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भारतीय वायुसेना को मिलेंगे 5 और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम, DAC ने दी 2.38 लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी

DAC S-400 India Approval
Pic Source- IAF Disha

DAC S-400 India Approval: सरकार ने भारतीय वायुसेना के लिए अतिरिक्त एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह फैसला शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में लिया गया।

इस मंजूरी के बाद अब एस-400 सिस्टम की खरीद की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर शुरू हो जाएगी। इससे पहले डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने भी पांच अतिरिक्त यूनिट खरीदने की सिफारिश की थी। अब अंतिम मंजूरी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की बैठक में दी जाएगी।

DAC S-400 India Approval: ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार हुआ इस्तेमाल

एस-400 सिस्टम का इस्तेमाल हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था। यह पहली बार था जब इस सिस्टम का कॉम्बैट डेब्यू हुआ। इस ऑपरेशन में एस-400 ने पाकिस्तान के एक एयरक्राफ्ट को करीब 300 किलोमीटर की दूरी से निशाना बनाया।

यह अब तक का सबसे लंबी दूरी का इंटरसेप्शन माना जा रहा है। इस घटना के बाद इस सिस्टम की क्षमता को लेकर वायुसेना के अंदर भरोसा और मजबूत हुआ।

अभी कितनी यूनिट हैं और क्या है स्थिति

भारत ने साल 2018 में रूस के साथ एस-400 सिस्टम खरीदने का बड़ा समझौता किया था। इस डील के तहत कुल पांच स्क्वाड्रन मिलने थे। इनमें से अब तक तीन स्क्वाड्रन भारत को मिल चुके हैं।

पहली यूनिट दिसंबर 2021 में मिली थी, दूसरी अप्रैल 2022 में और तीसरी फरवरी 2023 में डिलीवर हुई। बाकी दो यूनिट 2024 तक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से डिलीवरी में देरी हो गई।

अब रक्षा अधिकारियों के अनुसार, चौथी यूनिट अगले कुछ महीनों में मिल सकती है, जबकि पांचवीं यूनिट साल के आखिर तक मिलने की संभावना है।

मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट को भी मिली थी मंजूरी

ऑपरेशन सिंदूर के बाद डीएसी ने एस-400 सिस्टम के लिए एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट को भी मंजूरी दी थी। किसी भी बड़े सैन्य सिस्टम के लिए मेंटेनेंस बेहद जरूरी होता है, ताकि वह लंबे समय तक सही तरीके से काम करता रहे।

इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत सिस्टम की सर्विसिंग, मरम्मत और जरूरी अपडेट किए जाते हैं। समय-समय पर इसे रिन्यू भी किया जाता है, जिससे सिस्टम की कार्यक्षमता बनी रहती है।

एस-400 सिस्टम की खूबियां

एस-400 एक लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जो दुश्मन के हवाई खतरों को दूर से ही पहचान कर उन्हें नष्ट कर सकता है। इसका रडार करीब 600 किलोमीटर दूर तक आने वाले टारगेट को डिटेक्ट कर सकता है।

यह सिस्टम एक साथ 100 से ज्यादा टारगेट को ट्रैक कर सकता है और उनमें से कई को एक साथ निशाना बना सकता है। इसकी खासियत यह है कि यह अलग-अलग तरह के खतरों को पहचान सकता है।

इसमें फाइटर जेट, स्ट्रैटेजिक बॉम्बर, अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे टारगेट शामिल हैं। यह सिस्टम इन सभी को 400 किलोमीटर तक की दूरी से इंटरसेप्ट करने की क्षमता रखता है।

चार तरह की मिसाइलों से लैस

एस-400 सिस्टम में चार अलग-अलग रेंज की मिसाइलें इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें 400 किलोमीटर, 250 किलोमीटर, 120 किलोमीटर और 40 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलें शामिल हैं।

इसका मतलब यह है कि यह सिस्टम अलग-अलग दूरी पर आने वाले टारगेट को उनकी स्थिति के हिसाब से निशाना बना सकता है। यही वजह है कि इसे मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा माना जाता है।

बड़े स्तर पर डिफेंस खरीद को मंजूरी

इसी बैठक में सिर्फ एस-400 ही नहीं, बल्कि कई अन्य रक्षा खरीद प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई है। कुल मिलाकर करीब 2.38 लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी गई है।

इस वित्तीय वर्ष में अब तक कुल 6.73 लाख करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी मिल चुकी है। यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।

इन प्रस्तावों में सेना, वायुसेना और कोस्ट गार्ड के लिए अलग-अलग तरह के सिस्टम शामिल हैं। इसमें एयर डिफेंस, आर्टिलरी, कम्युनिकेशन सिस्टम, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और ड्रोन जैसे उपकरण शामिल हैं।

सेना और वायुसेना के लिए अलग-अलग योजनाएं

सेना के लिए एयर डिफेंस ट्रैक्ड सिस्टम, धनुष गन सिस्टम और टैंक के लिए खास गोला-बारूद जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। इसके अलावा कम्युनिकेशन सिस्टम को मजबूत करने के लिए हाई कैपेसिटी रेडियो रिले और निगरानी के लिए नए सिस्टम पर भी काम किया जाएगा।

वायुसेना के लिए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम को मंजूरी दी गई है, जिससे पुराने विमानों की जगह नए विमान लिए जाएंगे। इसके अलावा स्ट्राइक ड्रोन और फाइटर एयरक्राफ्ट के इंजन अपग्रेड जैसे प्रोजेक्ट भी शामिल हैं।

कोस्ट गार्ड के लिए भी नए एयर कुशन व्हीकल्स खरीदने की योजना को मंजूरी दी गई है, जिनका इस्तेमाल समुद्री गश्त और रेस्क्यू ऑपरेशन में किया जाएगा।

858 करोड़ की डिफेंस डील, सेना को मिलेगा तुंगुश्का का ‘अपग्रेड’, नौसेना को P8I मेंटेनेंस सपोर्ट

Tunguska-P8i contracts

Tunguska-P8i contracts: भारत सरकार ने डिफेंस सेक्टर को मजबूती देने के लिए शुक्रवार को दो बड़े समझौते किए हैं। कुल 858 करोड़ रुपये के इन सौदों में एक तरफ भारतीय सेना के लिए तुंगुश्का एयर डिफेंस मिसाइल गन सिस्टम के लिए मिसाइलें/स्पेयर्स खरीदे जाएंगे, वहीं दूसरी तरफ नौसेना के खास पी-8आई विमान की देखरेख और मेंटेनेंस की व्यवस्था की जाएगी।

Tunguska-P8i contracts: सेना के लिए तुंगुश्का एयर डिफेंस सिस्टम का अपग्रेड

पहला कॉन्ट्रैक्ट 445 करोड़ रुपये का है, जिसके तहत भारतीय सेना के तुंगुश्का एयर डिफेंस मिसाइल गन सिस्टम के लिए मिसाइलें/स्पेयर्स खरीदे जाएंगे। यह समझौता रूस की कंपनी जेएससी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ किया गया है।

Tunguska-P8i contracts

तुंगुश्का एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम है, जो आसमान से आने वाले खतरों को रोकने के लिए इस्तेमाल होता है। इसमें मिसाइल और गन दोनों का कॉम्बिनेशन होता है, जिससे यह कम दूरी पर तेजी से हमला करने वाले टारगेट को भी निशाना बना सकता है। इस सिस्टम की खास बात यह है कि यह सिस्टम ड्रोन और मिसाइलों को निशाना बना सकता है।

