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कारगिल के सबसे खतरनाक अफसर! जिनसे सबसे ज्यादा डरती थी पाकिस्तानी सेना, इनके एक इशारे पर मच जाती थी तबाही

Kargil War Artillery OP Officer
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Kargil War Artillery OP Officer: कारगिल युद्ध की बात होती है तो सबसे पहले टाइगर हिल, तोलोलिंग और पॉइंट 5140 का नाम जहन में आता है। लेकिन इस युद्ध में कुछ ऐसे सैनिक भी थे, जिनका नाम बहुत कम लोगों ने सुना, जबकि उनकी भूमिका जीत की सबसे मजबूत नींव बनी। ये थे भारतीय सेना के आर्टिलरी ऑब्जर्वेशन पोस्ट (ओपी) अधिकारी। कारगिल युद्ध के दौरान ये पाकिस्तानी फौज का सबसे पहले निशाना बनते थे, क्योंकि ओपी अधिकारी उनकी गतिविधियों पर नजर रखते थे, उनका इशारा मिलते ही उन पर भारतीय तोपों का कहर बरपने लगता था।

Kargil War Artillery OP Officer: कारगिल युद्ध में क्यों सबसे ज्यादा खतरे में थे ओपी अधिकारी

ऐसे ही एक अधिकारी थे 15 फील्ड रेजिमेंट के कैप्टन सतीश कुमार। उन्होंने पूरे कारगिल युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर रहकर न केवल तोपखाने का मार्गदर्शन किया, बल्कि तीन अलग-अलग मौकों पर मौत को बेहद करीब से देखकर भी बच निकले। उनकी कहानी कारगिल युद्ध के उन अनसुने अध्यायों में शामिल है, जिनके बिना भारतीय सेना की सफलता की तस्वीर पूरी नहीं होती।

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय तोपें पहाड़ों के पीछे कई किलोमीटर दूर तैनात थीं। वहां से दुश्मन के बंकर सीधे दिखाई नहीं देते थे। ऐसे में तोपों को सही दिशा और सही दूरी बताने की जिम्मेदारी आर्टिलरी ऑब्जर्वेशन पोस्ट (ओपी) अधिकारियों की होती थी।

एक ओपी टीम में आम तौर पर तीन लोग होते थे। पहला होता था ओपी अधिकारी, जो दूरबीन और नक्शे की मदद से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता था। दूसरा तकनीकी सहायक होता था, जो गोले गिरने की जगह का विश्लेषण करता था। तीसरा रेडियो ऑपरेटर होता था, जो वायरलेस के जरिए पीछे मौजूद बैटरी कमांडर तक हर सूचना पहुंचाता था।

युद्ध के दौरान यह छोटी टीम दुश्मन के बेहद करीब ऊंची पहाड़ियों पर तैनात रहती थी। उनके पास दूरबीन, रेडियो सेट, बैटरियां और नक्शे होते थे, जिससे उनकी पहचान आसानी से हो जाती थी। पाकिस्तानी सेना जानती थी कि अगर ओपी टीम सक्रिय रही, तो कुछ ही मिनटों में भारतीय तोपों की गोलाबारी इतनी सटीक हो जाएगी कि उनके बंकर सुरक्षित नहीं रहेंगे। यही कारण था कि पाकिस्तानी स्नाइपर, मोर्टार और आर्टिलरी सबसे पहले ओपी टीम को निशाना बनाने की कोशिश करते थे। (Kargil War Artillery OP Officer)

तोपखाने की आंखें कहलाते थे ओपी अधिकारी

सेना के अधिकारियों के अनुसार, ओपी अधिकारी किसी भी आर्टिलरी रेजिमेंट की “आंखें” होते हैं। जिस तरह आधुनिक हथियारों में लेजर डिजाइनेटर टारगेट की पहचान करता है, उसी तरह कारगिल युद्ध में यह काम ओपी अधिकारी करते थे।

वे पहाड़ी की ऊंचाई से दुश्मन के बंकरों पर गिर रहे गोले देखते थे और तुरंत रेडियो पर सुधार बताते थे। जैसे यदि गोला टारगेट से कुछ मीटर बाईं ओर गिरा, तो वह नई दिशा बताते थे। इसके बाद अगला गोला पहले से अधिक सटीक स्थान पर गिरता था। कुछ ही राउंड के बाद गोलाबारी सीधे दुश्मन के बंकरों पर होने लगती थी।

यही वजह थी कि कारगिल युद्ध में ओपी अधिकारी केवल ऑब्जर्वर नहीं थे, बल्कि पूरी आर्टिलरी कार्रवाई के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से माने जाते थे। (Kargil War Artillery OP Officer)

बटालिक सेक्टर में सबसे मुश्किल थी जिम्मेदारी

कैप्टन सतीश कुमार की तैनाती बटालिक सेक्टर में थी। यह इलाका कारगिल के सबसे कठिन युद्ध क्षेत्रों में गिना जाता है। कारगिल युद्ध के दौरान मीडिया का अधिक ध्यान द्रास, तोलोलिंग और टाइगर हिल पर रहा, लेकिन बटालिक में भी बेहद कठिन लड़ाई लड़ी गई थी। यहां की पहाड़ियां अधिक ऊंची, ढलान ज्यादा खड़ी और रास्ते बेहद कठिन थे।

यही वजह थी कि यहां तोपों को तैनात करने के लिए प्लेन जमीन बहुत कम मिलती थी। कई जगह तोपों को ऐसी स्थिति में रखना पड़ता था, जहां से उन्हें ऊंचे एंगल पर गोले दागने पड़ते थे। इसे हाई एंगल फायर कहा जाता है।

हाई एंगल फायर क्यों था चुनौती

बटालिक सेक्टर में भारतीय सेना की 105 मिमी इंडियन फील्ड गन (आईएफजी) मुख्य हथियारों में शामिल थी। ये तोपें दाह क्षेत्र में सिंधु नदी के पास कई किलोमीटर पीछे तैनात थीं। सामान्य परिस्थितियों में तोपें अपेक्षाकृत सीधे एंगल से फायर करती हैं, लेकिन बटालिक की ऊंची पहाड़ियों के कारण यहां गोले अधिक ऊंचे एंगल से दागने पड़ते थे।

हाई एंगल फायर में गोला अधिक ऊंचाई लेकर टारगेट तक पहुंचता है। इससे दुश्मन के चट्टानों और गुफाओं में बने बंकरों तक पहुंचना संभव होता है, लेकिन इसकी सटीकता बनाए रखना बेहद कठिन होता है। ऐसे में ओपी अधिकारी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी।

कैप्टन सतीश कुमार अपनी टीम के साथ पहाड़ियों पर चढ़कर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखते थे और लगातार आर्टिलरी को सही निर्देश भेजते थे। (Kargil War Artillery OP Officer)

15 फील्ड रेजिमेंट ने बरसाए 45 हजार गोले

कारगिल युद्ध के दौरान 15 फील्ड रेजिमेंट ने बटालिक सेक्टर में जबरदस्त गोलाबारी की।

रिटायर्ड मेजर जनरल संजय सारण, जो उस समय 15 फील्ड रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे और बटालिक-तुर्तुक सेक्टर में आर्टिलरी ऑपरेशन को कॉर्डिनेट कर रहे थे। उन्होंने बताया कि केवल 45 दिनों में 105 मिमी आईएफजी से करीब 45,000 गोले दागे गए।

इतनी अधिक फायरिंग हुई कि कई तोपों की बैरल युद्ध क्षेत्र में ही बदलनी पड़ी। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान रेजिमेंट में नए शामिल हुए गनरों ने भी अपने पूरे मिलिट्री करियर में जितने गोले नहीं दागे, उससे कहीं अधिक गोले केवल कारगिल युद्ध के दौरान चला दिए।

इसी उत्कृष्ट योगदान के लिए युद्ध के बाद कैप्टन सतीश कुमार को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया। (Kargil War Artillery OP Officer)

1/11 गोरखा राइफल्स के साथ निभाई अहम भूमिका

बटालिक सेक्टर में कैप्टन सतीश कुमार ने 1/11 गोरखा राइफल्स, 12 जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री और 22 ग्रेनेडियर्स जैसी अग्रिम लड़ाकू इकाइयों के साथ काम किया। जब भी इन्फैंट्री को किसी पाकिस्तानी चौकी या बंकर पर हमला करना होता था, उससे पहले कैप्टन सतीश कुमार अपनी ओपी टीम के साथ पहाड़ी की ऊंचाई पर पहुंचकर दुश्मन की स्थिति का पता लगाते थे।

उनकी ओर से भेजे गए निर्देशों के आधार पर भारतीय तोपें कई किलोमीटर दूर से सटीक गोलाबारी करती थीं। भारी तबाही के बाद जब दुश्मन कमजोर हो जाता था, तब भारतीय इन्फैंट्री आगे बढ़कर उन पर कब्जा करती थी।

कारगिल युद्ध में आर्टिलरी और इन्फैंट्री के बीच यही तालमेल भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत बना। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने लगभग 2.5 लाख से अधिक गोले और रॉकेट दागे। दुश्मन की ऊंची चोटियों पर बने मजबूत बंकरों को नष्ट करने में आर्टिलरी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। (Kargil War Artillery OP Officer)

तीन बार मौत को मात देकर लौटे कैप्टन सतीश कुमार

कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन सतीश कुमार तीन बार मौत के बेहद करीब पहुंचे, लेकिन हर बार बाल-बाल बच निकले। मई 1999 में गनासोक हाइट्स पर वह अपनी ओपी टीम के साथ 1/11 गोरखा राइफल्स को आर्टिलरी सहायता दे रहे थे। दुश्मन के बंकरों पर नजर रखते हुए उन्हें अचानक लगा कि उनकी मौजूदा पोजीशन सुरक्षित नहीं है। उन्होंने अपनी टीम को तुरंत वहां से हटने का आदेश दिया। कुछ ही सेकंड बाद उसी स्थान पर पाकिस्तानी सेना का मोर्टार गोला गिरा और लगातार गोलाबारी शुरू हो गई।

जून 1999 में एरिया स्प्रिंग में लेफ्टिनेंट जी.एस. घुमन के साथ तैनाती के दौरान एक पाकिस्तानी स्नाइपर की गोली उनके बालों को छूते हुए निकल गई, लेकिन वे सुरक्षित बच गए।

वहीं जुलाई 1999 में खालूबर रिज पर 22 ग्रेनेडियर्स के साथ अभियान के दौरान उनके कान के पास से लगातार तीन गोलियां निकलीं। कैप्टन सतीश कुमार ने तुरंत साथियों को सतर्क किया। तलाशी में एक पाकिस्तानी सैनिक जी-3 राइफल के साथ छिपा मिला, जो पीछे छूट जाने के बाद किसी भारतीय अधिकारी को निशाना बनाना चाहता था।

इन्हीं अभियानों के दौरान उन्होंने एक ऐसी घटना भी देखी, जिसमें चट्टान की गुफा में शरण लेने वाले एक भारतीय जवान के ऊपर सीधे पाकिस्तानी गोला गिरा और उसकी मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उसके आसपास मौजूद अन्य सैनिक सुरक्षित बच गए। (Kargil War Artillery OP Officer)

प्वाइंट 5203 पर एक साथ लगाए गए तीन ओपी

बटालिक सेक्टर में स्थित प्वाइंट 5203 भारतीय सेना के लिए सबसे कठिन लक्ष्यों में से एक था। इस ऊंचाई पर बने पाकिस्तानी बंकरों पर प्रभावी गोलाबारी सुनिश्चित करने के लिए कैप्टन सतीश कुमार को एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग ऑब्जर्वेशन पोस्ट तैनात करनी पड़ीं।

अलग-अलग एंगल से दुश्मन की स्थिति देखने के बाद ही तोपों को सही निर्देश दिए जा सके। इससे भारतीय गोलाबारी की सटीकता बढ़ी और इन्फैंट्री को आगे बढ़ने में मदद मिली। (Kargil War Artillery OP Officer)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया को भायी भारत की ‘अस्त्र’, 6 देश खरीदने की दौड़ में

Astra Missile export
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Astra Missile Export: भारत की स्वदेशी अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल अब दुनिया के कई देशों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना द्वारा इसके सफल इस्तेमाल के बाद इस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग तेजी से बढ़ी है। इंडोनेशिया के साथ हुए शुरुआती समझौते के बाद अब आर्मेनिया, सऊदी अरब सहित कम से कम छह देश इस मिसाइल को खरीदने या अपने लड़ाकू विमानों पर लगाने के इच्छुक दिख रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, भारत और इंडोनेशिया के बीच अस्त्र मिसाइल को लेकर इन-प्रिंसिपल एग्रीमेंट हो चुका है। इस समझौते की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसी महीने जकार्ता यात्रा के दौरान की गई थी। अब दोनों देशों के बीच मिसाइलों की संख्या और सौदे की कुल कीमत पर आगे बातचीत होगी।

Astra Missile Export: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा दुनिया का भरोसा

अस्त्र मिसाइल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह असली युद्ध में भी अपनी क्षमता साबित कर चुकी है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से इस मिसाइल का सफल इस्तेमाल किया गया। इसके बाद इसे “कॉम्बैट प्रूवन” यानी वास्तविक युद्ध में सफल हथियार का दर्जा मिलने लगा।

रक्षा क्षेत्र में किसी भी हथियार के लिए यह पहचान बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिन हथियारों का वास्तविक युद्ध में सफल इस्तेमाल हो चुका होता है, उन पर दूसरे देशों का भरोसा तेजी से बढ़ता है। यही कारण है कि अब कई देश भारत के इस स्वदेशी हथियार में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। (Astra Missile Export)

आर्मेनिया सबसे आगे, सऊदी अरब भी बातचीत में

सूत्रों के मुताबिक, आर्मेनिया भारत के साथ अस्त्र मिसाइल खरीदने की बातचीत में सबसे आगे है। दोनों देशों के बीच इस मिसाइल को आर्मेनिया के सुखोई-30 एसएम लड़ाकू विमानों पर लगाने को लेकर एडवांस स्टेज पर चर्चा चल रही है।

आर्मेनिया पहले से ही भारत का बड़ा रक्षा ग्राहक बन चुका है। उसने भारत से आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार, एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (एटीएजीएस) और जेन एंटी-ड्रोन सिस्टम जैसे कई हथियार खरीदे हैं। अब अस्त्र मिसाइल में उसकी रुचि भारत के रक्षा उद्योग पर बढ़ते भरोसे को भी दिखाती है।

दूसरी ओर सऊदी अरब भी इस मिसाइल को लेकर भारत के साथ बातचीत कर रहा है। जानकारी के अनुसार, सऊदी वायुसेना के एफ-15एस, एफ-15एसए और यूरोफाइटर टाइफून लड़ाकू विमानों पर अस्त्र मिसाइल को लगाने की संभावनाओं पर चर्चा चल रही है।

