Home Blog Page 31

रक्षा मंत्री ने की बीआरओ के कामकाज की समीक्षा, बॉर्डर इलाकों में तेजी से बढ़ रहा है इंफ्रास्ट्रक्चर

BRO Projects
Pic: PIB

BRO Projects: सीमा क्षेत्रों में सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में एक अहम बैठक हुई, जिसमें बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ के कामकाज और योजनाओं की समीक्षा की गई। इस बैठक में रक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।

BRO Projects: संसद की कमेटी के साथ हुई चर्चा

यह बैठक रक्षा मंत्रालय की पार्लियामेंट्री कंसल्टेटिव कमेटी के साथ नई दिल्ली में आयोजित की गई। इसमें सरकार और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। बैठक के दौरान बीआरओ द्वारा किए जा रहे काम, नई परियोजनाओं और सीमा क्षेत्रों में विकास की स्थिति पर विस्तार से जानकारी दी गई।

रक्षा मंत्री ने इस दौरान कहा कि बीआरओ सिर्फ सड़कें ही नहीं बना रहा, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में एक ऐसा सिस्टम तैयार कर रहा है जिसमें सुरक्षा, विकास और कनेक्टिविटी तीनों को साथ लेकर काम किया जा रहा है।

सीमावर्ती इलाकों में बदल रही तस्वीर

रक्षा मंत्री ने बताया कि बीआरओ ने खासतौर पर नॉर्थ-ईस्ट और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों में कनेक्टिविटी बेहतर करने का काम किया है। इससे न सिर्फ सेना की आवाजाही आसान हुई है, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के जीवन में भी बदलाव आया है।

उन्होंने कहा कि अब सेना की मूवमेंट पहले से ज्यादा तेज और आसान हो गई है, जिससे ऑपरेशनल तैयारी मजबूत हुई है। साथ ही दूर-दराज के गांव भी अब बेहतर तरीके से जुड़ रहे हैं।

बीआरओ भारत के अलावा दूसरे देशों में भी काम कर रहा है। अफगानिस्तान, भूटान, म्यांमार और ताजिकिस्तान जैसे देशों में भी इस संगठन ने सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट पूरे किए हैं। बैठक में यह भी बताया गया कि बीआरओ को भारत-म्यांमार सीमा पर करीब 1600 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है।

बॉर्डर रोड्स डेवलपमेंट प्रोग्राम 2023-28 पर चर्चा

बैठक के दौरान बॉर्डर रोड्स डेवलपमेंट प्रोग्राम 2023-28 की प्रगति पर भी चर्चा हुई। इस प्रोग्राम के तहत देशभर में 1000 से ज्यादा सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

इनमें नई सड़कें बनाना, पुरानी सड़कों को अपग्रेड करना और उनकी मेंटेनेंस शामिल है। सरकार का लक्ष्य है कि दूर-दराज और ऊंचाई वाले इलाकों में भी हर मौसम में कनेक्टिविटी बनी रहे।

रक्षा मंत्री ने कहा कि इस नेटवर्क के जरिए अब ऐसे इलाकों में भी ऑल वेदर कनेक्टिविटी दी जा रही है, जहां पहले पहुंचना बहुत मुश्किल था। इससे सेना की तैयारी और मजबूत हुई है।

आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा

बैठक में तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया। रक्षा मंत्री ने कहा कि बीआरओ अब हाई एल्टीट्यूड इक्विपमेंट, मॉड्यूलर ब्रिज और प्रीकास्ट टेक्नोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकों का तेजी से इस्तेमाल कर रहा है।

इससे काम की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है और प्रोजेक्ट जल्दी पूरे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीक से भविष्य के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।

बैठक में डायरेक्टर जनरल बॉर्डर रोड्स लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने बीआरओ के काम की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बीआरओ की स्थापना 1960 में हुई थी और तब से अब तक इस संगठन ने 64,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई हैं। इसके अलावा 1179 पुल, 22 एयरफील्ड और 7 सुरंगों का निर्माण भी किया गया है। इन परियोजनाओं ने सीमा क्षेत्रों में सेना की तैयारी को मजबूत करने के साथ-साथ वहां के लोगों के विकास में भी मदद की है। इन परियोजनाओं से सीमा क्षेत्रों में सेना की ऑपरेशनल तैयारी मजबूत हुई है और वहां के लोगों के जीवन में भी सुधार आया है।

कमेटी को यह भी बताया गया कि सीमा क्षेत्रों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बनने से सेना की तैयारी मजबूत हुई है और इन इलाकों में सामाजिक और आर्थिक विकास को भी रफ्तार मिली है, जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से जुड़ा हुआ है।

कठिन हालात में काम करने की चुनौती

बीआरओ को काम करते समय कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसमें ऊंचे पहाड़ी इलाके, बेहद ठंडा मौसम और सीमित समय में काम पूरा करना शामिल है।

इसके अलावा जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी भी कई बार काम को प्रभावित करती हैं। इसके बावजूद बीआरओ लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है और नई तकनीक अपनाकर तेजी से काम कर रहा है।

इसके अलावा बीआरओ सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि आपदा के समय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बर्फबारी, भूस्खलन या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बीआरओ की टीमें तुरंत राहत और रास्ता खोलने का काम करती हैं।

भारतीय सेना के ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’ में जुटेंगे सेना-स्टार्टअप और इंडस्ट्री, ड्रोन, AI और नई टेक्नोलॉजी पर फोकस

North Tech Symposium 2026
North Tech Symposium 2026 is being organised jointly by Northern and Central Commands of the Indian Army

North Tech Symposium 2026: भारतीय सेना अब भविष्य की युद्ध तैयारी को ध्यान में रखते हुए नई टेक्नोलॉजी की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रही है। भारतीय सेना ने नॉर्थ टेक सिम्पोजियम की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य सेना, इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी सेक्टर को एक साथ लाकर आधुनिक जरूरतों के अनुसार समाधान तैयार करना है। नई दिल्ली में आयोजित कर्टेन रेजर कार्यक्रम के जरिए इस बड़े आयोजन की घोषणा की गई, जो इस साल मई में प्रयागराज में होगा।

इस कार्यक्रम में भारतीय सेना, इंडस्ट्री, स्टार्टअप्स, एकेडेमिया, डीपीएसयू, पैरामिलिट्री फोर्स और रक्षा मंत्रालय से जुड़े कई बड़े अधिकारी शामिल हुए। इसका मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस सिम्पोजियम में हिस्सा लें और रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक पर मिलकर काम करें।

North Tech Symposium 2026: सेना और इंडस्ट्री को जोड़ने की कोशिश

यह सिम्पोजियम भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड मिलकर आयोजित कर रही हैं। इसमें सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) भी सहयोग कर रही है। कार्यक्रम में सेंट्रल कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता और नॉर्दन कमांड जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा जैसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। इनके अलावा इंडस्ट्री और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञ भी शामिल हुए।