आज के समय में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लो फ्लाइंग एयरक्राफ्ट जैसे खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में तुंगुश्का जैसे सिस्टम सेना की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। यह सिस्टम बहुत कम समय में रेस्पॉन्स देता है और चलते-फिरते भी इस्तेमाल किया जा सकता है। भारतीय सेना में यह सिस्टम 1990 में शामिल किया गया था। इसकी मिसाइलों की रेंज 8-10 किमी तक है, जबकि यह पांच किमी दूर से ही गोलियों के जरिए किसी ड्रोन को निशाना बना सकता है। लेकिन समय के साथ यह सिस्टम पुराना हो गया है और इसे अपग्रेड की जरूरत है। इस सौदे के जरिए भारतीय सेना की मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम और मजबूत होगी। (Tunguska-P8i contracts)

नौसेना के पी8आई विमानों की होगी देश में ही देखरेख

दूसरा कॉन्ट्रैक्ट 413 करोड़ रुपये का है, जो भारतीय नौसेना के पी8आई लॉन्ग रेंज मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट की मेंटेनेंस के लिए किया गया है। यह समझौता बोइंग इंडिया डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ हुआ है।

पी8आई विमान भारतीय नौसेना के सबसे अहम विमानों में से एक है। इसका इस्तेमाल समुद्र में निगरानी, दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और लंबी दूरी तक गश्त करने के लिए किया जाता है।

अब तक इन विमानों की बड़ी मरम्मत और जांच के लिए कई बार विदेश पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन इस नए कॉन्ट्रैक्ट के बाद इनकी डिपो लेवल मेंटेनेंस भारत में ही की जाएगी। (Tunguska-P8i contracts)

Tunguska-P8i contracts

देश में बनेगा मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर

इस समझौते के तहत भारत में ही एमआरओ यानी मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा विकसित की जाएगी। जिसके तहत विमान की गहरी जांच, मरम्मत और जरूरी बदलाव देश के अंदर ही किए जाएंगे।

इससे समय की बचत होगी और ऑपरेशनल उपलब्धता भी बढ़ेगी। यानी विमान ज्यादा समय तक मिशन के लिए तैयार रहेंगे।

यह कदम सरकार की आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया नीति के तहत उठाया गया है। इसमें खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में 100 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट यानी स्वदेशी भागीदारी रखी गई है। (Tunguska-P8i contracts)

पी8आई विमान क्यों है अहम

पी8आई विमान लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है और समुद्र के बड़े इलाके पर नजर रख सकता है। इसमें एडवांस सेंसर और रडार लगे होते हैं, जो पानी के नीचे छिपी पनडुब्बियों का भी पता लगा सकते हैं। यह विमान भारतीय महासागर क्षेत्र में निगरानी के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसके जरिए नौसेना दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखती है और समय रहते कार्रवाई कर सकती है। (Tunguska-P8i contracts)

ईरान के मिसाइल लॉन्चर रोकने के लिए अमेरिका की नई चाल, आसमान से गिरा रहा कैन फूड जैसे बम पैकेट

US mines Iran missile bases

US mines Iran missile bases: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने उसके एक इलाके में फाइटर जेट के जरिए ऐसे विस्फोटक पैकेट गिराए हैं, जो दिखने में खाने के डिब्बों जैसे हैं, लेकिन खोलते ही फट जाते हैं। यह दावा खास तौर पर शिराज शहर के आसपास के इलाकों को लेकर किया गया है, जहां ईरान के अहम मिसाइल ठिकाने मौजूद बताए जाते हैं।

ईरान की सरकारी एजेंसी तसनीम न्यूज ने सोशल मीडिया पर इस बारे में जानकारी दी और कुछ तस्वीरें भी शेयर कीं। इन तस्वीरों में छोटे-छोटे डिब्बे जैसे ऑब्जेक्ट दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें विस्फोटक बताया जा रहा है।

US mines Iran missile bases: ‘कैन फूड’ जैसे दिखने वाले विस्फोटक

तसनीम की रिपोर्ट के मुताबिक, ये विस्फोटक पैकेट देखने में बिल्कुल रेडीमेड कैन फूड जैसे लगते हैं। इनका आकार टूना फिश के डिब्बों से थोड़ा बड़ा बताया गया है। दावा किया गया कि जब लोग इन्हें खोलने की कोशिश करते हैं, तो ये तुरंत फट जाते हैं और गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि शिराज के दक्षिणी हिस्से और खासकर कफारी नाम के गांव में ऐसे पैकेट आसमान से गिराए गए। कुछ लोगों की मौत होने का भी दावा किया गया है, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

क्या ये लैंडमाइन हैं?

तस्वीरों और वीडियो के आधार पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये सामान्य बम नहीं, बल्कि एंटी-टैंक लैंडमाइन हो सकते हैं। खास तौर पर इन्हें बीएलयू-91/बी नाम के एयर-ड्रॉप्ड माइंस जैसा बताया जा रहा है।

ये माइंस जमीन पर गिरने के बाद वहीं रह जाते हैं और जब कोई भारी वाहन या व्यक्ति इनके संपर्क में आता है, तो विस्फोट हो सकता है। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि दुश्मन के टैंक, ट्रक या भारी उपकरणों को रोका जा सके।

इन माइंस को हवा से गिराने के लिए खास तरह के डिस्पेंसर इस्तेमाल किए जाते हैं, जो एक ही बार में कई माइंस को बड़े इलाके में फैला देते हैं। (US mines Iran missile bases)

मिसाइल ठिकानों के पास क्यों गिराए जा रहे हैं?

जिस इलाके में ये माइंस मिलने की बात कही जा रही है, वह शिराज के पास एक अंडरग्राउंड मिसाइल फैसिलिटी के करीब बताया गया है। इन्हें अक्सर “मिसाइल सिटी” कहा जाता है, जहां ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों को जमीन के नीचे सुरक्षित रखता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन माइंस को ऐसे इलाकों में गिराने का मकसद इन ठिकानों तक पहुंचने वाले रास्तों को बंद करना हो सकता है। अगर रास्तों पर माइंस बिछा दिए जाएं, तो भारी गाड़ियां और लॉन्चर वहां तक नहीं पहुंच पाएंगे।

इससे मिसाइल लॉन्च करने में दिक्कत हो सकती है, क्योंकि मोबाइल लॉन्चर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना मुश्किल हो जाएगा। (US mines Iran missile bases)

लगातार हमलों के बावजूद एक्टिव हैं लॉन्चर

अमेरिका और उसके सहयोगी देश पिछले कुछ समय से ईरान के मिसाइल ठिकानों पर लगातार एयर स्ट्राइक कर रहे हैं। इन हमलों का मकसद मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च साइट्स को नष्ट करना है।

इसके बावजूद ईरान अब भी अलग-अलग जगहों से मिसाइल दागने में सफल हो रहा है। बताया जाता है कि वह अपने लॉन्चर को अंडरग्राउंड टनल में छिपाकर रखता है और जरूरत पड़ने पर बाहर लाकर लॉन्च करता है।

यही वजह है कि सिर्फ बमबारी से इन सिस्टम्स को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में माइंस जैसी रणनीति अपनाने की बात सामने आ रही है। (US mines Iran missile bases)

मोबाइल लॉन्चर बन रहे चुनौती

ईरान की मिसाइल रणनीति का एक अहम हिस्सा मोबाइल लॉन्चर हैं। ये ऐसे वाहन होते हैं, जिन पर मिसाइलें लगाई जाती हैं और उन्हें अलग-अलग जगहों से लॉन्च किया जा सकता है।

