Home Blog Page 33

सबसे बड़े डिफेंस रिफॉर्म्स की तैयारी; सरकार ने संसदीय कमेटी में क्या कहा थिएटर कमांड्स पर, अगले 3 माह में कैसे बदलेगा पूरा मिलिट्री स्ट्रक्चर?

India Theatre Commands
3 Service Chiefs and CDS (File Photo)

India Theatre Commands: अगले कुछ महीने भारतीय सेनाओं के लिए बेहद अहम होने वाले हैं। एक तरफ जहां, सीडीएस, नेवी चीफ मई के आखिर तक रिटायर हो जाएंगे तो मौजूदा आर्मी चीफ जून के आखिर तक रिटायर होंगे। वहीं दूसरी तरफ सरकार तीन इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स बनाने की तैयारी में है, जिससे सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर काम करेंगी। इस पर संसदीय कमेटी की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दिशा में काफी प्रगति हो चुकी है और लगभग सभी पक्षों में सहमति बन गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, अब कुछ अंतिम मुद्दों पर चर्चा चल रही है और प्रशासनिक काम भी साथ-साथ आगे बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि मई तक इस पर बड़ा फैसला हो सकता है। कोशिश यह है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान के मई में रिटायर होने से पहले इस योजना को मंजूरी मिल जाए। इसके लिए जल्द ही कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी से अप्रूवल लिया जा सकता है। यह बदलाव आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए बहुत अहम माना जा रहा है। (India Theatre Commands)

India Theatre Commands: क्या होते हैं थिएटर कमांड्स

थिएटर कमांड्स का मतलब है कि किसी खास इलाके या दुश्मन के हिसाब से सेना की तीनों शाखाओं को एक कमांड के तहत लाया जाए। अभी भारत में आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के अलग-अलग कमांड हैं, जो अपने-अपने तरीके से काम करते हैं।

नए सिस्टम में एक ही कमांडर के तहत तीनों सेनाएं मिलकर ऑपरेशन चलाएंगी। इससे फैसले जल्दी होंगे और युद्ध के समय तालमेल बेहतर रहेगा। (India Theatre Commands)

रक्षा मंत्रालय ने क्या कहा संसदीय कमेटी को

संसदीय कमेटी को रक्षा मंत्रालय ने बताया कि थिएटर कमांड्स बनाने की दिशा में अच्छा काम हुआ है और ज्यादातर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। अब कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा चल रही है, जिन्हें चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी यानी सीओएससी अंतिम रूप दे रही है। साथ ही, प्रशासनिक स्तर पर भी तैयारियां लगातार जारी हैं, ताकि जब फैसला हो, तो उसे तुरंत लागू किया जा सके।

सरकार का मानना है कि आज का युद्ध पहले जैसा नहीं रहा। अब लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर, स्पेस और मल्टी-डोमेन में भी होती है। ऐसे में सेना के ढांचे में बदलाव करना जरूरी हो गया है, ताकि आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से तेजी और बेहतर तरीके से काम किया जा सके।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी कहा है कि थिएटर कमांड्स का एक बड़ा फायदा यह होगा कि तीनों सेनाओं के बीच “जॉइंटनेस” यानी मिलकर काम करने की संस्कृति मजबूत होगी। अभी अलग-अलग सिस्टम होने की वजह से कई बार तालमेल की कमी दिखती है, लेकिन नए ढांचे में यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। (India Theatre Commands)

तीन बड़े थिएटर कमांड्स की योजना

अभी भारत में करीब 17 अलग-अलग सिंगल सर्विस कमांड्स हैं। जैसे आर्मी के अलग कमांड, एयर फोर्स के अलग और नेवी के अलग कमांड्स हैं। थिएटर कमांड्स बनने के बाद इन सभी को मिलाकर तीन बड़े कमांड बनाए जाएंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने कमांड पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, बल्कि उनका रोल बदल जाएगा।

दुश्मन के हिसाब से बनेगा नया स्ट्रक्चर

सूत्रों के मुताबिक भारत जिस नए थिएटर कमांड सिस्टम की तैयारी कर रहा है, उसकी सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ नक्शे के हिसाब से नहीं, बल्कि दुश्मन के हिसाब से बनाया जा रहा है। यानी पहले की तरह सिर्फ इलाके के आधार पर कमांड नहीं होगी, बल्कि जहां से खतरा है, उसी हिसाब से पूरी सैन्य ताकत को एक जगह लाकर रखा जाएगा।

इस नए मॉडल में तीन बड़े थिएटर कमांड नॉर्दर्न, वेस्टर्न और मैरिटाइम बनाए जाने की योजना है। हर कमांड का अपना अलग रोल होगा और उसमें तीनों सेनाओं के संसाधन एक साथ काम करेंगे। (India Theatre Commands)

नॉर्दर्न थिएटर कमांड: चीन के खिलाफ सबसे बड़ा फ्रंट

नॉर्दर्न थिएटर कमांड का सबसे बड़ा फोकस चीन के साथ लगने वाली सीमा यानी एलएसी पर होगा। इसमें लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक का पूरा इलाका शामिल होगा। इसके साथ ही पूर्वी सेक्टर में बांग्लादेश और म्यांमार से जुड़े इलाकों पर भी नजर रखी जाएगी, ताकि पूरे पूर्वी मोर्चे को एक साथ कंट्रोल किया जा सके।

इस कमांड का हेडक्वार्टर लखनऊ में बनाया जा सकता है। इसके पीछे वजह यह है कि लखनऊ भौगोलिक रूप से इस पूरे क्षेत्र के बीच में पड़ता है और यहां से कमांड और कंट्रोल करना आसान होगा।

इस थिएटर कमांड में आर्मी की नॉर्दर्न, सेंट्रल और ईस्टर्न कमांड्स के कुछ हिस्सों को शामिल किया जाएगा। साथ ही एयर फोर्स की वेस्टर्न, सेंट्रल और ईस्टर्न कमांड्स के एयर एसेट्स भी इसमें शामिल होंगे। यानी लड़ाई की स्थिति में जमीन और हवा दोनों से एक साथ कार्रवाई हो सकेगी। (India Theatre Commands)

इसका कमांडर तीन-स्टार रैंक का अधिकारी होगा, जो आर्मी या एयर फोर्स दोनों में से किसी से भी हो सकता है। माना जा रहा है कि इसमें रोटेशन सिस्टम भी हो सकता है, ताकि दोनों सेनाओं को बराबर मौका मिले।

इस कमांड का मुख्य उद्देश्य चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के खिलाफ मजबूत डिफेंस तैयार करना और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई यानी काउंटर-ऑफेंसिव करना होगा। पिछले कुछ सालों में एलएसी पर जो तनाव देखने को मिला है, उसके बाद इस कमांड की अहमियत और बढ़ जाती है। (India Theatre Commands)

वेस्टर्न थिएटर कमांड: पाकिस्तान फ्रंट पर तेजी से जवाब

वेस्टर्न थिएटर कमांड पूरी तरह पाकिस्तान को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इसका इलाका सियाचिन में साल्टोरो रिज से लेकर रण ऑफ कच्छ तक फैला होगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में चल रहे काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस भी इसी कमांड के तहत आएंगे।

इसका हेडक्वार्टर जयपुर में बनाया जा सकता है। जयपुर की लोकेशन पश्चिमी मोर्चे के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि यहां से पूरे बॉर्डर पर नजर रखना आसान होता है। (India Theatre Commands)

इस थिएटर में आर्मी की वेस्टर्न और साउथ-वेस्टर्न कमांड्स के हिस्से शामिल होंगे। इसके अलावा एयर फोर्स के जरूरी स्क्वाड्रन्स भी इसमें जोड़े जाएंगे। यानी अगर किसी भी तरह के तनाव की स्थिति बनती है, तो आर्मी और एयर फोर्स मिलकर तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे।

इस कमांड का नेतृत्व भी तीन-स्टार जनरल करेगा, लेकिन यहां आर्मी अफसर को कमांड सौंपी जाा सकती है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ जमीन पर टकराव की संभावना ज्यादा रहती है।

इस थिएटर का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह की पारंपरिक लड़ाई या “कोल्ड स्टार्ट” जैसे ऑपरेशन में तेजी से और प्रभावी कार्रवाई की जा सके। अभी तक अलग-अलग कमांड्स के चलते फैसलों में देरी हो सकती थी, लेकिन अब एक ही कमांडर के पास पूरा कंट्रोल होगा, जिससे प्रतिक्रिया का समय कम हो जाएगा। (India Theatre Commands)

मैरिटाइम थिएटर कमांड: नेवी की समुद्र में बढ़ेगी ताकत

तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण थिएटर कमांड होगा मैरिटाइम थिएटर कमांड, जो पूरी तरह समुद्री क्षेत्र पर फोकस करेगा। इसमें हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी जैसे इलाके शामिल होंगे। इसके साथ ही इंडियन ओशन रीजन में चीन की बढ़ती मौजूदगी पर भी नजर रखी जाएगी।

इसके हेडक्वार्टर के लिए तिरुवनंतपुरम, कारवार या कोयंबटूर में से किसी एक जगह को चुना जा सकता है। हालांकि तिरुवनंतपुरम की लोकेशन समुद्री ऑपरेशंस के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है।

इस थिएटर में नेवी की ईस्टर्न और वेस्टर्न कमांड्स के सभी एसेट्स शामिल होंगे। इसके अलावा एयर फोर्स के कुछ समुद्री ऑपरेशन से जुड़े स्क्वाड्रन्स और आर्मी की कोस्टल यूनिट्स भी इसमें शामिल होंगी। यानी समुद्र से जुड़े हर ऑपरेशन को एक ही कमांड के तहत लाया जाएगा।

इस कमांड का नेतृत्व नेवी के फ्लैग ऑफिसर यानी एडमिरल रैंक के अधिकारी के पास होगा। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि समुद्री ऑपरेशंस में नेवी की भूमिका सबसे ज्यादा होती है।

इस थिएटर का मुख्य उद्देश्य समुद्री रास्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से लेकर मलक्का स्ट्रेट तक, जहां से दुनिया का बड़ा व्यापार गुजरता है। इसके अलावा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत को संतुलित करना भी इसका अहम लक्ष्य होगा। (India Theatre Commands)

कुल 197 जॉइंटनेस इनिशिएटिव्स तय

आज के समय में सेना की ताकत सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि तीनों सेनाएं – आर्मी, नेवी और एयर फोर्स – मिलकर कितनी अच्छी तरह काम करती हैं। इसी को “जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन” कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है तीनों सेनाओं का एक टीम की तरह काम करना, ताकि युद्ध के समय पूरी ताकत एक साथ इस्तेमाल हो सके।