इस सिम्पोजियम का मुख्य उद्देश्य सेना की जरूरतों और देश में बन रही तकनीक के बीच तालमेल बैठाना है, ताकि जो टेक्नोलॉजी बनाई जा रही है, वह सीधे मैदान में काम आ सके।

क्या है ‘रक्षा त्रिवेणी संगम’ थीम

इस बार सिम्पोजियम की थीम रखी गई है “रक्षा त्रिवेणी संगम – जहां टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्री और सैनिक एक साथ आते हैं।” इसका मतलब है कि सेना, प्राइवेट कंपनियां, स्टार्टअप्स और पढ़ाई-लिखाई से जुड़े संस्थान एक प्लेटफॉर्म पर आएं और मिलकर नई रक्षा तकनीक विकसित करें।

प्रयागराज में यह आयोजन इसलिए रखा गया है क्योंकि यह गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम का प्रतीक है। उसी तरह यह सिम्पोजियम भी तीन क्षेत्रों को जोड़ने की कोशिश है।

सिम्पोजियम में क्या होगा खास

इस सिम्पोजियम में देश की कई कंपनियां और स्टार्टअप्स अपनी नई टेक्नोलॉजी दिखाएंगे। ये तकनीक सेना की जरूरतों के आधार पर तैयार की गई हैं। कर्टेन रेजर के दौरान जो “प्रॉब्लम डिफिनिशन स्टेटमेंट” जारी किए गए हैं, उन्हीं के आधार पर इंडस्ट्री अपनी तकनीक लेकर आएगी। इसके अलावा अलग-अलग सेमिनार भी आयोजित किए जाएंगे, जिनमें सेना, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के विशेषज्ञ मिलकर चर्चा करेंगे।

दो बड़े सेमिनार होंगे आयोजित

इस कार्यक्रम में दो खास सेमिनार रखे गए हैं। पहला सेमिनार “संगम” नाम से होगा, जिसमें नई पीढ़ी की तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग पर बात होगी। दूसरा सेमिनार “ध्रुवा” नाम से होगा, जिसमें रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने और सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की जाएगी। इन सेमिनारों में नई टेक्नोलॉजी, रिसर्च और भविष्य की जरूरतों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

किन-किन तकनीकों पर रहेगा फोकस

सिम्पोजियम में कई अहम क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा। इसमें ड्रोन सिस्टम, रोबोटिक्स, कम्युनिकेशन सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और सर्विलांस जैसे विषय शामिल हैं। इसके साथ ही हाई एल्टीट्यूड एरिया में काम आने वाली तकनीक, सैनिकों की सुरक्षा से जुड़ी डिवाइस और विशेष ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरण भी दिखाए जाएंगे।

नॉर्थ टेक सिम्पोजियम से पहले भी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। 2023 में इसका पहला आयोजन आईआईटी जम्मू में हुआ था, जहां इंडस्ट्री और एकेडेमिया ने मिलकर सेना की जरूरतों के समाधान खोजे थे। इसके बाद 2024 में लेह में “हिम टेक” कार्यक्रम हुआ था, जिसमें हाई एल्टीट्यूड एरिया में काम आने वाली तकनीकों पर फोकस किया गया था।

अब 2026 का यह सिम्पोजियम इन दोनों अनुभवों को आगे बढ़ाने का प्रयास है। इस सिम्पोजियम का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि सेना को जो भी तकनीक चाहिए, वह देश में ही विकसित की जाए।

इसके लिए इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स को सीधे सेना की जरूरतों के बारे में बताया जाएगा, ताकि वे उसी के अनुसार समाधान तैयार कर सकें। इससे न सिर्फ सेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि देश में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। सेना चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस क्षेत्र में जुड़ें और मिलकर ऐसे समाधान तैयार करें जो भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकें।

सैनिक स्कूलों को लेकर संसदीय समिति ने कही ये बड़ी बात, बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर जताई नाराजगी!

Sainik Schools India
AI-Generated Image

Sainik Schools: देश के सैनिक स्कूलों को लेकर संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने बड़ी सिफारिश की है। हाल ही में जारी संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक अब इन स्कूलों का फोकस केवल आर्म्ड फोर्सेज में भर्ती तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समिति का कहना है कि छात्रों को रक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों जैसे डिफेंस रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइन और मेडिसिन में भी करियर बनाने के लिए तैयार किया जाए।

यह सिफारिश समिति की हालिया रिपोर्ट में दी गई है, जिसमें कहा गया है कि समय के साथ युद्ध और सुरक्षा का स्वरूप बदल गया है। ऐसे में छात्रों को भी नई तकनीक और आधुनिक क्षेत्रों के लिए तैयार करना जरूरी है। (Sainik Schools)

Sainik Schools: अब केवल सेना तक सीमित नहीं रहेगा करियर

अभी तक सैनिक स्कूलों का मुख्य उद्देश्य छात्रों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और नौसेना अकादमी के लिए तैयार करना रहा है। यहां पढ़ने वाले अधिकतर छात्र सेना, नौसेना या वायुसेना में जाने का सपना देखते हैं।

लेकिन समिति ने कहा है कि अब छात्रों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार अन्य विकल्प भी दिए जाने चाहिए। इसमें डिफेंस टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, रिसर्च, मेडिकल और डिजाइन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इससे छात्रों के सामने करियर के ज्यादा रास्ते खुलेंगे। (Sainik Schools)

देश में कितने हैं सैनिक स्कूल

देश में इस समय कुल 33 सैनिक स्कूल हैं, जो 1961 से केंद्र और राज्य सरकारों के मिल कर चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और देहरादून स्थित राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज भी रक्षा मंत्रालय के तहत काम करते हैं।

आरआईएमसी की स्थापना 1922 में हुई थी और राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल 1925 से शुरू हुए। ये दोनों पूरी तरह केंद्र सरकार के अधीन हैं। वहीं सैनिक स्कूल केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से चलते हैं।

इन संस्थानों का उद्देश्य शुरू से ही सेना के लिए अधिकारियों को तैयार करना और देश के अलग-अलग हिस्सों से युवाओं को समान अवसर देना रहा है। (Sainik Schools)

नए विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश

रिपोर्ट में कहा गया है कि सैनिक स्कूल, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज के छात्रों को रक्षा से जुड़े दूसरे क्षेत्रों जैसे रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइन और मेडिकल फील्ड में भी जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे छात्रों को ज्यादा अवसर मिलेंगे और वे अलग-अलग क्षेत्रों में देश की सेवा कर सकेंगे।

समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि सैनिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में आधुनिक तकनीक से जुड़े विषय शामिल किए जाएं। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वारफेयर, स्पेस वारफेयर, ड्रोन टेक्नोलॉजी, क्वांटम टेक्नोलॉजी और डायरेक्टेड एनर्जी जैसे विषय शामिल हैं।

