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ईरान-इजरायल संघर्ष से सीख: ड्रोनों के झुंड से कैसे निपटेगा भारत? सेना बदलेगी एयर डिफेंस स्ट्रेटेजी

Iran-Israel War Lessons: Indian Army Transformation
Indian Army Transformation: How Operation Sindoor Transformed Indian Army War-Fighting Architecture with Drone Units and Bhairav Battalions

Iran-Israel War Lessons: पश्चिम एशिया में चल रहे इजरायल-ईरान-अमेरिका युद्ध से भारतीय सेनाओं ने कई जरूरी सबक लेने शुरू कर दिए हैं। इस युद्ध में जिस तरह छोटे और सस्ते ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ, उसने पूरी दुनिया की सेनाओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अब भारतीय सेनाओं में इस बात पर गंभीर चर्चा चल रही है कि देश की सुरक्षा के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम को तेजी से खरीदा जाए और उन्हें पुराने एयर डिफेंस सिस्टम के साथ जोड़ा जाए।

Iran-Israel War Lessons: छोटे ड्रोन बने बड़ी चुनौती

हाल के युद्धों में यह साफ दिखा है कि छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे बन सकते हैं। इनकी कीमत बहुत कम होती है, लेकिन अगर इन्हें झुंड यानी स्वॉर्म के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यह बड़े और महंगे हथियारों को भी चुनौती दे सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, एक छोटे ड्रोन को गिराने के लिए महंगे मिसाइल का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से सही नहीं माना जाता। ऐसे में सस्ते और प्रभावी विकल्प तैयार करना जरूरी हो गया है।

पुराने हथियारों को नए सिस्टम से जोड़ने की तैयारी

भारतीय सेना अब अपने पुराने यानी लेगेसी एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने पर ध्यान दे रही है। जैसे एल-70 गन जैसे सिस्टम का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन गिराने में किया जा चुका है।

अब योजना यह है कि इन पुराने हथियारों को नए एंटी-ड्रोन सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किया जाए, ताकि कम लागत में एक मजबूत एयर डिफेंस छतरी तैयार हो सके। (Iran-Israel War Lessons)

स्वॉर्म ड्रोन का बढ़ता खतरा

वेस्ट एशिया के संघर्ष में यह देखा गया कि ईरान ने स्वॉर्म ड्रोन का इस्तेमाल किया, यानी एक साथ कई ड्रोन भेजे गए। इस तरह के हमले से एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है।

अगर एक साथ बहुत सारे ड्रोनहैं आते , तो उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि भारत अब अपनी एंटी-ड्रोन क्षमता को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। (Iran-Israel War Lessons)

रोबोटिक तकनीक पर भी ध्यान

सेना अब सिर्फ ड्रोन ही नहीं, बल्कि रोबोटिक सिस्टम पर भी फोकस बढ़ा रही है। ऐसे उपकरण जो माइन डिटेक्शन, सामान ढोने और अन्य कामों में मदद कर सकें, उन्हें शामिल करने की योजना है।

इससे सैनिकों पर निर्भरता कम होगी और जोखिम भी घटेगा। रोबोटिक सिस्टम कई खतरनाक काम बिना मानव नुकसान के कर सकते हैं।

किन स्ट्रक्चर को बनाए निशाना

वेस्ट एशिया संघर्ष में यह भी देखा गया कि देशों ने एक-दूसरे के एनर्जी रिसोर्सेस और प्रशासनिक ढांचे को निशाना बनाया। इससे उनके सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स पर बड़ा दबाव पड़ा।

भारतीय सेना इस पहलू पर भी विचार कर रही है कि भविष्य के युद्धों में किन लक्ष्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। (Iran-Israel War Lessons)

पैसिव उपायों की जरूरत

अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ हथियारों से ही सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि कुछ पैसिव उपाय भी जरूरी होते हैं। इसमें फोर्स को अलग-अलग जगहों पर फैलाना, छिपाना, कैमोफ्लेज करना और अंडरग्राउंड स्ट्रक्चर तैयार करना शामिल है।

अगर एक ही जगह पर ज्यादा रिसोर्सेस रखे जाएं, तो वे आसानी से निशाना बन सकते हैं। इसलिए इन्हें सुरक्षित तरीके से दूसरी जगहों पर भी रखना जरूरी माना जा रहा है। (Iran-Israel War Lessons)

एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव

हाल के युद्धोंमें यह भी देखा गया कि अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी दबाव में आ सकते हैं। जब एक साथ कई मिसाइल या ड्रोन हमला करते हैं, तो सबसे मजबूत सिस्टम भी चुनौती का सामना करता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए भारत अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को और मजबूत बनाने पर विचार कर रहा है।

डिसेंट्रलाइज्ड युद्ध की ओर बढ़ता फोकस

अब युद्ध का तरीका भी बदल रहा है। पहले जहां बड़े स्तर पर सेंट्रलाइज्ड ऑपरेशन होते थे, अब छोटे-छोटे यूनिट्स के जरिए डिसेंट्रलाइज्ड तरीके से लड़ाई लड़ी जा रही है।

इससे दुश्मन के लिए पूरे सिस्टम को निशाना बनाना मुश्किल हो जाता है। भारत में भी जॉइंट मिलिट्री कमांड बनाने पर चर्चा चल रही है, जिससे बेहतर तालमेल हो सके। (Iran-Israel War Lessons)

लंबी लड़ाई की तैयारी पर जोर

अधिकारियों का मानना है कि अब सिर्फ तेज और छोटे युद्ध ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की तैयारी भी जरूरी है। इसके लिए संसाधनों का सही इस्तेमाल और लगातार सप्लाई बनाए रखना जरूरी होता है।

साथ ही यह भी जरूरी है कि युद्ध शुरू होने के साथ ही उसके उद्देश्य स्पष्ट हों और हर चरण में उसे खत्म करने की रणनीति तैयार रहे। (Iran-Israel War Lessons)

Drone warfare में नया इनोवेशन! वीडियो में देखें कैसे बिना विस्फोट के रूसी FPV ने मेटल रॉड से उड़ा दिए यूक्रेनी ड्रोन के परखच्चे

Drone Warfare

Drone warfare: चाहे अमेरिका-ईरान युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, हालिया जंगों में ड्रोन वॉरफेयर का अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। यूक्रेन ने रूस के शाहेद के ड्रोन का मुकाबला करने के लिए सस्ता इंटरसेप्टर ड्रोन बनाया तो, रूस ने यूक्रेनी ड्रोन को गिराने के लिए रियूजेबल तरीका अपनाया। हाल ही में एक वीडियो रूस की तरफ से जारी किया गया, जिसमें एक रूसी एफपीवी (फर्स्ट पर्सन व्यू) इंटरसेप्टर ड्रोन ने यूक्रेनी ड्रोन को बिना किसी विस्फोटक के सिर्फ मेटल रॉड्स की टक्कर मारकर गिरा दिया।

हालांकि यह तरीका देखने में बेहद साधारण लगता है, लेकिन इसका असर काफी बड़ा है। खास बात यह रही कि हमला करने वाला ड्रोन खुद सुरक्षित दिखाई दिया और उसे दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। (Drone warfare)

Drone warfare: कैसे हुआ ये हमला

वीडियो में साफ दिखता है कि रूसी ड्रोन के आगे दो लंबी मेटल रॉड्स लगी हुई थीं। यह ड्रोन तेजी से उड़ते हुए एक सफेद रंग के यूक्रेनी फिक्स्ड-विंग ड्रोन की तरफ बढ़ता है।

कुछ ही सेकंड में वह सीधे टारगेट से टकराता है और दोनों रॉड्स दुश्मन ड्रोन की बॉडी और विंग्स में घुस जाती हैं। टक्कर के साथ ही स्पार्क्स निकलते हैं और यूक्रेनी ड्रोन में आग लग जाती है। थोड़ी ही देर में वह हवा में टूटकर नीचे गिर जाता है।

इस पूरे ऑपरेशन में कोई विस्फोट नहीं हुआ। सिर्फ टक्कर से ही टारगेट को नष्ट कर दिया गया। (Drone warfare)

क्या है ‘काइनेटिक इंटरसेप्शन’

इस तरीके को ‘काइनेटिक इंटरसेप्शन’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि बिना बम या मिसाइल के, सिर्फ फिजिकल अटैक से ही दुश्मन को नष्ट किया जाता है।

आम तौर पर एफपीवी ड्रोन में विस्फोटक वॉरहेड लगाया जाता है। टारगेट से टकराते ही दोनों ड्रोन खत्म हो जाते हैं। लेकिन इस नए तरीके में सिर्फ मेटल रॉड्स का इस्तेमाल किया गया, जिससे हमला करने वाला ड्रोन बच गया।

यही इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत मानी जा रही है। (Drone warfare)

लागत में है बड़ा फर्क

ड्रोन युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती लागत की होती है। एक साधारण एफपीवी ड्रोन की कीमत लगभग 500 से 1000 डॉलर के बीच होती है। अगर इसमें विस्फोटक जोड़ा जाए तो खर्च और बढ़ जाता है।

