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Special Report: भारतीय सेना की आर्मर्ड कोर में बड़ा बदलाव! अब हर टैंक यूनिट के साथ होगी ड्रोन से लैस ये खास “स्क्वाड्रन”

Shaurya Squadron Indian Army
Shaurya Squadron Indian Army

Shaurya Squadron Indian Army: भारतीय सेना अब तेजी से अपने युद्ध लड़ने के तरीके को बदल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका-ईरान जैसे हालिया संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ टैंक, तोप और सैनिकों से नहीं जीते जाते, बल्कि टेक्नोलॉजी, खासकर ड्रोन की बड़ी भूमिका होती है। यही वजह है कि भारतीय सेना अब अपनी इन्फैंट्री के बाद आर्मर्ड कोर यानी टैंक यूनिट्स में भी बड़ा बदलाव करने जा रही है।

सेना अब हर आर्मर्ड रेजिमेंट में “शौर्य स्क्वाड्रन” नाम से एक नई यूनिट जोड़ने की तैयारी कर रही है। यह कोई सामान्य यूनिट नहीं होगी, बल्कि इन्फैंट्री की अश्नि प्लाटून की तरह ड्रोन और एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस एक आधुनिक टैक्टिकल फोर्स होगी, जो टैंकों की ताकत को कई गुना बढ़ा देगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

Shaurya Squadron Indian Army: क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव

पिछले कुछ सालों में हुए युद्धों ने दुनिया को दिखाया है कि ड्रोन अब गेम चेंजर बन चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में कई बार ऐसा देखा गया कि छोटे-छोटे ड्रोन ने महंगे टैंकों को भी नष्ट कर दिया। वहीं, मिडिल ईस्ट में भी ड्रोन अटैक और सर्विलांस ने युद्ध की दिशा बदल दी।

भारतीय सेना ने इन अनुभवों से सीख लेते हुए यह फैसला किया है कि अब सिर्फ टैंक या आर्मर्ड व्हीकल्स पर निर्भर रहना काफी नहीं है। उन्हें ड्रोन-एनेबल्ड बनाना जरूरी है। यानी अब टैंक जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान से मिलने वाली जानकारी और हमले की क्षमता के साथ काम करेंगे। (Shaurya Squadron Indian Army)

क्या है नई शौर्य स्क्वाड्रन

शौर्य स्क्वाड्रन भारतीय सेना की एक नई और आधुनिक टैक्टिकल यूनिट है, जिसे खास तौर पर मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस के लिए तैयार किया जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी यूनिट है जो एक साथ कई काम कर सकती है। इन प्रस्तावित स्क्वाड्रनों को आर्मर्ड रेजिमेंट के अंदर कंपनी स्तर पर बनाया जाएगा। इसका मतलब यह है कि ड्रोन यूनिट्स को सीधे फ्रंटलाइन लड़ाकू यूनिट्स के साथ जोड़ा जाएगा, न कि उन्हें ऊपर के स्तर पर अलग रखा जाएगा।

आम तौर पर एक आर्मर्ड रेजिमेंट की कंपनी में करीब एक दर्जन टैंक और सौ से ज्यादा जवान होते हैं। ऐसे में इसी स्तर पर ड्रोन तैनात करने का मकसद है कि निगरानी, टारगेट पहचान और हमला करने की प्रक्रिया को तेज और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।

यह यूनिट दुश्मन की निगरानी करेगी, टारगेट ढूंढेगी, जरूरत पड़ने पर तुरंत हमला भी करेगी और लगातार मैदान में सक्रिय भी रहेगी। इसका मकसद है दूर तक देखना, गहराई में वार करना और लंबे समय तक ऑपरेशन जारी रखना।

यह यूनिट सबसे पहले सदर्न कमांड के तहत सुदर्शन चक्र कोर की व्हाइट टाइगर डिवीजन में रेज की गई है। हाल ही में इसे बाबीना फायरिंग रेंज में “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज” के दौरान टेस्ट भी किया गया, जहां इसने अपनी क्षमताओं का सफल प्रदर्शन किया। (Shaurya Squadron Indian Army)

ड्रोन के साथ टैंक की नई जोड़ी

अब भारतीय सेना का फोकस यह है कि टैंक और ड्रोन एक साथ मिलकर काम करें। पहले टैंक आगे बढ़ते थे और उन्हें दुश्मन की जानकारी सीमित मिलती थी। लेकिन अब ड्रोन पहले ही आसमान से दुश्मन की पोजीशन, मूवमेंट और हथियारों की जानकारी दे देंगे।

इससे टैंक यूनिट्स ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी हो जाएंगी। अगर दुश्मन कहीं छिपा हुआ है, तो ड्रोन पहले ही उसे पहचान लेगा। इसके बाद टैंक या ड्रोन खुद उस पर सटीक हमला कर सकते हैं।

यही नहीं, अब टैंक कॉलम के आगे ड्रोन “स्काउट” की तरह काम करेंगे। यानी वे रास्ता साफ करेंगे, खतरे की जानकारी देंगे और जरूरत पड़ने पर खुद हमला भी कर सकते हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

हर आर्मर्ड रेजिमेंट में होगी ड्रोन यूनिट

सूत्रों के मुताबिक, इन स्क्वाड्रनों का फोकस निगरानी के साथ-साथ हमले पर भी रहेगा। इसमें फर्स्ट पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन के जरिए दुश्मन के टैंक और लॉजिस्टिक ठिकानों पर हमला करने की क्षमता शामिल होगी।

हालांकि, सूत्रों ने यह भी साफ किया है कि “शौर्य स्क्वाड्रन” का यह कॉन्सेप्ट अभी शुरुआती चरण में है और इसे धीरे-धीरे डेवलप किया जा रहा है।

सेना की योजना है कि आने वाले समय में हर आर्मर्ड रेजिमेंट में एक डेडिकेटेड ड्रोन प्लाटून या शौर्य स्क्वाड्रन तैनात किया जाए। इसमें करीब 20 से 25 प्रशिक्षित सैनिक होंगे, जो खास तौर पर ड्रोन ऑपरेशन में एक्सपर्ट होंगे। बता दें कि प्रेसिडेंट गार्ड को शामिल करके सेना में लगभग 60 से 67 आर्मर्ड रेजिमेंट्स हैं। जिनमें से हर एक में लगभग 45-50 टैंक हैं और इन्हें कई स्क्वाड्रनों में बांटा गया है। (Shaurya Squadron Indian Army)

भारतीय सेना के पास करीब 4000-4200 तक मुख्य युद्धक टैंक हैं। इनमें टी-90 भीष्मा, टी-72 अजेय और अर्जुन एमके1ए जैसे टैंक शामिल हैं। सेना की आर्मर्ड रेजिमेंट्स इन्हीं टैंकों को चलाती और इस्तेमाल करती हैं।

इन यूनिट्स के पास अलग-अलग तरह के ड्रोन होंगे। कुछ ड्रोन सिर्फ निगरानी के लिए होंगे, कुछ दुश्मन पर हमला करने के लिए और कुछ ऐसे होंगे जो टारगेट पर मंडराते रहेंगे और सही समय पर खुद को विस्फोट कर देंगे।

इस तरह यह यूनिट टैंक यूनिट्स के लिए “आंख और हथियार” दोनों का काम करेगी। (Shaurya Squadron Indian Army)

अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज में दिखी ताकत

हाल ही में बाबीना फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज” में शौर्य स्क्वाड्रन का प्रदर्शन देखा गया। जहां सदर्न कमांड के जजनरल ऑफिसर कमांडर इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ भी इस एक्सरसाइज को देखने पहुंचे। इस एक्सरसाइज में टैंक, अटैक हेलीकॉप्टर, फाइटर जेट, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम एक साथ काम करते नजर आए।

यह पहली बार था जब इतने बड़े स्तर पर मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का प्रदर्शन किया गया। इसमें ड्रोन ने रियल-टाइम सर्विलांस दिया, टारगेट की पहचान की और फिर सटीक हमले में मदद की।

बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ जल्द ही दिल्ली में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की जिम्मेदारी संभालेंगे।

सदर्न कमांड की तरफ से जारी ट्विट में लिखा गया, “अमोघ ज्वाला एक्सरसाइज के दौरान भारतीय सेना ने शौर्य स्क्वाड्रन का प्रदर्शन किया। यह एक नई और आधुनिक टैक्टिकल यूनिट है, जिसे व्हाइट टाइगर डिवीजन ने सुदर्शन चक्र कोर के तहत तैयार किया है। (Shaurya Squadron Indian Army)

इस एक्सरसाइज में शौर्य स्क्वाड्रन को बिल्कुल असली युद्ध जैसे माहौल में टेस्ट किया गया। इसमें इस यूनिट ने दिखाया कि कैसे यह एक साथ दुश्मन पर नजर रख सकती है, उसकी गतिविधियों को समझ सकती है और फिर सही समय पर सटीक हमला भी कर सकती है।

शौर्य स्क्वाड्रन की खास बात यह है कि यह दूर तक निगरानी करने, दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर हमला करने और लंबे समय तक ऑपरेशन जारी रखने के लिए बनाई गई है। यह रियल टाइम जानकारी जुटाकर तुरंत और सटीक प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

इस एक्सरसाइज से यह साफ हो गया कि आने वाले समय में यह यूनिट युद्ध के मैदान में बहुत अहम भूमिका निभा सकती है और सेना की ताकत को काफी बढ़ा सकती है।” (Shaurya Squadron Indian Army)

इन्फैंट्री में अश्नि, शक्तिबाण और दिव्यास्त्र

पिछले साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, भैरव बटालियन और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई UAV/ड्रोन-केंद्रित स्ट्रक्चर बनाने का ऐलान किया था। ये सभी यूनिट्स मुख्य रूप से इन्फैंट्री और आर्टिलरी के लिए डिजाइन की गई हैं, ताकि पारंपरिक बलों को आधुनिक ड्रोन युद्ध क्षमता से लैस किया जा सके।

अश्नि प्लाटून (Ashni Platoons) इन्फैंट्री बटालियनों के अंदर रेज की गई हैं। प्रत्येक बटालियन में 20-25 विशेष प्रशिक्षित सैनिकों वाली यह प्लाटून सर्विलांस, रिकॉन्सेंस, FPV स्ट्राइक और लॉइटरिंग मुनिशन (कामिकाजे ड्रोन) से लैस है। इसका उद्देश्य हर इन्फैंट्री यूनिट को ऑर्गेनिक ड्रोन क्षमता देना है, जिससे ग्राउंड फोर्सेस रीयल-टाइम इंटेलिजेंस और प्रिसिजन स्ट्राइक कर सकें। सेना की योजना है कि हर इन्फैंट्री यूनिट में अश्नि प्लाटून तैयार की जाए।

शक्तिबाण रेजिमेंट भी आर्टिलरी के अंतर्गत तैयार की गई हैं। ये यूएवी/सी-यूएवी आधारित स्पेशल आर्टिलरी रेजिमेंट्स हैं, जो लंबी दूरी के ड्रोन स्वार्म, लॉइटरिंग मुनिशन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम से लैस हैं। ये बैटलफील्ड पर डीप स्ट्राइक और एंटी-ड्रोन रक्षा प्रदान करती हैं।

भैरव बटालियन स्पेशल फोर्सेस/लाइट कमांडो यूनिट्स हैं, जो घातक और स्पेशल फोर्सेस के बीच की कड़ी है। ये ड्रोन-इंटीग्रेटेड कमांडो ऑपरेशंस के लिए हैं, जहां स्वार्म ड्रोन, ओवरवॉच और शॉक एक्शन पर फोकस है। 25-30 ऐसी बटालियन रेज की जा रही हैं।

वहीं, दिव्यास्त्र बैटरी आर्टिलरी में लॉइटरिंग मुनिशन और सर्विलांस एसेट्स का कॉम्बिनेशन हैं। ये मूविंग टारगेट्स को ट्रैक करके रीयल-टाइम में सटीक हमला करती हैं, जिससे आर्टिलरी की मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

