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सूर्यकिरण टीम के 30 साल में 800 एयर शो…दुनिया की सबसे खतरनाक एरोबेटिक टीमों में क्यों गिनी जाती है लाल-सफेद रंग के जेट वाली टीम

टीम ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 15 सितंबर 1996 में कोयंबटूर में किया था। उस एयर शो के बाद सूर्यकिरण टीम तेजी से लोकप्रिय हो गई। लोगों ने पहली बार इतने करीब उड़ते विमानों को एक साथ करतब करते देखा था...

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📍नई दिल्ली | 23 May, 2026, 1:11 PM

Suryakiran Aerobatic Team 30 Years: भारतीय वायु सेना की मशहूर सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम 26 मई को अपने 30 साल पूरे करने जा रही है। तीन दशक पहले शुरू हुई यह टीम आज दुनिया की प्रमुख एरोबेटिक टीमों में गिनी जाती है। लाल और सफेद रंग के लड़ाकू जेट जब एक साथ बेहद करीब उड़ते हुए आसमान में करतब दिखाते हैं, तो हजारों लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं।

भारतीय वायु सेना सूर्यकिरण टीम को एंबेसडर ऑफ द इंडियन एयर फोर्स भी कहती है। यह टीम केवल एयर शो नहीं करती, बल्कि दुनिया के सामने भारतीय वायु सेना की प्रोफेशनल क्षमता, अनुशासन और सटीकता भी दिखाती है।

Suryakiran Aerobatic Team 30 Years: 1996 में हुई थी शुरुआत

सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम की स्थापना 27 मई 1996 को कर्नाटक के बीदर एयर फोर्स स्टेशन में हुई थी। शुरुआत में टीम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल द्वारा बनाए गए किरण एमके-2 जेट ट्रेनर विमान उड़ाती थी। इसके पहले विंग कमांडर कुलदीप मलिक थे, जो पहले थंडरबोल्ट्स टीम का सदस्य रह चुके थे।

टीम ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 15 सितंबर 1996 में कोयंबटूर में किया था। उस एयर शो के बाद सूर्यकिरण टीम तेजी से लोकप्रिय हो गई। लोगों ने पहली बार इतने करीब उड़ते विमानों को एक साथ करतब करते देखा था। 1998 में विंग कमांडर ए.के. मुरगई के नेतृत्व में टीम 9 विमानों की फॉर्मेशन में परिवर्तित हुई। वहीं, 15 अगस्त 1998 को लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस पर 9 विमानों का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ।

8 अक्टूबर 2004 को सूर्यकिरण टीम को चीफ ऑफ द एयर स्टाफ यूनिट साइटेशन से सम्मानित किया गया। यह भारतीय वायु सेना में पहली बार किसी यूनिट को दिया गया यह सम्मान था। 1 मई 2006 से सूर्यकिरण टीम को नंबर 52 के तौर पर अलग स्क्वाड्रन का दर्जा दिया। पहले यह नंबर 52 स्क्वॉड्रन (शार्क्स) के तहत काम कर रही थी, लेकिन अब पूरी टीम को स्वतंत्र स्क्वाड्रन का दर्जा मिल गया।

पिछले 30 वर्षों में सूर्यकिरण टीम ने 800 से ज्यादा एयर डिस्प्ले किए हैं। भारत के लगभग हर बड़े शहर में यह टीम प्रदर्शन कर चुकी है। इसके अलावा चीन, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भी टीम ने भारतीय वायु सेना का प्रतिनिधित्व किया।

2011 से 2015 तक निलंबित रही थी टीम

साल 2011 में सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम को बड़ा झटका लगा था। फरवरी 2011 में एयरो इंडिया शो के बाद टीम को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया गया। इसकी सबसे बड़ी वजह एचएएल किरण मेक-II ट्रेनर विमानों की कमी थी। उस समय भारतीय वायु सेना में नए पायलटों की ट्रेनिंग की जरूरत तेजी से बढ़ रही थी, इसलिए उपलब्ध किरण विमानों को ट्रेनिंग यूनिट्स में भेज दिया गया।

स्थिति ऐसी हो गई कि सूर्यकिरण टीम के पास 9 विमानों की फॉर्मेशन बनाए रखने के लिए पर्याप्त एयरक्राफ्ट नहीं बचे। इसके बाद टीम के कई पायलटों को दूसरी स्क्वाड्रनों में ट्रांसफर कर दिया गया। करीब चार साल तक यानी 2011 से 2015 के बीच सूर्यकिरण का कोई बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं हुआ।

