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एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो के लिए नया कॉम्बैट व्हीकल, ड्रैगुनोव की गोली और 10 किग्रा TNT ब्लास्ट भी झेलेगा

Garud Commando MSAV
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Garud Commando MSAV: भारतीय वायुसेना के स्पेशल फोर्स गरुड़ कमांडो को जल्द ही एक नया मल्टी-स्पेशलिटी आर्मर्ड व्हीकल (एमएसएवी) मिल सकता है। रक्षा मंत्रालय ने मॉडर्न आर्मर्ड व्हीकल की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी कर दी है। यह व्हीकल विशेष रूप से उन मिशन के लिए तैयार किया जाएगा, जहां दुर्गम पहाड़, बर्फीले इलाके, रेगिस्तान और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से कार्रवाई करनी होती है।

यह व्हीकल गरुड़ कमांडो की सुरक्षा, तेज आवाजाही और हथियारों के साथ लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने की क्षमता बढ़ाने के लिए खरीदा जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद पूरी सप्लाई 12 महीने के भीतर पूरी करनी होगी। खरीद प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी)-2020 के तहत बाय इंडियन श्रेणी में होगी, जिसमें कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होना अनिवार्य रहेगा।

Garud Commando MSAV: पहाड़, रेगिस्तान और जंगल, हर इलाके में चलेगा व्हीकल

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई में बताया है कि यह व्हीकल पश्चिमी सीमा के रेगिस्तानी और मैदानी इलाकों, उत्तरी सीमा के 5,000 मीटर तक ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों तथा पूर्वोत्तर के जंगलों और कठिन इलाकों में चलने में सक्षम होना चाहिए।

व्हीकल को सड़क और बिना सड़क वाले रास्तों पर समान रूप से चलने योग्य बनाया जाएगा। इसका इस्तेमाल दिन और रात, दोनों समय तथा अलग-अलग मौसम की परिस्थितियों में किया जा सकेगा।

आरएफआई के अनुसार व्हीकल में आधुनिक नेविगेशन सिस्टम, आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो (आईएफएफ) सिस्टम और सर्विलांस इक्विपमेंट्स भी लगाए जाएंगे, जिससे ऑपरेशन के दौरान मित्र और दुश्मन की पहचान आसान हो सके।

एक साथ 10 कमांडो कर सकेंगे सफर

व्हीकल में कम से कम 10 जवानों के बैठने की जगह होनी चाहिए। इनमें एक चालक और नौ गरुड़ कमांडो अपने पूरे युद्धक उपकरणों के साथ यात्रा कर सकेंगे।

कमांडो के लिए लगाई जाने वाली सीटें झटके सहने वाली होंगी और इस तरह लगाई जाएंगी कि ऑपरेशन के दौरान हथियारों का उपयोग आसान रहे। ड्राइवर और को-ड्राइवर के लिए अलग समायोजित होने वाली सीटें होंगी।

व्हीकल में हथियार रखने के लिए अलग रैक, गोला-बारूद रखने की जगह और अन्य सैन्य उपकरण रखने के लिए विशेष स्टोरेज कम्पार्टमेंट भी बनाए जाएंगे। (Garud Commando MSAV)

बुलेट और विस्फोट से सुरक्षा होगी

इस व्हीकल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सुरक्षा है। आरएफआई में कहा गया है कि व्हीकल ऐसा होना चाहिए जो 7.62×54 मिलीमीटर एपीआई बुलेट का सामना कर सके। इन गोलियां का इस्तेमाल ड्रैगुनोव जैसी स्नाइपर राइफलों में किया जाता है।

व्हीकल को 10 किलोग्राम टीएनटी के बराबर विस्फोट से भी चालक दल और कमांडो की सुरक्षा करनी होगी। सुरक्षा केवल सामने से नहीं, बल्कि व्हीकल के किनारों और नीचे के हिस्से के लिए भी अनिवार्य रखी गई है।

व्हीकल के सभी शीशे बुलेटप्रूफ लैमिनेटेड आर्मर्ड ग्लास के होंगे। इनमें सामने और दोनों तरफ विशेष सुरक्षा मानकों के अनुरूप मोटे शीशे लगाए जाएंगे।

हथियार लगाने की भी होगी सुविधा

एमएसएवी केवल सैनिकों को ले जाने वाला व्हीकल नहीं होगा। इसे चलते-फिरते लड़ाकू प्लेटफॉर्म के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

व्हीकल की छत पर 360 डिग्री घूमने वाला टर्रेट होगा, जिस पर 7.62 मिलीमीटर मशीन गन, 12.7 मिलीमीटर मशीन गन, 40 मिलीमीटर मल्टी-शॉट ग्रेनेड लॉन्चर या रिमोट कंट्रोल वेपन स्टेशन लगाया जा सकेगा।

कमांडो के लिए व्हीकल के दोनों तरफ फायरिंग पोर्ट भी होंगे, ताकि जरूरत पड़ने पर व्हीकल के अंदर से भी जवाबी कार्रवाई की जा सके। (Garud Commando MSAV)

आग लगने पर खुद एक्टिव होगा सिक्योरिटी सिस्टम

रक्षा मंत्रालय ने व्हीकल में ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम लगाने की भी शर्त रखी है।

यदि इंजन कम्पार्टमेंट या सैनिकों के बैठने वाले हिस्से में आग लगती है तो यह सिस्टम अपने आप एक्टिव होकर आग बुझाने का काम करेगी। इसके अलावा व्हीकल में दो अतिरिक्त पोर्टेबल फायर एक्सटिंग्विशर भी लगाए जाएंगे।

आरएफआई के अनुसार व्हीकल में सिक्स सिलेंडर टर्बोचार्ज्ड डीजल इंजन लगाया जाएगा, जिसकी क्षमता कम से कम 450 हॉर्सपावर होगी। व्हीकल की अधिकतम गति हाईवे पर 100 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक होगी, जबकि कठिन इलाकों में यह 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकेगा।

एक बार ईंधन भरने पर व्हीकल हाईवे पर कम से कम 600 किलोमीटर और कठिन रास्तों पर लगभग 300 किलोमीटर तक चलने में सक्षम होना चाहिए।

इसमें ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन, पावर स्टीयरिंग, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (एबीएस), हिल होल्ड असिस्ट और ऑल-व्हील ड्राइव जैसी सुविधाएं भी अनिवार्य रखी गई हैं।

बर्फ, रेगिस्तान और खराब रास्तों के लिए विशेष व्यवस्था

रक्षा मंत्रालय ने व्हीकल को हर तरह के इलाके के लिए तैयार करने की शर्त रखी है। व्हीकल में रन-फ्लैट टायर लगाए जाएंगे, ताकि गोली लगने या टायर खराब होने के बाद भी कम से कम 10 किलोमीटर तक व्हीकल चलता रहे।

इसके साथ सेंट्रल टायर इन्फ्लेशन सिस्टम होगा, जिससे चालक जरूरत के अनुसार चलते-चलते टायर का दबाव बदल सकेगा। रेगिस्तान के लिए अलग टायर और सामान्य सड़कों के लिए अलग टायर उपलब्ध कराए जाएंगे।

बर्फीले क्षेत्रों में इस्तेमाल के लिए चार एंटी-स्किड स्नो चेन और एक अतिरिक्त स्पेयर व्हील भी व्हीकल का हिस्सा होंगे। (Garud Commando MSAV)

एडवांस नेविगेशन सिस्टम जरूरी

व्हीकल में ऐसा नेविगेशन सिस्टम लगाया जाएगा, जो नैविक, जीपीएस और ग्लोनास तीनों सैटेलाइट सिस्टम्स के साथ काम कर सके। डिजिटल मैप, स्थान की जानकारी और मिशन से जुड़ी सूचनाएं व्हीकल के अंदर लगे डिस्प्ले पर दिखाई देंगी। इसके अलावा दो सैन्य रेडियो सेट लगाने की सुविधा भी होगी, जिससे ऑपरेशन के दौरान लगातार संपर्क बनाए रखा जा सके। (Garud Commando MSAV)

कैमोफ्लाज और आईएफएफ सिस्टम भी रहेगा

एमएसएवी के लिए विशेष मल्टी-स्पेक्ट्रल थ्री-डी कैमो किट भी मांगी गई है। इसका उद्देश्य व्हीकल की पहचान को कम करना है।

यह कैमो कवर दिन और रात दोनों समय काम करेगा। इससे व्हीकल थर्मल इमेजर और इमेज इंटेंसिफायर जैसे निगरानी उपकरणों से आसानी से दिखाई नहीं देगा।

व्हीकल में थर्मल आईआर बीकन और ऑपरेटर थर्मल नाइट साइट भी होगी, जिससे फ्रेंड फोर्सेज की पहचान और रात में ऑपरेशन आसान हो सके। (Garud Commando MSAV)

व्हीकल में 120 लीटर तक पीने के पानी की व्यवस्था

रक्षा मंत्रालय ने व्हीकल में केवल सुरक्षा और हथियारों पर ही ध्यान नहीं दिया है, बल्कि जवानों की सुविधा से जुड़े कई प्रावधान भी शामिल किए हैं।

व्हीकल में 120 लीटर तक पीने के पानी की व्यवस्था होगी। इसके अलावा एचवीएसी सिस्टम लगाया जाएगा, जो बाहर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस होने पर भी अंदर का तापमान लगभग 22 डिग्री सेल्सियस के आसपास बनाए रख सके।

इसके साथ मेडिकल बैग, टूल किट, टोइंग हुक, फ्रंट और रियर कैमरा सिस्टम, पब्लिक एड्रेस सिस्टम, अतिरिक्त बैटरी, सेल्फ रिकवरी विन्च और अन्य सैन्य उपकरण भी व्हीकल का हिस्सा होंगे। (Garud Commando MSAV)

भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडो होंगे और घातक, 120 मिनट तक उड़ने वाले लॉइटर म्यूनिशन से होंगे लैस, टैंक भी करेंगे तबाह!

Garud Commandos Loiter Munitions System
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Garud Commandos Loiter Munitions System: भारतीय वायुसेना के स्पेशल फोर्स गारुड़ कमांडो को आधुनिक लॉइटर म्यूनिशन सिस्टम से लैस करने की तैयारी शुरू हो गई है। रक्षा मंत्रालय ने मैन पोर्टेबल लॉइटर म्यूनिशन्स सिस्टम (MPLMS) की खरीद के लिए आरएफआई जारी की है। यह सिस्टम स्पेशल फोर्सेज को दुश्मन के ठिकानों पर सुरक्षित दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता देगा।

गरुड़ कमांडो वायुसेना के सबसे प्रशिक्षित स्पेशल फोर्सेज में शामिल हैं और उन्हें आतंकवाद विरोधी अभियान, एयरबेस सुरक्षा, विशेष अभियान और दुश्मन के इलाके में संवेदनशील मिशनों के लिए तैनात किया जाता है।

Garud Commandos Loiter Munitions System: क्या है मैन पोर्टेबल लॉइटर म्यूनिशन्स सिस्टम?

मैन पोर्टेबल लॉइटर म्यूनिशन्स सिस्टम एक ऐसा हथियार है जिसे अक्सर ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी कहा जाता है। यह सामान्य ड्रोन की तरह केवल निगरानी नहीं करता, बल्कि टारगेट को तलाश कर उस पर सीधे हमला कर देता है।

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि सैनिकों को दुश्मन के बेहद करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऑपरेटर सुरक्षित स्थान से पूरे मिशन को कंट्रोल कर सकता है। इससे स्पेशल फोर्सेज का जोखिम कम होता है और हमला अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है।

रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई में साफ किया है कि यह सिस्टम दिन और रात दोनों समय काम कर सके। इसका इस्तेमाल निगरानी, टोही और दुश्मन के सैनिकों, बख्तरबंद वाहनों तथा इमारतों पर सटीक हमले के लिए किया जाएगा। वहीं पूरा सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि इसे केवल दो स्पेशल फोर्स ऑपरेटर ही चला सकें।

पूरा सिस्टम होना चाहिए पोर्टेबल

आरएफआई के अनुसार यह सिस्टम पूरी तरह मैन पोर्टेबल होना चाहिए। यानी इसे सैनिक अपने कंधों पर बैकपैक में लेकर चल सकें। पूरा सिस्टम एक, दो या अधिकतम तीन ऑल-वेदर बैकपैक में समा जाना चाहिए।

पूरे सिस्टम का कुल वजन 25 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। वहीं एयरियल व्हीकल, वारहेड और कैमरे सहित उसका कुल वजन 18 किलोग्राम से कम रखा गया है।

सिस्टम में हाई एक्सप्लोसिव वारहेड और हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक वारहेड वाले अलग-अलग एरियल व्हीकल, ग्राउंड डेटा टर्मिनल, ऑपरेटर कंट्रोल यूनिट, ट्रेनिंग के लिए अलग लॉइटर म्यूनिशन और विशेष रखरखाव उपकरण शामिल होंगे। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

40 किलोमीटर तक मार, दो घंटे तक उड़ान

रक्षा मंत्रालय ने इस सिस्टम के लिए कई सख्त तकनीकी मानक तय किए हैं। आरएफआई के अनुसार लॉइटरिंग म्यूनिशन की कम से कम ऑपरेशनल रेंज 40 किलोमीटर होनी चाहिए। यह लगातार 120 मिनट या उससे अधिक समय तक हवा में रह सके।

इसकी सामान्य उड़ान गति कम से कम 60 किलोमीटर प्रति घंटा और टारगेट पर हमला करते समय डाइव स्पीड 100 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक होनी चाहिए।

