजों और लैंडिंग क्राफ्ट की मदद से समुद्र से तट पर उतारा गया।

बीच लैंडिंग ड्रिल के दौरान सैनिकों ने तेजी से किनारे पर उतरकर आगे बढ़ने का अभ्यास किया। इस दौरान यह भी देखा गया कि अगर सामने दुश्मन की मौजूदगी हो, तो सैनिक किस तरह से सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ते हैं।

इस तरह के ऑपरेशन काफी जटिल होते हैं, क्योंकि इसमें समुद्र, जमीन और हवा तीनों का कॉर्डिनेशन जरूरी होता है।

समुद्र पर नियंत्रण बनाए रखने की तैयारी

नौसेना ने इस अभ्यास में समुद्री क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के तरीके पर काम किया। इसमें समुद्र में निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और समुद्री मार्गों की सुरक्षा शामिल रही।

जहाजों और अन्य समुद्री प्लेटफॉर्म्स के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि किसी भी दुश्मन गतिविधि को समय रहते रोका जा सके। समुद्र पर कंट्रोल बनाए रखना किसी भी देश की सुरक्षा के लिए जरूरी होता है, खासकर जब बात व्यापारिक मार्गों की हो। (Exercise Dweep Shakti 2026)

Exercise Dweep Shakti 2026

वायुसेना ने दिया हवाई सपोर्ट

अभ्यास के दौरान वायुसेना ने अहम भूमिका निभाई। फाइटर जेट्स, हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया। इनकी मदद से सैनिकों को सपोर्ट दिया गया और जरूरत पड़ने पर तेजी से मूवमेंट भी किया गया।

हवाई निगरानी के जरिए जमीन और समुद्र दोनों जगह की गतिविधियों पर नजर रखी गई। इससे ऑपरेशन को बेहतर तरीके से प्लान करने में मदद मिली। (Exercise Dweep Shakti 2026)

ड्रोन और नई तकनीक का इस्तेमाल

इस अभ्यास में ड्रोन और नेक्स्ट जनरेशन उपकरणों का खास इस्तेमाल देखने को मिला। सर्विलांस ड्रोन के जरिए रियल टाइम जानकारी जुटाई गई। इससे यह पता चलता रहा कि टारगेट कहां है और वहां की स्थिति क्या है।

ड्रोन की मदद से ऑपरेशन ज्यादा सटीक और तेज हो गया। इसके अलावा नेटवर्क आधारित सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया, जिससे अलग-अलग यूनिट्स के बीच तुरंत जानकारी साझा हो सके।

अभ्यास के दौरान अलग-अलग तरह के हालात तैयार किए गए, ताकि सैनिक हर स्थिति के लिए तैयार रह सकें। कभी दुश्मन की घुसपैठ की स्थिति बनाई गई, तो कभी अचानक हमला होने का सीन तैयार किया गया।

इन हालात में सैनिकों ने तेजी से निर्णय लेने और तुरंत कार्रवाई करने का अभ्यास किया। इससे उनकी प्रतिक्रिया क्षमता को परखा गया। (Exercise Dweep Shakti 2026)

टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसीजर

इस अभ्यास का एक बड़ा उद्देश्य यह भी था कि ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल होने वाली रणनीतियों और प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाया जाए। इसे टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसीजर यानी टीटीपी कहा जाता है।

अभ्यास के दौरान यह देखा गया कि किस तरह से ऑपरेशन को और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है। अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल को भी मजबूत किया गया।

वहीं इस एक्सरसाइज में सिर्फ लड़ाकू क्षमता ही नहीं, बल्कि सपोर्ट सिस्टम का भी अभ्यास किया गया। इसमें यह देखा गया कि सैनिकों तक जरूरी सामान, ईंधन और उपकरण कितनी तेजी से पहुंचाए जा सकते हैं।

दूरदराज के इलाकों में ऑपरेशन चलाने के लिए मजबूत लॉजिस्टिक्स बहुत जरूरी होते हैं। इस अभ्यास में इसी पहलू पर भी ध्यान दिया गया। (Exercise Dweep Shakti 2026)

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की तैयारी

यह अभ्यास सिर्फ जमीन, समुद्र या हवा तक सीमित नहीं था। इसमें मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की तैयारी भी दिखाई दी। यानी एक साथ कई क्षेत्रों में कार्रवाई करने की क्षमता पर काम किया गया।

इसमें सूचना, निगरानी और तकनीक का इस्तेमाल अहम रहा। आधुनिक युद्ध में यह जरूरी हो गया है कि सभी क्षेत्रों में एक साथ काम किया जाए। (Exercise Dweep Shakti 2026)