इसके बाद फरवरी 2015 में भारतीय वायु सेना ने सूर्यकिरण टीम को फिर से शुरू किया। इस बार टीम को आधुनिक हॉक एमके-132 विमान दिए गए। उस समय विंग कमांडर अजित कुलकर्णी टीम के कमांडिंग ऑफिसर थे।

नई शुरुआत के बाद अक्टूबर 2015 में हिंडन एयरबेस पर एयर फोर्स डे समारोह में हॉक विमानों के साथ टीम ने पहला प्रदर्शन किया। शुरुआत में केवल चार विमान शामिल थे, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ाकर फिर से नौ विमानों की फॉर्मेशन तक पहुंचाई गई।

किरण विमान से हॉक जेट तक का सफर

साल 2015 में सूर्यकिरण टीम ने एक बड़ा बदलाव किया। पुराने किरण एमके-2 विमानों की जगह टीम ने हॉक एमके-132 एडवांस जेट ट्रेनर विमान शामिल किए।

यह विमान ज्यादा ताकतवर इंजन, आधुनिक एवियोनिक्स और बेहतर नियंत्रण क्षमता के साथ आते हैं। लाल और सफेद रंग वाले यही हॉक विमान अब सूर्यकिरण टीम की नई पहचान बन चुके हैं।

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भारतीय वायु सेना के अधिकारियों के मुताबिक हॉक विमान जटिल एरोबेटिक मैन्यूवर्स के लिए ज्यादा बेहतर माने जाते हैं। इससे टीम के प्रदर्शन में और सुधार आया।

भारतीय वायु सेना में इस्तेमाल होने वाला बीएई सिस्टम्स हॉक एमके-132 एक एडवांस जेट ट्रेनर विमान है। इसे ब्रिटेन की कंपनी बीएई सिस्टम्स ने बनाया है, जबकि भारत में इसका निर्माण एचएएल करती है। यह विमान मुख्य रूप से नए फाइटर पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वे आगे चलकर सुखोई-30 एमकेआई, राफेल और तेजस जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों को आसानी से उड़ा सकें।

इस विमान में दो सीटें होती हैं। आगे की सीट पर ट्रेनिंग लेने वाला पायलट बैठता है और पीछे ट्रेनर बैठता है। हॉक एमके-132 पहली बार 2008 में भारतीय वायु सेना में शामिल हुआ था।

यह विमान लगभग 12.4 मीटर लंबा है और इसकी अधिकतम गति करीब 1,000 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। जरूरत पड़ने पर यह डाइव के दौरान ध्वनि की गति के करीब भी उड़ सकता है। इसकी उड़ान क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है और यह करीब 44 हजार फीट की ऊंचाई तक जा सकता है।

हॉक एमके-132 में रोल्स-रॉयस और टर्बोमेका का एडौर इंजन लगा है। यह इंजन विमान को तेज रफ्तार और बेहतर कंट्रोल देता है। इसमें आधुनिक डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम भी है, जिससे इंजन की परफॉर्मेंस बेहतर रहती है।

यह विमान सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। इसमें हल्के हथियार भी लगाए जा सकते हैं। इसके नीचे मिसाइल, रॉकेट और बम लगाने की क्षमता होती है। हालांकि सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम में इस्तेमाल होने वाले हॉक विमानों में हथियार नहीं लगाए जाते। वहां इन विमानों का इस्तेमाल केवल एयर शो और एरोबेटिक प्रदर्शन के लिए होता है।

हॉक एमके-132 की सबसे बड़ी खासियत इसकी आधुनिक एवियोनिक्स प्रणाली है। इसमें ग्लास कॉकपिट, हेड-अप डिस्प्ले (HUD), मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और आधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगे हैं। पायलट बिना नीचे देखे एचयूडी पर जरूरी जानकारी देख सकता है। इससे फॉर्मेशन फ्लाइट और एयर कॉम्बैट ट्रेनिंग आसान हो जाती है।

इस विमान में HOTAS सिस्टम भी दिया गया है। इसका मतलब है कि पायलट थ्रॉटल और कंट्रोल स्टिक से हाथ हटाए बिना कई जरूरी सिस्टम चला सकता है। इससे तेज प्रतिक्रिया और बेहतर कंट्रोल मिलता है।

