Home Blog Page 35

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने लगाई लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के रिटायरमेंट पर रोक, केस से प्रमोशन पर पड़ा असर

Lt Col Purohit AFT Case
Lt Col Purohit (File Photo)

Lt Col Purohit AFT Case: नई दिल्ली में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक अहम फैसले में लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित की रिटायरमेंट पर अस्थायी रोक लगा दी है। उनका रिटायरमेंट 31 मार्च को होना था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस प्रक्रिया को फिलहाल रोकते हुए रक्षा मंत्रालय से जवाब मांगा है। यह मामला मालेगांव ब्लास्ट केस और उससे जुड़े लंबे ट्रायल के कारण उनके करियर पर पड़े असर से जुड़ा है।

यह फैसला 17 मार्च को आया, जब ट्रिब्यूनल की बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक पुरोहित की स्टैट्यूटरी शिकायत पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उन्हें सेवा से रिटायर नहीं किया जाएगा। (Lt Col Purohit AFT Case)

Lt Col Purohit AFT Case: मालेगांव केस के बाद उठाया प्रमोशन का मुद्दा

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जुलाई 2025 में मालेगांव ब्लास्ट केस में अदालत से बरी कर दिया गया था। यह मामला साल 2008 का था और इसमें करीब 17 साल तक जांच और ट्रायल चला। पुरोहित का कहना है कि इस लंबे कानूनी संघर्ष के कारण उनके प्रमोशन और करियर प्रोग्रेशन पर असर पड़ा।

उन्होंने ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल कर कहा कि उन्हें उनके बैचमेट्स के बराबर प्रमोशन का अवसर नहीं मिला। उनके अनुसार, यदि यह मामला नहीं होता, तो वे सामान्य प्रक्रिया के तहत उच्च पद तक पहुंच सकते थे। (Lt Col Purohit AFT Case)

डीवी बैन और सीलबंद प्रक्रिया पर उठाए सवाल

पुरोहित ने अपने मामले में आर्मी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ डिसिप्लिन एंड विजिलेंस यानी डीवी बैन लागू था, जिसके चलते उनके प्रमोशन पर फैसला रोक दिया गया।

फरवरी 2021 में उन्हें कर्नल पद के लिए विचार किया गया था, लेकिन उनका रिजल्ट सीलबंद रखा गया। बाद में उन्हें बताया गया कि वे प्रमोशन के लिए फिट नहीं पाए गए। उनका कहना है कि यदि वे प्रमोशन के लिए योग्य नहीं थे, तो यह जानकारी तुरंत दी जानी चाहिए थी। सीलबंद प्रक्रिया अपनाकर उन्हें आगे के प्रमोशन के अवसरों से भी वंचित किया गया और उन्हें कानूनी चुनौती देने का मौका भी नहीं मिला। (Lt Col Purohit AFT Case)

ट्रिब्यूनल ने मांगा रक्षा मंत्रालय से जवाब

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल की जस्टिस राजेंद्र मेनन की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले में रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि पहली नजर में यह मामला बनता है कि पुरोहित को उनके जूनियर्स के बराबर प्रमोशन और अन्य लाभों पर विचार किया जाना चाहिए।

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि आपराधिक अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद यह देखा जाना जरूरी है कि कहीं उन्हें गलत तरीके से उनके अधिकारों से वंचित तो नहीं किया गया। इस मामले की अगली सुनवाई 22 मई को होगी। (Lt Col Purohit AFT Case)

पुरोहित ने करियर प्रभावित होने का किया दावा

पुरोहित ने अपनी याचिका में कहा है कि सामान्य परिस्थितियों में वे अब तक ब्रिगेडियर पद तक पहुंच सकते थे। उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ लगे आरोप और उसके बाद की प्रक्रिया ने उनके करियर ग्रोथ को प्रभावित किया।

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने प्रमोशन से जुड़े फैसले के खिलाफ अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला। इस कारण उन्हें समय रहते न्याय पाने का मौका नहीं मिल सका। (Lt Col Purohit AFT Case)

सेवा में वापसी के बाद भी जारी रहा असर

पुरोहित को 2017 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्होंने दोबारा सेना में जॉइन किया था। हालांकि, वे 2020 तक सस्पेंशन में रहे। सस्पेंशन हटने के बाद भी उनके ऊपर डीवी बैन जारी रहा। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सेवा जारी रखी और 2018 से 2025 के बीच कई एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट्स हासिल कीं। इन रिपोर्ट्स में उनके काम और प्रोफेशनल क्षमता को सकारात्मक बताया गया। (Lt Col Purohit AFT Case)

इंटेलिजेंस भूमिका का भी दिया हवाला

अपनी याचिका में पुरोहित ने यह भी कहा है कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस में कार्यरत थे और उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के अनुसार ही काम किया। उन्होंने कुछ आधिकारिक पत्रों का हवाला देते हुए कहा कि उनकी गतिविधियां ड्यूटी के दायरे में थीं। इन दस्तावेजों में यह उल्लेख किया गया कि वे एक सोर्स नेटवर्क के जरिए जानकारी जुटा रहे थे और यह काम उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा था। (Lt Col Purohit AFT Case)

अक्टूबर 2008 में हुई थी गिरफ्तारी

पुरोहित की गिरफ्तारी अक्टूबर 2008 में हुई थी, जब वे एक ट्रेनिंग कोर्स कर रहे थे। इसके बाद उन्हें एंटी टेररिज्म स्क्वाड को सौंपा गया। इस मामले में उन्होंने कई साल जेल में बिताए। जेल में रहने के दौरान वे अपनी दो महत्वपूर्ण कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट्स हासिल नहीं कर सके, जिसका असर उनके करियर पर पड़ा। (Lt Col Purohit AFT Case)

स्टैट्यूटरी शिकायत पर फैसला बाकी

पुरोहित ने अक्टूबर 2025 में आर्मी चीफ को पत्र लिखकर अपनी बात रखने का अनुरोध किया था। इसके बाद फरवरी 2026 में उन्होंने स्टैट्यूटरी शिकायत भी दर्ज कराई। उनका कहना है कि उन्हें उनके बैचमेट्स के बराबर अवसर दिए जाएं। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि जब तक इस शिकायत पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उनकी रिटायरमेंट पर रोक जारी रहेगी। (Lt Col Purohit AFT Case)

कानूनी अधिकारों के उल्लंघन का आरोप

पुरोहित ने अपनी याचिका में कहा है कि उनके साथ हुए व्यवहार से उनके मौलिक और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने कहा कि उन्हें समानता और सम्मान के साथ सेवा करने का अधिकार मिलना चाहिए था।
उनका यह भी कहना है कि लंबी कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों के कारण उन्हें समय से पहले सेवा से बाहर होना पड़ सकता था। (Lt Col Purohit AFT Case)

गेमचेंजर है जापान का नया एयरक्राफ्ट EC-2, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में दुश्मन के रडार को कर देगा ब्लाइंड

EC-2 Electronic Warfare Aircraft
EC-2 Electronic Warfare Aircraft

EC-2 Electronic Warfare Aircraft: जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स ने हाल ही में अपने नए इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एयरक्राफ्ट EC-2 की पहली आधिकारिक तस्वीरें जारी की हैं। यह एयरक्राफ्ट खास तौर पर दुश्मन के रडार और कम्यूनिकेशन सिस्टम को जाम करने के लिए तैयार किया गया है। यह एयरक्राफ्ट ऐसे मिशनों के लिए बनाया गया है, जिसमें यह दुश्मन की पहुंच से दूर रहकर उसके सिस्टम को प्रभावित कर सके।

जापान के एयर डेवलपमेंट एंड टेस्ट कमांड ने इस विमान की तस्वीरें हाल ही में सार्वजनिक की हैं। यह विमान पुराने EC-1 इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर विमान की जगह लेगा, जो 1986 से सेवा में था। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

EC-2 Electronic Warfare Aircraft: स्टैंड-ऑफ जैमिंग क्षमता से लैस है यह विमान

EC-2 विमान की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्टैंड-ऑफ जैमिंग क्षमता है। इसका मतलब है कि यह विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की सीमा से बाहर रहकर ही उसके रडार और कम्युनिकेशन नेटवर्क को जाम कर सकता है। इससे विमान को खतरा कम होता है और मिशन अधिक सुरक्षित तरीके से पूरा किया जा सकता है।

यह विमान दुश्मन के रडार सिस्टम, डेटा लिंक, कम्यूनिकेशन नेटवर्क और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सेंसर को प्रभावित करने में सक्षम है। इसके जरिए दुश्मन की निगरानी क्षमता को कमजोर किया जा सकता है, जिससे फाइटर जेट्स और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन कर सकते हैं। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

कावासाकी C-2 प्लेटफॉर्म पर आधारित है EC-2

EC-2 विमान जापान के कावासाकी C-2 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट पर आधारित है। यह एक आधुनिक सैन्य परिवहन विमान है, जिसे खास तौर पर भारी उपकरण और सैनिकों को ले जाने के लिए विकसित किया गया था। इसी प्लेटफॉर्म को संशोधित करके EC-2 तैयार किया गया है।

इस विमान की लंबाई करीब 43.9 मीटर है और इसका विंगस्पैन 44.4 मीटर है। इसमें दो टर्बोफैन इंजन लगे हैं, जो इसे तेज गति और लंबी दूरी तक उड़ान भरने की क्षमता देते हैं। यह विमान लगभग 7,600 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है और भारी वजन उठाने में सक्षम है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

EC-2 Electronic Warfare Aircraft
EC-2 Electronic Warfare Aircraft

डिजाइन में दिखते हैं बड़े बदलाव

EC-2 का डिजाइन सामान्य C-2 विमान से काफी अलग दिखाई देता है। इसके आगे के हिस्से में एक बड़ा गोलाकार रेडोम लगाया गया है, जो इसकी सबसे प्रमुख पहचान है। इसके अलावा विमान के ऊपर और साइड में भी कई उभार दिखाई देते हैं।

ये उभार दरअसल इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम के हिस्से हैं। इनमें एंटीना और सेंसर लगे होते हैं, जो रेडियो सिग्नल, रडार वेव्स और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों को पहचानते हैं और उन पर जैमिंग सिग्नल भेजते हैं।