इंडोनेशिया बन सकता है पहला विदेशी ग्राहक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच अस्त्र मिसाइल को लेकर सिद्धांत रूप में सहमति बनी थी। इसके बाद दोनों देशों के रक्षा अधिकारियों के बीच टेक्निकल और कमर्शियल नेगोशिएशंस चल रही हैं।

सौदे के तहत कितनी मिसाइलें खरीदी जाएंगी और कुल कीमत कितनी होगी, इसका फैसला कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशंस के दौरान किया जाएगा। इंडोनेशिया के पास भी सुखोई लड़ाकू विमान हैं, इसलिए अस्त्र मिसाइल का इंटीग्रेशन अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। (Astra Missile Export)

क्या है अस्त्र मिसाइल

अस्त्र भारत की पहली पूरी तरह स्वदेशी बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। इसका मतलब है कि यह ऐसी मिसाइल है जो पायलट की आंखों से दिखाई देने वाली दूरी से काफी आगे मौजूद दुश्मन के लड़ाकू विमान को निशाना बना सकती है। इसे भारतीय वायुसेना के यह सु-30एमकेआई और तेजस एमके-1ए सहित अन्य लड़ाकू विमानों के साथ भी जोड़ा जा रहा है।

इस मिसाइल को डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीआरडीएल) ने तैयार किया है। इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) करती है।

अस्त्र का विकास भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले इस श्रेणी की मिसाइलों के लिए देश को विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। (Astra Missile Export)

अस्त्र एमके-1 की खूबियां

अस्त्र एमके-1 लगभग 154 किलोग्राम वजनी मिसाइल है। इसकी लंबाई करीब 3.84 मीटर और व्यास 178 मिलीमीटर है। इसमें लगभग 15 किलोग्राम का प्री-फ्रैगमेंटेड हाई एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया गया है।

यह मिसाइल मैक 4.5 यानी ध्वनि की गति से लगभग साढ़े चार गुना अधिक रफ्तार से उड़ सकती है। इसकी मारक क्षमता सामान्य परिस्थितियों में 80 से 110 किलोमीटर तक है। कुछ एडवांस वर्जन में इसकी इफेक्टिव रेंज और बढ़ाई गई है।

मिसाइल में सिंगल-पल्स स्मोकलेस सॉलिड रॉकेट मोटर लगी है। यह लॉन्च के समय बहुत कम धुआं छोड़ती है, जिससे लड़ाकू विमान की स्थिति का पता लगाना दुश्मन के लिए कठिन हो जाता है।

कैसे करती है टारगेट पर हमला

अस्त्र मिसाइल में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। शुरुआत में यह फाइबर ऑप्टिक जायरोस्कोप आधारित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम की मदद से उड़ान भरती है। बीच रास्ते में लड़ाकू विमान से डेटा लिंक के जरिए इसे लगातार नई जानकारी मिलती रहती है।

लक्ष्य के पास पहुंचने के बाद इसका एक्टिव रडार सीकर खुद टारगेट को खोजकर उस पर सटीक हमला करता है। इस तकनीक की वजह से मिसाइल अंतिम चरण में भी तेजी से दिशा बदल सकती है और तेज गति से उड़ रहे लड़ाकू विमान को निशाना बना सकती है। (Astra Missile Export)

अस्त्र एमके-2 में बढ़ी दूरी और ताकत

डीआरडीओ ने अस्त्र के दूसरे वर्जन एमके-2 का भी सफल परीक्षण किया है। इस मिसाइल की मारक क्षमता 160 से 240 किलोमीटर तक मानी जा रही है।

एमके-2 में सबसे बड़ा बदलाव इसकी ड्यूल-पल्स रॉकेट मोटर है। यह तकनीक मिसाइल को उड़ान के अंतिम चरण में दोबारा अतिरिक्त ऊर्जा देती है। इससे टारगेट के पास पहुंचने तक इसकी गति और मारक क्षमता बनी रहती है।

इस वर्जन में बेहतर एईएसए बेस्ड सीकर, एडवांस लेजर फ्यूज और बड़ा नो-एस्केप जोन भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि टारगेट के बच निकलने की संभावना काफी कम हो जाती है।

एमके-3 में होगी रैमजेट तकनीक

डीआरडीओ अस्त्र के तीसरे वर्जन एमके-3 पर भी काम कर रहा है। इसे गांडीव भी कहा जा रहा है। इसमें सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट इंजन लगाया जा रहा है। यह तकनीक मिसाइल को लंबे समय तक हाई स्पीड बनाए रखने में मदद करती है। इसकी संभावित मारक क्षमता 300 किलोमीटर से अधिक रखने का लक्ष्य है।

रैमजेट तकनीक के कारण मिसाइल पूरे उड़ान मार्ग में पर्याप्त ऊर्जा बनाए रखती है और दूर स्थित तेज गति वाले लक्ष्यों पर भी प्रभावी हमला कर सकती है। (Astra Missile Export)

कीमत भी बड़ी ताकत

रक्षा सूत्रों का कहना है कि अस्त्र मिसाइल की सबसे बड़ी खूबियों में इसकी कीमत भी शामिल है। यह चीन, यूरोप, अमेरिका और रूस की मिसाइलों की तुलना में करीब 70 प्रतिशत तक सस्ती है। कम लागत के बावजूद इसकी मारक क्षमता और तकनीकी प्रदर्शन दुनिया की कई आधुनिक एयर-टू-एयर मिसाइलों के बराबर माना जा रहा है।
इसी वजह से जिन देशों के पास सीमित रक्षा बजट है, उनके लिए यह एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरी है।

इसका मुकाबला पीएल-15 (चीन), मेटियोर (यूरोप/एमबीडीए), एआईएम-120डी (अमेरिका), आर-77, पीएल-17 (चीन), आर-37एम (रूस), एआईएम-260 (अमेरिका) से है।

बढ़ती मांग के बीच निजी कंपनियां भी करेंगी निर्माण

अब तक अस्त्र मिसाइल का निर्माण मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड करती रही है। लेकिन लगातार बढ़ती घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसके उत्पादन में निजी क्षेत्र को भी शामिल करने का फैसला किया है।

इस कदम का उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाना और समय पर सप्लाई सुनिश्चित करना है। इससे भारतीय रक्षा उद्योग में निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ेगी। (Astra Missile Export)

भारतीय नौसेना को मिला नया सबमरीन हंटर MH-60R सीहॉक, ऑपरेशन सिंदूर से हिंद महासागर तक बढ़ी भारत की ताकत!

MH-60R Seahawk Indian Navy
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MH-60R Seahawk Indian Navy: भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को और मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। अमेरिका ने भारतीय नौसेना को एक और अत्याधुनिक एमएच-60आर ‘सीहॉक’ मल्टी-रोल नौसैनिक हेलीकॉप्टर सौंप दिया है। यह हेलीकॉप्टर पिछले सप्ताह केरल के कोच्चि में भारतीय नौसेना को डिलीवर किया गया। अमेरिकी दूतावास ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इसी सप्ताह दो और हेलीकॉप्टर भारत पहुंचने वाले हैं। इनकी डिलीवरी के साथ भारतीय नौसेना के पास मौजूद सीहॉक हेलीकॉप्टरों की संख्या 21 तक पहुंच जाएगी।

अमेरिकी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि लॉकहीड मार्टिन द्वारा विकसित यह अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी की मजबूती का प्रतीक है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस डिलीवरी का स्वागत करते हुए कहा कि इससे समुद्री सुरक्षा और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता और मजबूत होगी।

MH-60R Seahawk Indian Navy: 2020 में हुआ था 24 हेलीकॉप्टरों का बड़ा समझौता

भारत ने फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) कार्यक्रम के तहत 24 एमएच-60आर (MH-60R) ‘रोमियो’ हेलीकॉप्टर खरीदने का समझौता किया था। इस सौदे की कीमत लगभग 2.6 अरब अमेरिकी डॉलर थी। इन हेलीकॉप्टरों का निर्माण अमेरिकी कंपनी सिकोरस्की एयरक्राफ्ट करती है, जो अब लॉकहीड मार्टिन का हिस्सा है।

इन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी साल 2021 से शुरू हुई। जुलाई 2026 तक 21 हेलीकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं, जबकि अंतिम तीन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी अभी बाकी है।

अभी कितने हेलीकॉप्टर हैं ऑपरेशन के लिए तैयार

भारतीय नौसेना के सूत्रों के अनुसार, अभी तक मिले हेलीकॉप्टरों में से 15 हेलीकॉप्टर पूरी तरह ऑपरेशनल हैं और विभिन्न युद्धपोतों पर तैनात किए जा चुके हैं।

तीन हेलीकॉप्टर अमेरिका में भारतीय पायलटों और तकनीकी कर्मचारियों की ट्रेनिंग के लिए रखे गए हैं। वहीं, हाल में पहुंचे तीन हेलीकॉप्टरों की जांच, दस्तावेजी प्रक्रिया और वैलिडेशन के बाद उन्हें भी जल्द नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

दो स्क्वाड्रन में हो चुकी है तैनाती

सीहॉक हेलीकॉप्टरों के लिए भारतीय नौसेना ने दो अलग-अलग स्क्वाड्रन तैयार किए हैं। पहला स्क्वाड्रन आईएनएएस 334 ‘सीहॉक्स’ है, जिसे 6 मार्च 2024 को आईएनएस गरुड़, कोच्चि में कमीशन किया गया था। यह स्क्वाड्रन ट्रेनिंग और ऑपरेशनल मदद दोनों की जिम्मेदारी संभालता है।

दूसरा स्क्वाड्रन आईएनएएस 335 ‘ऑस्प्रेय्स’ है, जिसे 17 दिसंबर 2025 को आईएनएस हंसा, गोवा में कमीशन किया गया। यह पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में पूरी तरह ऑपरेशनल स्क्वाड्रन है।

इन दोनों स्क्वाड्रनों के हेलीकॉप्टर आईएनएस विक्रांत, आईएनएस विक्रमादित्य, आधुनिक विध्वंसक युद्धपोतों और फ्रिगेट्स पर तैनात किए जा सकते हैं। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

क्यों खास है MH-60R सीहॉक

एमएच-60 ‘रोमियो’ दुनिया के सबसे आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों में शामिल है। यह अमेरिकी सेना के प्रसिद्ध ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर का समुद्री संस्करण है। इसमें जहाज पर कम जगह घेरने के लिए फोल्ड होने वाले मुख्य रोटर ब्लेड और मुड़ने वाली टेल लगाई गई है।

यह दो टर्बोशाफ्ट इंजन से चलता है। हेलीकॉप्टर में तीन से चार सदस्यीय क्रू रहता है और इसमें पांच अतिरिक्त सैनिक या कर्मी बैठ सकते हैं। इसकी अधिकतम गति लगभग 330 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि इसकी ऑपरेशनल रेंज लगभग 830 किलोमीटर है। यह लगभग 3,000 किलोग्राम तक का भार ले जाने में सक्षम है।

पनडुब्बियों का लग सकता है पता

सीहॉक हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी ताकत इसकी एंटी-सबमरीन वारफेयर (एएसडब्ल्यू) क्षमता है। इसमें डिपिंग सोनार लगा होता है, जिसे समुद्र में नीचे उतारकर पानी के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाया जाता है। इसके अलावा यह बड़ी संख्या में सोनोबॉय भी समुद्र में गिरा सकता है। ये छोटे सेंसर समुद्र के भीतर होने वाली ध्वनि को रिकॉर्ड करके पनडुब्बियों की गतिविधि का पता लगाते हैं।

हेलीकॉप्टर में लगा मल्टी-मोड रडार समुद्र की सतह और उसके आसपास मौजूद टारगेट्स की पहचान करता है। दुश्मन की पनडुब्बी मिलने पर यह एमके-54 लाइटवेट टॉरपीडो से हमला कर सकता है।

भारत ने साल 2024 में अमेरिका से 500 से अधिक आधुनिक सोनोबॉय खरीदने का फैसला किया था। इसी साल अमेरिका ने 53 एमके-54 टॉरपीडो की बिक्री को भी मंजूरी दी थी, ताकि सीहॉक हेलीकॉप्टरों की मारक क्षमता और बढ़ाई जा सके। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

समुद्र की सतह पर भी कर सकता है हमला

एमएच-60आर केवल पनडुब्बियों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाजों के खिलाफ भी प्रभावी हथियार है।

यह एजीएम-114 हेलफायर मिसाइल, मशीन गन और अन्य आधुनिक हथियारों से लैस किया जा सकता है। इसमें लगे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, लेजर रेंज फाइंडर, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स, इन्फ्रारेड जैमर, मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और ग्लास कॉकपिट इसे हर मौसम और दिन-रात में ऑपरेशन करने की क्षमता देते हैं।

इसका रडार समुद्र में मौजूद छोटे टारगेट्स और यहां तक कि पनडुब्बियों के पेरिस्कोप तक की पहचान करने में सक्षम माना जाता है। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

भारतीय जरूरतों के अनुसार किए जा रहे अपग्रेड

भारतीय नौसेना के लिए आने वाले एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों में इंडिया यूनिक इक्विपमेंट (आईयूई) भी जोड़े जा रहे हैं। इनमें स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट, सुरक्षित संचार प्रणाली और भारतीय जरूरतों के अनुरूप अन्य उपकरण शामिल हैं। पहले से सेवा में मौजूद हेलीकॉप्टरों को भी चरणबद्ध तरीके से अमेरिका भेजकर इन्हीं मानकों के अनुसार अपग्रेड किया जाएगा।

इन हेलीकॉप्टरों का भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर भी सफल परीक्षण किया जा चुका है। भारतीय नौसेना के अनुसार, इन्हें भारतीय मौसम और समुद्री परिस्थितियों के अनुरूप पूरी तरह परखा गया है।

पुराने सी किंग हेलीकॉप्टरों की ले रहे हैं जगह

एमएच-60आर हेलीकॉप्टर ब्रिटेन मूल के सी किंग एमके-42बी हेलीकॉप्टरों की जगह ले रहे हैं। सी किंग हेलीकॉप्टर करीब 40 सालों तक भारतीय नौसेना की सेवा में रहे और जून 2026 में उन्हें चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाया गया।

नई पीढ़ी के सीहॉक हेलीकॉप्टर आने के बाद नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमता, समुद्री निगरानी और जहाज आधारित हवाई अभियानों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

ऑपरेशन सिंदूर और नौसैनिक अभ्यासों में हुआ इस्तेमाल

भारतीय नौसेना प्रमुख रहे एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने दिसंबर 2025 में दूसरे स्क्वाड्रन के कमीशनिंग के दौरान बताया था कि एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था और उन्होंने अपनी निर्धारित भूमिका प्रभावी तरीके से निभाई।