ये स्ट्रक्चर ‘डेकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन’ (2023-2032) का हिस्सा हैं, जो रुद्र ब्रिगेड्स के साथ मिलकर सेना को अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए तैयार कर रही हैं। ड्रोन को सबसे निचले स्तर तक इंटीग्रेट करके भारतीय सेना फ्यूचर-रेडी बन रही है, जहां हर सैनिक ईगल इन द आर्म की तरह ड्रोन से लैस होगा। यह परिवर्तन सीमा पर चीन-पाकिस्तान थ्रेट्स के जवाब में महत्वपूर्ण है। (Shaurya Squadron Indian Army)

सेना की “ड्रोन-फर्स्ट” अप्रोच

भारतीय सेना अब धीरे-धीरे “ड्रोन-फर्स्ट” रणनीति की ओर बढ़ रही है। इसका मतलब है कि अब युद्ध में सबसे पहले ड्रोन का इस्तेमाल होगा, उसके बाद बाकी हथियारों का।

भारतीय सेना की इन्फैंट्री में पहले ही अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण और दिव्यास्त्र जैसे ड्रोन यूनिट्स तैनात की जा चुकी हैं। अब उसी मॉडल को आर्मर्ड में भी लागू किया जा रहा है।

सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक हर सैनिक को बेसिक ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग मिल जाए। इसके लिए देशभर के कई मिलिट्री संस्थानों में ट्रेनिंग सेंटर भी बनाए गए हैं। (Shaurya Squadron Indian Army)

रुद्र ब्रिगेड और मल्टी-डोमेन वॉर

सेना अब सिर्फ यूनिट लेवल पर ही नहीं, बल्कि ब्रिगेड लेवल पर भी बदलाव कर रही है। “रुद्र ब्रिगेड” जैसे नए स्ट्रक्चर बनाए जा रहे हैं, जिनमें टैंक, इन्फैंट्री, आर्टिलरी और ड्रोन सभी को एक साथ जोड़ा जा रहा है।

इससे सेना की मारक क्षमता और प्रतिक्रिया समय दोनों बेहतर होंगे। दुश्मन पर तेजी से और सटीक हमला करना आसान हो जाएगा। (Shaurya Squadron Indian Army)

Petrodollar vs Petroyuan: होर्मुज में ईरान के इस दांव से घबराया अमेरिका, क्या खत्म होगा डॉलर का राज?

Petrodollar vs Petroyuan
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Petrodollar vs Petroyuan: पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान-अमेरिका टकराव के बीच एक ऐसा खेल चल रहा है जो केवल मिसाइल और ड्रोन तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई असल में पैसों की है, करेंसी की है और दुनिया की आर्थिक ताकत के संतुलन की है। यह लड़ाई पेट्रो डॉलर वर्सेस पेट्रो युआन की है। अगर इसे आसान भाषा में समझें तो यह पूरी कहानी तेल और पैसे के रिश्तों की है।

इस समय जो कुछ भी होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हो रहा है, वह सिर्फ एक युद्ध नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक दांव भी है। जहां ईरान इस पूरे खेल में सिर्फ अपने दुश्मनों से नहीं लड़ रहा, बल्कि वह अमेरिका के सबसे बड़े आर्थिक हथियार को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। (Petrodollar vs Petroyuan)

Petrodollar vs Petroyuan: पेट्रो डॉलर क्या है और कैसे बना अमेरिका की ताकत

दुनिया में आज जो अमेरिकी डॉलर इतना मजबूत है, उसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह तेल है। 1970 के दशक में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत तय हुआ कि दुनिया में ज्यादातर तेल का व्यापार सिर्फ अमेरिकी डॉलर में होगा। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी देश को तेल खरीदना है, तो उसे पहले डॉलर हासिल करना पड़ेगा।

यहीं से पेट्रो डॉलर सिस्टम की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे यह पूरी दुनिया में फैल गया और आज भी ज्यादातर देशों के बीच तेल का व्यापार डॉलर में ही होता है। इससे अमेरिका को बहुत बड़ा फायदा मिला। हर देश को डॉलर की जरूरत होने लगी, जिससे डॉलर की मांग हमेशा बनी रहती है।

इसका एक और फायदा अमेरिका को यह मिला कि वह अपने आर्थिक घाटे को भी आसानी से संभाल सकता है, क्योंकि दुनिया के देश डॉलर को सुरक्षित मानकर अपने पास रखते हैं। इसके अलावा अमेरिका के पास यह ताकत भी आ गई कि वह किसी भी देश को डॉलर सिस्टम से बाहर करके उस पर आर्थिक दबाव बना सकता है। ईरान, रूस और वेनेजुएला जैसे देश इसका उदाहरण हैं। (Petrodollar vs Petroyuan)

क्या है पेट्रो युआन और चीन क्यों बढ़ा रहा है आगे

अब बात करते हैं पेट्रो युआन की। चीन ने कुछ साल पहले यह समझ लिया था कि अगर दुनिया सिर्फ डॉलर पर निर्भर रहेगी, तो अमेरिका हमेशा आर्थिक रूप से मजबूत रहेगा। इसलिए चीन ने अपनी करेंसी युआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने की कोशिश शुरू की।

इसके तहत चीन ने शंघाई इंटरनेशनल एनर्जी एक्सचेंज पर युआन में तेल का व्यापार शुरू किया। इसका मतलब यह हुआ कि अब कुछ देश डॉलर की बजाय युआन में भी तेल खरीद और बेच सकते हैं।

ईरान जैसे देशों के लिए यह बहुत बड़ा मौका बन गया, क्योंकि वे पहले से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। अगर वे डॉलर में व्यापार नहीं कर सकते, तो युआन उनके लिए एक विकल्प बन जाता है। यही वजह है कि चीन और ईरान के बीच तेल का व्यापार तेजी से बढ़ा है और उसमें युआन का इस्तेमाल भी हो रहा है। (Petrodollar vs Petroyuan)

ईरान वॉर में होर्मुज बना आर्थिक हथियार

अब समझिए कि इस युद्ध में होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों इतना महत्वपूर्ण है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से लगभग 20 फीसदी वैश्विक तेल गुजरता है। यानी अगर यहां कोई रुकावट आती है, तो पूरी दुनिया पर असर पड़ता है।

ईरान ने इस जगह को एक तरह से अपने आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। उसने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया, बल्कि नियंत्रित तरीके से जहाजों को गुजरने दिया जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक नई शर्त सामने आई है कि तेल का व्यापार डॉलर में नहीं, बल्कि युआन में किया जाए।

यह कदम सीधा-सीधा पेट्रो डॉलर सिस्टम को चुनौती देने जैसा है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि अगर दुनिया को तेल चाहिए, तो उसे अमेरिका के बजाय दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना होगा। (Petrodollar vs Petroyuan)

8 देशों से बात कर रहा है ईरान

निजी कंपनियां अब ईरान की सेना से जुड़े संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को पैसे देकर अपने तेल के जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिला रही हैं। यानी जहाजों को गुजरने के लिए एक तरह से “प्रोटेक्शन फीस” देनी पड़ रही है। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

लेकिन मामला यहीं तक सीमित नहीं है। ईरान अब इससे भी आगे बढ़ गया है। खबरों के मुताबिक, तेहरान कम से कम 8 देशों जैसे चीन, भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और इराक से बातचीत कर रहा है। इस बातचीत का मकसद एक ऐसा सिस्टम बनाना है जिसमें जो देश चीन की करेंसी युआन में तेल खरीदेगा, उसे होर्मुज से गुजरने में प्राथमिकता दी जाएगी।

यानी साफ शब्दों में कहें तो अगर तेल का सौदा डॉलर में नहीं, बल्कि युआन में होगा, तभी जहाजों को आसानी से रास्ता मिलेगा। एक ईरानी अधिकारी ने तो यहां तक कहा है कि होर्मुज से सीमित संख्या में ही टैंकर गुजरने दिए जाएंगे और उनमें भी वही जहाज प्राथमिकता पाएंगे जिनका तेल व्यापार युआन में होगा।

इसका मतलब बहुत बड़ा है। दुनिया का सबसे अहम तेल रास्ता अब धीरे-धीरे डॉलर से हटकर युआन की तरफ धकेला जा रहा है।

दूसरी तरफ, ईरान ने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया है। वह लगातार चीन को तेल भेज रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से करीब 1.1 से 1.2 करोड़ बैरल तेल होर्मुज के रास्ते चीन पहुंच चुका है। यह ज्यादातर “डार्क फ्लीट” यानी ऐसे जहाजों के जरिए हो रहा है जो ट्रैकिंग से बचकर चलते हैं या ईरान के झंडे वाले टैंकर होते हैं।

इससे साफ है कि ईरान बिना सोचे-समझे रास्ता बंद नहीं कर रहा, बल्कि बहुत सोच-समझकर चाल चल रहा है। वह इस रास्ते को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है जहां जरूरत हो वहां दबाव बना रहा है, और जहां फायदा हो वहां रास्ता दे रहा है।

यानी यह कोई सीधा-सादा कदम नहीं है, बल्कि बहुत ही रणनीतिक और सटीक तरीके से खेला जा रहा दांव है, जो अमेरिका की रणनीति से बिल्कुल अलग नजर आता है। (Petrodollar vs Petroyuan)

यह असिमेट्रिक इकोनॉमिक वॉर है

ईरान का यह कदम एक तरह का असिमेट्रिक इकोनॉमिक वॉर है। यानी वह सीधे सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि आर्थिक तरीके से जवाब दे रहा है। अगर ज्यादा देश युआन में तेल खरीदना शुरू कर देते हैं, तो धीरे-धीरे डॉलर की मांग कम हो सकती है।

इसका असर अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। डॉलर कमजोर हो सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और अमेरिका की वैश्विक पकड़ भी कम हो सकती है। हालांकि यह बदलाव तुरंत नहीं होगा, लेकिन इसकी शुरुआत हो चुकी है।

चीन को इस स्थिति से फायदा मिल सकता है। वह पहले से दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और अगर तेल का व्यापार युआन में होता है, तो उसकी करेंसी मजबूत होगी। इसके अलावा उसे सस्ता तेल भी मिल सकता है, क्योंकि ईरान जैसे देश प्रतिबंधों से बचने के लिए कम कीमत पर तेल बेचते हैं। (Petrodollar vs Petroyuan)

दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ अमेरिका या चीन तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। सबसे पहला असर तेल की कीमतों पर दिखाई देता है। युद्ध और तनाव की वजह से तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।

जब तेल महंगा होता है, तो हर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। भारत जैसे देशों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है। आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ता है।

इसके अलावा निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर जाने लगते हैं, जैसे सोना और चांदी। वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ जाती है। कंपनियों की लागत बढ़ती है और विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है। (Petrodollar vs Petroyuan)

पेट्रो डॉलर का धीरे-धीरे कमजोर होना

एक बात है जो नई दिल्ली, वॉशिंगटन और रियाद के वित्त मंत्रालयों को चिंतित कर सकती है। पिछले करीब 50 साल से दुनिया में तेल का ज्यादातर व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता रहा है। इसी सिस्टम को पेट्रो डॉलर कहा जाता है। इसमें खाड़ी देशों की कमाई का बड़ा हिस्सा फिर अमेरिका की फाइनेंशियल सिस्टम में वापस चला जाता है। लेकिन अब इस व्यवस्था में दरारें दिखने लगी हैं, जिन्हें सिर्फ थोड़े समय के बदलाव से छिपाया नहीं जा सकता।

यह सही है कि युद्ध शुरू होने के बाद कुछ समय के लिए डॉलर मजबूत हुआ है। मार्च में हमलों के बाद डॉलर इंडेक्स में करीब 2 फीसदी से ज्यादा बढ़त देखी गई। आमतौर पर जब दुनिया में तनाव बढ़ता है तो निवेशक सुरक्षित विकल्प की तरफ जाते हैं और डॉलर को अभी भी सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर की स्थिति लंबे समय तक मजबूत ही रहेगी। ऊपर से सब ठीक दिख सकता है, लेकिन अंदर ही अंदर बड़ा बदलाव चल रहा है।