लेकिन इस नए तरीके में कोई वॉरहेड नहीं लगाया गया। सिर्फ साधारण मेटल रॉड्स से काम हो गया। इससे हर इंटरसेप्शन की लागत काफी कम हो जाती है।

युद्ध में जहां रोज हजारों ड्रोन इस्तेमाल हो रहे हैं, वहां यह तरीका बड़ी बचत की वजह बन सकता है। (Drone warfare)

दोबारा इस्तेमाल की सुविधा

इस तकनीक का एक और अहम पहलू यह है कि ड्रोन को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। पारंपरिक हमलों में ड्रोन खुद भी नष्ट हो जाता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।

वीडियो में दिखता है कि टक्कर के बाद रूसी ड्रोन उड़ता रहता है। वीडियो में यह भी देखा गया कि उसने कुछ समय तक दुश्मन ड्रोन को साथ लेकर उड़ान जारी रखी और रूसी ड्रोन सुरक्षित रहा। यह सिस्टम सिर्फ सस्ता ही नहीं, बल्कि टिकाऊ भी है। (Drone warfare)

किन ड्रोन पर इस्तेमाल हो रही तकनीक

इस तरह की तकनीक कुछ खास इंटरसेप्टर ड्रोन मॉडल्स में इस्तेमाल हो रही है। इनका मकसद यूक्रेन के सस्ते स्ट्राइक ड्रोन को रोकना है।

यूक्रेन की तरफ से भी इसी तरह के कम लागत वाले प्रयोग देखने को मिले हैं। कुछ मामलों में ड्रोन पर फिशिंग रॉड या जाल लगाकर दुश्मन ड्रोन को गिराने की कोशिश की गई है।

दोनों पक्ष अब महंगे हथियारों की जगह सस्ती और सरल तकनीकों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। (Drone warfare)

ड्रोन बनाम ड्रोन की नई लड़ाई

2022 में शुरू हुए इस युद्ध में शुरुआत में ड्रोन का इस्तेमाल जमीन पर हमला करने के लिए किया जा रहा था। लेकिन अब स्थिति बदल गई है।

अब ड्रोन ही ड्रोन को मार रहे हैं। यानी आसमान में ही एक अलग तरह की लड़ाई चल रही है। इसे ड्रोन-वर्सेस-ड्रोन कॉम्बैट कहा जा रहा है।

इसमें छोटे, तेज और सस्ते ड्रोन ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं। (Drone warfare)

इलेक्ट्रॉनिक और अन्य तरीके भी इस्तेमाल

रूस सिर्फ टक्कर वाले ड्रोन ही नहीं, बल्कि अन्य तरीकों का भी इस्तेमाल कर रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी ईडब्ल्यू सिस्टम शामिल हैं, जो दुश्मन ड्रोन के सिग्नल को जाम कर देते हैं।

कुछ मामलों में जाल फेंककर ड्रोन को फंसाने की तकनीक भी अपनाई जा रही है। इसके अलावा डिकॉय ड्रोन यानी नकली ड्रोन भेजकर दुश्मन को भ्रमित किया जाता है।

लो-एल्टीट्यूड फ्लाइट और फाइबर-ऑप्टिक कंट्रोल जैसे तरीके भी इस्तेमाल में आ रहे हैं, जिससे जामिंग का असर कम हो जाता है।

ड्रोन तकनीक में हो रहे ये बदलाव दिखाते हैं कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब महंगे मिसाइल सिस्टम के साथ-साथ सस्ते और स्मार्ट सॉल्यूशंस भी अहम हो गए हैं। (Drone warfare)

कोच्चि में जुटीं 12 देशों की नौसेनाएं, समुद्री सुरक्षा अभ्यास IONS IMEX 2026 में लिया हिस्सा

IONS IMEX 2026

IONS IMEX 2026: भारतीय नौसेना ने हाल ही में कोच्चि स्थित सदर्न नेवल कमांड के मैरीटाइम वॉरफेयर सेंटर में एक अहम अंतरराष्ट्रीय अभ्यास का आयोजन किया। इस अभ्यास का नाम आईओएनएस मैरीटाइम एक्सरसाइज (IMEX) टेबल-टॉप एक्सरसाइज (TTX) 2026 रखा गया था। इसमें हिंद महासागर क्षेत्र से जुड़े कई देशों की नौसेनाओं के अधिकारी शामिल हुए।

इस आयोजन में इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम यानी आईओएनएस के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ आईओएस सागर के अंतरराष्ट्रीय अधिकारी और भारतीय नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। सभी ने मिलकर समुद्री सुरक्षा से जुड़े नए और बदलते खतरों पर चर्चा की।

IONS IMEX 2026: कई देशों ने मिलकर किया अभ्यास

इस एक्सरसाइज में बांग्लादेश, फ्रांस, इंडोनेशिया, केन्या, मालदीव, मॉरीशस, म्यांमार, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया और तिमोर-लेस्ते जैसे देशों ने हिस्सा लिया। अलग-अलग देशों की भागीदारी से यह साफ दिखा कि समुद्री सुरक्षा को लेकर सभी देश एक साथ काम करना चाहते हैं।

यह अभ्यास ऐसे समय पर हुआ जब भारत 2026 से 2028 तक आईओएनएस की चेयरमैनशिप संभालने जा रहा है। करीब 16 साल बाद भारत को यह जिम्मेदारी मिली है, इसलिए यह एक्सरसाइज काफी अहम मानी जा रही है।

बिना असली तैनाती के किया गया अभ्यास

यह एक टेबल-टॉप एक्सरसाइज थी, यानी इसमें असली जहाज या हथियारों की तैनाती नहीं की गई। इसकी जगह एक सिमुलेटेड एनवायरनमेंट में अलग-अलग हालात बनाए गए, जिन पर अधिकारियों ने मिलकर काम किया।

इस तरीके से कई तरह के संभावित समुद्री खतरों को समझने और उनसे निपटने की रणनीति तैयार करने का मौका मिला। इसमें सूचना साझा करना, फैसले लेना और अलग-अलग देशों के बीच तालमेल कैसे बेहतर किया जाए, इन सभी बातों पर ध्यान दिया गया।

समुद्री सुरक्षा के नए खतरों पर चर्चा

इस अभ्यास में पारंपरिक युद्ध के अलावा उन खतरों पर ज्यादा फोकस रहा, जो आज के समय में तेजी से बढ़ रहे हैं। जिनमें समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मछली पकड़ना, आपदा की स्थिति और समुद्री रास्तों की सुरक्षा शामिल है।

हिंद महासागर क्षेत्र दुनिया के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति होती है। ऐसे में इस क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत बनाना सभी देशों के लिए जरूरी है।

यह एक्सरसाइज आईओएस सागर पहल से भी जुड़ी हुई थी, जिसमें कई देशों के नौसैनिक अधिकारी पहले से ही कोच्चि में ट्रेनिंग ले रहे थे। इन अधिकारियों ने भी इस टेबल-टॉप एक्सरसाइज में हिस्सा लिया, जिससे उन्हें वास्तविक परिस्थितियों के करीब अनुभव मिला।

इससे सिर्फ वरिष्ठ स्तर पर ही नहीं, बल्कि ऑपरेशनल स्तर पर भी सहयोग और समझ को मजबूत करने का मौका मिला।

इस अभ्यास के दौरान कई तरह के सीनारियो बनाए गए, जिनमें अलग-अलग तरह की परिस्थितियों को शामिल किया गया। इन पर चर्चा करके यह समझने की कोशिश की गई कि किसी संकट के समय किस तरह जल्दी और सही फैसला लिया जाए।

इस प्रक्रिया में सभी देशों के अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए और एक-दूसरे के काम करने के तरीके को समझा।

सहयोग और तालमेल पर रहा जोर

इस पूरे आयोजन का मुख्य उद्देश्य यही था कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें। इसके लिए जानकारी साझा करने, एक जैसी प्रक्रिया अपनाने और आपसी भरोसा बढ़ाने पर खास ध्यान दिया गया।

नेशनल आर्चरी चैंपियनशिप में आर्मी स्कूल की बेटियों ने रचा इतिहास, 13 साल की जीविशा ने जीता गोल्ड

Indian Army archery championship

Archery championship: भारतीय सेना से जुड़े एक प्रशिक्षण संस्थान के दो युवा तीरंदाजों ने राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया है। आंध्र प्रदेश के गुंटूर में आयोजित एनटीपीसी ओपन नेशनल आर्चरी चैंपियनशिप में इन खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का दम दिखाया और सेना के साथ-साथ महाराष्ट्र का नाम भी रोशन किया।

यह प्रतियोगिता देशभर के उभरते तीरंदाजों के लिए एक बड़ा मंच मानी जाती है, जहां कड़ी चुनौती के बीच खिलाड़ियों को अपनी क्षमता साबित करनी होती है।

Indian Army archery championship

Archery championship: जीविशा अग्रवाल ने जीता गोल्ड

इस प्रतियोगिता में जीविशा अग्रवाल ने शानदार प्रदर्शन किया। अहिल्यानगर के मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल से जुड़ी जीविशा ने अंडर-13 गर्ल्स कैटेगरी के इंडियन राउंड एलिमिनेशन इवेंट में शानदार खेल दिखाते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

