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रक्षा मंत्रालय में खाली आरक्षित पदों की होगी गिनती, बैकलॉग खत्म करने के लिए बनाई हाई लेवल कमेटी

Defence Ministry Vacancies
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Defence Ministry Vacancies: रक्षा मंत्रालय ने आरक्षित वर्गों के लिए निर्धारित लेकिन लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने की दिशा में बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। रक्षा विभाग ने अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और दिव्यांगजन (पीडब्ल्यूबीडी) के लिए आरक्षित बैकलॉग रिक्तियों की पहचान, समीक्षा और निगरानी के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी आदेश के अनुसार यह समिति रक्षा विभाग के विभिन्न निदेशालयों और मुख्यालयों में मौजूद बैकलॉग रिक्तियों का आकलन करेगी। साथ ही यह भी पता लगाएगी कि ये पद सालों तक खाली क्यों रहे और उन्हें भरने में कौन-कौन सी प्रशासनिक या प्रक्रियागत बाधाएं सामने आईं।

यह कदम कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों के तहत उठाया गया है। रक्षा सचिव की मंजूरी से जारी इस आदेश का उद्देश्य आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और रिक्तियों को समयबद्ध तरीके से भरने की प्रक्रिया को मजबूत करना है।

Defence Ministry Vacancies: अतिरिक्त सचिव करेंगे समिति की अध्यक्षता

रक्षा विभाग द्वारा गठित समिति की अध्यक्षता अतिरिक्त सचिव (स्थापना) करेंगे। समिति में उप सचिव (सीपी), उप सचिव (स्थापना), एससी, एसटी, पीडब्ल्यूबीडी और ईडब्ल्यूएस वर्गों के लिए नियुक्त संपर्क अधिकारी तथा रक्षा विभाग के विभिन्न निदेशालयों और मुख्यालयों के प्रतिनिधियों को सदस्य बनाया गया है।

समिति को स्पष्ट जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इसका पहला काम विभिन्न कार्यालयों में मौजूद बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों की पहचान करना होगा। इसके बाद समिति उन कारणों की जांच करेगी जिनकी वजह से ये पद निर्धारित समय में नहीं भरे जा सके।

समिति उन कारकों का भी विश्लेषण करेगी जो बैकलॉग बढ़ने के लिए जिम्मेदार रहे हैं। इसके आधार पर सुधारात्मक उपायों की सिफारिश की जाएगी ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो। इसके अलावा विशेष भर्ती अभियानों के जरिए इन रिक्तियों को भरने की प्रगति की निगरानी भी समिति करेगी। (Defence Ministry Vacancies)

हर छह महीने में होगी समीक्षा बैठक

आदेश के अनुसार समिति कम से कम हर छह महीने में एक बार बैठक करेगी। इन बैठकों में विभिन्न निदेशालयों और मुख्यालयों से प्राप्त आंकड़ों की समीक्षा की जाएगी।

रक्षा मंत्रालय की यह कार्रवाई दरअसल वर्ष 2014 में शुरू हुई उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसका उद्देश्य सरकारी सेवाओं में आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधित्व को मजबूत करना था।

डीओपीटी ने 19 दिसंबर 2014 को एक विस्तृत कार्यालय ज्ञापन जारी किया था। यह ज्ञापन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित था।

उस समिति ने केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में एससी, एसटी, ओबीसी और दिव्यांग वर्ग के कम प्रतिनिधित्व तथा बैकलॉग रिक्तियों के कारणों का अध्ययन किया था।

रिपोर्ट में पाया गया था कि कई विभागों में आरक्षित पद वर्षों तक खाली रह जाते हैं। इससे आरक्षण नीति का उद्देश्य पूरी तरह पूरा नहीं हो पाता। (Defence Ministry Vacancies)

अक्टूबर 2014 की बैठक में बनी थी कार्ययोजना

22 अक्टूबर 2014 को डीओपीटी में एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई थी। इसमें सामाजिक न्याय मंत्रालय, जनजातीय कार्य मंत्रालय, उच्च शिक्षा विभाग और दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के अधिकारियों ने भाग लिया था।

बैठक में निर्णय लिया गया कि सभी मंत्रालय अपने स्तर पर विशेषज्ञ समितियां बनाएं। इन समितियों को बैकलॉग रिक्तियों का डेटा तैयार करने, कारणों का विश्लेषण करने और समाधान सुझाने की जिम्मेदारी दी गई।

उस समय मंत्रालयों को 1 अप्रैल 2012 से लंबित बैकलॉग रिक्तियों का समूहवार विवरण तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इसमें ग्रुप-ए, ग्रुप-बी, ग्रुप-सी और अन्य श्रेणियों के पद शामिल थे।

साथ ही सीधे भर्ती और पदोन्नति से संबंधित रिक्तियों का अलग-अलग रिकॉर्ड तैयार करने को कहा गया था।

विशेष भर्ती अभियानों पर दिया गया था जोर

डीओपीटी की कार्ययोजना में विशेष भर्ती अभियान महत्वपूर्ण हिस्सा था। मंत्रालयों को निर्देश दिए गए थे कि वे बैकलॉग रिक्तियों को भरने के लिए विशेष भर्ती अभियान चलाएं।

अगर अभियान के बाद भी पद खाली रह जाते हैं तो संबंधित विभागों को पूर्व-भर्ती प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने और पात्र उम्मीदवारों की उपलब्धता बढ़ाने के उपाय करने थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भर्ती प्रक्रिया केवल विज्ञापन आधारित और पारदर्शी तरीके से ही संचालित होनी चाहिए। इसी कारण रोजगार एक्सचेंज या सीमित कैंपस भर्ती जैसे कुछ प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए गए थे। (Defence Ministry Vacancies)

बैकलॉग बढ़ने के पीछे कई वजह

2014 की समीक्षा में बैकलॉग के कई कारण सामने आए थे। इनमें शैक्षिक योग्यता में अंतर, जागरूकता की कमी, भर्ती प्रक्रिया में देरी, तकनीकी पदों के लिए योग्य उम्मीदवारों की सीमित उपलब्धता और कुछ क्षेत्रों में प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव शामिल था।

विशेष रूप से एसटी वर्ग के उम्मीदवारों की उपलब्धता कुछ तकनीकी पदों पर चुनौती के रूप में सामने आई थी। इसके अलावा वैज्ञानिक और विशेषज्ञता वाले पदों पर भी रिक्तियां लंबे समय तक बनी रहती थीं।

इन समस्याओं के समाधान के लिए कौशल विकास, पूर्व-भर्ती प्रशिक्षण, योग्यता मानकों की समीक्षा और लगातार निगरानी जैसे उपाय सुझाए गए थे। (Defence Ministry Vacancies)

प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों पर भी रहा फोकस

डीओपीटी ने मंत्रालयों को निर्देश दिया था कि आरक्षित वर्गों के छात्रों और युवाओं को सरकारी नौकरियों के अवसरों के बारे में अधिक जानकारी दी जाए।

इसके लिए रोजगार समाचार, क्षेत्रीय समाचार पत्रों और सरकारी वेबसाइटों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई थी। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए कहा गया था जहां आरक्षित वर्गों की आबादी अधिक है।

साथ ही ऐसे कर्मचारियों के लिए ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग की भी सिफारिश की गई थी जिन्हें आरक्षण के तहत नियुक्त किया गया है, ताकि वे अपनी क्षमता और दक्षता को और बेहतर बना सकें। (Defence Ministry Vacancies)

कश्मीर के आर्मी गुडविल स्कूल का बड़ा कमाल, दुनिया के टॉप-10 में बनाई जगह; टीचर हुमैरा राशिद ने बदली बच्चों की सोच

Army Goodwill School Wuzur
From Rural Kashmir to Global Top 10: Humira Rashid Helps Army Goodwill School Wuzur Earn Global Recognition (Image Source: Indian Army)

Army Goodwill School Wuzur: जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के एक ग्रामीण इलाके में स्थित आर्मी गुडविल स्कूल वुजूर ने छात्रों के इनोवेशन के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। स्कूल को टी4 एजुकेशन के वर्ल्ड्स बेस्ट स्कूल प्राइजेज 2026 में इनोवेशन कैटेगरी के दुनिया के टॉप-10 फाइनलिस्ट स्कूलों में जगह मिली है। इस उपलब्धि के पीछे स्कूल के बच्चों के साथ उनकी बायोलॉजी टीचर हुमैरा राशिद की अहम भूमिका रही है।

हुमैरा ने स्कूल के इनोवेशन क्लब के जरिए बच्चों को अपने आसपास की समस्याएं पहचानने और उनका व्यावहारिक समाधान तैयार करने के लिए प्रेरित किया। क्लब के छात्र अब तक 15 से ज्यादा प्रोटोटाइप और प्रोजेक्ट तैयार कर चुके हैं। इनमें कम लागत वाला वाटर प्यूरिफायर, पैर से चलने वाला पानी का नल और न्यूट्रिस्कैन जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं।

Army Goodwill School Wuzur
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Army Goodwill School Wuzur: 2019 में बायोलॉजी टीचर के रूप में स्कूल से जुड़ीं

हुमैरा राशिद वर्ष 2019 में पोस्ट ग्रेजुएट बायोलॉजी टीचर के रूप में आर्मी गुडविल स्कूल वुजूर से जुड़ी थीं। वह कक्षा 9 से 12 तक के बच्चों को बायोलॉजी पढ़ाती थीं। उस समय उनका काम मुख्य रूप से क्लास, प्रैक्टिकल और परीक्षाओं तक सीमित था।

हुमैरा खुद को काफी शर्मीला और इंट्रोवर्ट बताती हैं। क्लास के अंदर बच्चों को पढ़ाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी, लेकिन लोगों के सामने बोलने या वरिष्ठ अधिकारियों के सामने प्रेजेंटेशन देने से वह बचती थीं।

उनके मुताबिक उस समय उनकी दुनिया क्लासरूम की चार दीवारों तक सीमित थी। उनमें बच्चों को आगे बढ़ाने की क्षमता थी, लेकिन खुद सामने आने में आत्मविश्वास की कमी महसूस होती थी।

Army Goodwill School Wuzur
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2023 में मिली इनोवेशन क्लब की जिम्मेदारी

हुमैरा के काम में बड़ा बदलाव साल 2023 में आया, जब उन्हें स्कूल के इनोवेशन क्लब की जिम्मेदारी दी गई। स्कूल के प्रिंसिपल शकील अहमद खान, भारतीय सेना की चिनार कोर से जुड़े अधिकारियों और भारती एयरटेल फाउंडेशन से मिले सहयोग ने उन्हें इस काम को आगे बढ़ाने में मदद की।

इनोवेशन क्लब का आयडिया बिल्कुल सिंपल था। बच्चों को अपने गांव, घर और आसपास के इलाके में मौजूद किसी समस्या को पहचानना था। इसके बाद उन्हें यह सोचना था कि उस समस्या का आसान और कम लागत वाला समाधान कैसे तैयार जा सकता है।

शुरुआत में बच्चों को इस क्लब से जोड़ना भी आसान नहीं था। हुमैरा के मुताबिक कई छात्र सोचते थे कि इसमें शामिल होने से पढ़ाई के अलावा उनका काम बढ़ जाएगा। बाद में बच्चों की दिलचस्पी इतनी बढ़ी कि क्लब में जगह कम पड़ने लगी।

Army Goodwill School Wuzur
Innovation Lab (Image Source: Indian Army)

स्कूल में नहीं थी अलग इनोवेशन लैब

जब इनोवेशन क्लब शुरू हुआ तब स्कूल के पास इसके लिए कोई अलग लैब नहीं थी। बच्चे खाली क्लासरूम, खुले स्थान और फ्री पीरियड में अपने मॉडल पर काम करते थे।

बाद में एक क्लासरूम के एक हिस्से को मेकर स्पेस में बदल दिया गया। इस जगह को तैयार करने में भी छात्रों ने खुद काम किया। यहीं बच्चे अपने आइडिया को मॉडल और काम करने वाले प्रोटोटाइप में बदलने लगे।

