📍विशाखापट्टनम | 31 Jul, 2026, 11:20 AM
Indian Navy Warship: अब भारतीय नौसेना के वॉरशिपों को दुश्मन के इन्फ्रारेड सेंसर और इन्फ्रारेड सीकर मिसाइलें भी निशाना नहीं बना पाएंगी। डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजी लेबोरेटरी (एनएसटीएल) ने एक ऐसे अत्याधुनिक इन्फ्रारेड सिग्नेचर प्रेडिक्शन सॉफ्टवेयर बनाने की तैयारी कर रही है, जो किसी भी नौसैनिक प्लेटफॉर्म के इन्फ्रारेड सिग्नेचर का पहले से अनुमान लगा सकेगा।
यह सॉफ्टवेयर वॉरशिप के डिजाइन से लेकर उसके इंजन, एग्जॉस्ट, मौसम, समुद्र की स्थिति और सूरज की गर्मी जैसे कई फैक्टर्स का एनालिसिस करेगा। इसके आधार पर यह पता लगाया जाएगा कि किसी विशेष स्थिति में जहाज दुश्मन के इन्फ्रारेड सेंसर या इन्फ्रारेड सीकर मिसाइल को कितना दिखाई देगा।
Indian Navy Warship: क्या होता है इन्फ्रारेड सिग्नेचर?
दरअसल हर वॉरशिप के इंजन, मशीन या गर्म सतह से गर्मी निकलती है। यही गर्मी इन्फ्रारेड रेडिएशन के रूप में बाहर आती है। आधुनिक इन्फ्रारेड सेंसर और मिसाइलें इसी गर्मी को पकड़कर टारगेट की पहचान करती हैं।
वॉरशिप का इन्फ्रारेड सिग्नेचर जितना अधिक होगा, उसे पहचानना उतना आसान होगा। इसलिए दुनिया की आधुनिक नौसेनाएं अब जहाजों के रडार सिग्नेचर के साथ-साथ उनके इन्फ्रारेड सिग्नेचर को भी कम करने पर काम कर रही हैं। एनएसटीएल इस नए सॉफ्टवेयर को इसीलिए तैयार कर रही है।
जहाज का पूरा डिजिटल मॉडल करेगा तैयार
यह सॉफ्टवेयर जहाज की पूरी थ्री-डी ज्योमेट्री तैयार करेगा। इसमें जहाज का हल, सुपरस्ट्रक्चर, इंजन, फनल, एग्जॉस्ट, सेंसर और अन्य सभी प्रमुख हिस्सों को डिजिटल रूप में मॉडल किया जाएगा।
इसके बाद यह जहाज में इस्तेमाल होने वाली मेटल, पेंट, कोटिंग और अन्य सामग्रियों के थर्मल प्रोपर्टीज का अध्ययन करेगा। फिर इंजन से निकलने वाली गर्मी, जहाज के भीतर मौजूद मशीनों से बनने वाली हीट, धूप, समुद्री पानी के प्रभाव और वातावरण की स्थिति को जोड़कर वास्तविक इन्फ्रारेड सिग्नेचर की कैलकुलेशन करेगा।
यह एनालिसिस एमडब्ल्यूआईआर (3 से 5 माइक्रोन) और एलडब्ल्यूआईआर (8 से 14 माइक्रोन) दोनों स्पेक्ट्रल बैंड में किया जाएगा, जिनका इस्तेमाल आधुनिक इन्फ्रारेड सेंसर और मिसाइलें करती हैं।
अलग-अलग मौसम में करेगा परीक्षण
इस सॉफ्टवेयर की खासियत यह होगी कि यह केवल सामान्य परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि अलग-अलग समुद्री और मौसम संबंधी हालात में भी जहाज के व्यवहार का अध्ययन करेगा।
इसमें साफ मौसम, बादल, दिन और रात, अलग-अलग हवा की गति, समुद्री लहरों की तीव्रता, समुद्र की विभिन्न अवस्थाएं और सूरज की अलग-अलग दिशा जैसी परिस्थितियों को शामिल किया जाएगा।
सॉफ्टवेयर यह भी बताएगा कि जहाज 0 से 30 नॉट की गति से चलने पर उसका इन्फ्रारेड सिग्नेचर कितना बदलता है। इंजन के 25 प्रतिशत, 50 प्रतिशत और 100 प्रतिशत लोड पर भी अलग-अलग एनालिसिस किया जाएगा। (Indian Navy Warship)