इन लॉन्चर को लगातार एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। अगर इनके रास्तों में माइंस बिछा दिए जाएं, तो इनकी मूवमेंट सीमित हो सकती है।

यह रणनीति सीधे हमले से अलग है, क्योंकि इसमें दुश्मन के मूवमेंट को रोकने की कोशिश की जाती है। (US mines Iran missile bases)

क्या है ‘गेटर’ माइंस सिस्टम

जिस तरह की माइंस की बात हो रही है, उन्हें गेटर सिस्टम का हिस्सा माना जाता है। इसमें दो तरह की माइंस होती हैं – एंटी-टैंक और एंटी-पर्सनल। हालांकि सामने आई तस्वीरों में सिर्फ एंटी-टैंक माइंस जैसे ऑब्जेक्ट दिखाई दे रहे हैं। ये माइंस जमीन पर गिरने के बाद एक्टिव हो जाते हैं और किसी भारी दबाव या संपर्क पर विस्फोट करते हैं। इनमें एक खास फीचर यह भी होता है कि इन्हें पहले से तय समय के बाद खुद ही नष्ट होने के लिए सेट किया जा सकता है। यह समय कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक हो सकता है। (US mines Iran missile bases)

नागरिकों के लिए खतरा

ऐसे माइंस का सबसे बड़ा खतरा आम लोगों के लिए होता है। अगर ये रिहायशी इलाके में गिरते हैं, तो लोग अनजाने में इन्हें छू सकते हैं या उठा सकते हैं, जिससे हादसा हो सकता है। ईरान ने जो दावा किया है, उसमें भी यही कहा गया है कि लोग इन्हें सामान्य चीज समझकर खोल रहे थे और तभी विस्फोट हो रहा था।

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर ऐसे मिसाइल ठिकाने शहरों से दूर होते हैं और वहां आम लोगों की पहुंच सीमित रहती है। फिर भी अगर माइंस गांव या रिहायशी इलाके के पास गिरते हैं, तो खतरा बढ़ जाता है।

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, वे सोशल मीडिया और ईरानी मीडिया के जरिए आए हैं।

कुछ ओपन सोर्स जांच करने वाले समूहों ने इन लोकेशंस की पहचान करने की कोशिश की है और कुछ वीडियो को शिराज के पास के इलाकों से जोड़ा है। लेकिन यह साफ नहीं है कि ये माइंस किसने गिराए और कब गिराए गए।

अमेरिका की तरफ से भी इस बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इस मुद्दे पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है। (US mines Iran missile bases)

800 किलोमीटर तक वार करेगी सुपरसोनिक ब्रह्मोस! सेना देने जा रही बड़ा ऑर्डर

BrahMos Missile 800 km
File Photo

BrahMos Missile 800 km: भारतीय सेना अब अपनी स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत करने के लिए 800 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी कर रही है। अभी तक सेना के पास जो ब्रह्मोस मिसाइलें हैं, उनकी रेंज करीब 450 किलोमीटर तक है, लेकिन अब उसे और लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की जरूरत महसूस हो रही है।

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर जल्द ही एक उच्चस्तरीय बैठक में फैसला लिया जा सकता है। यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों में जमकर लंबी दूरी की मिसाइलें इस्तेमाल की जा रहीं हैं।

BrahMos Missile 800 km: ब्रह्मोस मिसाइल क्यों खास है

ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, यानी यह आवाज की गति से कई गुना ज्यादा रफ्तार से उड़ती है। इसकी स्पीड इतनी ज्यादा होती है कि दुश्मन के पास इसे रोकने के लिए बहुत कम समय बचता है। यह मिसाइल जमीन से जमीन, जहाज से जहाज और हवा से जमीन तक अलग-अलग तरह के टारगेट पर हमला कर सकती है।

इस मिसाइल को भारत और रूस ने मिलकर डेवलप किया है। समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए हैं और अब इसके ज्यादातर हिस्से भारत में ही बनाए जा रहे हैं। यह मिसाइल बेहद सटीक मानी जाती है और अपने टारगेट को बहुत कम गलती के साथ भेद सकती है। (BrahMos Missile 800 km)

अब क्यों बढ़ाई जा रही है रेंज

सेना के पास पहले से मौजूद 450 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलें अपने काम में प्रभावी रही हैं, लेकिन अब बदलते युद्ध के तरीके को देखते हुए लंबी दूरी से हमला करने की जरूरत बढ़ गई है। 800 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाली मिसाइल का मतलब है कि सेना दुश्मन के अंदरूनी इलाकों तक बिना आगे बढ़े ही हमला कर सकती है।

इससे सैनिकों को सीमा के पास जाने की जरूरत कम होगी और दूर से ही अहम ठिकानों को निशाना बनाया जा सकेगा। लंबी दूरी की मिसाइलें खास तौर पर एयर बेस, कमांड सेंटर और लॉजिस्टिक हब जैसे टारगेट को नष्ट करने में इस्तेमाल होती हैं। (BrahMos Missile 800 km)

ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ताकत

पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइलों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना और वायुसेना ने मिलकर पाकिस्तान के कई एयर बेस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। मिसाइलें बहुत कम समय में अपने टारगेट तक पहुंचीं और बड़े नुकसान का कारण बनीं। इस अनुभव के बाद सेना के अंदर यह भरोसा और मजबूत हुआ कि ब्रह्मोस जैसे हथियार भविष्य के युद्ध में बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं।

नई पीढ़ी के युद्ध की तैयारी

भारतीय सेना अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। बदलते समय के साथ सेना अपनी रणनीति में बड़े बदलाव कर रही है। अब फोकस ऐसे हथियारों पर है जो तेजी से, सटीक और दूर से हमला कर सकें।

इसी के तहत ड्रोन और मिसाइलों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। सेना अपने अलग-अलग रेजिमेंट में खास ड्रोन यूनिट तैयार कर रही है। ये ड्रोन निगरानी के साथ-साथ हमले में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

इसके साथ ही एक अलग मिसाइल फोर्स तैयार करने की भी योजना पर काम चल रहा है। इसका मकसद यह है कि जरूरत पड़ने पर बड़ी संख्या में मिसाइलों का इस्तेमाल किया जा सके। (BrahMos Missile 800 km)

सेना खुद भी बना रही है ड्रोन

सेना ने अपने वर्कशॉप में ड्रोन बनाना भी शुरू कर दिया है। इनका उत्पादन बड़े स्तर पर किया जा रहा है, ताकि बाहर पर निर्भरता कम की जा सके। छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन अब सेना की रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा बन चुके हैं।

इन ड्रोन का इस्तेमाल सीमा पर निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरी जानकारी जुटाने के लिए किया जाता है। कई मामलों में इन्हें हमले के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। (BrahMos Missile 800 km)

तीनों सेनाओं के पास है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस मिसाइल सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि नौसेना और वायुसेना के पास भी मौजूद है। नौसेना इसे जहाजों से दागती है, जबकि वायुसेना इसे फाइटर विमान से लॉन्च करती है। सेना के पास इसका जमीन से दागने वाला वर्जन है। इस मिसाइल की खासियत यह है कि इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि यह तीनों सेनाओं के लिए एक अहम हथियार बन चुका है। (BrahMos Missile 800 km)

ब्रह्मोस का अगला वर्जन भी तैयार

ब्रह्मोस का एक नया और हल्का वर्जन भी तैयार किया जा रहा है, जिसे ब्रह्मोस नेक्स्ट जेनरेशन कहा जाता है। यह मौजूदा मिसाइल से छोटा और हल्का होगा, जिससे इसे ज्यादा तरह के फाइटर विमान में लगाया जा सकेगा। खासतौर पर स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान में इसे लगाने की योजना है। इससे वायुसेना की मारक क्षमता और बढ़ जाएगी और कम दूरी में ज्यादा मिसाइलें ले जाई जा सकेंगी।