सरकार और रक्षा मंत्रालय का मानना है कि यही जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन भविष्य के युद्धों में जीत की सबसे बड़ी कुंजी है। इसी सोच के तहत कुल 197 अलग-अलग पहलें यानी इनिशिएटिव्स तय किए गए हैं। ये पहलें कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फैली हुई हैं, जैसे ऑपरेशन और इंटेलिजेंस, नई सैन्य क्षमता का विकास, कम्युनिकेशन और आईटी सिस्टम, लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई सिस्टम, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस, मानव संसाधन, प्रशासन और कानूनी व्यवस्था।

इन सभी क्षेत्रों में सुधार करके यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि तीनों सेनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर काम करें।

इन 197 पहलों को अलग-अलग चरणों में लागू किया जा रहा है। पहले चरण में वे काम शामिल थे, जो थिएटर कमांड्स की घोषणा से पहले पूरे किए जाने थे। इस चरण में कुल 50 काम तय किए गए थे, जिनमें से 29 पूरे हो चुके हैं।

दूसरे चरण में थिएटर कमांड्स की घोषणा के बाद से लेकर उनके पूरी तरह काम शुरू करने तक पूरे किए जाएंगे। इस चरण में 62 काम तय किए गए हैं, जिनमें से 12 पर काम पूरा हो चुका है और बाकी पर तेजी से काम चल रहा है।

तीसरा चरण वह है, जो थिएटर कमांड्स के पूरी तरह ऑपरेशनल होने के बाद भी जारी रहेगा। इसमें 51 काम शामिल हैं, जिनमें से 7 पूरे किए जा चुके हैं। यानी यह प्रक्रिया सिर्फ एक बार की नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाला सुधार है।

अगर इन तीनों चरणों को मिलाकर देखें, तो कुल 163 काम इस मुख्य सेट में आते हैं, जिनमें से अब तक 48 पूरे हो चुके हैं। इसके अलावा 34 ऐसे काम भी हैं, जो थिएटर कमांड्स बनने से सीधे जुड़े नहीं हैं, लेकिन सेना की जॉइंटनेस बढ़ाने के लिए जरूरी हैं। इनमें से 10 काम पूरे हो चुके हैं। (India Theatre Commands)

क्या हैं फोर्स एप्लीकेशन और फोर्स जनरेशन

थिएटर कमांड बनने के बाद अब सर्विस चीफ यानी आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के प्रमुख “फोर्स जनरेशन” पर ध्यान देंगे। यानी भर्ती, ट्रेनिंग, उपकरण और तैयारी उनकी जिम्मेदारी होगी। फोर्स जनरेशन यानी सेना को तैयार करना – भर्ती, ट्रेनिंग, हथियार आदि – यह काम सर्विस चीफ्स करेंगे।

जबकि फोर्स एप्लीकेशन यानी असली ऑपरेशन की जिम्मेदारी थिएटर कमांडर के पास होगी। इससे कमांडर पूरी तरह युद्ध और ऑपरेशन पर ध्यान दे पाएगा।

सथ ही, रणनीतिक और ऑपरेशनल प्लानिंग को नए तरीके से व्यवस्थित किया जाएगा। अब पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी एक ही कमांडर के पास होगी। इससे “यूनिटी ऑफ कमांड” बनेगी। पहले अलग-अलग कमांड होने की वजह से कई बार तालमेल की समस्या आती थी, लेकिन अब यह समस्या कम हो जाएगी। एक ही कमांडर पूरे ऑपरेशन को प्लान करेगा और तीनों सेनाएं मिलकर काम करेंगी। (India Theatre Commands)

अगले तीन महीनों में कई बड़े बदलाव

अगले तीन महीनों में भारतीय सेना के शीर्ष स्तर पर कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इसकी शुरुआत नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस की नियुक्ति से होगी। मौजूदा सीडीएस जनरल अनिल चौहान को पिछले साल सितंबर में एक्सटेंशन दिया गया था, जो 30 मई तक है। यानी मई के अंत तक नए सीडीएस की नियुक्ति तय मानी जा रही है।

सरकार अप्रैल के अंत तक इस पर फैसला ले सकती है। रक्षा मंत्रालय के 2022 के नियमों के मुताबिक, सीडीएस पद के लिए वही अधिकारी चुने जा सकते हैं जो तीन-स्टार रैंक के हों, यानी लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल। ये अधिकारी या तो सेवा में हों या रिटायर हो चुके हों, लेकिन उनकी उम्र नियुक्ति के समय 62 साल से कम होनी चाहिए। (India Theatre Commands)

इस नियम में 2019 के पुराने नियम में बदलाव करके यह दायरा बढ़ाया गया था, जिसके बाद जनरल अनिल चौहान को भी 2022 में सीडीएस बनाया गया था। इसका मतलब यह है कि सरकार के पास काफी बड़ा विकल्प है और 150 से ज्यादा तीन-स्टार अधिकारी इस पद के लिए संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं।

हालांकि अगर सरकार चाहे, तो वह इस नियम से आगे जाकर मौजूदा सेना प्रमुखों में से भी किसी को सीडीएस बना सकती है। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि अगला सीडीएस कौन होगा।

सीडीएस के अलावा आर्मी और नेवी में भी बड़े बदलाव होने वाले हैं। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी 31 मई को रिटायर हो रहे हैं, जबकि थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 30 जून को रिटायर होंगे। ऐसे में इन दोनों पदों पर भी नए चेहरों की नियुक्ति होगी।

अप्रैल की शुरुआत में ही आर्मी के शीर्ष अधिकारियों में फेरबदल की योजना बनाई जा चुकी है। लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ दिल्ली में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की जिम्मेदारी संभालेंगे। उनके स्थान पर लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को साउदर्न आर्मी कमांड का नया कमांडर बनाया जाएगा।

वहीं, मौजूदा वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल पीपी सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कटियार की जगह वेस्टर्न कमांड की कमान संभालेंगे, जो 31 मार्च को रिटायर हो रहे हैं। इसी दिन ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी भी रिटायर होंगे और उनकी जगह लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन को जिम्मेदारी दी जाएगी, जो अभी क्वार्टर मास्टर जनरल के पद पर हैं।

यह सारे बदलाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि मौजूदा कमांड सिस्टम जारी रहता है या नहीं। अगर जल्द ही इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स लागू हो जाते हैं, तो सेना के पूरे ढांचे में बड़े स्तर पर बदलाव, प्रमोशन और नई नियुक्तियां देखने को मिल सकती हैं। (India Theatre Commands)

रक्षा मंत्री बोले- जल्द खुलेंगे 100 नए सैनिक स्कूल, युवाओं को समझाया VUCA का नया मतलब

Raksha Mantri Rajnath Singh on Sainik Schools

Sainik Schools: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि आज के समय में युद्ध सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा हो चुका है। अब किसी देश की सुरक्षा सिर्फ सेना पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इकोनॉमिक, डिजिटल, एनर्जी और फूड सिक्योरिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने यह बात उत्तराखंड के सैनिक स्कूल घोराखाल के 60वें स्थापना दिवस (डायमंड जुबली) कार्यक्रम को वर्चुअल तरीके से संबोधित करते हुए कही। इस दौरान उन्होंने कहा कि देश को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ एक मजबूत सेना ही नहीं, बल्कि जागरूक और तैयार नागरिक भी जरूरी हैं।

Sainik Schools: बदल चुका है युद्ध का तरीका

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के समय में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। पहले युद्ध जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित होते थे, लेकिन अब साइबर, स्पेस और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर भी इसका हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने बताया कि अब दुश्मन किसी देश को सीधे हमला किए बिना भी कमजोर कर सकता है। जैसे साइबर अटैक के जरिए सिस्टम ठप करना, इकोनॉमिक दबाव बनाना या गलत जानकारी फैलाकर देश को अस्थिर करना। इसी वजह से उन्होंने हर नागरिक को सतर्क और तैयार रहने की जरूरत पर जोर दिया।

देश के नागरिकों की भूमिका बेहद अहम

राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार लगातार सेना को आधुनिक हथियार और नई टेक्नोलॉजी से लैस कर रही है। लेकिन इसके साथ-साथ देश के नागरिकों की भूमिका भी बहुत अहम है।

उन्होंने कहा कि अगर देश के लोग मानसिक रूप से मजबूत और अनुशासित होंगे, तभी वे मुश्किल समय में देश के साथ खड़े हो पाएंगे। खासकर युवाओं को इस दिशा में तैयार होने की जरूरत है।

युवाओं के लिए VUCA का नया मतलब

रक्षा मंत्री ने युवाओं को एक खास संदेश भी दिया। उन्होंने VUCA शब्द का जिक्र किया, जिसका मतलब होता है – वोलाटाइल, अनसर्टेन, कॉम्प्लेक्स और एम्बिग्युअस।

लेकिन उन्होंने युवाओं से कहा कि वे इसका नया मतलब अपनाएं – विजन, अंडरस्टैंडिंग, करेज और अडैप्टेबिलिटी।

उन्होंने समझाया कि आज के समय में युवाओं को साफ सोच, सही समझ, हिम्मत और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। इससे वे किसी भी चुनौती का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

देशभर में बढ़ रहे सैनिक स्कूल

राजनाथ सिंह ने बताया कि सरकार देश में युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए तैयार करने के लिए कई कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत 100 नए सैनिक स्कूल खोलने का फैसला किया है। इससे ज्यादा से ज्यादा युवाओं को अनुशासन और देश सेवा की भावना सिखाई जा सकेगी।

इसके अलावा एनसीसी यानी नेशनल कैडेट कॉर्प्स में भी सीटों की संख्या बढ़ाई गई है। पहले जहां 17 लाख कैडेट्स की क्षमता थी, अब इसे बढ़ाकर 20 लाख कर दिया गया है।

लड़कियों के लिए नया मौका

रक्षा मंत्री ने सैनिक स्कूलों में लड़कियों के एडमिशन को एक ऐतिहासिक फैसला बताया। उन्होंने कहा कि इससे देश की ‘नारी शक्ति’ और मजबूत होगी। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में यही लड़कियां देश के अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ी भूमिका निभाएंगी और दूसरों के लिए प्रेरणा बनेंगी।

अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने सैनिक स्कूल घोराखाल की उपलब्धियों की भी सराहना की। उन्होंने बताया कि इस स्कूल ने पिछले कई दशकों में देश को बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारी दिए हैं। अब तक यहां से 800 से ज्यादा छात्र नेशनल डिफेंस एकेडमी में पहुंचे हैं, जबकि 2000 से ज्यादा छात्र अलग-अलग परीक्षाओं के जरिए सशस्त्र बलों में शामिल हुए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह संस्थान आगे भी देश के लिए बेहतर और जिम्मेदार नेता तैयार करता रहेगा।

INS Taragiri: ब्रह्मोस मिसाइल से लैस नया वॉरशिप भारतीय नौसेना में जल्द होगा कमीशन, प्रोजेक्ट 17A का है चौथा फ्रिगेट