चीन ने पहले अपने ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में किया करता था, लेकिन अब उसने इसका बड़ा हिस्सा अपनी करेंसी रेनमिन्बी यानी युआन में करना शुरू कर दिया है। एक दशक पहले जहां 80 प्रतिशत से ज्यादा व्यापार डॉलर में होता था, अब यह घटकर करीब आधा रह गया है। (Petrodollar vs Petroyuan)

रूस भी अपने ब्रिक्स देशों के साथ लगभग 90 प्रतिशत व्यापार अपनी-अपनी करेंसी में कर रहा है। सऊदी अरब ने भी खुले तौर पर युआन में तेल बेचने की संभावना पर चर्चा की है। अर्जेंटीना और पाकिस्तान जैसे देश चीन से होने वाले कई बड़े आयात युआन में ही निपटा रहे हैं।

भारत का उदाहरण भी दिलचस्प है। कुछ साल पहले तक भारत ईरान से तेल खरीदते समय रुपये में भुगतान करता था। यह पैसा भारतीय बैंकों में ही रखा जाता था और ईरान उसी पैसे से भारत से सामान खरीद लेता था। यह एक संतुलित व्यवस्था थी, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम होती थी और भारतीय मुद्रा भी मजबूत रहती थी।

कुल मिलाकर, तस्वीर यह दिखा रही है कि पेट्रो डॉलर सिस्टम अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी पकड़ कमजोर पड़ रही है और दुनिया अब दूसरे विकल्पों की तरफ बढ़ रही है। (Petrodollar vs Petroyuan)

क्या डॉलर का अंत हो जाएगा

यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है कि क्या अब डॉलर खत्म हो जाएगा। इसका जवाब है – नहीं, कम से कम अभी नहीं। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे मजबूत और भरोसेमंद करेंसी है। ज्यादातर देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का बड़ा हिस्सा होता है।

लेकिन यह जरूर है कि डॉलर की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। इसे एक लंबी प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए। जैसे समुद्र किनारे की मिट्टी धीरे-धीरे कटती है, वैसे ही डॉलर की ताकत भी समय के साथ कम हो सकती है।

पेट्रो युआन अभी शुरुआती दौर में है। इसमें कई सीमाएं भी हैं, जैसे चीन की कड़ी नियंत्रण वाली वित्तीय व्यवस्था और सीमित अंतरराष्ट्रीय भरोसा। लेकिन फिर भी यह एक विकल्प के रूप में उभर रहा है। (Petrodollar vs Petroyuan)

भारत के लिए क्या हैं मायने

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की स्थिति भी दिलचस्प है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और उसकी ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में होर्मुज में कोई भी रुकावट सीधे भारत को प्रभावित करती है।

पहले भारत ईरान से तेल खरीदता था और कुछ हद तक रुपये में भुगतान भी करता था। इससे उसे डॉलर पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में यह व्यवस्था लगभग खत्म हो गई है।

अब अगर पेट्रो युआन का दायरा बढ़ता है, तो भारत को भी अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। उसे अपने ऊर्जा स्रोतों और भुगतान के तरीकों में विविधता लानी होगी, ताकि किसी एक सिस्टम पर ज्यादा निर्भरता न रहे। (Petrodollar vs Petroyuan)

ट्रंप से दोस्ती कर भारत को क्या मिला

अगर सीधे और साफ शब्दों में समझें, तो अमेरिका के साथ रिश्तों से भारत को क्या मिला, इस पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका ने भारत के सामान पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया था। पहले 25 प्रतिशत “रिसिप्रोकल” के नाम पर लगाया गया और फिर 25 प्रतिशत और बढ़ाया गया, क्योंकि भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा था।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन भी रूस से भारत से ज्यादा तेल खरीद रहा था, लेकिन उस पर ऐसा कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया गया। यानी अमेरिका ने चीन से टकराने के बजाय भारत पर दबाव बनाना ज्यादा आसान समझा, जबकि भारत खुद को उसका रणनीतिक साझेदार कहता है।

बाद में जो टैरिफ समझौता हुआ, उसे आधिकारिक तौर पर बड़ी सफलता बताया गया। लेकिन हकीकत यह है कि टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया, जबकि पहले यह सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत के बीच था। यानी अब भी भारत ज्यादा टैरिफ दे रहा है। इसके साथ ही भारत ने अगले पांच साल में 500 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने का वादा भी किया।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि अगर यह टैरिफ पूरी तरह लागू रहता, तो भारत की जीडीपी पर करीब 0.8 प्रतिशत तक असर पड़ सकता था और अमेरिका को होने वाला निर्यात हर साल लगभग 35 बिलियन डॉलर तक घट सकता था। इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा, खासकर टेक्सटाइल, जेम्स और लेदर से जुड़े कामगारों पर, जो इस पूरे भू-राजनीतिक खेल में फंस गए।

इसी बीच ऑपरेशन सिंदूर भी हुआ, जो पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई थी। यह ऐसे समय पर हुआ जब भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संतुलन बनाकर चलने की जरूरत थी। ऑपरेशन के अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन इसके समय और दुनिया के सामने पेश किए जाने के तरीके ने यह दिखाया कि सरकार ने वैश्विक हालात का सही अंदाजा नहीं लगाया।

डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई सार्वजनिक टिप्पणियां भी इस रिश्ते की असली तस्वीर दिखाती हैं। कभी वह सलाह देने वाले अंदाज में नजर आए, तो कभी आलोचनात्मक। इससे यह साफ होता है कि यह रिश्ता जितना दिखाया जाता है, उतना मजबूत जमीनी स्तर पर नहीं है।

दूसरी तरफ ईरान है, जिससे भारत ने पिछले कुछ सालों में दूरी बना ली। लेकिन ईरान की भौगोलिक स्थिति बहुत अहम है। वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर बैठा है, जो दुनिया के तेल का सबसे बड़ा रास्ता है। साथ ही, चाबहार पोर्ट भी उसी के पास है, जो भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का एकमात्र रास्ता है।

आज ईरान ब्रिक्स का हिस्सा भी बन चुका है और रूस व चीन के साथ उसके संबंध मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में यह साफ है कि न तो अमेरिका और न ही इजरायल, ईरान की जगह ले सकते हैं। उसकी भौगोलिक और रणनीतिक अहमियत को किसी भी तरह से बदला नहीं जा सकता। (Petrodollar vs Petroyuan)

मल्टी-पोलर वर्ल्ड की तरफ बढ़ती दुनिया

आज की दुनिया धीरे-धीरे एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां सिर्फ एक देश या एक करेंसी का दबदबा नहीं रहेगा। इसे मल्टी-पोलर वर्ल्ड कहा जाता है। इसमें कई देश और कई करेंसी मिलकर वैश्विक व्यवस्था को तय करेंगे।

पेट्रो डॉलर से पेट्रो युआन की ओर बढ़ता यह बदलाव उसी दिशा का संकेत है। यह अचानक नहीं होगा, बल्कि धीरे-धीरे कई सालों में होगा। लेकिन जो घटनाएं आज हो रही हैं, वे इस बदलाव की नींव रख रही हैं। (Petrodollar vs Petroyuan)

भारतीय सेना में बड़ा बदलाव, अब ग्रेजुएट जवान चार नहीं सिर्फ डेढ़ साल में बनेंगे आर्मी ऑफिसर!

Indian Army ACC Entry

Indian Army ACC Entry: भारतीय सेना में जवान से ऑफिसर बनने का सपना अब पहले से ज्यादा आसान और तेज हो गया है। हाल ही में सेना ने इस प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है, खासकर उन जवानों के लिए जो पहले से ग्रेजुएट हैं। अब ऐसे जवानों को ऑफिसर बनने के लिए लंबी 4 साल की ट्रेनिंग नहीं करनी होगी, बल्कि वे सिर्फ डेढ़ साल में ही कमीशन हासिल कर सकेंगे। यह बदलाव सेना की बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद ऑफिसर्स की कमी को पूरा करना और अनुभवी सैनिकों को नेतृत्व की भूमिका में लाना गै।

Indian Army ACC Entry: क्या है पूरा मामला और क्यों हुआ बदलाव

भारतीय सेना में लंबे समय से ऑफिसर्स की कमी एक गंभीर मुद्दा रही है। लगभग साढ़े बारह लाख की क्षमता वाली भारतीय सेना में तकरीबन 8000 अफसरों के पद खाली हैं, जिससे यूनिट्स में लीडरशिप पर असर पड़ता है। ऐसे में सेना ने यह समझा कि जो जवान पहले से सेवा में हैं और ग्रेजुएट भी हैं, उन्हें जल्दी ऑफिसर बनाया जा सकता है।

पहले इन जवानों को भी वही लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, जो 12वीं पास जवानों के लिए होती है। लेकिन अब यह बदल गया है। सेना ने फैसला लिया है कि ग्रेजुएट जवानों को अनावश्यक एकेडमिक ट्रेनिंग से बचाकर सीधे मिलिट्री और लीडरशिप ट्रेनिंग दी जाए। (Indian Army ACC Entry)

ACC एंट्री क्या होती है

आर्मी कैडेट कॉलेज यानी एसीसी, देहरादून में स्थित एक खास ट्रेनिंग विंग है। यहां सिर्फ वही जवान आते हैं जो पहले से सेना में सेवा दे रहे होते हैं और ऑफिसर बनना चाहते हैं। यह एक तरह से सेना के अंदर ही प्रमोशन का सबसे बड़ा रास्ता है, जहां सिपाही, नायक या हवलदार जैसे रैंक वाले सैनिक पढ़ाई और ट्रेनिंग के जरिए लेफ्टिनेंट बन सकते हैं। इस एंट्री के लिए जवानों को पहले लिखित परीक्षा पास करनी होती है, फिर एसएसबी इंटरव्यू और मेडिकल टेस्ट होता है। इसके बाद ही उनका चयन होता है। (Indian Army ACC Entry)

पहले कैसी होती थी पूरी प्रक्रिया

पहले अगर कोई जवान एसीसी के जरिए ऑफिसर बनना चाहता था, तो उसे लंबी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता था। सबसे पहले उसे देहरादून के एसीसी विंग में 3 साल की पढ़ाई करनी होती थी। यहां उसे ग्रेजुएशन लेवल की पढ़ाई कराई जाती थी, साथ ही बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग भी दी जाती थी। इसके बाद उसे इंडियन मिलिट्री एकेडमी यानी आईएमए में 1 साल की प्री-कमीशनिंग ट्रेनिंग करनी होती थी।

इस तरह कुल मिलाकर 4 साल लगते थे। खास बात यह थी कि ग्रेजुएट जवानों को भी वही 3 साल की पढ़ाई करनी पड़ती थी, जो पहले से पढ़े-लिखे होने के बावजूद उनके लिए जरूरी नहीं थी। (Indian Army ACC Entry)

अब क्या बदल गया है

अब सबसे बड़ा बदलाव यही है कि ग्रेजुएट जवानों के लिए यह 4 साल की ट्रेनिंग घटाकर सिर्फ 1.5 साल यानी डेढ़ साल कर दी गई है। अब उन्हें एसीसी में 3 साल की पढ़ाई नहीं करनी होगी। उनकी ट्रेनिंग सीधे मिलिट्री स्किल्स, लीडरशिप और ऑफिसर बनने की तैयारी पर फोकस करेगी। इसका मतलब यह हुआ कि जो जवान पहले से ग्रेजुएशन कर चुके हैं, उन्हें दोबारा वही पढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी। उनकी ट्रेनिंग ज्यादा प्रैक्टिकल और फोकस्ड होगी।

हालांकि, 12वीं पास जवानों के लिए अभी भी पुरानी 4 साल वाली प्रक्रिया जारी रहेगी। (Indian Army ACC Entry)

इससे जवानों को क्या फायदा होगा

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा जवानों को मिलेगा। पहले जहां उन्हें ऑफिसर बनने में 4 साल लगते थे, अब वे सिर्फ डेढ़ साल में यह मुकाम हासिल कर सकते हैं। इससे उनका करियर तेजी से आगे बढ़ेगा। जो सैनिक पहले से मैदान में अनुभव ले चुके हैं, वे जल्दी नेतृत्व की भूमिका में आ जाएंगे। इसके अलावा, यह उन जवानों के लिए एक बड़ा मोटिवेशन भी है जो सेना में रहते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। (Indian Army ACC Entry)