इस तरह का डिजाइन यह दिखाता है कि यह विमान पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक अटैक और सिग्नल इंटेलिजेंस मिशन के लिए तैयार किया गया है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

चार विमानों की फ्लीट तैयार करने की योजना

जापान इस प्रोग्राम के तहत कुल चार EC-2 विमान तैयार करने की योजना बना रहा है। यह पुराने EC-1 की तुलना में बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है, क्योंकि पहले केवल एक ही विमान सेवा में था।

यह प्रोग्राम 2020 में शुरू किया गया था और इसे दो चरणों में डेवलप किया जा रहा है। पहले चरण में बेसिक जैमिंग क्षमता डेवलप की जा रही है, जबकि दूसरे चरण में इसे पूरी तरह ऑपरेशनल बनाया जाएगा।

EC-2 विमान पुराने EC-1 की जगह लेगा, जिसे 1980 के दशक में डेवलप किया गया था। EC-1 में भी रडार जेमिंग और कम्युनिकेशन डिसरप्शन की क्षमता थी, लेकिन तकनीक के मामले में वह अब पुराना हो चुका है।

EC-1 को कावासाकी C-1 विमान से विकसित किया गया था और इसमें कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए थे। लेकिन अब नई तकनीक के साथ EC-2 को ज्यादा आधुनिक और सक्षम बनाया गया है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में बढ़ेगी जापान की ताकत

EC-2 विमान जापान की इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमता को मजबूत करेगा। यह विमान इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में कंट्रोल स्थापित करने में मदद करेगा, जो आधुनिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसकी मदद से दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर किया जा सकता है और अपने फाइटर जेट्स को सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन करने का मौका मिल सकता है। यह विमान काउंटर-एयर ऑपरेशन और अन्य सामरिक मिशनों में भी उपयोगी होगा। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

RC-2 और अन्य वेरिएंट भी तैयार

कावासाकी C-2 प्लेटफॉर्म को केवल ट्रांसपोर्ट के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य सैन्य भूमिकाओं के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी प्लेटफॉर्म पर RC-2 नाम का एक इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस विमान भी विकसित किया गया है, जो रेडियो सिग्नल को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

लंबी दूरी तक ऑपरेशन की क्षमता

EC-2 विमान को लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी रेंज और पेलोड क्षमता इसे दूर से मिशन पूरा करने की सुविधा देती है। यह विमान दुश्मन के इलाके के करीब गए बिना ही अपने इलेक्ट्रॉनिक अटैक मिशन को अंजाम दे सकता है।

इसका फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और ग्लास कॉकपिट इसे आधुनिक और प्रभावी बनाते हैं। इसके जरिए पायलट का काम आसान होता है और ऑपरेशन अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

स्वदेशी तकनीक का किया इस्तेमाल

इस विमान के विकास में जापान ने अपनी घरेलू तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसका उद्देश्य संवेदनशील तकनीक को सुरक्षित रखना और बाहरी निर्भरता को कम करना है। इसमें पहले से मौजूद जापानी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जैसे J/ALQ-5 का भी इस्तेमाल किया गया है, जिसे समय के साथ अपग्रेड किया गया है। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच विकास

जापान ने जहाज ऐसे समय में बनाया है, जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं। समुद्री और हवाई क्षेत्रों में बढ़ते खतरे के बीच इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। इस तरह के विमान आधुनिक युद्ध में अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि यह सीधे लड़ाई में शामिल हुए बिना ही दुश्मन की क्षमताओं को कमजोर कर सकते हैं। (EC-2 Electronic Warfare Aircraft)

Blue Water Diplomacy: विशाखापत्तनम पहुंचे रूस के दो आधुनिक वॉरशिप, गुआम में US के साथ नेवी कर रही अभ्यास

Indian Navy Blue Water Diplomacy
Russia’n Navy comprising the Sovershenny and Rezky corvettes arrived on an unofficial visit at the India’n Navy’s Eastern Naval Command base in Visakhapatnam.

Indian Navy Blue Water Diplomacy: एक तरफ भारतीय नौसेना जहां गुआम में अमेरिका के साथ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के लिए सी ड्रैगन एक्सरसाइज में हिस्सा ले रही है, तो वहीं दूसरी तरफ रूस के दो युद्धपोत भारत के विशाखापत्तनम बंदरगाह पर पहुंचे हुए हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव के बीच भारतीय नौसेना की ब्लूवॉटर डिप्लोमेसी ही है, जो एक साथ अलग-अलग देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ा रही है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

Indian Navy Blue Water Diplomacy: गुआम में शुरू हुई सी ड्रैगन एक्सरसाइज

अमेरिका के गुआम स्थित एंडरसन एयर फोर्स बेस पर ‘सी ड्रैगन 2026’ अभ्यास 9 मार्च से शुरू हो चुका है। यह एक बहुराष्ट्रीय एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभ्यास है, जिसमें कई देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं।

इस अभ्यास में क्वॉड देशों भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के अलावा न्यूजीलैंड भी शामिल है। यह अभ्यास लगभग तीन सप्ताह यानी 21 मार्च तक चलेगा। इसमें सभी देश अपने-अपने लॉन्ग रेंज मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट यानी समुद्री निगरानी विमानों को तैनात कर रहे हैं।

भारतीय नौसेना ने इसमें अपने अत्याधुनिक पी-8आई एंटी-सबमरीन एयरक्राफ्ट को भेजा है। यह विमान समुद्र के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में सक्षम है। इसके अलावा यह विमान समुद्र की निगरानी और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने में भी उपयोगी है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

200 घंटे से ज्यादा का उड़ान प्रशिक्षण

इस अभ्यास के दौरान पायलट और एयरक्रू को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शुरुआत में सिमुलेशन के जरिए अभ्यास होता है, जिसमें नकली टारगेट्स को ट्रैक किया जाता है। इसके बाद वास्तविक परिस्थितियों में पनडुब्बियों को खोजने और उनका पीछा करने का अभ्यास कराया जाता है।

इस पूरे अभ्यास में 200 घंटे से अधिक का उड़ान प्रशिक्षण शामिल है। इसके साथ ही क्लासरूम सेशन भी आयोजित किए जा रहे हैं, जहां अलग-अलग देशों के अधिकारी मिलकर रणनीति और तालमेल पर चर्चा करते हैं।

इस अभ्यास का आयोजन साल 2019 से हर साल किया जा रहा है और इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों के बीच बेहतर समन्वय और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

अमेरिका की नौसेना ने इसमें अपने दो पी-8ए पोसाइडन विमान भेजे हैं, जो अलग-अलग स्क्वाड्रन से आते हैं और पहले जापान के कडेना एयर बेस के जरिए तैनात किए गए हैं। भारतीय नौसेना की ओर से एक पी-8आई विमान शामिल किया गया है, जो इसी प्लेटफॉर्म का भारतीय संस्करण है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पनडुब्बियों का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस अभ्यास में जापान ने अपने कावासाकी पी-1 समुद्री निगरानी विमान को इस अभ्यास में भेजा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया की वायु सेना ने दो पी-8ए विमान और करीब 50 प्रशिक्षित कर्मियों को इसमें शामिल किया है। न्यूजीलैंड की ओर से भी एक पी-8ए विमान इस अभ्यास में हिस्सा ले रहा है। इस अभ्यास में शामिल अधिकांश विमान बोइंग पी-8 प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं। इन विमानों के मिशन सिस्टम, सेंसर और डेटा लिंक काफी हद तक एक जैसे हैं। इससे अलग-अलग देशों के बीच जानकारी साझा करना आसान हो जाता है। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

विशाखापत्तनम पहुंचे रूसी युद्धपोत

दूसरी ओर, रूस के दो युद्धपोत ‘सोवर्शेन्नी’ (hull 333) और ‘रेजकी’ (hull 343) 14 मार्च को विशाखापत्तनम पहुंचे। ये दोनों जहाज रूस के प्रशांत बेड़े का हिस्सा हैं और आधुनिक मल्टी-रोल कॉर्वेट श्रेणी में आते हैं। ये व्लादिवोस्तोक से 12 फरवरी को लंबी दूरी की तैनाती पर निकले थे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई समुद्री इलाकों त्सुशिमा जलडमरूमध्य, पूर्वी चीन सागर और फिलीपीन सागर (जापान द्वारा अपने ईईजेड के पास निगरानी) जैसे इलाकों से होते हुए भारत पहुंचे हैं। इन जहाजों की यात्रा के दौरान जापान के समुद्री क्षेत्र के पास भी इनकी निगरानी की गई थी।

विशाखापत्तनम पहुंचने के बाद इन जहाजों का स्वागत भारतीय नौसेना और रूस के दूतावास के प्रतिनिधियों द्वारा किया गया। इस दौरान बंदरगाह पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इन जहाजों की यह यात्रा एक आधिकारिक “बिजनेस कॉल” के रूप में है, जिसका मतलब है कि यह कोई सैन्य अभ्यास नहीं बल्कि नियमित दौरा है। इस दौरान जहाजों के चालक दल को आराम दिया जाएगा, आवश्यक सामान की आपूर्ति की जाएगी और भारतीय नौसेना के साथ सांस्कृतिक और खेल गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब हाल ही में विशाखापत्तनम में इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और मिलन जैसे बड़े नौसैनिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, जिनमें कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। रूस के इन जहाजों का आना भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा संबंधों को भी दर्शाता है। दोनों देश अब रक्षा क्षेत्र में संयुक्त विकास और उत्पादन पर भी काम कर रहे हैं।

इसी बीच भारत ने हाल ही में एक ईरानी युद्धपोत को कोच्चि बंदरगाह पर शरण दी थी, जहां उसके चालक दल को भी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। यह कदम मानवीय आधार पर उठाया गया था। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

अमेरिका और रूस दोनों के साथ संबंध

भारत लंबे समय से अमेरिका और रूस दोनों के साथ अपने सैन्य संबंध बनाए हुए है। हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच संयुक्त अभ्यास और सहयोग बढ़ा है। वहीं दूसरी ओर रूस के साथ भारत के रक्षा संबंध कई दशकों पुराने हैं। दोनों देश अब रक्षा क्षेत्र में सह-विकास और सह-उत्पादन पर भी काम कर रहे हैं। (Indian Navy Blue Water Diplomacy)