इन हेलीकॉप्टरों को ट्रोपेक्स-25 सहित कई बड़े नौसैनिक अभ्यासों में भी तैनात किया जा चुका है। इनके आधुनिक सेंसर और नेटवर्क आधारित सिस्टम युद्धपोतों को समुद्री क्षेत्र की बेहतर जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

7,995 करोड़ का सस्टेनमेंट पैकेज भी हुआ लागू

हेलीकॉप्टरों की लंबे समय तक बेहतर उपलब्धता बनाए रखने के लिए भारत ने दिसंबर 2025 में लगभग 7,995 करोड़ का सस्टेनमेंट पैकेज भी साइन किया था। इस पांच सालीय पैकेज में स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता, ट्रेनिंग, मरम्मत, उपकरण, नियमित निरीक्षण और भारत में इंटरमीडिएट स्तर की रिपेयर सुविधाएं तैयार करना शामिल है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इससे धीरे-धीरे रखरखाव के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम होगी और भारत के भीतर ही मरम्मत एवं तकनीकी क्षमता विकसित होगी। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

हिंद महासागर में बढ़ी समुद्री निगरानी क्षमता

भारतीय नौसेना लंबे समय से 100 से अधिक मल्टी-रोल नौसैनिक हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता बता रही है। फिलहाल एमएच-60आर हेलीकॉप्टर हिंद महासागर क्षेत्र में पनडुब्बियों की निगरानी, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, विमानवाहक पोतों की सुरक्षा, खोज एवं बचाव अभियान, मेडिकल इवैक्यूएशन और लंबी दूरी की समुद्री निगरानी जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

इन हेलीकॉप्टरों के आने से भारतीय नौसेना की जहाज आधारित हवाई क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है और आधुनिक युद्धपोतों को एक ऐसी हवाई ताकत मिली है, जो समुद्र के ऊपर और समुद्र के नीचे दोनों तरह के खतरों पर लगातार नजर रखने में सक्षम है। (MH-60R Seahawk Indian Navy)

27 साल बाद कारगिल युद्ध का पूरा सच! तोलोलिंग से टाइगर हिल तक- कब, कहां और कैसे बदला युद्ध का रुख, पढ़ें पूरी टाइमलाइन

Kargil War Timeline 1999
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Kargil War Timeline 1999: कारगिल युद्ध को हुए 27 साल बीत चुके हैं। इसे भारत के सैन्य इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयों में गिना जाता है। साल 1999 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कारगिल, द्रास, बटालिक और मुश्कोह सेक्टर की ऊंची चोटियों पर गुपचुप तरीके से कब्जा करने की योजना बनाई। शुरुआत में इसे आतंकियों की घुसपैठ माना गया, लेकिन कुछ ही दिनों में यह साफ हो गया कि इसके पीछे पाकिस्तान सेना की सुनियोजित कार्रवाई थी।

कारगिल युद्ध अचानक शुरू नहीं हुआ था। फरवरी 1999 से ही पाकिस्तान की गतिविधियां तेज होने लगी थीं। भारतीय सेना के दस्तावेजों के अनुसार, कई घटनाएं एक के बाद एक हुईं, जिन्होंने अंततः बड़े सैन्य अभियान का रूप लिया। फरवरी से जून 1999 के बीच हुई घटनाओं ने युद्ध की दिशा तय की। आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन।

Kargil War Timeline 1999: फरवरी 1999: मुश्कोह सेक्टर से शुरू हुई घुसपैठ

भारतीय सेना के रिकॉर्ड के अनुसार सर्दियों में फरवरी 1999 में पाकिस्तान सेना ने मुश्कोह सेक्टर में घुसपैठ शुरू कर दी थी। उस समय यह आम गतिविधियां लग रही थीं, लेकिन बाद में पता चला कि पाकिस्तानी सेना सुनियोजित तरीके से ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमाने की तैयारी कर रही थी।

इन इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है। कई ऊंची चौकियां मौसम के कारण खाली करनी पड़ती थीं। पाकिस्तान ने इसी स्थिति का फायदा उठाकर भारतीय क्षेत्र में कई स्थानों पर अपनी मौजूदगी बना ली। (Kargil War Timeline 1999)

अप्रैल 1999: युद्धाभ्यास में उठा था घुसपैठ का मुद्दा

अप्रैल 1999 में बादामी बाग (श्रीनगर) स्थित 15 कोर मुख्यालय में एक कोर वार गेम आयोजित किया गया। इस अभ्यास के दौरान 70 इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर देविंदर सिंह ने टाइगर हिल और अन्य बिना कब्जे वाली चोटियों में संभावित घुसपैठ का मुद्दा उठाया।

उस समय यह केवल एक सैन्य आकलन माना गया, लेकिन कुछ हफ्तों बाद यही आशंका असलियत में बदल गई।

3-5 मई: स्थानीय चरवाहे ने सबसे पहले देखी घुसपैठ

3 मई 1999 को बटालिक सेक्टर के स्थानीय निवासी ताशी नामग्याल ने कुछ काले पठानी सूट पहने कुछ संदिग्ध लोगों को ऊंची पहाड़ियों पर देखा। उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी भारतीय सेना को दी। इसी के बाद पता चला कि पाकिस्तान कुछ बड़ी तैयारी कर रहा है। सेना ने सूचना मिलने के बाद 5 मई को इलाके में पेट्रोलिंग बढ़ाई और हालात की जानकारी लेना शुरू कर दिया। (Kargil War Timeline 1999)

9 मई: कारगिल के गोला-बारूद डिपो पर हमला

रविवार 9 मई 1999 को पाकिस्तान ने कारगिल स्थित भारतीय सेना के अम्युनिशन डंप पर भारी गोलाबारी की। पाकिस्तानी सेना ने दोपहर से गोलाबारी शुरू की, जो 10 मई तक चली। इस हमले में गोला-बारूद के भंडार को काफी नुकसान पहुंचा। कारगिल शहर के बारू इलाके में भारतीय सेना का बड़ा गोला-बारूद डंप (अम्युनिशन डंप) था, जो पहाड़ियों में फैला हुआ था और कारगिल शहर के बेहद करीब था।

यह पहली बार था जब पाकिस्तानी सेना ने खुले तौर पर भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया। विस्फोट 2-3 दिनों तक चले, और गोले-बारूद उड़कर आसपास बिखर गए। (Kargil War Timeline 1999)

10 मई: सेना प्रमुख विदेश दौरे पर

10 मई को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के आधिकारिक दौरे पर रवाना हुए। इसी दौरान सीमा पर हालात तेजी से बदल रहे थे। बाद में जनरल मलिक को स्थिति की गंभीरता देखते हुए अपना दौरा बीच में छोड़कर भारत लौटना पड़ा। (Kargil War Timeline 1999)

11 मई: वायुसेना से हेलीकॉप्टर मदद मांगी

11 मई 1999 को उधमपुर स्थित उत्तरी कमान मुख्यालय ने भारतीय वायुसेना से एमआई-25, एमआई-35 अटैक हेलीकॉप्टर और हथियारबंद एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की मांग की। हालांकि उस समय यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया। कारण यह बताया गया कि कारगिल क्षेत्र की ऊंचाई इन हेलीकॉप्टरों की प्रभावी ऑपरेटिंग सीमा से अधिक थी।

12 और 13 मई: द्रास सेक्टर में भी हुई घुसपैठ की पुष्टि

12 मई को पहली बार द्रास सेक्टर में भी दुश्मन की मौजूदगी का पता चला। इसके अगले ही दिन यानी 13 मई को कारगिल के अम्युनिशन डंप पर हुए हमले के केवल चार दिन बाद द्रास स्थित भारतीय सेना का ट्रांजिट कैंप भी पाकिस्तान की भारी गोलाबारी का शिकार हुआ। इससे भारतीय सेना को स्पष्ट संकेत मिल गया कि यह सामान्य सीमा उल्लंघन नहीं, बल्कि बड़े सैन्य अभियान का हिस्सा है।

14 मई: वायुसेना की मदद पर हुई अहम बैठक

14 मई 1999 को तत्कालीन उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल चंद्र शेखर ने चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी की बैठक में भारतीय वायुसेना को अभियान में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया। उस समय तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस ने कहा कि इसके लिए भारत सरकार की औपचारिक मंजूरी आवश्यक होगी।

इसी दिन एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। 4 जाट रेजिमेंट के कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व में पांच सैनिकों (सिपाही अर्जुन राम बसावनबिहा, सिपाही भंवर लाल बागरिया, सिपाही भिखा राम, सिपाही मूला राम और सिपाही नरेश सिंह) की गश्ती टीम बजरंग पोस्ट (काकसर सेक्टर, ऊंचाई लगभग 13,000–14,000 फीट) की ओर गई, लेकिन यह दल वापस नहीं लौटा। यह कारगिल युदध की शुरुआत की पहली बड़ी क्षति थी।

पाकिस्तानी सेना (नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री और रेंजर्स) ने उन पर हमला बोल दिया। घंटों तक भीषण गोलीबारी हुई। गोला-बारूद खत्म होने के बाद कालिया ने बेस कैंप से संपर्क किया और रीइन्फोर्समेंट मांगी। लेकिन इससे पहले ही पाकिस्तानी प्लाटून ने उन्हें घेर लिया और जिंदा पकड़ लिया। कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों को 15 मई से 7 जून 1999 तक (लगभग 22-23 दिन) पाकिस्तानी हिरासत में रखा गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें बेहद क्रूर यातनाएं दी गईं। 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना ने उनके क्षत-विक्षत शव भारतीय पक्ष को सौंपे। जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जिनेवा कन्वेंशन के उल्लंघन का नोटिस भेजा।

16 मई: कैप्टन अमित भारद्वाज की टुकड़ी पर हमला

लापता गश्ती दल की तलाश के लिए 16 मई को कैप्टन अमित भारद्वाज के नेतृत्व में एक प्लाटून भेजी गई। जांच के दौरान इस दल पर घात लगाकर हमला किया गया। इस मुठभेड़ में कैप्टन अमित भारद्वाज और एक जूनियर कमीशंड अधिकारी शहीद हो गए।

इसी दिन 8 माउंटेन डिवीजन की 56 माउंटेन ब्रिगेड को कश्मीर घाटी से द्रास भेजने का आदेश दिया गया। यह फैसला युद्ध की दिशा बदलने वाला साबित हुआ क्योंकि इसके बाद बड़े स्तर पर सैनिकों की तैनाती शुरू हुई। (Kargil War Timeline 1999)

17 मई: पहली बार हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक

17 मई 1999 को नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की पहली बैठक हुई।
इस बैठक में रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री को कारगिल की स्थिति की जानकारी दी गई। सेना ने वायुसेना को अभियान में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस समय इसे मंजूरी नहीं मिली। (Kargil War Timeline 1999)

20 मई: सेना प्रमुख लौटे भारत

हालात की गंभीरता को देखते हुए 20 मई को सेना प्रमुख जनरल वी. पी. मलिक अपना विदेश दौरा बीच में छोड़कर भारत लौट आए। उनके लौटने के बाद सैन्य अभियान की गति और योजना दोनों में तेजी आई।

22 मई: टाइगर हिल और तोलोलिंग पर पहला बड़ा हमला

22 मई 1999 को 56 माउंटेन ब्रिगेड ने द्रास सेक्टर की जिम्मेदारी संभाली।

उसी दिन टाइगर हिल, तोलोलिंग और पॉइंट 5140 पर कब्जा वापस लेने के लिए पहला बड़ा सैन्य हमला शुरू किया गया। हालांकि यह हमला सफल नहीं हो सका और भारतीय सेना को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों को सामरिक बढ़त हासिल थी। (Kargil War Timeline 1999)

23 से 27 मई: अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती

23 मई को 79 माउंटेन ब्रिगेड को मुश्कोह सेक्टर भेजा गया ताकि वहां की जिम्मेदारी संभाली जा सके। 24 मई को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सीसीएस बैठक में भारतीय वायुसेना के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई। साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया कि अभियान के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) या अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं की जाएगी।

26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया। पहले ही दिन तीन विमान और हेलीकॉप्टर खोने के बाद वायुसेना ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और ऊंचाई पर स्थित लक्ष्यों के अनुसार अभियान को फिर से तैयार किया।

इसी दौरान 26-27 मई को पाकिस्तान सेना प्रमुख और रावलपिंडी स्थित चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के बीच हुई बातचीत भारतीय एजेंसियों ने इंटरसेप्ट की। इन बातचीतों से पहली बार स्पष्ट प्रमाण मिला कि कारगिल घुसपैठ में पाकिस्तान सेना सीधे तौर पर शामिल थी, न कि केवल आतंकवादी या घुसपैठिए।

27 मई: 6 माउंटेन डिवीजन को भी किया गया एक्टिव

27 मई 1999 को सेना मुख्यालय ने 6 माउंटेन डिवीजन को सोनमर्ग के पास जोजिला दर्रे तक पहुंचने का आदेश दिया। इसका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सैन्य बल उपलब्ध कराना था।

इसी समय भारतीय एजेंसियों द्वारा इंटरसेप्ट की गई बातचीत से यह भी साफ हो गया कि कारगिल की पूरी योजना पाकिस्तान सेना की टॉप लीडरशिप उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ की जानकारी में बनाई गई थी।

31 मई: प्रधानमंत्री ने माना युद्ध जैसे हालात

31 मई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि कारगिल में युद्ध जैसी स्थिति बन चुकी है। इसके बाद सैन्य और प्रशासनिक स्तर पर फैसलों में तेजी आने लगी। (Kargil War Timeline 1999)

1 जून: 8 माउंटेन डिवीजन ने संभाली कमान

1 जून को 8 माउंटेन डिवीजन के टैक्टिकल मुख्यालय ने मुश्कोह और द्रास सेक्टर की जिम्मेदारी संभाल ली। यहीं से भारतीय सेना ने अलग-अलग क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जवाबी अभियान शुरू किया।

4 जून: स्पेशल फोर्स की एंट्री

4 जून 1999 को 9 पैरा स्पेशल फोर्स की बटालियन, जिसकी कमान कर्नल जॉन एबॉट के पास थी, कारगिल पहुंची।
इसके बाद 50 पैरा ब्रिगेड, जिसकी कमान ब्रिगेडियर प्रभोध भारद्वाज संभाल रहे थे, को भी अभियान में शामिल किया गया। इन विशेष बलों को कठिन पर्वतीय इलाकों में विशेष ऑपरेशन के लिए लगाया गया।

6 जून: बोफोर्स तोप का इस्तेमाल

6 जून को भारतीय सेना ने पहली बार बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर का लंबी दूरी से सीधे टारगेट पर फायर करने का प्रयोग तोलोलिंग में किया। सामान्य तौर पर बोफोर्स का उपयोग अप्रत्यक्ष गोलाबारी के लिए किया जाता है, लेकिन कारगिल की ऊंची पहाड़ियों में इसे सीधे टारगेट पर दागा गया। इससे दुश्मन के बंकरों को भारी नुकसान पहुंचा और आगे के हमलों के लिए रास्ता तैयार हुआ।