सेना को क्या फायदा होगा

यह बदलाव सिर्फ जवानों के लिए ही नहीं, बल्कि सेना के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि ऑफिसर्स की कमी तेजी से पूरी होगी। जब ज्यादा जवान जल्दी ऑफिसर बनेंगे, तो यूनिट्स में लीडरशिप मजबूत होगी। इसके अलावा, जो जवान पहले से ग्राउंड पर काम कर चुके हैं, उन्हें जब ऑफिसर बनाया जाएगा, तो वे ज्यादा व्यावहारिक और अनुभवी लीडर साबित होंगे। इससे ऑपरेशनल एफिशिएंसी भी बढ़ेगी। (Indian Army ACC Entry)

अन्य स्कीम्स में भी किए गए बदलाव

सेना सिर्फ एसीसी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसने कई अन्य रास्तों को भी आसान बनाया है। परमानेंट कमीशन स्पेशल लिस्ट यानी पीसी एसएल के तहत अब जवानों के लिए एसएसबी की प्रक्रिया आसान कर दी गई है। पहले जहां दो स्टेज होते थे, अब स्टेज-1 हटा दिया गया है और सीधे स्टेज-2 में एंट्री मिलती है।

पीसी एसएल के तहत वे सैनिक आवेदन कर सकते हैं जिनकी सेवा 10 साल से ज्यादा हो चुकी है और जिनकी उम्र 42 साल तक है। इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले सैनिकों के लिए यह सीमा 45 साल तक है। चयन के बाद उन्हें 12 हफ्ते की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें पहले 8 हफ्ते कम्युनिकेशन स्किल्स पर फोकस होता है और फिर 4 हफ्ते की मिलिट्री ओरिएंटेशन ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद उन्हें परमानेंट कमीशन मिल जाता है। (Indian Army ACC Entry)

इसी तरह स्पेशल कमीशन्ड ऑफिसर यानी एससीओ स्कीम में भी ज्यादा उम्र के सैनिकों को ऑफिसर बनने का मौका दिया जा रहा है और उनके लिए भी एसएसबी प्रक्रिया को आसान बनाया गया है।

टेक्निकल एंट्री में भी बदलाव किए गए हैं। टेक्निकल एंट्री स्कीम यानी टीईएस, जो 12वीं पास छात्रों के लिए होती है, उसमें पहले कुल 5 साल की ट्रेनिंग होती थी। अब इसे घटाकर 4 साल कर दिया गया है। इसमें 3 साल की इंजीनियरिंग पढ़ाई और 1 साल की मिलिट्री ट्रेनिंग शामिल है। इस बदलाव से कैडेट्स जल्दी ऑफिसर बन पाएंगे और सेना को भी जल्दी नए ऑफिसर मिलेंगे।

शॉर्ट सर्विस कमीशन टेक्निकल यानी एसएससी टेक में भी प्रक्रिया को तेज किया गया है। इसमें इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स को करीब 49 हफ्ते यानी लगभग 1 साल की ट्रेनिंग दी जाती है। हालांकि इसमें ट्रेनिंग अवधि में ज्यादा कटौती नहीं की गई है, लेकिन पूरी चयन और ट्रेनिंग प्रक्रिया को पहले से ज्यादा तेज और प्रभावी बनाया गया है। ताकि ज्यादा युवा इसमें शामिल हों। (Indian Army ACC Entry)

ट्रेनिंग का नया तरीका कैसा होगा

नई ट्रेनिंग में फोकस पूरी तरह से प्रैक्टिकल स्किल्स पर रहेगा। जवानों को लीडरशिप, टैक्टिक्स, ऑपरेशन प्लानिंग और फील्ड कमांड जैसी चीजें सिखाई जाएंगी। इसके अलावा उन्हें फिजिकल और मेंटल रूप से भी तैयार किया जाएगा। इस ट्रेनिंग का मकसद सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक सक्षम ऑफिसर तैयार करना है, जो मैदान में तुरंत जिम्मेदारी संभाल सके। (Indian Army ACC Entry)

क्या यह बदलाव लंबे समय तक डालेगा असर

इस बदलाव का असर आने वाले सालों में साफ दिखाई देगा। जैसे-जैसे ज्यादा जवान ऑफिसर बनेंगे, सेना का लीडरशिप स्ट्रक्चर मजबूत होगा। इससे यूनिट्स में बेहतर समन्वय और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। इसके अलावा, यह बदलाव सेना को एक मॉडर्न और फ्लेक्सिबल फोर्स बनाने में मदद करेगा, जो तेजी से बदलते युद्ध के माहौल में खुद को ढाल सके।

जवानों के लिए सुनहरा मौका

अगर कोई जवान पहले से ग्रेजुएट है और ऑफिसर बनने का सपना देखता है, तो यह उसके लिए एक बड़ा मौका है। अब उसे लंबी ट्रेनिंग से नहीं गुजरना पड़ेगा। सही तैयारी, लिखित परीक्षा और एसएसबी इंटरव्यू पास करके वह कम समय में ऑफिसर बन सकता है। यह न सिर्फ उसके करियर को आगे बढ़ाएगा, बल्कि उसे सेना में एक नई पहचान भी देगा। (Indian Army ACC Entry)

1600 किमी मार करने वाली मिसाइलों से लैस है HMS Anson, पढ़ें ब्रिटेन की सबसे एडवांस्ड न्यूक्लियर अटैक सबमरीन की पूरी डिटेल

HMS Anson submarine
HMS Anson submarine

HMS Anson submarine: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन की न्यूक्लियर पावर्ड सबमरीन एचएमएस एंसन अब अरब सागर में पहुंच चुकी है और माना जा रहा है कि यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास रणनीतिक पोजीशन ले चुकी है। खास बात यह है कि यह सबमरीन टॉमहॉक ब्लॉक 4 लैंड अटैक मिसाइल्स से लैस है। यह तैनाती ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है और इस इलाके में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। इससे पूरे इलाके की स्थिति और संवेदनशील हो गई है।

HMS Anson submarine: ऑस्ट्रेलिया से अरब सागर तक का सफर

रिपोर्ट के मुताबिक यह सबमरीन 6 मार्च को ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर से रवाना हुई थी। करीब दो हफ्ते में 5,500 मील (लगभग 8,850 किमी) की यात्रा तय करने के बाद यह उत्तरी अरब सागर में पहुंची है। जहां यह डीप वॉटर्स में पोजिशन पर है। यह इलाका होर्मुज जलडमरूमध्य के बेहद करीब है, जो दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक माना जाता है। इसी रास्ते से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल की सप्लाई गुजरती है। (HMS Anson submarine)

क्या है एचएमएस एंसन और क्यों है खास

एचएमएस एंसन ब्रिटेन की रॉयल नेवी की पांचवी एस्ट्यूट क्लास न्यूक्लियर अटैक सबमरीन है। एचएमएस एंसन का नाम 18वीं सदी के एडमिरल जॉर्ज एन्सन के नाम पर पड़ा है। यह रॉयल नेवी का आठवां जहाज है जो इस नाम से है। पहले के एचएमएस एंसन वर्ल्ड वॉर के बैटलशिप थे।

इसे अगस्त 2022 में आधिकारिक तौर पर सेवा में शामिल किया गया था। यह कोई सामान्य पनडुब्बी नहीं है, बल्कि ब्रिटेन की सबसे एडवांस और आधुनिक सबमरीन में से एक मानी जाती है। इसका मुख्य काम दुश्मन के जहाजों और सबमरीन पर नजर रखना, जरूरत पड़ने पर हमला करना और गुप्त मिशन को अंजाम देना है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती है और दुश्मन को बिना पता चले उसके करीब पहुंच सकती है।

यह सबमरीन हर 24 घंटे में थोड़ा ऊपर उठकर लंदन स्थित परमानेंट जॉइंट हेडक्वार्टर्स (पीजीएचक्यू) से कम्यूनिकेट करती है। (HMS Anson submarine)

न्यूक्लियर रिएक्टर है असली ताकत

इस सबमरीन की सबसे बड़ी ताकत इसका न्यूक्लियर रिएक्टर है। इसमें रॉल्स-रॉयस पीडब्ल्यूआर-2 रिएक्टर लगा है, जो करीब 25 साल तक बिना ईंधन बदले काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि एचएमएस एंसन को बार-बार सतह पर आने या ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती। यह महीनों तक समुद्र के अंदर रहकर ऑपरेशन कर सकती है।

यह खुद ऑक्सीजन और पीने का पानी भी तैयार कर सकती है, जिससे यह पूरी तरह आत्मनिर्भर बन जाती है। इसकी स्पीड करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है, जो पानी के अंदर काफी तेज मानी जाती है। (HMS Anson submarine)

चुपके से हमला करने की क्षमता

एचएमएस एंसन 97 मीटर लंबी (318 फीट), 11.3 मीटर चौड़ी और 10 मीटर ड्रॉट वाली है। इसका डिस्प्लेसमेंट सरफेस पर 7,000-7,400 टन और सबमर्ज्ड स्टेट में 7,400-7,800 टन है। यह ब्रिटेन की सबसे बड़ी और सबसे एडवांस्ड अटैक सबमरीन है।

एचएमएस एंसन का डिजाइन इस तरह से बनाया गया है कि यह बेहद कम आवाज करती है। इसमें पंप-जेट प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह दुश्मन के सोनार में आसानी से पकड़ में नहीं आती। इसमें पारंपरिक पेरिस्कोप की जगह हाई-स्पेसिफिकेशन वीडियो कैमरा और फाइबर-ऑप्टिक केबल्स सिस्टम लगा है, जो फाइबर ऑप्टिक के जरिए कंट्रोल रूम तक लाइव तस्वीरें भेजता है। यानी सबमरीन को सतह के करीब आए बिना ही ऊपर की पूरी जानकारी मिल जाती है। इसके क्रू में 110 लोग हैं। (HMS Anson submarine)

38 तरह के हथियारों से जमीन और समुद्र दोनों पर हमला

इसमें 6 टॉरपीडो ट्यूब लगे होते हैं, जिनका साइज 533 मिलीमीटर होता है। इन ट्यूब्स के जरिए यह एक साथ कई तरह के हथियार इस्तेमाल कर सकती है और कुल मिलाकर करीब 38 हथियार अपने अंदर स्टोर कर सकती है।

इसमें टॉमहॉक ब्लॉक-4 क्रूज मिसाइलें लगी होती हैं, जो करीब 1600 किलोमीटर दूर तक जमीन पर सटीक निशाना लगा सकती हैं। इन मिसाइलों से दुश्मन के एयरबेस, कमांड सेंटर या मिसाइल साइट्स को निशाना बनाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर यह सबमरीन समुद्र की सतह के थोड़ा करीब आकर एक साथ चार मिसाइलें दाग सकती है, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं मिलता। (HMS Anson submarine)

इसके अलावा इसमें स्पीयरफिश हैवीवेट टॉरपीडो भी होते हैं। ये खास तौर पर दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं। ये टॉरपीडो बहुत स्मार्ट होते हैं, जो या तो वायर के जरिए कंट्रोल किए जाते हैं या फिर अपने आप सोनार की मदद से लक्ष्य को ढूंढकर हमला करते हैं।

यह सबमरीन जरूरत पड़ने पर समुद्र में माइन्स भी बिछा सकती है, जिससे दुश्मन के जहाजों के रास्ते को रोका जा सके। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सबमरीन एक साथ कई तरह के मिशन कर सकती है। यह जमीन पर हमला करने के साथ-साथ दुश्मन की पनडुब्बियों को भी ट्रैक कर सकती है, खुफिया जानकारी जुटा सकती है और स्पेशल फोर्सेस यानी रॉयल मरीन्स को गुप्त तरीके से दुश्मन इलाके में पहुंचाने या निकालने का काम भी कर सकती है। यही वजह है कि इसे एक मल्टी-रोल और बेहद खतरनाक प्लेटफॉर्म माना जाता है। (HMS Anson submarine)