यह सिस्टम अलग-अलग कोणों से हमला करने में सक्षम होना चाहिए। टारगेट के अनुसार 35 डिग्री से 85 डिग्री तक अटैक एंगल उपलब्ध होना चाहिए, ताकि खुले मैदान से लेकर पहाड़ी इलाकों और इमारतों के पीछे छिपे टारगेटों तक प्रभावी हमला किया जा सके।

न्यूमेटिक लॉन्च सिस्टम से कम होगी पहचान

स्पेशल फोर्स मिशनों में गोपनीयता सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण रक्षा मंत्रालय ने लॉन्च सिस्टम को लेकर भी विशेष शर्त रखी है।

आरएफआई में कहा गया है कि लॉइटर म्यूनिशन को न्यूमेटिक लॉन्च ट्यूब से छोड़ा जाना चाहिए। इस तकनीक से लॉन्च के समय आवाज बहुत कम होगी और विजुअल सिग्नेचर लगभग नहीं के बराबर रहेगा। इससे दुश्मन के लिए लॉन्च की जगह का पता लगाना कठिन होगा।

सिस्टम में ऐसा सेफ्टी मैकेनिज्म भी होना चाहिए, जिससे मिशन रद्द होने पर म्यूनिशन को सुरक्षित रूप से वापस लाया जा सके। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

दो तरह के वारहेड होन जरूरी

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक सिस्टम में दो तरह के वारहेड होने चाहिए। पहला हाई एक्सप्लोसिव (एचई) वारहेड, जिसका इस्तेमाल दुश्मन के सैनिकों और सामान्य सैन्य ठिकानों के खिलाफ किया जाएगा। दूसरा हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (एचईएटी) वारहेड, जो आर्मर्ड व्हीकल्स को नष्ट कर सके।

आरएफआई के अनुसार एचई वारहेड का प्रभाव कम से कम पांच मीटर के दायरे तक होना चाहिए। वहीं एचईएटी वारहेड कम से कम 500 मिलीमीटर रोल्ड होमोजीनियस आर्मर (आरएचए) को भेदने में सक्षम होना चाहिए।

सिस्टम में ऐसा सेफ एंड आर्म मैकेनिज्म होना चाहिए, जिससे ऑपरेटर जरूरत पड़ने पर वारहेड को सक्रिय या निष्क्रिय कर सके। इसमें प्रॉक्सिमिटी, इम्पैक्ट और डिले जैसे अलग-अलग मोड उपलब्ध होने चाहिए, ताकि टारगेट के अनुसार हमला किया जा सके।

छोटे टारगेट पर भी सटीक हमला करने की क्षमता जरूरी

रक्षा मंत्रालय ने इस सिस्टम के लिए सटीकता को सबसे महत्वपूर्ण मानकों में रखा है। आरएफआई में कहा गया है कि सिस्टम कम से कम 800 फीट की ऊंचाई से मानव आकार के टारगेट की पहचान कर सके और 30 सेकंड के भीतर उस पर लॉक हासिल कर ले।

सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी एक मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इसका मतलब है कि हमला टारगेट से लगभग एक मीटर के भीतर होना चाहिए। वहीं फाइनल अटैक की सटीकता दो मीटर के दायरे के अंदर तय की गई है। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

दिन और रात दोनों समय करेगा निगरानी

नए लॉइटर म्यूनिशन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड कैमरा लगाया जाएगा। यही कैमरा ऑपरेटर को रीयल टाइम तस्वीरें उपलब्ध कराएगा।

आरएफआई के अनुसार कैमरा दिन और रात दोनों समय टारगेट की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए। चलते हुए व्यक्ति और सैन्य वाहन दोनों की निगरानी और ट्रैकिंग की क्षमता होनी चाहिए।

ह्यूमन टारगेट की पहचान दिन में लगभग डेढ़ किलोमीटर और रात में करीब 750 मीटर की दूरी से होनी चाहिए। वहीं मिलिट्री व्हीकल को दिन में 2.2 किलोमीटर और रात में लगभग 1.2 किलोमीटर की दूरी से पहचानने की क्षमता मांगी गई है।

कैमरा केवल तस्वीरें भेजने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराएगा, जिससे ऑपरेटर को लगातार टारगेट का पीछा करने में आसानी होगी। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

जीपीएस बंद होने पर भी मिशन जारी रहेगा

आधुनिक युद्ध में कई बार दुश्मन जीपीएस सिग्नल को जाम करने की कोशिश करता है। ऐसे हालात को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम भी मांगा है।

आरएफआई के अनुसार सिस्टम में जीपीएस के साथ भारतीय नैविक प्रणाली का विकल्प होना चाहिए। यदि जीपीएस उपलब्ध नहीं हो तो इनर्शियल नेविगेशन और इमेज आधारित नेविगेशन के जरिए भी म्यूनिशन अपना मिशन पूरा कर सके। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

सुरक्षित डेटा लिंक और मजबूत कंट्रोल सिस्टम

पूरे सिस्टम को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत ऑपरेटर कंट्रोल यूनिट और ग्राउंड डेटा टर्मिनल की आवश्यकता होगी।

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कंट्रोल यूनिट मिलिट्री ग्रेड रग्ड कंप्यूटर पर आधारित होनी चाहिए, जो धूल, पानी और झटकों को सहन कर सके। इसकी बैटरी कम से कम 18 घंटे तक चलनी चाहिए और स्क्रीन तेज धूप में भी साफ दिखाई देनी चाहिए।

डेटा लिंक पूरी तरह एन्क्रिप्टेड होगा ताकि मिशन के दौरान भेजी जा रही जानकारी को कोई तीसरा पक्ष बीच में पकड़ या बदल न सके। सिस्टम में रियल टाइम वीडियो, कंट्रोल ट्रांसफर और डेटा ट्रांसमिशन की सुविधा भी अनिवार्य रखी गई है। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

ऊंचे पहाड़ों और कठिन मौसम में भी काम करने की शर्त

भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडो अक्सर ऊंचाई वाले इलाकों और कठिन मौसम में अभियान चलाते हैं। यह सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिसे 16 हजार फीट तक की ऊंचाई से लॉन्च किया जा सके। यह माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम हो। इसके अलावा धूल, हल्की बारिश और तेज हवा में भी इसकी कार्यक्षमता बनी रहनी चाहिए।

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि पूरा सिस्टम मजबूत लेकिन हल्के मिलिट्री ग्रेड कंपोनेंट से बना हो और इसे दस मिनट या उससे कम समय में जोड़ा या अलग किया जा सके। (Garud Commandos Loiter Munitions System)

कौन था कारगिल युद्ध का पहला शहीद? 27 साल बाद भी क्यों अधूरा है जवाब, किसके लिए सेना ने पार की थी श्योक नदी

First Martyr of Kargil War
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First Martyr of Kargil War: कारगिल युद्ध को 27 साल पूरे हो चुके हैं। हर साल 26 जुलाई को पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाता है। द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और ऑपरेशन विजय की सफलता को याद किया जाता है। इस अभियान में भारतीय सशस्त्र बलों के 546 जवान और अधिकारी शहीद हुए, जिनमें 537 भारतीय सेना, चार भारतीय वायुसेना और पांच सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान शामिल थे। लेकिन इन 27 वर्षों में एक सवाल ऐसा है, जिसका आधिकारिक जवाब आज तक सामने नहीं आया। आखिर कारगिल युद्ध की पहली सैन्य क्षति किसे माना जाए?

क्या सबसे पहले लांस नायक खड़ग सिंह ने सर्वोच्च बलिदान दिया था? या फिर कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी गश्ती टीम कारगिल युद्ध की पहली शहादत थी? या कैप्टन अमित भारद्वाज, जिन्होंने अपने जवानों को बचाते हुए अपने जवानों की आहूति दी?

First Martyr of Kargil War: युद्ध शुरू कब हुआ, यही सबसे बड़ा सवाल

कारगिल युद्ध की समाप्ति की तारीख 26 जुलाई 1999 को लेकर कोई विवाद नहीं है। लेकिन युद्ध वास्तव में कब शुरू हुआ, इस पर आज भी अलग-अलग तिथियां सामने आती हैं।

3 मई 1999 को बटालिक सेक्टर के गारकोन गांव के निवासी और चरवाहे ताशी नामग्याल अपने खोए हुए याक की तलाश में जुब्बार लांगपा नाले के पास पहुंचे। दूरबीन से देखने पर उन्हें ऊंची चोटियों पर कुछ संदिग्ध लोग दिखाई दिए। वे पठानी कपड़ों में थे और बर्फ हटाकर बंकर बना रहे थे।

उन्होंने तुरंत नजदीकी भारतीय सेना की चौकी पहुंचकर 3 पंजाब रेजिमेंट के हवलदार बलविंदर सिंह और मिलिट्री इंटेलिजेंस के हवलदार नंदू राम को इसकी जानकारी दी। इसके बाद भारतीय सेना ने कई इलाकों में गश्त तेज कर दी। बाद में जांच में पता चला कि पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) के सैनिक सर्दियों में खाली हुई भारतीय चौकियों पर कब्जा कर चुके थे।

ऑपरेशन विजय की शुरुआत की तारीख भी स्पष्ट नहीं

मई 1999 के दूसरे सप्ताह तक भारतीय सेना को यह स्पष्ट हो गया था पाकिस्तान ने द्रास, कारगिल, बटालिक, काक्सर और मुश्कोह घाटी की कई ऊंची चोटियों पर कब्जा जमा लिया है। हालात की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। इसका मकसद नियंत्रण रेखा पार किए बिना भारतीय इलाकों को दुश्मन से खाली कराना था।

लेकिन ऑपरेशन विजय कब शुरू हुआ इसकी कोई स्पष्ट तारीख सरकारी डॉक्यूमेंट्स में उपलब्ध नहीं है। तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने अपनी किताब Kargil: From Surprise to Victory में लिखा है कि 23 मई 1999 को तीनों सेनाओं के प्रमुखों की बैठक हुई थी, जिसमें भारतीय वायुसेना को अभियान में शामिल करने पर सहमति बनी।

इसके अगले दिन 24 मई को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक हुई। इस बैठक में संयुक्त सैन्य रणनीति को मंजूरी मिली, भारतीय वायुसेना के ऑपरेशन सफेद सागर को हरी झंडी दी गई और यह स्पष्ट निर्देश दिया गया कि भारतीय सेना और वायुसेना नियंत्रण रेखा पार नहीं करेंगी। (First Martyr of Kargil War)

भारत ने कभी औपचारिक युद्ध घोषित नहीं किया

कारगिल युद्ध की एक सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह भी रही कि भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कभी औपचारिक युद्ध की घोषणा नहीं की। न तो राष्ट्रपति द्वारा युद्ध घोषित किया गया और न ही संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया गया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने शुरुआत से ही यह नीति अपनाई कि भारतीय सेना केवल अपने क्षेत्र के भीतर कार्रवाई करेगी और नियंत्रण रेखा पार नहीं करेगी। इसी रणनीति ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नैतिक और कूटनीतिक समर्थन दिलाया।

31 मई 1999 को पहली बार प्रधानमंत्री वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से इसे “युद्ध जैसी स्थिति” बताया। इसके बाद 7 जून को राष्ट्र के नाम संदेश में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर भारतीय क्षेत्र में कब्जा किया है और भारतीय सेना हर घुसपैठिए को बाहर निकालने तक अभियान जारी रखेगी।

14 जुलाई को उन्होंने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की और 26 जुलाई को भारतीय सेना ने पूरे क्षेत्र को घुसपैठियों से मुक्त घोषित कर दिया।

6 मई 1999: लांस नायक खड़ग सिंह का सर्वोच्च बलिदान

कई सैन्य स्रोतों के अनुसार कारगिल संघर्ष में सबसे पहले शहीद होने वाले सैनिक 12 जाट रेजिमेंट के लांस नायक खड़ग सिंह (सेना मेडल) थे।

6 मई 1999 को उन्हें तुर्तुक सेक्टर के रेशमा हाइट्स क्षेत्र में पाकिस्तानी हेलीकॉप्टरों की गतिविधियों की पुष्टि करने के लिए गश्त पर भेजा गया था। उस समय भारतीय सेना को पूरी तरह यह अंदाजा नहीं था कि सामने केवल घुसपैठिए नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नियमित सेना मौजूद है।

गश्त के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों की गोलीबारी में लांस नायक खड़ग सिंह शहीद हो गए और उनका पार्थिव शरीर पाकिस्तान के कब्जे में चला गया।

दो दिन बाद भारत और पाकिस्तान के बीच फ्लैग मीटिंग हुई। पाकिस्तान ने उनका पार्थिव शरीर लौटाने पर सहमति जताई। लेकिन शव वापस लाना आसान नहीं था। श्योक नदी लगभग 100 फीट चौड़ी थी और उस पर कोई पुल नहीं था।

12 जाट रेजिमेंट के 25 जवान रस्सियां और ट्रक के हवा भरे टायर ट्यूब लेकर नदी तक पहुंचे। दो प्रशिक्षित तैराक सबसे पहले नदी पार गए और रस्सियां बांधीं। इसके बाद अन्य सैनिक आगे बढ़े। पाकिस्तानी सेना ने पहचान होने के बाद ताबूत भारतीय सैनिकों को सौंपा। जवानों ने उसे टायर ट्यूब से बांधा और तैरते हुए सुरक्षित भारतीय क्षेत्र में वापस लेकर आए।