ब्रह्मोस मिसाइल के उत्पादन में अब भारत की भूमिका पहले से ज्यादा बढ़ गई है। इसके कई हिस्से अब देश में ही बनाए जा रहे हैं। इससे उत्पादन तेज हुआ है और लागत भी कम हुई है। लखनऊ समेत कई जगहों पर इसके निर्माण और परीक्षण के लिए सुविधाएं तैयार की गई हैं। इससे सेना को समय पर मिसाइलें मिल पा रही हैं और जरूरत के हिसाब से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। (BrahMos Missile 800 km)

सेना को सप्लाई किए जाने वाले ड्रोन में ‘चीनी घुसपैठ’ का खतरा, अब पास करना होगा 20 पॉइंट सिक्योरिटी टेस्ट

Military Drone Security Framework

Military Drone Security Framework: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। अब कोई भी ड्रोन सीधे सेना में शामिल नहीं होगा। अब भारतीय सेनाओं के लिए खरीदे जाने वाले हर ड्रोन को 20 पॉइंट सिक्योरिटी टेस्ट पास करना जरूरी होगा। यह कदम खास तौर पर उस खतरे को देखते हुए उठाया गया है, जिसमें “मेड इन इंडिया” के नाम पर इस्तेमाल हो रहे ड्रोन के अंदर चीनी हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर पाए गए हैं।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सेना के भीतर यह चिंता बढ़ रही थी कि कुछ ड्रोन दिखने में भारतीय हैं, लेकिन उनके अंदर लगे अहम कंपोनेंट्स विदेशी हो सकते हैं, जो सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

Military Drone Security Framework: नया ड्रोन सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

रक्षा मंत्रालय ने एक नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसके तहत हर ड्रोन को खरीद से पहले सख्त जांच से गुजरना होगा। यह फ्रेमवर्क सेना, नौसेना और वायुसेना के साथ मिलकर तैयार किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी ड्रोन सिस्टम बिना पूरी जांच के सेना में शामिल न हो।

यह भी पढ़ें: मिलिट्री ड्रोन बनाने के लिए कड़े होंगे नियम, चीनी पार्ट्स पर लगेगा पूरा ब्रेक, नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार

इस नई व्यवस्था में ड्रोन को सिर्फ उड़ान क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी साइबर सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और कंट्रोल सिस्टम की मजबूती के आधार पर भी जांचा जाएगा। (Military Drone Security Framework)

चीन से जुड़ा है खतरा

भारतीय एजेंसियों को यह इनपुट मिल रहे थे कि कई ड्रोन में ऐसे पार्ट्स लगे हैं जो चीन में बने हैं। यह हार्डवेयर या फर्मवेयर के जरिए ड्रोन की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं या उसे कंट्रोल भी कर सकते हैं।

इसका खतरा सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं है। अगर किसी ड्रोन का कंट्रोल बाहर से लिया जा सके, तो वह मिशन के दौरान गलत दिशा में जा सकता है या संवेदनशील जानकारी बाहर भेज सकता है। इसी वजह से अब हर ड्रोन को पूरी तरह जांचने का फैसला लिया गया है। (Military Drone Security Framework)

सीमा पर हुई घटना ने बढ़ाई चिंता

पिछले साल एक घटना ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया। पूर्वी सेक्टर में चीन सीमा के पास उड़ रहा एक भारतीय ड्रोन अचानक अपनी दिशा से भटक गया और चीन के नियंत्रण वाले इलाके में पहुंच गया। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने उस ड्रोन का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। कुछ समय तक उसे ऑपरेट करने के बाद उन्होंने उसे वापस लौटा दिया। यह ड्रोन इजरायली तकनीक पर बेस्ड था और इसमें एन्क्रिप्टेड डेटा लिंक भी था, इसके बावजूद उसका कंट्रोल छिन जाना सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील था।

सात बड़े खतरों की हुई पहचान

नए फ्रेमवर्क में ड्रोन से जुड़े सात प्रमुख खतरों की पहचान की गई है। इसमें ड्रोन और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के बीच कम्युनिकेशन लिंक को इंटरसेप्ट करना, जीपीएस जैमिंग या स्पूफिंग, फर्मवेयर के जरिए कंट्रोल हासिल करना, डेटा चोरी, इंटरनेट के जरिए डेटा बाहर भेजना, बाहर से भेजे गए मैलिशियस अपडेट और नेटवर्क से जुड़े डिवाइसेस के जरिए अतिरिक्त डेटा कलेक्शन शामिल हैं। इन सभी खतरों को ध्यान में रखते हुए टेस्टिंग सिस्टम तैयार किया गया है, ताकि ड्रोन के हर हिस्से को अलग-अलग स्तर पर जांचा जा सके। (Military Drone Security Framework)

कैसे काम करेगा 20 पॉइंट टेस्ट सिस्टम

रक्षा मंत्रालय ने जो नया सिस्टम बनाया है, उसमें कुल 20 टेस्ट होंगे। इनमें 10 हार्डवेयर से जुड़े होंगे और 10 सॉफ्टवेयर से। हार्डवेयर टेस्ट में ड्रोन के अंदर लगे इंटीग्रेटेड सर्किट की जांच की जाएगी। यह देखा जाएगा कि कहीं उनमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई है। इसके अलावा सिक्योर बूट सिस्टम, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड की परतों की जांच और अलग-अलग हिस्सों के बीच होने वाले कम्युनिकेशन की सिक्योरिटी भी चेक की जाएगी।

वहीं सॉफ्टवेयर टेस्ट में यह देखा जाएगा कि ड्रोन में इस्तेमाल हो रहे क्रिप्टोग्राफिक-की कितनी सुरक्षित हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम की मेमोरी प्रोटेक्शन, डेटा ट्रांसफर के दौरान सिक्योरिटी और फर्मवेयर को बिना अनुमति बदले जाने से रोकने की क्षमता की भी जांच होगी। साथ ही यह देखा जाएगा कि ड्रोन का ऑपरेटिंग सिस्टम, डेटा ट्रांसफर और कंट्रोल सिस्टम सुरक्षित है या नहीं। इसमें यह भी जांचा जाएगा कि कहीं ड्रोन को दूर से हैक करके कंट्रोल तो नहीं किया जा सकता।

आठ अहम हिस्सों पर खास नजर

ड्रोन के आठ हिस्सों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, उसका फर्मवेयर, ट्रांसमिशन यूनिट, आईएनएस और जीपीएस मॉड्यूल, सेंसर, ग्राउंड डेटा टर्मिनल और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन का सॉफ्टवेयर शामिल हैं। इन हिस्सों में अगर कोई भी कमजोरी होती है, तो पूरा सिस्टम खतरे में आ सकता है। इसलिए इन पर सबसे ज्यादा सख्ती रखी गई है। (Military Drone Security Framework)

किन ड्रोन पर लागू होंगे नियम

अभी यह नियम छोटे और हल्के ड्रोन पर लागू किया गया है, जिन्हें लो, स्लो और स्मॉल कैटेगरी में रखा जाता है। इसमें नैनो, माइक्रो और छोटे क्वाडकॉप्टर और हेक्साकॉप्टर जैसे ड्रोन शामिल हैं। ये वही ड्रोन हैं, जो सेना में निगरानी, टोही और सीमित ऑपरेशन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। इन्हीं में सबसे ज्यादा सुरक्षा खतरे भी सामने आए हैं।