क्लब में लड़कियों की भागीदारी खास तौर पर अधिक रही। हुमैरा के मुताबिक बच्चों को शुरुआत से यह समझाने पर जोर दिया गया कि वे किसी समस्या को देखकर सीधे यह न कहें कि इसे हल नहीं किया जा सकता।

Army Goodwill School Wuzur
(Image Source: Indian Army)

बच्चों ने बनाए 15 से ज्यादा प्रोटोटाइप

इनोवेशन क्लब से अब तक 15 से ज्यादा छात्र आधारित प्रोजेक्ट और काम करने वाले प्रोटोटाइप सामने आए हैं। इनमें स्थानीय जरूरतों से जुड़े समाधान भी शामिल हैं।

कुछ छात्रों ने गांवों में साफ पानी से जुड़ी समस्या को देखते हुए कम कीमत वाला वाटर प्यूरिफायर तैयार किया। छात्रों ने हाथ से नल छूने की जरूरत कम करने के लिए फुट-ऑपरेटेड वाटर टैप भी बनाया। इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

कक्षा छह के एक छात्र ने न्यूट्रिस्कैन नाम का एप तैयार किया। इसे बेंगलुरु में आयोजित एक प्रतियोगिता के लिए चुना गया। हुमैरा के मुताबिक वहां जज इस प्रोजेक्ट से काफी प्रभावित हुए।

इन प्रोजेक्ट्स में बच्चों को केवल तैयार तकनीक इस्तेमाल करना नहीं सिखाया गया, बल्कि पहले समस्या समझने, फिर आइडिया तैयार करने, मॉडल बनाने और उसे टेस्ट करने की प्रक्रिया से जोड़ा गया।

सुबह पांच बजे से शुरू होती थी हुमैरा की तैयारी

स्कूल और इनोवेशन क्लब की जिम्मेदारी के साथ हुमैरा ने अपनी पढ़ाई और प्रोफेशनल तैयारी भी जारी रखी। वह कई बार सुबह करीब पांच बजे उठकर पढ़ाई करती थीं, ताकि परिवार और स्कूल की जिम्मेदारियों के बीच तैयारी के लिए समय निकाल सकें।

उनके लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव सेंटा इंटरनेशनल टीचिंग प्रोफेशनल्स ओलंपियाड रहा। शुरुआत में पुराने प्रश्नपत्र देखकर उन्हें लगा कि यह परीक्षा उनके स्तर से कठिन है।

उन्होंने अपने एकेडमिक मेंटर और प्रिंसिपल शकील अहमद खान से बात की। दोनों ने उन्हें परीक्षा देने के लिए प्रोत्साहित किया।

हुमैरा ने इसके बाद दो बार इस प्रतियोगिता में क्वालिफाई किया। पहले प्रयास में उन्होंने अपने विषय में इंटरनेशनल सब्जेक्ट रैंक-5 हासिल की। वहीं, वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली जम्मू-कश्मीर की एकमात्र टीचर बनीं।

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ग्लोबल एजुकेटर इनोवेटर अवॉर्ड भी मिला

शिक्षा और इनोवेशन से जुड़े काम के लिए हुमैरा को बो सीट का ग्लोबल एजुकेटर इनोवेटर अवॉर्ड भी मिला। उन्हें अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर के लिए यूनाइटेड किंगडम जाने का अवसर भी मिला।

लेकिन स्कूल में उनका काम सामान्य स्कूल टाइम के साथ खत्म नहीं होता। छात्रों के प्रोजेक्ट तैयार करने में स्कूल के बाद भी काफी समय लगता है। कई बार वह घर से भी बच्चों को उनके मॉडल और आइडिया पर मार्गदर्शन देती हैं।

उन्होंने एक घटना का जिक्र किया, जब इनोवेशन क्लब की एक छात्रा को अपने प्रोजेक्ट में मदद चाहिए थी। हुमैरा ने रात करीब 1:30 बजे तक उससे बात कर प्रोजेक्ट को बेहतर बनाने में सहायता की।

Army Goodwill School Wuzur
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वर्ल्ड्स बेस्ट स्कूल प्राइजेज में टॉप-10

छात्रों के इनोवेशन और स्कूल में तैयार हुए इस मॉडल को 2026 में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। आर्मी गुडविल स्कूल वुजूर को टी4 एजुकेशन के वर्ल्ड्स बेस्ट स्कूल प्राइजेज 2026 की इनोवेशन कैटेगरी में दुनिया के टॉप-10 फाइनलिस्ट में चुना गया।

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के ग्रामीण इलाके में स्थित इस स्कूल के छात्रों ने सीमित संसाधनों के बीच अपने आसपास की समस्याओं पर आधारित मॉडल तैयार किए।

हुमैरा इस उपलब्धि का श्रेय अपने छात्रों के साथ अपने माता-पिता, प्रिंसिपल शकील अहमद खान, चिनार कोर के अधिकारियों और भारती एयरटेल फाउंडेशन से मिले सहयोग को देती हैं। उनके मुताबिक इनोवेशन क्लब में ट्रॉफी या रैंकिंग से ज्यादा जोर बच्चों में यह भरोसा पैदा करने पर रहा है कि उनका स्थान या भौगोलिक इलाका उनकी प्रतिभा की सीमा तय नहीं करता। (Army Goodwill School Wuzur)

नौसेना के कमांडो ऑपरेशन के लिए आएंगी खास असॉल्ट बोट; ड्रोन, स्पाइक मिसाइल और मशीन गन से होंगी लैस

Indian Navy Special Operations Assault Craft
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Indian Navy Special Operations Assault Craft: भारतीय नौसेना अपने स्पेशल ऑपरेशंस के लिए 10 नई स्पेशल ऑपरेशंस असॉल्ट क्राफ्ट (एसओएसी) खरीदने की तैयारी कर रही है। ये सामान्य पेट्रोलिंग बोट नहीं होंगी। इन्हें तेज रफ्तार से समुद्र में आगे बढ़ने, कम गहरे पानी में ऑपरेट करने, निगरानी करने और जरूरत के मुताबिक हथियार तथा ड्रोन ले जाने के लिए तैयार किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है।

Indian Navy Special Operations Assault Craft: समुद्र से तट तक निगरानी की क्षमता

स्पेशल ऑपरेशंस असॉल्ट क्राफ्ट को नौसेना के स्पेशल ऑपरेशंस में फायर सपोर्ट और सर्विलांस-रिकॉनिसेंस जैसी भूमिकाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा। क्राफ्ट अपने सेंसर और हथियारों की मदद से खुद ऑपरेट होगी, और दूसरे क्राफ्ट को भी फायर सपोर्ट देगी।

इसकी सबसे खास बात इसका अनमैन्ड सिस्टम है। इसके जरिए समुद्र के साथ तटीय इलाके और तट के अंदर के क्षेत्र पर भी निगरानी की जा सकेगी। इसमें अलग-अलग तरह के अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) भी शामिल होंगे।

क्राफ्ट को लॉइटरिंग म्यूनिशन और दूसरे मिशन पेलोड ले जाने के हिसाब से भी कॉन्फिगर किया जा सकेगा। इसके पीछे कम से कम चार मीटर लंबा और तीन मीटर चौड़ा खुला डेक भी होगा। इस हिस्से को अलग-अलग मिशन के मुताबिक बदला जा सकेगा।

45 नॉट तक होगी स्प्रिंट स्पीड

एसओएसी की लंबाई करीब 14 से 17 मीटर के बीच होगी। इसकी चौड़ाई अधिकतम पांच मीटर और पूरी तरह लोड होने पर ड्राफ्ट एक मीटर से अधिक नहीं रखा जाएगा। कम ड्राफ्ट का फायदा उथले समुद्री क्षेत्रों में ऑपरेशन के दौरान मिलता है। इसका अधिकतम डिस्प्लेसमेंट 17 टन रखा गया है।

अधिकतम पेलोड के साथ 85 प्रतिशत मैक्सिमम कंटीन्यूअस रेटिंग पर इसकी स्पीड कम से कम 40 नॉट होगी। जरूरत पड़ने पर इसकी स्प्रिंट स्पीड न्यूनतम 45 नॉट तक जा सकेगी।

क्राफ्ट में 30 नॉट की क्रूजिंग स्पीड पर कम से कम 400 नॉटिकल मील चलने की क्षमता होनी चाहिए। इसमें क्रू समेत आठ लोग जा सकेंगे।

इसके इंजन इनबोर्ड होंगे। प्रोपल्शन के लिए वॉटरजेट या सरफेस ड्राइव जैसे विकल्प होंगे। वॉटरजेट या सरफेस ड्राइव जैसे सिस्टम तेज रफ्तार और कम गहरे पानी में चलने वाली बोट के लिए उपयोगी होती हैं। (Indian Navy Special Operations Assault Craft)

बैलिस्टिक प्रोटेक्शन वाला केबिन

क्राफ्ट में बंद और क्लाइमेट-कंट्रोल्ड केबिन होगा। साथ ही यह बैलिस्टिक प्रूफ होना चाहिए, ताकि इस पर गोलियों का भी असर न पड़े। केबिन में चालक दल के लिए शॉक मिटिगेटिंग सीट लगाई जाएंगी, जिससे तेज रफ्तार में लहरों से होने वाले झटकों का असर कम किया जा सके।

आरएफपी में तय भारतीय मानक के अनुसार थ्रेट लेवल-6 तक ऑल-अराउंड बैलिस्टिक प्रोटेक्शन की जरूरत रखी गई है। अलग-अलग हिस्सों में थ्रेट लेवल-5 और 6 की मॉड्यूलर सुरक्षा प्लेट लगाने की व्यवस्था भी होगी, जिन्हें जरूरत के अनुसार लगाया या हटाया जा सकेगा।

क्राफ्ट के लिए हल्के लेकिन मजबूत मरीन-ग्रेड कम्पोजिट और कार्बन फाइबर जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। समुद्र में स्थिरता और हथियारों से सटीक निशाना लगाने में मदद के लिए जायरोस्कोपिक स्टेबिलाइजेशन का भी फीचर होगा। (Indian Navy Special Operations Assault Craft)

12.7 मिमी और 7.62 मिमी गन से लैस

एसओएसी के वेपन पैकेज में आगे की तरफ 12.7 मिलीमीटर गन लगाई जाएगी। यह स्टेबिलाइज्ड रिमोट-कंट्रोल गन या हेवी मशीन गन हो सकती है। पीछे की तरफ 7.62 मिलीमीटर गन होगी, जिसके लिए गैटलिंग गन या मीडियम मशीन गन लगाई जा सकती है।

हथियारों को क्रू द्वारा सीधे चलाने के साथ रिमोट मोड से कंट्रोल करने का सिस्टम भी होगा। इसके लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर, गन माउंट, वेपन फायर कंट्रोल स्टेशन और जरूरी सेफ्टी लिमिटर पूरे सिस्टम का हिस्सा होंगे।

इसके अलावा मिशन की जरूरत के अनुसार क्राफ्ट पर लॉइटरिंग म्यूनिशन वर्जन 1.0 और 2.0 तथा स्पाइक मिसाइल जैसे मिशन बेस्ड वेपन भी होंगे। रीकॉन्फिगरेबल डेक की वजह से अलग-अलग मिशन पेलोड लगाए जा सकेंगे।

क्राफ्ट से उड़ सकेगा 12 घंटे एंड्योरेंस वाला ड्रोन

एसओएसी में इंटीग्रल ड्रोन सिस्टम भी होगा। ताकि मिड-रेंज यूएएस को चलती हुई बोट से लॉन्च किया जा सके। जिसमें वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग यानी वीटीओएल सिस्टम की खूबी हो। क्योंकि छोटी बोट पर लंबा रनवे उपलब्ध नहीं होता।

मिड-रेंज यूएएस की एंड्योरेंस कम से कम 12 घंटे और मिशन रेंज न्यूनतम 80 नॉटिकल मील रखी गई है। जो कम से कम 30 नॉट की हवा में ऑपरेट कर सके। और इसकी ऑपरेशनल सीलिंग कम से कम 2,500 मीटर होगी।