नौ विमानों की फॉर्मेशन बनाती है खास

सूर्यकिरण टीम की सबसे बड़ी पहचान इसकी नौ विमानों वाली फॉर्मेशन है। दुनिया में बहुत कम एरोबेटिक टीमें इतनी बड़ी फॉर्मेशन में प्रदर्शन करती हैं।

टीम के विमान कुछ मीटर की दूरी पर उड़ते हैं। इतनी कम दूरी पर तेज गति से उड़ान भरना बेहद कठिन माना जाता है। पायलटों को एक-दूसरे की गति, दिशा और ऊंचाई का बिल्कुल सटीक अंदाजा रखना पड़ता है।

एयर शो के दौरान टीम डायमंड फॉर्मेशन, एरो फॉर्मेशन, लूप, रोल, स्प्लिट और क्रॉसओवर जैसे जटिल करतब दिखाती है। कई बार विमान 600 से 800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हैं। कई बार उनके बीच की दूरी सिर्फ 5 से 10 मीटर होती है। इतनी नजदीकी में उड़ान भरना बेहद मुश्किल माना जाता है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इतने करीब उड़ान के दौरान एक छोटी गलती भी बड़ा हादसा बन सकती है। इसी वजह से सूर्यकिरण टीम (SKAT) को दुनिया की सबसे अनुशासित एरोबेटिक टीमों में गिना जाता है।

सिग्नेचर डिस्प्ले है DNA मैन्यूवर

सूर्यकिरण टीम का सबसे मशहूर करतब DNA मैन्यूवर माना जाता है। इसे टीम का सिग्नेचर डिस्प्ले भी कहा जाता है। इस करतब में कुछ विमान सीधे उड़ते रहते हैं, जबकि बाकी विमान उनके चारों ओर स्पाइरल यानी कुंडली जैसी उड़ान भरते हैं। इससे आसमान में DNA की डबल हेलिक्स जैसी आकृति बनती है। जब विमान तिरंगे रंगों का धुआं छोड़ते हैं, तो यह दृश्य और भी शानदार दिखाई देता है।

इस मैन्यूवर में नंबर 1, 2 और 3 विमान सीधी लाइन में उड़ते हैं और केंद्रीय धुरी का काम करते हैं। वहीं नंबर 4 और 7 विमान उनके चारों ओर गोल-गोल घूमते हैं। दोनों पायलटों को बिल्कुल एक जैसी गति, दूरी और टाइमिंग बनाए रखनी पड़ती है। छोटी सी गलती भी पूरे फॉर्मेशन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि इस करतब के लिए महीनों तक अभ्यास किया जाता है।

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सूर्यकिरण टीम का एक और बेहद लोकप्रिय करतब “बॉम्ब बर्स्ट” है। इसमें सभी विमान पहले एक साथ ऊपर की ओर उड़ते हैं और फिर अचानक अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है जैसे आसमान में कोई विस्फोट हुआ हो। एयर शो देखने वाले लोग इस करतब पर सबसे ज्यादा तालियां बजाते हैं।

टीम “हार्ट इन द स्काई” यानी दिल की आकृति भी बनाती है। इसमें विमान आसमान में विशाल हार्ट शेप तैयार करते हैं। कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों और खास मौकों पर यह प्रदर्शन किया जाता है। तिरंगे धुएं के साथ बना यह दिल दर्शकों को काफी आकर्षित करता है।

“डायमंड फॉर्मेशन” भी सूर्यकिरण की पहचान मानी जाती है। इसमें नौ विमान हीरे जैसी आकृति में उड़ते हैं। यह फॉर्मेशन टीम की सटीकता और अनुशासन दिखाती है। कई बार इसी फॉर्मेशन में लूप और रोल जैसे कठिन करतब भी किए जाते हैं।

“एरोहेड फॉर्मेशन” में विमान तीर की नोक जैसा आकार बनाते हैं। यह तेज गति और दिशा परिवर्तन का प्रदर्शन माना जाता है। वहीं “विक” या “एरो फॉर्मेशन” क्लासिक लड़ाकू विमान फॉर्मेशन जैसा दिखाई देता है।

सूर्यकिरण टीम “लूप” मैन्यूवर भी करती है। इसमें विमान पूरा 360 डिग्री का चक्कर लगाते हुए ऊपर की ओर घूमते हैं। कई बार पूरा फॉर्मेशन एक साथ लूप बनाता है, जो बेहद कठिन माना जाता है।

“बैरल रोल” में विमान अपनी लंबाई वाली धुरी पर घूमते हुए आगे बढ़ते हैं। जब कई विमान एक साथ यह करतब करते हैं, तो पूरा दृश्य बेहद रोमांचक दिखाई देता है।