INS Taragiri Commissioning

INS Taragiri: भारतीय नौसेना को जल्द ही नया वारशिप मिलने वाला है। देश में बना आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी (F41) जल्द ही नौसेना के बेड़े में शामिल होने वाला है। इस युद्धपोत का कमीशनिंग समारोह 3 अप्रैल को आयोजित किया जाएगा, जिसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहेंगे।

आईएनएस तारागिरी प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाए जा रहे आधुनिक फ्रिगेट्स की सीरीज का हिस्सा है। यह इस प्रोजेक्ट का चौथा युद्धपोत है, जिसे विशेष रूप से आधुनिक समुद्री युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। हालांकि रक्षा समाचार ने 14 मार्च को ही इस बारे में पहले ही बता दिया था…”INS Taragiri: भारत का नया स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट अप्रैल में होगा नौसेना में शामिल, ब्रह्मोस-बराक से है लैस

INS Taragiri: क्या है प्रोजेक्ट 17ए और क्यों है अहम

प्रोजेक्ट 17ए भारतीय नौसेना का एक बड़ा और महत्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसके तहत नीलगिरी क्लास के स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इन युद्धपोतों को नई तकनीक, बेहतर डिजाइन और आधुनिक हथियारों से लैस किया गया है।

इस सीरीज का पहला जहाज आईएनएस नीलगिरी पहले ही नौसेना में शामिल हो चुका है। इसके बाद आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस हिमगिरि भी सेवा में आ चुके हैं। अब आईएनएस तारागिरी इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए नौसेना की ताकत में नया इजाफा करेगा।

यह प्रोजेक्ट इसलिए भी खास है क्योंकि इसका उद्देश्य भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है और आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करना है। (INS Taragiri)

स्वदेशी तकनीक से बना है INS Taragiri

आईएनएस तारागिरी को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) में तैयार किया गया है। यह जहाज करीब 6,670 टन वजनी है और इसमें 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी यानी भारत में बनी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

इस युद्धपोत के निर्माण में देश की अपनी तकनीक और उद्योगों की बड़ी भूमिका रही है। इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा एमएसएमई यानी छोटे और मध्यम उद्योगों ने भी योगदान दिया है, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला है।

यह जहाज ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का एक मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। (INS Taragiri)

स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए मुश्किल

आईएनएस तारागिरी की सबसे बड़ी खासियत इसका स्टेल्थ डिजाइन है। स्टेल्थ का मतलब होता है ऐसा डिजाइन, जिससे दुश्मन के रडार और सेंसर इसे आसानी से पकड़ न सकें।

इस जहाज का बाहरी ढांचा बहुत स्मूद और स्लीक बनाया गया है। इसके अलावा इसमें रडार क्रॉस सेक्शन कम करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इससे यह जहाज दुश्मन की नजर से काफी हद तक छिपा रह सकता है।

इसके साथ ही इसमें कम इंफ्रारेड सिग्नेचर यानी कम गर्मी छोड़ने वाली तकनीक भी दी गई है, जिससे इसे ट्रैक करना और भी मुश्किल हो जाता है। युद्ध के समय यह क्षमता बेहद अहम होती है। (INS Taragiri)

आधुनिक हथियारों से लैस

आईएनएस तारागिरी को आधुनिक और शक्तिशाली हथियारों से लैस किया गया है। इसमें सुपरसोनिक सर्फेस-टू-सर्फेस मिसाइल यानी ब्रह्मोस सिस्टम लगाया गया है, जो दुश्मन के जहाजों और जमीन पर मौजूद ठिकानों को तेजी से निशाना बना सकता है।

इसके अलावा इसमें मीडियम रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम भी है, जो हवाई खतरों जैसे फाइटर जेट या मिसाइल से जहाज की रक्षा करता है। जहाज में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम भी लगाया गया है, जिससे यह समुद्र के अंदर छिपी पनडुब्बियों को खोजकर उन पर हमला कर सकता है।

इसके साथ ही इसमें आधुनिक रडार, सेंसर और कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है। यह सिस्टम सभी हथियारों और सेंसर को एक साथ जोड़ता है, जिससे जहाज का क्रू तेजी से फैसले ले सकता है और तुरंत कार्रवाई कर सकता है। (INS Taragiri)

तेज रफ्तार और लंबी दूरी की क्षमता

आईएनएस तारागिरी में सीओडीओजी (कंबाइंड डीजल ऑर गैस) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इसका मतलब यह है कि जहाज जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टरबाइन दोनों का इस्तेमाल कर सकता है।

इससे जहाज को हाई स्पीड और लंबी दूरी तक चलने की क्षमता मिलती है। यानी यह युद्धपोत तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है।

निर्माण में इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक

इस युद्धपोत के निर्माण में इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें जहाज के अलग-अलग हिस्सों को पहले अलग से तैयार किया जाता है और बाद में उन्हें जोड़कर पूरा जहाज बनाया जाता है।

इस तकनीक से निर्माण में कम समय लगता है और गुणवत्ता भी बेहतर रहती है। आईएनएस तारागिरी को बनाने में पहले के मुकाबले कम समय लगा, जो भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दिखाता है।

कई तरह के मिशन के लिए तैयार

आईएनएस तारागिरी सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं बना है, बल्कि यह कई तरह के मिशन को पूरा करने में सक्षम है। यह जहाज हाई इंटेंसिटी कॉम्बैट यानी बड़े युद्ध के अलावा ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ (एचएडीआर) जैसे कामों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

मतलब, यह जहाज जरूरत पड़ने पर आपदा के समय लोगों की मदद करने, राहत सामग्री पहुंचाने और बचाव कार्यों में भी उपयोगी साबित होगा।

पूर्वी नौसेना कमान में होगी तैनाती

आईएनएस तारागिरी को भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान में तैनात किया जाएगा, जिसका मुख्यालय विशाखापत्तनम में है। यह कमान हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। इस युद्धपोत के शामिल होने से पूर्वी फ्लीट की ताकत और बढ़ेगी और समुद्री क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा बेहतर होगी।

आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होने से भारत की समुद्री ताकत को तेजी से मजबूती मिलेगी। यह जहाज न सिर्फ तकनीकी रूप से आधुनिक है, बल्कि यह देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को भी दिखाता है।

भारत अब ऐसे युद्धपोत बना रहा है, जो पूरी तरह देश में डिजाइन किए गए हैं, देश में बनाए गए हैं और देश के ही सैनिकों द्वारा संचालित किए जाएंगे। यह भारतीय नौसेना को और ज्यादा मजबूत, तैयार और आत्मनिर्भर बनाता है। (INS Taragiri)

4000 किमी दूर डिएगो गार्सिया पर ईरानी मिसाइल अटैक से चौंकी दुनिया, क्या इसमें है चीन का हाथ?

Iran Missile Range Diego Garcia

Iran Missile Range Diego Garcia: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच हिंद महासागर के बीच स्थित एक छोटे से द्वीप पर ईरान ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी दुनिया के रक्षा समीकरण बदल दिए। ब्रिटेन द्वारा अमेरिका को डिएगो गार्सिया बेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने इस सैन्य ठिकाने को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल दाग दीं।

हालांकि यह हमला भले ही सफल नहीं रहा, लेकिन इससे एक बड़ा संदेश दुनिया को मिल गया कि अब ईरान की मिसाइल क्षमता पहले से कहीं ज्यादा दूर तक पहुंच चुकी है।

Iran Missile Range Diego Garcia: क्या हुआ डिएगो गार्सिया में

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने दो बैलिस्टिक मिसाइलें डिएगो गार्सिया की ओर दागीं। यह बेस ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर हिंद महासागर में चागोस द्वीपसमूह में स्थित है।

हालांकि एक मिसाइल बीच रास्ते में ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत ने रोकने की कोशिश की। यह साफ नहीं हो पाया कि इंटरसेप्शन सफल रहा या नहीं, लेकिन इतना जरूर तय है कि ईरान ने इतनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता दिखा दी। यह घटना इसलिए भी अहम है क्योंकि ईरान पहले दावा करता रहा है कि उसकी मिसाइलों की अधिकतम रेंज करीब 2000 किलोमीटर है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ईरान ने असली ताकत छिपाई थी?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कुछ दिन पहले कहा था कि देश ने जानबूझकर अपनी मिसाइल रेंज को सीमित रखा है। लेकिन इस हमले ने उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह साफ हो गया है कि ईरान की मिसाइलें 4000 किलोमीटर तक पहुंच सकती हैं। इसका मतलब है कि सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई हिस्से भी इस रेंज में आ जाते हैं। इससे दुनिया भर के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संस्थानों के लिए खतरा बढ़ गया है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ब्रिटेन के फैसले से बढ़ा तनाव

यह पूरा मामला फरवरी महीने से शुरू हुआ। उस समय ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने दो अहम सैन्य ठिकानों, आरएएफ फेयरफोर्ड और डियागो गार्सिया, का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय कानून बताई गई। सरकार के कानूनी सलाहकारों ने कहा था कि अगर बिना मजबूत कानूनी आधार के किसी हमले में शामिल हुआ जाता है, तो यह नियमों के खिलाफ हो सकता है। इसी वजह से प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने खुद इस अनुरोध को ठुकरा दिया। (Iran Missile Range Diego Garcia)

इस फैसले के तुरंत बाद अमेरिका की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ब्रिटेन को डियागो गार्सिया जैसे महत्वपूर्ण बेस पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहिए। उन्होंने यह भी इशारा किया कि चागोस द्वीपों को मॉरिशस को सौंपने का जो समझौता चल रहा था, वह भी इस फैसले से प्रभावित हो सकता है। ट्रंप ने इसे कमजोरी के रूप में पेश किया और कहा कि ऐसे समय में, खासकर चीन जैसे देश के सामने, यह सही संकेत नहीं है।

जिसके बाद हालात तेजी से बदले। करीब दस दिन बाद, यानी मार्च की शुरुआत में, ब्रिटेन ने अपना रुख बदलते हुए प्रधानमंत्री स्टार्मर ने एक आधिकारिक बयान जारी कर अमेरिका को इन बेस के इस्तेमाल की अनुमति दे दी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह अनुमति सिर्फ सीमित और रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए खासकर ईरान के मिसाइल लॉन्च साइट और उनके स्टोरेज ठिकानों को निशाना बनाने के लिए है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

इसी दौरान हालात और ज्यादा गंभीर हो गए। उसी दिन ईरान ने बहरीन में मौजूद एक ब्रिटिश सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया। इस हमले में ब्रिटिश सैनिक बाल-बाल बच गए, लेकिन खतरा साफ दिखने लगा था। इसके अलावा कतर के ऊपर एक ईरानी ड्रोन को ब्रिटेन के आरएएफ टाइफून लड़ाकू विमान ने मार गिराया।