अमेरिका-ईरान तनाव का असर

इस पूरी घटना की जड़ में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है। हाल के दिनों में होर्मुज के आसपास जहाजों पर हमले की घटनाएं सामने आई हैं, जिनका आरोप ईरान से जुड़े आतंकी गुटों पर लगाया जा रहा है। इसके जवाब में अमेरिका ने अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं और अब उसके सहयोगी देश भी इस क्षेत्र में सक्रिय हो रहे हैं।
ब्रिटेन की इस सबमरीन का तैनात होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

वहीं इस पूरे घटनाक्रम को ब्रिटेन की रणनीति में बड़े बदलाव की तरह देखा जा रहा है। पहले ब्रिटेन अमेरिका को अपना डिएगो गार्सिया सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की अनुमति सीमित तौर पर देता था। लेकिन अब उसने दायरा बढ़ा दिया है। अब अमेरिका इन बेस का इस्तेमाल ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाने के लिए कर सकता है, खासकर उन ठिकानों को जो होर्मुज में जहाजों पर हमलों से जुड़े हैं। हालांकि ब्रिटेन ने साफ किया है कि यह कार्रवाई “डिफेंसिव” यानी रक्षात्मक उद्देश्य के तहत होगी और वह सीधे बड़े युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता। (HMS Anson submarine)

वहीं, ब्रिटेन के इस फैसले पर वहां की राजनीति में भी बहस छिड़ गई है। विपक्ष की नेता केमी बैडेनोक ने सरकार की इस नीति को बड़ा यू-टर्न बताया है। उनका कहना है कि पहले सरकार अमेरिका के साथ पूरी तरह खड़ी नहीं थी, लेकिन अब उसने अचानक अपना रुख बदल लिया है।

इस बीच सैयद अब्बास अराघची ने ब्रिटेन को चेतावनी दी है कि अगर उसने अमेरिका को अपने बेस इस्तेमाल करने दिए, तो इसे आक्रामक कार्रवाई में शामिल होने के तौर पर देखा जाएगा। ईरान का कहना है कि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और क्षेत्र में बड़ा संघर्ष शुरू हो सकता है। यह बयान इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में तनाव और बढ़ सकता है। (HMS Anson submarine)

पाकिस्तान बना दुनिया का नंबर-1 आतंक प्रभावित देश, भारत में 43 फीसदी घटे हमले

Global Terrorism Index 2026
File Photo

Global Terrorism Index 2026: दुनिया भर में आतंकवाद की स्थिति को लेकर जारी हुई ग्लोबल ग्लोबल टेरेरिज्म इंडेक्स 2026 में पाकिस्तान अब दुनिया का सबसे ज्यादा आतंक प्रभावित देश बन गया है, जबकि भारत में आतंकवादी घटनाओं में साफ तौर पर कमी आई है। यह रिपोर्ट इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस ने जारी की है, जिसमें साल 2025 के आंकड़ों के आधार पर दुनिया के 160 से ज्यादा देशों का विश्लेषण किया गया है।

Global Terrorism Index 2026: पाकिस्तान में लगातार बिगड़ते हालात

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में साल 2025 के दौरान आतंकवाद से जुड़े हमलों और मौतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले साल वहां 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत आतंकवादी घटनाओं में हुई, जबकि 1,000 से ज्यादा हमले हुए। यानी हालात धीरे-धीरे खराब हो रहे हैं और अब पाकिस्तान इस सूची में पहले स्थान पर पहुंच गया है।

पहले यह स्थान अफ्रीकी देश बुर्किना फासो के पास था, लेकिन इस बार पाकिस्तान ने उसे पीछे पछाड़ दिया है। यह दिखाता है कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद का खतरा अभी भी बहुत गंभीर है। (Global Terrorism Index 2026)

टीटीपी बना सबसे बड़ा खतरा

पाकिस्तान में आतंकवाद बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी का फिर से मजबूत होना है। यह संगठन पिछले कुछ सालों में काफी सक्रिय हुआ है और उसने अपने हमलों की संख्या और क्षमता दोनों बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे खतरनाक चार आतंकी संगठनों में टीटीपी भी शामिल है, और खास बात यह है कि इन चारों में सिर्फ टीटीपी ही ऐसा संगठन है, जिसकी हिंसक गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है।

अफगानिस्तान से है कनेक्शन

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद क्षेत्रीय समीकरण बदल गए। अफगानिस्तान में नई सरकार बनने के बाद टीटीपी को सीमा पार सुरक्षित ठिकाने और समर्थन मिलने लगा। इससे उसकी ताकत और बढ़ गई। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा लंबे समय से अस्थिर रही है, लेकिन अब यह और ज्यादा संवेदनशील हो गई है। कई बार दोनों देशों के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि पाकिस्तान को अफगानिस्तान के अंदर एयरस्ट्राइक तक करनी पड़ी। (Global Terrorism Index 2026)

खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान बने हिंसा के केंद्र

अगर पाकिस्तान के अंदर की स्थिति को देखें, तो ज्यादातर आतंकवादी घटनाएं खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में हो रही हैं। इन दोनों इलाकों में न सिर्फ हमलों की संख्या ज्यादा है, बल्कि मौतों का आंकड़ा भी यहीं सबसे अधिक है।

बलूचिस्तान में हाल ही में एक बड़ी घटना हुई थी, जिसमें एक ट्रेन को हाईजैक कर लिया गया और सैकड़ों लोगों को बंधक बना लिया गया। इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि वहां आतंकवादी संगठन कितनी ताकत हासिल कर चुके हैं।

वैश्विक स्तर पर कुछ सुधार, लेकिन खतरा बरकरार

अगर पूरी दुनिया की बात करें, तो रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। दुनिया भर में आतंकवाद से होने वाली मौतों में करीब 28 फीसदी की कमी आई है। हमलों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है और कई देशों में स्थिति बेहतर हुई है। करीब 80 से ज्यादा देशों में हालात सुधरे हैं, जबकि बहुत कम देशों में स्थिति खराब हुई है।

लेकिन इसके बावजूद रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि दुनिया में बढ़ते नए संघर्ष, जैसे मध्य पूर्व की स्थिति, भविष्य में आतंकवाद को फिर से बढ़ा सकते हैं। (Global Terrorism Index 2026)

भारत के लिए राहत भरी खबर

इस रिपोर्ट में भारत के लिए भी अच्छी खबर है। भारत इस सूची में 13वें स्थान पर है, जो पिछले साल से थोड़ा नीचे जरूर है, लेकिन इसके बावजूद देश में आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है। सबसे अहम बात यह है कि भारत में आतंकवादी हमलों की संख्या में 43 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही आतंकवाद से होने वाली मौतों में भी कमी आई है, जो देश में सुरक्षा व्यवस्था पहले से ज्यादा मजबूत होने का बड़ा संकेत है। (Global Terrorism Index 2026)

भारत में सुधार के पीछे क्या वजह

भारत में आतंकवाद में कमी के पीछे कई अहम कारण हैं। सबसे पहला कारण है सीमा पर सख्त निगरानी और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था है। इसके अलावा खुफिया एजेंसियों का बेहतर तालमेल और समय पर कार्रवाई भी इसमें अहम भूमिका निभा रही है। सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति में भी बदलाव किया है और अब तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। इन सभी प्रयासों का असर यह हुआ है कि पिछले कुछ सालों में आतंकवाद की घटनाओं में लगातार कमी आई है।

रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद वैश्विक आतंकवादी मौतों में इसका हिस्सा बहुत कम है। दुनिया की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा भारत में रहता है, लेकिन आतंकवाद से होने वाली मौतों में इसका हिस्सा सिर्फ करीब 2 फीसदी है। यह इस बात का संकेत है कि इतने बड़े देश में भी आतंकवाद को काफी हद तक नियंत्रित किया गया है।

हालांकि रिपोर्ट में सुधार के संकेत हैं, लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सीमा विवाद बढ़ रहे हैं। ये सभी कारक आतंकवाद को बढ़ावा दे सकते हैं। खासतौर पर दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और अफगानिस्तान की स्थिति भारत के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है। अगर क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ सकता है। (Global Terrorism Index 2026)

EXPLAINER: क्या टेलीमेडिसिन से जवानों की बचेगी जान? ISRO की मदद से कैसे फ्रंटलाइन पर बैठे सैनिकों तक पहुंचेगा डॉक्टर!

Army ISRO Telemedicine MoU
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ISRO Army Telemedicine MoU: देश की सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए भारतीय सेनाओं और इसरो के बीच एक अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत अब दूर-दराज और कठिन इलाकों में तैनात सैनिकों को बेहतर मेडिकल सुविधा मिल सकेगी। इस समझौते का मकसद सैटेलाइट के जरिए टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार करना है, ताकि जहां अस्पताल पहुंचना मुश्किल है, वहां डॉक्टर खुद सैनिक तक पहुंच सके।

ISRO Army Telemedicine MoU: 53 नए टेलीमेडिसिन नोड्स

हाल ही में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर इसरो के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू साइन किया है। इस समझौते के तहत पहले से मौजूद टेलीमेडिसिन सिस्टम को मजबूत किया जाएगा और नए सेंटर भी जोड़े जाएंगे।

पहले चरण में इसरो 53 नए टेलीमेडिसिन नोड्स स्थापित करेगा। ये नोड्स पहले से मौजूद 20 नोड्स के साथ मिलकर काम करेंगे। यानी आने वाले समय में सेना के पास कुल 70 से ज्यादा ऐसे मेडिकल कनेक्शन पॉइंट होंगे, जहां से सैनिक सीधे बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों से जुड़ सकेंगे। (ISRO Army Telemedicine MoU)

क्यों जरूरी है यह सुविधा

भारत के कई ऐसे बेहद दुर्गम इलाके ऐसे हैं, जहां हालात बेहद कठिन होते हैं। जिनमें सियाचिन ग्लेशियर, लद्दाख की ऊंची पहाड़ियां या पूर्वोत्तर के दूर-दराज इलाके शामिल हैं। इन जगहों पर जवानों की तैनाती की जाती है। यहां तापमान कई बार माइनस 40-50 डिग्री तक चला जाता है और बर्फबारी के कारण कई महीनों तक सड़क और हेलीकॉप्टर दोनों का संपर्क टूट जाता है।

ऐसे हालात में अगर कोई जवान बीमार पड़ जाए या घायल हो जाए, तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है। पहले छोटी बीमारी भी गंभीर बन जाती थी, क्योंकि स्पेशलिस्ट डॉक्टर तक पहुंचने में काफी समय लग जाता था।

अब टेलीमेडिसिन के जरिए यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। जवान वहीं बैठे-बैठे बड़े अस्पताल के डॉक्टर से बात कर सकेगा और तुरंत इलाज शुरू किया जा सकेगा। (ISRO Army Telemedicine MoU)

कैसे काम करेगा टेलीमेडिसिन सिस्टम

यह पूरा सिस्टम सैटेलाइट पर आधारित है। इसमें वीसेट यानी वेरी स्मॉल एपर्चर टर्मिनल तकनीक का इस्तेमाल होता है। आसान भाषा में समझें तो यह एक छोटा डिश एंटेना होता है, जो इसरो के सैटेलाइट से जुड़कर इंटरनेट और वीडियो कनेक्शन उपलब्ध कराता है।

हर टेलीमेडिसिन नोड पर एक मेडिकल सेटअप होता है, जिसमें ईसीजी मशीन, डिजिटल एक्स-रे, ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन मापने वाले उपकरण और अन्य जरूरी मेडिकल डिवाइस होते हैं। यहां तैनात मेडिकल ऑफिसर मरीज का पूरा डेटा तैयार करता है।

इसके बाद यह डेटा और लाइव वीडियो कनेक्शन के जरिए कमांड हॉस्पिटल या बड़े स्पेशलिटी अस्पताल में बैठे डॉक्टरों तक पहुंचाया जाता है। वहां से डॉक्टर तुरंत सलाह देते हैं कि मरीज का इलाज कैसे करना है या उसे तुरंत निकालने की जरूरत है या नहीं। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं, जो पहले कई घंटों या दिनों में संभव हो पाता था। (ISRO Army Telemedicine MoU)

