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ऑपरेशन सिंदूर का असर! संसदीय समिति ने की डिफेंस रिसर्च बजट बढ़ाने की सिफारिश

Defence Reserch Budget India

Defence Reserch Budget India: देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनाने के लिए संसदीय समिति ने एक अहम सिफारिश की है। समिति ने कहा है कि आने वाले पांच सालों में रक्षा अनुसंधान और विकास यानी डिफेंस आर एंड डी बजट को धीरे-धीरे बढ़ाया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि आधुनिक और एडवांस तकनीकों में निवेश बढ़ाने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अगर भारत को आत्मनिर्भर बनना है और दुनिया के बड़े देशों के साथ तकनीकी स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है, तो डिफेंस आर एंड डी पर खर्च बढ़ाना होगा। (Defence Reserch Budget India)

Defence Reserch Budget India: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बजट में बढ़ोतरी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मौजूदा वर्ष में डिफेंस कैपिटल बजट में विशेष बढ़ोतरी की गई है। यह बढ़ोतरी ऑपरेशन सिंदूर के बाद की गई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए की गई है। समिति का कहना है कि केवल एक साल की बढ़ोतरी काफी नहीं है, बल्कि लगातार कई सालों तक निवेश बढ़ाने की जरूरत है। (Defence Reserch Budget India)

नई और एडवांस तकनीकों पर जोर

समिति ने कहा कि बढ़ा हुआ बजट खास तौर पर एडवांस और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में निवेश के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसमें नए तरह के हथियार, बेहतर डिजाइन और अधिक प्रभावी डिफेंस सिस्टम डेपलप करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

रिपोर्ट के अनुसार, पर्याप्त और स्थिर फंडिंग से देश में स्वदेशी तकनीकों का विकास तेज होगा और विदेशी आयात पर निर्भरता कम की जा सकेगी। (Defence Reserch Budget India)

डीआरडीओ का बढ़ाएं बजट

डीआरडीओ ने भी समिति को बताया कि पिछले कुछ वर्षों में आर एंड डी बजट में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसे और बढ़ाने की जरूरत है। खासकर कुल रक्षा बजट के प्रतिशत के रूप में इसे बढ़ाना जरूरी बताया गया है।

डीआरडीओ के प्रतिनिधियों ने कहा कि कई बड़े प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिनमें सेना का बजट भी शामिल होता है। उदाहरण के तौर पर एईडब्ल्यू एंड सी मार्क-2 प्रोजेक्ट, जिसकी लागत करीब 19,000 करोड़ रुपये है, उसमें से बड़ा हिस्सा वायुसेना के बजट से आता है।

समिति के अनुसार, डीआरडीओ अब भविष्य की एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है, जिसमें हाइपरसोनिक मिसाइल और नई पीढ़ी के फाइटर विमान शामिल हैं। अभी भारत पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) पर काम कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट के लिए भी तकनीक विकसित करने की योजना बनाई जा रही है। ये नए फाइटर जेट नेटवर्क आधारित होंगे और दूसरे सिस्टम व ग्राउंड प्लेटफॉर्म के साथ जुड़े रहेंगे। (Defence Reserch Budget India)

समिति का कहना है कि इस तरह की पहल जरूरी है ताकि भारत दुनिया में तेजी से बदल रही रक्षा तकनीकों के साथ कदम मिलाकर चल सके। इसके लिए समिति ने सुझाव दिया है कि नई और महत्वपूर्ण तकनीकों के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए अलग से बजट तय किया जाए, ताकि इन प्रोजेक्ट्स को समय पर और बेहतर तरीके से पूरा किया जा सके और पैसों की कमी बीच में रुकावट न बने।

समिति ने यह भी कहा कि सुपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल जैसी तकनीकों पर खास ध्यान देना चाहिए। यह मिसाइल बहुत तेज गति से चलती है और लॉन्च होने के बाद हवा में दिशा बदल सकती है, जिससे इसे पकड़ना और रोकना दुश्मन के लिए मुश्किल हो जाता है। यह भविष्य की लड़ाई में भारत की ताकत को बढ़ाने में मदद कर सकती है। (Defence Reserch Budget India)

समिति का मानना है कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और अब नेटवर्क आधारित और क्लाउड सिस्टम पर आधारित ऑपरेशन बढ़ रहे हैं। ऐसे में ग्लाइड मिसाइल जैसी स्वदेशी तकनीक विकसित करना जरूरी है, ताकि भारत की सैन्य तैयारी मजबूत हो।

इसके लिए समिति ने कहा है कि पर्याप्त फंडिंग, तय समयसीमा और बेहतर टेस्टिंग सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि इन प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। साथ ही, यह तकनीक भविष्य के फाइटर जेट और ड्रोन जैसे सिस्टम के साथ मिलकर काम करेगी और देश को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगी। (Defence Reserch Budget India)

अगले पांच साल में बड़ा लक्ष्य

समिति को यह भी जानकारी दी गई कि आने वाले वर्षों में रक्षा अनुसंधान बजट को कुल रक्षा बजट का लगभग 10 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जा सकता है। इसके लिए चरणबद्ध तरीके से निवेश बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है।

समिति ने यह भी सुझाव दिया कि आर एंड डी प्रोजेक्ट्स की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि संसाधनों का सही उपयोग हो सके और परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकें। (Defence Reserch Budget India)

रक्षा बजट 2026-27

रिपोर्ट में रक्षा बजट 2026-27 के आंकड़े भी सामने आए हैं। इस वर्ष रक्षा मंत्रालय को कुल लगभग 7.84 लाख करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। यह देश के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस बजट में रक्षा सेवाओं के लिए सबसे बड़ा हिस्सा रखा गया है। इसके अलावा पेंशन, पूंजीगत खर्च और अन्य प्रशासनिक खर्चों के लिए भी अलग-अलग राशि निर्धारित की गई है। (Defence Reserch Budget India)

कैपिटल और रेवेन्यू खर्च में बढ़ोतरी

रक्षा सेवाओं के लिए पूंजीगत खर्च यानी कैपिटल आउटले में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। यह पिछले साल की तुलना में करीब 25 फीसदी से अधिक है। इस खर्च का उपयोग नए हथियार, उपकरण और सैन्य प्लेटफॉर्म खरीदने के लिए किया जाता है।

वहीं राजस्व खर्च यानी रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में भी बड़ी राशि निर्धारित की गई है, जिससे सेना के रोजमर्रा के संचालन और रखरखाव की जरूरतें पूरी की जाती हैं। (Defence Reserch Budget India)

एमएसएमई और आत्मनिर्भरता पर असर

समिति ने कहा कि बढ़ा हुआ आर एंड डी बजट देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देगा। इससे एमएसएमई और स्टार्ट-अप को भी नई तकनीकों पर काम करने का मौका मिलेगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सरकार की नीति आत्मनिर्भर भारत को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है, जिससे देश में ही रक्षा उपकरणों का निर्माण बढ़े।

समिति ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य के युद्धों में तकनीक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान देना जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर समय पर निवेश किया गया और नई तकनीकों को अपनाया गया, तो देश की रक्षा क्षमता को और मजबूत किया जा सकता है। (Defence Reserch Budget India)

रक्षा मंत्री बोले- रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल युद्ध से लें सीख, भारत में बनें ड्रोन के सभी पार्ट्स

Drone Manufacturing India

Drone Manufacturing India: बदलते वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि भविष्य की लड़ाइयों में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम होने वाली है। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव से यह साफ हो गया है कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है और अब ड्रोन टेक्नोलॉजी एक प्रमुख हथियार बनती जा रही है।

रक्षा मंत्री नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित राष्ट्रीय रक्षा उद्योग सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में एमएसएमई, स्टार्ट-अप, रक्षा कंपनियां, वैज्ञानिक, नीति निर्माता और सेना से जुड़े अधिकारी शामिल हुए। (Drone Manufacturing India)

Drone Manufacturing India: ड्रोन निर्माण में आत्मनिर्भरता पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत को केवल ड्रोन बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके हर हिस्से में आत्मनिर्भर बनना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ड्रोन के मोल्ड, सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरी तक सब कुछ भारत में ही बनना चाहिए।

उन्होंने बताया कि दुनिया के कई देशों में ड्रोन बनाए जाते हैं, लेकिन उनके कई जरूरी पुर्जे अब भी चीन से आयात किए जाते हैं। ऐसे में भारत को इस निर्भरता से बाहर निकलना होगा और अपने स्तर पर पूरी सप्लाई चेन तैयार करनी होगी। (Drone Manufacturing India)

ग्लोबल ड्रोन हब बनने का लक्ष्य

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत को मिशन मोड में काम करते हुए आने वाले कुछ सालों में ड्रोन निर्माण का वैश्विक केंद्र बनना चाहिए। इसके लिए एक मजबूत ड्रोन प्रोडक्शन इकोसिस्टम तैयार करना जरूरी है, जिससे देश की सुरक्षा मजबूत होगी और रणनीतिक स्वतंत्रता भी बढ़ेगी।