इन सब घटनाओं के बीच एक और बड़ा दबाव था, जो चागोस द्वीपों से जुड़ा था। यह सौदा करीब 35 अरब पाउंड का था और इस पर अमेरिका का भी असर था। ऐसे में ब्रिटेन के सामने सुरक्षा, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का दबाव एक साथ आ गया। (Iran Missile Range Diego Garcia)

अमेरिकी ऑपरेशन पर पड़ा था असर 

ब्रिटेन की अनुमति न मिलने की वजह से अमेरिका को पहले लंबी दूरी से ऑपरेशन करना पड़ा था। अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स को अमेरिका से उड़ान भरकर 36 घंटे का मिशन करना पड़ा था। अब जब ब्रिटेन ने अपने बेस खोल दिए हैं, तो ऑपरेशन आसान हो गया है। अब बी-52 और बी-1 जैसे बॉम्बर्स कम समय में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं और बार-बार ऑपरेशन कर सकते हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ईरान ने दी कड़ी प्रतिक्रिया

ईरान ने इस फैसले के तुरंत बाद कड़ी प्रतिक्रिया दी। ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिटेन इस कदम से अपने नागरिकों को खतरे में डाल रहा है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि ईरान आत्मरक्षा का अधिकार इस्तेमाल करेगा। कुछ ही घंटों बाद मिसाइलें दाग दी गईं। यानी चेतावनी और हमला लगभग एक ही समय में हुआ।

हालांकि इस घटनाक्रम ने अमेरिका और ब्रिटेन के बीच मतभेद भी उजागर कर दिए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि ब्रिटेन ने बहुत देर से अनुमति दी, जिससे ऑपरेशन में देरी हुई। उन्होंने यह भी कहा कि सहयोगी देशों को ऐसे मामलों में तुरंत फैसले लेने चाहिए।

दरअसल अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी देश तुरंत सैन्य समर्थन दें, जबकि ब्रिटेन अपने कानूनी और राजनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखता है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

Iran Missile Range Diego Garcia

क्यों इतन अहम है डिएगो गार्सिया बेस

डियागो गार्सिया सिर्फ एक छोटा सा द्वीप नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर में स्थित एक बेहद अहम और रणनीतिक सैन्य ठिकाना है। यह चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा हिस्सा है, जहां अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य बेस मौजूद है।

इस बेस की खासियत यह है कि यहां दुनिया के सबसे आधुनिक सैन्य संसाधन तैनात हैं। बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर जैसे अत्याधुनिक विमान, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां, गाइडेड मिसाइल से लैस युद्धपोत और खुफिया जानकारी जुटाने वाले इंटेलिजेंस सेंटर सभी एक ही जगह पर मौजूद हैं।

भौगोलिक रूप से भी यह जगह बेहद महत्वपूर्ण है। यह मालदीव से करीब 1600 किलोमीटर, श्रीलंका से लगभग 1900 किलोमीटर और भारत से करीब 1800 से 2000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसे में अगर कोई देश इस बेस तक पहुंचने की क्षमता दिखा देता है, तो इसका मतलब है कि पूरे क्षेत्र के कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकाने खतरे में आ सकते हैं।

इस बेस का इतिहास भी काफी पुराना और विवादों से जुड़ा रहा है। 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इस सैन्य ठिकाने को विकसित किया था। उस समय चागोस द्वीपसमूह के मूल निवासियों को यहां से हटाया गया था, ताकि इस जगह को पूरी तरह सैन्य उपयोग के लिए तैयार किया जा सके। तब से लेकर आज तक यह बेस अमेरिका के लिए हिंद महासागर में सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल हब बना हुआ है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

गल्फ वॉर से लेकर इराक युद्ध तक, कई बड़े सैन्य अभियानों में इसी बेस से बॉम्बर विमान उड़ान भरते रहे हैं। यह जगह अमेरिका के लिए एक लॉन्च पैड की तरह काम करती है, जहां से वह एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका तक अपनी सैन्य पहुंच बनाए रखता है।

हाल के घटनाक्रम के बाद इस बेस की अहमियत और बढ़ गई है। पहले अमेरिका को अपने बॉम्बर विमान मिसौरी से उड़ाकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, जिसमें करीब 36 घंटे का समय लगता था। लेकिन अब जब ब्रिटेन ने फेयरफोर्ड और डियागो गार्सिया जैसे बेस खोल दिए हैं, तो ऑपरेशन कहीं ज्यादा आसान हो गया है।

अब बमवर्षक विमान कम समय में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, मिशन पूरा कर सकते हैं और दोबारा हथियार भरकर फिर से उड़ान भर सकते हैं। इससे सैन्य कार्रवाई की गति और प्रभाव दोनों बढ़ जाते हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

मिसाइल की रेंज ने बदला पूरा समीकरण

ईरान लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसकी मिसाइलों की अधिकतम रेंज करीब 2000 किलोमीटर तक ही सीमित है। लेकिन हालिया हमले ने इस दावे को पूरी तरह बदल दिया है। अब जिस तरह से अटैक हुआ है, उससे साफ है कि ईरान की असली क्षमता इससे कहीं ज्यादा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले में इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था। इससे पहले ईरान के पास ज्यादातर शॉर्ट और मीडियम रेंज मिसाइलें थीं, जिनमें शाहब-3, एमाद और खोर्रमशहर शामिल हैं। इनकी रेंज लगभग 1300 से 3000 किलोमीटर के बीच मानी जाती है।

लेकिन पिछले कुछ सालों में ईरान ने स्पेस लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी पर भी काम किया है। इसी तकनीक की मदद से वह धीरे-धीरे लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

हाल ही में अमेरिका और इजरायल ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के तहत ईरान के कई मिसाइल ठिकानों, फैक्ट्रियों और स्टोरेज साइट्स पर बड़े हमले किए थे। इसके बावजूद ईरान इस तरह का लंबी दूरी का हमला करने में सफल रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि उसकी मिसाइल उत्पादन क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और वह अभी भी सक्रिय है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

हालांकि इस हमले में तकनीकी कमियां भी सामने आईं। एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को रोक दिया गया। इससे यह पता चलता है कि ईरान की मिसाइलों की सटीकता और भरोसेमंद प्रदर्शन अभी पूरी तरह मजबूत नहीं है।

इसका सीधा असर यह है कि अब खतरे का दायरा काफी बढ़ गया है। पहले जहां 2000 किलोमीटर तक का क्षेत्र ही खतरे में माना जाता था, अब यह सीमा करीब 4000 किलोमीटर तक पहुंच गई है।

इस नए दायरे में अब सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई हिस्से भी शामिल हो गए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरण पर बड़ा असर पड़ सकता है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

क्या चीन का है कोई रोल

इस पूरे मामले को लेकर कई लोग इसे सिर्फ ईरान का “मैसेज” बता रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ ईरान की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसके पीछे चीन की भूमिका भी हो सकती है। उनका मानना है कि यह कदम अमेरिका की सैन्य क्षमता और उसके मिसाइल डिफेंस सिस्टम को परखने के लिए उठाया गया।

20 मार्च को ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डियागो गार्सिया बेस की ओर दो मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल दागीं। इनमें से एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही खराब हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत ने एसएम-3 इंटरसेप्टर से रोकने की कोशिश की। हालांकि यह साफ नहीं हो पाया कि वह मिसाइल पूरी तरह नष्ट हुई या नहीं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले में खोर्रमशहर-4 मिसाइल का इस्तेमाल किया गया हो सकता है, जिसे खैबर के नाम से भी जाना जाता है। यह ईरान की एक एडवांस लिक्विड फ्यूल वाली मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी रेंज 4000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है और यह करीब 1500 किलोग्राम तक का वॉरहेड ले जा सकती है।

इस मिसाइल की खास बात यह है कि यह बहुत तेज गति से उड़ती है, जिसे हाइपरसोनिक रेंज कहा जाता है। इसकी गति मैक 8 से लेकर मैक 16 तक हो सकती है। इसमें एक खास तरह का सिस्टम होता है, जिसे मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल कहा जाता है। इसके जरिए मिसाइल अपने रास्ते में बदलाव कर सकती है, जिससे इसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है।

बताया जाता है कि यह मिसाइल कम समय में तैयारी के साथ मोबाइल लॉन्चर से करीब 15 मिनट के अंदर दागी जा सकती है। इसकी सटीकता भी काफी बेहतर मानी जाती है, जो करीब 30 से 100 मीटर तक की गलती के दायरे में रहती है।

माना जाता है कि यह मिसाइल उत्तर कोरिया की ह्वासोंग-10 तकनीक पर आधारित है, जो खुद सोवियत संघ की पुरानी आर-27 मिसाइल से प्रेरित थी। ईरान ने 2005 के आसपास इस तकनीक को हासिल किया और फिर इसमें अपने स्तर पर सुधार करते हुए खोर्रमशहर सीरीज तैयार की।

कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस मिसाइल के नए वर्जन खासकर डिजाइन और गाइडेंस सिस्टम में में चीन की तकनीकी मदद भी शामिल हो सकती है।

खास बात यह रही कि अमेरिका इस मिसाइल को पूरी तरह रोक नहीं पाया। इसे एक चिंता की बात माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम में कुछ कमियां हो सकती हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

एयरक्राफ्ट कैरियर के डेक पर पड़ा बोल्ट भी बन सकता है बड़ा खतरा! नहीं होगी FOD वॉक की जरूरत! AI करेगा मदद

AI FOD Detection System
AI FOD Detection System

AI FOD Detection System: कई बार एयरक्राफ्ट कैरियर के फ्लाइट डेक पर छोटी-छोटी चीजें जैसे स्क्रू, बोल्ट, धातु के टुकड़े या रबर के हिस्से पड़े रह जाते हैं। देखने में ये बेहद मामूली लगते हैं, लेकिन यही चीजें किसी बड़े हादसे की वजह बन सकती हैं। ऐसे ही खतरों से निपटने के लिए अब भारतीय नौसेना ने एक नई हाई-टेक तकनीक की ओर कदम बढ़ाया है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इन खतरनाक चीजों को तुरंत पहचान लिया जाएगा।

भारत की डिफेंस टेक कंपनी स्काईलार्क लैब्स ने हाल ही में भारतीय नौसेना की एयर ऑपरेशन क्षमता को और मजबूत बनाने के लिए नौसेना के एक एयरक्राफ्ट कैरियर पर फिक्स्ड फॉरेन ऑब्जेक्ट डेब्रिस यानी एफओडी डिटेक्शन सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया।

इस सिस्टम की खास बात यह है कि अब जहाज के फ्लाइट डेक पर छोटी-छोटी खतरनाक चीजों को पहचानने के लिए इंसानों को बार-बार चेक नहीं करना पड़ेगा। यह काम अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई खुद करेगा और वह भी लगातार, बिना रुके। (AI FOD Detection System)