शाहेद 136 के बाद एफपीवी ड्रोन कैसे बदल रहे युद्ध की रणनीति, असिमेट्रिक वारफेयर से कैसे फूलने लगीं अमेरिकी डिफेंस सिस्टम की सांसें

Asymmetric Warfare US-Iran War
Asymmetric Warfare US-Iran War

Asymmetric Warfare US-Iran War: पश्चिम एशिया में चल रहा अमेरिका-ईरान युद्ध अब असिमेट्रिक वारफेयर यानी असमान युद्ध की रणनीति की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। हाल ही में ईरान समर्थित एक मिलिशिया ने अमेरिकी दूतावास के ऊपर एक छोटा फर्स्ट-पर्सन-व्यू यानी एफपीवी ड्रोन उड़ाया और करीब दो मिनट तक पूरे इलाके की निगरानी की। यह ड्रोन बेहद कम ऊंचाई पर उड़ रहा था और इसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सका। रूस-यूक्रेन वॉर के बाद यह असिमेट्रिक वारफेयर का सबसे ताजा उदाहरण है।

यह घटना इराक की राजधानी बगदाद के ग्रीन जोन इलाके की है, जहां अमेरिकी दूतावास स्थित है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सुरक्षित इलाकों में माना जाता है। इसके बावजूद ड्रोन ने दूतावास के अंदर की इमारतों, गाड़ियों और अमेरिकी झंडे तक की तस्वीरें रिकॉर्ड कर लीं। बाद में इस वीडियो को सार्वजनिक रूप से जारी किया गया। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

Asymmetric Warfare US-Iran War: पहले हमले में नष्ट हुआ था रडार सिस्टम

इस घटना से कुछ दिन पहले दूतावास पर एक और हमला हुआ था। इस हमले में एक आत्मघाती ड्रोन ने दूतावास की छत पर लगे एक महत्वपूर्ण रडार सिस्टम को निशाना बनाया था। यह रडार सिस्टम Saab Giraffe-1X था, जो दूतावास की सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जाता है।

यह रडार सिस्टम C-RAM डिफेंस सिस्टम को जानकारी देता था। C-RAM एक ऐसा सिस्टम है, जो रॉकेट, आर्टिलरी और मोर्टार जैसे खतरों को हवा में ही नष्ट कर देता है। लेकिन रडार के नष्ट होने के बाद यह सिस्टम प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाया।

यह घटना इसी रणनीति का एक उदाहरण मानी जा रही है। इसमें ईरान समर्थित मिलिशिया ने पहले दूतावास के रडार सिस्टम को एक सस्ते आत्मघाती ड्रोन से नष्ट किया और फिर कुछ ही समय बाद एक छोटे एफपीवी ड्रोन के जरिए पूरे इलाके की निगरानी की। यह ड्रोन करीब दो मिनट तक बिना किसी रोक-टोक के उड़ता रहा। इस घटना ने दिखाया कि कैसे सस्ती तकनीक से महंगी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

सस्ते ड्रोन से महंगे सिस्टम्स को चैलेंज

इस घटना ने एक बड़ी बात सामने रखी है कि आधुनिक युद्ध में अब केवल ताकत ही नहीं, बल्कि रणनीति भी अहम हो गई है। जिस ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, उसकी लागत बहुत कम बताई जा रही है। यह ड्रोन सामान्य बाजार में मिलने वाले उपकरणों से तैयार किया गया था।

इसके विपरीत, अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा में लगे सिस्टम बहुत महंगे हैं। C-RAM सिस्टम एक मिनट में हजारों गोलियां दाग सकता है, जिसकी लागत बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में सस्ते ड्रोन से महंगे सिस्टम को चुनौती दी जा रही है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन की नई तकनीक

इस ड्रोन की एक खास बात यह भी थी कि इसमें फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस का इस्तेमाल किया गया था। इसका मतलब यह है कि यह ड्रोन रेडियो सिग्नल के बजाय तार के जरिए कंट्रोल किया जाता है।

इस तकनीक की वजह से इसे जाम करना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर ड्रोन को रेडियो फ्रीक्वेंसी जैमिंग से रोका जा सकता है, लेकिन इस तरह के ड्रोन पर यह तरीका काम नहीं करता।

इन ड्रोन की लागत बहुत कम होती है, जबकि इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिस्टम काफी महंगे होते हैं। यही कारण है कि एक छोटा और सस्ता ड्रोन भी बड़े सैन्य सिस्टम पर भारी पड़ सकता है। जब ऐसे कई ड्रोन एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं, तो यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

इसके पीछे “मोजेक डिफेंस” रणनीति

इस तरह की रणनीति के पीछे ईरान की एक खास सैन्य सोच काम करती है, जिसे “मोजेक डिफेंस” कहा जाता है। इसमें सेना को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है, जो अलग-अलग जगहों पर स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। अगर एक जगह पर हमला होता है या नेतृत्व को नुकसान पहुंचता है, तब भी बाकी यूनिट्स अपना काम जारी रखती हैं। यही वजह है कि ईरान से जुड़े अलग-अलग समूह, जैसे लेबनान, इराक या यमन में सक्रिय संगठन, एक साथ कई मोर्चों पर कार्रवाई कर सकते हैं। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

हमलों का लगातार एक जैसा पैटर्न

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला कोई अलग घटना नहीं है। अक्टूबर 2023 के बाद से इराक में अमेरिकी ठिकानों पर ऐसे कई हमले हो चुके हैं। इन हमलों का तरीका भी लगभग एक जैसा है। पहले किसी सिक्योरिटी सिस्टम की पहचान की जाती है, फिर उसे निशाना बनाया जाता है और उसके बाद अगले हमले में उस कमजोरी का फायदा उठाया जाता है। इस मामले में भी पहले रडार सिस्टम को नष्ट किया गया और फिर ड्रोन के जरिए निगरानी की गई।

हालांकि इस हमले की जिम्मेदारी ईरान समर्थित मिलिशिया ने ली है। यह मिलिशिया इराक में सक्रिय है और खुद को “इस्लामिक रेजिस्टेंस” का हिस्सा बताती है।

इनका कहना है कि यह कार्रवाई अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में की गई है। इस पूरे क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है और अलग-अलग जगहों पर ऐसे हमले सामने आ रहे हैं। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

अमेरिकी संसाधनों पर बढ़ रहा दबाव

असिमेट्रिक वारफेयर के कारण अमेरिका के सामने कई तरह की चुनौतियां और असर साफ दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या इंटरसेप्टर की कमी से जुड़ी है। पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम सीमित संख्या में उपलब्ध हैं और लगातार हमलों के चलते इनके स्टॉक पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे हालात में हर छोटे ड्रोन या मिसाइल को रोकने के लिए महंगे इंटरसेप्टर का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे तेजी से संसाधन कम होते हैं। इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र के कई सहयोगी देश भी सीधे तौर पर एस्कॉर्ट मिशन में शामिल होने से हिचक रहे हैं, जिससे जिम्मेदारी और ज्यादा अमेरिका पर आ जाती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

दूसरी बड़ी चुनौती संसाधनों के बंटवारे की है, जिसे बैंडविड्थ ड्रेन कहा जा रहा है। एक तरफ बगदाद में दूतावास और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा करनी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा और वैश्विक सप्लाई चेन को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। इसके अलावा दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बनी हुई है। ऐसे में समय, संसाधन और सैन्य ध्यान कई दिशाओं में बंट जाता है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर पूरा फोकस करना मुश्किल हो जाता है।

हालांकि असिमेट्रिक वारफेयर केवल ड्रोन तक सीमित नहीं है। इसमें कई तरह की रणनीतियां शामिल होती हैं। समुद्र में जहाजों को निशाना बनाना, माइंस बिछाना, छोटे बोट्स के जरिए हमला करना और साइबर या सूचना के माध्यम से दबाव बनाना भी इसी का हिस्सा हैं। फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में जो हालात बने हुए हैं, उनमें भी इस तरह की रणनीति का असर देखा जा रहा है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

वर्ल्ड वॉर-2 में मिली जीत पर नई दिल्ली में बाइक रैली निकालेगा रूस, पढ़ें रूसी सेना का मोटरसाइकिल कनेक्शन

Russia WWII Victory Motorcycle Rally
WWII Victory Motorcycle Rally: Russia to Organise Grand Bike Rally in New Delhi

Russia WWII Victory Motorcycle Rally: नई दिल्ली में द्वितीय विश्व युद्ध में जीत की 81वीं वर्षगांठ के मौके पर एक विशेष मोटरसाइकिल रैली आयोजित की जाएगी। यह आयोजन वर्ल्ड वॉर II विक्ट्री मोटरसाइकिल रैली (WWII Victory Motorcycle Rally) के नाम से किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का आयोजन रूस के दूतावास और नई दिल्ली स्थित रशियन हाउस द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है।

यह रैली 21 मार्च को आयोजित होगी, जिसमें भारत और रूस सहित कई देशों के 300 से अधिक बाइक राइडर्स हिस्सा लेंगे। इस आयोजन में दिल्ली के विभिन्न मोटरसाइकिल ग्रुप भी शामिल होंगे।

Russia WWII Victory Motorcycle Rally: रैली का रूट और कार्यक्रम

इस मोटरसाइकिल रैली का रूट भी खास महत्व रखता है। रैली की शुरुआत रूस के दूतावास से होगी और इसके बाद यह इंडिया गेट और नेशनल वॉर मेमोरियल से होते हुए रशियन हाउस तक पहुंचेगी।

यह रूट उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से चुना गया है, जिन्होंने युद्ध के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी थी। इंडिया गेट और नेशनल वॉर मेमोरियल भारत के शहीद सैनिकों की याद में बनाए गए महत्वपूर्ण स्थल हैं। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

300 से ज्यादा राइडर्स लेंगे हिस्सा

इस कार्यक्रम में भारत और रूस के अलावा अन्य मित्र देशों के भी नागरिक हिस्सा लेंगे। कुल मिलाकर 300 से अधिक मोटरसाइकिल राइडर्स इस रैली में शामिल होंगे।