12 जून: तोलोलिंग पर पहला बड़ा हमला

12 जून 1999 को 8 माउंटेन डिवीजन के नेतृत्व में 56 माउंटेन ब्रिगेड ने तोलोलिंग हाइट्स और पॉइंट 5140 पर बड़ा हमला शुरू किया।

यह हमला बेहद कठिन था क्योंकि पाकिस्तानी सैनिक ऊंची चोटियों पर बैठे थे, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से चढ़ाई करते हुए हमला करना पड़ रहा था। (Kargil War Timeline 1999)

13 जून: तोलोलिंग पर फहराया तिरंगा

13 जून 1999 कारगिल युद्ध का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। 2 राजपूताना राइफल्स ने भीषण लड़ाई के बाद तोलोलिंग हाइट्स पर कब्जा कर लिया। यह कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की पहली बड़ी टैक्टिकल जीत थी।
तोलोलिंग की जीत से द्रास क्षेत्र में भारतीय सेना की स्थिति मजबूत हुई और आगे के अभियानों के लिए आधार तैयार हुआ।

17 जून: पॉइंट 5140 की ओर बढ़ा अभियान

17 जून को 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने रॉकी नॉब क्षेत्र में दिन के उजाले में हमला किया। यह अभियान सफल रहा और भारतीय सेना ने आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति हासिल कर ली।

19 जून: पॉइंट 5140 पर कब्जा

19 जून 1999 को 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने पॉइंट 5140 पर सफल हमला किया। यह द्रास क्षेत्र की सबसे ऊंची टैक्टिकल चोटियों में से एक थी। इसी अभियान के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने “ये दिल मांगे मोर” का मैसेज दिया था, जो बाद में पूरे देश में चर्चा का विषय बना।

पॉइंट 5140 पर कब्जा मिलने के बाद भारतीय सेना को टाइगर हिल की दिशा में आगे बढ़ने में महत्वपूर्ण बढ़त मिली।

28 जून: मारपोला रिज पर सफलता

28 जून को भारतीय सेना ने मारपोला रिज क्षेत्र में अभियान शुरू किया। 56 माउंटेन ब्रिगेड के नेतृत्व में 2 राजपूताना राइफल्स ने ब्लैक रॉक क्षेत्र में सफलता हासिल की, जबकि 18 गढ़वाल राइफल्स ने पॉइंट 4700 पर कब्जा कर लिया।

इन सफलताओं से द्रास क्षेत्र में पाकिस्तान की कई अग्रिम पोस्ट दबाव में आ गईं।

1 जुलाई: सैंडो टॉप पर स्पेशल ऑपरेशन

1 जुलाई को 9 पैरा स्पेशल फोर्स ने टारगिल हिल के नीचे सैंडो टॉप पर विशेष अभियान शुरू किया। दिन निकलने के बाद दुश्मन की नजर पड़ने पर स्पेशल फोर्सेज को आर्टिलरी की आड़ लेकर पीछे हटना पड़ा। इसके बाद अभियान की रणनीति में बदलाव किया गया।

3 और 4 जुलाई: टाइगर हिल की निर्णायक लड़ाई

3 जुलाई 1999 को 92 माउंटेन ब्रिगेड, जिसकी कमान ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा के पास थी, उन्होंने 18 ग्रेनेडियर्स के साथ मिलकर टाइगर हिल पर हमला शुरू किया। 4 जुलाई की सुबह भारतीय सैनिक टाइगर हिल की चोटी तक पहुंच गए। हालांकि शुरुआती घोषणा समय से पहले कर दी गई थी, लेकिन लगातार लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने पूरी चोटी पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उसी दिन 79 माउंटेन ब्रिगेड के नेतृत्व में ब्रिगेडियर रमेश कक्कड़ ने पॉइंट 4875 पर भी सफल हमला किया।

7 जुलाई: ट्विन बंप पर कब्जा

7 जुलाई को 2 नागा रेजिमेंट ने ट्विन बंप पर कब्जा कर लिया। इस सफलता से पॉइंट 4875 के आसपास भारतीय सेना की स्थिति और मजबूत हो गई। पॉइंट 4875 (टाइगर हिल कॉम्प्लेक्स का हिस्सा) मुश्कोह वैली में स्थित एक प्रमुख ऊंची चोटी थी। पाकिस्तानी सेना ने इसकी चोटियों पर कब्जा करके भारतीय सैनिकों और सप्लाई काफिले पर तोपों और मोर्टार से हमला कर रही थी।

2 नागा रेजिमेंट (कमांडिंग ऑफिसर कर्नल डी.के. बादोला) को 27 जून 1999 को द्रास-मश्कोह सेक्टर में शामिल किया गया। सिर्फ 7 दिनों के एक्रोमेटाइजेशन (ऊंचाई के अभ्यस्त होने) के बाद ही उन्हें ट्विन बंप्स पर हमला करने का काम सौंपा गया। यह हमला टाइगर हिल पर हमला कर रही इकाइयों (जैसे 8 सिख) पर दबाव कम करने के लिए था। आर्टिलरी से ट्विन बंप्स पर भारी गोलाबारी की गई। इससे पाकिस्तानी ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा।
ट्विन बंप्स पर कब्जे के बाद पाकिस्तानी सेना को पॉइंट 4875 और टाइगर हिल क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा।

2 नागा रेजिमेंट को इस ऑपरेशन में भारी कीमत चुकानी पड़ी। उनके लगभग 18 सैनिक शहीद हुए। यूनिट को बैटल ऑनर: मुश्कोह, थिएटर ऑनर: कारगिल और सीओएएस यूनिट सिटेशन का सम्मान मिला।

10 जुलाई: पाकिस्तान ने हार मानी

लगातार सैन्य दबाव के बाद 10 जुलाई 1999 को पाकिस्तान ने संघर्षविराम स्वीकार किया। पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) ने 10 जुलाई से सैनिकों की वापसी शुरू करने और 16 जुलाई तक इसे पूरा करने पर सहमति दी। मश्कोह से 12–15 जुलाई, द्रास से 14–15 जुलाई और बटालिक से 15–16 जुलाई तक वापसी की बात हुई।

16 जुलाई: पीछे हटने के वादे से मुकरा पाकिस्तान

16 जुलाई को भारतीय सेना ने पाया कि पाकिस्तान ने तय समय के अनुसार सभी क्षेत्रों से सैनिक नहीं हटाए हैं।
इसके बाद कई स्थानों पर भारतीय सेना ने अभियान जारी रखा। कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तानी सैनिक अभी भी भारतीय क्षेत्र पर मौजूद थे। वहीं, वापसी के दौरान पाकिस्तान ने कई जगहों पर माइंस और बूबी ट्रैप बिछा दिए थे।
जबकि तीन प्रमुख फीचर्स पर पाकिस्तान की उपस्थिति अभी भी बनी हुई थी।

21 जुलाई: अंतिम सैन्य कार्रवाई की मंजूरी

21 जुलाई 1999 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से शेष घुसपैठियों को पूरी तरह बाहर निकालने के लिए अंतिम सैन्य कार्रवाई की अनुमति मांगी गई। उसी दिन अनुमति मिलने के बाद भारतीय सेना ने शेष क्षेत्रों में अभियान शुरू किया।

26 जुलाई: कारगिल विजय दिवस

26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने घोषणा की कि सभी घुसपैठियों और पाकिस्तानी सैनिकों को कब्जे वाले क्षेत्रों से पूरी तरह बाहर निकाल दिया गया है। इसी दिन को हर वर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

अगस्त में भी जारी रही सैन्य कार्रवाई

इसके बाद भी पाकिस्तान की ओर से तोपखाने की गोलाबारी जारी रही। 20 अगस्त 1999 को भारतीय तोपखाने ने पोस्ट 44 पर भारी जवाबी कार्रवाई की। यह पोस्ट पॉइंट 13620 के पास स्थित थी। युद्ध समाप्त होने के बाद भी सेना ने सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा मजबूत करने का काम जारी रखा। मध्य अगस्त 1999 में 8 माउंटेन डिवीजन को कारगिल क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने और खाली स्थानों पर परमानेंस डिफेंस सिस्टम तैयार करने का आदेश दिया गया। (Kargil War Timeline 1999)

अब दुश्मन हैक नहीं कर पाएगा भारत के सीक्रेट मैसेज! DRDO ने पूरे किए क्वांटम कम्युनिकेशन के मिलिट्री ट्रायल्स

DRDO Quantum Communication
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DRDO Quantum Communication: भारत ने सिक्योर मिलिट्री कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने फाइबर बेस्ड क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) सिस्टम के मिलिट्री फील्ड ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह सिस्टम ऐसा सुरक्षित कम्युनिकेशन नेटवर्क तैयार करता है, जिसे रास्ते में कोई सुन नहीं सकता और न ही उसमें सेंध लगा सकता है। डीआरडीओ ने इस तकनीक को बेंगलुरु की भारतीय कंपनी टैकबिट लैब्स के साथ मिलकर तैयार किया है।

सूत्रों के मुताबिक, इसका परीक्षण मिलिट्री इकोसिस्टम में किया गया, वहीं यह सिस्टम भविष्य में भारत के स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन नेटवर्क की सुरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। यह तकनीक बड़े पैमाने पर मल्टी-हॉप क्वांटम नेटवर्क बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

DRDO Quantum Communication: क्या है क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम

आमतौर पर जब कोई संदेश इंटरनेट या किसी सुरक्षित नेटवर्क के जरिए भेजा जाता है तो उसे एन्क्रिप्शन यानी विशेष कोड में बदल दिया जाता है। इस कोड को खोलने के लिए एक डिजिटल “की” यानी चाबी की जरूरत होती है।

यहीं से क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) की भूमिका शुरू होती है। यह तकनीक उस डिजिटल चाबी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक इस तरह भेजती है कि अगर कोई तीसरा व्यक्ति बीच में उसे पकड़ने या पढ़ने की कोशिश करे, तो सिस्टम तुरंत इसकी जानकारी दोनों अधिकृत पक्षों को दे देता है।

यानी संदेश चोरी होने से पहले ही पता चल जाता है कि नेटवर्क में किसी ने हस्तक्षेप किया है।

यह तकनीक सामान्य एन्क्रिप्शन से कैसे है अलग

आज दुनिया में ज्यादातर सिक्योर मैथेमेटिकल कम्युनिकेशन एन्क्रिप्शन पर बेस्ड हैं। बैंकिंग, मिलिट्री नेटवर्क, सरकारी डेटा और इंटरनेट सेवाओं में इसी प्रकार की सुरक्षा का इस्तेमाल होता है।

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में आने वाले क्वांटम कंप्यूटर इतनी अधिक क्षमता वाले होंगे कि वे आज इस्तेमाल हो रहे कई एन्क्रिप्शन सिस्टम को काफी तेजी से तोड़ सकेंगे।

इसी खतरे को देखते हुए दुनिया के कई देश क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम कर रहे हैं।

क्यूकेडी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सुरक्षा केवल गणित पर आधारित नहीं होती, बल्कि क्वांटम फिजिक्स के नियमों पर आधारित होती है। इसलिए यदि कोई बीच में जानकारी चुराने की कोशिश करता है तो स्वयं क्वांटम अवस्था बदल जाती है और सिस्टम तुरंत अलर्ट कर देता है।

कैसे काम करता है ये सिस्टम

क्वांटम कम्युनिकेशन में जानकारी भेजने के लिए फोटॉन यानी प्रकाश के अत्यंत छोटे कणों का इस्तेमाल किया जाता है। इन फोटॉनों में विशेष प्रकार की क्वांटम जानकारी मौजूद होती है। यदि कोई व्यक्ति इन्हें रास्ते में मापने या कॉपी करने की कोशिश करता है तो इनकी मूल अवस्था बदल जाती है।

यही बदलाव सिक्योरिटी सिस्टम को बता देता है कि किसी ने कम्युनिकेशन में दखल देने की कोशिश की है। इसके बाद पूरी की दोबारा तैयार की जाती है और संदिग्ध कम्युनिकेशन रिसीव नहीं होता। यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे सिक्योर कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में से एक माना जाता है। (DRDO Quantum Communication)

डीआरडीओ ने किस तरह का सिस्टम तैयार किया

डीआरडीओ ने जिस सिस्टम का परीक्षण किया है, वह फाइबर बेस्ड क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है। यह तकनीक पहले से मौजूद ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के साथ काम कर सकती है। नई केबल बिछाने की जरूरत कम पड़ती है और मौजूदा कम्युनिकेशन स्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

डीआरडीओ का कहना है कि यह सिस्टम केवल एक लिंक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगे चलकर कई सुरक्षित नेटवर्क को जोड़ने वाले मल्टी-हॉप नेटवर्क का आधार बनेगा।

टैकबिट लैब्स की रही अहम भूमिका

इस परियोजना में डीआरडीओ के साथ बेंगलुरु स्थित टैकबिट लैब्स ने भी काम किया है। यह भारतीय कंपनी क्वांटम साइबर सुरक्षा, क्वांटम रैंडम नंबर जेनरेटर और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी जैसे क्षेत्रों में काम करती है।

डीआरडीओ के अनुसार, प्रयोगशाला स्तर पर विकसित तकनीक को वास्तविक उत्पाद में बदलने का काम इसी साझेदारी के माध्यम से किया गया। (DRDO Quantum Communication)

डीआरडीओ कई सालों से कर रहा है क्वांटम तकनीक पर काम

क्वांटम तकनीक पर शोध को आगे बढ़ाने के लिए डीआरडीओ ने मई 2025 में दिल्ली के मेटकॉफ हाउस परिसर में क्वांटम टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (क्यूटीआरसी) की स्थापना की थी। इस केंद्र में सुरक्षित क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग और पोस्ट-क्वांटम साइबर सुरक्षा से जुड़े कई आधुनिक प्रयोग किए जा रहे हैं।

इस रिसर्च सेंटर में सिंगल फोटॉन सोर्स की जांच, लेजर कैरेक्टराइजेशन, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक का परीक्षण, अल्ट्रा स्मॉल एटॉमिक क्लॉक, एटॉमिक मैग्नेटोमीटर और अन्य अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं बनाई गई हैं। यहां वैज्ञानिक भविष्य के सुरक्षित सैन्य नेटवर्क के लिए नई तकनीकों पर लगातार काम कर रहे हैं।

पिछले कई सालों से डीआरडीओ लगातार क्वांटम कम्युनिकेशन पर अनुसंधान कर रहा है। वर्ष 2022 में डीआरडीओ ने प्रयागराज और विंध्याचल के बीच लगभग 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर देश का पहला इंटरसिटी क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया था। उस समय पहली बार सामान्य टेलीकॉम फाइबर के जरिए सुरक्षित क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन का प्रदर्शन किया गया था।