पूरे मुकाबले के दौरान उन्होंने काफी संयम और आत्मविश्वास के साथ तीर चलाए। हर राउंड में उनका प्रदर्शन स्थिर रहा, जिसकी वजह से वह फाइनल तक पहुंचीं और जीत हासिल की।

इंडिविजुअल रैंकिंग प्रतियोगिता में भी जीविशा ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन वह सिर्फ एक अंक से पोडियम में जगह बनाने से चूक गईं। इसके बावजूद उनका प्रदर्शन लगातार शानदार बना रहा।

निधि महतो को राष्ट्रीय रैंकिंग में नौवां स्थान

जीविशा के साथ ही निधि महतो ने भी इस प्रतियोगिता में बेहतरीन खेल दिखाया। उन्होंने राष्ट्रीय रैंकिंग में नौवां स्थान हासिल किया।

कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच टॉप-10 में जगह बनाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। दोनों खिलाड़ियों ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान मेहनत और धैर्य के साथ मुकाबला किया और अपनी पहचान बनाई।

राज्य स्तर से नेशनल तक का सफर

इन दोनों युवा तीरंदाजों के इस शानदार सफर के पीछे लगातार मेहनत और कई प्रतियोगिताओं का अनुभव रहा है। महाराष्ट्र के सोलापुर में आयोजित मिनी सब-जूनियर स्टेट लेवल आर्चरी प्रतियोगिता में इनके प्रदर्शन के आधार पर ही इनका चयन नेशनल चैंपियनशिप के लिए हुआ था।

उस प्रतियोगिता में जीविशा ने इंडिविजुअल कैटेगरी में दूसरा स्थान हासिल किया था। वहीं टीम इवेंट में अहिल्यानगर की टीम ने गोल्ड मेडल जीता था, जिसमें जीविशा और निधि दोनों शामिल थीं।

सेना के ट्रेनिंग सिस्टम की अहम भूमिका

इन खिलाड़ियों की सफलता के पीछे सेना के प्रशिक्षण सिस्टम की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। अहिल्यानगर स्थित मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल में बच्चों की प्रतिभा को शुरुआती स्तर पर ही पहचाना जाता है और उन्हें सही दिशा में ट्रेनिंग दी जाती है।

यहां खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास, अनुशासन और सही मार्गदर्शन मिलता है, जिससे वे बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार हो पाते हैं।

कोच की अहम भूमिका

इस सफलता में कोच हवलदार राकेश निनामा का भी अहम योगदान रहा। उन्होंने दोनों खिलाड़ियों को लगातार ट्रेनिंग दी और उनके खेल को बेहतर बनाने पर काम किया।

उनकी देखरेख में खिलाड़ियों ने न केवल तकनीक सीखी, बल्कि दबाव में खेलने का तरीका भी समझा। यही वजह रही कि राष्ट्रीय स्तर पर भी दोनों ने आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन किया।

पहले भी दिखा चुकी हैं दम

यह पहली बार नहीं है जब इन खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया हो। इससे पहले भी 2025 में आयोजित सीबीएसई आर्चरी नेशनल प्रतियोगिता में अहिल्यानगर की टीम ने हिस्सा लिया था। उस समय भी टीम ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था और व्यक्तिगत स्तर पर भी खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया था।

गुंटूर में आयोजित इस प्रतियोगिता में देश के अलग-अलग राज्यों से आए खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। हर कैटेगरी में मुकाबला काफी कड़ा रहा, खासकर अंडर-13 वर्ग में जहां कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी मैदान में थे।

अग्निवीर इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव, एक्सीडेंट या आतंकी हमले में मौत होने पर मिलेगा पहले से ज्यादा मुआवजा!

Agniveer insurance cover

Agniveer insurance cover: भारतीय सेना के अग्निवीरों के लिए एक अहम बदलाव किया गया है। अब डिफेंस सैलरी पैकेज (डीएसपी- अग्निवीर) के तहत उन्हें पहले से ज्यादा इंश्योरेंस कवर मिलेगा। यह बदलाव भारतीय सेना और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के बीच हुए समझौते को रिन्यू करने के बाद लागू हुआ है, जिसे मार्च 2029 तक बढ़ा दिया गया है।

इस नए सिस्टम के तहत अग्निवीरों को अब पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस और एयर एक्सीडेंट इंश्योरेंस दोनों में बड़ा फायदा मिलेगा। इससे ड्यूटी के दौरान या किसी दुर्घटना की स्थिति में उनके परिवार को आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

Agniveer insurance cover: कितना मिलेगा इंश्योरेंस कवर

अब अग्निवीरों को पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस यानी पीएआई के तहत 1 करोड़ रुपये का कवर दिया जा रहा है। वहीं एयर एक्सीडेंट इंश्योरेंस यानी एएआई के तहत 1.5 करोड़ रुपये तक की सुरक्षा मिलेगी।

इसके अलावा अगर किसी अग्निवीर को स्थायी रूप से पूरी या आंशिक विकलांगता हो जाती है, तो उस स्थिति में भी उसे 1 करोड़ रुपये तक का कवर दिया जाएगा।

इस पैकेज में एक खास प्रावधान यह भी है कि अगर किसी अग्निवीर की मौत आतंकवाद, नक्सल हमले या दुश्मन के साथ मुठभेड़ जैसी स्थिति में होती है, तो अतिरिक्त 10 लाख रुपये का कवर भी दिया जाएगा। (Agniveer insurance cover)

पहले क्या था और अब क्या बदला

जब अग्निपथ योजना की शुरुआत हुई थी, उस समय मिलने वाला इंश्योरेंस कवर इससे काफी कम था। शुरुआत में पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस 50 लाख रुपये और एयर एक्सीडेंट कवर 1 करोड़ रुपये तक सीमित था।

बाद में नवंबर 2025 में इसमें बदलाव किया गया और कवर बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये और 1.5 करोड़ रुपये कर दिया गया। अब इस व्यवस्था को आगे भी जारी रखने के लिए समझौते को बढ़ा दिया गया है। यानी अब जो बढ़ा हुआ कवर है, वही आगे भी लागू रहेगा और अग्निवीरों को लगातार मिलता रहेगा। (Agniveer insurance cover)

कैसे काम करता है एयर एक्सीडेंट कवर

एयर एक्सीडेंट इंश्योरेंस के तहत कवर तभी लागू होता है, जब टिकट डीएसपी अकाउंट से खरीदा गया हो या फिर अग्निवीर आधिकारिक ड्यूटी पर डिफेंस एयरक्राफ्ट में यात्रा कर रहा हो। इसका मतलब यह है कि ड्यूटी से जुड़ी यात्रा के दौरान भी यह कवर पूरी तरह लागू रहेगा।

एक्स्ट्रा बेनिफिट्स भी शामिल

इस पैकेज में कुछ अतिरिक्त फायदे भी जोड़े गए हैं, जो जरूरत के समय काम आते हैं। अगर किसी हादसे में जलने की घटना होती है, तो प्लास्टिक सर्जरी के लिए 10 लाख रुपये तक का खर्च कवर किया जाएगा।

अगर इलाज के लिए बाहर से दवा मंगानी पड़े, तो उसके ट्रांसपोर्ट का पांच लाख रुपये तक का खर्च भी दिया जाएगा। एयर एंबुलेंस की जरूरत होने पर 10 लाख रुपये तक की मदद मिल सकती है। अगर कोई व्यक्ति हादसे के बाद 48 घंटे से ज्यादा समय तक कोमा में रहने के बाद मौत का शिकार हो जाता है, तो उस स्थिति में 5 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है।

परिवार से जुड़े प्रावधान भी इसमें शामिल हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिए 18 से 25 साल की उम्र के बीच उच्च शिक्षा के लिए पीएआई कवर का 25 प्रतिशत तक, यानी 8 लाख रुपये तक (लड़की के लिए 10 लाख रुपये तक) मदद मिलती है। बेटियों की शादी के लिए भी अलग से कवर दिया जाता है, जिसमें दो बेटियों के लिए कुल 10 लाख रुपये तक या एक बेटी के लिए 5 लाख रुपये तक की सहायता शामिल है।

इसके अलावा, हादसे के समय परिवार के दो सदस्यों के यात्रा खर्च के लिए 50,000 रुपये तक की राशि दी जाती है। पार्थिव शरीर को घर तक लाने के लिए 50,000 रुपये और एंबुलेंस खर्च के लिए भी 50,000 रुपये तक का कवर भी इस पैकेज में शामिल किया गया है। (Agniveer insurance cover)

आंशिक या पूर्ण विकलांग होने पर 1 करोड़ रुपये तक

अगर कोई अग्निवीर आतंकवाद, नक्सल हमले या दुश्मन के साथ मुठभेड़ में शहीद होता है, तो एसबीआई के एक्सप्रेस क्रेडिट लोन अकाउंट पर 10 लाख रुपये तक का इंश्योरेंस कवर मिलता है। इसके साथ ही ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त 10 लाख रुपये का पीएआई कवर भी दिया जाता है।