13 मई 1999 को पोस्टमार्टम के बाद लांस नायक खड़ग सिंह का पार्थिव शरीर राजस्थान के झुंझुनूं स्थित उनके गांव पहुंचा, जहां पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। (First Martyr of Kargil War)

खड़ग सिंह की शहादत को लेकर भी उठे सवाल

सूत्रों का कहना है कि कारगिल युद्ध के शुरुआती रिकॉर्ड में लांस नायक खड़ग सिंह की शहादत को ऑपरेशन विजय के बजाय ऑपरेशन मेघदूत के तहत दर्ज किया गया था। उस समय 3 इंफ्रैंट्री डिविजन कारगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी घुसपैठ को सार्वजनिक नहीं करना चाहता था, इसलिए इस घटना को कारगिल युद्ध की शुरुआती सैन्य क्षति के रूप में नहीं दिखाया गया। बाद में उनके परिवार की मांग पर उनके बलिदान को ऑपरेशन विजय के तहत शामिल किया गया।

8 और 9 मई को भी हुई थीं शुरुआती झड़पें

कारगिल युद्ध की शुरुआत में यह केवल एक ही घटना नहीं हुई थी। 8 मई को 16 ग्रेनेडियर्स की टुकड़ी पर भी हमला हुआ था। अगले दिन 9 मई को 10 गढ़वाल राइफल्स की टीम को प्वाइंट 4927 के पास जुबार कॉम्प्लेक्स क्षेत्र में भारी नुकसान उठाना पड़ा। इन शुरुआती घटनाओं से यह साफ हो गया था कि सामने केवल घुसपैठिए नहीं, बल्कि पूरी तैयारी के साथ बैठे पाकिस्तानी सैनिक हैं।

हालांकि इन घटनाओं का विस्तार से उल्लेख कारगिल रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट और कई चर्चित सैन्य किताबों में नहीं मिलता।

14 मई: दुश्मन के हमले का शिकार हुई सौरभ कालिया की टीम 

14 मई 1999 को 4 जाट रेजिमेंट के युवा अधिकारी लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपनी छह सदस्यीय गश्ती टीम के साथ काक्सर सेक्टर के बजरंग पोस्ट क्षेत्र की ओर रवाना हुए। उनके साथ सिपाही अर्जुन राम, भंवर लाल बगरिया, भीखा राम, मूला राम और नरेश सिंह थे। उस समय इसे सामान्य गश्त माना जा रहा था, इसलिए टीम हल्के हथियारों और सीमित गोला-बारूद के साथ आगे बढ़ी।

सूत्रों का कहना है कि उस समय तक अलग-अलग सेक्टरों में भारतीय सेना की कई गश्ती टुकड़ियां पाकिस्तानी सैनिकों की घात का सामना कर चुकी थीं। इसके बावजूद सौरभ कालिया की टीम को क्षेत्र की वास्तविक ऑपरेशनल स्थिति की पूरी जानकारी नहीं दी गई। उनके साथ कोई जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) भी नहीं था।

यदि उस समय तक सामने आ चुकी घटनाओं और दुश्मन की वास्तविक तैनाती की जानकारी गश्ती दल को विस्तार से दी जाती, तो अभियान की योजना अलग हो सकती थी।

जैसे ही गश्ती दल बजरंग पोस्ट के करीब पहुंचा, ऊंचाइयों पर पहले से मौजूद पाकिस्तानी सैनिकों ने फायरिंग शुरू कर दी। भारतीय जवानों ने जवाबी कार्रवाई की और मुख्यालय को स्थिति की सूचना भी दी, लेकिन कुछ समय बाद रेडियो संपर्क टूट गया। गोला-बारूद सीमित होने और दुश्मन की संख्या अधिक होने के कारण पूरी टीम पाकिस्तानी सैनिकों के कब्जे में चली गई।

करीब 22 दिन बाद, 9 जून 1999 को पाकिस्तान ने छह भारतीय सैनिकों के पार्थिव शरीर लौटाए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किए जाने का उल्लेख किया गया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।

17 मई: साथियों को बचाने के लिए कैप्टन अमित भारद्वाज ने दी जान

लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनकी टीम के लापता होने के बाद 4 जाट रेजिमेंट ने खोज अभियान शुरू किया। इसकी जिम्मेदारी कैप्टन अमित भारद्वाज को सौंपी गई। 17 मई 1999 को वह लगभग 30 सैनिकों के साथ बजरंग पोस्ट क्षेत्र की ओर बढ़े।

आगे बढ़ते ही टीम का सामना बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों से हुआ। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए कैप्टन अमित भारद्वाज ने अपने अधिकांश जवानों को सुरक्षित पीछे हटने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने स्वयं हवलदार राजबीर सिंह के साथ मोर्चा संभाला और लगातार कवर फायर देते रहे, ताकि बाकी सैनिक सुरक्षित लौट सकें।

उनकी इस बहादुरी के कारण 29 सैनिक सुरक्षित निकलने में सफल रहे, लेकिन कैप्टन अमित भारद्वाज और हवलदार राजबीर सिंह रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय दुश्मन का कब्जा इतना मजबूत था कि भारतीय सेना तत्काल उनके पार्थिव शरीर भी वापस नहीं ला सकी। लगभग 56 दिन बाद, 13 जुलाई 1999 को क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण मिलने के बाद दोनों के पार्थिव शरीर बरामद किए गए। (First Martyr of Kargil War)

क्या घुसपैठ के संकेत जनवरी में ही मिल गए थे?

कारगिल युद्ध की शुरुआत को लेकर एक और महत्वपूर्ण दावा सामने आता है। उस समय प्वाइंट 5770 क्षेत्र में तैनात रहे 5 पैरा (स्पेशल फोर्सेज) के सेवानिवृत्त मेजर मनीष भटनागर के अनुसार, पाकिस्तानी गतिविधियों के शुरुआती संकेत मई 1999 से काफी पहले दिखाई देने लगे थे।

उनके अनुसार 26 जनवरी 1999 को दक्षिणी सियाचिन क्षेत्र में एनजे-9842 के पास स्थित प्वाइंट 5770 पर पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में भारतीय सेना के कई जवान हताहत हुए थे। इनमें सूबेदार ताशी स्टोबदास शहीद हुए, जबकि हवलदार जया राजन, लांस नायक भुंचोक रंगाओल, सिपाही तुंदुप वांगल और नायक चेरिंग मुतुप घायल हुए थे।

इसी तरह 9 फरवरी 1999 को प्वाइंट 5770 की चोटी पर पाकिस्तानी सेना की एक स्थायी चौकी देखे जाने का भी दावा किया जाता है। बताया जाता है कि इसकी सूचना तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई थी। बाद में ऑपरेशन विजय के दौरान 27 जून 1999 को 27 राजपूत बटालियन ने मेजर नवदीप सिंह के नेतृत्व में इस पोस्ट पर दोबारा कब्जा किया। पाकिस्तानी सेना इसे बिलाल पोस्ट के नाम से जानती थी।

वीरता पुरस्कारों को लेकर भी बना हुआ है सवाल

कारगिल युद्ध की शुरुआती घटनाओं से जुड़ा एक और सवाल वीरता पुरस्कारों को लेकर भी उठता है। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उन्हें खोजने के दौरान वीरगति प्राप्त करने वाले कैप्टन अमित भारद्वाज को कोई वीरता पदक नहीं मिला। दूसरी ओर, 4 जाट रेजिमेंट के उसी अभियान से जुड़े पांच अन्य सैनिकों को सेना मेडल और मेंशन-इन-डिस्पैचेज से सम्मानित किया गया।

इसी वजह से पूर्व सैनिकों और रक्षा विशेषज्ञों के बीच समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि सौरभ कालिया और अमित भारद्वाज को वीरता पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया। इस विषय पर अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक या आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। (First Martyr of Kargil War)

27 साल बाद भी आधिकारिक युद्ध इतिहास का इंतजार

वहीं आज भी कारगिल युद्ध के शुरुआती दिनों की कई घटनाएं अलग-अलग सैन्य पुस्तकों, संस्मरणों, पूर्व सैनिकों के अनुभवों और उपलब्ध दस्तावेजों में बिखरी हुई मिलती हैं। वहीं, शुरुआती घटनाक्रम और आधिकारिक इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण पन्ने अब भी पूरी तरह स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं।

कारगिल युद्ध के बाद सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की समीक्षा के लिए कारगिल रिव्यू कमेटी का गठन किया था। इसकी अध्यक्षता रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम ने की थी। समिति ने युद्ध से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं की समीक्षा की, लेकिन उसका उद्देश्य युद्ध का विस्तृत सैन्य इतिहास तैयार करना नहीं था। (First Martyr of Kargil War)

कारगिल विजय दिवस पर रक्षा मंत्री की पाकिस्तान को दो टूक, अब पीओके पर ही होगी बातचीत

Kargil Vijay Diwas 2026
Kargil Vijay Diwas 2026: Operation Sindoor Proves India's Decisive Response Capability; Rajnath Singh Says Talks with Pakistan Only on PoK (Photo: PIB)

Kargil Vijay Diwas 2026: 27वें कारगिल विजय दिवस के अवसर पर 26 जुलाई को द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया है कि भारत पाकिस्तान की किसी भी दुस्साहसपूर्ण हरकत का उसकी कल्पना से कहीं अधिक कड़े तरीके से जवाब देने की क्षमता रखता है। उन्होंने दो टूक कहा कि पाकिस्तान के साथ यदि भविष्य में कोई बातचीत होगी तो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) पर होगी, क्योंकि वह भारत का अभिन्न हिस्सा है और उस पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है।

रक्षा मंत्री ने कारगिल युद्ध के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि 1999 में भारतीय सैनिकों ने जिस साहस, अनुशासन और देशभक्ति का परिचय दिया था, वही भावना आज भी भारतीय सशस्त्र सेनाओं की सबसे बड़ी ताकत है।

Kargil Vijay Diwas 2026: ऑपरेशन सिंदूर का किया उल्लेख

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ होने वाली हर नापाक हरकत का जवाब उसी दृढ़ता से दिया जाएगा, जैसा भारतीय सेनाओं ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आतंकियों और उनके संरक्षकों के खिलाफ दिया था।

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत केवल आतंकियों को ही नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षण देने वाले सिस्टम को भी अलग नजरिए से नहीं देखता। उनके अनुसार भारत अब आतंकवाद और उसे समर्थन देने वाली व्यवस्था के बीच कोई अंतर नहीं मानता। (Kargil Vijay Diwas 2026)

पाकिस्तान पर साधा निशाना

राजनाथ सिंह ने कहा कि पिछले 27 सालों में भारत और पाकिस्तान की दिशा पूरी तरह अलग हो चुकी है। उन्होंने कहा कि भारत इनोवेशन, तकनीक और विकास के नए रास्ते तलाश रहा है, जबकि पाकिस्तान आज भी घुसपैठ और आतंकवाद के सहारे अपनी नीतियां चला रहा है।


उन्होंने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर बना रहा है, जबकि पाकिस्तान आत्मघाती आतंकियों को तैयार करने में लगा है। भारत दुनिया को सॉफ्टवेयर उपलब्ध करा रहा है, जबकि पाकिस्तान पर स्लीपर सेल तैयार करने के आरोप लगते रहे हैं। भारत अंतरिक्ष मिशनों में सफलता हासिल कर रहा है, जबकि पाकिस्तान प्रॉक्सी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के माध्यम से दुनिया को जोड़ रहा है, जबकि पाकिस्तान पर हवाला नेटवर्क के जरिए आतंकवाद को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं।

सैनिकों के कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता

रक्षा मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने भारतीय सेनाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में आवश्यक कार्रवाई के लिए पूरा राजनीतिक समर्थन दिया है। उन्होंने कहा कि जब देश की सीमाओं पर भारतीय सैनिक पूरी सतर्कता और संकल्प के साथ तैनात हैं, तब कोई भी दुश्मन भारत की ओर बुरी नजर डालने का साहस नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि सरकार सैनिकों के कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सीमाओं पर आधारभूत ढांचे को लगातार मजबूत किया जा रहा है और बदलते युद्ध स्वरूप के अनुरूप सैन्य क्षमताओं का आधुनिकीकरण भी जारी है।

कारगिल के वीरों को किया नमन

राजनाथ सिंह ने 1999 के कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सभी सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा और कैप्टन मनोज कुमार पांडेय सहित उन सभी वीर सैनिकों को याद किया, जिनकी बहादुरी आज भी देश के युवाओं को प्रेरित करती है।

उन्होंने कहा कि कारगिल विजय दिवस केवल एक सैन्य जीत का दिन नहीं है, बल्कि यह युवाओं को यह समझाने का अवसर भी है कि व्यक्तिगत सफलता और राष्ट्रीय कर्तव्य में क्या अंतर होता है। त्याग और सेवा की भावना ही किसी भी राष्ट्र की सबसे मजबूत नींव होती है। (Kargil Vijay Diwas 2026)

कारगिल युद्ध स्मारक को बताया भारत की एकता का प्रतीक

रक्षा मंत्री ने कहा कि द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक केवल एक स्मारक नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है। यहां अंकित शहीदों के नाम देश के हर क्षेत्र, हर भाषा और हर समुदाय से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि यही विविधता भारत की सबसे बड़ी ताकत है और यही एकता उन लोगों के लिए जवाब है जो देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं।

