📍नई दिल्ली | 1 Aug, 2026, 7:00 AM
DRDO Multi Drone Swarm: भारत अब ऐसी ड्रोन तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसमें कई ड्रोन एक साथ बेहद कम दूरी पर उड़ते हुए एक टीम की तरह काम करेंगे। यह प्रोजेक्ट पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित होगा और इसमें देश के एमएसएमई, स्टार्टअप्स और निजी भारतीय कंपनियों को शामिल होने का मौका दिया जाएगा। सरकारी रक्षा कंपनियां यानी डीपीएसयू और पीएसयू इस प्रोजेक्ट में शामिल नहीं हो सकेंगे। डीआरडीओ ने टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) योजना के तहत “डेवलपमेंट ऑफ क्लोज फॉर्मेशन फ्लाइंग ऑफ मल्टीपल ड्रोन्स” प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है।
DRDO Multi Drone Swarm: क्या है क्लोज फॉर्मेशन फ्लाइंग?
आमतौर पर जब कई ड्रोन एक साथ उड़ते हैं तो उनके बीच पर्याप्त दूरी रखी जाती है। लेकिन इस प्रोजेक्ट में डीआरडीओ ऐसा सिस्टम बनाना चाहता है, जिसमें ड्रोन एक-दूसरे से 500 मिलीमीटर से भी कम दूरी पर उड़ सकें और फिर भी उनकी उड़ान पूरी तरह सुरक्षित और नियंत्रित रहे।
इस पूरे सिस्टम में एक मास्टर ड्रोन होगा, जिसे ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से निर्देश मिलेंगे। यही मास्टर ड्रोन बाकी सभी स्लेव ड्रोन्स को आदेश देगा। सभी ड्रोन एक ही फॉर्मेशन में उड़ेंगे और जरूरत पड़ने पर कुछ ही सेकंड में अपना स्ट्रक्चर बदल सकेंगे।
ऐसी तकनीक आधुनिक युद्ध में इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि कई ड्रोन एक साथ अलग-अलग काम कर सकते हैं। इनमें निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट, संचार और अन्य मिशन शामिल हो सकते हैं।
50 ड्रोन का पूरा सिस्टम तैयार करना होगा
डीआरडीओ के इस प्रोजेक्ट के लिए 50 ड्रोन का पूरा सिस्टम तैयार करना होगा। इनमें एक मास्टर ड्रोन और कई अन्य ड्रोन शामिल होंगे, जो सात लाइनों और सात कॉलम वाले ग्रिड फॉर्मेशन में उड़ सकेंगे। सभी ड्रोन को इस तरह डिजाइन करना होगा कि वे एक-दूसरे की स्थिति लगातार पहचानते रहें और बिना टकराए निर्धारित दूरी बनाए रखें। इसके साथ पूरा कंट्रोल सिस्टम, कम्युनिकेशन नेटवर्क, ग्राउंड स्टेशन और सभी जरूरी सॉफ्टवेयर भी डेवलप करने होंगे। (DRDO Multi Drone Swarm)
पांच सेंटीमीटर से ज्यादा नहीं होगी गलती
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती ड्रोन की सटीक स्थिति बनाए रखना है। डीआरडीओ का कहना है कि प्रत्येक ड्रोन की स्थिति में तीनों अक्षों पर अधिकतम पांच सेंटीमीटर तक की ही गलती स्वीकार होगी। यदि किसी ड्रोन की स्थिति बदलती है तो पूरा सिस्टम 500 मिलीसेकंड के भीतर उसकी स्थिति को ठीक कर देगा।
यह क्षमता तब भी बनी रहनी चाहिए जब ड्रोन 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर और 20 मीटर प्रति सेकंड तक की तेज हवा में उड़ रहे हों।
आधे घंटे तक लगातार उड़ान जरूरी
आरएफपी में ड्रोन की उड़ान अवधि को लेकर भी मानक तय किए गए हैं। हर ड्रोन कम से कम 30 मिनट तक लगातार उड़ान भर सके। बैटरी खत्म होने पर उसे 15 मिनट के भीतर दोबारा चार्ज किया जा सके।
डीआरडीओ चाहता है कि ड्रोन हल्के हों, लेकिन उनमें पर्याप्त पेलोड ले जाने की क्षमता भी हो। प्रत्येक ड्रोन 500 ग्राम से 2 किलोग्राम तक का पेलोड उठा सकेगा। इसमें पावर सप्लाई शामिल नहीं होगी।
ड्रोन का लोड-टू-वेट रेशियो 30 प्रतिशत से अधिक होना जरूरी है। इसका मतलब है कि ड्रोन अपने कुल वजन की तुलना में पर्याप्त अतिरिक्त वजन लेकर उड़ान भर सके। (DRDO Multi Drone Swarm)
दुश्मन की जैमिंग से भी नहीं टूटेगा संपर्क
आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग होती है। दुश्मन कई बार रेडियो सिग्नल जाम करके ड्रोन का कंट्रोल छीनने की कोशिश करता है।
इसी वजह से डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में जैमिंग-प्रूफ वायरलेस कम्युनिकेशन सिस्टम जरूरी किया है।