टेस्टिंग कहां और कैसे होगी

ड्रोन की जांच भारत में ही होगी। इसके लिए सिर्फ उन्हीं लैब को अनुमति दी जाएगी, जो एनएबीएल से मान्यता प्राप्त हों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल कर चुकी हों। फिलहाल क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ही एक ऐसी संस्था है, जो पूरी टेस्टिंग प्रक्रिया को संभाल सकती है। इसके अलावा डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस सिकंदराबाद में एक नई टेस्टिंग सुविधा तैयार कर रहा है। (Military Drone Security Framework)

गलत जानकारी देने पर सख्त कार्रवाई

अगर कोई कंपनी अपने ड्रोन के पार्ट्स या सॉफ्टवेयर के बारे में गलत जानकारी देती है, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होगी। ऐसे विक्रेताओं को सीधे सस्पेंड किया जा सकता है या भविष्य के कॉन्ट्रैक्ट से बाहर किया जा सकता है और ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।

रक्षा उत्पादन विभाग एक सेंट्रल डेटाबेस भी बनाएगा, जिसमें उन कंपनियों और ड्रोन मॉडल्स की जानकारी होगी जो सभी टेस्ट पास कर चुके हैं। एक बार मंजूरी मिलने के बाद उसी मॉडल को दोबारा टेस्ट की जरूरत नहीं होगी, जब तक उसमें कोई बदलाव न किया जाए।

इसके अलावा ड्रोन को सेना में शामिल करने के बाद भी उसकी निगरानी जारी रहेगी। समय-समय पर उसके सॉफ्टवेयर अपडेट और सुरक्षा जांच की जाएगी। अगर किसी ड्रोन में बाद में कोई कमजोरी पाई जाती है, तो उसे तुरंत ठीक किया जाएगा या सिस्टम से हटाया जा सकता है। (Military Drone Security Framework)

बनी हुई है सप्लाई चेन की चुनौती

हालांकि यह नया फ्रेमवर्क काफी सख्त है, लेकिन एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है। भारत में चिप स्तर पर पूरी तरह स्वदेशी निर्माण अभी शुरुआती चरण में है। पहले एक सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए हार्डवेयर के सोर्स को ट्रैक किया जाता था, लेकिन नवंबर 2024 में उसे बंद कर दिया गया। इसके बाद सप्लाई चेन की पूरी ट्रेसबिलिटी अभी भी एक अधूरी कड़ी बनी हुई है। इस वजह से यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि हर पार्ट पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। इसलिए फिलहाल टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। (Military Drone Security Framework)

स्वदेशी सब-मशीन गन ‘अस्मी’ के डिजाइनर कर्नल प्रसाद बंसोड़ को मिला बड़ा सम्मान, SMG की सेनाओं में लगातार बढ़ रही डिमांड

Asmi Machine Pistol
Lt Gen RC Tiwari, #ArmyCdrEC awarded the GOC-in-C, #EasternCommand Commendation Card to Col Prasad Bansod.

Asmi Machine Pistol: भारतीय सेना में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे अधिकारी कर्नल प्रसाद बंसोड़ को सम्मानित कियाा गया है। ईस्टर्न कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी ने कर्नल प्रसाद बंसोड़ को प्रशंसा पत्र से सम्मानित किया है। यह सम्मान उन्हें ‘अस्मी’ सब-मशीन गन (एसएमजी) के डेवलपमेंट में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है।

Asmi Machine Pistol: ‘अस्मी’ मशीन पिस्टल के पीछे है कर्नल बंसोड़

अस्मी’ नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका मतलब होता है आत्मसम्मान और गर्व। कर्नल प्रसाद बंसोड़ ने भारतीय सेना की स्वदेशी मशीन पिस्टल ‘अस्मी’ के डिजाइन में अहम भूमिका निभाई है। यह एक 9 एमएम मशीन पिस्टल है, जिसे खास तौर पर क्लोज क्वार्टर बैटल यानी नजदीकी लड़ाई के लिए तैयार किया गया है। इस हथियार का डिजाइन पूरी तरह भारत में तैयार किया गया है और इसमें सेना की जरूरतों को ध्यान में रखा गया है।

‘अस्मी’ पूरी तरह स्वदेशी हथियार है और इसका उत्पादन भारत में ही किया जा रहा है। इसे हैदराबाद की कंपनी लोकेश मशीन्स लिमिटेड बना ररहाा है। यह पहली बार है जब किसी निजी कंपनी ने भारतीय सेना को इस तरह की स्वदेशी सबमशीन गन सप्लाई की है।

हल्की, कॉम्पैक्ट और इस्तेमाल में आसान

‘अस्मी’ का डिजाइन और विकास साल 2020 में शुरू हुआ था। तब लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद बंसोड़ ने बहुत कम समय में तैयार किया। उन्होंने इसे करीब चार महीनों में पूरा कर लिया इस प्रोजेक्ट में उन्होंने डीआरडीओ की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट, पुणे के साथ मिलकर काम किया।

कर्नल बंसोड़ के पास पहले से हथियार डिजाइन का अनुभव था। उन्होंने इंसास राइफल को समझकर उसे नए तरीके से बदलकर बुलपप कार्बाइन बनाने का काम भी किया था। इसी अनुभव का इस्तेमाल उन्होंने ‘अस्मी’ को तैयार करने में किया। उन्होंने इस हथियार को बनाते समय सैनिकों से मिले फीडबैक को ध्यान में रखा। खास तौर पर इसे हल्का, बिना जाम हुए काम करने वाला और आसानी से मेंटेन किया जा सकने वाला वेपन तैयार किया।

इस हथियार के विकास में 3डी प्रिंटिंग तकनीक का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इससे इसका प्रोटोटाइप यानी शुरुआती मॉडल जल्दी तैयार किया जा सका और उसमें जरूरी बदलाव भी आसानी से किए गए।

‘अस्मी’ को पहली बार साल 2021 में सार्वजनिक रूप से दिखाया गया था। इसके बाद 2022 में इसे इंटरनेशनल पुलिस एक्सपो और डेफएक्सपो जैसे बड़े कार्यक्रमों में भी प्रदर्शित किया गया। यह पूरी तरह स्वदेशी हथियार है, जो ‘मेक इन इंडिया’ पहल का एक मजबूत उदाहरण माना जाता है। इसके निर्माण में ऊपर का हिस्सा एयरक्राफ्ट ग्रेड एल्युमिनियम से बनाया गया है, जबकि हल्का और मजबूत रखने रखने के लिए नीचे का हिस्सा कार्बन फाइबर से तैयार किया गया है। (Asmi Machine Pistol)

अस्मी की खूबियां

‘अस्मी’ मशीन पिस्टल का वजन 2 किलोग्राम के बीच है। इस वजह से यह अपने अंतरराष्ट्रीय समकक्ष हथियारों की तुलना में करीब 10 से 15 प्रतिशत तक हल्की मानी जाती है। इसमें स्टैंडर्ड 9×19 मिमी पैराबेलम कारतूस का इस्तेमाल होता है, जो पहले से ही भारतीय सेनाओं में इस्तेमाल हो रहा है। ‘अस्मी’ की फायरिंग रेट लगभग 600 राउंड प्रति मिनट है और यह करीब 100 मीटर तक प्रभावी तरीके से लक्ष्य को भेद सकती है। इसकी मैगजीन क्षमता 33 राउंड की है और यह ग्लॉक मैगजीन के साथ भी इस्तेमाल की जा सकती है।