इसके अलावा, अगर किसी अग्निवीर को स्थायी रूप से पूरी तरह या आंशिक विकलांगता हो जाती है, तो उसे 1 करोड़ रुपये तक का कवर दिया जाता है।

अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों को 48 लाख रुपये का नॉन-कॉन्ट्रिब्यूटरी लाइफ इंश्योरेंस मिलता है। इसका पूरा प्रीमियम सरकार खुद वहन करती है, यानी अग्निवीर को इसके लिए अपनी जेब से एक भी रुपया नहीं देना पड़ता।

अग्निपथ योजना में क्या देती है सरकार

अग्निपथ योजना के तहत अगर किसी अग्निवीर की सेवा के दौरान मौत होती है, तो उसके परिवार को पेंशन नहीं मिलती, लेकिन एकमुश्त मुआवजे और इंश्योरेंस के रूप में एक तय पैकेज दिया जाता है। रक्षा मंत्रालय ने ऐसी स्थितियों को तीन कैटेगरी में बांटा है, जिनके आधार पर अलग-अलग लाभ मिलते हैं।

सबसे पहले कैटेगरी X आती है, जिसमें मौत सेवा से जुड़ी नहीं होती, जैसे बीमारी या प्राकृतिक कारण। इस स्थिति में परिवार को 48 लाख रुपये का नॉन-कॉन्ट्रिब्यूटरी लाइफ इंश्योरेंस मिलता है, जिसका पूरा प्रीमियम सरकार देती है। इसके साथ अग्निवीर का सेवा निधि फंड भी मिलता है, जिसमें उसका योगदान, सरकार का हिस्सा और ब्याज शामिल होता है। इस कैटेगरी में कोई एक्स-ग्रेशिया नहीं दिया जाता। (Agniveer insurance cover)

दूसरी कैटेगरी Y होती है, जिसमें मौत ड्यूटी या ट्रेनिंग के दौरान किसी हादसे की वजह से होती है। इस स्थिति में परिवार को 48 लाख रुपये का इंश्योरेंस मिलता है, साथ ही सरकार की तरफ से 44 लाख रुपये का वन-टाइम एक्स-ग्रेशिया दिया जाता है। इसके अलावा, अग्निवीर की बची हुई सेवा अवधि का पूरा वेतन भी परिवार को दिया जाता है, जो आमतौर पर करीब 13 लाख रुपये के आसपास होता है। सेवा निधि की पूरी राशि भी मिलती है, जो लगभग 2.3 लाख रुपये तक होती है। इसके साथ ही आर्म्ड फोर्सेस बैटल कैजुअल्टी फंड से 8 लाख रुपये की अतिरिक्त मदद दी जाती है।

तीसरी कैटेगरी Z होती है, जिसमें अग्निवीर आतंकवादी हमले, दुश्मन की कार्रवाई या युद्ध जैसी स्थिति में शहीद होता है। इस कैटेगरी में Y कैटेगरी के सभी लाभ मिलते हैं। यानी 48 लाख रुपये का इंश्योरेंस, 44 लाख रुपये का एक्स-ग्रेशिया, करीब 13 लाख रुपये का बाकी वेतन, लगभग 2.3 लाख रुपये की सेवा निधि और 8 लाख रुपये का बैटल फंड मिलता है।

अगर कुल रकम को जोड़ा जाए, तो Y या Z कैटेगरी में परिवार को लगभग 1.15 करोड़ रुपये से 1.20 करोड़ रुपये तक का सरकारी मुआवजा देने का प्रावधान है। (Agniveer insurance cover)

डीएसपी अकाउंट में सिर्फ इंश्योरेंस ही नहीं, बैंकिंग सुविधाएं भी

डिफेंस सैलरी पैकेज के तहत अग्निवीरों को सिर्फ इंश्योरेंस ही नहीं, बल्कि कई बैंकिंग सुविधाएं भी दी जाती हैं। इस अकाउंट में मिनिमम बैलेंस रखने की जरूरत नहीं होती। इसके साथ इंटरनेशनल गोल्ड डेबिट कार्ड मुफ्त दिया जाता है और इस पर कोई सालाना चार्ज नहीं लिया जाता। एसबीआई के एटीएम पर अनलिमिटेड फ्री ट्रांजेक्शन की सुविधा भी मिलती है।

चेक बुक की सुविधा भी फ्री है, जिसमें हर महीने 25 चेक लीव्स बिना किसी शुल्क के मिलती हैं। इसके अलावा आरटीजीएस और एनईएफटी जैसी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन भी बिना चार्ज के की जा सकती हैं।

अग्निवीर योजना 2022 में शुरू की गई थी, जिसके तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना, नौसेना और वायुसेना में सेवा का मौका दिया जाता है। इस दौरान उन्हें ट्रेनिंग, सैलरी और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं।

इसी योजना के तहत अग्निवीरों के लिए यह डिफेंस सैलरी पैकेज तैयार किया गया, ताकि उन्हें बैंकिंग और इंश्योरेंस दोनों का लाभ एक साथ मिल सके। (Agniveer insurance cover)

पुणे से जैसलमेर तक सेना ने चलाया मिलिट्री-सिविल फ्यूजन अभियान, कई एजेंसियों को जोड़ा एक मंच पर

Military-Civil Fusion Campaign

Military-Civil Fusion Campaign: देश की सुरक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए भारतीय सेना की सदर्न कमांड ने एक खास पहल शुरू की है, जिसे मिलिट्री सिविल फ्यूजन अभियान नाम दिया गया है। इस अभियान के तहत सेना ने अलग-अलग सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर कई जगहों पर संयुक्त गतिविधियां कीं। इसका मकसद था कि किसी भी आपात स्थिति में सभी एजेंसियां एक साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें।

यह अभियान महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में चलाया गया। इसमें सेना के साथ सिविल एडमिनिस्ट्रेशन, पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां, शिक्षण संस्थान और इंडस्ट्री के लोग भी शामिल हुए।

Military-Civil Fusion Campaign: अलग-अलग एजेंसियों को एक मंच पर लाने की कोशिश

इस अभियान की खास बात यह रही कि इसमें कई तरह की एजेंसियों को एक साथ जोड़ा गया। इसमें सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स, स्टेट पुलिस, डिजास्टर मैनेजमेंट एजेंसियां, एयरपोर्ट और सिविल एविएशन से जुड़ी संस्थाएं, फॉरेस्ट और माइनिंग विभाग, एनसीसी और कई शैक्षणिक संस्थान शामिल रहे।

इन सभी ने मिलकर सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर काम किया। जैसे इंटरनल सिक्योरिटी, एयरस्पेस की निगरानी, डिजास्टर रिस्पॉन्स और महत्वपूर्ण इलाकों की सुरक्षा। इस दौरान अलग-अलग एजेंसियों ने एक-दूसरे के काम करने के तरीके को समझा और एक जैसी प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया। (Military-Civil Fusion Campaign)

Military-Civil Fusion Campaign

पुणे में हुई बड़ी टेबल टॉप एक्सरसाइज

अभियान के तहत पुणे स्थित सदर्न कमांड मुख्यालय में एक बड़ी टेबल टॉप एक्सरसाइज भी की गई, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई कि देश के अंदर अलग-अलग तरह के खतरों से कैसे निपटा जाए।

इस अभ्यास की अगुवाई लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने की। इसमें महाराष्ट्र सरकार के अधिकारी, रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी और कई सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सभी ने मिलकर संभावित खतरों पर चर्चा की और उनसे निपटने की रणनीति पर काम किया।

कई शहरों में हुए अलग-अलग अभ्यास

इस अभियान के तहत देश के अलग-अलग शहरों में विशेष गतिविधियां आयोजित की गईं। पुणे के औंध मिलिट्री स्टेशन में एक मल्टी एजेंसी एक्सरसाइज हुई, जिसमें सेना, पुलिस, सिविल एडमिनिस्ट्रेशन और एनसीसी ने मिलकर काम किया। इसका मकसद था कि किसी संकट के समय सभी एजेंसियां एक साथ कैसे प्रतिक्रिया दें।

भोपाल में काउंटर यूएएस यानी ड्रोन से जुड़े खतरों पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। इसमें मिलिट्री विशेषज्ञों के साथ सिविल एविएशन और एयरपोर्ट अथॉरिटी के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। यहां ड्रोन से बढ़ते खतरों पर चर्चा की गई।

बबीना में सेना, पुलिस और अन्य विभागों ने मिलकर जमीन स्तर पर गतिविधियां कीं। इसमें निगरानी, संयुक्त पेट्रोलिंग और आसपास के गांवों में संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दिया गया। (Military-Civil Fusion Campaign)

Military-Civil Fusion Campaign

चेन्नई और अन्य शहरों में भी हुई चर्चा

चेन्नई में विक्ट्री वॉर मेमोरियल पर एक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इसमें सेना, सिविल एडमिनिस्ट्रेशन और राज्य एजेंसियों के अधिकारी शामिल हुए। यहां इंटरनल सिक्योरिटी और संकट के समय प्रतिक्रिया पर चर्चा हुई।