आधुनिक युद्ध ने बदल दी सुरक्षा की चुनौतियां

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन संघर्ष का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन संघर्षों ने यह दिखाया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों की क्षमता की परीक्षा नहीं लेते, बल्कि किसी देश के धैर्य, संसाधनों और राष्ट्रीय संकल्प की भी परीक्षा लेते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के पास मजबूत और सक्षम सशस्त्र सेनाएं हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक में राष्ट्र सर्वोपरि की भावना, अनुशासन और कर्तव्यबोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर भारतीय को सैनिक बनने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि देश को कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग की जरूरत पड़े तो हर नागरिक मानसिक, नैतिक और शारीरिक रूप से तैयार रहना चाहिए।

विकसित भारत 2047 की सोच

रक्षा मंत्री ने कहा कि विकसित भारत 2047 केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं है। इसमें रणनीतिक मजबूती, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक समरसता भी शामिल है। उन्होंने कहा कि कारगिल के वीरों ने जिस समर्पण और कर्तव्य भावना का परिचय दिया, वही सोच राष्ट्र निर्माण के हर क्षेत्र में आवश्यक है। (Kargil Vijay Diwas 2026)

आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन पर दिया जोर

राजनाथ सिंह ने कैप्टन विक्रम बत्रा के प्रसिद्ध वाक्य “ये दिल मांगे मोर” का उल्लेख करते हुए कहा कि यही भावना भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के अभियान को आगे बढ़ा रही है।

उन्होंने बताया कि जब वर्तमान सरकार ने कार्यभार संभाला था तब भारत अपनी रक्षा जरूरतों का लगभग 65 से 70 प्रतिशत सामान विदेशों से आयात करता था। आज लगभग 65 फीसदी रक्षा उपकरणों का निर्माण भारत में ही हो रहा है।

उन्होंने कहा कि भारतीय सेनाओं के पास अब स्वदेशी आकाश-तीर एयर डिफेंस कंट्रोल सिस्टम, नई पीढ़ी की आकाश मिसाइल, स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, तेजस हल्का लड़ाकू विमान, प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर, ध्रुव एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक, पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, आधुनिक ड्रोन और काउंटर-ड्रोन प्रणाली जैसे कई स्वदेशी प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं।

उन्होंने कहा कि देश में और अधिक आधुनिक हथियार, अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और मिसाइलें विकसित करने का कार्य जारी है। (Kargil Vijay Diwas 2026)

वर्चुअल वॉकथ्रू पोर्टल का शुभारंभ

रक्षा मंत्री ने कार्यक्रम के दौरान वर्चुअल वॉकथ्रू पोर्टल का भी उद्घाटन किया। इस पोर्टल का उद्देश्य देशभर के लोगों को डिजिटल माध्यम से कारगिल युद्ध के इतिहास और उससे जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों की जानकारी उपलब्ध कराना है।

उन्होंने गौरव गाथा प्रस्तुति भी देखी, जिसमें दो नॉन-कमीशंड अधिकारियों ने ऑपरेशन विजय के दौरान भारतीय सैनिकों की बहादुरी, धैर्य और संघर्ष की कहानी सुनाई। इसके बाद उन्होंने हट ऑफ रिमेंबरेंस और वीर भूमि पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी।

शौर्य विजय यात्रा का समापन

कार्यक्रम के अंत में रक्षा मंत्री ने सैनिकों, शहीद परिवारों और अन्य अतिथियों के साथ चाय पर बातचीत की। इसके बाद उन्होंने शौर्य विजय यात्रा मोटरसाइकिल रैली का समापन किया। इस रैली को उन्होंने 14 जुलाई को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय समर स्मारक से रवाना किया था। (Kargil Vijay Diwas 2026)

Exclusive: 27 साल बाद भी जारी नहीं हुआ कारगिल युद्ध का आधिकारिक इतिहास, पांच साल पहले किया अपना ही वादा भूली सरकार

Official Kargil War History:
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Official Kargil War History: हर साल 26 जुलाई को पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाता है। वहीं इस साल पूरे देश में कारगिल युद्ध में जीत की 27वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। साल 1999 में मई से जुलाई तक चले इस युद्ध में 545 वीरों ने ऑपरेशन विजय में सर्वोच्च बलिदान दिया था। हर साल विजय दिवस मनाने वाली सरकार पांच साल पहले किए अपने एक अहम वादे को ही भूल जाती है। साल 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया था कि कारगिल युद्ध की वर्षगांठ के 25 साल पूरे होने पर इस जंग का आधिकारिक और प्रमाणिक इतिहास सार्वजनिक किया जाएगा। लेकिन यह वादा पांच साल बाद भी पूरा होने का इंतजार ही कर रहा है।

गौरतलब है कि कारगिल युद्ध से जुड़ीं कई घटनाओं पर अभी तक आम राय मौजूद नहीं हैं। मसलन पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ वास्तव में कब शुरू हुई थी। इसी तरह युद्ध की पहली सैन्य क्षति किसे माना जाए, जैसे कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। वहीं इन सवालों पर अधिकारियों की बीच भी कोई एक राय मौजूद नहीं है।

Official Kargil War History: कई किताबें आईं, लेकिन आधिकारिक इतिहास नहीं

कारगिल युद्ध पर अब तक 15 से 20 प्रमुख पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक, वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और कारगिल युद्ध में शामिल रहे कई अधिकारियों की किताबें शामिल हैं। उस समय 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग रहे लेफ्टिनेंट जनरल बधवार ने भी अपने अनुभव लिखे हैं।

इन पुस्तकों ने युद्ध के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा गया है, लेकिन कई घटनाओं के विवरण एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

उदाहरण के तौर पर आज भी यह सवाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तानी घुसपैठ वास्तव में कब शुरू हुई थी। वहीं युद्ध की पहली सैन्य क्षति किसे माना जाए, इस पर भी अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ विवरणों में लांस नायक खड़ग सिंह का उल्लेख है, जबकि कुछ में कैप्टन सौरभ कालिया और कुछ में कैप्टन अमित भारद्वाज को युद्ध की पहली शहादत बताया गया है।

इसी कारण सैन्य इतिहासकार लंबे समय से एक आधिकारिक और प्रमाणिक युद्ध इतिहास की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। कारगिल युद्ध पर सरकार का आधिकरिक दस्तावेज सामने आने पर इन सभी सवालों से पर्दा उठ सकता है।

साल 2000 में शुरू हुआ था कारगिल विजय दिवस

कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच नियंत्रण रेखा पर लड़ा गया था। पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने द्रास, कारगिल, बटालिक, मुश्कोह और काक्सर सेक्टर की कई रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया था।

जिसके बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर चलाया और भारतीय नौसेना ने अरब सागर में ऑपरेशन तलवार के माध्यम से पाकिस्तान नौसेना की घेराबंदी कर दी थी। 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने सभी प्रमुख चोटियों पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद वर्ष 2000 से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जा रहा है। (Official Kargil War History)

कारगिल रिव्यू कमेटी ने की थी सिफारिश

कारगिल युद्ध समाप्त होने के बाद जुलाई 1999 में केंद्र सरकार ने वरिष्ठ रणनीतिक विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में कारगिल रिव्यू कमेटी (केआरसी) का गठन किया था।

समिति ने दिसंबर 1999 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई कि कारगिल जैसे एतिहासिक हाई एल्टीट्यूड युद्ध का आधिकारिक और प्रमाणिक इतिहास जल्द प्रकाशित किया जाना चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि भारत ने 1965 और 1971 के युद्धों का भी आधिकारिक इतिहास सार्वजनिक नहीं किया था। समिति का मानना था कि सही युद्ध इतिहास उपलब्ध होने से भविष्य की सैन्य योजना बेहतर बनेगी और गलत सूचनाओं पर भी रोक लगेगी।

बाद में ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स और एनएन वोहरा समिति ने भी इसी दिशा में सुझाव दिए थे। (Official Kargil War History)

2021 में बनी नई नीति

करीब दो दशक बाद रक्षा मंत्रालय ने इस दिशा में औपचारिक कदम उठाया। 12 जून 2021 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने युद्ध और सैन्य अभियानों के इतिहास के संग्रह, गोपनीयता समाप्त करने तथा संकलन और प्रकाशन संबंधी नीति को मंजूरी दी।

इस नीति के अनुसार किसी भी युद्ध या सैन्य अभियान का इतिहास अधिकतम पांच वर्ष के भीतर तैयार किया जाना चाहिए।

नीति में यह भी तय किया गया कि युद्ध खत्म होने के दो साल के भीतर एक समिति बनाई जाएगी। इसके बाद अगले तीन साल में सभी दस्तावेजों का संकलन और इतिहास तैयार किया जाएगा। (Official Kargil War History)

25 साल बाद रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का प्रावधान

नई नीति में यह भी कहा गया कि युद्ध संबंधी रिकॉर्ड सामान्य रूप से 25 वर्ष बाद सार्वजनिक किए जा सकते हैं।
इसके लिए संबंधित विभाग अपने रिकॉर्ड की समीक्षा करेंगे। युद्ध इतिहास तैयार होने के बाद 25 वर्ष से पुराने दस्तावेज नेशनल आर्काइव को भी भेजे जा सकते हैं। यह प्रक्रिया पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट 1993 और उससे जुड़े नियमों के तहत पूरी की जाएगी।

रक्षा मंत्रालय की नीति के मुताबिक मंत्रालय का हिस्ट्री डिवीजन पूरे कार्य का समन्वय करेगा। इसके लिए एक समिति बनाई जाएगी जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी करेंगे।

समिति में सेना, नौसेना, वायुसेना, इंटीग्रेट डिफेंस स्टाफ, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा आवश्यकता पड़ने प्रमुख सैन्य इतिहासकार भी शामिल किए जा सकते हैं।

सभी सैन्य संगठन अपनी युद्ध डायरी, ऑपरेशनल रिकॉर्ड, कार्यवाही संबंधी दस्तावेज और अन्य अभिलेख हिस्ट्री डिवीजन को उपलब्ध कराएंगे।

लेकिन कारगिल युद्ध को 27 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 25 वर्ष की अवधि भी जुलाई 2024 में पूरी हो गई। इसके बावजूद अब तक रक्षा मंत्रालय ने कारगिल युद्ध का आधिकारिक इतिहास सार्वजनिक नहीं किया है। न ही सार्वजनिक रूप से यह जानकारी दी गई है कि कारगिल युद्ध के लिए इतिहास तैयार करने वाली समिति का गठन कब हुआ या उसका कार्य किस चरण में है। (Official Kargil War History)

सेनाओं का चल रहा है बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन

सूत्रों का कहना है कि साल 2021 के बाद भारतीय सशस्त्र सेनाओं में बड़े स्तर पर परिवर्तन चल रहे हैं। तीनों सेनाओं के एकीकरण, संयुक्त कमानों की अवधारणा और थिएटराइजेशन की प्रक्रिया पर काम हो रहा है।

सूत्रों के अनुसार इसी कारण कई प्रशासनिक और संरचनात्मक कार्यों को प्राथमिकता दी गई, जबकि युद्ध इतिहास से जुड़ी प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि इस संबंध में रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। (Official Kargil War History)

ब्रिगेडियर सुरिंदर सिंह ने भी उठाया था मुद्दा

कारगिल युद्ध के दौरान 121 (इंडिपेंडेंट) इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान संभालने वाले ब्रिगेडियर सुरिंदर सिंह (सेवानिवृत्त) भी लंबे समय से आधिकारिक युद्ध इतिहास की आवश्यकता पर जोर दिया था। उन्होंने साल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की थी, जिसमें कारगिल युद्ध से जुड़े रिकॉर्ड की समीक्षा और तथ्यों को सही रूप में सामने लाने की मांग की गई थी। उन्होंने लिखा था कि कारगिल युद्ध से जुड़े रहे सैनिक और वरिष्ठ अधिकरियों का जीवनकाल रहते इस युद्ध का प्रमाणिक इतिहास लिख लिया जाना चाहिए।

क्यों जरूरी है युद्ध का इतिहास लेखन?