पिछले वर्ष आयोजित पहली रैली में करीब 100 से 150 राइडर्स ने हिस्सा लिया था। इस बार प्रतिभागियों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

द्वितीय विश्व युद्ध- “ग्रेट पैट्रियॉटिक वॉर”

द्वितीय विश्व युद्ध को रूस में “ग्रेट पैट्रियॉटिक वॉर” के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध 1941 से 1945 के बीच लड़ा गया था। इस दौरान सोवियत संघ के लगभग 2.7 करोड़ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।

रूस में हर साल 9 मई को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह देश के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दिनों में से एक है। नई दिल्ली में आयोजित यह रैली उसी ऐतिहासिक विजय की याद में आयोजित की जा रही है।

रैली के बाद रशियन हाउस में एक विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। इसमें विभिन्न देशों के कलाकार हिस्सा लेंगे और संगीत प्रस्तुति देंगे।

इसके साथ ही नई दिल्ली में आयोजित होने वाली फोटो प्रदर्शनी “Motorcycles in the Service of the Soviet Army” में इसी M-72 और अन्य सैन्य मोटरसाइकिलों की भूमिका को दिखाया जाएगा। इसमें युद्ध के दौरान ली गई पुरानी तस्वीरें, सैनिकों के साथ बाइक्स के दृश्य और उनके उपयोग से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित की जाएगी।

इस प्रदर्शनी का उद्देश्य यह दिखाना है कि कैसे इन मोटरसाइकिलों ने युद्ध के दौरान सेना को तेज, मोबाइल और प्रभावी बनाया। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

सोवियत सेना में मोटरसाइकिलों रहीं बेहद अहम

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत सेना ने मोटरसाइकिलों का जमकर इस्तेमाल किया था। इनका इस्तेमाल सैनिकों के संदेश पहुंचाने, टोही मिशन, हथियार ले जाने और घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जाता था। इस प्रदर्शनी के माध्यम से यह दिखाया जाएगा कि कैसे इन मोटरसाइकिलों ने युद्ध के दौरान सेना की मदद की थी।

खासकर एम-72 मॉडल ने युद्ध के मैदान में सेना की गति और क्षमता को काफी बढ़ाया। यह मोटरसाइकिल सेना के कई महत्वपूर्ण कामों में इस्तेमाल होती थी।

एम-72 की शुरुआत जर्मनी की BMW R71 बाइक से हुई। सोवियत यूनियन ने इस बाइक के कुछ नमूने हासिल किए और फिर अपने इंजीनियरों की मदद से उसी तरह की मोटरसाइकिल तैयार की। 1941 के आसपास इसका उत्पादन शुरू हुआ। यह एक मजबूत और भारी बाइक थी, जिसमें साइडकार लगा होता था। इस साइडकार में सैनिक बैठ सकते थे या हथियार और जरूरी सामान रखा जा सकता था।

इस बाइक का इंजन करीब 750cc का था और यह अच्छी स्पीड के साथ खराब रास्तों पर भी चल सकती थी। इसे खास तौर पर सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, इसलिए इसमें मजबूत फ्रेम, ऊंचे मडगार्ड और हथियार लगाने की सुविधा दी गई थी। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

सोवियत सेना में M-72 का इस्तेमाल कई तरह के कामों के लिए किया जाता था। सबसे पहले इसका उपयोग टोही यानी रिकॉनिसेंस मिशन में होता था। सैनिक इस बाइक पर आगे जाकर दुश्मन की स्थिति का पता लगाते थे और जानकारी वापस लाते थे। इसकी तेज रफ्तार और आसानी से चलने की क्षमता इसे इस काम के लिए बहुत उपयोगी बनाती थी।

इसके अलावा यह मोटरसाइकिल संदेश पहुंचाने के लिए भी इस्तेमाल होती थी। युद्ध के दौरान कई बार रेडियो संपर्क सही तरीके से काम नहीं करता था, ऐसे में सैनिक इन बाइक्स के जरिए जरूरी संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक जल्दी पहुंचाते थे।

M-72 का एक खास उपयोग यह भी था कि इसके साइडकार पर मशीन गन लगाई जा सकती थी। इससे यह एक चलती-फिरती फायरिंग यूनिट बन जाती थी। सैनिक चलते हुए भी दुश्मन पर हमला कर सकते थे। इससे पैदल सेना को काफी मदद मिलती थी। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने और जरूरी सामान सप्लाई करने में भी यह बाइक काम आती थी। साइडकार में घायल सैनिकों को ले जाया जा सकता था या फिर जरूरी दवाइयां और हथियार पहुंचाए जा सकते थे।

इसका इस्तेमाल पेट्रोलिंग और एस्कॉर्ट के लिए भी किया जाता था। कई बार वरिष्ठ अधिकारियों की सुरक्षा के लिए या सड़क पर निगरानी के लिए इन बाइक्स को तैनात किया जाता था।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान M-72 ने सोवियत सेना को तेजी से आगे बढ़ने में मदद की। खासकर बड़े सैन्य अभियानों के दौरान यह बाइक सेना की मूवमेंट को तेज बनाने में काम आई। उस समय जर्मन सेना भी इसी तरह की मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल कर रही थी, इसलिए सोवियत M-72 ने मुकाबले में बराबरी बनाए रखने में मदद की। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

Russia WWII Victory Motorcycle Rally

कई देशों के राजनयिकों होंगे शामिल

इस कार्यक्रम में 10 से अधिक देशों के राजनयिकों के शामिल होने की संभावना है। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और मित्रता का भी प्रतीक माना जा रहा है।

रैली के लिए सुबह के समय रूस दूतावास के पास सभी बाइकर्स जुटेंगे, इसके बाद निर्धारित समय पर रैली को रवाना किया जाएगा।

प्रतिभागियों के लिए सुरक्षा नियम भी तय किए गए हैं। सभी राइडर्स को हेलमेट और अन्य सुरक्षा उपकरण पहनना अनिवार्य होगा। इसके अलावा ट्रैफिक नियमों का पालन करना भी जरूरी होगा।

रैली में हिस्सा लेने वाले सभी प्रतिभागियों को आयोजकों की ओर से स्मृति चिन्ह भी दिए जाएंगे। यह आयोजन को यादगार बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। इस पूरे कार्यक्रम का मकसद द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास को याद करने और शहीदों को श्रद्धांजलि देने का कोशिश है। (Russia WWII Victory Motorcycle Rally)

यूएस-ईरान तनाव के बीच भारत का बड़ा कदम, गुआम में अमेरिका संग सबमरीन हंट का करेगा अभ्यास

Sea Dragon Exercise 2026

Sea Dragon Exercise 2026: एक तरफ जहां यूएस-ईरान वॉर में फंसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप हॉर्मुज में फंसे जहाजों की सुरक्षा के लिए नाटो देशों की नौसेनाओं का सहयोग मांग रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय नौसेना ने अमेरिका के नेतृत्व में आयोजित होने वाले बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास सी ड्रैगन एक्सरसाइज (Sea Dragon Exercise 2026) में हिस्सा लेने के लिए अपने अत्याधुनिक P-8I समुद्री निगरानी विमान को गुआम भेजा है। यह अभ्यास इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते समुद्री खतरों के बीच एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। खास बात यह है कि क्वॉड में शमिल ऑस्ट्रेलिया, जापान ने अमेरिका के होर्मुज मिशन से इनकार किया है।

यह अभ्यास 9 मार्च से शुरू हो चुका है, जो 24 मार्च तक चलेगा। इसमें क्वॉड देशों अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान के अलावा न्यूजीलैंड जैसे देशों की भागीदारी है। यह क्वाड+ फॉर्मेट में आती है। इन सभी देशों के समुद्री गश्ती विमान इस अभ्यास में शामिल हैं। यह एक्सरसाइज इंडो-पैसिफिक में बढ़ते सबमरीन थ्रेट्स (खासकर चीन की पीएलए नेवी) के खिलाफ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर स्किल्स को मजबूत करने के लिए की जाती है। (Sea Dragon Exercise 2026)

Sea Dragon Exercise 2026: गुआम में आयोजित हो रहा है अभ्यास

सी ड्रैगन एक्सरसाइज का आयोजन हर साल गुआम के एंडरसन एयर फोर्स बेस पर किया जाता है। यह क्षेत्र पश्चिमी प्रशांत महासागर में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अमेरिका की सातवीं फ्लीट भी इसी क्षेत्र में एक्टिव रहती है।

इस अभ्यास की शुरुआत साल 2019 में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच द्विपक्षीय स्तर पर हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे इसमें अन्य देशों को भी शामिल किया गया और अब यह एक बहुराष्ट्रीय अभ्यास बन चुका है। (Sea Dragon Exercise 2026)

किन देशों की भागीदारी

इस अभ्यास में अमेरिका की नौसेना के दो पी-8ए पोसाइडन विमान, भारत का एक पी-8आई विमान, ऑस्ट्रेलिया के दो पी-8ए, न्यूजीलैंड का एक पी-8ए और जापान का पी-1 समुद्री निगरानी विमान शामिल है।

इन सभी विमानों की खास बात यह है कि इनके मिशन सिस्टम, सेंसर और डेटा लिंक काफी हद तक एक जैसे हैं। इससे अलग-अलग देशों के बीच बेहतर तालमेल और रीयल टाइम जानकारी शेयर करना आसान हो जाता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

P-8I विमान की खूबियां

भारतीय नौसेना का पी-8आई विमान लंबी दूरी तक समुद्र की निगरानी करने में सक्षम है। यह विमान बोइंग 737 प्लेटफॉर्म पर आधारित है और इसमें आधुनिक सेंसर और हथियार सिस्टम लगाए गए हैं।

इस विमान में मैग्नेटिक एनोमली डिटेक्टर, एडवांस रडार सिस्टम, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड कैमरा जैसे उपकरण लगे होते हैं। यह समुद्र के अंदर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करता है।

इसके अलावा इसमें टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल जैसे हथियार भी लगाए जा सकते हैं, जिससे यह केवल निगरानी ही नहीं, बल्कि कार्रवाई करने में भी सक्षम होता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