AI FOD Detection System: क्या होता है एफओडी और क्यों है यह इतना खतरनाक

एफओडी का मतलब होता है फॉरेन ऑब्जेक्ट डेब्रिस। यानी ऐसी छोटी चीजें जो फ्लाइट डेक या रनवे पर पड़ी रह जाती हैं। इनमें स्क्रू, बोल्ट, धातु के टुकड़े, रबर के हिस्से या छोटे टूल्स शामिल हो सकते हैं।

ये चीजें देखने में छोटी लगती हैं, लेकिन इनसे बड़ा नुकसान हो सकता है। अगर ये जेट इंजन के अंदर चली जाएं तो इंजन खराब हो सकता है। इससे विमान को नुकसान पहुंच सकता है और लाखों-करोड़ों का नुकसान हो सकता है और उड़ान भी रद्द करनी पड़ सकती है। यहां तक कि पायलट की जान भी खतरे में पड़ सकती है। (AI FOD Detection System)

इसके अलावा इससे टायर फट सकते हैं या डेक पर काम कर रहे लोगों को चोट लग सकती है। एयरक्राफ्ट कैरियर पर यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि वहां समुद्र का नमक, तेज हवा, जहाज की हलचल और लगातार उड़ानें होती रहती हैं। (AI FOD Detection System)

पहले कैसे होता था चेकिंग का काम

अब तक इन खतरों से बचने के लिए सेलर्स को फ्लाइट ऑपरेशन से पहले डेक पर पैदल चलकर जांच करनी पड़ती थी। इसे फॉरेन ऑब्जेक्ट डेब्रिस वॉक कहा जाता है।

यह प्रक्रिया समय लेने वाली होती थी और इसमें जोखिम भी रहता था। अगर किसी छोटी चीज को नजरअंदाज कर दिया गया, तो बड़ा हादसा हो सकता था। (AI FOD Detection System)

अब AI करेगा पूरा काम

स्काईलार्क लैब्स के इस नये सिस्टम ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। इसमें डेक पर खास जगहों पर कैमरे लगाए जाते हैं, जो लगातार निगरानी करते रहते हैं।

जैसे ही कोई संदिग्ध चीज दिखाई देती है, सिस्टम तुरंत उसे पहचान लेता है और उसकी सटीक लोकेशन डेक पर काम कर रहे स्टाफ को भेज देता है। इससे तुरंत कार्रवाई की जा सकती है।

यह सिस्टम सिर्फ चीजों को पहचानता ही नहीं, बल्कि उन्हें अलग-अलग कैटेगरी में भी बांटता है, जैसे मेटल, रबर या अन्य सामग्री। इससे बाद में जांच और मेंटेनेंस प्लान बनाने में भी मदद मिलती है। (AI FOD Detection System)

कठिन परिस्थितियों में भी काम करने की क्षमता

एयरक्राफ्ट कैरियर का माहौल बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। यहां नमक का असर, तेज धूप, परछाइयां, जहाज की वाइब्रेशन और लगातार मूवमेंट रहता है। इस सिस्टम को खास तौर पर इन सभी परिस्थितियों में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह एआई सिस्टम धीरे-धीरे सीखता भी रहता है और अलग-अलग परिस्थितियों में खुद को बेहतर बनाता है। (AI FOD Detection System)

रियल टाइम में काम, बिना ऑपरेशन रोके

इस डेमोंस्ट्रेशन के दौरान सिस्टम ने रियल टाइम में डेक की निगरानी की और बिना किसी रुकावट के उड़ान संचालन चलता रहा। जैसे ही कोई डेब्रिस मिला, सिस्टम ने तुरंत उसकी जानकारी दी और टीम ने तुरंत उसे हटा दिया। इसके अलावा, इस सिस्टम की एक और खास बात यह है कि यह समय के साथ और ज्यादा स्मार्ट होता जाता है।

यह डेक पर बार-बार गिरने वाली चीजों के पैटर्न को पहचान सकता है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किस जगह पर ज्यादा खतरा है और किस वजह से डेब्रिस बन रहा है। इससे भविष्य में हादसों को रोकने के लिए पहले से तैयारी की जा सकती है। (AI FOD Detection System)

ऑटोमैटिक रिपोर्ट और आसान मैनेजमेंट

पहले जहां हर चीज की मैन्युअल रिपोर्ट बनानी पड़ती थी, अब यह सिस्टम खुद ही रिपोर्ट तैयार कर सकता है। इससे समय बचता है और ऑपरेशन टीम को सीधे काम की जानकारी मिलती है।

स्काईलार्क लैब्स के सीईओ अमरजीत सिंह ने कहा कि एयरक्राफ्ट कैरियर सबसे कठिन ऑपरेशन वाले वातावरण में से एक है। इस डेमोंस्ट्रेशन ने साबित किया है कि उनका सिस्टम ऐसे माहौल में भी लगातार निगरानी कर सकता है और सही समय पर सटीक जानकारी दे सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह सिस्टम सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं है। यह एयरफील्ड, एयरपोर्ट और अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। (AI FOD Detection System)

वहीं, इस तकनीक के आने से भारतीय नौसेना की सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। अब मैन्युअल जांच पर निर्भरता कम होगी और गलतियों की संभावना भी घटेगी। इसके साथ ही उड़ानों की गति भी बढ़ सकती है, क्योंकि हर बार लंबी जांच की जरूरत नहीं होगी।

पहले 2023-24 में इस तकनीक का मोबाइल वर्जन आईएनएस विक्रमादित्य पर टेस्ट किया जा चुका है और iDEX प्रोजेक्ट के तहत कंपनी ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर काम भी किया था। अब इसका फिक्स्ड वर्जन भी सफलतापूर्वक साबित हो गया है, जो जमीन पर बने एयरपोर्ट के साथ-साथ एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे समुद्री प्लेटफॉर्म पर भी आसानी से काम कर सकता है। यही वजह है कि अब इस तकनीक के सामने वैश्विक स्तर पर भी बड़े मौके खुल गए हैं और आने वाले समय में इसे अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों की नौसेनाओं के एयरक्राफ्ट कैरियर पर भी इस्तेमाल के लिए निर्यात किया जा सकता है। (AI FOD Detection System)

स्वदेशी फाइटर जेट इंजन को लेकर बड़ी खबर! कावेरी की देरी से लिया सबक, अब देश में बनेगा जेट इंजन टेस्टिंग सेंटर

National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility
National Aero Engine Test Complex: India Plans Indigenous Jet Engine Testing Facility

National Aero Engine Test Complex: भारत अब जेट इंजन की टेस्टिंग को लेकर बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। देश जल्द ही अपना पहला पूरी तरह इंटीग्रेटेड एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद यह है कि अब जेट इंजन की टेस्टिंग के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

डीआरडीओ ने इसके लिए “नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स” बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। (National Aero Engine Test Complex)

National Aero Engine Test Complex: कहां बनेगा यह हाई-टेक कॉम्प्लेक्स

सूत्रों के अनुसार, यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स कर्नाटक के चल्लाकेरे या फिर नागार्जुन सागर के आसपास बनाया जा सकता है। यह जगह इसलिए चुनी जा रही है क्योंकि यहां बड़े स्तर पर तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना आसान है।

अब तक भारत को अपने जेट इंजन की कई अहम टेस्टिंग के लिए रूस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की परफॉरमेंस जांचने के लिए भारत के पास खुद की सुविधा नहीं थी।

इस वजह से समय ज्यादा लगता था, खर्च बढ़ जाता था और कई बार प्रोजेक्ट में देरी भी हो जाती थी। कावेरी इंजन प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है, जिसमें टेस्टिंग के लिए विदेश जाना पड़ा और समयसीमा पर असर पड़ा। (National Aero Engine Test Complex)

कैसा होगा यह नया टेस्ट कॉम्प्लेक्स

यह कॉम्प्लेक्स पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस होगा। इसमें जेट इंजन के हर हिस्से की टेस्टिंग के लिए अलग-अलग सुविधाएं होंगी। इसमें हाई अल्टीट्यूड टेस्ट सिस्टम होगा, जहां 10 से 15 किलोमीटर ऊंचाई जैसी स्थिति बनाई जा सकेगी।

इसके अलावा इसमें फैन, कंप्रेसर, कंबस्चर, टरबाइन और आफ्टरबर्नर जैसे सभी अहम हिस्सों की जांच के लिए अलग टेस्ट सेटअप होंगे। इससे इंजन के छोटे-छोटे पार्ट्स से लेकर पूरे इंजन तक की जांच एक ही जगह पर हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

टर्नकी आधार पर बनेगा पूरा सिस्टम

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को टर्नकी आधार पर बनाने की योजना बनाई है। इसका मतलब है कि जो कंपनी इस प्रोजेक्ट को लेगी, वही डिजाइन से लेकर निर्माण और इंस्टॉलेशन तक की पूरी जिम्मेदारी निभाएगी। इसमें सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ एडवांस टेस्टिंग सिस्टम भी शामिल होंगे। देश और विदेश की कंपनियों को इसमें हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। (National Aero Engine Test Complex)

किन कंपनियों को मौका मिलेगा

इस प्रोजेक्ट में देशी और विदेशी कंपनियां दोनों हिस्सा ले सकती हैं। इसमें ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स, टेस्ट फैसिलिटी बनाने वाली कंपनियां, जॉइंट वेंचर और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल हो सकते हैं।

फ्रांस की कंपनी सफरान और रूस की कंपनियां इस सेक्टर में पहले से काम कर रही हैं, इसलिए उनके भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसमें जीटीआरई के साथ 110-120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन के लिए संभावित साझेदारी भी शामिल है। (National Aero Engine Test Complex)

कावेरी इंजन की कहानी – क्यों जरूरी है यह कॉम्प्लेक्स

कावेरी इंजन की शुरुआत साल 1989 में हुई थी, जब जीटीआरई ने इसे डेवलप करना शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत अपने एलसीए तेजस फाइटर जेट के लिए खुद का इंजन तैयार कर सके। लेकिन कई सालों की मेहनत के बावजूद यह इंजन तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। यह करीब 72 से 81 किलो न्यूटन थ्रस्ट ही दे सका, जबकि तेजस को 83 से 85 किलो न्यूटन की जरूरत थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रही हाई टेम्परेचर मटेरियल, जैसे सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर अलॉय की कमी, साथ ही पर्याप्त टेस्टिंग सुविधाओं का न होना था।

इसी वजह से 2008 में डीआरडीओ ने तेजस प्रोजेक्ट से कावेरी इंजन को अलग कर दिया। हालांकि इसके बाद भी इस पर काम बंद नहीं हुआ। धीरे-धीरे इसमें सुधार किया गया और अब इसका ड्राई वर्जन, यानी बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन, करीब 48 से 52 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने लगा है। इस वर्जन को अब डीआरडीओ के घातक यूसीएवी यानी स्टेल्थ ड्रोन में इस्तेमाल करने की योजना है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में जाकर कावेरी इंजन के आफ्टरबर्नर का ट्रायल भी देखा था। (National Aero Engine Test Complex)