इन विषयों के जरिए छात्रों को नई तरह के युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों के बारे में जानकारी मिलेगी। साथ ही वे आधुनिक तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे। (Sainik Schools)

मल्टी-डायरेक्शनल शिक्षा पर जोर

रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय को इन स्कूलों के जरिए छात्रों में शुरुआती स्तर से ही जागरूकता बढ़ानी चाहिए। इसके लिए एक मल्टी-प्रॉन्ग्ड अप्रोच अपनाने की बात कही गई है, जिसमें छात्रों को अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में जानकारी दी जाए और उनकी पसंद के मुताबिक मार्गदर्शन किया जाए।

इसका उद्देश्य छात्रों का समग्र विकास करना है, ताकि वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें और देश के भविष्य में योगदान दे सकें। (Sainik Schools)

नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना

सरकार पहले ही देश में 100 नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना शुरू कर चुकी है। ये स्कूल एनजीओ, प्राइवेट संस्थानों और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में खोले जा रहे हैं। अब तक 86 नए स्कूलों को मंजूरी मिल चुकी है।

इन नए स्कूलों के जरिए ज्यादा से ज्यादा छात्रों को सैनिक शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। (Sainik Schools)

फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या

समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि कई सैनिक स्कूलों को बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। खासकर राज्य सरकारों से मिलने वाली आर्थिक मदद काफी नहीं है।

इस वजह से स्कूलों के रखरखाव, स्टाफ सुविधाओं और अन्य जरूरी कामों में दिक्कत आती है। समिति ने सुझाव दिया है कि इन स्कूलों को पर्याप्त फंड दिया जाए ताकि उनकी जरूरतें पूरी हो सकें। (Sainik Schools)

सरकार को दिए निर्देश

समिति ने रक्षा मंत्रालय से कहा है कि वह वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर सैनिक स्कूलों के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित करे। इसके साथ ही पुराने 33 सैनिक स्कूलों के आधुनिकीकरण पर भी ध्यान देने को कहा गया है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नए स्कूलों को फीस सपोर्ट, ट्रेनिंग ग्रांट और अन्य सुविधाएं समय पर दी जानी चाहिए, ताकि उनकी गुणवत्ता बनी रहे। (Sainik Schools)

Vayu Baan: अब हेलीकॉप्टर से छोड़े जाएंगे ड्रोन, IAF का नया प्रोजेक्ट दुश्मन पर करेगा दूर से वार

IAF Vayu Baan
AI-Generated Image

IAF Vayu Baan: भारतीय वायुसेना ने आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसका नाम “वायु बाण” रखा गया है। यह देश का पहला ऐसा प्रोग्राम है जिसमें हेलीकॉप्टर से ड्रोन को गिराकर ऑपरेशन किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत वायुसेना अब ऐसे छोटे ड्रोन डेवलप करना चाहती है जो हेलीकॉप्टर से लॉन्च होकर अपने आप दुश्मन के इलाके तक पहुंच सकें।

वायुसेना के डायरेक्टोरेट ऑफ एयरोस्पेस डिजाइन ने हाल ही में एक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया है। इसके जरिए भारतीय कंपनियों को इस सिस्टम के डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए आमंत्रित किया गया है। यह पूरा प्रोजेक्ट स्वदेशी है और इसमें केवल घरेलू कंपनियों को ही भाग लेने की अनुमति दी गई है। (IAF Vayu Baan)

IAF Vayu Baan: आधुनिक युद्ध में ड्रोन की बढ़ती भूमिका

हाल के सालों में युद्ध का तरीका तेजी से बदला है। अब लड़ाई केवल सामने से नहीं होती, बल्कि दूर से ही टारगेट को निशाना बनाया जाता है। इसे बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी बीवीआर कहा जाता है। ऐसे माहौल में ड्रोन सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं।

हेलीकॉप्टर को जब दुश्मन के इलाके के पास जाना पड़ता है तो उस पर हमला होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में “वायु बाण” प्रोजेक्ट का उद्देश्य यही है कि हेलीकॉप्टर को सुरक्षित दूरी पर रखते हुए ड्रोन के जरिए हमला किया जा सके। इससे एयरक्रू की सुरक्षा भी बढ़ेगी और मिशन ज्यादा प्रभावी होगा। (IAF Vayu Baan)

कैसे काम करेगा वायु बाण ड्रोन

इस प्रोजेक्ट के तहत जो ड्रोन तैयार किया जाएगा, उसे हेलीकॉप्टर से नीचे गिराया जाएगा। इसके बाद यह ड्रोन खुद ही उड़ान भरकर अपने टारगेट की ओर बढ़ेगा। यह पूरी तरह ऑटोमेटिक तरीके से काम करेगा और ऑपरेटर को रियल टाइम जानकारी भेजेगा।

यह ड्रोन केवल निगरानी ही नहीं करेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर सटीक हमला भी कर सकेगा। इसमें छोटा वॉरहेड लगाया जा सकता है, जिससे यह दुश्मन के टारगेट को निशाना बना सके। (IAF Vayu Baan)

ड्रोन की खासियतें

वायु बाण प्रोजेक्ट के तहत तैयार होने वाले ड्रोन की रेंज 80 किलोमीटर से ज्यादा रखी जा रही है। इसका मतलब है कि हेलीकॉप्टर को दुश्मन के इलाके में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह ड्रोन करीब 30 मिनट तक हवा में रह सकता है, जिससे इसे टारगेट खोजने और हमला करने का पर्याप्त समय मिलता है ।

इसमें इलेक्ट्रो ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर लगाए जाएंगे, जिससे यह दिन और रात दोनों समय काम कर सकेगा। इसके अलावा यह ड्रोन ऐसे सिस्टम से लैस होगा जो जीपीएस जैमिंग के बावजूद भी काम कर सके। यानी अगर दुश्मन जीपीएस सिग्नल को बंद कर दे, तब भी यह ड्रोन अपने मिशन को पूरा करेगा।

ड्रोन से मिलने वाला वीडियो सीधे ऑपरेटर तक पहुंचेगा, जिससे तुरंत निर्णय लिया जा सकेगा। इसे जमीन से भी कंट्रोल किया जा सकता है और हवा में मौजूद प्लेटफॉर्म से भी, जिससे ऑपरेशन में लचीलापन बढ़ेगा।

वायुसेना इस प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है। इसके तहत डिजाइन, डेवलपमेंट, टेस्टिंग और शुरुआती डिलीवरी को एक साल के अंदर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए हेलीकॉप्टर से ड्रॉप टेस्ट, पेलोड इंटीग्रेशन और हाई एल्टीट्यूड टेस्टिंग जैसे कई चरण पूरे किए जाएंगे।

जब यह सभी परीक्षण पूरे हो जाएंगे, तब इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी जाएगी। (IAF Vayu Baan)