उन्होंने निजी क्षेत्र, स्टार्ट-अप और एमएसएमई को इस दिशा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया और सरकार की ओर से हर संभव सहयोग का भरोसा दिया। (Drone Manufacturing India)

Drone Manufacturing India

iDEX और ADITI जैसे प्रोग्राम लॉन्च

कार्यक्रम के दौरान रक्षा मंत्री ने डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज (DISC-14) और ADITI चैलेंज के नए संस्करण लॉन्च किए। इसके तहत कुल 107 प्रोब्लेम डिस्क्रिप्शन जारी किए गए, जिनमें रक्षा बलों, कोस्ट गार्ड और डिफेंस स्पेस एजेंसी की जरूरतों को शामिल किया गया है।

इसके अलावा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की ओर से 101 नए इनोवेशन चैलेंज भी शुरू किए गए हैं, ताकि स्टार्ट-अप और एमएसएमई नई तकनीकों पर काम कर सकें। इन प्रोजेक्ट्स में कंपनियों को मेंटरशिप, टेस्टिंग सुविधाएं और सप्लाई चेन में शामिल होने के अवसर दिए जाएंगे। (Drone Manufacturing India)

डिफेंस इनोवेशन में तेजी

रक्षा मंत्री ने बताया कि आईडेक्स प्रोग्राम के जरिए अब तक सैकड़ों स्टार्ट-अप और इनोवेटर्स डिफेंस सेक्टर से जुड़े हैं। फरवरी 2026 तक करीब 676 स्टार्ट-अप और एमएसएमई इस इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं। 548 कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए हैं और 566 चैलेंज लॉन्च किए गए हैं।

इनमें से कई प्रोटोटाइप को सेना के लिए खरीद की मंजूरी भी मिल चुकी है और हजारों करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट साइन किए जा चुके हैं। इससे यह साफ होता है कि इनोवेशन अब धीरे-धीरे वास्तविक उत्पाद और तकनीक में बदल रहा है।

नई तकनीकों को अपनाने पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसी तकनीकें तेजी से विकसित हो रही हैं। ऐसे में एमएसएमई और स्टार्ट-अप को इन तकनीकों को अपनाना होगा।

उन्होंने ‘डिजिटल ट्विन’ जैसी तकनीक का भी जिक्र किया, जिसमें किसी असली सिस्टम का वर्चुअल मॉडल तैयार किया जाता है। इससे जटिल सिस्टम को समझने और बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है। (Drone Manufacturing India)

इंटीग्रेशन से बनेगा मजबूत इकोसिस्टम

रक्षा मंत्री ने कहा कि एमएसएमई को आगे बढ़ाने के लिए इंटीग्रेशन बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि यह दो तरह से हो सकता है, हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल इंटीग्रेशन। हॉरिजॉन्टल इंटीग्रेशन में अलग-अलग क्षेत्रों की कंपनियां एक-दूसरे के साथ जुड़कर काम करती हैं, जबकि वर्टिकल इंटीग्रेशन में छोटी कंपनियां बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर काम करती हैं और नई तकनीकों में विशेषज्ञता हासिल करती हैं। (Drone Manufacturing India)

सरकार की ओर से पूरा सहयोग

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार एमएसएमई को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठा रही है। इस साल के बजट में तीन स्तरों- इक्विटी, लिक्विडिटी और प्रोफेशनल सपोर्ट- पर काम किया जा रहा है, ताकि छोटे उद्योग तेजी से आगे बढ़ सकें।

उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से सरकार ने इस सेक्टर को लगातार प्राथमिकता दी है। उद्यम पोर्टल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए छोटे उद्योगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। (Drone Manufacturing India)

एमएसएमई सेक्टर में तेजी से बढ़ोतरी

रक्षा मंत्री ने बताया कि देश में एमएसएमई की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2012-13 में जहां इनकी संख्या करीब 4.67 करोड़ थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 8 करोड़ हो गई है। उन्होंने कहा कि स्टार्ट-अप नए विचारों के साथ समाज में बदलाव ला रहे हैं और कई कंपनियां कम समय में यूनिकॉर्न बन रही हैं। (Drone Manufacturing India)

डिफेंस इंडस्ट्री में सुधार के प्रयास

कार्यक्रम में रक्षा उत्पादन विभाग के सचिव संजीव कुमार ने बताया कि डिफेंस सेक्टर में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इसमें प्रक्रियाओं को आसान बनाना, गुणवत्ता सुधारना और टेस्टिंग सुविधाओं को मजबूत करना शामिल है। इसके साथ ही ‘सृजन दीप’ नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है, जिसमें 40 हजार से ज्यादा कंपनियों को जोड़ा गया है, ताकि रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा मिल सके। (Drone Manufacturing India)

यूक्रेन ने बनाया बिना GPS के टारगेट को हिट करने वाला स्मार्ट ड्रोन मुनिशन, AI की मदद से बिना सिग्नल करेगा हमला

AI Guided Drone Munitions
AI Guided Drone Munitions

AI Guided Drone Munitions: रूस-यूक्रेन वॉर में कई तरह के इनोवेशन देखे को मिल रहे हैं। इंटरसेप्टर ड्रोन के बाद यूक्रेन की डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी डेफ्टाक ने एक नई तरह की ड्रोन मुनिशन टेक्नोलॉजी पेश की है। खास बात यह है कि यह बिना जीपीएस के भी अपने टारगेट को सटीक तरीके से निशाना बना सकती है। इस नई तकनीक को “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गाइडेड ड्रोन मुनिशन्स” कहा जा रहा है। हाल ही में इसे बार “आर्सेनल ऑफ टैलेंट्स” डिफेंस एग्जिबिशन में शोकेस किया गया।

इसे बनाने वाली कंपनी डेफ्टाक के मुताबिक यह सिस्टम मौजूदा ड्रोन हथियारों से अलग है, क्योंकि इसमें ऐसा गाइडेंस सिस्टम लगाया गया है जो उड़ान के दौरान अपने रास्ते को खुद बदल सकता है और टारगेट को सटीक निशाना बना सकता है। (AI Guided Drone Munitions)

AI Guided Drone Munitions: कैसे काम करता है यह नया सिस्टम

इस नई मुनिशन में एक कैमरा, ऑनबोर्ड इलेक्ट्रॉनिक्स और एक वॉरहेड यानी विस्फोटक हिस्सा शामिल है। इसके साथ ही इसमें कंप्यूटर विजन आधारित सॉफ्टवेयर लगाया गया है। यह तकनीक ड्रोन को उड़ान के दौरान लक्ष्य की पहचान करने और उसी के अनुसार अपनी दिशा बदलने की क्षमता देती है।

सामान्य तौर पर पारंपरिक बम या प्रोजेक्टाइल एक तय रास्ते पर चलते हैं और लॉन्च होने के बाद उनका रास्ता बदला नहीं जा सकता। लेकिन डेफ्टाक का यह सिस्टम उड़ान के दौरान अपने ट्रैजेक्टरी यानी रास्ते को एडजस्ट कर सकता है, जिससे टारगेट पर सटीकता बढ़ जाती है। (AI Guided Drone Munitions)

बिना जीपीएस के भी काम करने की क्षमता

इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि यह जीपीएस के बिना भी काम कर सकती है। मौजूदा समय में युद्ध के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के जरिए जीपीएस सिग्नल को जाम किया जाता है, जिससे कई ड्रोन और मिसाइल सिस्टम प्रभावित हो जाते हैं।

ऐसे माहौल में डेफ्टाक की यह टेक्नोलॉजी कंप्यूटर विजन के जरिए टारगेट को पहचानती है और उसी के आधार पर हमला करती है। इससे यह सिस्टम जीपीएस जामिंग के बावजूद भी काम करता रहता है। (AI Guided Drone Munitions)

कई तरह के ड्रोन पर इस्तेमाल की तैयारी

कंपनी ने बताया कि शुरुआत में इस मुनिशन को मल्टीरोटर ड्रोन यानी क्वाडकॉप्टर पर इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह रिकॉन्सेप्ट क्वाडकॉप्टर्स को प्रिसिजन किलिंग मशीन्स में बदल देता है, इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी काम करता है अब इसे फिक्स्ड-विंग यूएवी यानी लंबे समय तक उड़ने वाले ड्रोन प्लेटफॉर्म पर भी लगाने की तैयारी की जा रही है।

इसके अलावा कंपनी एक लेजर-गाइडेड वर्जन पर भी काम कर रही है, जिसमें टारगेट पर लेजर से निशान लगाकर उसे और ज्यादा सटीक तरीके से हिट किया जा सकेगा। (AI Guided Drone Munitions)

रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम की कॉम्बैट टेस्टिंग पहले ही की जा चुकी है। अब कंपनी यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के साथ औपचारिक कॉन्ट्रैक्ट और कोडिफिकेशन प्रक्रिया की तैयारी कर रही है। कोडिफिकेशन एक प्रक्रिया होती है, जिसमें किसी नए हथियार या सिस्टम को आधिकारिक रूप से मिलिट्री इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी जाती है। (AI Guided Drone Munitions)

कम लागत में ज्यादा असर

डेफ्टाक को 2025 में यूरोप के डिफेंस फंड डार्कस्टार से करीब 6.5 लाख डॉलर का निवेश मिला था। निवेशकों के अनुसार, यह सिस्टम पारंपरिक गाइडेड मुनिशन्स की तुलना में काफी सस्ता है।

बताया गया है कि इसकी लागत पारंपरिक सिस्टम की तुलना में लगभग 10 गुना तक कम हो सकती है, जबकि इसकी सटीकता काफी उच्च स्तर की बनी रहती है। (AI Guided Drone Munitions)

डिफेंस टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव

यूक्रेन में चल रहे युद्ध के बीच डिफेंस टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। खास तौर पर ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम्स का उपयोग बढ़ रहा है। इसी दिशा में कई कंपनियां नए प्रयोग कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ ड्रोन को अब काउंटर-यूएवी यानी दुश्मन के ड्रोन को रोकने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे FP-1 ड्रोन, जिसे पहले लंबी दूरी के हमलों के लिए बनाया गया था, अब उसे इस तरह बदला जा रहा है कि वह एंटी-एयरक्राफ्ट हथियार ले जा सके और साथ ही इंटरसेप्टर FPV ड्रोन लॉन्च कर सके, ताकि दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोका जा सके।

“आर्सेनल ऑफ टैलेंट्स” नाम के डिफेंस इवेंट में इस सिस्टम को पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाया गया। इस कार्यक्रम में कई नई डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अपने उत्पाद पेश किए। डेफ्टाक के इस सिस्टम को खास तौर पर इसलिए ध्यान मिला क्योंकि यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार विकसित किया गया है, जहां जीपीएस जामिंग और इलेक्ट्रॉनिक हमले आम हो गए हैं। (AI Guided Drone Munitions)

रूस की खुफिया जानकारी से खुले थे ‘म्यामांर ड्रोन केस’ के राज, जिसके बाद हत्थे चढ़े एक अमेरिकी और 6 यूक्रेनी

Myanmar Drone Case- 6 Ukrainians and 1 US Citizen Booked Under UAPA in Major Terror Conspiracy Probe
NIA just caught US mercenary Matthew VanDyke

Myanmar Drone Case: हाल ही में म्यामांर ड्रोन केस में बड़ा खुलासा हुआ है। पकड़े गए एक अमेरिकी और 6 यूक्रेनी नागरिकों की खुफिया जानकारी रूस की तरफ से मिली थी। इस जानकारी के आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने 6 यूक्रेनी नागरिकों और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया। इन सभी पर आरोप है कि वे म्यांमार में सक्रिय एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ड्रोन से जुड़ी ट्रेनिंग दे रहे थे और इस गतिविधि का असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता था।

मामले से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, रूस की एजेंसियों ने भारतीय एजेंसियों को इन लोगों की गतिविधियों के बारे में इनपुट साझा किया था। हालांकि इस खुफिया जानकारी का पूरी डिटेल सामने नहीं आई है। (Myanmar Drone Case)

Myanmar Drone Case: म्यांमार से जुड़ी गतिविधियों पर नजर

रिपोर्ट के अनुसार, इन सातों विदेशी नागरिकों की गतिविधियां साल 2024 से ही निगरानी में थीं। बताया गया है कि यह ग्रुप कई बार म्यांमार गया और वहां के एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ड्रोन वारफेयर, ड्रोन असेंबली और सिग्नल जैमिंग जैसी तकनीकों की ट्रेनिंग देता था।

इसके साथ ही यह भी सामने आया कि यूरोप से बड़ी मात्रा में ड्रोन और संबंधित उपकरण भारत के रास्ते म्यांमार पहुंचाए गए। यह मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जिन ग्रुप्स को ट्रेनिंग दी जा रही थी, उनके भारत के उत्तर-पूर्व में सक्रिय उग्रवादी संगठनों से संपर्क होने की आशंका जताई गई है। (Myanmar Drone Case)

तीन महीने से चल रही थी ट्रैकिंग

सूत्रों के अनुसार, एनआईए और अन्य सुरक्षा एजेंसियां पिछले लगभग तीन महीने से इस पूरे नेटवर्क पर नजर रख रही थीं। खास तौर पर मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे सीमावर्ती इलाकों में गतिविधियों को ट्रैक किया जा रहा था।

रूस से मिली जानकारी ने इस जांच को निर्णायक मोड़ मिला। इसके बाद 13 मार्च को एक कॉर्डिनेटेड ऑपरेशन चलाया गया, जिसमें दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता एयरपोर्ट पर एक साथ कार्रवाई करते हुए सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। (Myanmar Drone Case)

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान

गिरफ्तार किए गए लोगों में अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन वैन डाइक और छह यूक्रेनी नागरिक शामिल हैं। इन सभी ने भारत में वैध टूरिस्ट वीजा पर प्रवेश किया था, लेकिन बाद में आवश्यक परमिट के बिना मिजोरम जैसे प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहुंच गए।

जांच एजेंसियों का कहना है कि यह समूह भारत को एक ट्रांजिट रूट की तरह इस्तेमाल कर म्यांमार में प्रवेश करता था, जहां पहले से तय ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। (Myanmar Drone Case)

ड्रोन ट्रेनिंग और सप्लाई के आरोप

एनआईए के अनुसार, यह समूह केवल ट्रेनिंग ही नहीं दे रहा था, बल्कि ड्रोन और उससे जुड़े उपकरणों की सप्लाई में भी शामिल था। आरोप है कि ये लोग ड्रोन ऑपरेशन, असेंबली और सिग्नल जैमिंग जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी की जानकारी दे रहे थे।

जांच के दौरान यह भी बताया गया कि इन गतिविधियों का सीधा असर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है, क्योंकि इससे देश के भीतर सक्रिय प्रतिबंधित संगठनों को तकनीकी सहायता मिल सकती थी। (Myanmar Drone Case)

गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों को विशेष एनआईए कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उन्हें 11 दिनों की एनआईए कस्टडी में भेज दिया है, जहां उनसे आगे पूछताछ की जा रही है। एनआईए ने कोर्ट को बताया कि आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है, ताकि उनके नेटवर्क और संपर्कों के बारे में और जानकारी जुटाई जा सके।

अधिकारियों का कहना है कि रूस ने केवल इन लोगों की गतिविधियों से जुड़ी सामान्य जानकारी साझा की थी, जिससे जांच एजेंसियों को दिशा मिली। सूत्रों का कहना है कि रूस म्यांमार की मिलिट्री जुंटा का समर्थक है, इसलिए वह उन एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स पर नजर रखता है जो जुंटा के खिलाफ लड़ रहे हैं। ये ग्रुप्स खासकर यूक्रेन युद्ध से जुड़े वेटरन्स की ट्रेनिंग पर रूस लगाताार नजर रख रहा था। इसके अलावा, गिरफ्तार अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैन डाइक के सोशल मीडिया पोस्ट्स में “Russia, we are coming for you” जैसी बातें भी सामने आई थीं, जिसके बाद से वह पहले से ही रूस की नजर में था। (Myanmar Drone Case)

अन्य संदिग्धों की तलाश जारी

जांच एजेंसियों को यह भी जानकारी मिली है कि यह समूह 14 लोगों के एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। फिलहाल बाकी लोगों के बारे में पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वे अभी म्यांमार में हैं या कहीं और चले गए हैं।

इसके अलावा भारतीय एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि इन विदेशी नागरिकों को भारत के भीतर किसने मदद की और किस तरह से उन्होंने सीमावर्ती इलाकों में प्रवेश किया। (Myanmar Drone Case)

इस मामले के सामने आने के बाद यूक्रेन ने अपने नागरिकों की गिरफ्तारी पर औपचारिक आपत्ति जताई है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं अमेरिका ने भी मामले की जानकारी होने की बात कही है, लेकिन ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार किया है।

भारत की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, क्योंकि जांच जारी है। (Myanmar Drone Case)

संसदीय समिति का बड़ा सुझाव, चीन से मुकाबले के लिए भारत को चाहिए छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट

Sixth Generation Fighter India
Sixth Generation Fighter India: Parliamentary Panel Calls for Roadmap to Boost Air Power (Photo: IAF)

Sixth Generation Fighter India: देश की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए संसद की स्थायी समिति ने बड़ा सुझाव दिया है। रक्षा मामलों से जुड़ी इस समिति ने कहा है कि भारत को अब छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट यानी सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट के डेवलपमेंट के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार करना चाहिए।