इंजन की गर्म गैसों का भी होगा एनालिसिस
वॉरशिप के इन्फ्रारेड सिग्नेचर का सबसे बड़ा सोर्स उसका इंजन और एग्जॉस्ट होता है। नया सिस्टम इंजन से निकलने वाली गर्म गैसों की दिशा, तापमान, फैलाव और वातावरण में उनके मिश्रण का भी अध्ययन करेगा। इसके लिए सॉफ्टवेयर में कम्प्यूटेशनल फ्लूइड डायनेमिक्स (सीएफडी) मॉड्यूल शामिल होगा।
यह मॉड्यूल हवा के प्रवाह, गर्म गैसों की गति, तापमान में बदलाव और हीट ट्रांसफर का सांइटिफिक एनालिसिस करेगा। वहीं, यह सीएफडी मॉड्यूल स्वदेश में ही तैयार किया जाएगा। (Indian Navy Warship)
सेंसर और मिसाइल की नजर से भी देखेगा जहाज
सॉफ्टवेयर केवल जहाज का तापमान नहीं बताएगा, बल्कि यह भी एनालिसिस करेगा कि दुश्मन का इन्फ्रारेड सेंसर या इन्फ्रारेड सीकर मिसाइल उसे कितनी दूरी से पहचान सकती है।
इसके लिए इसमें लॉक-ऑन रेंज मॉड्यूल दिया जाएगा। यह सेंसर की संवेदनशीलता, ऑप्टिकल सिस्टम, बैकग्राउंड रेडिएशन, सिग्नल-टू-नॉइज रेशियो और वायुमंडलीय ट्रांसमिटेंस को ध्यान में रखकर लॉक-ऑन दूरी की कैलकुलेशन करेगा।
इससे डिजाइन के शुरुआती चरण में ही जहाज की कमजोरियों का पता लगाया जा सकेगा।
थर्मल तस्वीर भी करेगा तैयार
यह सॉफ्टवेयर जहाज की थर्मल इमेज भी तैयार करेगा। अलग-अलग कोणों से यह दिखाएगा कि जहाज का कौन-सा हिस्सा सबसे अधिक गर्म दिखाई दे रहा है।
पोस्ट प्रोसेसिंग मॉड्यूल के जरिए इंजीनियर टू-डी और थ्री-डी कंटूर, पोलर प्लॉट, रेडिएंस मैप, प्लूम ट्रैजेक्टरी और अन्य तकनीकी ग्राफ तैयार कर सकेंगे। सभी परिणाम पीएनजी, जेपीजी, टीआईएफएफ, सीएसवी और अन्य फॉर्मेट में एक्सपोर्ट किए जा सकेंगे। (Indian Navy Warship)
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी होगा इस्तेमाल
सॉफ्टवेयर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड एक्यूरेसी डिटेक्शन और इमेज रैंकिंग मॉड्यूल भी होगा। यह मॉड्यूल तैयार की गई इन्फ्रारेड इमेज का एनालिसिस करेगा और अलग-अलग डिजाइन ऑप्शंस की तुलना करके बताएगा कि कौन-सा डिजाइन कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर पैदा करता है।
एनएसटीएल ने इस प्रोजेक्ट को चार चरणों में पूरा करने की योजना बनाई है। पहले चरण में आठ महीने के भीतर सीएफडी मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे। दूसरे चरण में 22 महीने के भीतर इन्फ्रारेड मॉड्यूल डेवलप होंगे।
तीसरे चरण में 30 महीने के भीतर पूरे सॉफ्टवेयर का असली नौसैनिक जहाज के मापे गए इन्फ्रारेड सिग्नेचर से परीक्षण किया जाएगा। चौथे चरण में 48 महीने तक प्रोजेक्ट की ट्रेनिंग दी जाएगी।
वहीं, इस सॉफ्टवेयर का पूरा सोर्स कोड, लाइसेंस जनरेशन प्रोग्राम और आईपीआर राइट्स एनएसटीएल के पास ही रहेंगे। (Indian Navy Warship)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