स्वदेशी तकनीक पर जोर

यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा है। वायुसेना चाहती है कि इस तरह के आधुनिक सिस्टम देश में ही डेवलप हों, ताकि विदेशी निर्भरता कम हो सके। इस प्रोजेक्ट में स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों को भी भाग लेने का मौका दिया गया है।

डायरेक्टोरेट ऑफ एयरोस्पेस डिजाइन इस पूरे प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहा है, जिसे हाल ही में स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य भारतीय रक्षा क्षेत्र में डिजाइन और इनोवेशन को बढ़ावा देना है।

वायु बाण प्रोजेक्ट के साथ भारत उन देशों की सूची में शामिल हो रहा है जो एयर लॉन्च्ड ड्रोन सिस्टम पर काम कर रहे हैं। चीन ने अपने बॉम्बर विमान से ड्रोन स्वार्म दिखाए हैं, लेकिन उनका पूरी तरह इस्तेमाल अभी शुरू नहीं हुआ है।

अमेरिका भी इस दिशा में काम कर रहा है। वहां ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से ड्रोन लॉन्च करने और हवा में वापस लेने की तकनीक पर काम चल रहा है। वहीं अमेरिकी सेना हेलीकॉप्टर से ड्रोन ऑपरेशन को डेवलप कर रही है।

भारत का यह प्रोजेक्ट खास इसलिए है क्योंकि यह सीधे हेलीकॉप्टर से ड्रोन लॉन्च करने पर केंद्रित है और इसे तेजी से तैयार किया जा रहा है। (IAF Vayu Baan)

मल्टी डोमेन ऑपरेशन की दिशा में कदम

वायु बाण प्रोजेक्ट के जरिए वायुसेना अपनी ऑपरेशनल क्षमता को और मजबूत करना चाहती है। यह सिस्टम ऐसे इलाकों में काम आएगा जहां खतरा ज्यादा हो और सीधे प्रवेश करना मुश्किल हो। ड्रोन पहले जाकर जानकारी जुटाएगा, टारगेट की पहचान करेगा और जरूरत पड़ने पर हमला करेगा। इससे मिशन की सफलता की संभावना बढ़ेगी और जोखिम कम होगा। यह प्रोजेक्ट आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है, जहां टेक्नोलॉजी और ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। (IAF Vayu Baan)

सिडनी पहुंचा भारतीय नौसेना का स्टेल्थ फ्रिगेट INS नीलगिरी, ऑस्ट्रेलिया इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में लेगा हिस्सा

INS Nilgiri Sydney IFR 2026
INS NILGIRI IN SYDNEY, AUSTRALIA FOR RAN INTERNATIONAL FLEET REVIEW 2026

INS Nilgiri Sydney IFR 2026: भारतीय नौसेना का स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस नीलगिरी 21 मार्च को ऑस्ट्रेलिया के सिडनी पहुंच गया है। यह युद्धपोत रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में हिस्सा लेने के लिए वहां पहुंचा है। यह आयोजन ऑस्ट्रेलियन नौसेना की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर किया जा रहा है।

आईएनएस नीलगिरी ने सिडनी पहुंचने से पहले एक्सरसाइज काकाडू के पहले चरण को पूरा किया। यह एक बहुराष्ट्रीय समुद्री अभ्यास है, जिसमें कई देशों की नौसेनाएं शामिल होती हैं।

INS Nilgiri Sydney IFR 2026: भारत का प्रतिनिधित्व करेगा नीलगिरी

इस इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में आईएनएस नीलगिरी भारतीय नौसेना का प्रतिनिधित्व करेगा। यह जहाज प्रोजेक्ट पी-17ए के तहत बना भारत का आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है।

इस तैनाती को भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, क्योंकि यह जहाज विदेश में अपनी ऑपरेशनल मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

सिडनी हार्बर में 19 देशों के 31 युद्धपोतों के साथ यह फ्लीट रिव्यू आयोजित हो रहा है, जो पिछले 10 साल का सबसे बड़ा समुद्री कार्यक्रम है।

आईएनएस नीलगिरी की खूबियां

प्रोजेक्ट 17ए के तहत निर्मित आईएनएस नीलगिरी भारतीय नौसेना का पहला स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड द्वारा निर्मित यह जहाज 2025 में कमीशन हुआ। इसका पूर्ण विस्थापन 6,670 टन, लंबाई 149 मीटर, चौड़ाई 17.8 मीटर और ड्राफ्ट 5.22 मीटर है। यह कॉम्बाइंड डीजल एंड गैस प्रोपल्शन सिस्टम से लैस है, जिसमें दो एचएएल-जीई एलएम2500 गैस टरबाइन (प्रत्येक 30,200 किलोवॉट) और दो मैन डीजल इंजन शामिल हैं। इसकी अधिकतम गति 32 नॉट्स (59 किमी/घंटा) है और 28 नॉट्स पर 5,500 नॉटिकल मील की रेंज तय कर सकता है।

जहाज की स्टेल्थ डिजाइन रडार-अब्जॉर्बिंग कोटिंग और कंपोजिट मटेरियल से बनी है, जो इसे दुश्मन के रडार से लगभग अदृश्य बनाती है। हथियार प्रणाली में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (8 लॉन्चर), बाराक-8 सर्फेस-टू-एयर मिसाइल (32 वर्टिकल लॉन्च सेल्स), 127 मिमी मुख्य तोप, दो 30 मिमी एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम, टॉरपीडो ट्यूब और आरबीयू-12000 रॉकेट लॉन्चर शामिल हैं। एक केए-28 या एमएच-60R हेलीकॉप्टर के लिए हैंगर और लैंडिंग डेक है। कुल 226 नाविकों की क्षमता के साथ यह बहु-उद्देशीय युद्धपोत एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन युद्ध में माहिर है।

भारत-ऑस्ट्रेलिया नौसेना सहयोग पर जोर

इस यात्रा को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते समुद्री सहयोग के रूप में देखा जा रहा है। दोनों देशों की नौसेनाएं इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मिलकर काम कर रही हैं और इस तरह के आयोजन आपसी समझ और तालमेल को मजबूत करते हैं।

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम के विजाग में हुए फ्लीट रिव्यू में ऑस्ट्रेलिया की नौसेना ने भी हिस्सा लिया था। उस समय एचएमएएस वारामुंगा नाम का युद्धपोत भारत आया था। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद

इस कार्यक्रम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाइस एडमिरल संजय भल्ला कर रहे हैं, जो पूर्वी नौसेना कमान के प्रमुख हैं। वहीं रियर एडमिरल आलोक आनंद फ्लीट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में भारतीय नौसेना का प्रतिनिधित्व करेंगे।

यह सम्मेलन नौसेना प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बातचीत का एक अहम मंच होता है, जहां विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की जाती है। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

पोर्ट कॉल के दौरान कई गतिविधियां

आईएनएस नीलगिरी के सिडनी पहुंचने के बाद कई तरह की गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। इसमें प्रोफेशनल डिस्कशन, एक्सरसाइज प्लानिंग, विशेषज्ञों के बीच बातचीत और खेल से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं।