हथियार की बैरल लंबाई मूल संस्करण में करीब 8 इंच यानी लगभग 203 मिमी है, जबकि नए वेरिएंट में इसे बढ़ाकर 9 इंच तक किया गया है। ‘अस्मी’ अपनी जामिंग-फ्री क्षमता के लिए जानी जाती है। परीक्षणों के दौरान इसने लगातार 3000 राउंड फायर करने की क्षमता दिखाई है। (Asmi Machine Pistol)

भारतीय सेनाओं को हो रही सप्लाई

साल 2024 में हैदराबाद की कंपनी लोकेश मशीन्स लिमिटेड ने ‘अस्मी’ मशीन पिस्टल की सप्लाई के लिए भारतीय सेना का कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया। जिसके बाद उसे 550 यूनिट्स बनाने और देने का ऑर्डर मिला। यह ऑर्डर करीब 4.26 करोड़ रुपये का था। इसके बाद कंपनी ने तय समय के अंदर काम पूरा करते हुए अक्टूबर 2024 तक सभी 550 ‘अस्मी’ मशीन पिस्टल्स भारतीय सेना को सौंप दीं।

इन हथियारों को मुख्य रूप से नॉर्दर्न कमांड में शामिल किया गया, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील इलाकों की जिम्मेदारी संभालती है। यहां क्लोज क्वार्टर कॉम्बैट यानी नजदीकी लड़ाई की जरूरत ज्यादा होती है, इसलिए ‘अस्मी’ जैसे हल्के और कॉम्पैक्ट हथियार काफी उपयोगी माने जाते हैं। (Asmi Machine Pistol)

डिलीवरी के बाद इन हथियारों को पैरा स्पेशल फोर्सेज जैसी यूनिट्स को भी दिया गया, जहां तेज और सटीक कार्रवाई की जरूरत होती है। फरवरी 2026 में असम राइफल्स ने भी 1,013 ‘अस्मी’ कार्बाइन का ऑर्डर लोकेश मशीन्स लिमिटेड को दिया। इनकी डिलीवरी 90 दिनों के अंदर पूरी करनी है। असम राइफल्स पूर्वोत्तर राज्यों में तैनात रहती है, जहां इस हथियार का इस्तेमाल पुरानी कार्बाइनों की जगह किया जाएगा।

इसके अलावा मार्च 2026 में सशस्त्र सीमा बल यानी एसएसबी ने भी करीब 9.5 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है, जिसमें ‘अस्मी’ सबमशीन गन्स की सप्लाई शामिल है। इसके अलावा राज्य पुलिस बल, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स जैसी एजेंसियां भी इसमें रुचि दिखा रही हैं। (Asmi Machine Pistol)

IRGC की निगरानी में होर्मुज! अब बिना क्लियरेंस कोई जहाज नहीं गुजर सकता

Strait of Hormuz Crisis
Strait of Hormuz

Strait of Hormuz Crisis: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान द्वारा इस रास्ते पर सख्ती बढ़ाने के बाद जहाजों की आवाजाही आसान नहीं रह गई है। कई जहाज फंसे हुए हैं और वैश्विक तेल बाजार में हलचल देखी जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसी रास्ते से सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, इराक और ईरान जैसे देशों से तेल और गैस की सप्लाई होती है। दुनिया की कुल तेल और एलएनजी सप्लाई का करीब 20 से 25 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

हर दिन लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल तेल इस रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देश इसी रास्ते पर निर्भर हैं। भारत के लिए यह रास्ता और भी अहम है, क्योंकि देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से मंगाता है।

Strait of Hormuz Crisis: ईरान की सख्ती से बढ़ी दिक्कतें

हाल के दिनों में ईरान ने इस रास्ते पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। उसने साफ कर दिया है कि केवल वही जहाज इस रास्ते से गुजर सकते हैं, जिन्हें उसकी मंजूरी मिली हो। बताया जा रहा है कि ईरान उन देशों के जहाजों को प्राथमिकता दे रहा है, जिनसे उसके अच्छे संबंध हैं, और भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गुजरने की अनुमति दी गई है।

ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि बिना अनुमति के आने वाले जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। इसी वजह से अब कोई भी जहाज बिना अनुमति के इस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं कर रहा है।

संकरे रास्ते से बढ़ा जोखिम

होर्मुज जलडमरूमध्य बहुत संकरा है। इसके सबसे पतले हिस्से में जहाजों के आने-जाने के रास्ते की चौड़ाई तीन किलोमीटर से भी कम है। जहाजों के लिए अलग-अलग लेन बनाई गई हैं ताकि टक्कर न हो।

लेकिन इस संकरे रास्ते की वजह से हर जहाज को ईरान के तटीय क्षेत्र के बेहद करीब से गुजरना पड़ता है। इससे ईरान के लिए हर जहाज पर नजर रखना आसान हो जाता है। यही कारण है कि यहां से गुजरना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।

वहीं, तनाव बढ़ने के बाद इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी कमी आई है। पहले रोजाना लगभग 130 से 140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर 5 से 6 जहाज प्रतिदिन रह गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह करीब 95 प्रतिशत की गिरावट है, जो अभूतपूर्व मानी जा रही है। इसके चलते हजारों जहाज इस रास्ते के आसपास फंसे हुए हैं और सुरक्षित रास्ता मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

मंजूरी के बिना नहीं मिल रही एंट्री

अब इस रास्ते से गुजरने के लिए जहाजों को पहले से अनुमति लेनी पड़ रही है। इसके लिए शिपिंग कंपनियों को ईरान से जुड़े अधिकारियों को जहाज की पूरी जानकारी देनी होती है। इसमें जहाज की पहचान, मालिक, माल, गंतव्य और क्रू से जुड़ी जानकारी शामिल होती है।

इन सभी दस्तावेजों की गहराई से जांच की जाती है। इसके बाद ही तय होता है कि जहाज को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाएगी या नहीं। खास तौर पर तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों को प्राथमिकता दी जा रही है।

आईआरजीसी की निगरानी में पूरा सिस्टम

इस पूरे सिस्टम की निगरानी आईआरजीसी कर रहा है। यही संगठन तय करता है कि कौन सा जहाज इस रास्ते से गुजर सकता है। जब किसी जहाज को अनुमति मिल जाती है, तो उसे एक विशेष कोड दिया जाता है और आगे बढ़ने के निर्देश दिए जाते हैं। जैसे ही जहाज संकरे हिस्से के पास पहुंचता है, उससे रेडियो के जरिए संपर्क किया जाता है और उसकी पहचान की पुष्टि की जाती है। इसके बाद पेट्रोल बोट्स उस जहाज को एस्कॉर्ट करते हुए आगे ले जाती हैं, ताकि वह सुरक्षित तरीके से इस रास्ते को पार कर सके।

ट्रांजिट चार्ज को लेकर भी चर्चा

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस रास्ते से गुजरने के लिए भारी शुल्क लिया जा रहा है। विदेशी मीडिया में इसे “तेहरान टोल बूथ” तक कहा गया है। बताया गया है कि कुछ जहाजों से सुरक्षित रास्ता देने के बदले बड़ी रकम मांगी जा रही है। हालांकि ईरान ने इन दावों को खारिज कर दिया है। फिर भी यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि इस रास्ते से गुजरना अब महंगा और जटिल हो गया है।

भारत पर भी सीधा असर

भारत इस रास्ते पर काफी हद तक निर्भर है। देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से मंगाता है। इसके अलावा एलएनजी की सप्लाई भी इसी रास्ते से होती है।