ड्रोन पर बदले जा सकने वाले इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर भी होंगे। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डिटेक्शन और ट्रैकिंग क्षमता होगी। यूएएस को कम्युनिकेशन रिले के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके अलावा क्लोज-रेंज यूएएस भी पैकेज का हिस्सा होगा। (Indian Navy Special Operations Assault Craft)

रडार से सैटकॉम तक पूरा नेविगेशन पैकेज

छोटे साइज के बावजूद एसओएसी में आधुनिक नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम का बड़ा पैकेज होगा। नेविगेशन सूट में लो-पावर रडार, इलेक्ट्रॉनिक चार्ट डिस्प्ले एंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम, इकोसाउंडर, जायरो कंपास, जीपीएस, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉग और ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम शामिल किए जाएंगे।

रात या कम रोशनी में ऑपरेशन के लिए नेविगेशन लाइट और हाई-बीम सर्च लाइट की व्यवस्था होगी।

कम्युनिकेशन के लिए आठ हैंडहेल्ड वीएचएफ सेट, इंट्रा-बोट कम्युनिकेशन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, ग्लोबल मैरीटाइम डिस्ट्रेस एंड सेफ्टी सिस्टम और स्पेशल ऑपरेशंस कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे उपकरण भी होंगे। भारतीय नौसेना के सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) को भी कम्युनिकेशन सिस्टम से जोड़ा जाएगा। (Indian Navy Special Operations Assault Craft)

एक ही जगह से नेविगेशन, हथियार और ड्रोन पर नजर

बोट के अंदर इंटीग्रेटेड कंट्रोल स्टेशन दिया जाएगा। इससे मशीनरी, नेविगेशन, हथियार, कम्युनिकेशन और सर्विलांस सिस्टम को कंट्रोल किया जा सकेगा।

समुद्र में लंबे ऑपरेशन को ध्यान में रखते हुए इसमें रिफ्यूलिंग की सुविधा भी होगी। क्राफ्ट को बड़े जहाज से समुद्र में उतारने और वापस उठाने के लिए होइस्टिंग और लोअरिंग सिस्टम होगा। इसमें हेनरिक्सन रिलीज हुक जैसे उपकरण लगाए जाएंगे।

घायल व्यक्ति को निकालने के लिए मेडिकल रैक भी होगा। लाइफ सेविंग उपकरणों के साथ सेल्फ-राइटिंग सिस्टम भी शामिल होगा, जिससे क्राफ्ट के पलटने जैसी स्थिति से निपटने में मदद मिल सके। (Indian Navy Special Operations Assault Craft)

कम से कम 12 साल की ऑपरेशनल लाइफ

यह खरीद बाय (इंडियन-आईडीडीएम) कैटेगरी में होगी। साथ ही, इसमें कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त रखी गई है। इन क्राफ्ट की डिलीवरी मुंबई और विशाखापट्टनम में की जानी है।

नौसेना ने एसओएसी के लिए कम से कम 12 वर्ष की ऑपरेशनल लाइफ तय की है। इसे रोजाना आठ घंटे या उससे ज्यादा और साल में करीब 1,500 घंटे के इस्तेमाल को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा।

क्राफ्ट में सी स्टेट-4 तक सुरक्षित तरीके से ऑपरेट करने की क्षमता होनी चाहिए। सी स्टेट-1 में 45 नॉट और सी स्टेट-4 में 20 नॉट के लिए सर्टिफाइड ऑपरेशनल एनवलप उपलब्ध कराना होगा।

खरीद में 24 महीने की वारंटी और उसके बाद 10 वर्ष की कॉम्प्रिहेंसिव मेंटेनेंस व्यवस्था का प्रावधान है। प्रत्येक दो क्राफ्ट के लिए एक रोड ट्रेलर भी दिया जाएगा। (Indian Navy Special Operations Assault Craft)

अब हवा में होगा दुश्मन के ड्रोनों का शिकार, हेलीकॉप्टरों को ‘ड्रोन हंटर’ बनाएगी भारतीय वायुसेना

IAF Helicopter Counter Drone System
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IAF Helicopter Counter Drone System: भारतीय वायुसेना अब हेलीकॉप्टरों को दुश्मन के सस्ते ड्रोन, निगरानी करने वाले यूएवी और लोइटरिंग म्यूनिशंस से निपटने के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए हेलीकॉप्टरों पर एआई बेस्ड रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर, रेडियो फ्रीक्वेंसी और जीपीएस जैमर, माइक्रो-मिसाइल तथा 20 मिलीमीटर एयर-बर्स्ट गन राउंड जैसे सिस्टम लगाए जा सकते हैं। वायुसेना चाहती है कि हेलीकॉप्टर हवा में रहते हुए छोटे ड्रोन को खोज सके, उसकी पहचान और ट्रैकिंग कर सके तथा उपलब्ध काउंटर-ड्रोन सिस्टम से उससे निपट सके।

भारतीय वायुसेना ने नई दिल्ली में आयोजित आईएएफ-एसआईडीएम ‘संकल्प 2026’ के दौरान रक्षा उद्योग के सामने इससे जुड़ा प्रॉब्लम स्टेटमेंट रखा है। इसका नाम ‘काउंटरिंग लो-कॉस्ट लोइटरिंग म्यूनिशंस एंड रिकॉनिसेंस ड्रोन्स यूजिंग हेलीकॉप्टर्स’ है। वायुसेना के अनुसार जरूरी बदलाव, नए उपकरणों और सिस्टम इंटीग्रेशन के जरिए हेलीकॉप्टरों को काउंटर-यूएएस भूमिका वाला प्लेटफॉर्म बनाया जा सकता है।

IAF Helicopter Counter Drone System: सस्ते ड्रोन ने बदली एयर डिफेंस की चुनौती

यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने छोटे ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन की भूमिका को काफी बढ़ा दिया है। इनमें से कई ड्रोन आकार में छोटे होते हैं, कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और उनका रडार क्रॉस सेक्शन भी काफी कम होता है। इस कारण रडार के लिए उनकी पहचान करना मुश्किल हो सकता है।

दूसरी समस्या लागत की है। हजारों या लाखों रुपये की कीमत वाले छोटे ड्रोन को रोकने के लिए बहुत महंगी एयर डिफेंस मिसाइल इस्तेमाल करना हमेशा व्यावहारिक विकल्प नहीं होता। इसी कारण सेनाएं इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, गन, एयर-बर्स्ट गोला-बारूद और कम लागत वाली छोटी मिसाइलों जैसे विकल्पों पर भी काम कर रही हैं।

जमीन पर लगे रडार और एयर डिफेंस सिस्टम के सामने टेरन मास्किंग और लाइन-ऑफ-साइट की सीमा भी होती है। पहाड़, इमारत या दूसरी रुकावट के पीछे कम ऊंचाई पर उड़ रहा ड्रोन कुछ समय के लिए सेंसर की सीधी नजर से बाहर रह सकता है। हेलीकॉप्टर अपनी ऊंचाई और लोकेशन बदलकर ऐसे क्षेत्र को दूसरे कोण से देख सकता है।

एआई रडार खोजेगा छोटे ड्रोन

वायुसेना की जरूरत में एक महत्वपूर्ण सिस्टम एआई बेस्ड रडार है, जो कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले टारगेट का पता लगाने में सक्षम हो। छोटे ड्रोन की पहचान आसान नहीं होती। रडार को जमीन से आने वाले क्लटर, पक्षियों और धीमी गति से उड़ने वाली दूसरी वस्तुओं के बीच वास्तविक खतरे को अलग करना होता है। एआई आधारित प्रोसेसिंग सेंसर से मिलने वाले डेटा का विश्लेषण करके संदिग्ध टारगेट को पहचानने और उसकी ट्रैकिंग में मदद कर सकती है।

रडार के साथ इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड पॉड को जोड़ने की जरूरत भी बताई गई है। इसमें एआई बेस्ड थ्रेट और टारगेट आइडेंटिफिकेशन फीचर रखने की बात है। यानी किसी संदिग्ध हवाई वस्तु का पता चलने के बाद कैमरा और थर्मल सेंसर उसकी पहचान को और स्पष्ट कर सकेंगे। (IAF Helicopter Counter Drone System)

पहले जैमर से ड्रोन रोकने की कोशिश

प्रस्तावित सिस्टम में एयरबोर्न रेडियो फ्रीक्वेंसी और जीपीएस जैमर भी शामिल है। इसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड पॉड और हेलीकॉप्टर की फ्रंट गन के साथ जोड़ने की जरूरत बताई गई है।

कई ड्रोन ऑपरेटर और ड्रोन के बीच रेडियो कम्युनिकेशन पर निर्भर होते हैं। वहीं नेविगेशन के लिए सैटेलाइट सिग्नल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग ऐसे लिंक को बाधित करने का एक तरीका है।

हालांकि हर तरह के ड्रोन को केवल जैमिंग से रोकना संभव नहीं होता। ऑटोनॉमस तरीके से उड़ रहे या ऐसे यूएवी जिनका कम्युनिकेशन लिंक जाम होने के बाद भी मिशन जारी रह सकता है, उनके खिलाफ फिजिकल तौर पर इंटरसेप्ट करने वाले हथियार की जरूरत पड़ सकती है। इसी कारण वायुसेना के कॉन्सेप्ट में सॉफ्ट-किल के साथ हार्ड-किल विकल्प भी रखे गए हैं। (IAF Helicopter Counter Drone System)

ड्रोन के लिए खास माइक्रो-मिसाइल

इस योजना में सबसे दिलचस्प हथियार माइक्रो-मिसाइल है। वायुसेना ऐसी छोटी मिसाइलों को देख रही है जिन्हें खास तौर पर ड्रोन और धीमी गति से उड़ने वाले हवाई टारगेट के खिलाफ तैयार किया गया हो।

इसका उद्देश्य बड़े और महंगे सर्फेस-टू-एयर हथियार की जगह छोटे ड्रोन के अनुरूप इंटरसेप्टर उपलब्ध कराना है।

भारतीय उद्योग इस दिशा में पहले से काम कर रहा है। वायुसेना के प्रॉब्लम स्टेटमेंट में भार्गवास्त्र का उदाहरण दिया गया है। इसे सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड ने डेवलप किया है।

भार्गवास्त्र के माइक्रो-रॉकेट का 13 मई 2025 को ओडिशा के गोपालपुर स्थित सीवर्ड फायरिंग रेंज में परीक्षण किया गया था। परीक्षण के दौरान चार रॉकेट दागे गए, जिनमें दो को साल्वो मोड में दो सेकंड के भीतर फायर किया गया। सिस्टम को करीब 2.5 किलोमीटर तक छोटे ड्रोन से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसके पहले स्तर में अनगाइडेड माइक्रो-रॉकेट और ज्यादा सटीक इंटरसेप्शन के लिए गाइडेड माइक्रो-मिसाइल शामिल है। (IAF Helicopter Counter Drone System)

जुलाई 2026 में फिर सामने आया भार्गवास्त्र

भार्गवास्त्र पर काम इसके बाद भी जारी रहा। 24 जुलाई 2026 को सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस के चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल ने नागपुर में सिस्टम के प्रदर्शन के बाद बताया कि इसके रडार की डिटेक्शन रेंज 10 किलोमीटर तक और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम की रेंज करीब छह किलोमीटर है।

कंपनी के अनुसार भारतीय सेना की टीम ने नागपुर स्थित सुविधा में सिस्टम की समीक्षा की। प्रदर्शन के दौरान ड्रोन स्वार्म उड़ाया गया, जिसे रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड और रेडियो फ्रीक्वेंसी सेंसर से डिटेक्ट किया गया। इसके बाद कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस सिस्टम ने हवाई स्थिति की तस्वीर तैयार करके टारगेट को लॉन्चर के लिए निर्धारित किया। (IAF Helicopter Counter Drone System)