इन गतिविधियों का उद्देश्य अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और समझ विकसित करना है। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

इंडो-पैसिफिक में बढ़ती भूमिका

आईएनएस नीलगिरी की तैनाती दक्षिणी गोलार्ध और वेस्टर्न पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती मौजूदगी को दिखाती है। इस दौरान यह जहाज कई विदेशी नौसेनाओं के साथ काम कर रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भारत क्षेत्र में सुरक्षित और सहयोगात्मक समुद्री व्यवस्था बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। (INS Nilgiri Sydney IFR 2026)

Inspirational: कॉर्पोरेट जॉब छोड़ सेना में आए मेजर अब पूरे भारत में लगा रहे दौड़, 32 राज्यों में पूरी की 46 हाफ मैराथन

Major A Sharad Naidu Half Marathon Mission
Major A Sharad Naidu

Half Marathon Mission: भारतीय सेना के अधिकारी मेजर ए शरद नायडू इन दिनों अपने अनोखे मिशन को लेकर चर्चा में हैं। गोरखा राइफल्स से जुड़े मेजर नायडू ने 39 साल की उम्र में सेना जॉइन की थी। इससे पहले वह एक सफल कॉर्पोरेट करियर में थे और उनके पास 12 साल से ज्यादा का प्रोफेशनल अनुभव था।

मेकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मार्केटिंग और ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट में एमबीए भी किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी स्थिर नौकरी छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुना।

Half Marathon Mission: 2022 में शुरू हुआ खास मिशन

107 इन्फैंट्री बटालियन, टेरिटोरियल आर्मी, 11 गोरखा राइफल्स से जुड़े मेजर नायडू ने साल 2022 में एक अनोखा लक्ष्य तय किया। उन्होंने फैसला किया कि वह 50 साल की उम्र से पहले भारत के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में एक-एक हाफ मैराथन पूरा करेंगे।

इस मिशन की शुरुआत मिजोरम के वैरेंगटे से हुई। उस समय वह एक आर्मी कोर्स के दौरान व्यक्तिगत चुनौती का सामना कर रहे थे। उसी दिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद ही एक सोलो मैराथन पूरी की। यही पल उनके लिए एक बड़े मिशन की शुरुआत बन गया।

देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दौड़ पूरी

मेजर नायडू अब तक 46 हाफ मैराथन पूरी कर चुके हैं। उन्होंने देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह दौड़ पूरी की है। पिछले एक साल में ही उन्होंने उत्तर, पूर्वोत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत में 14 हाफ मैराथन पूरी की हैं।

वहीं, उनका यह मिशन केवल दौड़ पूरी करने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि वह हर राज्य में जाकर वहां के लोगों, संस्कृति और जीवन को करीब से समझने की कोशिश करते हैं।

मेडल नहीं, देश को समझना है मकसद

मेजर नायडू के मुताबिक यह मिशन किसी रिकॉर्ड या मेडल के लिए नहीं है। उनका उद्देश्य भारत की विविधता को अनुभव करना और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को जीना है।

हर दौड़ उनके लिए एक नया अनुभव होती है, जहां वह अलग-अलग इलाकों की परिस्थितियों, मौसम और लोगों के बीच दौड़ते हैं।

अब मिशन के अंतिम चरण में पहुंचे

मेजर नायडू अब अपने मिशन के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। उन्होंने कुल 36 में से 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर कर लिया है। अभी हिमाचल प्रदेश, केरल, लक्षद्वीप और लद्दाख में दौड़ पूरी करना बाकी है।

उनकी यह यात्रा लगातार जारी है और वह अपने तय लक्ष्य के अनुसार देश के हर हिस्से तक पहुंच रहे हैं।

मेजर नायडू अपनी सैन्य जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत मिशन को भी जारी रखते हैं। ऑपरेशनल ड्यूटी और ट्रेनिंग के बीच समय निकालकर वह अलग-अलग राज्यों में जाकर हाफ मैराथन पूरी करते हैं। (Half Marathon Mission)

वेस्ट एशिया तनाव पर रक्षा मंत्री लिया ने सेना की तैयारियों का जायजा, 10 साल का प्लान बनाने के निर्देश

Rajnath Singh defence review

Rajnath Singh defence review: वेस्ट एशिया के मौजूदा हालात और भारत की रक्षा तैयारियों को लेकर मंगलवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक विशेष बैठक में चर्चा की। इस बैठक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव, रक्षा उत्पादन सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

बैठक के दौरान रक्षा मंत्री को वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति की पूरी जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष और बढ़ते तनाव का असर केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दुनिया के कई देशों पर पड़ रहा है, जिसमें भारत भी शामिल है।

Rajnath Singh defence review: संघर्ष का असर भारत की सुरक्षा और सप्लाई चेन पर

बैठक में खास तौर पर इस बात पर ध्यान दिया गया कि अगर वेस्ट एशिया में स्थिति और बिगड़ती है तो उसका भारत पर क्या असर पड़ेगा। अधिकारियों ने बताया कि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से समुद्री रास्तों, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मार्गों पर दबाव बढ़ सकता है।

यह मार्ग दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का ट्रांसपोर्ट होता है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में किसी भी तरह की बाधा से देश की ऊर्जा सप्लाई और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

इसके अलावा बैठक में यह भी चर्चा हुई कि इस स्थिति का रक्षा उपकरणों की सप्लाई चेन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। कई जरूरी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और टेक्नोलॉजी अलग-अलग देशों से आती है। अगर सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो इससे मेंटेनेंस और सर्विसेबिलिटी पर असर पड़ सकता है। (Rajnath Singh defence review)

रक्षा मंत्री ने दिए अहम निर्देश

बैठक के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कहा कि वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष से मिलने वाले ऑपरेशनल और टेक्नोलॉजिकल अनुभवों का लगातार अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और भारत को समय के साथ अपनी तैयारियों को मजबूत करना होगा।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इन अनुभवों के आधार पर सेना की रणनीति और क्षमताओं को बेहतर बनाया जाए। इसके साथ ही उन्होंने अगले दस साल के लिए एक व्यापक और इंटीग्रेटेड रोडमैप तैयार करने की जरूरत पर भी बल दिया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि इस रोडमैप में भविष्य की चुनौतियों, नए अवसरों और तकनीकी बदलावों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया, ताकि भारत रक्षा क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा स्वदेशी सिस्टम और उपकरणों पर निर्भर हो सके। (Rajnath Singh defence review)

टेक्नोलॉजी और ऑपरेशन पर विशेष फोकस

बैठक में यह भी चर्चा हुई कि आधुनिक युद्ध में टेक्नोलॉजी की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, मिसाइल सिस्टम और नेटवर्क आधारित ऑपरेशन जैसे क्षेत्र अब युद्ध के अहम हिस्से बन चुके हैं।