बेलगावी और हैदराबाद में भी ट्रेनिंग और कोऑर्डिनेशन से जुड़ी गतिविधियां हुईं। वहीं जोधपुर और जैसलमेर जैसे रणनीतिक इलाकों में सिविल और मिलिट्री के बीच बेहतर तालमेल पर काम किया गया।

साथ काम करने से बढ़ा भरोसा

इस पूरे अभियान में सबसे अहम बात यह रही कि अलग-अलग एजेंसियां एक साथ आईं और उन्होंने मिलकर काम किया। सेना और सिविल एजेंसियों ने एक-दूसरे के अनुभव से सीखा और अपने काम करने के तरीके को बेहतर बनाया। इससे जानकारी का आदान-प्रदान तेज हुआ, फैसले जल्दी लिए गए और किसी भी स्थिति में मिलकर काम करने की क्षमता मजबूत हुई। (Military-Civil Fusion Campaign)

भारतीय सेना को मिली स्वदेशी ‘प्रहार’ मशीन गन, अदाणी डिफेंस ने डिलीवर की 2000 LMG की पहली खेप

Prahar LMG India
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Prahar LMG India: अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भारतीय सेना को लाइट मशीन गन ‘प्रहार’ की पहली खेप सौंप दी है। इस खेप में कुल 2,000 लाइट मशीन गन शामिल हैं, जिन्हें पूरी तरह भारत में तैयार किया गया है। यह पहली बार है जब किसी बड़े प्राइवेट सेक्टर की कंपनी ने देश में इस स्तर पर लाइट मशीन गन बनाकर सेना को डिलीवर की हैं।

Prahar LMG India: तय समय से पहले पूरी हुई डिलीवरी

इस प्रोजेक्ट की खास बात यह रही कि कंपनी ने तय समय से काफी पहले काम पूरा कर लिया। जहां इस डिलीवरी के लिए ज्यादा समय तय था, वहीं पहली खेप सिर्फ सात महीने में ही तैयार कर ली गई।

इसके अलावा प्रोडक्शन का पहला मॉडल भी तय समय से पहले तैयार हुआ, जिससे बड़े स्तर पर निर्माण शुरू करने में तेजी आई। इसके बाद जरूरी मंजूरी मिलने के साथ ही फुल स्केल मैन्युफैक्चरिंग शुरू कर दी गई। (Prahar LMG India)

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ग्वालियर में बनाया आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग सेंटर

इन मशीन गनों का निर्माण मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित अदाणी डिफेंस की स्मॉल आर्म्स फैसिलिटी में किया गया है। यह भारत का पहला ऐसा प्राइवेट सेक्टर हब है, जहां छोटे हथियारों का पूरा निर्माण एक ही जगह पर किया जाता है।

करीब 100 एकड़ में फैली इस यूनिट में बैरल बनाने से लेकर मशीनिंग, रोबोटिक्स, मेटल ट्रीटमेंट और टेस्टिंग तक की सभी सुविधाएं मौजूद हैं। यहां 25 मीटर लंबी अंडरग्राउंड फायरिंग रेंज भी बनाई गई है, जहां हथियारों की जांच की जाती है। (Prahar LMG India)

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‘प्रहार’ मशीन गन की खासियत

प्रहार लाइट मशीन गन 7.62 मिमी कैलिबर की है। यह गन सेमी-ऑटोमैटिक और ऑटोमैटिक दोनों मोड में फायर कर सकती है। इसमें 120 राउंड का ड्रम या बेल्ट के जरिए गोलियां भरी जा सकती हैं। इसके अलावा इसमें मजबूत बाइपॉड, एडजस्टेबल बट स्टॉक और अतिरिक्त सेफ्टी सिस्टम भी दिए गए हैं।

यह गन करीब 8 किलो वजन की है और इसकी प्रभावी रेंज लगभग 1,000 मीटर तक है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि जरूरत पड़ने पर इसे मैदान में आसानी से खोला और जोड़ा जा सके। (Prahar LMG India)

हर हथियार की कड़ी जांच

अदाणी डिफेंस के मुताबिक, सेना को देने से पहले हर मशीन गन को कई तरह के टेस्ट से गुजरना होता है। इसमें बैलिस्टिक टेस्ट, एनवायरनमेंट ट्रायल और लंबी अवधि तक चलने की जांच शामिल है। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद ही हथियार को ऑपरेशन के लिए तैयार माना जाता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि हथियार हर तरह की परिस्थितियों में सही तरीके से काम करे। (Prahar LMG India)

Prahar LMG India

90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा देश में तैयार

इस प्रोजेक्ट की एक अहम बात यह है कि इसमें 90 फीसदी से ज्यादा हिस्से भारत में ही बनाए गए हैं। इसका मतलब है कि अब छोटे हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो रही है। इस फैसिलिटी में बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी है। यहां हर साल एक लाख तक हथियार बनाए जा सकते हैं। इससे स्थानीय इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिल रहा है और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

कानपुर से मिलेगा गोला-बारूद का सपोर्ट

अदाणी डिफेंस का एक और बड़ा सेंटर उत्तर प्रदेश के कानपुर में है, जहां गोला-बारूद तैयार किया जाता है। यह यूनिट सालाना करीब 30 करोड़ राउंड छोटे हथियारों के लिए बना सकती है। इस तरह हथियार और गोला-बारूद दोनों का निर्माण देश में ही हो रहा है, जिससे पूरी सप्लाई चेन मजबूत हो रही है। (Prahar LMG India)

बिना गोली चलाए होगी T-90 टैंक गनर्स की ट्रेनिंग! भारतीय सेना खरीदेगी AI बेस्ड वर्चुअल वॉरफील्ड सिमुलेटर

T-90 Gunnery Simulator
T-90 BHISHMA

T-90 Gunnery Simulator: भारतीय सेना अब टी-90 भीष्म टैंक क्रू को सिमुलेटर पर ट्रेनिंग देगी। रक्षा मंत्रालय ने करीब 50 बेसिक गनरी सिमुलेटर खरीदने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। इन सिमुलेटर के जरिए टैंक गनर्स को बिना असली फायरिंग रेंज पर ले जाए ट्रेनिंग दी जाएगी।

यह सिमुलेटर खास तौर पर टी-90 टैंक के गनर और कमांडर को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएंगे, ताकि वे असली युद्ध जैसे माहौल में बेहतर तरीके से अभ्यास कर सकें।

T-90 Gunnery Simulator: असली फायरिंग जैसा अनुभव मिलेगा

सेना ने साफ किया है कि यह सिमुलेटर सिर्फ स्क्रीन पर ट्रेनिंग देने वाला साधारण सिस्टम नहीं होगा, बल्कि इसमें वास्तविक फायरिंग जैसा पूरा अनुभव मिलेगा। टैंक के अंदर का माहौल बिल्कुल असली टी-90 जैसा बनाया जाएगा, जिसमें गनर की सीट, कंट्रोल्स और डिस्प्ले सिस्टम भी उसी तरह काम करेंगे।

इसमें गनर को दुश्मन को पहचानने, उसे ट्रैक करने, दूरी नापने, निशाना साधने और फायर करने तक की पूरी प्रक्रिया सिखाई जाएगी। इसमें 125 मिमी की मुख्य तोप, 7.62 मिमी मशीन गन, इनवार मिसाइल और स्मोक ग्रेनेड लॉन्चर का इस्तेमाल भी सिखाया जाएगा। (T-90 Gunnery Simulator)

आवाज और झटके भी लगेंगे

इस सिमुलेटर की एक खास बात यह होगी कि इसमें सिर्फ विजुअल नहीं, बल्कि आवाज और झटकों का भी पूरा अनुभव दिया जाएगा। जब टैंक फायर करेगा तो झटका महसूस होगा और स्क्रीन पर फ्लैश भी दिखाई देगा।

इंजन की आवाज, ऑटो लोडर के चलने की आवाज, दुश्मन की फायरिंग और युद्ध में बम फटने की आवाजें भी सुनाई देंगी। इससे ट्रेनिंग लेने वाला सैनिक मानसिक रूप से उसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जैसा असली युद्ध के दौरान होता है। (T-90 Gunnery Simulator)

मशीन में होगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल

इस सिमुलेटर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का खास इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें दुश्मन के टारगेट एआई के जरिए तैयार किए जाएंगे, जो हर अभ्यास के साथ ज्यादा मुश्किल होते जाएंगे।

इंस्ट्रक्टर चाहे तो कठिनाई का स्तर खुद भी तय कर सकता है। इसके अलावा सिस्टम खुद ही यह देखेगा कि ट्रेनिंग लेने वाला सैनिक कहां गलती कर रहा है और उसे सुधारने के सुझाव भी देगा। (T-90 Gunnery Simulator)

अलग-अलग इलाकों में होगी ट्रेनिंग

इस सिस्टम में भारत के अलग-अलग सीमावर्ती इलाकों जैसा माहौल बनाया जाएगा। इसमें पश्चिमी सीमा, नियंत्रण रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा जैसे क्षेत्रों के हालात शामिल होंगे।