सियाचिन जैसे इलाकों में बड़ा फायदा

इस सिस्टम का सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में होगा, जहां हालात बेहद कठिन हैं। सियाचिन ग्लेशियर को दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है। यहां ऑक्सीजन कम होती है और ठंड बेहद ज्यादा होती है।

ऐसे इलाकों में हाई अल्टीट्यूड बीमारी, फ्रॉस्टबाइट, हार्ट से जुड़ी दिक्कतें और चोट लगने के मामले आम हैं। अब टेलीमेडिसिन के जरिए इन सभी समस्याओं का तुरंत इलाज संभव हो पाएगा।

यहां तक कि कुछ खास टेलीमेडिसिन नोड्स को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे बेहद ठंड में भी काम कर सकें। इन्हें गर्म कमरों में रखा जाता है ताकि मशीनें सही तरीके से चलती रहें। (ISRO Army Telemedicine MoU)

साल 2001 में की थी शुरुआत

भारत में टेलीमेडिसिन की शुरुआत इसरो ने साल 2001 में की थी। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ग्रामीण और दूर-दराज इलाकों के लोगों के इलाज के लिए किया गया था। बाद में इसे सेना के लिए भी अपनाया गया।

पिछले कुछ सालों में सेना के कई इलाकों में टेलीमेडिसिन नोड्स लगाए गए, लेकिन अब तकनीक को और बेहतर बनाने और कवरेज बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई। इसी को ध्यान में रखते हुए यह नया समझौता किया गया है।

इस समझौते के तहत सिर्फ नए नोड्स ही नहीं लगाए जाएंगे, बल्कि पुराने सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि बेहतर क्वालिटी का वीडियो और डेटा ट्रांसमिशन हो सके। (ISRO Army Telemedicine MoU)

सैनिकों की जान बचाने में मददगार

इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे सैनिकों की जान बचाई जा सकेगी। कई बार मौसम खराब होने के कारण हेलीकॉप्टर भी नहीं उड़ पाते और मरीज को निकालना संभव नहीं होता।

ऐसे में टेलीमेडिसिन ही एकमात्र सहारा बन जाता है। डॉक्टर तुरंत सलाह देकर इलाज शुरू करवा सकते हैं, जिससे हालत बिगड़ने से पहले ही मरीज को संभाला जा सके।

इसके अलावा इससे हेलीकॉप्टर के जरिए मरीजों को निकालने की जरूरत भी कम होगी, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत होगी। (ISRO Army Telemedicine MoU)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का होगा इस्तेमाल

साथ ही, आने वाले समय में टेलीमेडिसिन सिस्टम को और स्मार्ट बनाया जाएगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे बीमारी की पहचान और जल्दी हो सके। इसके अलावा बेहतर वीडियो क्वालिटी, पोर्टेबल डिवाइस और डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम को भी जोड़ा जाएगा। इससे सैनिकों का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड एक जगह उपलब्ध रहेगा और जरूरत पड़ने पर कहीं से भी देखा जा सकेगा। (ISRO Army Telemedicine MoU)

ऑस्ट्रेलिया में INS नीलगिरी का जलवा! काकाडू एक्सरसाइज में दिखी भारत की समुद्री ताकत

INS Nilgiri Kakadu 2026

INS Nilgiri Kakadu 2026: भारतीय नौसेना के आधुनिक फ्रिगेट आईएनएस नीलगिरी ने ऑस्ट्रेलिया में चल रहे एक्सरसाइज काकाडू 2026 के सी फेज यानी समुद्री चरण में हिस्सा लिया है। इसकी आधिकारिक पुष्टि भी भारतीय नौसेना ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर की। नेवी की इस भागीदारी को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की मजबूत होती रणनीतिक पकड़ और सहयोग की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

INS Nilgiri Kakadu 2026: क्या है एक्सरसाइज काकाडू 2026

एक्सरसाइज काकाडू ऑस्ट्रेलिया की रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी द्वारा आयोजित एक बड़ा बहुपक्षीय समुद्री अभ्यास है, जो हर दो साल में आयोजित किया जाता है। इस साल इसका 17वां संस्करण आयोजित हो रहा है, जो 2 मार्च से 31 मार्च तक चलेगा। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, एक साथ काम करने की क्षमता विकसित करना और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना है।

इस अभ्यास में सिर्फ युद्ध से जुड़े अभ्यास ही नहीं होते, बल्कि समुद्री सुरक्षा, निगरानी, आपदा राहत और अन्य ऑपरेशंस से जुड़े पहलुओं को भी शामिल किया जाता है। इस बार के अभ्यास में करीब 19 देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं, जिनमें 20 से ज्यादा युद्धपोत, एयरक्राफ्ट और 6000 से अधिक सैन्य कर्मी शामिल हैं।

यह अभ्यास ऑस्ट्रेलिया के डार्विन से लेकर कैर्न्स और जर्विस बे तक फैले समुद्री क्षेत्र में हो रहा है। खास बात यह भी है कि इस बार का आयोजन रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर हो रहा है। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

समुद्र में दिखा आईएनएस नीलगिरी का कौशल

आईएनएस नीलगिरी इस समय वेस्टर्न पैसिफिक क्षेत्र में ओवरसीज डिप्लॉयमेंट पर है और इसी दौरान उसने एक्सरसाइज काकाडू के सी फेज में भाग लिया। इस चरण में जहाजों के बीच तालमेल से नेविगेशन, जटिल समुद्री अभ्यास और विभिन्न युद्धक रणनीतियों का अभ्यास किया जाता है।

इस दौरान आईएनएस नीलगिरी ने कई देशों के युद्धपोतों के साथ मिलकर अभ्यास किया। इनमें ऑस्ट्रेलिया का एचएमएएस चूल्स, मलेशिया का केडी लेकिर, फिलीपींस का बीआरपी डिएगो सिलांग और थाईलैंड का एचटीएमएस नरेसुआन शामिल रहे। इन सभी के साथ मिलकर भारतीय नौसेना ने समुद्र में जॉइंट ऑपरेशन की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया।

21 मार्च को सिडनी हार्बर में आयोजित फ्लीट रिव्यू इस अभ्यास का एक अहम हिस्सा रहा, जिसमें 19 देशों के 31 युद्धपोत शामिल हुए। यह पिछले एक दशक में सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक जमावड़ा माना जा रहा है। आईएनएस नीलगिरी भी इस भव्य आयोजन का हिस्सा बनी, जिससे भारत की मौजूदगी को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिली। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

इंडो-पैसिफिक में बढ़ती भारत की भूमिका

आईएनएस नीलगिरी की यह भागीदारी सिर्फ एक अभ्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक सोच को भी दर्शाती है। आज के समय में यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है।

भारत लगातार इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है और विभिन्न देशों के साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। काकाडू जैसे अभ्यास भारत को अन्य देशों के साथ बेहतर तालमेल बनाने का मौका देते हैं। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

इस अभ्यास में वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे आसियान देशों की भागीदारी भी इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय सहयोग को कितना महत्व दिया जा रहा है। इसके अलावा क्वाड देशों के बीच भी इस तरह के अभ्यास रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करते हैं।

आईएनएस नीलगिरी की वेस्टर्न पैसिफिक में मौजूदगी यह भी दिखाती है कि भारतीय नौसेना अब लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम है। इसे ही ब्लू वॉटर नेवी कहा जाता है, जहां एक देश की नौसेना अपने समुद्री क्षेत्र से दूर जाकर भी प्रभावी ऑपरेशन कर सकती है। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

आईएनएस तारागिरी से और बढ़ेगी ताकत

जहां एक ओर आईएनएस नीलगिरी विदेश में भारत की ताकत दिखा रही है, वहीं नीलगिरी क्लास के चौथे फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को भारतीय नौसेना 4 अप्रैल को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है।

यह जहाज प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाया गया चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे मुंबई की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने तैयार किया है। करीब 6670 टन वजनी यह युद्धपोत आधुनिक तकनीक से लैस है और इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी उपकरण लगे हैं।

आईएनएस तारागिरी में सतह से सतह और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम और आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगे हैं। यह जहाज युद्ध के अलावा मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। (INS Nilgiri Kakadu 2026)

2027 तक बदल जाएगा भारतीय सेना के युद्ध का तरीका, हर जवान बनेगा ‘ईगल इन द आर्म’

Indian Army Drone Warrior
Indian Army Drone Warrior

Indian Army Drone Warrior: पहले रूस-यूक्रेन युद्ध और अब इजरायल-ईरान संघर्ष हर जगह ड्रोन बेहद भूमिका निभा रहे हैं। यहां तक कि पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भी ड्रोन ने अहम भूमिका निभाई थी। जिसके बाद भारतीय सेना ने अपने स्ट्रक्चर में कई अहम बदलाव करते हुए एक बड़ा कदम उठाया। जिसके तहत आने वाले समय में हर इन्फैंट्री जवान को ड्रोन ऑपरेट करने का फैसला लिया गया। वहीं पिछले साल लिए गए इस फैसले के बाद इन्फैंट्री बटालियनों के हर जवान को बुनियादी ड्रोन ट्रेनिंग दी गई, जो अब पूरी हो चुकी है और उन्हें अब स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग दी जा रही है। जिसके तहत 2027 तक 100 प्रतिशत सैनिक ड्रोन ऑपरेशन में एक्सपर्ट हो जाएंगे।

Indian Army Drone Warrior: क्या है ‘ईगल इन द आर्म’?

सेना ने पिछले साल सितंबर में नई डॉक्ट्रिन “ईगल इन द आर्म” लॉन्च की थी। इसका मतलब यह है कि हर सैनिक सिर्फ ड्रोन चलाना ही नहीं सीखेगा, बल्कि ड्रोन उसके हथियार का हिस्सा बन जाएगा। जैसे वह अपनी राइफल साथ रखता है, वैसे ही ड्रोन भी साथ रहेगा। यह ड्रोन सैनिक की “तीसरी आंख” की तरह काम करेगा, जिससे वह दूर तक देख सकेगा और जरूरत पड़ने पर हमला भी कर सकेगा। यह सोच रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास संघर्ष और मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर जैसे अनुभवों से आई है, जहां ड्रोन ने बड़ी भूमिका निभाई।

यह योजना सितंबर 2025 में औपचारिक रूप से शुरू हुई थी। इससे पहले जुलाई में कारगिल विजय दिवस पर आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इसकी घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि हर इन्फैंट्री बटालियन में एक खास ड्रोन प्लाटून बनाया जाएगा। इसके अलावा तोपखाने में दुश्मन के ड्रोन को रोकने के लिए काउंटर-ड्रोन सिस्टम और लॉइटर म्यूनिशन भी शामिल किए जाएंगे। (Indian Army Drone Warrior)

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में सैनिक सिर्फ राइफल से नहीं, बल्कि हाथ में ड्रोन लेकर लड़ाई लड़ेगा, जिससे उसकी देखने की क्षमता, पहुंच और ताकत तीनों बढ़ जाएंगी।

ड्रोन की ट्रेनिंग पहले यूनिट स्तर पर शुरू की गई थी, लेकिन अब इसे और आगे बढ़ाया जा रहा है। अलग-अलग जगहों पर खास ट्रेनिंग सेंटर बनाए जा रहे हैं, जहां एडवांस कोर्स चल रहे हैं। इसके अलावा वर्चुअल रियलिटी यानी वीआर सिमुलेटर के जरिए भी सैनिकों को बिना किसी खतरे के ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके साथ ही 2026 तक देशभर में करीब 19 ड्रोन ट्रेनिंग हब तैयार किए जा रहे हैं, जहां बड़े पैमाने पर सैनिकों को प्रशिक्षित किया जाएगा।

देशभर में खास ट्रेनिंग सेंटर बनाए

इन ट्रेनिंग सेंटरों में देहरादून का भारतीय मिलिट्री अकादमी (आईएमए), महू का इन्फैंट्री स्कूल, चेन्नई और गया की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (ओटीए), देवलाली का आर्टिलरी स्कूल और अरुणाचल प्रदेश का लिकाबली ड्रोन लैब शामिल हैं। यहां सिर्फ जवान ही नहीं, बल्कि अधिकारी भी ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग ले रहे हैं।