अधिकारियों ने बताया कि इन नई तकनीकों को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी रक्षा रणनीति को लगातार अपडेट करना होगा। इसके लिए रिसर्च, डेवलपमेंट और इंडिजिनस प्रोडक्शन पर फोकस बढ़ाने की जरूरत है।

सभी मोर्चों पर तैयार रहने की बात

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारत को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। चाहे वह पारंपरिक युद्ध हो या नई तरह की चुनौतियां, सभी मोर्चों पर ऑपरेशनल रेडीनेस बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि सेना के पास जरूरी संसाधन, उपकरण और सपोर्ट सिस्टम हमेशा उपलब्ध रहें, ताकि किसी भी स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। (Rajnath Singh defence review)

बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा

इस बैठक में केवल सुरक्षा स्थिति ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े कई अन्य पहलुओं पर भी चर्चा हुई। इसमें रक्षा उत्पादन, उपकरणों की खरीद, उनकी देखभाल और सर्विसेबिलिटी जैसे मुद्दे शामिल रहे।

अधिकारियों ने बताया कि मौजूदा स्थिति में इन सभी पहलुओं पर नजर रखना जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की बाधा आने पर समय रहते समाधान किया जा सके।

बैठक के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत लगातार बदलते वैश्विक हालात पर नजर बनाए हुए है और जरूरत के अनुसार अपनी रणनीति में बदलाव करता रहेगा। (Rajnath Singh defence review)

लेह-मनाली हाईवे खोलने की तैयारी शुरू, BRO ने शुरू किया स्नो क्लियरेंस ऑपरेशन

Leh-Manali Snow Clearance

Leh-Manali Snow Clearance: लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से जोड़ने वाले अहम लेह-सर्चू-मनाली मार्ग को खोलने की शुरुआत शुरू हो गई है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ ने नेशनल हाईवे-03 पर स्नो क्लियरेंस ऑपरेशन शुरू कर दिया है। यह सड़क हर साल भारी बर्फबारी के कारण करीब चार से पांच महीने तक बंद रहती है, जिससे इलाके की कनेक्टिविटी पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।

Leh-Manali Snow Clearance: बीआरओ का प्रोजेक्ट हिमांक कर रहा ऑपरेशन

बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के तहत यह अभियान चलाया जा रहा है। यह प्रोजेक्ट लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले और कठिन इलाकों में सड़क निर्माण और रखरखाव का काम करता है। इस बार भी टीमों ने कठिन मौसम और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच बर्फ हटाने का काम शुरू किया है, ताकि सड़क को जल्द से जल्द खोला जा सके।

Leh-Manali Snow Clearance

यह 251.5 किलोमीटर लंबा रास्ता लेह से सरचू तक जाता है और इसमें तीन प्रमुख हाई एल्टीट्यूड पास शामिल हैं। इनमें तंगलंग ला, लाचुंग ला और नकी ला जैसे दर्रे आते हैं, जिनकी ऊंचाई 15 हजार फीट से ज्यादा है। इन इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फ जमा हो जाती है, जिससे सड़क पूरी तरह बंद हो जाती है।

यह सड़क कई दूर-दराज के गांव और बॉर्डर के पास स्थित कैंप के लिए लाइफ लाइन है। सर्चू समेत करीब 9 गांव इस मार्ग पर निर्भर हैं, जहां लगभग 5 से 6 हजार लोग रहते हैं। सड़क बंद होने से इन इलाकों में जरूरी सामान और सेवाओं की आपूर्ति प्रभावित होती है।

Leh-Manali Snow Clearance

सेना के लिए भी महत्वपूर्ण

यह सड़क भारतीय सेना के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। लद्दाख में तैनात सैनिकों तक रसद, उपकरण और जरूरी सामग्री पहुंचाने में यह मार्ग अहम भूमिका निभाता है। सड़क बंद होने पर सेना की सप्लाई लाइन प्रभावित होती है, इसलिए इसे समय पर खोलना जरूरी होता है।

इस ऑपरेशन को बीआरओ की 111 रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी, जो 753 बॉर्डर रोड्स टास्क फोर्स के तहत काम करती है, अंजाम दे रही है। टीमों के पास भारी स्नो कटिंग मशीनें और अनुभवी ऑपरेटर्स हैं। ये टीमें लगातार दिन-रात काम कर रही हैं ताकि रास्ते को जल्द से जल्द साफ किया जा सके।

Leh-Manali Snow Clearance

स्नो क्लियरेंस का काम आसान नहीं होता। ऊंचाई, ठंड और खराब मौसम के बीच काम करना चुनौतीपूर्ण होता है। इसके बावजूद बीआरओ की टीमें इस मिशन को पूरा करने में जुटी हुई हैं और रास्ते को फिर से चालू करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अफसरों को मिलेगा हक, परमानेंट कमीशन न देने को बताया गलत

IAF Supreme Court
Supreme Court Rules Against Denial of Permanent Commission to IAF SSC Officers, Grants Pension Benefits

IAF Supreme Court: भारतीय वायु सेना से जुड़े एक बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सेना में महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों को भी परमानेंट कमीशन (पीसी) पाने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने माना कि अब तक उन्हें पीसी न देना सही नहीं था और इसमें कई तरह की भेदभाव वाली खामियां थीं।

यह मामला उन महिला अधिकारियों से जुड़ा है जिन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत सेवा के बाद परमानेंट कमीशन (PC) नहीं दिया गया था। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के बाद प्रभावित अधिकारियों को पेंशन और अन्य सुविधाएं देने का आदेश दिया है।

इस फैसले का सबसे बड़ा असर महिला अधिकारियों पर पड़ा है। लंबे समय से महिलाएं सेना में समान अधिकारों की मांग कर रही थीं। (IAF Supreme Court)

IAF Supreme Court: क्या है पूरा मामला

भारतीय वायुसेना में दो तरह की सर्विस होती है। एक होती है शॉर्ट सर्विस कमीशन, जिसे एसएससी कहा जाता है। इसमें अधिकारी एक तय समय, आमतौर पर 10 से 14 साल तक सेवा करते हैं। इसके बाद या तो उन्हें परमानेंट कमीशन दिया जाता है या फिर सेवा से बाहर होना पड़ता है।

दूसरी तरफ परमानेंट कमीशन यानी पीसी होता है, जिसमें अधिकारी लंबी अवधि तक सेवा कर सकते हैं और उन्हें पेंशन, प्रमोशन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं।

समस्या तब शुरू हुई जब कई एसएससी अधिकारियों ने शिकायत की कि उन्हें परमानेंट कमीशन देने की प्रक्रिया में सही मौका नहीं दिया गया और उनके साथ न्याय नहीं हुआ। (IAF Supreme Court)

अधिकारियों की शिकायत क्या थी

कई अधिकारियों, खासकर महिला अधिकारियों ने कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं थी। उनका कहना था कि उन्हें खुद को साबित करने का सही मौका नहीं मिला।