रेगिस्तान, मैदान, नदी के इलाके, ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र और शहरी इलाकों जैसे अलग-अलग टेरेन में ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे सैनिकों को हर तरह के ऑपरेशन के लिए तैयार किया जा सकेगा। (T-90 Gunnery Simulator)

ट्रेनिंग पर नजर रखेगा इंस्ट्रक्टर

इस सिस्टम में एक इंस्ट्रक्टर स्टेशन भी होगा, जहां से ट्रेनिंग पर नजर रखी जाएगी। इंस्ट्रक्टर यह देख सकेगा कि सैनिक कैसे प्रदर्शन कर रहे हैं, कहां गलती कर रहे हैं और उन्हें कैसे सुधारना है। साथ ही बाहर लगे डिस्प्ले पर दूसरे सैनिक भी ट्रेनिंग को देख सकेंगे।

जरूरत पड़ने पर सिस्टम में जानबूझकर खराबी भी डाली जा सकती है, ताकि सैनिकों को इमरजेंसी स्थिति से निपटना सिखाया जा सके।

साइज और मजबूती पर खास ध्यान

सेना ने सिमुलेटर के डिजाइन को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसे मिलिट्री ग्रेड मजबूती के साथ बनाया जाना होगा, ताकि यह अलग-अलग मौसम और कठिन परिस्थितियों में काम कर सके।

यह सिस्टम इतना कॉम्पैक्ट होगा कि इसे अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रक में रखा जा सके। इसका वजन और साइज भी तय सीमा के भीतर होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके।

यह सिमुलेटर -10 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक के तापमान में काम कर सकेगा और दिन में 12 से 16 घंटे तक लगातार चलने में सक्षम होगा। इसमें बैकअप पावर के लिए यूपीएस की सुविधा भी होगी। (T-90 Gunnery Simulator)

लंबी सर्विस लाइफ और मेंटेनेंस की व्यवस्था

सेना ने इस सिमुलेटर की सर्विस लाइफ करीब 15 साल तय की है। कंपनियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे लंबे समय तक इसके स्पेयर्स और मेंटेनेंस की सुविधा दे सकें।

साथ ही, अगर किसी कंपनी को प्रोडक्शन बंद करना हो, तो उसे पहले से सूचना देनी होगी, ताकि जरूरी पार्ट्स का स्टॉक तैयार किया जा सके। (T-90 Gunnery Simulator)

खरीद प्रक्रिया में स्वदेशी कंपनियों को प्राथमिकता

यह पूरी प्रक्रिया आत्मनिर्भर भारत के तहत की जा रही है। इसका मतलब है कि इसमें भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सेना कंपनियों से यह भी पूछ रही है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है। इसके आधार पर आगे चयन किया जाएगा। (T-90 Gunnery Simulator)

चीन-पाकिस्तान के लिए बुरी खबर; IAF का ‘बाज’ बनेगा और घातक, मिग-29 में वायुसेना करने जा रही बड़ा मिसाइल अपग्रेड

MiG-29 ASRAAM missile upgrade
Photo: IAF/ Gp Captain Indranil Nandi

MiG-29 ASRAAM missile upgrade: भारतीय वायुसेना अपने फेवरेट ‘बाज’ यानी मिग-29 फाइटर एयरक्राफ्ट (Fulcrum) को और ज्यादा घातक बनाने की तैयारी में है। वायुसेना मिग-29 में ASRAAM यानी एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल को लगाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने बकायदा इसके लिए प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। हाल ही में वायुसेना ने आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है, जिसमें इंडिजिनस कंपनियों से निविदा मांगी गई है।

इस अपग्रेड के तहत मिग-29 फ्लीट के 56 एयरक्राफ्ट, जिनमें 48 फाइटर और 8 ट्रेनर शामिल हैं, पर ASRAAM मिसाइल का इंटीग्रेशन और सर्टिफिकेशन किया जाएगा। इसके साथ ही नए लॉन्चर, टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और ट्रेनिंग भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे।

MiG-29 ASRAAM missile upgrade: क्यों जरूरी है यह अपग्रेड

मिग-29 भारतीय वायुसेना का एक अहम फाइटर एयरक्राफ्ट है, जिसे मिग-29UPG वर्जन में अपग्रेड किया जा चुका है। इसके बावजूद इसमें इस्तेमाल हो रही कुछ मिसाइलें अब पुरानी हो चुकी हैं। खास तौर पर शॉर्ट रेंज फाइट यानी क्लोज कॉम्बैट में इस्तेमाल होने वाली आर-73 मिसाइल 1980 के दशक की टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है, जिसकी रेंज 10-15 किमीतक है। वहीं इसमें मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल भी इस्तेमाल होती है।

आज के समय में जब एयर कॉम्बैट तेजी से बदल रहा है, जहां बेहतर सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नई मिसाइल टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है। ऐसे में ASRAAM जैसी लेटेस्ट मिसाइल के इंटीग्रेट होने से मिग-29 की कॉम्बैट क्षमता बनी रहेगी, बल्कि मॉडर्न डॉगफाइट में भी इसकी सुपीरियरिटी बनी रहेगी। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade
Photo Source: IAF

क्या है ASRAAM मिसाइल

ASRAAM एक शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (विद इन विजुअल रेंज- WVR) है, जिसे ब्रिटेन की कंपनी एमबीडीए ने डेवलप किया है। यह मिसाइल मैक-3 से ज्यादा की स्पीड से उड़ सकती है और इसकी रेंज लगभग 25 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है। ASRAAM को साल 1998 में रॉयल एयर फोर्स (RAF) में शामिल किया गया था।

इसमें एडवांस्ड इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर लगा होता है, जो दुश्मन के विमान को बेहतर तरीके से पहचान सकता है। यह मिसाइल फ्लेयर्स और जैमिंग जैसी तकनीकों से बचने में भी सक्षम है।

ASRAAM की एक खूबी यह भी है कि इसे लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च (LOBL) और लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च (LOAL) मोड में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च मोड में पायलट पहले दुश्मन के विमान को अपनी स्क्रीन या हेलमेट से देखता है और मिसाइल को उसी समय टारगेट पर लॉक कर देता है। जब लॉक हो जाता है, तब मिसाइल फायर की जाती है। इसका फायदा यह है कि मिसाइल पहले से टारगेट को पकड़ चुकी होती है, इसलिए हिट करने की संभावना ज्यादा रहती है।

वहीं, लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च ज्यादा एडवांस है। इस मोड में पायलट बिना पूरी तरह लॉक किए पहले मिसाइल दाग देता है। मिसाइल हवा में आगे बढ़ती है और उड़ते-उड़ते खुद ही टारगेट को ढूंढकर लॉक कर लेती है। इसमें पायलट सिर्फ दिशा बताता है कि दुश्मन किस तरफ है। बाकी काम मिसाइल खुद करती है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि पायलट को दुश्मन को सीधे सामने रखने की जरूरत नहीं होती। वह साइड में या दूर होते हुए भी हमला कर सकता है। कई बार दुश्मन को पता भी नहीं चलता कि मिसाइल उसकी तरफ आ रही है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade
Air Chief Marshal AP Singh with MiG-29 UPG on March 12, 2026

चीन की PL-10 और पाकिस्तान की PL-10E से कैसे करेगी मुकाबला

भारत के मुकाबले चीन और पाकिस्तान भी अपने फाइटर जेट में आधुनिक शॉर्ट रेंज मिसाइलें इस्तेमाल कर रहे हैं। चीन की PL-10 और उसका एक्सपोर्ट वर्जन PL-10E ऐसी ही मिसाइलें हैं। चीन की PL-10 मिसाइल को साल 2015 में सेवा में शामिल किया गया था। इसका डेवलपमेंट 2004 में शुरू हुआ था और 2010 में इसका डिजाइन मंजूर हुआ। इसके बाद 2013 से इसका प्रोडक्शन शुरू हो गया।

यह मिसाइल खास तौर पर चीन के नए फाइटर जेट जैसे जे-10सी, जे-16 और जे-20 के लिए बनाई गई है। यह एक शॉर्ट रेंज इंफ्रारेड गाइडेड मिसाइल है, यानी यह दुश्मन के विमान की गर्मी को ट्रैक करके उसे निशाना बनाती है।

पीएल-10 की रेंज आम तौर पर करीब 20 किलोमीटर बताई जाती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह 30 किलोमीटर तक भी जा सकती है। इसकी स्पीड मैक-4 तक पहुंच सकती है, जो इसे काफी तेज बनाती है।

अगर ASRAAM से तुलना करें, तो पीएल-10 की टॉप स्पीड ज्यादा है। लेकिन ASRAAM में बड़ा रॉकेट मोटर लगा होता है, जिससे यह ज्यादा देर तक रफ्तार बनाए रख सकती है और लंबी दूरी तक असरदार बनी रहती है।

पाकिस्तान ने भी इस मिसाइल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। वह पीएल-10ई वर्जन को अपने जेएफ-17 ब्लॉक-3 फाइटर जेट में लगा रहा है। यह डील चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग का हिस्सा है।