ट्रेनिंग को अलग-अलग भूमिकाओं के हिसाब से तैयार किया गया है। जो सैनिक कॉम्बैट में होंगे, उन्हें एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन चलाना सिखाया जा रहा है। निगरानी के लिए सैनिकों को रियल टाइम आईएसआर ड्रोन की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख सकें।

इसके अलावा लॉजिस्टिक्स के लिए ड्रोन के जरिए सामान पहुंचाना और मेडिकल स्थिति में घायल सैनिकों को निकालना भी सिखाया जा रहा है। साथ ही एक जरूरी हिस्सा यह भी है कि सैनिक दुश्मन के ड्रोन को कैसे रोके या नष्ट करे। इसलिए काउंटर-ड्रोन ट्रेनिंग भी अनिवार्य बनाई गई है, ताकि हर जवान सिर्फ ड्रोन चलाना ही नहीं, बल्कि दुश्मन के ड्रोन से मुकाबला करना भी सीख सके। (Indian Army Drone Warrior)

‘अश्नि प्लाटून’ इस योजना का अहम हिस्सा

पिछले साल कारगिल विजय दिवस के मौके पर अहम रिस्ट्रक्चर प्लान में अश्नि प्लाटून बनाने का एलान किया गया था। अश्नी प्लाटून इस पूरी ड्रोन क्रांति का सबसे अहम हिस्सा बन गए हैं। ‘अश्नि’ का मतलब होता है ‘अग्नि’, यानी आग की ताकत। आसान शब्दों में समझें तो हर 380 इन्फैंट्री बटालियन में अब एक खास ड्रोन टीम बनाई गई है, जिसमें करीब 20 से 25 विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक होते हैं।

इस प्लाटून के पास कई तरह के ड्रोन होते हैं। इनमें कम से कम 4 सर्विलांस ड्रोन होते हैं, जो दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। इसके अलावा करीब 6 आर्म्ड या कामिकाजी ड्रोन भी होते हैं, जिन्हें सीधे दुश्मन पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जैसे नागास्त्र-1, वारमेट और अन्य ड्रोन। (Indian Army Drone Warrior)

ये अश्नि प्लाटून अब पूरी तरह से ऑपरेशनल हो चुके हैं और सेना के बड़े अभ्यासों जैसे ‘राम प्रहार’ और ‘खड़गा शक्ति’ में अपनी क्षमता दिखा चुके हैं। ये प्लाटून युद्ध के मैदान में एक ‘अदृश्य तीसरी आंख’ की तरह काम करते हैं। ये रियल टाइम जानकारी देते हैं और जरूरत पड़ने पर सटीक हमला करके दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

अब इन प्लाटून का इस्तेमाल सिर्फ इन्फैंट्री तक सीमित नहीं है। स्पेशल फोर्सेस, भैरव लाइट कमांडो बटालियनों और आगे चलकर आर्मर्ड और आर्टिलरी यूनिट्स में भी इन्हें शामिल किया जा रहा है, ताकि पूरी सेना की ताकत और बढ़ाई जा सके। (Indian Army Drone Warrior)

ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि ड्रोन युद्ध में कितना अहम रोल निभा सकते हैं। इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान ने बड़ी संख्या में ड्रोन का इस्तेमाल किया, लेकिन भारत ने अपने मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम से उन्हें नाकाम कर दिया।

साथ ही भारतीय ड्रोन ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला किया। इससे यह साबित हो गया कि ड्रोन अब सिर्फ सहायक उपकरण नहीं, बल्कि मुख्य हथियार बन चुके हैं।

हर काम में होगा ड्रोन का इस्तेमाल

अब ड्रोन सिर्फ हमला करने के लिए ही नहीं, बल्कि कई और कामों में भी इस्तेमाल होंगे। जैसे दुश्मन की निगरानी करना, जरूरी सामान पहुंचाना, घायल सैनिकों को निकालना और रीयल टाइम जानकारी देना।

सेना अब हर सैनिक को उसकी भूमिका के हिसाब से ट्रेनिंग दे रही है। यानी कोई सैनिक कॉम्बैट में ड्रोन चलाएगा, तो कोई सर्विलांस या लॉजिस्टिक्स में इसका इस्तेमाल करेगा। (Indian Army Drone Warrior)

काउंटर-ड्रोन क्षमता भी बढ़ाई जा रही

जैसे-जैसे ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे ही दुश्मन के ड्रोन से बचाव भी जरूरी हो गया है। इसलिए सेना अपने जवानों को यह भी सिखा रही है कि दुश्मन के ड्रोन को कैसे रोका जाए या नष्ट किया जाए।

इसके लिए जैमर, लेजर सिस्टम और अन्य तकनीकों पर भी काम किया जा रहा है, ताकि एक मजबूत मल्टी-लेयर सिस्टम तैयार हो सके। (Indian Army Drone Warrior)

स्वदेशी तकनीक पर जोर

इस पूरे प्रोग्राम में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर खास ध्यान दिया जा रहा है। सेना ज्यादा से ज्यादा ड्रोन देश में ही बनवाना चाहती है, ताकि विदेशों पर निर्भरता कम हो।

इसी के तहत ‘ड्रोन शक्ति’ जैसी पहल शुरू की गई है, जिसमें भारतीय कंपनियां और डीआरडीओ मिलकर काम कर रहे हैं। ‘ड्रोन शक्ति’ को सेना का ईएमई कोर अगुवाई कर रही है। अब हर कोर में 1000 से ज्यादा छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन तैनात किए जा रहे हैं।

फिलहाल अलग-अलग तरह के करीब 9 ड्रोन की टेस्टिंग चल रही है। इनमें कुछ ड्रोन निगरानी (आईएसआर) के लिए हैं, कुछ सीधे हमला करने वाले यानी कामिकाजी ड्रोन हैं, और कुछ ऐसे हैं जो ऊपर से सटीक तरीके से हथियार गिरा सकते हैं। इसके साथ ही दुश्मन के ड्रोन को रोकने के लिए भी तैयारी की जा रही है। इसके लिए लेजर सिस्टम, जामर और गन सिस्टम इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यहां तक कि प्रशिक्षित बाज (ईगल), जिसे ‘अर्जुन’ कहा जाता है, का भी प्रयोग किया जा रहा है, जो दुश्मन के ड्रोन को पकड़ सकता है। 2026 के गणतंत्र दिवस पर ‘ड्रोन शक्ति-ईगल ऑन आर्म’ की झलक भी दिखाई गई थी। (Indian Army Drone Warrior)

2027 तक हर जवान बनेगा ड्रोन वॉरियर

सेना का लक्ष्य है कि साल 2027 तक हर इन्फैंट्री जवान ड्रोन ऑपरेशन में पूरी तरह दक्ष हो जाए। यानी भविष्य में हर सैनिक एक “ड्रोन वॉरियर” होगा, जो जमीन के साथ-साथ आसमान से भी युद्ध लड़ सकेगा।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, अब सैनिकों को उनकी भूमिका के हिसाब से ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। यानी जो सैनिक जिस काम में लगे हैं, उसी के अनुसार उन्हें ड्रोन इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है। (Indian Army Drone Warrior)

कुछ सैनिकों को लड़ाई (कॉम्बैट) के लिए ड्रोन चलाना सिखाया जा रहा है, कुछ को दुश्मन पर नजर रखने यानी सर्विलांस के लिए। वहीं कुछ को जरूरी सामान पहुंचाने यानी लॉजिस्टिक्स में ड्रोन का इस्तेमाल सिखाया जा रहा है। यहां तक कि घायल सैनिकों को निकालने (मेडिकल एवाक्यूएशन) में भी ड्रोन की ट्रेनिंग दी जा रही है।

इसके साथ-साथ सेना सिर्फ ड्रोन चलाना ही नहीं, बल्कि दुश्मन के ड्रोन को रोकना या खत्म करना भी सिखा रही है। यानी सैनिक अब ड्रोन से हमला भी कर सकेंगे और दुश्मन के ड्रोन से बचाव भी कर पाएंगे। (Indian Army Drone Warrior)

F-INSAS प्रोग्राम के तहत सेना खरीदेगी 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स, एक क्लिक में दुश्मन खत्म!

Holographic Reflex Sight India RFI

Holographic Reflex Sight India RFI: भारतीय सेना को आधुनिक बनाने के लिए फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (F-INSAS) के तहत रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। यह इक्विपमेंट जवानों की निशानेबाजी को पहले से कहीं ज्यादा तेज और सटीक बनाने में मदद करेगा। खास बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत की जा रही है, ताकि देश में ही इन इक्विपमेंट्स का निर्माण हो सके।

Holographic Reflex Sight India RFI: क्या है होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट और क्यों है जरूरी

सरल शब्दों में समझें तो होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट एक आधुनिक निशानेबाजी इक्विपमेंट है, जो राइफल पर लगाया जाता है। पहले जवान आयरन साइट्स यानी साधारण निशाने का इस्तेमाल करते थे, जिसमें टारगेट को फोकस करने में थोड़ा समय लगता था। लेकिन इस नई तकनीक में जवानों को एक होलोग्राफिक रेटिकल यानी चमकता हुआ निशान दिखाई देता है, जिससे वह बहुत तेजी से टारगेट पर निशाना लगा सकता है।

यह इक्विपमेंट मुख्य रूप से 7.62×51 मिमी असॉल्ट राइफल के साथ इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन इसे 7.62×39 मिमी राइफल पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जवान दोनों आंखें खुली रखकर भी फायरिंग कर सकता है। इससे आसपास के हालात पर नजर बनाए रखते हुए भी दुश्मन पर सटीक निशाना लगाया जा सकता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में जहां हर सेकंड की अहमियत होती है, वहां यह इक्विपमेंट काफी मददगार साबित होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

हर मौसम और हर इलाके में काम करेगा

आरएफआई में साफ कहा गया है कि ये साइट्स देश के अलग-अलग इलाकों में इस्तेमाल होंगी। इसमें पश्चिमी सीमा के रेगिस्तान से लेकर उत्तर-पूर्व के ऊंचे पहाड़ तक शामिल हैं। यानी यह इक्विपमेंट 18,000 फीट की ऊंचाई तक भी काम करेगा।

मौसम चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, जैसे तेज बारिश, धूल, बर्फ या तेज धूप, यह साइट लगातार काम करती रहेगी। तापमान माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तक होने पर भी इसकी परफॉर्मेंस पर असर नहीं पड़ेगा। और जेन-2 या जेन-3 इमेज इंटेंसिफायर के साथ आसानी से काम करेंगी। रात के समय भी इसे नाइट विजन डिवाइस के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे सैनिक अंधेरे में भी दुश्मन को आसानी से देख और निशाना लगा पाएंगे। इनका डिजाइन मॉड्यूलर होगा, यानी भविष्य में इन्हें बिना ज्यादा बदलाव किए आसानी से अपग्रेड किया जा सकेगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

सैनिकों की ताकत कई गुना बढ़ेगी

इस इक्विपमेंट से सैनिकों की फायरिंग स्पीड और सटीकता दोनों बढ़ेंगी। पहले जहां निशाना साधने में समय लगता था, अब दुश्मन को देखते ही तुरंत फायर किया जा सकेगा। इसमें पैरालैक्स एरर नहीं होता, यानी आंख की स्थिति बदलने पर भी निशाना नहीं बदलता।

सबसे खास बात यह है कि अगर इस साइट का सामने वाला ग्लास आंशिक रूप से टूट भी जाए, तब भी इसका रेटिकल काम करता रहता है। यही होलोग्राफिक साइट की सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। यानी युद्ध के दौरान नुकसान होने पर भी सैनिक अपनी फायरिंग जारी रख सकता है। यही वजह है कि इसे सैनिकों के लिए “तीसरी आंख” भी कहा जाता है।