कैसे होती है ट्रेनिंग

इस अभ्यास के दौरान पायलट और एयरक्रू पहले क्लासरूम में बैठकर जॉइंट स्ट्रेटेजी पर चर्चा करते हैं। इसके बाद सिमुलेशन के जरिए अभ्यास किया जाता है।

फिर वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में पनडुब्बियों को खोजने और ट्रैक करने का अभ्यास किया जाता है। इस पूरे अभ्यास के दौरान करीब 200 घंटे से ज्यादा उड़ान प्रशिक्षण किया जाता है।

ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के एक आधिकारिक बयान में कहा गया, “यह अभ्यास पनडुब्बी रोधी युद्ध में एयरक्रू की क्षमता को बेहतर बनाता है। इसमें प्रशिक्षण की शुरुआत ट्रैक-सिमुलेटेड लक्ष्यों से होती है और धीरे-धीरे वास्तविक पनडुब्बी का पता लगाने और उसे ट्रैक करने तक पहुंचती है। इस दौरान क्रू कुल मिलाकर 200 घंटे से अधिक उड़ान प्रशिक्षण में हिस्सा लेते हैं।”

इस प्रशिक्षण में शुरुआत आसान लक्ष्यों से होती है और धीरे-धीरे इसे असली पनडुब्बियों तक ले जाया जाता है। इससे एयरक्रू की क्षमता और कॉर्डिनेशन को परखा जाता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

कॉम्पिटिटिव फॉर्मेट भी शामिल

सी ड्रैगन एक्सरसाइज की एक खास बात यह भी है कि इसमें भाग लेने वाले देशों के प्रदर्शन को अंक दिए जाते हैं। जो देश सबसे बेहतर प्रदर्शन करता है उसे ड्रैगन बेल्ट अवॉर्ड दिया जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में जापान और ऑस्ट्रेलिया ने इस अवॉर्ड को जीता है। इससे यह अभ्यास केवल प्रशिक्षण ही नहीं बल्कि एक प्रतिस्पर्धात्मक चुनौती भी बन जाता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

गुआम ही क्यों?

इससे पहले मालाबार एक्सरसाइज भी नवंबर 2025 में गुआम के आसपास हुई थी। जो क्वॉड देशों (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) की सबसे प्रमुख और स्पेसिफिक नेवल एक्सरसाइज है। यह क्वॉड का कोर मिलिट्री कोऑपरेशन है, जो 1992 में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय से शुरू होकर अब पूर्ण क्वॉड फॉर्मेट में चलती है।

गुआम को इस अभ्यास के लिए चुनने के पीछे कई अहम रणनीतिक वजहें हैं। सबसे पहले इसकी लोकेशन की बात करें, तो गुआम पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिका का एक प्रमुख स्ट्रैटेजिक हब है, जहां एंडरसन एयर फोर्स बेस और नेवल बेस गुआम मौजूद हैं। यह इलाका “सेकंड आइलैंड चेन” का हिस्सा माना जाता है, जो चीन की पीएलए नेवी की बढ़ती गतिविधियों, खासकर ताइवान और साउथ चाइना सी के आसपास, को संतुलित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। (Sea Dragon Exercise 2026)

इसके अलावा गुआम का लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर भी अहम है। यहां बड़े एयरफील्ड, पोर्ट और सपोर्ट सुविधाएं मौजूद हैं, जिससे पी-8 जैसे मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट आसानी से ऑपरेट कर सकते हैं। वहीं नौसेना के जहाज अप्रा हार्बर में तैनात किए जा सकते हैं, जिससे ऑपरेशन को लगातार सपोर्ट मिलता रहता है।

ट्रेनिंग के लिहाज से भी गुआम के आसपास का खुला समुद्री क्षेत्र बेहद उपयुक्त है। यहां बड़े स्तर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, सतह और हवाई ऑपरेशन का अभ्यास किया जा सकता है। साथ ही यह अमेरिका की सातवीं फ्लीट का प्रमुख ऑपरेशनल बेस भी है। (Sea Dragon Exercise 2026)

भारत की लगातार भागीदारी

भारत ने 2021-22 के बाद से इस अभ्यास में लगातार भाग लिया है। भारतीय नौसेना के पी-8आई विमान अरक्कोनम स्थित आईएनएस राजाली और गोवा के आईएनएस हंसा से ऑपरेट किए जाते हैं। यह अभ्यास भारतीय नौसेना को आधुनिक पनडुब्बी रोधी तकनीकों और संयुक्त ऑपरेशन की बेहतर समझ देता है। (Sea Dragon Exercise 2026)

इंडो-पैसिफिक में बढ़ीं सैन्य गतिविधियां

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हाल के समय में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। चीन की नौसेना द्वारा ताइवान के आसपास बढ़ती गतिविधियां और अन्य देशों की तैनाती ने इस क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है। इसी के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा इस तरह के अभ्यास आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि समुद्री सुरक्षा और निगरानी को मजबूत किया जा सके।

इस अभ्यास के साथ ही भारतीय नौसेना अरब सागर में भी सक्रिय है। हाल ही में नौसेना ने पश्चिम एशिया से आने वाले भारतीय जहाजों को एस्कॉर्ट करने का काम किया है। इसके अलावा भारतीय नौसेना ने हाल ही में एक सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में भी हिस्सा लिया, जब एक विदेशी युद्धपोत को नुकसान पहुंचने के बाद मदद की जरूरत पड़ी थी। भारतीय नौसेना का पी-8आई विमान और युद्धपोत तुरंत मौके पर पहुंचकर राहत कार्य में शामिल हुए। (Sea Dragon Exercise 2026)

IDS चीफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित बोले- कारगिल से मिला सबक, ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाई संयुक्त सैन्य ताकत

Indian Armed Forces
Chief of Integrated Defence Staff Air Marshal Ashutosh Dixit speaking at 5th CDS General Bipin Rawat Memorial Lecture organized by GBR Memorial Foundation of India at Constitution Club of India.

Indian Armed Forces: भारत के चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं की संयुक्त ताकत को दुनिया ने देखा। उन्होंने कहा कि जिस तरह कारगिल युद्ध के दौरान अलग-अलग काम करने की कमजोरी को उजागर किया था, उसी तरह ऑपरेशन सिंदूर ने इंटीग्रेटेड सैन्य कार्रवाई की ताकत को सामने रखा।

एयर मार्शल दीक्षित ने यह बात जनरल बिपिन रावत मेमोरियल लेक्चर के दौरान कही। यह कार्यक्रम भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत की 68वीं जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का आयोजन जीबीआर मेमोरियल फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में किया।

Indian Armed Forces: ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि मई 2025 में पहलगाम में हुए बड़े आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत की तीनों सेनाओं ने मिलकर जवाबी कार्रवाई की थी। इस संयुक्त अभियान को ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया था।

उन्होंने बताया कि भारत के स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने एक साथ मिलकर एक सीमा पार आतंकवाद विरोधी अभियान की योजना बनाई, उसे तैयार किया और फिर उसे अंजाम दिया।

एयर मार्शल दीक्षित के अनुसार इस अभियान में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय देखने को मिला। यह पूरी कार्रवाई एकीकृत दिशा और संयुक्त योजना के तहत की गई थी।

Indian Armed Forces

22 मिनट में शुरू हुआ अभियान

उन्होंने बताया कि यह ऑपरेशन 7 मई को शुरू किया गया था। ऑपरेशन की शुरुआत केवल 22 मिनट के भीतर कर दी गई थी। इसके बाद लगभग 88 घंटे तक सैन्य कार्रवाई जारी रही।

इस अभियान के दौरान नौ उच्च मूल्य वाले आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इनमें से सात ठिकानों को भारतीय सेना ने वायुसेना की मदद से निशाना बनाया।

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि यह अभियान सटीकता और रणनीतिक गहराई का उदाहरण था। इस कार्रवाई में सभी सैन्य शाखाओं ने अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नौसेना की भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नौसेना ने अरब सागर में अपने कैरियर बैटल ग्रुप और युद्धपोत तैनात किए।

इन तैनातियों का उद्देश्य समुद्र में नियंत्रण स्थापित करना और क्षेत्र में संभावित खतरों को सीमित करना था। नौसेना की मौजूदगी के कारण पाकिस्तान के समुद्री और हवाई तत्वों पर भी दबाव बना रहा।

कारगिल युद्ध से मिला सबक

एयर मार्शल दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि कारगिल युद्ध ने यह दिखाया था कि जब सैन्य बलों के बीच समन्वय कम होता है तो उसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

उन्होंने कहा कि उस अनुभव से सीख लेते हुए भारत ने संयुक्त सैन्य संस्कृति विकसित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऑपरेशन सिंदूर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर सामने आया।

थिएटर कमांड अभी भी पेंडिंग

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि भारत में इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड की स्थापना अभी पूरी तरह से नहीं हो पाई है। उन्होंने बताया कि सैन्य संस्थानों के बीच अभी भी कुछ अलग-अलग प्रोसीजर्स मौजूद हैं जिन्हें खत्म करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इसके लिए जॉइंट ट्रेनिंग, शेयर्ड मिलिटरी डॉक्ट्रिन और निरंतर शिक्षा की जरूरत है। साथ ही तीनों सेनाओं के बीच ज्ञान साझा करने की प्रक्रिया को भी मजबूत करना होगा।

जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि

कार्यक्रम के दौरान जनरल बिपिन रावत के जीवन और नेतृत्व को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि भारत में थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता में भी जनरल रावत की दूरदर्शी सोच का बड़ा योगदान रहा है।

इस कार्यक्रम में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे। इनमें भारत के पूर्व वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया, जनरल बिपिन रावत की पत्नी तरिणी रावत और एयर वाइस मार्शल राजेश भंडारी भी शामिल थे। कार्यक्रम में जनरल बिपिन रावत के नेतृत्व, सैन्य सेवा और देश के प्रति उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंसे भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकाल रही भारतीय नौसेना, युद्ध के बीच 3 वॉरशिप कर रहे एस्कॉर्ट

Hormuz, Indian Navy, Gulf of Oman, Maritime Security, Defence News, Naval Deployment, Oil Trade, IFC IOR, Shipping, Global Crisis
Shivalik Arrival at LPG terminal Mundra Port. LPG vessel, Shivalik arrival at LPG terminal Mundra Port today. With total Quantity 46000MT. 20000MT will be unloaded at Mundra and 26000MT will be unloaded at Mangalore. Vessel is carrying the liquid LPG ordered by IOCL.