टीम “इनवर्टेड फ्लाइंग” यानी उल्टी उड़ान भी दिखाती है। इसमें कुछ विमान उल्टे होकर उड़ते हैं। यह करतब पायलट की क्षमता और विमान के नियंत्रण को दर्शाता है।

पुराने किरण एमके-II विमानों के दौर में “टैंगो रोल” और “गोबलेट रोल” जैसे करतब भी काफी मशहूर थे। टैंगो रोल को भारतीय वायु सेना के सबसे कठिन एरोबेटिक करतबों में गिना जाता था।

इसके अलावा टीम “क्रॉसओवर”, “ट्रिपल मिरर”, “बॉक्स फॉर्मेशन”, “वाई फॉर्मेशन” और “हिडन स्प्लिट” जैसे कई जटिल मैन्यूवर्स भी दिखाती है। “हिडन स्प्लिट” में विमान अचानक अलग-अलग दिशाओं में बंट जाते हैं और फिर दोबारा एक साथ जुड़ जाते हैं।

विशेष G-सूट पहनते हैं पायलट

सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम के पायलट जब आसमान में डीएनए, बॉम्ब बर्स्ट, हार्ट शेप, लूप या बैरल रोल जैसे कठिन करतब दिखाते हैं, तब उनके शरीर पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है। तेज गति और अचानक मोड़ लेने की वजह से पायलटों को +6जी तक का फोर्स झेलना पड़ता है। कई बार नेगेटिव -1.5जी फोर्स भी लगता है, जिससे शरीर और दिमाग पर असर पड़ सकता है।

जी-फोर्स का मतलब होता है गुरुत्वाकर्षण से कई गुना ज्यादा दबाव। जब विमान बहुत तेज मोड़ लेता है या तेजी से ऊपर उठता है, तो शरीर का खून नीचे की तरफ खिंचने लगता है। इससे दिमाग तक खून कम पहुंचता है। ऐसी स्थिति में पायलट की आंखों के सामने धुंधलापन आ सकता है, जिसे “ग्रे-आउट” कहा जाता है। अगर दबाव और बढ़ जाए तो कुछ समय के लिए दिखाई देना बंद हो सकता है, जिसे “ब्लैक-आउट” कहते हैं। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब पायलट बेहोश हो जाए। इसे जी-लॉक यानी “G-Induced Loss of Consciousness” कहा जाता है।

सूर्यकिरण जैसी टीम में यह खतरा और ज्यादा गंभीर होता है, क्योंकि विमान एक-दूसरे से सिर्फ कुछ मीटर की दूरी पर उड़ते हैं। ऐसे में अगर एक पायलट भी नियंत्रण खो दे, तो पूरा फॉर्मेशन खतरे में पड़ सकता है।

इसी वजह से सूर्यकिरण टीम के पायलट विशेष “एंटी-G सूट” पहनते हैं। इसे आम भाषा में G-सूट कहा जाता है। यह सूट पायलट के शरीर को सुरक्षित रखने में मदद करता है।

G-सूट एक खास तरह का टाइट फ्लाइट सूट होता है। इसमें पेट, जांघों और पैरों के आसपास हवा भरने वाले हिस्से लगे होते हैं। जब विमान पर G-फोर्स बढ़ता है, तो विमान का सिस्टम अपने आप सूट में हवा भर देता है। इससे सूट शरीर को कसकर पकड़ता है और खून को नीचे जाने से रोकने में मदद करता है। इससे दिमाग तक खून की सप्लाई बनी रहती है और पायलट लंबे समय तक होश में रह सकता है।

हॉक एमके-132 विमान में यह सिस्टम विमान के एवियोनिक्स और सेंसर से जुड़ा होता है। जैसे ही विमान पर ज्यादा G-फोर्स आता है, सूट तुरंत प्रतिक्रिया देता है।

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सिर्फ G-सूट ही नहीं, पायलट एक खास सांस लेने की तकनीक भी इस्तेमाल करते हैं। इसे “एंटी-G स्ट्रेनिंग मैन्यूवर” (AGSM) कहा जाता है। इसमें पायलट खास तरीके से सांस रोकते हैं और पेट व पैरों की मांसपेशियों को कसते हैं। इससे शरीर का ब्लड प्रेशर बना रहता है और दिमाग तक खून पहुंचता रहता है।