इसके बाद आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर डीआरडीओ ने एक किलोमीटर से अधिक दूरी तक फ्री स्पेस ऑप्टिकल लिंक के जरिए एंटैंगलमेंट आधारित सुरक्षित संचार का सफल प्रदर्शन किया था।

उस परीक्षण के दौरान क्वांटम बिट एरर रेट सात प्रतिशत से कम रही, जिसे इस प्रकार के परीक्षणों में अच्छा माना जाता है। सुरक्षित की तैयार करने की गति भी सफल रही थी।

आईआईटी दिल्ली के साथ मिला बड़ा अनुभव

डीआरडीओ के डीआरडीओ-इंडस्ट्री-अकादमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तहत आईआईटी दिल्ली में क्वांटम कम्युनिकेशन पर लगातार अनुसंधान चल रहा है। पिछले साल वैज्ञानिकों ने क्वांटम साइबर सिक्योरिटी से जुड़ा सफल प्रदर्शन किया था। इसमें यह दिखाया गया कि भविष्य में क्वांटम नेटवर्क और क्वांटम इंटरनेट जैसे सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं। (DRDO Quantum Communication)

एंटैंगलमेंट आधारित क्यूकेडी क्या होती है

डीआरडीओ जिस तकनीक पर काम कर रहा है, उसमें क्वांटम एंटैंगलमेंट का इस्तेमाल भी शामिल है। इसे सामान्य क्यूकेडी की तुलना में अधिक सुरक्षित माना जाता है।

एंटैंगलमेंट ऐसी अवस्था होती है जिसमें दो फोटॉन एक-दूसरे से विशेष रूप से जुड़े रहते हैं। चाहे दोनों के बीच कितनी भी दूरी हो, यदि कोई तीसरा व्यक्ति उनमें से किसी एक को छूने या मापने की कोशिश करता है तो दोनों की क्वांटम अवस्था प्रभावित हो जाती है।

यही बदलाव अधिकृत उपयोगकर्ताओं को तुरंत बता देता है कि कम्युनिकेशन के दौरान किसी ने दखल देने की कोशिश की है। इस कारण एंटैंगलमेंट बेस्ड सिस्टम को भविष्य की सुरक्षित संचार तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पोस्ट-क्वांटम साइबर सुरक्षा क्यों बन रही है जरूरी

दुनिया भर में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ एक नए खतरे की चर्चा कर रहे हैं, जिसे “हार्वेस्ट नाउ, डिक्रिप्ट लेटर” कहा जाता है। इसका मतलब है कि कोई हमलावर आज सुरक्षित डेटा चुरा सकता है और भविष्य में जब उसके पास शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर होंगे, तब उस डेटा को पढ़ सकता है।

इसी खतरे को देखते हुए दुनिया के कई देश पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन जैसी तकनीकों पर तेजी से काम कर रहे हैं। डीआरडीओ का यह नया सिस्टम भी इसी दिशा में भारत की तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। (DRDO Quantum Communication)

IAF का बड़ा फैसला! MiG-29 फाइटर जेट के लिए स्वदेशी एवियोनिक सिस्टम भारत में बनाने की तैयारी

MiG-29 Avionics Indigenous Development
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MiG-29 Avionics Indigenous Development: भारतीय वायुसेना ने अपने पुराने हो चुके मिग-29 फाइटर जेट्स के मेंटेनेंस और ऑपरेशनल क्षमता को मजबूत करने के लिए इसमें इस्तेमाल होने वाले आठ महत्वपूर्ण एवियोनिक एग्रीगेट्स के स्वदेशी विकास के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य उन विदेशी इक्विपमेंटों का भारतीय विकल्प तैयार करना है, क्योंकि उनकी उपलब्धता समय के साथ मुश्किल होती जा रही है।

इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय कंपनियों से मौजूदा विदेशी सिस्टम का फंक्शनल रिप्लेसमेंट बनाने की मांग की गई है।

MiG-29 Avionics Indigenous Development: क्यों उठाना पड़ा यह कदम

मिग-29 भारतीय वायुसेना का एक महत्वपूर्ण मल्टीरोल फाइटर जेट है। यह विमान 1980 के दशक के अंत में वायुसेना में शामिल हुआ था और बाद में इसे मिग-29 यूपीजी मानक तक अपग्रेड किया गया। इन विमानों में आधुनिक रडार, डिजिटल कॉकपिट, बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और हवा में ईंधन भरने जैसी सुविधाएं जोड़ी गईं।

इसके बावजूद विमान के कई इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट पुराने हो चुके हैं। इनमें इस्तेमाल होने वाले कई पुर्जों का उत्पादन बंद हो चुका है या उनकी सप्लाई सीमित हो गई है। ऐसे में स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और रखरखाव बड़ी चुनौती बन गई है।

इसी समस्या को देखते हुए वायुसेना अब विदेशी इक्विपमेंटों की नकल करने के बजाय नई पीढ़ी के भारतीय इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डेवलप करना चाहती है।

पूरी तकनीक बदलने की योजना

पुणे स्थित वायुसेना के बेस रिपेयर डिपो (9 बीआरडी) की तरफ से यह ईओआई जारी किया गया है। इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारतीय वायुसेना पारंपरिक तरीके से अलग रास्ता अपना रही है। इससे पहले किसी खराब इक्विपमेंट का वैसा ही दूसरा इक्विपमेंट तैयार करने का कोशिश की जाती थी। लेकिन अब वायुसेना ने टेक्नोलॉजी स्पेसिफिक इंडिजनाइजेशन मॉडल अपनाया है। इसमें समान तकनीक वाले कई इक्विपमेंट्स को एक ग्रुप में रखकर उनके लिए एक साझा हार्डवेयर प्लेटफॉर्म डेवलप किया जाएगा।

इसके बाद अलग-अलग काम केवल सॉफ्टवेयर के जरिए कराए जाएंगे। इसे सॉफ्टवेयर डिफाइंड एवियोनिक सिस्टम कहा जाता है। इससे भविष्य में किसी एक इक्विपमेंट के खराब होने पर पूरा सिस्टम बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। केवल सॉफ्टवेयर या संबंधित मॉड्यूल अपडेट करके काम किया जा सकेगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development

किन आठ सिस्टम को भारत में किया जाएगा तैयार

ईओआई में जिन आठ प्रमुख एवियोनिक एग्रीगेट्स को शामिल किया गया है, उनमें रडार के लिए पावर और सिंक्रोनाइजेशन सिस्टम, रिसीवर-एक्साइटर यूनिट, ट्रांसमीटर यूनिट, कैमरा इलेक्ट्रॉनिक यूनिट, वोल्टेज रेक्टिफायर, एयरबोर्न प्रोटेक्टेड रिकॉर्डर, कोड कन्वर्टर और रडार ट्रांसमीटर शामिल हैं।

इनमें से कुछ इक्विपमेंट सीधे रडार ऑपरेशन से जुड़े हैं, जबकि कुछ फ्लाइट रिकॉर्डिंग, पावर मैनेजमेंट और सेंसर डेटा प्रोसेसिंग का काम करते हैं। कई सिस्टम को वायुसेना ने मिशन क्रिटिकल कैटेगरी में रखा है, यानी इनके बिना विमान का सुरक्षित ऑपरेशन संभव नहीं होगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development

रडार सिस्टम को मिलेगा नया भारतीय विकल्प

प्रोजेक्ट में शामिल सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम रडार से जुड़े हैं। एक यूनिट रडार के विभिन्न हिस्सों को स्टेबल इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई और सिंक्रोनाइजेशन सिग्नल उपलब्ध कराती है। दूसरी यूनिट रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नलों को रिसीव और प्रोसेस करती है। तीसरी यूनिट रडार ट्रांसमीटर के लिए हाई पावर सिग्नल तैयार करती है। इन सभी का स्वदेश में डेवलपमेंट होने से भविष्य में विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी।

कॉकपिट रिकॉर्डर और फ्लाइट डेटा सिस्टम भी होंगे स्वदेशी

प्रोजेक्ट में एयरबोर्न प्रोटेक्टेड रिकॉर्डर भी शामिल है। यही सिस्टम उड़ान के दौरान विमान के विभिन्न पैरामीटर और कॉकपिट की आवाज रिकॉर्ड करता है। किसी दुर्घटना या तकनीकी जांच के समय यही रिकॉर्डर सबसे महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है।

इसके अलावा कैमरा इलेक्ट्रॉनिक यूनिट और वोल्टेज रेक्टिफायर जैसे इक्विपमेंट भी डेवलप किए जाएंगे, जो मल्टी फंक्शन डिस्प्ले और डिजिटल वीडियो रिकॉर्डिंग सिस्टम को बिजली उपलब्ध कराते हैं। MiG-29 Avionics Indigenous Development

मॉडर्न ओपन आर्किटेक्चर पर बनेगा पूरा सिस्टम

भारतीय वायुसेना ने इस प्रोजेक्ट में मॉड्यूलर ओपन सिस्टम अप्रोच (मोसा) अपनाने का फैसला किया है। इस मॉडल में पूरा हार्डवेयर ओपन वीपीएक्स प्लेटफॉर्म पर आधारित होगा। इससे भविष्य में किसी भी मॉड्यूल को आसानी से बदला या अपग्रेड किया जा सकेगा।

सॉफ्टवेयर का विकास अंतरराष्ट्रीय डीओ-178सी स्टैंडर्ड के अनुसार होगा, जबकि हार्डवेयर डीओ-254 सर्टिफिकेशन प्रक्रिया का पालन करेगा। यही स्टैंडर्ड दुनिया के आधुनिक सैन्य और नागरिक विमानों में इस्तेमाल किए जाते हैं।

नई तकनीक तैयार करने से पहले भारतीय कंपनियों को पुराने विदेशी इक्विपमेंटों का विस्तृत तकनीकी अध्ययन करना होगा। इसके तहत प्रत्येक इक्विपमेंट की कार्यप्रणाली, इनपुट और आउटपुट सिग्नल, इंटरफेस, प्रदर्शन सीमा, फर्मवेयर और इलेक्ट्रॉनिक व्यवहार का विश्लेषण किया जाएगा। इसके बाद भारतीय कंपनियां ऐसा नया सिस्टम विकसित करेंगी जो पुराने इक्विपमेंट की सभी क्षमताओं को पूरा कर सके।

परीक्षण के लिए बनेगा विशेष टेस्ट बेड

वायुसेना ने इस प्रोजेक्ट में आधुनिक पीएक्सआईई आधारित टेस्ट बेड डेवलप करने की भी योजना बनाई है। इसमें लैबव्यू आधारित सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाएगा। यही प्लेटफॉर्म दुनिया की कई बड़ी एयरोस्पेस कंपनियां
टेस्टिंग और मेजरमेंट के लिए इस्तेमाल करती हैं।

नए तैयार सिस्टम की तुलना ऑरिजनल इक्विपमेंट से की जाएगी। इसके लिए दोनों पर समान टेस्ट वेक्टर चलाकर परिणामों का मिलान किया जाएगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development

हर सिस्टम के बनेंगे तीन प्रोटोटाइप

वायुसेना ने प्रत्येक एवियोनिक एग्रीगेट के कम से कम तीन प्रोटोटाइप तैयार करने की शर्त रखी है। इनका इस्तेमाल डिजाइन सत्यापन, तकनीकी परीक्षण और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में किया जाएगा। सभी सिस्टम को सीईएमआईएलएसी, आरसीएमए और डीजीएक्यूए जैसी डिफेंस सर्टिफिकेशन एजेंसियों की मंजूरी लेनी होगी।

किन कंपनियों को मिलेगा मौका

इस प्रोजेक्ट में केवल भारतीय कंपनियां भाग ले सकेंगी। ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनके पास एवियोनिक सिस्टम के डिजाइन, डेवलपमेंट, रिपेयर या ओवरहॉल का अनुभव हो। साथ ही उन्हें मिलिट्री एयरवर्थनेस मानकों की जानकारी भी होनी चाहिए। यदि कोई कंपनी किसी विदेशी तकनीकी साझेदार के साथ काम करना चाहती है तो उसे उसकी भूमिका भी स्पष्ट करनी होगी। MiG-29 Avionics Indigenous Development

मिग-29 बेड़े के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

भारतीय वायुसेना के पास इस समय लगभग 55 से 65 मिग-29 यूपीजी लड़ाकू विमान हैं। इनमें सिंगल-सीटर और ट्विन-सीटर ट्रेनर दोनों शामिल हैं। ये विमान मुख्य रूप से पंजाब के अदमपुर और गुजरात के जामनगर एयरबेस से संचालित तीन स्क्वाड्रनों में तैनात हैं। यह बेड़ा वायुसेना की एयर डिफेंस क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं वायुसेना की योजना इसकी सर्विस लाइफ 40 साल से बढ़ाकर 50 साल करने की है।

भारतीय वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की संख्या बनाए रखना इस समय बड़ी चुनौती है। वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 फाइटर स्क्वाड्रन की है, लेकिन फिलहाल उसके पास केवल 29 से 31 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। मिग-21 लड़ाकू विमानों के चरणबद्ध रिटायर होने के बाद यह कमी और बढ़ गई है। ऐसे में मिग-29 जैसे विमानों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। स्वदेशी तेजस एमके-2 लड़ाकू विमान के पूरी तरह सेवा में आने में अभी समय है। इसलिए वायुसेना चाहती है कि मिग-29 बेड़ा लंबे समय तक पूरी क्षमता के साथ सेवा में बना रहे। इसी वजह से इसके पुराने और दुर्लभ हो चुके एवियोनिक सिस्टम का स्वदेशी विकल्प तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, ताकि इन विमानों की ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित न हो।

भारतीय वायुसेना इन विमानों को सेवा में बनाए रखने के लिए लगातार अपग्रेड और लाइफ एक्सटेंशन कार्यक्रम चला रही है। हाल के सालों में मिग-29 में एएसआरएएएम हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, एचएसएलडी एमके-2 प्रिसीजन गाइडेड बम, स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो जैसी नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं। (MiG-29 Avionics Indigenous Development)

सर क्रीक में पाकिस्तान को लगेगा झटका! ऑपरेशन के लिए भारतीय सेना को मिलेंगी पानी और जमीन दोनों पर चलने वालीं ये खास बोटें

Indian Army Amphibious Boats
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Indian Army Amphibious Boats: पाकिस्तान से लगे सर क्रीक इलाके से लेकर अंडमान-निकोबार तक भारतीय सेना की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने 11 रिजिड हल बोट (एम्फीबियस) की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है। यह खरीद बाय (इंडियन) श्रेणी के तहत होगी, जिसमें कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल जरूरी है।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी आरएफपी के मुताबिक, इन 11 बोटों में से 7 भारतीय सेना और 4 भारतीय नौसेना को मिलेंगी। सेना की बोटें गुजरात के लखपत स्थित 235 इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट यूनिट को दी जाएंगी, जबकि नौसेना की दो बोटें मुंबई और दो पोर्ट ब्लेयर में तैनात की जाएंगी। इन बोटों का इस्तेमाल ऐसे इलाकों में तेज और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा, जहां सामान्य नावें या पहिए वाले वाहन काम नहीं कर पाते।