हालांकि मौजूदा स्थिति में भारत के जहाजों को गुजरने की अनुमति मिली हुई है, लेकिन पूरे क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण चिंता बनी हुई है। शिपिंग कंपनियां भी सावधानी बरत रही हैं और कई जहाज सुरक्षित रास्ते का इंतजार कर रहे हैं।

लंबी कतार में खड़े जहाज

तनाव बढ़ने के बाद इस रास्ते के दोनों ओर जहाजों की लंबी कतार लग गई है। कई जहाज कई दिनों से इंतजार कर रहे हैं कि कब उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिलेगी।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के मुताबिक, हजारों जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। इससे यह साफ है कि स्थिति सामान्य नहीं है और आवाजाही पर बड़ा असर पड़ा है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में तेजी आई है और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। कई देशों में ऊर्जा संकट की स्थिति बनने लगी है। जहाजों की आवाजाही रुकने से न केवल तेल और गैस, बल्कि अन्य सामान की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ रहा है।

BDL ने बनाया आकाश मिसाइल का नया अवतार! एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम है डिलीवरी के लिए तैयार

Advanced Akash Weapon System

Advanced Akash Weapon System: भारत डायनैमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) ने एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम का पहला प्रोडक्शन मॉडल यानी एफओपीएम तैयार कर लिया है। यह वही सिस्टम है जिसे भारतीय सेनाओं के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है और इसमें कई नए और एडवांस सब-सिस्टम्स जोड़े गए हैं। वहीं उम्मीद जताई जा रही है जल्द ही इस सिस्टम की डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

Advanced Akash Weapon System: क्या है एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम

एडवांस्ड आकाश एक मध्यम दूरी का सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसे हवा से आने वाले खतरों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है, जबकि इसका प्रोडक्शन बीडीएल कर रही है। यह सिस्टम भारतीय सेना और वायुसेना दोनों के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि यह दुश्मन के एयरक्राफ्ट, ड्रोन और मिसाइल जैसे खतरों को हवा में ही नष्ट कर सकता है।

आकाश मिसाइल सिस्टम पहले से ही भारतीय सेना में तैनात है, लेकिन इस नए एडवांस्ड वर्जन में कई तकनीकी सुधार किए गए हैं, जिससे इसकी ताकत और सटीकता पहले से ज्यादा बढ़ गई है।

एफओपीएम पूरा होने का क्या है मतलब

एफओपीएम यानी फर्स्ट-ऑफ प्रोडक्शन मॉडल का मतलब है कि डिजाइन और टेस्टिंग के बाद अब यह सिस्टम उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है। बीडीएल द्वारा यह मॉडल तैयार कर लिया जाना इस बात का संकेत है कि अब इसे बड़े पैमाने पर बनाया जा सकता है और सेना को सौंपा जा सकता है। इस मॉडल में सभी जरूरी सिस्टम इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और क्वालिटी चेक पूरे कर लिए गए हैं। इसके बाद ही इसे एफओपीएम माना जाता है। अब अगला चरण डिलीवरी और तैनाती का होगा।

नई तकनीक से बढ़ी क्षमता

एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें अपग्रेडेड सब-सिस्टम्स लगाए गए हैं। इस सिस्टम में बेहतर रडार, आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स जैसी क्षमताएं जोड़ी गई हैं।

इसमें इस्तेमाल किया गया आरएफ सीकर टारगेट को अधिक सटीकता से पहचानने में मदद करता है। साथ ही यह सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक जामिंग में भी काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि दुश्मन अगर सिग्नल को बाधित करने की कोशिश करे, तब भी यह सिस्टम अपना काम जारी रख सकता है।

अलग-अलग हवाई खतरों पर भी असरदार

इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कई तरह के हवाई खतरों को एक साथ संभाल सकता है। इसमें हाई स्पीड एयरक्राफ्ट, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य एरियल टारगेट शामिल हैं। हाल में टेस्टिंग के दौरान इस सिस्टम ने अलग-अलग परिस्थितियों में सटीक निशाना लगाकर अपनी क्षमता साबित की है। इसमें मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट क्षमता है यानी यह एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन पर कार्रवाई कर सकता है।

एडवांस्ड आकाश वेपन सिस्टम की डिलीवरी शुरू होने के बाद इसे सीमावर्ती इलाकों और संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किया जाएगा, जहां हवाई खतरों का जोखिम ज्यादा रहता है। इस सिस्टम की खास बात यह है कि यह मोबाइल है। यानी इसे एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाया जा सकता है। इससे जरूरत के हिसाब से इसकी तैनाती की जा सकती है।

ईरानी दूतावास क्यों डिलीट कर रहा कश्मीर को ‘थैक्स’ वाले कई ट्वीट, क्या पाकिस्तान के दबाव में है ईरान?

Iran Embassy Tweet Controversy
Iran Embassy Tweet Controversy: Why Iran Deleted Kashmir-Related Posts Amid Pakistan Backlash

Iran Embassy Tweet Controversy: नई दिल्ली में ईरानी दूतावास के एक के बाद एक ट्वीट डिलीट करने पर सवाल खड़े होने लगे हैं। खास बात यह है कि ये ट्वीट भारत और कश्मीर से जुड़े थे और इनमें मानवीय मदद के लिए धन्यवाद दिया गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद इन पोस्ट को बिना किसी वजह बताए हटा दिया गया। यह सिलसिला एक बार नहीं, बल्कि लगातार दो-तीन बार हुआ, जिससे पूरे मामले पर सवाल उठने लगे हैं।

ताजा मामला ईरान की एरोस्पेस फोर्स की तरफ से किए गए एक ट्वीट को लेकर है। जिसमें इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की एरोस्पेस फोर्स ने कश्मीर के लोगों का धन्यवाद दिया था। हालांकि ईरान ऐसा पहली बार नहीं कर रहा है। हाल ही में वह जब भी कोई मिसाइल छोड़ता है फ्लिस्तीन में मारे गए लोगों के नाम लिखता है।

Iran Embassy Tweet Controversy: एक के बाद एक कई ट्वीट डिलीट

इस पूरे मामले में सबसे पहले ईरान के दूतावास ने ईद के मौके पर एक पोस्ट किया था, जिसमें भारत और “कश्मीर के लोगों” को धन्यवाद दिया गया था। इसमें लिखा गया था कि कश्मीर के लोगों ने मुश्किल समय में ईरान का साथ दिया और उनकी मदद को कभी नहीं भुलाया जाएगा। इस पोस्ट में साफ तौर पर “थैंक यू इंडिया” भी लिखा गया था।

इसके कुछ समय बाद यह ट्वीट हटा दिया गया। इसके बाद दूसरा पोस्ट सामने आया, जिसमें कश्मीर की एक महिला द्वारा सोना दान करने की कहानी साझा की गई थी। इस पोस्ट के अंत में भी “थैंक यू कश्मीर” और “थैंक यू इंडिया” लिखा गया था। लेकिन यह पोस्ट भी कुछ समय बाद हटा दिया गया। (Iran Embassy Tweet Controversy)

तीसरा ट्वीट भी किया डिलीट

इसके बाद जो तीसरा ट्वीट सामने आया, वही सबसे ज्यादा विवादित माना जा रहा है। इस पोस्ट में इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी के एयरोस्पेस फोर्स का जिक्र था। साथ ही एक तस्वीर भी साझा की गई थी।