इसके साथ ही अब भारत एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे एएचटीसीई कहा जाता है। इसका लक्ष्य 110 से 130 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाला ताकतवर इंजन बनाना है। यह इंजन भारत के भविष्य के स्टेल्थ फाइटर जेट एएमसीए के लिए होगा। एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे, जिनकी कुल ताकत करीब 240 किलो न्यूटन होगी। अगर यह इंजन भारत खुद नहीं बना पाया, तो उसे विदेशी इंजनों जैसे जीई एफ414 या सफरान पर निर्भर रहना पड़ेगा। (National Aero Engine Test Complex)

सबसे बड़ी समस्या अब तक टेस्टिंग की रही है। भारत में हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की जांच करने के लिए जरूरी टेस्ट बेड नहीं है। इसी वजह से कावेरी इंजन के कई टेस्ट रूस के रूस के ग्रोमोव इंस्टीट्यूट और सीआईएएम संस्थानों में करवाने पड़े। वहां टेस्टिंग के लिए 9 से 10 महीने तक लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा यह प्रक्रिया काफी महंगी भी थी और संवेदनशील तकनीक विदेश भेजने का जोखिम भी बना रहता था।

यही वजह है कि अब नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई है, ताकि भारत अपने इंजन की पूरी टेस्टिंग देश में ही कर सके और भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी और निर्भरता दोनों कम हो सकें। (National Aero Engine Test Complex)

कितनी मुश्किल है टेस्टिंग?

जेट इंजन बनाना बेहद मुश्किल काम होता है। एक इंजन में करीब 25,000 छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं और हर पार्ट का सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। इसके अंदर तापमान 1500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में इंजन को सही तरीके से चलाना और उसकी जांच करना आसान नहीं होता।

जब इंजन को ऊंचाई पर उड़ान के लिए टेस्ट किया जाता है, तो वहां हवा बहुत पतली होती है। इससे इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा आफ्टरबर्नर में अतिरिक्त ताकत पाने के लिए ईंधन जलाया जाता है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट मिलता है, लेकिन इस प्रक्रिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होता है। (National Aero Engine Test Complex)

दुनिया में ऐसे टेस्ट करने के लिए बहुत कम देशों के पास पूरी सुविधाएं हैं। अमेरिका में नासा और जीई के पास सबसे बड़े और आधुनिक टेस्ट कॉम्प्लेक्स हैं। रूस और फ्रांस के पास भी ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं।

जीटीआरई में फिलहाल 130 किलो न्यूटन क्षमता वाला ट्विन इंजन टेस्ट बेड बनाया जा रहा है, लेकिन वह सिर्फ जमीन पर होने वाले टेस्ट के लिए है। वहीं नया नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जहां हर तरह की टेस्टिंग एक ही जगह पर की जा सकेगी।

नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स के बाद अगला कदम फ्लाइंग टेस्ट बेड होगा। वहीं भारतीय वायुसेना के आईएल-76 ट्रांसपोर्ट प्लेन इसे बनाने के लिए चुना जा सकता है। इससे उड़ान की टेस्टिंग भी देश में हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए जरूरी कदम

यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए के लिए बेस तैयार करेगा। भारत एएमसीए जैसे एडवांस फाइटर जेट्स पर काम कर रहा है, जिसके लिए हाई पावर इंजन की जरूरत होगी।

अगर इंजन की टेस्टिंग देश में ही होगी, तो इन प्रोजेक्ट्स को रफ्तार मिलेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (National Aero Engine Test Complex)

डीआरडीओ की तरफ से जारी की गई आरएफआई इस पूरे प्रोजेक्ट का पहला चरण है। इसके जरिए कंपनियों की क्षमता और तकनीकी योग्यता का आकलन किया जाएगा।

इसके बाद इस प्रोजेक्ट को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहां से मंजूरी मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

आरएफआई के जवाब जून के मध्य तक मांगे गए हैं। इसके बाद इंडस्ट्री के साथ चर्चा की जाएगी और प्रोजेक्ट की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। (National Aero Engine Test Complex)

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

आज के समय में जेट इंजन टेक्नोलॉजी किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानी जाती है। अगर किसी देश के पास अपनी इंजन टेस्टिंग सुविधा नहीं है, तो उसे हर बार विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इस नए कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इससे समय, लागत और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान हो जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा। इससे देश की कंपनियों को नई तकनीक पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। (National Aero Engine Test Complex)

भारतीय वायुसेना कर रही मॉडर्न वॉरफेयर को लेकर बड़ी तैयारी, खरीदेगी AI-बेस्ड हाई-टेक वॉरगेमिंग सिमुलेटर

Computer Aided Wargaming Simulator

Computer Aided Wargaming Simulator: भारतीय वायुसेना अब मॉडर्न वॉरफेयर को लेकर बड़ी तैयारी कर रही है। वायुसेना आधुनिक युद्ध की तैयारियों के लिए एक नया हाई-टेक सिस्टम लाने जा रही है। इसके लिए कंप्यूटर एडेड वारगेमिंग सिमुलेटर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस सिस्टम के जरिए वायुसैनिक बिना किसी असली हथियार के इस्तेमाल के, वर्चुअल तरीके से युद्ध की पूरी तैयारी कर सकेंगे।

इस सिस्टम के लिए सिकंदराबाद स्थित कॉलेज ऑफ एयर वारफेयर ने टेंडर जारी किया है। इसके तहत एक यूनिट खरीदी जाएगी। (Computer Aided Wargaming Simulator)

Computer Aided Wargaming Simulator: क्या होता है वारगेमिंग सिमुलेटर

यह एक आधुनिक डिजिटल ट्रेनिंग सिस्टम है, या सीधे शब्दों में कहें तो यह एक वर्चुअल युद्ध का मैदान है, जहां भारतीय वायुसेना के अधिकारी बिना कोई जोखिम उठाए, असली युद्ध के लिए खुद को तैयार करते हैं। इसमें कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और थ्रीडी ग्राफिक्स की मदद से युद्ध जैसी पूरी स्थिति को वर्चुअल तरीके से तैयार किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह “वारगेमिंग” का कंप्यूटर वाला रूप है, जिसमें बिना असली हथियार इस्तेमाल किए और बिना किसी नुकसान के, सैन्य अधिकारियों को युद्ध की योजना बनाना, फैसले लेना और ऑपरेशन चलाने की प्रैक्टिस कराई जाती है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

अगर इसे और सरल तरीके से समझें, तो यह एक एडवांस वीडियो गेम जैसा होता है, लेकिन इसमें सब कुछ असली युद्ध जैसा होता है। इसमें अधिकारी हवाई जहाज, मिसाइल, रडार, दुश्मन की गतिविधियां, साइबर अटैक और यहां तक कि स्पेस सैटेलाइट तक को स्क्रीन पर देख और कंट्रोल कर सकते हैं। कई अधिकारी एक साथ इसमें हिस्सा लेते हैं, जहां कोई एयर ऑपरेशन संभालता है तो कोई ग्राउंड या दूसरी जिम्मेदारी निभाता है। इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दुश्मन की तरफ से फैसले लेता है और मौसम, जमीन की स्थिति और इंटेलिजेंस इनपुट भी रियल टाइम में बदलते रहते हैं।

जब यह पूरा अभ्यास खत्म होता है, तो उसका पूरा रिव्यू किया जाता है। इसमें बताया जाता है कि कहां गलती हुई और आगे कैसे बेहतर रणनीति अपनाई जा सकती है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

हमलों और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस का अभ्यास

भारतीय वायुसेना में इस सिस्टम का इस्तेमाल अधिकारियों की ट्रेनिंग के लिए किया जाएगा। इसे सिकंदराबाद स्थित कॉलेज ऑफ एयर वारफेयर में लगाया जा रहा है। इसके जरिए एयर वॉर, जॉइंट ऑपरेशन, साइबर और स्पेस से जुड़े हमलों और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस का अभ्यास कराया जाएगा। अधिकारी इसमें नई रणनीतियों और नए हथियारों को भी सुरक्षित तरीके से टेस्ट कर सकते हैं।

इस सिमुलेटर की मदद से वास्तविक युद्ध जैसी स्थितियों को बार-बार दोहराया जा सकता है, जैसे सीमा पर तनाव या किसी बड़े ऑपरेशन की तैयारी। इसमें 10 अधिकारियों के लिए करीब 28 दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम भी शामिल है।

इस तरह के सिमुलेटर में हाई क्वालिटी थ्रीडी मैप, रियल टाइम सिमुलेशन, एआई आधारित दुश्मन का व्यवहार, मल्टी-प्लेयर सिस्टम और डेटा एनालिसिस जैसी सुविधाएं होती हैं। इसके साथ ही यह सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित होता है और सेना की सुरक्षा नीतियों के अनुसार डिजाइन किया जाता है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

इस सिमुलेटर में कई अधिकारी एक साथ जुड़कर अलग-अलग जिम्मेदारी निभाते हैं। कोई एयर ऑपरेशन संभालता है, तो कोई ग्राउंड सपोर्ट या नेवल सपोर्ट देखता है। सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी होता है, जो दुश्मन की तरफ से फैसले लेता है।

जब पूरा सिमुलेशन खत्म होता है, तो उसका विश्लेषण किया जाता है। इसमें यह बताया जाता है कि कहां गलती हुई और कैसे बेहतर रणनीति अपनाई जा सकती थी। इसे आफ्टर एक्शन रिव्यू कहा जाता है।

इस टेंडर के लिए बोली जमा करने की अंतिम तारीख 27 मार्च रखी गई है। इससे पहले 23 मार्च को प्री-बिड मीटिंग भी आयोजित की जाएगी। बिड में शामिल होने के लिए कंपनियों को कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। जैसे पिछले तीन साल में कम से कम 20 करोड़ रुपये का औसत टर्नओवर होना जरूरी है। हालांकि एमएसएमई और स्टार्टअप के लिए इसमें कुछ छूट दी गई है। (Computer Aided Wargaming Simulator)

यह टेंडर मेक इन इंडिया नीति के तहत जारी किया गया है। इसमें कम से कम 50 फीसदी लोकल कंटेंट अनिवार्य रखा गया है। यानी इस सिस्टम का बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा। इससे भारतीय कंपनियों को डिफेंस सेक्टर में काम करने का मौका मिलेगा और देश को तकनीक के मामले में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी।

इस सिस्टम के लिए सुरक्षा के कड़े नियम भी तय किए गए हैं। इसमें मैलिशियस कोड नहीं होना चाहिए और सभी डेटा पूरी तरह सुरक्षित होना चाहिए। सिस्टम को आईपीवी6 रेडी भी होना जरूरी है। इसके अलावा, अगर हार्ड डिस्क खराब होती है, तो उसे वापस नहीं लिया जाएगा, ताकि कोई संवेदनशील डेटा बाहर न जा सके।