Indian Army Amphibious Boats: क्या होती हैं एम्फीबियस रिजिड हल बोट

एम्फीबियस रिजिड हल बोट ऐसी विशेष मिलिट्री बोट होती हैं, जो केवल पानी में ही नहीं बल्कि जमीन पर भी चल सकती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि समुद्र, ज्वारीय दलदली क्षेत्र, उथली खाड़ियां और कीचड़ वाले इलाकों में भी यह बिना दिक्कत के आगे बढ़ सकती है।

सामान्य नावें कम ज्वार के समय अक्सर कीचड़ में फंस जाती हैं, जबकि आम मिलिट्री व्हीकल्स दलदल में धंस जाते हैं। एम्फीबियस बोटों में इस तरह की समस्याएं नहीं आती हैं। जरूरत पड़ने पर यह पानी से सीधे जमीन पर आ सकती है और फिर दोबारा पानी में उतर सकती हैं।

रक्षा मंत्रालय ने आरएफपी में स्पष्ट किया है कि नई बोटों को सेना की जरूरतों को देखते हुए मजबूत बनाया जाएगा। इनमें तेज रफ्तार, बेहतर समुद्री स्थिरता और ऐसा हल डिजाइन होगा जिससे तेज रफ्तार पर भी क्रू मेंबर्स को कम झटके महसूस हों। (Indian Army Amphibious Boats)

सर क्रीक में क्यों है ऐसी बोटों की जरूरत

इन बोटों की सबसे बड़ी भूमिका गुजरात के सर क्रीक इलाके में होगी। लगभग 96 किलोमीटर लंबा सर क्रीक भारत और पाकिस्तान के बीच एक ज्वारीय मुहाना है, जो अरब सागर में जाकर मिलता है।

यह इलाका पूरी तरह सामान्य समुद्री क्षेत्र भी नहीं है और पूरी तरह जमीन भी नहीं। यहां ज्वार-भाटा के साथ पानी का स्तर लगातार बदलता रहता है। चारों ओर दलदल, उथले चैनल और कीचड़ भरे इलाके होने के कारण पेट्रोलिंग करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहता है।

भारत का मानना है कि सीमा इस क्रीक के बीच से गुजरती है, जबकि पाकिस्तान पूरे क्रीक पर दावा करता है। इसी विवाद के कारण समुद्री सीमा का निर्धारण भी प्रभावित होता है।

घुसपैठ और तस्करी रोकने में मिलेगी मदद

सर क्रीक और उससे जुड़े हरामी नाला इलाके का इस्तेमाल कई बार तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध घुसपैठ के लिए किया जाता रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए इन इलाकों में लगातार निगरानी बनाए रखना आसान नहीं होता।

सूत्रों के अनुसार, इन नई एम्फीबियस बोटों के आने से सेना दलदली इलाकों में बिना रुके पेट्रोलिंग कर सकेगी। जरूरत पड़ने पर छोटी टुकड़ियों को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सकेगा। इससे निगरानी और जवाबी कार्रवाई दोनों अधिक प्रभावी होंगी। (Indian Army Amphibious Boats)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली स्थिति

सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियों ने पिछले साल सर क्रीक क्षेत्र के सामने पाकिस्तान की ओर नए बंकर, फॉरवर्ड पोस्ट्स और अन्य स्ट्रक्चर्स के निर्माण पर भी ध्यान दिया था। इसी वजह से इस क्षेत्र में भारतीय सेना की पेट्रोलिंग बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई।

अंडमान-निकोबार में भी बढ़ेगी क्षमता

नई बोटें केवल पश्चिमी सीमा तक सीमित नहीं रहेंगी। चार बोटें भारतीय नौसेना को मिलेंगी, जिनमें दो मुंबई और दो पोर्ट ब्लेयर में तैनात की जाएंगी।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में बड़ी संख्या में छोटे द्वीप, संकरे समुद्री मार्ग और उथले तटीय क्षेत्र हैं। ऐसे इलाकों में एम्फीबियस बोट तेज गश्त, तटीय सुरक्षा, विशेष अभियान और राहत कार्यों में उपयोगी होती हैं। (Indian Army Amphibious Boats)

जमीन और पानी दोनों पर चलेंगी

आरएफपी के अनुसार, बोट न केवल पानी में ही तेज रफ्तार से चलेगी, बल्कि इसमें हाइड्रोलिक तरीके से ऑपरेट होने वाले वापस मुड़ने वाले पहिए लगाए जाएंगे।

इन्हीं पहियों की मदद से यह जमीन पर भी चल सकेगी। जमीन पर इसकी गति लगभग 10 से 15 किलोमीटर प्रति घंटा होगी और यह लगभग 15 डिग्री ढलान भी चढ़ सकेगी।

इससे सैनिकों को पानी से उतरने के बाद अलग वाहन की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Indian Army Amphibious Boats)

40 नॉट से ज्यादा होगी रफ्तार

इन बोटों की अधिकतम गति 40 नॉट से अधिक होनी चाहिए। एक नॉट लगभग 1.85 किलोमीटर प्रति घंटा के बराबर होता है। इसका अर्थ है कि बोट लगभग 74 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक की गति से पानी में चल सकेगी। इतनी गति सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से प्रतिक्रिया देने और गश्त के दौरान काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

साथ ही, हर बोट में लगभग 12 पूरी तरह हथियारों से लैस सैनिक सवार हो सकेंगे। इसके अलावा यह 1,500 किलोग्राम से अधिक पेलोड लेकर चल सकेगी। इससे सैनिकों के साथ हथियार, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स और अन्य जरूरी सैन्य सामग्री भी आसानी से पहुंचाई जा सकेगी। (Indian Army Amphibious Boats)

बोट में मिलेगा बैलिस्टिक प्रोटेक्शन

आरएफपी के अनुसार, बोट के आगे और पीछे हथियार लगाने की व्यवस्था होगी। साथ ही चालक दल की सुरक्षा के लिए बैलिस्टिक प्रोटेक्शन भी दिया जाएगा ताकि ऑपरेशन के दौरान गोलीबारी की स्थिति में सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

हर बोट में कई जरूरी सैन्य उपकरण पहले से लगाए जाएंगे। इनमें कम्युनिकेशन सिस्टम, लाइफ सेविंग जैकेट्स, आग बुझाने के उपकरण, प्राथमिक उपचार किट, स्ट्रेचर, मूरिंग लाइन और अन्य सुरक्षा उपकरण शामिल होंगे।
इसके अलावा तकनीकी दस्तावेज, गुणवत्ता जांच योजना और रखरखाव संबंधी दस्तावेज भी सप्लाई का हिस्सा होंगे।

रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि हर बोट की वारंटी 24 महीने होगी। इसके बाद 8 वर्ष का कॉम्प्रिहेंसिव मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट रहेगा। इसके अलावा पूरी प्रणाली के लिए कम से कम 10 वर्ष का प्रोडक्ट सपोर्ट उपलब्ध कराना होगा। बोट की सर्विस लाइफ कम से कम 10 वर्ष या 10,000 ऑपरेटिंग घंटे रखी गई है।

वहीं, कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत होने के बाद सभी 11 बोटों की सप्लाई 24 महीने के भीतर पूरी करनी होगी। पहले चरण में एक बोट, दूसरे चरण में चार और अंतिम चरण में छह बोटें सौंपी जाएंगी। (Indian Army Amphibious Boats)

हवाई मार्ग से भी पहुंचाई जा सकेगी

रक्षा मंत्रालय ने यह भी तय किया है कि जरूरत पड़ने पर इन बोटों को सड़क मार्ग से भारी टैंक ट्रांसपोर्टर पर ले जाया जा सके। इसके अलावा इन्हें भारतीय वायुसेना के आईएल-76 और सी-17 ग्लोबमास्टर परिवहन विमान में भी ले जाने योग्य बनाया जाएगा। इससे किसी भी सैन्य क्षेत्र में कम समय में इनकी तैनाती संभव होगी। (Indian Army Amphibious Boats)

भारतीय सेना के T-72 और T-90 टैंकों के लिए आएंगे नए AI गनरी सिमुलेटर, बिना गोला दागे मिलेगी युद्ध की ट्रेनिंग

T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator: भारतीय सेना अपने टैंक चालक दल की ट्रेनिंग को और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। सेना ने टी-72 और टी-90 मेन बेटल टैंकों के लिए कुल 150 अत्याधुनिक गनरी सिमुलेटर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए मई 2026 में तीन अलग-अलग रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किए गए हैं। इनमें टी-72 टैंक के लिए 50 क्रू गनरी सिमुलेटर (सीजीएस), 50 बेसिक गनरी सिमुलेटर (बीजीएस) और टी-90 टैंक के लिए 50 क्रू गनरी सिमुलेटर (सीजीएस) शामिल हैं।

T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator: रक्षा मंत्रालय ने शुरू की खरीद प्रक्रिया

ये तीनों आरएफआई रक्षा मंत्रालय के तहत इंटीग्रेटेड हेडक्वार्टर ऑफ मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस (आर्मी) के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ आर्मर्ड कॉर्प्स एंड मैकेनाइज्ड फोर्सेज की ओर से जारी किए गए हैं।

भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टी-72 और टी-90 मुख्य युद्धक टैंक हैं। ये दोनों टैंक पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। इन टैंकों के चालक दल को लगातार अभ्यास कराना जरूरी होता है, ताकि किसी भी समय ऑपरेशन के लिए तैयार रखा जा सके।

अब तक अधिकांश गनरी एक्सरसाइज फायरिंग रेंज में असली गोला-बारूद के साथ की जाती हैं। ऐसी ट्रेनिंग में भारी खर्च आता है। इसके अलावा गोला-बारूद, ईंधन, टैंक की आवाजाही, रखरखाव और फायरिंग रेंज की उपलब्धता जैसी कई चुनौतियां भी होती हैं। मौसम खराब होने या रेंज उपलब्ध नहीं होने पर ट्रेनिंग भी प्रभावित हो सकती है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए सेना अब सिमुलेशन आधारित ट्रेनिंग पर अधिक जोर दे रही है। इससे सैनिकों को बार-बार अभ्यास कराने में आसानी होगी और वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियां भी तैयार की जा सकेंगी। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

क्या होता है गनरी सिमुलेटर

गनरी सिमुलेटर एक ऐसा डिजिटल ट्रेनिंग सिस्टम होता है, जिसमें असली टैंक के अंदर का पूरा माहौल तैयार किया जाता है। इसमें गनर और कमांडर उसी तरह बैठते हैं जैसे असली टैंक में बैठते हैं। उनके सामने वही कंट्रोल, वही साइट, वही डिस्प्ले और वही वेपन ऑपरेशन सिस्टम होता है।

जब अभ्यास शुरू होता है तो सामने बड़ी स्क्रीन पर कंप्यूटर से तैयार किया गया पूरा बेटल फील्ड दिखाई देता है। इसमें पहाड़, रेगिस्तान, जंगल, मैदान, गांव, दुश्मन के टैंक, बख्तरबंद वाहन और दूसरे मिलिट्री टारगेट दिखाए जाते हैं। चालक दल को इन्हें पहचानकर उन पर हमला करना होता है।

सिस्टम हर कार्रवाई को रिकॉर्ड करता है और यह भी बताता है कि निशाना कितना सटीक था, टारगेट पर हमला करने में कितना समय लगा और किस जगह गलती हुई।

खरीदे जाएंगे दो तरह के सिमुलेटर

सेना इस बार टी-72 टैंकों के लिए दो अलग-अलग तरह के गनरी सिमुलेटर खरीदने की तैयारी कर रही है।

पहला है क्रू गनरी सिमुलेटर (सीजीएस)। इसमें गनर और कमांडर दोनों एक साथ अभ्यास करेंगे। इसका उद्देश्य पूरे टैंक चालक दल के बीच तालमेल बढ़ाना है।

दूसरा है बेसिक गनरी सिमुलेटर (बीजीएस)। यह मुख्य रूप से गनर की व्यक्तिगत ट्रेनिंग के लिए बनाया गया है। इसमें टारगेट पहचानना, दूरी मापना, निशाना लगाना और अलग-अलग हथियारों का इस्तेमाल करना सिखाया जाता है। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

टी-72 और टी-90 के लिए अलग-अलग सिस्टम

हालांकि दोनों टैंकों में 125 मिमी की मुख्य तोप होती है, लेकिन उनके अंदर का लेआउट, कंट्रोल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अलग-अलग हैं। इसी वजह से दोनों टैंकों के लिए अलग सिमुलेटर बनाए जाएंगे।

टी-72 सिमुलेटर में उसी टैंक के कंट्रोल, गनर स्टेशन, कमांडर स्टेशन और फायर कंट्रोल सिस्टम को दोबारा तैयार किया जाएगा। इसी तरह टी-90 सिमुलेटर में टी-90 के आधुनिक उपकरण, थर्मल साइट और दूसरे सिस्टम उसी तरह काम करेंगे जैसे असली टैंक में करते हैं।

इससे चालक दल को वही अनुभव मिलेगा, जो उन्हें असली टैंक चलाते समय मिलता है।

नए सिमुलेटरों में छह दिशाओं में मूवमेंट करने वाला 6-डीओएफ मोशन प्लेटफॉर्म लगाया जाएगा। इसका मतलब है कि जब टैंक ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलेगा, अचानक मुड़ेगा या फायर करेगा, तो चालक दल को वही झटका महसूस होगा जो असली टैंक में होता है।

गोला दागने के समय रिकॉयल यानी पीछे की ओर लगने वाला झटका भी महसूस होगा। टैंक के इंजन की आवाज, ऑटो लोडर की आवाज, गोला भरने की प्रक्रिया, गोली चलने की आवाज और युद्ध क्षेत्र की अन्य ध्वनियां भी वास्तविक माहौल जैसा अनुभव देंगी।

इसके साथ ही कंप्यूटर से तैयार किए गए त्रि-आयामी युद्ध क्षेत्र में बारिश, बर्फबारी, धूल, धुआं, कोहरा, दिन और रात जैसे अलग-अलग हालात भी बनाए जा सकेंगे। इससे चालक दल हर तरह की परिस्थितियों में अभ्यास कर सकेगा।

एआई से होगी गलतियों की पहचान

नए गनरी सिमुलेटरों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) बेस्ड ट्रेनिंग सिस्टम भी शामिल होगा। इसका काम केवल अभ्यास कराना नहीं होगा, बल्कि हर सैनिक के प्रदर्शन का विश्लेषण करना भी होगा।

यदि गनर टारगेट पहचानने में देर करता है, गलत गोला चुनता है या निशाना लगाने में गलती करता है तो सिस्टम तुरंत उसे रिकॉर्ड करेगा। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इंस्ट्रक्टर यह देख सकेंगे कि चालक दल ने कहां गलती की और उसे कैसे सुधारा जा सकता है। अलग-अलग स्तर के युद्ध अभ्यास भी तैयार किए जा सकेंगे, जिनमें आसान से लेकर बेहद मुश्किल टारगेट शामिल होंगे।