कुछ मामलों में यह भी सामने आया कि अलग-अलग बैच के अधिकारियों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए गए। यानी एक बैच में ज्यादा अंक वालों का चयन हुआ, जबकि दूसरे बैच में कम अंक वालों को भी मौका मिल गया।

इसके अलावा कुछ महिला अधिकारियों ने यह भी कहा कि मैटरनिटी लीव के कारण उनकी एसीआर पर असर पड़ा, जिससे उनके चयन की संभावना कम हो गई। (IAF Supreme Court)

क्या कहा कोर्ट ने

कोर्ट ने अपने विशेष अधिकार, यानी आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला अधिकारियों के साथ सिस्टम के स्तर पर भेदभाव हुआ है। साथ ही यह भी कहा कि हर साल केवल 250 महिला अधिकारियों को ही पीसी देने की सीमा तय करना मनमाना फैसला था और इसे सही नहीं माना जा सकता।

यह फैसला आर्मी, नेवी और एयर फोर्स तीनों पर लागू होगा। कोर्ट ने साफ किया कि महिलाओं को मूल्यांकन, करियर के मौके और पेंशन जैसे मामलों में बराबरी मिलनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी समझाया कि एसएससी सिस्टम में अधिकारी 10 साल के लिए भर्ती होते हैं, जिसे बढ़ाकर 14 साल तक किया जा सकता है। इसके बाद अगर उन्हें परमानेंट कमीशन नहीं मिलता, तो उन्हें सेवा छोड़नी पड़ती है। ऐसे में उन्हें पेंशन और आगे बढ़ने के मौके भी सीमित मिलते हैं। वहीं, पीसी मिलने पर अधिकारी रिटायरमेंट तक सेवा कर सकते हैं, प्रमोशन पा सकते हैं और पेंशन के हकदार बनते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों के मूल्यांकन का तरीका ही गलत था। उनकी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (एसीआर) इस सोच के साथ लिखी जाती थी कि उन्हें पीसी नहीं मिलेगा। इससे उनकी मेरिट यानी योग्यता पर असर पड़ता था।

हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि 2019, 2020 और 2021 में जो चयन बोर्ड के जरिए पीसी दिया जा चुका है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के मानदंड को सही तरीके से और निष्पक्ष तरीके से लागू नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी माना कि अधिकारियों को खुद को साबित करने का पूरा मौका नहीं मिला, जो कि उनके अधिकारों के खिलाफ है। इसे संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन माना गया। (IAF Supreme Court)

क्या थी 2019 की पॉलिसी 

साल 2019 में वायु सेना ने एक नई ह्यूमन रिसोर्स पॉलिसी लागू की थी। इसके तहत एसएससी अधिकारियों को पीसी पाने के लिए तीन मौके दिए गए थे। यह मौके उनकी सेवा के 11वें, 12वें और 13वें साल में मिलते थे।

इस प्रक्रिया में अधिकारियों के प्रदर्शन को कई आधारों पर परखा जाता था। जैसे उनकी एसीआर यानी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट, सीजीपीए और एक न्यूनतम प्रदर्शन मानक, जिसे एमपीसी कहा जाता है।

सरकार का कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया मेरिट के आधार पर थी और इसमें कोई भेदभाव नहीं था। (IAF Supreme Court)

कोर्ट ने क्या राहत दी

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं को अक्सर ऐसे कोर्स और अहम पोस्टिंग नहीं दी जाती थी, जो उनके करियर को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं। बाद में जब पीसी के लिए उनका मूल्यांकन किया जाता था, तो उनके पास कम मौके होने की वजह से उन्हें कमजोर माना जाता था।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अब यह नहीं माना जा सकता कि परमानेंट कमीशन सिर्फ पुरुषों के लिए ही रहेगा। महिलाओं को इससे बाहर रखना साफ तौर पर भेदभाव है।

पुराने मामलों में न्याय देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया। जिन महिला अधिकारियों को पीसी मिलना चाहिए था, उन्हें ऐसा माना जाएगा जैसे उन्होंने 20 साल की सेवा पूरी कर ली हो। इसके आधार पर उन्हें पेंशन और बाकी सभी सुविधाएं दी जाएंगी। यह लाभ उन अधिकारियों को भी मिलेगा, जिन्हें पहले चयन प्रक्रिया में अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

इसमें पेंशन के साथ-साथ मेडिकल सुविधा, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ भी शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन अधिकारियों की सेवा को ऐसे माना जाए जैसे उन्होंने लंबी अवधि तक सेवा की हो।

हालांकि कोर्ट ने उन्हें दोबारा सेवा में लेने का आदेश नहीं दिया, लेकिन आर्थिक सुरक्षा देने पर जोर दिया।

नेवी-एयरफोर्स पर क्या कहा कोर्ट ने

नेवी के मामले में कोर्ट ने कहा कि वहां सीटों का सिस्टम ठीक है, लेकिन चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2009 के बाद शामिल हुई महिला अधिकारियों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर पीसी दिया जाए।

एयर फोर्स के मामले में कोर्ट ने कहा कि जिन अधिकारियों को करियर में आगे बढ़ने का सही मौका ही नहीं मिला, उनके खिलाफ यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने कम सेवा की है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें दोबारा सेवा में लेना सही नहीं होगा, लेकिन इससे उनकी पेंशन नहीं रोकी जा सकती।

अंत में कोर्ट ने तीनों सेनाओं को निर्देश दिया कि वे अपने मूल्यांकन सिस्टम की पूरी समीक्षा करें, ताकि भविष्य में किसी भी महिला अधिकारी के साथ भेदभाव न हो और सभी को निष्पक्ष मौका मिल सके। (IAF Supreme Court)

Explained: क्या होता है कर्नल ऑफ द रेजिमेंट? लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई को मिला भारतीय सेना का सबसे सम्मानित पद!

Colonel of the Regiment
Lieutenant General Rajiv Ghai, Deputy Chief of Army Staff (Strategy), Indian Army, has assumed the prestigious appointment of Colonel of the Kumaon Regiment, Kumaon Scouts and Naga Regiment, taking over from Lieutenant General Ram Chander Tiwari, the outgoing General Officer Commanding-in-Chief, Eastern Command.