लोकसभा में पेश की गई और राज्यसभा में भी रखी गई इस रिपोर्ट में समिति ने कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और इसमें एयर पावर की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में भारत को केवल पुराने सिस्टम को अपग्रेड करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भविष्य की तकनीक पर काम शुरू करना चाहिए। (Sixth Generation Fighter India)

Sixth Generation Fighter India: नई पीढ़ी के युद्ध की जरूरतों पर जोर

31 सदस्यों वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब आज के समय में युद्ध केवल जमीन या समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक मल्टी-डोमेन यानी कई क्षेत्रों में एक साथ लड़ा जा रहा है। इसमें हवा, अंतरिक्ष और साइबर जैसे क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं।

इसलिए भविष्य के फाइटर एयरक्राफ्ट ऐसे होने चाहिए, जो इन सभी क्षेत्रों में काम कर सकें। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिक्स्थ जेनरेशन एयरक्राफ्ट में एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और मैनड-अनमैनड टीमिंग जैसी क्षमताएं शामिल होंगी। (Sixth Generation Fighter India)

कई देश बनाने में जुटे

दुनिया के कई बड़े देश पहले से ही छठी पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने पर काम कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स का मकसद भविष्य के युद्ध को ध्यान में रखते हुए नई तकनीक विकसित करना है।

समिति ने कहा कि भारत को भी इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए ताकि वह वैश्विक स्तर पर पीछे न रह जाए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत इस समय यूरोप के कुछ देशों के साथ इस विषय पर बातचीत कर रहा है। (Sixth Generation Fighter India)

यूरोपीय कंसोर्टियम से जुड़ने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, भारत दो बड़े यूरोपीय समूहों में से किसी एक के साथ जुड़ने पर विचार कर रहा है। एक समूह में ब्रिटेन, इटली और जापान शामिल हैं, जबकि दूसरे में फ्रांस और जर्मनी शामिल हैं।

इन दोनों समूहों द्वारा सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट डेवलप किए जा रहे हैं। भारत इन प्रोजेक्ट्स में भागीदारी के जरिए तकनीक हासिल करने और उत्पादन में हिस्सेदारी चाहता है।

सूत्रों के अनुसार, भारत ने फ्रांस के साथ फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम में संभावित भागीदारी को लेकर शुरुआती स्तर पर बातचीत शुरू की है। यह एक अगली पीढ़ी का एयर कॉम्बैट प्रोग्राम है, जिसे फ्रांस जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर डेवलप कर रहा है। भारत इस सहयोग में खास तौर पर को-डेवलपमेंट यानी संयुक्त विकास और को-प्रोडक्शन यानी संयुक्त उत्पादन पर जोर दे रहा है।

यह कार्यक्रम दसॉ एविएशन, एयरबस और स्पेन की डिफेंस कंपनी इंद्रा के कंसोर्टियम पर आधारित है। हालांकि इस प्रोजेक्ट में फ्रांस और जर्मनी के बीच काम के बंटवारे और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर कुछ मतभेद भी सामने आए हैं। (Sixth Generation Fighter India)

स्वदेशी फाइटर प्रोग्राम पर भी काम जारी

इसी बीच भारत अपने स्वदेशी फाइटर जेट प्रोग्राम पर भी काम कर रहा है। एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए प्रोजेक्ट भारत का पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारत एक स्वदेशी इंजन डेवलप करने की दिशा में भी काम कर रहा है। फ्रांस की कंपनी के साथ मिलकर 110 से 120 किलो न्यूटन क्षमता का इंजन डेवलप करने को लेकर बातचीत चल रही है। जिसका इस्तेमाल इन स्वदेशी फाइटर जेट्स में किया जाएगा। (Sixth Generation Fighter India)

यह इंजन एएमसीए के भविष्य के वर्जन में इस्तेमाल किया जाएगा। इस सहयोग में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर यानी तकनीक का पूरा हस्तांतरण भी शामिल हो सकता है, जिससे भारत की विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी।

भारतीय वायुसेना की योजना है कि वह इन पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के कुल छह स्क्वाड्रन शामिल करेगी और उन्हें साल 2035 से तैनात किया जाएगा। (Sixth Generation Fighter India)

भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी पहले से बढ़ी

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय वायुसेना की जिम्मेदारी अब पहले से ज्यादा बढ़ गई है। अब वायुसेना को केवल पारंपरिक हमलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि उसे अंतरिक्ष और अन्य नए क्षेत्रों में भी काम करना होगा।

रिपोर्ट में कहा गया कि वायुसेना को “नियर स्पेस” यानी पृथ्वी के ऊपर के उस हिस्से में भी क्षमता डेवलप करनी चाहिए, जहां से निगरानी और सुरक्षा कार्य किए जा सकते हैं।

इसके लिए समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि वायुसेना को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वह आधुनिक तकनीक से लैस हो सके। (Sixth Generation Fighter India)

जॉइंट मिलिट्री स्ट्रक्चर पर भी जोर

समिति ने यह भी कहा कि भविष्य के युद्ध में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा। इसलिए संयुक्त सैन्य ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है।

रिपोर्ट में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ को और मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त फंड देने की सिफारिश की गई है, ताकि तीनों सेनाएं मिलकर बेहतर योजना और संचालन कर सकें। (Sixth Generation Fighter India)

चीन बना चुका है पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि अन्य देश तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहे हैं। चीन भी अपने सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर जेट पर काम कर रहा है और उसने इसके कुछ विजुअल्स भी जारी किए हैं।

इसके अलावा चीन के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट पहले से ही तैयार हैं और उन्हें अन्य देशों के साथ साझा करने की चर्चा भी चल रही है।

ऐसे माहौल में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी एयर पावर को मजबूत बनाए और नई तकनीकों को अपनाए। (Sixth Generation Fighter India)

पहली बार प्राइवेट कंपनी ने किया पिनाका MBRL का सफल ट्रायल, पोखरण में 24 रॉकेट्स दाग कर दिखाई ताकत

Pinaka Rocket Trials

Pinaka Rocket Trials: नागपुर स्थित सोलर इंडस्ट्रीज ने राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में पिनाका एक्सटेंडेड रेंज रॉकेट्स का सफल परीक्षण किया है। यह पहली बार है जब किसी प्राइवेट कंपनी ने प्रोडक्शन लेवल पर पिनाका रॉकेट्स का प्रूफ ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया है।

कंपनी के मुताबिक, इस परीक्षण में कुल 24 एन्हांस्ड पिनाका रॉकेट्स को फायर किया गया। इन सभी रॉकेट्स ने अपने निर्धारित टारगेट को सटीकता के साथ भेदा। ट्रायल के दौरान रॉकेट्स की एक्यूरेसी, कंसिस्टेंसी और लेथैलिटी यानी घातक क्षमता का परीक्षण किया गया, जिसमें उन्होंने बेहतर प्रदर्शन दिखाया। (Pinaka Rocket Trials)

Pinaka Rocket Trials: फील्ड कंडीशंस में शानदार प्रदर्शन

यह परीक्षण पोखरण के कठिन फील्ड कंडीशंस में किया गया, जहां तेज गर्मी, धूल और हवा जैसी परिस्थितियां मौजूद रहती हैं। इन सभी चुनौतियों के बावजूद रॉकेट्स ने अपने टारगेट को सटीक तरीके से हिट किया। कंपनी ने बताया कि रॉकेट्स का प्रदर्शन “एक्सेप्शनली गुड” रहा।

इस ट्रायल को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह प्रोडक्शन लॉट्स का परीक्षण था, यानी बड़े पैमाने पर बनाए गए रॉकेट्स को फील्ड में परखा गया। (Pinaka Rocket Trials)

क्या है पिनाका रॉकेट सिस्टम

पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है, जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम एक साथ कई रॉकेट फायर करने की क्षमता रखता है, जिससे दुश्मन के बड़े इलाके को कम समय में निशाना बनाया जा सकता है।

पिनाका के शुरुआती वर्जन की रेंज करीब 40 किलोमीटर तक थी, लेकिन अब इसके एक्सटेंडेड रेंज और एन्हांस्ड वर्जन में यह दूरी बढ़कर लगभग 75 से 90 किलोमीटर तक पहुंच गई है। कुछ गाइडेड वर्जन में यह रेंज 120 किलोमीटर तक भी बताई जाती है।

एक पिनाका लॉन्चर बहुत कम समय में कई रॉकेट दाग सकता है, जिससे युद्ध के मैदान में तेजी से जवाबी कार्रवाई संभव होती है। इसकी सटीकता भी बेहतर मानी जाती है, जिससे लक्ष्य को सही तरीके से निशाना बनाया जा सकता है। (Pinaka Rocket Trials)

प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी

अब तक पिनाका रॉकेट्स का उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों द्वारा किया जाता था, लेकिन अब प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। सोलर इंडस्ट्रीज की सहायक कंपनी ने डीआरडीओ से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर लेकर इन रॉकेट्स का निर्माण किया है।