स्पेनिश-अमेरिकी दार्शनिक जॉर्ज सांतायना ने 1905 में अपनी पुस्तक द लाइफ ऑफ रीजन में लिखा था, “जो लोग इतिहास को याद नहीं रखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।”

युद्ध इतिहास के विशेषज्ञ इस कथन का अक्सर उल्लेख करते हैं। उनका मानना है कि युद्धों से मिलने वाले सबक केवल सैनिकों के लिए नहीं, बल्कि नीति निर्माताओं, सैन्य योजनाकारों और पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इससे भविष्य की सैन्य शिक्षा, प्रशिक्षण और शोध को दिशा मिलती है। (Official Kargil War History)

कारगिल से रक्षा मंत्री की पाकिस्तान को दो टूक, बोले- हर चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं भारतीय सेनाएं

Kargil Vijay Diwas 2026
Rajnath Singh Says Indian Defence Forces Are Fully Prepared to Face Any Challenge on Kargil Vijay Diwas 2026 (Image: PIB)

Kargil Vijay Diwas 2026: 27वें कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की सुरक्षा के सामने चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं, लेकिन भारतीय सेनाएं हर स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने कहा कि दुश्मन की नीयत में कोई बदलाव नहीं आया है। वह आज भी प्रॉक्सी वॉर, घुसपैठ और अन्य नापाक तरीकों का सहारा ले रहा है, लेकिन भारतीय सेनाओं का साहस, प्रशिक्षण और आधुनिक सैन्य क्षमता हर चुनौती का जवाब देने में सक्षम है।

द्रास में आयोजित कारगिल विजय दिवस समारोह में रक्षा मंत्री ने 1999 के कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भारतीय सैनिकों ने जिस साहस, दृढ़ संकल्प और देशभक्ति का परिचय दिया था, वह आज भी पूरे देश और सेना के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

Kargil Vijay Diwas 2026
Rajnath Singh Says Indian Defence Forces Are Fully Prepared to Face Any Challenge on Kargil Vijay Diwas 2026 (Image: PIB)

Kargil Vijay Diwas 2026: भारतीय सैनिकों की वजह से देश सुरक्षित

रक्षा मंत्री ने सैनिकों से बातचीत के दौरान कहा कि जब तक भारतीय सैनिकों का देशभक्ति का जज्बा और संकल्प अटूट रहेगा, तब तक कोई भी भारत की ओर बुरी नजर डालने का साहस नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि देश का हर नागरिक अपने सपनों को इसलिए निडर होकर पूरा कर पाता है क्योंकि सीमाओं पर सैनिक पूरी निष्ठा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

उन्होंने सैनिकों के साथ आयोजित ‘बड़ाखाना’ कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया और कहा कि कारगिल विजय पर गर्व करना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि देश के सामने सुरक्षा चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं।

सेना के आधुनिकीकरण पर सरकार का जोर

रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार सैनिकों के कल्याण के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र के आधुनिकीकरण पर लगातार काम कर रही है। उन्होंने बताया कि सेना को विश्वस्तरीय हथियार, आधुनिक सैन्य उपकरण और बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसी भी परिस्थिति में भारतीय सेनाओं की क्षमता मजबूत बनी रहे।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सेनाओं ने नई तकनीकों को तेजी से अपनाया है। आधुनिक युद्ध में ड्रोन, रोबोटिक सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीक और एडवांस सर्विलांस सिस्टम की भूमिका लगातार बढ़ रही है। भारतीय सेनाएं इन नई तकनीकों को अपने अभियानों में शामिल कर रही हैं।

Kargil Vijay Diwas 2026
Rajnath Singh Says Indian Defence Forces Are Fully Prepared to Face Any Challenge on Kargil Vijay Diwas 2026 (Image: PIB)

आत्मनिर्भर भारत से बढ़ी रक्षा क्षमता

राजनाथ सिंह ने कहा कि रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। देश में रक्षा उपकरणों के स्वदेशी निर्माण पर विशेष जोर दिया जा रहा है। उनका कहना था कि भारत जिस गति से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उससे भारतीय सेनाओं की क्षमता लगातार मजबूत हो रही है।

उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों की वीरता केवल देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सम्मान के साथ देखी जाती है।

शौर्य भोज में दिखी आधुनिक सैन्य तकनीक

कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर द्रास स्थित विश्वनाथन स्टेडियम में आयोजित ‘शौर्य भोज’ कार्यक्रम में आधुनिक सैन्य तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया।

कार्यक्रम में सेना द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ड्रोन, रोबोटिक म्यूल और आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन का प्रदर्शन किया गया। रोबोटिक म्यूल ऐसे ऑटोमैटेड प्लेटफॉर्म हैं जो दुर्गम पहाड़ी इलाकों में सैनिकों का सामान, हथियार और अन्य आवश्यक सामग्री ढोने में मदद करते हैं। वहीं ड्रोन आधुनिक युद्ध में निगरानी, टोही और वास्तविक समय में जानकारी जुटाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

कार्यक्रम में लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने वाली प्रस्तुतियां भी हुईं। इसके बाद रक्षा मंत्री ने लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना, थल सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ, उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिकों, वीर नारियों, शौर्य पुरस्कार विजेताओं और शहीदों के परिजनों के साथ शौर्य भोज में हिस्सा लिया।

शौर्य संध्या में दी वीरों को श्रद्धांजलि

इससे पहले कारगिल युद्ध स्मारक पर आयोजित ‘शौर्य संध्या’ कार्यक्रम में देशभक्ति से जुड़े संगीत के बीच ऑपरेशन विजय के वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी गई।

समारोह में कारगिल युद्ध के 10 शहीदों के परिजनों को सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल सैनिकों के साहस का नहीं, बल्कि उनके परिवारों के धैर्य, त्याग और योगदान का भी प्रतीक था।

कार्यक्रम के दौरान रक्षा मंत्री को ‘वीरों की मिट्टी’ से भरा एक कलश भी भेंट किया गया। इसके बाद विभिन्न धर्मों के धार्मिक गुरुओं ने सर्वधर्म प्रार्थना की। ‘बीटिंग रिट्रीट’ समारोह और राष्ट्रगान के बाद रक्षा मंत्री ने युद्ध स्मारक पर दीप प्रज्वलित कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

Kargil Vijay Diwas 2026
Rajnath Singh Says Indian Defence Forces Are Fully Prepared to Face Any Challenge on Kargil Vijay Diwas 2026 (Image: PIB)

युद्ध संस्मरण कार्यक्रम में याद किए गए कारगिल के नायक

कारगिल विजय दिवस के कार्यक्रमों की शुरुआत द्रास के लामोचन व्यू प्वाइंट पर आयोजित ‘युद्ध संस्मरण’ कार्यक्रम से हुई।

इस कार्यक्रम में कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक, शहीदों के परिजन और कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। समारोह के दौरान एक विशेष फिल्म और वीडियो दिखाया गया, जिसमें ऑपरेशन विजय के 40 वीर सैनिकों की बहादुरी और शौर्य गाथा को प्रस्तुत किया गया।

इसके बाद शहीदों के परिजनों को सम्मानित किया गया। कई परिवारों ने मंच से अपने प्रियजनों की यादें साझा कीं, जिससे पूरा माहौल भावुक हो गया।

देशभक्ति और सैन्य अनुशासन की झलक

विश्वनाथन स्टेडियम में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंटल सेंटर बैंड की देशभक्ति धुनों से हुई। इसके बाद कॉर्प्स ऑफ मिलिट्री पुलिस सेंटर एंड स्कूल की ‘श्वेत अश्व’ मोटरसाइकिल टीम ने शानदार प्रदर्शन किया। सैनिकों ने सटीक संतुलन, अनुशासन और पेशेवर कौशल का प्रदर्शन किया।

स्कूल के विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय एकता पर आधारित सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किया। साथ ही भारतीय सेना द्वारा ऊंचाई वाले और कठिन इलाकों में आधुनिक तकनीकों के उपयोग की भी झलक दिखाई गई।

ऑपरेशन विजय के 545 वीरों को राष्ट्र का नमन

कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच नियंत्रण रेखा पर लड़ा गया था। भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत द्रास, कारगिल, बटालिक, मुश्कोह और काक्सर सेक्टर की रणनीतिक चोटियों से पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को पीछे हटाया था।

इस युद्ध में भारत के 545 वीरों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। इनमें भारतीय सेना के 537 जवान, भारतीय वायुसेना के 5 कर्मी, सीमा सुरक्षा बल का 1 जवान और 2 नागरिक शामिल थे। इन वीरों के बलिदान से भारत ने रणनीतिक चोटियों पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया और देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा की।

26 जुलाई को आयोजित ‘श्रद्धांजलि समारोह’ में राष्ट्र की ओर से ऑपरेशन विजय के सभी वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। यह आयोजन उन सैनिकों के अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान की स्मृति को समर्पित है, जिन्होंने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर तिरंगा फिर से फहराने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। (Kargil Vijay Diwas 2026)

नए सेना प्रमुख ने आर्मी चीफ लाउंज से हटवाई ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग, ऐतिहासिक 1971 वॉर सरेंडर पेंटिंग हटाने पर हुआ था विवाद

Army chief Karm Kshetra Painting
Source: Indian Army

Army Chief Karm Kshetra Painting: भारतीय सेना के नए प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने कार्यभार संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर सेना मुख्यालय के साउथ ब्लॉक स्थित आर्मी चीफ लाउंज में लगी ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग को हटाने का फैसला किया है। इसकी जगह अब लाउंज को नए स्वरूप में तैयार किया जा रहा है। यह वही पेंटिंग थी, जिसे पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के कार्यकाल में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण की ऐतिहासिक पेंटिंग हटाकर लगाया गया था। उस समय इस बदलाव को लेकर पूर्व सैन्य अधिकारियों, रक्षा विशेषज्ञों और सोशल मीडिया पर लंबी बहस छिड़ गई थी।

Army Chief Karm Kshetra Painting: सेना प्रमुख के वीडियो से हुआ खुलासा

‘कर्म क्षेत्र‘ पेंटिंग को सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने बनाई था। जनरल धीरज सेठ ने इसी महीने सेना प्रमुख का पद संभाला है और उनके कार्यभार ग्रहण करने के बाद लाउंज में यह बदलाव किया गया।

आज जब सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने जब 135वें डूरंड कप को लेकर एक वीडियो जारी किया तो उसमें बैकग्राउंड लगी ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग नदारद नजर आई। सूत्रों का कहना है कि यह बदलाव हाल ही में उनके पदभार संभालने के बाद किया गया है।

1971 की ऐतिहासिक पेंटिंग हटने पर उठा था विवाद

यह विवाद दिसंबर 2024 में शुरू हुआ था, जब साउथ ब्लॉक के आर्मी चीफ लाउंज से 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण को दर्शाने वाली प्रसिद्ध पेंटिंग हटाकर उसकी जगह ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग लगा दी गई थी। 1971 की पेंटिंग भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में से एक का प्रतीक मानी जाती है। इसी युद्ध के दौरान ढाका में पाकिस्तान के लगभग 93 हजार सैनिकों ने भारतीय सेना और संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण किया था।

Army chief Karm Kshetra Painting
Source: Indian Army

पेंटिंग हटने की खबर सामने आने के बाद कई सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि भारतीय सेना की सबसे बड़ी ऐतिहासिक जीत को दर्शाने वाली पेंटिंग को आर्मी चीफ लाउंज से हटाना उचित नहीं था। विवाद बढ़ने के बाद 1971 की पेंटिंग को मानेकशॉ सेंटर में प्रमुख स्थान पर स्थापित किया गया।

पूर्व सेना प्रमुख ने किया था फैसले का बचाव

विवाद बढ़ने पर जनवरी 2025 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस फैसले पर सफाई दी थी। उन्होंने कहा था कि 1971 की पेंटिंग का महत्व कम नहीं किया गया है। इसे मानेकशॉ सेंटर में 16 दिसंबर, यानी विजय दिवस के दिन स्थापित किया गया था, जिसे उन्होंने शुभ तिथि बताया था।

उन्होंने यह भी कहा था कि सेना के दो चीफ लाउंज हैं। एक साउथ ब्लॉक में और दूसरा मानेकशॉ सेंटर में। उनके अनुसार, साउथ ब्लॉक स्थित लाउंज में नई पेंटिंग भारतीय सेना के अतीत, वर्तमान और भविष्य की सोच को दर्शाने के उद्देश्य से लगाई गई थी, जबकि 1971 की ऐतिहासिक पेंटिंग को सम्मानजनक स्थान दिया गया।

1971 Surrender Painting Row: Army Chief Breaks Silence, Calls Date 'Auspicious'
मानेक शॉ सेंटर में नई जगह पर पेंटिंग

‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग में क्या दिखाया गया था

लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब द्वारा बनाई गई ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग भारतीय सेना को केवल सीमा की रक्षा करने वाली सेना के रूप में नहीं, बल्कि धर्म, न्याय और राष्ट्रीय मूल्यों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती थी। पेंटिंग में भगवान श्रीकृष्ण का रथ, आचार्य चाणक्य, पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग झील, बर्फ से ढके पहाड़, आधुनिक टैंक, इन्फैंट्री लड़ाकू वाहन, पेट्रोल बोट, स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर और एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर जैसे कई सैन्य प्रतीकों को एक साथ दिखाया गया था।

Army chief Karm Kshetra Painting
Karm Kshetra Painting

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने उस समय कहा था कि यह पेंटिंग भारतीय सैन्य परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक सैन्य क्षमता के बीच संबंध को दर्शाती है। उन्होंने चाणक्य और श्रीकृष्ण के चित्रण का भी बचाव किया था और कहा था कि भारतीय सैन्य सोच को अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। (Army Chief Karm Kshetra Painting)

नौसेना के इंडिजिनाइजेशन मॉडल से सीखे वायुसेना, एयर चीफ मार्शल एपी सिंह की बड़ी सलाह; INS मैंगरोल भी जल्द होगा शामिल

INS Malvan Commissioned IAF Chief Air Chief Marshal AP Singh at Karwar
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

INS Malvan Commissioned: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा है कि भारतीय वायुसेना को स्वदेशीकरण के मामले में भारतीय नौसेना के मॉडल से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नौसेना ने जहाज निर्माण परियोजनाओं में शुरुआत से ही अपने अधिकारियों को शिपयार्ड के साथ जोड़कर एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसने आज भारत को 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी युद्धपोत बनाने की क्षमता दी है। वायुसेना को भी यही मॉडल अपनाना होगा, ताकि विमानन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता तेजी से हासिल की जा सके।

वेस्टर्न नेवल कमांड के तहत आने वाले भारतीय नौसेना के बेहद स्ट्रेटेजिक नौसैनिक अड्डे कारवार के आईएनएस कदंबा पर माहे क्लास के दूसरे एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) आईएनएस मालवन के कमीशनिंग समारोह में एयर चीफ मार्शल ने कहा कि नौसेना ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बहुत पहले अपना लिया था। अब इसका परिणाम साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि डिफेंस प्रोडक्शन में देरी का मतलब कई बार तकनीक से पीछे रह जाना होता है।