अलग-अलग हथियारों का अभ्यास भी होगा

सिमुलेटर में टैंक के अलग-अलग हथियारों का इस्तेमाल भी सिखाया जाएगा। चालक दल मुख्य तोप के अलावा को-एक्सियल मशीन गन, एंटी एयरक्राफ्ट मशीन गन और स्मोक ग्रेनेड सिस्टम का भी अभ्यास कर सकेगा।

सिस्टम में अलग-अलग तरह के गोला-बारूद का भी डिजिटल मॉडल होगा। इसमें आर्मर पियर्सिंग फिन स्टेबलाइज्ड डिस्कार्डिंग सबोट (एपीएफएसडीएस), हाई एक्सप्लोसिव एंटी टैंक (एचईएटी), हाई एक्सप्लोसिव (एचई) और इनवार गाइडेड मिसाइल जैसी क्षमताओं का अभ्यास कराया जा सकेगा। इससे चालक दल अलग-अलग परिस्थितियों में सही हथियार चुनने का अनुभव हासिल करेगा। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

थर्मल साइट और फायर कंट्रोल सिस्टम का भी अभ्यास

नए सिमुलेटरों में टैंक के फायर कंट्रोल सिस्टम और थर्मल साइट भी दिया जाएगा। इससे चालक दल दिन और रात दोनों समय टारगेट खोजने और उस पर हमला करने का अभ्यास कर सकेगा।

सिस्टम में लेजर रेंज फाइंडर, दूरी मापने की प्रक्रिया, लक्ष्य को ट्रैक करना और चलते हुए टारगेट पर निशाना लगाने जैसी सभी प्रक्रियाएं शामिल होंगी। इससे जवानों को वही अनुभव मिलेगा जो वास्तविक ऑपरेशन के दौरान मिलता है।

पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं जैसे इलाके दिखेंगे

इन सिमुलेटरों में केवल सामान्य मैदान नहीं दिखेंगे, बल्कि भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं जैसे इलाके भी तैयार किए जाएंगे। कंप्यूटर से तैयार थ्रीडी नक्शों में रेगिस्तान, पहाड़ी क्षेत्र, जंगल और बर्फीले इलाके शामिल होंगे।

इसके अलावा धूल भरी आंधी, बारिश, बर्फबारी, कोहरा, धुआं और दिन-रात जैसी परिस्थितियां भी बनाई जा सकेंगी। इससे चालक दल अलग-अलग मौसम और टेरेन में टैंक चलाने का अभ्यास कर सकेगा। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

इंस्ट्रक्टर एक क्लिक में बदल सकेंगे पूरा बैटल फील्ड

इन सिमुलेटरों के साथ इंस्ट्रक्टर के लिए अलग कंट्रोल स्टेशन भी होगा। यहीं से पूरा अभ्यास संचालित किया जाएगा। इंस्ट्रक्टर किसी भी समय युद्ध क्षेत्र बदल सकेंगे, नए टारगेट जोड़ सकेंगे, टैंक में तकनीकी खराबी दिखा सकेंगे या किसी भी स्थिति को दोबारा चला सकेंगे। पूरी ट्रेनिंग रिकॉर्ड होगी, जिसे बाद में दोबारा देखकर चालक दल की समीक्षा की जा सकेगी।

15 साल तक लगातार इस्तेमाल के लिए तैयार होंगे सिस्टम

सेना ने सिमुलेटरों के लिए लंबे समय तक इस्तेमाल की शर्त भी रखी है। सूत्रों के मुताबिक, इनकी न्यूनतम सेवा अवधि 15 वर्ष होगी। इन्हें प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक लगातार चलाने की क्षमता भी होनी चाहिए।

साथ ही इन्हें माइनस 10 डिग्री सेल्सियस से लेकर 48 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और अधिक नमी वाले वातावरण में भी काम करने योग्य बनाया जाएगा। बिजली जाने की स्थिति में बैकअप पावर की व्यवस्था भी रहेगी।

एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाए जा सकेंगे

सेना चाहती है कि इन सिमुलेटरों को जरूरत पड़ने पर आसानी से एक ट्रेनिंग सेंटर से दूसरे सेंटर तक ले जाया जा सके। इसलिए इन्हें कंटेनर आधारित डिजाइन में तैयार करने की मांग की गई है। सूत्रों के अनुसार, पूरा सिस्टम ऐसा होगा जिसे सेना के अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रक से आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सके।

स्वदेशी तकनीक पर रहेगा जोर

इन आरएफआई में सेना ने कंपनियों से यह जानकारी भी मांगी है कि सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख हिस्से कितने स्वदेशी हैं। सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों के बारे में भी जानकारी देनी होगी।

इसका उद्देश्य केवल सिमुलेटर खरीदना नहीं, बल्कि देश में रक्षा सिमुलेशन तकनीक का मजबूत आधार तैयार करना भी है। रक्षा क्षेत्र में पहले से काम कर रही कई भारतीय कंपनियां इस क्षेत्र में अपनी तकनीक विकसित कर चुकी हैं और उनके इस प्रक्रिया में भाग लेने की संभावना है। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

लाइव फायरिंग पर निर्भरता होगी कम

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक सेनाएं अब सिमुलेशन आधारित प्रशिक्षण पर अधिक जोर दे रही हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इजरायल और दक्षिण कोरिया जैसी सेनाएं सालों से एडवांस टैंक सिमुलेटरों का इस्तेमाल कर रही हैं।

भारतीय सेना भी अब उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। सिमुलेटरों की मदद से गोला-बारूद की बचत होगी, टैंकों पर होने वाला घिसाव कम होगा और चालक दल को एक ही दिन में कई बार अभ्यास कराने की सुविधा मिलेगी। इससे वास्तविक फायरिंग रेंज का उपयोग केवल अंतिम चरण की ट्रेनिंग के लिए किया जा सकेगा।

अभी आरएफआई चरण में है पूरी प्रक्रिया

फिलहाल यह पूरी परियोजना रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) स्टेज में है। इसके बाद कंपनियों से मिली जानकारी का मूल्यांकन किया जाएगा। तकनीकी जरूरतों के आधार पर आगे रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी होगी। इसके बाद परीक्षण, मूल्यांकन और रक्षा खरीद प्रक्रिया के अनुसार अंतिम चयन किया जाएगा। (T-72 T-90 Tanks Gunnery Simulator)

Explainer: लद्दाख के 7 जिलों को क्यों मिल रही हैं हिल काउंसिल? चीन सीमा पर भारत की नई रणनीति से क्या होंगे बदलाव?

Ladakh 7 Hill Councils
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Ladakh 7 Hill Councils: लद्दाख में हाल ही में बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया गया है। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब लद्दाख के सभी सात जिलों में ऑटोमॉमस हिल काउंसिल बनाई जाएंगी। अभी तक केवल लेह और कारगिल में ही हिल काउंसिल थीं, लेकिन अब शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास जैसे नए जिलों को भी वही अधिकार मिलेंगे। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब पूर्वी लद्दाख में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन दोनों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैनिकों की तैनाती, मिलिट्री स्ट्रक्चर और बुनियादी सुविधाओं को तेजी से मजबूत किया है

अधिकारियों के मुताबिक, इस फैसले का मकसद प्रशासन को लोगों के और करीब ले जाना है, ताकि हर जिला अपनी जरूरत के हिसाब से विकास योजनाएं बना सके और तेजी से फैसले लिए जा सकें। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब लद्दाख में नए जिले बनाए जाने के बाद प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया जा रहा है।

Ladakh 7 Hill Councils: लद्दाख में कई सालों से चल रही थी तैयारी

लद्दाख को वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की प्रक्रिया शुरू हुई। अगस्त 2024 में गृह मंत्रालय ने पांच नए जिले बनाने को मंजूरी दी थी। इसके बाद सीमा निर्धारण, जिला मुख्यालय तय करने और प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने के लिए एक समिति बनाई गई।

समिति ने कई दौर की बैठकों और स्थानीय स्तर पर विचार-विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट उपराज्यपाल को सौंपी। रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद अप्रैल 2026 में नए जिलों की अधिसूचना जारी की गई। अब उसी प्रक्रिया के अगले चरण के रूप में सातों जिलों में हिल काउंसिल बनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। (Ladakh 7 Hill Councils)

हिल काउंसिल का क्या है रोल?

हिल काउंसिल एक स्थानीय निर्वाचित निकाय होती है, जिसे जिले के विकास और कई प्रशासनिक मामलों में अधिकार दिए जाते हैं। लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल एक्ट के तहत इसका गठन किया जाता है।

इसका उद्देश्य यह है कि दूर-दराज और कठिन इलाकों से जुड़े फैसले स्थानीय स्तर पर ही लिए जाएं, ताकि लोगों को हर काम के लिए लेह या दूसरे बड़े प्रशासनिक केंद्रों पर निर्भर न रहना पड़े।

लद्दाख में लंबे समय तक केवल दो जिले थे, लेह और कारगिल। इन्हीं दोनों जिलों में हिल काउंसिल काम कर रही थीं। लेह हिल काउंसिल की स्थापना 1995 में, जबकि कारगिल हिल काउंसिल की स्थापना 2003 में हुई थी।

इसके बाद अप्रैल 2026 में लद्दाख में पांच नए जिले बनाए गए। इनमें शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास शामिल हैं। अब इन सभी जिलों में भी पूर्ण अधिकार वाली हिल काउंसिल बनाई जाएगी।

नई काउंसिलों को मिलेंगे कौन-कौन से अधिकार?

लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने सोमवार को लेह में प्रेस वार्ता के दौरान बताया कि लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल एक्ट की धारा 3(1) में पहले से ही हर जिले के लिए हिल काउंसिल बनाने का प्रावधान मौजूद है। अब सरकार इसकी अधिसूचना जारी कर सातों जिलों में यह व्यवस्था लागू करेगी।

नए फैसले के बाद बाकी पांच जिलों को भी वही अधिकार मिलेंगे जो पहले से लेह और कारगिल की काउंसिलों के पास हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी जिले को सीमित अधिकार नहीं दिए जाएंगे।

अधिकारियों के मुताबिक सभी सात हिल काउंसिलों को समान अधिकार दिए जाएंगे। उन्हें जिले के विकास की योजना बनाने, स्थानीय स्तर पर परियोजनाओं को मंजूरी देने और कई प्रशासनिक फैसले लेने का अधिकार होगा।

काउंसिलों के पास भूमि आवंटन और भूमि प्रबंधन से जुड़े अधिकार भी होंगे। इसके अलावा जिला कैडर की नौकरियों में भर्ती और पदोन्नति से जुड़े फैसलों में भी उनकी भूमिका रहेगी।

सूत्रों के मुताबिक इसका उद्देश्य स्थानीय युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराना और जिला प्रशासन में स्थानीय भागीदारी बढ़ाना है। इससे प्रत्येक जिले की प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार कर्मचारियों की नियुक्ति करना भी आसान होगा।

हर काउंसिल का अपना अलग फंड होगा और उसे कुछ स्थानीय कर तथा शुल्क लगाने का अधिकार भी मिलेगा। इससे प्रत्येक जिले के पास अपने विकास कार्यों के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था होगी। (Ladakh 7 Hill Councils)

नए जिलों के लिए यह फैसला क्यों है जरूरी

अब तक कई योजनाएं लेह या कारगिल से तैयार होकर दूसरे इलाकों तक पहुंचती थीं। नई व्यवस्था में प्रत्येक जिला अपनी जरूरत के अनुसार विकास योजना तैयार करेगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, ग्रामीण सड़कें, स्थानीय बुनियादी ढांचा और सामाजिक कल्याण योजनाओं से जुड़े फैसले जिला स्तर पर लिए जाएंगे।

अधिकारियों का कहना है कि लद्दाख का भौगोलिक स्वरूप देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग है। यहां ऊंचे पहाड़, लंबे समय तक बर्फबारी, सीमित आबादी और दूर-दराज के गांव हैं। ऐसे में हर जिले की जरूरत भी अलग है।

लद्दाख का क्षेत्रफल बहुत बड़ा होने से आबादी बेहद कम है। यहां कई गांव ऐसे हैं जो एक-दूसरे से काफी दूर हैं और सर्दियों में महीनों तक बर्फ से कट जाते हैं।

ऐसी स्थिति में दो जिलों से पूरे लद्दाख का प्रशासन चलाना मुश्किल माना जा रहा था। नए जिले बनने के बाद अब हर जिले को अपनी अलग प्रशासनिक व्यवस्था और निर्वाचित हिल काउंसिल मिलेगी। इससे स्थानीय जरूरतों के अनुसार फैसले लेना आसान होगा।

नई व्यवस्था में किसी जिले में पर्यटन पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है तो किसी जिले में स्वास्थ्य सेवाओं या स्कूलों पर। हिल काउंसिल स्थानीय जरूरतों के अनुसार सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और सामाजिक कल्याण योजनाओं को आगे बढ़ा सकेगी। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया पहले की तुलना में तेज होने की उम्मीद है।

अनुच्छेद 371 को लेकर भी चल रही है चर्चा

मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने बताया कि लद्दाख के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था को लेकर भी अलग से विचार-विमर्श जारी है। इसके तहत केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक ऐसे निकाय की संभावना पर चर्चा हो रही है, जिसके पास विधायी, प्रशासनिक, वित्तीय और कार्यकारी अधिकार हो सकते हैं।

लद्दाख प्रशासन ने यह भी बताया है कि केंद्र सरकार के साथ विशेष संवैधानिक व्यवस्था को लेकर बातचीत जारी है। इसके तहत केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक अलग निकाय बनाने पर विचार किया जा रहा है, जिसके पास विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार हो सकते हैं।

अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल सातों जिलों में हिल काउंसिल का गठन इस पूरी प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। (Ladakh 7 Hill Councils)

चांगथांग जिले पर सबसे ज्यादा नजर क्यों?

नई हिल काउंसिल में सबसे ज्यादा चर्चा चांगथांग जिले की हो रही है। इसका मुख्यालय न्योमा बनाया गया है। यह इलाका वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के बेहद करीब है और इसमें चुशूल, डेमचोक, कोयुल, न्योमा और अन्य कई महत्वपूर्ण गांव शामिल हैं।

राजस्व रिकॉर्ड में इन गांवों को स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाने और अलग जिला प्रशासन बनने से सरकारी योजनाओं, राजस्व व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन को मजबूत आधार मिलेगा।

वहीं, न्योमा पहले से ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहां भारतीय वायुसेना का हाई एल्टीट्यूड एडवांस लैंडिंग ग्राउंड तैयार किया जा रहा है। दूसरी ओर सेना की कई महत्वपूर्ण तैनातियां भी इसी इलाके के आसपास हैं।

ऐसे में जिला मुख्यालय भी न्योमा में बनने से नागरिक प्रशासन और सरकारी सेवाओं की मौजूदगी और मजबूत होगी। इससे विकास योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों को स्थानीय स्तर पर लागू करना आसान होगा। (Ladakh 7 Hill Councils)

सीमा पर प्रशासनिक व्यवस्था क्यों होती है महत्वपूर्ण?