कंपनी पहले भी परीक्षण कर चुकी है, लेकिन यह पहली बार है जब प्रोडक्शन स्तर के रॉकेट्स का सफल परीक्षण किया गया है। इससे यह साफ हो गया है कि प्राइवेट कंपनियां भी रक्षा उत्पादन में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

सोलर इंडस्ट्रीज को रक्षा मंत्रालय से करीब 6,084 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। इस ऑर्डर के तहत कंपनी को पिनाका एन्हांस्ड रेंज रॉकेट्स और एरिया डिनायल म्युनिशन्स की सप्लाई करनी है।

एरिया डिनायल म्युनिशन्स ऐसे हथियार होते हैं, जिनका उपयोग बड़े इलाके में दुश्मन की गतिविधियों को रोकने के लिए किया जाता है। इस ट्रायल के सफल होने के बाद अब बड़े पैमाने पर रॉकेट्स की सप्लाई का रास्ता साफ हो गया है। (Pinaka Rocket Trials)

पिनाका रेजिमेंट्स की संख्या बढ़ा रही भारतीय सेना  

पिनाका सिस्टम भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। सेना लगातार अपनी पिनाका रेजिमेंट्स की संख्या बढ़ा रही है। इन रेजिमेंट्स को देश की सीमाओं, खासकर संवेदनशील इलाकों में तैनात किया जा रहा है।

पिनाका की मदद से सेना लंबी दूरी से दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकती है। इसमें दुश्मन की आर्टिलरी, कमांड सेंटर और सप्लाई लाइन जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शामिल होते हैं। (Pinaka Rocket Trials)

आत्मनिर्भर भारत को मिला बढ़ावा

इस परीक्षण को आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पहल के तहत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से देश की उत्पादन क्षमता मजबूत हो रही है।

सोलर इंडस्ट्रीज पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय है। कंपनी ने पिनाका रॉकेट्स का निर्यात भी शुरू कर दिया है, जिससे भारत के रक्षा निर्यात को बढ़ावा मिला है। (Pinaka Rocket Trials)

समझें क्या है म्यांमार ड्रोन केस? जिसमें शामिल हैं 6 यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक, आतंकी साजिश से जुड़े तार

Myanmar Drone Case- 6 Ukrainians and 1 US Citizen Booked Under UAPA in Major Terror Conspiracy Probe
NIA just caught US mercenary Matthew VanDyke

Myanmar Drone Case: भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा करते हुए छह यूक्रेनी नागरिकों और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया है। इस मामले को “म्यांमार ड्रोन केस” कहा जा रहा है, जिसमें ड्रोन टेक्नोलॉजी, हथियार ट्रेनिंग और सीमा पार गतिविधियों से जुड़ी गंभीर साजिश के आरोप सामने आए हैं। इस पूरे मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए कर रही है।

एनआईए के मुताबिक यह मामला भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा हुआ है। एजेंसी ने इन सातों विदेशी नागरिकों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत केस दर्ज किया है। इस कानून के तहत आतंक से जुड़ी साजिशों पर सख्त कार्रवाई की जाती है। (Myanmar Drone Case)

Myanmar Drone Case: कौन हैं आरोपी और कैसे हुई गिरफ्तारी

जांच एजेंसी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए लोगों में एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक और छह यूक्रेनी नागरिक शामिल हैं। जिनके नाम पेट्रो हुरबा, तारास स्लिवियाक, इवान सुकमानोव्स्की, मारियन स्टेफानकिव, मक्सिम होंचारुक और विक्टर कामिंस्की बताए गए हैं। इन सभी को 13 मार्च की रात को देश के अलग-अलग एयरपोर्ट्स से पकड़ा गया। ये एयरपोर्ट कोलकाता, दिल्ली और लखनऊ थे। अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक को पूर्व मर्सेनरी/प्राइवेट मिलिट्री कांट्रैक्टर के रूप में जाना जाता है।

एनआईए का कहना है कि ये सभी भारत में टूरिस्ट वीजा पर आए थे, लेकिन इनके असली मकसद कुछ और थे। जांच में सामने आया कि इन लोगों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए मिजोरम जैसे संवेदनशील इलाके में बिना परमिट प्रवेश किया। (Myanmar Drone Case)

मैथ्यू वैनडाइक की भूमिका सबसे अहम

जांच एजेंसी के अनुसार, इस पूरे ग्रुप में अलग-अलग भूमिकाएं तय थीं और सभी मिलकर एक संगठित नेटवर्क की तरह काम कर रहे थे। इस ग्रुप का सबसे प्रमुख नाम मैथ्यू एरॉन वैनडाइक है, जो एक अमेरिकी नागरिक है। उनकी उम्र करीब 40 साल बताई जाती है। वह पेशे से जर्नलिस्ट, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर और प्राइवेट मिलिट्री कांट्रैक्टर रह चुका है। उसने “Sons of Liberty International” नाम का एक संगठन भी बनाया है। साल 2011 में लीबिया के गृहयुद्ध के दौरान वह गद्दाफी के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुआ था, जहां उसे पकड़ लिया गया और त्रिपोली की अबू सलीम जेल में करीब छह महीने तक कैद रखा गया। बाद में वह वहां से भाग निकला। इसके अलावा वह सीरिया, इराक और यूक्रेन में सक्रिय रहा है। (Myanmar Drone Case)

एनआईए के अनुसार, इस पूरे केस में मैथ्यू वैनडाइक की भूमिका सबसे अहम बताई जा रही है। एजेंसी का दावा है कि वह इस ग्रुप का लीडर था और ड्रोन ट्रेनिंग तथा सप्लाई नेटवर्क को कॉर्डिनेट कर रहा था।

बाकी छह आरोपी यूक्रेन के नागरिक हैं। लेकिन जांच एजेंसी का मानना है कि ये सभी किसी न किसी रूप में मिलिट्री या ड्रोन टेक्नोलॉजी से जुड़े रहे हैं।

इनमें पहला नाम पेट्रो हुरबा का है। माना जा रहा है कि उसका मिलिट्री से जुड़ा बैकग्राउंड हो सकता है। उसे ड्रोन ऑपरेशन और ट्रेनिंग से संबंधित गतिविधियों में शामिल बताया गया है।

दूसरा नाम तारास स्लिवियाक का है। माना जा रहा है कि वह भी ड्रोन ट्रेनिंग और सैन्य गतिविधियों से जुड़ा रहा है। यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद कई यूक्रेनी नागरिक ड्रोन टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट बने हैं, और इसे भी उसी श्रेणी में देखा जा रहा है। (Myanmar Drone Case)

तीसरे आरोपी इवान सुकमानोव्स्की को भी ड्रोन से जुड़ी गतिविधियों और सप्लाई नेटवर्क का हिस्सा बताया गया है।

चौथा नाम मारियन स्टेफानकिव का है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इनके पास तकनीकी या मिलिट्री एक्सपर्टाइज हो सकती है और ये ट्रेनिंग से जुड़े काम में शामिल था।

पांचवं आरोपी मक्सिम होंचारुक हैं, यह ड्रोन असेंबली और ऑपरेशनल काम में शामिल था, यानी ड्रोन को तैयार करना और इस्तेमाल करना इसका काम था।

छठा यूक्रेनी नागरिक विक्टर कामिंस्की हैं, उसे इस पूरे नेटवर्क में ट्रेनिंग और सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ बताया गया है।

जांच एजेंसी के अनुसार, ये सभी आरोपी मिलकर एक संगठित तरीके से काम कर रहे थे, जिसमें ड्रोन ट्रेनिंग, तकनीकी सपोर्ट और उपकरणों की सप्लाई जैसी गतिविधियां शामिल थीं। (Myanmar Drone Case)

रिस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट का उल्लंघन

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ हिस्सों में विदेशी नागरिकों के लिए विशेष अनुमति यानी रिस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट लेना जरूरी होता है। यह नियम सुरक्षा कारणों से लागू किया गया है। लेकिन एनआईए के अनुसार इन आरोपियों ने यह परमिट नहीं लिया और सीधे इन क्षेत्रों में प्रवेश कर गए।

जांच में यह भी सामने आया कि भारत को इन लोगों ने केवल ट्रांजिट रूट की तरह इस्तेमाल किया। यानी इनका मुख्य उद्देश्य भारत में रहना नहीं था, बल्कि यहां से म्यांमार पहुंचना था। (Myanmar Drone Case)

म्यांमार में ड्रोन और हथियार ट्रेनिंग का आरोप

एफआईआर के मुताबिक, ये सभी आरोपी म्यांमार में सक्रिय एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ट्रेनिंग देने जा रहे थे। इन समूहों को ड्रोन ऑपरेशन, हथियार चलाने, हार्डवेयर असेंबली और सिग्नल जैमिंग जैसी तकनीकी ट्रेनिंग दी जा रही थी। इन्होंने यूरोप से बड़ी मात्रा में ड्रोन (और संबंधित उपकरण) आयात कर भारत के रास्ते म्यांमार पहुंचाए।