Colonel of the Regiment: भारतीय सेना में कई ऐसे पद होते हैं जो सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परंपरा और सम्मान से भी जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक खास पद है “कर्नल ऑफ द रेजिमेंट” (Colonel of the Regiment)। हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कुमाऊं रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट और कुमाऊं स्काउट्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद संभाला है। नाम भले ही “कर्नल” हो, लेकिन यह कोई सामान्य रैंक या फील्ड कमांड नहीं है, बल्कि परंपरा, सम्मान और नेतृत्व से जुड़ा एक खास पद है। ऐसे में समझना जरूरी है कि कर्नल ऑफ द रेजिमेंट वास्तव में क्या होता है और सेना में इसकी क्या अहमियत है। (Colonel of the Regiment)

Colonel of the Regiment: क्या होता है कर्नल ऑफ द रेजिमेंट

सरल शब्दों में समझें तो कर्नल ऑफ द रेजिमेंट कोई सामान्य सैन्य रैंक नहीं है। यह एक ऑनरेरी यानी सम्मानित और पारंपरिक पद होता है। इसका काम युद्ध में कमांड देना नहीं, बल्कि पूरी रेजिमेंट को एक परिवार की तरह जोड़कर रखना होता है।

यह पद उस अधिकारी को दिया जाता है जिसका उस रेजिमेंट से गहरा रिश्ता रहा हो और जिसने अपने करियर में बेहतरीन सेवा दी हो। वह अधिकारी उस रेजिमेंट का सबसे वरिष्ठ और सम्मानित चेहरा बन जाता है। (Colonel of the Regiment)

कैसे हुई इस पद की शुरुआत 

यह परंपरा ब्रिटिश दौर की सेना से शुरू हुई थी। उस समय रेजिमेंट्स को एक तरह से “छोटी-छोटी निजी सेना” की तरह माना जाता था। तब कर्नल ऑफ द रेजिमेंट उस यूनिट का सबसे बड़ा संरक्षक होता था, जिसे जवान अपने परिवार के मुखिया या पिता जैसा मानते थे।

आजादी के बाद भारतीय सेना ने इस परंपरा को जारी रखा। आज भी हर बड़ी रेजिमेंट, जैसे कुमाऊं, गोरखा, सिख या राजपूताना राइफल्स, आर्टिलरी और आर्मर्ड कोर में यह पद होता है। आमतौर पर एक ही व्यक्ति पूरी रेजिमेंट की सभी बटालियनों के लिए कर्नल ऑफ द रेजिमेंट होता है। जैसे कुमाऊं रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट और कुमाऊं स्काउट्स के लिए एक ही अधिकारी इस जिम्मेदारी को संभाल सकता है। (Colonel of the Regiment)

कैसे होती है नियुक्ति?

कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद आमतौर पर चुनाव के जरिए तय होता है, लेकिन अंतिम फैसला सेना प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) की मंजूरी से होता है। इस प्रक्रिया में रेजिमेंट के वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा लेते हैं। कर्नल और उससे ऊपर के अधिकारी वोट देते हैं, जबकि बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर्स अपनी-अपनी यूनिट के जवानों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

आमतौर पर उसी अधिकारी को चुना जाता है जो सबसे वरिष्ठ हो और जिसका उस रेजिमेंट से गहरा जुड़ाव रहा हो। यह अधिकारी ब्रिगेडियर, मेजर जनरल या लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का होता है, और कभी-कभी जनरल भी हो सकता है।

एक बार नियुक्ति होने के बाद यह पद लंबे समय तक रहता है। अक्सर अधिकारी इसे जीवनभर निभाता है या तब तक जब तक वह खुद इसे छोड़ न दे।

हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने यह जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने यह पद ईस्टर्न कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राम चंदर तिवारी से लिया है, जो पहले इस रेजिमेंट के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट थे। (Colonel of the Regiment)

क्या करता है कर्नल ऑफ द रेजिमेंट

कर्नल ऑफ द रेजिमेंट (CoR) कोई लड़ाई लड़ने या यूनिट चलाने वाला पद नहीं होता। यानी वह रोजमर्रा की कमान नहीं संभालता। उसका काम एक मार्गदर्शक, संरक्षक और परिवार के मुखिया की तरह होता है।

सबसे पहले, वह रेजिमेंट की परंपरा और इतिहास को संभालकर रखता है। रेजिमेंट ने कौन-कौन सी लड़ाइयां लड़ीं, कौन से सम्मान जीते, उसका वॉर क्राई क्या है, यूनिफॉर्म और बैज कैसे हैं- इन सब चीजों को वह जीवित रखता है। साथ ही रेजिमेंटल सेंटर और म्यूजियम को भी आगे बढ़ाने में मदद करता है।

दूसरी बड़ी जिम्मेदारी होती है सैनिकों और उनके परिवारों का ख्याल रखना। इसमें सिर्फ ड्यूटी पर तैनात जवान ही नहीं, बल्कि रिटायर्ड सैनिक, शहीदों के परिवार और वेटरन्स भी शामिल होते हैं। उनकी पेंशन, इलाज, बच्चों की पढ़ाई या नौकरी जैसी जरूरतों को लेकर वह उच्च अधिकारियों से बात करता है और मदद की कोशिश करता है। (Colonel of the Regiment)

तीसरी भूमिका है मोराल यानी मनोबल और एकता बढ़ाना। वह पूरी रेजिमेंट को एक परिवार की तरह जोड़कर रखता है। अलग-अलग कार्यक्रमों जैसे रेजिमेंटल डे, रीयूनियन या परेड में शामिल होकर जवानों का हौसला बढ़ाता है और युवा अफसरों को दिशा देता है।

इसके अलावा, वह रेजिमेंट का प्रतिनिधित्व भी करता है। बड़े समारोहों में शामिल होता है, नए अफसरों की कमीशनिंग या प्रमोशन के समय मार्गदर्शन देता है और रेजिमेंट की तरफ से सेना मुख्यालय या रक्षा मंत्रालय में अपनी बात रखता है।

सबसे खास बात यह है कि कर्नल ऑफ द रेजिमेंट होने के कारण वह ऊपर के स्तर पर रेजिमेंट के हितों की आवाज उठाने में सक्षम होता है। जैसे बेहतर ट्रेनिंग, नए हथियार या अच्छी पोस्टिंग से जुड़े मुद्दों पर वह अपने विचार रख सकता है। (Colonel of the Regiment)

इतना खास क्यों है यह पद

कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद इसलिए खास है क्योंकि यह रैंक से भी ऊपर का सम्मान होता है। एक अधिकारी चाहे कितना भी बड़ा पद संभाल रहा हो, लेकिन अगर वह अपनी रेजिमेंट का कर्नल ऑफ द रेजिमेंट बनता है, तो यह उसके करियर का सबसे गौरवपूर्ण क्षण माना जाता है।

यह पद उस अधिकारी के अनुभव, नेतृत्व और रेजिमेंट के साथ उसके जुड़ाव का प्रतीक होता है। (Colonel of the Regiment)

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई की नई जिम्मेदारी

हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने इस पद को संभाला है। उन्होंने कुमाऊं रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट और कुमाऊं स्काउट्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट के रूप में जिम्मेदारी ली है।

उन्होंने इस मौके पर कहा कि उन्हें इन वीर और गौरवशाली रेजिमेंट्स का नेतृत्व करने पर गर्व है। उन्होंने अपने पूर्व अधिकारी के योगदान की भी सराहना की और कहा कि वह इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। (Colonel of the Regiment)