मिग-29 में हुए क्या-क्या अपग्रेड

हाल ही में 12 मार्च को एयर फोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आदमपुर एयरबेस पर अपग्रेड हुए मिग-29 यूपीजी को उड़ाया था। भारतीय वायुसेना के मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट पहले से ही कई अपग्रेड से गुजर चुके हैं। शुरुआत में 6 मिग-29 विमानों का अपग्रेड रूस में किया गया था, जबकि बाकी विमानों को भारत में नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में अपग्रेड किया गया। वायुसेना के अधिकारियों के अनुसार, हर एक मिग-29 को अपग्रेड करने में करीब 15 मिलियन डॉलर खर्च आया है। अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी की क्षमता काफी हद तक एफ-16 ब्लॉक 70 जैसे आधुनिक फाइटर के बराबर मानी जा रही है।

इसमें नया झुक-एमई रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक कर सकता है। हवाई मोड में यह करीब 120 किलोमीटर दूर तक दुश्मन के विमान को पहचान सकता है। यह एक साथ 10 टारगेट को ट्रैक कर सकता है और उनमें से 4 पर एक साथ हमला किया जा सकता है। इसके अलावा इसमें एडवांस एवियोनिक्स, ग्लास कॉकपिट और इन-फ्लाइट रिफ्यूलिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं।

मिग-29यूपीजी में ईएलटी-568 जैमर भी लगाया गया है। यह सिस्टम दुश्मन के रडार और मिसाइलों को भ्रमित करने में मदद करता है। इससे विमान पर हमला करना मुश्किल हो जाता है।

इसके अलावा मिग-29 में डी-29 इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार को पहचान कर उसे जाम करने में मदद करता है। इसे भारत में ही डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट ने बनाया है और इसका निर्माण बीईएल ने किया है। इसके साथ ही इसमें आईआरएसटी यानी इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम भी है, जो बिना रडार ऑन किए दुश्मन के विमान को ट्रैक कर सकता है।

इसके अलावा इसमें सिक्योर डेटा लिंक भी लगाया गया है, जिससे यह अवाक्स और ग्राउंड रडार से जुड़कर जानकारी ले सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

मिग-29 का इंजन भी बदला

मिग-29 यूपीजी में नए सीरीज-3 आरडी-33 इंजन भी लगाया गया है। जहां चीन का जे-11 फाइटर जेट थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो के मामले में करीब 1 पर है, वहीं मिग-29 यूपीजी का यह अनुपात लगभग 1.11 तक पहुंच जाता है। जिससे मिग-29 ज्यादा वजन के साथ भी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।

मिग-29 के आरडी-33 इंजन की खासियत यह है कि यह बहुत तेजी से पावर जनरेट करता है, जिससे पायलट को अचानक स्पीड और ऊंचाई बदलने में मदद मिलती है। यही वजह है कि हवाई लड़ाई के दौरान यह दुश्मन की मिसाइलों से बचने और जवाबी हमला करने में ज्यादा सक्षम माना जाता है। इन इंजनों का निर्माण भारत में ही एचएएल के कोरापुट डिवीजन में लाइसेंस के तहत किया जा रहा है। इस अपग्रेड के बाद मिग-29 अब सात हार्ड पॉइंट्स पर करीब 4,500 किलोग्राम तक हथियार ले जा सकता है, जिससे इसकी स्ट्राइक क्षमता बढ़ गई है।

इसके अलावा इस अपग्रेड से मिग-29 की रेंज में भी करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। अब यह विमान सिर्फ अपने इंटरनल फ्यूल के सहारे करीब 2,100 किलोमीटर तक मिशन पूरा कर सकता है। साथ ही इसमें एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के लिए रिट्रैक्टेबल प्रोब भी जोड़ा गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर उड़ान के दौरान ही ईंधन भरा जा सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

बढ़ जाएगी मिग-29 की लाइफ

मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट को अभी कई साल तक सेवा में रखा जाना है। भारतीय वायुसेना का प्लान इसे 2033–37 तक रिटायर करने का है। इस वजह से इसमें लगातार नए अपग्रेड किए जा रहे हैं, ताकि यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक काम करता रहे। ASRAAM का इंटीग्रेशन इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल मिग-29 की तीन स्क्वाड्रन हैं, जो अलग-अलग इलाकों में तैनात हैं। इन एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन मिशन में किया जाता है। इन बदलावों के चलते इस विमान की उम्र करीब 10 साल तक बढ़ गई है। इसके रखरखाव की लागत भी कम हुई है और इसकी ऑपरेशनल रेंज भी पहले से ज्यादा हो गई है।

इन सभी अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी अब एक आधुनिक 4 जेनरेशन फाइटर के बराबर माना जाता है। इसकी लड़ाकू क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ताकत दोनों में बड़ा सुधार हुआ है। अब यह विमान पहले की तुलना में ज्यादा समय तक उड़ान भर सकता है और ज्यादा प्रभावी तरीके से मिशन पूरा कर सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

किन मिसाइलों की जगह लेगी ASRAAM

मिग-29 में अभी दो तरह की एयर-टू-एयर मिसाइलें इस्तेमाल होती हैं। मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल और शॉर्ट रेंज मिसाइल के लिए आर-73 मिसाइल लगी है।

अब वायुसेना आर-77 की जगह स्वदेशी अस्त्र मार्क-1 और आने वाले समय में अस्त्र मार्क-2 को शामिल करने की योजना बना रही है। वहीं आर-73 की जगह ASRAAM को लाया जा रहा है।

इस बदलाव के बाद मिग-29 पूरी तरह आधुनिक मिसाइल सिस्टम से लैस हो जाएगा, जिसमें लंबी दूरी के लिए अस्त्र और नजदीकी लड़ाई के लिए ASRAAM का कॉम्बिनेशन होगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

दो कंपनियां बनाती हैं ASRAAM

ASRAAM मिसाइल को मुख्य रूप से दो कंपनियां बनाती हैं। पहली कंपनी है ब्रिटेन की एमबीडीए है, जो इस मिसाइल की असली और मुख्य निर्माता यानी ओईएम है। दुनिया भर में जो ASRAAM मिसाइल इस्तेमाल होती है, उसकी सप्लाई भी यही कंपनी करती है। यूके, ऑस्ट्रेलिया और कई फाइटर जेट जैसे टाइफून और एफ-35 में यही मिसाइल लगाई जाती है।

वहीं, दूसरी कंपनी है भारत डायनैमिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल, जो भारत की सरकारी रक्षा कंपनी है। साल 2021 में दोनों कंपनियों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत में ही ASRAAM मिसाइल को जोड़ने और तैयार करने का काम शुरू हुआ। अब हैदराबाद में बीडीएल इस मिसाइल की असेंबली, टेस्टिंग और इंटीग्रेशन करती है।

एक जैसी मिसाइलों से मिलेगा फायदा

वायुसेना अब अपने अलग-अलग फाइटर एयरक्राफ्ट में एक जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है। ASRAAM को पहले ही तेजस मार्क-1ए और जगुआर जैसे एयरक्राफ्ट में शामिल किया जा चुका है। भारतीय वायुसेना की योजना है कि धीरे-धीरे इस मिसाइल को सभी फाइटर जेट में लगाया जाए।

अगर मिग-29 में भी यही मिसाइल लगती है, तो ट्रेनिंग और मेंटेनेंस आसान हो जाएगा। पायलट एक ही तरह की मिसाइल पर ट्रेनिंग ले सकेंगे और लॉजिस्टिक्स भी सरल हो जाएगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

कैसे होगा इंटीग्रेशन

आरएफपी के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट में मिसाइल को एयरक्राफ्ट के साथ पूरी तरह जोड़ना और उसकी टेस्टिंग शामिल होगी। इसके अलावा 98 नए लॉन्चर दिए जाएंगे, जिनमें प्रोटोटाइप और प्रोडक्शन दोनों शामिल हैं।

इसके साथ ही टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और मेंटेनेंस टूल्स भी दिए जाएंगे। वायुसेना के 30 कर्मियों को इस सिस्टम के लिए खास ट्रेनिंग भी दी जाएगी, जो नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में होगी।

इस प्रक्रिया में एयरक्राफ्ट के सॉफ्टवेयर, फायर कंट्रोल सिस्टम और अन्य सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि मिसाइल पूरी तरह से काम कर सके। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

MiG-29 ASRAAM missile upgrade

हाई एल्टीट्यूड में शानदार परफॉरमेंस

2020 में लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए गतिरोध के दौरान हल्के वजन के चलते मिग-29 यूपीजी ने शानदार प्रदर्शन किया था। ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में इसकी क्षमता को देखते हुए इसे “ड्रैगन स्लेयर” का नाम भी दिया गया। 2020 में पूरी लद्दाख में स्टैंडऑफ के दौरान मिडियम-वेट फाइटर जैसे मिग-29 यूपीजी और राफेल ने उच्च हिमालयी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि भारी फाइटर जेट जैसे सुखोई-30 एमकेआई को पतली हवा के चलते कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

लद्दाख में तैनाती के दौरान मिग-29 यूपीजी को लेह और थोइस एयरबेस पर ऑपरेट किया गया। लेह करीब 10,600 फीट और थोइस लगभग 9,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। इन एयरबेस से मिग-29 ने नियमित सॉर्टीज उड़ाईं और हिमालयी इलाकों में पेट्रोलिंग की। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