हर एयर शो से पहले लंबी ब्रीफिंग और प्रैक्टिस की जाती है। उड़ान के बाद वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर हर छोटी गलती का विश्लेषण किया जाता है।

सूर्यकिरण टीम के विमानों में स्मोक सिस्टम लगाया गया है, जिससे वे केसरिया, सफेद और हरे रंग का धुआं छोड़ते हैं। यही तिरंगा धुआं एयर शो को और आकर्षक बनाता है।

कैसे चुने जाते हैं सूर्यकिरण के पायलट

सूर्यकिरण टीम में शामिल होना किसी भी फाइटर पायलट के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है। भारतीय वायु सेना केवल चुनिंदा और अनुभवी पायलटों को ही इस टीम के लिए चुनती है।

चयन के बाद पायलटों को कई महीनों तक कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। इसमें फॉर्मेशन फ्लाइंग, सिमुलेटर ट्रेनिंग, इमरजेंसी हैंडलिंग और मानसिक मजबूती पर खास ध्यान दिया जाता है। इसके लिए सेंट्रीफ्यूज मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक बड़ी घूमने वाली मशीन होती है, जिसमें पायलटों को 7 से 9G तक का दबाव झेलने का अभ्यास कराया जाता है।

पायलटों की फिटनेस पर भी खास ध्यान दिया जाता है। गर्दन की ताकत बढ़ाने वाली एक्सरसाइज, कार्डियो ट्रेनिंग और कोर स्ट्रेंथ वर्कआउट रोजाना का हिस्सा होते हैं। तेज मोड़ों के दौरान गर्दन और शरीर पर काफी दबाव पड़ता है, इसलिए शारीरिक फिटनेस बहुत जरूरी मानी जाती है।

सूर्यकिरण टीम की ट्रेनिंग कई चरणों में होती है। पहले ग्राउंड क्लास और सिमुलेटर ट्रेनिंग कराई जाती है। इसके बाद पायलट ढीली फॉर्मेशन में उड़ान भरते हैं और धीरे-धीरे बेहद करीबी फॉर्मेशन तक पहुंचते हैं। हर उड़ान के बाद पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग देखी जाती है और छोटी से छोटी गलती पर चर्चा होती है।

टीम में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। हर पायलट को अपने साथी की क्षमता पर पूरा विश्वास रखना पड़ता है। उड़ान के दौरान लगातार रेडियो कम्युनिकेशन चलता रहता है। “स्मोक ऑन”, “इन पोजीशन” और “क्लियर” जैसे कॉल लगातार दिए जाते हैं।

पूरे प्रदर्शन का नियंत्रण नंबर-1 पायलट यानी टीम लीडर के हाथ में होता है। बाकी सभी विमान उसी के निर्देशों के अनुसार उड़ते हैं।

हर एयर शो से पहले टीम घंटों तक ब्रीफिंग करती है। पायलट हर मैन्यूवर का अभ्यास करते हैं। प्रदर्शन के बाद वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर गलतियों और सुधार पर चर्चा की जाती है।

टीम के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक सूर्यकिरण में केवल अच्छा पायलट होना काफी नहीं है। यहां टीमवर्क और एक-दूसरे पर भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है।

बीदर एयरबेस पर होगा बड़ा समारोह

30वीं वर्षगांठ के मौके पर बीदर एयर फोर्स स्टेशन में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस दौरान सूर्यकिरण टीम विशेष एयर डिस्प्ले करेगी।

समारोह में वर्तमान और पूर्व पायलटों के साथ टेक्नीशियन, इंजीनियर और सपोर्ट स्टाफ भी शामिल होंगे। वायु सेना के अधिकारियों के मुताबिक यह कार्यक्रम उन सभी लोगों को सम्मान देने का अवसर होगा, जिन्होंने तीन दशकों में इस टीम को दुनिया की प्रमुख एरोबेटिक टीमों में शामिल करने में योगदान दिया।

दुनिया की बड़ी टीमों में गिनी जाती है सूर्यकिरण

सूर्यकिरण टीम की तुलना दुनिया की कई प्रसिद्ध एरोबेटिक टीमों से की जाती है। ब्रिटेन की रेड एरोज, अमेरिका की थंडरबर्ड्स और इटली की फ्रेचे ट्रिकोलोरी जैसी टीमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी प्रसिद्ध हैं।

भारतीय वायु सेना के अधिकारी मानते हैं कि सूर्यकिरण टीम ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई है। टीम के विमानों का मेंटेनेंस और सपोर्ट भी भारत में ही किया जाता है।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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