Strait of Hormuz Escort: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एस्कॉर्ट अभियान के तहत भारतीय नौसेना लगातार भारतीय ध्वज लगे जहाजों को सुरक्षित निकालने का काम कर रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार भारतीय नौसेना के युद्धपोत इस समय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और आसपास के समुद्री इलाकों में सक्रिय रूप से तैनात हैं और भारतीय जहाजों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।

हाल ही में भारतीय ध्वज वाला एक और जहाज सुरक्षित रूप से इस इलाके से निकलकर भारत के लिए रवाना हुआ है। इससे पहले भी दो भारतीय जहाजों को नौसेना के युद्धपोतों ने एस्कॉर्ट करते हुए सुरक्षित रास्ता दिया था। (Strait of Hormuz Escort)

Strait of Hormuz Escort: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकल रहे भारतीय जहाज

सरकारी सूत्रों के अनुसार एलपीजी कैरियर शिवालिक और नंदा देवी के बाद अब तीसरा भारतीय ध्वज वाला जहाज जग लाडकी भी सुरक्षित रूप से इस संवेदनशील समुद्री मार्ग से निकल चुका है। जग लाडकी फुजैराह ऑयल टर्मिनल पर हमले से बाल-बाल बचा था। बताया गया है कि यह जहाज पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्र से भारत के लिए रवाना हुआ।

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत देर रात से इस जहाज को एस्कॉर्ट करते हुए सुरक्षित समुद्री इलाके तक लेकर गया। इससे पहले भी भारतीय नौसेना के जहाजों ने शिवालिक और नंदा देवी को इसी तरह सुरक्षा प्रदान की थी।

ये तीनों जहाज सफलतापूर्वक निकल चुके हैं, लेकिन अन्य 22 जहाज अभी भी क्षेत्र में हैं, जिनकी एस्कॉर्ट की तैयारी है। इन जहाजों के सुरक्षित निकलने को भारतीय नौसेना के सक्रिय समुद्री निगरानी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। (Strait of Hormuz Escort)

मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट के तहत तैनाती

भारतीय नौसेना वर्ष 2017 से मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट रणनीति के तहत दुनिया के कई महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में अपने युद्धपोत तैनात कर रही है। इस रणनीति का उद्देश्य समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना है।

इस मिशन के तहत भारतीय नौसेना के युद्धपोत लगातार अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में तैनात रहते हैं और वहां की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। (Strait of Hormuz Escort)

ऑपरेशन संकल्प और एंटी पायरेसी ऑपरेशन

ओमान की खाड़ी के पास भारतीय नौसेना ऑपरेशन संकल्प चला रही है। इस ऑपरेशन का उद्देश्य क्षेत्र में मौजूद भारतीय जहाजों और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा करना है।

इसके अलावा अदन की खाड़ी में भारतीय नौसेना एंटी पायरेसी ऑपरेशन भी चला रही है। इस क्षेत्र में सोमालिया और जिबूती के समुद्री डाकुओं की गतिविधियों को देखते हुए यह अभियान शुरू किया गया था।

सूत्रों के अनुसार अदन की खाड़ी के पास फिलहाल भारतीय नौसेना के तीन युद्धपोत ऑपरेट कर रहे हैं। ये जहाज समुद्री गतिविधियों की निगरानी के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर जहाजों को सुरक्षा भी प्रदान कर रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि ये तीनों शिप डेस्ट्रॉयर कैटेगरी के हैं और इन पर मार्कोस कमांडोज तैनात हैं। (Strait of Hormuz Escort)

ओमान की खाड़ी में तैनात आईएनएस सूरत

ओमान की खाड़ी के पास भारतीय नौसेना का आधुनिक गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर आईएनएस सूरत तैनात है। यह युद्धपोत क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों की निगरानी कर रहा है।

सूत्रों के अनुसार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री ट्रैफिक प्रभावित होने के बाद से भारतीय नौसेना लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। नौसेना के युद्धपोत और निगरानी प्रणाली इस पूरे समुद्री इलाके की गतिविधियों को मॉनिटर कर रही है। (Strait of Hormuz Escort)

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रणनीतिक अहमियत

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी तक जाने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद अहम है।

भारत के लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के कुल ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है। अनुमान के अनुसार भारत के लगभग 80 फीसदी ऊर्जा व्यापार का संबंध इस समुद्री मार्ग से है।

इसी कारण इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सुरक्षा चुनौती का असर सीधे भारत के एनर्जी सप्लाई सिस्टम पर पड़ सकता है। (Strait of Hormuz Escort)

अदन की खाड़ी में तैनाती

भारतीय नौसेना की दूसरी बड़ी तैनाती अदन की खाड़ी में है। यह क्षेत्र भी वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

भारत का लगभग 90 फीसदी समुद्री व्यापार इस मार्ग से होकर गुजरता है। यह व्यापार सुएज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी से होते हुए अरब सागर के रास्ते भारत तक पहुंचता है।

अदन की खाड़ी लंबे समय से समुद्री डकैती के लिए संवेदनशील क्षेत्र रही है। सोमालिया के समुद्री डाकू इस क्षेत्र में कई बार व्यापारी जहाजों को निशाना बना चुके हैं।

इसी खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना लंबे समय से इस क्षेत्र में एंटी पायरेसी मिशन चला रही है। (Strait of Hormuz Escort)

वैकल्पिक समुद्री मार्ग की चुनौती

अदन की खाड़ी का मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सबसे छोटा समुद्री रास्ता माना जाता है। इसलिए यहां जहाजों की आवाजाही भी अधिक रहती है।

यदि किसी कारण से यह मार्ग बाधित हो जाए, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर केप ऑफ गुड होप के रास्ते आना-जाना पड़ता है। यह मार्ग काफी लंबा है और इससे यात्रा का समय बढ़ जाता है।

इसके अलावा जहाजों की ऑपरेशनल लागत भी बढ़ जाती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। (Strait of Hormuz Escort)

छह इलाकों में भारतीय नौसेना की तैनाती

मिशन बेस्ड डिप्लॉयमेंट के तहत भारतीय नौसेना दुनिया के छह अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में अपने युद्धपोत तैनात रखती है।

पहली तैनाती अरब सागर में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास है। दूसरी तैनाती अदन की खाड़ी में है। तीसरी तैनाती सेशेल्स के पास की जाती है, ताकि केप ऑफ गुड होप मार्ग से आने वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

इसके अलावा चौथी तैनाती मालदीव के पास, पांचवीं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पास और छठी तैनाती बंगाल की खाड़ी में म्यांमार और बांग्लादेश सीमा के आसपास की जाती है। (Strait of Hormuz Escort)

समुद्री सुरक्षा और सहयोग

इन तैनातियों के दौरान भारतीय नौसेना के युद्धपोत कई अन्य देशों की नौसेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास भी करते हैं। इसके अलावा समुद्र में किसी दुर्घटना की स्थिति में राहत और बचाव अभियान भी चलाए जाते हैं।

समुद्री डकैती, जहाजों पर हमले या किसी आपात स्थिति में भारतीय नौसेना तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता रखती है।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्र में स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और भारतीय ध्वज वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। (Strait of Hormuz Escort)

भारत की क्या है रणनीति

यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद हो जाता है, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे (केप ऑफ गुड होप) से गुजरना पड़ेगा, जो 10-15 दिन अतिरिक्त समय और लाखों डॉलर अतिरिक्त लागत बढ़ सकती है। इससे भारत में ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

भारतीय नौसेना की यह सक्रिय भूमिका न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि भारत की बढ़ती नौसैनिक क्षमता और क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान को भी दर्शाती है। सूत्रों के अनुसार, सभी भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। यह ऑपरेशन भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘सागरमाला’ जैसी नीतियों के साथ जुड़ा है, जहां समुद्री मार्गों की सुरक्षा राष्ट्रीय हितों का केंद्र है। (Strait of Hormuz Escort)

ईरान ने पहली बार दागी ‘डांसिंग मिसाइल’ सेज्जिल, 7 मिनट में 2000 किमी दूर तक मार

Sejjil Missile- Iran Fires Sejjil Ballistic Missile for First Time in War with US and Israel
Sejjil Missile- Iran Fires Sejjil Ballistic Missile for First Time in War with US and Israel

Sejjil Missile: पश्चिम एशिया में जारी यूएस-इजराइल ईरान वॉर को शुरू हुए 17 दिन हो गए हैं। इस बीच ईरान ने पहली बार अपनी एडवांस सेज्जिल बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया है। IRGC के मुताबिक यह सॉलिड फ्यूल से चलने वाली इस रणनीतिक मिसाइल को ईरान ने रविवार को लॉन्च किया। यह वही मिसाइल है जिसे ईरान की सबसे खतरनाक और शक्तिशाली मिसाइलों में से एक माना जाता है।

ईरान और इजराइल के बीच चल रहे इस संघर्ष के दौरान यह पहली बार है जब सेज्जिल मिसाइल को वास्तविक युद्ध में इस्तेमाल किए जाने की खबर सामने आई है। इस मिसाइल के इस्तेमाल के बाद पूरे क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं पर नई चर्चा शुरू हो गई है। यह मिसाइल करीब 2000–2500 किलोमीटर तक मारक क्षमता रखती है और इसे बहुत जल्दी लॉन्च किया जा सकता है। (Sejjil Missile)

Sejjil Missile: युद्ध के बीच पहली बार इस्तेमाल

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध लगातार तेज होता जा रहा है। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।

युद्ध के दौरान ईरान ने कई मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसी दौरान ईरान ने पहली बार सेज्जिल-2 बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया। इस मिसाइल को ईरान के सबसे एडवांस हथियारों में गिना जाता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार यह मिसाइल बहुत कम समय में अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है। इसकी लंबी दूरी और तेज गति के कारण इसे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। (Sejjil Missile)