20 मिलीमीटर गन से भी रोके जाएंगे ड्रोन

माइक्रो-मिसाइल के अलावा वायुसेना ने 20 मिलीमीटर एयर-बर्स्ट गन राउंड को भी संभावित विकल्प के रूप में शामिल किया है।

सामान्य गन फायर में छोटे ड्रोन को सीधे हिट करना कठिन हो सकता है। एयर-बर्स्ट गोला-बारूद को एरियल टरगेट के आसपास निर्धारित जगह पर असर पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे निकलने वाले फ्रैगमेंट छोटे ड्रोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

प्रॉब्लम स्टेटमेंट में फ्रैगमेंटेशन रॉकेट-प्रोपेल्ड वारहेड का भी उल्लेख है। इसे माइक्रो और मिनी यूएएस सहित अलग-अलग तरह के ड्रोन से निपटने के लिए इस्तेमाल करने की जरूरत बताई गई है। (IAF Helicopter Counter Drone System)

एक हेलीकॉप्टर पर कई लेयर में काम करेगा सिस्टम

वायुसेना का कॉन्सेप्ट केवल हेलीकॉप्टर पर एक मिसाइल लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें पूरा डिटेक्ट, ट्रैक, पहचान और एंगेजमेंट सिस्टम एक साथ काम करेगा।

सबसे पहले रडार संदिग्ध एरियल टारगेट का पता लगाएगा। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड पॉड उसकी पहचान और ट्रैकिंग में मदद करेगा। एआई सिस्टम सेंसर से मिले डेटा के आधार पर खतरे को पहचानने में सहायता करेगा।

इसके बाद उपलब्ध विकल्पों में रेडियो फ्रीक्वेंसी या जीपीएस जैमिंग जैसे सॉफ्ट-किल सिस्टम इस्तेमाल किए जा सकते हैं। यदि ड्रोन पर इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर असरदार नहीं रहता है तो माइक्रो-मिसाइल, फ्रैगमेंटेशन हथियार या गन जैसे हार्ड-किल विकल्प काम आएंगे। (IAF Helicopter Counter Drone System)

अपाचे और प्रचंड जैसे लड़ाकू हेलीकॉप्टर भी वायुसेना के बेड़े में

भारतीय वायुसेना के पास अलग-अलग भूमिकाओं वाले हेलीकॉप्टर मौजूद हैं। इनमें एएच-64ई अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर और स्वदेशी एलसीएच प्रचंड जैसे लड़ाकू प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं। इसके अलावा एमआई-17 कैटेगरी के हेलीकॉप्टर वायुसेना के रोटरी-विंग बेड़े का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

हालांकि संकल्प 2026 के प्रॉब्लम स्टेटमेंट में किसी खास हेलीकॉप्टर को इस काउंटर-यूएएस भूमिका के लिए चुने जाने की बात नहीं कही गई है। फिलहाल वायुसेना ने उद्योग के सामने उस तकनीकी क्षमता को रखा है, जिसमें जरूरी मॉडिफिकेशन, मैन्युफैक्चरिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन के जरिए हेलीकॉप्टर को लो-कॉस्ट लोइटरिंग म्यूनिशन तथा रिकॉनिसेंस ड्रोन के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। (IAF Helicopter Counter Drone System)

India’s AMCA Fighter Engine Challenge: Raghu Vamsi Aerospace Chief Identifies the Biggest Technology Gaps

AMCA fighter Jet engines
Vamsi Vikas Ganesula, Founder and Managing Director of Raghu Vamsi Aerospace Group

Hyderabad-based Raghu Vamsi Aerospace Group has announced an investment of over Rs. 600 crore to set up a 50-acre integrated nickel-based superalloy manufacturing facility in Telangana. Announced at the Farnborough International Airshow 2026, the project aims to strengthen India’s domestic supply chain for critical aerospace and defence materials.

Against this backdrop, Raksha Samachar spoke with Vamsi Vikas Ganesula, Managing Director of Raghu Vamsi Aerospace Group, about defence indigenisation, indigenous propulsion and UAV technologies, the AMCA programme, fighter jet engines, and India’s emergence as a global aerospace manufacturing hub.

Q: India is witnessing a major push towards defence indigenisation. How is your group contributing to the Atmanirbhar Bharat mission in aerospace and defence?

A: The effort towards indigenisation in defence is very similar to our Group’s long-term goals and vision. We are supporting the mission by developing indigenous capabilities related to precision manufacturing, propulsion, and autonomy. Specifically, we aim to develop micro turbine jet engines and unmanned systems from within India. Alongside that, we are making investments in aerospace manufacturing capacity. We are developing long-term programmes in relation to defence and aerospace by making use of our manufacturing abilities. These programmes include much more than just assembly-level indigenisation but, more significantly, focus on creating strategic industries and capabilities.

Q: Your group has expanded from precision manufacturing to developing indigenous microturbojet engines and UAV technologies. What has driven this strategic shift?

A: Moving from precision machining towards building indigenous microtubrojet engines and Unmanned Aerial Vehicles (UAVs) has been a logical progression of moving from component manufacture to system development. A key driver has been the desire to move higher in the aerospace value chain, along with the growing need for indigenous propulsion and autonomous technologies. We have also been able to leverage decades of aerospace manufacturing expertise and ecosystem relationships in this journey.

At the same time, the focus has been on building long-term intellectual property and technology ownership.

Q: What are the biggest gaps that still need to be addressed for India to emerge as a global aerospace manufacturing hub?

A: In order for India to become a manufacturing destination for aerospace components globally, the need arises for even greater development of the supplier base at the Tier-2 and Tier-3 levels. Greater availability of aerospace materials and process capabilities would also make a difference.

In addition, the establishment of highly sophisticated test and qualification facilities would become essential, along with enhanced scalability and consistency in the supply chain. Increased investment in propulsion technology would be crucial.

Q: How do you assess the impact of recent defence reforms on the growth of private-sector participation in aerospace and defence manufacturing?

A: Recent defence reform has created greater assurance for the private sector’s involvement in defence manufacturing, as well as greater scope for private industry involvement in strategic programmes. It has also expedited indigenous research and development, while promoting cooperation between the government and the private industry. In general, it has helped create a balanced ecosystem of the defence industry.

Q: With increasing geopolitical uncertainties and supply-chain realignments, what opportunities do you see for Indian aerospace companies in global markets?

A: Given that geopolitical and supply chain risks are growing, there is also a need for greater resilience and diversification for many OEMs, thus presenting new avenues for Indian manufacturing.

Further, export opportunities are rising in the aerospace & defence sectors, and reliable sources are needed for companies capable of manufacturing the required items. This offers Indian companies opportunities to rise above supplier roles and engage in programs as partners.

Q: Among emerging programmes such as drones, missiles, helicopters, and fighter aircraft, which sectors do you believe will drive the next phase of growth for Indian defence manufacturing?

A: Unmanned and autonomous systems, as well as aero engine and propulsion technologies, are going to drive the next wave of growth in the Indian defence manufacturing sector. This growth can also come from missiles and guided weapons and their subsystems, as well as from fighter aircraft and helicopters. Along with these, it is also expected that counter-UAS technologies and mission system technologies are going to have an important part to play in growth.

AMCA fighter Jet engines
Super Alloy Facility of Raghu Vamsi Aerospace Group

Q: The AMCA programme marks a significant opening for private industry. What does this shift signal for the future of India’s defence-industrial ecosystem?

A: In terms of the AMCA programme, it not only marks the advancement of private-sector capabilities and maturity but also provides greater room for industry involvement in strategic national programmes. The programme supports long-term investments in technology and infrastructure and the growth of local aerospace and defence supply chains. Overall, the programme indicates the transition towards a more cooperative and competitive defence sector ecosystem.

Q: Developing an indigenous high-thrust fighter engine remains one of India’s biggest technological challenges. What are the key bottlenecks that must be overcome?

A: The development of a high-thrust fighter jet engine involves several major challenges. These include advanced materials and high-temperature metallurgy, as well as single-crystal blade technologies and coatings. Additionally, long-term testing and validation capabilities, as well as decades-long investments and continuity, are required. Finally, the close integration of research, manufacturing, and testing infrastructure plays an equally important role.

Q: What lessons from your Group’s work on indigenous microturbojet engines can be applied to India’s ambitions for advanced fighter-engine development?

A: The development of microturbojet engines confirmed once again that propulsion development is not just a matter of engineering and technical skills but also requires persistence and patience. In addition, the process made us realize that testing and validation play an equally significant role as development itself. The process proved that materials and manufacturing processes are crucial aspects of the work. Finally, our main lesson from the experience was that ecosystems play a greater role than technology breakthroughs.

Q: How can government, industry, and research institutions collaborate more effectively to accelerate self-reliance in critical aerospace technologies?

A: A synergy between the government, industry, and research organizations could be better achieved through the creation of common aerospace technology roadmaps that span years. Another aspect where synergies can be realized is through strengthening industrial collaborations with academia and research organizations. This would require setting up testing and qualification facilities as well as faster technology transfer from the lab to production. Alongside, investments for deep-tech development must continue to grow.

Q: By 2035, where do you see India’s aerospace and defence sector in the global landscape, and what role do you expect your group to play in that journey?

A: By 2035, we envisage India becoming a preferred partner in aerospace manufacturing in the world with significant participation in international civil and defence programmes. In this endeavor, we also anticipate the emergence of a fully-fledged indigenous aerospace propulsion and technology eco-system, along with increased contributions toward the export of aerospace and defence products. This includes our vision at RVAG, which would be making contributions to the development of manufacturing technologies and autonomous technologies.

अब दूर बैठा दुश्मन भी होगा निशाने पर, गरुड़ कमांडोज को मिलेंगी 1800 मीटर तक मार करने वाली नई स्नाइपर राइफलें

Garud Commandos Sniper Rifle
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Garud Commandos Sniper Rifle: भारतीय वायुसेना अपने स्पेशल फोर्स गरुड़ कमांडो के लिए बेहद ताकतवर हाई कैलिबर स्नाइपर राइफल खरीदने की तैयारी कर रही है। गरुड़ कमांडोज को एयरबेस सुरक्षा, स्पेशल ऑपरेशंस और कठिन भौगोलिक इलाकों में तैनाती जैसी जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता है। वहीं, कई बार ऑपरेशन के दौरान कमांडोज को सुरक्षित दूरी से किसी अहम टारगेट को निशाना भी बनाना पड़ता है। इसी जरूरत को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने स्पेशलाइज्ड हाई कैलिबर स्नाइपर राइफल की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है।

Garud Commandos Sniper Rifle: 1800 मीटर की रेंज

12.7×99 मिलीमीटर को आम तौर पर .50 बीएमजी कैलिबर के नाम से जाना जाता है। इस कैटेगरी की राइफल को लंबी दूरी पर सटीक फायर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आरएफआई में कम से कम 1800 मीटर की प्रभावी एंगेजमेंट रेंज मांगी गई है। खरीद को डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर-2020 के तहत ‘बाय इंडियन’ श्रेणी में आगे बढ़ाया जाना है और इसमें कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त रखी गई है।

गरुड़ कमांडोज को मिलने वाली राइफल बोल्ट-एक्शन सिस्टम पर आधारित होगी। इसका कैलिबर 12.7×99 मिलीमीटर होगा। राइफल की मजल वेलोसिटी कम से कम 850 मीटर प्रति सेकंड और मजल एनर्जी न्यूनतम 14,000 जूल मांगी गई है।

इसकी प्रभावी एंगेजमेंट रेंज कम से कम 1800 मीटर रखी गई है, जबकि अधिकतम रेंज 2500 मीटर से कम नहीं होनी चाहिए।

राइफल की बैरल लाइफ 15 साल या 5,000 राउंड, जो भी पहले पूरा हो, निर्धारित की गई है। इसमें मिलिट्री स्टैंडर्ड-1913 पिकाटिनी रेल सिस्टम होगा, जिस पर अलग-अलग ऑप्टिकल और दूसरे उपकरण लगाए जा सकेंगे। बैरल को साउंड सप्रेसर के साथ भी काम करना होगा।