इस सिमुलेटर के साथ दो साल की वारंटी दी जाएगी। इसके बाद तीन साल तक मेंटेनेंस का विकल्प भी रहेगा। इसमें सिस्टम की देखभाल और तकनीकी सहायता शामिल होगी। (Computer Aided Wargaming Simulator)

क्यों जरूरी है यह सिस्टम

आज के समय में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर और स्पेस जैसे क्षेत्रों तक फैल चुकी है। ऐसे में इस तरह के सिमुलेटर पर अभ्यास करने से अधिकारियों की फैसले लेने की क्षमता बेहतर होती है, गलतियां कम होती हैं और कम खर्च में ज्यादा ट्रेनिंग मिलती है। इस सिस्टम के जरिए वायुसेना के अधिकारी अलग-अलग युद्ध स्थितियों का बार-बार अभ्यास कर सकते हैं और अपनी रणनीति को मजबूत बना सकते हैं। (Computer Aided Wargaming Simulator)

US रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, भारत-पाक नहीं चाहते युद्ध, फिर भी खतरा बरकरार! आतंकियों को लेकर दी चेतावनी

India Pakistan Relations
AI Generated Image

India Pakistan Relations: अमेरिका की एक ताजा खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत और पाकिस्तान दोनों ही अब युद्ध नहीं चाहते हैं, लेकिन आतंकवादी गतिविधियां ऐसी परिस्थितियां बना रही हैं, जिससे कभी भी तनाव बढ़ सकता है।

यह रिपोर्ट अमेरिका के डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (डीएनआई) की सालाना थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट है, जिसे हाल ही में जारी किया गया। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि दोनों देश फिलहाल टकराव से बचना चाहते हैं, लेकिन जमीनी हालात पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

India Pakistan Relations: आतंकी हमले बन सकते हैं बड़े संकट की वजह

रिपोर्ट में खास तौर पर पिछले साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके में हुए आतंकी हमले का जिक्र किया गया है। इस हमले ने यह दिखाया कि कैसे एक आतंकी घटना दोनों देशों के बीच बड़े टकराव की वजह बन सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे हमले माहौल को अचानक बिगाड़ सकते हैं और दोनों देशों को आमने-सामने ला सकते हैं। यानी भले ही सरकारें युद्ध नहीं चाहतीं, लेकिन आतंकवादी संगठन हालात को खराब कर सकते हैं। (India Pakistan Relations)

परमाणु टकराव का खतरा अभी भी मौजूद

अमेरिकी रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में अभी भी परमाणु टकराव का खतरा बना हुआ है। दोनों देश परमाणु हथियार रखते हैं और पहले भी कई बार आमने-सामने आ चुके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जब भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। ऐसे में परमाणु युद्ध का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। (India Pakistan Relations)

पिछले तनाव में अमेरिका की भूमिका का जिक्र

रिपोर्ट में पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तनाव का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल से हालात को शांत करने में मदद मिली थी। जिसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस क्षेत्र के हालात पर नजर रखी जाती है और जरूरत पड़ने पर दखल दिया जाता है।

रिपोर्ट में दोनों देशों की सैन्य क्षमताओं पर भी बात की गई है। इसमें कहा गया है कि भारत नई और लंबी दूरी तक मार करने वाले परमाणु डिलीवरी सिस्टम पर काम कर रहा है।

वहीं पाकिस्तान भी अपने मिसाइल सिस्टम को लगातार बेहतर बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ऐसी मिसाइल तकनीक विकसित कर रहा है, जिससे वह दक्षिण एशिया से बाहर तक निशाना साध सके। (India Pakistan Relations)

आईसीबीएम को लेकर चिंता

अमेरिकी रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई है कि पाकिस्तान इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी आईसीबीएम बनाने की दिशा में काम कर सकता है। यह ऐसी मिसाइल होती है जिसकी रेंज 5,500 किलोमीटर से ज्यादा होती है। अगर ऐसा होता है, तो यह क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से भी अहम मामला बन सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ भारत और पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि कई अन्य देश भी अपने हथियारों को आधुनिक बना रहे हैं। चीन, उत्तर कोरिया, रूस और पाकिस्तान जैसे देश नई तकनीक पर काम कर रहे हैं।

इन देशों में ऐसे सिस्टम डेवलप किए जा रहे हैं, जिनकी रेंज ज्यादा है और जिन्हें पकड़ना या रोकना पहले से ज्यादा मुश्किल हो सकता है। (India Pakistan Relations)

नई तकनीक से बढ़ी चुनौती

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आजकल ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित हो रही है, जिसे डुअल-यूज टेक्नोलॉजी कहा जाता है। इसका मतलब है कि इनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों कामों में हो सकता है।

ऐसी तकनीक के कारण यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन-सी चीज सैन्य इस्तेमाल के लिए बनाई जा रही है और कौन-सी सामान्य इस्तेमाल के लिए। (India Pakistan Relations)

ड्रग्स और केमिकल सप्लाई पर भी चिंता

इस रिपोर्ट में अवैध ड्रग्स के कारोबार का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि चीन और भारत फेंटेनाइल जैसे खतरनाक ड्रग्स के प्रीकर्सर केमिकल और मशीनों के प्रमुख सोर्स बने हुए हैं।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत ने इस दिशा में अपनी कार्रवाई तेज की है। भारत ने काउंटर-नार्कोटिक्स यानी नशे के खिलाफ अभियान को मजबूत किया है। (India Pakistan Relations)

भारत-अमेरिका सहयोग बढ़ाने के संकेत

जनवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य भारतीय अधिकारियों ने अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई थी। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देश इस समस्या को मिलकर हल करना चाहते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई के बावजूद ड्रग तस्कर नए तरीके अपनाकर कानून से बच निकल रहे हैं। खासकर मेक्सिको के तस्कर गलत लेबल लगाकर या बिना नियंत्रण वाले केमिकल खरीदकर सिस्टम को चकमा दे रहे हैं। (India Pakistan Relations)

इजरायल ने नहीं दिया Iron Dome, तो अब यूक्रेन खुद बना रहा घातक एयर डिफेंस सिस्टम

Ukraine Air Defence Shield
AI Image

Ukraine Air Defence Shield: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन अब अपनी सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठा रहा है। यूक्रेन एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहा है, जो इजरायल के आयरन डोम की तरह काम करेगा। इस सिस्टम का मुख्य उद्देश्य दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और बमों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट करना है।

यूक्रेन को यह सिस्टम खुद डिजाइन करना पड़ रहा है, क्योंकि इजरायल ने अपना आयरन डोम सिस्टम साझा नहीं किया था। ऐसे में यूक्रेन ने अपनी जरूरतों के अनुसार एक नया सिस्टम बनाने का काम शुरू किया है।

Ukraine Air Defence Shield: बड़ी चुनौती- यूक्रेन का विशाल क्षेत्र

यूक्रेन के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका बड़ा क्षेत्रफल है। यूक्रेन का क्षेत्रफल इजरायल से लगभग 30 गुना बड़ा है। ऐसे में पूरे देश को कवर करने के लिए एक बहुत बड़े और मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क की जरूरत है।

यूक्रेन का कुल क्षेत्रफल लगभग 2,33,000 स्क्वायर माइल है, जिसमें से करीब 20 फीसदी हिस्सा अभी भी रूस के कब्जे में है। इस बड़े इलाके की सुरक्षा करना किसी भी देश के लिए आसान नहीं है। (Ukraine Air Defence Shield)

रूस के लगातार हमलों ने बढ़ाई जरूरत

यूक्रेन पर लगातार ड्रोन, मिसाइल और बम हमले हो रहे हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के अनुसार, सिर्फ एक हफ्ते में रूस ने 1,770 सुसाइड ड्रोन, 1,530 हवाई बम और 86 मिसाइलें दागीं।

इन लगातार हमलों के कारण यूक्रेन को अपनी एयर डिफेंस क्षमता को तेजी से बढ़ाना पड़ रहा है। रूस की रणनीति यह है कि वह एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइलें भेजकर यूक्रेन के डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड कर दे। (Ukraine Air Defence Shield)

ड्रोन आने से पहले ही नष्ट करने की तैयारी

यूक्रेन का नया एयर डिफेंस सिस्टम इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह खतरे को आने से पहले ही खत्म कर दे। यूक्रेन के अधिकारियों के अनुसार, यह सिस्टम केवल प्रतिक्रिया नहीं करेगा, बल्कि पहले से ही खतरे को पहचानकर उसे रोक देगा।

इस साल जनवरी में यूक्रेन ने इस मिशन के लिए पाव्लो येलिजारोव को एयर फोर्स का डिप्टी कमांडर नियुक्त किया था। उन्हें इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी गई है।

येलिजारोव ने कहा कि उनका लक्ष्य “एंटी-ड्रोन डोम” बनाना है, जो दुश्मन के ड्रोन को उनके लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट कर दे। (Ukraine Air Defence Shield)

कैसे काम करेगा यह एयर डिफेंस सिस्टम

यूक्रेन के इस सिस्टम में कई तकनीकें शामिल होंगे। जैसे इसमें रडार, एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और इंटरसेप्टर ड्रोन शामिल होंगे।

रडार सिस्टम दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों का पता लगाएगा। इसके बाद मिसाइल या इंटरसेप्टर ड्रोन उन्हें हवा में ही नष्ट करने की कोशिश करेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम दुश्मन के ड्रोन के कम्युनिकेशन और नेविगेशन को बाधित करेगा। (Ukraine Air Defence Shield)

इंटरसेप्टर ड्रोन बने सबसे प्रभावी हथियार

यूक्रेन ने इंटरसेप्टर ड्रोन पर खास जोर दिया है। ये छोटे ड्रोन दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही टकराकर या हमला करके गिरा सकते हैं। यूक्रेन के अनुसार, इंटरसेप्टर ड्रोन का इस्तेमाल करने वाली मोबाइल एंटी-एयर यूनिट्स करीब 50 प्रतिशत तक दुश्मन के ड्रोन को मार गिराने में सफल हो रही हैं। यह सफलता जमीन पर लगे एंटी-एयर सिस्टम और हेलीकॉप्टर से भी ज्यादा मानी जा रही है।

पश्चिमी हथियारों पर पूरी निर्भरता नहीं

यूक्रेन इस सिस्टम को पूरी तरह पश्चिमी देशों के महंगे हथियारों पर आधारित नहीं रखना चाहता। यूक्रेन के पास पैट्रियट और आईरिस-टी जैसे सिस्टम हैं, लेकिन ये महंगे हैं और पूरे देश को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए यूक्रेन अपने घरेलू संसाधनों और तकनीक के आधार पर यह सिस्टम बना रहा है, ताकि इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके। (Ukraine Air Defence Shield)