क्या है सेज्जिल मिसाइल

सेज्जिल एक दो चरण वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसे ईरान के रक्षा उद्योग ने विकसित किया है। इस मिसाइल को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। इसे अशूरा या अशौरा मिसाइल भी कहा जाता है।

यह मिसाइल पूरी तरह सॉलिड प्रोपेलेंट यानी ठोस ईंधन से चलती है। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। पहले ईरान की कई मिसाइलें लिक्विड फ्यूल पर आधारित थीं, जिन्हें लॉन्च करने से पहले काफी तैयारी करनी पड़ती थी।

सॉलिड फ्यूल मिसाइल होने के कारण सेज्जिल को कम समय में लॉन्च किया जा सकता है। इससे दुश्मन को जवाबी कार्रवाई का कम समय मिलता है। (Sejjil Missile)

मिसाइल की लंबाई और वजन

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार सेज्जिल मिसाइल की लंबाई लगभग 18 मीटर है। इसका व्यास लगभग 1.25 मीटर बताया जाता है। इस मिसाइल का कुल वजन करीब 23,600 किलोग्राम तक हो सकता है। इसकी रफ्तार टर्मिनल वेलोसिटी मैक 12+ (ध्वनि की गति से 12 गुना ज्यादा) है, जो इंटरसेप्शन को मुश्किल बनाती है।

इसमें लगभग 700 किलोग्राम वजन का वारहेड लगाया जा सकता है। वारहेड का उपयोग लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इतने बड़े वारहेड के कारण यह मिसाइल बड़े सैन्य ठिकानों या बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने में सक्षम मानी जाती है। (Sejjil Missile)

लगभग 2000 किलोमीटर की रेंज

रिपोर्ट्स के अनुसार सेज्जिल मिसाइल की अधिकतम रेंज लगभग 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसका मतलब है कि ईरान से लॉन्च होने पर यह मिसाइल पश्चिम एशिया के बड़े हिस्से तक पहुंच सकती है।

इस दूरी में इजराइल, सऊदी अरब, तुर्की और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी आते हैं। यही वजह है कि इस मिसाइल को क्षेत्र की रणनीतिक संतुलन में महत्वपूर्ण माना जाता है। (Sejjil Missile)

क्यों कहा जाता है “डांसिंग मिसाइल”

रक्षा विशेषज्ञों के बीच सेज्जिल मिसाइल को कभी-कभी “डांसिंग मिसाइल” भी कहा जाता है। यह नाम इसकी उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता से जुड़ा है।

आमतौर पर बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च होने के बाद एक तय रास्ते पर चलती हैं। लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सेज्जिल मिसाइल उड़ान के दौरान अपनी दिशा में बदलाव कर सकती है।

अगर ऐसा होता है तो मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए इसे ट्रैक करना कठिन हो सकता है। इसी कारण इसे “डांसिंग मिसाइल” का नाम दिया गया है। (Sejjil Missile)

कब शुरू हुआ सेज्जिल मिसाइल का डेवलपमेंट

ईरान का मिसाइल कार्यक्रम कई दशकों से विकसित हो रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार सेज्जिल मिसाइल का विकास 1990 के दशक में शुरू हुआ था।

इस मिसाइल का पहला ज्ञात परीक्षण 2008 में किया गया था। उस समय यह मिसाइल लगभग 800 किलोमीटर तक गई थी। इसके बाद 2009 में इसका दूसरा परीक्षण किया गया जिसमें गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम को बेहतर बनाने की कोशिश की गई। (Sejjil Missile)

इसके बाद भी कई उड़ान परीक्षण किए गए। एक परीक्षण में यह मिसाइल लगभग 1900 किलोमीटर तक जाने की जानकारी सामने आई थी।

ईरान के सरकारी मीडिया ने दावा किया है कि हाल के हमलों में इस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। बताया गया कि यह हमला इजराइल और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को ध्यान में रखकर किया गया था।

इजराइल की ओर से भी मिसाइल हमलों की पुष्टि की गई है। कुछ रिपोर्ट्स में तेल अवीव के आसपास हमलों के दौरान घायल होने की जानकारी दी गई है। हालांकि हर हमले में किस प्रकार की मिसाइल इस्तेमाल हुई, इसकी स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। (Sejjil Missile)

लगातार गंभीर होता जा रहा है युद्ध

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच यह युद्ध लगातार गंभीर होता जा रहा है। संघर्ष शुरू होने के बाद से दोनों पक्षों की ओर से कई हमले किए जा चुके हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक इस युद्ध में 2000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। कई शहरों में बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं।

इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। विशेष रूप से ऊर्जा बाजार पर इसका प्रभाव देखा जा रहा है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने के बाद कई देशों को वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति के रास्ते तलाशने पड़े हैं। (Sejjil Missile)

पश्चिम एशिया में कई देशों ने पिछले वर्षों में अपनी मिसाइल क्षमताओं को बढ़ाया है। ईरान, इजराइल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां लगातार नए हथियार और मिसाइल तकनीक विकसित कर रही हैं। सेज्जिल मिसाइल के इस्तेमाल की खबर आने के बाद ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर फिर से वैश्विक ध्यान गया है। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह की लंबी दूरी की मिसाइलें क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित करती हैं। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव के बीच इस मिसाइल का उपयोग एक महत्वपूर्ण सैन्य घटनाक्रम माना जा रहा है। (Sejjil Missile)

भारतीय सेना की 7वीं पिनाका रेजिमेंट एक्टिव, 250 किमी रेंज वाले महेश्वरास्त्र की तैयारी!

Pinaka Rocket System
Pinaka MBRL

Pinaka Rocket System: भारतीय सेना अपनी लंबी दूरी की फायरपावर क्षमता को मजबूत करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। भारतीय सेना ने इसी दिशा में आगे कदम बढ़ाते हुए एक और पिनाका रॉकेट सिस्टम की रेजिमेंट को ऑपरेशनल कर दिया है। सूत्रों के अनुसार अब भारतीय सेना की सातवीं पिनाका रेजिमेंट एक्टिव हो चुकी है और आठवीं रेजिमेंट को भी इस साल के आखिर तक पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने की तैयारी चल रही है।

सेना के अधिकारियों ने बताया कि आठवीं रेजिमेंट का गठन किया जा चुका है और इसके लिए जरूरी उपकरणों का आधे से ज्यादा हिस्सा भी मिल चुका है। इस समय यह यूनिट कन्वर्जन और ट्रेनिंग की प्रक्रिया से गुजर रही है। उम्मीद है कि यह रेजिमेंट भी साल खत्म होने से पहले पूरी तरह तैयार हो जाएगी। (Pinaka Rocket System)

Pinaka Rocket System: बढ़ रही पिनाका रेजिमेंट्स की संख्या

भारतीय सेना ने वर्ष 2020 में छह नई पिनाका रेजिमेंट्स के लिए ऑर्डर दिया था। इनमें से दो और रेजिमेंट अगले साल तक तैयार होने की संभावना है। अगर यह योजना तय समय के अनुसार पूरी होती है तो भारतीय सेना के पास कुल दस पिनाका रेजिमेंट एक्टिव हो जाएंगी।

2010 से 2020 के बीच सेना ने चार पिनाका रेजिमेंट का ऑर्डर दिया था। इसके बाद 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी क्षेत्र में चीन के साथ हुए सैन्य तनाव के बाद रॉकेट आर्टिलरी की क्षमता बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया गया। उसी के बाद इस सिस्टम के विस्तार की रफ्तार बढ़ाई गई। (Pinaka Rocket System)

2,580 करोड़ रुपये का रक्षा सौदा

2020 में रक्षा मंत्रालय ने लगभग 2,580 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। यह कॉन्ट्रैक्ट बीईएमएल, टाटा पावर कंपनी लिमिटेड और लार्सन एंड टुब्रो जैसी कंपनियों के साथ किया गया था। इस सौदे के तहत छह अतिरिक्त पिनाका रेजिमेंट के लिए उपकरणों की खरीद का फैसला लिया गया।

इस ऑर्डर में कुल 114 लॉन्चर, 45 कमांड पोस्ट और 330 सपोर्ट व्हीकल्स शामिल थे। इन लॉन्चर्स में ऑटोमेटेड गन एमिंग एंड पोजिशनिंग सिस्टम लगाया गया है, जिससे रॉकेट को टारगेट की ओर सटीक तरीके से दागा जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

आर्टिलरी रेजिमेंट का स्ट्रक्चर

आर्टिलरी की भाषा में एक रेजिमेंट सेना की मूल ऑपरेशनल यूनिट होती है। आमतौर पर एक रेजिमेंट में तीन बैटरियां होती हैं। हर बैटरी में छह पिनाका लॉन्चर होते हैं। इस तरह एक रेजिमेंट में कुल 18 लॉन्चर सक्रिय रूप से तैनात रहते हैं।

इसके अलावा दो अतिरिक्त लॉन्चर ट्रेनिंग और युद्ध के समय बैकअप के लिए रखे जाते हैं। इस तरह एक रेजिमेंट में कुल मिलाकर लगभग 20 लॉन्चर मौजूद होते हैं। (Pinaka Rocket System)

कुछ सेकंड में भारी फायरपावर

पिनाका रॉकेट सिस्टम की खासियत इसकी तेज और भारी फायरपावर है। एक बैटरी में मौजूद छह लॉन्चर लगभग 44 सेकंड में 72 रॉकेट दाग सकते हैं। इन रॉकेटों की बारिश से लगभग 1000 मीटर × 800 मीटर के क्षेत्र को कुछ ही मिनटों में निशाना बनाया जा सकता है।

इस तरह के हमले का उद्देश्य दुश्मन के सैनिक जमावड़े, आर्टिलरी पोजिशन, लॉजिस्टिक बेस और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को तेजी से निष्क्रिय करना होता है। (Pinaka Rocket System)

पिनाका के अलग-अलग वेरिएंट

भारतीय सेना पिनाका सिस्टम के कई अलग-अलग वेरिएंट का उपयोग करती है। इन वेरिएंट की मारक क्षमता धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है।