15 किलो के आसपास हो वजन

इतने बड़े कैलिबर के बावजूद राइफल को गरुड़ कमांडोज आसानी से ले जा सकें, इसके लिए बाइपॉड, खाली मैगजीन, टेलीस्कोपिक साइट, माउंट और फ्लैश सप्रेसर या मजल ब्रेक के साथ इसका वजन 15 किलोग्राम से करीब 10 प्रतिशत तक रखा गया है। वहीं, राइफल की कुल लंबाई अधिकतम 1500 मिलीमीटर होगी। फोल्ड करने पर इसकी लंबाई 1250 मिलीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।

इसमें एडजस्ट होने वाला या फोल्ड होने वाला बट स्टॉक मांगा गया है। चीक रेस्ट भी एडजस्ट किया जा सकेगा और क्विक-रिलीज मोनोपॉड सिस्टम होगा। इसके साथ एर्गोनॉमिक पिस्टल ग्रिप दी जाएगी।

मेटल पार्ट्स पर सेराकोट जेनरेशन-II या उससे बेहतर कोटिंग मांगी गई है। इसका उद्देश्य हथियार की सतह को सुरक्षा देने के साथ उसके इन्फ्रारेड और थर्मल सिग्नेचर को कम रखना है। (Garud Commandos Sniper Rifle)

दाएं और बाएं दोनों हाथ से इस्तेमाल पर जोर

रक्षा मंत्रालय ने राइफल के कंट्रोल्स को एंबीडेक्सट्रस रखने की जरूरत बताई है, यानी प्रमुख कंट्रोल्स को दाएं या बाएं हाथ से इस्तेमाल करने की सुविधा होनी चाहिए।

सेफ्टी कैच, मैगजीन कैच और कॉकिंग से जुड़े कंट्रोल इसी जरूरत के हिसाब से होंगे। खाली कारतूस बाहर निकलने के लिए ऐसा सिस्टम होना चाहिए कि किसी भी कंधे से फायर करते समय कारतूस शूटर के चेहरे या हाथ से न टकराए।

राइफल का डिजाइन मॉड्यूलर होना चाहिए, ताकि फील्ड में सैनिक बिना विशेष उपकरणों के जरूरी हिस्सों को खोल और जोड़ सकें। ट्रिगर ग्रुप, रिसीवर और स्टॉक असेंबली की फील्ड मेंटेनेंस को इसमें खास तौर पर ध्यान में रखा गया है। (Garud Commandos Sniper Rifle)

खराबी के लिए भी सख्त शर्तें

आरएफआई में राइफल की रिलायबिलिटी का भी ध्यान रखा गया है। 120 राउंड के फायरिंग साइकल के दौरान अधिकतम दो क्लास-I या एक क्लास-II स्टॉपेज की सीमा रखी गई है, जबकि क्लास-III स्टॉपेज स्वीकार नहीं होगा।

क्लास-I खराबी वह होगी जिसे 10 सेकंड के भीतर बिना किसी टूल के दूर किया जा सके। क्लास-II खराबी को ठीक करने में 10 सेकंड से 10 मिनट तक लग सकते हैं और इसमें टूल या स्पेयर की जरूरत पड़ सकती है। क्लास-III वह खराबी है, जिसे ठीक करने में 10 मिनट से अधिक समय लगे।

राइफल ऐसी हो जो कम से कम 900जी तक शॉक सह सके। साथ ही इसकी शेल्फ लाइफ कम से कम 15 वर्ष होनी चाहिए। (Garud Commandos Sniper Rifle)

5एक्स से 45एक्स तक की टेलीस्कोपिक साइट

लंबी दूरी पर सटीक निशाने के लिए राइफल के साथ हाई-एंड टेलीस्कोपिक डे साइट मांगी गई है। इसका लो मैग्निफिकेशन 5एक्स या उससे कम और हाई मैग्निफिकेशन 45एक्स या उससे अधिक होगा।

साइट में कम से कम 90 प्रतिशत लाइट ट्रांसमिशन, मल्टी-कोटेड लेंस और फर्स्ट फोकल प्लेन पर मिल-ग्रिड रेटिकल होना चाहिए। इसमें 200 से 1800 मीटर तक का स्टैडिमीट्रिक रेंज फाइंडर भी मांगा गया है।

इसके साथ बैलिस्टिक कैलकुलेटर होगा, जो हवा के कारण गोली पर पड़ने वाले असर, एयर प्रेशर, तापमान और फायरिंग एंगल जैसे डेटा को ध्यान में रखकर करेक्शन देगा। इसमें रियल-टाइम करेक्शन डिस्प्ले और ब्लूटूथ कनेक्टिविटी की जरूरत भी रखी गई है।

डे साइट को आईपी68 सुरक्षा स्तर के अनुरूप और नाइट्रोजन पर्ज्ड होना होगा। इसे कम से कम 20 मीटर पानी में सबमर्शन और छह मीटर की ऊंचाई से गिरने जैसी परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाना है।

रात में थर्मल साइट से 1800 मीटर तक एंगेजमेंट

राइफल में थर्मल नाइट साइट भी होगी। इसमें कम से कम 640×480 रेजोल्यूशन वाला अनकूल्ड माइक्रो-बोलोमीटर डिटेक्टर और 12 माइक्रॉन या उससे छोटा पिक्सल पिच मांगा गया है।

सिस्टम का स्टार्ट-अप समय 15 सेकंड से कम होना चाहिए। इसमें 2एक्स और 4एक्स इलेक्ट्रॉनिक जूम के साथ कम से कम 2एक्स ऑप्टिकल मैग्निफिकेशन होगा।

आरएफआई में थर्मल साइट की डिटेक्शन रेंज कम से कम 2500 मीटर और रिकग्निशन रेंज 1800 मीटर मांगी गई है। प्रभावी एंगेजमेंट क्षमता भी 1800 मीटर तय की गई है। जबकि इसका मीन टाइम बिटवीन फेल्योर कम से कम 10,000 घंटे होना चाहिए। (Garud Commandos Sniper Rifle)

सप्रेसर और स्पॉटर स्कोप भी पैकेज में

हथियार के साथ तेजी से लगाया और हटाया जा सकने वाला सप्रेसर मांगा गया है। इसकी लंबाई अधिकतम 430 मिलीमीटर और वजन 1650 ग्राम तक रखा गया है। राइफल के साथ 20-60एक्स मैग्निफिकेशन और 80 मिलीमीटर ऑब्जेक्टिव लेंस वाला स्पॉटर स्कोप भी मांगा गया है। स्नाइपर टीम में स्पॉटर लंबी दूरी पर टारगेट को देखने और शूटर को जरूरी ऑब्जर्वेशन देने के लिए इस तरह के ऑप्टिकल उपकरण का इस्तेमाल करता है।

हर राइफल के लिए कम से कम पांच राउंड क्षमता वाली चार मजबूत और अलग की जा सकने वाली मैगजीन होना चाहिए। वहीं, एडजस्टेबल टेलीस्कोपिक बाइपॉड, थ्री-पॉइंट स्लिंग, क्लीनिंग किट और हार्ड तथा सॉफ्ट ट्रांसपोर्ट केस भी पूरे पैकेज का हिस्सा होंगे।

कई तरह के .50 बीएमजी गोला-बारूद के साथ होगी कम्पैटिबल

नई राइफल को अलग-अलग प्रकार के 12.7×99 मिलीमीटर गोला-बारूद के साथ कम्पैटिबल रखने की मांग की गई है। आरएफआई में एम33 फुल मेटल जैकेट बॉल, एम2 आर्मर पियर्सिंग, एम8 आर्मर पियर्सिंग इनसेंडियरी, एम17 ट्रेसर और दूसरे तय .50 बीएमजी गोला-बारूद के लिए कंपैटेबल होना चाहिए। इस तरह 12.7×99 मिलीमीटर प्लेटफॉर्म को सामान्य लंबी दूरी की स्नाइपर भूमिका के साथ एंटी-मटेरियल श्रेणी की जरूरतों के अनुरूप रखा गया है। (Garud Commandos Sniper Rifle)

5000 मीटर की ऊंचाई पर भी करना होगा काम

गरुड़ कमांडोज देश के अलग-अलग भौगोलिक और मौसम वाले क्षेत्रों में तैनात होते हैं। इसी कारण हथियार और उसके उपकरणों के लिए कठिन पर्यावरणीय मानक तय किए गए हैं।

राइफल को लगभग समुद्र की सतह से 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर काम करने योग्य होना चाहिए। तापमान संबंधी परीक्षण के साथ इसकी पर्यावरणीय और ड्यूरेबिलिटी जांच जेएसजी, जेएसएस या मिलिट्री स्टैंडर्ड-810 जैसे तय मानकों के अनुरूप होगी। (Garud Commandos Sniper Rifle)

60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त

खरीद प्रक्रिया में भारतीय वेंडर को प्राथमिकता दी गई है। संबंधित कंपनी मैन्युफैक्चरिंग एंटिटी या सिस्टम इंटीग्रेटर होनी चाहिए, केवल ट्रेडिंग कंपनी नहीं हो। भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा भी जरूरी है। आरएफआई के अनुसार खरीद ‘बाय इंडियन’ श्रेणी में प्रस्तावित है और न्यूनतम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की आवश्यकता रखी गई है। तकनीकी मूल्यांकन के बाद प्रस्तावित सिस्टम को अलग-अलग परिस्थितियों में ‘नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट’ आधार पर ट्रायल से गुजरना होगा। (Garud Commandos Sniper Rifle)

फिलहाल कौन सी स्नाइपर हैं गरुड़ कमांडोज के पास

गरुड़ कमांडोज के पास अभी मुख्य रूप से इजरायल में बनी आईएमआई गैलिल 7.62 स्नाइपर राइफल है, जिसे गैलाट्ज भी कहा जाता है। यह 7.62×51 मिलीमीटर नाटो कैलिबर की सेमी-ऑटोमैटिक स्नाइपर राइफल है और गैलिल असॉल्ट राइफल प्लेटफॉर्म पर आधारित है। इसे लंबी दूरी पर सटीक फायर और कठिन परिस्थितियों में भरोसेमंद तरीके से काम करने के लिए तैयार किया गया है।

इसके अलावा गरुड़ कमांडोज के पास अलग-अलग ऑपरेशनल जरूरतों के लिए आईडब्ल्यूआई तवोर टीएआर-21 असॉल्ट राइफल, एके-103, आईडब्ल्यूआई नेगेव लाइट मशीन गन और ग्लॉक-17 पिस्टल जैसे हथियार भी हैं। हालांकि डेडिकेटेड स्नाइपर गैलिल 7.62 ही है।

वहीं, नई राइफल और मौजूदा गैलिल के बीच सबसे बड़ा अंतर उनकी भूमिका और क्षमता का है। गैलिल 7.62 मुख्य रूप से स्नाइपर भूमिका वाली राइफल है, जबकि नई 12.7×99 मिलीमीटर राइफल को लंबी दूरी और हार्ड टारगेट्स, एंटी-मटेरियल (व्हीकल, रडार, इक्विपमैंट्स, स्ट्रक्चर्स) के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। (Garud Commandos Sniper Rifle)

डीआरडीओ तैयार करेगा 50 ड्रोन का हाई-प्रिसिजन स्वार्म, दुश्मन के ऊपर एक साथ उड़ेंगे कई ड्रोन

DRDO Multi Drone Swarm
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

DRDO Multi Drone Swarm: भारत अब ऐसी ड्रोन तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसमें कई ड्रोन एक साथ बेहद कम दूरी पर उड़ते हुए एक टीम की तरह काम करेंगे। यह प्रोजेक्ट पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित होगा और इसमें देश के एमएसएमई, स्टार्टअप्स और निजी भारतीय कंपनियों को शामिल होने का मौका दिया जाएगा। सरकारी रक्षा कंपनियां यानी डीपीएसयू और पीएसयू इस प्रोजेक्ट में शामिल नहीं हो सकेंगे। डीआरडीओ ने टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) योजना के तहत “डेवलपमेंट ऑफ क्लोज फॉर्मेशन फ्लाइंग ऑफ मल्टीपल ड्रोन्स” प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है।

DRDO Multi Drone Swarm: क्या है क्लोज फॉर्मेशन फ्लाइंग?