जांच एजेंसी का दावा है कि यह ट्रेनिंग काफी एडवांस लेवल की थी। इसमें ड्रोन के जरिए हमले करना, निगरानी करना और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बाधित करना शामिल था। (Myanmar Drone Case)

ड्रोन सप्लाई नेटवर्क का खुलासा

एनआईए की जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी यूरोप से आधुनिक ड्रोन भारत के रास्ते म्यांमार भेजने में भी शामिल थे। यह एक बड़ा नेटवर्क था, जिसमें हाई-टेक उपकरणों को अवैध तरीके से ट्रांसफर किया जा रहा था।

इन ड्रोन्स का इस्तेमाल म्यांमार के सशस्त्र समूहों द्वारा किया जाना था, जिससे उनकी सैन्य क्षमता बढ़ सके। जांच एजेंसी का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। (Myanmar Drone Case)

भारत की सुरक्षा को क्यों है खतरा

एनआईए के अनुसार, जिन एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स को ट्रेनिंग दी जा रही थी, उनके संबंध भारत के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों से हैं। ये संगठन पूर्वोत्तर भारत में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं।

जांच में यह आशंका जताई गई है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी और हथियारों की यह ट्रेनिंग भारत के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती थी। खासकर मणिपुर जैसे राज्यों में पहले से चल रहे तनाव को देखते हुए इसे गंभीर माना जा रहा है।

एफआईआर में साफ कहा गया है कि आरोपियों की गतिविधियों का सीधा असर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता था। (Myanmar Drone Case)

कोर्ट ने दी 11 दिन की कस्टडी  

गिरफ्तारी के बाद इन सभी आरोपियों को एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया गया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 11 दिन की कस्टडी मंजूर की है। यह रिमांड 27 मार्च तक चलेगा।

अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में कहा कि इस मामले की पूरी साजिश को समझने के लिए आरोपियों से पूछताछ जरूरी है। साथ ही उनके डिजिटल डिवाइस की जांच भी महत्वपूर्ण है। (Myanmar Drone Case)

डिजिटल फॉरेंसिक जांच जारी

एनआईए ने आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप को जब्त कर लिया है। इन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। इस जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इन लोगों के संपर्क किन-किन लोगों से थे।

एजेंसी का कहना है कि शुरुआती जांच में आरोपियों का संपर्क हथियारबंद लोगों से मिला है, जो एके-47 जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे। (Myanmar Drone Case)

गिरफ्तारी पर क्या बोले यूक्रेन और अमेरिका 

यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि उनके छह नागरिकों के खिलाफ भारत या म्यांमार में किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल होने के पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं। नई दिल्ली में यूक्रेन के राजदूत ओलेक्सांद्र पोलिशचुक ने भारत के विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सिबी जॉर्ज से मुलाकात कर विरोध दर्ज कराया और एक आधिकारिक नोट सौंपा।

यूक्रेन ने अपने नागरिकों की तुरंत रिहाई की मांग की है और उनके लिए कांसुलर एक्सेस यानी दूतावास से संपर्क की अनुमति देने की बात कही है। यूक्रेन का यह भी कहना है कि भारत के कुछ प्रतिबंधित इलाकों में जाने के लिए विशेष परमिट जरूरी होता है, लेकिन कई जगह जमीन पर इसकी स्पष्ट जानकारी या निशान नहीं होते। ऐसे में विदेशी पर्यटक अनजाने में नियमों का उल्लंघन कर सकते हैं। (Myanmar Drone Case)

वहीं अमेरिका की ओर से प्रतिक्रिया सीमित रही है। अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि उन्हें मैथ्यू वैनडाइक की गिरफ्तारी की जानकारी है, लेकिन उन्होंने निजी कारणों का हवाला देते हुए इस पर ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

इस पूरे मामले पर भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, जबकि एनआईए की जांच लगातार जारी है।

भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि एनआईए की जांच लगातार जारी है और एजेंसी इस मामले के हर पहलू की जांच कर रही है। (Myanmar Drone Case)

भारतीय नौसेना ने शुरू की IOS SAGAR 2026 पहल, 16 देशों के साथ शुरू हुआ समुद्री सहयोग कार्यक्रम

IOS SAGAR 2026

IOS SAGAR 2026: भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और सहयोग को मजबूत करने के लिए आईओएस सागर पहल का दूसरा संस्करण शुरू कर दिया है। 16 मार्च से शुरू हुए इस कार्यक्रम में हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों की भागीदारी शामिल है।

यह पहल भारत की उस नीति के तहत की गई है जिसमें क्षेत्र के सभी देशों के साथ मिलकर सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसे सागर यानी “Security and Growth for All in the Region” और महासागर विजन का हिस्सा माना जा रहा है।

IOS SAGAR 2026: 16 देशों के नौसैनिक ले रहे हैं हिस्सा

इस बार के आईओएस सागर कार्यक्रम में इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (IONS) से जुड़े 16 देशों के नौसैनिक शामिल हो रहे हैं। जो पहले संस्करण की तुलना में ज्यादा है। भारतीय नौसेना ने फरवरी 2026 में IONS की चेयरमैनशिप संभाली है। इसके बाद यह पहला बड़ा कार्यक्रम है, जिसमें इतने देशों के सैनिक एक साथ हिस्सा ले रहे हैं। इस पहल के तहत अलग-अलग देशों के नौसैनिक एक ही जहाज पर साथ काम करेंगे और एक-दूसरे के अनुभव से सीखेंगे। (IOS SAGAR 2026)

कोच्चि में शुरू हुआ ट्रेनिंग फेज

इस कार्यक्रम की शुरुआत केरल के कोच्चि स्थित भारतीय नौसेना के ट्रेनिंग संस्थानों में हुई है। यहां पर विदेशी नौसैनिकों को समुद्री संचालन, जहाज चलाने की तकनीक और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं की ट्रेनिंग दी जा रही है।

इस दौरान उन्हें सीमैनशिप यानी समुद्री कौशल, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और समुद्री सुरक्षा से जुड़े विषयों की जानकारी दी जा रही है।

ट्रेनिंग का उद्देश्य यह है कि अलग-अलग देशों के सैनिक एक-दूसरे की कार्यशैली को समझ सकें और साथ मिलकर काम करने की क्षमता विकसित कर सकें। (IOS SAGAR 2026)

समुद्र में संयुक्त ऑपरेशन की तैयारी

ट्रेनिंग के बाद सभी प्रतिभागी एक भारतीय नौसैनिक जहाज पर सवार होकर समुद्र में संयुक्त गतिविधियों में हिस्सा लेंगे। इस दौरान वे वास्तविक परिस्थितियों में ऑपरेशन से जुड़ी गतिविधियों को समझेंगे।

समुद्र में रहने के दौरान यह दल कई तरह के अभ्यास करेगा, जिससे उनकी आपसी समझ और तालमेल मजबूत होगा।

इस चरण में जहाज अलग-अलग देशों के बंदरगाहों पर भी जाएगा, जहां स्थानीय नौसेना और एजेंसियों के साथ बातचीत और सहयोग किया जाएगा। (IOS SAGAR 2026)

पोर्ट विजिट और समुद्री सहयोग

कार्यक्रम के दौरान जहाज विभिन्न देशों के बंदरगाहों का दौरा करेगा। इन विजिट्स के जरिए अलग-अलग देशों के बीच संबंध मजबूत होंगे और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।

इन गतिविधियों के जरिए देशों के बीच जानकारी साझा करने, अनुभवों के आदान-प्रदान और बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

यह पहल खास तौर पर समुद्री चुनौतियों जैसे पायरेसी यानी समुद्री डकैती, तस्करी और अन्य खतरों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है। (IOS SAGAR 2026)

पहले संस्करण की तुलना में बड़ा कार्यक्रम

आईओएस सागर का पहला संस्करण 2025 में आयोजित किया गया था, जिसमें कम देशों ने हिस्सा लिया था। उस समय यह कार्यक्रम एक महीने तक चला था और इसमें कई देशों के बंदरगाहों का दौरा किया गया था। इस बार का संस्करण अधिक बड़ा और विस्तारित है। इसमें ज्यादा देशों की भागीदारी है और गतिविधियों का दायरा भी बढ़ाया गया है। (IOS SAGAR 2026)

SAGAR और MAHASAGAR विजन पर फोकस

आईओएस सागर पहल भारत के सागर विजन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह पीएम मोदी के महासागर विजन को भी आगे बढ़ाता है, जिसमें भारत समुद्री सहयोग को और व्यापक स्तर पर बढ़ाना चाहता है। इस पहल के जरिए भारत खुद को एक भरोसेमंद समुद्री साझेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की पहल