INS Malvan Commissioned: नौसेना के मॉडल से सीखने की जरूरत

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि भारतीय नौसेना की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसके अधिकारी किसी जहाज के निर्माण की शुरुआत से ही शिपयार्ड के साथ जुड़े रहते हैं। वे डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और कमीशनिंग तक पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। यही अधिकारी बाद में वरिष्ठ पदों तक पहुंचते हैं और रिटायर होने के बाद भी अपने अनुभव से शिपयार्ड की मदद करते हैं।

उन्होंने कहा कि विमान निर्माण के क्षेत्र में भी इसी तरह की व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। इससे स्वदेशी विमान और डिफेंस सिस्टम्स के विकास की गति तेज होगी और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य जल्दी हासिल किया जा सकेगा।

तकनीक में देरी का मतलब तकनीक से वंचित होना

एयर चीफ मार्शल ने कहा कि केवल स्वदेशी तकनीक विकसित करना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे समय पर तैयार करना भी उतना ही जरूरी है।

उन्होंने कहा, “अगर किसी तकनीक को विकसित करते-करते दुनिया उससे आगे निकल जाए तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। मेरे हिसाब से तकनीक में देरी का मतलब तकनीक से वंचित रह जाना है।”

उन्होंने कहा कि अनुसंधान, विकास और उत्पादन को उसी गति से आगे बढ़ाना होगा, जिस गति से दुनिया में नई तकनीक विकसित हो रही है। (INS Malvan Commissioned)

2026 में सातवां युद्धपोत, अभी 12 और आने बाकी

एयर चीफ मार्शल ने कहा कि यह भारतीय नौसेना का साल 2026 में शामिल होने वाला यह सातवां युद्धपोत है। उन्होंने खुशी जताई कि नौसेना लगातार अपनी ताकत बढ़ा रही है और आने वाले समय में 12 और युद्धपोत नौसेना में शामिल किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि आईएनएस मालवन में करीब 80 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ी उपलब्धि है। (INS Malvan Commissioned)

कारवार बना आधुनिक नौसैनिक शक्ति का केंद्र

एयर चीफ मार्शल ने प्रोजेक्ट सीबर्ड के तहत विकसित करवार नौसैनिक अड्डे की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि करवार आज दुनिया के सबसे आधुनिक नौसैनिक अड्डों में शामिल है। यहां विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचा और अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं इस अड्डे का दौरा किया है और यहां उपलब्ध सुविधाएं किसी भी विकसित नौसैनिक अड्डे से कम नहीं हैं।

भविष्य के युद्ध तीनों सेनाएं मिलकर लड़ेंगी

उन्होंने कहा कि भविष्य का कोई भी युद्ध केवल एक सेना नहीं लड़ेगी। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को एक संयुक्त बल के रूप में काम करना होगा। उन्होंने कहा कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की व्यवस्था बनने के बाद तीनों सेनाओं के बीच जॉइंटनेस लगातार बढ़ी है और भविष्य में यह सहयोग और मजबूत होगा।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख करते हुए कहा कि हाल के अभियानों ने यह दिखा दिया है कि संयुक्त अभियान ही भविष्य का रास्ता हैं। (INS Malvan Commissioned)

आईएनएस मालवन सिर्फ युद्धपोत नहीं, एक विरासत

एयर चीफ मार्शल ने आईएनएस मालवन के कमांडिंग ऑफिसर और चालक दल को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें केवल एक आधुनिक युद्धपोत नहीं मिला है, बल्कि भारतीय नौसेना की गौरवशाली परंपरा भी सौंपी गई है।

उन्होंने कहा कि किसी भी युद्धपोत की असली ताकत केवल उसकी तकनीक नहीं होती, बल्कि उसे चलाने वाले अधिकारियों और नाविकों का नेतृत्व, प्रशिक्षण, टीमवर्क और पेशेवर क्षमता होती है।

भारतीय नौसेना के लिए ऐतिहासिक दिन

समारोह को संबोधित करते हुए फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वेस्टर्न नेवल कमांड वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने कहा कि आईएनएस मालवन का कमीशन होना भारतीय नौसेना के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक है।

उन्होंने बताया कि यह आठ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट की सीरीज का दूसरा युद्धपोत है, जिसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड कर रहा है।

वाइस एडमिरल वात्सायन ने बताया कि आईएनएस मालवन कारवार नौसैनिक अड्डे पर कमीशन होने वाला पहला भारतीय नौसैनिक युद्धपोत भी बन गया है।

उन्होंने कहा कि यह जहाज महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तटीय शहर मालवन के नाम पर रखा गया है, जिसका संबंध छत्रपति शिवाजी महाराज की समुद्री विरासत से जुड़ा है। यह नाम 1983 से 2003 तक सेवा देने वाले पुराने आईएनएस मालवन की विरासत को भी आगे बढ़ाता है।

उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है और भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा, सुरक्षित नौवहन, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। (INS Malvan Commissioned)

आईएनएस मैंगरोल भी कमीशनिंग के लिए तैयार

आईएनएस मालवन के कमीशनिंग समारोह में कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक जोस विजयन ने कहा कि एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहा है। आईएनएस मालवन के बाद इसी सीरीज का तीसरा युद्धपोत ‘मैंगरोल’ भी तैयार है और जल्द भारतीय नौसेना को सौंप दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस श्रृंखला के बाकी सभी युद्धपोत भी निर्माण के अंतिम चरण में हैं और उन्हें एक के बाद एक नौसेना को सौंपा जाएगा।

पांच दशक की यात्रा का बड़ा पड़ाव

जोस विजयन ने कहा कि पिछले 50 सालों में कोचीन शिपयार्ड ने भारत के जहाज निर्माण और जहाज मरम्मत क्षेत्र की मजबूत नींव तैयार की है। देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से लेकर आधुनिक युद्धपोतों तक के निर्माण में शिपयार्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि आज कोचीन शिपयार्ड एशिया के सबसे आधुनिक समुद्री औद्योगिक ढांचों में से एक के साथ काम कर रहा है और भारत में समुद्री क्षेत्र के तेजी से बढ़ते विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

उन्होंने बताया कि इन जहाजों के डिजाइन से लेकर स्टील और अधिकांश उपकरण भारत में ही तैयार किए गए हैं। युद्धपोत में लगभग 80 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।

निर्माण के दौरान आईं कई तकनीकी चुनौतियां

जोस विजयन ने बताया कि लगभग 78 मीटर लंबे इन युद्धपोतों का निर्माण आसान नहीं था। हालांकि आकार के हिसाब से यह कोचीन शिपयार्ड का सबसे बड़ा या सबसे जटिल जहाज नहीं है, लेकिन निर्माण के दौरान कई तकनीकी और उत्पादन संबंधी चुनौतियां सामने आईं।

उन्होंने कहा कि पहले दो जहाजों के निर्माण से जो अनुभव मिला है, उसके बाद अब इन चुनौतियों का समाधान कर लिया गया है। इसका फायदा बाकी जहाजों के निर्माण में मिलेगा और उनकी डिलीवरी पहले की तुलना में अधिक तेजी से हो सकेगी। (INS Malvan Commissioned)

पूरी सर्विस लाइफ में मिलेगा तकनीकी सहयोग

जोस विजयन ने कहा कि कोचीन शिपयार्ड केवल युद्धपोत बनाकर नौसेना को सौंपने तक ही अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानता। जहाज के पूरे सेवा काल में रखरखाव, तकनीकी सहायता और भविष्य में होने वाले रिफिट कार्यों के दौरान भी शिपयार्ड भारतीय नौसेना को पूरा सहयोग देता रहेगा।

उन्होंने भरोसा जताया कि आईएनएस मालवन भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमता को और मजबूत करेगा तथा उसका चालक दल देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा में नई उपलब्धियां हासिल करेगा। (INS Malvan Commissioned)

आईएनएस मालवन: समुद्र के भीतर दुश्मन पनडुब्बियों का शिकारी

आईएनएस मालवन भारतीय नौसेना की नई पीढ़ी का एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) है, जिसे उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए विशेष रूप से विकसित किया गया है।

करीब 78 मीटर लंबे इस युद्धपोत में अत्याधुनिक सोनार, निगरानी प्रणाली और पनडुब्बी रोधी हथियार लगाए गए हैं, जिससे यह तटीय क्षेत्रों में प्रभावी समुद्री सुरक्षा प्रदान कर सकता है। इसके अलावा यह माइंस बिछाने, सर्च एंड रेस्क्यू, लो-इंटेंसिटी मैरिटाइम ऑपरेशन और समुद्री निगरानी जैसे कई अभियानों को भी अंजाम देने में सक्षम है। जहाज का नाम महाराष्ट्र के ऐतिहासिक तटीय शहर मालवन के नाम पर रखा गया है, जो छत्रपति शिवाजी महाराज की समृद्ध समुद्री विरासत से जुड़ा है। यह नाम 1983 से 2003 तक भारतीय नौसेना में सेवा देने वाले पुराने आईएनएस मालवन की विरासत को भी आगे बढ़ाता है। आईएनएस मालवन के शामिल होने से भारतीय नौसेना की तटीय रक्षा और पनडुब्बी रोधी क्षमता को नई मजबूती मिलेगी। (INS Malvan Commissioned)

क्या है आईएनएस मैंगरोल 

आईएनएस मैंगरोल भारतीय नौसेना की माहे क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) सीरीज का तीसरा युद्धपोत है। इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) ने किया है। इस जहाज को 30 नवंबर 2023 को आईएनएस माहे और आईएनएस मालवन के साथ लॉन्च किया गया था। फिलहाल यह डिलीवरी की प्रक्रिया में है और जल्द ही भारतीय नौसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है। जहाज का नाम गुजरात के तटीय शहर मैंगरोल के नाम पर रखा गया है, जो भारत की समुद्री विरासत और तटीय पहचान को दर्शाता है।

करीब 78 मीटर लंबे और लगभग 900 से 1,100 टन वजनी इस युद्धपोत को विशेष रूप से उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी टॉप स्पीड 25 नॉट्स है।

आईएनएस मैंगरोल में डीआरडीओ द्वारा विकसित ‘अभय’ हल-माउंटेड सोनार के साथ लो फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार लगाया गया है, जो उथले पानी में भी पनडुब्बियों का प्रभावी ढंग से पता लगाने में सक्षम है। हथियारों के रूप में इसमें हल्के टॉरपीडो, आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, 30 मिमी मुख्य गन और 12.7 मिमी रिमोट कंट्रोल्ड गन लगाई गई हैं। इसके अलावा यह माइन लेइंग यानी समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने की क्षमता भी रखता है।

माहे क्लास के ये युद्धपोत भारतीय नौसेना के पुराने अभय क्लास कोरवेट की जगह ले रहे हैं। इनके शामिल होने से तटीय क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी निगरानी और समुद्री सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी। साथ ही बड़े फ्रिगेट और डेस्ट्रॉयर जैसे प्रमुख युद्धपोतों को गहरे समुद्र में रणनीतिक अभियानों के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जा सकेगा। (INS Malvan Commissioned)

कारगिल का वो सच जिसे आज भी भूलना चाहता है पाकिस्तान, भारतीय सेना ने निभाई मानवता की मिसाल

Kargil War Pakistani Soldiers Buried
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Kargil War Pakistani Soldiers Buried: कारगिल युद्ध की चर्चा जब भी होती है तो सबसे पहले भारतीय सेना के युवा अधिकारी कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों के साथ हुई अमानवीय यातना का जिक्र भी जरूर आता है। मई 1999 में पाकिस्तानी सेना की कैद में जाने के बाद कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों के शव जिस हालत में भारत को लौटाए गए, उसने पूरे देश को झकझोर दिया था। उनके शरीर पर यातना के कई निशान थे। भारत ने उस समय इसे जिनेवा समझौते के तहत युद्ध के नियमों का गंभीर उल्लंघन बताया।

वहीं, दूसरी तरफ भारतीय सेना थी, जिस समय पाकिस्तान अपने कई सैनिकों के शव लेने से इनकार कर रहा था, तो उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों को पूरे सैन्य सम्मान और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया। भारतीय सेना ने जिम्मेदारी निभाते हुए बाद में उन्हीं शवों को दुर्गम पहाड़ियों से निकालकर पाकिस्तान को सौंपने के लिए भी भारतीय सैनिकों ने अपनी जान जोखिम में डाली। लगभग 249 पाकिस्तानी सैनिकों के शव भारतीय सेना ने बरामद किए थे।

Kargil War Pakistani Soldiers Buried: पाकिस्तान ने पहले सैनिकों की मौजूदगी से ही किया इनकार

कारगिल युद्ध मई 1999 में शुरू हुआ था। पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पार कर कारगिल, द्रास, बटालिक, टोलोलिंग, चोरबाट ला और आसपास की कई ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था। शुरुआत में पाकिस्तान ने का दावा किया था कि इन इलाकों में उसकी सेना नहीं, बल्कि “कश्मीरी मुजाहिदीन” लड़ रहे हैं। इसके लिए पकिस्तानी सेना ने जानबूझ कर उनकी बातचीत भारत को इंटरसेप्ट करवाई, ताकि भारतीय सेना को यह भरोसा दिया जा सके कि वे घुसपैठिये मुजाहिद हैं।

लेकिन भारतीय सेना को युद्ध के दौरान जिन लोगों के शव मिले, उनके पास से पाकिस्तानी सेना के पहचान पत्र, यूनिट के दस्तावेज, हथियार और सैन्य सामग्री मिली। इससे साफ हो गया कि लड़ाई में पाकिस्तान की नियमित सेना, खासकर नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) की कई बटालियन सीधे शामिल थीं।