आमतौर पर जब कई ड्रोन एक साथ उड़ते हैं तो उनके बीच पर्याप्त दूरी रखी जाती है। लेकिन इस प्रोजेक्ट में डीआरडीओ ऐसा सिस्टम बनाना चाहता है, जिसमें ड्रोन एक-दूसरे से 500 मिलीमीटर से भी कम दूरी पर उड़ सकें और फिर भी उनकी उड़ान पूरी तरह सुरक्षित और नियंत्रित रहे।

इस पूरे सिस्टम में एक मास्टर ड्रोन होगा, जिसे ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से निर्देश मिलेंगे। यही मास्टर ड्रोन बाकी सभी स्लेव ड्रोन्स को आदेश देगा। सभी ड्रोन एक ही फॉर्मेशन में उड़ेंगे और जरूरत पड़ने पर कुछ ही सेकंड में अपना स्ट्रक्चर बदल सकेंगे।

ऐसी तकनीक आधुनिक युद्ध में इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि कई ड्रोन एक साथ अलग-अलग काम कर सकते हैं। इनमें निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट, संचार और अन्य मिशन शामिल हो सकते हैं।

50 ड्रोन का पूरा सिस्टम तैयार करना होगा

डीआरडीओ के इस प्रोजेक्ट के लिए 50 ड्रोन का पूरा सिस्टम तैयार करना होगा। इनमें एक मास्टर ड्रोन और कई अन्य ड्रोन शामिल होंगे, जो सात लाइनों और सात कॉलम वाले ग्रिड फॉर्मेशन में उड़ सकेंगे। सभी ड्रोन को इस तरह डिजाइन करना होगा कि वे एक-दूसरे की स्थिति लगातार पहचानते रहें और बिना टकराए निर्धारित दूरी बनाए रखें। इसके साथ पूरा कंट्रोल सिस्टम, कम्युनिकेशन नेटवर्क, ग्राउंड स्टेशन और सभी जरूरी सॉफ्टवेयर भी डेवलप करने होंगे। (DRDO Multi Drone Swarm)

पांच सेंटीमीटर से ज्यादा नहीं होगी गलती

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती ड्रोन की सटीक स्थिति बनाए रखना है। डीआरडीओ का कहना है कि प्रत्येक ड्रोन की स्थिति में तीनों अक्षों पर अधिकतम पांच सेंटीमीटर तक की ही गलती स्वीकार होगी। यदि किसी ड्रोन की स्थिति बदलती है तो पूरा सिस्टम 500 मिलीसेकंड के भीतर उसकी स्थिति को ठीक कर देगा।

यह क्षमता तब भी बनी रहनी चाहिए जब ड्रोन 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर और 20 मीटर प्रति सेकंड तक की तेज हवा में उड़ रहे हों।

आधे घंटे तक लगातार उड़ान जरूरी

आरएफपी में ड्रोन की उड़ान अवधि को लेकर भी मानक तय किए गए हैं। हर ड्रोन कम से कम 30 मिनट तक लगातार उड़ान भर सके। बैटरी खत्म होने पर उसे 15 मिनट के भीतर दोबारा चार्ज किया जा सके।

डीआरडीओ चाहता है कि ड्रोन हल्के हों, लेकिन उनमें पर्याप्त पेलोड ले जाने की क्षमता भी हो। प्रत्येक ड्रोन 500 ग्राम से 2 किलोग्राम तक का पेलोड उठा सकेगा। इसमें पावर सप्लाई शामिल नहीं होगी।

ड्रोन का लोड-टू-वेट रेशियो 30 प्रतिशत से अधिक होना जरूरी है। इसका मतलब है कि ड्रोन अपने कुल वजन की तुलना में पर्याप्त अतिरिक्त वजन लेकर उड़ान भर सके। (DRDO Multi Drone Swarm)

दुश्मन की जैमिंग से भी नहीं टूटेगा संपर्क

आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग होती है। दुश्मन कई बार रेडियो सिग्नल जाम करके ड्रोन का कंट्रोल छीनने की कोशिश करता है।

इसी वजह से डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में जैमिंग-प्रूफ वायरलेस कम्युनिकेशन सिस्टम जरूरी किया है।

ड्रोन का कम्युनिकेशन सिस्टम एस, एचएफ या सी बैंड पर काम करेगा और इसमें ईसीसीएम (इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स) की सुविधा होगी। इसका उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक हमलों के बीच भी कम्युनिकेशन बनाए रखना है।

कम्युनिकेशन लिंक की न्यूनतम रेंज 5 किलोमीटर तय की गई है।

हवा, पहाड़ और समुद्र में भी करेगा काम

डीआरडीओ की आरएफपी के अनुसार यह सिस्टम 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर काम करने में सक्षम होना चाहिए। ड्रोन 20 मीटर प्रति सेकंड तक की हवा सह सके और जरूरत पड़ने पर वह चलते हुए जहाज से उड़ान भरने के बाद सुरक्षित रूप से रिटर्न-टू-होम भी कर सके। वहीं, पूरे सिस्टम को पैक से निकालकर पांच मिनट के भीतर ऑपरेशन के लिए तैयार किया जा सके। (DRDO Multi Drone Swarm)

ग्राउंड सिस्टम भी होगा प्रोजेक्ट का हिस्सा

डीआरडीओ ने स्पष्ट किया है कि केवल ड्रोन तैयार करना काफी नहीं होगा। चयनित कंपनी को ग्राउंड हैंडलिंग इक्विपमेंट, ऑनबोर्ड स्पेयर्स, विशेष टूल्स, कंट्रोल स्टेशन, कम्युनिकेशन सब-सिस्टम, कंट्रोल एल्गोरिदम, ग्राफिकल यूजर इंटरफेस, सोर्स कोड, यूजर मैनुअल और मेंटेनेंस डॉक्यूमेंट भी उपलब्ध कराने होंगे।

इसके अलावा 50 ड्रोन के लिए बैटरियां और 100 फीसदी स्पेयर पार्ट्स भी प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे।

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट में स्वदेशीकरण पर विशेष जोर दिया है। आरएफपी के अनुसार ड्रोन सिस्टम में कम से कम 70 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल करनी होगी। साथ ही ऐसे देशों के कंपोनेंट्स के इस्तेमाल से बचने को कहा गया है जिन्हें भारत का प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। (DRDO Multi Drone Swarm)

डीआरडीओ देगा करोड़ों रुपये की फंडिंग

यह प्रोजेक्ट ग्रांट-इन-एड मॉडल पर चलेगा। यदि प्रोजेक्ट की कुल लागत 10 करोड़ रुपये तक होती है तो डीआरडीओ अधिकतम 90 प्रतिशत तक वित्तीय मदद देगा। वहीं 10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले प्रोजेक्ट में डीआरडीओ की हिस्सेदारी अधिकतम 70 प्रतिशत होगी।

भुगतान प्रोजेक्ट के तय चरणों के अनुसार किया जाएगा। इसके लिए अधिकतम पांच माइलस्टोन निर्धारित किए जा सकते हैं। भुगतान बैंक गारंटी के आधार पर अग्रिम या रीइम्बर्समेंट मॉडल से किया जाएगा। (DRDO Multi Drone Swarm)

दो साल में पूरा करना होगा प्रोजेक्ट

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट की कुल अवधि 24 महीने तय की है। पहले दो महीने में प्रिलिमिनरी डिजाइन रिव्यू, छह महीने में डिटेल्ड डिजाइन रिव्यू, बारह महीने में प्रोटोटाइप तैयार करने, परीक्षण और क्रिटिकल डिजाइन रिव्यू का काम पूरा करना होगा।

इसके बाद 21वें महीने तक अंतिम सिस्टम की डिलीवरी और इंटीग्रेशन होगा। 24वें महीने तक पूरे प्रोजेक्ट का डॉक्यूमेंटेशन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और प्रोजेक्ट क्लोजर पूरा करना होगा। (DRDO Multi Drone Swarm)

किन कंपनियों को मिलेगा मौका?

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को केवल भारतीय निजी कंपनियों, एमएसएमई, स्टार्टअप्स और भारतीय नागरिकों के नियंत्रण वाली ऑटोनॉमस संस्थाओं के लिए खोला है। विदेशी निवेश 49 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।

ब्लैकलिस्ट या डिबार की गई कंपनियां आवेदन नहीं कर सकेंगी। एक कंपनी को अधिकतम दो प्रोजेक्टएं मिल सकते हैं। कंपनियां विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और अन्य औद्योगिक भागीदारों के साथ मिलकर भी काम कर सकती हैं। हालांकि, ऐसे सहयोग की सीमा निर्धारित की गई है।

वहीं, प्रोजेक्ट का चयन एल-1 (लीस्ट कॉस्ट) मैथड से किया जाएगा। अगर दो कंपनियों की लागत समान होती है तो कुल प्रोजेक्ट लागत कम होने वाले प्रस्ताव को वरीयता दी जाएगी। इसके बाद भी स्थिति समान रहने पर चयन ड्रॉ ऑफ लॉट्स के माध्यम से किया जाएगा। (DRDO Multi Drone Swarm)

5000 मीटर की ऊंचाई पर ऑपरेशन करने के लिए तैयार गरुड़ कमांडोज! हाई मोबिलिटी ऑल-टेरेन व्हीकल से होंगे लैस

IAF Garud Commandos Vehicle
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IAF Garud Commandos Vehicle: भारतीय वायुसेना की स्पेशल फोर्स गरुड़ कमांडोज को जल्द एक नया हाई मोबिलिटी ऑल-टेरेन व्हीकल (एचएमएटीवी) मिल सकता है। यह व्हीकल खास तौर पर ऊंचे पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तान, बर्फ से ढके क्षेत्रों और कठिन रास्तों पर तेज गति से ऑपरेशन करने के लिए तैयार किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने इस व्हीकल की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी कर दी है।

IAF Garud Commandos Vehicle: गरुड़ कमांडोज की क्या हैं जरूरतें

भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडोज देश के सबसे कठिन इलाकों में विशेष अभियान चलाते हैं। इनकी तैनाती अक्सर ऊंचे पहाड़ों, सीमावर्ती क्षेत्रों, रेगिस्तान और संवेदनशील एयरबेस की सुरक्षा में होती है। इसी के चलते उन्हें ऐसे व्हीकल की जरूरत है जो 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर भी काम कर सके।

व्हीकल में सैनिकों के साथ उनका पूरा कॉम्बैट ऑपरेशनल गियर, हथियार, संचार उपकरण और अन्य मिशन सामग्री रखने की पर्याप्त जगह होनी चाहिए। इसमें आधुनिक सर्विलांस सिस्टम और आईएफएफ (आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो) क्षमता भी होगी, जिससे अपने और दुश्मन की पहचान आसान हो सके।

व्हीकल की सर्विस लाइफ 10 साल या 1 लाख किलोमीटर तक होनी चाहिए।

छोटा साइज, लेकिन भारी क्षमता

इस व्हीकल की लंबाई 4115 मिलीमीटर, चौड़ाई 1905 मिलीमीटर और ऊंचाई 1778 मिलीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसका उद्देश्य यह है कि व्हीकल को संकरी पहाड़ी सड़कों और सीमित जगहों पर आसानी से चलाया जा सके।

व्हीकल में चार दरवाजे होंगे और कम से कम चार पूर्ण सुसज्जित सैनिकों के बैठने की व्यवस्था होगी। इसके साथ 1100 लीटर से अधिक का अलग बूट स्पेस भी मांगा गया है, ताकि अतिरिक्त हथियार और उपकरण रखे जा सकें।

खाली व्हीकल का वजन 1475 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि इसका पेलोड 1100 किलोग्राम या उससे अधिक होना जरूरी है। (IAF Garud Commandos Vehicle)