भारतीय नौसेना के अनुसार यह कार्यक्रम सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य देशों के बीच वास्तविक सहयोग को बढ़ाना है। इस पहल से विभिन्न देशों के नौसैनिक एक-दूसरे के साथ काम करने का अनुभव हासिल करेंगे, जिससे भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन करना आसान होगा। कार्यक्रम के दौरान समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और अन्य साझा चुनौतियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। (IOS SAGAR 2026)

होर्मुज से ओमान की खाड़ी तक बढ़ा खतरा, IFC-IOR की रिपोर्ट के बाद भारतीय नौसेना अलर्ट पर

Hormuz Threat Expansion

Hormuz Threat Expansion: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच गुरुग्राम स्थित इंडियन नेवी के इन्फॉरमेशन सेंटर ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास का खतरा अब पूर्व की ओर बढ़ता हुआ ओमान की खाड़ी तक पहुंच रहा है। इस चेतावनी को क्षेत्रीय सुरक्षा को देखते के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह आकलन इंडियन नेवी के सहयोग से काम करने वाले इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) ने किया है, जो कई देशों के साथ मिलकर समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है। (Hormuz Threat Expansion)

Hormuz Threat Expansion: कई देशों के साथ मिलकर हो रही निगरानी

यह केंद्र एक मल्टी-नेशनल प्लेटफॉर्म है, जिसमें 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हैं। ये सभी देश मिलकर कमर्शियल शिपिंग से जुड़ी जानकारी साझा करते हैं, जिससे समुद्र में चल रही गतिविधियों की एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है।

इस केंद्र ने हाल ही में अपने अपडेट में बताया कि होर्मुज के आसपास की स्थिति लगातार बदल रही है और खतरा अब धीरे-धीरे ओमान की खाड़ी की तरफ बढ़ रहा है। (Hormuz Threat Expansion)

छह अलग-अलग शिपिंग घटनाएं दर्ज

रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के पूर्वी हिस्से में छह अलग-अलग शिपिंग घटनाएं दर्ज की गई हैं। ये घटनाएं खास तौर पर ओमान की खाड़ी के आसपास हुई हैं।

इन घटनाओं के आधार पर यह माना जा रहा है कि खतरा केवल होर्मुज तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसका असर आसपास के समुद्री क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। इसका असर ऊर्जा और अन्य जरूरी सामान की सप्लाई पर भी पड़ सकता है। (Hormuz Threat Expansion)

एनर्जी सप्लाई पर बढ़ सकता है दबाव

इस स्थिति का असर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में बढ़ते जोखिम के कारण वॉर रिस्क इंश्योरेंस की लागत भी बढ़ी हुई बनी हुई है।

इसका मतलब यह है कि जहाजों को इस क्षेत्र से गुजरने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है, जिससे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। (Hormuz Threat Expansion)

भारतीय नौसेना ने बढ़ाई तैनाती

इसी बीच भारतीय नौसेना ने भी अपनी तैनाती बढ़ा दी है। फिलहाल इस क्षेत्र में यूएवी और सर्विलांस एयरक्राफ्ट्स के साथ 6 से 8 युद्धपोत भी तैनात किए गए हैं, जो भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकालने में मदद कर रहे हैं।

इन युद्धपोतों का मुख्य काम एलपीजी और क्रूड ऑयल लेकर आने वाले जहाजों को सुरक्षित एस्कॉर्ट करना है। इसके अलावा निगरानी के लिए सर्विलांस एयरक्राफ्ट और यूएवी यानी ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। (Hormuz Threat Expansion)

दो टास्क फोर्स बनाकर किया गया ऑपरेशन

सूत्रों के अनुसार, भारतीय नौसेना ने इस मिशन के लिए दो अलग-अलग टास्क फोर्स तैयार किए हैं। पहले जहां केवल तीन युद्धपोत तैनात थे, वहीं अब उनकी संख्या बढ़ाकर 6 से 8 कर दी गई है। यह पूरा ऑपरेशन भारत अपने स्तर पर चला रहा है और किसी बहुराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। (Hormuz Threat Expansion)

ओमान की खाड़ी में पहले से मौजूद हैं युद्धपोत

भारतीय नौसेना पहले से ही सऊदी अरब के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र में अपने युद्धपोत तैनात रखती है। इनमें से एक युद्धपोत साल 2008 से अदन की खाड़ी में तैनात है, जहां उसका मुख्य काम समुद्री डकैती यानी एंटी-पायरेसी ऑपरेशन को रोकना है। इसके अलावा एक दूसरा युद्धपोत साल 2019 से ओमान की खाड़ी में तैनात है, जो इस क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा का काम करता है।

हाल ही में होर्मुज क्षेत्र में बढ़े तनाव के बाद नौसेना ने एक और अतिरिक्त युद्धपोत इस इलाके में तैनात कर दिया है, ताकि सुरक्षा को और मजबूत किया जा सके। इन युद्धपोतों को अपने रडार, सैटेलाइट और अन्य निगरानी सिस्टम से लगातार जानकारी मिलती रहती है। इसके जरिए वे जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। (Hormuz Threat Expansion)

समुद्र में ही किया जा सकता है ईंधन और सप्लाई ट्रांसफर

भारतीय नौसेना के पास अपने जहाजों को सपोर्ट देने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर ये जहाज ओमान के डुक्म और सलालाह जैसे बंदरगाहों पर जाकर ईंधन भर सकते हैं और जरूरी सामान ले सकते हैं। इसके अलावा नौसेना के पास फ्लीट टैंकर भी होते हैं, जो समुद्र में ही जहाजों तक ईंधन और राशन पहुंचा सकते हैं, जिससे उन्हें बीच रास्ते में कहीं रुकने की जरूरत नहीं पड़ती। (Hormuz Threat Expansion)

जेलेंस्की का बड़ा खुलासा! सस्ते ड्रोन के आगे बेबस हैं महंगे एयर डिफेंस सिस्टम, अब फाइटर जेट्स भी सुरक्षित नहीं!

Ukraine drone warfare: President Zelenskyy speech at UK Parliament
Ukraine drone warfare: President Zelenskyy speech at UK Parliament

Ukraine Drone Warfare: पश्चिम एशिया में यूएस-ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन से शाहेद ड्रोन का मुकाबला करने के लिए इंटरसेप्टर ड्रोन मांगे। जिसके बाद यूक्रेन ने इंटरसेप्टर ड्रोन के साथ 200 यूक्रेनी एयर डिफेंस एक्सपर्ट पश्चिम एशिया में तैनात कर दिए। यह खुलासा खुद यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने ब्रिटेन की संसद में किया। संसद को संबोधित करते हुए जेलेंस्की ने आधुनिक युद्ध में तेजी से बदलती तकनीकों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ड्रोन तकनीक ने युद्ध के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है और अब सस्ते हथियार भी महंगे सैन्य सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं।

उन्होंने अपने संबोधन में यह भी बताया कि रूस और ईरान के बीच रक्षा सहयोग के चलते युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है। उनके अनुसार, यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर देखा जा सकता है। (Ukraine Drone Warfare)

Ukraine Drone Warfare: शाहेद ड्रोन से शुरू हुई नई रणनीति

जेलेंस्की ने कहा कि करीब तीन साल पहले रूस को ईरान से “शाहेद” ड्रोन मिले थे। ये ऐसे ड्रोन हैं, जिन्हें कम लागत में तैयार किया जाता है, लेकिन इनका इस्तेमाल महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि ईरान ने रूस को इन ड्रोन को इस्तेमाल करने और बनाने की तकनीक दी। बाद में रूस ने इसमें बदलाव किए और अब इन ड्रोन में रूसी तकनीक के भी हिस्से शामिल हो चुके हैं। (Ukraine Drone Warfare)

कम लागत वाले हथियार बन रहे बड़ी ताकत

जेलेंस्की ने कहा कि आधुनिक युद्ध में अब एक नई तरह की प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। एक तरफ महंगे एयर डिफेंस सिस्टम और हथियार हैं, वहीं दूसरी तरफ कम लागत वाले ड्रोन हैं। उन्होंने बताया कि एक छोटा ड्रोन कुछ सौ डॉलर में तैयार हो सकता है, जबकि उसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिस्टम की लागत हजारों या लाखों डॉलर तक होती है। इस वजह से युद्ध का संतुलन बदल रहा है। (Ukraine Drone Warfare)

समुद्र से जमीन तक हमला करने में सक्षम 

यूक्रेन ने ऐसे बोट्स भी विकसित किए हैं, जो अन्य ड्रोन को ले जा सकते हैं और उन्हें लॉन्च कर सकते हैं। इसके अलावा ऐसे सिस्टम भी तैयार किए गए हैं, जो समुद्र से जमीन पर हमला कर सकते हैं। जेलेंस्की ने बताया कि इन ड्रोन को और ज्यादा स्थिर और लंबी दूरी तक काम करने लायक बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसे सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं, जो समुद्र के कठिन हालात में भी काम कर सकेंगे।