ड्रोन का कम्युनिकेशन सिस्टम एस, एचएफ या सी बैंड पर काम करेगा और इसमें ईसीसीएम (इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स) की सुविधा होगी। इसका उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक हमलों के बीच भी कम्युनिकेशन बनाए रखना है।
कम्युनिकेशन लिंक की न्यूनतम रेंज 5 किलोमीटर तय की गई है।
हवा, पहाड़ और समुद्र में भी करेगा काम
डीआरडीओ की आरएफपी के अनुसार यह सिस्टम 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर काम करने में सक्षम होना चाहिए। ड्रोन 20 मीटर प्रति सेकंड तक की हवा सह सके और जरूरत पड़ने पर वह चलते हुए जहाज से उड़ान भरने के बाद सुरक्षित रूप से रिटर्न-टू-होम भी कर सके। वहीं, पूरे सिस्टम को पैक से निकालकर पांच मिनट के भीतर ऑपरेशन के लिए तैयार किया जा सके। (DRDO Multi Drone Swarm)
ग्राउंड सिस्टम भी होगा प्रोजेक्ट का हिस्सा
डीआरडीओ ने स्पष्ट किया है कि केवल ड्रोन तैयार करना काफी नहीं होगा। चयनित कंपनी को ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट, ऑनबोर्ड स्पेयर्स, विशेष टूल्स, कंट्रोल स्टेशन, कम्युनिकेशन सब-सिस्टम, कंट्रोल एल्गोरिदम, ग्राफिकल यूजर इंटरफेस, सोर्स कोड, यूजर मैनुअल और मेंटेनेंस डॉक्यूमेंट भी उपलब्ध कराने होंगे।
इसके अलावा 50 ड्रोन के लिए बैटरियां और 100 फीसदी स्पेयर पार्ट्स भी प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे।
डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में स्वदेशीकरण पर विशेष जोर दिया है। आरएफपी के अनुसार ड्रोन सिस्टम में कम से कम 70 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल करनी होगी। साथ ही ऐसे देशों के कंपोनेंट्स के इस्तेमाल से बचने को कहा गया है जिन्हें भारत का प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। (DRDO Multi Drone Swarm)
डीआरडीओ देगा करोड़ों रुपये की फंडिंग
यह प्रोजेक्ट ग्रांट-इन-एड मॉडल पर चलेगा। यदि प्रोजेक्ट की कुल लागत 10 करोड़ रुपये तक होती है तो डीआरडीओ अधिकतम 90 प्रतिशत तक वित्तीय मदद देगा। वहीं 10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले प्रोजेक्ट में डीआरडीओ की हिस्सेदारी अधिकतम 70 प्रतिशत होगी।
भुगतान प्रोजेक्ट के तय चरणों के अनुसार किया जाएगा। इसके लिए अधिकतम पांच माइलस्टोन निर्धारित किए जा सकते हैं। भुगतान बैंक गारंटी के आधार पर अग्रिम या रीइम्बर्समेंट मॉडल से किया जाएगा। (DRDO Multi Drone Swarm)
दो साल में पूरा करना होगा प्रोजेक्ट
डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट की कुल अवधि 24 महीने तय की है। पहले दो महीने में प्रिलिमिनरी डिजाइन रिव्यू, छह महीने में डिटेल्ड डिजाइन रिव्यू, बारह महीने में प्रोटोटाइप तैयार करने, परीक्षण और क्रिटिकल डिजाइन रिव्यू का काम पूरा करना होगा।
इसके बाद 21वें महीने तक अंतिम सिस्टम की डिलीवरी और इंटीग्रेशन होगा। 24वें महीने तक पूरे प्रोजेक्ट का डॉक्यूमेंटेशन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और प्रोजेक्ट क्लोजर पूरा करना होगा। (DRDO Multi Drone Swarm)
किन कंपनियों को मिलेगा मौका?
डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को केवल भारतीय निजी कंपनियों, एमएसएमई, स्टार्टअप्स और भारतीय नागरिकों के नियंत्रण वाली ऑटोनॉमस संस्थाओं के लिए खोला है। विदेशी निवेश 49 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
ब्लैकलिस्ट या डिबार की गई कंपनियां आवेदन नहीं कर सकेंगी। एक कंपनी को अधिकतम दो प्रोजेक्टएं मिल सकते हैं। कंपनियां विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और अन्य औद्योगिक भागीदारों के साथ मिलकर भी काम कर सकती हैं। हालांकि, ऐसे सहयोग की सीमा निर्धारित की गई है।
वहीं, प्रोजेक्ट का चयन एल-1 (लीस्ट कॉस्ट) मैथड से किया जाएगा। अगर दो कंपनियों की लागत समान होती है तो कुल प्रोजेक्ट लागत कम होने वाले प्रस्ताव को वरीयता दी जाएगी। इसके बाद भी स्थिति समान रहने पर चयन ड्रॉ ऑफ लॉट्स के माध्यम से किया जाएगा। (DRDO Multi Drone Swarm)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