इसके बावजूद पाकिस्तान ने लंबे समय तक अपने कई सैनिकों के शव लेने से इनकार किया। क्योंकि ऐसा करने से पाकिस्तान की आधिकारिक कहानी कमजोर पड़ जाती कि कारगिल में केवल घुसपैठिए लड़ रहे थे।

भारतीय सेना ने निभाई सैन्य परंपरा

भारतीय सेना ने युद्ध के दौरान मिले पाकिस्तानी सैनिकों के शवों के साथ वही व्यवहार किया, जो अंतरराष्ट्रीय सैन्य परंपराओं और जिनेवा कन्वेंशन की भावना के अनुरूप माना जाता है।

पहले सैनिकों की पहचान से जुड़े दस्तावेज, पहचान पत्र और व्यक्तिगत सामान सुरक्षित किए गए। इसके बाद मुस्लिम धार्मिक परंपरा का सम्मान करते हुए जनाजा पढ़वाया गया और शवों को दफनाया गया। जहां संभव हुआ, वहां कब्रों पर पहचान से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की गई ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर शवों की पहचान की जा सके।

युद्ध के दौरान भारतीय सेना की इस कार्रवाई का कई विदेशी मीडिया संस्थानों और सैन्य लेखकों ने भी उल्लेख किया।

बटालिक सेक्टर में भी दफन किए गए पाकिस्तानी सैनिक

कारगिल युद्ध की सबसे कठिन लड़ाइयों में से कई बटालिक सेक्टर में हुई थीं। यहां खालूबार रिज, जुबार, कुकरथांग, गनासोक, यालडोर घाटी और पॉइंट 5203 जैसी ऊंचाइयों पर भारतीय सेना ने भीषण संघर्ष के बाद कब्जा वापस लिया।

यह बेहद कम लोगों को पता है कि बटालिक में भी पाकिस्तानी सैनिकों को दफनाया गया था। दरअसल द्रास औऱ कारगिल में मीडिया की भारी मौजूदगी थी, लेकिन बटालिक में उस दौरान कोई मीडिया से वहां शायद ही पहुंचा, जिसके चलते वहां की वीरता की कहानियां लोगों को कम पता चलीं।

बटालिक में भारतीय सैनिकों को कई पाकिस्तानी सैनिकों के शव मिले। कई शव ऐसी जगहों पर थे जहां हेलीकॉप्टर भी नहीं पहुंच सकते थे। ऊंची चट्टानों और बर्फ से ढके इलाकों के कारण शवों को नीचे लाना बेहद कठिन था।

कारगिल युद्ध के बाद भी बटालिक, गनासोक, यालडोर, खालूबर और आसपास के क्षेत्रों में दफन किए गए कई पाकिस्तानी सैनिकों का उल्लेख विभिन्न सैन्य पुस्तकों और पूर्व अधिकारियों के संस्मरणों में मिलता है। इनमें कैप्टन फरहत हसीब हैदर, मेजर अब्दुल वहाब और कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन जैसे अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं। हालांकि सुरक्षा कारणों से इन कब्रों की सटीक लोकेशन कभी सार्वजनिक नहीं की गई।

द्रास और टाइगर हिल में भी दफनाए थे पाकिस्तानी सैनिक

केवल बटालिक ही नहीं, बल्कि द्रास, टोलोलिंग और टाइगर हिल की लड़ाइयों के बाद भी भारतीय सेना को बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों के शव मिले थे।

युद्ध समाप्त होने के बाद कुछ शव दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक माध्यमों से लौटाए गए, लेकिन कई सैनिक ऐसे भी रहे जिनके शव लेने पाकिस्तान की ओर से कोई आधिकारिक प्रयास नहीं किया गया। ऐसे सैनिकों को भारतीय सेना ने युद्ध क्षेत्र में ही दफनाया।

कारगिल युद्ध पर लिखी कई पुस्तकों और सैन्य संस्मरणों में इन घटनाओं का उल्लेख मिलता है। तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने अपनी पुस्तक “कारगिल: फ्रॉम सरप्राइज टू विक्ट्री” में युद्ध के दौरान अपनाई गई सैन्य प्रक्रियाओं का विस्तार से वर्णन किया है।

इसी तरह ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा ने अपनी पुस्तक “कारगिल: द इनसाइड स्टोरी” में कई ऐसे मामलों का जिक्र किया है, जब भारतीय सेना ने दुश्मन सैनिकों के शवों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया।

युद्ध में शामिल कई वरिष्ठ अधिकारियों ने बाद में दिए गए साक्षात्कारों में भी स्वीकार किया कि भारतीय सेना ने हर स्तर पर सैन्य परंपराओं का पालन किया।

पाकिस्तान ने अपने कई अधिकारियों के शव भी नहीं लिए

पूर्व पाकिस्तानी सेना अधिकारी मेजर इमरान, जो बाद में समय से पहले सेना छोड़कर कनाडा में रहने लगे, उन्होंने अपनी रिसर्च शोध में ऐसे कई पाकिस्तानी अधिकारियों का उल्लेख किया है जिनके शव कभी पाकिस्तान वापस नहीं ले जा सका।

इनमें कैप्टन फरहत हसीब हैदर, मेजर अब्दुल वहाब और कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन जैसे अधिकारी शामिल हैं। इनके बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार ये सभी कारगिल युद्ध के दौरान अलग-अलग मोर्चों पर मारे गए थे, लेकिन उनके शव लंबे समय तक भारतीय क्षेत्र में ही रहे।

इन अधिकारियों को पाकिस्तान ने बाद में वीरता पुरस्कार जरूर दिए, लेकिन उनके शवों को वापस लाने का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड लंबे समय तक सामने नहीं आया।

रेडियो पर हुई दो कमांडरों की बातचीत

192 माउंटेन ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा ने बाद में एक घटना का विस्तार से जिक्र किया। उनके अनुसार, 27 जुलाई 1999 के आसपास पाकिस्तान की फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की 19वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मुस्तफा ने भारतीय सेना से सीधे रेडियो संपर्क किया।

मुस्तफा ने सबसे पहले कहा कि विभाजन से पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भी फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट का हिस्सा रह चुके थे। इसके बाद उन्होंने भारतीय अधिकारियों से कहा कि उनके सैनिक बहादुरी से लड़े हैं, लेकिन अब उनकी पलटन के कई जवान मारे गए हैं।

उन्होंने भारतीय सेना से अनुरोध किया कि शव उन्हें लौटा दिए जाएं ताकि वह अपने सैनिकों को सम्मान के साथ दफना सकें। उन्होंने इसे अपनी पलटन की ‘इज्जत’ का सवाल बताया।

भारतीय कमांडर ने भी रखी शर्त

ब्रिगेडियर बाजवा ने तुरंत सहमति नहीं दी। उन्होंने पाकिस्तानी अधिकारी से कहा कि यदि शव लौटाए जाएंगे तो बदले में क्या होगा।

जवाब में लेफ्टिनेंट कर्नल मुस्तफा ने कहा कि यदि शव लौटा दिए गए तो उनकी बची हुई टुकड़ी नियंत्रण रेखा के उस पार वापस चली जाएगी और उस इलाके में आगे लड़ाई नहीं होगी।

ब्रिगेडियर बाजवा ने बाद में बताया कि उन्होंने मुस्तफा से पूछा कि क्या वह अपने शब्द पर कायम रहेंगे। इस पर पाकिस्तानी अधिकारी ने जवाब दिया, “मैं पठान हूं।”

ब्रिगेडियर बाजवा ने कहा कि वह भी अपने वादे पर कायम रहेंगे और शव सौंप दिए जाएंगे।

सफेद झंडे के साथ पहुंचे पाकिस्तानी सैनिक

भारतीय सेना ने शव सौंपने के लिए स्पष्ट नियम बनाए। ब्रिगेडियर बाजवा ने कहा कि पाकिस्तानी सैनिकों को सफेद झंडा, स्ट्रेचर और पूरी सैन्य मर्यादा के साथ आना होगा।

उन्होंने यह भी साफ किया कि शवों को किसी बोरे या असम्मानजनक तरीके से नहीं ले जाया जाएगा। हर शव को सम्मान के साथ स्ट्रेचर पर रखा जाएगा।

निर्धारित समय पर पाकिस्तानी सैनिक सफेद झंडे के साथ पहुंचे और भारतीय सेना ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ शव उनके हवाले कर दिए। इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई।

बाद में यही वीडियो इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण बना कि कारगिल युद्ध में पाकिस्तान की नियमित सेना लड़ रही थी, जबकि उस समय पाकिस्तान लगातार कह रहा था कि केवल घुसपैठिए या तथाकथित मुजाहिदीन शामिल हैं।

टाइगर हिल: बहादुरी के दो सर्वोच्च सम्मानों की बनी गवाह

कारगिल युद्ध 1999 में टाइगर हिल सबसे अहम और सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक थी। इस ऊंची चोटी पर पाकिस्तान का कब्जा था। इसे वापस लेने के लिए भारतीय सेना की 18 ग्रेनेडियर्स ने 3 और 4 जुलाई 1999 की रात बड़ा हमला किया। भारी गोलाबारी, खड़ी चट्टानों और बेहद कठिन मौसम के बीच भारतीय सैनिकों ने चोटी पर कब्जा कर लिया।

यह लड़ाई इसलिए भी खास मानी जाती है क्योंकि इसमें दोनों देशों के सैनिकों को उनकी बहादुरी के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार मिले।

भारतीय सेना के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने खड़ी चट्टान पर चढ़ते हुए दुश्मन के बंकरों तक पहुंचने का रास्ता बनाया। इस दौरान उन्हें तीन गोलियां लगीं, लेकिन उन्होंने लड़ाई नहीं छोड़ी। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परम वीर चक्र दिया गया।

दूसरी ओर, पाकिस्तान की 12 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के कैप्टन कर्नल शेर खान भी टाइगर हिल पर अंत तक लड़ते रहे और युद्ध में मारे गए। भारतीय सेना ने उनका शव बरामद कर पूरे सम्मान के साथ पाकिस्तान को सौंपा। बाद में पाकिस्तान ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत अपना सर्वोच्च वीरता पुरस्कार निशान-ए-हैदर प्रदान किया।

टाइगर हिल की जीत कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। इस लड़ाई ने दोनों देशों के सैनिकों के साहस, कर्तव्य और बलिदान की मिसाल पेश की, जिसे आज भी कारगिल युद्ध के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।

टाइगर हिल पर भी भारतीय सेना ने निभाई जिम्मेदारी

टाइगर हिल की लड़ाई में पाकिस्तान के कैप्टन कर्नल शेर खान और कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन भी मारे गए थे। दोनों ने भारतीय सेना की 8 सिख बटालियन के खिलाफ जवाबी हमला किया था।

लड़ाई खत्म होने के बाद भारतीय सेना ने कैप्टन शेर खान की बहादुरी को भी स्वीकार किया। ब्रिगेडियर बाजवा ने उनके शव को सम्मानपूर्वक नीचे लाने का आदेश दिया और पाकिस्तान को भेजते समय उनके साहस का उल्लेख करते हुए उनकी शर्ट की जेब में एक पर्ची भी रखी थी।

बाद में पाकिस्तान ने कैप्टन कर्नल शेर खान को अपना सर्वोच्च वीरता पुरस्कार निशान-ए-हैदर प्रदान किया।

इसके विपरीत, उपलब्ध सैन्य विवरणों के अनुसार कैप्टन मुहम्मद अम्मार हुसैन का शव लंबे समय तक वहीं युद्ध क्षेत्र में रहा और उसे पाकिस्तान तत्काल वापस नहीं ले सका।

कैप्टन तैमूर मलिक की कहानी बनी मानवता की मिसाल

कारगिल युद्ध की दिल झकझोर देने वाली घटनाओं में कैप्टन मीर तैमूर मलिक की कहानी भी शामिल है। वह पाकिस्तान सेना की 38 ए.के./पैरा ब्रिगेड से जुड़े थे और पॉइंट 5770 पर तैनात थे।

27 जून 1999 को भारतीय सेना की 27 राजपूत बटालियन ने लगभग 18,930 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पोस्ट पर हमला किया। मेजर नवदीप एस. चीमा, कैप्टन श्यामल सिन्हा, हवलदार जोगिंदर सिंह और लद्दाख स्काउट्स के जवानों ने लगभग सीधी बर्फीली चट्टान पर चढ़ाई कर यह ऑपरेशन पूरा किया।

भीषण लड़ाई में कैप्टन तैमूर मलिक और उनके छह सैनिक मारे गए। पाकिस्तान ने उस समय उनके शव लेने से इनकार कर दिया। भारतीय सैनिकों ने ऊंची चट्टान पर ही अस्थायी कब्र बनाकर उन्हें पूरे सम्मान के साथ दफनाया।

दादी की अपील पर फिर निकाले गए शव

युद्ध समाप्त होने के बाद कैप्टन तैमूर मलिक की दादी जोहरा अपने पोते का शव वापस लाने के लिए लगातार प्रयास करती रहीं। उनका परिवार ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर सुधीर शर्मा के संपर्क में आया।

ब्रिगेडियर शर्मा ने यह मामला सेना मुख्यालय तक पहुंचाया। इसके बाद तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक की स्वीकृति मिलने पर भारतीय सेना ने एक बेहद कठिन अभियान शुरू किया।

लगभग 19 हजार फीट की ऊंचाई पर बने अस्थायी कब्रों तक सैनिक फिर पहुंचे। शवों को सावधानी से बाहर निकाला गया। उन्हें स्लीपिंग बैग में रखकर रस्सियों के सहारे खड़ी बर्फीली ढलानों से नीचे उतारा गया। एक-एक शव को नीचे लाने में 7 से 8 सैनिकों की जरूरत पड़ी।

इसके बाद हेलीकॉप्टर की मदद से शवों को बेस कैंप लाया गया और 25 अगस्त 1999 को नियंत्रण रेखा पर पोस्ट-43 के जरिए पूरे सैन्य सम्मान के साथ पाकिस्तान को सौंप दिया गया।

अगले दिन 26 अगस्त 1999 को कैप्टन तैमूर मलिक को मुजफ्फराबाद के बुट्टदारा गांव में दफनाया गया। उनके साथ छह अन्य पाकिस्तानी सैनिकों के शव भी उनके परिवारों तक पहुंचे। (Kargil War Pakistani Soldiers Buried)

जहां कैमरा होगा फेल, वहां यह रडार देख लेगा दुश्मन…जानें क्या है भारतीय सेना का नया ‘सीक्रेट’ प्रोजेक्ट?