इसके साथ ही इसमें लंबी बैटरी लाइफ होनी चाहिए, ताकि इसे बार-बार चार्ज या बदलने की जरूरत न पड़े। सैनिक अगर दस्ताने पहने हों तब भी इसके बटन आसानी से दबा सकें। इसे हेलमेट या गैस मास्क पहनकर भी आराम से इस्तेमाल किया जा सके और राइफल के रेल कवर या चार्जिंग हैंडल के साथ कोई दिक्कत न आए।

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई जारी करके कंपनियों से जानकारी मांगी है। इसका मकसद यह जानना है कि कौन-कौन सी भारतीय या विदेशी कंपनियां इस तरह के इक्विपमेंट बना सकती हैं। कंपनियों को 28 अप्रैल तक अपना जवाब देना होगा।

इसके बाद तकनीकी जांच होगी, फिर ट्रायल किए जाएंगे। ट्रायल में यह देखा जाएगा कि इक्विपमेंट असली परिस्थितियों में कितना अच्छा काम करता है। इसमें ऊंचे पहाड़, रेगिस्तान, बारिश और धूल जैसी परिस्थितियों में टेस्ट किया जाएगा। जो कंपनी इन सभी टेस्ट में सफल होगी, उसे आगे कॉन्ट्रैक्ट मिलने की संभावना होगी। (Holographic Reflex Sight India RFI)

‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगा बड़ा फायदा

इस पूरी खरीद प्रक्रिया का एक बड़ा उद्देश्य देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना भी है। सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक इक्विपमेंट भारत में ही बनें। इससे देश की कंपनियों को काम मिलेगा, रोजगार बढ़ेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

भारतीय कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि वे कितने प्रतिशत इक्विपमेंट देश में ही बना सकती हैं और क्या वे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन कर सकती हैं। अगर यह योजना सफल होती है, तो आने वाले समय में भारत खुद इस तकनीक में आत्मनिर्भर बन सकता है।

कंपनियों से पूछा गया है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का क्या प्लान है और जरूरी पार्ट्स कहां से आएंगे।

ट्रायल्स के लिए “नो कॉस्ट नो कमिटमेंट” आधार रखा गया है, यानी कंपनियों को बिना किसी भुगतान के अपने प्रोडक्ट का टेस्ट देना होगा। यह टेस्ट ऊंचाई वाले इलाकों, रेगिस्तान, बारिश, धूल, रिकॉयल और गिरने जैसी स्थितियों में किया जाएगा। इसके लिए वेंडर को अपना प्रोटोटाइप देना होगा।

ट्रेनिंग के मामले में भी कंपनियों से पूछा गया है कि वे सैनिकों और तकनीकी स्टाफ को कैसे ट्रेनिंग देंगे, क्या कंप्यूटर बेस्ड ट्रेनिंग देंगे और ट्रेन-द-ट्रेनर सिस्टम होगा या नहीं।

वहीं वेंडर चुनने की प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को इसमें कुछ छूट भी दी गई है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

अभी क्या स्थिति है सेना में

फिलहाल भारतीय सेना में यह तकनीक सीमित संख्या में इस्तेमाल हो रही है। इन्हें अभी चुनिंदा यूनिट्स में ही इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे घातक प्लाटून, पैरा एसएफ और वे इन्फैंट्री यूनिट्स जो फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (एफ-इंसास) के तहत आधुनिक उपकरणों से लैस हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या अभी कुछ हजार के आसपास ही है। कुछ यूनिट्स, खासकर स्पेशल फोर्सेस और घातक प्लाटून में ऐसे इक्विपमेंट पहले से मौजूद हैं। लेकिन अब इन्हें बड़े स्तर पर लाने की तैयारी है।

सबसे पहले बात करें स्वदेशी विकल्प की, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल की होलोग्राफिक वेपन साइट सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आ रही है। इसे डीआरडीओ के सहयोग से बनाया गया है। यह साइट सिग-716आई बैटल राइफल, एके-203 असॉल्ट राइफल, इंसास और अन्य क्लोज क्वार्टर बैटल हथियारों पर लगाई जा रही है। यह एफ-इंसास प्रोग्राम का हिस्सा है और 2022 से धीरे-धीरे सेना में शामिल की जा रही है। इसकी खासियत यह है कि सैनिक दोनों आंखें खुली रखकर निशाना लगा सकता है, इसमें पैरालैक्स की समस्या नहीं होती, दिन और रात दोनों समय काम करती है और मजबूत होने के साथ-साथ अपेक्षाकृत सस्ती भी है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

इसके अलावा कुछ इम्पोर्टेड साइट्स भी इस्तेमाल हो रही हैं, जिनमें ईओटेक EXPS3 और 512 मॉडल शामिल हैं। ये मुख्य रूप से पैरा एसएफ, एनएसजी और अन्य स्पेशल फोर्सेस के पास हैं। इन्हें एम4ए1 कार्बाइन, एके-203 और सिग-716 जैसी राइफलों पर लगाया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये दुनिया की सबसे भरोसेमंद होलोग्राफिक साइट्स मानी जाती हैं। अगर इनका फ्रंट ग्लास टूट भी जाए, तब भी रेटिकल काम करता रहता है, जो युद्ध में बहुत अहम होता है।

इसके अलावा कुछ अन्य साइट्स भी सीमित संख्या में मौजूद हैं। डीआरडीओ की इंडिजिनस साइट, जिसे इगनेटा कहा जाता है, अभी डेवलपमेंट और ट्रायल के चरण में है और इसे सिग सॉयर, एके-47 और उग्रम जैसी राइफलों के लिए तैयार किया जा रहा है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

जानें फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम के बारे में

भारतीय सेना का फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम, जिसे एफ-इंसास (F-INSAS) कहा जाता है, एक ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट है जिसका मकसद सैनिकों को आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करना है। इस सिस्टम में हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, नाइट विजन, कम्युनिकेशन और डिजिटल नेटवर्क जैसी सभी चीजें शामिल होती हैं, ताकि वह ज्यादा सुरक्षित, तेज और घातक बन सके।

यह योजना करीब 2007-08 में शुरू हुई थी। उस समय लक्ष्य था कि 2020 तक सेना की सभी इन्फैंट्री बटालियनों को आधुनिक इक्विपमेंटों से लैस कर दिया जाए। 2015 में इसमें बड़ा बदलाव किया गया। पहले यह एक ही बड़ा प्रोग्राम था, लेकिन बाद में इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। पहला हिस्सा था सैनिकों के हथियार और व्यक्तिगत इक्विपमेंट, जैसे असॉल्ट राइफल, हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते और अन्य जरूरी चीजें। दूसरा हिस्सा था बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम, यानी ऐसा डिजिटल सिस्टम जिससे सैनिक को रीयल टाइम में जानकारी मिल सके कि दुश्मन कहां है, उसके साथी कहां हैं और किस दिशा से हमला हो सकता है।

इसके बाद 2022 में इस प्रोग्राम को नया रूप मिला। रक्षा मंत्री ने इसका एक अपडेटेड वर्जन सेना को सौंपा। इसमें कई नई चीजें शामिल थीं, जैसे नया कैमोफ्लाज यूनिफॉर्म, एडवांस्ड हेलमेट, मजबूत बॉडी आर्मर, नाइट विजन डिवाइस, थर्मल इमेजर और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम। इसके साथ ही नई एके-203 असॉल्ट राइफल भी दी गई, जो पुरानी इंसास राइफल की जगह ले रही है। (Holographic Reflex Sight India RFI)

फिलहाल यह प्रोग्राम धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। कई यूनिट्स, खासकर जो सीमा पर तैनात हैं, उन्हें नए इक्विपमेंट मिल चुके हैं। सैनिकों को बेहतर राइफल, मजबूत सुरक्षा गियर और आधुनिक इक्विपमेंट दिए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ डीआरडीओ और निजी कंपनियां डिजिटल सिस्टम पर काम कर रही हैं, जिससे सैनिक को युद्ध के दौरान हर जानकारी तुरंत मिल सके।

आने वाले समय में इसमें और भी नई तकनीक जुड़ सकती है। जैसे सैनिक हेलमेट या चश्मे के जरिए ही दुश्मन की लोकेशन देख सके, ड्रोन से मिल रही जानकारी सीधे उसके सामने दिखाई दे, और वह तेजी से फैसले ले सके। इसे और बेहतर बनाने के लिए “स्मार्ट सोल्जर” जैसी पहल भी चल रही है।

इस प्रोग्राम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सैनिक की फायरपावर बढ़ेगी। नई राइफल से वह ज्यादा दूर और सटीक निशाना लगा सकेगा। साथ ही, बेहतर बॉडी आर्मर और हेलमेट उसे दुश्मन की गोली से बचाने में मदद करेंगे। हल्के और आरामदायक इक्विपमेंट होने से उसकी मूवमेंट भी बेहतर होगी। सबसे अहम बात यह है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए उसे हर समय पूरी स्थिति की जानकारी मिलती रहेगी, जिससे वह ज्यादा समझदारी से लड़ाई लड़ सकेगा।

कुल मिलाकर, एफ-इंसास अब सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं रहा, बल्कि भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की पूरी सोच बन चुका है। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारतीय सैनिक को तकनीक से लैस एक “स्मार्ट फाइटर” बना देगा, जो हर तरह की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)

गलवान हीरो कर्नल जामवाल को बड़ा सम्मान! मिला ‘नेशनल एडवेंचर आइकन अवॉर्ड’

Colonel Ranveer Singh Jamwal Award

Colonel Ranveer Singh Jamwal Award: जम्मू निवासी और अरुणाचल प्रदेश में दिरांग स्थित राष्ट्रीय पर्वतारोहण एवं साहसिक खेल संस्थान (निमास) के डायरेक्टर कर्नल रणवीर सिंह जामवाल को हाल ही में ‘नेशनल एडवेंचर आइकन अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें उनके शानदार साहसिक कारनामों और देश के लिए किए गए योगदान के लिए दिया गया है। बता दें कि कर्नल जामवाल वही भारतीय सेना के बहादुर अधिकारी हैं, जिन्होंने 2020 में गलवान संघर्ष के बाद 29-30 अगस्त की रात को पैंगोंग झील के पास ब्लैक टॉप पर चीनी पीएलए की कब्जे की कोशिशों को नाकाम किया था।

कर्नल जामवाल पिछले करीब 20 साल से एडवेंचर की दुनिया में सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने कई ऐसे काम किए हैं, जो बहुत कम लोग कर पाते हैं। उन्होंने दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई की है। इसके साथ ही उन्होंने भारत के सभी 28 राज्यों की सबसे ऊंची चोटियों को भी फतह किया है। ऐसा करने वाले वह देश के इकलौते व्यक्ति हैं।

तीन बार एवरेस्ट फतह, 70 से ज्यादा मिशन पूरे

कर्नल जामवाल ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तीन बार सफल चढ़ाई की है। यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने अब तक 70 से ज्यादा एडवेंचर मिशन पूरे किए हैं।

उनकी उपलब्धियां सिर्फ पर्वतारोहण तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी पर 1040 किलोमीटर लंबी राफ्टिंग यात्रा का नेतृत्व भी किया है। इस यात्रा में भारत के अंदर नदी की पूरी लंबाई को पार किया गया, जो पहले कभी नहीं हुआ था। तेज धाराओं और मुश्किल हालात के बीच यह मिशन पूरा करना आसान नहीं था।

Colonel Ranveer Singh Jamwal Award

इसके अलावा उन्होंने साइकिलिंग में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के कठिन इलाकों में 1100 किलोमीटर की साइकिल यात्रा का नेतृत्व किया। वहीं ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के दौरान 5374 किलोमीटर लंबा इंटरनेशनल साइकिल अभियान भी पूरा किया, जिसमें उन्होंने छह देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

कई बड़े पुरस्कारों से हो चुके हैं सम्मानित

कर्नल जामवाल को देश के कई बड़े एडवेंचर अवॉर्ड भी मिल चुके हैं। इनमें तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड, आईएमएफ गोल्ड मेडल और मैकग्रेगर मेडल शामिल हैं। खास बात यह है कि वह इन तीनों बड़े पुरस्कारों को पाने वाले देश के एकमात्र व्यक्ति हैं।