इजरायल से प्रेरणा, लेकिन सहयोग नहीं

यूक्रेन ने इस सिस्टम के लिए इजरायल के आयरन डोम से प्रेरणा ली है। लेकिन इजरायल ने 2022 में यूक्रेन को यह सिस्टम देने से इनकार कर दिया था। इजरायल का कहना था कि अगर यह तकनीक गलत हाथों में चली गई, तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। इजराइल ने यूक्रेन को आयरन डोम इसलिए नहीं दिया था, क्योंकि उसे डर था कि यह तकनीक ईरान के हाथ लग सकती है। हालांकि इजरायल ने यूक्रेन को एक अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूर दिया, जिससे हमलों की पहले जानकारी मिल सके।

इसके अलावा इजरायल रूस के साथ अपने संबंधों को भी ध्यान में रखकर फैसले लेता है। इजराइल में बड़ी संख्या में रूसी मूल के लोग रहते हैं, इसलिए वह रूस के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता।

लेकिन अब हालात यह हैं कि इजरायल खुद यूक्रेन की ड्रोन इंटरसेप्टर तकनीक में रुचि दिखा रहा है। (Ukraine Air Defence Shield)

यूक्रेन की तकनीक में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी

यूक्रेन द्वारा बनाए गए इंटरसेप्टर ड्रोन और अन्य तकनीकों में अब कई देश दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के देश इस तकनीक को ध्यान से देख रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब की कंपनी सऊदी अरामको भी इन ड्रोन को खरीदने पर विचार कर रही है। हालांकि यूक्रेन की कंपनी वाइल्ड हॉर्नेट्स, जो “स्टिंग” इंटरसेप्टर ड्रोन बनाती है, ने इन खबरों से इनकार किया है। कंपनी का कहना है कि वह अभी अपने देश की सेना की जरूरत भी पूरी नहीं कर पा रही है। (Ukraine Air Defence Shield)

युद्ध के बीच डेवलप हो रहा सिस्टम

यूक्रेन का यह एयर डिफेंस सिस्टम ऐसे समय में तैयार किया जा रहा है, जब देश लगातार युद्ध का सामना कर रहा है। यूक्रेन के पास न तो इजरायल जैसा तैयार सिस्टम है और न ही उसके पास कोई ब्लूप्रिंट है। इसके अलावा उसकी फ्रंटलाइन करीब 1,000 किलोमीटर लंबी है। इसके बावजूद यूक्रेन अपने अनुभव और युद्ध में सीखी गई तकनीकों के आधार पर यह सिस्टम बना रहा है। (Ukraine Air Defence Shield)

ड्रोन ने बदला युद्ध का स्वरूप

इस युद्ध ने यह भी दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो गई है। ड्रोन का इस्तेमाल न केवल हमले के लिए बल्कि निगरानी और इंटरसेप्शन के लिए भी किया जा रहा है। यूक्रेन अब ड्रोन को केवल हमला करने का हथियार नहीं, बल्कि रक्षा प्रणाली का हिस्सा बना रहा है। (Ukraine Air Defence Shield)

क्या इजरायल-ईरान जंग में कूदेगा पाकिस्तान? तेहरान को सऊदी की कड़ी चेतावनी के बाद क्यों छूटे शहबाज शरीफ के पसीने?

Saudi Arabia Iran Conflict
AI Image

Saudi Arabia Iran Conflict: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने इजरायल के साथ अपने उस पड़ोसियों पर भी जमकर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए, जिनकी सीमा ईरान से लगती थी। लेकिन इनमें से केवल पाकिस्तान ही अकेला एक ऐसा देश था, जिसकी सीमा ईरान से लगने के बावजूद ईरान ने उस पर कोई हमला नहीं किया। लेकिन अब पाकिस्तान का रोल नजर आने लगा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव जिस तरह से अब और गंभीर होता नजर आ रहा है। और सऊदी अरब ने साफ तौर पर कहा है कि अगर ईरान की ओर से हमले नहीं रुके, तो वह सैन्य जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इस बयान के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है और खासकर पाकिस्तान को लेकर कई देशों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

Saudi Arabia Iran Conflict: रियाद में हुई अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक

हाल ही में रियाद में ईरानी हमलों को लेकर अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में कतर, अजरबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्किये और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। मंत्रियों ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से ईरान के जानबूझकर किए गए हमलों की निंदा की, जिनमें रिहायशी इलाकों, सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें तेल की फैसिलिटी, डीसेलिनेशन प्लांट, एयरपोर्ट, रिहायशी इमारतें और डिप्लोमैटिक जगहों को निशाना बनाया गया। (Saudi Arabia Iran Conflict)

बैठक में मंत्रियों ने यूनाइटेड नेशंस चार्टर के आर्टिकल (51) के अनुसार देशों के खुद का बचाव करने के अधिकार पर भी जोर दिया। साथ ही मंत्रियों ने ईरान से तुरंत अपने हमले रोकने और तनाव को खत्म करने, इलाके में सुरक्षा और स्थिरता पाने और संकट को हल करने के तरीके के तौर पर डिप्लोमेसी को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले इंटरनेशनल कानून, इंटरनेशनल मानवीय कानून और अच्छे पड़ोसी के सिद्धांतों का सम्मान करने की जरूरत पर जोर दिया। (Saudi Arabia Iran Conflict)

रियाद बैठक के बाद सऊदी अरब का सख्त संदेश

इस बैठक के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने कहा कि वह इस तरह के हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करेगा। सऊदी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि ईरान अपने पड़ोसियों पर दबाव बनाने के लिए हमले कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब अब झुकने वाला नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो सैन्य कदम उठाए जा सकते हैं।

इसके अलावा, बैठक में यह भी कहा गया कि ईरान को अपने सहयोगी मिलिशिया ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करना चाहिए। आरोप लगाया गया कि ईरान इन ग्रुप्स को फंडिंग, हथियार और ट्रेनिंग देकर क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

समुद्री सुरक्षा पर भी जताई चिंता

बैठक में समुद्री सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदब जैसे अहम समुद्री रास्तों को लेकर कहा गया कि इन्हें बंद करने या बाधित करने की कोई भी कोशिश वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

पाकिस्तान की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान की भूमिका को लेकर हो रही है। दरअसल, पिछले साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इस नाटो स्टाइल समझौते में दोनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। इस डिफेंस पैक्ट के बाद पाकिस्तान को मध्य पूर्व में एक तरह से “सिक्योरिटी गारंटर” यानी सुरक्षा देने वाला देश माना जाने लगा है और इससे अरब-इस्लामिक देशों के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

लेकिन अब हालात बदल गए हैं। जब ईरान ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए, तो इस समझौते की वजह से पाकिस्तान के सामने बड़ी कूटनीतिक मुश्किल खड़ी हो गई है।

इसका कारण यह है कि समझौते के मुताबिक अगर सऊदी अरब पर बड़ा हमला होता है, तो पाकिस्तान को उसका साथ देना पड़ सकता है, जबकि पाकिस्तान के ईरान के साथ भी संबंध हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)

रियाद बैठक में पाकिस्तान की मौजूदगी

रियाद में हुई बैठक में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है कि पाकिस्तान इस मामले में क्या रुख अपनाएगा।

हाल के दिनों में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच संपर्क भी बढ़ा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने भी रियाद का दौरा किया था।

इन मुलाकातों को इस पूरे संकट से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस मामले में कोई स्पष्ट सैन्य रुख नहीं अपनाया है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

म्यूचुअल डिफेंस समझौते का असर

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए यह स्थिति काफी जटिल है। एक तरफ उसका सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है, तो दूसरी तरफ उसके ईरान के साथ भी अच्छे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय की बड़ी आबादी भी रहती है, ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इस बीच कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अगर सऊदी अरब इस युद्ध में पूरी तरह शामिल होता है, तो वह अपने रक्षा समझौते को सक्रिय कर सकता है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब को सुरक्षा सहयोग दे सकता है। हालांकि इस तरह के दावों पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। (Saudi Arabia Iran Conflict)

हालांकि सऊदी अरब अब तक ईरान के साथ बातचीत करने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करता रहा है। इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया था कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बातचीत के दौरान सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते का मुद्दा उठाया था।

इशाक डार ने कहा कि “हमारा सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता है, और हमने यह बात ईरान को भी साफ तौर पर बता दी है।” इस पर ईरान की ओर से यह कहा गया कि सऊदी की जमीन का इस्तेमाल उनके खिलाफ हमले करने के लिए नहीं होना चाहिए, इस बारे में भरोसा दिया जाए। (Saudi Arabia Iran Conflict)

होर्मुज से आया पाकिस्तान का पहला जहाज

सऊदी अरब के साथ कूटनीतिक और रक्षा संबंधों के अलावा पाकिस्तान खाड़ी देशों पर तेल और गैस के लिए भी काफी हद तक निर्भर है।

इसी हफ्ते पाकिस्तान के झंडे वाला जहाज “कराची” (जिसे लोरेक्स भी कहा जाता है) होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला पहला ऐसा जहाज बना, जो गैर-ईरानी कच्चा तेल लेकर जा रहा था। इस जहाज का ट्रैकिंग सिस्टम यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम चालू था।

यह जहाज पाकिस्तान की सरकारी कंपनी नेशनल शिपिंग कॉरपोरेशन का है और इसमें जो तेल था, वह संयुक्त अरब अमीरात से आया था।

जानकारों का मानना है कि इस जहाज के सुरक्षित गुजरने के लिए पाकिस्तान ने संभवतः ईरान सरकार के साथ पहले से बातचीत की थी। (Saudi Arabia Iran Conflict)

तेल सप्लाई और वैश्विक असर

ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव का असर तेल सप्लाई पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है और यहां तनाव बढ़ने से बाजार पर असर दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण का असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर भी पड़ा है।

हालांकि, सऊदी अरब ने खाड़ी क्षेत्र से अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का इस्तेमाल करके इस समस्या से बचने की कोशिश की है। इस पाइपलाइन के जरिए वह होर्मुज को बायपास करके रोज करीब 40 लाख बैरल (4 मिलियन बैरल प्रति दिन) कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच पा रहा है। जबकि युद्ध शुरू होने से पहले सऊदी अरब लगभग 70 लाख बैरल प्रति दिन (7 मिलियन bpd) तेल निर्यात करता था, जिसमें से बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जाता था। (Saudi Arabia Iran Conflict)

अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति पर जोर

बैठक में शामिल देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय कानून के पालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए और किसी भी तरह की दखलअंदाजी से बचना चाहिए।

साथ ही यह भी कहा गया कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं और सभी देश इस दिशा में सहयोग जारी रखेंगे। (Saudi Arabia Iran Conflict)