इस तस्वीर में एक मिसाइल या ड्रोन सिस्टम के पास एक बैनर लगा हुआ था, जिसमें उर्दू या फारसी भाषा में लिखा गया था, “हम दिल की गहराइयों से आप कश्मीरी लोगों की सहायता के शुक्रगुजार हैं, और आपके नाम पर अपने लीडर के कातिलों से बदला लेंगे।”

यह पोस्ट सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से प्रतिक्रिया शुरू हो गई। लोगों ने इसे गंभीर और संवेदनशील मामला बताया। इसके कुछ समय बाद यह ट्वीट भी बिना किसी स्पष्टीकरण के हटा दिया गया। (Iran Embassy Tweet Controversy)

क्या पाकिस्तान जता रहा है आपत्ति

बताया जा रहा है कि इन ट्वीट्स को लेकर पाकिस्तान से जुड़े कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि कश्मीर को भारत का हिस्सा बताना सही नहीं है। इसी वजह से ईरान दूतावास के पोस्ट पर बड़ी संख्या में टिप्पणियां आने लगीं।

इन प्रतिक्रियाओं के बाद दूतावास ने अपने पोस्ट एक-एक करके हटाने शुरू कर दिए। हालांकि इस पर दूतावास की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया। (Iran Embassy Tweet Controversy)

भारत में लोगों ने जताई नाराजगी

इस पूरे घटनाक्रम के बाद भारत में भी लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने पूछा कि अगर पहले भारत और कश्मीर का जिक्र किया गया था, तो बाद में उसे क्यों हटाया गया।

कुछ लोगों ने इसे भारत की संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया। उनका कहना था कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और इस तरह के बदलाव से गलत संदेश जा सकता है। कुछ यूजर्स ने विदेश मंत्रालय से इस मामले पर दखल देने की मांग भी की।

यह पूरा मामला उस समय सामने आया जब कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों से ईरान के लिए मदद भेजी जा रही थी। लोगों ने नकद पैसे, सोना, चांदी और घरेलू सामान तक दान किया।

कई जगहों पर लोगों ने खुद आगे आकर राहत सामग्री इकट्ठा की। कुछ महिलाओं ने अपने निजी गहने तक दान कर दिए। इसी मदद को लेकर ईरान दूतावास ने शुरुआत में आभार जताया था। (Iran Embassy Tweet Controversy)

कश्मीर का जिक्र क्यों बना मुद्दा

कश्मीर का मुद्दा भारत के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। भारत हमेशा यह कहता है कि पूरा जम्मू-कश्मीर उसका हिस्सा है। वहीं पाकिस्तान इस पर अलग रुख रखता है। ऐसे में जब किसी विदेशी दूतावास की तरफ से कश्मीर का जिक्र किया जाता है, तो उसे बहुत ध्यान से देखा जाता है। यही वजह है कि ईरान दूतावास के ट्वीट चर्चा में आ गए।

सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई। कुछ लोगों ने इसे कूटनीतिक दबाव का असर बताया, तो कुछ ने इसे गलत संदेश देने वाला कदम कहा। कई यूजर्स ने यह भी कहा कि बार-बार ट्वीट डिलीट करना खुद में एक बड़ा सवाल है। वहीं कुछ लोगों ने यह मुद्दा उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया के दबाव का असर कूटनीतिक फैसलों पर पड़ रहा है। हालांकि ईरान दूतावास की तरफ से अब तक इन ट्वीट्स को हटाने को लेकर कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है। (Iran Embassy Tweet Controversy)

भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग में बड़ा कदम, हथियार खरीद से आगे बढ़कर अब को-प्रोडक्शन पर फोकस!

DPG Meeting 2026
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh and US Under Secretary of War for Policy Elbridge Colby co-chaired the talks.

DPG Meeting 2026: ईरान में चल रही भीषण जंग के बीच भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए नई दिल्ली में 18वें डिफेंस पॉलिसी ग्रुप (डीपीजी) बैठक आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी फॉर पॉलिसी एल्ब्रिज कोल्बी ने संयुक्त रूप से की। बैठक में दोनों देशों ने मौजूदा रक्षा सहयोग की समीक्षा की और आगे के सहयोग के लिए अहम क्षेत्रों पर सहमति जताई।

डिफेंस पॉलिसी ग्रुप भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सबसे अहम संवाद मंच माना जाता है। इसके जरिए दोनों देश रक्षा, सुरक्षा, सैन्य सहयोग और रणनीतिक मामलों पर नियमित बातचीत करते हैं। इस बैठक में भी दोनों पक्षों ने उन पहलुओं पर ध्यान दिया जो दोनों देशों की सुरक्षा और सैन्य तैयारियों से सीधे जुड़े हैं।

बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच पहले से चल रही रक्षा योजनाओं की विस्तार से समीक्षा की गई। इसमें रक्षा उपकरणों की खरीद, तकनीकी सहयोग और सैन्य साझेदारी से जुड़े मुद्दे शामिल रहे। दोनों पक्षों ने माना कि इन योजनाओं को और बेहतर तरीके से लागू करने की जरूरत है, ताकि इसका फायदा जमीन पर भी दिखाई दे।

DPG Meeting 2026: को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन पर जोर

इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रक्षा उपकरणों के को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन को लेकर चर्चा रहा। दोनों देशों ने ऐसे क्षेत्रों की पहचान की, जहां मिलकर आधुनिक हथियार और तकनीक विकसित की जा सकती है।

इसका उद्देश्य यह है कि भारत और अमेरिका केवल खरीदार और विक्रेता के रूप में नहीं, बल्कि साझेदार के रूप में काम करें। इससे भारत को नई तकनीक तक पहुंच मिलेगी और देश के अंदर रक्षा उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा।

बता दें कि जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल और स्ट्राइकर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स के को-प्रोडक्शन की योजनाएं पहले से ही आगे बढ़ रही हैं। इसके साथ ही ऑटोनॉमस सिस्टम्स इंडस्ट्री अलायंस (एशिया) जैसी नई पहल पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत एंडुरिल-महिंद्रा और एल3 हैरिस-भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे पाटर्नरशिप मॉडल उभरकर सामने आ रहे हैं।

सैन्य सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति

बैठक में दोनों देशों ने अपनी सेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। इसके तहत संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अधिकारियों के बीच रणनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। इस तरह के सहयोग से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बेहतर होता है और किसी भी स्थिति में साथ मिलकर काम करने की क्षमता बढ़ती है।

बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर भी चर्चा हुई। यह क्षेत्र दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सहयोग जारी रखना जरूरी है।

बैठक में आधुनिक सैन्य तकनीकों पर भी विशेष जोर दिया गया। इसमें एडवांस सिस्टम, निगरानी क्षमता और नई पीढ़ी के हथियारों के विकास जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तकनीकी सहयोग को और बढ़ाया जाएगा।

वहीं, बैठक में दोनों देशों के बीच चल रही योजनाओं और समझौतों की समीक्षा की गई। इसमें लेमोआ (2016), कॉमकासा (2018), बीईसीए (2020) और इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एग्रीमेंट जैसे समझौते शामिल रहे।

इन समझौतों की वजह से अमेरिका के कई रक्षा उपकरण जैसे सी-17, सी-130जे, पी-8आई, अपाचे, चिनूक हेलीकॉप्टर और एमक्यू-9बी ड्रोन भारतीय सेना में शामिल किए जा चुके हैं।

इस समय भारत अमेरिका से 20 अरब डॉलर से ज्यादा के रक्षा उपकरण ले चुका है। बैठक में इन उपकरणों की देखभाल, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और भारत में ही उनकी मरम्मत की व्यवस्था को बेहतर बनाने पर खास ध्यान दिया गया।