सीमावर्ती इलाकों में केवल सेना की मौजूदगी ही काफी नहीं होती। वहां मजबूत नागरिक प्रशासन, नियमित सरकारी सेवाएं और स्थानीय आबादी की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी होती है।

चांगथांग जैसे इलाके में नया जिला बनने के बाद सरकारी कार्यालय, राजस्व व्यवस्था, विकास योजनाएं और स्थानीय प्रशासन पहले की तुलना में ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम कर सकेंगे। इससे लोगों को छोटी-छोटी प्रशासनिक जरूरतों के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।

सूत्रों ने बताया कि लद्दाख के नए जिलों के गठन के साथ राजस्व रिकॉर्ड को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार प्रत्येक गांव की स्पष्ट प्रशासनिक पहचान तय की जा रही है।

सीमावर्ती इलाकों में सही भूमि रिकॉर्ड, गांवों की आधिकारिक सूची और प्रशासनिक सीमाएं सरकारी कामकाज का अहम हिस्सा होती हैं। इससे विकास योजनाओं, सड़क, बिजली, पानी और अन्य सरकारी परियोजनाओं को लागू करने में आसानी होती है।

पश्मीना अर्थव्यवस्था को मिल सकता है नया आधार

चांगथांग दुनिया की सबसे अच्छी पश्मीना ऊन के लिए जाना जाता है। यहां रहने वाले चांगपा समुदाय की आजीविका मुख्य रूप से पश्मीना बकरियों पर निर्भर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर ऊन की प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की व्यवस्था मजबूत हो, तो केवल कच्ची ऊन बेचने की बजाय तैयार उत्पादों से स्थानीय लोगों की आय बढ़ सकती है।

नई जिला व्यवस्था में स्थानीय विकास योजनाएं बनने से इस क्षेत्र के पारंपरिक व्यवसायों को भी प्राथमिकता मिलने की संभावना है। (Ladakh 7 Hill Councils)

याक डेयरी भी बन सकती है स्थानीय आय का बड़ा स्रोत

इसके अलावा चांगथांग और आसपास के ऊंचाई वाले इलाकों में याक पालन लंबे समय से होता रहा है। यहां बनने वाला याक चीज (चुरपे) और अन्य डेयरी उत्पाद धीरे-धीरे पहचान बना रहे हैं। यदि स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग, गुणवत्ता प्रमाणन और विपणन की व्यवस्था विकसित की जाए तो याक डेयरी उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

वहीं, चांगथांग, नुब्रा, हानले, पांगोंग त्सो, त्सो मोरीरी और जांस्कर जैसे इलाके पहले से ही देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। नई जिला व्यवस्था के बाद प्रत्येक जिला अपनी पर्यटन योजनाएं खुद तैयार कर सकेगा। स्थानीय प्रशासन सड़क, होम-स्टे, पर्यटन सुविधाओं और स्थानीय रोजगार से जुड़ी योजनाओं पर अपने स्तर पर काम कर सकेगा। (Ladakh 7 Hill Councils)

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी उठाए बड़े कदम

लद्दाख में प्रशासनिक बदलाव के साथ-साथ पर्यटन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए भी हाल के महीनों में कई अहम फैसले लिए गए हैं। इनका उद्देश्य पर्यटन को संगठित ढंग से विकसित करना, स्थानीय लोगों की आय बढ़ाना और निवेश को बढ़ावा देना है।

जून 2026 में उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने लद्दाख टूरिज्म डेवलपमेंट सोसाइटी (LTDS) के गठन को मंजूरी दी थी। यह एक स्वायत्त संस्था होगी, जो पर्यटन और संस्कृति विभाग के साथ मिलकर काम करेगी। इसका उद्देश्य लद्दाख को केवल मौसमी पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सालभर आकर्षण का केंद्र बनाने की दिशा में योजनाएं तैयार करना है।

यह संस्था एडवेंचर टूरिज्म, इको-टूरिज्म, एस्ट्रो-टूरिज्म, वाइल्डलाइफ टूरिज्म और कम्युनिटी आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने पर काम करेगी। साथ ही पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढांचे का विकास, स्थानीय युवाओं के लिए प्रशिक्षण, सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाना और लद्दाख की वैश्विक ब्रांडिंग भी इसकी जिम्मेदारी होगी।

इससे पहले मई 2026 में लेफ्टिनेंट गवर्नर ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा की थी। जिसके तहत पर्यटन विभाग में पंजीकृत होटल और गेस्ट हाउस को ‘इंडस्ट्री’ का दर्जा देने का भी फैसला किया गया। इस फैसले के बाद इन प्रतिष्ठानों को औद्योगिक श्रेणी के अनुसार कई सुविधाएं मिल सकेंगी। इनमें बिजली और पानी की रियायती दरें, आसान बैंक ऋण और अन्य औद्योगिक प्रोत्साहन शामिल हैं। प्रशासन का मानना है कि इससे होटल उद्योग की लागत कम होगी और नए निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि पर्यटन लद्दाख की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। ऐसे में पर्यटन को संस्थागत रूप से मजबूत करने और होटल उद्योग को राहत देने वाले ये फैसले स्थानीय रोजगार, होम-स्टे, हस्तशिल्प, परिवहन और अन्य पर्यटन आधारित व्यवसायों को भी मजबूती दे सकते हैं।

चीन को काउंटर करने की रणनीतिक तैयारी

चीन अपनी “सलामी स्लाइसिंग” रणनीति के तहत किसी बड़े सैन्य संघर्ष की बजाय छोटे-छोटे कदम उठाकर किसी इलाके पर धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करता है। चीन कई बार सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, पुल, गांव, सैन्य चौकी या अन्य ढांचे बनाकर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में भी चीन पर ऐसी रणनीति अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।

लद्दाख भारत का सबसे संवेदनशील सीमावर्ती इलाका है, जिसकी सीमा चीन के कब्जे वाले तिब्बत से लगती है। मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुए सीमा विवाद और गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों ने एलएसी पर सैनिकों, हथियारों और बुनियादी ढांचे को लगातार मजबूत किया है। चीन ने अपनी तरफ अक्साई चिन और तिब्बत क्षेत्र में सड़कें, पुल, रेल लाइनें, नए गांव, एयरबेस और सैन्य ढांचे का तेजी से विस्तार किया है। जवाब में भारत ने भी दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (डीएस-डीबीओ) सड़क, न्योमा एयरफील्ड का विस्तार, सीमावर्ती सड़कों, सुरंगों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर तेजी से काम किया है।

वहीं, चीन तिब्बत में विकास और प्रशासन से जुड़े ज्यादातर फैसले केंद्र स्तर पर लेता है। जबकि भारत लद्दाख में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। सातों जिलों में हिल काउंसिल बनने के बाद कई अहम फैसले स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से लिए जा सकेंगे। साथ ही, सीमावर्ती इलाकों में मजबूत स्थानीय प्रशासन और लोगों की सक्रिय भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। (Ladakh 7 Hill Councils)

भारत के S-400 से परेशान है चीन? LAC के पास एक्सरसाइज में PLA ने 370 मिमी गाइडेड रॉकेट से एयर डिफेंस सिस्टम को बनाया निशाना, क्या है ड्रैगन की रणनीति?

India S-400 China Drill
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India S-400 China Drill: भारत के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर चीन कितना घबराया हुआ है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने हाल ही में एक सैन्य अभ्यास किया। , इस एक्सरसाइज में एस-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम पर हमला करने का अभ्यास किया गया। हाल ही में पश्चिमी थिएटर कमांड की ओर से जारी वीडियो में 370 मिमी गाइडेड रॉकेट से एयर डिफेंस रडार पर हमला करते हुए दिखाया गया है।

चीन का पश्चिमी थिएटर कमांड भारत के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की जिम्मेदारी संभालती है। अभ्यास के दौरान चीन ने लंबी दूरी तक मार करने वाले गाइडेड रॉकेट का इस्तेमाल करते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि जरूरत पड़ने पर वह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर शुरुआती हमला कर सकता है।

India S-400 China Drill: किस हथियार का किया गया इस्तेमाल

अभ्यास में चीन ने 370 मिमी गाइडेड रॉकेट का इस्तेमाल किया। माना जाता है कि यह रॉकेट पीसीएल-191 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम से दागा जाता है। यह चीन की नई पीढ़ी की लंबी दूरी की रॉकेट प्रणाली है।

यह रॉकेट सैटेलाइट नेविगेशन और इनर्शियल गाइडेंस सिस्टम की मदद से अपने तय स्थान तक पहुंचता है। अलग-अलग संस्करणों की मारक क्षमता लगभग 300 से 350 किलोमीटर तक बताई जाती है।

चीन ने रॉकेट आर्टिलरी पर क्यों बढ़ाया जोर

पश्चिमी थिएटर कमांड ने पिछले कुछ सालों में अपनी लंबी दूरी की रॉकेट क्षमता में काफी बढ़ोतरी की है। इसमें पीसीएल-191 जैसे आधुनिक मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम शामिल हैं। यह सिस्टम कुछ ही मिनटों में कई गाइडेड रॉकेट दाग सकता है।

रिपोर्टों के मुताबिक 370 मिमी गाइडेड रॉकेट सैटेलाइट और इनर्शियल गाइडेंस की मदद से लंबी दूरी तक पहुंच सकते हैं। ऐसे हथियारों का इस्तेमाल स्थिर सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशन, मिसाइल बैटरियों और कमांड सेंटर पर हमला करने के लिए किया जाता है।

साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद पीएलए ने तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत की है।

पश्चिमी थिएटर कमांड ने इन इलाकों में लंबी दूरी की रॉकेट प्रणाली, ड्रोन, निगरानी उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम की संख्या बढ़ाई है। (India S-400 China Drill)

क्या है इस रणनीति का मतलब

चीन की यह एक्सरसाइज ‘सप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंसिस (SEAD)’ और ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ एनिमी एयर डिफेंसिस (DEAD)’ रणनीति पर आधारित थी। आधुनिक युद्ध में इन दोनों रणनीतियों का उद्देश्य किसी भी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर या पूरी तरह निष्क्रिय करना होता है। इसके लिए पहले एयर डिफेंस रडार, मिसाइल लॉन्चर, कमांड सेंटर और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों की पहचान की जाती है। इसके बाद लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य हथियारों की मदद से उन पर एक साथ हमला किया जाता है, ताकि विरोधी की हवाई सुरक्षा कमजोर पड़ जाए। जब एयर डिफेंस सिस्टम प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते, तब लड़ाकू विमान और अन्य हमलावर प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत कम जोखिम के साथ अपने मिशन पूरे कर सकते हैं।

चीन के हालिया अभ्यास से यह संकेत मिलता है कि उसकी सेना भविष्य में किसी भी बड़े संघर्ष की शुरुआत में सबसे पहले विरोधी के एयर डिफेंस नेटवर्क को निशाना बनाने की तैयारी पर विशेष ध्यान दे रही है। इसी सोच के तहत पीएलए ने अपने युद्धाभ्यास में गाइडेड रॉकेट, लंबी दूरी की मारक क्षमता और आधुनिक हमले की तकनीकों का प्रदर्शन किया। यह अभ्यास चीन की बदलती सैन्य रणनीति और संयुक्त युद्ध क्षमता को भी दर्शाता है।

India S-400 China Drill
PLA Western Theater Command has released footage from an exercise showing a PCL-191 multiple launch rocket system (MLRS) simulating the destruction of a 92N6E fire-control radar – part of the S-400 air defence system.

अब केवल लड़ाकू विमानों पर निर्भर नहीं चीन

कुछ साल पहले तक लड़ाकू विमानों किसी भी देश की सुरक्षा की रीढ़ होते थे। लेकिन अब चीन अपनी रणनीति बदल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पीएलए अब रॉकेट आर्टिलरी, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और साइबर हमलों का एक साथ इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य युद्ध की शुरुआत में ही कम्युनिकेशन नेटवर्क, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम और कमांड सेंटर को प्रभावित करना होता है। इसे मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की रणनीति कहा जाता है, जिसमें एक साथ कई तरह के सैन्य साधनों का इस्तेमाल किया जाता है। (India S-400 China Drill)

भारत के लिए एस-400 क्यों अहम

भारत ने रूस से पांच एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं। यह दुनिया के सबसे आधुनिक लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। इसके अलावा रक्षा मंत्रालय पहले ही अतिरिक्त पांच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे चुका है। जिसके बाद भारत के पास कुल 10 एस-400 स्क्वाड्रन हो जाएंगे।

एस-400 एक साथ कई तरह के हवाई खतरों पर नजर रख सकता है। यह लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल को अलग-अलग दूरी पर रोकने की क्षमता रखता है। इसकी अधिकतम मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर तक बताई जाती है।

भारतीय वायुसेना ने इसे उत्तर और पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैनात किया है। यह प्रणाली भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ मिलकर काम करती है, जिससे अलग-अलग रडार और एयर डिफेंस नेटवर्क से जानकारी एक साथ मिलती रहती है। (India S-400 China Drill)

भारत भी लगातार मजबूत कर रहा है अपनी हवाई सुरक्षा

भारत भी बदलते युद्ध के स्वरूप को देखते हुए अपनी हवाई सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहा है। एस-400 के अलावा आकाश मिसाइल सिस्टम, बराक-8, क्यूआरएसएएम और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस जैसी कई प्रणालियां अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा देती हैं। इन सभी को जोड़कर मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क तैयार किया गया है।

इसके अलावा डीआरडीओ लंबे समय से प्रोजेक्ट कुशा पर भी काम कर रहा है। यह भारत का स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है। इसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करना और स्वदेशी क्षमता को मजबूत करना है।

भारतीय सेना और वायुसेना लगातार कर रही हैं अभ्यास

भारतीय सेना और वायुसेना भी समय-समय पर संयुक्त सैन्य अभ्यास करती रहती हैं। इन अभ्यासों में एयर डिफेंस सिस्टम, लड़ाकू विमान, मिसाइल इकाइयों और रडार नेटवर्क के बीच तालमेल की जांच की जाती है। साथ ही तेजी से तैनाती, स्थान बदलने और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा से जुड़े अभ्यास भी किए जाते हैं। आधुनिक युद्ध में केवल अत्याधुनिक हथियार होना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें तेजी से तैनात करना, सुरक्षित रखना और पूरे नेटवर्क के साथ जोड़कर इस्तेमाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। (India S-400 China Drill)