📍नई दिल्ली/लेह | 23 May, 2026, 11:22 AM
Indian Army Cheetah Crash Leh: लद्दाख के बेहद दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाके तंगत्से में भारतीय सेना का चीता हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हेलीकॉप्टर में सेना के तीन वरिष्ठ अधिकारी सवार थे। हादसे में तीनों अधिकारियों की जान बच गई और उन्हें मामूली चोटें आईं हैं। सेना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक यह हादसा किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है, क्योंकि हेलीकॉप्टर जिस जगह गिरा वहां से सैकड़ों फीट नीचे गहरी ढलान थी।
सेना के सूत्रों के मुताबिक हेलीकॉप्टर में 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल सचिन मेहता, एक लेफ्टिनेंट कर्नल और एक मेजर सवार थे। तीनों अधिकारियों को मामूली चोटें आईं और वे सुरक्षित बाहर निकल आए।
Indian Army Cheetah Crash Leh: दो चट्टानों के बीच टकराया हेलीकॉप्टर
यह घटना 20 मई को हुई थी, लेकिन इसकी जानकारी बाद में सामने आई। हादसे के बाद सेना ने जांच शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि हेलीकॉप्टर नियमित ऑपरेशन पर था और कम ऊंचाई पर उड़ान भर रहा था। इसी दौरान श्योक नदी के पास तंगत्से इलाके की पहाड़ियों के बीच हेलीकॉप्टर का संतुलन बिगड़ गया और वह क्रैश लैंडिंग की स्थिति में आ गया। हादसे के बाद हेलीकॉप्टर दो चट्टानों के बीच टकराया और ढलान पर लगभग 20 से 30 फीट तक फिसलता चला गया। आखिर में वह एक बड़े पत्थर पर अटक गया। अगर वह पत्थर वहां नहीं होता तो हेलीकॉप्टर सैकड़ों फीट नीचे खाई में गिर सकता था। इलाके की ढलान करीब 60 से 70 डिग्री तक बताई जा रही है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)
हादसे के बाद नहीं लगी आग
सेना के अधिकारियों का कहना है कि सबसे राहत वाली बात यह रही कि हादसे के बाद हेलीकॉप्टर में आग नहीं लगी। आमतौर पर ऐसे हादसों में फ्यूल लीक होने के बाद आग लगने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। लेकिन इस दुर्घटना में ऐसा नहीं हुआ। तीनों अधिकारी खुद हेलीकॉप्टर से बाहर निकल आए। उन्हें मामूली चोटें आईं और बाद में मेडिकल जांच कराई गई।
सेना के सूत्रों के मुताबिक हादसे के बाद तीनों अधिकारी खुद हेलीकॉप्टर से बाहर निकले। मौके पर मौजूद जवानों ने तुरंत राहत और बचाव अभियान शुरू किया। कठिन पहाड़ी इलाके के बावजूद 20 मिनट के भीतर ही रेस्क्यू टीम तेजी से मौके तक पहुंच गई। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर भी चर्चा में रही है, जिसमें मेजर जनरल सचिन मेहता और बाकी अधिकारी दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के पास खड़े दिखाई दिए। सेना के कई पूर्व अधिकारियों ने इसे सैन्य प्रशिक्षण और मजबूत मानसिकता का उदाहरण बताया।
बेहद कठिन इलाके में हुआ हादसा
यह हादसा जिस इलाके में हुआ वह बेहद कठिन माना जाता है। तंगत्से लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आता है, जहां मौसम तेजी से बदलता है और पहाड़ी ढलान काफी खतरनाक होती है। ऐसे इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाना आसान नहीं माना जाता। यहां हवा पतली होती है, जिससे हेलीकॉप्टर के इंजन और रोटर की क्षमता पर असर पड़ता है।
भारतीय सेना ने हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी है। कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि दुर्घटना तकनीकी खराबी, मौसम, ऊंचाई या किसी अन्य वजह से हुई। फिलहाल सेना ने आधिकारिक तौर पर कारणों की पुष्टि नहीं की है। हालांकि हादसे के वक्त मौसम साफ था। इसलिए क्रैश की वजह को लेकर अटकलें ही लगाई जा रही हैं।
मेजर जनरल सचिन मेहता भारतीय सेना की 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जीओसी हैं। यह डिवीजन पूर्वी लद्दाख और एलएसी के पास महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालती है। ऐसे में उनका इस तरह के ऑपरेशनल इलाके में दौरा करना नियमित सैन्य गतिविधि का हिस्सा माना जा रहा है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)
क्यों खास माना जाता है चीता हेलीकॉप्टर
चीता हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायुसेना के सबसे पुराने लाइट हेलीकॉप्टरों में गिने जाते हैं। इनका इस्तेमाल खास तौर पर सियाचिन, लद्दाख और उत्तर-पूर्व जैसे कठिन इलाकों में किया जाता है। चीता हेलीकॉप्टर मूल रूप से फ्रांस की एयरोस्पेशियल कंपनी की तकनीक पर आधारित है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल ने 1970 के दशक में इसे भारत में बनाना शुरू किया था। सेना में यह हेलीकॉप्टर दशकों से इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि अब इसकी उम्र काफी ज्यादा हो चुकी है।
सेना के मुताबिक चीता हेलीकॉप्टर दशकों से ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों के लिए लाइफलाइन की तरह काम कर रहे हैं। जहां बड़े हेलीकॉप्टर नहीं उतर सकते, वहां चीता आसानी से पहुंच जाता है। यही वजह है कि सियाचिन ग्लेशियर, एलएसी और कई अग्रिम चौकियों तक राशन, दवाइयां और जवानों को पहुंचाने में इन हेलीकॉप्टरों की बड़ी भूमिका रही है।