मिग-29 यूपीजी की ताकत का सबसे बड़ा कारण उसका हल्का वजन है। इसका मैक्स टेकऑफ वेट करीब 27 टन है, जबकि सुखोई-30 एमकेआई लगभग 38 टन का होता है। ऊंचाई वाले इलाकों में जहां हवा पतली होती है, वहां हल्का विमान ज्यादा आसानी से लिफ्ट और थ्रस्ट हासिल कर पाता है। यही वजह है कि मिग-29 ऐसे इलाकों में ज्यादा सहज तरीके से ऑपरेट करता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

भारतीय सेना की आर्टिलरी को मिला ‘देसी बोफोर्स’ का बूस्ट, DAC में 300 धनुष तोपों की खरीद को मिली मंजूरी

Dhanush Artillery Gun India
Indian Army Dhanush Howitzer Photo By Raksha Samachar

Dhanush Artillery Gun India: भारतीय सेना की आर्टिलरी पावर को नया बूस्ट मिलने वाला है। शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में सेना के लिए 300 स्वदेशी धनुष आर्टिलरी गन सिस्टम खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है।

इस फैसले के बाद सेना के तोपखाने की ताकत में बड़ा इजाफा होने वाला है।

Dhanush Artillery Gun India: 300 नई तोपों से बढ़ेंगी रेजिमेंट

धनुष तोपों की यह बड़ी संख्या सेना में नई आर्टिलरी रेजिमेंट तैयार करने में मदद करेगी। सूत्रों के मुताबिक, इन 300 तोपों के शामिल होने के बाद सेना के पास 15 से ज्यादा नई रेजिमेंट तैयार हो सकेंगी।

अभी तक धनुष तोप की करीब 3 रेजिमेंट सेना में शामिल हो चुकी हैं और 3 और रेजिमेंट शामिल होने की प्रक्रिया में हैं। जैसे-जैसे नई तोपें मिलती जाएंगी, आर्टिलरी यूनिट्स की संख्या और बढ़ती जाएगी।

पहले चरण में साल 2019 में बुल्क प्रोडक्शन क्लियरेंस मिलने के बाद 114 धनुष तोपों का ऑर्डर दिया गया था। उम्मीद जताई जा रही है कि 114 तोपों की पूरी डिलीवरी इसी साल तक पूरी हो जाएगी। वहीं अब कुल मिलाकर धनुष की संख्या 400 से ज्यादा हो जाएगी। (Dhanush Artillery Gun India)

क्यों कहा जाता है ‘देसी बोफोर्स’

धनुष तोप को अक्सर ‘देसी बोफोर्स’ कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि इसका डिजाइन पुराने बोफोर्स गन FH-77B सिस्टम पर आधारित है, लेकिन इसमें कई नए बदलाव और सुधार किए गए हैं।

यह 155 मिमी और 45 कैलिबर की तोप है, जो करीब 38 से 40 किलोमीटर तक मार कर सकती है। पुराने बोफोर्स सिस्टम की रेंज करीब 27 किलोमीटर थी। यानी धनुष उससे काफी ज्यादा दूरी तक निशाना साध सकती है।

इसकी बैरल लंबाई बढ़ाई गई है, जिससे इसकी रेंज और सटीकता दोनों बेहतर हुई हैं। इसके साथ ही इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी जोड़े गए हैं। सस्टेन मोड में धनुष प्रति घंटा 60 राउंड तक फायर कर सकती है। (Dhanush Artillery Gun India)

स्वदेशी तकनीक से तैयार

धनुष तोप का निर्माण भारत में ही किया जा रहा है। इसे जबलपुर स्थित गन कैरिज फैक्ट्री में तैयार किया जाता है, जो अब एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड का हिस्सा है।

इस सिस्टम में 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से स्वदेशी हैं। इसका मतलब है कि इसमें ज्यादातर पार्ट्स भारत में ही बनाए जाते हैं। इससे उत्पादन पर देश का नियंत्रण बना रहता है और बाहर पर निर्भरता कम होती है।

इस प्रोजेक्ट पर काम 2011 के आसपास शुरू हुआ था और कुछ वर्षों में इसका प्रोटोटाइप तैयार किया गया। इसके बाद टेस्टिंग और सुधार के बाद इसे सेना में शामिल किया गया। (Dhanush Artillery Gun India)

कैसे काम करती है धनुष तोप

धनुष एक टोड आर्टिलरी गन है, यानी इसे किसी वाहन के जरिए खींचकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है। इसे ऑपरेट करने के लिए आमतौर पर 6 से 8 जवानों की टीम की जरूरत होती है।

इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और ऑटो लेइंग जैसी सुविधाएं दी गई हैं। इसका मतलब यह है कि यह अपने आप लक्ष्य की दिशा तय करने में मदद करती है और फायरिंग को ज्यादा सटीक बनाती है।

इसमें ऑनबोर्ड बैलिस्टिक कंप्यूटेशन सिस्टम भी है, जो हवा, दूरी और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फायरिंग की कैलकुलेशन करता है। इससे निशाना ज्यादा सटीक लगता है। (Dhanush Artillery Gun India)

ऑपरेशन सिंदूर में भी हुआ था इस्तेमाल

धनुष तोप का इस्तेमाल हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी किया गया था। इसे सीमावर्ती इलाकों में तैनात किया गया और इसका उपयोग किया गया। इस दौरान यह देखा गया कि यह तोप पहाड़ी और कठिन इलाकों में भी प्रभावी तरीके से काम कर सकती है।

सेना के आधुनिकीकरण का हिस्सा

भारतीय सेना 1999 से अपने आर्टिलरी सिस्टम को आधुनिक बनाने की योजना पर काम कर रही है। जिसे फील्ड आर्टिलरी रैशनलाइजेशन प्लान कहा जाता है। इस योजना के तहत 2027 तक करीब 2800 नई 55 मिमी तोपों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें अलग-अलग तरह की तोपें शामिल हैं। कुछ तोपें ऐसी हैं जिन्हें गाड़ियों से खींचा जाता है, कुछ ट्रक पर लगी होती हैं और कुछ खुद चलने वाली यानी सेल्फ प्रोपेल्ड होती हैं।

इसके अलावा अल्ट्रा लाइट होवित्जर तोपें भी शामिल हैं, जिन्हें हेलीकॉप्टर के जरिए पहाड़ी इलाकों तक पहुंचाया जा सकता है, जहां सड़क से पहुंचना मुश्किल होता है। (Dhanush Artillery Gun India)

पहले से मौजूद सिस्टम

सेना के पास पहले से ही कई आधुनिक तोप सिस्टम मौजूद हैं। इनमें एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर शामिल हैं, जिनकी संख्या 145 के करीब है। ये हल्की तोपें हैं और इन्हें हवाई रास्ते से ले जाया जा सकता है।

इसके अलावा के-9 वज्र नाम की ट्रैक्ड सेल्फ प्रोपेल्ड गन भी सेना में शामिल है। इसकी संख्या करीब 100 है। यह सिस्टम खास तौर पर तेजी से मूव करने और फायर करने के लिए जाना जाता है।

इन सभी सिस्टम के बीच धनुष एक मजबूत टोड आर्टिलरी विकल्प के रूप में सामने आया है, जो लंबी दूरी तक सटीक हमला कर सकता है। (Dhanush Artillery Gun India)

डीएसी में सेना को और क्या मिला

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में 55 प्रस्तावों को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी यानी एओएन के तहत मंजूरी दी गई। जो किसी एक वित्तीय वर्ष में अब तक की सबसे बड़ी मंजूरी मानी जा रही है।

सेना के हिस्से में पांच अहम सिस्टम शामिल किए गए हैं। इनमें एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम प्रमुख है, जो रियल टाइम में हवाई खतरों की पहचान और रिपोर्टिंग करने में मदद करेगा। मौजूदा समय में क्रूज मिसाइल और लोइटरिंग म्यूनिशन जैसे खतरों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यह सिस्टम सेना के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।

साथ ही, टैंक यूनिट्स को मजबूत करने के लिए आर्मर्ड पियर्सिंग टैंक अम्यूनिशन को भी मंजूरी दी गई है। इससे दुश्मन के भारी बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ सेना की क्षमता और प्रभावी होगी।

कम्युनिकेशन सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए हाई कैपेसिटी रेडियो रिले सिस्टम को शामिल किया गया है। यह सिस्टम युद्ध के दौरान संचार को सुरक्षित रखने और जैमिंग या इंटरसेप्शन से बचाने में मदद करेगा।

इसके साथ ही रनवे इंडिपेंडेंट एरियल सर्विलांस सिस्टम को भी मंजूरी मिली है। यह सिस्टम बिना किसी एयरबेस पर निर्भर हुए जमीन से ही निगरानी करने की सुविधा देता है। खास तौर पर लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे इलाकों में, जहां एयरफील्ड की कमी होती है, वहां यह सिस्टम काफी उपयोगी माना जा रहा है। (Dhanush Artillery Gun India)