1400 सीसी इंजन और फोर-व्हील ड्राइव सिस्टम

आरएफआई के अनुसार एचएमएटीवी में चार सिलेंडर टर्बोचार्ज्ड पेट्रोल इंजन लगाया जाएगा। इंजन की क्षमता कम से कम 1400 सीसी होगी। यह 163 हॉर्सपावर की शक्ति और 254 न्यूटन मीटर से अधिक टॉर्क पैदा करने में सक्षम होना चाहिए।

व्हीकल में ऑन-डिमांड टू-व्हील ड्राइव और फोर-व्हील ड्राइव सिस्टम होगा। कठिन रास्तों पर बेहतर पकड़ के लिए न्यूमेटिकली लॉक होने वाले डिफरेंशियल भी दिए जाएंगे।

इसके साथ ऑटोमैटिक सीवीटी ट्रांसमिशन, लो-गियर ट्रांसफर केस और सभी पहियों पर इंडिपेंडेंट सस्पेंशन की व्यवस्था होगी। मिलिट्री ग्रेड के शॉक एब्जॉर्बर भी लगाए जाएंगे ताकि ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी व्हीकल संतुलित रहे। (IAF Garud Commandos Vehicle)

मुश्किल रास्तों पर भी नहीं रुकेगा

रक्षा मंत्रालय ने व्हीकल की ऑफ-रोड क्षमता को लेकर भी कई सख्त मानक तय किए हैं।

व्हीकल का ग्राउंड क्लियरेंस 380 मिलीमीटर या उससे अधिक होना चाहिए। यह 35 डिग्री तक की चढ़ाई चढ़ सके, 30 डिग्री तक के साइड स्लोप पर चल सके और 600 मिलीमीटर ऊंची बाधा पार कर सके।

इसके अलावा व्हीकल 650 मिलीमीटर गहरे पानी को पार करने में सक्षम होना चाहिए। इसका टर्निंग रेडियस 5500 मिलीमीटर से कम रखा गया है, ताकि संकरी जगहों पर आसानी से मोड़ा जा सके।

व्हीकल की टॉप स्पीड 100 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक हो। वहीं, पूरी क्षमता के साथ यह 20 सेकंड के भीतर 0 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ सके। इसकी ऑपरेशनल रेंज कम से कम 400 किलोमीटर होनी चाहिए।

रन-फ्लैट टायर और सेल्फ रिकवरी विंच

व्हीकल के सभी पांच पहियों में रन-फ्लैट सिस्टम होगा। यदि गोली लगने या किसी अन्य कारण से टायर खराब हो जाए, तब भी व्हीकल कम से कम 10 किलोमीटर तक बिना रुके चल सकेगा।

इसके आगे की तरफ 4500 किलोग्राम क्षमता वाली सेल्फ रिकवरी विंच लगाई जाएगी। इसमें कम से कम 10 मीटर लंबी स्टील केबल होगी, जिससे व्हीकल खुद को दलदल, बर्फ या कठिन इलाके से बाहर निकाल सके।

इसके अलावा 1500 किलोग्राम क्षमता वाला टो-हिच, दो फ्यूल टैंक, एक स्पेयर व्हील और बर्फीले क्षेत्रों के लिए चार एंटी-स्किड स्नो चेन भी अनिवार्य होंगे। (IAF Garud Commandos Vehicle)

अत्याधुनिक नेविगेशन सिस्टम से हो लैस

एचएमएटीवी में अत्याधुनिक नेविगेशन सिस्टम लगाया जाएगा, जो नैविक, जीपीएस और ग्लोनास तीनों सैटेलाइट सिस्टम के साथ काम करेगा।

डिजिटल डिस्प्ले पर सैनिकों को नक्शा, स्थान, दिशा और अन्य जरूरी जानकारी मिलेगी। इसमें डिफेंस सीरीज मैप्स का भी सपोर्ट होगा।

व्हीकल में ऑपरेटर थर्मल नाइट साइट भी होगी, जिससे रात में 100 मीटर दूरी पर किसी व्यक्ति और 200 मीटर दूरी पर व्हीकल की पहचान की जा सकेगी।

इसके अलावा थर्मल इन्फ्रारेड बीकन भी लगाया जाएगा, जिसकी हवाई पहचान क्षमता कम से कम 4 किलोमीटर होगी।

दुश्मन की नजर से बचाने के लिए विशेष कैमोफ्लाज

वहीं, व्हीकल में थ्री-डी मल्टी-स्पेक्ट्रल कैमोफ्लाज किट भी होना जरूरी है। यह कैमोफ्लाज केवल सामान्य रंग बदलने वाला कवर नहीं होगा, बल्कि विजिबल लाइट के साथ-साथ मिड-वेव इन्फ्रारेड (एमडब्ल्यूआईआर) और लॉन्ग-वेव इन्फ्रारेड (एलडब्ल्यूआईआर) स्पेक्ट्रम में भी व्हीकल की पहचान कम करेगा। इसमें 700 मेगाहर्ट्ज से 24 गीगाहर्ट्ज तक के रडार स्पेक्ट्रम में टेस्ट भी शामिल रहेगा। (IAF Garud Commandos Vehicle)

हवाई मार्ग से भी ले जाया जा सकेगा

इस व्हीकल को भारतीय वायुसेना के मौजूदा परिवहन विमानों में ले जाने योग्य बनाया जाएगा। जरूरत पड़ने पर इसे चिनूक और एमआई-26 हेलीकॉप्टर के नीचे लटकाकर भी ले जाया जा सकेगा।

इसके अलावा इसे मिलिट्री रेलवे वैगन के जरिए भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सकेगा। सथ ही इसे पैरा-ड्रॉप भी किया जा सकेगा।

यह खरीद डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी)-2020 के तहत ‘बाय इंडियन’ श्रेणी में की जाएगी। वाहन में कम से कम 60 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल जरूरी होगा। कॉन्ट्रैक्ट पर साइन होने के बाद पूरी डिलीवरी 12 महीने के भीतर पूरी करनी होगी। (IAF Garud Commandos Vehicle)

दुश्मन की इन्फ्रारेड सीकर मिसाइलों को चकमा देंगे भारतीय नौसेना के जहाज, DRDO बना रहा फुल स्टेल्थ वॉरशिप!

Indian Navy Warship
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Indian Navy Warship: अब भारतीय नौसेना के वॉरशिपों को दुश्मन के इन्फ्रारेड सेंसर और इन्फ्रारेड सीकर मिसाइलें भी निशाना नहीं बना पाएंगी। डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजी लेबोरेटरी (एनएसटीएल) ने एक ऐसे अत्याधुनिक इन्फ्रारेड सिग्नेचर प्रेडिक्शन सॉफ्टवेयर बनाने की तैयारी कर रही है, जो किसी भी नौसैनिक प्लेटफॉर्म के इन्फ्रारेड सिग्नेचर का पहले से अनुमान लगा सकेगा।

यह सॉफ्टवेयर वॉरशिप के डिजाइन से लेकर उसके इंजन, एग्जॉस्ट, मौसम, समुद्र की स्थिति और सूरज की गर्मी जैसे कई फैक्टर्स का एनालिसिस करेगा। इसके आधार पर यह पता लगाया जाएगा कि किसी विशेष स्थिति में जहाज दुश्मन के इन्फ्रारेड सेंसर या इन्फ्रारेड सीकर मिसाइल को कितना दिखाई देगा।

Indian Navy Warship: क्या होता है इन्फ्रारेड सिग्नेचर?

दरअसल हर वॉरशिप के इंजन, मशीन या गर्म सतह से गर्मी निकलती है। यही गर्मी इन्फ्रारेड रेडिएशन के रूप में बाहर आती है। आधुनिक इन्फ्रारेड सेंसर और मिसाइलें इसी गर्मी को पकड़कर टारगेट की पहचान करती हैं।

वॉरशिप का इन्फ्रारेड सिग्नेचर जितना अधिक होगा, उसे पहचानना उतना आसान होगा। इसलिए दुनिया की आधुनिक नौसेनाएं अब जहाजों के रडार सिग्नेचर के साथ-साथ उनके इन्फ्रारेड सिग्नेचर को भी कम करने पर काम कर रही हैं। एनएसटीएल इस नए सॉफ्टवेयर को इसीलिए तैयार कर रही है।

जहाज का पूरा डिजिटल मॉडल करेगा तैयार 

यह सॉफ्टवेयर जहाज की पूरी थ्री-डी ज्योमेट्री तैयार करेगा। इसमें जहाज का हल, सुपरस्ट्रक्चर, इंजन, फनल, एग्जॉस्ट, सेंसर और अन्य सभी प्रमुख हिस्सों को डिजिटल रूप में मॉडल किया जाएगा।

इसके बाद यह जहाज में इस्तेमाल होने वाली मेटल, पेंट, कोटिंग और अन्य सामग्रियों के थर्मल प्रोपर्टीज का अध्ययन करेगा। फिर इंजन से निकलने वाली गर्मी, जहाज के भीतर मौजूद मशीनों से बनने वाली हीट, धूप, समुद्री पानी के प्रभाव और वातावरण की स्थिति को जोड़कर वास्तविक इन्फ्रारेड सिग्नेचर की कैलकुलेशन करेगा।

यह एनालिसिस एमडब्ल्यूआईआर (3 से 5 माइक्रोन) और एलडब्ल्यूआईआर (8 से 14 माइक्रोन) दोनों स्पेक्ट्रल बैंड में किया जाएगा, जिनका इस्तेमाल आधुनिक इन्फ्रारेड सेंसर और मिसाइलें करती हैं।

अलग-अलग मौसम में करेगा परीक्षण

इस सॉफ्टवेयर की खासियत यह होगी कि यह केवल सामान्य परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि अलग-अलग समुद्री और मौसम संबंधी हालात में भी जहाज के व्यवहार का अध्ययन करेगा।

इसमें साफ मौसम, बादल, दिन और रात, अलग-अलग हवा की गति, समुद्री लहरों की तीव्रता, समुद्र की विभिन्न अवस्थाएं और सूरज की अलग-अलग दिशा जैसी परिस्थितियों को शामिल किया जाएगा।

सॉफ्टवेयर यह भी बताएगा कि जहाज 0 से 30 नॉट की गति से चलने पर उसका इन्फ्रारेड सिग्नेचर कितना बदलता है। इंजन के 25 प्रतिशत, 50 प्रतिशत और 100 प्रतिशत लोड पर भी अलग-अलग एनालिसिस किया जाएगा। (Indian Navy Warship)

इंजन की गर्म गैसों का भी होगा एनालिसिस

वॉरशिप के इन्फ्रारेड सिग्नेचर का सबसे बड़ा सोर्स उसका इंजन और एग्जॉस्ट होता है। नया सिस्टम इंजन से निकलने वाली गर्म गैसों की दिशा, तापमान, फैलाव और वातावरण में उनके मिश्रण का भी अध्ययन करेगा। इसके लिए सॉफ्टवेयर में कम्प्यूटेशनल फ्लूइड डायनेमिक्स (सीएफडी) मॉड्यूल शामिल होगा।

यह मॉड्यूल हवा के प्रवाह, गर्म गैसों की गति, तापमान में बदलाव और हीट ट्रांसफर का सांइटिफिक एनालिसिस करेगा। वहीं, यह सीएफडी मॉड्यूल स्वदेश में ही तैयार किया जाएगा। (Indian Navy Warship)

सेंसर और मिसाइल की नजर से भी देखेगा जहाज

सॉफ्टवेयर केवल जहाज का तापमान नहीं बताएगा, बल्कि यह भी एनालिसिस करेगा कि दुश्मन का इन्फ्रारेड सेंसर या इन्फ्रारेड सीकर मिसाइल उसे कितनी दूरी से पहचान सकती है।