यह हेलीकॉप्टर भारतीय सेना का चीता मॉडल था, जिसे लंबे समय से हाई ऑल्टीट्यूड वाले इलाकों में इस्तेमाल किया जाता रहा है। चीता हेलीकॉप्टर को भारतीय सेना और वायुसेना के लिए बेहद अहम माना जाता है, खासकर सियाचिन, लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे दुर्गम इलाकों में। यह हल्का हेलीकॉप्टर संकरी पहाड़ी जगहों पर उतर सकता है और जवानों तक जरूरी सामान पहुंचाने में मदद करता है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)
पुराने हेलीकॉप्टरों पर बढ़ी चिंता
हालांकि इन हेलीकॉप्टरों की उम्र अब काफी ज्यादा हो चुकी है। कई चीता और चेतक हेलीकॉप्टर 30 से 50 साल पुराने बताए जाते हैं।
भारतीय सेना के पास इस समय करीब 190 चीता, चेतक और चीटल हेलीकॉप्टर सेवा में हैं। शुरुआत में सेना के पास इन हेलीकॉप्टर्स की कुल संख्या 246 थी। इनमें से लगभग 25 हेलीकॉप्टर किसी भी समय मरम्मत और मेंटेनेंस में रहते हैं।
इन हेलीकॉप्टर्स के बेड़े का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा 30 साल से भी पुराना हो चुका है। सेना, नौसेना और वायु सेना तीनों को मिलाकर देखा जाए तो चेतक और चीता हेलीकॉप्टर्स की कुल संख्या करीब 400 के आसपास है।
पिछले कुछ वर्षों में इनसे जुड़े कई हादसे सामने आए हैं। रक्षा सूत्रों के मुताबिक पिछले 10 से 12 सालों में 15 से ज्यादा चीता और चेतक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इनमें कई पायलटों और सैन्यकर्मियों की जान भी गई।
चीता हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी खासियत इसकी हाई-ऑल्टीट्यूड क्षमता मानी जाती है। यह करीब 19 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर भी ऑपरेशन कर सकता है। इसकी अधिकतम गति लगभग 190 से 220 किलोमीटर प्रति घंटा है। यह छोटे आकार का हेलीकॉप्टर है और संकरी पहाड़ी जगहों पर भी उतर सकता है।
लेकिन इसके साथ कुछ सीमाएं भी जुड़ी हैं। यह सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर है। यानी इंजन फेल होने की स्थिति में बैकअप नहीं होता। ऊंचाई वाले इलाकों में पतली हवा की वजह से इंजन पर ज्यादा दबाव पड़ता है। मौसम और कठिन भूभाग भी जोखिम बढ़ाते हैं।
सेना के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 से 12 सालों में चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों के कई हादसे हो चुके हैं। इनमें कई पायलटों और सैन्यकर्मियों की जान भी गई। इसी वजह से पुराने हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। (Indian Army Cheetah Crash Leh)
नए हेलीकॉप्टर शामिल करने की तैयारी
इसी वजह से भारतीय सेना अब धीरे-धीरे पुराने चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों को हटाने की योजना पर काम कर रही है। सेना की एविएशन कोर नई पीढ़ी के लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर शामिल कर रही है। एचएएल का स्वदेशी लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर यानी एलयूएच इसी योजना का हिस्सा है।
सेना पहले ही एलयूएच के सीमित सीरीज प्रोडक्शन वाले छह हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दे चुकी है। इन हेलीकॉप्टरों की अधिकतम गति करीब 220 किलोमीटर प्रति घंटा है और इनकी ऑपरेशनल रेंज लगभग 350 किलोमीटर बताई जाती है। सेना और वायुसेना को आने वाले वर्षों में करीब 250 नए हेलीकॉप्टरों की जरूरत बताई जा रही है।
सेना पहले ही एलयूएच के कुछ लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दे चुकी है। नए हेलीकॉप्टरों में बेहतर इंजन, ज्यादा सुरक्षा और हाई-ऑल्टीट्यूड क्षमता दी जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक पुराने हेलीकॉप्टर अभी भी एयरवर्दी हैं और उनकी तकनीकी उम्र बाकी है, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें बदला जाएगा।
चीता हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल केवल जवानों की आवाजाही तक सीमित नहीं है। इनका उपयोग मेडिकल इवैक्यूएशन, टोही मिशन, सप्लाई ड्रॉप और फॉरवर्ड पोस्ट तक जरूरी सामान पहुंचाने में भी किया जाता है। सियाचिन जैसे इलाकों में इन्हें जवानों की “लाइफलाइन” कहा जाता है। (Indian Army Cheetah Crash Leh)
बाल-बाल बचे थे जनरल बिपिन रावत
भारतीय सेना के इतिहास में पहले भी ऐसे कई हादसे सामने आ चुके हैं, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी बाल-बाल बचे। इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत भी नागालैंड के दीमापुर में चीता हेलीकॉप्टर दुर्घटना में बच गए थे। उस समय हेलीकॉप्टर उड़ान भरने के कुछ सेकंड बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। शुरुआती जांच में इंजन फेल होने की आशंका जताई गई थी।
सेना के अधिकारियों का कहना है कि पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाना दुनिया के सबसे कठिन सैन्य अभियानों में गिना जाता है। इसके बावजूद भारतीय सेना के एविएशन पायलट लगातार बेहद कठिन परिस्थितियों में मिशन पूरा करते हैं। (Indian Army Cheetah Crash Leh)