FOPEN Radar Drone
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

FOPEN Radar Drone: भारतीय सेना अब ऐसे ड्रोन सिस्टम को शामिल करने की तैयारी कर रही है, जो घने जंगलों और पेड़ों की मोटी छतरी के नीचे छिपे आतंकियों, घुसपैठियों और दुश्मन की गतिविधियों का पता लगा सके। इसके लिए सेना ने ड्रोन बेस्ड फोलिएज पेनेट्रेशन (एफओपेन) रडार डेवलप करने की तैयारी शुरू कर दी है। यह प्रोजेक्ट मेक-II श्रेणी के तहत होग, जिसमें भारतीय कंपनियां इस सिस्टम को डिजाइन, डेवलप और तैयार करेंगी।

यह सिस्टम खास तौर पर उन इलाकों के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां सामान्य ड्रोन कैमरे, थर्मल कैमरे या ऑप्टिकल सेंसर काम नहीं कर पाते। जम्मू-कश्मीर के घने जंगल, पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्य और सीमावर्ती वन क्षेत्र ऐसे इलाके हैं, जहां आतंकवादी और घुसपैठिए पेड़ों की घनी पत्तियों के नीचे छिपकर अपनी गतिविधियां चलाते हैं। ऐसे हालात में सेना को ऐसी तकनीक की जरूरत महसूस हुई, जो पेड़ों के आर-पार देखकर जमीन पर मौजूद गतिविधियों की जानकारी दे सके।

FOPEN Radar Drone: क्या है फोलिएज पेनेट्रेशन रडार

फोलिएज पेनेट्रेशन रडार (एफओपेन) का मतलब है ऐसा रडार जो घने पेड़ों, पत्तियों और जंगल की छतरी के बीच से भी जमीन की जानकारी जुटा सके।

आमतौर पर जब कोई ड्रोन कैमरे से निगरानी करता है तो उसे केवल पेड़ों का ऊपरी हिस्सा दिखाई देता है। अगर कोई व्यक्ति, वाहन या हथियार पेड़ों के नीचे छिपा हो तो कैमरा उसे नहीं देख पाता। यही समस्या थर्मल कैमरों और कई सामान्य सेंसरों के साथ भी होती है।

एफओपेन रडार विशेष रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करता है, जो पेड़ों और पत्तियों के बीच से गुजर सकती हैं। इसके बाद रडार जमीन से लौटने वाले सिग्नल का विश्लेषण करता है और यह पता लगाने की कोशिश करता है कि नीचे कोई व्यक्ति, वाहन या दूसरी गतिविधि मौजूद है या नहीं। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं जंगलों में निगरानी के लिए इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं।

आतंकवाद और घुसपैठ जैसी चुनौतियां

भारतीय सेना को केवल पारंपरिक युद्ध की तैयारी नहीं करनी होती, बल्कि आतंकवाद और घुसपैठ जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर के जंगलों में कई बार आतंकवादी पेड़ों और झाड़ियों की आड़ लेकर छिप जाते हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर के राज्यों में भी घने जंगल सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बने रहते हैं।

इन इलाकों में सामान्य ड्रोन कई बार केवल ऊपर की तस्वीर भेजते हैं, जबकि असली खतरा नीचे छिपा होता है। ऐसी स्थिति में सैनिकों को आगे बढ़ने से पहले पूरी जानकारी नहीं मिल पाती। एफओपेन रडार इस कमी को दूर करने के लिए तैयार किया जा रहा है। अगर ड्रोन उड़ते समय नीचे छिपी गतिविधियों की जानकारी पहले ही मिल जाए तो ऑपरेशन की योजना अधिक सटीक तरीके से बनाई जा सकती है। (FOPEN Radar Drone)

छोटा ड्रोन लेकिन बड़ी जिम्मेदारी

सेना ने इस प्रोजेक्ट के लिए हल्के ड्रोन की मांग रखी है। पूरे सिस्टम का वजन 20 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सके।

ड्रोन में इतना पेलोड होगा कि वह एफओपेन रडार को लेकर उड़ सके। इसके साथ ही उसका फ्लाइंग टाइम 60 से 120 मिनट के बीच होना चाहिए। सेना चाहती है कि यह ड्रोन एक बार उड़ान भरने के बाद लंबे समय तक निगरानी कर सके।

सिस्टम की ऑपरेशनल रेंज 5 से 10 किलोमीटर रखी गई है। इससे सैनिक सुरक्षित दूरी पर रहते हुए जंगलों की निगरानी कर सकेंगे। (FOPEN Radar Drone)

ऊंचे पहाड़ों में भी करेगा काम

भारतीय सेना की बड़ी तैनाती हिमालयी क्षेत्रों में है। इसलिए सेना ने इस सिस्टम के लिए ऊंचाई पर काम करने की क्षमता भी अनिवार्य रखी है।

ड्रोन और रडार दोनों को 4500 मीटर तक की ऊंचाई पर काम करने में सक्षम होना होगा। इसके अलावा यह सिस्टम माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी काम कर सके।

यह सिस्टम लद्दाख जैसे ठंडे इलाकों से लेकर राजस्थान और मध्य भारत जैसे गर्म क्षेत्रों तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। (FOPEN Radar Drone)

केवल कैमरा नहीं, रडार करेगा असली काम

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका रडार है। यह सामान्य कैमरे की तरह केवल तस्वीर नहीं लेता, बल्कि रेडियो तरंगों की मदद से आसपास के इलाके का विश्लेषण करता है।

रडार से मिलने वाली जानकारी सीधे जमीन पर मौजूद सैनिकों तक पहुंचेगी। इससे सैनिकों को तुरंत पता चल सकेगा कि आगे का इलाका सुरक्षित है या वहां किसी प्रकार की गतिविधि दिखाई दे रही है।

सेना चाहती है कि डेटा रियल टाइम में मिले, ताकि निर्णय लेने में देरी न हो। (FOPEN Radar Drone)

एसएआर तकनीक से बढ़ेगी सटीकता

भारतीय सेना ने आरएफपी में यह भी पूछा है कि क्या एफओपेन रडार सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) तकनीक पर आधारित होगा।

एसएआर आधुनिक रडार तकनीक है, जिसमें ड्रोन उड़ते समय लगातार सिग्नल भेजता और प्राप्त करता रहता है। बाद में इन सभी सिग्नलों को जोड़कर कंप्यूटर बहुत अधिक स्पष्ट तस्वीर तैयार करता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि छोटे ड्रोन पर भी बिना बड़े एंटीना के हाई क्वॉलिटी वाली रडार इमेज तैयार की जा सकती है।

एसएआर तकनीक कम फ्रीक्वेंसी वाली रेडियो तरंगों के साथ मिलकर घने जंगलों के नीचे छिपी गतिविधियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए दुनिया के कई आधुनिक फोलिएज पेनेट्रेशन सिस्टम इसी तकनीक का उपयोग करते हैं।

सैनिकों तक तुरंत पहुंचेगी रियल टाइम जानकारी

सेना की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि ड्रोन से मिलने वाला डेटा बिना किसी देरी के सीधे जमीन पर मौजूद सैनिकों तक पहुंचे। इसके लिए एफओपेन रडार में रियल टाइम डेटा ट्रांसमिशन की सुविधा होनी चाहिए।

अगर ड्रोन जंगल के ऊपर उड़ते समय किसी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाता है तो उसकी जानकारी तुरंत ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और ऑपरेशन चला रही टीम तक पहुंच जाएगी। इससे सैनिकों को आगे बढ़ने से पहले इलाके की स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

सेना ने यह भी पूछा है कि डेटा ट्रांसमिशन में कितनी देरी होगी। जितनी कम देरी होगी, सिस्टम उतना ही प्रभावी माना जाएगा।

सुरक्षित रहेगा पूरा कम्युनिकेशन नेटवर्क

आज के समय में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी मिलिट्री ऑपरेशनों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसी कारण सेना ने ड्रोन और ग्राउंड स्टेशन के बीच सुरक्षित संचार पर विशेष जोर दिया है।

आरएफपी के अनुसार सिस्टम में एस या सी बैंड डेटा लिंक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ 256-बिट एईएस एन्क्रिप्शन अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ड्रोन से भेजी जा रही जानकारी को कोई दुश्मन बीच में पढ़ या बदल न सके।

सिक्योर डेटा लिंक के कारण निगरानी के दौरान मिलने वाली जानकारी केवल अधिकृत सैनिकों तक ही पहुंचेगी।

एक साथ कई नेविगेशन सिस्टम का होगा उपयोग

भारतीय सेना चाहती है कि यह ड्रोन केवल एक सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर न रहे। इसी वजह से प्रस्ताव में नैवस्टार (जीपीएस), ग्लोनास और आईआरएनएसएस (नैविक) के साथ काम करने की क्षमता मांगी गई है। जरूरत पड़ने पर ऑपरेटर इनमें से किसी एक या कई सिस्टम को सिलेक्ट कर सकेगा। इस सिस्टम से किसी एक सैटेलाइट नेटवर्क में समस्या आने पर भी ड्रोन अपना मिशन जारी रख सकेगा। (FOPEN Radar Drone)

खराब मौसम में भी जारी रहेगी निगरानी

यह सिस्टम हर मौसम में करेगा। ड्रोन और रडार दोनों के लिए आईपी-65 या उससे बेहतर सुरक्षा मानक तय किया गया है। इसका मतलब है कि सिस्टम धूल और पानी से सुरक्षित रहेगा और कठिन मौसम में भी काम कर सकेगा।

साथ ही ड्रोन को तेज हवा में भी स्थिर उड़ान बनाए रखने में सक्षम होना होगा। कंपनियों को अपनी तकनीकी जानकारी में यह भी बताना होगा कि उनका सिस्टम कितनी तेज हवा सह सकता है।

जरूरत पड़ने पर कंधे पर लेकर भी इस्तेमाल किया जा सकेगा

इस प्रोजेक्ट की एक खास बात यह भी है कि एफओपेन रडार केवल ड्रोन तक सीमित नहीं रहेगा। सेना चाहती है कि जरूरत पड़ने पर यही रडार मैन-पैक मोड में भी इस्तेमाल किया जा सके। यानी सैनिक इसे अपने कंधे पर लेकर भी ऑपरेशन क्षेत्र में ले जा सकें। इससे उन इलाकों में भी इसका इस्तेमाल संभव होगा, जहां ड्रोन उड़ाना कठिन हो या जहां जमीन से निगरानी की जरूरत हो। (FOPEN Radar Drone)

लंबे समय तक मिलेगा रखरखाव

सेना ने कंपनियों से पूछा है कि वे कितने सालों तक स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध करा सकेंगी, सिस्टम की मरम्मत कैसे होगी और सॉफ्टवेयर अपडेट कितने समय तक दिए जाएंगे।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि सिस्टम का डिजाइन ऐसा हो कि यदि कोई हिस्सा खराब हो जाए तो उसे मैदान में ही आसानी से बदला जा सके। इसके अलावा विशेष परीक्षण उपकरण, रखरखाव उपकरण और विस्तृत तकनीकी पुस्तिकाएं भी उपलब्ध करानी होंगी। (FOPEN Radar Drone)

60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री जरूरी

इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है। कंपनियों को यह बताना होगा कि सिस्टम के कौन-कौन से हिस्से भारत में तैयार होंगे और यदि कोई तकनीक विदेश से लेनी पड़ेगी तो उसका प्रतिशत कितना होगा।

सेना ने यह भी पूछा है कि भविष्य में विदेशी हिस्सों को भारतीय तकनीक से बदलने की क्या योजना होगी। इसके साथ बौद्धिक संपदा अधिकार और महत्वपूर्ण तकनीकों की जानकारी भी मांगी गई है।

पहले बनेगा प्रोटोटाइप, फिर होंगे यूजर ट्रायल

यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए सेना ने तय संख्या में सिस्टम खरीदने की घोषणा नहीं की है।

सबसे पहले चयनित कंपनियां प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। इसके बाद इन्फैंट्री डायरेक्टोरेट की ओर से यूजर ट्रायल किए जाएंगे। ट्रायल में यह देखा जाएगा कि सिस्टम घने जंगल, पहाड़ी क्षेत्र और अलग-अलग मौसम में कितना प्रभावी काम करता है। सेना ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि ट्रायल के लिए कितने प्रोटोटाइप उपलब्ध कराए जा सकते हैं और बड़े पैमाने पर उत्पादन की उनकी क्षमता कितनी होगी। (FOPEN Radar Drone)