इसके लिए इसमें लॉक-ऑन रेंज मॉड्यूल दिया जाएगा। यह सेंसर की संवेदनशीलता, ऑप्टिकल सिस्टम, बैकग्राउंड रेडिएशन, सिग्नल-टू-नॉइज रेशियो और वायुमंडलीय ट्रांसमिटेंस को ध्यान में रखकर लॉक-ऑन दूरी की कैलकुलेशन करेगा।

इससे डिजाइन के शुरुआती चरण में ही जहाज की कमजोरियों का पता लगाया जा सकेगा।

थर्मल तस्वीर भी करेगा तैयार

यह सॉफ्टवेयर जहाज की थर्मल इमेज भी तैयार करेगा। अलग-अलग कोणों से यह दिखाएगा कि जहाज का कौन-सा हिस्सा सबसे अधिक गर्म दिखाई दे रहा है।

पोस्ट प्रोसेसिंग मॉड्यूल के जरिए इंजीनियर टू-डी और थ्री-डी कंटूर, पोलर प्लॉट, रेडिएंस मैप, प्लूम ट्रैजेक्टरी और अन्य तकनीकी ग्राफ तैयार कर सकेंगे। सभी परिणाम पीएनजी, जेपीजी, टीआईएफएफ, सीएसवी और अन्य फॉर्मेट में एक्सपोर्ट किए जा सकेंगे। (Indian Navy Warship)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी होगा इस्तेमाल

सॉफ्टवेयर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड एक्यूरेसी डिटेक्शन और इमेज रैंकिंग मॉड्यूल भी होगा। यह मॉड्यूल तैयार की गई इन्फ्रारेड इमेज का एनालिसिस करेगा और अलग-अलग डिजाइन ऑप्शंस की तुलना करके बताएगा कि कौन-सा डिजाइन कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर पैदा करता है।

एनएसटीएल ने इस प्रोजेक्ट को चार चरणों में पूरा करने की योजना बनाई है। पहले चरण में आठ महीने के भीतर सीएफडी मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे। दूसरे चरण में 22 महीने के भीतर इन्फ्रारेड मॉड्यूल डेवलप होंगे।

तीसरे चरण में 30 महीने के भीतर पूरे सॉफ्टवेयर का असली नौसैनिक जहाज के मापे गए इन्फ्रारेड सिग्नेचर से परीक्षण किया जाएगा। चौथे चरण में 48 महीने तक प्रोजेक्ट की ट्रेनिंग दी जाएगी।

वहीं, इस सॉफ्टवेयर का पूरा सोर्स कोड, लाइसेंस जनरेशन प्रोग्राम और आईपीआर राइट्स एनएसटीएल के पास ही रहेंगे। (Indian Navy Warship)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद IAF करेगी अपने एयर डिफेंस नेटवर्क में बड़ा अपग्रेड, S-400, आकाश और रडार को जोड़ने वाला IACCS होगा AI से लैस

IAF IACCS Upgrade
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IAF IACCS Upgrade: भारतीय वायुसेना अपने सबसे महत्वपूर्ण एयर डिफेंस नेटवर्क इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) को अपग्रेड करने की तैयारी कर रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आईएसीसीएस ने बेहद अहम भूमिका निभाई थी। इसे भारतीय वायुसेना का मुख्य नर्व सेंटर भी कहा जाता है। इस सिस्टम की मदद से एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तान के ड्रोन, मिसाइल तथा रॉकेट हमलों को नाकाम करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। इस प्रोजेक्ट के तहत हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, नेटवर्किंग, साइबर सिक्योरिटी के अलावा एआई बेस्ड थ्रेट एनालिसिस को भी शामिल किया जाएगा।

IAF IACCS Upgrade: क्या है IACCS और क्यों है यह इतना महत्वपूर्ण?

वायुसेना का ऑपरेशन्स नेटवर्क डायरेक्टोरेट आईएसीसीएस के अपग्रेडेशन में अहम भूमिका निभा रहा है। आईएसीसीएस भारतीय वायुसेना का इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क है। यह देशभर में मौजूद मिलिट्री रडार, एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (एडब्ल्यूएसीएस), फाइटर जेट्स, मिसाइल सिस्टम और अन्य सेंसर से मिलने वाली जानकारी को एक ही नेटवर्क पर जोड़ता है।

इस नेटवर्क की मदद से वायुसेना को पूरे देश के हवाई क्षेत्र की रियल टाइम एयर पिक्चर मिलती है। यदि किसी दिशा से लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल या अन्य हवाई खतरा आता है तो आईएसीसीएस तुरंत उसकी जानकारी संबंधित कमांड सेंटर तक पहुंचाता है। इसके बाद उसी नेटवर्क के जरिए इंटरसेप्टर विमान, एयर डिफेंस मिसाइल या अन्य वेपन सिस्टम को टारगेट की जानकारी भेजी जाती है। यही वजह है कि आईएसीसीएस को भारतीय वायुसेना के एयर डिफेंस नेटवर्क का नर्व सेंटर माना जाता है।

बैच-III अपग्रेडेशन में होंगे ये बदलाव

वायुसेना की तरफ से जारी आरएफपी के अनुसार बैच-III अपग्रेडेशन में वायुसेना ठिकानों पर मौजूदा सिस्टम को नए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर से अपग्रेड किया जाएगा। इसमें नए सर्वर, स्टोरेज सिस्टम, नेटवर्क उपकरण, वर्कस्टेशन, ऑडियो-वीजुअल सिस्टम, पावर बैकअप और एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगाए जाएंगे।

इसके साथ मौजूदा नेटवर्क में नई ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) बिछाई जाएगी ताकि डेटा ट्रांसफर अधिक तेज और सुरक्षित हो सके। प्रोजेक्ट में उनका इंस्टॉलेशन, कमीशनिंग, सिस्टम इंटीग्रेशन, साइट एक्सेप्टेंस टेस्ट और बाद में मेंटेनेंस भी शामिल रहेगा। (IAF IACCS Upgrade)

आधुनिक सॉफ्टवेयर और एपीआई गेटवे पर फोकस

अपग्रेडेशन में हार्डवेयर के साथ-साथ सॉफ्टवेयर अपग्रेड भी शामिल है। इसमें सीओटीएस सॉफ्टवेयर, आईएसीसीएस बी-III सॉफ्टवेयर, एपीआई गेटवे, हाई-एंड रैक सर्वर और अलग-अलग नेटवर्क सेवाओं का इंटीग्रेशन किया जाएगा।

एपीआई गेटवे का इस्तेमाल विभिन्न मिलिट्री प्लेटफॉर्म और सिस्टम के बीच सुरक्षित तरीके से डेटा शेयर करने के लिए किया जाएगा। इससे अलग-अलग सेंसर और कमांड सेंटर के बीच जानकारी का आदान-प्रदान पहले की तुलना में अधिक तेज और व्यवस्थित होगा।

साइबर सिक्योरिटी होगी सबसे बड़ी प्राथमिकता

नए अपग्रेडेशन में साइबर सुरक्षा पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। जिसके तहत नेटवर्क में नए फायरवॉल लगाए जाएंगे और पूरा सिस्टम भारतीय वायुसेना के साइबर सुरक्षा मानकों के अनुरूप होगा। साथ ही, अपग्रेड करने वली कंपनी को नो मैलिशियस कोड सर्टिफिकेट भी देना होगा, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी सॉफ्टवेयर में नुकसान पहुंचाने वाला कोड मौजूद नहीं है। (IAF IACCS Upgrade)

क्यों जरूरी हुआ है ये अपग्रेड?

हाल के वर्षों में एरियल वॉरफेयर तेजी से बदला है। पहले खतरा मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों से था। लेकिन अब ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल, स्टैंड-ऑफ हथियार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और साइबर हमले नई चुनौती बन चुके हैं। ऐसे खतरे बहुत कम समय में बड़ी संख्या में सामने आ सकते हैं। इसलिए कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क को भी पहले से अधिक तेज, सुरक्षित और अधिक डेटा संभालने में सक्षम बनाना आवश्यक हो गया है।

एआई बेस्ड थ्रेट एनालिसिस भी होगा शामिल

प्रोजेक्ट से जुड़े सूत्रों के मुताबिक नए वर्जन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित थ्रेट इवैल्यूएशन मॉड्यूल को भी शामिल करने की योजना है।

यह सिस्टम अलग-अलग सोर्सेज से आने वाले डेटा का तेजी से विश्लेषण कर संभावित खतरों की प्राथमिकता तय करने में मदद करेगी। इससे कमांडरों को कम समय में बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।

इसके अलावा सेंसर-टू-शूटर टाइम को भी कम करने का टारगेट रखा गया है। जिससे खतरे का पता चलने और उस पर कार्रवाई शुरू होने के बीच लगने वाला समय और कम किया जाएगा। (IAF IACCS Upgrade)

नए वेपन और प्लेटफॉर्म भी जुड़ेंगे

अपग्रेडेशन के बाद आईएसीसीएस नेटवर्क को नए मिलिट्री प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ना आसान होगा। सिस्टम को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वह अलग-अलग तरह के रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम और अन्य नेटवर्क आधारित सैन्य प्लेटफॉर्म के साथ बेहतर तरीके से काम कर सके। इससे पूरे एयर डिफेंस नेटवर्क में डेटा साझा करने की क्षमता बढ़ेगी और इंटीग्रेटेड ऑपरेशन आसान होगा। (IAF IACCS Upgrade)

ऑपरेशन सिंदूर में IACCS ने कैसे निभाई अहम भूमिका?

7 से 10 मई 2025 के दौरान चले ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना का इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) पूरे एयर डिफेंस नेटवर्क का सबसे अहम हिस्सा था। ऑपरेशन के दौरान आईएसीसीएस ने देशभर के ग्राउंड रडार, एडब्ल्यूएसीएस, एईडब्ल्यू एंड सी विमान, सैटेलाइट, सिविल रडार और दूसरे सेंसर से मिलने वाले डेटा को जोड़कर पूरे भारतीय हवाई क्षेत्र की लाइव एयर पिक्चर तैयार की। इससे कमांडरों को एक ही स्क्रीन पर यह दिखाई देता रहा कि आसमान में क्या हो रहा है और किस दिशा से खतरा आ रहा है।

इसी दौरान पाकिस्तान की ओर से बड़ी संख्या में ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, क्रूज मिसाइल और रॉकेट का इस्तेमाल किया गया। सिस्टम ने इन खतरों का तेजी से पता लगाते हुए लगातार निगरानी की और उनकी जानकारी तुरंत एयर डिफेंस सिस्टम तक पहुंचाई।

इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसने खतरे की पहचान होने और जवाबी कार्रवाई शुरू होने के बीच लगने वाला समय काफी कम कर दिया। जैसे ही कोई ड्रोन या मिसाइल दिखाई देती, आईएसीसीएस तुरंत तय करता कि उसे रोकने के लिए कौन-सा हथियार सबसे उपयुक्त रहेगा। इसके बाद आकाश, एस-400, एमआरएसएएम, एयर डिफेंस गन और अन्य वेपन सिस्टम्स को तुरंत टारगेट की जानकारी भेजी जाती थी। इससे कुछ ही सेकंड में जवाबी कार्रवाई संभव हो सकी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आईएसीसीएस ने केवल वायुसेना के साथ ही नहीं, बल्कि भारतीय थलसेना के आकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम और नौसेना के सेंसर नेटवर्क के साथ भी मिलकर काम किया। इससे तीनों सेनाओं के बीच रियल-टाइम में जानकारी साझा होती रही और पूरा एयर डिफेंस नेटवर्क एक साथ काम करता रहा।

सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस नेटवर्क की मदद से पाकिस्तान की ओर से किए गए बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइल हमलों को समय रहते नाकाम किया गया और भारतीय सैन्य तथा नागरिक ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई। इसी ऑपरेशन के बाद भारतीय वायुसेना ने आईएसीसीएस के अपग्रेडेशन की प्रक्रिया को और तेजी से आगे बढ़ाया, ताकि भविष्य की नई चुनौतियों से निपटने के लिए यह नेटवर्क और अधिक आधुनिक, सुरक्षित और तेज बनाया जा सके। (IAF IACCS Upgrade)