जेलेंस्की के मुताबिक यूक्रेन ने भी इस बदलते युद्ध के तरीके को समझते हुए अपनी रणनीति में बदलाव किया है। जेलेंस्की ने बताया कि शुरुआत में यूक्रेन ने साधारण कामिकाजी समुद्री ड्रोन बनाए, जिनका इस्तेमाल दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने के लिए किया गया। इसके बाद यूक्रेन ने ऐसे ड्रोन विकसित किए, जिनमें टर्रेट यानी गन सिस्टम लगाया गया। ये ड्रोन हवा में मौजूद हेलीकॉप्टर को भी निशाना बना सकते हैं।

उन्होंने बताया कि अब यूक्रेन ऐसे ड्रोन भी विकसित कर चुका है, जो समुद्र से उड़ान भरकर दुश्मन के लड़ाकू विमानों को भी निशाना बना सकते हैं। यह तकनीक आधुनिक युद्ध में एक बड़ा बदलाव मानी जा रही है। (Ukraine Drone Warfare)

अंडरवाटर सिस्टम पर भी चल रहा काम

उन्होंने यह भी बताया कि यूक्रेन अब अंडरवाटर सिस्टम यानी पानी के नीचे काम करने वाले ड्रोन पर भी काम कर रहा है। ब्लैक सी में बढ़ते खतरों को देखते हुए यह तकनीक विकसित की जा रही है। उनके अनुसार, इन तकनीकों की मदद से यूक्रेन ने अपनी सुरक्षा के लिए नए समाधान तैयार किए हैं।

जेलेंस्की ने बताया कि यूक्रेन अब ऐसे ड्रोन विकसित कर रहा है, जो लंबे समय तक समुद्र में काम कर सकें। जेलेंस्की ने कहा कि इन ड्रोन को और ज्यादा स्थिर और प्रभावी बनाया जा रहा है, ताकि वे कठिन मौसम और समुद्री परिस्थितियों में भी ऑपरेशन कर सकें। उन्होंने कहा कि जल्द ही ऐसे सिस्टम तैयार होंगे, जो महासागर जैसी परिस्थितियों में भी काम कर सकेंगे। (Ukraine Drone Warfare)

दूसरे देशों को भी दे रहा है तकनीकी सहयोग

जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन अपनी इस तकनीक को अन्य देशों के साथ साझा करने के लिए भी तैयार है। उन्होंने बताया कि यूक्रेन के सैन्य विशेषज्ञ कई देशों में काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यूक्रेन के करीब 200 से ज्यादा विशेषज्ञ मध्य पूर्व और खाड़ी देशों में मौजूद हैं। और 34 अन्य लोग तैनाती के लिए तैयार हैं।  ये सभी सैन्य विशेषज्ञ हैं, जिन्हें “शाहेद” जैसे ड्रोन से बचाव और मुकाबला करने का अनुभव है। हमारी टीमें पहले से ही यूएई, कतर और सऊदी अरब में काम कर रही हैं, जबकि कुछ टीमें कुवैत के रास्ते में हैं। इसके अलावा हम कई अन्य देशों के साथ भी सहयोग कर रहे हैं और इसको लेकर समझौते पहले ही हो चुके हैं।

ये विशेषज्ञ ड्रोन से सुरक्षा और रक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं। इन विशेषज्ञों का काम वहां ड्रोन से सुरक्षा के उपाय तैयार करना और डिफेंस सिस्टम को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि इन सैन्य विशेषज्ञों को मैंने हमारे सहयोगी देशों के अनुरोध पर भेजा है, जिसमें अमेरिका भी शामिल है। दरअसल, यह उसी “ड्रोन डील” का हिस्सा है, जिसे हमने अमेरिका के साथ मिलकर प्रस्तावित किया था और जिस पर अभी भी बातचीत जारी है। (Ukraine Drone Warfare)

रियल टाइम कंट्रोल सिस्टम से बढ़ी क्षमता

यूक्रेन ने एक ऐसा डिजिटल सिस्टम भी तैयार किया है, जिसके जरिए पूरे युद्ध क्षेत्र की स्थिति को रियल टाइम में देखा जा सकता है। जेलेंस्की ने बताया कि इस सिस्टम के जरिए फ्रंटलाइन की स्थिति, हमलों की जानकारी और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

जेलेंस्की ने कहा कि मेरे पास इस बात के सबूत हैं कि सुरक्षा व्यवस्था को बहुत तेजी से बदला जा सकता है, और यह पुराने रक्षा सिस्टम के मुकाबले सस्ती भी हो सकती है। उन्होंने कहा, यह एक आईपैड है, जिसमें ऐसा सॉफ्टवेयर है जो हमें रियल टाइम में अपनी सुरक्षा पर नजर रखने और उसे कंट्रोल करने की सुविधा देता है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है। मेरे पास यह आईपैड है, हमारे प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और शीर्ष सैन्य कमांडरों के पास भी यही सिस्टम है। इसके जरिए हम यूक्रेन के फ्रंटलाइन की स्थिति देख सकते हैं, यहां तक कि दुश्मन के नुकसान को भी वीडियो सबूत के साथ ट्रैक कर सकते हैं।

इस समय फ्रंटलाइन पर रूस के लगभग 90% नुकसान हमारे ड्रोन के कारण हो रहे हैं। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी हो गया है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी में किसके पास बढ़त है और उनसे बचाव में कौन ज्यादा मजबूत और तेज है।

यह आईपैड हमें आसमान में होने वाले हर हमले, समुद्री क्षेत्र की गतिविधियों और रूस के खिलाफ हमारी लंबी दूरी की स्ट्राइक की जानकारी भी देता है। इसके जरिए लोगों की सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा क्षेत्र पर भी रियल टाइम नजर रखी जाती है।

मेरा मानना है कि भविष्य में सुरक्षा का यह सिस्टम इतना विकसित हो जाएगा कि हर देश के नेता, रक्षा मंत्री ही नहीं, बल्कि आम लोगों के पास भी ऐसे टूल्स होंगे, जिनसे वे अपनी सुरक्षा को बेहतर तरीके से समझ और देख सकेंगे।

उन्होंने कहा कि इस तरह के सिस्टम से कमांड और कंट्रोल में सुधार होता है और तेजी से फैसले लिए जा सकते हैं। (Ukraine Drone Warfare)

ड्रोन से होने वाले हमलों को रोकने की तैयारी

जेलेंस्की ने यह भी बताया कि यूक्रेन ने ड्रोन से होने वाले हमलों को रोकने के लिए इंटरसेप्टर सिस्टम भी विकसित किए हैं। उन्होंने कहा कि यूक्रेन हर दिन बड़ी संख्या में ऐसे इंटरसेप्टर तैयार कर सकता है।

जेलेंस्की ने बताया कि हम हर दिन कम से कम 2,000 प्रभावी और युद्ध में साबित इंटरसेप्टर बनाने में सक्षम हैं। हम इससे ज्यादा भी बना सकते हैं, यह निवेश पर निर्भर करता है। हमें रोज लगभग 1,000 इंटरसेप्टर की जरूरत होती है, और हम अपने सहयोगी देशों को भी कम से कम 1,000 इंटरसेप्टर रोज उपलब्ध करा सकते हैं।

उन्होंने कहा, हमें यह अच्छी तरह पता है कि “शाहेद” जैसे ड्रोन और अन्य ड्रोन किस तरह आते हैं, और उन्हें रोकने के लिए हम रडार और ध्वनि (एकॉस्टिक) निगरानी सिस्टम तैयार कर सकते हैं।

इसके अलावा रडार और सॉफ्टवेयर सिस्टम भी बनाए गए हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बावजूद काम करते रहते हैं। इससे ड्रोन की पहचान और उन्हें रोकना आसान होता है। (Ukraine Drone Warfare)

ड्रोन से बदल रहा वैश्विक सुरक्षा ढांचा

जेलेंस्की ने अपने संबोधन में कहा कि अब ड्रोन केवल जमीन से ही नहीं, बल्कि समुद्र से भी लॉन्च किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि लंबी दूरी तक हमले करना अब सामान्य होता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि समुद्र में मौजूद जहाजों से भी ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं, जिससे सुरक्षा चुनौतियां और बढ़ जाती हैं।

जेलेंस्की ने कहा कि आधुनिक हथियार अब हजारों किलोमीटर दूर तक हमला करने में सक्षम हैं। बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन दोनों ही लंबी दूरी तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दुनिया के किसी भी हिस्से में हो रहा संघर्ष अब दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकता है। (Ukraine Drone Warfare)

रूस-ईरान के सहयोग पर उठाए सवाल

जेलेंस्की ने अपने संबोधन में रूस और ईरान के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच हथियारों और तकनीक का आदान-प्रदान हो रहा है। उनके अनुसार, यह सहयोग वैश्विक सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के सहयोग से युद्ध का स्वरूप और जटिल हो रहा है। (Ukraine Drone Warfare)