पिनाका का शुरुआती एमके-1 रॉकेट लगभग 37 से 40 किलोमीटर तक के लक्ष्य को निशाना बना सकता है। इसके बाद डेवलप किए गए एमके-2 एक्सटेंडेड रेंज रॉकेट की मारक क्षमता लगभग 60 किलोमीटर तक है।

इसके अलावा सेना के पास गाइडेड पिनाका रॉकेट भी हैं जो लगभग 75 से 90 किलोमीटर तक के लक्ष्य को ज्यादा सटीकता के साथ निशाना बना सकते हैं। (Pinaka Rocket System)

120 किलोमीटर रेंज का परीक्षण

पिछले साल दिसंबर में डीआरडीओ ने पिनाका लॉन्चर से एक लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण किया था। इस रॉकेट ने लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्य को सटीकता से निशाना बनाया।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस नए वेरिएंट में कई देशों ने रुचि दिखाई है और फ्रांस भी इस तकनीक में दिलचस्पी दिखा रहा है। (Pinaka Rocket System)

पिनाका रॉकेट में रैमजेट इंजन

रैमजेट पिनाका परियोजना में पिनाका रॉकेट सिस्टम को एडवांस बनाने पर काम हो रहा है। इसमें रैमजेट इंजन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इस तकनीक से रॉकेट की रेंज काफी बढ़ाई जा सकती है।

मौजूदा पिनाका सिस्टम की अधिकतम रेंज लगभग 120 किलोमीटर है। रामजेट तकनीक के इस्तेमाल से इसे 225 से 250 किलोमीटर तक बढ़ाने की योजना है।

यह परियोजना आईआईटी मद्रास और भारतीय सेना के सहयोग से विकसित की जा रही है। इस प्रोजेक्ट पर काम वर्ष 2020 में शुरू हुआ था। रिपोर्ट्स के अनुसार इसका परीक्षण चरण 2026 में शुरू हो सकता है।

रैमजेट तकनीक की मदद से रॉकेट की गति भी बढ़ेगी और इसकी अंतिम टर्मिनल वेलोसिटी अधिक होगी। इससे यह दुश्मन के एंटी-मिसाइल सिस्टम से बचते हुए लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम हो सकता है। (Pinaka Rocket System)

क्या है महेश्वरास्त्र-1 और महेश्वरास्त्र-2 प्रोजेक्ट

महेश्वरास्त्र भारत में विकसित की जा रही एक लंबी दूरी की आधुनिक रॉकेट प्रणाली है। इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार करने की योजना है। यह प्रोजेक्ट मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत विकसित किया जा रहा है। इस सिस्टम को सोलर इंडस्ट्रीज लिमिटेड नाम की भारतीय कंपनी विकसित कर रही है। यह प्रोजेक्ट रक्षा मंत्रालय की मेक-II कैटेगरी में आता है। इस कैटेगरी में कंपनियां अपने खर्च पर हथियार या तकनीक का प्रोटोटाइप बनाती हैं और बाद में सेना के परीक्षण के बाद उसका उपयोग तय किया जाता है।

महेश्वरास्त्र प्रोजेक्ट की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी। अभी यह सिस्टम सीएडी यानी कंप्यूटर-एडेड डिजाइन चरण में है। इसका मतलब है कि फिलहाल इसका डिजाइन और कंप्यूटर सिमुलेशन तैयार किया जा रहा है। इसके बाद प्रोटोटाइप तैयार किया जाएगा और फिर परीक्षण किए जाएंगे। (Pinaka Rocket System)

महेश्वरास्त्र का पहला संस्करण महेश्वरास्त्र-1 होगा। इसकी अनुमानित मारक क्षमता लगभग 150 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इस रॉकेट सिस्टम में लगभग 250 किलोग्राम वजन का वारहेड लगाया जा सकेगा। वारहेड यानी विस्फोटक भाग अलग-अलग प्रकार का हो सकता है। इसमें हाई-एक्सप्लोसिव, फ्रैगमेंटेशन या एंटी-पर्सनल वारहेड शामिल हो सकते हैं।

महेश्वरास्त्र-1 एक मल्टी-बैरेल गाइडेड रॉकेट लॉन्चर सिस्टम होगा। इसका मतलब है कि इसमें एक साथ कई रॉकेट दागने की क्षमता होगी। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह दुश्मन के सैनिक जमावड़े, आर्टिलरी पोजिशन, लॉजिस्टिक बेस और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बना सके। (Pinaka Rocket System)

इस रॉकेट का कैलिबर लगभग 300 मिलीमीटर के आसपास होगा। इसमें आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगाया जाएगा जिसमें इनर्शियल नेविगेशन और जीपीएस या नाविक सैटेलाइट सिस्टम का उपयोग किया जाएगा। इसकी सटीकता बहुत अधिक बताई जा रही है और इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी 10 मीटर से कम रखने की योजना है।

महेश्वरास्त्र का दूसरा और ज्यादा एडवांस वर्जन महेश्वरास्त्र-2 होगा। इसकी अनुमानित रेंज लगभग 250 से 290 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इस सिस्टम में भी लगभग 250 किलोग्राम या उससे अधिक वजन का वारहेड लगाया जा सकेगा।

महेश्वरास्त्र-2 में लंबी दूरी के लिए बेहतर प्रोपेलेंट और एडवांस गाइडेंस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे यह सिस्टम दूर स्थित लक्ष्यों को ज्यादा सटीकता के साथ निशाना बना सकेगा।

दोनों सिस्टम्स को हाई-मोबिलिटी व्हीकल पर लगाया जाएगा। आमतौर पर ऐसे सिस्टम्स को टाट्रा 8×8 जैसे सैन्य ट्रकों पर लगाया जाता है। इससे इन्हें तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत तैनात किया जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

बता दें कि महेश्वरास्त्र सिस्टम डिजाइन और सिमुलेशन चरण में है। इसका प्रोटोटाइप परीक्षण 2026-27 के आसपास शुरू हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि अगर डेवलपमेंट और ट्रायल्स तय समय पर पूरे हो जाते हैं तो यह सिस्टम 2028 से 2030 के बीच भारतीय सेना में शामिल किया जा सकता है। एक रेजिमेंट के लिए इसकी लागत लगभग 1000 से 1500 करोड़ रुपये तक हो सकती है। (Pinaka Rocket System)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

लंबी दूरी के रॉकेट सिस्टम की आवश्यकता पिछले वर्ष हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी महसूस की गई थी। इसके बाद भारतीय सेना ने आपात खरीद प्रक्रिया के तहत इजरायली एलबिट सिस्टम्स से दो सूर्यास्त्र (पुल्स यानी प्रीसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम) लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर सिस्टम भी हासिल किए थे। इनकी रेंज 150-300 किमी रेंज तक है। वहीं, इस साल जनवरी में दो लॉन्चर्स भी डिलीवर हो चुके हैं।

यह सिस्टम भारत और इजराइल के सहयोग से विकसित किए गए हैं। इनका परीक्षण फिलहाल लाइव फायर ट्रायल के रूप में किया जा रहा है। (Pinaka Rocket System)

सेना के पास मौजूद रॉकेट आर्टिलरी

वर्तमान समय में भारतीय सेना के पास लगभग 15 रॉकेट आर्टिलरी रेजिमेंट मौजूद हैं। जबकि साल 2007 में सेना के पास कुल 11 रॉकेट रेजिमेंट थीं। इनमें मुख्य रूप से तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इनमें सात पिनाका रेजिमेंट, तीन रूसी मूल के स्मर्च सिस्टम और पांच पुराने बीएम-21 ग्रैड रॉकेट सिस्टम शामिल हैं।

सेना की योजना है कि धीरे-धीरे पुराने ग्रैड सिस्टम को हटाकर उनकी जगह नए पिनाका यूनिट्स को शामिल किया जाए। योजना के अनुसार 2030 तक लगभग 22 से 30 पिनाका रेजिमेंट तक विस्तार किया जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

पाकिस्तान और चीन के सिस्टम

पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने फतह-2 गाइडेड रॉकेट दागा था, जिसे हरियाणा के सिरसा क्षेत्र के ऊपर भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने इंटरसेप्ट कर लिया था। पाकिस्तान का दावा है कि इस रॉकेट की रेंज लगभग 400 किलोमीटर तक हो सकती है।

अगस्त 2025 में पाकिस्तान ने सेना रॉकेट कमांड फोर्स बनाने की भी घोषणा की थी। बताया गया कि यह कमान लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम के ऑपरेशन के लिए बनाई गई है। (Pinaka Rocket System)

दूसरी ओर चीन के पास भी बड़े पैमाने पर रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम मौजूद हैं। चीनी सेना का पीएचएल-16 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम लगभग 130 किलोमीटर तक के गाइडेड रॉकेट दागने की क्षमता रखता है। इसके अलावा यह सिस्टम लगभग 290 किलोमीटर तक के टैक्टिकल मिसाइल भी लॉन्च कर सकता है।

चीनी सेना इन रॉकेट सिस्टम को सैटेलाइट, ड्रोन और डिजिटल कमांड नेटवर्क से जोड़कर इस्तेमाल करती है, जिससे सीमा क्षेत्रों में दूर तक टारगेट को पहचानकर हमला किया जा सकता है। (Pinaka Rocket System)

रॉकेट-मिसाइल फोर्स बनाने की योजना

वहीं, इस साल जनवरी में सेना दिवस पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने बताया था कि भारतीय सेना एक समर्पित रॉकेट-कम-मिसाइल फोर्स बनाने की दिशा में काम कर रही है। इस फोर्स का उद्देश्य पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का ऑपरेशन होगा।

इस योजना के तहत पिनाका जैसे स्वदेशी सिस्टम को भी बड़े पैमाने पर शामिल किया जाएगा। सेना का मानना है कि आधुनिक युद्ध में लंबी दूरी की सटीक फायरपावर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय सेना के आर्टिलरी आधुनिकीकरण कार्यक्रम में पिनाका रॉकेट सिस्टम को महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। डीआरडीओ और भारतीय उद्योग के सहयोग से विकसित यह सिस्टम स्वदेशी रक्षा तकनीक का एक प्रमुख उदाहरण है। (Pinaka Rocket System)